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प्यार ने तोड़ी धर्म की दीवार : भाग 3

कहते हैं सच्चा प्यार न कभी झुका है और न झुकेगा. चाहे मोहब्बत करने वालों का जमाना ही दुश्मन बन बैठे. मोहब्बत न कालागोरा देखती है और न ही धर्मजाति. मोहब्बत तो मोहब्बत है. चाहे जमाना लाख कोशिश करे, लेकिन मोहब्बत की डोर कभी कमजोर नहीं पड़ती.वैसे प्यार ने किसी बंदिश के आगे हार नहीं मानी. लेकिन बेदर्द जमाना 2 प्यार करने वालों को जीने नहीं देता. वही अगर प्रेमी युगल अलग संप्रदाय से ताल्लुक रखते हों तो दोनों की जान पर बन आती है.

यही सूरज और मोमिन खातून की प्रेम कहानी में हुआ. दोनों के अलगअलग संप्रदाय के होने के कारण उन के प्यार के बीच धर्म की दीवार आ खड़ी हुई. दोनों को प्यार की मंजिल पाने के लिए 2 साल की लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी. तब कहीं जा कर 13 जुलाई, 2022 को प्रेमी जोड़े को सफलता मिली.हालांकि इस शादी को ले कर प्रेमी युगल के परिवार वालों को कोई आपत्ति नहीं थी. लेकिन जब बात आती है धर्म के ठेकेदारों की तो ऐसे मामले में वह धर्म की दीवार बन कर आ खड़े होते हैं.

मोमिन खातून की शादी से उस के घर वालों को कोई ऐतराज नहीं था. लेकिन इस शादी के होते ही मुसलिम समुदाय के कुछ संगठनों की आंखों में यह शादी किरकिरी बन गई थी.जहां एक तरफ इस प्रेमी युगल की सुरक्षा के लिए पुलिस प्रशासन ने पूरी तरह से कमर कस ली थी तो वहीं विश्व हिंदू परिषद के जिला महामंत्री गौरव सिंह ने भी इस प्रेमी युगल की सुरक्षा की जिम्मेदारी ले ली थी.इस प्रेम कहानी की शुरुआत कैसे हुई, यह भी एक विचित्र कहानी है. यह सत्य ही है कि इंसान जिस जाति में जन्म लेता है, वह उसी के रंग में रंग जाता है. फिर उसे समाज के अनुसार ही सारे संस्कार भी निभाने पड़ते हैं. यही मोमिन खातून के साथ भी हुआ था.

अपने समाज के संस्कार नहीं थे पसंद मोमिन ने भले ही जन्म मुसलिम परिवार में लिया था, लेकिन उस की सोच शुरू से ही अपने समाज से हट कर थी. होश संभालते ही उसे मुसलिम समाज से कोई विशेष लगाव नहीं था. हर इंसान को अपने धर्म और संस्कारों पर गर्व होता है. क्योंकि यह सब उस के खून में रचाबसा होता है. लेकिन मोमिन खातून को शुरू से ही अपने धर्म से कोई खास लगाव नहीं था. न तो वह ईद खुशी से मनाती थी और न ही उसे अपने समाज के संस्कारों से कोई खास लगाव था.

उस के होश संभालने से पहले भले ही उस के मातापिता ने उसे कुछ भी खिलाया हो, लेकिन समझदार होते ही उस ने मीट, मछली सब कुछ खाना छोड़ दिया था. जब बकरीद का त्यौहार आता तो वह कुरबानी के वक्त कमरे में ही छिप कर बैठ जाती थी. उस ने कभी भी जानवरों की कुरबानी होते नहीं देखी थी.

घर में बहुत लाड़प्यार करके पाले गए बकरों से उसे बहुत ही लगाव था. लेकिन उसी की गरदन पर छुरा चलते देखना उस की बरदाश्त से बाहर था. यही कारण था कि उसे अपने त्यौहारों से ज्यादा हिंदू त्यौहार पसंद आते थे. वह कई बार अपने अब्बू और अम्मी के सामने ही कहती कि मुझे तो हिंदू त्यौहार ही सब से अच्छे लगते हैं.जन्म से ही मोमिन का झुकाव हिंदू धर्म की ओर होने के कारण उस की अम्मी रजिया भी बहुत परेशान रहती थी. रजिया ने कई बार उसे समझाने की कोशिश की, ‘‘बेटी, सब धर्मों के अपनेअपने संस्कार होते हैं. फिर उन्हें समाज के अनुसार मनाना भी पड़ता है. हम मुसलमान हैं तो हमें अपने धर्म के अनुसार ही चलना चाहिए.’’

लेकिन रजिया की नसीहत उसे काट खाने को दौड़ती थी. मोमिन ने कई बार अपने अब्बू और अम्मी के सामने भी कहा, ‘‘अम्मी, हम लोग हिंदू धर्म स्वीकार नहीं कर सकते क्या?’’ ‘‘नहीं बेटा, हम मुसलमान हैं तो मुसलमान ही रहेंगे. हिंदू कैसे बन सकते हैं.’’ उसे हमेशा ही यही जबाव मिलता था. उत्तर प्रदेश के जिला आजमगढ़ अतरौलिया थाना क्षेत्र का एक छोटा सा गांव है हैदरपुर खास. मुसलिम बाहुल्य इसी गांव में शरीफ अहमद अपने परिवार के साथ रहते थे. उस के परिवार में पत्नी रजिया के अलावा एक बेटा और 3 बेटिया थीं. शरीफ अहमद के पास थोड़ी सी जुतासे की जमीन थी, जिस के सहारे ही उस का परिवार चलता था. एक बेटी की वह पहले ही शादी कर चुके थे. उस के बाद मोमिन खातून और उस से छोटा उस का भाई था.

पहली मुलाकात में ही हो गया प्यार शरीफ अहमद की छोटी बेटी मोमिन खातून बहुत ही खूबसूरत थी. उस के अब्बू का एक सामान्य परिवार था. मोमिन खातून को शुरू से ही बनठन कर रहने की आदत थी. जवानी की दहलीज पर कदम रखतेरखते उस का रंग और भी खिल उठा था. यही कारण था कि वह जब कभी भी घर से निकलती तो अधिकांश गांव के लड़कों की उस पर ही नजर टिकी रहती थी. उस के पड़ोस में अधिकांश मुसलिम परिवार ही रहते थे. लेकिन शुरू से ही मुसलिम लड़कों को वह पसंद नहीं करती थी.
अब से लगभग 2 साल पहले की बात है. मोमिन खातून को किसी काम से शहर जाना था. वह अपने घर के सामने ही किसी सवारी के इंतजार में खड़ी हुई थी. उसी समय वहां से बाइक से सूरज गुजर रहा था.

सूरज को देखते ही मोमिन खातून ने हाथ दे कर उसे रोक लिया. मोमिन खातून ने उस से बाइक पर लिफ्ट देने की बात कही. सूरज ने उसे बाइक पर बिठा लिया. उसी दौरान सूरज ने उस से बातचीत का सिलसिला शुरू किया. उसी यात्रा के दौरान दोनों के बीच परिचय हो गया था. सूरज जिला आजमगढ़ के अतरौलिया थाना क्षेत्र के खानपुर फतेह गांव के रहने वाले जोखू सिंह का बेटा था. खानपुर फतेह से हैदरपुर खास की दूरी महज 2 किलोमीटर थी. जोखू सिंह का खातापीता परिवार था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बच्चे थे. सूरज अपनी बहनों में सब से छोटा था.

इसी छोटी सी मुलाकात में ही दोनों के बीच परिचय हुआ. उसी वक्त मोमिन खातून ने सूरज का मोबाइल नंबर भी ले लिया था. उसी पल सूरज ने मोमिन खातून के दिल में अपनी अलग ही छाप छोड़ी थी.समाज में भी फैल गई उन के प्यार की खुशबू उस पहली मुलाकात के बाद सूरज बारबार उस की यादों में आता रहा. उस ने कई बार उस के नंबर पर फोन मिलाने की कोशिश की, लेकिन वह हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी. उस ने जैसेतैसे कर तीसरे दिन सूरज के दिए गए नंबर पर फोन मिला कर बात की. फोन मिलाते ही मोमिन ने अपना परिचय दिया तो सूरज समझ गया.

मोमिन भले ही मुसलिम थी, लेकिन वह भी पहली ही मुलाकात में उस की खूबसूरती का दीवाना हो गया था. यही कारण था कि वह कई दिन से उस के फोन के आने का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. उस का फोने आते ही उस का चेहरा खिल उठा. उस दिन पहली ही बार में दोनों के बीच काफी देर तक बातचीत हुई. उस के बाद जब भी उन्हें मौका मिलता तो बात करने से नहीं चूकते थे. धीरेधीरे दोनों के दिलों में एकदूसरे के प्रति प्यार के बीज अंकुरित हो चुके थे. कुछ दिनों की मुलाकात में ही सूरज ने उस के परिवार की बारे में सारी जानकारी हासिल कर ली थी.

मोमिन एक गरीब घर से ताल्लुक रखती थी. लेकिन जब दोनों के बीच प्यारमोहब्बत की लहर चलनी शुरू हुई तो उन के बीच गरीबी और अमीरी का मतभेद भी खत्म हो गया था. जब दो दिलों से प्यार की खूशबू निकल कर फिजा में फैलती है तो उस की महक परिवार वालों तक ही नहीं पहुंचती, बल्कि समाज में भी फैल जाती है. यही दोनों के साथ भी हुआ. सूरज और मोमिन के बीच फोन पर काफी लंबी बातें होने से उन दोनों के घर वालों को उन की मोहब्बत की बात पता चल गई थी.

मोमिन कई बार सूरज को अपने साथ अपने घर भी ले गई थी. सूरज एक खातेपीते घर से था. इसी कारण मोमिन की अम्मी रजिया ने कभी भी उस के घर आने पर ऐतराज नहीं किया था. उस के बाद मोमिन के घर वाले सूरज को भी मानसम्मान देने लगे थे. मोमिन की अम्मी रजिया ने अपनी बेटी की तारीफ करते हुए सूरज को बताया कि उसे हिंदू त्यौहारों से बहुत ही लगाव है. धर्म अलग होने के बावजूद भी दोनों का एकदूसरे के घर आनाजाना शुरू हो गया. साथ ही दोनों के बीच प्यार भी बढ़ता गया. दोनों एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे थे.

उसी मिलनेजुलने के दौरान दोनों ने फैसला कर लिया कि दोनों शादी कर पूरी जिंदगी साथ रहेंगे. उन्होंने एक साथ जीनेमरने की कसमें खाईं और निकल पड़े जातिधर्म की दीवार से टकराने. मोमिन के घर वाले पड़े असमंजस में एक दिन मौका पाते ही मोमिन ने अपनी अम्मी रजिया से अपने दिल की बात कह दी, ‘‘अम्मी, आप तो जानती हो कि सूरज बहुत अच्छा लड़का है. वह भी मुझे बहुत चाहता है और मैं भी उसे बहुत प्यार करने लगी हूं.

अम्मी प्यार ही नहीं, मैं उस से शादी भी करना चाहती हूं.’’ बेटी की बात सुनते ही रजिया का गुस्सा फूट पड़ा, ‘‘मोमिन, तू पागल हो गई है क्या? तुझे पता नहीं कि सूरज हमारे मजहब का नहीं है. अगर गांव में इस बात का पता चला तो बवाल खड़ा हो जाएगा.’’ उसी समय शरीफ अहमद भी घर पहुंच चुका था. शरीफ अहमद के घर में घुसते ही दोनों सहम गईं. फिर थोड़ी देर बाद ही रजिया ने मोमिन की बात शौहर के सामने रखी तो वह भी बौखला उठा.

मोमिन की बात सुनते ही शरीफ अहमद ने बेटी को समझाने की कोशिश की, ‘‘बेटी, तू ये जो कदम उठाने जा रही है, उस से हमारा इस गांव में रहना दूभर हो जाएगा. हम सारी जिंदगी किसी के सामने सिर नहीं उठा सकेंगे. समाज वाले हमारा जीना दूभर कर देंगे.’’ मोमिन ने अपने अब्बू की बात एक कान से सुनी और दूसरे से निकाल दी. उस ने प्रण किया कि वह शादी करेगी तो सूरज के साथ ही अन्यथा वह सारी जिंदगी घर में ही कुंवारी बैठी रहेगी.

उस ने यह बात सूरज को भी नहीं बताई थी. उस के बाद भी वह उस से पहले की तरह मिलतीजुलती रही. मोमिन के परिवार वालों को विश्वास था कि सूरज कभी भी उस से शादी करने के लिए तैयार नहीं होगा. यही सोच कर उन्होंने दोनों के मिलने पर पाबंदी नही लगाई. उसी दौरान एक दिन सूरज अयोध्या घूमने गया तो मोमिन खातून भी उस के साथ चली गई. अयोध्या जाने के बाद उस की सनातन धर्म के प्रति आस्था और भी पक्की हो गई थी. सूरज के साथ ही उस ने अयोध्या में सभी मंदिरों के दर्शन भी किए.
अयोध्या में रामलला के दर्शन करने के दौरान ही उस ने प्रण किया कि आज के बाद वह मुसलिम धर्म को पूरी तरह से त्याग कर सनातन धर्म के संस्कारों को ही मानेगी. यही नहीं, उस ने रामलला के सामने ही अपनी मांग में अपने प्रेमी सूरज के नाम का सिंदूर भरते हुए अपना नाम भी मोमिन खातून से बदल कर मीना रख लिया था.

उस के बाद दोनों ने रामलला को साक्षी मान कर जिंदगी भर साथ जीनेमरने की कसमें भी खा लीं. अयोध्या से आने के बाद उस का रहनसहन भी पूरी तरह से बदल गया था. रामलला के मंदिर में शादी करने के बाद से ही मोमिन सूरज को अपना पति मानने लगी थी. लेकिन उस के घर वालों को इस की कानोकान खबर नहीं हुई थी.

मोमिन खातून के रहनसहन को देख कर उस के घर वालों को कुछ शक भी हुआ. लेकिन वे मोमिन से कुछ कह नहीं पाए. फिर एक दिन ऐसा भी आया कि उस के घर वालों को पता चल ही गया कि उन की बेटी ने सूरज के साथ मंदिर में शादी कर ली है.यह जानकारी मिलते ही घर वाले उस से खफा हो गए. पहले तो उन्होंने उसे काफी समझाया, लेकिन उस ने उन की एक न सुनी.

मोमिन की जिद को देखते हुए उस के अम्मीअब्बू ने सूरज के साथ शादी करने की एक शर्त रख दी. उन्होंने कहा कि उन्हें उस की शादी सूरज के साथ करने से कोई ऐतराज नहीं. लेकिन सूरज को शादी करने के लिए इसलाम धर्म अपनाना होगा.उन की यह शर्त मोमिन को ही मंजूर नहीं थी. फिर उस बात से सूरज कैसे सहमत हो सकता था. उस के बाद कोई रास्ता न निकलने पर सूरज और मोमिन ने घर से भाग कर शादी करने की योजना बनाई और दोनों घर से भागने का मौका तलाशने लगे.

पुलिसप्रशासन भी हो गया सतर्क

सूरज अपने परिवार का इकलौता बेटा था. जब इन दोनों की योजना का पता उस के घर वालों को हुआ तो वह उस की शादी मोमिन के साथ करने के लिए तैयार हो गए. घर वालों के मानने के बाद ही सूरज मोमिन को उस के घर से भगा लाया और फिर सब के सामने ही सम्मो देवी के मंदिर में शादी कर ली.
सूरज की शादी से उस के घर वाले खुश थे. लेकिन मोमिन की शादी से उस के घर वाले खुश नहीं थे. वहीं दूसरी ओर धर्म के कुछ ठेकेदारों को यह शादी अखरने लगी थी. हालांकि इन दोनों की शादी के बाद से पुलिसप्रशासन ने भी उन की सुरक्षा के पूरेपूरे बंदोबस्त कर दिए थे. साथ ही जिले की खुफिया विभाग एलआईयू भी उन की सुरक्षा को ले कर सक्रिय हो गई थी.

लेकिन फिर भी सूरज के घर वालों ने दोनों की सुरक्षा को देखते हुए उन की शादी कराने के बाद उन्हें गांव से बाहर अपने एक रिश्तेदार के घर भेज दिया था. प्यार के आगे धर्म की दीवार टूटने से यह शादी आजमगढ़ के साथसाथ पूरे उत्तर प्रदेश में चर्चा का विषय बन गई थी.

जेनेटिक कारण भी डिप्रैशन के लिए जिम्मेदार

आज के किशोर डिप्रैशन की गिरफ्त में तेजी से आ रहे हैं, जिस का कारण जहां किशोरों पर ओवरलोड पड़ना है वहीं आनुवंशिक कारण भी इस के लिए जिम्मेदार हैं. डिप्रैशन में नींद में कमी, बातबात पर उदास हो कर बैठ जाना, भूख में कमी, जल्दी थक जाना, किसी भी काम में मन न लगना आदि लक्षण देखने को मिलते हैं. जिन परिवारों में पेरैंट्स या फिर घर के किसी और सदस्य में डिप्रैशन की समस्या होती है उन के बच्चों में डिप्रैशन होने की आशंका ज्यादा बढ़ जाती है. इसलिए जरूरत है डेली व्यायाम करने की व परिवार के माहौल को सामान्य बनाने की ताकि अगर किशोर डिप्रैशन का शिकार हो भी तो उसे आसानी से इस स्थिति से बाहर निकाला जा सके.

इस के लिए आप नियमित रूप से ऐक्सरसाइज करें. भले ही आप पतले हों लेकिन फिर भी आप ऐक्सरसाइज को इग्नोर न करें, क्योंकि ऐक्सरसाइज करने से मन शांत होता है, साथ ही शरीर में सेरोटोनिन पैदा होता है. यह ऐसा रसायन है जो डिप्रैशन रोगियों में धीमी गति से बनता है. आप डेली दौड़ लगा सकते हैं, पैदल चल सकते हैं, पसंद के खेल खेल सकते हैं. इस से आप खुद को काफी फ्रैश महसूस करेंगे और आप धीरेधीरे तनाव की स्थिति से खुद बाहर निकलने लगेंगे. इसी के साथ आप को खानपान पर भी ध्यान देना होगा.

कुछ भी खा लेने से बात नहीं बनेगी. कहा भी जाता है कि अच्छा खाओगे तभी दिमाग सही ढंग से काम करेगा. अच्छा भोजन खाने से मूड और सोच दोनों में परिवर्तन होता है. अपनी डाइट में फलसब्जियां, मछली, साबुत अनाज, दही, दालें आदि शामिल करें. इस से शरीर को ऊर्जा मिलेगी. कार्बोहाइड्रेट से सेरोटोनिन के स्तर में बढ़ोतरी होती है. सेरोटोनिन रसायन भाव व एहसास को नियंत्रित करता है. इस तरह किशोर तनाव की स्थिति से जल्दी ही बाहर आ सकते हैं.

मैं पत्नी को नहीं पसंद करता हूं, क्या करूं?

सवाल

26 वर्षीय विवाहित युवक हूं. विवाह को 5 वर्ष हो चुके हैं. 3 वर्ष का बेटा और 8 महीने की बेटी है. मेरी पत्नी के घर वालों ने उस की शिक्षा को ले कर झूठ बोला था. हम से कहा गया था कि लड़की बीए पास है, जबकि वह सिर्फ 10वीं कक्षा पास है. वह न तो मुझे ठीक से प्यार करती है और न ही बच्चों की परवरिश ठीक से कर पाती है. जिस रिश्ते की बुनियाद ही झूठ पर रखी गई हो वह रिश्ता कितने दिन टिक सकता है? मैं पत्नी को नहीं चाहता. एक और लड़की है जो हर तरह से मेरे लिए उपयुक्त है. मैं उस से शादी करना चाहता हूं. बताएं कि यह कैसे संभव है?

जवाब

रिश्ता तय होने से पहले आप को लड़की के बारे में सारी तहकीकात करनी चाहिए थी पर आप ने ऐसा नहीं किया. अब शादी के 5 साल बीत जाने और 2 बच्चों का पिता बनने के बाद पत्नी की खामियां देख रहे हैं. आप मानते हैं कि आप की बीवी अपने बच्चों की सही परवरिश नहीं कर सकती. ऐसे में बच्चों के प्रति आप की जिम्मेदारी बढ़ गई है. मगर बजाय इस ओर ध्यान देने के आप किसी लड़की के प्रेम में पड़े हैं और उस से शादी के सपने देख रहे हैं. आप को समझना चाहिए कि एक पत्नी के होते हुए दूसरा विवाह गैरकानूनी होगा. अत: किसी मुगालते में न रहें. पत्नी से तालमेल बैठाने और घरपरिवार को संभालने का प्रयास करें.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

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आंगन का बिरवा

और प्रतिभा नहीं रही- भाग 4 : प्रतिभा अस्पताल में अकेली क्यों थी

‘‘कुछ खाया तुम ने कि नहीं…’’‘‘नहीं…पर आप चिंता मत करोअभी अक्षत आता होगा। उसे मम्मी के पास बैठा कर मैं कुछ खा लूंगी,’’ उस ने फोन रख दिया था। तबियत में सुधार हैसुन कर अच्छा लगा।

दूसरे दिन मैं ने जबरदस्ती डिस्चार्ज ले लिया। मुझे डाक्टर और नर्स को डांटना पड़ा था, ‘‘मैं अपनी मरजी से डिस्चार्ज ले रहा हूं…आप मुझे डिस्चार्ज कर दें…अन्यथा मैं ऐसे ही वार्ड के बाहर चला जाऊंगा…’’ मेरी खिसियाहट का असर यह हुआ कि दोपहर तक मुझे डिस्चार्ज दे दिया

गया। अक्षत ने बाकी औपचारिकताएं पूरी कर लीं और मैं वार्ड के बाहर निकल आया.‘‘मुझे मम्मी के पास ले चलो…’’‘‘अभी आप कमरे पर चलो…नहा लो फिर चलना…’’ रोली ने एक लौज का रूम किराए पर ले लिया था। मैं सहमत भी हो गया था। प्रतिभा मुझे इस हालत में देखेगी तो उस की चिंता और बढ़ जाएगी.

शाम को मैं रोली के साथ आईसीयू में पहुंचा जहां प्रतिभा भर्ती थी। आईसीयू में बगैर पीपीई किट पहने प्रवेश नहीं करने दिया जा रहा था। मुझे भी पीपीई किट पहननी पड़ी। अच्छा थाइस के कारण प्रतिभा मेरी हालत को नहीं देख पाएगी. प्रतिभा के चेहरे पर मास्क लगा था। वह जोरजोर से सांसें ले रही थी। उस के चारों ओर मशीनें लगी थीं जो उस का औक्सीजन लेवलपल्स लेवल और बीपी बता रही थीं। इन मशीनों की भारीभरकम आवाज से पूरा कमरा गूंज रहा था। वार्ड में करीब 8 मरीज थे सभी की हालत ऐसी ही थी।

मैं लगभग भागता हुआ प्रतिभा के बैड के पास जा कर खड़ा हो गया था। उस की आंखें बंद थीं पर मेरे आने की आहट से उस ने धीरे से आंखें खोलीं और मुझे सामने देखते ही उस की आंखों से आंसू बह निकले। मैं ने उस के सिर पर हाथ फेरा,”कैसी हो?’’ वह एकटक मेरी ओर ही देख रही थी। आंसू लगातार बह रहे थे। मैं ने उस का हाथ अपने हाथों में ले लिया। उस ने मेरे हाथों को जोर से पकड़ लिया, “मैं अब ठीक हूं…देखो ठीक लग रहा हूं न…’’

मैं उसे समझा देना चाह रहा था कि मैं वाकई ठीक हो गया हूं ताकि उस की चिंता कम हो सके। उस के चेहरे पर संतोष के भाव दिखने लगे। उस दिन तो मैं ज्यादा देर तक वहां नहीं बैठा।रोली चाह रही थी कि मैं आराम करूं क्योंकि मेरी हालत अभी उतनी बेहतर नहीं थी। मैं लौज के कमरे में आ गया पर दूसरे दिन से मैं ने नियम बना लिया था कि दिन में मैं प्रतिभा के

पास रहूंगा और रात को दोनों बच्चे। दरअसलदोनों बच्चों को रैस्ट नहीं मिल पा रहा था। उन के लिए रैस्ट जरूरी था। मैं दिनभर प्रतिभा क पास बैठा रहता। उस से बातें करता। वह इशाारों से बात करती। मास्क लगा होने के कारण वह बोल नहीं पाती थी। अकसर वह हाथ के इशारसे पूछती, ‘‘घर कब चलेंगे?’’

‘‘बहुत जल्दी…तुम स्वस्थ तो हो जाओ…’’वह चेहरे पर लगे मास्क की ओर इशारा करती। मानो कह रही हो कि इसे निकलवा दो बहुत तकलीफ होती है। मैं उसे हौसला देता,”बहुत जल्दी निकल जाएगा…डाक्टर साहब कह रहे थे कि तुम स्वस्थ हो रही हो…वे मास्क भी निकाल देंगे और छुट्टी भी कर देंगे…’’ वह आश्वस्त हो जाती।

मैं दिन में कई बार उस के सिर पर हाथ फेरता। वह मेरा हाथ पकड़े लेटी रहती। अकसर उस की आंखों से आंसू बहते रहते। मैं मोबाइल में कम आवाज में पुराने गाने लगा देता। वह सुनती रहती।शाम को जब मैं लौटने लगता तब मैं उस को बोलता,”रोली और अक्षत हैं…तुम अपना ध्यान रखना…मैं सुबह आऊंगा…’’ वह सिर हिला देती.मैं दिनभर प्रतिभा के साथ रहता तो मुझे अस्पताल के कर्मचारियों की लापवाही का भी अंदाजा होने लगा था,”सिस्टरउस मरीज के हाथों में लगी बौटल कब की खत्म हो गई है…उसे निकालो…देखो खून बौटल में आने लगा है।’’

‘‘हांदेखती हूं अभी…तुम अपने मरीज को देखो…यहांवहां देखने की क्या जरूरत है,’’ वह शायद झुंझला गई थी। कई बार मैं स्वयं ही किस कराह रहे मरीज के पास चला जाता, ‘‘कुछ चाहिए…’’ वह हाथों के संकेत से बता देता कि उसे पानी पीना है। मैं नर्स को ले कर आता और उसे पानी देता। मास्क लगा होने के कारण मैं खुद ही पानी नहीं दे पाता था।

आईसीयू में भरती एक मरीज कोमा में था। उस के पिता आते और एक कोने में खड़े हो कर चुपचाप उसे देखते रहते। उन की आंखों से बहने वाले आंसू उन के दर्द को बयां करते। मैं उन से भी बात करता और उन्हें ढांढ़स बंधाता। वे 2-3 दिनों तक दिखाई नहीं दिए। चौथे दिन जब वे बदहवास की हालत में अपने बेटे के बैड के पास आए तो मुझ से रहा

नहीं गया,”कहां चले गए थे आप…’’‘‘डाक्टर ने बोला था कि बेटे का औपरेशन करना है पैसे ले कर आओ…तो पैसे लेने गांव चला गया था…’’‘‘कितने पैसे?”‘‘₹ 3 लाखएक मकान था उसे ही बेच आया…’’ अब उन की आंखों से आंसू बह निकले थे,”अरेबेटा बचा जाएगा तो मकान फिर ले लेंगे…’’ उन्होंने अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया था।‘‘तो कहां हैं पैसे?’’‘‘अस्पताल के कांउटर पर जमा करा दिए।”मैं कुछ नहीं बोला। इतने दिनों में मुझे उस के बेटे की हालत में कोई सुधार दिखाई नहीं दे रहा था। वैसे भी अस्पताल का खर्चा बहुत महंगा था।

उस पर दवा वगैरह का खर्चा भी ज्यादा। दवा वहीं की दवा दुकान से लेने को मजबूर किया जाता था। दुकान में दवाएं प्रिंट रेट से ज्यादा में दी जाती थीं पर मरीज के परिजन मजबूर थे। वार्ड में ड्यूटी करने वाले कर्मचारी अपने लिए पीपीई किट भी मरीज से मंगवाते थे। कई बार एक

दिन में 2 बार किट मंगा लेते। किट मंहगी होती थी। यदि मरीज के परिजन ले कर न आएं तो फिर उस मरीज को न तो दवा दी जाती और न

ही इंजैक्शन।मैं उसे बुजुर्ग के आंसुओं के मोल को समझ रहा था। दोपहर में डाक्टर जब रांउड पर आए तब भी वे वहीं थे। डाक्टर में उस के बेटे को देखा और निराशा में सिर हिला दिया, ‘‘अस्पताल के पैसे जमा कर दिए?” डाक्टर ने उन से पूछा।‘‘जी…’’ वह बुजुर्ग अपने हाथ जोड़े उन के सामने खड़े थे।‘‘सिस्टरमरीज का बीपी चैक करो। मुझे लगता है ही इज नो मोर…’’कहते हुए वे वार्ड से निकल गए।मैं समझ गया था कि उन के बेटे को अब मृत घोषित किया जाएगा मगर वह तो शायद पिछले कुछ दिनों पहले ही मर चुका था। वही हुआमैं उस बुजुर्ग की रूदन नहीं सुन पाया। वार्ड से बाहर निकल आया था।

 

वैंटिलेटर पर उसे 15 दिन हो चुके थे। उस के आसपास भर्ती ज्यादातर मरीजों की मौत हो चुकी थी। हम लोग उसे दिनभर बहलाते रहते। उस का आत्मविश्वास बढ़ाते रहते।

 

एक दिन रात को अचानक अक्षत ने फोन किया, ‘‘पापामम्मी की औक्सीजन लेवल कम हो रहा है। डाक्टर कह रहे हैं कि मुंह में ट्यूब डालना पड़ेगा।”

 

मैं ने घड़ी देखी, 2 बज रहे थे,”मैं आ रहा हूं…तुम चिंता मत करो…’’ लौज और अस्पताल की दूरी पर्याप्त थी। मुझे पहुंचने में समय लग गया। तब तक डाक्टर उस को ट्यूब डाल चुके थे। उसे नींद का इंजैक्शन दे दिया गया था ताकि उसे तकलीफ न हो।

मैं जब पहुंचा तब दोनों बच्चे उदास चेहरा लिए प्रतिभा के बैड के पास खड़े थे। मैं ने डाक्टर से बात की। उन्होंने बता दिया, ‘‘होपलैस कंडीशन…’’ पर इस के ट्यूब डालने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

 

औक्सीजन नाक से फेफड़ों तक नहीं जा रही थीअब वह सीधे फेफड़ों में पहुंच रही थी। प्रतिभा की बेहोशी कल तक ही दूर होगी फिर से उसे बेहोश कर दिया जाएगा। 2-3 दिन ऐसे ही रहने वाला है। अब वहां हमारे ठहरने का कोई मतलब था भी नहीं फिर भी हम ने अक्षत को वहीं रहने दिया और रोली को साथ ले कर हम लौज आ गए। प्रतिभा की बेहोशी तीसरे दिन दूर हुई। उस ने जब आंखें खोलीं तब हम उस के पास नहीं थे बल्कि वार्ड के बाहर ही बैठे थे। नर्स ने आ कर बताया कि वे बुला रही हैं। हम दौड़ते हुए उस के बैड के पास पहुंचे। उस की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। वह बारबार अपने मुंह में लगे ट्यूब की ओर इशारा कर रही थी और यह बता रही थी कि उसे बहुत तकलीफ हो रही है।

 

मैं ने उस के सिर पर हाथ फेरा,‘‘यह जल्दी निकल जाएगा…तुम को सांस लेने में दिक्कत हो रही थी न इसलिए लगाया है…इस से तुम जल्दी ठीक हो जाओगी, ’’ इस बार वह मेरी बात से नहीं बहल पाई। उस ने मेरा हाथ जोर से पकड़ लिया और रोती रही। हम असहाय थे वरना उसे कभी रोने नहीं देते। हम सभी अब कमजोर पड़ते जा रहे थे। ट्यूब डलने के चौथे दिन हम ने डाक्टर से बात की। उन्होने आश्वस्त किया कि तेजी सी रिकवरी हो रही है और संभव है कि 2-3 दिनों में ट्यूब अलग कर दिया जाए। पर ऐसा नहीं हुआ। हालांकि उस रात को मैं बहुत देर तक वार्ड में ही रुका रहा।

 

अचानक उस वार्ड के सभी मरीजों को दूसरे वार्ड में कर दिया गया था,”अरेआप ऐसा कैसे कर सकते हैं… इन को औक्सीजन लगी है और आप बगैर औक्सीजन के ले जा रहे हैं…’’ मैं आगबबूला हो रहा था, “प्लीजआप मरीज के जीवन के साथ ऐसा खिलवाड़ न करें…’’

 

‘‘थोडी दूर ही ले जा रहे हैं…’’ कहते हुए उन्होने प्रतिभा को स्ट्रैचर में रख लिया था।

 

‘‘वह एक पल को बगैर औक्सीजन की नहीं रह सकतीं और आप कह रहे हैं कि थोड़ी दूर ही बगैर औक्सीजन के ले जा रहे हैं…’’ मैं झुंझला पड़ा था पर उन्हें इस की कोई परवाह नहीं थी. उन्होने बेदर्दी से उसे स्ट्रैचर पर डाला और दूसरे वार्ड में ले जा कर एक बैड पर लिटा दिया। ऐसा ही उन्होंने अन्य मरीजों के साथ भी किया।

 

बगैर औक्सीजन के कुछ देर रहने पर उस का औक्सीजन लेवल कम होने लगा। डाक्टर ने कोई एक इंजैक्शन लगाया जिस से मशीन में औक्सीजन लेवल बढ़ता हुआ दिखाई देने लगा। मैं उस दिन बहुत देर तक वहां रहा। प्रतिभा को शायद नींद आ गई थी। उस ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

 

हम तीनों प्रतिभा के पास थे। कुछ देर तक प्रतिभा की स्थिति को समझने का प्रयास करता रहा। मैं झुंझला पड़ा था पर उन्हें इस की कोई परवाह नहीं थी। उन्होंने बेदर्दी से उसे स्ट्रैचर पर डाला और दूसरे वार्ड में ले जा कर एक बैड पर लिटा दिया। ऐसा ही उन्होंने अन्य मरीजों के साथ भी किया। बगैर औक्सीजन के कुछ देर रहने पर उस का औक्सीजन लेबल कम होने लगा। डाक्टर ने कोई एक इंजैक्शन लगाया जिस से मशीन में

औक्सीजन लेबल बढ़ता हुआ दिखाई देने लगा। मैं उस दिन बहुत देर तक वहां रह कर आया। प्रतिभा को शायद नींद आ गई थी। उस ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

 

हम तीनों प्रतिभा के पास थे। कुछ देर तक प्रतिभा की स्थिति को समझने का प्रयास करता रहा फिर मैं दोनों बच्चों को वहां छोड़ कर लौज आ गया था। लगभग 1 बजा होगा जब अक्षत ने फोन किया, ‘‘पापा जल्दी आ जाओ…मम्मी की तबियत ज्यादा खराब हैउन्हें सांस लेने में दिक्कत हो रही है।”

 

मैं तुरंत ही तैयार हो कर निकल पड़ा। चल तो मैं तेज कदमों से ही रहा था पर अस्पताल पहुंचने में समय लग ही गया। मैं जब वार्ड में पहुंचा तब नर्स पंपिंग कर रही थी। दोनों बच्चे प्रतिभा के बैड के पास गुमसुम से खड़े थे। मुझे देखते ही डाक्टर ने इशारे से मुझे बता दिया था कि अनहोनी हो चुकी है। प्रतिभा अब इस दुनिया में नहीं रही। मुझे दोनों बच्चों को संभालना था इसलिए मैं अपने जज्बातों को अंदर ही दबा कर दोनों का हाथ पकड़ कर वार्ड के बाहर ले आया। बच्चे भी अब तक सारा कुछ समझ चुके थे। वे दोनों मेरे कंधे से लग कर फूटफूट कर रो रहे थे। मैं दोनों को शांत करने की कोशिश कर रहा था।

 

रात के 2 बज गए थे। प्रतिभा की डैड बौडी को पन्नी से बांध कर शवगृह में रख दिया गया था। अब सुबह ही बाकी सब होगा। हम लोग उदास कदमों से लौज की और चल दिए। मेरे कानों में प्रतिभा के बोल गूंज रहे थे,

‘‘देखोदोनों बच्चे बाहर चले गए अब हमारे बुढ़ापे में हम जानें क्या करेंगे…’’

प्रतिभा अकसर चिंता करती।

 

‘‘एक काम करनामैं मरूं इस के पहले तुम मर जाना नहीं तो तुम वाकई बहुत परेशान हो जाओगी… तुम ने तो आज तक घर के बाहर मेरे बिना कदम तक नहीं बढा़या है। ऐसे में बूढ़ी हो कर कैसे घर से निकलोगी…” हम अकसर अपने आने वाले बुढ़ापे को ले कर चर्चा करते। पर वह सच में मुझ से पहले चली जाएगी ऐसा तो सोचा भी नहीं था।

 

हम हताशनिराश और आंसू बहाते हुए लौज की और लौट रहे थे कि तभी रोली के मोबाइल की घंटी बजी।फोन अस्पताल से ही था,”अस्पताल का बिल जमा कर दो तब ही डैड बौडी मिलेगी…’’ किसी ने उस तरफ से बोला था।

 

‘‘अभी रात को…’’

 

‘‘हां…’’ रोली ने मेरी ओर देखा।

 

‘‘हम सुबह आएंगे। और हांआप के अस्पताल की 1-1 पाई जमा कर देगें…अभी आप डिस्टर्ब न करें,’’ गुस्से में उस ने फोन काट दिया था।

 

कितना अर्थ प्रधान हो गया है सब। अभी मौत हुई हैहम उस का शोक मना रहे हैं और अस्पताल को अपने पैसों की चिंता सताने लगी है। सुबह 8 बजे फिर से अस्पताल से फोन आ गया था। रोली ने बता दिया कि कुछ ही देर में हम वहां पहुंच रहे हैं। अस्पताल का पेमेंट करने के पहले दवा दुकान का पेमेंट करना जरूरी था। इसलिए पहले दवाओं का भुगतान किया, ‘‘अब तो मरीज नहीं है…बिल में कुछ कम कर पाएंगे?’’

 

‘‘नहीं…’’ उस ने पूरा बिल लिया और अस्पताल प्रबंधन ने भी। पैसे जमा हो जाने के बाद डैड बौडी हमें सौंपी गई। सौंपी नहीं गई नगर निगम की ऐंबुलैंस में रख दी गई। ऐंबुलैंस के ड्राइवर और कर्मचारी को नई पीपीई किट खरीद कर देना पड़ी। उस ऐंबुलैंस में एक डैड बौडी और थी और उन्होंने भी उन्हें पीपीई किट दी थी।

 

वहीं के एक घाट पर हम तीनों ने उस का दाह संस्कार किया। कोरोना मरीज होने के कारण घाट के कर्मचारियों ने भी हमें बहुत लूटा पर हमारे पास और कोई वकल्प था ही नहीं था इसलिए हम अनजान बन लुटते रहे। भैया ने कई बार हमें फोन कियाजिज्जी का भी फोन आया पर हम ने फोन नहीं उठाया। हम बात करने की स्थिति में नहीं थे। अक्षत ने भैया को फोन कर इतना ही बोला था, ‘‘दाजीहम घर आ रहे हैं।’’

 

भैया सारा कुछ समझ चुके थे। शाम को हम बगैर प्रतिभा के अपने घर लौट रहे थे।

और प्रतिभा नहीं रही- भाग 3 : प्रतिभा अस्पताल में अकेली क्यों थी

‘‘अरे इस हालत में मरीज को कहीं और कैसे ले जाया जा सकता है?’’ मैं झुंझला पड़ा था।‘‘वह हम नहीं जानते…पर मरीज का औक्सीजन लेवल निरंतर कम हो रहा है…उसे वैंटिलेटर की जरूरत है…’’

 

‘‘सरआप जानते हैं कि मैं स्वयं यहां ऐडमिट हूं…मैं कैसे कहीं और ले जा सकता हूं…’’‘‘अच्छा…मैं प्रसास करता हूं…कुछ ऐक्स्ट्रा कर पाओगे…’’ वह मरीज की फाइल देखते हुए बोल रहे थे.

 

‘‘फिलहाल तो हम इस स्थिति में हैं कि कुछ भी करना पड़े तो करेंगे…’’ मेरे स्वर में लाचारी थी.‘‘ठीक है…मैं व्यवस्था करवा देता हूं…’’दोपहर होतेहोते पता चला कि आईसीयू में भर्ती एक मरीज की अचानक मौत हो गई है और उस का बैड खाली हो गया है। अस्पताल के एक कर्मचारी ने खुद आ कर डाक्टर का संदेश मुझ तक पहुंचाया था। शाम को प्रतिभा को आईसीयू में शिफ्ट कर दिया गयागनीमत यह थी कि उस समय बिटिया रंगोली साथ में थी। मुझे उस के बारे में कोई खबर नहीं मिली। दूसरे दिन दोपहर को अक्षत मेरे सामने खड़ा था,”पापा…’’

‘‘अरे तुम कब आए…’’ उसे यहां देख कर मुझे आश्चर्य हो रहा था। वह तो सूरत में नौकरी कर रहा था। जब मैं अस्पताल में भर्ती हुआ था तब उस ने पूछा भी था, ‘‘पापामैं आ जाऊं?’’ मैं ने वैसे ही मना कर दिया था जैसे रंगोली को मना कर देता था। रंगोली तो फिर भी बहुत जिद कर रही थी, ‘‘मुझे आ जाने दो पापा…आप अकेले परेशान होंगे।’’

 

‘‘अरे नहीं…तुम यहां कहां आओगी… कोरोना मरीजों के बीच मेें…यदि तुम्हें कुछ हो गया तो…’’‘‘पर पापा…’’‘‘अभी नहीं…यहां रुकने की कोई व्यवस्था नहीं हैमम्मी को भी तो इसी कारण से वापस भेजना पड़ा है,”बहुत चाह कर भी वह मेरे मना करने के कारण तब नहीं आ पाई थी। पर जैसे ही प्रतिभा को भर्ती होना पड़ा वह बगैर पूछे आ गई थी। अक्षत भी वैसे ही आ गया थाउस ने भी नहीं पूछा था। यही कारण था कि उसे देख कर आश्चर्य हुआ।

 

‘‘मैं अभीअभी आया हूं…दीदी ने फोन किया था…मम्मी को आईसीयू में भर्ती करा दिया है वह अकेली है…मैं तत्काल चल दिया…’’ उस ने एक सांस में ही सारा कुछ बता दिया.

 

‘‘मम्मी को देख आए…कैसी हैं वह?’’

‘‘अभी नहीं…वहीं जा रहा हूं। पहले आप को देख लूं फिर जाता हूं…’’

 

‘‘तुम मम्मी के पास ही जाओ…मैं तो ठीक हूं…’’

 

उस ने कुछ फल वगैरह मुझे दिए और तेज कदमों से आईसीयू की ओर बढ़ गया. वह डाक्टर के कहने पर पीपीई किट लगाया हुआ था।

 

रोली शाम को आई मेरे पास। उस के माथे पर चिंता की लकीरें थीं. शाम को भैया का फोन आया तो मैं ज्यादा कुछ नहीं बोल पाया,”क्यों क्या हुआ… तुम उदास हो…मम्मी की तबियत कैसी है?’’ मैं प्रतिभा का हाल जानने के लिए बैचेन था.

 

‘‘ठीक है…औक्सीजन लगा दिया है…वे बारबार आप को याद कर रही हैं…’’ उस ने अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया था। शायद उस की आंखों में आंसू थे.

 

‘‘मुझे डिस्चार्ज करा दो…मैं भी उस से मिलना चाहता हूं…’’

 

‘‘आप…..स्वस्थ तो हो जाएं तब ही तो डाक्टर आप को डिस्चार्ज करेंगे…’’

 

‘‘अरे मैं ठीक हूं…तुम डाक्टर से बात तो करो…’’

 

‘‘मैं देखती हूं…आप ने कुछ खाया… सेब दे दूं…’’

 

‘‘नहीं तुम डाक्टर से बात करो और मुझे डिस्चार्ज कराओ…’’

 

मेरी  बैचेनी बढ़ती जा रही थी। मेरे सामने रोली का उदास चेहर घूम रहा था। क्या वाकई प्रतिभा की तबियत ज्यादा खराब है। वह अच्छीभली थी मगर अचानक उसे क्या हो गया। मेरी आंखों से आंसू बह निकले। रोली ने कुछ नहीं बोला। वह चुपचाप वार्ड से बाहर निकल गई.

 

इस के बाद दूसरे दिन तक न तो रोली मेरे पास आई और न ही अक्षत। मेरी बैचेनी बढ़ती जा रही थी। मैं ने खुद ही डाक्टर से बात की,”मैं स्वस्थ महसूस कर रहा हूं इसलिए आप मुझे डिस्चार्ज कर दें…’’

 

‘‘कल देखते हैं…’’ डाक्टर ने मेरी बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था। मैं ने रोली और अक्षत दोनों को फोन लगा कर प्रतिभा के बारे में जानकारी ली,

‘‘मैं अभी इंजैक्शन के लिए आया हूं… लंबी लाइन लगी है…’’ अक्षत ने इतना कह कर फोन काट दिया।

 

रोली ने जरूर बात की और बताया कि वह कल से ही लगातार प्रतिभा के साथ ही है। उन की तबियत में अब सुधार हो रहा है।

 

‘‘थोड़ाबहुत आराम तुम भी कर लो। बेटाऐसे में तुम्हारी तबियत खराब न हो जाए…’’

 

‘‘अभी मम्मी के साथ रहने की जरूरत है पापायदि उन्हें हम में से कोई न दिखे तो वे घबरा जाती हैं…’’

 

‘‘इलाज तो ठीक से हो रहा है न…’’

 

‘‘नहीं सभी लापरवाह हैं…उन्हें केवल पैसे चाहिए…मैं दे भी रही हूं…नर्सों को अलग से और सफाई करने वालों को भी… अस्पताल का बिल तो अलग है ही…’’ उस के स्वर में नाराजगी और लाचारगी दोनों थी।

 

‘‘पैसे की चिंता मत करो बेटा…केवल मम्मी को ठीक करा लो…’’ मेरी बैचेनी अब और बढ़ गई थी।

 

‘‘सामने न रहो तो वे न तो समय पर दवा देते हैं और न ही बौटल बदलते हैं…खाली बौटल ही चढ़ी रहती है… इसलिए पूरे समय मम्मी के पास बैठे रहना पड़ता है…’’ उस की आवाज में निराशा थी।

 

‘‘अरे…’’ सच में मुझे भी अस्पताल की लापरवाही पर गुस्सा आ रहा था….पर मैं कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं था.

 

मुखरित मौन – भाग 2 : क्या अवनी अपने ससुराल की जिम्मेदारियां निभा पाई

सुजाता सिर्फ शारीरिक रूप से ही नहीं, मानसिक रूप से भी व्यस्त थीं. नौकरी की व्यस्तता के कारण उन का ध्यान दूसरी कई फालतू बातों की तरफ नहीं जाने पाता था. दूसरा, सोचने का आयाम बहुत बड़ा था. कई बातें उन की सोच में रुकती ही नहीं थीं. इधर से शुरू हो कर उधर गुजर जाती थीं.

2 बज गए थे. लंच का समय हो गया था. बच्चे अभी होटल से नहीं आए थे. सरस ने एकदो बार फोन करने की पेशकश की, पर सुजाता ने सख्ती से मना कर दिया कि उन्हें फोन कर के डिस्टर्ब करना गलत है.

‘‘तुम्हें भूख लग रही है, सरस, तो हम खाना खा लेते हैं.’’

‘‘बच्चों का इंतजार कर लेते हैं.’’

‘‘बच्चे तो अब यहीं रहेंगे. थोड़ी देर और देखते हैं, फिर खा लेते हैं. न उन्हें बांधो, न खुद बंधो. वे आएंगे तो उन के साथ कुछ मीठा खा लेंगे.’’

सुजाता के जोर देने पर थोड़ी देर

बाद सुजाता व सरस ने खाना खा लिया. बच्चे 4 बजे के करीब आए. वे सो कर ही 2 बजे उठे थे. अब कुछ फ्रैश लग रहे थे. उन के आने से घर में चहलपहल हो गई. सरस और सुजाता को लगा बिना मौसम बहार आ गई हो. सुजाता ने उन का कमरा व्यवस्थित कर दिया था. बच्चों का भी होटल जाने का कोई मूड नहीं था. परिमल भी अपने ही कमरे में रहना चाहता था. इसलिए वे अपनी अटैचियां साथ ले कर आ गए थे. थोड़ी देर घर में रौनक कर, खाना खा कर बच्चे फिर अपने कमरे में समा गए.

अवनी अपनी मम्मी को फोन करना फिर भूल गई. बेचैनी में मानसी का दिन नहीं कट रहा था. दोबारा फोन मिलाने पर अवनी की सुबह की डांट याद आ रही थी. इसलिए थकहार कर समधिन सुजाता को फोन मिला दिया. थकी हुई सुजाता भी लंच के बाद नींद के सागर में गोते लगा रही थीं. घंटी की आवाज से बमुश्किल आंखें खोल कर मोबाइल पर नजरें गड़ाईं. समधिन मानसी का नाम देख कर हड़बड़ा कर उठ कर बैठ गईं.

टूटती बेड़िया -भाग 3 : संगीता अनीता साथ में कहां जा रही थी

‘‘वह आप हम पर छोड़ दें. आप चलें,’’ कह कर माधवेशजी मु?ा से बोले, ‘‘भाईसाहब, आप चलिए, मैं एक फोन कर के आता हूं.’’ ‘‘अरे, उस के लिए कहीं जाने की क्या जरूरत है, यह लीजिए,’’ हरीशजी अपना मोबाइल बढ़ाते हुए बोले, ‘‘यह फिर किस दिन काम आएगा.’’ तब मोबाइल लेते हुए माधवेशजी बोले, ‘‘देखता हूं, हमारे दूर के एक संबंधी एमएलए हैं. उन की मैडिकल कालेज में बहुत जानपहचान है. अगर मिल गए तो टाइम भी बच जाएगा और पैसा भी. वरना देनेदिलाने में ही दोढाई हजार रुपए का चक्कर बैठेगा और टाइम लगेगा सो अलग.’’ इत्तफाकन उन महाशय से फोन पर बात हो गई. खास वृत्तांत सुन कर वे बोले कि मैं चीफ मिनिस्टर के यहां जा रहा हूं. वहां से ही फोन करवा दूंगा,

आप चिंता न करें. करीब 3 घंटे में लाश मिली जिसे ले कर घर लौटा तो देखा सभी लोग आ चुके हैं. हम दोनों के औफिस के लोग तथा सभी नातेरिश्तेदार. लाश को ले कर सभी मरघट की ओर चल पड़े. वहां पहुंच कर मरघट के महाराज के दरबार में पेशी हुई. जैसा कि कर्मकांड के मुताबिक रिवाज है, बिना उस के आग दिए कोई चिता जलाई नहीं जा सकती. महाराज उस समय नशे में धुत थे, देखते ही बोले, ‘‘5 हजार रुपए दे दें.’’ तो माधवेशजी हाथ जोड़ कर बोले, ‘‘महाराज, हम विपदा में आप के पास आए हैं. वह हमारा एकलौता बेटा है.’’ ‘‘ठीक है, तो 3 हजार रुपए दे दो, हम इस से कम नहीं करेंगे,’’ महाराज ने दरबार बरखास्तगी का संकेत करते हुए कहा. इस से पहले कि माधवेशजी कुछ कहें, मैं बोला, ‘‘मैं इन कफनखसोटों को एक पाई भी नहीं दूंगा. चलिए, माधवेशजी, शव को विद्युत शवदाह गृह में ले चलिए.’’

‘‘अरे, क्या करते हो जीजाजी, बिना इन की आग दिए लड़के की सद्गति नहीं होगी. वह प्रेत बना डोलेगा.’’ ‘‘आप चुप रहिए, चलिए, माधवेशजी.’’ ‘‘आप खुद पर काबू रखें भाईसाहब,’’ माधवेशजी बोले, ‘‘इस क्षेत्र में आने पर यहां बिना कुछ दिए निकलना सहज नहीं है. ये लोग कुछ भी कर सकते हैं, मर्डर भी और उन का कुछ नहीं होगा. सदियों से चली आ रही है यह प्रथा. पुलिस भी इन से डरती है. आप उधर चल कर बैठें, मैं सब संभाल लूंगा,’’ कह कर वे फिर महाराज के पैर पर 5 सौ रुपए रख कर बोले, ‘‘महाराज, हमारी बस, इतनी ही सामर्थ्य है. आप तो देख ही रहे हैं, भैया का दिमाग खराब हो गया है. उन्हें खुद पर काबू नहीं है. उन्हें आप क्षमा कर दें तथा आग दे दें. ये बाहर के लोग हैं. इन्हें यहां का कानून मालूम नहीं है पर हम जानते हैं कि आप की आज्ञा के बिना यहां पर पत्ता भी नहीं हिल सकता. यह आज की बात नहीं हैं, यह तो राजा हरिश्चंद्र के समय से चली आ रही प्रथा है.’’ ‘‘अच्छा, ये बातें रहने दें,’’

कहते हुए महाराज ने दरबारी को पुकारा, ‘‘कलुआ, आग ले आओ,’’ और उठ कर उस ने एक हांडी पकड़ा दी जिस में धधकते हुए कोयले भरे थे. ‘‘महाराज की जय,’’ कह कर माधवेशजी आग ले कर आ गए, फिर उसे आगे रख कर विद्युत शवदाह गृह की ओर निकल लिए, यह हांडी उस क्षेत्र का लाइसैंस जो थी. ‘‘यह क्या किया माधवेशजी आप ने, अब मुरदों को फूंकने के लिए भी घूस देनी पड़ेगी?’’ ‘‘हुजूर, यह घूस नहीं, नजराना है. अब चलिए,’’ माधवेशजी बोले. विद्युत शवदाह गृह में 40 मिनट में सब काम निबटा कर लौटते समय बड़े साले साहब और ताऊजी ने सभी से हाथ जोड़ कर खाने की विनती की पर मैं ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया, ‘‘देखिए, अगर आप खिलाना चाहें तो बेशक खिलाएं पर मैं नहीं खिलाऊंगा. ऐसे ही मेरी छाती फट रही है और आप उस पर मु?ो दावत देने को कह रहे हैं, आप को शर्म नहीं आती.’’ ‘‘आती है, बेटा, आती है. तु?ो इस वंश का कहते हुए शर्म आती है जोकि धार्मिक रीतिरिवाज और मान्यताओं को तिलांजलि देने पर तुला है. ‘‘अरे, यह सब उसी का तो था, वह तो गया. यह पैसा क्या तू छाती पर रख कर ले जाएगा.’’ ‘‘नहीं ताऊजी, बुढ़ापा संवारूंगा. यह पैसा ही वृद्धावस्था का सहारा है.’’

‘‘क्या हम मर गए?’’ ‘‘नहीं ताऊजी, मरे नहीं, जिंदा हैं और तब भी थे जब मेरे पापा मु?ा 15 वर्ष का अकेला छोड़ कर चले गए थे और मु?ो अकेले को अपनी पढ़ाई छोड़ कर दो जून की रोटी की जुगाड़ में जुट जाना पड़ा था.’’ ‘‘क्यों, घर में नहीं रखा था तु?ो?’’ ‘‘रखा था पर पापा का सारा हिस्सा हथिया कर. क्या पापा का हिस्सा केवल वे ग्रामोफोन के चंद रिकौर्ड ही थे और कुछ नहीं? पारिवारिक संपत्ति में क्या उन का वही हक था?’’ ‘‘अरे, इस का तो दिमाग खराब हो गया है. इस से बहस का कोई फायदा नहीं. चलो, सब चलो,’’ कह कर ताऊजी खिसक लिए. घर लौटने पर पता चला कि दोनों सालियां सपरिवार अड्डा जमाए हैं और हमारे खानदान के भी कुछ लोग आ कर बैठे हैं. एकमात्र सगे भाई का फोन आया था कि उस की सदा बीमार रहने वाली पत्नी बीमार है और वह आ नहीं सकता. यह वही भाई है जिस की पत्नी ने सास को घर से निकालने के ?ागड़े में अपने पुत्र को आग लगा कर स्वयं को भी आग लगा ली थी. तब मैं नौकरी न होने के बावजूद दौड़ादौड़ा सूरत पहुंचा था और अपने परिवार की रोजीरोटी की चिंता न कर एक महीने तक उन सब की सेवा की थी. तब मैं कितनी परेशानी से घर पहुंचा था,

केवल 5 रुपए में. 3 दिन का सफर ही नहीं करना पड़ा था बल्कि पास के पैसे भाई ने धरा लिए कि बहुत कर्जा चुकाना है. और तो और, टिफिन बांध कर देने की भी किसी ने जरूरत नहीं सम?ा थी. मां ने भी नहीं. पत्नी को उस की बहनों ने व्यस्त कर दिया था. वह उन की ही सेवा में जुटी थी. मैं सीधा अपने पुत्र के कमरे में गया और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. उस की हर चीज से लिपट कर रो पड़ा. अब तक तो किसी तरह से खुद पर काबू किया था पर अंदर घुसते ही सब्र का बांध टूट गया और मैं बिलख उठा. लेकिन मेरी नियति में चैन कहां, अचानक ही दरवाजे पर जोरों की थाप पड़ी तो मैं हड़बड़ा कर उठा और दरवाजा खोला. देखा, सामने रौद्ररूपा पत्नी खड़ी थी. ‘‘तुम्हारा सोने का टाइम हो गया, सो पट बंद कर लिए? अब कोई जिए या मरे तुम्हारी बला से. यह भी सोचा है कि इस जाड़े की रात में इतने लोग सोएंगे कहां और कैसे? न लिहाफ है न गद्दे, न पलंग है न चारपाई. पहले इन सब के सोने का इंतजाम करो, फिर रोते रहना, पूरी जिंदगी पड़ी है.’’ सामान लाने के लिए जैसे ही मैं घर से निकला कि माधवेशजी ट्रक से सामान उतरवाते नजर आए. देखते ही बोले,

‘‘भाईसाहब, आजकल कोई बिस्तर ले कर तो चलता नहीं है, चाहे शादीविवाह हो या मातमपुरसी, इसलिए मैं यह सामान उठवा लाया.’’ पैसे निकालने के साथ ही वे ‘‘राहुल क्या मेरा बेटा नहीं था,’’ कह कर बिलख उठे. राहुल तब 2 माह से बराबर उन के ही घर पर रहता था. आज ही उन्हें एक विवाह में जाना था जिस के कारण मु?ो उसे अकेले छोड़ कर जाना पड़ा था. मैं उन से सामान अंदर रखवाने को कह कर बाहर निकल गया. मेरा कलेजा मानो फटा जा रहा था और मैं चाह रहा था कि एकांत में बैठ कर जी भर रो लूं. कब तक पार्क में बैठा मैं बिलखता रहा, नहीं मालूम. अचानक ही कोई लिपट कर रो पड़ा तब तंद्रा टूटी, देखा, पत्नी मेरे पैरों पर पड़ी बुरी तरह रोते हुए कह रही थी, ‘‘मु?ो माफ कर दो. मैं तुम से न जाने क्याक्या बोल गई. मैं तुम्हें जाने कहांकहां ढूंढ़ आई और तुम यहां बैठे हो. पता नहीं कैसेकैसे खयाल मेरे मन में आ रहे थे. चलो, घर चलो, कहीं ठंड लग गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे.’’ घर आ कर देखा तो सभी मेहमान आराम से बिस्तर, यहां तक कि एकएक मेहमान 2-2 गद्दे बिछाए सो रहा था.

खाना आसपड़ोस से आ गया था, सो सभी खा कर तृप्त हो गए थे. घर का दरवाजा खुला था और सड़क के कुत्ते सूंघते हुए घूम रहे थे. मेरे लिए वहां पर न कोई बिस्तर था और न ही पलंग. खाने का तो सवाल ही नहीं उठता. मैं दरवाजा भेड़ कर निकला कि किसी होटल में जगह देखूं, मगर तभी माधवेशजी से सामना हो गया. देखते ही बोले, ‘‘आइए, मैं आप का ही इंतजार कर रहा था. आजकल इंसान में इंसानियत तो रह ही नहीं गई है. सब अपना ही स्वार्थ देखते हैं. ये लोग शादीविवाह में जाएं या मातमपुरसी में, सब से पहले अपने आराम की ही सोचेंगे. सामान उतरते न उतरते, सब ऐसे ?ापट पड़े मानो इन्हें यहां जिंदगीभर रहना है. अगर चूक गए तो फिर जमीन पर ही सोना पड़ेगा.

‘‘बिस्तर रखते ही सब से पहले बड़ी बहनजी ने अपने पति व बच्चों के लिए पलंग हथिया लिए कि इन्हें गठिया का रोग है, ठंड लग जाएगी तो बहुत मुसीबत होगी तो छोटी के हसबैंड को अस्थमा की शिकायत थी. ताऊजी बुजुर्ग हैं, सो ताईजी उन के इंतजाम में लग गईं. बाकी लोगों ने भी देखादेखी अपने इंतजाम कर लिए. भाभीजी होश में नहीं थीं, सो आप का इंतजाम मैं ने अपने यहां करवा दिया है.’’ मैं ताला बंद करने गया तो देखा शर्मिष्ठा एक कोने में बैठी सिसक रही थी. उस की रोकी हुई सिसकियां उस का बदन ?ाक?ार रही थीं. मैं ने जैसे ही उस के सिर पर हाथ रखा, वह बिलख उठी. मैं बिस्तर पर आ कर सोचने लगा कि अगर यह दिखावे की जिंदगी न जीनी पड़ती तो आज यह दिन न देखना पड़ता. क्या करें, आज के युग की मांग है, सुविधा की हर वस्तु संग्रह करने की, दिखावे की. 10,000 रुपए की आमदनी है पर रहनसहन ऐसा दिखाएंगे मानो 15,000 रुपए की आमदनी हो. यह हाल हर स्टेज पर है, चाहे वह कम कमाता हो या ज्यादा. भोग की संस्कृति के चक्कर में हर तरह की सुखसुविधा की चीजें उपलब्ध हैं. हर आदमी का प्रयास रहता है कि वह उन का अधिक से अधिक संग्रह करे.

उस के लिए चाहिए धन और जब एक की कमाई से पूरा नहीं पड़ता तो दूसरे को भी उस क्षेत्र में उतरना पड़ता है. फिर शुरू हो जाती है अंधी दौड़, जिस में सब से ज्यादा क्षतिग्रस्त होते हैं रिश्ते. इन के लिए आज के आदमी के पास समय नहीं है और जिस के पास है वह कहलाता है एक ‘इमोशनल फूल’ यानी भावुक मूर्ख. आज उसी अंधी दौड़ के परिणाम परिलक्षित हो रहे हैं. ननद, देवरदेवरानी, भतीजेभतीजियां सब पराए हो गए हैं. महानगर में तो मातापिता भी बाहरी लोग हैं. पति, पत्नी, बच्चे सब बाहरी और फालतू लोग हैं. बस, आदमी अकेला ही अपने सुख की खोज में इधर से उधर भटकता है. इसलिए देशकाल के हिसाब से खुद को छोड़ किसी और पर खर्च करना निरी भावुकतापूर्ण मूर्खता है जो मैं अब तक करता आ रहा हूं. चाहे वह मेरे घर के लोग, भाईबहन हों या ससुराल के सालीसाले. इन्हीं सब के कारण मेरे खर्चे बराबर बढ़ रहे हैं और मैं पत्नी के नौकरी छोड़ने के आग्रह को टालता रहा हूं. लेकिन बदले में मु?ो क्या मिला? पत्नी द्वारा लगाया गया बच्चे की हत्या करने का लांछन, जीवनभर कर्ज का बो?ा, अवमानना तथा मुसीबत के क्षणों में अकेलापन.

आज मैं खुद को कितना अकेला महसूस कर रहा हूं. सालेसालियां अपनी बहन का मन बहला रहे हैं. मेरे भाईबहन मु?ा से कन्नी काट गए हैं. मेरे इस संकट के क्षणों में कौन साथी है? साथी हैं ये मेरे पड़ोसी माधवेशजी, हरीशजी और मेरा विश्वास. बाकी सब लेने के ही साथी हैं, चाहे तीजत्योहार हो या शादीविवाह, इन का मुंह भरते रहो तो खुश, नहीं तो नाराज. वाह रे वाह, अब इस संकट की घड़ी में खिलाने से मना कर दिया तो कितना बौखला गए ताऊजी. अरे, आप सगे हैं तो कर डालिए खर्च, सो तो एकएक पाई तक मांग लेंगे. उन के यहां जाओ तो सैकड़ों हजम कर जाएंगे, देने का नाम भी न लेंगे. अब कल के कर्मकांड में हजारों का खर्च आने वाला है. मैं नहीं करूंगा एक पैसा भी खर्च. जिसे करना हो सो करे, जो नाराज हो तो हो. एक दृढ़निश्चय कर के मैं ने बिस्तर छोड़ दिया. सवेरे शर्मिष्ठा ने मु?ो सामान की लिस्ट थमाई तो मैं ने साफ मना कर दिया. वह भौचक सी मु?ो देखती रह गई. फिर थोड़ा संभल कर बोली, ‘‘आप का दिमाग तो खराब नहीं हो गया है जो ऐसा कर रहे हैं. कोई ऐसे भी करता है. जब सामान ही नहीं लाएंगे तो काम कैसे होंगे? मौत कोई आप के घर में ही नहीं हुई है.

क्या कोई ऐसे आपा खोता है? संभालिए खुद को. कभी सोचा है ये नातेरिश्तेदार, ये समाज के लोग क्या कहेंगे कि एकलौती संतान का ढंग से क्रियाकर्म तक नहीं किया.’’ ‘‘मु?ो इन सब की परवा नहीं है.’’ ‘‘अरे, आप का क्या, आप से तो कोई कुछ कहेगा नहीं, सुननी तो मु?ो पड़ेगी. अगर पैसे न हों तो मैं दे दूंगी. अब तुम बेकार का लफड़ा मत करो.’’ ‘‘लफड़ा… और मैं… और तुम कहां से पैसा दोगी?’’ ‘‘क्यों?’’ ‘‘तुम्हीं तो कह रही थीं कि तुम केवल मेरे लालच के चलते नौकरी कर रही हो.’’ ‘‘मैं ने ऐसा कब कहा. वह तो गुस्से की बात थी. उसी को ले कर बैठे हो.’’ ‘‘नहीं शर्मिष्ठा, मैं सोचसम?ा कर ही कह रहा हूं. अब जब कोई खर्च ही नहीं है तो तुम्हें नौकरी करने की भी कोई जरूरत नहीं है.’’ ‘‘इन का तो लगता है वाकई दिमाग खराब हो गया है,’’ मेरे साले साहब बोल पड़े. ‘‘अब तुम्हीं सम?ाओ न इन्हें भैया,’’ शर्मिष्ठा अपने भाई से बोली. ‘‘मु?ो कुछ भी सम?ाने की जरूरत नहीं है. मैं सबकुछ सम?ा गया हूं, सम?ां.’’ ‘‘तो तुम क्या करोगे? यह घर क्या बिना शुद्धि के ऐसे ही पड़ा रहेगा?’’ ‘‘नहीं, कल शुद्धि करवा लेंगे, बस.’’ ‘‘और दसवीं, तेरहवीं, ब्राह्मण भोज, सामाजिक भोज वगैरह.’’ ‘‘इन की कोई आवश्यकता नहीं है. मेरे घर में मौत हुई है, कोई खुशी का अवसर नहीं कि सब को भोजन कराऊं.

यह कहां का न्याय है कि बजाय मदद करने के, खानपान का यह खर्च और सिर पर लाद दिया जाए?’’ ‘‘बस, बस, रहने दे. थोड़ा पढ़लिख क्या गया कि रीतिरिवाजों पर तर्क करने लगा. सीधी तरह क्यों नहीं कहता कि अब तु?ो पैसा खर्च नहीं करना है जो तरहतरह के बहाने बना रहा है,’’ ताऊजी बोले. ‘‘तो बताएं कि मैं क्या गलत कह रहा हूं?’’ ‘‘मु?ो तुम से बहस नहीं करनी है. हां, एक बात कान खोल कर सुन लो, अगर तुम ने ढंग से विधिवत कर्मकांड नहीं कराए तो हम तुम्हारे घर का पानी भी नहीं पिएंगे.’’ ‘‘आप की मरजी है. आप को पानी पिलाने के लिए मैं अपना सर्वनाश नहीं कर सकता.’’ ‘‘तो ठीक है, चमेली, संगीता, अनिता, अपना सामान बांधो और निकल चलो. इस का तो मुंह देखना भी…’’ ‘‘हां, हां चलो,’’ कहते हुए और दूसरे नातेरिश्तेदार भी उठ खड़े हुए. ‘‘देखेंगे, ये अकेले क्याक्या कर लेते हैं. समाज के बिना देखे कैसे जिएंगे,’’ बिफरते हुए बड़े साले साहब बोले. ‘‘मु?ो तुम और तुम्हारे जैसी स्वार्थी समाज की आवश्यकता नहीं है. तुम लोग चले जाओगे तो मु?ो कर्मकांड के लिए कर्ज नहीं लेना पड़ेगा, तुम्हारी आएदिन की फरमाइशें भी पूरी नहीं करनी पड़ेंगी. ‘‘रही बात समाज की, सो मेरे साथ मेरे ये पड़ोसी हैं जो आज पिछले 3 दिनों से अपने सारे काम छोड़ कर निस्वार्थ भाव से सारा काम संभाले हुए हैं. इन में संवेदनशीलता है और ये मेरा दर्द सम?ाते हैं.’’ ‘‘हां, हां, लगा ले इन्हें अपने कलेजे से. चलो,’’ कह कर ताऊजी सब को ले कर बाहर की ओर चल

GHKKPM: शो के सेट पर सवि ने संभाली डायरेक्टर की कुर्सी, देखें Video

आयशा सिंह, ऐश्वर्या शर्मा और नील भट्ट स्टारर शो ‘गुम है किसी के प्यार में’ की कहानी में जमकर हाईवोल्टेज ड्रामा देखने को मिल रहा है. शो की कहानी में लगातार ट्विस्ट एंड टर्न  देखने को मिल रहा है. जिससे दर्शकों का खूब एंटेरटेनमेंट हो रहा है. सई पाखी-विराट को एक साथ देखकर उनसे दूर रहने का फैसला करती है. इसी बीच सई की बेटी यानी सवी का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है. आइए जानते हैं, इस वीडियो के बारे में…

सवि अब ‘गुम है किसी के प्यार में’  की कहानी बदलने में जुट गई है. सोशल मीडिया पर सवि यानी अरिया सकारिया का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है. इस वीडियो में अरिया सकारिया डायरेक्टर बनकर एक्शन बोलती नजर आ रही हैं. अरिया सकारिया के इस अंदाज को देखकर फैंस कह रहे हैं कि वो शो की कहानी में अपने हिसाब से बदलाव करने वाली है. इस काम में आयशा सिंह भी अरिया सकारिया की मदद करती नजर आ रही हैं.

 

शो के लेटेस्ट एपिसोड में दिखाया गया कि विराट पाखी का बर्थडे सेलिब्रेट करता है. उसके लिए केक और गिफ्ट बुक करने लगता है. तो  दूसरी तरफ सई, सवि को गुलाब का फूल देती है, लेकिन वह फूल सवि विनायक को देती है.

 

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शो में ये भी दिखाया गया कि विनायक उस लाल गुलाब को विराट के पास ले जाता है और पाखी को प्रपोज करने के लिए कहता है. विनायक विराट से कहता है कि पाखी का जन्मदिन है, ऐसे में उनसे उसे गुलाब देना चाहिए.

 

अनुपमा को जान से मारने की धमकी देगा पारितोष! क्या करेगी किंजल?

टीवी शो ‘अनुपमा’ लगातार टीआरपी लिस्ट में टॉप पर बना हुआ है. इन दिनों शो की कहानी का ट्रैक दर्शकों का दिल जीत रहा है. शो के बिते एपिसोड में आपने देखा कि  एक तरफ किंजल की बेटी का रोना बंद नहीं होता है तो वहीं उसे बचाने के चक्कर में अनुज गिर जाता है और उसके सिर पर चोट लग जाती है. ये सब देखकर ‘अनुपमा’ बुरी तरह घबरा जाती है.  उसे लगाता है कि उसके कारण ही सबकुछ हो रहा है. वह खुद कोसती लेकिन अनुज उसे समझाता है. शो के अपकमिंग एपिसोड में खूब धमाल होने वाला है. आइए बताते हैं शो के नए एपिसोड के बारे में…

शो के नए एपिसोड में आप देखेंगे कि बा कपाड़िया हाउस जाकर खूब तमाशा करने वाली है. वह अनुपमा के घर जाकर किंजल से उसकी बेटी छीनने लगती हैं. लेकिन अनुपमा उनके हाथ से बच्ची ले लेती है और कहती है कि वह कोई खिलौना नहीं है. लेकिन बा अनुपमा को कहती है कि इसने खुद का घर तोड़ दिया है, वो किंजल का घर भी तोड़ देगी. बा, अनुपमा को ताना मारती हैं कि अपने ही बेटे का बर्बाद करने पर क्यों तुली है.

 

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बा अनुपमा को  खूब सुनाती है. ऐसे में अनुज का पारा बढ़ जाता है. वह बा पर चीख पड़ता है औऱ कहता है कि इतनी देर से आप अनुपमा को भला-बुरा कह रही हैं, लेकिन अब प्लीज यहां से चले जाइए.

 

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तो दूसरी तरफ वनराज को पता चलता है कि बा, किंजल और परी से मिलने के लिए कपाड़िया हाउस गई हैं तो वो परेशान हो जाता है. वह कहता है कि बा को ऐसा नहीं करना चाहिए था. उसका दिल परितोष से मिली धमकी से बैठ जाता है. वह कहता है कि परितोष क्या करेगा, क्या नहीं कुछ नहीं पता है.

 

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शो में आप देखेंगे कि परितोष कपाड़िया हाउस  जाएगा और किंजल से उसकी बेटी छीनेगा. वह हाथ में चाकू लेकर कहेगा कि किंजल अगर तुमने मुझे माफ नहीं किया तो मैं अपनी जान दे दूंगा. इसी बीच अनुपमा उससे कहेगी कि “हां तो दे ना.” रिपोर्ट के अनुसार परितोष अपनी जगह अनुपमा की जान लेने की कोशिश करेगा. शो में ये देखना दिलचस्प होगा कि अनुपमा अपने बेटे को कैसे सुधारती है?

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