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अनुमोलू रेवंता रेड्डी : दूसरों को साधना है और खुद भी सधे रहना है

सियासी ड्रामेबाजी में तेलंगाना के नए मुख्यमंत्री ए रेवंता रेड्डी किसी से उन्नीस नहीं हैं जिन्होंने कुरसी संभालते ही मंच से कांग्रेस की 6 गारंटियों की फाइल मंजूर की. घाटघाट का पानी पी चुके 54 वर्षीय रेवंता जन्मना कांग्रेसी नहीं हैं, कर्मणा हैं और यह उन्होंने बतौर मुख्यमंत्री पहले ही भाषण से साबित कर दिया. अपने भाषण की शुरुआत उन्होंने जय सोनिया अम्मा के उद्घोष से की जिस से सहज ही उन दिग्गज कांग्रेसियों को मायूसी हुई होगी जो मुख्यमंत्री बनने की दौड़ और होड़ में थे. मुख्यमंत्री आवास का नाम बदल कर ज्योतिबा फुले उन्होंने रखा है और हर शुक्रवार प्रजा दरबार लगाने की भी घोषणा की है जिस में आम लोगों की सुनवाई होगी.

तेलंगाना की जीत में रेवंता के साथसाथ कांग्रेस विधायक दल के नेता विक्रमार्क भट्टी और एक और दिग्गज कुमार रेड्डी के रोल भी अहम थे लेकिन दूध की जली कांग्रेस तेलंगाना में छाछ भी फूंकफूंक कर पी रही है. सोनिया, राहुल और प्रियंका के चहेते इस खेवनहार से कांग्रेस आलाकमान पहले ही वादा कर चुका था, इसलिए मुख्यमंत्री बनने के लिए रेवंता ने राज्यभर में ताबड़तोड़ मेहनत की. उलट इस के, विक्रमार्क भट्टी और कुमार रेड्डी अपनेअपने क्षेत्रों में उलझे रहे जहां उन्हें 95 फीसदी कामयाबी मिली भी.

लेकिन यह मुख्यमंत्री बनने के लये पर्याप्त नहीं था. सोनिया-राहुल की कृपा किसी भी योग्यता या अनुभव से ज्यादा जरूरी थी जिस पर रेवंता पास हो गए. यों उन के पास सियासी हालात को ताड़ने वाली नजर है लेकिन असल इम्तिहान अब शुरू होगा उन का भी और कांग्रेस का भी क्योंकि कांग्रेस के पास बहुमत से सिर्फ 4 सीटें ही ज्यादा हैं. लिहाजा, भाजपाई तोड़फोड़ की आशंका हमेशा सिर पर मंडराती रहेगी. गौरतलब है कि तेलंगाना की 119 सीटों में से कांग्रेस को 64,बीआरएस को 39 और भाजपा को 8 सीटें मिली हैं जबकि एआईएमएआईएम 7 सीट जीती है.

फिल्मी कहानी जैसी जिंदगी 

एक मामूली किसान परिवार में जन्मे रेवंता की जिंदगी की कहानी फिल्मों से कमतर नहीं है जिस में रोमांस, ऐक्शन, जेल, आंदोलन, दलबदल सबकुछ है जो इन दिनों कामयाबी की बड़ी शर्तें और वजहें हो चली हैं. उस्मानिया यूनिवर्सिटी से बीए करने के दौरान ही रेवंता छात्र राजनीति में सक्रिय हो गए थे.

आरएसएस की सरपरस्ती में चलने वाले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से उन्होंने राजनीति का ककहरा सीखा लेकिन वह ज्यादा रास नहीं आया तो वे साल 2001 में तेलंगाना राष्ट्र समिति से जुड़ गए जो अब बीआरएस है. पृथक तेलंगाना के नायक रहे केसीआर के साथ उन्होंने 2001 से ले कर 2006 तक काम किया.

न मालूम वजहों से रेवंता की पटरी केसीआर से भी नहीं बैठी और वे जोखिम उठाते साल 2007 में आंध्रप्रदेश विधान परिषद चुनाव में कूद पड़े और निर्दलीय जीते भी. टीडीपी मुखिया चंद्रबाबू नायडू की नजर इस होनहार युवक पर पड़ी तो वे उसे अपनी पार्टी में ले आए जिस से वे विधायक भी चुने गए. यहां से भी रेवंता का मोहभंग हो गया तो वे कांग्रेस में शामिल हो गए.

साल 2018 में वे कांग्रेस से विधानसभा चुनाव कोडंगल सीट से हारे तो नैया डगमगाती दिखी लेकिन 2019 का लोकसभा चुनाव मलकागिरी सीट से जीत कर उन्होंने खुद को साबित कर दिया. 2021 में कांग्रेस ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बना दिया और अब मुख्यमंत्री बनाने से भी गुरेज नहीं किया.

लव स्टोरी और सोनिया अम्मा  

कालेज के दिनों में राजनीति में हाथपांव मारने के ही दौरान रेवंता को गीता रेड्डी नाम की युवती से प्यार हो गया. यह पहली नजर का प्यार था जो नागार्जुन सागर बांध में नाव की सवारी के दौरान हुआ था. तभी उन्होंने तय कर लिया था कि अब जिंदगी की नाव में गीता के साथ ही सफर करेंगे.

लेकिन यह आसान काम नहीं था क्योंकि गीता दिग्गज कांग्रेसी नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री जयपाल रेड्डी की भतीजी थी. जैसे ही रसूखदार रेड्डी परिवार को इस अफेयर की हवा लगी तो उन्होंने इस पर एतराज जताया और फिल्मी तर्ज पर गीता को अपने मंत्री चाचा के घर दिल्ली भेज दिया.

यह उन दिनों की बात है जब रेवंता एबीवीपी में सक्रिय थे और आरएसएस का प्रकाशन संबंधी काम भी देखते थे. कांग्रेस और आरएसएस के बीच छत्तीस का आंकड़ा आज की तरह तब भी किसी सुबूत का मुहताज नहीं था. रेवंता को समझ आ गया था कि बात ऐसे नहीं बनने वाली, लिहाजा, एक दिन वे हिम्मत कर सीधे जयपाल रेड्डी से मिले और हाले दिल बयां कर डाला.

खुलेतौर पर तो रेवंता ने कभी नहीं स्वीकारा लेकिन ज्यादातर संभावना यही है कि उन्होंने गीता को हासिल करने के लिए ही इस हिंदूवादी संगठन का साथ और हाथ छोड़ा होगा. दूसरे, संघ में  गहरी डुबकी लगाने का मतलब था अविवाहित रहना, जो गीता से बढ़ती दोस्ती के चलते उन के लिए मुमकिन नहीं था.

सच जो भी हो लेकिन अपनी इस लव स्टोरी को अंजाम तक पहुंचाने में वे कभी पीछे नहीं हटे जिस में गीता ने हमेशा उन का साथ दिया. जयपाल रेड्डी ने गीता और रेवंता के प्यार की गहराई व गंभीरता को समझा. उन के दखल से दोनों 7 मई,1992 को जिंदगी की नाव में एकसाथ सवार हो गए.

इस के बाद वे यहां से वहां होते रहे.अब तक रेवंता को भी यह समझ आने लगा था कि यों भटकते रहने से कुछ हासिल नहीं होगा. लिहाजा, वे सोनिया गांधी की शरण में चले गए जहां से उन्हें आशीर्वाद और संरक्षण दोनों मिले. अब रेवंता न केवल तेलंगाना बल्कि दक्षिण भारत की राजनीति का भी प्रमुख चेहरा बन चुके हैं. कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार भी उन के रिश्तेदार हैं.

चुनौतिया अभी बाकी हैं 

रेवंता पर 89 छोटेबड़े अदालती मामले दर्ज हैं जिन में से एक कैश फौर वोट के चलते वे जेल की हवा भी खा चुके हैं. बेटी निमिषा की शादी के वक्त वे जेल में ही थे तब बमुश्किल उन के वकीलों ने कुछ घंटों की जमानत का इंतजाम उन के लिए किया था. जाहिर है जमीनी राजनीति का तगड़ा तजरबा उन्हें है जिस के चलते उन्हें तेलंगाना का चाणक्य भी कहा जाने लगा है.

तेलांगना के लोगों खासतौर से आदिवासियों, दलितों और मुसलमानों ने कांग्रेस पर गहरा भरोसा जताया है जिसे कायम रखना किसी चुनौती से कम नहीं. दूसरे उन्हें नाराज दिग्गज कांग्रेसियों को भी साध कर रखना है और खुद भी संभल कर रहना है क्योंकि भाजपाई तोड़फोड़ में माहिर हैं. मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे और अजीत पवार इस के बेहतर उदाहरण हैं. कर्नाटक का उदाहरण तो उन के बहुत नजदीक है.

लेकिन इन से भी ज्यादा अहम है अगला लोकसभा चुनाव जिस की तैयारिया शुरू हो गई हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा तेलंगाना की 17 में से 4 लोकसभा सीट ले गई थी जबकि बीआरएस 9 पर जीती थी और कांग्रेस 3 पर सिमट कर रह गई थी. एक सीट एआईएमएम के खाते में गई थी.

अब कांग्रेस की उम्मीद और कोशिश तेलंगाना में 10 सीटें जीतने की होगी क्योंकि विधानसभा चुनाव में भाजपा और बीआरएस दोनों ही पार्टियों को निराशा हुई है. हालांकि अभी बीआरएस को ज्यादा कमजोर कर नहीं आंका जा सकता लेकिन अगले 6 महीने रेवंता सरकार का परफौर्मेंस तय करेगा कि वोटर उसे कितना भाव देगा. भाजपा ज्यादा बड़ा खतरा है जिस की हर मुमकिन कोशिश तेलंगाना में तोड़फोड़ की रहेगी जिस से बचने के लिए रेवंता को होशियार तो रहना ही पड़ेगा.

शहाना सुसाइड केस : दौलत के आगे दम तोड़ती मोहब्बत

दहेज न जाने कितनी लड़कियों की जान लेता रहा है. सदियों बाद भी समाज बदला नहीं है बल्कि दहेज के लिए लालच की सीमा बढ़ गई है. पैसों के आगे भावनाएं दम तोड़ रही हैं. सोचने को विवश कर देने वाली ऐसी ही एक घटना केरल के तिरुवंतपुरम से सामने आई है जहां प्रेमी ने दहेज न मिलने पर शादी से इंकार कर दिया. घटना से आहत 26 साल की डाक्टर लड़की ने पहले तो प्रेमी को मनाने की कोशिश की पर सफल न होने पर आखिर में खुदकुशी कर ली.

शहाना नाम की यह लड़की तिरुवंतपुरम के सरकारी मैडिकल कालेज में पीजी कर रही थी. शहाना अपनी मां और 2 भाईबहनों के साथ रहती थीं. उन के पिता की 2 साल पहले मृत्यु हो गई. वह डा. रुवैस के साथ कई सालों से रिलेशनशिप में थी. प्यार जब परवान चढ़ा तो दोनों ने शादी का फैसला किया. उन्होंने अपने अपने घर में बात की. दोनों के परिवार वाले शादी के लिए तैयार हो गए लेकिन फिर लड़के वालों ने दहेज की भारी मांग रख दी.

शहाना के परिवार वालों के अनुसार डा. रुवैस के घरवालों ने दहेज के रूप में डेढ़ सौ तोले के गहने, बीएमडब्ल्यू कार और 15 एकड़ जमीन की मांग रखी पर वे इन डिमांड को पूरा करने में असमर्थ थे. इस पर रुवैस के परिवार ने शादी करने से मना कर दिया और रुवैस ने भी शाहना से बातचीत बंद करते हुए रिश्ता तोड़ दिया.

अचानक हुए इस घटनाक्रम ने शाहना को अंदर से तोड़ दिया. वह इतनी आहत हो गई कि वह खुद को संभाल नहीं सकी. पहले तो काफी डिप्रैशन में रहने लगी और फिर उस ने मौत को गले लगा लिया. शहाना 5 दिसंबर, मंगलवार सुबह मैडिकल कालेज के पास अपने किराए के अपार्टमैंट में मृत पाई गईं. शहाना ने मरने से पहले अपने सुसाइड नोट में लिखा, ‘हर कोई केवल पैसे से प्यार करता है.’

आरोपी डाक्टर मैडिकल पीजी डाक्टर्स एसोसिएशन का प्रतिनिधि था. डाक्टर पर लगे आरोपों के बाद संगठन की सभी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया गया. पुलिस ने पीड़ित परिवार वालों के बयान के आधार पर प्रेमी और उस के परिवार के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है. उन पर आत्महत्या के लिए उकसाने और दहेज रोकथाम के तहत मुकदमा दर्ज किया है.

इस का दोषी कौन ?

सवाल यह उठता है कि क्या दोषी परिवार को सजा मिल पाएगी ? क्या एक लड़की के जज्बातों को दौलत की कसौटी पर मापने वाले समाज का रुख कभी बदलेगा? क्या लड़कियों को नीचा दिखाने और अपमानित करने वाले इस दहेज प्रथा के खिलाफ कभी लोग एकजुट हो पाएंगे या फिर इसी तरह पढ़ीलिखी लड़कियां भी ऐसी कुप्रथाओं के आगे घुटने टेकती रहेंगी?

नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो, 2022 की रिपोर्ट के आकंड़े समाज फैले हुए दहेज रुपी राक्षस का सच उजागर करते हैं. 2022 में दहेज के लिए 6516 बेटियां बलि चढ़ा दी गई. कानून में मामला दहेज़ मृत्यु 304बी का माना जाता है लेकिन इसे हत्या से कम नहीं माना जा सकता.

एनसीआरबी के आकंड़ों के अनुसार साल 2022 में हर रोज 17 बेटियों को दहेज के लिए मौत दी गई जबकि 2022 में ही देश के विभिन्न थानों में दहेज प्रताड़ना के 14 लाख 4 हजार 593 मामले दर्ज हुए.

देश में वर्ष 2017 से 2021 के बीच दहेज की वजह से मौत के लगभग हर दिन करीब 20 मामलों की सूचना मिली और उत्तर प्रदेश में हर दिन दहेज से सर्वाधिक 6 मौत की खबर आई. देश में 2017 से 2021 के बीच दहेज की वजह से मौत के 35,493 मामलों का पता चला है.

वैसे इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कुछ मामलों में पढ़ीलिखी लड़कियां खुद भी दहेज चाहती हैं. दहेज में मिली रकम और सामान भविष्य में दंपति के काम आता है. वैसे भी आजकल पढ़ेलिखे परिवारों में दहेज पर नवल जोड़ी का ही हक होता है. घरवाले उन पर अधिकार नहीं जमाते. कई घरों में ऐसा भी है कि लड़कियों को लगता है कि वे जितना ज्यादा दहेज ले कर ससुराल जाएंगी उन्हें वहां उतना ज्यादा भाव मिलेगा. ये सब दहेज के कुछ डिफरेंट पहलू हैं.

मगर मुख्य रूप से दहेज जिस वजह से बदनाम है वह इस के जबरदस्ती वाले स्वरुप के कारण है. यदि लड़की के मांबाप डिमांड की गई रकम नहीं जुटा पा रहे हैं तो कोई लड़की नहीं चाहेगी कि उस के मांबाप पर रकम जुटाने का प्रैशर बनाया जाए.

सोच बदलने की जरूरत

ऐसे में अकसर शादियां टूट जाती हैं और इस का सब से बुरा असर लड़की के मन पर पड़ता है. उसे महसूस होता है कि उस के होने वाले पति या ससुराल वालों की नजर में उस का कोई वजूद नहीं. उसे तो इसलिए ब्याहा जा रहा है ताकि वह ससुराल वालों का घर धनदौलत से भर दे. यही सोच उसे अंदर तक तोड़ देती है और इस तरह के सुसाइड या कन्या भ्रूण हत्या जैसे मामले सामने आते हैं. हमें इसी विकृत सोच से लड़ना है. पढ़ीलिखी या काबिल लड़की खुद में दहेज है. उस के आने से घर में खुद ही खुशियां आएंगी. फिर इस तरह उस के मायके वालों को प्रताड़ित करने का क्या औचित्य ?

अंत में यह कहना भी लाजिमी होगा कि किसी शख्स या एक परिवार की गलत सोच की सजा खुद को या अपने परिवार को देना और अपनी जिंदगी खत्म कर लेना बेवकूफी है. जिंदगी में करने को बहुत कुछ है. एक के पीछे सब कुछ समाप्त कर लेने के बजाए बेहतर है कि आप उस एक को अपनी जिंदगी और अपने दिलोदिमाग से पूरी तरह निकाल कर नार्मल जिंदगी जीएं और अपने लक्ष्य ऊंचे रखें.

बच कर रहिए, अब सुबह की वाक भी हो गई है खतरनाक

स्वस्थ रहने के लिए सुबह स्वच्छ और ठंडी हवा में वाक की सलाह हर डाक्टर देता है. बुजुर्ग लोग अकसर जल्दी उठ कर मौर्निंग वाक के लिए निकल जाते हैं. सेहत के प्रति सजग युवा और सेना और पुलिस में भर्ती की आकांक्षा पाले लोग भी मुंहअंधेरे ही घर से जौगिंग के लिए निकल पड़ते हैं. लेकिन सुबह की वाक आप की जान के लिए कितनी खतरनाक हो गई है, इस बारे में एनसीआरबी के आंकड़ें देख कर आप चौंक जाएंगे.

2021 में देश में 4,12,432 सड़क दुर्घटनाएं हुईं जिस में 1,53,972 लोग मारे गए. अगले वर्ष 2022 में 10 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी के साथ 4,61,312 सड़क दुर्घटनाएं हुईं जिस में 1,68,491 लोग माए गए. यानी मौतों में 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई. मरने वालों में अधिकांश 18 से 45 साल के युवा थे.

पश्चिम चम्पारण के बेतिया नगर थाना क्षेत्र में 17 नवंबर की सुबह मौर्निंग वाक पर निकले 55 वर्षीय बृजमोहन पटेल की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई. किसी अज्ञात वाहन ने उन्हें कलेक्ट्रेट चौक के समीप रौंद दिया. सुबह चूंकि सड़कें सूनी थीं, कोई आवाजाही नहीं थी इसलिए किसी को नहीं पता चला कि पटेल को किस गाड़ी ने मारा.

लखनऊ में जनेश्वर मिश्र पार्क के पास 21 नवंबर की सुबह एडिशनल एसपी श्वेता श्रीवास्तव का 10 साल का इकलौता बेटा नैमिष स्केटिंग प्रैक्टिस करने के बाद घर लौट रहा था, तभी एक तेज रफ्तार कार ने उस को जोरदार टक्कर मारी. टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि नैमिष करीब 15 फुट ऊपर उछल गया और जमीन पर गिरते ही उस की मौत हो गई. उस की मां श्वेता श्रीवास्तव उस के साथ ही थीं. वे भी सुबह उस के साथ मौर्निंग वाक के लिए जाती थीं.

पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज की मदद से 10 घंटे में कार चालक सपा के पूर्व जिला पंचायत सदस्य के बेटे और उस के साथी को गिरफ्तार कर एसयूवी बरामद की, जिस से दुर्घटना हुई थी. पता चला कि जवान लड़के किसी अन्य गाड़ी से सुबह सुबह रेस लगा रहे थे और गाड़ी की स्पीड 150 के करीब थी.

दिल्ली के ग्रेटर कैलाश इलाके में एक होंडा सिटी कार चालक ने 72 साल के बुजुर्ग को न सिर्फ अपनी गाड़ी से टक्कर मारी, बल्कि उन्हें कई मीटर तक घसीटता ले गया. इस भयावह घटना में बुजुर्ग अजीत लाल टंडन की मौत हो गई. बुजुर्ग को होंडा सिटी कार से टक्कर मारने वाला शख्स तरुण अरोरा (50) है, जो कालकाजी इलाके में रहता है.

सबूत मिलने के बाद पुलिस ने तरुण को गिरफ्तार कर लिया लेकिन बाद में प्रक्रिया के तहत जमानत पर रिहा कर दिया गया. तरुण अरोरा का कहना था कि जब वह ग्रेटर कैलाश से कालकाजी की तरफ जा रहा था तो अचानक बुजुर्ग कार के सामने आ गए. पुलिस ने आरोपी के बारे में गहनता से पड़ताल की तो उस की कोई पुराना क्राइम रिकौर्ड या नशे में गाड़ी चलाने का इतिहास नहीं पाया गया.

सितंबर माह में टाटा संस के पूर्व चेयरमैन साइरस मिस्त्री की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई. दुर्घटना उस वक्त हुई जब मिस्त्री की कार एक ‘डिवाइडर’ से टकरा गई. उस समय मिस्त्री मर्सिडीज कार में अहमदाबाद से मुंबई लौट रहे थे. कार में उन के साथ 4 लोग थे जिन में से दो की औन द स्पोट मौत हो गई. कार साइरस मिस्त्री की महिला मित्र चला रही थीं मगर सड़क ऊबड़ खाबड़ थी जिस के चलते कार बेकाबू हो कर डिवाइडर से जा टकराई.

इतने ज़्यादा सड़क हादसे मुख्यतः 2 वजहों से हो रहे हैं. पहला रैश ड्राइविंग के कारण और दूसरा सड़क की खस्ताहाली की वजह से. देशभर में हालफिलहाल की बनी सड़कें भी जगह जगह टूटी और गड्ढेदार नजर आती हैं. आएदिन सड़कों पर मरम्मत का काम होता है और आयेदिन उन में गड्ढे पैदा हो जाते हैं, जिस के जिम्मेदार पीडब्लयूडी के भ्रष्ट अधिकारी, इंजीनियर और वर्कर हैं.

मजबूत और समतल सड़कों की जगह ऊबड़खाबड़ और गड्ढायुक्त सड़कें लोगों के जीवन को एक झटके में समाप्त कर देती हैं. देश में सड़क हदसों का आंकड़ा दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है. अब तो सुबह के वक्त भी सड़क पर पैदल निकलना सुरक्षित नहीं लगता, खासतौर से बुजुर्ग लोगों को जो सुबह की सैर के दौरान अपने पुराने दोस्तों यारों से मिल कर ताजगी अनुभव करते थे.

पिछले दिनों सड़क दुर्घटनाओं के बढ़ते मामले में संसद के अंदर भी काफी गरमागरमी रही. एनसीआरबी के आंकड़े जारी होने के बाद केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने देश में सड़क दुर्घटनाओं और उनमें लोगों की मृत्यु पर गंभीर चिंता जताई. सदन में उन्होंने एक तरह से माफी मांगते हुए यह बात कही कि दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि उन का विभाग सतत प्रयास के बावजूद जानलेवा सड़क हादसों को रोक नहीं पाया है.

गडकरी लोकसभा में वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के कोटागिरी श्रीधर के एक पूरक प्रश्न का उत्तर दे रहे थे. उन्होंने यह माना कि देश में सड़क दुर्घटनाओं को सरकार रोक नहीं पा रही है. उन्होंने कहा कि एक्सप्रेसवे पर एक तरफ कुछ लोग गति सीमा बढ़ाने की मांग करते हैं और इस सम्बन्ध में कानून में ढील का अनुरोध करते हैं तो कुछ लोग गति सीम को कम करने का प्रस्ताव देते हैं. इन के अलावा सर्विस लेन को जोड़ने से भी समस्याएं सामने आ रही हैं.

दुर्भाग्यपूर्ण है कि सड़क दुर्घटनाओं से देश की जीडीपी को 3.14 प्रतिशत का नुकसान हो रहा है. इस से भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि सड़क दुर्घटनाओं की वजह से हुई मौत के 67 प्रतिशत मामले 18 से 45 साल के युवाओं के होते हैं. गडकरी ने कहा कि मैं 9 साल से प्रयासरत हूं लेकिन हम सड़क दुर्घटनाओं की संख्या और मौत के मामलों को कम करने की स्थिति में नहीं पहुंच पा रहे हैं.

सड़कों दुर्घटनाओं की विभिन्न वजहें

ड्राइवर : तेज गति से गाड़ी चलाना, लापरवाही से गाड़ी चलाना, नियमों का उल्लंघन, संकेतों को समझने में विफलता, थकान, शराब.
पैदल यात्री : लापरवाही, अशिक्षा, गाड़ी के रास्ते पर गलत स्थानों पर चलना, जयवाकर्स.
यात्री : अपने शरीर को वाहन के बाहर दिखाना, ड्राइवरों से बात करना, गलत साइड से वाहन से उतरना और चढ़ना, फुटबोर्ड पर यात्रा करना, चलती बस को पकड़ना आदि.
वाहन : ब्रेक या स्टीयरिंग की विफलता, टायर फटना, अपर्याप्त हेडलाइट्स, ओवरलोडिंग, लोड प्रोजेक्ट करना.
सड़क की स्थिति : गड्ढे, क्षतिग्रस्त सड़क, ग्रामीण सड़कों का राजमार्गों में विलय, डायवर्जन, अवैध स्पीड ब्रेकर.
मौसम की स्थिति : कोहरा, बर्फ, भारी वर्षा, तूफान, ओलावृष्टि.

अंबेडकर परिनिर्वाण दिवस : अहम यह है कि भीमराव अंबेडकर को कौन कैसे याद करता है

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भीमराव अंबेडकर के `परिनिर्वाण` दिवसपर पूरा दिन उन के नाम कर दिया और उन की आड़ में परोक्ष रूप से कांग्रेस को कोसते कहा कि जो लोग आज भारतविरोधी गतिविधियों के माध्यम से समाज को विभाजित करते हैं, भारत को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं, वे बाबासाहब भीमराव अंबेडकर का अपमान कर रहे हैं. हम सब को इस बारे में गांवगांव जा कर बताना होगा.

क्या थी योगी की मंशा और कैसे भगवा गैंग ने अंबेडकर के विचारों, सिद्धांतों और दर्शन का भी हिंदूकरण कर दिया है, इसे समझने के लिए पहले परिनिर्वाण शब्द को समझ लेना जरूरी है जिस का मतलब होता है पूर्ण मोक्ष यानी अब अंबेडकर दोबारा मानव योनि में जन्म नहीं लेंगे. वे ईश्वरीय सत्ता में विलीन हो कर उस का हिस्सा बन चुके हैं.

हिंदू धर्म छोड़ कर जिस बौद्ध धर्म को अंबेडकर ने अपनाया था वह मोक्ष और पुनर्जन्म का धुर विरोधी था क्योंकि इन्हीं का डर दिखा कर सनातनी अपनी दुकान चलाते रहे हैं और आबादी के बड़े तबके को गुमराह करते उसे गुलाम व पिछड़ा बनाए रखने की साजिश मठों और मंदिरों में रचते रहे हैं. सनातनियों ने दिया हो या बौद्धों ने, यह परिनिर्वाण शब्द ही अंबेडकर का सब से बड़ा अपमान है. जैसे कालांतर में बुद्ध को विष्णु का 9वां अवतार घोषित कर उन के विचारों को दबा दिया गया, वही अब भीमराव अंबेडकर के सिद्धांतों के साथ किया जा रहा है.

और इस के लिए नया कुछ नहीं करना है बल्कि बौद्धों वअंबेडकरवादियों को पूजापाठी बनाने के लिए उन की जयंतियां धूमधाम से मनाना है. उन की मौत के दिन को पूर्णमोक्ष दिवस कहना है. जगहजगह उन की मूर्तियां लगा कर नए तरीके से पाखंड और कर्मकांड थोपना है. इस शोर व कर्मकांडों के ढोलधमाके में बुद्ध की तरह अंबेडकर की नसीहतें भी हवा हो जानी हैं. ऐसा हो भी रहा है कि अंबेडकर में अगाध श्रद्धा रखने वाले भी उन के मंदिर व मूर्तियों के आगे दीया और अगरबत्ती जलाने लगे हैं, आरतियां और भजनकीर्तन आम हैं.

अंबेडकर की वैचारिक हत्या 

देश को विभाजित कौन कर रहा है जैसा कि डर भाजपा नेता योगी आदित्यनाथ और भगवा खेमा आएदिन दिखा कर वोट लूटा करता है. इस सवाल का जवाब शायद ही कोई ढूंढ़ पाए क्योंकि यह डर ही गांव के बाहर पीपल के पेड़ पर भूतप्रेत होने जैसा काल्पनिक है जिस से गांव के पंडितों की रोजीरोटी चलती है. वे इस प्रेत से बचने के लिए टोटके बताया करते हैं, तावीज देते हैं और झाड़फूंक भी करते हैं.

यही वैचारिक रूप से इन दिनों समाज और राजनीति में हो रहा है कि एक काल्पनिक प्रेत पैदा करो और फिर उस से बचाने के नाम पर वोटों की दक्षिणा बटोरो. कोई यह नहीं पूछेगा कि पंडितजी यह भूतप्रेत कुछ होता भी है या आप के दिमाग व आप के धर्मग्रंथों की खुराफाती उपज है.

यह डर फैलाना जरूरी है कि अंबेडकर जैसे गंभीर चिंतक और दूरदृष्टा की वैचारिक हत्या कर दो. यह हत्या धर्म के हथियार से होना ही संभव है, इसलिए की भी जा रही है. नहीं तो,अंबेडकर के सपनों का भारत गढ़ने का दावा करने वाले आदित्यनाथों को उन के इन कथनों वचिंतन पर बोलना चाहिए जो उन के कहे के करोड़वां हिस्सा भी नहीं.

  • “अगर हिंदू राष्ट्र बन जाता है तो बेशक इस देश के लिए एक भारी खतरा उत्पन्न हो जाएगा. हिंदू कुछ भी कहें पर हिंदुत्व स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारे के लिए एक खतरा है. इस आधार पर यह लोकतंत्र के लिए अनुपयुक्त है. हिंदू राज को हर कीमत पर रोका जाना चाहिए.” 1940 में दिए अंबेडकर के इस बयान की व्याख्या बहुत बाद तक होती रही कि कैसे हिंदू राष्ट्र या हिंदुत्व का विचार ही दलितों और महिलाओं के लिए घातक है. अब इस पर कोई नहीं बोलता इसलिए नहीं कि लोग कुछ बोल नहीं सकते बल्कि इसलिए कि मौजूदा माहौल में उन्हें खामोश रहने में ही भलाई नजर आ रही है जो लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों (बशर्ते किसी को कहीं दिखते हों तो) से मेल नहीं खाती.
  • एक और भाषण में अंबेडकर ने कहा था-“26 जनवरी,1950 को हम विरोधाभासों से भरे जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं. राजनीतिक जीवन में तो हमारे पास समानता होगी लेकिन सामाजिक व आर्थिक जीवन में असमानता होगी.”

25 नवंबर,1949 को अंबेडकर का यह कहा भी किस तरह सच हो रहा है, यह खुद उन के परिनिर्वाण दिवस,6 दिसंबर,2023, पर योगी आदित्यनाथ के भाषण से साफ हो जाता है कि क्या पहले कभी मुसहर, चेरो, वनटांगिया, थारू, कोल, अहरिया और सहरिया जाति के लोगों के बारे में कोई पूछता था.

80 करोड़ लोग आज भी अन्न के मुहताज हैं, यह बात खुद केंद्र सरकार मानती है जो उन्हें मुफ्त का राशन बांट रही है फिर कैसा ‘सब का साथ कैसा विकास’? यह गरीब को गरीब रखने की तकनीकी साजिश है जिस पर बहस की लंबी गुंजाइश है. पहले कांग्रेस भी यही करती रही और अब भाजपा भी कर रही है तो दोनों में फर्क क्या, सिवा इस के कि कांग्रेस घोषिततौर पर हिंदू राष्ट्र नहीं चाहती थी और भाजपा घोषिततौर पर चाहती है और इसीलिए दलितों को सहमत करने के लिए वह अंबेडकर को जबरिया मोक्ष दिलाने पर उतारू है, ताकि फिर कोई अंबेडकर पैदा न हो.

उन के विचारों के पीछे, लड़खड़ाते ही सही, चलने वालों को रोकने के लिए उन का रास्ता ही बदल दो. जो न माने उन्हें साम, दाम, दंड, भेद से खत्म कर दो. उसे एकलव्य, कर्ण या शम्बूक मानना अधर्म की नहीं बल्कि धर्म की बात है. मायावती, रामदास अठावले, चिराग पासवान जैसे दर्जनों छोटेबड़े दलित  नेता भाजपा के हाथों जीतेजी सियासी मोक्ष को प्राप्त हो चुके हैं.

लाख टके का सवाल यह कि सामाजिक और आर्थिक असमानता कैसे दूर होगी और यह राजनीति का विषय है या उस धर्म का जिस के ग्रंथों को जलाने का आग्रह भी कभी भीमराव अंबेडकर ने किया था.

इसलिए पिछड़ रही कांग्रेस 

अंबेडकर के `परिनिर्वाण` दिवस पर कोई बड़ा कांग्रेसी नेता कुछ नहीं बोला सिर्फ इसलिए नहीं कि वे हताश और सदमे में हैं बल्कि इसलिए भी कि उन्होंने पढ़नालिखना ही छोड़ दिया है. वे सामाजिक स्थितियों और अपेक्षाओं को समझ ही नहीं पा रहे हैं.

3 राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने मुंह की इसलिए खाई कि मतदाता की नजर में वह वैचारिक रूप से निरर्थक हो चुकी है. यह सोचना बेमानी है कि मतदाता गहराई से नहीं सोचता, असल में उस के पास किताबी शब्द नहीं होते. रही बात लुभावनी योजनाओं की, तो वे लोगों की जरूरत बना दी गई हैं जिन के चलते लोग खुद से जुड़े असल मुद्दों से भटक रहे हैं.

कांग्रेस अंबेडकर जैसे दलित नेताओं को सही तरीके से पेश करने में मात खा रही है जबकि भाजपा गलत तरीके से पेश कर न केवल मौज कर रही है बल्कि देश को गुमराह भी कर रही है.

एप्लायंसेज जो रखेंगे वार्म और देंगे कंफर्ट

सर्दी के मौसम में ठंड की मार से खुद को सुरक्षित रखना मुश्किल काम होता है. लेकिन अगर इस मौसम में खुद की सुरक्षा नहीं की गई तो यह लापरवाही आप पर भारी पड़ सकती है. इसलिए जरूरी होता है कि इस की तैयारी पहले से ही शुरू कर ली जाए. इस के लिए आप के पास कुछ खास विंटर एप्लायंसेज का होना जरूरी है ताकि सर्दी में सेफ रहने के साथसाथ आप मौसम को भी जीभर कर एंजौय कर पाएं. तो आइए जानते हैं इन के बारे में-

इलैक्ट्रिक हीटिंग पैड

अभी तक आपने विंटर्स में खुद को वार्म रखने के लिए रबर हौट वाटर बैग तो खूब इस्तेमाल किया होगा. लेकिन इस में पानी गरम करने का झंझट बहुत ज्यादा होता है और साथ ही, ज्यादा टाइम भी लगता है. इस वजह से अकसर आप इसे इस्तेमाल करने से कतराते होंगे लेकिन अब आप की इस परेशानी के समाधान के रूप में एक बैटर औप्शन मिलता है इलैक्ट्रिक हीटिंग पैड के रूप में, जो आप को वार्म रखने के साथसाथ आप के बिस्तर को भी वार्म रखने का काम करता है.

इस के लिए आप को बस अपने बैड के साथ में लगे स्विच में इसे 10-15 मिनट के लिए चार्ज करना है और फिर इसे अपने बिस्तर में रख कर खुद को विंटर्स में वार्म फील करवाने का मजा उठाना है. यही नहीं, ये बैकपेन से रिलीफ पहुंचाने में भी मदद करता है. यह एक तरह से हीट थेरैपी है और हीट थेरैपी ब्लड सर्कुलेशन को इंप्रूव करने का काम करती है. इस से न्यूट्रिएंट्स और औक्सीजन मसल्स व जौइंट्स तक पहुंच कर डैमेज मसल्स को इंप्रूव कर के जौइंट्स में जकड़न जैसी समस्याओं को ठीक करने में मदद करते हैं.

लेकिन इलैक्ट्रिक हीटिंग पैड का इस्तेमाल हमेशा लो लैवल सैटिंग मोड से ही करना चाहिए, जिसे आप हीटिंग सैटिंग मोड से सैट कर सकते हैं क्योंकि इस से आप इस का इस्तेमाल लंबे समय तक कर पाएंगे और इस से जलने का डर भी नहीं रहेगा. आप जब भी इलैक्ट्रिक हीटिंग पैड खरीदें तो देखें कि उस में औटोमेटिक शटऔफ फीचर जरूर हो, जो ओवरहीटिंग और बर्न होने से बचाने में मदद करेगा. ये आप को 300 से ले कर 1,000 रुपए में अच्छे फीचर्स के साथ मिल जाएंगे. तो फिर इस विंटर्स में खुद को वार्म रखें इलैक्ट्रिक हीटिंग पैड से.

रूम हीटर

विंटर्स में हर कोई मौसम का लुत्फ तो उठाना चाहता है, लेकिन बाहर की ठिठुरती ठंड हमें घर से बाहर तो क्या, कंबल से निकलने भी नहीं देती है. बस, मजबूरी के कारण घर से बाहर निकलना पड़ता है. ऐसे में हर कोई चाहता है कि वह भले ही बाहर के टैंपरेचर को कंट्रोल न कर पाए लेकिन अपने रूम को तो वार्म रख सके ताकि जब बाहर से घर आए तो उसे अपना कमरा वार्म व कोजी मिले. ऐसे में रूम हीटर्स आप के बड़े काम आएंगे. ये अपनी हीटिंग टैक्नोलौजी के कारण विंटर्स में रूम को वार्म रखते हैं.

बाजार में आज अलगअलग तकनीक के साथ विभिन्न प्रकार के रूम हीटर उपलब्ध हैं जिन्हें आप अपनी पसंद व जरूरत के हिसाब से खरीद सकते हैं. जैसे, रेडिएंट ट्यूब हीटर, जो सस्ता होने के कारण सब से ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है. इस में रेडिएशन प्लेट होती है जो सब से पहले आसपास की चीजों को गरम करती है. यह आप को 500 रुपए तक में मिल जाएगा. वहीं, फैन ब्लोअर रूम हीटर काफी पसंद किए जाते हैं क्योंकि ये काफी सेफ माने जाते हैं. असल में इस में एक फैन होता है जो गरम एलिमैंट पर हवा को संचारित करता है जिस के द्वारा हवा गरम हो कर पूरे रूम में फैल कर रूम को वार्म बनाने में मदद करती है. यह आप को 1,500-3,000 के बीच मिल जाएगा.

इसी तरह पीटीसी रूम हीटर, जिसे पौजिटिव टैंपरेचर एफिशिएंट रूम हीटर भी कहा जाता है. इस तरह के हीटर्स में पीटीसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है, जो तापमान के हिसाब से कमरे को वार्म रखने में मदद करते हैं. ये कमरे के माहौल को आरामदायक बनाने के साथ तेज हीटिंग की सुविधा भी प्रदान करते हैं और सेफ्टी के मामले में भी इन का कोई जवाब नहीं. हालांकि ये थोड़े महंगे जरूर होते हैं लेकिन कमरे के कंफर्ट को बनाए रखने में इन का अहम रोल होता है.

और अब बात आती है, औयल फिल्ड रूम हीटर की. इस में हीट ट्रांसफर करने के लिए औयल और रेडिएटर का इस्तेमाल किया जाता है. सब से पहले औयल को रेडिएटर में सर्कुलेट किया जाता है, जिस से रेडिएटर के बड़े सतह क्षेत्र के साथ, ताप अच्छे से विसर्जित होता है. कमरे को आरामदायक बनाने के लिए हीटर का टैंपरेचर थर्मोस्टेट के माध्यम से नियंत्रित किया जाता है. औक्सीजन बर्निंग प्रौब्लम इस तरह के हीटर्स में न के बराबर होती है, इसलिए ये महंगे होते हैं.

गीजर

विंटर का मौसम लगभग आ ही गया है. ऐसे में हर घर में सर्दी में गीजर की जरूरत महसूस होती ही है. न सिर्फ बाथरूम में बल्कि किचन में भी, जिस से आप के नहाने से ले कर आप का किचन में काम करना भी सुविधाजनक हो सके. लेकिन घर में गीजर को यों ही खरीद कर न ले आएं, बल्कि जब भी आप इसे खरीदें तो अपनी जरूरत, स्टाइल, कितने लोगों के लिए खरीदना है, वाटर हीटिंग का टाइम, प्राइस सब को ध्यान में रख कर खरीदें, ताकि विंटर में आराम मिलने के साथसाथ आप की जरूरत भी पूरी हो सके.

इस के लिए हम आप को बताते हैं कि आप को मार्केट में कई तरह के गीजर मिल जाएंगे, जिन में शामिल है, इंस्टेंट गीजर. ये गीजर आजकल काफी डिमांड में रहते हैं क्योंकि इन का कौम्पैक्ट डिजाइन छोटे बाथरूम और किचन के लिए बिलकुल उपयुक्त है. इस में इंसुलेटेड वाटर टैंक होता है, साथ ही, ये इंस्टैंट पानी को गरम करते हैं, जिस से ये किचन, बाथरूम में बड़े काम के साबित होते हैं. कोशिश करें इन्हें औफलाइन ही खरीदें ताकि आप को कोई भी छोटीबड़ी दिक्कत आने पर तुरंत समाधान मिल सके.

इसी के साथ गैस गीजर पानी को गरम करने के लिए लिक्विड पैट्रोलियम गैस का इस्तेमाल करते हैं. ये गीजर गरम पानी को लगातार प्रवाह प्रदान करते हैं, जिस से पानी तेजी से गरम होता है. और अगर आप के घर में पावर सप्लाई नहीं है, तब भी इस का असर आप पर नहीं पड़ेगा. ये कम ऊर्जा का उपयोग करते हुए पानी को तेजी से गरम करने में सक्षम होते हैं.

वहीं स्टोरेज गीजर, जो बिजली से चलता है, उस में एकीकृत इंसुलेटेड पानी का टैंक होता है. इस में बड़े पैमाने पर पानी संग्रहीत किया जाता है, जिस से बारबार पानी गरम करने के झंझट से बचा जा सके. ये इंस्टैंट वाटर गीजर की तुलना में थोड़े सस्ते होते हैं. तो इस तरह आप भी अपनी जरूरत के हिसाब से इस विंटर्स गीजर को लगवा कर मिनटों में गरम पानी का लुत्फ उठा सकते हैं.

इलैक्ट्रिक बैड वार्मर

नाम सुन कर हैरान रह गए न आप भी. असल में ये इलैक्ट्रिक बैड वार्मर सर्दी में आप के बड़े काम आने वाला है. जब बिस्तर ठंडे हो जाते हैं, जिस कारण घंटों नींद नहीं आती है, ऐसे में यह वार्मर आप के बैड को सोने से पहले प्रीहीट करने का काम करता है, जिस से आप को सोते समय गरमाहट में नींद आ सके. इस में बहुत कम बिजली लगती है, क्योंकि इस में बहुत पतली कार्बन फाइबर वायर्स का इस्तेमाल किया जाता है. इस में ब्लैंकेट का मैटीरियल ऐसा होता है, जिस से आग लगने का डर नहीं होता है. बस, जरूरत होती है इस ब्लैंकेट को इलैक्ट्रिक सर्किट में प्लगइन करने की और फिर रिमोट की मदद से आप टैंपरेचर को भी आसानी से सैट कर सकते हैं. ये आप को 2,000 से 4,000 रुपए में औनलाइन व औफलाइन मिल जाएंगे.

इलैक्ट्रिक फुट वार्मर

क्या सर्दी में आप के पैर भी ठंडे रहते हैं और आप को उन्हें गरम करने के लिए बारबार बिस्तर में जाना पड़ता है तो अब आप की इस परेशानी का अच्छा सा सौलूशन है, इलैक्ट्रिक फुट वार्मर. बस, इसे आप को प्लगइन करने की जरुरत है और आप अपनी जरूरत के हिसाब से इस में टैंपरेचर को भी सैट कर सकते हैं. इस के पोर्टेबल डिजाइन के कारण आप इसे आसानी से कहीं पर भी ले जा सकते हैं. साथ ही, इस का सुपर सौफ्ट मैटीरियल पैरों को गरम रखने के साथसाथ उन्हें फुल कंफर्ट देने का भी काम करता है. अगर कीमत की बात की जाए तो ये काफी पौकेटफ्रैंडली है. तो फिर तैयार हैं न विंटर्स में खुद को कंफर्ट व वार्म रखने के लिए.

सर्दी में पहाड़ों पर पर्यटन का मजा

बदलते मौसम में पर्यटन के दस्तूर भी बदल रहे हैं. आज पर्यटक सर्दियों में भी पहाड़ों की ठंड का मजा लेना चाहते हैं. पहले लोग गरमी में ही पहाड़ों पर जाना पसंद करते थे. सर्दी में पहाड़ों पर पर्यटन को ‘औफ सीजन’ माना जाता था. उस समय सर्दी  में पहाड़ों में पर्यटन सस्ता माना जाता था. होटल में रहने का खर्च व वहां घूमनाफिरना कम होता था.

अब हालात बदल गए हैं. अब पर्यटक सर्दी में पहाड़ों पर घूमने को प्राथमिकता देने लगे हैं. इस का सब से बड़ा कारण पहाड़ों की बर्फ का आनंद लेना है. सर्दी में पहाड़ों पर घूमने वालों की भीड़ नहीं रहती है. जिस से घूमने में सुकून मिलता है. अब पहाड़ों पर सर्दी में पर्यटन को ‘औफ सीजन’ नहीं माना जाता है.

सर्दी के मौसम में बर्फबारी देखने का अपना अलग ही मजा है. जिन लोगों को इस मौसम में पहाड़ों की बर्फबारी देखना और बर्फ में खेलना पसंद है वह पहाड़ों पर जाना पसंद करते हैं. इस के अलावा कुछ पर्यटक शांति की तलाश में पर्यटन करना चाहते हैं. वे भी इस मौसम को ही पसंद करते हैं.

गरमी में पर्यटन स्थलों पर इतनी भीड़ होने लगी है कि वहां जाना और रुकना महंगा और असुविधाजनक हो गया है. ऐसे में पहाड़ों पर सर्दी में जाने का ही बेहतर विकल्प रह गया है. सर्दी में पहाड़ों पर घूमने जा रहे हैं तो यह तय करना जरूरी है कि कहां जाएं, जहां आप को आनंद मिल सके?

देश में कई ऐसे पर्यटन क्षेत्र हैं जहां आप को चारों तरफ बर्फ ही बर्फ नजर आएगी. बर्फ से ढकी पहाडि़यां और पेड़पौधे मन मोह लेंगे. जो लोग स्कैटिंग जैसी ऐक्टिविटीज के लिए सर्दी में पहाड़ों का मजा लेना चाहते हैं वह भी ऐसी जगहों का चुनाव करें तो अच्छा होगा. पहाड़ी पर्यटन स्थलों में ज्यादातर हिमाचल, उतराखंड और नौर्थ ईस्ट हैं.

हिमाचल प्रदेश में इस सीजन पर्यटन के हिसाब से अच्छा नहीं जाएगा. लैंडस्लाडिंग में तमाम सड़कें खराब हो गईं. ऐसे में पर्यटक इस बार कश्मीर, उत्तराखंड  और नौर्थईस्ट जा सकते हैं. नौर्थईस्ट में बर्फबारी देखने को नहीं मिलती लेकिन पहाड़ दिखते हैं. उत्तराखंड में तमाम ऐसी जगहें हैं जहां पर बर्फबारी का पूरा मजा लिया जा सकता है.

कश्मीर में श्रीनगर, गुलमर्ग, पहलगाम, दूध पथरी और सोनमर्ग प्रमुख हैं. उत्तराखंड में नैनीताल, भीमताल, अल्मोड़ा, रानीखेत, गढ़मुक्तेश्वर, मसूरी, चमोली, औली, और जोशीमठ प्रमुख हैं. इसी तरह से नौर्थईस्ट में मेघालय और सिक्किम जैसी मशहूर जगहें हैं. कुछ शहर ऐसे हैं जो टौप फेवरेट माने जाते हैं. इन के बारे में जानना जरूरी है.

औली में स्कीइंग का मजा

सर्दी में पहाड़ों के सब से ज्यादा पसंद किए जाने वाले पर्यटन स्थलों में औली का नाम सब से प्रमुख है. यह हिमाचल प्रदेश में स्थित बेहद शांत और खूबसूरत हिल स्टेशन है. यहां आप स्कीइंग का आनंद ले सकते हैं. यह सब से फेमस स्कीइंग प्लेस है. बर्फ से ढकी पहाडि़यां घूमने वालों को एक अलग ही दुनिया में ले जाती हैं. नवंबर से मार्च तक औली जा सकते हैं. वहां का मौसम अच्छा होता है.

झील और जंगल देखना है तो हो आइए तवांग

तवांग में पर्यटकों की कम भीड़ देखने को मिलेगी. यहां आप को चारों ओर बर्फ की वादियां दिखाई देंगी. तवांग बेहद खूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों, हरेभरे जंगलों और खूबसूरत  झीलों के लिए भी जाना जाता है. तवांग में स्कीइंग का मजा लेने के लिए सब से अच्छी जगह पंगा टेंग त्सो  झील या पीटी  झील है. तवांग जाने का सब से अच्छा समय दिसंबर से फरवरी है.

सब से हौट स्पौट है मनाली

मनाली एक बहुत ही खूबसूरत हिल स्टेशन है. यह हिमाचल प्रदेश में है. पर्यटक सब से अधिक इस को ही पसंद करते हैं. मनाली में आमतौर पर नवंबर के शुरुआत में ही बर्फबारी होने लगती है. यहां आप ट्रेकिंग, स्कीइंग और कई तरह की ऐक्टिविटीज कर सकते हैं.

शिमला के आसपास पर्यटन स्थलों की भरमार

दिसंबर से जनवरी तक शिमला घूमने जा सकते हैं. इस समय यहां अच्छी बर्फबारी देखने को मिलेगी. शिमला के आसपास कुफरी, मनाली, डलहौजी जैसी जगहें हैं जहां सर्दी में घूमने जा सकते हैं.

बर्फबारी के लिए प्रसिद्ध है मुनस्यारी

मुनस्यारी अपनी बर्फबारी के लिए प्रसिद्ध है. पर्यटक यहां स्कीइंग का मजा ले सकते हैं. यह जौहर घाटी के पास है. मुनस्यारी नाम का मतलब होता है ‘बर्फ से ढकी जगह’. मुनस्यारी पर्वतारोहियों का भी पसंदीदा स्थान है. यहां के ग्लेशियर लोगों को पसंद आते हैं. बर्फ से ढकी ढलानें स्कीइंग के रोमांच को बढ़ा देती हैं.

गुलमर्ग से बेहतर कुछ भी नहीं

कश्मीर की बात तबतक अधूरी है जब तक गुलमर्ग की बात न हो. गुलमर्ग में चारों तरफ बर्फ नजर आती है. गुलमर्ग सर्दी में बर्फ से लदी वादियां देखने वाली होती है. कागज से सफेद बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच बर्फबारी खेल का आनंद अद्भुत होता है. गुलमर्ग में कोंगडोरी और अपर्वहाट पीक स्कीइंग के लिए सब से प्रमुख स्थान हैं. कोंगडोरी की 450 मीटर की ढलान पर स्कीइंग का अलग ही मजा होता है.

पहाड़ों पर बढ़ी हैं सुविधाएं

आज के दौर में सर्दी में पहाड़ों पर जाना लोग इसलिए भी पसंद  करते हैं क्योंकि वहां अब सुविधाएं बढ़ गई हैं. अगर बर्फ का मजा लेना है तो बाहर घूमिए. सर्दी से दिक्कत है तो होटल के अंदर रह सकते हैं. सर्दी से बचने के उपाय है वहां पर. होटल के अलावा होम स्टे भी उपलब्ध हैं. ये सस्ते पड़ते हैं. पहाड़ के घर भी इस तरह से बनाए जाते हैं जिन में सर्दी कम असर करती है. अब पहाड़ों पर आनेजाने के साधन बेहतर हो गए हैं. बरसात के दिनों में पहाड़ों पर खतरा रहता है. सर्दी में धूप और ठंड का अलग ही मजा आता है.

महिलाओं और परिवार के लोगों को पर्यटन करने के लिए ले जाने का काम करने वाली सोनिया गुलाटी कहती हैं, ‘‘सर्दी  में कुछ पर्यटन स्थल हौटस्पौट के नाम से मशहूर होते हैं. वहां जाने की जगह पर कम फेमस जगहों पर जाएं. वहां भी पूरा आनंद मिलता है. बस ब्रैंड नेम न होने के कारण भीड़ कम होती है.’’

ऐसे में अगर बजट टूरिज्म करना चाहते हैं तो कम मशहूर जगहों का चुनाव करें. इन की जानकारी पहले से हासिल कर लें. आज सब जगहों की जानकारी और मौसम का मिजाज पहले ही पता चल जाता है. अच्छा प्लान करेंगे तो पहाड़ों का असली आनंद सर्दी में ले सकेंगे. अब अपने बजट में घूम सकते हैं क्योंकि महंगी और सस्ती हर तरह की जगह और साधन मिल सकते हैं.

मैं अपने बौयफ्रैंड से शादी करूं या नहीं, कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करूं ?

सवाल

मैं अपने बौयफ्रैंड से डेटिंग ऐप पर मिली थी. इस बात को 4 साल हो चुके हैं. हम दोनों एकदूसरे को बहुत पसंद करते हैं. वह अब मुझ से शादी करना चाहता है. वह अब अपनी जौब में सैट हो चुका है. उस के मम्मीपापा को भी हमारी शादी से कोई एतराज नहीं है. वे बहुत खुले विचारों के हैं और मुझे विश्वास है कि वे मुझे खुश रखेंगे. फिर भी कुछ समझ नहीं आ रहा है कि मैं उससे शादी करूं या नहीं ? कृपया कोई सुझाव दीजिए.

जवाब

सब से पहले आप को खुद को भावनात्मक रूप से तैयार करना है. विवाह के लिए आप को अपनी भावनाओं, समय और ऊर्जा का निवेश करने की आवश्यकता होती है और आप इस का लाभ उठाने के लिए तैयार हैं तो आप के लिए शादी करने के लिए यह समय सही है. दूसरा, आप दोनों एकदूसरे को 4 साल से जानते हैं. डेटिंग को एंजौय कर चुके हैं. सिंगल कपल लाइफ का आनंद ले लिया है. अब आप अपने बौयफ्रैंड के साथ जीवन में स्थिरता चाहते हैं तो वह स्थिरता शादी ही ला सकती है.

शादी से पहले आर्थिक रूप से मजबूत होना जरूरी है. आप खुद कह रही हैं कि अब आप का बौयफ्रैंड लाइफ में, अपनी जौब में सैट हो चुका है तो इस का मतलब यही है कि वह अपने साथसाथ आप की जिम्मेदारी भी उठा सकता है. अलबत्ता आज टाइम ऐसा है कि लड़की को भी पैसे के मामले में सक्षम होना चाहिए. ऐसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आत्मनिर्भर हो कर लड़की लड़के पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं रहती. अपने बौयफ्रैंड की भी पसंद जान लें कि वह वर्किंग वाइफ चाहता है या नौन वर्किंग. यह सब आप दोनों की अंडरस्टैंडिंग पर है.

सब से महत्त्वपूर्ण बात, यदि आप को लगता है कि आप को वह व्यक्ति मिल गया है, जिस की आप को चाह थी. जिस के साथ आप अपना पूरा जीवन खुशीखुशी बिता सकती हैं तो शादी का निर्णय ले सकती हैं.

नींद और लंग्स का आपस में कनैक्शन

एक एनर्जेटिक और प्रोडक्टिव दिन को पाने के लिए रात को भरपूर और आरामदायक नींद लेना बहुत जरूरी है. कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का कारण खराब नींद है. फिर भी हम इसे हलके में लेते हैं और नींद की गुणवत्ता के साथ सम?ाता करते हैं. कम नींद की वजह से हमें न सिर्फ मानसिक बीमारियां घेर लेती हैं बल्कि इस से दिल और फेफड़े खराब हो सकते हैं. यदि हम 7 से 8 घंटे की अच्छी नींद नहीं लेते हैं तो यह हमारे फेफड़ों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है.

अच्छी नींद लेने से सेहत और मन दोनों अच्छे रहते हैं. डाक्टर भी अच्छी सेहत के लिए 8 घंटे की नींद लेने की सलाह देते हैं. जो लोग रोजाना 11 घंटे से ज्यादा सोते हैं या 4 घंटे से कम नींद लेते हैं, उन में गंभीर और लाइलाज फेफड़ों की बीमारी पल्मोनरी फाइब्रोसिस होने का खतरा 2 से 3 गुना ज्यादा होता है.

साइंस पत्रिका ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ की एक रिपोर्ट कहती है कि कम सोने से आरईवी-ईआरबीए नामक जीवाणु फेफड़ों पर असर दिखाने लगते हैं, जिस के कारण फेफड़ों के ऊतकों पर काले धब्बे उभर आते हैं. ऊतक डैमेज हो जाते हैं. यह पल्मोनरी फाइब्रोसिस नामक बीमारी की शुरुआत है.

यह गंभीर बीमारी है जिस में लंग्स मोटे और कठोर हो जाते हैं और व्यक्ति को सांस लेने में कठिनाई होने लगती है. फेफड़े के ऊतक क्षतिग्रस्त होने से श्वसन क्रिया पर असर पड़ता है. फेफड़ों के ठीक तरीके से काम न करने से पूरे शरीर और दिमाग को औक्सीजन नहीं मिल पाती, जिस से मल्टीप्ल और्गन फैल्योर का खतरा बढ़ जाता है. फेफड़ों में एक बार खतरनाक इन्फैक्शन हो जाए तो उसे ठीक होने में लंबा टाइम लगता है.

फेफड़ों की कोशिकाओं का अध्ययन बताता है कि जैविक घड़ी के अनुसार सोने से फेफड़ों में होने वाली पल्मोनरी फाइब्रोसिस बीमारी के घाव धीरेधीरे ठीक होने लगते हैं. यूनिवर्सिटी औफ मैनचेस्टर और यूनिवर्सिटी औफ औक्सफोर्ड के शोधकर्ताओं के अनुसार शरीर की जैविक घड़ी शरीर में मौजूद एकएक कोशिका को संचालित करती है.

यह जैविक घड़ी 24 घंटे के चक्र में कई प्रक्रियाएं, जैसे सोना, हार्मोन का स्राव और चयापचय को संचारित करती है. फेफड़ों में यह घड़ी हवा अंदर ले जाने वाली प्रमुख नली यानी वायुमार्ग में स्थित होती है. असामान्य नींद का पैटर्न शरीर की इस प्राकृतिक जैविक घड़ी के कार्य को बाधित करता है. वर्तमान में, फाइब्रोसिस के इलाज के लिए एफडीए द्वारा अनुमोदित केवल 2 दवाएं हैं और वे केवल प्रक्रिया में देरी करती हैं, वे बीमारी का इलाज नहीं करतीं.

नींद से जुड़ी दूसरी बीमारी है स्लीप ऐप्निया. वे लोग जिन्हें दिन में उनींदापन अधिक रहता है और जो खर्राटे लेते हैं उन्हें इन लक्षणों के बारे में अपने डाक्टर से बात करनी चाहिए. वे निश्चित ही कम नींद लेने की वजह से स्लीप ऐप्निया रोग की गिरफ्त में हैं. उन के साथ हांफने या दम घुटने, रुकरुक कर सांस आने और खर्राटे के साथ घबरा कर नींद खुलने की घटनाएं होती हैं.

स्लीप ऐप्निया कुछ चिकित्सकीय विकारों और असमय मृत्यु के जोखिम को बढ़ाती है. इस बीमारी की पुष्टि, बीमारी की गंभीरता और निदान के लिए डाक्टर पौलीसोम्नोग्राफी करवाते हैं. स्लीप ऐप्निया का इलाज करने के लिए लगातार पौजिटिव एयरवे प्रैशर, डैंटिस्ट द्वारा लगाए गए मुंह के उपकरणों का प्रयोग और कभीकभी सर्जरी भी करनी पड़ती है. स्लीप ऐप्निया एक बहुत आम समस्या है. दुनियाभर में एक बिलियन से अधिक लोग इस से प्रभावित हैं. विभिन्न कारणों और जोखिम कारकों के साथ यों तो स्लीप ऐप्निया कई प्रकार की होती है लेकिन औब्सट्रक्टिव स्लीप ऐप्निया और सैंट्रल स्लीप ऐप्निया के मरीज अधिक मिलते हैं.

औब्सट्रक्टिव स्लीप ऐप्निया एक आम स्लीप ऐप्निया है जो नींद के दौरान गले या ऊपरी वायुमार्ग के बारबार बंद होने से पैदा होती है. ऊपरी वायुमार्ग में मुंह और नथुनों से ले कर गले और नीचे स्वरयंत्र तक का रास्ता शामिल होता है और व्यक्ति जब सांस लेता है तो ये संरचनाएं अपनी स्थिति को बदल सकती हैं. इस प्रकार का ऐप्निया 8 से 16 फीसदी वयस्कों के स्वास्थ्य पर प्रभाव डालता है. औब्सट्रक्टिव स्लीप ऐप्निया मोटे लोगों में अधिक होता है.

अधिक मोटापा, बढ़ती आयु, नींद की कमी और दूसरे कारकों के चलते ऊपरी वायुमार्ग के संकुचित होने से औब्सट्रक्टिव स्लीप ऐप्निया होता है. अल्कोहल और सिडेटिव का अत्यधिक उपयोग औब्स्ट्रक्टिव स्लीप ऐप्निया को और बिगाड़ देता है. संकुचित गला, मोटी गरदन और गोल सिर होना स्लीप ऐप्निया के जोखिम को बढ़ा देता है. थायराइड हार्मोन के कम स्तर (हाइपोथाइरौइडिज्म), गैस्ट्रोइसोफेजियल रिफ्लक्स रोग या रात में एनजाइना पेन या हार्मोन (एक्रोमेगाली) के अतिरिक्त स्राव औब्सट्रक्टिव स्लीप ऐप्निया रोग को बढ़ा सकते हैं. कभीकभी आघात के कारण भी औब्स्ट्रक्टिव स्लीप ऐप्निया हो सकती है. औब्स्ट्रक्टिव स्लीप ऐप्निया वाले लोगों को अल्कोहल और सिडेटिंग दवाओं से बचना चाहिए.

सैंट्रल स्लीप ऐप्निया

औब्सट्रक्टिव स्लीप ऐप्निया की तुलना में सैंट्रल स्लीप ऐप्निया बहुत कम होती है. यह दिमाग के ब्रेन स्टेम कहलाने वाले भाग में सांस के नियंत्रण की समस्या के कारण पैदा होती है. सामान्यतया ब्रेन स्टेम खून में कार्बन डाइऔक्साइड के स्तर में बदलावों के प्रति बहुत संवेदनशील होता है. जब कार्बन डाइऔक्साइड का स्तर अधिक होता है तो ब्रेन स्टेम श्वसन तंत्र की मांसपेशियों को गहरी और तेज सांसें लेने का संकेत देता है ताकि कार्बन डाइऔक्साइड को सांस के माध्यम से बाहर निकाला जा सके. लेकिन इस के विपरीत सैंट्रल स्लीप ऐप्निया में, ब्रेन स्टेम कार्बन डाइऔक्साइड के स्तरों में बदलाव के प्रति ठीक प्रकार से प्रतिक्रिया नहीं करता.

इस के परिणामस्वरूप, जिन लोगों को सैंट्रल स्लीप ऐप्निया होती है, नींद के दौरान उन की सांसों में रुकावट आ सकती है या वे सामान्य से कम गहरी और अधिक धीमी सांसें ले सकते हैं. सभी प्रकार के स्लीप ऐप्निया में नींद के व्यवधान के परिणामस्वरूप दिन के समय उनींदापन, थकान, चिड़चिड़ापन, सुबह का सिरदर्द, विचारों का धीमापन और एकाग्रता में कठिनाई हो सकती है.

जो लोग रात में अपनी पूरी 8 घंटे की नींद नहीं लेते, वे दिनभर नींद से भरे रहते हैं. ऐसे में उन्हें तब चोट लगने का जोखिम अधिक होता है जब वे मोटरवाहन या भारी मशीन संचालित कर रहे हों या ऐसी गतिविधियां कर रहे हों जिन के दौरान उनींदापन खतरनाक होता है. उन्हें काम पर कठिनाइयां हो सकती हैं और यौन संबंधी विकार भी हो सकता है. चूंकि श्वसन क्रिया ठीक न होने से खून में औक्सीजन का स्तर काफी हद तक कम हो सकता है, इसलिए आर्टिरियल फाइब्रिलेशन विकसित हो सकता है और ब्लडप्रैशर बढ़ सकता है.

औब्सट्रक्टिव स्लीप ऐप्निया में स्ट्रोक, दिल के दौरे, आर्टिरियल फाइब्रिलेशन (एक असामान्य, अनियमित हृदय गति) और अधिक ब्लडप्रैशर का जोखिम बढ़ जाता है. यदि अधेड़ आयु के पुरुषों के साथ औब्सट्रक्टिव स्लीप ऐप्निया के प्रसंग प्रति घंटे लगभग 30 से अधिक बार होते हैं तो उन की असमय मृत्यु होने का जोखिम बढ़ जाता है.

स्लीप ऐप्निया से कैसे बचें

स्लीप ऐप्निया नींद और श्वसन से जुड़ी एक आम बीमारी है. अकसर इस बीमारी का पता नहीं चल पाता. स्लीप ऐप्निया से बचने के लिए ये तरीके अपनाए जा सकते हैं-

  • औब्सट्रक्टिव स्लीप ऐप्निया से पीडि़त लोगों को सोने से पहले अल्कोहल और सिडेटिंग दवाओं से बचना चाहिए.
  • स्लीप ऐप्निया के जोखिम कारकों में मोटापा, ऊपरी वायुमार्ग में संरचनात्मक असामान्यताएं, स्लीप ऐप्निया का पारिवारिक इतिहास, हाइपोथायरायडिज्म और पौलीसिस्टिक अंडाशय सिंड्रोम जैसे हार्मोन विकार, धूम्रपान और शराब का दुरुपयोग शामिल हैं. इस के लिए डाक्टर की सलाह पर व्यायाम और दवाओं का सेवन करें.
  • नींद के दौरान लक्षणों पर आमतौर पर सब से पहले साथ सोने वाले व्यक्ति, कमरे या घर के साथी का ध्यान जाता है. सभी प्रकार के स्लीप ऐप्निया में सांस लेना असामान्य रूप से धीमा और उथला हो सकता है, या सांस अचानक रुक सकती है कभीकभी तो एक मिनट तक के लिए, फिर वापस चालू हो जाती है. इन लक्षणों की पहचान कर जल्दी ट्रीटमैंट शुरू करना चाहिए.
  • वजन कम करना, धूम्रपान छोड़ना और अधिक अल्कोहल का उपयोग न करना मदद कर सकता है. नाक के संक्रमणों और एलर्जी का इलाज किया जाना चाहिए. हाइपोथाइरायडिज्म और एक्रोमेगाली का इलाज किया जाना चाहिए.

पति विवाद में पहली हिंसा में ही पत्नी करे विरोध

लखनऊ ठाकुरगंज थाना क्षेत्र में आनंदेश्वर अग्रहरी उर्फ आनंद और जान्हवीं अग्रहरि उर्फ संध्या पतिपत्नी के रूप में रह रहे थे. 2008 में दोनों ने प्रेम विवाह किया था. दोनों के 2 बेटे तनिष्क और शोर्य थे. तनिष्क मूक बधिर था. आनंद फिजियोथेरैपिस्ट के रूप में काम करता था. पतिपत्नी दोनों के बीच झगड़े होते रहते थे.

2019 में झगड़े को ले कर मसला पुलिस तक गया था. हर बार समझौता हो जाता था. 4 दिसंबर को पहला झगड़ा हुआ. आनंद जुआ खेलने और नशे का आदी था. कुछ माह से वह आपना काम भी नहीं कर रहा था. ऐेसे में पैसों को ले कर पतिपत्नी में झगड़ा बढ़ गया था.

आनंद के बड़े बेटे तनिष्क ने पुलिस को लिख कर और साइन लैग्वेंज (इशारो से अपनी बात बताना) के जरीए पुलिस को बताना चाहा तो पुलिस उस बात को समझ नहीं पाई थी. ऐसे में एडीसीपी चिरंजीवी नाथ सिन्हा ने साइन लैग्वेंज की जानने वाली प्रिंसिपल को बुलवाया. उन के साथ बातचीत कर के तनिष्क ने घर का नक्षा बनाते हुए लिख कर समझाया कि ‘डैड ने पहले पैकेट खोल कर नशीला पदार्थ बच्चों और पत्नी को धोखे से पिला दिया.’

जब बच्चे बेहोश हो गए तो आनंद ने बेहोश पत्नी संध्या पर चाकू से 22 वार कर के मार दिया.’ इस के कुछ देर बाद शौर्य उठा तो उस ने अपनी नानी को फोन पर सारी जानकारी दी. आनंद फरार हो चुका था. इस तरह से आनंद और संध्या की प्रेम कहानी का अंत हो गया. अगर संध्या ने पहली हिंसा पर ही विरोध कर के अलग रहने का फैसला किया होता तो शायद वह जिंदा होती.

इसी तरह की दूसरी घटना लखनऊ के 80 किलोमीटर दूर रायबरेली जिले की है. मीरजापुर जिले के फरदहा घाटमपुर निवासी डाक्टर अरूण सिंह लालगंज रायबरेली स्थित रेल डिब्बा कारखाना के अस्पताल में 6 साल से नौकरी कर रहा था. उस के साथ पत्नी अर्चना, बेटी अदीवा और आरव रहता था. रहने के लिए टाइप-4 आवास उन को मिला था. वह दिन से डयूटी पर नहीं गया तो अस्पताल के कर्मचारी उस को देखने घर गए. घर के दरवाजे पर ताला लगा था. दूसरे दरवाजे अंदर से बंद थे. खिड़की से झांक कर देखने पर पता चला कि घर में सब मरे पड़े थे.

पुलिस के अनुसार डाक्टर अरूण ने मिठाई में जहर खिला कर पत्नी और बच्चों को बेहोश कर दिया. इस के बाद चेहरों पर हथौड़ी मार कर पहले पत्नी और बच्चों की हत्या कर दी. इस के बाद ग्राइडर मशी से अपनी नस काटनी चाही, असफल होने पर फंसी लगा कर जान दे दी. डाक्टर अरूण भी नशा करता था. आईजी पुलिस तरूण गाबा और एसपी आलोक प्रियदर्शी ने कहा कि घटना दुखद है. पुलिस इस की जांच कर रही है. इस तरह की घटनाएं नई नहीं हैं. हर शहर में कभी न कभी सामने आती है. ऐसे में महिलाएं किस तरह से अपना बचाव कर सकती हैं यह समझना जरूरी है.

नशा, जुआ और मैंटल हैल्थ बन रहा कारण

पतिपत्नी विवाद में झगड़े की शुरूआत धीरेधीरे होती है. शुरूआत में पत्नी को यह लगता है कि हर पतिपत्नी के बीच ऐसा होता है. धीरेधीरे सब ठीक हो जाता है. लेकिन धीरेधीरे सब ठीक नहीं होता बल्कि और बिगड़ जाता है. पत्नी दो कारणों से पति का विरोध नहीं कर पाती है. पहला उस के बच्चे हो जाते हैं. उसे लगता है इन को ले कर कहां जाएगी. दूसरे शादी के बाद लड़कियों को अपने मायके में भी साथ और सहयोग नहीं मिलता.

धर्म ग्रंथों में लड़कियों को यही समझाया जाता है कि शादी के बाद उन का घर ससुराल होता है. मायके से डोली में वह जाती है और ससुराल से उन की अर्थी ही निकलती है. समाज में उन महिलाओं को अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता जो सुसराल छोड़ कर अलग रहती है. अधिकतर महिलाएं आर्थिक रूप से कमजोर होती हैं. वह अलग रह कर अपना जीवन यापन नहीं कर सकती. सिंगल रहने वाली महिलाओं के प्रति समाज अच्छी नजर नहीं रखता है.

इस वजह से वह अपने फैसले खुद नहीं ले पाती है और हिंसा सह कर पति के साथ उस के घर में रहने को मजबूर होती है. मनोचिकित्सक डाक्टर मधु पाठक कहती है ‘जुआ खेलने के आदी ज्यादातर लोग नशे के भी आदी हो जाते हैं. नशा करने वाले की सहनशीलता और सोचनेसमझने की ताकत खत्म हो जाती है. वह अचानक गुस्से में आ जाता है. कई बार वह क्रोध में कई बार डिप्रेशन में घातक कदम उठा लेता है.

जल्दी नहीं मिलता तलाक

इस तरह की घटनाओं की शिकार पूजा वाजपेई कहती है, “हिंसा का विरोध करने पर जब लड़की मायके वालों को अपनी बात बताती है तो वह सलाह देते हैं थोड़ा सहन करो हर रिश्ते में ऐसा होता है. जब लड़की तलाक लेने के लिए जाती है तो सालोंसाल उस को भटकना पड़ता है. जब तलाक मिल जाता है तो उस के लिए मायके में भी जगह बहुत बार नहीं मिलती है. जब वह किराए के मकान में रहती है तो मध्यम वर्गीय शहरों में किराए पर घर नहीं मिलता.

सिंगल महिला के कैरेक्टर को ले कर सवाल उठते हैं. कई बार उस के आसपास के पुरूष गलत फायदा भी उठाने का प्रयास करते हैं. इन हालातों से बचने के लिए महिलाएं पतियों की प्रताड़ना सहती रहती है.’

पूजा खुद सिंगल पैरेंट है. वह अपनी बेटी के साथ अलग रहती है. पति के साथ विवाद के बाद उस ने पति से तलाक लेने का काम किया. 6 साल में उसे तलाक मिला. पूजा की शादी कम उम्र में हो गई थी. 26 साल में उस का तलाक हो गया. उस के पास काम करने का मौका था. उस ने जौब करना शुरू किया. अपनी बेटी को अपने पास रखा. अब वह सोशल मीडिया पर मुहिम चला कर सिंगल रहने वाली महिलाओं की मुश्किलों को हल करने में मदद भी कर रही है.

आत्मनिर्भरता जरूरी

समाज में यह बदलाव आने लगा है कि लड़कियां अब नौकरी करने लगी हैं. ज्यादातर की प्राइवेट जौब है. जिस में 10-12 हजार ही वेतन मिलता है. बड़े शहरों में यह 20-25 हजार हो जाता है. ऐसे में शादी के बाद वह जौब करना वह छोड़ देती है. शादी में अगर सब ठीक नहीं चला तो उन के पास जीवन यापन का कोई साधन नहीं होता.

ज्यादातर पति अपने घर परिवार के साथ घर में रह रहे होते हैं. ऐसे में पत्नी को घर में झगड़े के बाद रहने को मिल भी जाए तो शांति से रहना मुश्किल रहता है.

इस के उलट सरकारी नौकरी करने वाली लड़कियों को शादी के बाद नौकरी छोड़ने के लिए नहीं दबाव डाला जाता है. जिस से पति के साथ झगड़ा होने पर भी वह अपना जीवन गुजारने की हालत में होती है.

वह सिंगल रह भी लेती है और समाज भी उन के साथ खड़ा हो जाता है. पतिपत्नी विवादों में पुलिस और कचहरी के तमाम चक्कर लगाने पड़ते हैं. प्राइवेट संस्थान छुट्टियां नहीं देते. ऐसे में लड़कियों के सामने दिक्कतें होती हैं.

पूजा कहती है, ‘पति का घर छोड़ते ही हालात बदल जाते हैं. संयुक्त परिवार में पति के घर रहना नामुमकिन होता है. उन की बहू के साथ कोई लगाव नहीं रहता. वह खराब से खराब हालत में अपने बेटे का ही सपोर्ट करते हैं. लड़की के मांबाप उस को मायके नहीं ला पाते. उन को लगता है कि मायके में बैठी बेटी को देख कर उस के दूसरे लड़के लड़की के लिए अच्छे रिश्ते नहीं आएंगे.’

इन कारणो से ही लड़की हिंसा सहती है. अगर घर परिवार समाज और कानून उस की मदद करे तो वह मरने के लिए कभी पति के साथ नहीं रहेगी. लड़की को बेचारी समझने की जगह पर अगर उस की मदद की जाए तो समाज में बेहतर हालात बन सकते हैं. आत्मनिर्भर लड़कियां खुद के फैसले ले सकती हैं. शादी के बाद भी उनको जौब नहीं छोड़नी चाहिए. उन के पास एक ठिकाना जरूर होना चाहिए जहां वह जरूरत पड़ने पर बिना किसी दबाव के रह सके.

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