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ज्योति -भाग 2: सब्जबाग के जाल में

इस का एक कारण यह भी था कि ज्योति के घर में ऐसा कोई अतिरिक्त कमरा नहीं था, जहां वे दोनों पौलीटैक्निक की पढ़ाई संजीदगी से कर सकें, जबकि हरीश और प्रियंका को उस के पिता ने अलगअलग कमरे दे रखे थे. और उस का घर भी ज्योति और जुगल के घर से बड़ा था.

समय के साथसाथ ज्योति और प्रियंका की पढ़ाई आगे बढ़ती रही. दोनों की स्कूल में तो मुलाकातें होतीं, पर एकदूसरे के घर दोनों न पहुंच पातीं.

3 साल से ज्यादा का समय बीत चुका था. दोनों इंटर फाइनल का रिजल्ट स्कूल बोर्ड पर देख कर अपनीअपनी साइकिलों से लौट रही थीं, तो अपने रिजल्ट से उदास प्रियंका के विशेष अनुरोध पर वह उस के घर रुक गई.

बाहरी ड्राइंगरूम में बैठ कर ज्योति ने जब प्रियंका से पूछा, “मुझे बड़ा आश्चर्य है कि तू एक्जाम में फेल हो गई?

“तेरे भाई जुगल से प्यार के उतावलेपन के कारण मैं फेल हो गई. मेरा पढ़नेलिखने में बिलकुल भी मन नहीं लगा और हम दोनों एकदूसरे में समा जाने को इतने आतुर हो गए कि मैं ने प्यार में जुगल को पूरी तरह सौंप दिया.”

“तू भी अजीब लड़की है, ऐसे कैसे तू ने अपना सर्वस्व शादी से पहले किसी को सौंप दिया.”

इसलिए कि एक तो वह तेरा भाई था, जिस पर मुझे तुझ से ज्यादा भरोसा हो गया था. दूसरे, मैं उसे अपना दिल दे कर यह सोच चुकी थी कि जब भी शादी करूंगी तो उसी से. और उस ने भी मुझ से वादा किया था.

“मेरा भाई था तो क्या…?कभी सोचा नहीं कि तेरी उम्र क्या है और इस उम्र का प्यार क्या गुल खिला सकता है. ये बता कि जब तुम दोनों एकदूसरे के समीप होते थे, तो उस समय हरीश कहां होता था.”

“भैया या तो मां के किसी काम से बाजार गए हुए होते थे. कई बार तो ऐसा भी हुआ कि जब जुगल संयुक्त पढ़ाई करने आया तो भैया नहाने के लिए गुसलखाने में घुसा होता था और हम दोनों ही जानते थे कि वह नहाने घुसता है, तो घंटाभर लगाता ही है.”

“और, तुम्हारी मां कहां होती थीं उस समय?”

“मां तो पूजापाठ या घर के कामों में ही बिजी रहती थीं. और यही समझती थीं कि हम दोनों अपनेअपने कमरों में पढ़ाई कर रहे हैं.”

“पिताजी को तो तू जानती ही है. सवेरे जो अपनी पूजन सामग्री वाली दुकान खोल कर बैठते हैं, तो रात को ही लौटते हैं.”

“एक को दूसरे के कमरे में जाते हुए कभी नहीं देखा किसी ने?”

“चोरीछिपे प्यार करने वाले बड़े सतर्क रहते हैं. फिर तू तो जानती है कि मेरे कमरे से भैया के कमरे में जाने के लिए बीच में भी तो दरवाजा है, जो यों तो बंद रहता है, पर जब दोनों कमरों में रहने वाले चाहें तो खोल सकते हैं.”

ज्योति के दिमाग में एक बार फिर पुराना दृश्य घूम गया, जब उसी दरवाजे से हरीश ने आ कर मजे ले लिए थे.

उस ने तो अपने को संभाल लिया, पर प्रियंका फंस गई.16-17 साल की उम्र का दोष है या दूरदर्शिता की कमी. कितनी लड़कियां ऐसी स्थिति से अपने को बचा पाती होंगी. वो क्या करें? यहां वह जवान युवक उस का भाई है, जिस ने उस की सहेली के शरीर से जी भर कर खिलवाड़ किया. आज वह ये सब उसे तब बता रही है, जब सबकुछ घट चुका है.

ऐसा नहीं है कि 2-4 बार हरीश भी जुगल से मिलने उस के घर आया, पर क्या मजाल कि वह उस के करीब आ पाया हो. उसे अपनी सीमाएं और घर की मर्यादाएं पता थीं.

परंतु, प्रियंका का स्वभाव उस से भिन्न था. हो सकता है कि उस ने पहले दिन से ही जुगल की छिछोरी हरकत का विरोध न कर के उस से मिलने वाले आनंद को आत्मसात कर लिया हो और उसे लगातार बढ़ावा देती गई हो.

उस ने गौर किया कि कैंपस सेलेक्शन होने के बाद पिताजी ने जुगल की शादी की बात चलाई, तो वह फौरन ही राजी हो गया. उस समय तो ऐसा लग रहा था, जैसे आज तक उस ने किसी लड़की को आंख उठा कर भी न देखा हो. वह तो जुगल को बहुत सीधा समझती थी. वह समझ गई कि जैसे और मर्दों की फितरत होती है कि वह किसी एक के प्यार से संतुष्ट नहीं होते. उस का भाई भी तो इसी समाज का अंग है. फिर उसे अपने राठौर होने का भी तो गुरूर है.

Bigg Boss 16: श्रिजिता डे को सलमान खान ने दिखाया घर से बाहर का रास्ता

सलमान खान का सबसे चर्चित शो बिग बॉस 16 में आएं दिन नए-नए अपडेट आते रहते हैं, शो में कंटेस्टेंट आएं दिन कुछ न कुछ नया बोलते नजर आ रहे हैं , जिससे उनकी बातें दर्शकों तक पहुंच रही हैं.

अब शो में एलिमिनेश का दौर शुरू हो गया है, हर दिन नए- नए कंटेस्टेंट एलिमिनेट होते रहते हैं,इस शो से कोई एक सदस्य घर से बाहर होने वाला है. इस लिस्ट में अभी तक 5 लोगों का नाम आ चुका है, बता दें कि पहला नाम श्रीजिता डे का आया है , जैसे ही यह खबर सामने आई है सभी फैंस हैरान हो गए.

 

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फैंस श्रिजिता डे को दमदार कंटेस्टेंट मानते हैं, बता दें कि शो में इससे पहले श्रिजिता और टीना दत्ता के बीच जमकर बहस हुईं है, जिसे देखने के बाद से दर्शक कयास लगा रहे हैं कि श्रिजिता डे के नॉमिनेट होने का यही कारण हो सकता है.

हालांकि अभी तक कंटेस्टेंट का नॉमिनेशन नहीं हुआ है, फैंस नहीं चाहते हैं कि श्रिजिता डे इस शो को बीच में छोड़कर जाए. क्योंकि श्रिजिता डे एक दमदार कंटेस्टेंट हैं. सलमान खान ने श्रिजिता डे की क्लास भी लगाई थी.

इससे पहले शो में दलजीत कौर के एक्स पति शालिन भनोट को लेकर बात हो रही थी.

उर्फी जावेद और पारस कलनावत का क्या सच में हो गया है पैचअप ?

उर्फी जावेद और पारस कलनावत अक्सर अपनी ब्रेकअप की खबरों को लेकर चर्चा में बने रहते हैं, पारस से ब्रेकअप के बाद भी उर्फी उन्हें अपना अच्छा दोस्त मानती हैं. हाल ही में उर्फी जावेद ने अपनी प्री बर्थ डे पार्टी रखी थी, जिसमें उनके खास दोस्त शामिल थें.

जहां पारस कलनावत भी उर्फी जावेद के प्री बर्थ डे पार्टी मनाने पहुंचे, इस दौरान पारस कलनावत भी अपनी एक्स गर्लफ्रेंड के साथ जमकर फोटो खींचवाई हैं. इन दोनों की तस्वीर सोशल मीडिया पर चर्चा की विषय बनी हुई है.

 

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जिसे देखकर साफ लग रहा है कि उर्फी जावेद और पारस कलनावत फिर से अच्छे दोस्त बन गए हैं.जिसे देखकर कुछ लोग यह भी कयास लगा रहे हैं कि क्या इन दोनों का फिर से पैचअप हो गया है. इस तस्वीर को देखने के बाद से कुछ ऐसे ही इशारा सामने आ रहे हैं.

बता दें कि टीवी स्टार उर्फी जावेद 25 साल की हो गई हैं. वह अपना 25 वां जन्मदिन मना रही हैं. उर्फी जावेद ने अपनी प्री बर्थ डे पार्टी की तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर किया है. जिसे लोग खूब पसंद कर रहे हैं.

अपने प्री बर्थ डे पर उर्फी जमकर पार्टी करती नजर आईं, बता दें कि उर्फी जावेद अक्सर अपने कपड़ों को लेकर चर्चा में बनी रहती हैं. उर्फी जावेद के नए पोस्ट का इंतजार उनके फैंस को भी होता है.

Diwali 2022: कैसे मनाएं ईकोफ्रैंडली दीवाली

20 वर्षीय प्रभात बहुत खुश था. दीवाली का त्योहार उसे काफी अच्छा लगता था. प्रभात के कालेज में समझाया जा रहा था कि दीवाली पर पटाखे नहीं चलाने चाहिए. प्रभात को इन बातों पर भरोसा नहीं हो रहा था. अपने घर वालों से जिद कर के प्रभात ने पटाखे और फुलझडि़यां खरीद ली थीं. उस ने दीवाली पर अपने रिश्तेदारों को भी बुलाया था.

सब ने तय किया कि आज महल्ले में खूब धमाल मचाएंगे. उस के कुछ साथी तो तेज आवाज वाले बमपटाखे भी लाने वाले थे. शाम होते ही महल्ले के सभी लड़के एक जगह आ गए. प्रभात के घर की छत काफी बड़ी थी, इसलिए सभी वहीं पर आ गए. प्रभात और उस के साथियों का धमाल शुरू हो गया. पटाखों का धुआं चारों ओर फैलने लगा था.

अचानक प्रभात को सांस लेने में तकलीफ होने लगी. उसे खांसी भी आ गई. वह घबरा कर नीचे आया. घरपरिवार के लोगों ने मामले को हलके में लिया. प्रभात की तकलीफ बढ़ने लगी. कुछ देर में ही वह बेहोश हो गया.

घर के लोग प्रभात को ले कर अस्पताल की तरफ भागे. वहां डाक्टरों ने बताया कि प्रभात को दमे की बीमारी थी जो दीवाली के पटाखों के धुएं से और बढ़ गई है, जिस से प्रभात की तबीयत खराब होने लगी थी. डाक्टरों के काफी इलाज के बाद ही वह ठीक हो सका. डाक्टरों ने प्रभात और उस के परिवार के लोगों को हिदायत देते हुए कहा कि कभी इस को धुएं में मत भेजिएगा. इस से दमे की बीमारी दोबारा उभर सकती है. अब प्रभात कभी पटाखे नहीं चलाता और दूसरों को भी चलाने से मना करता है.

खुशी कम, धुआं ज्यादा

दीवाली खुशियों का त्योहार है. इस त्योहार की सब से बड़ी बुराई यह है कि खुशियां मनाने के लिए लोग पटाखों और फुलझडि़यों का सहारा लेते हैं जिन से जहरीला धुआं फैलता है और वह वातावरण को विषैला बना देता है. यह धुआं अस्थमा के मरीजों को नुकसान पहुंचाता है. इन में बच्चे, बूढ़े, जवान सभी उम्र के लोग होते हैं. सांस की बीमारी के अलावा पटाखों की तेज आवाज कानों को भी नुकसान पहुंचाती है. इस की आवाज से आदमी ही नहीं, जानवर भी बेचैन हो जाते हैं. इस को ध्वनि प्रदूषण कहा जाता है. ध्वनि प्रदूषण कम करने के लिए ही अस्पतालों और स्कूलों में साइलैंस जोन बनाए जाते हैं, वहां पर तेज आवाज में हौर्न बजाने की मनाही होती है.

देखा जाता है कि जब लोग तेज आवाज वाले पटाखे, बम और दूसरी चीजें चलाते हैं तो अपना मुंह दूसरी ओर कर के कान पर हाथ रख लेते हैं यानी यह आवाज उन को भी अच्छी नहीं लगती है. सोचने की बात यह है कि जब हमारे कानों को कोई चीज अच्छी नहीं लगती तो वह दूसरों को कैसे अच्छी लगेगी? इसलिए तेज आवाज के पटाखे नहीं चलाने चाहिए.

जोखिमभरा पटाखा कारोबार

पटाखे केवल चलाने वालों को ही नुकसान नहीं पहुंचाते बल्कि बनाने वालों को भी नुकसान पहुंचाते हैं. पटाखे बनाने में बारूद का इस्तेमाल होता है जो बनाने वाले के हाथों को नुकसान पहुंचाता है. इस के अलावा जब यह बारूद नाक के रास्ते फेंफड़ों तक पहुंचता है तो यह व्यक्ति को गंभीर बीमारी का शिकार बना देता है.

दीवाली के दौरान पटाखों की दुकानों में आग लगने और विस्फोट होने की घटनाएं बढ़ जाती हैं. कई बार तो इस से बाजारों में आग भी लग जाती है. इसलिए सरकार ने पटाखों की दुकानें खुली जगह पर लगाने का आदेश दिया है. इस के बाद भी पटाखा बेचने वाले गलीमहल्ले में दुकानें लगाते हैं, जिस से दुर्घटनाएं होती हैं. यदि पटाखों का यह कारोबार बंद हो जाए तो तमाम तरह की परेशानियां अपनेआप खत्म हो जाएंगी. पटाखे खुशी कम और दुख ज्यादा देते हैं.

रोशनी खड़ी करे परेशानी

दीवाली में खुशियां मनाने का दूसरा तरीका बिजली की रोशनी का है. इस के लिए लोग बड़ी संख्या में बिजली की झालरें, बल्ब और दूसरे सजावटी सामानों का इस्तेमाल करते हैं. इस में सब से बड़ी बात यह है कि लोग एकदूसरे की देखादेखी में अपने घर पर ज्यादा से ज्यादा रोशनी करना चाहते हैं. इस से बिजली का खर्च बढ़ता है. इस का परिणाम यह होता है कि बिजली सप्लाई में परेशानी आती है. अस्पतालों, औफिसों, रेलवे स्टेशनों और बाजारों को समुचित मात्रा में बिजली नहीं मिल पाती. बिजली का सजावटी सामान लगाने के लिए लोग बिजली चोरी करते हैं. इस वजह से जगहजगह पर फ्यूज उड़ जाते हैं, जिस से बिजली जाने की परेशानी ज्यादा बढ़ जाती है.

दीवाली रोशनी का त्योहार माना जाता है. लोग बाजारों में देररात तक खरीदारी करते हैं. जिस से बिजली की व्यवस्था खराब हो जाती है. इसलिए बिजली की फुजूलखर्ची रोकने के लिए कम बिजली जलानी चाहिए. रोशनी करने के लिए दीयों का प्रयोग करें, यह वातावरण के लिए ठीक रहता है.

रंगोली से दीवाली में घर की सजावट की जाती है, लेकिन इसे बनाने के लिए हानिकारक रंगों का इस्तेमाल किया जाता है. इसलिए जरूरत इस बात की है कि रंगोली बनाने के लिए प्राकृतिक चीजों को ही आजमाएं. इस के लिए फूल और पत्ती का प्रयोग कर सकते हैं. चावल रंगने के लिए हलदी का इस्तेमाल करें. पत्तियों को बारीक काट लें, इन का इस्तेमाल रंगोली को आकर्षक बनाने के लिए कर सकते हैं. इसी तरह प्राकृतिक रंग बनाने में अलगअलग रंगों के फूलों के भी रंग निकाल सकते हैं.

ईकोफ्रैंडली दीवाली मनाने के लिए कृत्रिम रंगों का बहिष्कार करें. लखनऊ में रंगोली की बड़ी कलाकर ज्योति रतन कहती हैं कि प्राकृतिक रंगों से आकर्षक रंगोली बनाई जा सकती है. रंगोली में डिजाइन और रंगों का प्रयोग महत्त्वपूर्ण होता है. आज बाजार में तरहतरह के फूल आने लगे हैं जिन से रंगबिंरगी रंगोली बनाई जा सकती है.

अनकहा प्यार- भाग 2: क्या सबीना और अमित एक-दूसरे के हो पाए?

दुबई से नौकरी छोड़ कर आमिर ने अपना खुद का व्यापार शुरू कर दिया. बेटे सलीम को पढ़ाई के लिए उसे होस्टल में डाल दिया. सबीना का भी आमिर ने अच्छी तरह ध्यान रखा. उसे खूब प्रेम दिया. लेकिन जबजब आमिर सबीना से कहता कि नौकरी छोड़ दो. सबकुछ है हमारे पास. सबीना ने यह कह कर इनकार कर दिया कि कल तुम्हें कोई और भा गई. तुम ने फिर तलाक दे दिया तो मेरा क्या होगा? फिर मुझे यह नौकरी भी नहीं मिलेगी. मैं नौकरी नहीं छोड़ सकती. इस बात पर अकसर दोनों में बहस हो जाती. घर का माहौल बिगड़ जाता. मन अशांत हो जाता सबीना का.

‘तुम्हें मुझ पर यकीन नहीं है?’ आमिर ने पूछा.

‘नहीं है,’ सबीना ने सपाट स्वर में जवाब दिया.

‘मैं ने तो तुम पर विश्वास किया. तुम्हें क्यों नहीं है?’

‘कौन सा विश्वास?’

‘इस बात का कि हलाला में पराए मर्द को तुम ने हाथ भी नहीं लगाया होगा.’

‘जब निकाह हुआ तो पराया कैसे रहा?’

‘मैं ने इस बात के लिए 3 लाख रुपए खर्च किए थे. ताकि जिस से हलाला के तहत निकाह हो, वह  हाथ भी न लगाए तुम्हें.’

‘भरोसा मुझ पर नहीं किया आप ने. भरोसा किया मौलवी पर. अपने रुपयों पर, या जिस से आप ने गैरमर्द से मेरा निकाह करवाया.’’

‘लेकिन भरोसा तो तुम पर भी था न.’

‘न करते भरोसा.’

‘कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरे 3 लाख रुपए भी गए और तुम ने रंगरेलियां भी मनाई हों.’ आमिर की इस बात पर बिफर पड़ी सबीना. बस, इसी मुद्दे को ले कर दोनों में अकसर तकरार शुरू हो जाती और सबीना पार्क में आ कर बैठ जाती.

पार्क की बैंच पर बैठे हुए उस की दृष्टि सामने बैठे हुए एक अधेड़ व्यक्ति पर पड़ी. वह थोड़ा चौंकी. उसे विश्वास नहीं हुआ इस बात पर कि सामने बैठा हुआ व्यक्ति अमित हो सकता है. अमित उस के कालेज का साथी. 45 वर्ष के आसपास की उम्र, दुबलापतला शरीर, सफेद बाल, कुछ बढ़ी हुई दाढ़ी जिस में अधिकांश बाल चांदी की तरह चमक रहे थे. यहां क्या कर रहा है अमित? इस शहर के इस पार्क में, जबकि उसे तो दिल्ली में होना चाहिए था. अमित ही है या कोई और. नहीं, अमित ही है. शायद मुझ पर नजर नहीं पड़ी उस की.

अमित और सबीना एकसाथ कालेज में पूरे 5 वर्ष तक पढ़े. एक ही डैस्क पर बैठते. एकदूसरे से पढ़ाई के संबंध में बातें करते. एकदूसरे की समस्याओं को सुलझने में मदद करते. जिस दिन वह कालेज नहीं आती, अमित उसे अपने नोट्स दे देता. जब अमित कालेज नहीं आता, तो सबीना उसे अपने नोट्स दे देती. कालेज के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में दोनों मिल कर भाग लेते और प्रथम पुरुस्कार प्राप्त करते हुए सब की वाहवाही बटोरते. जिस दिन अमित कालेज नहीं आता, सबीना को कालेज मरघट के समान लगता. यही हालत अमित की भी थी. तभी तो वह दूसरे दिन अपनत्वभरे क्रोध में डांट कर पूछता. ‘कल कालेज क्यों नहीं आईं तुम?’

सबीना समझ चुकी थी कि अमित के दिल में उस के प्रति वही भाव हैं जो उस के दिल में अमित के प्रति हैं. लेकिन दोनों ने कभी इस विषय पर बात नहीं की. सबीना घर से टिफिन ले कर आती जिस में अमित का मनपसंद भोजन होता. अमित भी सबीना के लिए कुछ न कुछ बनवा कर लाता जो सबीना को बेहद पसंद था. वे अपनेअपने सुखदुख एकदूसरे से कहते. अमित ने बताया कि उस के घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है. घर में बीमार बूढ़ी मां है. जवान बहन है जिस की शादी की जिम्मेदारी उस पर है. अपने बारे में क्या सोचूं? मेरी सोच तो मां के इलाज और बहन की शादी के इर्दगिर्द घूमती रहती है. बस, अच्छे परसैंट बन जाएं ताकि पीएचडी कर सकूं. फिर कोई नौकरी भी कर लूंगा.’’

सबीना उसे सांत्वना देते हुए कहती, ‘चिंता मत करो. सब ठीक हो जाएगा.

सबीना के घर की उन दिनों आर्थिक स्थिति अच्छी थी. उस के अब्बू विधायक थे. उन के पास सत्ता भी थी और शक्ति भी. कभी कहने की हिम्मम नहीं पड़ी उस की अपने अब्बू से कि वह किसी हिंदू लड़के से प्यार करती है. कहती भी थी तो वह जानती थी कि उस का नतीजा क्या होगा? उस की पढ़ाईलिखाई तुरंत बंद कर के उस के निकाह की व्यवस्था की जाती. हो सकता है कि अमित को भी नुकसान पहुंचाया जाता. लेकिन घर वालों की बात क्या कहे वह? उस ने खुद कभी अमित से नहीं कहा कि वह उस से प्यार करती है. और न ही अमित ने उस से कहा.

अमित अपने परिवार, अपने कैरियर की बातें करता रहता और वह अमित की दोस्त बन कर उसे तसल्ली देती रहती. पैसों के अभाव में सबीना ने कई बार अमित के लाख मना करने पर उस की फीस यह कह कर भरी कि जब नौकरी लग जाए तो लौटा देना, उधार दे रही हूं.

और अमित को न चाहते हुए भी मदद लेनी पड़ती. यदि मदद नहीं लेता तो उस का कालेज कब का छूट चुका होता. कालेज की तरफ से कभी पिकनिक आदि का बाहर जाने का प्रोग्राम होता, तो अमित के न चाहते हुए भी उसे सबीना की जिद के आगे झकना पड़ता. कई बार सबीना ने सोचा कि अपने प्यार का इजहार करे लेकिन वह यह सोच कर चुप रह गई कि अमित क्या सोचेगा? कैसी बेशर्म लड़की है? अमित को पहल करनी चाहिए. अमित

कैसे पहल करता? वह तो अपनी गरीबी

से उबरने की कोशिश में लगा हुआ था. अमित सबीना को अपना सब से अच्छा दोस्त मानता था. अपना सब से बड़ा शुभचिंतक. अपने सुखदुख का साथी. लेकिन वह भी कर न सका अपने प्यार

का इजहार.

प्यार दोनों ही तरफ था. लेकिन कहने की पहल किसी ने नहीं की. कहना जरूरी भी नहीं था. प्यार है, तो है. बीए प्रथम वर्ष से एमए के अंतिम वर्ष तक, पूरे 5 वर्षों का साथ. यह साथ न छूटे, इसलिए सबीना ने भी अंगरेजी साहित्य लिया जोकि अमित ने लिया था. अमित ने पूछा भी, ‘तुम्हारी तो हिंदी साहित्य में रुचि थी?’

‘मुझे क्या पता था कि तुम अंगरेजी साहित्य चुनोगे,’ सबीना ने जवाब दिया.

‘तो क्या मेरी वजह से तुम ने,’ अमित ने पूछा.

‘नहीं, नहीं, ऐसी कोई बात नहीं. सोचा कि अंगरेजी साहित्य ही ठीक रहेगा.’

‘उस के बाद क्या करोगी?’

‘तुम क्या करोगे?’

‘मैं, पीएचडी.’

‘मैं भी, सबीना बोली.’

ज्योति -भाग 1: सब्जबाग के जाल में

प्रियंका अपने कमरे में ज्योति को बिठा कर उस के लिए कुछ खानेपीने का सामान लाने कमरे से बाहर चली गई, तो हरीश तेजी से उस कमरे में घुस आया. हरीश के उस समय इंटर के एक्जाम चल रहे थे. आते ही वह बोला, “ज्योति, तुम बहुत सुंदर हो. पता नहीं क्यों जब भी तुम्हें देखता हूं, तो मन तुम्हें सीने से लगाने को करता है.”

“तुम पढ़ाई करते हो या ये सब सोचते रहते हो. तुम्हें अपना पूरा ध्यान पढ़ाई में लगाना चाहिए. ज्योति ने समझाना चाहा, तो वह बोला, “ज्योति, पढ़ाई के साथसाथ जिंदगी के मजे भी लेने चाहिए.”

“मजे लेने से क्या मतलब है तुम्हारा…?” ज्योति के ऐसा पूछने पर वह बिलकुल उस के करीब आया और उस के कान के पास झुक कर धीरे से बोला, “मजे लेने का मतलब है…” ऐसा कहते हुए उस ने ज्योति को अपने सीने में भींच कर उस के दोनों होंठों को अपने होंठों से गीला कर दिया.

ज्योति एकदम से घबरा गई थी. उस ने जोर से हरीश को धक्का दिया और बोली, “ये क्या कर रहे थे तुम? शर्म नहीं आती…”

“तुम्हें बता रहा था कि मजे…”

तभी प्रियंका एक ट्रे में कुछ खाने का सामान और पानी का गिलास लिए आ गई.

उस के आते ही हरीश ने बात बदल दी, “हां, तो मैं बता रहा था कि मजेदार सब्जेक्ट है ‘मैथ’. तुम 9वीं में मैथ अवश्य लेना,” इतना कह कर उस ने प्रियंका की पढ़ाई वाली मेज पर पड़ा स्केल उठाया और तेजी से कमरे से बाहर निकल गया.

ये हरकत हरीश ने इसलिए की कि प्रियंका समझे कि वह कमरे में उस का स्केल लेने आया था.

उस के बाद ज्योति ने प्रियंका के घर जाना ही बंद कर दिया, जबकि इस से पहले जब भी प्रियंका स्कूल से लौटते समय उस से अपने घर चलने को कहती थी तो वह कभी मना नहीं करती थी. कुछ देर उस के घर में रुक कर ही अपने घर जाती थी.

फिर 9वीं में एडमिशन के बाद दोनों के सैक्शन बदल गए थे, तो इस कारण भी दोनों का घर आनाजाना न के बराबर हो गया था. पर, ज्योति और प्रियंका के भाइयों के इंटर करने के बाद पौलीटैक्निक में एक ही विषय लेने के कारण दोस्ती बढ़ गई थी. अधिकतर जुगल ही हरीश के घर संयुक्त रूप से पढ़ाई करने के कारण पहुंच जाता था.

मेरी लॉकडाउन में नौकरी चली गई है, मैं फाइनैंशियल परेशान हूं कुछ उपाय बताएं?

सवाल
मैं 35 वर्षीय हूं. लौकडाउन के दौरान मेरी नौकरी चली गई थी और घर में फाइनैंशियल दिक्कत आ गई थी. इस मारे मैं ने अपने एक मित्र से 60 हजार रुपए का कर्जा लिया था. आज 8 महीने बीत गए हैं. नौकरी अभीअभी लगी है. मैं उस का कर्जा चुका देना चाहता हूं पर कर्जा चुकाने लायक पैसा अभी नहीं जोड़ पाया हूं. वह पैसों के लिए फोन कर रहा है पर उस का फोन उठा कर उस से बात करने की हिम्मत नहीं हो रही. बताइए मैं क्या करूं?
जवाब
 

अगर कर्जा लिया है तो सही समय पर चुकाना ही चाहिए. वरना जिन से कर्जा लिया है उन से रिश्ते बिगड़ते ही बिगड़ते हैं. इस से सिर्फ रिश्ते नहीं बिगड़ते साथ में आगे के लिए रास्ते भी बंद हो जाते हैं. आप बता रहे हैं कि आप फोन नहीं उठा रहे. यह तो बहुत ही गलत कर रहे हैं आप.

सब से पहले तो जिन्होंने आप को कर्जा दिया है उन के टच में रहें. किन्हीं दिक्कतों से गुजर रहे हैं तो बेहतर यह है कि आप लेनदार से व्यक्तिगत रूप से बात करेंउन से मिलें और अपनी अवस्था का वितरण बताएं. आप की ईमानदारी में खोट नहींयह उन्हें सम?ाएं और दोस्त को विश्वास में लें. इस से दोनों एकदूसरे की दिक्कत सम?ा सहमति पर आगे बढ़ेंगे.

कोशिश करेंआप एक तय किस्त बांध लेंजिसे समयसमय पर दे कर कर्जा मुक्त होते रहें. इस से दोस्त को भी लगेगा कि आप पैसा देने के सही में इच्छुक हैं. आप की नौकरी लग गई है तो कुछ पैसा आप के पास आएगा. कोशिश करें कर्जे से छुटकारा पाने के लिए अपने खर्चों को कम करें और जितनी जल्दी हो सके कर्जमुक्त हों.

औरत की औकात- भाग 1: प्रौपर्टी में फंसे रिश्तों की कहानी

कल रात से ही वह अपनी सास से हुई बहस को ले कर परेशान थी. उस पर सोते वक्त पति के सामने अपना दुखड़ा रो कर मन हलका करना चाहा तो उस के मुंह से रमा सहाय का नाम सुन कर पति का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. सारी रात आंखों में ही कुछ समझते हुए और कुछ न समझ आने पर उस पर गहन विचार करते हुए उस ने गुजार दी.

सुबह उठी तो आंखें बोझिल हो रही थीं और सिर भारी हुआ जा रहा था. रात को सास और फिर पति के संग हुई बहस की वजह से आज उस का मन किसी से भी बात करने को न हो रहा था. न चाहते हुए भी भारी मन से पति के लिए टिफिन बना कर उन्हें नौकरी के लिए विदा किया और फिर आंखें बंद कर बैठ गई. वैसे भी इंसान को अपनी समस्याओं का कोई हल नहीं मिलता तो अंतिम सहारे के रूप में वह आंख बंद कर प्रकृति के बारे में सोचने लगता है.

“अब बंद भी कर यह नाटक और रसोई की तैयारी कर.” तभी उस के कानों में तीखा स्वर गूंजा.

अपनी सास की बात का कोई जवाब न दे कर वह हाथ जोड़ कर अपनी जगह से खड़ी हो गई. सास से उस की नजरें मिलीं. एक क्षण वह वहां रुकी और फिर चुपचाप रसोई में आ गई. उस के वहां से उठते ही उस की सास अपनी रोज की क्रिया में मग्न हो गई.

अभी भी कल वाली ही बात पर विचार कर वह अनमनी सी रसोई के प्लेटफौर्म के पास खड़ी हुई थी. तभी रसोई के प्लेटफौर्म की बगल वाली खिड़की से उस की नजर बाहर जा कर टिक गई. रसोईघर के बाहर खाली पड़ी जगह में पड़े अनुपयोगी सामान के ढेर पर कुछ दिनों से कबूतर का एक जोड़ा तिनकातिनका जोड़ कर घोंसला बनाने की कोशिश कर रहा था लेकिन थोड़े से तिनके इकट्ठे करने के बाद दोनों में न जाने किस बात को ले कर जोरजोर से अपने पंख फड़फड़ाते व सारे तिनके बिखर कर जमीन पर आ गिरते. जैसेतैसे आपस में लड़तेझगड़ते और फिर एक हो कर आखिरकार घोंसला तो उन्होंने तैयार कर ही लिया था और कबूतरी घोंसले में अपने अंडों को सेती हुई कई दिनों से तपस्यारत इत्मीनान से बैठी हुई थी. उसे आज घोंसले में कुछ हलचल नजर आई. अपनी जिज्ञासा मिटाने के लिए वह खिड़की के पास के दरवाजे से बाहर गई और अपने पैरों के पंजों को ऊंचा कर घोंसले में नजर डालने लगी. उस की इस हरकत पर घोंसले में बैठी हुई कबूतरी सहम कर अपनी जगह से थोड़ी सी हिली. 2 अंडों में से एक फूट चुका था और एक नन्हा सा बच्चा मांस के पिंड के रूप में कबूतरी से चिपका हुआ बैठा था. सहसा उस के चेहरे पर छाई उदासी की लकीरों ने खुदबखुद मुड़ कर मुसकराहट का रूप ले लिया. उस ने अपना हाथ बढ़ा कर कबूतरी को सहलाना चाहा लेकिन कबूतरी उस के इस प्रयास को अपने और अपने बच्चे के लिए घातक जान कर गला फुला कर अपनी छोटी सी चोंच से उसे दूर खदेड़ने का यत्न करने लगी.

एक छोटा सा नजारा उस के मन को अपार खुशी से भर गया. वह वापस अंदर रसोई में आने को मुड़ी और उस के होंठों से अनायस ही उस का पसंदीदा गाना, मधुर आवाज के साथ, निकल कर उस के मन के तारों को झंकृत करने लगा.

“न समय देखती है न बड़ों का लिहाज करती है. यह कोई समय है फिल्मी गाना गाने का? गाना ही है तो भजन गा तो मेरी पूजा भी सफल हो जाए,” सास का यह नाराजगीभरा स्वर सुन कर उस की आवाज बंद होंठों के अंदर सिमट गई और चेहरे पर कुछ देर पहले छाई हुई मुसकराहट को उदासी ने वापस अपनी आगोश में समा लिया. हाथ धो कर उस ने फ्रिज खोला और उस में रखा पत्तागोभी निकाल कर अनमने भाव से उसे काटने लगी.

तभी डोरबैल बजने पर उस ने जा कर दरवाजा खोला तो अपने सामने एक अपरिचित व्यक्ति को खड़ा पा कर अचरज से उस से कुछ पूछने जा ही रही थी कि तभी पीछे से आ कर उस की सास ने उस व्यक्ति को नमस्ते करते हुए अंदर आने को कहा. उस ने भगवा धोतीकुरता पहने उस व्यक्ति को गौर से देखा. उस के माथे पर लंबा तिलक लगा हुआ था और उस ने गले में रुद्राक्ष की माला पहन रखी हुई थी. उस की सास उस पंडितवेशधारी व्यक्ति से कुछ दूरी बना कर उस के साथ सोफे पर बैठ गई और उसे पानी लाने के लिए कहा.

पानी देने के बाद खाली गिलास ले कर वह अंदर जाने को हुई तो सास ने उसे टोका, “यहां पंडितजी के पास बैठ. ये बहुत बड़े ज्ञानी है और हाथ देख कर सारी समस्याओं का हल बता देते हैं.”

सास की बात सुन कर वह चौंक गई. उस ने मना करना चाहा लेकिन फिर कल रात परिवार में हुई अनबन को याद कर बात को और आगे न बढ़ाने के लिए वह पंडितजी से कुछ दूरी बना कर उन के पास बैठ गई. पंडितजी ने मुसकरा कर उस की तरफ देखा और उसे अपना सीधा हाथ आगे बढ़ाने को कहा. उस ने झिझकते हुए अपने सीधे हाथ की हथेली उन के आगे कर दी. पंडितजी ने उस की हथेली को छूते हुए उस पर हलका सा दबाव डाला. उस ने अपनी हथेली पीछे करनी चाही पर उस के ऐसा करने से पहले ही पंडित उस की हथेली पर अपनी उंगलिया फेरते हुए उस की सास से पूछने लगे, “तो यह आप की बहू है?”

 

दीवाली स्पेशल: जिंदगी जीने का हक

क्या यह प्रेम था : भाग 2

बाद में उसे संकोच हुआ कि अगर कोई दूसरा हुआ तो वह उसे कितना गलत समझेगा. कुहू ने एक बार फिर उस का प्रोफाइल चैक किया और उस के फोटो को देखने लगी तो उस का फोटो देख कर उस की आंखें नम हो गईं. यह तो उसी का आरव है. फोटो में उसे उस के हाथ का वह काला निशान यानी ‘बर्थ मार्क’ दिख गया था.

अगले ही दिन आरव का संदेश आया, ‘‘हां.’ अब इस हां का अर्थ 2 तरह से निकाला जा सकता था- एक हां का मतलब मैं आरव ही हूं और दूसरा यह कि तुम मुझे भी याद हो. मगर कुहू को तो दोनों ही अर्थों में हां दिखाई दी.

कुहू ने इस संदेश के जवाब में अपना फोन नंबर दे दिया. थोड़ी देर में आरव औनलाइन दिखाई दिया तो दोनों ही यह भूल गए कि उनकी जिंदगी 15 साल आगे निकल चुकी है. कुहू 1 बच्चे की मां तो आरव 2 बच्चों का बाप बन चुका है. इस के बाद दोनों में बात हुई तो कुहू ने पूछा, ‘‘आरव, तुम ने अपने घर में मेरी बात की

थी क्या?’’

आरव की मां को कुहू के बारे में पता था कि दोनों में खूब बातें होती हैं. जब उस ने अपनी मां से कुहू की सगाई के बारे मं बताया उस ने राहत की सांस ली थी. यह बात आरव ने ही कुहू को बताई थी. इस पर आरव पर क्या असर पड़ा, यह जाने बगैर ही कुहू खूब हंसी थी. आरव सिर्फ उस का मुंह ताकता रह गया था.

हां, तो जब कुहू ने आरव से पूछा कि उस ने उस के बारे में अपने घर में बताया कि नहीं, तो इस पर आरव हंस पड़ा था. हंसी को काबू करते हुए उस ने कहा, ‘‘न बताया है, न बताऊंगा. मां तो अब हैं नहीं, मेरी पत्नी मुझ पर शक करती है. इसलिए उस से कुछ भी बताने की हिम्मत मैं नहीं कर सकता.’’

दोनों की चैटिंग और बातचीत का सिलसिला चलता रहा. आरव हमेशा शिकायत करता कि वह उसे छोड़ कर चली गई. इस पर कुहू को पछतावा होता.

बारबार आरव के शिकायत करने पर एक दिन उस ने नाराज हो कर कहा, ‘‘क्यों न चली जाती? क्या तुम ने मुझे रोका था? किस के भरोसे रुकती?’’

आरव ने कहा, ‘‘एक बात पूछूं, पर अब उस का कोई मतलब नहीं और तुम जो जवाब दोगी वह भी मुझे पता है. फिर भी तुम मुझे बताओ कि अगर मैं तुम्हारी तरफ हाथ बढ़ाता तो तुम मना तो न करतीं? पर आज बात कुछ अलग है.’’

सचमुच इस सवाल का कुहू के पास कोई जवाब नहीं था और कोई भी…

एक दिन आरव ने हंस कर कहा, ‘‘कुहू, कोई समय घटाने की मशीन होती तो हम 15 साल पीछे चले जाते.’’

‘‘अरे मैं तो कब से वहीं हूं, पर तुम कहां हो….’’

‘‘मैं तुम्हारे पीछे खड़ा हूं,’’  आरव ने जोर से हंस कर कहा, ‘‘पर तुम बहुत झूठी हो, मुझे दिखाई ही नहीं दे रही हो,’’ और उस ने एक गाना गाया, ‘बंदा परवर थाम लो जिगर…’’

कुहू भी जोर से हंस कर बोली, ‘‘तुम्हारी यह गाने की आदत अब तक नहीं गई. अब इस आदत का मतलब खूब समझ में आता है, पर अब इस का क्या फायदा.’’

दिल की सच्ची और ईमानदार कुहू को थोड़ी आत्मग्लानि हुई कि वह जो कर रही है वह गलत है. फिर उस ने सबकुछ उमंग से बताने का निर्णय कर लिया और रात में खाने के बाद उस ने सारी सचाई बता दी.

अंत में कहा, ‘‘इस में सारी गलती मेरी ही है. मैं ने ही आरव को ढूंढ़ा और अब मुझ से झूठ नहीं बोला जाता. अब आप को जो सोचना है, सोचिए.’’

पहले तो उमंग थोड़ा परेशान हुआ, पर फिर बोला, ‘‘कुहू, तुम झूठ बोल रही हो. तुम मजाक कर रही हो. सच बोलो… मेरे दिल की धड़कन थम रही है.’’

‘‘नहीं उमंग यह सच है.’’ कुहू ने कहा. उस ने सारी बातें तो उमंग को बता दी थी, पर गाने सुनाने और फिल्म देखने वाली बात नहीं बताई थी. शायद हिम्मत नहीं कर सकी.

उमंग ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. कहा, ‘‘जाने दो, कोई प्रौब्लम नहीं है. इस तरह तो होता रहता है. जीवन में यह सब चलता रहता है.’’

अगले दिन कुहू ने सारी बात आरव को बताई तो वह हैरान होते हुए बोला, ‘‘कुहू, तुम बहुत खुशहाल हो, जो तुम्हें ऐसा जीवनसाथी मिला है, जबकि सुरभि ने तो मुझे कैद कर रखा है.’’

‘‘इस में गलती तुम्हारी है, जो तुम अपने जीवनसाथी को विश्वास में नहीं ले सके.’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है. मैं ने बहुत कोशिश की. सुरभि भी मेरे साथ वकील है… वह पता नहीं ऐसा क्यों करती है.’’

इस के बाद एक दिन आरव ने कुहू की बात सुरभि से करा दी. उस ने कुहू से तो खूब मीठीमीठी बातें कीं, पर इस के बाद आरव का जीना मुहाल कर दिया.

उस ने आरव से स्पष्ट कहा, ‘‘तुम कुहू से संबंध तोड़ लो वरना मैं मौत को गले लगा लूंगी.’’

अगले दिन आरव का संदेश था, ‘कुहू मैं तुम से कोई बात नहीं कर सकता. सुरभि ने सख्ती से मना कर दिया है.’

उस समय कुहू और उमंग खाना खा रहे थे. संदेश पढ़ कर कुहू रो पड़ी. उमंग ने पूछा तो उस ने बेटे की याद आने का बहाना बना दिया. कितने दिनों तक वह संताप में रही. फोन भी किया, पर आरव ने बात नहीं की. हार कर कुहू ने संदेश भेजा कि एक बार तो बात करनी ही पड़ेगी, ताकि मुझे पता चल सके कि क्या हुआ है.

इस के बाद आरव का फोन आया. बोला, ‘‘मेरे यहां कुछ ठीक नहीं है. तीन दिन हो गए, हम सोए नहीं हैं. सुरभि को हमारी निस्स्वार्थ दोस्ती से सख्त ऐतराज है. अब मैं आप से प्रार्थना कर रहा हूं कि मुझे माफ कर दो. मुझे पता है, इन बातों से तुम्हें कितनी तकलीफ हो रही है और मुझे ये सब कहते हुए भी. विधि का विधान भी यही है… हम इस से बंधे हुए जो हैं.’’

कुहू बड़ी मुश्किल से सिर्फ इतना कह पाई, ‘‘कोई प्रौब्लम नहीं, अब मैं तुम से मिलने के लिए 15 साल और इंतजार करूंगी.’’

‘‘ठीक है,’’ कह कर आरव ने फोन काट दिया.

कूहू ने भी उस का नंबर डिलीट कर दिया और उसे अपनी फ्रैंडलिस्ट स निकाल दिया. कुहू ने मोनिका का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘यार मोनिका, मैं ने उस का नंबर    तो डिलीट कर दिय, पर जिस नंबर को मैं पिछले 15 सालों से नहीं भूल सकी उसे इस तरह कैसे भूल सकती हूं. वजह मुझे पता नहीं. मुझे उस से प्यार नहीं था, फिर भी मैं उसे नहीं भूल सकी. उस के लिए मेरा दिल दुखी हुआ है और अब मुझे यह पता नहीं कि इस दिल को समझाने के लिए क्या करूं. मेरी समझ में नहीं आता कि उस ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया, जबकि उसे पता था, फिर भी उस ने ऐसा क्यों किया. बस, जब तक उसे अच्छा लगा, मुझ से बातें करता रहा और जब जान पर आ गई तो तुम कौन और मैं कौन वाली बात कह कर किनारा कर लिया.’’

कुहू इसी तरह की बातें कह कर रोती रही और मोनिका ने भी उसे रोने दिया. उसे रोका नहीं. यह समझ कर कि उस के दिल पर जितना बोझ है, वह आंसुओं के रास्ते बह जाए.

अब मोनिका उस से कहती भी क्या, जबकि वह जानती थी कि वह प्यार ही था, जिसे कुहू भुला नहीं सकी थी. एक बार आरव से उस ने खुद कहा था, ‘‘हम औरतों के दिल में 3 कोने होते हैं- एक में उस का घर, दूसरे में उस का मायका और जो दिल का तीसरा कोना होता है उस में उस की अपनी कितनी यादें संजोई रहती हैं, जिन्हें वह फुरसत के क्षणों में निकाल कर धोपोंछ कर रख देती है.’’

मोनिका सोचने लगी, जो लड़की प्यार को कैमिकल रिएक्शन मानती थी और दिल को मात्र रक्त सप्लाई करने का साधन, उस ने दिल की व्याख्या कर दी थी और अब कह रही थी कि उसे आरव से प्यार नहीं है.

मोनिका ने उसे यही समझाया और वह खुद भी समझतीजानती थी कि उसे जो मिला है,

अच्छा ही मिला है, कोई भी विधि का विधान नहीं बदल सकता.    ‘‘दिल की सच्ची और ईमानदार कुहू को थोड़ी आत्मग्लानि हुई

कि वह जो कर रही है वह गलत है.

फिर उस ने सबकुछ उमंग से बताने का निर्णय कर लिया…’

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