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जब लड़का देखने जाएं तो इन बातों को रखें ध्यान, बेटी रहेगी हमेशा खुश

अब वह जमाना नहीं रहा जब युवकयुवती देखने जा कर अपनी पसंदनापसंद बताता था. बदलते दौर में अब न सिर्फ युवक बल्कि युवती भी लड़का देखने जाती है और दस तरह की बातें पौइंट आउट करती है जैसे वह दिखने में कैसा है? उस का वे औफ टौकिंग कैसा है? बौडी फिजिक बोल्ड है या नहीं ममाज बौय तो नहीं है? वगैरावगैरा.

आज बराबर की हिस्सेदारी के कारण युवतियां किसी चीज से समझौता करना पसंद नहीं करतीं. यह ठीक भी है कि जिस के साथ ताउम्र रहना है उस के बारे में जितना हो सके जान लेना चाहिए ताकि आगे किसी तरह का कोई डाउट न रहे.

ऐसे में आप जब लड़का देखने जाएं तो कुछ बातें ध्यान में रखें और खुद भी ऐसा कुछ न करें जो आप की नैगेटिव पर्सनैलिटी को दर्शाए.

  1. जब भी आप युवक से पहली बार मिलें तो उस की बौडी लैंग्वेज पर खास ध्यान दें. इस से आप को उस की आधी पर्सनैलिटी का तो ऐसे ही अंदाजा हो जाएगा. बात करते हुए देख लें कि कहीं वह बात करने से ज्यादा अपने हाथपैर तो नहीं हिला रहा. बात करते हुए फेस पर अजीब से रिऐक्शन तो नहीं आ रहे. इस से आप को उसे जज करने में काफी आसानी होगी.
  2. बात करते समय इस बात पर गौर फरमाएं कि कहीं वह तू से बात करना तो शुरू नहीं करता कि यार, मुझे तो बिलकुल तेरे जैसी लड़की चाहिए, तू तो आज बहुत क्यूट लग रही है. अगर ऐसा कहे तो समझ जाएं कि वह आप के लायक युवक नहीं है, क्योंकि जो पहली बातचीत में ही तू तड़ाक पर आ जाए उस से भविष्य में रिस्पैक्ट की उम्मीद नहीं की जा सकती.
  3. भले ही उस युवक का सैलरी पैकेज काफी अच्छा हो, लेकिन इस का यह मतलब तो नहीं कि उस की हर बात में सैलरी का ही जिक्र हो. जैसे अगर हम दोनों की शादी हो गई तो तुम ऐश करोगी, तुम्हें ब्रैंडेड चीजें यूज करने का मौका मिलेगा, क्योंकि मैं औफिस के काम से विदेश भी जाता रहता हूं. इस से आप को अंदाजा हो जाएगा कि उसे अपनी सैलरी पर घमंड है.
  4. युवक को जानने के साथसाथ आप उस की फैमिली को भी एकनजर में जानने की कोशिश करें. आप को उन की बातचीत के तरीके से पता लग जाएगा कि वे कैसे विचारों के लोग हैं. लड़की को जौब करवाने के फेवर में हैं या नहीं. घर में लड़की से ज्यादा लड़के को तो महत्त्व नहीं देते. इन सारी बातों का पता होने पर आप को डिसीजन लेने में काफी आसानी होगी.
  5. बातोंबातों में कहीं दहेज की ओर तो इशारा नहीं है. जैसे हमारी बड़ी बहू तो शादी में हर चीज लाई थी, हमारा लड़का तो 15 लाख रुपए सालाना कमाता है, हमारे यहां तो रिश्तेदारों का शादी में खास खातिरदारी का रिवाज है. आप को जो देना है अपनी लड़की को देना है, हमें कुछ नहीं चाहिए जैसी बातें अगर मीटिंग में की जा रही हैं तो समझ जाएं कि उन्हें लड़की से ज्यादा दहेज में इंट्रस्ट है.
  6. आप की फैमिली लड़की को आप से बात करने के लिए कह रही है और वह इस के लिए मम्मी से परमिशन ले कर खुद को ममाज बौय दिखाने की कोशिश करे तो समझ जाएं कि लड़के की खुद की कोई पर्सनैलिटी नहीं है और वह हर बात के लिए मम्मी पर डिपैंड रहता है.
  7. अगर थोड़ी सी सीरियस बात के बाद वह सीधा कपड़ों पर आ जाए जैसे मुझे तो सूट वगैरा बिलकुल पसंद नहीं हैं. मैं तो चाहता हूं कि मेरी लाइफ पार्टनर हमेशा हौट ड्रैसेज पहने, इस से आप को यह समझने में आसानी होगी कि उसे आप से ज्यादा छोटे कपड़ों में इंट्रस्ट है, जो हैप्पी मैरिड लाइफ के लिए सही नहीं है.
  8. कहीं ऐसा तो नहीं कि फर्स्ट मीटिंग में ही युवक आप से फ्यूचर प्लानिंग के बारे में बात करना शुरू कर दे कि हम तो शादी के बाद अकेले रहेंगे, इस तरह चीजों को मैनेज करेंगे, मुझे तो लड़के बहुत पसंद हैं इस से आप को उस की मैच्योरिटी के बारे में पता चल जाएगा.
  9. जरूरी नहीं कि जब हम इस तरह की मीटिंग के लिए कहीं बाहर जाएं तो हमेशा लड़की वाले ही बिल पे करें. भले ही आप के पेरैंट्स उन्हें बिल पे न करने दें, लेकिन फिर भी यह बात जानने के लिए थोड़ी देर तक बिल पे न करें. अगर वह एक बार भी बिल पे करने का जिक्र न करे तो समझ जाएं कि वह सिर्फ फ्री में खानेपीने वाले सिद्धांत पर चलने वाला है.
  10. भले ही आप काफी स्मार्ट हों, लेकिन इस का यह मतलब नहीं कि आप लड़के के गुणों को देखने के बजाय उस की स्मार्टनैस के बेस पर ही उसे पौइंट्स दें. एक बात मान कर चलें कि स्मार्टनैस थोड़े दिन ही अच्छी लगती है उस के बाद तो व्यक्ति के गुणों के बल पर ही जिंदगी चलती है. इसलिए आउटर के साथसाथ इनर पर्सनैलिटी को भी ध्यान में रखें.
  11. हमारे घर में यह होता है, हम ऐसे रहते हैं, हम यह नहीं खाते, मौल्स के अलावा हम कहीं और से शौपिंग नहीं करते. भले ही आप का लिविंग स्टैंडर्ड काफी हाई हो, लेकिन अगर आप इस तरह की बातें लड़के से करेंगी तो वह चाहे आप कितनी भी सुंदर क्यों न हों, आप से शादी नहीं करेगा.
  12. माना कि युवतियों को शौपिंग का शौक होता है, लेकिन इस का मतलब यह तो नहीं कि आप युवक से 20 मिनट में 15 मिनट शौपिंग को ले कर ही बात करें. जैसे मैं हफ्ते में जब तक एक बार शौपिंग नहीं कर लेती तब तक मुझे चैन नहीं आता, क्या तुम्हें शौपिंग पसंद है? अगर हमारी शादी हो गई तो क्या तुम मेरे साथ हर वीकैंड पर शौपिंग पर चला करोगे? ऐसी बातों से सिर्फ यही शो होगा कि आप को मैरिज से ज्यादा शौपिंग में इंट्रस्ट है जो आप की नैगेटिव पर्सनैलिटी को शो करेगा.
  13. आज सोशल मीडिया का जमाना है, लेकिन इस का यह मतलब नहीं कि हर जगह सोशल मीडिया ही हावी हो. ऐसे में जब आप लड़के से बात कर रही हैं तो यह न पूछ बैठें कि आप सोशल साइट्स पर ऐक्टिव हैं कि नहीं. अगर हैं तो अपनी आईडी दीजिए ताकि मैं अपनी फ्रैंडलिस्ट में आप को ऐड कर सकूं. इस से लड़के तक यही मैसेज जाएगा कि आप सोशल मीडिया को ले कर कितनी क्रेजी हैं तभी इतनी सीरियस टौक में आप सोशल मीडिया को ले आई हैं.
  14. जब भी आप लड़के से मिलने जाएं तो उस का बायोडाटा अच्छी तरह पढ़ लें कि वह कहां जौब करता है, इस से पहले उस ने किनकिन कंपनियों में जौब की है, उस की फैमिली में कितने मैंबर्स हैं और कौन क्या करता है. यहां तक कि उस की कंपनी व पद के बारे में भी जानकारी रखें. इस से जब वह अपनी कंपनी के बारे में बता रहा होगा तो आप की तरफ से भी अच्छा फीडबैक मिल पाएगा.
  15. पहली मुलाकात में ही आप उस से अपना नंबर शेयर न करें, क्योंकि आप को क्या पता कि बात बनेगी या नहीं. इसलिए इस बात को अपने पेरैंट्स पर छोड़ दें, क्योंकि अगर आप का रिश्ता बना तो पेरैंट्स खुद ही आप को नंबर दिलवा देंगे ताकि आप को एकदूसरे को जानने का मौका मिल सके.
  16. अगर बड़े किसी टौपिक पर बात कर रहे हैं कि जैसे हम शादी तो अपने होम टाउन से ही करेंगे तो ऐसे में आप बीच में टांग न अड़ाने लगें कि नहीं आंटी ऐसा नहीं होगा. आप के इस व्यवहार से आप की बदतमीजी ही शो होगी इसलिए जब तक जरूरी न हो तब तक बीच में न बोलें.
  17. अगर आप को लड़के की कोई बात पसंद नहीं आ रही तो एकदम से गुस्से में न आ जाएं बल्कि शांत तरीके से अपनी बात रखें, इस से उस पर आप का अच्छा प्रभाव पड़ेगा और उसे लगेगा कि आप चीजों को अच्छे से ऐडजस्ट करना जानती हैं.

इस तरह आप को अपने लाइफ पार्टनर के सिलैक्शन में आसानी होगी.

मेरे मम्मी-पापा रोज लड़ाई करते हैं, जिससे मैं परेशान हो चुका हूं, अब आप ही बताएं मैं क्या करूं?

सवाल

मेरे मम्मीपापा हमेशा से एकदूसरे से लड़ते आए हैं. पहले मैं कालेज जाता था, तो शाम को घर आ कर अपने कमरे में बंद हो जाया करता था जिस से मुझे उन दोनों की बातें सुननी नहीं पड़ती थीं और न ही झगड़े. जब से हम सभी घर में रहने लगे हैं तब से मुझ से यह रोजरोज का लड़ाईझगड़ा सहा नहीं जा रहा. मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या ऐसा कोई उपाय है जिस से मैं इन दोनों को झगड़ने से रोक सकूं. अगर हाल ऐसा ही रहा तो शायद मैं पागल हो जाऊंगा.

जवाब

यह सही है कि इतना ज्यादा समय घर पर रहना, वह भी इस झगड़े के बीच, बेहद मुश्किल है. लेकिन, इस सिचुएशन से निकलने का तरीका सिर्फ यह है कि आप इस का सामना करें. मम्मीपापा झगड़ा करते हैं तो इस का कोई कारण तो होगा ही. आप को वह कारण पता हो तो उसे सुलझाने की कोशिश कीजिए. ज्यादा कुछ नहीं तो उन्हें समझाइए कि उन के इस तरह झगड़ने के कारण आप की शांति भंग हो रही है जो आप के मानसिक स्वास्थ्य के लिए सही नहीं है.

कोशिश कीजिए कि मम्मी या पापा में से किसी एक के साथ या दोनों के साथ आप थोड़ाबहुत समय बिताएं जिस से उन्हें अपने आपसी झगड़े का ध्यान ही न रहे.
जिस समय वे झगड़ना शुरू करें, आप अपने कमरे में चले जाएं और उन से बात न करें. इस से हो सकता है कि उन्हें अपनी गलती का एहसास हो और शायद आप को नाराज न करने की गरज से ही वे झगड़ने से खुद को रोकें.

फिर वही शून्य – भाग 2 : समर को सामने पा कर सौम्या का क्या हुआ ?

समर की छुट्टियां खत्म होने को थीं. उस के वापस जाने से पहले जो लम्हे मैं ने उस के साथ गुजारे वे मेरे जीवन की अमूल्य निधि हैं. उस का शालीन व्यवहार, मेरे प्रति उस की संवेदनशीलता और प्रेम के वे कोमल क्षण मुझे भावविह्वल कर देते. उस के साथ अपने भविष्य की कल्पनाएं एक सुखद अनुभूति देतीं.

मगर इनसान जैसा सोचता है वैसा हो कहां पाता है? पड़ोसी देश के अचानक आक्रमण करने की वजह से सीमा पर युद्ध के हालात उत्पन्न हो गए. एक फौजी के परिवार को किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है, इस का अंदाजा मुझे उस वक्त ही हुआ. टीवी पर युद्ध के हृदयविदारक दृश्य और फौजियों की निर्जीव देहें, उन के परिजनों का करुण रुदन देख कर मैं विचलित हो जाती. मन तरहतरह की आशंकाआें से घिरा रहता. सारा वक्त समर की कुशलता की प्रार्थना करते ही बीतता.

ऐसे में मैं एक दिन वीरां के साथ बैठी थी कि समर की बटालियन से फोन आया. समर को लापता कर दिया गया था. माना जा रहा था कि उसे दुश्मन देश के सैनिकों ने बंदी बना लिया था.

कुछ देर के लिए तो हम सब जड़ रह गए. फिर मन की पीड़ा आंखों के रास्ते आंसू बन कर बह निकली. वहां समर न जाने कितनी यातनाएं झेल रहा था और यहां…खुद को कितना बेबस और लाचार महसूस कर रहे थे हम.

युद्ध की समाप्ति पर दुश्मन देश ने अपने पास युद्धबंदी होने की बात पर साफ इनकार कर दिया. हमारी कोई कोशिश काम न आई. हम जहां भी मदद की गुहार लगाते, हमें आश्वासनों के अलावा कुछ न मिलता. उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आ रही थी.

वक्त गुजरता गया. इतना सब होने के बाद भी जिंदगी रुकी नहीं. वाकई यह बड़ी निर्मोही होती है. जीवन तो पुराने ढर्रे पर लौट आया लेकिन मेरा मन मर चुका था. वीरां और मैं अब भी साथ ही कालिज जाते, मगर समर अपने साथ हमारी हंसीखुशी सब ले गया. बस जीना था…तो सांस ले रहे थे, ऐसे ही…निरुद्देश्य. जीवन बस, एक शून्य भर रह गया था.

फिर हम दोनों ने साथ ही बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन का कोर्स भी कर लिया. तब एक दिन मम्मी ने मुझे अनिरुद्ध की तसवीर दिखाई.

‘मैं जानती हूं कि तुम समर को भुला नहीं पाई हो, लेकिन बेटा, ऐसे कब तक चलेगा? तुम्हें आगे के बारे में सोचना ही पडे़गा. इसे देखो, मातापिता सूरत में रहते हैं और खुद अमेरिका में साफ्टवेयर इंजीनियर है. इतना अच्छा रिश्ता बारबार नहीं मिलता. अगर तुम कहो तो बात आगे बढ़ाएं,’  वह मुझे समझाने के स्वर में बोलीं.

उन की बात सुन कर मैं तड़प उठी, ‘आप कैसी बातें कर रही हैं, मम्मी? मैं समर के अलावा किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकती. आप एक औरत हैं, कम से कम आप तो मेरी मनोदशा समझें.’

‘तो क्या जिंदगी भर कुंआरी  रहोगी?’

‘हां,’ अब मेरा स्वर तल्ख होने लगा था, ‘और आप क्यों परेशान होती हैं? आप लोगों को मेरा बोझ नहीं उठाना पडे़गा. जल्दी ही मैं कोई नौकरी ढूंढ़ लूंगी. फिर तो आप निश्ंिचत रहेंगी न…’

‘पागल हो गई हो क्या? हम ने कब तुम्हें बोझ कहा, लेकिन हम कब तक रहेंगे? इस समाज में आज के दौर में एक अकेली औरत का जीना आसान नहीं है. उसे न जाने कितने कटाक्षों और दूषित निगाहों का सामना करना पड़ता है. कैसे जी पाओगी तुम? समझ क्यों नहीं रही हो तुम?’ मम्मी परेशान हो उठीं.

मगर मैं भी अपनी जिद पर अड़ी रही, ‘मैं कुछ समझना नहीं चाहती. मैं बस, इतना जानती हूं कि मैं सिर्फ समर से प्यार करती हूं.’

‘और समर का कुछ पता नहीं. वह जिंदा भी है या…कुछ पता नहीं,’ वीरां की धीमी आवाज सुन कर हम दोनों चौंक पड़ीं. वह न जाने कब से खड़ी हमारी बातें सुन रही थी, लेकिन हमें पता ही न चला था. मम्मी कुछ झेंप कर रह गईं लेकिन उस ने उन्हें ‘मैं बात करती हूं’ कह कर दिलासा दिया और वह हम दोनों को अकेला छोड़ कर वहां से चली गईं.

‘वीरां, तू कुछ तो सोचसमझ कर बोला कर. तू भूल रही है कि जिस के बारे में तू यह सब बातें कर रही है, वह तेरा ही भाई है.’

‘जानती हूं, लेकिन हकीकत से भी तो मुंह नहीं मोड़ा जा सकता. हमारी जो जिम्मेदारियां हैं, उन्हें भी तो पूरा करना हमारा ही फर्ज है. तुम्हें शायद भाई के लौटने की आस है, लेकिन जब 1971 के युद्धबंदी अब तक नहीं लौटे, तो हम किस आधार पर उम्मीद लगाएं.’

‘लेकिन…’

‘लेकिन के लिए कोई गुंजाइश नहीं है, सौम्या. तुम अपने मातापिता की इकलौती संतान हो. तुम चाहती हो कि वे जीवनभर तुम्हारे दुख में घुलते रहें? क्या तुम्हारा उन के प्रति कोई फर्ज नहीं है?’

‘लेकिन मेरा भी तो सोचो, समर के अलावा मैं किसी और से कैसे शादी कर सकती हूं?’

‘अपनी जिम्मेदारियों को सामने रखोगी तो फैसला लेना आसान हो जाएगा,’ उस दिन हम दोनों सहेलियां आपस में लिपट कर खूब रोईं.

फिर मैं अनिरुद्ध से विवाह कर के न्यू जर्सी आ गई, मगर मैं समर को एक दिन के लिए भी नहीं भूल पाई. हालांकि मैं ने अनिरुद्ध को कभी भी शिकायत का मौका नहीं दिया, अपने हर कर्तव्य का निर्वहन भली प्रकार से किया, पर मेरे मन में उस के लिए प्रेम पनप न सका. मेरे मनमंदिर में तो समर बसा था, अनिरुद्ध को कहां जगह देती.

यही बात मुश्किल भी खड़ी करती. मैं कभी मन से अनिरुद्ध की पत्नी न बन पाई. उस के सामने जब अपना तन समर्पित करती, तब मन समर की कल्पना करता. खुद पर ग्लानि होती मुझे. लगता अनिरुद्ध को धोखा दे रही हूं. आखिर उस की तो कोेई गलती नहीं थी. फिर क्यों उसे अपने हिस्से के प्यार से वंचित रहना पडे़? अब वही तो मेरे जीवन का सच था. मगर खुद को लाख समझाने पर भी मैं समर को दिल से नहीं निकाल पाई. शायद एक औरत जब प्यार करती है तो बहुत शिद्दत से करती है.

सोने से पहले जरूर पिएं गुनगुना पानी, शरीर को मिलेंगे अनगिनत फायदे

बहुत से लोग अक्सर कहते हैं कि सुबह में जागते ही गुनगुना पानी पीना चाहिए. लोग इसके बहुत से फायदे भी गिनाते हैं. बहुत से हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि सेहत की बेहतरी के लिए और शरीर के बेहतर ढंग से काम के लिए सुबह में गुनगुने पानी का सेवन जरूरी है. इससे त्वचा संबंधित बहुत सी परेशानियां दूर होती है. पर क्या आपको पता है कि सोने से पहले गुनगुना पानी पीने के क्या फायदे होते हैं?

इस खबर में हम आपको सोने से पहले गुनगुना पानी पीने के फायदों के बारे में बताने वाले हैं.

वजन कम करने में है मददगार

गर्म पानी पीने से वजन कम होता है. जानकारों का मानना है कि अगर आप तेजी से वजन कम करना चाहते हैं तो रोज सुबह और रात में गुनगुना पानी जरूर पिएं.

शरीर से बाहर होते हैं टौक्सिक्स

गुनगुना या हल्का गर्म पानी पीने से शरीर का तापमान बढ़ता है और पसीना अधिक निकलता है. आपको बता दें कि पसीना निकलने से ब्लड सर्कुलेशन बेहतर रहता है और टौक्सिक एजेंट्स बाहर निकलते हैं.

डिप्रेशन में असरदार

बहुत से जानकारों का मानना है कि शरीर में पानी की कमी होने से डिप्रेशन का खतरा अधिक होता है. और इससे हमारी नींद पर भी काफी बुरा असर होता है. रात में सोने से पहले एक गिलास गुनगुना पानी पीने से शरीर में पानी की स्थिति समान्य रहती है और मूड अच्छा रहता है.

बेहतर होता है डाइजेशन

गर्म पानी के पीने से पाचन बेहतर रहता है. आपको बता दें कि दिन की तुलना में रात में पाचन कमजोर होता है. रात में गर्म पानी पीने से खाना जल्दी पचता है.

उलझे धागे : दामिनी के गले की फांस क्या चीज बन रही थी ? – भाग 2

जब वह अपनी परीक्षा के बाद वापस ससुराल आई थी तब शैली ने कैसा बुरा सा मुंह बनाया था. दामिनी आज तक वह भंगिमा नहीं भूल सकी है, बल्कि कई बार अकेले में उस ने शीशे के सामने खड़े हो कर ठीक वैसी ही भंगिमा बनाने की कोशिश भी की थी और अपनी इस बचकानी हरकत पर खूब हंसी भी थी.

दामिनी ने शैली को ले कर सुमित्रा को विश्वास में लेना शुरू कर दिया और धीरेधीरे सास सुमित्रा के दिमाग में शैली की शादी करवाने की बात फिट कर दी थी. शैली के पास भी न कहने का कोई बहाना नहीं था. हार कर अपने सुमित्रा के सामने हथियार डाल दिए और एक दिन दामिनी ने शैली को अपने पति के घर से उसे उस के पति के घर विदा कर दिया.

2 साल बीत गए. शैली अपने पति के साथ रम नहीं पाई थी. रमती भी तो कैसे. दिल कहीं और दिमाग कहीं. ऐसे भी भला रमा जाता है कहीं. शैली के मायके के फेरे बढ़ने लगे. जब भी शैली आती, विनय उसी के आगेपीछे घूमता. दामिनी को कई बार लगता था जैसे कि दालभात में मूसलचंद शैली नहीं बल्कि वह खुद है जो उन दोनों के बीच अनचाही सी आ गई क्योंकि 2 साल बीतने पर भी वह विनय के दिल में अपने लिए जगह नहीं बना सकी थी.

इधर जब विनय का ट्रांसफर दूसरे शहर में हो गया तो दामिनी ने राहत की सांस ली. वह विनय के साथ उस की नई पोस्ंिटग पर आ गई. यहीं आ कर एक दिन किन्हीं कमजोर पलों में विनय ने दामिनी को अपनी अंकशायिनी बनाया और फलस्वरूप सिद्ध का अंकुरण उस की कोख में हुआ.

लेकिन इस दौरान अपने पति को पूरी तरह से नकार कर शैली सुमित्रा के पास वापस आ गई और उधर दामिनी अपनी कोख की आहट से आहत थी. त्रिकोणीय रिश्ते से अनजान सुमित्रा ने दामिनी और शैली दोनों को राहत देने के मकसद से शैली को दामिनी के पास उस की देखभाल के लिए भेज दिया.

शैली को देखते ही दामिनी फिर से आशंकित हो उठी लेकिन विनय एकदम खिल गया था. गर्भवती दामिनी उन दोनों को एकसाथ उठतेबैठते, खातेपीते और घूमतेफिरते देखती तो सिर्फ कुढ़ कर रह जाती. चाह कर भी कुछ कर नहीं पा रही थी.

सिद्ध के जन्म के बाद तो विनय पूरी तरह से शैली का हो गया था. उन दोनों के बीच जो सामाजिक मर्यादा की महीन रेखा थी वह भी अब मिट चुकी थी. दामिनी अपनेआप को बेहद अपमानित महसूस कर रही थी.

एक दिन हिम्मत कर के उस ने सारी बातें सास सुमित्रा को बता दीं लेकिन वहां से भी उसे आश्वासन के अतिरिक्त कुछ न मिला. तब अपने स्वाभिमान को बचाने की खातिर दामिनी सिद्ध को ले कर मायके आ गई और बैंक की प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने लगी.

आवश्यकता आविष्कार की जननी ही नहीं होती बल्कि मेहनत और लगन की कुंजी भी होती है. दामिनी ने भी रातदिन मेहनत की और आखिर बैंक में उस का चयन हो ही गया. वह सिद्ध को ले कर अपनी पोस्ंिटग पर आ गई. विनय और शैली ने लाख चाहा लेकिन दामिनी विनय को तलाक देने को राजी नहीं हुई.

थोड़ा बड़ा होने पर दामिनी ने सिद्ध को होस्टल भेज दिया और खुद बैंक पीओ की परीक्षा की तैयारी करने लगी. यहीं मानव उस की जिंदगी में आया था. मानव उस कोचिंग संस्थान का मालिक था जिस में दामिनी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही थी. अकेलेपन और पति की बेवफाई से जू  झती दामिनी के लिए मानव एक संजीवनी बन कर आया था.

मानव से रिश्ता जुड़ने के बाद धीरेधीरे दामिनी को विनय और शैली का रिश्ता सम  झ में आने लगा था. मानव के जिंदगी में आते ही उसे यह महसूस हुआ कि प्यार किसी के चाहने या न चाहने की परिधि से बहुत बाहर का एहसास है. यह तो, बस, हो जाता है जैसे उसे हो गया मानव से. शायद ऐसे ही हुआ होगा विनय को शैली से.

अब दामिनी ने विनय और शैली की दुनिया से दूर जाने का फैसला कर लिया था लेकिन वह सिद्ध को पिता के साए से वंचित नहीं करना चाहती थी. वह उस के बचपन को अदालत के गलियारे में भटकने नहीं देना चाहती थी. इसलिए सब के बीच एक मौन अलिखित सम  झौता हो गया था. दामिनी मानव के साथ खुश थी तो विनय और शैली अपनी दुनिया में. सिद्ध दामिनी और विनय सहित सब का चहेता था. यहां तक कि अब तो शैली और मानव का भी.

‘‘मु  झे क्या सोचना था. मैं ने तो बरसों पहले ही सोच लिया था जो मु  झे सोचना था. बस, एकदो दिन में चली जाऊंगी अपनी पोस्ंिटग पर,’’ दामिनी ने साफसाफ कहा.

‘‘तुम्हें जिस से शिकायत थी जब वह ही नहीं रहा तो अब नाराजगी छोड़ो और घर लौट आओ,’’ सुमित्रा ने आग्रह किया.

‘‘नहीं मां. अब संभव नहीं. हां, बीचबीच में विनय के क्लेम से जुड़ी फौर्मेलिटी पूरी करने आती रहूंगी,’’ कह कर दामिनी अपना सामान पैक करने लगी.

महीनेभर की भागदौड़ के बाद विनय के सारे क्लेम पूरे हो गए. आज दामिनी को पति की ग्रेच्युएटी और पीएफ के पैसे का चैक मिलना था.

‘‘शैली, यह चैक मेरे अकाउंट में जमा होते ही सारा पैसा मैं तुम्हारे नाम ट्रांसफर कर दूंगी,’’ दामिनी ने कहा तो सास सुमित्रा भी उसे आश्चर्य से देखने लगी.

‘‘नहीं दामिनी, विनय के पैसों पर तुम्हारा और सिद्ध का अधिकार है. उस के बाद चाची का, मेरा तो इस पर कोई भी हक नहीं बनता. न कानूनी न सामाजिक,’’ शैली ने इनकार कर दिया.

जनवरी का पहला सप्ताह कैसा रहा बौलीवुड का कारोबार

Bollywood Jan 2024 Box Office Collection : हमेशा से माना जाता रहा है कि जनवरी के पहले सप्ताह में प्रदर्शित होने वाली फिल्मों को सफलता नसीब नहीं होती लेकिन इस वर्ष 5 जनवरी को प्रदर्शित हुई फिल्में ‘फायर औफ लव रेड’ तथा ‘तोबा तेरा जलवा’ के निर्माताओं ने दावा किया था कि वे इस वर्ष इतिहास बदल देंगे.

दिसंबर 23 में प्रदर्शित सफल फिल्म ‘एनिमल’ से अपनी फिल्म ‘फायर औफ लव रेड’ की तुलना करते हुए निर्देशक अशोक त्यागी ने दावा किया था कि उन की फिल्म ‘एनिमल’ का बाप है और फिल्म ‘तोबा तेरा जलवा’ में ‘ग़दर 2’ फेम अमीषा पटेल हीरोइन है, इसलिए उम्मीद थी कि ये फिल्में एक नया इतिहास रचेंगी. पर अफसोस कि इन फिल्मों के निर्माता और इन के प्रचारक ने सब बंटाधार कर दिया.

फिल्म ‘एनिमल’ की ही तरह राजीव चौधरी व निर्देशक अशोक त्यागी की फिल्म ‘फायर औफ लव रेड’ ऐसे इंसान की कहानी है जो लोगों की नजर में मशहूर लेखक है पर वह हिंसा व सैक्सप्रेमी है. मगर दोनों फिल्मों में सब से बड़ा अंतर यह है कि ‘एनिमल’ में सबकुछ दृश्यों के माध्यम से दिखाया गया था जबकि ‘फायर औफ लव रेड’ में संवादों से बताया गया है कि नायक 6 लड़कियों के साथ यौनसुख भोगने के बाद उन की हत्याएं कर चुका है.

फिल्म की कहानी व पटकथा कमजोर है. निर्देशक अशोक त्यागी अपने फिल्म के हीरो कृष्णा अभिषेक को सुपरस्टार बता रहे थे लेकिन फिल्म में कृष्णा अभिषेक को देख कर लगता है कि उसे अभिनय नहीं आता. फिल्म के निर्देशक अशोक त्यागी अपने बलबूते पर फिल्म को सोशल मीडिया पर प्रमोट करते रहे मगर निर्माता, इस फिल्म के प्रचारक ने कोई काम नहीं किया.

इतना ही नहीं, फिल्म के कलाकार कृष्णा अभिषेक, पायल घोष, भारत दाभोलकर सहित किसी ने भी फिल्म को प्रमोट नहीं किया. मजेदार बात यह है कि फिल्म के निर्माता राजीव चौधरी किसी जमाने में फिल्म ‘मैं ने प्यार किया’ सहित राजश्री प्रोडक्शन, देव आनंद व भप्पी सोनी सहित कई दिक्कत फिल्मकारों के प्रचारक रहे हैं.

यही नहीं, इस फिल्म के प्रदर्शन की तारीख भी 5 बार बदली गई. परिणामतया 4 करोड़ रुपए की लागत में बनी यह फिल्म बौक्सऔफिस पर सिर्फ 25 लाख रुपए ही कमा सकी. किसी फिल्म की इतनी बड़ी दुर्गति की कल्पना नहीं की जा सकती.

फिल्म के प्रदर्शन से पहले निर्देशक अशोक त्यागी और निर्माता राजीव चौधरी के सारे दावों की हवा निकल गई. अभिनेता कृष्णा अभिषेक सुपरस्टार तो छोड़िए, फिल्मों में अभिनय करने के लायक भी नहीं रहे. उन के लिए छोटा परदा ही जिंदाबाद.

5 जनवरी को ही दूसरी फिल्म ‘तोबा तेरा जलवा’ प्रदर्शित हुई जिस की कहानी के केंद्र में उत्तर प्रदेश का रियल स्टेट कारोबारी रोमी त्यागी (जतिन खुराना) है. उस की पारिवारिक जिंदगी खुशहाल है पर जब रोमी की जिंदगी में लैला (अमीषा पटेल) आती है तो बवाल मच जाता है.

फिल्म की कमजोर पटकथा, कमजोर निर्देशन और कलाकारों के निराशाजनक अभिनय के साथ ही बिना प्रचार के फिल्म को प्रदर्शित किया जाना फिल्म को डुबो दिया. फिल्म के प्रचारक ने पत्रकारों के पास फिल्म के ट्रेलर लौंच की खबर ईमेल पर भेज कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली.

अमीषा पटेल व जतिन खुराना ने भी इस फिल्म को प्रमोट करने के लिए एक भी दिन का वक्त नहीं दिया. लेखक व निर्देशक आकाश आदित्य लामा ने 2012 में एक असफल फिल्म ‘सिगरेट की तरह’ निर्देशित की थी. अब पूरे 12 साल बाद वे लेखक व निर्देशक के तौर पर ‘तोबा तेरा जलवा’ ले कर आए पर उन्होंने बेमन ही लेखन व निर्देशन किया.

5 करोड़ रुपए की लागत में बनी फिल्म ‘तोबा तेरा जलवा’ महज 30 लाख रुपए ही बौक्सऔफिस पर कमा सकी. काश, फिल्मकार व कलाकार पैसे की बरबादी करने के बजाय अपने काम को ईमानदारी से करने पर ध्यान देते तो यह नौबत न आती.

यह भूल मत करना : माधवी की शादी हुई या नहीं ? – भाग 2

‘‘मौसी,’’ मैं ने विरोध किया.

‘‘हां, माधवी, प्रेम करना है और उस में सफल होना है तो बहुत साहस चाहिए, नहीं तो मेरे जैसी दशा होगी.’’

‘‘मौसी, आप के जैसी? आप को क्या हुआ?’’ मैं चौंकी. मैं कुछ समझ न पाई थी.

‘‘माधवी, क्या तुम ने कभी यह गौर नहीं किया कि इतने बरसों में तुम्हारे मौसाजी कभी मेरे मायके नहीं आए?’’

‘‘हां, इस पर लोगों की टिप्पणियां भी सुनी हैं. क्यों नहीं आते, मौसाजी?’’

‘‘वही कारण है माधवी, जो मैं ने तुम्हें बताया है, प्रेम में मेरी कायरता.’’

‘‘आप ने कैसी कायरता दिखाई, मौसी?’’

‘‘माधवी, मेरी सगाई जिस से हुई थी, एक मोटरसाइकिल दुर्घटना में उस की एक बांह कुचल गई थी. हाथ ठीक तो हुआ पर 3 उंगलियां कट गईं. उस ने सगाई तोड़ दी और कसम दिलवा कर मेरी शादी तुम्हारे मौसाजी से करवा दी. मैं बहुत रोईधोई. मैं ने आत्महत्या करने की भी कोशिश की पर कुछ न हुआ और मेरी शादी यहां हो गई,’’ इतना कह कर मौसी काफी देर चुप रहीं तो मुझे लगा, वे रो रही हैं.

‘‘मौसी, मौसी,’’ मैं ने मेहंदी लगे हाथों से मौसी का चेहरा छू कर देखा तो वे हंस कर बोलीं, ‘‘नहीं, माधवी, मैं रो नहीं रही. दूसरों की गलती हो तो रोऊं, अपनी गलती पर इंसान आखिर कब तक रोएगा?’’

इतना घोर अवसाद मौसी की आवाज में था कि एक पल को मैं अपना भी दुख भूल गई. मैं मेहंदी रचे हाथ मौसी के कंधों पर रख, बोली, ‘‘मौसी, क्या बात है? बताइए न?’’

‘‘हां माधवी, बताती हूं. यही समय है बताने का, वरना मेरे जैसी एक भूल तुम भी कर बैठोगी.

‘‘मैं जब 18 वर्ष की थी और कालेज में द्वितीय वर्ष में पढ़ती थी, तब मेरी सगाई सतीश नामक युवक से हुई थी. वह आकाशवाणी में अभियंता था. सुंदर, सुसंस्कृत और आधुनिक विचारों वाला. मांपिताजी ने मेरी बात मान ली कि मैं पहले बीए कर लूं, शादी के बाद पढ़नालिखना न हो पाएगा. फिर 4-5 माह तक वह यदाकदा मुझ से मिलने, मेरी पढ़ाई की बात पूछने आता रहा. फिर कभीकभार हम बाजार जाते.’’

‘‘‘मुझे बहन के लिए गिफ्ट खरीदना है, एकता को ले जाऊं?’ सतीश कहता, ‘मां ने बाजार जाने के लिए कहा है, एकता को साथ ले कर हम जाएं?’ धीरेधीरे घनिष्ठता बढ़ने लगी. मुझे तो पता था उस से मेरी शादी होने वाली है, इसलिए मैं अपने मन की बातें उसे बताती.

‘‘मैं उस का बहुत आदर करती थी, माधवी, क्योंकि मेरे भोलेपन का उस ने कभी फायदा नहीं उठाया. मेरी पवित्रता पर लांछन न लगने दिया. हमारी शादी

की तारीख पक्की हुई. उसी के 4 दिनों

बाद वह एक गाय को बचातेबचाते मोटरसाइकिल से गिर पड़ा. उस

का बायां हाथ उस के नीचे आ कर कुचल गया.

‘‘बस, 2 दिनों बाद जब उंगलियां कटीं तब से वह मेरे पीछे पड़ गया कि एकता, मैं तुम से शादी नहीं कर सकता. तुम्हारा जीवन खराब नहीं कर सकता.’’

‘‘आप ने मना नहीं किया, मौसी?’’

‘‘किया माधवी, पर हाथ के घाव के कारण वह बहुत मानसिक तनाव में था. डाक्टर को शक हुआ कि वह ठीक नहीं हो पाएगा. आखिरकार, सब के दबाव में आ कर मैं मान गई,’’ कहतेकहते मौसी कुछ क्षण को चुप हो गईं. मैं उन के दर्द का एहसास करती रही. वे फिर बोलीं, ‘‘और तब, तुम्हारे मौसाजी से शादी हो गई.’’

‘‘फिर?’’ मैं ने पूछा.

‘‘उन्हें थोड़ी बातें तो मालूम थीं. मैं भी प्रेम से आहत थी. अपनी सारी भड़ास मैं ने तुम्हारे मौसाजी को अपराधी सिद्ध करने में निकाली, ‘आप मुझ से शादी न करते तो क्या होता? मैं ने सतीश को ही पति माना है. आप के साथ फेरे लेने से ही थोड़ी न सबकुछ हो गया,’ और भी न जाने क्याक्या,’’ कहती हुई मौसी फिर चुप हो गईं. शायद वे उन दिनों की कड़वी यादों में खो गईं.

‘‘फिर मौसी?’’ मैं ने टोका.

‘‘फिर क्या, 2 साल तक मैं मायके में ही रही. बीए किया, तब तक सोचविचार में परिपक्वता आई. मेरे पड़ोस में सुधा नामक एक युवती रहने आई थी, उस से मेरी अंतरंगता बढ़ गई. उसे सब बताया तो उस ने जो बात कही वह मुझे चुभ गई, ‘एकता, तुम ने 2 गलतियां कीं. एक तब जब सब के कहने पर तुम ने सतीश को छोड़ा. अरे, साहस कर के थोड़े दिन उसे झठा आश्वासन दे देतीं, फिर कर लेतीं शादी. मातापिता के सामने दिखातीं साहस. यदि वही दुर्घटना शादी के बाद होती तो क्या तुम सतीश को छोड़ देतीं? ‘दूसरी गलती की अपने पति को पहली ही रात सतीश के बारे में बता कर या तो तुम उन से विवाह न करतीं और अब, जबकि कर लिया तो चुप रहतीं. कोई गलत कदम तो तुम ने उठाया नहीं था, न बतातीं. अब तुम ने और सतीश ने अपना जीवन तो खराब किया ही, एक और पुरुष का जीवन बरबाद करने पर तुली हो. या तो उन्हें छोड़ दो, स्वतंत्र कर दो या फिर उन के पास चली जाओ.’’’

‘‘तो आप मौसाजी के पास चली गईं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘हां माधवी, चली गई. 2 वर्षों तक वे हर तीजत्योहार पर आते रहे. हम एक कमरे में रहते पर वे मुझे छूते भी नहीं. मेरे घर के किसी व्यक्ति को नहीं मालूम कि  हमारे बीच क्या चल रहा था. कभी वे मुझे एक ताना भी न देते.’’

‘‘फिर क्या किया आप ने?’’

‘‘एक दिन मैं स्वयं तुम्हारे मौसाजी के पास चली गई. क्षमा मांग ली उन से तो उन्होंने कहा, ‘एकता, क्या तुम तनमन से आज से मुझे अपना पति मान रही हो? इस रास्ते में पीछे नहीं मुड़ पाओगी, फिर कभी?’ मैं ने हां कर दी,’’ कहते मौसी ने लंबी सांस ली.

‘‘मगर मौसाजी यहां क्यों नहीं आते, मौसी?’’

‘‘क्या पता, माधवी. मैं ने इस बारे में उन से कभी न पूछा. बस, एक दिन उन्होंने मुझ से कहा, ‘तुम जाओ, रोकूंगा नहीं पर मुझे जाने को न कहना.’’

‘‘और आप के साथ मौसाजी का व्यवहार?’’

‘‘हमेशा ठीक रहा. माधवी, मैं यह कहना चाहती हूं कि तुम ऐसी कोई भूल न करना. आलोक का कोई पत्र या फोटो न रखना. मैं ने रखा था संदूक में. एक दिन तुम्हारे मौसाजी सुबह की चाय पीतेपीते बोले, ‘एकता, क्या तुम्हें नहीं लगा कि तुम्हारे संदूक में रखे पत्र, कार्ड और सूखे फूल फेंक दिए जाने चाहिए?’ मुझे कैसा लगा, मैं बता नहीं सकती. तब तक शकुन और आरती पैदा हो चुकी थीं.’’

‘‘सब से अधिक शर्म की बात तो यह है माधवी कि सतीश ने मेरी शादी के एक साल बाद ही शादी कर ली थी और मैं ने वे 2 साल किस तनाव व अपमान में काटे, मैं ही जानती हूं. इधर जिस शख्स के लिए मैं पति को ठेस पहुंचा चुकी थी, वह सुख से जी रहा था,’’ कहतेकहते मौसी का गला सूखने को हुआ.

‘‘फिर भी मौसी, आप ने उन के पत्र और फूल संजो रखे थे,’’ मैं ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा.

दोस्त अजनबी : आखिर क्या हुआ था सुधा और पुण्पावती के बीच ? – भाग 2

कार्यक्रम दोबारा बना. पुण्पा को बताया, ‘अब पहले तुम्हारे पास आ रही हूं, 3 दिन बाद मामाजी के यहां जाऊंगी, जाना जरूरी है, फिर लौट कर 4 दिन तुम्हारे साथ रहूंगी, फिर वापस बुदापैश्त. अब तो ठीक है?’ पुण्पा खुश थी.

मैं उत्साहित भी थी और थ्रिल्ड भी. परदेश में पहली बार अकेले घूमने जा रही थी. लोगों ने कहा, डर की कोई बात नहीं है, यह भारत तो है नहीं है कि अकेली औरत देखते ही लोग माहौल सूंघने के लिए आसपास मडराने लगें. यहां तो अकेले ही आनेजाने का चलन है.

पैकिंग हो गई. फारेंट, जिलौटी और यूरो को पर्स के अलगअलग खानों में रख कर अनुराग ने काफी हिदायतें दे दीं. मेरे मैथ्स पर उन्हें कभी भरोसा नहीं रहा. ट्रेन कैलेती स्टेशन से चलती थी. टैक्सी ले कर जब स्टेशन पहुंचे तो पता चला प्लेटफौर्म पर केवल यात्री ही जा सकते हैं. भारी मन से अनुराग को विदा दे कर धडक़ते दिल से अटैची घसीटते कंधे पर भारी सा बैग संभालती आगे बढ़ी. ट्रेन लगी हुई थी. सामने ही यूनिफौर्म में टीटी खड़ा था. उस के बताए कूपे में घुस कर अपनी बर्थ देखी. कूपे में 6 सीटें थीं, शीशे के दरवाजे पर परदा पड़ा था.

ट्रेन सुबहसुबह वार्सा पहुंच गई. उतर कर बाहर जाने का रास्ता पूछा और माल असबाब के साथ बाहर आ गई.

‘टैक्सी?’ एक टैक्सीवाला मेरे बाहर निकलते ही आ कर पूछने लगा. ‘वाह, यहां भी इंडिया की तरह है,’ सोचा और पुण्पावती का पता उसे दिखा दिया.

‘ओके, ओके,’ करता वह टैक्सी की ओर बढ़ा. सामान रख कर मैं भी टैक्सी में बैठ गई. चलतेचलते करीब आधा घंटा हो गया. वार्सा की साफसुथरी, लंबीचौड़ी सडक़ें अभी अंगड़ाई ले रही थीं. ट्रैफिक पूरी तरह शुरू नहीं हुआ था, न ही दुकानें खुली थीं. मगर सुबह की हलकीफुलकी चहलपहल शुरू हो चुकी थी. वार्सा बुदापैश्त से ज्यादा खुला और आधुनिक लगा. होना ही था. विश्व युद्ध में तो यह शहर लगभग पूरी तरह से ध्वस्त हो गया था, पर जितनी तेजी से और सुंदरता से इसे नया रूप कर दिया गया था उस से पोलिश लोगों की मेहनत, इच्छाशक्ति और कल्पना का लोहा मानना ही पड़ा.

अब तक टैक्सी में बैठेबैठे बोरियत होने लगी थी. पुण्पा ने तो कहा था कि घर स्टेशन से ज्यादा दूर नहीं है. कहीं यह भी दिल्ली के टैक्सीवालों की तरह घुमा तो नहीं रहा है. मन में एक बार खयाल आया. पता नहीं क्यों एक विश्वास था कि ‘नहीं, ये लोग धोखा नहीं दे सकते’, यह सोच कर सीट से टिक कर बाहर देखने लगी. थोड़ी देर में होटल आ गया. मैं ने टूटीफूटी इंग्लिश और इशारे से ड्राइवर को समझाने की कोशिश की कि वह इंतजार करे, मैं एक बार कन्फर्म कर आती हूं कि मेरी फ्रैंड यही रहती है. वह समझ गया. मैं अंदर गई और होटल के बोर्ड पर उस का नाम देख कर वापस आ गई.

‘ओ को?’ ड्राइवर ने पूछा ‘येस,’ मैं ने कहा. उस ने डिक्की से सामान निकाल कर बाहर रख दिया. ‘हाऊ मच?’ मेरे पूछने पर ड्राइवर ने मीटर दिखा दिया. 49.50 लिखा था. मैं ने न जाने क्या सोच कर उसे 50 यूरो दिए. वह उन्हें ले कर टैक्सी में बैठा और मैं कुछ सोच या कर पाती, उस से पहले ही उस ने टैक्सी स्टार्ट की और चला गया. ‘बाप रे. इतनी मंहगी टैक्सी है यहां’ मैं ने मन में सोचा और सामान घसीटती अंदर चल दी.

पुण्पा के अपार्टमैंट से फोन पर बात करने की आवाज आ रही थी. घंटी बजाई, ‘हेलो सुधा’ दरवाजा खुलते ही एक अजनबी चेहरा और जानीपहचानी आवाज सामने थी.

‘हेलो, आप पहचान गईं?’

‘लो, कैसे न पहचानती, एक साल से नैट पर बात करकर के अजनबीपन तो जैसे भाग ही गया था.’

‘बस, झट से नहा कर आती हूं, फिर आराम से चाय पिएंगे.’

‘आप को कितने बजे यूनिवर्सिटी जाना है?’

‘जल्दी नहीं. साढ़े बारह बजे, बहुत समय है.’

‘ठीक है.’ नहा कर आई तब तक पुण्पा ने चायपकौडिय़ां तैयार कर मेज पर रख दी थीं.

खातेखाते इधरउधर की बातें होती रहीं. चूंकि अभी तक हम लोग इंटरनैट पर ही बातें करते रहते थे, इसलिए आमनेसामने बैठ कर वही बातें फिर से करने पर भी नई लग रही थीं. एकदूसरे की शक्ल हम पहली बार ही देख रही थीं.

जब मैं पुण्पा की तरफ देख कर बात करती तो परिचयअपरिचय का मिलाजुला अजीब सा एहसास होता, मगर जब उस की आवाज सुनती तो लगता न जाने कितना पुराना परिचय है.

यूनिवर्सिटी के लिए निकलते हुए पुण्पा ने कहा, ‘आप का ट्राम का एक हफ्ते का टिकट बनवा देती हूं, नहीं तो परेशानी तो होगी, साथ ही, बहुत महंगा भी पड़ेगा.’

‘हां, यहां तो टैक्सी बहुत ही मंहगी है,’ मुझे सुबह के 50 यूरो मन में कसक रहे थे.

‘हां. मंहगी तो है मगर बहुत ज्यादा तो नहीं.’

‘अरे, स्टेशन से आप के घर का टैक्सीवाले ने 50 यूरो ले लिए थे.’

‘क्या, 50…यूरो..?’ पुष्पा का मुंह खुला का खुला रह गया.

‘आप ने पूछा कि यूरो या जिलौटी? यहां की करैंसी तो जिलौटी है न?’

‘नहीं, मैं ने 50 यूरो का नोट दिया और वह ले कर चला गया.’

पुण्पा कुछ क्षण वैसी खड़ी रही, ‘छोड़िए, जो हो गया सो हो गया. बेईमान सब जगह होते हैं. हम भारतीय लोग तो यहां शक्ल से ही परदेशी के रूप में पहचान लिए जाते हैं.’

‘उसे बाकी पैसे लौटाने चाहिए थे न.’ मुझे लगा मैं रो दूंगी. 50 यूरो बड़ी रकम थी.

‘हां, उसे पता चल गया कि आप विदेशी हैं. आप को करैंसी के बारे में ज्यादा मालूम नहीं है. लगता है सुबहसुबह आप से कोई महा बेईमान टकरा गया. वरना स्टेशन से यहां तक 25-30 जिलौटी से ज्यादा नहीं लगता.’

मुझे अपने ऊपर गुस्सा आने लगा. जब वह गाड़ी में बैठा था तो मैं ने रोका क्यों नहीं? बेवकूफों की तरह देखती क्यों रही? दिल कर रहा था कि अगर टैक्सीवाला मिल जाए तो टैक्सी उठा कर उस के ही सिर पर दे मारूं.

‘छोड़िए, जितना सोचेंगी उतना दुख होगा.’ मुझे भी मालूम था कि जो हो गया उस के लिए कुछ नहीं किया जा सकता. पर अपनी इस बेवकूफी के कारण मन बहुत खराब हो गया. अनुराग ने कितनी बार सारी करैंसीज समझाई थीं. कहा था स्टेशन पर ही और कनवर्ट करवा लेना. मगर, अब घूमने का मजा आधा हो गया.

पुण्पा मुझे वार्सा और पोलैंड के बारे में न जाने क्याक्या बताती जा रही थी. मगर मेरा कुछ सुनने में मन नहीं लग रहा था. ‘पता नहीं कौन मनहूस कूपे में था, जिस का मुंह सुबहसुबह देखा था,’ मन ही मन बड़बड़ाती जा रही थी.

‘अगर आप 50 यूरो में ही अटकी रहेंगी तो कुछ एंजौय नहीं कर पाएंगी,’ पुण्पा कह रही थी.

‘नहींनहीं, मैं कुछ और सोच रह थी.’ मैं चोरी पकड़ी जाने पर शर्मिंदा हो गई. मैट्रो स्टेशन से 7 दिन का पास ले लिया. हालांकि वहां रहना 4 दिन ही था. 7 दिन का पास 3 दिन का टिकट खरीद कर यात्रा करने से ज्यादा सस्ता पड़ा.

आगे के 4 दिन खूब मजे से गुजरे. हम सुबह से शाम तक वार्सा के अलगअलग इलाके घूम आए.

अगले दिन मुझे मामाजी के यहां जाना था. फ्लाइट सुबह की थी. मैं निकल गई. जिस दिन लौटना था उस दिन पुण्पा ने कहा था कि वह छुट्टी ले लेगी. मैं दोपहर में ही वार्सा पहुंच गई. मैं ने पुण्पा को फोन किया. वह क्लास में थी. उस ने छुट्टी नहीं ली थी, ‘ठीक है, आप लौबी में इंतजार कीजिएगा, मैं एक घंटे तक पहुंच जाऊंगी.’ मुझे ताज्जुब हुआ कि पुण्पा ने यह क्यों नहीं कहा कि आप रिसैप्शन से चाबी ले कर घर चली जाइएगा. थकान और नींद से सिर भारी हो रहा था. एक बार मन में आया कि पुण्पा से फोन कर के चाबी के लिए पूछ लूं. शायद क्लास में होने के कारण वह चाबी की बात करना भूल गई होगी. मगर फिर न जाने क्या सोच कर नहीं पूछा. इस बार टैक्सीवाले को जिलौटी में ही भुगतान किया और अपनी बुद्धिमानी पर खुश होती हुई लौबी में बैठ कर पुण्पा का इंतजार करने लगी. करीब एक घंटे के बाद पुण्पा आ गई.

‘हल्लोऽऽ’ पुण्पा को दूर से देख मैं ने चहक कर कहा.

‘हलो.’ पुण्पा की आवाज में लेशमात्र भी उत्साह न था. मुझे यह सपाटपन थोड़ा खटका, ‘थकी है, शायद लगातार लैक्चर रहे होंगे,’ मन को समझा लिया.

‘चलो, तुम्हें किसी से मिलवाती हूं,’ पुण्पा ने कहा.

‘किस से?’ मुझे हैरानी हुई. पुण्पा ने चाबी नहीं ली थी. हम सीधे ऊपर आ गए.

घंटी बजाते ही दरवाजा खुला, ‘मेरे हस्बैंड’ पुण्पा ने सामने खड़े पुरुष से मेरा परिचय कराया.

‘नमस्ते,’ मैं ने मशीनी अंदाज में हाथ जोड़ दिए, पर मैं सकते में आ गई, ‘मगर पुष्पा, तुम्हारे हस्बैंड तो अगले सप्ताह आने वाले थे न?’

‘हां, मगर मेरी मदर की तबीयत खराब है, इसलिए इन्हें जल्दी आना पड़ा.’

‘ओह. क्या बहुत ज्यादा खराब है?’

‘हां,’ पुण्पा ने कहा, मगर न जाने क्यों मुझे उस का लहजा पहले से बदला हुआ लग रहा था.

छंटती हुई काई : क्या निशात के ससुराल वाले दकियानूसी सोच छोड़ पाएं ? – भाग 2

‘‘मैं बहुत परेशान और फिक्रमंद हूं, अपनी बेटी और नवासी के मुस्तकबिल को ले कर. अभी मुझे अपनी और 2 जवान बेटियों की भी शादी करनी है. पहला ही रिश्ता नहीं निभा तो बाकी रिश्ते कैसे जोड़ सकूंगा, कामिल भाई. मेरी बेटी एमए कर रही थी. लड़का सरकारी नौकर है, खातापीता घर का है यही सोच कर फौरन शादी की तैयारियां कर बेटी की शादी करा दी. एक बात जानते हो, पढ़ने वाली बेटी पर काम का बोझ कभी उस की मां ने डाला नहीं.

“नातजुर्बेकार लड़की के ऊपर 6-7 लोगों के 3 वक्त के खाने का भार डाल कर सास पान की टोकरी ले कर दिनभर मोहल्ले वालों, रिश्तेदारों की गिबतें करती बैठी रहतीं. कभी खाने में कोई कमी रह जाती तो शौहर आसमान सिर पर उठा लेता. उस ने कुछ अच्छे शेरों को फ्रेम करा कर घर में टांग दिया तो सास कहने लगीं कि हमें तालिम दे रही है यह कल की लड़की,’’ सास के ताने सुनसुन कर बेटी रोती रहती थी. आप ही बताइए, क्या गलत किया मेरी बेटी ने?’’ हनीफ हताशाभरे स्वर में बोला.

मैं जानता हूं कि इस 21वीं सदी में भी मुसलमान शरियत के खिलाफ, उन बेबुनियाद रवायतों को पीढ़ी दर पीढ़ी मानते चले जा रहे हैं जिन का हदीसों में कहीं जिक्र तक नहीं है. कई मुसलमान मजारों पर सजदा कर के खुदावंदताला के वजूद को ही नकारने से बाज नहीं आते. इसलामी तौरतरीकों से अनजान जाहिल व अनपढ़ मुसलमान औरतें अपनी अधकचरी जानकारी बच्चों पर थोप कर उन्हें शिर्क और बिद्दत करने की सबक घुट्टी में पिला देती हैं. रहीसही कसर कठमुल्ला लोग अपनी रोटी सेंकने के लिए कौम की जाहिलियत का भरपूर फायदा उठा कर उन्हें इसलाम की सही बातें न बतला कर सदियों से चल रहे गैरइसलामी बातों की ही जानकारी दे कर गुमराही के अंधेरी खोहों में धकेल देते हैं.

“सच तो यह है कि हिंदुस्तान के मुसलमानों को किसी भी बात की सही जानकारी है ही नहीं, तभी तो पूरा माअशरा कई फिरकों में बंटा अपनेअपने तरीके से इसलाम के फरायज को अंजाम देता है और एकदूसरे के खिलाफ खड़ा रहता है.

मैं समझ गया था कि अजमेरी साहब के घर में सासबहू के अहं की टकराहट की धमक गूंजने लगी है. परिवार की शांति, अंधविश्वासों और रोशनखयाली के बीच गहरे अंतराल की खाई को पार कर सकने में असमर्थ है.

रूमाल से मुंह पोंछ कर हनीफ मंसूरी बतलाने लगे कि हमारे घर में सब के लिए तौलिए, साबुन और खाने के लिए शालियां भी अलगअलग हैं लेकिन निशात के ससुराल में पूरा घर एक ही साबुन, एक ही तौलिया और एक बड़े कटोरे में निवाला डूबोडूबो कर सभी लोग सालन रोटी खाते हैं. एक बड़ी परात में चावल डाल कर सभी साथसाथ खाते हैं. यहां तक कि एक ही गिलास से सब पानी भी पी लेते हैं.

बेटी ने शौहर को अकेले में समझाने की कोशिश की थी,‘‘अम्मी को पायरिया और आप के छोटे भाई को टीबी और अब्बू को चर्मरोग है. आप सब एक ही तौलिए का इस्तेमाल करते हैं. दूसरे का जूठा पानी और खाना खाते हैं तो ये बीमारियां पूरे घर के लोगों में फैल जाएंगी. ये संक्रामक बीमारियां हैं. ये सब हाइजीनिक भी नहीं हैं. अगर आप लोग अलगअलग…’’ इतना सुन कर बेटे ने बीवी की सलाहों को नमकमिर्च लगा कर मां तक पहुंचाने में जरा सी देरी नहीं की. सास तो गरम तवे पर पानी की बूंदों की तरह छनछनाने लगीं.

निशात पर तो तोहमत लगाया जाने लगा, ‘‘हम बहू की जगह घर को तोड़ने वाला इबलीस ब्याह कर ले आए हैं. हमारे घर की एकता बरदाश्त नहीं हो रही है कमबख्त से.’’ सब की आंखों में किरकिरी की तरह खटकने लगी निशात.

‘‘लगा दो 2-4 हाथ कमीनीकुतिया को. अभी अक्ल ठिकाने आ जाएगी. इस से पहले कि मेरा घर तोड़े, मैं इस का थोबड़ा ही न तोड़ दूं,’’ कहते हुए सास ने तड़ातड़ 2-4 थप्पड़ जड़ दिए थे निशात के गाल पर.

पढ़ीलिखी निशात तिलमिला गई थी. अपमान की भयंकर वेदना में सुलगती 2 दिनों तक बिना खानापीना कमरे में पड़ी रही. पतिपत्नी के बीच विश्वास, सामंजस्य और आपसी समझदारी से हर बात को एकदूसरे के साथ बांटने की बुनियादी नियमावली को धता बतला कर उस का पढ़ालिखा मातृभक्त पति सरेआाम उस के यकीन की धज्जियां उड़ा देता, तो बुरी तरह से छटपटा कर रह जाती निशात. ब्याहता जीवन में तन का मेल होने से मन और खयालात भी मिल जाएं यह जरूरी नहीं है.

निशात का देवर जमीनों की दलाली और ठेकेदारी करता था. ससुर रिटायर्ड हुए तो अतिरिक्त आमदनी के लिए मकान के ऊपर और 3 कमरे बना लेने की प्लानिंग होने लगी तो निशात ने सास के सारे कसैले व्यवहार भूला कर सलाह दी, ‘‘अम्मी, आप और अब्बू इस साल हज कर आइए. मकान तो आप के बेटे बना ही लेंगे कभी न कभी.’’ लेकिन बददिमाग सास को बहू की हर सीधीसहज बात उलटी ही लगती थी.

वे आंखें तरेर कर बोलीं,”अच्छा तो तू चाहती है कि हम अपने पैसे फुजूल में बरबाद कर के अपने बच्चों के जीने के साधन भी छीन लें. यह क्यों नहीं कहती कि हमारे रहने से तेरी आजादी छिन गई है. हमारी सलाह तुझे बंदिशें लगती हैं. हज के बहाने हमें बाहर भेज कर तू पूरे घर पर हुकूमत करना चाहती है.’’

“बस, इसी तरह बेटी की सास उस से लड़ने का कोई न कोई बहाना ढूंढ़ लेती है. बेसिरपैर की छोटीछोटी बातों ने मेरी बेटी की खुशियां छीन ली हैं. 2 साल हो गए सुनते और सहते हुए, लेकिन बेटी को जब मेरे घर पर छोड़ गए तो सब्र के सारे बांध टूटते जा रहे हैं. इस मामले में अगर पसमांदा समाज समिति कोई कदम नहीं उठाती है तो मैं पुलिस में रिपोर्ट करूंगा. दहेज उत्पीड़न, घरेलू मारपीट और जान से मार देने की धमकी देने का इलजाम लगाऊंगा. तब इन बददिमागों की अक्ल ठिकाने आएगी.

“शादीब्याह को मजाक समझ लिया है. दहेज की लालच में शादी की, औरत के साथ ऐश किया, बच्चा पैदा कर लिया. अब उसे जिस्मानी और मानसिक तकलीफे दे रहे हैं. कोर्ट के चक्कर लागाएंगे तब समझ में आएगा आटेदाल का भाव. धूल चटा दूंगा उन्हें,’’ हनीफ गुस्से से कांपने लगा था.

‘‘हनीफ भाई, थोड़ा सब्र और तसल्ली रखें. आप की समधिन मेरी बीवी की रिश्ते की बहन है. हम दोनों उन के घर जा कर बात करेंगे. बड़े से बड़े मसले आपस में बैठ कर सुलझा लिए जाते हैं. सब ठीक हो जाएगा. आप जोश में आ कर ऐसा कोई कदम न उठाइएगा कि 3 जिंदगियां बरबाद हो जाएं,’’ मैं ने हनीफ के कंधे पर हाथ रख कर तसल्ली दी.

रात को बिस्तर पर लेटा तो हजारों खयाल, अनेक सवाल दिमाग को मथने लगे,’ निशात जैसी न जाने कितनी लड़कियां हैं जो अपने ससुराल वालों की तंगजहनियत और बहू को सिर्फ नौकरानी और बच्चे जनने वाली मशीन समझी जाने के कारण आपसी तालमेल नहीं बैठा पाती हैं. कभी अहं, कभी दहेज, कभी बहू का खुलापन, कभी बहू की तालिम वगैरा ससुराल में सासननदों के गले में हड्डी की तरह फंसने लगता है. कब खत्म होगी यह आपसी और घरेलू कलह, कब सोच पाएगा मुसलमान अपनी तरक्की के साथ माअशरे और मुल्क की तरक्की के बारे में. ढेर सारे बच्चे, उन की समस्याएं, परवरिश, शादीब्याह, फिर तलाक, कोर्टकचहरी. बस, इसी में ही खत्म हो जाती है मुसलमानों की जिंदगी,’ ठंडी सांस ले कर मैं ने करवट बदली तो याद आ गया कि आज जो हनीफ अपनी बेटी की चिंता में बिलबिला उठा है, 3 साल पहले उसी हनीफ की मौजूदगी में मुझे अपमान का कितना गहरा आघात सहना पड़ा था.

वह नाजुक सी लड़की : क्या मंजरी और रोहन की शादी हो पाई ? – भाग 2

लेकिन सच्चे प्रेमी भला खतरों से कभी डरते हैं. वे कहीं न कहीं मिल कर आपस में अपने दिल का दर्द बांट लेते.

वह 11वीं में आ गई थी. उस ने कोचिंग में पढऩे की इच्छा जाहिर की थी. अम्मांपापा की काफी लंबी बहसबाजी के बाद एक ऐसी कोचिंग में उस का ऐडमिशन करवा दिया गया, जहां फीस नहीं लगती थी, साथ ही उस के ऊपर पूरी निगरानी भी रखी जा सकती थी.

अब वह देखता था कि मंजरी सुबह होते ही कभी घर का सामान लेने जाती, कभी दूध तो कभी चाय तो कभी सब्जी… यह सिलसिला रात तक चलता रहता. और वह जैसे ही घर में घुसती माधुरी की चीखचिल्लाहटें सुनाई पडऩे लगती थीं.

एक दिन वह रोहन के सामने फफक पड़ी थी, ‘‘रोहन, अम्मां मुझ से कहती हैं कि तुम पैैसे चुरा लेती हो. बताओ क्या मैं चोर लगती हूं? उस का मासूम सा चेहरा देख रोहन की आंखें भी भीग उठी थीं.

एक किस्सा समाप्त नहीं होता, दूसरा शुरू हो जाता. एक शाम उन के घर से गाली, मारपीट की आवाजें सुनाई पड़ रही थीं. उन लोगों का शोर कोई सुन न ले, इसलिए तेज आवाज में टीवी चला दिया जाता था. 3-4 दिन बाद मंजरी मिली तो उस ने बताया कि पापा बोले, “कल उन्होंने रात में ₹10,000 गिन कर जेब में रखे थे. सुबह जेब में नहीं थे. अम्मां ने साफसाफ कह दिया कि वह कुछ नहीं जानती.”

घर में उन तीनों के सिवा दूसरा तो कोई था नहीं इसलिए पक्का था कि मंजरी ने ही चुराए हैं. उस ने बताया कि मेरी जम कर पिटाई हुई, पापा ने बेल्ट से पूरी पीठ उधेड़ कर रख दी, तो अम्मां ने लातघूंसे और थप्पड़ से पूरी कुटाई कर डाली. उस के बैग अलमारी, बिस्तर सबकुछ खंगाल डाला गया.

“सच बता, अपने आशिक को दे आई?”

पापा बोलो, “इतने रुपए ले कर यह घर से भागने की तैयारी तो नहीं कर रही है?”

मारपीट तो रोज की बात हो चुकी थी इसलिए वह भी ढीठ बनती जा रही थी,”मार डालो, एक दिन किस्सा ही खत्म हो जाए, लेकिन घर का काम करने के लिए भी तो नौकरानी चाहिए.”

बतौर सजा 3 दिन के लिए खाना बंद और स्कूल जाना भी बंद कर दिया गया. रोहन को वह दिखाई नहीं पड़ रही थी, इसलिए वह बेचैन था, लेकिन उस से मिलने का कोई रास्ता भी नहीं था. जब 3-4 दिन बाद वह दिखी, तो उस के चेहरे का रंग काला सा पड़ा हुआ था, शरीर एकदम दुर्बल दिखाई पड़ रहा था. जब रोहन से उस ने बताया कि मैं ने 3 दिनों से अन्न का दाना भी नहीं खाया है, तो सुनते ही रोहन की आंखों में आंसू आ गए. उस ने जल्दी से उसे जूस पिला कर डोसा खिलाया था.

“रोहन, अब मुझ से ये सब बरदाश्त नहीं होता.”

“मंजरी, मैं अपनी मां से बात करूंगा.”

छुटभैये गुंडे टाइप नेता तो रोज ही शाम को आते थे. लेकिन वह सामने नहीं जाती थी. हंसीठट्ठा और पीनापिलाना चलता. अम्मां सजधज कर बैठ जातीं और देर रात तक बैठकें चलती. मंजरी अंदर लेटेलेटे कभी सो जाती तो कभी उन के भद्देभद्दे हंसीमजाक और कभी गालीगलौच सुनती रहती.

कुछ दिनों से वह मिली नहीं थी, लेकिन अब वह नएनए कपड़ों में दिखार्ई देने लगी थी. घर के कामों के लिए कामवाली आने लगी थी. वही झाड़ू वगैरह करती. अब वह घर से बहुत कम निकलती थी.

एक दिन रात में किसी तरह चुपके से एक पत्र रोहन को दे कर जल्दी से वह अपने घर में भाग गई थी…

“प्रिय रोहन,

“जैसे बकरे को बलि देने के पहले नहलाधुला कर माला पहनाया जाता है, वैसे ही आजकल मुझे बढ़िया खाना खिलाया जाता है, मेवामिठाई खाने को दिया जाता है. ताकत के कैप्सूल खिलाए जा रहे हैं, जिस से मेरा शरीर भर जाए.

“मैं कैप्सूल नाली में फेंक देती हूं. आजकल मारपीट और अत्याचार बिलकुल बंद कर दिए गए हैं. मेरी शादी का ड्रामा रच कर 50 साल के बलविंदर के साथ मुझे बेचा जा रहा है.

“एक दिन वह आया था, तब अम्मां ने मुझे बैठक में बुलाया था. वह तो मुझे देखते ही बेकाबू हो गया था. मुझे अपने बगल में बैठा लिया, उस की वासना से पूर्ण लाल डोरे वाली आंखें मेरे जिस्म के आरपार देख रही थीं. उस के हाथ में शराब का जाम था. उस ने पहले मेरे गालों पर हाथ फेरा फिर मेरे हाथों को पकड़ लिया था.

“मैं वहां से गुस्से में उठ कर अंदर
भाग आई थी. अम्मां खुसुरफुसुर बातें कर रही थीं. शायद मेरा सौदा तय कर लिया है, इसलिए मुझे घर में बंद कर रखा है.

‘‘रोहन, यदि तुम कुछ नहीं करोगे, तो मैं फांसी पर लटक जाऊंगी और अपनी जान दे दूंगी. जो कुछ करना है, जल्दी करना. नहीं तो हाथ मलते रह जाओगे.”

रोहन ने पत्र अपनी मां सुजाता को दे दिया. उन्होंने अपनी नौकरानी से उन के घर आने वाली दाई से पता लगाने को कहा था. 2-3 दिन में यह साफ हो गया कि गुपचुप तरीके से उस के फेरे डालने की बातें घर में हो रही हैं.

सुजाताजी को मालूम था कि मंजरी बालिग हो चुकी है. उन्होंने अपने बेटे को चुपचाप तरीके से मंजरी को ले कर दिल्ली भाग जाने की सलाह दी.

दूसरा कोई रास्ता न दिखाई पड़ने पर मंजरी को ले कर कभी बस में तो कभी ट्रेन में छिपतेछिपाते दोनों दिल्ली पहुंच गए. वहां पर सुजाता की पुरानी सहेली ने दोनों की शादी करवा दी. दोनों अपना ठिकाना बदलबदल कर समय बिता रहे थे.

मंजरी होशियार थी. वह अपने साथ अपना हार्ईस्कूल का सर्टिफिकेट ले कर घर से निकली थी. सुजाताजी जानती थीं कि वह बहुत बड़ी मुसीबत में फंसने वाली हैं लेकिन एक तरफ उन के बेटे का प्यार था तो दूसरी ओर उस नाजुक सी लडक़ी मंजरी के जीवन को बचाने का था. वह प्यारी सी मंजरी के लिए सारे खतरों से लडऩे को तैयार थीं.

मंजरी को घर में न पा कर माधुरीजी की पैरों के नीचे से मानों धरती खिसक गई थी. मंजरी के एवज में उन्हें पार्टी की ओर से चुनाव लडऩे का टिकट और एक बड़ी धनराशि मिलने वाली थी. अब तो उन्होंने हंगामा करना शुरू कर दिया. उन्होंने रोहन के नाम नामजद रिपोर्ट पुलिस में लिखा दी. उस ने लिखवाया कि वह उन की लडक़ी को बहलाफुसला कर भगा ले गया है और मंजरी घर से ₹5 लाख ले कर भागी है. वह और उस के मांबाप दोनों ने मिल कर उन की नाबालिग लडक़ी को गायब कर दिया है.

उन दोनों पर पुलिसिया अत्याचार शुरू हो गया. पहले पूछताछ शुरू हुई, जब उस से कुछ नतीजा नहीं निकला, तो दोनों की पुलिस ने पिटाई कर के जेल में बंद कर दिया, क्योंकि दबंग नेता का पुलिस पर दबाव जो था.

वे यहांवहां भागते हुए परेशान थे. तभी उन्हें मातापिता के घर की कुर्की और उन की पिटाई की खबर मालूम हुई तो रोहन और मंजरी दोनों टूट गए और पुलिस के सामने जा कर आत्मसमर्पण कर दिया.

मांबाप को पुलिस ने छोड़ दिया. बेटे की भी जमानत हो गई. लेकिन बेटी ने अपने मांबाप के पास जाने से इनकार कर दिया, तो पुलिस ने उसे ‘नारी निकेतन’ में भेज दिया.

नारी निकेतन की हालत देख वह सिसक पड़ी थी. वहां छोटीबड़ी सभी उम्र की लड़कियां और महिलाएं रहती थीं. कुछ तो ठीक दिख रही थीं, लेकिन कुछ की दशा दयनीय दिखाई पड़ रही थी. वार्डन की शक्ल में उसे दूसरी अम्मां मिल गई थीं जो बहुत कडक़ और कर्कश आवाज में भद्दीभद्दी गालियां देती थीं.

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