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आरोही : विज्ञान पर भरोसा करती एक डॉक्टर की कहानी

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मायावती की जेब में अब नहीं रहा दलित वोटर

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का कहना है, ‘मायावती डर की वजह से अलग राह पर चलने का फैसला कर रही हैं.‘ असल में मायावती अगर ‘इंडिया’ ब्लौक का हिस्सा बनतीं तो गठबंधन के दूसरे दलों के लिए मुश्किल हो जाती. मायावती और ममता बनर्जी दोनों जिस स्वभाव की नेता हैं, उस से उन के साथ किसी का तालमेल होना कठिन है. इन दोनों से ही ‘इंडिया’ ब्लौक को कोई लाभ नहीं होने वाला.

मायावती और ममता बनर्जी दोनों के ही अगले कदम का किसी को पता नहीं होता.

2014 के बाद से मायावती का रुझान मोदी सरकार की तरफ रहा है. ममता बनर्जी तो एनडीए का हिस्सा ही रह चुकी हैं. ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में सीमित हैं. बाकी देश में उन के नाम पर वोट नहीं. यही हाल मायावती का है. उत्तर प्रदेश में वे भले ही खुद के पास 13 फीसदी दलित वोट मान कर चल रही हों पर होने वाले लोकसभा चुनाव को देखें तो वे अपने बलबूते एक भी सीट जीतने की हालत में नहीं हैं.

बहुजन समाज पार्टी पहले ‘तिलक, तराजू और तलवार….’ का नारा दे कर मनुवाद का विरोध करती थी. मनुवाद के लोग कैसे दलित समाज पर अत्याचार करते हैं, इस को ले कर वे नुक्कड़ नाटक करती थीं. कांशीराम ने बसपा को ओबीसी और दलित वोटर के सहारे आगे बढ़ाने का काम किया था. यह कारवां आगे बढ़ता तो सब से पहला प्रभाव समाजवादी पार्टी पर पड़ता. इसलिए पिछड़ों के नेता और समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने सपा-बसपा का गठबंधन कर ‘मिले मुलायम कांशीराम…’ का नारा दे कर 1993 में सरकार बना ली.

मायावती की तुनकमिजाजी से यह सरकार समय से पहले ही गिर गई. तब मुलायम सिह यादव पिछड़ी जातियों को ले कर वहां से अलग हो गए. इस के बाद बसपा के पास केवल दलित वोटर रह गए. उन की ताकत इतनी नहीं थी कि वे अपने बलबूते सरकार बना सकें. यही वजह है कि 1995, 1996 और 2002 में मायावती भाजपा की मदद से ही मुख्यमंत्री बनीं. 2007 में बसपा की बहुमत से तब सरकार बनी जब सवर्ण वोटर उस के साथ जुड़े. यहां तक मायावती अपनी दलित राजनीति को छोड़ चुकी थीं. बसपा ‘तिलक तराजू…’ वाले नारे को छोड़ ‘हाथी नहीं गणेश है…’ का नारा देने लगी थी. यहीं से पार्टी का बुरा दौर शुरू हो गया.

दलित मुददों से भटकीं तो घटे वोट

साल 1996 में बसपा ने 6 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की थी, तब बसपा को 20.6 फीसदी वोट मिले थे. साल 1998 में बसपा को 4 सीटें मिलीं और वोट प्रतिशत बढ़ कर 20.9 फीसदी हो गया. साल 1999 में बसपा को 14 सीटें मिलीं और वोट 22.08 फीसदी हो गया. साल 2004 में सीटें बढ़ कर 19 हो गईं और 24.67 फीसदी वोट मिले. बसपा ने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन साल 2009 में किया जब पार्टी को 20 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल हुई और 27.42 फीसदी वोट मिले.

बसपा की स्थिति साल 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से बदलती चली गई. 20 सांसदों वाली बसपा को 2014 चुनाव में एक भी सीट हासिल नहीं हो पाई और उस का वोट प्रतिशत भी गिर कर 19.77 फीसदी पर आ गया. बसपा के वोट में करीब 8 फीसद की गिरावट आई.

1996 के बाद बसपा का यह सब से बुरा प्रदर्शन था. साल 2019 में बसपा ने सपा के साथ गठबंधन किया. जिस का बसपा को भरपूर फायदा हुआ और जीरो सीटों वाली बसपा ने 10 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि उस का वोट और कम हुआ. इस चुनाव में बसपा को सपा के साथ गठबंधन कर 19.43 फीसदी वोट ही वोट मिले.

बसपा का हाथी नहीं रहा सब का साथी

अब तक बसपा का वोट ट्रांसफर होना बंद हो गया. 2019 के लोकसभा में अगर बसपा का वोट सपा के प्रत्याशी को ट्रांसफर हुआ होता तो सपा-बसपा को अधिक सीटें मिल जातीं. 2024 में बसपा के लिए अपना वोट बचाना मुश्किल है. वह ‘इंडिया’ गठबंधन को क्या वोट दिलाएगी, सोचने वाली बात है.

मायावती को दलित नेता के रूप में इसलिए पहचान मिली है क्योंकि 1990 के बाद उत्तर प्रदेश में कोई दलित नेता पहचान नहीं बना पाया. ‘इंडिया’ गठबंधन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकाजुर्न खड़गे को दलित नेता के रूप में उभारने की कोशिश कर रहा है पर उन की पहचान दलित नेता की नहीं है.

‘इंडिया’ गठबंधन में रह कर मायावती 3 से 4 फीसदी वोट जोड़ सकती थीं, लेकिन उस से अधिक वे इंडिया गठबंधन में परेशानी पैदा करतीं. सीट शेयर को ले कर उन का टकराव दूसरे दलों से होता. वे चाहती थीं कि ‘इंडिया’ ब्लौक उन को पीएम फेस बनाए. मायावती और ममता बनर्जी दोनों को साध कर चलना ‘इंडिया’ ब्लौक के वश में नहीं. ‘इंडिया’ ब्लौक के सभी घटक ओबीसी समीकरण वाले हैं. ऐसे में मायावती की दलित राजनीति के साथ टकराव होता रहता. अपने स्वभाव के चलते मायावती खुद को ऊपर रखने का काम करतीं. ऐसे में साथ चलना संभव न होता.

मायावती पौराणिक व्यवस्था को स्वीकार कर चुकी हैं. अब वे मनुवाद का विरोध नहीं करतीं. आज का दलित पढ़ालिखा है. वह अपने मुददे समझता है. उसे पता है कि राममंदिर उस के किसी काम का नहीं है. उस के हिस्से में मंदिर के बाहर सड़क साफ करना ही आएगा. ऐसे में राममंदिर और उस के आसपास घूमती राजनीति से उसे कुछ नहीं मिलने वाला. सो, वह ‘इंडिया’ ब्लौक की तरफ बढ़ सकता है. दलितों के वोट ‘इंडिया’ ब्लौक को बिना मायावती के साथ रहने से ही मिल सकते हैं.

मायावती के अकेले चुनाव लड़ने से कोई बहुत प्रभाव नहीं पड़ने वाला क्योंकि दलित वोटर मायावती के सच को समझ चुका है. मायावती भी परिवारवाद को ही बढ़ा रही हैं. कांशीराम ने अगर अपने परिवार को आगे बढ़ाया होता तो क्या मायावती नेता बन पातीं? ऐसे में मायावती अगर दलित समाज के नेता को अपना उत्तराधिकारी बनातीं तो समाज का भला होता. मायावती के भतीजे आकाश आनंद से दलित समाज का क्या भला होगा, सोचने वाली बात है.

क्या आप भी सर्दियों में खाते हैं ज्यादा हरी मटर, तो सेहत पर पड़ सकता है भारी

Green Peas Side Effects : सर्दियों में ज्यादातार लोग हरी मटर खाना पसंद करते हैं. इसमें पोषक तत्वों का खजाना होता है. कैंसर और डायबिटीज की समस्या में तो विशेषतौर पर इसके सेवन की सलाह दी जाती है, क्योंकि इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स इन बीमारियों से लड़ने में सक्षम होते है. ठंड में तो इसका स्वाद और ज्यादा बढ़ जाता है. इसी वजह से लोग हरी मटर का इस्तेमाल सब्जी बनाने से लेकर नमकीन पराठों में करते हैं. लेकिन क्या आपको ये बात पता है कि बहुत ज्यादा मटर का सेवन करना भी शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है. दरअसल, हरी मटर में एंटीन्यूट्रेंट कंपाउंड की भी कुछ मात्रा पाई जाती है, जो शरीर से कुछ जरूरी पोषक तत्वों को खुद ही बाहर निकाल देते है. इसी वजह से कई लोग हरी मटर न खाने की सलाह देते हैं.

आइए अब जानते हैं कि किन-किन बीमारियों में ज्यादा हरी मटर (Green Peas Side Effects) नहीं खानी चाहिए और किन-किन स्थितियों में इसका सेवन नुकसानदेह हो सकता है.

ज्यादा हरी मटर खाने के नुकसान

बदहजमी

आपको बता दें कि रोजाना या ज्यादा हरी मटर खाने से बदहजमी यानी ब्लॉटिंग की समस्या हो सकती है. हरी मटर में लेक्टिंस और फायटिक एसिड नामक एंटीन्यूट्रेंट तत्व होते हैं, जो पाचन से जुड़ी परेशानी को बढ़ा सकते है. इसके अलावा जिन लोगों को पेट की समस्या रहती है या जिनके पेट में सूजन है, उन्हें भी ज्यादा हरी मटर खाने से बचना चाहिए.

गैस की समस्या

हरी मटर (Green Peas Side Effects) में प्रोटीन की भरपूर मात्रा होती है. इसलिए जिन लोगों की पाचन शक्ति कमजोर होती है, उन्हें हरी मटर का अधिक मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए. इससे उनके शरीर को पचाने में बहुत ज्यादा मशक्कत करनी पड़ती है, जिससे गैस और एसिडिटी की समस्या उन्हें परेशान कर सकती है.

वजन बढ़ना

नियमित रूप से हरी मटर खाने से वजन भी बढ़ सकता है. चूंकि इसमें डाइट्री फाइबर की उच्च मात्रा होती है, जो मेटाबोलिज्म को बूस्ट करता है. मेटाबोलिज्म के बूस्ट होने से खाना जल्दी-जल्दी पचता है, जिससे भार-भार भूख लगती है. इससे लोग ज्यादा मात्रा में खाना खाते हैं और उनका वजन बढ़ने लगता है.

यूरिक एसिड का बढ़ना

गठिया के मरीजों को भी हरी मटर का सीमित मात्रा में सेवन करना चाहिए. दरअसल, इसे ज्यादा खाने से शरीर में कैल्शियम जमा होने लगता है, जिससे यूरिक एसिड बनने लगता है. गठिया के मरीजों के लिए यूरिक एसिड का बढ़ना खतरनाक होता है.

डायरिया

बहुत अधिक मात्रा में हरी मटर (Green Peas Side Effects) खाने से शरीर में बाउल सिंड्रोम की मात्रा भी बढ़ जाती है, जिससे डायरिया होने का खतरा बना रहता है.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें.

शरीर में Vitamin B12 की कमी हो सकती है खतरनाक, जानें इसके लक्षण और उपचार

Vitamin B12 Foods : शरीर को स्वस्थ रखने के लिए विटामिन्स और मिनरल्स की जरूरत होती है, लेकिन आज के समय में खराब लाइफस्टाइल और अस्वस्थ खानपान की वजह से कई लोगों के शरीर में पोषक तत्वों की कमी होने लगी है, जिससे कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में जरूरी है कि आप अपनी डाइट में पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य-पदार्थ को शामिल करें. इन्हीं जरूरी विटामिन्स में से एक है बी 12, जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए बहुत जरूरी है.

शरीर में कई महत्वपूर्ण काम जैसे रक्त कोशिकाओं को बनाना, मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत करना और शरीर को एनर्जी देना आदि-आदि सभी कार्य विटामिन B12 ही करता हैं. हालांकि हमारा शरीर इसे खूद नहीं बनाता है. जब बॉडी में इसकी कमी होने लगती है, तो व्यक्ति बीमार पड़ सकता है. इसलिए जरूरी है कि आप अपनी डाइट में विटामिन B12 से युक्त चीजों को शामिल करें.

आइए अब जानते हैं कि शरीर में विटामिन B12 की कमी होने पर कौन-कौने से लक्षण दिखाई देते हैं और इसकी (Vitamin B12 Foods) कमी को कैसे दूर किया जा सकता है.

विटामिन-बी 12 की कमी में नजर आते हैं ये लक्षण

  • थकान
  • कमजोरी
  • जीभ में दर्द
  • पाचन संबंधी समस्या
  • चिड़चिड़ापन
  • बालों और नाखूनों की समस्या
  • स्किन का हल्का पीला पड़ना
  • लिवर में खराबी
  • मुंह में बार-बार छाले होना

विटामिन बी 12 की कमी को कैसे करें दूर ?

  • रोजाना दूध पीने से शरीर में विटामिन बी 12 (Vitamin B12 Foods) की कमी नहीं होती है.
  • विटामिन बी12 की कमी से बचने के लिए नियमित रूप से चीज खाएं. कॉटेज चीज विटामिन बी12 का मुख्य स्रोत है. इससे न सिर्फ शरीर में विटामिन बी12 की कमी दूर होगी. साथ ही मसल्स में भी मजबूती आएगी.
  • दही में कैल्शियम, प्रोटीन और विटामिन बी12 की उच्च मात्रा होती है. इसलिए मांसपेशियों और हड्डियों में मजबूती भरने के लिए अपनी डाइट में दही को जरूर शामिल करें.
  • ब्रोकोली को सभी जरूरी विटामिन और मिनरल्स का खजाना माना जाता हैं. इसी वजह से डॉक्टर भी ब्रोकोली खाने की सलाह देते हैं.
  • इसके अलावा नियमित रूप से फल, हरी सब्जियां और ड्राई फ्रूट्स खाने से भी शरीर में कभी विटामिन बी12 (Vitamin B12 Foods) की कमी नहीं होती है.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें.

मां-बाप की डांट से परेशान बच्चे क्यों करते हैं खुदकुशी ?

18 साल की पूजा का अपनी बहन से किसी बात को ले कर झगड़ा हुआ. पूजा के मांबाप ने दोनों बहनों की बातचीत सुनी और पूजा को डांट लगाई कि छोटी बहन के साथ झगड़ा न करे. गुस्से में पूजा अपने कमरे में चली गई और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. घंटों गुजर जाने के बाद जब पूजा बाहर नहीं निकली और न ही कमरे का दरवाजा खुला तो पिता प्रदीप ने दरवाजा खटखटाया. अंदर से कोई जवाब नहीं मिलने पर प्रदीप ने घर वालों की मदद से दरवाजा तोड़ा तो देखा कि पूजा पंखे से लटकी हुई है. पुलिस आई और पूजा की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज कर जांच आदि में लग गई. पूजा ने खुदकुशी कर एक बार फिर इस सवड्डाल को खड़ा कर दिया कि मांबाप की डांटफटकार से नाराज हो कर बच्चे क्यों जान देने पर उतारू हो जाते हैं? पटना के कदमकुआं महल्ले की चूड़ी मार्केट के मिश्रा लेन में प्रदीप अपनी बीवी और 2 बेटियों के साथ रहते हैं. पूजा बीए पार्ट वन की स्टूडैंट थी. पिता की डांट से नाराज हो कर खुदकुशी कर उस ने अपने मांबाप और परिवार वालों को पुलिस व अदालत के चक्कर दर चक्कर लगाने की सजा दे दी. बेटी की मौत से आहत परिवार के लिए कानूनी पचड़ों में फंसना और भी ज्यादा तकलीफ देने वाला होता है.

कई लड़का इम्तिहान में कम अंक लाने की वजह से पिता से डांट खाने के बाद किसी पुल से नदी में छलांग लगा रहा है. किसी लड़के की मोटरसाइकिल या स्मार्ट फोन की फरमाइश पूरी करने से पिता ने मना कर दिया तो वह सल्फास की गोली खाने में जरा भी देरी नहीं करता है. लड़की के चक्कर में पड़ कर पढ़ाई पर ध्यान नहीं देने के लिए जब मांबाप किसी बच्चे को फटकार लगाते हैं तो कोई अपार्टमैंट की छत से कूद कर जान देता है तो कोई ट्रेन के आगे कूद कर. मांबाप की डांट से आहत या नाराज हो कर और बातबेबात खुदकुशी करने की वारदातें तेजी से बढ़ रही हैं.

आखिर इतना गुस्सा क्यों और कैसे होता है कि अपनी जिंदगी ही खत्म कर ली जाए? समाजशास्त्रियों का मानना है कि आम आदमी में सहनशक्ति में कमी आना, जरा से विरोध और डांट को प्रतिष्ठा का विषय बना लेना और समझौता करने की मानसिकता में कमी आने की वजह से बातबेबात खुदकुशी की वारदातें बढ़ रही हैं. मांबाप कोई भी गलत कदम उठाने से लड़केलड़कियों को रोकते हैं तो युवा खुदकुशी जैसा आत्मघाती कदम उठा लेते हैं.

पटना हाईकोर्ट के वकील अनिल कुमार सिंह कहते हैं कि खुदकुशी करने वाले यह सोचतेसमझते नहीं हैं कि खुद को मिटा कर वे क्या पा लेते हैं. खुदकुशी न तो किसी परेशानी का हल है और न ही यह हिम्मत वालों का काम है. यह तो साफसाफ कमजोरों की गलत और गैरकानूनी हरकत है. खुदकुशी कर बच्चे अपने मांबाप को जिंदगी भर रोने और कोर्ट के चक्कर लगाने के लिए छोड़ जाते हैं. वे एक मिनट भी यह नहीं सोचते हैं कि उन की गलत हरकत से उन का परिवार कितनी बड़ी मुसीबत में फंस सकता है. 

बच्चे यह नहीं समझते हैं कि उन के मांबाप उन्हें डांटफटकार उन के ही भले के लिए लगाते हैं. उन की कमियों को दूर करने, उन्हें अच्छा और कामयाब इंसान बनाने, उन्हें सही रास्ते पर लाने और उन की गलत हरकतों को छुड़ाने के लिए ही वे बच्चों को डांटफटकार लगाते हैं. कोई बच्चा अगर पढ़ाईलिखाई के समय को बरबाद करता है तो अभिभावक को गुस्सा आना जायज है. मांबाप अपने बेटे को बड़ा अफसर बनाना चाहते हैं. उन्हें कामयाब होते देखना चाहते हैं. बच्चों को राह से भटकते देख कर ही वे डांट लगाते हैं.

पटना के एक सरकारी स्कूल की टीचर रेखा पोद्दार कहती हैं कि बच्चों के पढ़ाई में ध्यान नहीं देने, किसी विषय में कम अंक आने या फेल होने पर अभिभावक को बच्चों के साथ सख्त रवैया नहीं अपनाना चाहिए. बढ़ती उम्र के बच्चों का मन बहुत ही कोमल व अपरिपक्व होता है, ऐसे में उन से कोई गलती होने पर ठंडे दिमाग और प्यार से समझाना चाहिए. यह तरीका पिटाई और डांट से ज्यादा कारगर होता है.

अभिभावक के सख्त रवैए से डर कर या नाराज हो कर ही बच्चे खुदकुशी करने जैसा गलत तरीका अपना रहे हैं. हर बड़ेछोटे शहर में खुदकुशी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. इस के पीछे की सब से बड़ी वजह क्या है? कोई इसे कच्ची उम्र की वजह बताता है तो कोई तेजी से बदलती जीवनशैली को. कोई बच्चों के प्रति उन के अभिभावकों की लापरवाही व उपेक्षा को दोष देता है तो कोई बच्चों में हर चीज को तुरतफुरत पाने के उतावलेपन को जिम्मेदार ठहराता है. परिवार के लोगों के बीच बढ़ती संवादहीनता को कोई खुदकुशी की बड़ी वजह करार देता है. 

मनोविज्ञानी अजय मिश्र कहते हैं कि आज के युवा जरा सी डांटफटकार या किसी नाकामी को इज्जत का सवाल बना लेते हैं और उस के बाद उन्हें जीवन ही बेकार लगने लगता है. ऐसे लोग खुदकुशी कर अपने जीवन को खत्म कर लेते हैं पर अपने परिवार वालों के लिए समाज में अपमान और आंसू छोड़ जाते हैं. खुदकुशी करने से पहले युवाओं को ठंडे दिमाग से यह सोचना चाहिए कि खुदकुशी किसी भी समस्या का हल नहीं है. समस्या से लड़ कर ही उस का हल निकाला जा सकता है, न कि उस से भाग कर. खुदकुशी करने वाले अपने परिवार वालों के लिए कई मुसीबतें और समस्याएं छोड़ जाते हैं.

पिछले साल 25 अक्तूबर को पटना में 21 साल की लड़की आर्या की खुदकुशी के बाद से उस के परिवार वाले पुलिस, अदालत, वकीलों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं. आर्या के मां और पिता दोनों नौकरी करते हैं और अब वे जबतब काम से छुट्टी ले कर थानाकचहरी के चक्कर लगा रहे हैं. रिश्तेदारों और पड़ोसियों की तिरछी नजरों का सामना नहीं कर पा रहे हैं.

रिटायर्ड पुलिस अफसर आर के सिंह कहते हैं कि बच्चों और अभिभावकों के बीच तालमेल की कमी से न बच्चे अपने मांबाप से खुल कर बातें कर पाते हैं न ही मांबाप के पास बच्चों की दिक्कतों को सुनने व समझने की फुरसत है. ऐसे हालात में तो बच्चे सही और गलत के बारे में सोचे बगैर ही कोई फैसला ले लेते हैं. आज बच्चों की तुनकमिजाजी आम होती जा रही है. जरा सी उन के मन के लायक बात नहीं हुई तो उन का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचता है.

इस तरह की ढेरों वारदातें हमारे आसपास घटित हो रही हैं. खेलने और पढ़ने की उम्र में बातबेबात किसी की जान लेने, खुदकुशी करने की वारदातें इतनी तेजी से बढ़ रही हैं कि हर परिवार भय के माहौल में जीने लगा है. पता नहीं कब किस बात पर उन का बच्चा कोई गलत कदम उठा ले. मासूमों में आखिर इतना गुस्सा कैसे बढ़ गया है कि वे जान लेने या जान देने में जरा भी नहीं हिचकते हैं. ऐसे मामलों को रोकने के लिए कानून से ज्यादा अभिभावकों को समझने और समझाने की जरूरत है.

उलझे धागे : दामिनी के गले की फांस क्या चीज बन रही थी ? – भाग 3

‘‘मैं नौकरी कर रही हूं और सिद्ध भी. मांजी को भी पैसे की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है लेकिन तुम्हें अपना जीवन चलाने के लिए कोई ठोस आधार होना चाहिए कि नहीं. मेरे और सिद्ध के रहते विनय चाह कर भी तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर पाया. सही माने में इन पैसों की आज सब से ज्यादा जरूरत तुम्हें ही है,’’ दामिनी ने शैली के कंधे पर स्नेह से हाथ रखा.

‘‘दामिनी, जब तुम्हें विनय से कुछ भी नहीं चाहिए था तो फिर तुम ने उसे तलाक दे कर हमें आजाद क्यों नहीं कर दिया? यदि तुम ऐसा कर देतीं तो आज मैं विनय की ब्याहता होती,’’ शैली ने शिकायत की.

‘‘तुम्हारा सवाल बिलकुल वाजिब है लेकिन मेरी अपनी वजह भी अपनी जगह सही है. दरअसल, जब मैं ने विनय का घर छोड़ा था उस समय मैं तुम दोनों के प्रति नफरत और गुस्से से भरी हुई थी. ‘मैं खुश नहीं हूं तो क्या, चैन से तुम्हें भी नहीं रहने दूंगी,’ की भावना मेरे भीतर उबाल मार रही थी, इसलिए मैं ने तुम दोनों को आजाद नहीं किया. फिर जब मैं ने तुम दोनों के रिश्ते को अलग नजर से देखना शुरू किया तब तक सिद्ध भी रिश्तों को सम  झने लगा था. उसे विनय से ‘पापा’ वाला लगाव हो चुका था.

‘‘मैं विनय को तो छोड़ सकती थी लेकिन सिद्ध से उस के पापा को नहीं छीन सकती थी. बस, इसीलिए मैं तुम लोगों से दूर रह कर भी तुम्हारी जिंदगी में बनी रही. खैर, अब छोड़ो इन पुरानी बातों को. तुम अपना बैंक डिटेल मु  झे दे दो ताकि मैं ये पैसे ट्रांसफर कर सकूं.’’ दामिनी ने एक गहरी सांस छोड़ कर अपनी बात खत्म की.

दामिनी रिश्तों के उल  झे हुए धागों को सुल  झाने की कोशिश कर रही थी लेकिन रिश्तों के समीकरण भी कभी एक फौर्मूले से हल हुए हैं, भला. शैली चुपचाप अपनी बैंक पासबुक लेने भीतर चली गई.

हायटस हर्निया की बीमारी का क्या इलाज संभव है ?

सवाल

मैं 57 वर्षीय पुरुष हूं. मुझे हायटस हर्निया है. बैठे बैठे और चलने पर मुझे सीने में दर्द उठता है. यह हायटस हर्निया क्यों होता है? इस का इलाज क्या है? कृपया मुझे बताइए.

जवाब

हमारे शरीर के अंदर सीने और पेट के बीच गुंबद की शक्ल की पेशी पाई जाती है, जिस का काम सांस लेने और छोड़ने में फेफड़ों की मदद करना है और सीने तथा पेट के अंगों को एकदूसरे से अलग रखते हुए शरीर के दोनों क्षेत्रों को हिस्सों में विभाजित करना है.

यह पेशी डायफ्राम या मध्यच्छद के नाम से जानी जाती है. इस पेशी में कुछ सामान्य छेद होते हैं, जिन से छाती के कुछ अंग नीचे पेट में उतर आगे बढ़ जाते हैं. जैसे छाती में मुंह से शुरू हुई खाने की नली पेट में उतर आमाशय में खुल जाती है. दिल से प्रकट हुई महाधमनी पेट में पहुंच अनेक उदरीय धमनियों को जन्म देती है और पेट के निचले भाग में पहुंच 2 श्रोणिफलक धमनियों में बंट श्रोणि के तमाम अंगों और बाद में जांघिक धमनी बन दोनों टांगों को रक्त पहुंचाती है.

कुछ लोगों में डायफ्राम में बना वह छेद, जिस से खाने की नली नीचे पेट में उतरती है, अधिक खुल जाता है और जरूरत से ज्यादा चौड़ा हो जाता है. नतीजतन आमाशय पेट से फुदक कर सीने में आ बैठता है. चूंकि सीने में इतनी जगह नहीं होती कि वह आमाशय को अपने अंदर बैठा सके, इसलिए आमाशय के ऊपर आने से सीने में दबाव महसूस होने लगता है. साथ ही, सीने में जलन महसूस हो सकती है, डकारें आ सकती हैं, पेट भराभरा रह सकता है. इस से भूख मर जाती है.

यह विकार ही हायटस हर्निया कहलाता है. अधिकांश मामलों में कुछ छोटीछोटी सावधानियां बरत कर और कुछ दवाएं ले कर हायटस हर्निया पर नियंत्रण पाया जा सकता है. भरपेट भोजन के बजाय थोड़ाथोड़ा खाने, भोजन करने के बाद लेटने से परहेज बरतने, मिर्चमसाले व तले भोजन और चायकौफी से परहेज रखने तथा डाक्टरी सलाह से ऐसिडरोधक दवाएं लेने से प्राय: यह नियंत्रण में आ जाता है. जिन कुछ लोगों को इन उपायों से आराम नहीं आता उन का औपरेशन करना पड़ सकता है.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

यह भूल मत करना : माधवी की शादी हुई या नहीं ? – भाग 3

‘‘क्या पता, क्यों? माधवी, मुझे लगता है युवावस्था का पहला प्रेम ही दोषी है इस के लिए. आज शायद मैं सतीश का चेहरा याद भी नहीं कर सकती.’’

‘‘फिर मौसाजी ने क्या कहा? आप ने क्या किया?’’

‘‘मैं ने उसी समय वह सबकुछ जला दिया था, मगर उस के बाद…’’ कहतेकहते मौसी फिर चुप हो गईं. जाने क्या था जो वे कह नहीं पा रही थीं.

‘‘मौसी, क्या हुआ उस के बाद?’’ मैं ने उन्हें टोका तो उन्होंने मेरा बाजू इतना कस कर दबाया कि मैं चीत्कार सी कर उठी. वे बोलीं, ‘‘उस के बाद आज 12 बरस हो गए माधवी,’’ कहतेकहते वे फिर चुप हो गईं.

‘‘बताइए न मौसीजी,’’ मैं ने फुसफुसा कर कहा तो वे हांफती सी बोलीं, ‘‘उस के बाद आज तक उन्होंने मुझे हाथ तक नहीं लगाया, माधवी. मैं पत्नी हो कर भी अब उन की पत्नी नहीं. मैं केवल शकुन, आरती और राजेश की मां हूं, बस,’’ कहतेकहते वे चुपचाप रोए जा रही थीं. आंखों में जाने कब से रोक रखा बांध टूट गया था. मैं अब उन्हें गोद में भर कर चुप करा रही थी.

जाने कब तक वे रोती रहीं, मुझे समय का पता ही न चला. मेरी साड़ी भिगो दी उन के आंसुओं ने. जब उन की सिसकियां रुकीं तो मैं ने उन का चेहरा ऊपर करते हुए कहा, ‘‘मौसी, मौसी, क्या मौसाजी आप को तंग करते हैं?’’ कहते हुए मैं सहम रही थी कि न जाने क्या उत्तर मिले.

‘‘नहीं माधवी, यही तो बात है जो मुझे मारे जाती है. वे सही माने में जैंटलमैन हैं. मेरे मन में कब से सतीश की जगह तुम्हारे मौसाजी ने ले ली थी, मगर मेरी एक नादानी ने हमारे बीच कठिनाई से पनपे प्रेम व विश्वास को तोड़ डाला. मैं कैसे विश्वास दिलाऊं उन्हें कि संदूक में पड़े पत्र बरसों से मैं ने देखे भी नहीं, पर हां, यह है तो मेरी ही भूल न? मैं ने भी तो 2 बरस यही किया था. मैं ने तो इन्हें निरपराध होने पर भी सजा दी थी. खैर, जाने दो. तुम ऐसी गलती न करना, माधवी. अगर आलोक तुम से प्रेम करता है और तुम उस से तो विवाह कर लो.’’

‘‘मुझे नहीं मालूम, मौसी,’’ मैं ने कहा.

‘‘परसों तुम्हारी बरात आ रही है. तुम क्या यह विश्वास करती हो कि आलोक भारत आने पर तुम से ही विवाह करेगा? अगर हां, तो रुको और यदि नहीं तो भूल जाओ. आजकल लडक़ेलड़कियों को मिलनेबोलने की स्वतंत्रता है, इसलिए इसे ‘प्रेम’ न समझ. अगर प्रेम है भी तो यह विवाह में ही परिणत होगा, इस की भी कोई गारंटी नहीं है न?’’

‘‘हां, मौसी, नहीं है,’’ मैं ने धीरे से कहा.

‘‘माधवी, जीवन बरबाद मत कर लेना, बस, सही कहूंगी. रातभर सोच लो. तुम चाहो तो मैं जापान फोन लगा कर आलोक से स्पष्ट बात करूं?’’

‘‘मैं सोचती हूं, मौसी,’’ मैं ने कहा.

मैं सोचने लगी कि कभी भी आलोक ने हमारे भविष्य को ले कर कोई बात न की थी. पत्नी, घर, विवाह आदि शब्द कभी हमारी बातचीत में आए ही नहीं, तब मैं कैसे कुछ पूछूं? मौसी क्या कहेंगी उस से, यही न, ‘आलोक, तुम हमारी माधवी से शादी करोगे क्या? वह तुम से प्रेम करती है.’ छि:छि:, ऐसे पूछ सकते हैं क्या? और मैं 2-3 बार लिख भी चुकी हूं कि मेरे मातापिता मेरे लिए वर ढूंढ़ रहे हैं, मुझे लड़के वाले देखने आए थे, मेरी सगाई हो गई है. उस का रुझन होता तो क्या वह कुछ न कहता.

अगर मैं अपने मातापिता से कह कर विवाह रुकवा दूं तो भी क्या निश्चित है कि कल आलोक मुझ से ही विवाह करेगा. यदि किसी को पता भी चल गया तो फिर मेरा विवाह तो कहीं भी न हो पाएगा. मातापिता का जो अपमान होगा, सो अलग.

यही सब सोचतेसोचते मेरी आंखें लग गईं. सुबह जब मैं उठी तो मैं ने फैसला कर लिया था. दोपहर को मौसी को बहाने से बुला कर मैं ने छत पर उन्हें धीरे से कागजों का एक पुलिंदा दिया और बोली, ‘‘मौसी, यह सब जला देना.’’

यह देखसुन कर मौसी ने मुझे सवालिया नजरों से देखा. मैं फिर बोली, ‘‘आप ठीक कहती हैं, मौसी, आप की भूल मैं न दोहराऊंगी.’’

‘‘हां, माधवी. और देखो, पहली रात या उस के बाद भी कभी भावना की रौ में बह कर अपने इस अल्हड़ एकतरफा प्रेम को स्वीकार न कर बैठना. कोई पति, पत्नी के अन्य प्रेम को स्वीकार नहीं कर सकता, चाहे वह कितना ही सात्विक, निश्च्छल क्यों न रहा हो, समझं.’’

‘‘हां, मौसी,’’ मैं ने कहा और मौसी के साथ वहीं बैठ कर आलोक के पत्र, कार्ड और फोटो जलाने लगी.

फिर वही शून्य – भाग 3 : समर को सामने पा कर सौम्या का क्या हुआ ?

अलार्म की आवाज ने विचारों की शृंखला को तोड़ दिया. सारी रात सोचतेसोचते ही बीत गई थी. एक ठंडी सांस ले कर मैं उठ खड़ी हुई.

फिर 1 साल बाद ही भारत आना हुआ. इस बीच वीरां का विवाह भी हो चुका था. जब इस बात का पता चला तो मन में एक टीस सी उठी थी.

‘‘तुम्हारी पसंद का मूंग की दाल का हलवा बनाया है, वहां तो क्या खाती होगी तुम यह सब,’’ मम्मी मेरे आने से बहुत उत्साहित थीं.

‘‘वीरां कैसी है, मम्मी? वह अपने ससुराल में ठीक तो है न?’’

‘‘हां, वह भी आई है अभी मायके.’’

‘‘अच्छा, तो मैं जाऊंगी उस से मिलने,’’ मैं ने खुश हो कर कहा.

इस पर मम्मी कुछ खामोश हो गईं. फिर धीरे से बोलीं, ‘‘हम ने तुम से एक बात छिपाई थी. वीरां की शादी के कुछ दिन पहले ही समर रिहा किया गया था. उस का एक पांव बेकार हो चुका है. बैसाखियों के सहारे ही चल पाता है. अभी महीना भर पहले ही उस का भी विवाह हुआ है. तुम वहां जाओगी तो जाहिर है, अत्यंत असहज महसूस करोगी. बेहतर होगा किसी दिन वीरां को यहीं बुला लेना.’’

वज्रपात हुआ जैसे मुझ पर. नियति ने कैसा क्रूर मजाक किया था मेरे साथ. समर की रिहाई  हुई तो मेरी शादी के फौरन बाद. किस्मत के अलावा किसे दोष देती? समय मेरी मुट्ठी से रेत की तरह फिसल चुका था. अब हो भी क्या सकता था?

इसी उधेड़बुन में कई दिन निकल गए. पहले सोचा कि वीरां से बिना मिले ही वापस लौट जाऊंगी, लेकिन फिर लगा कि जो होना था, हो गया. उस के लिए, वीरां के साथ जो मेरा खूबसूरत रिश्ता था, उसे क्यों खत्म करूं? अजीब सी मनोदशा में मैं ने उस के घर का नंबर मिलाया.

‘‘हैलो,’’ दूसरी तरफ से वही आवाज सुनाई दी जिसे सुन कर मेरी धड़कनें बढ़ जाती थीं.

विधि की कैसी विडंबना थी कि जो मेरा सब से ज्यादा अपना था, आज वही पराया बन चुका था. मैं अपनी भावनाओं पर काबू न रख पाई. रुंधे गले से इतना ही बोल पाई, ‘‘मैं, सौम्या.’’

‘‘कैसी हो तुम?’’ समर का स्वर भी भीगा हुआ था.

‘‘ठीक हूं, और आप?’’

‘‘मैं भी बस, ठीक ही हूं.’’

‘‘वो…मुझे वीरां से बात करनी थी.’’

‘‘अभी तो वह घर पर नहीं है.’’

‘‘ठीक है,’’ कह कर मैं रिसीवर रखने लगी कि समर बोल उठा, ‘‘रुको, सौम्या, मैं…मैं कुछ कहना चाहता हूं. जानता हूं कि मेरा अब कोई हक नहीं, लेकिन क्या आज एक बार और तुम मुझ से शाम को उसी काफी शाप पर मिलोगी, जहां मैं तुम्हें ले जाता था?’’

एक बार लगा कि कह दूं, हक तो तुम्हारा अब भी इतना है कि बुलाओगे तो सबकुछ छोड़ कर तुम्हारे पास आ जाऊंगी, लेकिन यह सच कहां था? अब दोनों के जीवन की दिशा बदल गई थी. अग्नि के समक्ष जिस मर्यादा का पालन करने का वचन दिया था उसे तो पूरा करना ही था.

‘‘अब किस हैसियत से मिलूं मैं आप से? हम दोनों शादीशुदा हैं और आप की नजरों का सामना करने का साहस नहीं है मुझ में. किसी और से शादी कर के मैं ने आप को धोखा दिया है. नहीं, आप की आंखों में अपने लिए घृणा और वितृष्णा का भाव नहीं देख सकती मैं.’’

‘‘फिर ऐसा धोखा तो मैं ने भी तुम्हें दिया है. सौम्या, जो कुछ भी हुआ, हालात के चलते. इस में किसी का भी दोष नहीं है. मैं तुम से कभी भी नफरत नहीं कर सकता. मेरे दिल पर जैसे बहुत बड़ा बोझ है. तुम से बात कर के खुद को हलका करना चाहता हूं बाकी जैसा तुम ठीक समझो.’’

मैं जानती थी कि मैं उसे इनकार नहीं कर सकती थी. ?एक बार तो मुझे उस से मिलना ही था. मैं ने समर से कह दिया कि मैं उस से 6 बजे मिलने आऊंगी.

शाम को मैं साढे़ 5 बजे ही काफी शाप पर पहुंच गई, लेकिन समर वहां पहले से ही मौजूद था. जब उस ने मेरी ओर देखा, तो उठ कर खड़ा हो गया. उफ, क्या हालत हो गई थी उस की. जेल में मिली यातनाओं ने कितना अशक्त कर दिया था उसे और उस का बायां पैर…बड़ी मुश्किल से बैसाखियों के सहारे खड़ा था वह. कभी सोचा भी न था कि उसे इन हालात में देखना पडे़गा.

हम दोनों की ही आंखों में नमी थी. बैरा काफी दे कर चला गया था.

‘‘वीरां कैसी है?’’ मैं ने ही शुरुआत की.

‘‘अच्छी है,’’ एक गहरी सांस ले कर समर बोला, ‘‘वह खुद को तुम्हारा गुनाहगार मानती है. कहती है कि अगर उस ने जोर न दिया होता तो शायद आज तुम मेरी…’’

मैं निगाह नीची किए चुपचाप बैठी रही.

‘‘गुनाहगार तो मैं भी हूं तुम्हारा,’’ वह कहता रहा, ‘‘तुम्हें सपने दिखा कर उन्हें पूरा न कर सका, लेकिन शायद यही हमारी किस्मत में था. पकड़े जाने पर मुझे भयंकर अमानवीय यातनाएं दी जातीं. अगर हिम्मत हार जाता, तो दम ही तोड़ देता, लेकिन तुम से मिलन की आस ही मुझे उन कठिन परिस्थितियों में हौसला देती. एक बार भागने की कोशिश भी की, लेकिन पकड़ा गया. फिर एक दिन सुना कि दोनों तरफ की सरकारों में संधि हो गई है जिस के तहत युद्धबंदियों को रिहा किया जाएगा.

‘‘मैं बहुत खुश था कि अब तुम से आ कर मिलूंगा और हम नए सिरे से जीवन की शुरुआत करेंगे. जब यहां आ कर पता चला कि तुम्हारी शादी हो चुकी है, तो मेरी हताशा का कोई अंत न था. फिर वीरां भी शादी कर के चली गई. जेल में मिली यातनाओं ने मुझे अपंग कर दिया था. मैं ने खुद को गहन निराशा और अवसाद से घिरा पाया. मेरे व्यवहार में चिड़चिड़ापन आने लगा था. जराजरा सी बात पर क्रोध आता. अपना अस्तित्व बेमानी लगने लगा था.

‘‘उन्हीं दिनों नेहा से मुलाकात हुई. उस ने मुझे बहुत संबल दिया और जीवन को फिर एक सकारात्मक दिशा मिल गई. मेरा खोया आत्मविश्वास लौटने लगा था. मैं तुम्हें तो खो चुका था, अब उसे नहीं खोना चाहता था. तुम मेरे दिल के एक कोने में आज भी हो, मगर नेहा ही मेरे वर्तमान का सच है…’’

मैं सोचने लगी कि एक पुरुष के लिए कितना आसान होता है अतीत को पीछे ढकेल कर जिंदगी में आगे बढ़ जाना. फिर खुद पर ही शर्मिंदगी हुई. अगर समर मेरी याद में बैरागी बन कर रहता, तब खुश होती क्या मैं?

‘‘…बस, तुम्हारी फिक्र रहती थी, पर तुम अपने घरसंसार में सुखी हो, यह जान कर मैं सुकून से जी पाऊंगा,’’ समर कह रहा था.

‘‘मुझे खुशी है कि तुम्हें ऐसा साथी मिला है जिस के साथ तुम संतुष्ट हो,’’ मैं ने सहजता से कहने की कोशिश की, ‘‘दिल पर कोई बोझ मत रखो और वीरां से कहना, मुझ से आ कर मिले. अब चलती हूं, देर हो गई है,’’ बिना उस की तरफ देखे मैं उठ कर बाहर आ गई.

जिन भावनाओं को अंदर बड़ी मुश्किल से दबा रखा था, वे बाहर पूरी तीव्रता से उमड़ आईं. यह सोच कर ही कि अब दोबारा कभी समर से मुलाकात नहीं होगी, मेरा दिल बैठने लगा. अपने अंदर चल रहे इस तूफान से जद्दोजहद करती मैं तेज कदमों से चलती रही.

तभी पर्स में रखे मोबाइल की घंटी बज उठी. अनिरुद्ध का स्वर उभरा, ‘‘मैं तो अभी से तुम्हें मिस कर रहा हूं. कब वापस आओगी तुम?’’

‘‘जल्दी ही आ जाऊंगी.’’

‘‘बहुत अच्छा. सौम्या, वह बात कहो न.’’

‘‘कौन सी?’’

‘‘वही, जिसे सुनना मुझे अच्छा लगता है.’’

मैं ने एक दीर्घनिश्वास छोड़ कर कहा, ‘‘मैं आप से बहुत प्यार करती हूं,’’ जेहन में समर का चेहरा कौंधा और आंखों में कैद आंसू स्वतंत्र हो कर चेहरे पर ढुलक आए. जीवन में फिर वही शून्य उभर आया था.

दोस्त अजनबी : आखिर क्या हुआ था सुधा और पुण्पावती के बीच ? – भाग 3

‘तुम्हारा ट्रिप कैसा रहा?’

‘बहुत अच्छा,’ अभी मैं आगे बताने ही जा रही थी कि पुण्पा ने पूछा, ‘तुम ने मेरे हस्बैंड कीह अलमारी तो नहीं खोली थी?’

‘क्याऽऽ…’ मैं इस अप्रत्याशित प्रश्न पर यकीन नहीं कर पा रही थी.

‘मेरे हस्बैंड की कोई एक चीज भी छू ले तो इन्हें तुरंत पता चल जाता है. जानती हो, हमारे यहां भारत में 200 गमले हैं. यदि कोई एक फूल भी तोड़ ले तो इन्हें तुरंत पता चल जाता है,’’ पुष्पा बोलती ही जा रही थी. मेरे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था. मैं कुछ क्षण के लिए अवाक ही खड़ी रह गई.

‘मगर मैं तुम्हारे हस्बैंड की अलमारी क्यों छूने लगी. मैं तो तुम्हारे साथ ही थी,’ किसी तरह मेरे मुंह से आवाज निकली.

‘यों ही पूछा, मेरे हस्बैंड कह रहे थे कि लगता है किसी ने मेरी अलमारी को हाथ लगाया है. उन्हें गलतफहमी हुई होगी.’

‘हो सकता है, मुझे नहीं मालूम.’  मैं ने यह कह तो दिया, मगर उस के बाद पुण्पा की दी हुई चाय जैसे कुनेन घोल कर बनाई हुई लगी.

‘तुम जानती हो, किसी ने मेरे घर की तलाशी ली है.’

‘थैंक गौड, मैं तो चली गर्ई थी,’ मैं ने राहत की सांस लेते हुए कहा. मगर मुझे माहौल में घुटन सी महसूस होने लगी.

‘पता नहीं. लोग दोस्त बन कर पीठ में खंजर भूंकते हैं,’ पुण्पा बोलती जा रही थी. मुझे लगा यह पुण्पा का असली चेहरा था या ट्रिप पर जाने से पहले वाली पुण्पा असली थी.

‘मुझे तो लोग चोर समझते हैं, मैं तो चोर हूं. बाप रे बाप.’ पुण्पा पर जैसे दौरा सा पड़ गया था. मैं घबरा गई. उस के पति दूसरे कमरे थे. समझ में नहीं आ रहा था कि उन्हें बुलाऊं या नहीं. सुन तो वे भी रहे होंगे. मैं चुपचाप पत्थर बनी बैठी रही. उस के पति का एटिट्यूट भी मुझे कुछ अजीब सा ही लगा.

मुझे टैंशन होते ही कमजोरी लगने लगती है. इस समय वैसा ही लग रहा था. मैं अभी पुण्पा की बात को समझने की कोशिश कर ही रही थी कि उस ने कहा, ‘ऐसा करते हैं कि इस समय मैं भिंडीआलू बनाती हूं और तुम मटरमशरूम बना दो.’

वह अचानक इस तरह सामान्य लहजे में बोली कि एक झटके में तो मुझे समझ ही नहीं आया कि चोरी का इलजाम लगातेलगाते वह अचानक खाने की बात पर कैसे आ गई. यों तो मैं मानसिक रूप से काम करने के लिए तैयार थी क्योंकि मैं कभी भी किसी पर बोझ बन कर नहीं रहती हूं. मगर पुण्पा की बेसिरपैर की बातों ने मेरी सोचनेसमझने की ताकत छीन ली थी, शरीर को जैसे काठ मार गया था. वैसे भी, मेरे आने के दिन से पुण्पा मुझे बारबार बता रही थी कि वह सर्वाइकल की मरीज है, इसलिए वह कोई काम नहीं कर सकती. उस के घर की अस्तव्यस्तता और गंदगी देख कर मैं खुद भी यह अनुमान लगा चुकी थी कि वाकई 2 महीने पहले उस के पति ने भारत लौटने से पहले ही घर साफ किया होगा.

पति के जाने के बाद शायद ही उस के घर में वैक्यूम क्लीनर का इस्तेमाल हुआ होगा. हालांकि यूरोप में भारत की तरह धूल मिटटी के अभाव में रोज सफाई की जरूरत तो नहीं पड़ती थी. ‘मैं तो सलाद या दलिया ही खाती हूं, वह भी एक बार बना कर दोनों समय खा लेती हूं,’ पुष्पा ने स्काइप पर भी ये बातें बताई थीं. जिस दिन मैं उस के घर पहुंची थी उस दिन जरूर उस ने बढिय़ा नाश्ता कराया था, उस के बाद से तो खाना बनाना क्या, बरतन मांजने का काम भी मैं ने अपने ऊपर ले लिया था.

मगर इस समय 2 सब्जियां, दाल, चावल और रोटी बनाने का न तो मेरा मूड ही था न ही बाद में बरतन मांजने की ताकत.

‘रहने दो. केवल मगटर वाले चावल ही बना लेते हैं,’ मैं ने धीरे से कहा.

‘अरे, ऐसा कैसे हो सकता है, मैं और आलोक ‘अतिथि देवो भव’ पर विश्वास करते हैं. तुम्हें कुछ करने की जरूरत नहीं है. तुम केवल मटरमशरूम बना दो. बाकी खाना तो आलोक बना देंगे.’

मुझे मालूम था यह केवल कहने की बात है. बनाना तो मुझे ही पड़ेगा.

‘आलोक, भिंडी काट दो,’ कह कर वह भिंडी ले कर आलोक के कमरे में चली गई. मशरूम और मटर मेरे सामने रख दिया. तुम बनाओ, मैं भी सीखूंगी.

मुझे इस समय अनुराग बेइंतहा याद आ रहे थे. मन कर रहा था उन के कंधे पर सिर रख कर फूटफूट कर रोने लगूं. ‘क्यों भेजा तुम ने मुझे यहां, मना नहीं कर सकते थे…’ मगर अब कुछ नहीं किया जा सकता था. पुण्पा वापस आ कर मेरे सामने बैठ गई और मैं मशरूम साफ करने लगी.

‘जानती हो, भारत से जो दूसरे प्रोफैसर आए थे उन्हें मेरे साथ क्याक्या किया?’

मैं मन ही मन डर गई, पता नहीं किस के माध्यम से मुझे क्या सुनाने लगे. मैं ने कोई जवाब नहीं दिया. प्रो. गुप्ता, जो भारत से यहां पौलिटिकल साइंस के विजिटिंग प्रोफैसर बन कर आए थे, इसी बिल्डिंग में रहते थे, उन से पुष्पा के संबंध अच्छे नहीं थे. यह अनुमान तो उस की बातों से पहले ही लगा चुकी थी. पर अब पुण्पा की मानसिकता जानने के बाद मुझे प्रो. गुप्ता से सहानुभूति होने लगी थी.

‘मुझे यह पता नहीं था कि विदेश में आ कर मुझे यह सब सहना पड़ेगा. पता नहीं मेरे अगेंस्ट कांस्परेसी क्यों कर रहे हैं…’ पुण्पा बड़बड़ा रही थी.

गुस्से और थकान के बावजूद मुझे हंसी आ गई, ‘क्यों, तुम ऐसी क्या चीज हो जो सारी दुनिया तुम्हारे खिलाफ कांस्परेसी करेगी भला?’ न चाहते हुए भी मेरे मुंह से निकल तो गया पर मैं डर गर्ई कि अब वह प्रोफैसर गुप्ता को छोड़ कर मेरे पीछे न पड़ जाए. पर वह अपनी धुन में मगन बोलती ही जा रही थी, ‘जानती हो, उन की वाइफ आ रही थीं तो मैं ने कहा मेरे लिए एक किलो चावल और थोड़ी सी चायपत्ती लेती आएं.’

मेरे कान खड़े हो गए क्योंकि और चीजों के साथ मैं ये दोनों चीजें भी साफ लाई थी, पुण्पा को भेंट करने. परदेश में भारतीय आटाचावलमसाले जैसी चीजें कैसी अनमोल उपहार होती हैं, यह वही समझ सकता है जो देश के बाहर इन चीजों के लिए तरसा हो.

‘जानती हो, मैं ने पैसे दिए तो उन्होंने नहीं लिए. मगर सारी जगह मेरी बदनामी कर गए. मुझे लालची बताया.’

मैं चुपचाप सुनती रही और अपने काम में लगी रही. मुझे लग रहा था कि यह सिर्फ उस के मन का वहम होगा. ‘तुम्हें कैसे पता?’ आखिर रहा न गया, तो पूछ ही बैठी.

‘पता कैसे नहीं?’ पुण्पा नाराज हो गई, ‘मुझे लोगों ने बताया कि पूरी इंडियन कम्यूनिटी में हमारी बदनामी हो रही है. भला मैं ने ऐसा क्या किया था?’  उस ने खुद ही प्रश्न पूछा. कोई उत्तर न पा कर मेरी तरफ मुखातिब हुई, ‘सुनो, तुम जो चावलवावल लाई हो न, उन्हें भी नहीं रखूंगी. तुम इन्हें वापस ले जाना.’ अब वह असली बात पर आ गई थी.

‘अरे, ऐसा भी कहीं होता है क्या? तुम ने थोड़े ही मंगाया था, वह तो मैं खुद लाई थी. अब मैं उन का क्या करूंगी?’ जब उस ने बात शुरू की थी तभी मैं ने अनुमान लगा लिया था कि बात मेरे उपहारों तक जरूर आएगी.

‘पर वापस ले जाना, मैं नहीं रखूंगी,’ पुण्पा ने ऐलान कर दिया था.

उस से बहस करना बेकार था. उपहार वापस ले जाने की कल्पना अजीब सी लगी, साथ में इतना बोझा वापस ढोना भी मुश्किल था. आते समय मैं यह सोच कर निश्चिंत थी कि वापसी पर कम से कम चावलों का बोझ नहीं होगा. इधर मामामामी ने भी ढेर सारी चीजें लाद दी थीं. उन में रास्ते के लिए जूस की बोतलें पानी और केक वगैरह के पैकेट्स भी थे. उन पैकेटों को मैं ने ड्राइंग टेबल पर यह सोच कर रख दिया था कि इसे यहां अगले 2 दिनों में खापी लेंगे, नहीं तो छोड़ जाऊंगी. मैं चुप रही.

‘लोग सोचते हैं, मैं बड़ी लालची हूं. तुम बताओ अगर तुम्हारे साथ ऐसा हुआ होता तो क्या तुम ऐसे चीजें रखतीं?’

मैं चुपचाप सब्जी चलाती रही.

‘सब्जी बनने वाली है,’ मैं ने बात बदलने की गर्ज से कहा.

‘ओह, मैं तो भूल ही गई. ऐसा करो दूसरी सब्जी भी चढ़ा दो, भिंडी कट गई होगी, मैं लाती हूं. तुम बस तेल, जीरा डाल कर छौंक दो. तब तक मैं आटा निकाल दूंगी. मेरे से तो आटा मंढ़ता नहीं, हस्बैंड से कहूंगी, मांढ देंगे.’

‘नहीं, मैं ही मांढ़ दूंगी,’ मैं ने मन मार कर कहा.

‘ओहो, तुम क्या सोचोगी कि तुम्हें काम करने के लिए ही बुलाया है. तुम तो देख ही रही हो, मेरा तो हाथ ही नहीं चलता. चलो, रोटी तो मैं ही सेंक दूंगी. बस, तुम बेल देना.’

मेरे होंठों पर बरबस मुसकान आ गई. मुश्किल से उसे रोक कर कहा, ‘अरे, उतना ही टाइम लगता है. मैं बेल भी लूंगी और सेंक भी लूंगी.’

‘नहीं भाई, मैं अब मेहमान से इतना काम भी तो नहीं करवा सकती न, रोटी तो मैं ही सेंकूंगी. फिर बरतन मांजने में भी मेरे हाथ अकड़ जाते हैं. वे तो मेरे हस्बैंड मांज देंगे.’

‘जानती हो, जब पिछली बार मैं इंडियन एसोसिएशन के कार्यक्रम में गई थी तो जो कुछ भी पार्टी में बचा था उस में से खूब चीजें भर लाई थी. मैं सोच रही थी ये लोग मुझे लालची समझते हैं तो दिखा ही देती हूं कि मैं कितनी लालची हूं.’ मैं चुपचाप सुनती रही. ‘और जानती हो मैं ने क्या किया, मैं ने वे सारी चीजें डस्टबिन में फेंक दीं.

‘मुझे लालची समझते हो न. तो देखो, मैं सचमुच लालची हूं.’

पुण्पा की अनर्गल बातें मेरे थके दिमाग को जकड़ती जा रही थीं. हाथ मशीन की तरह चल रहे थे. खाना तैयार था. पुण्पा ने प्लेट लगा कर आलोक को खाना कमरे में ही दे दिया. हम खाना खाने बैठे, मेरी भूख मर चुकी थी.

‘मटरमशरूम बहुत अच्छे बने हैं,’ पुण्पा ने कहा. मेरा न मुसकराने का मन किया न थैंक्स कहने का. ‘सुनो, मटरमशरूम कैसे बने हैं? सुधा ने बनाए हैं.’ उस ने वहीं बैठेबैठे अपने पति से पूछा.

‘ठीक हैं,’ आलोक का संक्षिप्त सा उत्तर आया.

‘चलो आलोक को अच्छे लगे,’ उस के चेहरे पर संतुष्टि आई, ‘ऐसा करना कल कोफ्ते बना देना, इन्हें अच्छे लगे तो इन्हें भी सिखा देना.’ मेरे दिल की सारी जलन जरूर मेरी आंखों में उतर आई होगी. मैं रोटी को अच्छी तरह चबाने की कोशिश करने लगी.

‘बाप रे बाप, कैसेकैसे लोग होते हैं…’ वह फिर बड़बड़ाने लगी, ‘मैं तो चोर हूं, लालची हूं.’

‘‘ओप्फ, इनफ इज इनफ, पुण्पा. तुम्हारी तो सूई जैसे वहीं अटक गई है,’ मेरे सब्र का बांध टूटने लगा था.

वह भी अचकचा गई, फिर संभली, ‘नहींनहीं, तुम्हें नहीं मालूम, मेरे घर की तलाशी ली गई है.’

‘किसने ली तुम्हारे घर की तलाशी? मैं ने?’ मुझे लग रहा था जैसे इस औरत के साथ मैं खुद भी पागल हो जाऊंगी.

पुण्पा को इस सीधे प्रश्न की उम्मीद नहीं थी. वह लडख़ड़ाई, ‘मैं ने तुम्हें तो कुछ नहीं कहा.’

‘तो तुम ये सब बातें मुझे क्यों सुना रही हो?’ चाहते हुए भी मैं अपनी आवाज सामान्य नहीं कर पा रही थी. पुण्पा हड़बड़ा गई थी. मैं ने स्वयं पर नियंत्रण रखने की कोशिश करते हुए कहा, ‘देखो पुण्पा, तुम मुझे अच्छी लगीं. हम करीब एक साल तक स्काइप पर बातें करते रहे. अगर मुझे तुम पर विश्वास न होता या तुम अच्छी न लगतीं तो क्या मैं परदेश में अकेली ऐसे ही तुम्हारे घर चली आती? दुनिया तुम्हें क्या समझती है, इस से मेरा कोई लेनादेना नहीं है.’ और जैसेतैसे रोटी निगल कर मैं उठ खड़ी हुई.

‘अरे, ठीक से तो खाओ.,’

मेरी बात का शायद उस पर, फौरीतौर पर ही सही, असर हुआ लग रहा था.

‘बस हो गया,’ मैं ने अपनी प्लेट धो कर रख दी, और कुछ करने की हिम्मत नहीं थी.

‘सुनो, आज तुम मेरे पास ही सोना.’

‘तुम्हारे हस्बैंड?’

‘वे बैठक में सो जाएंगे.’

अटपटा लगा. कुछ कहने जा रही थी कि याद आया, मेरे घर की तलाशी हुई है…तो क्या… इस के आगे दिमाग ने सोचने से भी इनकार कर दिया. धप्प से कुरसी पर ढह गई. अब तक पुण्पा भी खा चुकी थी. हाथ धो कर उस ने पति को आवाज लगाई, ‘आलोक, बरतन देख लेना, प्लीज. और मुझे ले कर बैडरूम में आ गई. मैं अपने को खुद की निगाह में ही गिरा हुआ महसूस कर रही थी. यंत्रचलित सी पुण्पा के पीछे आ कर बैड पर लेट गई.

पुष्पा मेरी बगल में लेटी थी. अचानक उस की बड़बड़ाहट फिर से शुरू हो गई, ‘उफ, समझ नहीं आ रहा कि क्या हो रहा है यहां, लोग खामखां मेरे पीछे पड़े हैं. सब लोग मिल कर मेरे अगेंस्ट कान्स्परेसी कर रहे हैं. लोग दोस्त बन कर पीठ में छुरा घोंपते हैं.’

अचानक वह पलटी और मेरा हाथ अपने दोनों हाथों में दबाते हुए बड़ी राजदारी से बोली, ‘जानती हो, मेरे पति जनखे हैं.’

मन घिन से गनगना गया. मैं ने झटके से अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा, ‘शर्म करो, तुम्हारी बेटी है.’

वह हंस पड़ी, ’तो तुम ने मेरी बात का विश्वास कर लिया? सच में?’

‘चुप रहो, मुझे सोने दो.’ मैं ने करवट बदल ली मगर मेरी सारी इंद्रियां जागृत हो कर मेरी पीठ में समा गई थीं. डर, क्षोभ, गुस्से, घृणा से मेरे आंसू निकल आए. यह तो पक्का था कि उस की दिमागी हालत ठीक नहीं थी. सीत्जोफ्रेनिया…ओह कहीं यह सीत्जोफ्रेनिक तो नहीं है. ऐसे मरीजों के बारे में पढ़ी, सुनी और तमाम फिल्मों में देखी घटनाएं याद आ गईं. डर से हाथपांव ठंडे पडऩे लगे.

मैं ने फैसला कर लिया कि मैं कल ही वापस अपने घर चली जाऊंगी. चाहे कितने ही यूरो का नुकसान क्यों न हो, चाहे प्लेन से तुरंत का किराया दे कर जाना पड़े, पर मैं हरगिज यहां नहीं रुकूंगी. भाड़ में जाए बर्लिन. दिल कर रहा था भाग कर अनुराग की बांहों में समा जाऊं. ओह अनुराग, क्यों भेज दिया तुम ने इस पागल औरत के पास. मन में आया कि इस के पति से बात कर उन्हें इस को किसी अच्छे मनोचिकित्सक को दिखाने को कहूं, मगर उस के पति भी मुझे असामान्य ही लगे, इसलिए चुप रही.

बाहर किचन से अभी भी खटरपटर की आवाजें आ रही थीं. पुण्पा सो चुकी थी. तमाम थकान के बावजूद मैं सो नहीं पा रही थी. अनुराग बेतरह याद आ रहे थे. जब भी आंख लगती, अजीबअजीब सपने दिखने लगते.

अचानक पुण्पा ने करवट बदली और बोली, ‘सब लोग मेरे पीछे पड़ गए हैं, मुझे बदनाम करने में लगे हैं.’

जब तक मैं ने उस की ओर देखा, वह फिर से सो चुकी थी. अब तक उस के पति भी काम कर के जा चुके थे. घर में सन्नाटा पसरा हुआ था. मैं नहीं चाहती थी कि पुण्पा की आवाज उस सन्नाटे को तोड़े. पता नहीं कितनी मुद्दत के बाद अनुराग को अपने मनप्राणों के इतना करीब महसूस किया था.

‘नींद अच्छी आई?’ चौंक कर आंखें खुल गईं. सुबह होनी ही शुरू हुई थी. डर कर पुण्पा की तरफ देखा. वह लेटी थी, पर बिलकुल तरोताजा लग रही थी. ‘मैं कुछ भी खाऊं, मैं मायोनीज खाऊं, भिंडी खाऊं, टैक्सी में जाऊं न जाऊं किसी को क्या? डा. गुप्ता…’ मैं तड़प कर उठ बैठी. पुण्पा का बड़बड़ाना मेरी बरदाश्त के बाहर हो रहा था.

‘भाड़ में जाने दो डा. गुप्ता को,’ मैं ने अपने स्वर को भरसक संयत करते हुए कहा, ‘वे हिंदुस्तान जा चुके हैं. इतने बड़े हिंदुस्तान में वे कहां और तुम कहां? अब कभी जिंदगी में वे तुम्हें नहीं मिलेंगे. फिर उन के नाम का शोर क्यों मचाए जा रही हो?’ वह भौचक्की सी मुझे देखे जा रही थी. ‘पुण्पा, मैं आज वापस चली जाऊंगी अपने घर,’ मैं ने उसे एक भी शब्द बोलने का मौका दिए बिना ही कहा.

‘‘क्यों? वह भी शायद मेरी इस अप्रत्याशित प्रतिक्रिया से घबरा गई, बर्लिन…’

‘तुम्हारी मां बीमार हैं, तुम्हारे पति जल्दी आए हैं, तुम्हें कभी भी इंडिया जाना पड़ सकता है. तुम्हीं ने तो बताया था,’ न चाहते हुए भी मेरे स्वर में कड़वाहट घुलती जा रही थी.

‘ओह, हांहां,’ उस ने संभलने की कोशिश की, ‘मैं इंतजार कर रही हूं, भाई का फोन आने दो. शायद 3-4 दिनों में जाना पड़े.’

‘इसलिए बेहतर यही है कि मैं आज ही निकल जाऊं.’

‘तुम्हारा टिकट?’

‘मैं प्रीपोन करवा लूंगी और अपना बर्लिन का टिकट कैंसिल करवा लूंगी, तुम चाहे तो रख लेना अपना,’ मैं अपनी झुंझलाहट छिपा नहीं पा रही थी. मैं बिस्तर छोड़ चुकी थी, ‘जल्दी निकलती हूं, तुम तो शायद यूनिवर्सिटी जाओगी.’

‘नहीं, आज मेरी क्लास नहीं है. मैं भी तुम्हारे साथ चलती हूं. ऐसा करते हैं, कुछ हैवी नाश्ता कर लेते हैं. तुम कोफ्ते बना लो, मैं परांठें सेंक लेती हूं.’

मेरा दिल कर रहा था, दीवार से सिर फोड़ लूं, ‘तुम क्यों परेशान होगी, मैं बाहर ही खा लूंगी.’

‘अरे, अतिथि को ऐसे थोड़े ही न जाने देंगे. मेरे हस्बैंड नाराज हो जाएंगे.’

मुझे लग गया कि छुटकारे का कोई रास्ता नहीं है. मैं ने महसूस किया था कि पुण्पा के पति का व्यवहार भी मेरे प्रति अच्छा नहीं था, लग रहा था कि पुण्पा की हर बात में उन की सहमति है. मैं ने जल्दी से फ्रिज में से गोभी निकाली और कद्दूकस करने लगी, पुण्पा, तुम नहा कर आओ, तब तक नाश्ता तैयार करती हूं.’

‘अरे, सांस तो लेने दो. ऐसा लग रहा है जैसे कि किसी जंगल में बैठी हो,’  उस के स्वर में शिकायत थी.

‘मैं आज की बुकिंग हर हाल में करवा लेना चाहती हूं,’ मैं उस की कोई बात नहीं सुन पा रही थी.

वह मेरे स्वर की दृढ़ता को भांप गई थी, जल्दी से बाथरूम में घुस गई. मेरे हाथ इतनी तेजी से चल रहे थे कि मुझे खुद हैरानी हो रही थी. जब तक पुण्पा नहा कर निकली, मैं नाश्ता बना कर अपनी चीजें समेट चुकी थी.

‘अरे वाह, तुम तो बिलकुल तैयार हो.’

‘हां, चलो नाश्ता कर लें.’

नाश्ते के बाद पुण्पावती ने टेबल पर रखे लिफाफे की ओर इशारा किया, ‘सुधा, वह अपना पैकेट भी ले जाना.’

‘नहीं, पहले ही बहुत वजन हो गया है, इसे यहीं छोड़ देती हूं.’

‘क्यों, मैं क्या करूंगी इन का?’ पुष्पा के तेवर फिर बदल गए. वह बड़बड़ाती हुई दूसरे कमरे से एक बड़ा सा लिफाफा ले आई. उस में मेरे लाए हुए चावल, चायपत्ती वगैरह थीं. उस ने उसे करीबकरीब मेरे सामने पटकते हुए कहा, ‘इन्हें भी ले जाओ, अगर छोड़ोगी तो कूड़ेदान में फेंक दूंगी.’

गुस्से से मेरा शरीर जलने लगा, ‘तो फेंक दो, मैं तुम्हारे लिए लाई थी, अब तुम्हारा जो जी चाहे करो.’

‘आलोक हम जा रहे हैं,’ उस ने कहा और अपना बैग उठा लिया. दरवाजे के पास आ कर वह मुझ से बोली, ‘सुधा, वह लिफाफा उठा लो, प्लीज. मुझे तो सर्वाइकल है. डाक्टर ने एक किलो से ज्यादा सामान उठाने से मना किया है.’

आने के बाद से यह बात मैं न जाने कितनी बार सुन चुकी थी. मैं ने लिफाफा उठाया और उस के पीछे चल दी.

‘अब क्या करना है इस का?’

‘आगे डस्टबिन है, उस में फेंक देंगे,’ उस ने बेहद ठंडे स्वर में कहा. दिल में धक्का सा लगा. इतने महंगे बासमती चावल, दार्जिलिंग चायपत्ती, घर का कुटा गरममसाला आदि सब को यह पगली डस्टबिन में फेंक देगी. यदि पता होता तो बुदापैश्त में ही किसी को उपहारस्वरूप दे देती. पाने वाला कितना खुश होता. पर अब इस की बातें सुन कर हाथों में जान ही नहीं महसूस हो रही थी. अपमान की आग अंदर धधक रही थी. पर यह नहीं कह पा रही थी कि इसे वापस ले जाती हूं. आगे ही डस्टबिन था. पुण्पा रुक कर मेरी ओर देखने लगी. मैं ने डस्टबिन के पास ही लिफाफा रख दिया और पुण्पा के आगेआगे चलने लगी. मैट्रो में भी भीड़ का बहाना कर मैं ने पुण्पा से दूरी बनाए रखी. मेरा उस की शक्ल तक देखने का मन नहीं कर रहा था. स्टेशन जा कर मैं ने बर्लिन और बुदापैश्त के पुराने टिकट कैंसिल करवाए और बिना हिसाब पूछे आज की वापसी बुकिंग कराने के लिए अपना डैबिट कार्ड आगे कर दिया. टिकट हाथ में लेते ही सुकून की ठंडी लहर दिल में दौड़ गई. पुष्पा से शिकायत भी कुछकुछ दूर हो गई.

ट्रेन में देरी थी. घर के घुटनभरे माहौल में जाने का मन नहीं था, ‘पुण्पा, तुम घर जाओ, मैं थोड़ी देर यहीं मौल में घूमूंगी.’

‘नहीं, आज तो तुम चली ही जाओगी. मैं तुम्हारे साथ ही टाइम बिताऊंगी.’

खीझ गया मन, पता नहीं यह प्यार था या निगरानी. मन को तसल्ली दी, चलो कुछ देर की बात और है, फिर तो इस बला से छुटकारा मिल ही जाएगा. पुण्पावती जो पिछले एक साल में स्काइप पर बात करकर के मेरी बहुत अच्छी दोस्त बन गई थी, अब नितांत ही अजनबीअपरिचित लग रही थी.

शाम तक मौल में टहलती रही पुण्पावती ने बात करने की बहुत कोशिश की मगर गिफ्ट फेंकने के बाद मेरा मन उस से बिलकुल हट चुका था. डर भी लग रहा था कि न जाने किस बात पर क्या बोल दे. मैं ने अंदाज लगाया कि अब घर से केवल सामान उठाने भर का वक्त बचा है. घर आ कर पुण्पावती ने कहा, ‘कुछ खा लो.’

‘नहीं, बहुत खा लिया.’

‘मगर…’

‘प्लीज पुण्पावती.’

“पासपोर्ट प्लीज,” बाहर कोई नौक कर रहा था.

हड़बड़ा गई. दरवाजा खोला. अरे, ट्रेन किसी दूसरे देश के प्लेटफौर्म पर रुकी थी. जल्दी से पासपोर्ट, टिकट उसे दिया.

पुण्पा से छुटकारे का एहसास इतना सुखद था कि यह भी नहीं पूछा कि ट्रेन कहां रुकी है. थैंक्स कह कर टीटी पासपोर्ट आदि वापस कर चला गया.

ओह, अब तो मैं ट्रेन में हूं, मुझे उस के बारे में सोचने की कोई जरूरत नहीं है. कुछ देर बाद मैं अनु यानी अपने अनुराग के पास होऊंगी. ओह, मैं ने केबिन की अलमारी से निकाल कर केक खाया और पानी पी कर बर्थ पर लेट गई. कंफर्टर को ऊपर तक खींच लिया. केबिन अनु की खुशबू से भरता जा रहा था.

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