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छंटती हुई काई : क्या निशात के ससुराल वाले दकियानूसी सोच छोड़ पाएं ? – भाग 3

3 साल पहले हनीफ ने ही मुझे मेरी बड़ी बेटी के लिए अपनी रिश्तेदारी का रिश्ता बतलाया था. लड़का रेलवे में असिस्टैंट ड्राइवर था. मेरी बेटी गणित में एमएससी कर रही थी. हनीफ के मारफत बेटी का फोटो और बायोडाटा वरपक्ष के पास पहुंच गया था. लड़के के अब्बा ने हनीफ के साथ 3-4 और दाढ़ी वालों को बुला रखा था.

मैं भी बेटी का पैगाम ले कर उन के घर पहुंचा. मन में हजारों प्रश्न उठ रहे थे. कैसा रिवाज है जिन की आपस में शादी होनी है उन की रायमशवरा या रजामंदी लेना भी अपनी शान के खिलाफ समझते हैं. बुजुर्गवार और माअशरे के ठेकेदार रिश्ता पूरी तरह से व्यवसायिकता की खोल में लिपटा रहता है. लड़के की पोस्ट कामकाजी दरजे के हिसाब से उस की बोली लगाई जाती है मंसूरी समाज में.

‘‘कितने की शादी करेंगे आप?’’ अप्रत्यक्ष रूप से एक बुजुर्गवार पूछ रहे थे कि कतने में खरीदेंगे आप लड़के को?

‘‘मैं रेलवे कर्मचारी हूं. बेटी की पढ़ाई में आमदनी का आधे से ज्यादा हिस्सा खर्च किया है. 2 बेटियां और हैं पढ़ने वाली,’’ मैं ने अपनी स्थिति बतलाई तो काले चारखाने वाला बड़ा रूमाल पीठ पर डाले हुए दाढ़ी वाले शख्स बीच में बात काटते हुए बोले, ‘‘वह सब छोङिए, आप यह बतलाइए कि पक्यात में कितना कैश देंगे आप? बाकी मिलनी, घरेलू सामान, बाराम के इंतजाम वगैरा में कितना खर्च करेंगे आप?’’

अभी मैं खुद को जवाब देने के लिए तैयार कर ही रहा था कि मोटेताजे और लुंगीकुरता पहने हुए अधेड़ व्यक्ति ने जुमाला उछाला, ‘‘लड़का रेलवे में है. लोग तो ₹20 लाख शादी के लिए देने को तैयार हैं. हमें पढ़ीलिखी लड़की चाहिए, इसलिए आप अपनी हैसियत बताइए?’’

जी चाहा जोर से चिल्ला कर कहूं कि लड़के को पढ़ालिखा कर विवाह की मंडी में ऊंची कीमत पर बेचने के लिए बेटा पैदा किया जाता है क्या? पर एक बेटी का बाप हूं, इसलिए बहुत कुछ सोच कर चुप रहना पड़ा.

हैसियत… क्या हैसियत है बेटी के बाप की. आसानी से जिब्ह होने वाले मुरगे से ज्यादा हैसियत नहीं है बेटे वालों की नजरों में. होश संभालने से ले कर अब तक यही तो देख रहा हूं मंसूरी समाज में.

‘‘रिटायरमैंट पर ₹30 लाख मिलेंगे. तीनों बेटियों की शादी में ₹10-10 लाख खर्च करने का सोचा है मैं ने,’’ शब्द गले में अटकने लगे. सरेआम अपने कपड़े उतरते से लगे मुझे.

‘‘₹10 लाख… क्या मजाक कर रहे हैं आप कामिल साहब…लड़के के लिए पूरे ₹5 लाख पक्यात में, सोनाचांदी, घरेलू सामान, बारात की बेहतरीन खातिरदारी और वरपक्ष के साथ मंगनी की रस्म में और बारातियों के लिए बेहतरीन तोहफे…कुल मिला
कर ₹25 लाख की शादी तो होनी ही चाहिए,’’ हनीफ मेरा दोस्त हो कर भी अपनी रिश्तेदारों की तरफदारी में बोल रहा था.

‘‘लेकिन मेरी हैसियत नहीं है उतना खर्च करने की,’’ छाती फटने लगी मेरी.

बेटी का बाप होना गुनाह है क्या? क्या उसे अपनी जिंदगीभर की मेहनत की कमाई दुल्हे की मुंहमांगी कीमत देेने के लिए इकट्ठी करनी चाहिए? अगर ऐसा न करें तो जिंदगीभर कुंआरी बेटी का मुरझाया चेहरा देखते रहें और फिर खुद अपनी गुरबत और पशेमानी के फंदे में लटक कर आत्महत्या कर लें.

‘‘माफ कीजिएगा, मैं इतना खर्च नहीं कर सकूंगा. लेकिन हां, मैं पूरे एतबार और एतमाद से कह सकता हूं कि मेरी बेटी इतनी काबिल, समझदार, सलीकेमंद है कि आप का घर बरकतों से भर जाएगा,’’ मैं ने दलीलें दीं तो दुबलेपतले आंखों मेें सुरमा लगाए दाढ़ी वाले ने बीड़ी सुलगाते हुए कहा,‘‘फिर तो ऐसी नेक लड़की के रहते हुए आप के घर में दौलत के खजाने खुल जाने चाहिए थे,’’ उन का निहायत नामाकूल जुमले का तंज तीर की तरह सीधा घुसा कलेजे में.

‘‘ससुराल को गुलशन बनाना, सासससुर की खिदमत करना, देवरननदों रिश्तेदारों का खयाल रखना यह तो हर लडक़ी का फर्ज होता है. इस में कौन सी अनोखी बात करेगी आप की बेटी,’’ ठहाका लगाते हुए बोला एक अधेड़ लाल दाढ़ी वाले ने. सुन कर बाकी सब भी मुसकराने लगे.

मेरे आक्रोश का ज्वालामुखी फटने ही वाला था कि मैं ने आखिरी उम्मीद से हनीफ की तरफ देखा. मुझ से निगाहें मिलते ही वह निगाहें चुरा कर दीवार पर लगे मक्कामदीना के तुगरे को देखने लगा. मानों कहना चाह रहा हो कि सौरी दोस्त.

मंसूरी समाज की बरसों की रवायत पर चल कर ही समाज में सिर उठा कर जी पाओगे, वरना या तो तुम्हें बिरादरी से बाहर कर दिया जाएगा या फिर जिंदगीभर कुंआरी बेटी के अरमान पूरे न कर पाने की कसक सीने में लिए तिलतिल धुलते हुए वक्त से पहले मर जाओगे.

मैं सलाम कर के मायूस कदम उठाते हुए उन के घर से निकल रहा था कि तभी एक कटीला जुमला बबूल की टहनी की तरह मेरी पीठ पर चुभा, ‘‘हैसियत कौड़ियों की नहीं, ख्वाब महलों के देखते हैं.’’

निराश व बोझिल कदमों से मैं घर तो पहुंच गया लेकिन उस तीखे जुमले का पैनापन आज तक दिमाग की नसों को जख्मी कर रखा है और मुझे रातभर सोने नहीं देता.

लालची, लोभी दूसरों की कमाई से अपना घर भरने का ख्वाब देखने वाले लडक़ों के मांबाप के प्रति मन वितृष्णा से भर गया. सहसा एक संकल्प बिजली की तरह दिमाग में कौंधा था. अब चाहे जिंदगीभर मेरी बेटियां कुंआरी बैठी रहें, मैं दहेज मांगने वालों से शादी नहीं करवाऊंगा. अपनी गाढ़ी कमाई से ऊंची तालिम, अच्छी तरबीयत दे कर उन्हें उन के पैरों पर खड़ा कर के बाहैसियत बनाऊंगा. अगर लडक़े वाले खुद रिश्ता ले कर आएंगे, जिन की आंखों में चांदी की पुतलियां न होंगी, दूसरों की दौलत देख उन की लार न टपकती होंगी, उसी लडक़े का ही रिश्ता मंजूर करूंगा.

हनीफ अब वक्तबेवक्त मुझ से फोन पर अपनी बेटी के मसले पर बात करता था. मैं संजीदगी से उस की परेशानी की गहराई को भीतर तक महसूस कर रहा था.

‘‘हनीफ भाई, मैं अपनी अहलिया के साथ कल मऊरानीपुर जा रहा हूं. आप के समधीसमधन को समझाबुझा कर मामले को सुलझाने की पूरी कोशिश करूंगा.’’

दूसरे दिन मैं हनीफ के समधी के साथ उन के मेहमानखाने में बैठा था. मेरी बीवी भी निशात की सास के साथ बैठी थी. इस से पहले कि मैं अपनी बात शुरू करता, निशात की सास बम की तरफ फट पड़ीं, ‘‘आप लोगों को उन लोगों ने अच्छी तरह कान भर कर भेजा होगा. हम ने बहू पर कोई जुल्म नहीं किया. उलटे उसी ने हमें खुदकशी करने और पुलिसथाने की धमकी दी तो इस से पहले कि कोई मुसीबत या फसाद हो हम ने
सहीसलामत बहू को उस के घर पहुंचा दिया. उस ने हमारे घर
को दोजख बना दिया था,’’ कह कर वे रोने लगीं.

‘‘अच्छाअच्छा, तुम खामोश रहो, मैं सचाई बतलाता हूं,’’ कह कर निशात के ससुर ने बहू की हरकतों का कच्चा चिट्ठा खोलना शुरू किया,”कामिल भाई, बहू रोज 10 बजे सो कर उठती. सुबह सभी का नाश्ता और टिफिन मेरी बीवी खुद तैयार कर करती हैं. बहू उठ कर बच्ची को संभालने लग जाती, कभीकभी दालचावल पका कर अपने कमरे में चली जाती. अपने कमरे की सफाई के लिए भी नौकरानी का इंतजार करती रहती. 3 बजे तक टीवी सीरियल देखने के बाद अपने कमरे में जा कर सो जाती, तो शाम को ही कमरे से निकलती. पूछने पर कहती कि एमए फाइनल की तैयारी कर रही हूं.

“सासससुर, रिश्तेदारों के सामने सामान ताले में बंद रखती है. पक्यात के ₹5 लाख और दहेज की कार का बेटे को हरदम ताना देती है. हमें जाहिल, गंवार और बेटों को निकम्मा और नाकारा कहती है. आप ही बताइए, क्या यह एक पढ़ीलिखी, तमीजदार खानदान की बेटी की तहजीब है? बहू से उम्मीद की जाती है कि वह घर में सुकून और आपसी मेलमिलाप बनाए रखेगी. पर हमारे घर में सब उलटा हो रहा है. बहू तो बेटे को कुछ समझती ही नहीं. रत्तीभर खबरें फोन पर अपने घर वालों को देती है. जवाब में उस की मां अलग रहने के हथकंड़े और तरीके सिखाती हैं. छोटीछोटी बातों में कभी मुुंह फुला लेती है, कभी खुदकशी के लिए दुपट्टा पंखे से बांधने लगती है.

“हमलोग थाना, कोर्टकचहरी के चक्करों से दूर ही रहते हैं, इसलिए हम खुद उसे उस के मायके छोड़ आए,’’ कहते हुए निशात के ससुर टोपी उतार कर अपने सिर पर हाथ फेरने लगे.

समधी की बातें सुन कर मैं ने यही निष्कर्ष निकाला की यह परिवार बहुत ही कट्टरपंथी और औरतों को सिर्फ मशीन और मुफ्त की नौकरानी से ज्यादा अहमियत नहीं देता है. दोनों पक्षों के आरोपोंप्रत्यारोपों के मकड़जाल में न उलझ कर हनीफ की बेटी को ससुराल वापस लाने का सार्थक प्रयास करना था, इसलिए मैं समधीजी से विनम्रता से बोला, ‘‘अजमेरी साहब, आप पसमांदा समाज समिति के सेक्रैटरी हैं, फिर भी आप ने बेटे की शादी में मुंहमांगा दहेज लिया. आप को तो बिना दहेज के बेटे की शादी कर के मंसूरी समाज में मिसाल कायम करना चाहिए था लेकिन आप ने यह महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी उठाने में कोताही की. आप ने मांगे हुए धन से अमीरी का आसमान छूने की कोशिश की. पढ़ीलिखी व रोशनखयाल लड़की यह सब कैसे बरदाश्त करेगी…”

‘‘और हां, बाजी,’’ मैं ने समधिन को सुनाते हुए ऊंची आवाज से बोला,”आप किसी की बेटी ब्याह कर लाई हैं या अपने घर में बिना तनख्वाह की कामवाली?’’

‘‘6-7 लोगों का खाना बनाने की जिम्मेदारी अकेली लड़की पर डाल कर आप खुद बैठक में बैठ कर मोहल्लापुराण पढ़ती रहती हैं. आप को चाहिए था कि आप खुद बहू को पहले घर के तौरतरीके सिखलातीं, बावर्चीखाने में उस की मदद करतीं. आप खुद पायरिया और आप का एक बेटा टीबी का मरीज है. एक बेटा चर्मरोग से ग्रस्त है. सब के लिए एक गिलास, एक कटोरा, एक ही थाली, एक ही तौलिया रख कर आप संक्रामक बीमारियों को घर के हर अफराद में फैलाने की नासमझी कर रही हैं. बहू की सही और जायज बातों को आप ने अपने तंग नजरिए
और अशिक्षा के कारण हरदम गलत साबित किया. आप ने बहू को कभी बेटी की नजरों से देखने की जहमत नहीं की. दूसरे घर में पलीबङी लड़की से उम्मीद करती हैं कि वह आप के घर की हर गलतसही बात से समझौता कर ले. आप सुन रही हैं न मेरी बात…

“हां, एक बात और, कोई भी बेटी का खुद्दार बाप अपनी बेटी पर जुल्म होते देख, उस की बेइज्जती होते देख, चुपचाप नहीं बैठेगा. अगर गुस्से में आ कर हनीफ भाई ने आप के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट कर दी तो दहेज उत्पीड़न के केस में पूरा घर बिना जमानत जेल में ठूंस दिया जाएगा. केस चलेगा, आपसी रंजिशें बढ़ेंगी और दोनों खानदानों की इज्जत खाक में मिल जाएगी और आप के दोनों कुंआरे बेटे, हनीफ की 2 कुंआरी बेटियां अनब्याही ही रह जाएंगी जिंदगीभर. 2 घरों की आपसी लड़ाई का आप की मासूम पोती के मुस्तकबिल पर कितना बुरा असर पड़ेगा, कभी सोचा है आप ने?’’

‘‘तो क्या हम बहू के सामने घुटने टेक दें,’’ समधिन गरजीं.

‘‘नहीं बाजी, आप पर कोई आंच नहीं आएगी. बस, आप अपना रवैया और तंग नजरिए की जगह बहू की बातों को रौशनखयाली से समझने की कोशिश कीजिए. बहू की छोटीछोटी गलतियों को तूल देने के बजाय उन गलतियों की वजह की जड़ तक पहुंच कर बहू को इतना खुला और अपनत्व वाला माहौल दें कि वह आप सब को अपना हमदर्द और हितैषी समझने लगें. बस, यही गुजारिश है,’’ मेरी आवाज 7 लोगों से भरे कमरे के सन्नाटे को चीरती रही.

‘‘अच्छा भाई साहब, बाजीजान… अब हमें इजाजत दीजिए. मैं आप के खानदान को नेक तौफिकों से नवाजने की कामना करता हूं.’’

मैं और मेरी बीवी अजमेरी भाई साहब के घर से निकले तो रास्ते में मोबाइल बज उठा, ‘‘अब्बू, जद्दा वाले रियाज भाई ने अभीअभी बड़ी बाजी से स्काईअप पर बात कर के शादी का प्रपोजल दिया है,’’ मैं ने शुक्रगुजार निगाहों से आसमान की तरफ देखा और स्कूटर की स्पीड बढ़ा दी.

5वें दिन हनीफ भाई का फोन आया, ‘‘कामिल भाई, कल निशात के ससुराल वाले उसे लेने आ रहे हैं. इस मौके पर बिरादरी के मोअज्जीज बुर्दगार लोगों, पसमांदा समाज के मैंबरान का खानापीना होगा. आप की फैमिली का मुझे बेसब्री से इंतजार रहेगा,’’ हनीफ की खुशी से उछाल मारती लहरों ने मेरे मन पर जमे अवसाद को हमेशाहमेशा के लिए खत्म कर दिया था.

वह नाजुक सी लड़की : क्या मंजरी और रोहन की शादी हो पाई ? – भाग 3

सीलन से भरी हुई कोठरी में, जगहजगह से प्लास्टर उखड़ा हुआ, जहां बरसों से सफेदी नहीं हुई थी.
जमीन पर गंदा फटा हुआ चादर बिछा कर सोना पड़ता था. कुछ महिलाओं ने उसे देखते ही अश्लील इशारे करने शुरू कर दिए थे. खाने में चावल के साथ कीड़े और दाल कम पानी ज्यादा… लेकिन आखिर पेट का सवाल था. कब तक भूखी रहती. अपने हाथों से कीड़े हटा कर चावल खा लेती. फिर तो वह दालचावल खुद से साफ करवाने की कोशिश करती थी. कभीकभी सब्जी के नाम पर कुछ मिल जाता तो कभी अचार भी मिल जाता.

लेकिन सुजाता ने अपनी नाजुक सी बहू को अकेला नहीं छोड़ा था. वे बस की लंबी यात्रा कर के उस से मिलने हर हफ्ते आ जातीं. वे अपने साथ खाना, नाश्ता ले कर आतीं, उसे प्यार से अपने हाथों से खिलातीं. उस के लिए धुले हुए कपड़े और दूसरी जरूरत की चीजें भी ले कर आतीं.

उन का प्यारदुलार मंजरी के लिए औक्सीजन का काम करता. उस को यहां से जल्दी छूटने का आश्वासन देतीं. उन से मिलने के बाद उस के मन में फिर से जीने का उत्साह जाग उठता था. वह जो कुछ भी सामान खाने का दे कर जातीं, सब के बीच बांट देती. जो खाने के लिए रोटी मिला करती उन्हीं को बचा कर रख लेती और सुबह पानी में भिगो कर खा लेती, यही उस का नाश्ता होता.

नारी निकेतन का उद्देश्य महिलाओं को व्यवसायिक प्रशिक्षण दे कर उन के पुनर्वास की व्यवस्था करना होता है. सिलाई, कढ़ाई और दूसरे गृहउद्योग का प्रशिक्षण देने की व्यवस्था कागजों में होती है. नियमकायदे केवल बनाए जाते हैं, लेकिन उन का अनुपालन कितना होता है, इस बात से कोई अनजान नहीं है.

वहां पर एक थी गीता दीदी, जो उस को बेटी की तरह प्यार करती थीं. वे बड़ी उम्र की थीं, उन्होंने अपने जेठ के सिर पर डंडा मार दिया था, क्योंकि वह उन की बेटी के साथ बलात्कार करना चाह रहा था. जेठ की मौत हो गई थी, इसलिए उन पर हत्या का मुकदमा चल रहा था.

एक दिन वे मंजरी से बोलीं,”देख मंजरी, सिलाई अच्छी तरह सीख लो, हो सकता है, इसी हुनर से तुम अपने पैरों पर खड़ी हो कर जीवन में आगे बढ़ सको.”

“दीदी, सिलाई सीखने के बहाने सब के कपड़े सिलवाती रहती हैं. दिनभर मशीन चलातेचलाते पैरों में दर्द भी हो जाता है. तब जा कर 2 वक्त का खाना मिलता है.”

“क्यों दीदी, बबिता को मैडम ब्यूटी पार्लर भी भेजती हैं. मैं तो इतनी सुंदर हूं. फिर भी मुझे बाहर नहीं भेजतीं. काश, मुझे बबिता की जिंदगी मिल जाए. रोज बाहर घूमना, सजधज कर रहना, अच्छे कपड़े पहनना. ब्यूटी पार्लर में बाल कटवाना, फेशियल करवाना, नेलपौलिश लगाना.”

“मंजरी चुप हो जाओ. तुम्हें बबिता का दर्द पता नहीं है. उसे रोज नई जगह भेजा जाता है, कभी दी का औफिस, तो कभी कोई होटल. हर दिन, हर घड़ी उसे काल में सजी हुई मिठाई की तरह भूखे लोगों के सामने परोस दिया जाता है. वह जल्लाद भला क्यों रहम करे, वह चाहे उन की बेटी की ही की उम्र की हो तो भी वह भूखे लोग उस के जिस्म के हर हिस्से को नोचते. हवस की भूख ऐसी रहती है कि आंसू और उस की चीखचीत्कार उस की आग की लौ पर घी डालने की तरह उन के वहशीपन को बढ़ाती जाती है,” यह सब बताते हुए उन का चेहरा आंसू से भीग उठा था. वह भी सिसकियां भर रही थी. वह सहम उठी थी.

एक दिन नारी निकेतन में जोरशोर से सफाई का कार्यक्रम चल रहा था. 1-2 कमरों में रंगरोगन भी करवाया गया था. उस दिन खाना भी अच्छा मिला था, पता लगा कि आज यहां का इंस्पैक्शन करने बड़े अधिकारी आ रहे हैं. कभी मैनेजर तो कभी अधिकारी आते रहते, कभीकभी नेता भी आते.

गीता दीदी ने उसे बताया था कि यहां से लड़कियों को रात में कहीं भेजा जाता है. फिर कई बार उस ने भी गौर किया था कि लड़कियों के गले पर, गालों पर कालेकाले निशान होते थे. वह छोटी थी, इसलिए कल्पना भी नहीं कर सकती कि ऐसा भी कुछ हो सकता है. उस के लिए ये बातें अविश्वसनीय और अकल्पनीय थीं.

एक बार कोई अधिकारी ने बाहर औफिस में बुला कर उस से पूछताछ की थी. वह तो सोच बैठी थी कि अब उस के मुकदमे की जल्द सुनवाई होने वाली है, लेकिन गीता दी ने बताया कि तुम्हारी सुंदरता पर किसी की नजर फिसली थी. वह तुम्हारी अस्मत के साथ खेलना चाहता था पर वार्डन मैडम ने मना कर दिया था कि इस के ऊपर किसी नेता की नजर है, इसलिए इसे नहीं भेज सकती.

अब वह डरी और सहमी हुर्ई रहा करती. सुजाता मांजी को भी आए 15 दिन से अधिक हो चुके थे. वह अपने जीवन से निराश हो कर अपने जीवन का अंत करने के विषय में सोचती रहती.

एक दिन सुजाता मांजी आईं, उन का चेहरा उतरा हुआ था. चिंता और परेशानी के भाव के कारण वह गुमसुम थी. उस के बहुत कुरेदने पर वे उस से लिपट कर रो पड़ी थीं, “बेटी मैं हार गई. तुम्हारे पापा तुम्हारा नकली बर्थ सर्टिफिकेट बनवा कर तुम्हें नाबालिग सिद्ध करने की कोशिश में लगे हुए हैं. मुझे पता लगा है कि वह तुम्हारे ननिहाल गए हुए हैं, वहां तुम्हारे मामा लोगों को तुम्हारी झूठीसच्ची बातें बता कर उन की सहानुभूति ले रहे हैं.”

जब दोनों काफी देर तक रो चुकीं तो मंजरी आवेश में बोली, “मांजी, यह समय रो कर हार मानने का नहीं है. आप किसी को नानी के पास भेजिए. मैं पत्र लिख कर दूंगी. मेरे पत्र से उन्हें सचाई का पता लगेगा.”

“बेटी, पुलिस हम लोगों की निगरानी कर रही है और तुम्हारी मम्मी के उस गुंडे के हाथ पुलिस बिकी हुई है. इसलिए बहुत गुपचुप तरीके से किसी के द्वारा तुम्हारा असली बर्थ सर्टिफिकेट मंगवाना पड़ेगा, जिसे कोर्ट में पेश करने के बाद तुम्हें बाहर निकालना संभव हो जाएगा.”

मंजरी के चाचा भी अपने भाईभाभी के विरोध में गवाही दे चुके थे. सुजाता के भाई जो दिल्ली में रहते थे, वह और चाचा राधेश्याम दोनों उस के ननिहाल गए और वहां उन्होंने सारा सच बताया, तब उन की आंखों के सामने से झूठ का आवरण हटा और उन्होंने झटपट उस का असली बर्थ सर्टिफिकेट नगरपालिका से निकलवा दिया.

कोर्ट की काररवाई तो मंथरगति से चल रही थी, पर सुजाता की अथक प्रयासों के कारण माधुरीजी द्वारा पेश किए गए फर्जी दस्तावेजों की पोल खुल गई थी. राधेश्यामजी की गवाही और सहयोग को भी कोर्ट ने स्वीकार किया.

2 वर्षों की नाटकीय पीड़ा को सहने के बाद उसे वहां से मुक्ति और आजादी की मिली थी. वह सुजाता, रोहन की ऋणी थी, उन के गले लग कर वह घंटों सिसकती रही थी, पर यह खुशी के आंसू थे.

बाहर आने के बाद उसे मालूम हुआ था कि मांजी का परिवार आर्थिक रूप से बरबाद हो चुका है. दुकान बंद हो चुकी है. सब कुछ जेल, कोर्टकचहरी और वकील के साथसाथ पुलिस की जेब गरम करने में उन की
भेंट चढ़ गए हैं. खेत गिरवी पर रखे हुए हैं. यहां तक कि खाने के लाले पड़ गए थे. लेकिन धन्य थीं सुजातामां जिन्होंने हार नहीं मानी और अपने बेटे के प्यार के लिए उस नाजुक सी लडक़ी को नर्क से निकाल कर ले ही आईं.

रोहन और मंजरी का स्वागत करने के लिए सुजाता घर पहुंच चुकी थीं. आसपास की महिलाएं ढोलक की थाप पर गीत गा रही थीं. साधारण सी गोटा लगी हुई लाल साड़ी, हाथों में कांच की चूडिय़ां, माथे पर बिंदिया… सौंदर्य की लालिमा से उस का चेहरा दमक रहा था.

21 वर्ष की छोटी सी उम्र में उस नाजुक सी लडक़ी ने अपने छोटे से जीवनकाल में क्याक्या नहीं देख लिया था, लेकिन वह टूटी नहीं और आखिर उस के सच्चे प्यार की जीत हुई.

सुजाता की दोनों बाहें फैली हुई थीं और उन के बीच उन के जिगर के टुकड़े इतने करीब थे, वे विश्वास नहीं कर पा रही थीं. आखिर में वह चरिप्रतीक्षित पल आ ही गया जब वह नाजुक सी लडक़ी अपने प्रिय की बांहों में खो गई थी.

कुछ ही सालों में मंजरी ने जो हुनर नारी निकेतन में सीखा था, उस के सहारे कपड़ों का काम शुरू कर दिया. सुजाता, सुरेश तो अनुभवी थे ही, रोहन ने भी रातदिन मेहनत की और जिंदगी को पटरी पर ला दिया.

वो जलता है मुझ से : विजय को तकलीफ क्यों होने लगी थी ?

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राममंदिर प्राणप्रतिष्ठा : सोशल मीडिया पर होती ऊलजलूल शास्त्रार्थ बहस

राममंदिर निर्माण को ले कर वैष्णवों और शैवों की तनातनी को ले कर हिंदुओं में जो असमंजस था उस की भ्रूणहत्या होने लगी है. इस की वजह यह है कि शंकराचार्य यह नहीं बता पा रहे कि किस धर्मग्रंथ में कहां यह लिखा है कि आधेअधूरे मंदिर की प्राणप्रतिष्ठा होना सनातन धर्म में वर्जित या निषेध बताया गया है. हालांकि इतना ही खरा सच यह भी है कि वैष्णव संत भी नहीं बता पा रहे कि आधेअधूरे मंदिर की प्राणप्रतिष्ठा फलां या अमुक धर्मग्रंथ के मुताबिक होना शास्त्र सम्मत है.

अब यह स्पष्ट हो चुका है कि चारों पीठों के शंकराचार्य 22 जनवरी को अयोध्या के जलसे में नहीं जाएंगे. क्यों नहीं जाएंगे, इस पर एक शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद साफ कर चुके हैं कि अयोध्या में शास्त्रीय विधि की उपेक्षा हो रही है. मंदिर अभी पूरा बना नहीं है और प्रतिष्ठा की जा रही है. हम धर्मशास्त्र के हिसाब से ही चलना चाहते हैं और उसी के अनुसार जनता को चलाना चाहते हैं. राम हैं, यह हमें धर्मशास्त्र ने ही बताया. जिस शास्त्र से हम ने राम को जाना उसी शास्त्र से हम प्राणप्रतिष्ठा भी जानते हैं.

इन शंकराचार्य का रोना यह भी है कि जब वे शास्त्रों और विधिविधान की बात करते हैं तो उन्हें झट से एंटी मोदी कह दिया जाता है. बात सही है क्योंकि देश का माहौल राममय से ज्यादा मोदीमय है. अब अनुभव तो यह है और सिद्धांत भी है कि जो राजा कह दे वही कानून हो जाता है और जो उस के पुरोहित कह दें वही विधान हो जाता है. एक पुरानी कहावत इस माहौल पर सटीक बैठती है कि सूर्य पूर्व दिशा से नहीं उगता बल्कि जिस दिशा से वह उदय होता है उसी दिशा को पूर्व मान लिया जाता है.

सोशल मीडिया पर खामोशी

राममंदिर को ले कर खासा जोश सोशल मीडिया पर है लेकिन उस में तर्क नहीं है, आस्था का सैलाब उमड़ा पड़ रहा है. अव्वल तो कोई भी शैव इस का विरोध नहीं कर रहा लेकिन वैष्णवों ने शंकराचार्यों की ही वैसी ही छिलाई शुरू कर दी है जैसी कि वे आदतन कांग्रेसियों, वामदलों, नक्सलियों, नास्तिकों, खालिस्तानियों, मुसलमानों और बुद्धिजीवियों की किया करते हैं.

वायरल हो रही एक पोस्ट में शंकराचार्यों को एक मजार पर दिखाया गया है. इस में लिखा है कि श्रीराम मंदिर प्राणप्रतिष्ठा से नाराज शंकराचार्य कभीकभी दरगाह पर चले जाते हैं क्योंकि वहां सब काम पूरे मुहूर्त के साथ सनातनी विधिविधान से होते हैं.

इस और ऐसी दर्जनों सैकड़ों पोस्टों पर शंकराचार्य के अनुयायी बेचारे खामोश रहने को मजबूर हैं क्योंकि उन्हें नहीं मालूम कि धर्म क्या कहता है. यही हाल वैष्णवों का है जिन्हें धर्म की एबीसीडी भी नहीं मालूम लेकिन आज उन का दबदबा है. इसलिए बहस में वे स्वभाविक तौर पर भारी पड़ रहे हैं.

शैव हों या वैष्णव, इन दोनों ही संप्रदायों में ब्राह्मणों का वर्चस्व है जो बमुश्किल 3 फीसदी देश की आबादी का हिस्सा हैं. 12 फीसदी गैरब्राह्मण सवर्णों को छोड़, बाकी 85 फीसदी तो दलित, आदिवासी, मुसलमान और ओबीसी वाले हैं जिन के लिए धर्म का मतलब वही होता है जो ये धर्माचार्य बताते रहते हैं.

इस का यह मतलब नहीं कि 15 फीसदी सवर्ण धर्म के सिद्धांत, दर्शन या विधिविधान समझते हैं. फर्क इतना है कि उन्हें कर्मकांड करने की और मंदिरों में जाने की मनाही नहीं है क्योंकि धर्म का धंधा चलता तो आखिर उन्हीं से है. अब मुट्ठीभर पैसे वाले पिछड़े और दलित भी इस जमात में शामिल हो गए हैं लेकिन इस से उन की सामाजिक हैसियत नहीं बदलने वाली. फिर भी दिल को बहलाने को खयाल बुरा नहीं वाली तर्ज पर वे मेहनत की कमाई पंडेपुजारियों पर उड़ा रहे हैं.

सोशल मीडिया लाख बकवास सही लेकिन हकीकत भी यही है कि इस पर कुछ सार्थक मुद्दों पर भी बात हो जाती थी जो राममंदिर के हल्ले के चलते बंद हो गई है. वैष्णवजन सुबह से ले कर रात तक इस पर रामधुन बजाते इस पर देश और समाज की तरह कब्जा जमा चुके हैं. ‘राम आएंगे तो अंगना सजाऊंगी…’ टाइप के भजन दिनरात बज और बजाए जा रहे हैं.

आम आदमी के हितों से सरोकार रखते मुद्दों का गायब होना तथाकथित लोकतंत्र के लिहाज से बेहद खतरनाक और नुकसानदेह है. मीडिया भी दिनरात ‘राम आएंगे…’ गा रहा है और घरों, खासतौर से सवर्णों के, में इस बात पर चर्चा नहीं हो रही कि फुटकर महंगाई इतनी और उतनी बढ़ गई है, बेरोजगारी की दर कितने फीसदी इस तिमाही में बढ़ी है. हां, लोगों को सोशल मीडिया पर लुढ़कते ज्ञान की पोस्टों से यह चिंता जरूर सता रही है कि मिट्टी का एक दीया 5 रुपए का मिल रहा है, इस से पहले कि वह 10 रुपए का हो जाए उसे खरीद लेना ही बुद्धिमानी की बात है.

मुद्दे की बात दीया और पूजापाठ रह जा रही है तो इस की वजह शैव और वैष्णवों की मिलीजुली साजिश है कि तुम इतने मंदिर हथिया लो, उतने पर हमारा कब्जा रहेगा. मकसद यह कि लोग पूजापाठी बने रहें, उस में ही हमारा तुम्हारा कल्याण है. बाकी सब तो मोह, माया और मिथ्या है. देश पिछड़ता है तो पिछड़े हमारी बला से, हमारा रसूख और दबदबा कायम रहना चाहिए. इस छद्म युद्ध में अहम दक्षिणा है जो राममंदिर से आए, श्याम मंदिर से आए या फिर शंकर या फिर देवी मंदिर से, कोई फर्क नहीं पड़ना.

धर्म पर बहस तो इस की पैदाइश के साथ ही होती रही है जिस से लोग हर दौर में भ्रमित रहे हैं. यह जाल धर्म के ठेकेदार ही एक नियमित अंतराल से बुनते हैं. प्राचीन भारत में धार्मिक बहसों को शास्त्रार्थ कहा जाता था. मध्यकाल का आचार्य शंकर और मंडन मिश्र का और कुमारिल भट्ट बनाम बौद्ध भिक्षुओं के बीच का शास्त्रार्थ आज भी मिसाल है. आर्य समाज के मुखिया दयानंद सरस्वती का तो जिक्र तक अब नहीं होता जिन्होंने कुछ सुधार कर बहुत सी विसंगतियां थोप दी थीं.

इन शास्त्रार्थ का नतीजा क्या निकला, यह सोशल मीडिया वीरों, जो आमजन ही होते हैं, को नहीं मालूम क्योंकि उन्हें धर्मग्रंथ कभी पढ़ने ही नहीं दिए गए. वे संस्कृत में थे जो आज भी द्विजों की भाषा है. बुद्ध और भीमराव आंबेडकर ने गहराई से इन्हें पढ़ा और ब्राह्मणों व ब्राह्मणत्व के चिथड़े उड़ा कर रख दिए.

अब ये दोनों ही आज राम, कृष्ण और शंकर से कम नहीं पूजे जाते. इस साजिश को सोशल मीडिया पर कोई उजागर नहीं करता और जो आधेअधूरे ज्ञान व जानकारियों की बिना पर ही सही तर्क करते हैं उन्हें ‘हो हो’ कर धकिया दिया जाता है. इस मानसिकता के ताजे शिकार बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर, सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य और ताजा उदाहरण बिहार के आरजेडी विधायक फ़तेह बहादुर का है जो भाजपा और कांग्रेस दोनों पर ही अंधविश्वास फ़ैलाने का आरोप लगाते हैं.

उन की इस दलील को खारिज नहीं किया जा सकता कि जो लोग पत्थर में प्राण डालने की बात कर रहे हैं वो देश के लिए बहुत कारगर साबित होंगे. इन्हें देश की सीमा पर सुरक्षा बलों के साथ और देश के सभी अस्पतालों में तैनात कर देना चाहिए जिस से कि वहां मरने वालों में ये प्राण डाल सकें.

बीजेपी के शोरशराबे के बावजूद सोशल मीडिया पर विपक्षी पकड़ मजबूत है

राजनेताओं ने हमेशा से मतदाताओं से संवाद करने के लिए मीडिया का इस्तेमाल किया है. पहले अखबार, पत्रिकाओं, टीवी चैनलों और रेडियो के माध्यम से वे जनता तक अपनी पहुंच बनाते थे, लेकिन अब फेसबुक, व्हाट्सऐप, यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म ने उन की चाहत को उड़ान दी और इन माध्यमों से उन्हें अपनी बात हवा की तेजी से फैलाने का अवसर हाथ लगा.

सोशल मीडिया को जो चीज़ विशिष्ट बनाती है वह है उस का पैमाना, उस की गति और वह न्यूनतम लागत जिस का लाभ उठाते हुए नेता सोशल मीडिया के ज़रिए अपने मन की बात दुनियाभर में फैला सकते हैं. मौजूदा दौर की डिजिटल क्रांति के बीच ट्विटर और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफौर्म दुनिया के कई हिस्सों में राजनीतिक विमर्श की प्रकृति को स्थायी रूप से बदल रहे हैं. दुनियाभर में राजनीतिक लोग, बड़े निकायों की तरह, बड़ी आबादी तक पहुंचने के लिए नियमित रूप से इन माध्यमों का उपयोग कर रहे हैं.

भारतीय राजनीति में भी सोशल मीडिया बेहद अहम भूमिका निभा रहा है. आज सभी पार्टियों और नेताओं के सोशल मीडिया हैंडल हैं और वे लोगों के साथ निरंतर संपर्क बना कर रखते हैं. देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से ले कर गांव के प्रधान तक सोशल मीडिया पर ऐक्टिव है. पार्षदों के, विधायकों के, सांसदों के पास अपनेअपने मीडिया सैल हैं. उन में सोशल मीडिया प्लेटफौर्म की जानकारी रखने वालों की बड़ी टीम काम करती है. उस टीम का काम होता है दिनभर नेताजी से जुड़े कामों और बातों पर ट्वीट बना बना कर पोस्ट करना, उन को पैसे दे कर लाइक और रीट्वीट करवाना. ये रोज के अखबारों में पार्टी या उन के नेता से जुड़ी खबर छपने पर उस की कटिंग या फोटो सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं और व्यूअर्स की संख्या बढ़ाने के लिए तमाम हथकंडे अपनाते हैं. इस तरह की मीडिया टीम पर सारे नेता हर महीने लाखों रुपए खर्च करते हैं. कुछ प्राइवेट कंपनियां भी नेताओं के लिए यह काम करती हैं. सोशल मीडिया के बिना आज के वक्त में राजनीति अधूरी है.

ये प्रोफैशनल्स कोई और नहीं, बल्कि बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां हैं जो नेताओं की ‘सोशल’ छवि को दुनिया के सामने प्रस्तुत करती हैं. ये कंपनियां विभिन्न पैकेजों के आधार पर अपनी सेवाएं दे रही हैं, मसलन यदि नेताजी को मात्र सोशल मीडिया अकाउंट्स पर पोस्ट डलवानी हैं तो उस की कीमत एक लाख रुपए है. यदि दोतीन लोगों की टीम नेताजी की छवि सुधारने में लगाई जाती है तो पैकेज 3 से 5 लाख रुपए का हो जाता है. सब से बड़ा पैकेज 5 से 8 लाख रुपए का है जिस में नेताजी के साथ औडियोवीडियो प्रोफैशनल्स की 3 से 4 लोगों की टीम चलती है जिस में उन के वीडियोज लाइवस्ट्रीम किए जाते हैं.

साथ ही, कई कंपनियां नेताजी के भाषण भी लिख रही हैं जिस से उन की सोशल मीडिया रीच बढ़े. यह सारी कवायद इसलिए है ताकि नेताजी की छवि और उन का स्वरूप विस्तृत लगे. भाजपा से ले कर कांग्रेस की आईटी सैल में अलगअलग टीमें बनी हुई हैं जो प्रत्याशियों के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर नजर रख रही हैं. जिस की जितनी रीच, उस को चुनावी टिकट मिलने की संम्भावना उतनी ही अधिक बन रही है.

मध्य प्रदेश में कांग्रेस मीडिया सैल के अनुसार, पार्टी के 70 हजार से अधिक व्हाट्सऐप समूह हैं जिन के माध्यम से 90 लाख लोगों तक पार्टी अपना एजेंडा एक क्लिक के माध्यम से पहुंचाती है. विधानसभा चुनाव के दौरान बूथ स्तर पर 60 हजार से अधिक मतदान केंद्रों पर कोऔर्डिनेटर बनाए गए जिन्होंने सोशल मीडिया के जरिए जनता तक अपनी बात पहुंचाई.

अयोध्या में रामलला के मंदिर निर्माण का शोर सोशल मीडिया पर आजकल खूब है. लोकसभा चुनाव सिर पर है, इसलिए रामलला को राजनीतिक हथियार बना कर बीजेपी सोशल मीडिया पर अपने महिमामंडल में जुटी है. बावजूद इस के, विपक्षी पार्टियों की आवाज भी खूब गूंज रही है. यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की सोशल मीडिया पर फैनफौलोइंग लगातार बढ़ रही है, तो अखिलेश यादव भी पीछे नहीं हैं. वहीं, अगर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विपक्षी नेता राहुल गांधी की बात करें तो दोनों ही ट्विटर पर काफी ऐक्टिव हैं. ट्विटर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फौलोअर्स की संख्या अगर 90 मिलियन (9 करोड़) है तो सत्ता में न होते हुए भी राहुल गांधी के 22.6 मिलियन यानी 2.25 करोड़ फौलोअर्स हैं. मोदी के फौलोअर्स की संख्या भले ज़्यादा हो मगर मोदी के मुकाबले राहुल दोगुने लाइक (Like) और रीट्वीट (Retweet) हासिल कर रहे हैं. ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के बाद से राहुल गांधी के फौलोअर्स की संख्या काफी तेजी से बढ़ी है. वहीं, प्रधानमंत्री के फौलोअर्स बढ़ने की गति कम हुई है.

सत्ता का लालच : मिलिंद देवड़ा ने कांग्रेस छोड़ी

पूर्व केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा ने कांग्रेस का दामन छोड़ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना जौइन कर ली. उन को लगता है कि शिंदे सरकार में उन की अच्छी पूछ होगी और कोई बड़ा पद उन को औफर होगा. ज्योतिरादित्य सिंधिया, आरपीएन सिंह, अनिल एंटनी, हार्दिक पटेल जैसे कई युवा नेता जो कभी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की युवा ब्रिगेड का हिस्सा हुआ करते थे, वे भी कांग्रेस से यही सोच कर अलग हुए कि अन्य पार्टियां और बीजेपी उन को सिरआंखों पर बिठाएगी, लेकिन एकाध को छोड़ किसी की भी ऊंची महत्त्वाकांक्षा परवान नहीं चढ़ी. कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आजाद जैसे लोग तो कांग्रेस छोड़ कर न घर के रहे न घाट के. हिमंता बिस्वा शर्मा जरूर असम का मुख्यमंत्री पद संभाल रहे हैं.

दरअसल, युवा नेताओं में जल्दीजल्दी ऊंची कुरसी पा लेने की छटपटाहट है. पार्टी कार्यकर्ता की तरह जमीन से जुड़े रह कर जनसेवा का भाव मन में है नहीं. राहुल गांधी जब आम आदमी के बीच आम आदमी की ही तरह उठतेबैठते हैं, उन के साथ पत्तल में खाना खा लेते हैं या उन के झोंपड़े में रात गुजारने को तैयार हो जाते हैं, तो राजघरानों से आए इन युवा नेताओं को यह बड़ा अनकंफर्टेबल लगता है. वे न तो आम आदमी से जुड़ पाते हैं, न उन के साथ जमीन पर बैठ पाते हैं. ऐसे में बड़ा पद पाने की लालसा में अपना घर छोड़ कर दूसरे के घर जा कर बसने से भी इन को कुछ ख़ास फायदा मिलता नहीं है.

बीजेपी में अनेक बड़े नेता ऐसे हैं जो कभी पार्टी कार्यालयों और आयोजनों में दरियां बिछाने का काम करते थे. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि मैं दरी बिछाने के काम से आगे बढ़ा और देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचा. मोदी के अलावा बीजेपी में अनेक नेता हैं जो कार्यकर्ता के तौर पर बरसों पार्टी का काम करते रहे.

बूथ स्तर पर, मंडल स्तर पर, जिला और प्रदेश स्तर पर सालोंसाल काम करने के बाद आज वे बड़े पदों तक पहुंचे हैं, तो बड़ीबड़ी महत्त्वाकांक्षाएं मन में पाल कर कांग्रेस छोड़ बीजेपी में आने वाले इन नेताओं के प्रति उन की दृष्टि क्या होगी, यह समझना मुश्किल नहीं है. शुरूशुरू में भले कांग्रेस को कमजोर करने की नीयत से ऐसे नेताओं का स्वागत भाजपा अपने घर में जोरशोर से करती दिखे, मगर आगे चल कर इन नेताओं का क्या हश्र होगा, यह देखना भी दिलचस्प रहेगा.

जिन के बापदादा कांग्रेस में रहे, जिन्होंने कांग्रेस से अपना राजनीतिक कैरियर शुरू किया, जब वे उसी के वफादार न हुए और उस की विचारधारा को ही आत्मसात न कर पाए, तो वे किसी दूसरी पार्टी के वफादार हो कर उस की विचारधारा पर चलने लगेंगे, ऐसा कैसे संभव है? यह तो उन की लालची मानसिकता, जल्दीजल्दी सबकुछ पा लेने की हवस है जो बेपेंदे के लोटे की तरह वे इधर से उधर लुढ़कते रहते हैं.

आज राहुल गांधी के साथ पुराने युवा नेताओं में से केवल सचिन पायलट ही बचे हैं. जब राहुल गांधी ने 2004 में अपनी चुनावी राजनीति शुरू की, तो वे ‘बाबा ब्रिगेड’ कहलाने वाले लोगों से घिरे हुए थे. मिलिंद देवड़ा से पहले कपिल सिब्बल, गुलाम नबी आज़ाद, अश्विनी कुमार, हिमंता बिस्व शर्मा, आरपीएन सिंह, अनिल एंटनी, हार्दिक पटेल और ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोड़ चुके हैं.

मिलिंद देवड़ा का परिवार पिछले 55 सालों से कांग्रेस के साथ था. उन के पिता मुरली देवड़ा गांधी परिवार के बहुत करीबी थे. कांग्रेस की सरकार में मुरली देवड़ा पैट्रोलियम मंत्री थे. उन के बाद कांग्रेस ने परंपरागत सीट साउथ मुंबई उन्हीं के बेटे मिलिंद देवड़ा को दी. यहां से वे 2 बार जीत दर्ज कर लोकसभा पहुंचे.

हाल ही में कांग्रेस के संगठन फेरबदल में मिलिंद देवड़ा को संयुक्त कोषाध्यक्ष भी बनाया गया था. वे राहुल गांधी के विदेशी कार्यक्रमों से भी करीब से जुड़े रहे हैं और भारत जोड़ो यात्रा में भी साथ रहे. मगर जरा सी लालच के चलते बरसों पुराना रिश्ता तोड़ कर वे शिंदे गुट में शामिल हो गए. सीएम एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने आगामी लोकसभा चुनाव में साउथ मुंबई की सीट देवड़ा को देने का वादा किया है. देवड़ा के इस कदम पर संजय राउत चुटकी लेते हुए कहते हैं, ‘विचार-विचारधारा अब कुछ नहीं रहा है, सब सत्ता की राजनीति है, खोके की राजनीति है और कुछ नहीं.’

मिलिंद देवड़ा से पहले टीम राहुल का स्तंभ माने जाने वाले कई नेता कांग्रेस से किनारा कर चुके हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने समर्थक विधायकों के साथ 2020 में पार्टी छोड़ दी थी जिस के बाद 15 महीने पुरानी कमलनाथ सरकार गिर गई थी. सिंधिया केंद्र सरकार में मंत्री हैं. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली केंद्र की यूपीए सरकार में मंत्री रहे जितिन प्रसाद 2021 में कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल हो गए थे. जितिन प्रसाद यूपी की योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं. पूर्व केंद्रीय मंत्री आरपीएन सिंह भी 2022 के यूपी चुनाव से पहले हाथ का साथ छोड़ बीजेपी में चले गए थे.

अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की प्रमुख रहीं सुष्मिता देव टीएमसी, जयवीर शेरगिल बीजेपी, प्रियंका चतुर्वेदी शिवसेना यूबीटी में जा चुकी हैं. गुजरात कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रहे हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर, पूर्व केंद्रीय मंत्री ए के एंटनी के पुत्र अनिल एंटनी और असम कांग्रेस के महासचिव रहे अपूर्व भट्टाचार्य भी पंजा निशान वाली पार्टी छोड़ कर दूसरे दल में जा चुके हैं.

कांग्रेस छोड़ कर जाने वाले नेताओं की फेहरिस्त में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा जैसे दिग्गज और वरिष्ठ नेताओं के भी नाम हैं. टीम राहुल की बात करें तो अब सचिन पायलट जैसे चुनिंदा नेता ही पार्टी में बने हुए हैं.

कांग्रेस छोड़ने वाले नेताओं का एक आरोप कौमन होता है- मिस कम्युनिकेशन या गांधी परिवार के साथ कम्युनिकेशन गैप. कोई मिलने के लिए समय नहीं मिल पाने की शिकायत करता है तो कोई कुछ और वजहें गिनाता है. सब के हमलों का केंद्र राहुल गांधी और गांधी परिवार ही होता है. एक आरोप यह भी कि कांग्रेस में युवा नेताओं को भविष्य का रोडमैप नहीं नजर आ रहा और इसलिए युवा नेता पार्टी छोड़ जा रहे हैं. जबकि सचाई यह है कि पद की लालसा, सत्ता की चाहत इन्हें विश्वासघात की तरफ धकेलती है.

खैर, जो अपनों का न हुआ वो गैरों का क्या होगा? अभी नएनए मेहमान हैं तो आवभगत हो रही है, कुछ समय बाद जब नए घर की बालकनी में भी जगह नहीं मिलेगी तब पुराने घर की याद सताएगी.

राजनीति पर सोशल मीडिया का प्रभाव, कितना असरकारक

UP congress Leaders reached Ram Mandir : अयोध्या में 15 जनवरी को उत्तर प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडेय ने प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के साथ अयोध्या में मंदिर दर्शन और सरयू स्नान किया. कांग्रेस के प्रदेश नेताओं ने यह दिखाने की कोशिश की कि उन पर राम के विरोध का आरोप ठीक नहीं है. वे राजनीति में धर्म के इस्तेमाल का विरोध करते हैं. सोशल मीडिया पर इस के तमाम फोटो पोस्ट होने लगे. सोशल मीडिया पर अयोध्या की पोस्ट में कांग्रेस ने कब्जा कर लिया. यह बात कांग्रेस के विरोधियों को अच्छी नहीं लगी.

कुछ ही देर में एक दूसरा वीडियो आ गया. इस वीडियो में कुछ गुमनाम जैसे दिखने वाले चेहरे कांग्रेस के झंडे को खींच रहे हैं. इस वीडियो में यह दिखाने की कोशिश की गई कि अयोध्या जाने वाले कांग्रेस के नेताओं का विरोध हुआ. यह छोटा सा वीडियो कितना सच है या झूठ, यह किसी ने नहीं समझा. विरोध करने वालों को कोई नहीं पहचान पा रहा था. जिस का विरोध हो रहा, उस को कोई नहीं पहचान पा रहा. सोशल मीडिया पर यह भी वायरल होने लगा. कांग्रेसियों के अयोध्या दर्शन कार्यक्रम पर यह छोटा सा वीडियो प्रभाव डालने लगा.

जमीनी मुद्दे खत्म नहीं होते

यह उदाहरण भर है. इस तरह की तमाम घटनाएं होती हैं जहां पर सोशल मीडिया का झूठ भी सच की तरह दौड़ता है. सोशल मीडिया में लोगों को लगता है कि सच यही है. जबकि सही मामले में इस तरह की घटनाएं जमीनी स्तर पर प्रभाव नहीं डालती हैं. आज राजनीति पर सोशल मीडिया का प्रभाव तेजी से बढ़ा है. यही वजह है कि आम लोगों के मुद्दे बहस से बाहर हो गए हैं. बहस से बाहर होने के बाद भी आम लोगों के मुद्दे हकीकत में मौजूद हैं और ये चुनाव पर असर डालते हैं. सोशल मीडिया का प्रभाव केवल उतने लोगों तक होता है जो सक्रिय होते हैं. सोशल मीडिया का एक बड़ा वर्ग वहां दिखता भले है पर वह सक्रिय नहीं है.

आंकड़े बताते हैं कि 80 करोड़ लोग ऐसे हैं जो इंटरनैट का प्रयोग करते हैं. इन में से आधे यानी 50 करोड़ के आसपास ऐसे लोग हैं जो सोशल मीडिया का प्रयोग करते हैं. जो लोग सोशल मीडिया का प्रयोग करते हैं वे 24 घंटे में औसतन 2 से ढाई घंटे प्रतिदिन करते हैं. यानी वे रोज 20 घंटे बिना सोशल मीडिया के गुजारते हैं. इन में से 8 घंटे सोने के निकाल दें तो 12 घंटे वे सोशल मीडिया से दूर अपने काम करते हैं. ये लोग जमीनी सच के हिसाब से अपने फैसले करते हैं.

हर प्लेटफौर्म की अलग पहचान है

अपनी दिनचर्या के इस दौरान वे जीवन के सच का सामना करते हैं, वे रोजमर्रा के संघर्ष कर रहे होते हैं. ऐेसे में उन को जमीनी मुद्दों का सच पता होता है. वे सोशल मीडिया के प्रभाव में नहीं आते. सोशल मीडिया के 5 प्रमुख प्लेटफौर्म हैं- फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स (जो पहले ट्विटर था), यूट्यूब और व्हाट्सऐप. राजनीति की बातें सब से अधिक एक्स पर होती हैं. उस के बाद व्हाट्सऐप और यूट्यूब के नंबर आते हैं.

इंस्टाग्राम और यूट्यूब मनोरंजन के सब से बड़ा साधन हैं. फेसबुक का प्रयोग लोग अपनी छवि को चमकाने के लिए भी करते हैं.

सोशल मीडिया पर वह सब से प्रभावी माना जाता है जिस के फौलोअर्स अधिक होते हैं. आंकड़े बताते हैं कि जितने फौलोअर्स होते हैं उन में केवल 10 से 20 फीसदी ऐक्टिव हों तो सब से अच्छा माना जाता है. इस से यह पता चलता है कि फौलोअर्स की आभासी दुनिया होती है. यह सच नहीं होती. सोशल मीडिया में तमाम ऐसे इनफलुएंसर होते हैं जिन के फौलोअर्स तो लाखों में होते हैं पर आसपास के लोग उन्हें नहीं पहचानते. फौलोअर्स की संख्या का जो सच है, वह भी मार्केटिंग का जाल है. यहां पैसे खर्च कर संख्या को बढ़ाया जाता है.

ताजा उदाहरण विवेक बिंद्रा और संदीप माहेश्वरी का है. सोशल मीडिया पर दोनों के करोड़ों फौलोअर्स हैं. दोनों के बीच विवाद हुआ तो इन के साथ मुठ्ठीभर लोग भी खड़े नहीं हुए. विवेक बिंद्रा का अपनी पत्नी से विवाद हुआ, झगड़े का वीडियो वायरल हुआ तो फौलोअर्स ही विरोध में खड़े हो गए. सोशल मीडिया जीवन ही नहीं, समाज का भी सच नहीं है. यह तर्कशक्ति की जगह कट/पेस्ट और फौरवर्ड पर चलता है. यही वजह है कि जो फौलोअर्स दिखते हैं वे असरदार नहीं होते.

खत्म हो रही जमीनी राजनीति

तमाम ऐसे नेता हैं जो सोशल मीडिया पर तो खूब चमकते हैं लेकिन असल में उन के समर्थक बेहद कम होते हैं. गोरखपुर में समाजवादी पार्टी की नेता हैं काजल निषाद. पार्टी ने 2022 के विधानसभा चुनाव में उन के फौलोअर्स को देखते टिकट दे दिया. वे टीवी सीरियल में काम करती थीं. कैंपियरगंज से विधानसभा का चुनाव हार गईं. हाल के कुछ चुनावों में ऐसे नेताओं को खूब टिकट मिले जो सोशल मीडिया पर बहुत पहचाने जाते थे. ये लोग चुनाव हार गए. चुनाव में जीत के लिए सोशल मीडिया पर ऐक्टिव चेहरों को महत्त्व मिलता है. इस के साथ ही यह जरूरी है कि वह सोशल मीडिया से अधिक जमीन पर सक्रिय हो.

समाजवादी पार्टी के नेता और संस्थापक मुलायम सिंह यादव कहते थे, ‘अगर नेता बनना है तो रोज कम से कम 2 हजार नए लोगों से व्यक्तिगत मिलो. इस से जानपहचान बनेगी. लोग भरोसा करेंगे, वोट देंगे.’

जो लोग यह समझते हैं कि केवल सोशल मीडिया पर फौलोअर्स बढ़ाने से जीत मिलेगी, वे सही नहीं सोच सकते. सोशल मीडिया राजनीति का एक जरूरी प्रोफाइल भर है. केवल सोशल मीडिया के प्रभाव से जीत नहीं मिलती. फौलोअर्स वोटर नहीं होते. इस फर्क को समझना पड़ेगा. आज जो फौलोअर्स हैं वही कल एक गलत कदम पर ट्रोल करने से नहीं चूकते हैं.

बेमानी है फौलोअर्स की बहस

सोशल मीडिया की ताकत यह है कि कम से कम समय में यह आप की बात को आगे पहुंचा सकता है. इस के साथ ही इस का दूसरा सच यह है कि नैगेटिव बातों का प्रचार अधिक होता है. पौजिटिव बातों को लोग आगे नहीं बढ़ाते. सोशल मीडिया पर सब से अधिक किन विषयों को लोग पंसद करते हैं, इन में सब से पहला विषय सैक्स है. दूसरे नंबर पर मनोरंजन फिल्म और गाने आते हैं. तीसरे नंबर पर धर्म की बातें आती हैं.

चौथे नंबर पर रोजगार और कैरियर को लोग पसंद करते हैं. 5वें नंबर पर अपराध और उस के बाद राजनीति का नंबर आता है. सैक्स के विषय को देखें तो पोर्नस्टार सनी लियोनी को सब से अधिक सर्च किया जाता है. इस के बाद भी वे फिल्मों में नहीं चलीं. सोचिए, क्या सनी लियोनी चुनाव जीत सकती हैं? जवाब है, नहीं.

फौलोअर्स और वोटर में फर्क होता है. देश के 2 बड़े नेताओं नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी की तुलना भी उन के सोशल मीडिया प्रोफाइल से की जानी उचित नहीं है. राहुल गांधी नरेंद्र मोदी को बराबर की टक्कर दे रहे हैं. कांग्रेस ने संसद टीवी के यूट्यूब चैनल पर दर्शकों की संख्या दिखाने वाले स्क्रीनशौट साझा किए, जिस में दावा किया गया कि संसद में राहुल गांधी के भाषण को पीएम मोदी की तुलना में अधिक दर्शक मिले.

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) टीवी की एक पोस्ट के अनुसार, राहुल गांधी के भाषण को संसद टीवी पर 3.5 लाख बार देखा गया, जबकि मोदी को 2.3 लाख बार देखा गया. कांग्रेस का कहना है कि राहुल, पीएम मोदी से ज्यादा पौपुलर हैं. कांग्रेस पार्टी की सोशल मीडिया टीम के मुताबिक, राहुल गांधी के आखिरी 30 ट्वीट्स को 48.13 मिलियन इंप्रैशन मिले, जबकि पीएम मोदी के आखिरी 30 ट्वीट्स को 21.59 मिलियन इंप्रैशन मिले.

भाजपा ने कहा कि एक्स (पहले ट्विटर) पर पीएम मोदी के अकाउंट को पिछले एक महीने में लगभग 79.9 लाख एंगेजमैंट मिले, जबकि राहुल गांधी के अकाउंट को लगभग 23.43 लाख एंगेजमैंट मिले. बीजेपी ने कहा कि फेसबुक पर पीएम मोदी के अकाउंट को पिछले एक महीने में लगभग 57.89 लाख एंगेजमैंट मिले, जबकि राहुल गांधी के अकाउंट को लगभग 28.38 लाख एंगेजमैंट मिले. 2 बड़े नेताओं के लोगों के बीच इस तरह की बहस राजनीति में सोशल मीडिया के प्रभाव को बताती है.

यह बहस बेमकसद है. नेताओं को समझना होगा कि फौलोअर्स वोटर नहीं होते. चुनाव वोट से जीते जाते हैं, फौलोअर्स से नहीं. वोटर को अपने क्षेत्र की जमीनी परेशानियों को जानने के लिए सोशल मीडिया नहीं देखना पड़ता. वह सच को समझता है. सोशल मीडिया राजनीति को प्रभावित कर सकता है, वोट नहीं दिला सकता.

अगर ऐसा होता तो भाजपा कर्नाटक, तेलंगाना और हिमांचल प्रदेश के चुनाव न हारी होती. जो नेता केवल सोशल मीडिया पर दिखेंगे, वे चुनाव नहीं जीत सकते. सोशल मीडिया एक वर्ग तक सीमित है. और वह वर्ग भी सोशल मीडिया को देख कर ही फैसले नहीं करता है.

फिल्मों में एकसाथ काम करने का मतलब इश्क का चक्कर नहीं- पल्लवी गिरि

कभी मांसल बदन वाली हीरोइनों के लिए पहचानी जाने वाली भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में अब छरहरे बदन की हीरोइनों का बोलबाला है. इन छरहरे बदन वाली हीरोइनों को दर्शक खूब प्यार भी दे रहे हैं. इसी में एक नाम है भोजपुरी हीरोइन पल्लवी गिरि का, जिन्हें हाल ही में आयोजित हुए ‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड’ शो में बैस्ट अलबम ऐक्ट्रैस अवार्ड से नवाजा गया है.

पल्लवी गिरि भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री की उन गिनीचुनी हीरोइनों में शुमार हैं, जो फिल्मों के साथसाथ भोजपुरी अलबम में भी खूब पसंद की जाती हैं. यही वजह है कि वे अकसर बड़े ऐक्टरों के साथ बनने वाले अलबम में स्क्रीन शेयर करती हुई नजर आती हैं.

‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड’ शो में शिरकत करने आईं पल्लवी गिरि से उन के फिल्मी कैरियर को ले कर ढेर सारी बातें हुईं. पेश हैं, उसी के खास अंश :

आप के फिल्मी कैरियर पर बात करें, उस से पहले अपने खूबसरत बदन और फिट रहने का राज बताएं?

-मेरे खूबसूरत बदन और फिट रहने का राज यह है कि मैं खुद को तनाव से दूर रखने की कोशिश करती हूं. मैं खुद पर स्ट्रैस को हावी नहीं होने देती हूं, क्योंकि आप की बौडी जितनी ऐक्टिव रहेगी, उतने ही आप चुस्त और दुरूस्त रहेंगे.

इस के अलावा सुबह उठने के बाद मैं सब से पहले पानी पीने पीती हूं.
इस के अलावा कार्डियो ऐक्सरसाइज, डांस, साइकिलिंग और रनिंग मेरे डेली रूटीन का हिस्सा है. डाइट में ढेर सारी हरी सब्जियां, फल और अंकुरित अनाज लेने के साथ ही नाश्ते में बादाम और अखरोट भी लेती हूं.

आप के फिल्मों की तरफ कदम कैसे बढे ?

-मुझे बचपन से ही डांसिंग और ऐक्टिंग का खूब शौक था, तो पहले मैं ने डांस इंस्टिट्यूट खोला और बच्चों को डांस सिखाने लगी. इस के बाद मैं ने मौडलिंग करना भी शुरू कर दिया था. चूंकि मेरे बदन की बनावट ही ऐसी थी की लोग मुझे हीरोइन और मौडल कह कर बुलाते थे, इसलिए मैं ने मौडलिंग की दुनिया में भी कदम बढ़ा दिया और इसी दौरान दौरान ‘मिस दिल्ली’ का खिताब भी जीता.

मेरे इस कामयाबी ने फिल्म मेकरों ध्यान मेरी तरफ खींचा और मुझे भोजपुरी फिल्मों के औफर आने लगे. मुझे भी लगा कि अच्छा मौका है और मैं ने फिल्मों में ऐक्टिंग की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए.

आप दर्जनों फिल्मों में अलगअलग किरदार निभा चुकी हैं फिर आप को बैस्ट अलबम ऐक्ट्रैस का अवार्ड क्यों मिला?

-यह तो फिल्म अवार्ड से जुड़ी जूरी तय करती है कि कौन बैस्ट ऐक्ट्रैस होगा और कौन बैस्ट अलबम ऐक्ट्रैस. मैं ने अपना नौमिनेशन ही बैस्ट अलबम ऐक्ट्रैस कैटेगरी के लिए किया था, क्योंकि मेरे कई अलबम ऐसे हैं, जिन्हें फिल्मों से ज्यादा प्यार मिला है. बैस्ट ऐक्ट्रैस के लिए मेरी पूरी फिल्मी लाइफ पड़ी है. मुझे जब लगेगा कि मुझे अब बैस्ट फिल्म ऐक्ट्रैस के लिए नौमिनेशन करना चाहिए, तो मैं नौमिनेशन भेजूंगी.

कागज पर शब्दों में लिखी कहानियों को पढ़ कर उसे खुद में ढाल कर ऐक्टिंग करना कितना मुश्किल है?

-आप ने सही कहा कि अगर हम फिल्म की कथा, पटकथा और संवाद को कागज में पढ़े शब्दों के जरीए पढ़ें तो उस में इमोशंस नहीं जुड़े होते हैं. लेकिन जब उसी कागज पर लिखे शब्दों को हमें संवाद के रूप में बोलते हुए ऐक्टिंग के जरीए दिखाना हो, तो वह चरित्र जिंदा हो जाता है, जिस का किरदार हम निभा रहे हैं.

ऐक्टरों का बड़ा बिजी शैड्यूल होता है. ऐसे में वे खुद को भी समय नहीं दे पाते हैं. ऐसे में क्या ऐक्टर की भी सैल्फ लाइफ होती है?

-आम लोगों की तरह ऐक्टरों की भी सैल्फ लाइफ होती है, लेकिन फिल्में उन्हें छीन लेती हैं. अगर आप एक कामयाब कलाकार हैं, तो फिल्मों की मसरूफियत आप की सैल्फ लाइफ छीन लेती है, इसीलिए मैं खुद और परिवार को समय देने के लिए बीच में थोड़े दिनों का ब्रेक जरूर लेती हूं.

आप यह कैसे तय करती हैं कि जिस फिल्म या अलबम में काम कर रही हैं, वह हिट ही होगा?

आज के दौर में फिल्मों के हिट होने का पैमाना बदल चुका है, क्योंकि बीते सालों में सामान्य से विषयों पर बनने वाली फिल्में भी हिट रहीं और कमाई का रिकौर्ड तोड़ा, इसलिए हम यह तय नहीं कर सकते हैं कि दर्शक किन फिल्मों को पसंद करेंगे और किसे नकार देंगे.

आप ने सैकड़ों अलबम और दर्जनों फिल्मों में काम किया है. आप को अलबम के लिए अवार्ड मिला है. आप के सब से करीब कौन सा अलबम है?

मेरे सारे अलबम सुपरहिट रहे हैं, फिर भी रितेश पांडेय के साथ आया अलबम ‘आज जेल होई काल्ह बेल होई ने’ कामयाबी के सारे रिकौर्ड तोड़े और उसे 10 करोड़ से भी ज्यादा लोगों ने देखा. पवन सिंह के साथ ‘मजनुआ पिटाता’ तकरीबन 8 करोड़ लोगों ने देखा. इस के अलावा अंकुश राजा के साथ ‘हम के दुल्हिन बनालस’ हिट रहा.

आप की और विमल पांडेय की जोड़ी खूब पसंद की जा रही है. इस के पीछे कहीं प्यार और रोमांस का चक्कर तो नहीं है?

फिल्मों में ऐक्टर और ऐक्ट्रैस एकसाथ ज्यादा काम करें या एकसाथ दिखें, तो इस का मतलब यह नहीं हैं कि दोनों में प्यार और रोमांस का चक्कर ही होगा. इस के पीछे की एक वजह यह भी होता है कि इन जोड़ियों को दर्शक ज्यादा प्यार करते हैं और पसंद करते हैं, इसीलिए फिल्म बनाने वाले कुछ खास जोड़ियों के साथ फिल्में ज्यादा बनाते हैं. दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’ और आम्रपाली दुबे, खेसारी और मेघाश्री, देव सिंह और अंजना सिंह, कल्लू और यामिनी जैसी तमाम जोड़ियां रही हैं, जिन्हें हम साथ देखते रहे हैं. इन सब की जोड़ियां केवल फिल्मों तक सीमित हैं. और हां, ऐक्ट्रैस को छोड़ दें, तो इन में से सभी ऐक्टर शादीशुदा भी हैं.

मेरी और विमल की जोड़ी भी केवल फिल्मी जोड़ी ही है. अभी मैं केवल फिल्मों पर फोकस कर रही हूं, इसीलिए मै सभी से गुजारिश करूंगी कि बेसिरपैर की बातों पर ध्यान न दें.

शरीर में हो रहे इन बदलावों को गलती से भी न करें अनदेखा, हो सकते हैं Heart Failure के लक्षण

Heart Failure Signs : आज के समय में युवओं से लेकर बड़े-बुजर्गों तक हर किसी को दिल से जुड़ी समस्याएं हो रही हैं, जिनमें हार्ट अटैक, स्ट्रोक और हार्ट फेलियर की परेशानियां सबसे ज्यादा है. इन सबमें से हार्ट फेलियर सबसे ज्यादा गंभीर और जानलेवा समस्या है, जिसमें दिल अचानक से काम करना बंद कर देता है. दिल पर्याप्त ब्लड-ऑक्सीजन पंप नहीं कर पाता और हार्ट की मांसपेशियां अपने आप कमजोर होने लगती है, जिससे व्यक्ति की जान जाने का खतरा भी बना रहता है.

हालांकि हार्ट फेल होने से पहले शरीर कई तरह के संकेत भी देता है, जिन्हें समझकर हार्ट फेलियर से बचा जा सकता हैं. आइए अब जानते हैं कि हार्ट फेलियर (Heart Failure Signs) आने से पहले शरीर कौन-कौन से इशारे देता है.

हार्ट फेलियर के लक्षण

दिल की धड़कनों का बढ़ना

जब व्यक्ति का दिल जोर-जोर से धड़कने लगता है, तो इसे हार्ट फेलियर का सबसे पहला संकेत माना जाता है. इसलिए अकस्मात दिल की धड़कनों के बढ़ने को कभी भी इग्नोर नहीं करना चाहिए.

वजन बढ़ना

अगर अचानक से आपका वजन बढ़ जाए या शरीर के कुछ अंगों जैसे कि पैरों, टांगों, टखनों या पेट में सूजन की समस्या होने लगे तो उसे भी नजरअंदाज ना करें. ये भी हार्ट फेलियर के संकेत हो सकते हैं. इसके अलावा भूख में कमी आना या दिनभर उल्टी व मतली जैसा महसूस होना भी इस जानलेवा बीमारी के कारण बन सकते हैं.

सांस लेने में परेशानी

सांस लेने में परेशानी को भी हार्ट फेलियर (Heart Failure Signs) का एक मुख्य लक्षण माना जाता हैं. जब व्यक्ति का शरीर सही तरह से काम नहीं करता व एक्टिव नहीं होता है तो सांस से जुड़ी समस्याएं होने लगती हैं. इसलिए अगर आपको सांस लेने में परेशानी हो रही है, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें.

थकान होना

जब दिल सही से ब्लड को पंप नहीं कर पाता है, तो इससे दिमाग तक खून नहीं पहुंच पाता है. ऐसे में कमजोरी आने लगती है, जो हार्ट फेलियर का एक अहम संकेत है.

गले में खराश

अगर लंबे समय तक आपको गले में खराश और खांसी की समस्या है, तो इसे भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. इसके अलावा खांसी के साथ हल्के लाल या सफेद बलगम का आना भी हार्ट अटैक (Heart Failure Signs) का कारण हो सकता है.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें.

क्या आपको भी है मुंह खोलकर सोने की आदत, तो हो सकती हैं ये गंभीर बीमारियां

Sleeping With Open Mouth Disadvantages : कई लोगों को आदत होती है कि वो सोते समय अपना मुंह खुला रखते हैं. अगर आप भी इस लत के शिकार है, तो सावधान हो जाइए क्योंकि आपकी ये छोटी सी गलती कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती है. दरअसल, जो लोग सोते समय मुंह खोलकर सोते हैं, उन्हें स्लीप एपनिया होता है. इसमें शरीर में ब्लॉकेज और कंजेशन के कारण सोते समय व्यक्ति की सांस रूक जाती है. हालांकि ये जरूरी नहीं है कि जो लोग मुंह खोलकर सोते हैं, वह स्लीप एपनिया से ग्रसित हो ही. कई केसों में कुछ और बीमारी के कारण भी उन्हें ऐसी आदत हो जाती है.

इसके अलावा जब हम लेटते हैं तो ब्लड सर्कुलेशन के कारण हमारी नाक के अंदर खून भरने लगता है, जिसकी वह से नाक में सूजन और कसाव दोनों बनने लगता है. इससे व्यक्ति नाक से सांस नहीं ले पाता है, जिससे वह सोते समय मुंह से सांस लेनी की कोशिश करता है और उसका मुंह अपने आप खुल जाता है. अब जानते हैं कि व्यक्ति को मुंह (Sleeping With Open Mouth Disadvantages) से सांस लेने की समस्या क्यों होती है.

मुंह से सांस लेने के कारण

चिंता

आपको बता दें कि जो व्यक्ति हर छोटी-छोटी बात पर टेंशन लेता है. उसे मुंह से सांस लेने में परेशानी होने लगती है. दरअसल, जब हम किसी चीज के बारे में बहुत ज्यादा सोचते हैं या टेंशन लेते हैं, तो इससे बीपी बढ़ने लगता है. ऐसे में मनुष्य को सोते समय मुंह खोलने की आदत लग जाती है.

एलर्जी

जब व्यक्ति का इम्यून सिस्टम ठीक से काम नहीं करता है, तो इससे शरीर को संक्रमण और एलर्जी दोनों होने की संभावना बढ़ जाती है. इससे वह नाक से अच्छे से सांस नहीं ले पाता, फिर उसका शरीर मुंह से सांस लेने की कोशिश करता है, जिससे सोते समय उसे मुंह (Sleeping With Open Mouth Disadvantages) खोलकर सोने की आदत होने लगती है.

अस्थमा

आमतौर पर अस्थमा के मरीजों के फेफड़ों में सूजन होती है, जिससे उन्हें सांस लेने में परेशानी होती है. इसलिए अस्थमा के मरीज भी मुंह खोलकर सोते हैं.

सर्दी-जुकाम

सर्दी-जुकाम, खांसी और नाक बहने की समस्या में नाक बंद हो जाती है, जिससे शरीर में ऑक्सीजन की कमी होने लगती है. ऐसे में व्यक्ति नाक की जगह मुंह से सांस लेता है. हालांकि इस समस्या में मुंह (Sleeping With Open Mouth Disadvantages) से सांस लेना आम बात है, जो दवाओं के लेने से ठीक हो जाती है.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें.

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