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न्याय पर मीडिया दबाव

मुख्य न्यायाधीश ने कहा है कि उन्हें ठीक से न्यायसंगत निर्णय लेने में मीडिया ट्रायलों से तकलीफ होने लगी है क्योंकि मीडिया पहले से ही फैसले सुना देती है कि कौन कितना अपराधी है. सनसनी फैलाने में इलैक्ट्रौनिक टीवी चैनल और सोशल मीडिया आगे हैं जबकि प्रिंट मीडिया व समाचारपत्र काफी संयत हैं. आमतौर पर जज चाहते हैं कि जब फैसला उन के हाथों में हो, तो उन को समाचारपत्रों, टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर प्रचारित की जा रही बातों को सुनना न पड़े ताकि वे उस तरह के तर्कों से प्रभावित न हों.

मीडिया से ज्यादा न्यायपूर्ण निर्णय देने में जो बात आज आड़े रही है और जिस का जिक्र मुख्य न्यायाशीश ने नहीं किया वह है सरकार व सत्ताधारी पार्टी के बयान जो पहले तो मतलब के मामले उछालते हैं और फिर उन्हें बुरी तरह ले उड़ते हैं. 2012-13 के दौरान भाजपाई सोच वाले कंपट्रोलर जनरल औफ इंडिया (लेखा विभाग के महानिरीक्षक) विनोद राय ने मीडिया की बात व निराधार तथ्यों के आधार पर कोयला खानों के ठेकों और टैलीकौम स्कैमों पर लाखोंकरोड़ों के घपलों की रिपोर्टें जारी कर दी थीं.

उन के तर्क लचर थे. कांग्रेस सरकार को दबाव में झुकना पड़ा. जजों ने सरकारी मोहर लगे झूठ के कारण कितनों को जेलों में भेज दिया. आज 15 साल बाद विनोद राय अपनी गलती मान रहे हैं क्योंकि उन आरोपों में किसी को सजा नहीं पर उन आरोपों के लिए कितने ही जेलों में महीनों, सालों बंद रहे और कांग्रेस सरकार ने राज खो डाला.

आज कोई विनोद राय पनपता है तो उस पर विनोद राय जैसे ही आरोप लगा कर उसे बंद कर दिया जाता है. सो, डर के मारे सब ने मुंह सी लिया है.

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने टीवी चैनलों और सोशल मीडिया को फटकारा, यह बहुत अच्छा है पर फटकार से काम नहीं चलता. सुप्रीम कोर्ट चाहे तो ट्रायल कोर्टों को आदेश दे सकती है कि निराधार आरोप लगाने वालों के खिलाफ दायर किए गए मुकदमों में महीनों में नहीं बल्कि सप्ताहों में सजा दे दी जाए मुजरिम चैनलों व सोशल मीडिया पर भारी जुर्माना लगाया जाए. ऐसा हो जाए तो काफी हद तक सुधार हो सकता है. सोशल मीडिया चैनल को बंद करने या चलाने वाले को गिरफ्तार करने का आदेश फिर भी गलत होगा. लेकिन कोरा कथन काफी नहीं है.

समाज को आलोचना करने का हक यथावत रहना चाहिए. आलोचना करने वाले को ही पकड़ कर बंद कर देने की जो पौराणिक परंपरा आज फिर से पिछले दरवाजे से लाई जा रही है, बंद होनी चाहिए. टीवी चैनल और सोशल मीडिया असल में पौराणिक सोच को थोपने के षड्यंत्र के हिस्से हैं. इन के निशाने पर सोनिया गांधी, राहुल गांधी, ममता बनर्जी, स्टालिन या निर्भीक पत्रकार नहीं हैं, इन के निशाने पर सवर्णों की औरतें, पिछड़ों के नेता, दलितों के मुखर होते विचारक, मुसलमानों के हक मांगने वाले लोग हैं. इन का उद्देश्य यह है कि धर्म का व्यापार न केवल चले, पौराणिक गाथाओं की तरह फलेफूले और राजा को सुरक्षा भी मिले. ये चाहते हैं कि देश उन के कहने पर चले जैसे विश्वामित्र के कहने पर राजा दशरथ ने रामायण की कथा में राम और लक्ष्मण को बालावस्था में ही आश्रम की सुरक्षा के लिए भेज दिया था.

आज न्यायपालिका में पौराणिक सोच वाले कम नहीं हैं. अमेरिका जैसे उन्नत व स्वतंत्र देश में डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के मनोनीत वकील घोषित रूप में चर्च की सोच के गुलाम नजर आते हैं.

भारत का लोकतंत्र आज फिर जंगखाई पुरानी पटरियों पर उतर चुका है. परिणाम चाहे घातक व भयंकर बढ़ती बेरोजगारी, मंहगाई, अभावों, अराजकता, सर्विलैंस स्टेट के रूप में सामने आ रहा हो लेकिन मंदिर व्यवसाय तो चमक रहा है न. और जब बढ़ते मंदिर, बढ़ती वर्णव्यवस्था व महिलाओं की अपमानजनक स्थिति का लक्ष्य पूरा हो रहा हो तो किसे न्यायसंगत निर्णयों की आवश्यकता है. भगवा सरकार तो यही चाहती है न.

52 वर्ष की उम्र में मुझे Pimples निकल रहा है, क्या करूं?

सवाल

मेरी उम्र 52 वर्ष है. अमूमन किशोरावस्था में लड़कियों को पिंपल्स की शिकायत होती है लेकिन तब मेरे चेहरे पर कोई पिंपल नहीं निकला. चेहरा एकदम साफसुधरा और ग्लो करता था. कभी निकलता भी था तो एकाध, वह भी अपनेआप ठीक हो जाता था. कोई निशान भी नहीं पड़ता था चेहरे पर. 50 की उम्र तक ऐसा ही चलता रहा लेकिन अब मेरे चेहरे पर पिंपल्स की भरमार है. एक्ने के निशान जाने का नाम नहीं लेते. चेहरा देखने में भद्दा लगता है. मुझे बहुत बुरा लगता है, अपनेआप को इस तरह देखने की आदत जो नहीं रही कभी. कई क्रीमें लगा चुकी हूं लेकिन एक के बाद एक पिंपल्स निकलते आ रहे हैं. मेकअप करना भी अच्छा नहीं लगता है. आप ही कोई राय दें.

जवाब

आप की परेशानी हम सम  झ रहे हैं. चेहरे पर दागधब्बे हो जाएं तो खूबसूरती कम हो जाती है. टीनएज में तो ऐसा होता है लेकिन आप की उम्र में पिंपल्स का होना दर्शा रहा है कि आप डाइट अच्छी नहीं ले रही हैं. आप के शरीर में जरूरी विटामिंस की कमी हो गई है.

विटामिन ए एक एंटी औक्सीडैंट है जो मुफ्त कणों (फ्री रैडिकल्स) से लड़ता है. यह शरीर में होने वाली सूजन को कम करता है. इस की कमी को पूरा करने के लिए टमाटर, हरीमिर्च और गाजर खानी चाहिए.

विटामिन बी 3 की कमी से भी त्वचा पर दागधब्बे और दाने होते हैं. इस के एंटीइंफ्लेमेटरी गुण एक्ने का इलाज करने में मदद करते हैं. यह त्वचा की चमक भी बढ़ाने का काम करता है. साथ ही, कीलमुंहासों को रोकने का काम भी करता है. यह चेहरे पर जमा होने वाले औयल को कम भी करता है.

विटामिन डी इम्यूनिटी बढ़ाने में भरपूर सहयोग करता है. यह भी चेहरे पर होने वाली सूजन को कम करता है. यह एक्ने को कंट्रोल करने में मदद करता है. साथ ही, यह विटामिन हड्डियों को मजबूत करने का भी काम करता है.

विटामिन ई इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर है जो एंटी औक्सीडैंट का काम करता है. यह विटामिन त्वचा की नमी को कम करता है और कोलेजन के उत्पादन को बढ़ावा देता है, जिस से चेहरे पर चमक आती है.

आप अपनी बौडी टैस्ट करवाइए जिस से पता चले कि आप की बौड़ी में किन विटामिंस की कमी है. डाक्टरी परामर्श लीजिए, जल्दी ही इस समस्या से नजात मिल जाएगी.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर ‘आदर्श ग्राम योजना’ की कहानी

डा. राजाराम त्रिपाठी, राष्ट्रीय संयोजक, अखिल भारतीय किसान महासंघ आईफा

साल 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस नई योजना ‘आदर्श ग्राम’ की घोषणा की, तो तमाम गाजेबाजे और विज्ञापनों के जरीए भले ही यह स्थापित करने का प्रयास किया गया, पर दरअसल ऐसा नहीं है. यह कोई नई विलक्षण सोच या नई योजना नहीं है.

योजना के लागू होने के

8 साल बीत जाने के बाद भी आज इन सवालों के जवाब ढूंढ़ना, जांचपड़ताल करना और सही जवाब न मिलने पर सरकार से इन सवालों के जवाब लेना इस देश के हर वोटर का, हर नागरिक का फर्ज भी है और हक भी.

1 अक्तूबर, 2014 को ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ की घोषणा अन्य बहुसंख्य सरकारी योजनाओं की तरह ही पूरे तामझाम, ढोलनगाड़े के साथ की गई थी. प्रधानमंत्री के मनमोहक डिजाइनर रंगीन फोटो के साथ समाचारपत्रों में फुलपेजिया विज्ञापन छपे थे. टीवी चैनलों पर कई दिनों तक भाट चारणों ने समवेत स्वर में इस महान युगांतरकारी कार्ययोजना का गुणगान किया था. इस योजना को ‘समावेशी विकास का ब्लूप्रिंट’ कहा गया. 8 अप्रैल, 2015 को यह योजना शुरू हुई.

* सरकारी वैबसाइट के अनुसार, ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ (एसएजीवाई)  संसद के दोनों सदनों के सांसदों को प्रोत्साहित करती है कि वे अपने निर्वाचन क्षेत्र के कम से कम एक गांव की पहचान करें और साल 2016 तक एक आदर्श गांव का विकास करें.

इस योजना के उद्देश्यों को अगर आप ठीक से पढ़ेंगे, तो सम्मोहित हो जाएंगे. इस के उद्देश्यों की बानगी पेश है :

* ग्राम पंचायतों के समग्र विकास के लिए नेतृत्व की प्रक्रियाओं को गति प्रदान करना.

* सभी वर्गों के जीवनयापन और जीवन की गुणवत्ता व स्तर में पर्याप्त रूप से सुधार करना.

* पंचायत और गांव का ऐसा सर्वविध समग्र विकास करना कि अन्य गांव और पंचायती प्रेरणा लें.

* चुने गए आदर्श ग्रामों को स्थानीय विकास के ऐसे केंद्रों के रूप में विकसित करना, जो अन्य ग्राम पंचायतों को प्रशिक्षित कर सकें. और अन्य भी हैं…

बुनियादी सुविधाओं में सुधार करना. उच्च उत्पादकता. मानव विकास में वृद्धि करना. आजीविका के बेहतर अवसर. असमानताओं को कम करना. हक की प्राप्ति. व्यापक सामाजिक गतिशीलता. समृद्ध सामाजिक पूंजी में वृद्धि करना वगैरह यानी इतना सबकुछ कि विकसित से विकसित शहर भी इन गांवों से रश्क करें. लिखने, पढ़ने व सुनने में बड़ा अच्छा लगता है सबकुछ.

चाहे देश में हो या विदेश में भारत को हमेशा गांवों का, किसानों का देश कहा जाता है. नई उपलब्ध सरकारी जानकारी के अनुसार, हमारे देश में 6 लाख, 49 हजार, 481 गांव यानी साढ़े 6 लाख गांव हैं.

आजादी के बहुत पहले साल 1909 में महात्मा गांधी ने अपनी किताब ‘हिंद स्वराज’ में ‘आदर्श ग्राम’ की संकल्पना की थी. लेकिन गांधी के आदर्शों की बातें तो बहुत की गईं, लेकिन गांधी के सपनों के गांव हम आज तक नहीं बना सके.

ऐसे ही साल 2009-10 में भी गांवों के समग्र विकास की एक योजना लाई गई थी, ‘प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना’ (पीएमएजीवाई). इस योजना में ऐसे गांवों का चयन करना था, जहां अनुसूचित जातियों की तादाद 50 फीसदी से अधिक हो.

चूंकि संविधान में देश के सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समानता का अधिकार दिया गया है, इसलिए इन तबकों को समाज में बराबरी के स्तर पर लाना इस का प्रमुख उद्देश्य था.

18 राज्यों के तकरीबन 16,000 गांवों को चुना गया, हर गांव के लिए 21 लाख रुपए की राशि भी प्रावधानित की गई थी. इस योजना के उद्देश्य और लक्ष्यों की अगर हम बात करें, तो इस योजना में कुल 13 बिंदुओं में ग्रामीण विकास की इतनी अच्छीअच्छी योजनाओं का उल्लेख किया गया है कि अगर सारी योजनाओं का शतप्रतिशत क्रियान्वयन हो जाता, तो गांव  बेहतर हो जाते.

इसी तरह समयसमय पर ऐसी कई लुभावनी योजनाएं बनाई गईं, जैसे कि लोहिया ग्राम योजना, अंबेडकर ग्राम योजना और गांधी ग्राम योजना, अटल आदर्श ग्राम योजना, उत्तराखंड वगैरह, जिन्होंने देश के गांवों को ‘आदर्श ग्राम’ बनाने का दावा किया, वादे किए, सपने दिखाए, वोट बटोरा, अपनीअपनी सरकारें बनाईं, पर न तो गांवों का हाल बदला और न ही उन की तसवीर.

तत्कालीन सरकारों से आज यह सवाल क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि क्या इस योजना के एक दशक बाद भी इन तबकों को हम समानता के स्तर पर ला सके हैं? अगर ऐसा नहीं कर पाए हैं, तो इस के लिए दोषी कौन हैं?

ऐसा नहीं है कि गांवों में बदलाव नहीं आया है. गांवों में ढेरों बदलाव दिखाई दे रहे हैं. गांव में साइकिलों के बजाय मोटरसाइकिलें आ गई हैं. पंच और सरपंचों के घर पक्के हो गए हैं. इन के घरों में चारपहिया वाहन भी देखे जा सकते हैं. और कुछ चाहे मिले या ना मिले, किंतु मोबाइल और टीवी हर घर की अनिवार्य जरूरतों में शुमार हैं.

असीमित कमीशनखोरी के साथ ही साथ पंचायत, अस्पताल, स्कूलों के पक्के भवन भी बनते जा रहे हैं, पर इन गुणवत्ताविहीन भवनों में न तो सुयोग्य शिक्षक हैं, न ही नियमित डाक्टर और न समुचित दवा.

जहांजहां सड़कें बनी भी, उन्हें भी अनियंत्रित कमीशनखोरी के अजगर ने आधापौना लील लिया है. कहींकहीं तो विकास के नाम पर गांवों में पहले से ही चल रहे अस्पतालों के नाम बदल कर उन्हें ‘वैलनैस सैंटर’ जैसा फैंसी नाम दे दिया गया, पर हमारे इन अस्पताल कम वैलनैस सैंटर्स की जमीनी हकीकत को कोरोना ने उधेड़ कर दुनिया को दिखा दिया था.

पर, बहुतकुछ ऐसा भी है, जो आज भी नहीं बदला है. जैसे कि गांवों में अव्वल तो नालियां हैं ही हीं, और जहां कच्चीपक्की कुछेक हैं भी, वहां आज भी पहले की तरह ही नालियां बदस्तूर बजबजा रही हैं. पहले की तरह गंदगी व मच्छरों, बीमारियों का साम्राज्य आज भी है. इंचइंच जमीनों के लिए लड़ाईझगड़ों के मामले आज भी जारी हैं.

कुछ अपवादों को छोड़ ज्यादातर जींसपैंट पहनने वाली ग्रामीण युवा पीढ़ी को भी पढ़ेलिखे सभ्य लोगों की तरह ही मिट्टी, कीचड़, गोबर, गायगोरू, खेतखलिहान की जहमत से सख्त परहेज है. किसान का युवा बेटा बाप की

4 एकड़ जमीन पर खेती करने के बजाय उस की 2 एकड़ जमीन बिकवा कर उस रकम की रिश्वत दे कर शहर में चपरासी की नौकरी करने की जुगाड़ में लगा हुआ है. गांव अब बिना देर किए किसी भी कीमत पर जल्द से जल्द शहर बनना चाहते हैं.

बड़े शहरों में रहने वाले कौंवैंट के बच्चे कभीकभार भूलेभटके अपने चाचाताऊ के यहां गांवों में आने पर अकसर यह सवाल पूछ ही लेते हैं कि जब अमूल और मदर डेरी इतना अच्छा दूध दे रहे हैं, तो आप लोग गांवों में दूध के लिए ये गायभैंस, गोबर, गौमूत्र की गंदगी क्यों बना कर रखे हैं? और इस बदबू और मच्छरों के बीच आप लोग भला रह कैसे पाते हैं?

इसी योजना के तहत स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भी वाराणसी से 25 किलोमीटर दूर स्थित महज 2974 आबादी वाले गांव जयापुर को गोद लिया गया था. इस ग्राम के चयन के भी कई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कारण रहे होंगे. विजय को प्रेरित करता हुआ इस का जयापुर नाम भी एक कारण हो सकता है.

वैसे, कहा जाता है कि यह गांव शुरू से ही संघ का गढ़ रहा है. इस पर अंतिम मोहर लगने का यह भी एक स्वाभाविक व नैसर्गिक कारण हो सकता है.

समाचारों में ही हम ने सुना है कि इस गांव के तकरीबन 300 वर्ष पुराने महुआ के पेड़ को संरक्षित करने की कवायद हो रही है, तो वहीं दूसरी ओर देश के हजारोंहजार साल पुराने जैविक विविधता से भरपूर जंगलों के लाखों पेड़ों को पूरी निर्ममता के साथ केवल इसलिए काटा जा रहा है, ताकि इन राजनीतिक पार्टियों और नेताओं को मोटा चुनावी चंदा देने वाली बड़ी कंपनियों द्वारा लीज पर ली गई खदानों से अवैध रूप से अनमोल खनिज संपदा को जल्द से जल्द निकाल कर बेचा जा सके.

नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री सांसद आदर्श ग्राम योजना पार्ट वन- 2014 एवं पार्ट टू -2021 की अगर बात करें, तो सांसद आदर्श ग्राम योजना 2021 की वैबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, इस योजना के तहत 2314 ग्राम पंचायतों का चयन किया गया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गोद लिए गए इस गांव में भी इतने सालों बाद भी एकचौथाई परियोजनाओं पर काम ही शुरू नहीं हुआ (9 अक्तूबर, 2021 की स्थिति में). और अगर काम हो गया हो, तो गांव वालों को बधाई.

ऐसा नहीं है कि इस योजना के पूरे न होने के पीछे फंड या पैसों की कमी की कोई समस्या है. देश में यही एक ऐसी योजना है, जिसे पूरा करने के लिए फंड की कोई समस्या ही नहीं है. आदर्श सांसद ग्राम योजना के तहत विकास कार्य पूरा करने के लिए कई तरह से फंड मिलते हैं. इन में इंदिरा आवास, पीएम ग्रामीण सड़क योजना और मनरेगा भी शामिल है. इस के अलावा सांसदों को मिलने वाला स्थानीय क्षेत्र विकास फंड भी कार्यक्रम पूरा करने में मददगार है.

अप्रैल में सरकार ने संसद की एक समिति को यह जानकारी दी है कि पूर्व सांसदों के द्वारा स्थानीय क्षेत्र विकास निधि की 1,723 करोड़ रुपए की राशि खर्च नहीं की जा सकी है. इसे कुएं में भांग पड़ना नहीं कहिएगा तो और क्या कहिएगा?

जरा सोचिए… जो सांसद हाथ जोड़ कर वोट मांगते वक्त आप की सेवा करने का वादा करते हैं, जीतने के बाद… आप की सेवा के लिए मिली हुई रकम को 5 सालों में भी समुचित तरीके से खर्च करने का वक्त भी उन के पास नहीं है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से गांवों की किस्मत बदलने के तमाम सपने दिखाए, सांसदों ने भी गांवों को गोद ले कर बड़ेबड़े वादे भी किए, लेकिन 8 साल बीत जाने के बाद भी ऐसे कई गोद लिए गांवों में ‘समग्र समावेशी विकास’ की तो छोडि़ए, समुचित शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार और बुनियादी जरूरतों को तरसते इन गांवों में अभी तक सामान्य योजनाएं तक भलीभांति नहीं पहुंच पाई हैं.

सोचने वाली बात यह है कि जब देश के प्रधानमंत्री और सांसदों द्वारा गोद लिए गए गांवों का यह हाल है, तो बाकी देश के साढ़े 6 लाख गांवों के समावेशी समग्र विकास के बारे में बात करना और सवाल पूछना ही बेमानी और फुजूल है.

कहने को हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, लेकिन कुलमिला कर इन 75 सालों में ‘ग्राम-निवासिनी भारत माता’ का चेहरा चमकाने के नाम पर नाना नामधारी योजनाओं के जरीए जो सतही रंगरोगन की कवायद की गई, उन में पर्याप्त राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के चलते शक्ल को चमकाने के बजाय और भी ज्यादा बिगाड़ दिया है.

यह कहना गलत ना होगा कि प्रधानमंत्री की इस ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ में न तो सांसद पर्याप्त रुचि ले रहे हैं और न ही इन योजनाओं में दूरदूर तक आदर्श नामक कोई चिडि़या दिखाई दे रही है. यही वजह है कि इस से न तो भारत के गांवों की दशा बदल रही है और न ही भारत की तसवीर.

त्यौहार 2022: चुटकियों में बनाएं स्वादिष्ट समोसे

त्यौहार के समय अगर आपके दोस्त आ रहे हैं और आप कुछ खास बनाने की सोच रहे हैं तो समोसा उनके लिए सबसे बेहतर ऑप्शन होगा, तो इसे बनाने के लिए नीचे दिए गए रेसिपी को फॉलो करें.

सामग्री:

  1. पैपरिका- 1 टीस्पून,
  2. गर्म मसाला- 1/4 टीस्पून,
  3. आमचूर- 1/4 टीस्पून,
  4. नमक- 1 टीस्पून,
  5. अदरक- 1 टेबलस्पून,
  6. धनिया- 2 टेबलस्पून
  7. मैदा- 30 ग्राम,
  8. गेहूं का आटा – 180 ग्राम,
  9. मैदा- 180 ग्राम,
  10. चीनी पाउडर- 1/4 टीस्पून,
  11. नमक- 1 टीस्पून,
  12. तेल- 2 टेबलस्पून,
  13. पानी- 220 मि.ली.
  14. प्याज- 150 ग्राम
  15. चिड़वा- 80 ग्राम,
  16. पानी- 60 मि.ली.,
  17. तेल- तलने के लिए

विधि:

  • एक कटोरी में सभी चीजों को डाल कर अच्छी तरह से मिक्स करें. अब इसे नरम मुलायम आटे की तरह गूंथ लें.
  • एक कटोरे में सारी सामग्रियों को डालकर अच्छी तरह से मिक्स कर दें.
  • एक कटोरी में 30 ग्राम मैदा लेकर उसमें 60 मिली लीटर पानी डाल कर अच्छे से मिक्स करें.
  • अब गुंथे आटे का थोड़ा हिस्सा लेकर उसकी लोई बनाकर बेलें.
  • इसे काटकर 2 से 3 मिनट तक तवे पर सेंकें. अब इसे समोसे के आकार में रोल करके इसमें तैयार किया हुआ मिश्रण डालकर किनारों पर तैयार किया गया मैदे का पेस्ट लगाकर बंद कर दें.
  • अब कढ़ाई में तेल गर्म करके समोसों को गोल्डन ब्राउन होने तक फ्राई करें. अब इसे टिशु पेपर पर निकालें. जिससे अतिरिक्त तेल निकल जाये. फिर इसे टोमाटो सौस के साथ सर्व करें.

Film Review: ‘‘अतिथि भूतो भवः”

रेटिंगः दो स्टार

निर्माताः हार्दिक गुज्जर फिल्मस और  पेन आडियो

निर्देशकः हार्दिक गज्जर

कलाकारःजैकी श्राफ,प्रतीक गांधी ,शर्मिन सहगल,प्रतिमा कानन,दिवीना ठाकुर  अन्य.

अवधिः एक घंटा पचास मिनट

ओटीटी प्लेटफार्मजी 5

‘‘सिर्फ प्यार करना ही नही बल्कि प्यार जताना भी आना चाहिए’’ तथा ‘हर रिश्ते में खामियों को नजरंदाज करना चाहिए’ की बात करने वाली हार्दिक गुज्जर की रोमांटिक कौमेडी फिल्म ‘‘अतिथि भूतो भवा’’ हल्की फुल्की हास्य फिल्म है. पर सशक्त फिल्म नहीं है.

कहानी:

वर्तमान समय की इस कहानी का जुड़ाव 75 वर्ष से भी है. इसका जुड़ाव कहानी के केंद्र में स्टैंड अप कौमेडियन श्रीकांत शिरोड़कर (प्रतीक गांधी) हैं, जिन्हें खाना बनाने का शौक है.वह अपनी गर्लफ्रेंड व एअर होस्टेस नेत्रा (शर्मिन सेहगल ) के साथ चार वर्ष से लिव इन रिलेषनषिप में रह रहे हैं. श्रीकांत को प्यार जताना जरूरी नहीं लगता है,जबकि नेत्रा के लिए इमोशन्स और भावनाएं ही सबसे ज्यादा महत्व रखती हैं.इसी वजह से हर दिन छोटी छोटी बात पर श्रीकांत और नेत्रा के बीच तू तू मैं मैं होती रहती है. नेत्रा अब ‘लिव इन रिलेषनषिप’ को शादी में बदलना चाहती है.मगर श्रीकांत को अपने रिश्ते को नाम देने में कोई दिलचस्पी नहीं है. एक दिन जब अचानक एक दिन रात में अपने स्टैंडअप कौमेडी शो से वापस लौटते हुए श्रीकांत शिरोड़कर बीच रास्ते पर कुछ ऐसा करता है कि एक भूत (जैकी श्राफ ) उसके साथ अतिथि  बनकर श्रीकांत के घर आ जाता है.भूत का दावा है कि वह माखन सिंह है. और श्रीकांत शिरोड़कर तो उनके दारजी यानी कि दादा जी हैं,जिनका पुर्नजन्म हुआ है.1975 में माखन सिंह 16 सत्रह वर्ष के दारजी ने वादा किया था कि वह उनकी प्रेमिका मंजू यादव से मिलवाकर रहेंगें.जब माखन अपनी प्रेमिका को होली के दिन दारजी की इच्छानुसार अपनी प्रेमिका मंजू को प्रेम पत्र देने जाता है,तो जैसे ही वह मंजू को प्रेम पत्र व गुलाब का फूल देने वाला होता है, तभी उन्हें दारजी को हार्ट अटैक होने की खबर मिलती है.माखन सिंह के घर पहुंचने पर दारजी स्वर्ग सिधार चुके ेहोते हैं.इधर माखन को अपना प्यार नसीब नही होता.लगभग पैंतालिस वर्ष बीत चुके हैं.माखन की मौत हो चुकी है.पर श्रीकांत से मिलने तक वह एक पेड़ पर उल्टा टंगे रहते हैं.और दारजी ने मंुबई के महाराष्ट्यिन परिवार में श्रीकांत शिरोड़कर के नाम से पुर्नजन्म ले लिया है.अब माखन सिंह का भूत अपने दारजी यानी कि श्रीकांत शिरोड़कर के माध्यम से अपनी जिंदगी का प्यार पाना चाहता है.मजबूरन श्रीकांत शिरोड़कर अपनी महिला मित्र व स्टैडअप कौमेडियन सुचारिता सेन की गाड़ी में सुचारित ,अपनी प्रेमिका नेत्रा व माखन के भूत के साथ मथुरा पहुंचता है.कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं.अंततः श्रीकांत शिरोड़कर,नेत्रा व सुचित्रा को प्यार व रिश्तों की अहमियत समझ में आती है.

लेखन  निर्देशनः

गत वर्ष बतौर लेखक व निर्देशक रोमंाटिक फिल्म ‘‘भवाई’’ लेकर आने वाले फिल्मकार हार्दिक गुज्जर रोमांटिक कौमेडी की भूत वाली फिल्म ‘अतिथि भूतो भव’ लेकर आए हैं.जिसमें उन्होने जहां रिश्तों व प्यार की अहमियत व रिश्ते को कैसे मजबूत किया जाए, इस पर रोशनी डाली है. तो वहीं बेवजह अंधविश्वास फैलाने के साथ ही धर्म को भी बेचने का प्रयास किया है.साठ प्रतिशत फिल्म मथुरा में है, तो वहां मंदिर वगैरह का नजर आना स्वाभाविक है.मगर मुंबई से मथुरा जाते हुए जब ग्वालियर में सुचारिता के घर पर रूकते हैं,उस वक्त बेवजह दुर्गा जी की विशालमूर्ति व दुर्गा पूजा, आरती  आदि के दृष्य रखे गए हैं.मजेदार बात यह है कि यह भूत डराने की बजाय खुद दुर्गा माता की मूर्ति के आगे फूल चढ़ता है और कृष्ण मंदिर में भी जाता है.इन धार्मिक दृश्यों का कहानी से कोई संबंध नही है.बल्कि इससे कहानी में व्यवधान आता है.कहानी के स्तर पर 55 वर्षीय भूत का अपने युवा दादाजी से अपने प्यार को दिलाने की गुहार लगाना,अजीब सा लगता है.कई दृष्य ऐसे हैं,जिनमें हंसी नही आती,बल्कि बोरियत होती है.रोड ट्पि पर कई फिल्में बन चुकी हैं.उनके मुकाबले यह फिल्म काफी सतही है.फिर भी इसकी कहानी व पटकथा चुस्त है.संवाद काफी सहज हैं.भूत व पुर्नजन्म के माध्यम से कहानी को कए नया अंदाज देने का प्रयास किया गया है.फिल्म कहीं न कहीं महिला प्रधान होने का दावा करती है.क्योंकि  फिल्म के एक दृश्य में ‘सुकन्या समृद्धि योजना’ का विषाल विज्ञापन भी नजर आता है.फिल्म कुछ जगहों पर काफी धीमी है,जिसे एडीटिंग टेबल पर कसा जाना चाहिए था. निर्देशक ने इस फिल्म के माध्यम से प्यार के अमर होने की बात भी की है.सुचारिता के किरदार को ठीक से लिखा ही नही गया.

अभिनयः

श्रीकांत शिरोड़कर के किरदार में प्रतीक गांधी के अभिनय को देखकर निराषा होती है.गुजराती रंगमंच पर अपने अभिनय कार जलवा दिखाने के बाद गुजराती फिल्मों से फिल्मी दुनिया में पदार्पण करने वाले  प्रतीक गांधी ने हिंदी वेब सीरीज ‘स्कैम 92’ से अपनी अभिनय प्रतिभा की जो छाप छोड़ी थी,उस पर श्रीकांत षिरोड़कर के किरदार में वह धूल छाड़ते हुए ही नजर आते हैं. भूत के किरदार में जैकी श्राफ ने ठीक ठाक अभिनय किया है.छोटे से किरदार में प्रतिमा कानन अपना असर छोड़ जाती हैं. मशहूर फिल्मसर्जक संजय लीला भंसाली की भांजी और 2019 में प्रदर्शित फिल्म ‘मलाल’ में अभिनय कर चुकी शर्मिन सेहगल ने नेत्रा का किरदार निभाया है, जो कि उनके कैरियर की दूसरी फिल्म है. पर वह सिर्फ खूबसूरत नजर आयी हैं. किशोर वय के माखन सिंह के किरदार में प्रभज्येात सिंह ने काफी अच्छी परफार्मेस दी है.

एक रात ने बचा लिया चारू असोपा और राजीव सेन का घर!

टीवी एक्ट्रेस चारू असोपा  और राजीव सेन अपने रिश्ते को लेकर सुर्खियों में छाये रहते हैं. कुछ दिन पहले दोनों का रिश्ता टूटने की कगार पर पहुंच गया था. यहां तक कि दोनों एक-दूसरे से तलाक भी लेने वाले थे. लेकिन अब वो दोनों साथ हैं. इस बात का खुलासा खुद चारू असोपा ने अपने व्लॉग में किया है. आइए जानते हैं, पूरी खबर.

एक रात ने चारू असोपा और राजीव सेन की जिंदगी को पूरी तरह से बदल दिया. रिपोर्ट के अनुसार चारू असोपा ने बताया  कि 29 अगस्त की रात को उनके और राजीव सेन के बीच क्या हुआ था. चारू असोपा ने इस बारे में  कहा, मैं 29 अगस्त 2022 को मुंबई पहुंच गई थी और 30 तारीख को हम मुंबई फैमिली कोर्ट में जाने वाले थे.

 

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लेकिन तलाक से एक रात पहले मैं और राजीव साथ बैठे थे और हम अपने बारे में ही बात करने लगे. इन बातों के बीच हमारी कई मिसअंडरस्टैंडिंग दूर हो गईं, साथ ही हमने अपनी परेशानियां भी सुलझाई.

 

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एक्ट्रेस ने  आगे कहा कि शायद बप्पा चाहते थे कि हम दोनों को एक मौका और मिले और हम अपनी बेटी जियाना के लिए रिश्ते क दोबारा संवार सकें.

 

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चारू असोपा और राजीव सेन ने सोशल मीडिया के जरिए तलाक न लेने की जानकारी दी थी. उन्होंने एक फोटो शेयर की थी, जिसमें एक्ट्रेस, राजीव सेन और उनकी बेटी जियाना नजर आ रहे थे.

 

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Neha Kakkar पर फूटा फाल्गुनी पाठक का गुस्सा, पढ़ें खबर

बॉलीवुड की सिंगर फाल्गुनी पाठक (Falguni Pathak) और नेहा कक्कड़ (Neha Kakkar) को बीच इन दिनों सोशल मीडिया पर विवाद चल रहा है.  दोनों ही सिंगर एक-दूसरे के लिए  काफी कुछ लिख रही है. दरअसल फाल्गुनी पाठक  के ‘मैंने पायल है छनकाई’ को नेहा ने रिक्रिएट किया है. इसी गाने को लेकर दोनों के बीच बहस चल रहा है.

नेहा कक्कड़ ने इस गाने का रीमिक्स गाया है, जिसके बाद ये विवाद शुरू हो गया. अब फाल्गुनी पाठक ने नेहा को लेकर काफी कुछ बोला. इन सब के बाद अब फाल्गुनी पाठक ने एक इंटरव्यू में इसको लेकर अपनी राय रखी है.

 

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उन्होंने कहा, अगर मुझे इन सब से बारे में पहले पता होता तो मैं एक्शन लेतीं. इसके आगे उन्होंने बोला ‘जब अपने पर गुजरती है तब ही पता चलता है, इस बात का दुख है कि मुझे इस बारे में कुछ पता नहीं था.’ उनके इस इंटरव्यू ने बहस को एक नया मोड़ दिया है. जिसकी वजह से इसको लेकर काफी चर्चा हो रही है.

 

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हाल ही में नेहा कक्कड़ ने सोशल मीडिया पर तस्वीरें शेयर की थीं. इन तस्वीरों में नेहा कक्कड़ ब्लैक कलर की ड्रेस में नजर आ रही थीं. इन तस्वीरों को शेयर करते हुए नेहा ने कैप्शन लिखा ‘मैंने पायल है छनकाई.’ जिसके बाद इसको लेकर नेहा को सोशल मीडिया पर काफी ट्रोल किया गया.

 

और प्रतिभा नहीं रही- भाग 1: प्रतिभा अस्पताल में अकेली क्यों थी

‘‘पापाआप जल्दी आओ… मम्मी का औक्सीजन लेवल कम होता जा रहा है…’’ बेटे की घबराई हुई आवाज से सहम गया था मैं।

‘‘तुम चिंता मत करोमैं बस अभी पहुंच रहा हूं,” कहते हुए बिस्तर से उठ खड़ा हुआ। ऐसा कैसे हो सकता है। मैं अभी ही तो अस्तपाल से लौटा हूंतब तो सबकुछ ठीक था. सुबह डाक्टर ने भी बोला था कि प्रतिभा अब स्वस्थ्य हो रही है और 1-2 दिनों में ही उस का वैंटीलेटर हटा देंगे। फिर अचानक क्या हो गया… हो सकता है बच्चे घबरा रहे होंगे. जल्दी से कपड़े बदले और अस्पताल की ओर चल पड़ा। हालांकि दिल जोरजोर से धड़क रहा था। रास्तेभर कुदरत से कामना करता रहा कि सबकुछ ठीक ही करना… प्रतिभा को कुछ न होने पाए.

लगभग 1 माह पहले ही तो वे इस अस्पताल में भर्ती हुए थे। उन्हें कोरोना ने अपनी चपेट में ले लिया था।‘‘इन्फैक्शन ज्यादा है…औक्सीजन की कमी कभी भी महसूस हो सकती हैइसलिए तुम किसी बड़े अस्पताल में भर्ती हो जाओ…’’ डाक्टर ने कहा तो उसे प्रतिभा ने सुन लिया था,”आप कहीं जाने और जाने की व्यवस्था कर लो…’’

‘‘अरेमुझे कुछ नहीं हुआ…मैं एकदम स्वस्थ महसूस कर रहा हूं…’’‘‘नहीं…अभी स्वस्थ लग रहे हो पर यदि औक्सीजन की कमी हुई तो तत्काल कहां मिलेगी…आप तो चलने की तैयारी करो…हम चले ही चलते हैं…’’डर तो मुझे भी लग रहा था कि यदि वाकई औक्सीजन की कमी अचानक सामने आ गई तो क्या करेंगे। कोरोना की महामारी इतनी तेजी से फैल रही थी कि अस्पतालों में बैड खाली नहीं थे। मरीजों का औक्सीजन लेवल कम हो रहा था। सप्ताह भर में ही दर्जनों लोग अपनी जानें गवां बैठे थे। डर तो स्वाभाविक ही था। भैया ने भी बोल दिया था, ‘‘देखोतुम चले ही जाओ… हम कोई रिस्क नहीं लेंगे।’’

भैया हमारे लिए अभिभावक ही तो हैं…उन का स्नेह ही तो हमें संबल देता रहा है। भला उन की बात कैसे काट सकते थे। प्रतिभा ने नागेंद्र को फोन कर दिया था।

उन्होंने आननफानन में एक ऐंबुलैंस की व्यवस्था कर दी थी। ऐंबुलैंस ने रात में एक निजी अस्पताल में छोड़ दिया था। चैक करने के बाद मुझे

भर्ती कर लिया गया। प्रतिभा अस्पताल के परिसर में अकेली रह गई। मेरी केवल फोन पर ही बात हो सकी,”देखोकुछ खा लेना और वहीं परिसर में सो जाना…’’

 

‘‘हां…पर यहां तो वौशरूम तक की व्यवस्था नहीं है।’’‘‘अरे…आज की रात काट लो कल तुम वापस चली जाना। मैं नागेंद्र को बोल कर गाड़ी की व्यवस्था करा दूंगा…’’

 

‘‘आप को अकेला छोड़ कर…’’‘‘क्या कर सकते हैं….मुझे वार्ड से निकलने की इजाजत नहीं है और तुम परेशान होती रहोगी।’’‘‘रोली को बुला लेते हैं…हम दोनों रह आएंगे…’’‘‘अरे नहीं…इतनी महामारी फैली है…हम बच्चों के साथ रिस्क नहीं ले सकते।’’

 

प्रतिभा कुछ नहीं बोली। वह शायद मेरी बात से सहमत थी। मेरे हाथ में बौटल लगा दी गई थी। पलक झपकते ही मेरी आंखों में नींद ने जगह बना ली। दूसरे दिन सुबह आंख खुलते ही मुझे प्रतिभा की चिंता हुई । फोन पर ही बात कर सकती था, “कैसी हो…”

 

‘‘रातभर जागती रही…’’‘‘अरे ….सो जातीं…’’‘‘यहां तो कोई व्यवस्था है ही नहीं… और फिर आप की भी चिंता लगी थी…ये लोग मुझे वार्ड में घुसने ही नहीं दे रहे थे…’’ उस का स्वररोआंसा था।‘‘हांवार्ड में तो आने नहीं देते…अच्छा मैं गाड़ी मंगवा देता हूंतुम वापस घर चली जाओ…’’

 

वह कुछ नहीं बोली। जब गाड़ी में बैठने लगी तब ही उस ने फोन किया था, “गाड़ी आ गई है…पर मेरा मन नहीं जाने को….मैं रुक ही जाती हूं…’’

 

‘‘कैसे रुकोगी…यहां कोई व्यवस्था है नहीं….और फिर 1-2 दिन की बात हो तो भी ठीक हैपता नहीं मुझे कब तक अस्पताल में रहना पड़ेगा…’’

 

वैसेसच तो यह भी था कि प्रतिभा का जाना मुझे भी अखर रहा था। मैं अकेला कैसे अस्पताल में रहूंगा…पर क्या करताकोई विकल्प था ही नहीं।

 

‘‘मुझे बहुत घबराहट हो रही है…’’

 

‘‘घबराने की कोई बात नहीं है…यहां अच्छे से इलाज हो रहा है और कोई परेशानी होगी तो मैं रोली को बुला

लूंगा…तुम चली ही जाओ…’’प्रतिभा कुछ नहीं बोली। पर मैं समझ गया कि उस की आंखों से आंसू बहे ही होंगे। ऐसे आंसू तब भी बहे थे जब उस ने सुना था कि मैं कोरोना पौजिटिव हो गया हूं। उस के लिए घबराने की बात तो थी ही।

 

शहर में लगातार कोरोना के केस बढ़ रहे थे और दर्जनों लोगों की जानें जा चुकी थीं। उस के मन में समा गया था कि इस बीमारी से बच के निकल पाना आसान नहीं है। यही कारण था कि वह मुझे दूसरे शहर के अनजाने अस्पताल में अकेला छोड़ कर जाने से हिचक रही थी.

 

 

बिदके क्यों नीतीश कुमार

कहते हैं राजनीति में कब कौन किस का दोस्त और दुश्मन बन जाए कहा नहीं जा सकता. यहां साधे जाते हैं तो सिर्फ हित. इन्हीं हितों की उठापटक में राजनीतिक रिश्ते टूटतेबनते हैं. 9 अगस्त को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भारतीय जनता पार्टी के साथ एनडीए गठबंधन तोड़ा और अपने पद से इस्तीफा दिया और 10 अगस्त को विपक्षी पार्टियों के साथ महागठबंधन सरकार के मुखिया के तौर पर फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली. उन के साथ राजद के नेता तेजस्वी यादव ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली.

शपथ लेने के बाद अपने ही अंदाज में नीतीश कुमार ने राजभवन में आयोजित एक समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा. उन्होंने कहा, ‘‘वे 2014 में जीत गए, लेकिन अब 2024 को ले कर उन्हें चिंतित होना चाहिए.’’ उन्होंने आगे कहा, ‘‘जो 2014 में सत्ता में आए, क्या वे 2024 में भी जीतेंगे? मैं 2024 में सभी (विपक्षी दलों) को एकजुट देखना चाहूंगा. मैं ऐसे किसी पद (प्रधानमंत्री) की दौड़ में नहीं हूं.’’

नीतीश के उक्त आयोजन में दिए इस बयान से साफ है वे इस बार पूरी तैयारी के साथ आए हैं ताकि राज्य व देश में भाजपा की बढ़ती ताकत को रोका जा सके. इस बात से यह भी तय हो गया कि वे 2024 में लोकसभा में होने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए बड़ी योजना में शामिल हैं और उन के रडार में आने वाले दिनों में सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी होने वाले हैं.

सीटों का गणित

नीतीश कुमार ने 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा और उस के सहयोगी दलों के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था. बिहार में विधानसभा की कुल 243 सीटें हैं. सरकार बनाने के लिए 122 चाहिए. चुनाव में भाजपा को 74 सीटें मिलीं, राजद को 75 और जेडीयू को 43.

हाल ही में राजद की सीटों में बढ़ोतरी हुई थी, जिस में एआईएमआईएम से आए 4 विधायक समेत एक विधायक बोहचा से था जिस के बाद आरजेडी की सीटों की संख्या बढ़ कर 80 हो गई थी. ऐसे ही भाजपा की भी सीटों में बढ़ोतरी हुई, जिस में वीआईपी से 3 विधायक जुड़ कर कुल 77 हुए. वहीं जेडीयू में भी एक बीएसपी और एक एलजेपी का विधायक शामिल होने से उस की संख्या 45 पहुंची.

ऐसे में पक्ष और विपक्ष के बीच रस्साकशी चल रही थी. बिहार सरकार कब गिर जाए और नीतीश कब पाला बदल लें, इस तरह के कयास राजनीतिक जानकार काफी पहले से ही लगा रहे थे, क्योंकि नीतीश भले भाजपा के साथ सरकार बना लें पर दाल गलने वाली बात कम ही रहती है. ऐसे में नीतीश बिना आरजेडी के समर्थन के सरकार बना नहीं सकते थे.

पलटा-पलटी

गौरतलब है कि सियासत हर समय अपने रंगढंग बदलती रहती है. नीतीश कुमार इसी रंगढंग के मास्टर भी कहे जा सकते हैं, इस में कोई संदेह नहीं. नीतीश कुमार ने एक बार फिर अपने सियासी दोस्त बदले हैं. उन्होंने फिर एनडीए का साथ छोड़ दिया है और फिर महागठबंधन के साथ आ गए हैं. साल 2013 में भी उन्होंने एनडीए का साथ छोड़ा था और आरजेडी के साथ महागठबंधन में आ गए थे.

उस दौरान भी उन की तरफ से तर्क दिया गया कि वे सांप्रदायिकता के खिलाफ हैं और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के चेहरे के तौर पर उन्हें पसंद नहीं हैं. हालांकि लोकसभा चुनाव में आरजेडी और जेडीयू अलगअलग लड़ीं पर कमाल कोई नहीं कर पाई. भाजपा ने सब से अधिक 22 सीटों पर जीत हासिल की.

पर 2 वर्षों बाद 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव में आरजेडी और जेडीयू के महागठबंधन ने कमाल कर दिया. इस जोड़ी के आगे मोदी की पौपुलैरिटी फीकी पड़ गई और सत्ता की आस लगाए भाजपा को 2017 तक नीतीश के पलटने तक इंतजार करना पड़ा. उस दौरान नीतीश पर भ्रष्टाचारी का साथ देने के आरोप लगे और उन्होंने महागठबंधन का साथ छोड़ भाजपा व सहयोगी पार्टियों के साथ फिर से सरकार बना ली.

2020 में नीतीश कुमार ने एनडीए के साथ मिल कर ही चुनाव लड़ने का फैसला किया पर उस चुनाव में उन्हें कम सीटें मिलीं, बावजूद इस के उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया. तब नीतीश कुमार के बारे में कटाक्ष कसा गया था कि जब प्रदेश में सांप्रदायिकता बढ़ती है तब वे आरजेडी के साथ चले जाते हैं, जब भ्रष्टाचार बढ़ता है तब वे भाजपा के साथ चले जाते हैं.

अब 2022 में फिर से नीतीश कुमार ने अपने पुराने संघर्ष के सहयोगी और दोस्त लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी से गठबंधन कर लिया है.

टकराव पहले से

हालांकि बिहार की सियासत में भाजपा और जेडीयू के बीच तल्खी का सिलसिला काफी पहले से शुरू हो गया था. यह सिलसिला 2019 के आम चुनाव के बाद से ही शुरू हो गया जब जेडीयू को केंद्रीय मंत्रिमंडल में मांग के अनुरूप 3 सदस्यों के लिए जगह नहीं मिली. इस के बाद 2020 के विधानसभा चुनाव में स्वयं को नरेंद्र मोदी का हनुमान कहने वाले चिराग पासवान की भूमिका ने जख्म को गहरा करने में अहम भूमिका निभाई थी. यही कारण भी था कि जेडीयू भाजपा के फेर में फंस कर अपने कद और सीटों को काफी गंवा चुकी थी.

इस के बाद बोचहां विधानसभा क्षेत्र उपचुनाव के दौरान जिस तरह, दबी जबान से ही सही, केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय को मुख्यमंत्री बनाए जाने की चर्चा तेज हुई, वह जेडीयू को नागवार गुजरनी ही थी और अंत में आरसीपी सिंह प्रकरण से जेडीयू को फाइनल निर्णय लेना ही था.

सहयोगियों की दमघोंटू भाजपा

यह सहयोगी दलों के लिए इसलिए भी जरूरी हो गया है कि भाजपा अपने साथियों के साथ परिपक्व लोकतंत्र को पनपने नहीं देती है. वह समुद्र की बड़ी मछली की तरह अपने से छोटी मछलियों को लगातार निगलती रहती है और अपनी भूख शांत करती है. जब से भाजपा अस्तित्व में आई है उस ने अपने इर्दगिर्द अपने सहयोगियों के लिए दमघोंटू वातावरण तैयार किया है. ऐसा वातावरण जहां भाजपा तो सहयोगियों के कंधों पर चढ़ कर अपना विस्तार कर रही है पर उस के सहयोगी या तो कमजोर अवस्था में पहुंचा दिए गए या मरणासन्न अवस्था में.

बीते 2019 के लोकसभा चुनाव में एनडीए के बैनर तले 21 पार्टियां चुनाव मैदान में थीं. उन में से लगभग आधा दर्जन उस से दूर हो चुकी हैं. सब से मजबूत और बड़े माने जाने वाले दलों का बाहर जाना अहम है. इन में हालिया जदयू, किसान आंदोलन के समय शिरोमणि अकाली दल और 2019 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद शिवसेना शामिल हैं.

यह हकीकत भी है कि क्षेत्रीय दलों को भाजपा का वर्चस्व भी नहीं भा रहा है, क्योंकि भाजपा उन के वर्चस्व वाले राज्यों में उन्हीं के कंधों पर चढ़ कर अपनी ताकत बढ़ा रही है. अधिकतर जगहों में भाजपा ने अपने सहयोगी घटकों के साथ तोड़फोड़ मचाई है. भाजपा की एक सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी भी विभाजित हो चुकी है जिस का एक घटक अभी एनडीए में है. ऐसे ही शिवसेना में भी तोड़फोड़ मची जिस का एक कथित घटक भाजपा के साथ सरकार में है. अन्नाद्रमुक भी बंट चुकी है. हालांकि वह भी एनडीए के साथ मानी जाती रही है. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद असम का बोडो पीपुल्स फ्रंट, पश्चिम बंगाल का गोरखा जनमुक्ति मोरचा, तमिलनाडु की डीएमके और गोवा की गोवा फौरवर्ड पार्टी उस से दूर हुई हैं.

विपक्ष के लिए मौका

प्रसिद्ध पुस्तक ‘गोपालगंज टू रायसीना रोड’ के राइटर नलिन शर्मा, जिन्होंने अपनी किताब में जिक्र ही नीतीश कुमार और लालू यादव की राजनीतिक सफर को ले कर किया, कहते हैं, ‘‘लालू ने कभी बीजेपी के साथ सम झौता नहीं किया, लेकिन नीतीश कुमार को भी बीजेपी की सांप्रदायिक पिच कभी सही नहीं लगी.’’

यह देखा भी जा सकता है, पिछली सरकार में भले भाजपा बड़ी पार्टी रही हो और संख्या बल के हिसाब से उस का दबदबा रहा हो पर नीतीश ने अपने तौरतरीकों से ही सरकार चलाई. भाजपा के खिलाफ कोई बयान देने से वे चूके नहीं.

विपक्ष के लिए बिहार में सरकार का पलटना, खासकर नीतीश कुमार जैसी बेदाग छवि के नेता का भाजपा के खिलाफ खड़े हो कर पाला बदल लेना किसी बड़ी कामयाबी से कम नहीं. इस से सब से बड़ी बात यह है कि विपक्ष को मनोवैज्ञानिक लाभ मिला है.

बिहार में 2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 19 सीटें जीतीं. आरजेडी से मोलभाव कर कांग्रेस ने ज्यादा सीटें ले लीं. जिस का खमियाजा आरजेडी को उठाना पड़ा पर बावजूद इस के, पिछले

2 बार से विपक्ष में बैठते हुए राजद नेता तेजस्वी यादव की पौपुलैरिटी बढ़ी ही है. उन की स्वीकार्यता बिहार राजनीति में मुख्य नेताओं में आती है. तेजस्वी को बिहार में मं झे हुए नेता के तौर पर पहचान मिली है. उन की छवि मजबूत नेता की बनी है.

ऐसे में इस घटनाक्रम का फायदा लंबे अंतराल के बाद राजद को मिलने वाला है और ऐसा कर वे भाजपा को बिहार की राजनीति से दूर भी कर सकेंगे. हालांकि इस घटनाक्रम में कांग्रेस को भी लाभ हुआ है, एक, भाजपा के हाथ से एक राज्य निकला है, दूसरा, सत्ता के नजदीक होना उस के राजनीतिक अस्तित्व के संकट को बचाने का उपाय बनेगा.

बिहार में बदलाव के माने

कोई शक नहीं कि नीतीश के इस कदम से भाजपा को करारा  झटका लगा है और यदि यह गठबंधन बरकरार रहता है तो इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में इस का राष्ट्रीय पैमाने पर असर पड़ेगा.

बिहार के लिए अकसर माना जाता है कि यह वह भूमि है जो पूरे देश को राजनीतिक सीख देती है, यहीं से मजबूत से मजबूत सत्ता से टकराने का जज्बा पैदा होता है जो पूरे देश में फैलता है. 70 के बाद राष्ट्रीय राजनीति में हलचल यहीं से शुरू हुई. इंदिरा गांधी के निरंकुश शासन के खिलाफ बिहार से ही जयप्रकाश नारायण ने शक्तिशाली जनआंदोलन शुरू किया था. उसे जेपी आंदोलन नाम दिया गया. सैकड़ों लालू यादव, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव, चंद्रशेखर जैसे युवा और छात्रनेता जेपी आंदोलन में शामिल हो गए थे. करीबकरीब सभी नेता आपातकाल के दौरान जेल में रहे. ये सभी नेता लोहिया, जेपी, कर्पूरी ठाकुर और जेपी की समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे. यह वह समय भी था जब भारत में पिछड़ी जाति की राजनीति ने सिर उठाया था.

2024 में अगर विपक्ष एकजुट होता है तो कमंडल की राजनीति और मंडल की ताकतों में फिर से सुगबुगाहट देखने को मिल सकती है. इस से राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों में नई उम्मीद जगेगी.

भाजपा हमेशा चुनाव जीतने के कारणों में सब से बड़ा तर्क देती है कि मोदी नहीं तो कौन. वह ऐसा कर लोगों को भ्रमित करती है कि मोदी के सामने कोई बड़ा नेता नहीं है. सवाल बड़े नेता का योगदान कभी भारतीय राजनीति में नहीं रहा.

सवाल है एक नेतावादी राजनीति के खिलाफ विपक्ष कैसे खुद को समेटता है. बंटा हुआ विपक्ष और कमजोर होती कांग्रेस, ये दोनों बिंदु भाजपा के विस्तार के कारक हैं. जहां विपक्ष जीती भी या भाजपा को टक्कर देने की पोजीशन में आई वहां भाजपा ने ईडी, सीबीआई और अन्य केंद्रीय एजेंसियों का डर दिखा कर तथा धनबल से सरकार बना ली.

बिहार में बदला यह घटनाक्रम देश की सभी विपक्षी पार्टियों के लिए राष्ट्रीय संदेश की तरह है. साथ ही, यह भाजपा के लिए भी सीख है कि वह अपने सहयोगियों के साथ अब भी ठीक से संतुलन नहीं बनाएगी तो वह अकेली अलगथलग पड़ जाएगी, जो उस के लिए ठीक नहीं होगा.

आज जब लोकतंत्र और संविधान दोनों गंभीर खतरे में हैं और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का माहौल है, ऐसे में बिहार की भूमि फिर से वह जमीन तैयार कर रही है जहां से बदलाव की फसल पैदा होती है. इस से विपक्ष के मनोबल को भी बढ़ावा मिला है. बिहार फिर देश के सामने एक एजेंडा तय कर रहा है और विपक्ष को मौका दे रहा है कि वह फिर से अपनी राजनीतिक शक्तियों को एकजुट करे.

धर्म: आस्था या दिखावा

आस्था जब दिखावे की चीज बन जाती है तब न सिर्फ आप खुद इसे भोग रहे होते हैं बल्कि दूसरों को भी परेशानी   झेलनी पड़ती है. आस्था ऐसी चीज होती है जिस में दूसरा व्यक्ति मरपिट रहा होता है जबकि आस्थावान को कोई फर्क ही नहीं पड़ता.

सुजय आज बहुत खुश था. खुश हो भी क्यों न, बात ही खुश होने की

थी. माइनिंग इंजीनियरिंग से डिग्री लेने के बाद लगभग 2 साल तक इधरउधर टप्पे खाने के बाद उस ने छोटीमोटी नौकरी की और अलगअलग जगह बड़ी नौकरी के लिए आवेदन कर रहा था. उस की मेहनत रंग लाई और दोदो परीक्षाएं में सफल होने के बाद एक प्रसिद्ध सीमेंट फैक्ट्री में फाइनल इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था.

यह सीमेंट फैक्ट्री देश की बड़ी फैक्ट्रियों में गिनी जाती थी. सब से बड़ी बात यह थी कि फैक्ट्री जिस इलाके में थी उसी इलाके में देवीजी का एक प्रसिद्ध मंदिर भी था. सुजय इस बात से भी खुश था कि चयन होने के बाद वह खाली समय में देवी दर्शन के लिए भी चला जाएगा.

इंटरव्यू का बुलावा भी उन्हीं 9 दिनों के बीच ही था जिन दिनों में देवीजी सब से ज्यादा पूजी जाती हैं और स्पष्टतया सुजय के लिए यह ‘माता ने बुलाया’ वाली स्थिति थी.

सुजय के गृहनगर से यह जगह लगभग 250 किलोमीटर दूर थी और वहां पहुंचने में लगभग 4 घंटे लगते हैं. सुजय को इंटरव्यू के लिए दोपहर एक बजे का समय दिया गया था. उस ने निश्चित किया कि वह सुबह 5 बजे चलने वाली ट्रेन से निकलेगा और 9 बजे तक वहां पहुंच जाएगा. नाश्ता वगैरह कर के 11 बजे तक फैक्ट्री पहुंच जाएगा.

निश्चित दिन निश्चित समय पर सुजय स्टेशन पहुंच गया. स्टेशन का दृश्य विस्मित करने वाला था. प्लेटफौर्म पर इतनी भीड़ थी कि पैर रखने की जगह भी न थी. ट्रेन लगभग 30 मिनट देरी से आई. सुजय पर्याप्त समय ले कर निकला था, इसलिए इस देरी से उसे खास प्रभाव नहीं पड़ा. जैसेतैसे इस भीड़ में वह एक कोच में घुसने में कामयाब हो गया. इतनी भीड़ थी कि उसे खड़े होने में भी असुविधा हो रही थी. ‘‘अरे बाप रे, इतनी भीड़,’’ सुजय डब्बे में घुसते ही बोला.

‘‘अरे भैया, यह भीड़ नहीं, यह तो आस्था है,’’ एक यात्री ने कहा.

‘‘यह कैसी आस्था जिस में आप खुद तो परेशान हो ही रहे हैं, दूसरों को भी परेशान कर रहे हैं.’’ सुजय बड़ी मुश्किल से अपने को एडजस्ट करता हुआ बोला.

‘‘या तो आप हिंदुस्तानी नहीं हैं या हिंदुस्तान में रहते नहीं हैं. यहां आस्था ऐसे ही दिखावे के माध्यम से प्रदर्शित की जाती है. यहां शादी की जाती है तो दिखावे के लिए बरात निकाली जाती है और उस बरात में भी जिस ने बुलाया है उस के प्रति आस्था प्रकट करने के लिए बीच सड़क पर कमर मटकाई जाती है. यहां तक कि अगर देशप्रेम प्रकट करना हो तो प्रभातफेरी निकाली जाती है, घर में तिरंगा फहराया जाता है.’’ पास खड़ा आदमी बोला.

‘‘सही है, अंकल,’’ सुजय बोला, ‘‘आप बिलकुल ठीक बोल रहे हैं. दिखावे का मतलब ही आस्था है. अगर ऐसा न होता तो हर गली में चंदा ले कर तीनचार जगह स्थापना क्यों की जाती? जगहजगह आरती, महाआरती, प्रदर्शनी, गरबा के नाम पर रास्ता क्यों रोका जाता? जरा सोचिए किसी गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति को अस्पताल ले जाने में कितनी परेशानी होती होगी?’’

अब ट्रेन धीरेधीरे रेंगने लगी थी. अभी कुछ ही दूर चली थी कि किसी ने ट्रेन की जंजीर खींच दी. करीब 15 मिनट तक रुके रहने के बाद ट्रेन फिर चली.

सुजय और उस के पड़ोसी की बातें अभी भी आस्था पर ही चल रही थीं.

सुजय बोला, ‘‘ईश्वर में आस्था हो तो भी इसे सार्वजनिक स्तर पर दिखावे के रूप में प्रदर्शित नहीं किया जाना चाहिए.’’

‘‘मैं आप से सहमत हूं’’, सहयात्री बोला और तभी किसी ने फिर से जंजीर खींच कर ट्रेन रोक दी. फिर यह काम हर 5-10 किलोमीटर पर होने लगा. गंतव्य तक पहुंचतेपहुंचते ट्रेन ढाई घंटे लेट हो गई.

9 बजे पहुंचने वाली ट्रेन साढ़े 11 बजे पहुंची. भीड़ का एक बड़ा सा रेला ट्रेन में से निकला. सुजय भी किसी तरह धकियाता हुआ प्लेटफौर्म के बाहर निकला. बाहर आने पर ज्ञात हुआ कि संबंधित फैक्ट्री स्टेशन से लगभग 11 किलोमीटर दूर है तथा वहां तक जाने के लिए औटो के अलावा कोई और साधन नहीं है.

स्टेशन पर चारों तरफ जन सैलाब के अलावा कुछ और नजर नहीं आ रहा था. बड़ी मुश्किल से ढूंढ़ते हुए कुछ दूर एक औटो रिकशा खड़ा हुआ दिखाई पड़ा. उस के पास उस की ही उम्र के 2 लड़के उस रिकशा वाले से बात कर रहे थे. सुजय भी वहां पहुंच गया. वे दोनों भी उसी फैक्ट्री में इंटरव्यू के लिए आए थे तथा औटो वाले से वहां तक छोड़ने की गुजारिश कर रहे थे. किंतु औटो वाले ने यह कह कर मना कर दिया कि इतनी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने किसी भी तरह के वाहन को सुबह

9 बजे के बाद प्रतिबंधित कर दिया है. यदि उसे पकड़ लिया गया तो उस का लाइसैंस प्रतिबंधित कर दिया जाएगा.

‘‘कोई दूसरा विकल्प भी तो होगा न,’’ सुजय ने पूछा.

‘‘कम से कम 3 किलोमीटर तो इस भीड़ के साथ पैदल चलना ही होगा. दूसरे छोर पर शायद औटो मिल सकते हैं,’’ औटो वाला बोला, ‘‘3-4 साल पहले किसी वाहन चालक ने भीड़ पर गाड़ी चढ़ा दी थी, तभी से इन दिनों में सभी तरह के वाहन प्रतिबंधित रहते हैं सिवा एंबुलैंस के. अब आप तीनों में से कोई बीमार पड़ जाए तो एंबुलैंस से तुरंत निकल सकते हैं,’’ औटो वाला मजाक में बोला.

निराश हो कर तीनों दूसरा औटो ढूंढ़ने लगे. तभी उन्हें एक और औटो वाला दिखाई पड़ा. पहले तो उस ने स्पष्ट रूप से मना ही कर दिया किंतु मिन्नतों के बाद जब मुंहमांगी रकम देने की बात कही तो वह प्रतिव्यक्ति 400 रुपए के मान से चलने को तैयार हो गया. चूंकि साढ़े 12 बज चुके थे, सो तीनों यह रकम देने को मान गए.

अभी आधा किलोमीटर ही चले थे कि पीछे से पुलिस की जीप आ गई. इंस्पैक्टर ने तीनों की बात सुने बिना ही औटो से उतार दिया और औटो को नजदीक के पुलिस थाने ले जाने का हुक्म दे दिया. तीनों बेचारे इंस्पैक्टर से एक बार बात सुनने का अनुरोध करते रहे परंतु उस के पास इन की बातें सुनने का समय नहीं था.

अब तक डेढ़ बज चुका था, फिर भी तीनों का अनुमान था कि उन की समस्या सुनने के बाद मैनेजमैंट उन्हें इंटरव्यू में अपीयर होने देगा. सो तीनों ने निश्चित किया कि वे इस 4 किलोमीटर की दूरी को पैदल ही तय करेंगे और अगले छोर से औटो पकड़ कर फैक्ट्री जाएंगे. तीनों भूखेप्यासे पैदल चलने लगे. लगभग

2 घंटे बाद उस जगह पर पहुंचे जहां से उन्हें औटो मिल सकता था. जब तीनों फैक्ट्री गेट पर पहुंचे तब तक साढ़े 4 बज चुके थे और इंटरव्यू समाप्त हो चुका था. सो उन्हें अंदर ही नहीं जाने दिया गया. तीनों लुटेपिटे से वापस स्टेशन आ गए.

स्टेशन पर एक बच्चा अपने पिता से पूछ रहा था, ‘‘देवीजी को नारियल क्यों चढ़ाया जाता है?’’ और पिता उसे सम  झा रहा था, ‘‘नारियल वास्तव में एक प्रतीकात्मक बलि है जो कि देवीजी को दी जाती है.’’

‘‘परंतु आज तो देवीजी ने हमारे कैरियर की वास्तविक बलि ले ली है,’’ सुजय बाकी दोनों की तरफ देख कर बोला.

यह शहर का एक संभ्रांत इलाका है. इस इलाके में शहर के लगभग सभी धनपति रहते हैं. सभी इतने व्यस्त हैं कि एकदूसरे से मिलने का समय तक नहीं निकाल पाते हैं. इन घरों में काम करने वाले वर्कर्स ने सार्वजनिक नवरात्र मनाने का निर्णय लिया. चंदे की तो कोई बात ही नहीं थी. हजारों से ले कर लाखों रुपयों तक का चंदा देने वाले मौजूद थे और नवरात्र मनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य भी यही था कि अधिक से अधिक वसूली की जाए. 9 दिनों तक रंगारंग कार्यक्रम किए गए. किसी दिन भजन संध्या, किसी दिन और्केस्ट्रा, किसी दिन गरबा आदि. अंतिम दिन जो कार्यक्रम था वह अत्यंत महत्त्वपूर्ण था, वह कार्यक्रम था कन्याभोज और भंडारे का.

भंडारा क्या था, व्यंजनों की प्रदर्शनी थी. चूंकि इन दिनों दूध का बना मावा अच्छा नहीं आ रहा था, इसलिए यह निश्चित हुआ कि सिर्फ मेवे की ही दोतीन मिठाइयां बनाई जाएं. खाने के तेल से कई लोगों को एलर्जी हो जाती है. सो नमकीन में भुने हुए काजू और बादाम रखे जाएंगे. 4-5 तरह की सब्जियां तो होनी ही चाहिए अन्यथा वैरायटी की कमी दिखेगी.

आयोजन बड़े पैमाने पर हो रहा था. काम पर कई मजदूर भी लगाए गए थे.

इस काम के लिए सब से ज्यादा चंदा दो लाख रुपए घनश्याम दासजी ने दिए थे. उन के आने के बाद ही कार्यक्रम प्रारंभ होना था. घनश्याम दासजी राजनीतिक व्यक्ति थे जिन की शहर में एक बड़ी फैक्ट्री भी थी. मतलब राजनीतिक उद्योगपति.

घनश्याम दासजी के आते ही कार्यकर्ताओं में एक जोश सा आ गया और सब अपने को दूसरे से अधिक कर्तव्यनिष्ठ दिखाने के चक्कर में जबरन भागदौड़ करने लगे और इसी चक्कर में सलाद काट रही महिला के पास सो रही उस की 9 माह की बच्ची पर किसी कार्यकर्ता का पैर पड़ गया. बच्ची दर्द से बिलख पड़ी. उसे चुप करवाने के लिए उसे मां का दूध पिलाना जरूरी था.

कार्यकर्ता किसी भी कीमत में भंडारे में देरी होने देना नहीं चाहते थे क्योंकि घनश्याम दासजी बहुत ही सीमित समय के लिए आए थे, साथ ही, जो बच्चे स्कूल गए थे वे भी लौटने वाले थे. बड़े घर के बच्चे खाने के लिए प्रतीक्षा करें, यह तो उचित नहीं होगा. लगभग 15 मिनट तक वह बच्ची रोती रही. अंत में साथ में काम कर रही महिला को दया आई और अपने हाथ का काम छोड़ कर आई और बच्ची की मां से बोली, ‘जा उस देवस्वरूप कन्या को कन्याभोज करवा दे जो शायद इन में से किसी को भी नहीं दिख रही है.’

यह महिला, दरअसल बरतन साफ करने का काम कर रही थी और अपने साथ अपनी 6 वर्ष की कन्या को भी ले कर आई थी जो सुबह से ही भूखी थी और काम में अपनी मां का हाथ बंटा रही थी. लगभग ढाई बजे यह बच्ची अचानक चक्कर खा कर गिर पड़ी. शायद भूख के कारण उस की यह हालत हो गई थी. शोर सुन कर कई लोग आ गए और कहने लगे, ‘‘शायद डिहाइड्रेशन हो गया है तुरंत नमकशक्कर का पानी पिलाओ और घर भेज दो. भंडारा तो अभी 2 घंटे और चलेगा, उस के बाद ही वर्कर्स को खाना दिया जाएगा.’’

आस्था की यह परिभाषा किसी को समझ में आए तो कृपया हमें भी सम  झाएं.

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