story in hindi
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जयपुर में 5 दिसंबर को दिनदहाड़े 3 बदमाशों ने राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना के अध्यक्ष सुखदेव सिंह गोगामेड़ी को उन के घर में घुस कर उन्हें गोलियां से भून डाला. इस शूटआउट में जेल में बंद बदमाश लौरेंस बिश्नोई के गैंग का हाथ होने की बात कही गई.
ह्त्या की जिम्मेदारी लौरेंस से दोस्त रोहित गोदारा ने ली है. सुखदेव सिंह गोगामेड़ी को कई दिन से जान से मारने की धमकी लौरेंस बिश्नोई गैंग की तरफ से मिल रही थे. सुखदेव सिंह गोगामेड़ी ने पुलिस सुरक्षा की भी मांग की थी मगर उन्हें सुरक्षा नहीं दी गई. लौरेंस बिश्नोई इस वक्त पंजाब जेल में बंद है. पंजाब पुलिस की उस की गतिविधियों पर नजर है.
जेल में उस से कौन मिलने आता है. जेल में उस के साथ रहे कैदी जेल से छूटने के बाद किसकिस से मिल रहे हैं इस की जानकारी पुलिस रख रही थी. इसी के चलते ये इनपुट मिला था कि सुखदेव सिंह गोगामेड़ी को मारने की योजना ये गैंग बना रहा है.
इस बाबत राजस्थान पुलिस को बताया भी गया था मगर समय रहते सुखदेव सिंह गोगामेड़ी की सुरक्षा चाकचौबंद नहीं हो पाई और शूटर अपना काम कर गए.
राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना के अध्यक्ष सुखदेव सिंह गोगामेड़ी की हत्या के बाद अब करणी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष सूरजपाल अम्मू को जान से मारने की धमकी मिली है. कथित तौर पर लौरेंस बिश्नोई के गुर्गों ने सोशल मीडिया पर ये धमकी दी है.
सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा गया है कि, “तूने लौरेंस को गाली दे कर गलती कर दी. अब की तेरी बारी ‘RIP IN ADVANCE’. ताऊ तुझे कब उठा लेंगे, पता ही नही चलेगा.”
इस धमकी के बाद अब पुलिस नींद से जागी है. रोहित गोदारा और उस के सहयोगियों की तलाश में जुटी राजस्थान और दिल्ली की पुलिस धड़ाधड़ बदमाशों का एनकाउंटर कर रही है.
8 दिसंबर की रात दिल्ली के बसंत कुंज इलाके में तड़ातड़ गोलियों की आवाज से लोग थरथरा उठे.
दरअसल पुलिस को यह जानकारी मिली कि लॉरेंस गैंग के 2 शार्प शूटर वसंत कुंज इलाके में हैं. इस के बाद स्पेशल सेल के दस्ते ने इलाके को घेर लिया. दोनों तरफ से कई राउंड फायर हुए और दिल्ली पुलिस ने बड़ी सफलता हासिल करते हुए लौरेंस बिश्नोई गैंग के 2 शार्प शूटरों को गिरफ्तार कर लिया.
पुलिस की स्पैशल सेल एनकाउंटर के बाद आरोपियों को गिरफ्तार किया है. यह मुठभेड़ बीती रात 9.00 बजे वसंत कुंज के एक पांच सितारा होटल के पास हुई. बदमाशों ने 5 राउंड और पुलिस ने दो राउंड फायरिंग की.
क्राइम ब्रांच ने इन के पास से 2 विदेशी पिस्टल, 4 कारतूस और एक बाइक बरामद की है. ये दोनों अपराधी रोहतक में 6 आपराधिक मामले में शामिल रहे हैं और अब लौरेंस ग्रुप से जुड़ कर उस के लिए काम कर रहे हैं.
शूटरों की पहचान आकाश कासा और नितेश के रूप में की गई है. दोनों हरियाणा के सोनीपत और चरखी दादरी इलाके के रहने वाले हैं. इन्हीं दोनों ने दिल्ली के पंजाबी बाग इलाके में रहने वाले पंजाब के फरीदकोट से एक्स एमएलए दीप मल्होत्रा के घर 3 दिसंबर की शाम फायरिंग की थी. हैरानी की बात है कि दोनों में से एक अभी नाबालिग है.
सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म के दौरान महिलाएं प्रवेश नहीं कर सकती यह मुकदमा तीन दशक तक चला था. तब कहीं जा कर सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर, 2018 को यह फैसला दिया था कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का बहिष्कार असंवैधानिक है. तब विवाद या धार्मिक एतराज इस बात को ले कर था कि 10 से 50 साल तक की महिलाएं मासिक धर्म से होती हैं इसलिए उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं दिया जाना चाहिए.
तब सब से बड़ी अदालत के अलावा देशभर के बुद्धिजीवी वर्ग में संविधान के अनुच्छेद 14 के आलावा जो शब्द चर्चा में रहे थे वे पवित्रता, अशुद्धि, वगैरह थे. मामला महिलाओं के लिहाज से अहम था जिस में धर्म, परंपराओं, बंदिशों, संस्कृति, प्रथाओं जैसे विषयों पर कई तारीखों में व्यापक चर्चा हुई थी.
कोलकाता हाई कोर्ट की हद
इस मामले पर अब भी यदाकदा चर्चा होती रहती है. लेकिन आजकल कोलकाता हाई कोर्ट का एक फैसला चर्चा में है जिस में उस ने कहा है कि कम उम्र की लड़कियों को अपनी यौन इच्छाएं कंट्रोल में रखनी चाहिए और 2 मिनिट के सुख के लिए अपनी गरिमा से समझौता नहीं कर लेना चाहिए. बकौल हाई कोर्ट के जस्टिस चितरंजन दास एवं जस्टिस पार्थ सारथी, जब वे 2 मिनट के सुख के लिए खुद को सौंप देती हैं तो समाज की निगाह में लूजर हो जाती हैं.
लड़कियों को ले कर अदालत की कुंठा ने और विस्तार लेते हुए यह भी कहा कि युवा लड़के लड़कियों समझना चाहिए कि यौन इच्छाएं खुद की तमाम गतिविधियों से पैदा होती हैं. ये नौर्मल नहीं हैं. युवाओं को हर हाल में इन्हें काबू में रखना चाहिए ताकि वे किसी गलत स्थिति में या किसी कानूनी पचड़े में न पड़ें.
सुप्रीम कोर्ट की फटकार
इस हैरान और सकते में डाल देने वाले फैसले पर अच्छी बात यह है कि किसी को सुप्रीम कोर्ट नहीं जाना पड़ा जिस ने 8 दिसंबर को खुद संज्ञान लेते हुए कोलकाता हाई कोर्ट को फटकार लगा दी कि जजों को अपनी राय नहीं व्यक्त करनी चाहिए. ऐसा आदेश किशोर वय के अधिकारों का हनन है. नाबालिग लड़की के एक दोस्त से रोमांटिक अफेयर पर हाई कोर्ट ने दोषी को बरी भी कर दिया था इसे भी सुप्रीम कोर्ट ने अनुचित माना.
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अभय श्रीनिवास ओका और जस्टिस पंकज मिथल ने हाई कोर्ट की इस टिप्पणी को गैरजरूरी और आपत्तिजनक बताते हुए कहा कि जजों से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वे उपदेश दें.
उपदेशों का हाल तो यह है कि
मामला अभी आयागया नहीं हुआ है, जिस पर दुखद बात समाज की उदासीनता और जानबूझ कर की गई अनदेखी रही जिस से लगता है कि हम तेजी से पौराणिक होते माहौल के गुलाम होते जा रहे हैं. 18 अक्तूबर, 2023 को कोलकाता हाई कोर्ट ने यह फैसला सुनाया था जिस पर किसी के कान पर जागरूकता, संवैधानिक अधिकारों या नारी स्वतंत्रा की जूं नहीं रेंगी और आखिरकर खुद सुप्रीम कोर्ट को ही संज्ञान लेना पड़ा.
बात जहां तक उपदेशों की है तो देश में उन्हीं का दौर है, खासतौर से लड़कियों और उन की आजादी के मामलों में तो धर्म के पैरोकारों ने मुहिम सी छेड़ रखी है. सोशल मीडिया पर उन के फैशन, नौकरी, प्यार और शादी करने के तौरतरीकों तक पर एतराज जताया जाता है.
सैक्स पर हालात या ताजी मानसिकता क्या है इस की एक बानगी करवाचौथ के दिन एक भगवानवादी वैबसाइट पर देखने में आई जिस में नसीहत दी गई थी कि धर्म को जानने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि करवाचौथ व्रत के दिन दंपति को शारीरिक संबंध नही बनाने चाहिए यहां तक कि इस प्रकार के विचार भी अपने दिमाग में नहीं आने देना चाहिए. इस प्रकार के कामों को व्रत में वर्जित माना गया है. हिंदू धर्म ग्रंथों में यह भी लिखा है कि चाहे व्रत कोई भी हो करवाचौथ तीज या नवरात्रि का महापर्व, इन दिनों में किसी भी पुरुष या स्त्री के मन में गलत विचार रखना गलत होता है इस से वैवाहिक जीवन को नुकसान होता है.
मुहूर्त देख कर करें सैक्स
इस तरह का प्रचारप्रसार कोई नई या अनूठी बात नही है क्योंकि धर्म कोई भी हो वह लोगों को अपने हिसाब से हांकना चाहता है जिस से उस का नियन्त्रण समाज पर बना रहे और दुकान फलतीफलती रहे. धर्म तो सहवास के मुहूर्त भी बताता है. इतनी बंदिशें खासतौर से महिलाओं पर धर्म ने सैक्स को ले कर थोप रखी हैं कि उन का सैक्स करना ही दूभर हो जाए.
कोलकाता हाई कोर्ट का फैसला इसी माहौल की झोंक की देन लगता है. नहीं तो कोई वजह नहीं है कि वह संविधान का उल्लंघन करते फैसला दे, राज धार्मिक टाइप के लोगों का है समाज पर कब्जा उन्हीं का है, घरों के बेडरूम तक में उन का दखल बढ़ रहा है. पूजापाठ, पाखंड व शबाब पर हैं. ऐसे में कोर्ट अगर अदालतें भी बहकने लगें तो फिर देश का भगवान ही मालिक है.
सबरीमाला के फैसले से जो उम्मीद महिलाओं को बंधी थी वह फिर खतरे में है. सुप्रीम कोर्ट की पहल स्वागत योग्य है लेकिन बड़ा दोष उन लोगों का है जो बात बात पर हल्ला मचाते रहते हैं. लेकिन बात लड़कियों की आजादी पर बंदिश की आती है तो धर्म के साथ हो लेते हैं. यही लोग चाहते हैं कि लड़कियां नौकरी कर पैसे तो ला कर दें लेकिन घूमेफिरें नहीं. लड़कों से दोस्ती न करें, शादी पेरेंट्स की मर्जी से करें, सैक्स तो बिलकुल न करें और घर में गाय की तरह बंधी रहें. अब अगर धर्म और अदालत भी ऐसा ही कहने लगे हैं तो ये तो मुंह में दही जमा कर रखेंगे ही.
टीएमसी यानी तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा पर पैसे ले कर सवाल पूछने और अपना ईमेल का पासवर्ड कारोबारी हीरानंदानी को देने का आरोप लगा था. लोकसभा की संसदीय समिति ने महुआ मोइत्रा की सदस्यता रद्द कर दी.
महुआ मोइत्रा ने कहा कि ‘सरकार संसदीय समिति को हथियार बना कर विपक्ष को झुकने के लिए मजबूर कर रही है. उपहार और नकदी से ले कर किसी तरह की सुविधा लेने के सबूत के बिना केवल शिकायती शपथ पत्र के आधार पर उन्हें दोषी ठहराया गया. यह कानून और संविधान का मखौल उड़ाना है. समिति ने उन्हें झुकाने के लिए अपने ही तमाम नियम तोड़े हैं और उन को बिना सुबूत के सजा दी है.
तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा ‘भाजपा लोकतांत्रिक रूप से नहीं लड़ पा रही है इसलिए राजनीति प्रतिशोध लेती है. एक महिला विशेष कर युवा पीढ़ी की अगुवाई करने वाली नेता का जिस तरह से उत्पीड़न किया गया है वह लोकतंत्र की हत्या की गई है.
‘मैं उस की निंदा करती हूं और तृणमूल कांग्रेस पूरी तरह से महुआ मोइत्रा के साथ थी, है और रहेगी.’
असल में जिस समय महुआ मोइत्रा अपनी लड़ाई लड़ रही थी बारबार यह बात कहने का प्रयास किया जा रहा था कि तृणमूल कांग्रेस और उस की प्रमुख ममता बनर्जी महुआ के साथ नहीं है. लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चैधरी ने 2 घंटे में 400 से अधिक पन्नो की रिपोर्ट पर चर्चा पर सवाल उठाते हुए कहा कि नई संसद में एक महिला सांसद के खिलाफ ऐसा फैसला नहीं होना चाहिए. मामले की सुनवाई के लिए दोचार दिन की मोहलत देनी चाहिए.
संसद में यह सवाल भी उठा कि आचार समिति को किसी सांसद की सदस्यता खत्म करने जैसी सजा देने का अधिकार ही नहीं है.
पौराणिक कानून के सामने सब फेल
संसद में औरत और कानून की बात कही गई लेकिन जो सरकार पौराणिक कानून से चलती है वहां ऐसे तर्क कोई नहीं सुनता. विरोध की आवाज नक्कार खाने में तूती की आवाज बन कर रह जाती है. महाभारत जैसे तमाम पौराणिक ग्रंथों में इस तरह की तमाम घटनाएं मिल जाती है.
महाभारत में भरी सभा में द्रौपदी का अपमान हो या रामायण में सीता का निष्कासन औरत की बात को कभी सुना नहीं गया. सुपर्णखा के साथ जो हुआ इस तरह की घटनाओं से साफ था कि औरतों को अलगथलग कर दिया जाता था. समाज उन के साथ अछूतों का व्यवहार करने लगता था. उन की सफाई को कभी सुना ही नहीं जाता था. इस डर से औरतें सच का समाज के सामने कहने से डरती थी.
महाभारत में कुंती यह जानती थी कि कर्ण उन का बेटा है लेकिन उन्होंने कभी समाज के सामने इस बात को स्वीकार नहीं किया. जिस का पाप जीवन भी कर्ण को झेलना पड़ा. उसे हमेशा ही सूत पुत्र कह कर संबोधित किया गया. अछूत बना कर लोगों को समाज से काट दिया जाता था.
महाभारत में विधुर का महात्मा जरूर कहा जाता था लेकिन उन की बातों को कभी सम्मान नहीं दिया गया. एकलव्य का अगूंठा इसलिए कटवा लिया क्योंकि वह अछूत था. औरतों को एक तरह से समाज से अलगथलग कर उन का हुक्का पानी बंद कर दिया जाता था.
अंग्रेजी सेना के ब्राहमण राजपूत सिपाहियों का हाल
हुक्का बंद करने की शुरूआत पौराणिक काल में अलग तरह से थी. उन को समाज की मुख्यधारा से काट दिया जाता था. बाद में इस ने दूसरा रूप लिया. तब इस को हुक्का पानी बंद करने की सजा के रूप में दिया जाने लगा. इस का देश और समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता रहा है.
अंग्रेज जब भारत आए तो यहां जो मुगलों की सेना थी वह तोप, हाथी और घोड़ों से लड़ाई लड़ती थी. तोपों को इधर से उधर ले जाना कठिन काम होता था. उस में समय भी लगता था. उस समय तक अंग्रेजों ने बंदूक बनाने का काम शुरू कर दिया था.
बंदूक से छिप कर वार करना सरल था. पैदल लड़ने वाले सिपाहियों के हाथ में तलवार और भाला के मुकाबले यह बहुत कारगर हथियार बन गया था. सन 1800 के आसपास अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में राजपूतों और ब्राह्मणों को भर्ती करना शुरू किया. अंग्रेजों को लगा था कि यह लड़ाकू लोग हो सकते हैं. सेना में ब्राह्मणों को खास महत्व दिया गया. यहां भी पौराणिक कानून का हुक्का पानी बंद काम करने लगा.
बन्दूंक को चलाने के लिए सब से पहले उस में एक कारतूस भरा जाता था. इस में जो बारूद प्रयोग किया जाता था वह चर्बी के खोल में होता था. बंदूक में डालने से पहले मुुंह से नोच कर चर्बी को बाहर करना होता था तब कारतूस को बंदूक में डाल कर फायर करना होता था. यह बात पहले तो ब्राह्मणों को पता नहीं थी धीरेधीरे ब्राह्मण समाज में यह बात फैलने लगी.
इस प्रभाव यह हुआ कि जो ब्राह्मण सेना में नहीं थे उन लोगों ने सेना में काम करने वाले ब्राह्मणों का सामाजिक बहिष्कार करना शुरू कर दिया. उन का हुक्का पानी बंद कर दिया. इस के बाद ही अंग्रेजी सेना में ब्राह्मण सिपाहियों ने चर्बी वाले कारतूसों को चलाने से मना करना शुरू कर दिया.
यह हुक्का पानी बंद करने का प्रभाव आजादी के बाद भी समाज के अलगअलग वर्गों में प्रभावी रहा. देश की आजादी के बाद जब देश में संविधान लागू हुआ तो ऐसे कानून दरकिनार होने लगे. नए ऐसे कानून भी बने जिस में महिलाओं को अधिकार दिए जाने लगे.
यूपीए की सरकार के दौरान महिला हिंसा के नाम कानून बनेे. लड़कियों को जायदाद में हिस्सा देने के कानून बने.
‘सेंगोल’ बना राजशाही की निशानी
2014 में जब मोदी सरकार आई तो देश को पौराणिक कानून से चलाने का काम किया जाने लगा. नई संसद में जब ‘सेंगोल‘ को स्थापित किया गया उसी समय यह तय हो गया था कि न्याय अब पौराणिक कानून अब सनातन और संस्कार के हिसाब से चलेगा.
यही नहीं संविधान के साथ ही साथ जिस भारतीय दंड संहिता को अपनाया गया था अब उन कानूनों को भी नई तरह से अपनाए जाने की पहल की जा रही है.
नई संसद ने जिस तरह से महुआ मोइत्रा के खिलाफ फैसला आया वह इस बात पर मोहर लगा रहा है कि अब पौराणिक कानून के हिसाब से राज चलेगा. वाचाल महिलाओं को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. खासकर तब जब वह राजा या राजा के तोते पर सवाल उठाने का काम करेगी.
संसद की समिति ने जिस तरह से महुआ से पूछताछ में व्यक्तिगत सवाल किए वह भी आपत्तिजनक रहे हैं. महुआ ने इस को ले कर समिति का बायकौट भी किया था. उस घटना से ही अंदाजा लग गया था कि सजा देने के पीछे की मंशा क्या है ?
यह सजा कोई बड़ा महत्व नहीं रखती क्योंकि अब 2024 के लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है. इस तरह महिला विरोधी फैसले भाजपा के सामने जनता के बीच सवाल बन कर खड़े होंगे.
सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता अधिनियम की धारा 6 ए की वैधता को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को एक लंबाचौड़ा होमवर्क दे दिया है. कोर्ट ने कहा है कि केंद्र सरकार बताए कि उस ने –
– देश की सीमा को सुरक्षित बनाने के लिए क्याक्या कदम उठाए हैं और क्या कर रही है ?
– बौर्डर के कितने एरिया में तार का बाड़ किया गया है और इस के लिए कितना पैसा सरकार ने अब तक निवेश किया है?
– अधिनियम की धारा 6ए के तहत सिर्फ असम में ही आने वाले बांग्लादेशियों के लिए क्यों भारतीय नागरिकता का प्रावधान किया गया? पश्चिम बंगाल जैसे अन्य राज्यों को क्यों छोड़ दिया गया?
– क्या सरकार के पास ऐसा डेटा उपलब्ध है कि बांग्लादेश से असम आने वाले लोगों की तादाद पश्चिम बंगाल की अपेक्षा ज्यादा थी?
कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी पूछा है कि –
– असम में कितने फौरेन ट्रिब्यूनल है?
– ट्रिब्यूनल के सामने कितने केस पेंडिंग हैं?
– 1 जनवरी 1966 से पहले असम आने वाले कितने प्रवासियों को भारत की नागरिकता दी गई है ?
– जनवरी 1966-71 के बीच बांग्लादेश से असम आने वाले कितने प्रवासियों को भारत की नागरिकता मिल पाई?
– 25 मार्च 1971 के बाद कितने लोग बांग्लादेश से असम आये?
– जो लोग 1971 के बाद असम आए, उन्हें वापस भेजने के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए ?
नागरिकता अधिनियम की धारा-6ए के मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट का ज्यादा जोर यह जानने पर था कि बार बार एनआरसी और सीएए का डर जनता को दिखाने वाली केंद्र की बीजेपी सरकार ने आखिर देश की सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए क्या कदम उठाए हैं?
सीजेआई डीवाई चंद्रचूड ने कहा कि यदि हम धारा 6ए की पुष्टि करते हैं तो 1971 के बाद हम ने क्या किया है? पीठ के जस्टिस सुंदरेश ने कहा कि आप पश्चिम बंगाल जैसे अन्य राज्यों में आमद का प्रस्ताव कैसे देते हैं?
गौरतलब है कि धारा 6ए असम समझौते के दायरे में आने वाले प्रवासियों को नागरिकता देने से संबंधित है.
धारा 6ए के अनुसार, जो लोग 1 जनवरी, 1966 और 25 मार्च, 1971 के बीच भारत में आए हैं, और असम में रह रहे हैं, उन्हें खुद को नागरिक के रूप में पंजीकृत करने की अनुमति दी जाएगी. इस मामले के परिणाम का राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) सूची पर एक बड़ा असर पड़ेगा. क्योंकि इस धारा के सहारे ही केंद्र सरकार 1971 के बाद आने वाले बांग्लादेशी लोगों को डिटेंशन सेंटर में डालने या देश से बाहर खदेड़ने का मंसूबा पाले बैठी है.
मामले की सुनवाई करते हुए सीजेआई ने कहा कि हम कोई सत्तावादी देश नहीं हैं और हमें कानून के शासन के अनुसार, चलना होगा और यदि इस का पालन नहीं किया गया तो वास्तविक लोगों को बाहर निकाला जा सकता है.
सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए क्या कर रही है कि यह एक अभेद्य सीमा है और क्या कार्यकारी कदम उठाए गए हैं? क्या निवेश किया गया है और सीमा पर बाड़ लगाने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?
सीजेआई ने कहा कि “मैं जानता हूं कि आप एक जटिल मुद्दे से निपट रहे हैं, क्योंकि आप ऐसे लोगों से निपट रहे हैं जिन की खानपान की आदतें, पहनावा, शारीरिक विशेषताएं समान हैं.”
इस पर सौलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र का पक्ष रखते हुए कहा कि बिल्कुल यह समान है और केंद्र सभी कदम उठा रहा है ताकि कोई अवैध प्रवास ना हो.
सौलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने 6A के चलते प्रवासियों की बड़ी संख्या के चलते राज्य की जनसांख्यिकी संतुलन बिगड़ने, मूल निवासियों के रोजगार घटने, उन के संसाधनों पर कब्जा होने को ले कर जो चिंता जाहिर की है, वो सही हो सकती है पर 6 ए को असंवैधानिक करार देना इस का समाधान नहीं है. 6 ए का दायरा सीमित है. ये प्रावधान एक खास वक़्त में एक राज्य विशेष (असम) में एक देश विशेष (बांग्लादेश) से आने वाले प्रवासियों के लिए है.
सीजेआई ने कहा कि फिर हम जानना चाहते हैं कि पश्चिम बंगाल को नागरिकता देने से बाहर क्यों रखा गया? तर्क यह नहीं हो सकता कि असम में आंदोलन था. पश्चिम बंगाल को अकेला क्यों छोड़ दिया गया? अब पश्चिम बंगाल में क्या स्थिति है?
सीजेआई ने कहा कि सीमा की सुरक्षा के लिए केंद्र क्या कर रहा है? सीमा पर बाड़ लगाई जा रही है या नहीं और सीमा पर कितनी दूरी तक बाड़ लगाई गई है? गृह सचिव को भी इस पर अपना दिमाग लगाना चाहिए.
इस पर तुषार मेहता ने समय मांगते हुए कहा कि इन पहलुओं पर हम एक हलफनामा दायर करेंगे.
कोर्ट ने सरकार को हलफनामा दायर करने के लिए 2 दिन का समय दिया है. हालांकि कोर्ट में सरकार से सख्त और परेशान करने वाले सवाल इस पेचीदा मामले में पूछे, कोर्ट कोई क्रांतिकारी निर्णय देगी इस की आशा कम है क्योंकि हाल में कोर्ट ने कोई ऐसा निर्णय नहीं दिया है जिस से सरकार की अपनी मनमानी रुकी हो.
जिस तरह से हमारे देश में कई तरह के मौसम होते हैं उसी तरह हर मौसम के हिसाब से खानेपीने की चीजें भी उपलब्ध हैं. इन को मौसमी खानपान कहा जाता है. अगर मौसम के हिसाब से डाइट में सीजनल चीजों को शामिल करेंगे तो बौडी को उस मौसम से लड़ने के पोषक तत्त्व मिलेंगे जिस से बीमारी से बचाव होगा और बौडी मौसम के हिसाब से फिट रहेगी. हमारे देश में विंटर सीजन की शुरुआत अक्तूबरनवंबर से फरवरीमार्च तक रहती है. ऐसे समय कई लोग ऐसे होते कि जिन को सीजन बदलते समय दिककत हो जाती है. उन्हें अपनी डाइट और ऐक्सरसाइज का खास खयाल रखना चाहिए.
लखनऊ के स्किन और क्योर क्लीनिक की डाक्टर रुचि सिंह कहती हैं, ‘‘अगर हम मौसम के हिसाब से अपनी डाइट रखें तो न केवल हम बीमारियों से बचे रहेंगे बल्कि हमारी बौडी में ताकत और एनर्जी बनी रहेगी और वह बीमारियों से लड़ सकेगी.’’
कई लोग विंटर में नौनवेज फूड खाना पसंद करते हैं. नौनवेज से बौडी को आयरन और प्रोटीन भरपूर मात्रा में मिलते हैं जो बौडी के मेटाबौलिज्म को बढ़ा कर बीमारी से बचाने का काम करते हैं.
शरीर को गरम रखते हैं हौट ड्रिंक्स : ठंड भगाने के लिए हौट ड्रिंक्स पीना सभी उम्र के लोगों के लिए बेहद जरूरी होता है. इस को अगर बदलबदल कर सेवन करते हैं तो स्वाद भी बना रहता है और हर तरह की बौडी की जरूरत पूरी हो जाती है. विंटर की हौट ड्रिंक्स में चाय, कौफी, फ्लेवर्ड दूध, सूप, जूस और काढ़ा प्रमुख रूप से आते हैं.
घी का सेवन : विंटर सीजन में घी का प्रयोग सब से जरूरी होता है. इस का उपयोग दाल, सब्जियां, चपाती, दूध और पूरीपरांठा के साथ किया जा सकता है. घी के अलावा दही भी शरीर के तापमान को उच्च रखता है. यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूत करता है. यह जरूरी है कि आप व्यायाम भी करते रहें.
तुलसी और शहद का मिश्रण लाभकारी : विंटर में तुलसी और शहद के सेवन से इम्यूनिटी बूस्ट होती है. तुलसी और शहद के गुण बौडी को ठंड और बीमारियों से बचाते हैं. तुलसी के पत्ते शहद के साथ चबा सकते हैं. तुलसी के पत्तों को पानी में उबाल कर पी भी सकते हैं. लेकिन बीमार पड़ने पर इसे उपचार न मानें. यह खाने में स्वाद व रंगत के लिए अच्छा है.
पेट और सेहत दोनों के लिए लाभकारी बाजरे की रोटी : सर्दी में बाजरे की रोटी को डाइट में शामिल करना चाहिए. यह शरीर को गरम रखने में मदद करती है. इस में प्रोटीन, कैल्शियम, फाइबर और विटामिन बी भी पाए जाते हैं जो सर्दी में बौडी को फिट रखते हैं.
ठंड से बचाते ड्राईफ्रूट्स : विंटर में ड्राईफ्रूट्स का सेवन बौडी को पर्याप्त एनर्जी देने का काम करते हैं. ड्राईफ्रूट्स गरम होते हैं. इस से बौडी को गरमी और सर्दीजुकाम से बचाव होता है. ड्राईफ्रूट्स में बादाम, किशमिश, मूंगफली, काजू और अखरोट अंजीर, खजूर प्रमुख होते हैं.
लहसुन हर तरह से करें सेवन : लहसुन का सेवन सर्दी में करना सेहत के लिए ठीक रहता है. लहसुन को मसाले के साथ और खाने में कच्चा शामिल कर सकते हैं. लहसुन का सूप, चटनी या अचार भी खा सकते हैं. इस के अलावा लहसुन की 1-2 कली सुबह खाली पेट भी खा सकते हैं. लहसुन शरीर की इम्यूनिटी बढ़ाता है. लहसुन का प्रयोग करने से विंटर इन्फैक्शन से भी बचा जा सकता है.
गुड़ की मिठास देगी ताकत : गुड़ में तमाम पोषक तत्त्व होते हैं. ऐसे में गुड़ का सेवन सर्दी में ठंड से बचाव करता है. गुड़ की चाय, गुड़ के लड्डू आदि का सेवन लाभकारी है.
सूप स्वाद और सेहत का खजाना : विंटर में टमाटर सूप, ब्रोकली सूप, बीन्स सूप, वैजिटेबल सूप, प्याज सूप, चिकन सूप ठंड को भगाने का बेहतरीन उपाय हैं. सूप में चुटकीभर नमक, काली मिर्च, दालचीनी डाल कर स्वाद बढ़ाएं. सूप विंटर में बौडी को एनर्जी देने का काम करते हैं.
विंटर में हरी सब्जियां : विंटर सीजन में तरहतरह की हरी सब्जियां बौडी की इम्यूनिटी को बूस्ट करने का काम करती हैं. इन सब्जियों में पालक, मेथी, सरसों का साग, बथुआ, हरी मटर प्रमुख होती है.
इस तरह से अपने खानपान का ध्यान रखेंगे तो विंटर सीजन का आनंद ले सकेंगे.
सर्दी में घर को गरम रखने के क्याक्या जतन हम और आप नहीं करते. इस के बाद भी ठंड कहीं न कहीं से दाखिल हो ही आती है. लेकिन बहुत सारे उपाय एकसाथ अपनाए जाएं तो ठंड के प्रकोप से काफी हद तक छुटकारा पाया जा सकता है. आइए जानें वे उपाय जिन से घर को गरम रखा जा सकता है.
सवाल
मैं लड़कियों की इज्जत करता हूं. मेरी उम्र 28 साल की है. इकलौता हूं. शुरू से ही मातापिता ने ऐसे संस्कार दिए कि मैं लड़कियों से तहजीब से पेश आता हूं. उन की हरसंभव मदद करने की कोशिश करता हूं. मेरी सोच के चलते लाइफ में लड़कियां तो बहुत आईं लेकिन सोलमेट जैसी बात किसी में दिखी ही नहीं. अब कुछ महीने हुए एक लड़की की तरफ मैं आकर्षित हो रहा हूं लेकिन वही प्रौब्लम मेरे सामने आ रही है. वह मुझ से बातें करती है, फ्रैंक है. लेकिन कई बार उस के हावभाव से मुझे लगता है कि वह मुझ से प्यार के बजाय कुछ और चाहती है, जो मुझे हरगिज मंजूर नहीं. शादी से पहले फिजिकल रिलेशन मैं हरगिज नहीं बना सकता. मैं कुछ कन्फ्यूज हो रहा हूं या मुझे कुछ गलतफहमी हो रही है. उस का प्यार सच्चा है या लस्ट, कैसे जानूं?
जवाब
वैसे युवकों के सामने भी यह समस्या आती है. कोई लड़की उन्हें प्रेम की नजरों से देख रही है या वह कुछ और चाहती है. ऐसे में कुछ बातें हैं जिन पर गौर कर के आप पता लगा सकते हैं कि लड़की उस से प्यार चाहती है या उस के पीछे है लस्ट.
यदि वह लड़की बारबार आप से बात करने या आप के पास आने का बहाना ढूंढ़ती है तो मामला प्यार के बजाय लस्ट का हो सकता है. अगर वह लड़की आप से किसी दूसरी लड़की की बौडी या उस के किसी खास पार्ट के बारे में आप से खुल कर चर्चा करती है तो मुमकिन है कि वह आप को अंतरंग संबंध बनाने के लिए प्रेरित कर रही हो.
अगर वह आप को टच करते वक्त कुछ अजीब नजरों से देखे तो सम झ जाएं कि मामला लव का नहीं, हर टच का मीनिंग अलग होता है. गौर कीजिए कि वह लड़की आप का ध्यान अपने कुछ खास अंगों की ओर खींचने की कोशिश तो नहीं करती. जानबू झ कर अपने कपड़ों को बारबार संवारने की कोशिश तो नहीं करती तो सम झ जाइए कि वह फिजिकल रिलेशन बनाने में इंट्रैस्टेड है.
ऐसा देखा गया है कि मैदानी इलाकों में रहने वालों से हिमालय की वादियों में रहने वाले शेरपाओं के लंग्स ज्यादा मजबूत होते हैं. इन्हें एथलीट जीन के लिए जाना जाता है. ये अधिकतर नेपाल और तिब्बत के इलाकों में रहते हैं, पहाड़ों में ही ये बसते हैं. ये बहुत ऊंची जगहों पर जहां औक्सीजन की कमी होती है, वहां भी पहुंच जाते हैं.
एक अध्ययन में यह पाया गया है कि शेरपाओं के लंग्स की मजबूती नीचे रहने वालों से 30 प्रतिशत अधिक होती है. इस की वजह एक स्क्वायर सैंटीमीटर्स मसल्स में कोशिकाओं की अधिक संख्या का होना है. इस से उन के चैस्ट भी चौड़े होते हैं, जिस से लंग्स की कैपेसिटी और सरफेस एरिया बढ़ जाता है. इस के अलावा वे लंग्स से नियमित काम लेते हैं, जिस से इन की क्षमता बढ़ती जाती है. साथ ही, पहाडि़यों पर रहने वालों में हीमोग्लोबिन की मात्रा अधिक होती है, जिस से वे अधिक मात्रा में औक्सीजन ले सकते हैं. सो, उन के लंग्स मजबूत हो जाते हैं.
मजबूत जैनेटिक जींस
मुंबई के वोकहार्ड हौस्पिटल के चैस्ट फिजिशियन डा. कमलेश पांडे बताते हैं कि सालों से पहाड़ों पर रहने वाले के शरीर में कुछ एडौप्टेशन हो जाते हैं जो उन के जैनेटिक्स पर भी असर डालते हैं. उन के माइटोकौंड्रिया (कोशिकाओं में पाए जाने वाले माइटोकौंड्रिया को कोशिका का ऊर्जाघर या पावरहाऊस कहा जाता है, जो मां से संतान में स्थानांतरित होता है) कम औक्सीजन में भी अधिक काम कर लेते हैं. सैल्स को औक्सीजन की जरूरत कम होती है.
माउंटेन पर औक्सीजन का दबाव कम होता है, ऐसे में नौर्मल जमीन पर रहने वाले अगर पहाड़ पर जाते हैं तो उन्हें कम औक्सीजन लगने लगती है. उन के सैल्स को कम औक्सीजन मिलने की वजह से उन में सांस फूलने लगती है, लंग्स पर प्रैशर या पानी भर जाता है या फिर ब्रेन में भी सूजन होने का रिस्क रहता है. लेकिन सालों से वहां रहने वालों के शरीर की बनावट ऐसी होती है कि उन में औक्सीजन की मात्रा कम रहती है. उन के ब्लड में आरबीसी की मात्रा अधिक प्रोड्यूस होती है. उन की मसल्स में भी औक्सीजन की मात्रा कम लगती है. अर्थात, कम औक्सीजन में भी वे काम कर सकते हैं, जिसे एरोबिक मैकेनिज्म कहा जाता है. इस में औक्सीजन की खपत कम होती है.
इन लोगों में मसल्स या लंग्स की कोशिकाएं अधिक होती हैं, जिस से लंग्स का सरफेस एरिया बढ़ जाता है. नौर्मल लंग्स को भी स्प्रेड करने पर एक टैनिस कोर्ट जितना बड़ा सरफेस एरिया स्प्रेड होता है, जिस में औक्सीजन का इन्टेक और कार्बन डाइऔक्साइड का बाहर निकलना होता है. शेरपा और माउंटेनियर करने वाले की स्टडी में पता चला है कि उन के लंग्स की कैपिलरी सरफेस एरिया अधिक होता है. उन के आरबीसी का कंसंट्रेशन भी अधिक होता है.
उम्र के साथ घटती है लंग्स कैपेसिटी
डा. कमलेश कहते हैं कि लंग्स की कैपेसिटी उम्र और हाइट पर निर्भर करती है. अगर किसी की हाइट अच्छी है तो उस की लंग्स की कैपेसिटी अधिक होनी चाहिए. एक उम्र के बाद लंग्स की कैपेसिटी घटती जाती है. मसलन, 25 से 26 साल तक, जब तक व्यक्ति ग्रो करता है, लंग्स की कैपेसिटी बढ़ती जाती है, लेकिन एक उम्र के बाद उस की कैपेसिटी घटती जाती है. इसलिए व्यक्ति की उम्र और हाइट को ले कर एक वैल्यू निकाली जाती है, जिस में 30 साल के व्यक्ति की कैपेसिटी को देखने पर अगर वह प्रिडिक्टेड वैल्यू के 80 या 90 प्रतिशत तक निकलता है तो उसे नौर्मल समझ जाता है. इस में एक औसत निकाला जाता है, जो इंडियन और वैस्टर्न लोगों के लिए अलगअलग होता है.
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