Story in Hindi
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चुनाव जैसे ही नजदीक आते हैं, सभी पार्टियां जीतने के लिए बड़ेबड़े वादे करती हैं. 13 मार्च, 2024 को कांग्रेस ने महिलाओं के लिए ‘नारी न्याय गारंटी’ का ऐलान किया. बताया गया कि यह पार्टी के घोषणापत्र का हिस्सा भी है. इस व दूसरे अन्य वादों को राहुल गांधी ने अनाउंस किया. ‘नारी न्याय गारंटी’ का वादा तो विशेषकर महिलाओं की आर्थिक व सामाजिक पृष्ठभूमि को मजबूत करने को ले कर था, जिस में 5 बिंदु रखे गए-
– देश की गरीब महिलाओं को सालाना 1 लाख रुपए की वित्तीय सहायता.
– केंद्र सरकार की नई नियुक्तियों में 50 फीसदी महिलाओं को हक.
– आंगनवाड़ी, आशा और मिडडे मील वर्कर्स के मासिक वेतन डबल.
– हर पंचायत में महिला जागरूकता के लिए कानूनी सहायक की नियुक्ति.
– हर जिले में महिलाओं के लिए कम से कम 1 होस्टल.
एक तरह से देखा जाए तो यह वादा अपनेआप में खासा दिलचस्प हैं क्योंकि जिस तरह संपत्ति और अधिकारों पर पुरुषों का कब्जा है उसे एक हद तक संतुलन करने के लिए इस तरह के काम किए जाने जरूरी हैं.
दूसरे, यह जरूरी इसलिए भी है कि आज आम लोगों के पास परचेजिंग पावर कम हो रही है. मार्केट में वैल्थ सर्कुलेशन हो नहीं पा रहा. धन कुछ ख़ास लोगों के हाथों में ही संकुचित हो रहा है. ऐसे में गरीबों को डायरैक्ट कैश ट्रांसफर से देश की अर्थव्यवस्था को चलाए रखना बेहद जरूरी भी है. पर समस्या यह कि इस तरह के बड़े वादे अकसर डूबते खेमे से ही आते हैं जिस पर बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं लगाई जा सकतीं.
हालांकि इस से एक सवाल तो बनता ही है कि 75 वर्षों बाद भी ऐसी नौबत क्यों है कि पक्षविपक्ष द्वारा महिलाओं के लिए ऐसे वादे करने पड़ रहे हैं? आखिर क्यों देश की आधी आबादी यानी महिलाओं को लुभाने के लिए चुनावी पार्टियों को तरहतरह के वादे करने पड़ रहे हैं?
इसी तरह प्रधानमंत्री मोदी ने 8 मार्च को सिलैंडर पर 100 रुपए की छूट देने का ऐलान किया. अपने चुनावी घोषणापत्र में भाजपा की तरफ से कहा गया है कि वह जीतने के बाद सभी बीपीएल परिवारों की छात्राओं को केजी से पीजी तक मुफ्त शिक्षा का लाभ देगी. पीएम उज्ज्वला योजना में महिलाओं को 450 रुपये में सिलैंडर दिया जाएगा. 15 लाख ग्रामीण महिलाओं को लखपति योजना के अंतर्गत कौशल प्रशिक्षण दिया जाएगा. एक करोड़ 30 लाख से अधिक महिलाओं को आर्थिक सहायता के साथ आवास का लाभ मिलेगा. बीपीएल परिवारों की लड़कियों को 21 वर्ष तक कुल 2 लाख रुपए का लाभ दिया जाएगा.
हालांकि सवाल यह भी है कि भाजपा की घोषणाओं से कितनी उम्मीद लगाईं जाए? साल 2014 से पहले भाजपा ने ‘अच्छे दिन’, ‘हर साल 2 करोड़ नौकरियां’, ‘महंगाई कम करने’, ‘कालाधन वापस लाने’ और ‘हर व्यक्ति के बैंक अकाउंट में 15 लाख रुपए डालने’ जैसे तमाम वादे किए थे. हालांकि, चुनाव के बाद सवाल पूछा गया तो तब के भाजपा अध्यक्ष व वर्तमान में गृहमंत्री अमित शाह ने इसे चुनावी जुमला बता दिया.
चुनाव में महिलाओं को लुभाने के लिए राष्ट्रीय पार्टियां ही कोशिश नहीं कर रहीँ, बल्कि क्षेत्रीय पार्टियां भी वादे कर रही हैं. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने ट्विटर हैंडल से 4 मार्च को ट्वीट करते हुए कहा, “महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए आप की दिल्ली सरकार ने एक कदम आगे बढ़ते हुए अब महिलाओं को सालाना 12 हजार रुपए की सौगात दी है. 18 साल से अधिक उम्र की हमारी सभी बहनबेटियों, माताओं और बहनों को अब मुख्यमंत्री सम्मान योजना के तहत 1,000 रुपए प्रतिमाह दिए जाएंगे.” इसी तरह तमिलनाडु में भी डीएमके सरकार व पश्चिम बंगाल में टीएमसी सरकार हर महीने 1,000 रुपए डायरैक्ट ट्रांसफर कर रही हैं. लगभग सभी पार्टियां महिलाओं के लिए जरूरी घोषणाएं जरूर कर रही हैं.
यह सोचा जा सकता है कि अचानक इन पार्टियों में महिलाओं के प्रति ऐसा रुझान क्यों होने लगा? इस की वजह पिछले एक दशक में महिलाओं के चुनावी भागीदारी में बड़ा बदलाव आना है. महिलाएं सब से बड़ा वोटबैंक बनकर उभरी हैं. इतना ही नहीं, विधानसभा चुनाव में बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल जैसे बड़े राज्यों में महिलाओं ने पिछले कुछ चुनावों में पुरुषों से अधिक वोट डाले.
लोकसभा से ले कर विधानसभा चुनाव तक सभी जगह इन की वोटिंग में 10 से 15 फीसदी तक का भारी इजाफा देखने को मिला है. इसे इन आंकड़ों से समझते हैं- 2014 के लोकसभा चुनाव में पुरुष और महिला मतदाताओं के मतदान प्रतिशत में सिर्फ डेढ़ प्रतिशत का अंतर था, जबकि 2019 में वे पुरुषों से आगे निकल गईं. 2019 के चुनाव में पुरुषों का मतदान प्रतिशत जहां 67.02 था, वहीं महिलाओं का 67.18 प्रतिशत था.
इस बढ़ते ट्रैंड और महिलाओं को ले कर हो रही घोषणाओं से ऐसा लग रहा है कि 2024 के चुनाव में महिला मतदाताओं की संख्या पिछली बार की तुलना में ज्यादा होगी. चुनाव आयोग के मुताबिक 2024 के चुनाव में कुल 96.8 करोड़ मतदाता हिस्सा ले सकते हैं. इन में 49.7 करोड़ पुरुष और 47.1 करोड़ महिला मतदाताओं के होने का अनुमान है.
खासकर, ग्रामीण क्षेत्रों में तो इन की संख्या और भी बढ़ी है. आज किसी भी पार्टी की सियासत को ऊपर या नीचे करने में महिला वोटर बड़ी भूमिका निभा रही हैं. कहा जाता है कि मोदी के सत्ता में रहने का एक बड़ा कारण महिलाएं ही हैं. यही वजह भी है कि केंद्र से ले कर राज्य सरकारों में सरकार चला रही पार्टियां महिलाओं के लिए कई खास योजनाएं व घोषणाएं संचालित कर रही हैं.
यदि इस का श्रेय 2005 में आए ‘मनरेगा’ एक्ट व पैतृक संपत्ति पर बेटी के अधिकार और 2009 में मिले शिक्षा के अधिकार जैसे अधिकारों को दिया जाए जिन्होंने महिला उत्थान में बड़ा योगदान दिया तो गलत न होगा, क्योंकि इन अधिकारों ने निचले से निचले वर्ग को छूने की कोशिश की, जिन में दोयम दर्जे में महिलाएं ही थीं.
एक तरह से महिलाओं के लिए ये नीतियां संजीवनी बूटी बन कर आईं, जिन्होंने उन्हें राजनीतिक रूप से ज्यादा सजग और अपने हकों के लिए लड़ना सिखाया, उन के हाथों में थोड़ीबहुत आर्थिक शक्ति देने की कोशिश की, सही मानों में आत्मनिर्भर बनाने में योगदान दिया.
मगर इस के बावजूद अगर 2024 के चुनावों में महिलाओं के लिए स्पैशल घोषणाएं की जा रही हैं तो जरूर सोचा जा सकता है कि आज भी महिलाएं उस स्तर पर नहीं पहुंच पाई हैं जहां उन्हें होना चाहिए था. आज भी सारी आर्थिक और कानूनी शक्तियां पुरुषों के हाथों में हैं. इस की पुष्टि वर्ल्ड बैंक द्वारा जारी की गई नई रिपोर्ट ‘वीमेन, बिजनैस एंड द ला’ और उस के आंकड़े भी करते हैं.
इस रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि कार्यस्थल पर महिलाओं और पुरुषों के बीच का अंतर पहले की तुलना में अधिक व्यापक है. वहीं जब हिंसा और बच्चों की देखभाल से जुड़े कानूनी मतभेदों को ध्यान में रखा जाता है, तो महिलाओं को पुरुषों की तुलना में दोतिहाई से भी कम अधिकार प्राप्त हैं. हैरानी यह कि दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं है जो इस असमानता से अछूता हो, यहां तक कि दुनिया की समृद्ध अर्थव्यवस्थाएं भी इस अंतर को पाटने में सफल नहीं हो पाई हैं, बाकि भारत में मामला गंभीर है, क्योंकि भारत में लैंगिक असमानता दुनिया के कई देशों के मुकाबले बेहद ख़राब स्थिति में है.
‘वैश्विक लैंगिक अंतर रिपोर्ट 2023’ में भारत का स्थान 146 देशों में शर्मनाक 127वें नंबर पर है. भारत के कामकाजी और शीर्ष पदों पर असमानता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि संसद में महिलाओं की भागीदारी महज 14 फीसदी है. वहीँ देश के कुल 119 अरबपतियों की सूची में मात्र 9 महिला अरबपति हैं.
आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि पुरुषों को महिलाओं के मुकाबले ज्यादा मौके हैं, वरना देश की कामकाजी महिलाओं की भागीदारी मात्र 23 फीसदी और पुरुषों की 72 फीसदी न होती. यानी, देखा जाए तो 50 फीसदी महिलाएं चुनावी घोषणाएं करने वाली पार्टियों के मुखिया से ले कर संसद में चुने पुरुष नेताओं के रहमोकरम पर हैं, यह महिलाओं के लिए गुलामी से कम नहीं.
लाखों लोग शरीर से आने वाली दुर्गंध की समस्या का सामना करते हैं, खासकर गरमी के मौसम में. अधिकतर लोगों को लगता है कि शरीर से बदबू या दुर्गंध पसीना उत्पन्न होने के कारण होती है. मगर यह आधी हकीकत है. दरअसल हमारे शरीर से बदबू आने का कारण शरीर पर गंध या बदबू पैदा करने वाले बैक्टीरिया की मौजूदगी है. शरीर की त्वचा में स्थित बैक्टीरिया एपोक्राइन ग्लैंड से निकलने वाले पसीने में स्थित प्रोटीन और फैट को खाते हैं. शरीर के बालों वाले और नम हिस्से में लाखों बैक्टीरिया होते हैं जो शरीर में रहते हैं. ये बैक्टीरिया गंधहीन एपोक्राइन पसीने के यौगिकों को बदबूदार गंध में बदल देते हैं.
पसीने की बदबू शारीरिक स्वास्थ्य और आत्मविश्वास को प्रभावित करने वाली एक आम समस्या है. यह दिनभर के कामकाज और रोजमर्रा के तनाव के कारण भी हो सकती है. शरीर से आने वाली पसीने की बदबू न केवल हमारा आत्मविश्वास कम करती है बल्कि निजी स्वास्थ्य पर भी असर डालती है. जबकि एक सुगंधित शरीर न केवल आत्मविश्वास को बढ़ाता है बल्कि लोगों के बीच आप के प्रति आकर्षण को भी बढ़ाता है. इसलिए शरीर की गंध को रोकना और सुरक्षा के उचित तौरतरीकों को अपनाना बेहद जरूरी है.
• पसीने के अलावा शरीर में पानी की कमी होने पर भी शरीर से बदबू आती है.
• हार्मोनल परिवर्तन भी शरीर की गंध का एक कारण हो सकता है. स्त्रियों में गर्भावस्था या मेनोपोज के दौरान और पुरुषों में यौन संबंधों के दौरान बदलते हुए हार्मोन्स गंध की वजह बन सकते हैं.
• तनाव की वजह से भी दुर्गंध आती है. तनाव में होने पर हमारे शरीर से बहुत अधिक मात्रा में पसीना निकलता है. इस दौरान शरीर में कौर्टिसोल नाम का हार्मोन बनता है जिस की वजह से ज्यादा मात्रा में निकला पसीना बैक्टीरिया के संपर्क में आने के बाद बदबू की वजह बनता है.
• कपड़ों का गलत चयन भी इस की वजह बन सकता है. सिंथेटिक कपड़े पसीना नहीं सोख पाते जबकि कौटन फैब्रिक बहुत जल्दी पसीना सोख लेते हैं. अगर आप को बहुत अधिक पसीना आता है तो बेहतर होगा कि आप रेयोन और पोलिएस्टर जैसे फैब्रिक का इस्तेमाल करने से बचें. वरना पसीना न सूखने की वजह से शरीर में बैक्टीरिया पनपने लगते हैं और बदबू आनी शुरू हो जाती है.
• गलत खानपान की वजह से भी शरीर की बदबू बढ़ सकती है. ज्यादा कैफीन या प्याज, लहसुन का प्रयोग इस समस्या को बढ़ा सकता है.
हाइजीन का खयाल रखें
रोजाना 2 बार अच्छे से स्नान करें. नहाने और त्वचा को रगड़ने से कीटाणुओं, गंदगी और दुर्गंध को दूर करने में मदद मिलती है. शरीर के सभी हिस्सों को अच्छी तरह से धोना चाहिए खासकर गरदन, बगल और पैरों को. ये बौडी के वो एरिया हैं जहां कीटाणु जमा होते हैं और दुर्गंध पैदा करते हैं. नहाने के पानी में कोलोन मिलाने से शरीर की बदबू दूर होती है. चंदन, गुलाब और खस जैसे प्राकृतिक तत्त्वों के गुण शरीर की बदबू दूर करने में मदद करते हैं.
ऐसे में शावर जेल और बौडी शैंपू आप के काम आ सकते हैं. नहाने के पानी में गुलाबजल मिलाएं. यह एक नैचुरल कूलर है. नहाने के पानी में गुलाब जल मिलाने से शरीर की अच्छी महक आती है और ताजगी का एहसास होता है. पसीने को त्वचा पर जमा न होने दें. अपने बगल के बालों की नियमित सफाई करें. सूती कपड़े पहनें. ढीले और आरामदायक अंडरगारमैंट्स पहनें.
डाइट में करें बदलाव
शरीर से अधिक पसीना आने से बदबू आने लगती है. ऐसे में डाइट में बदलाव कर आप शरीर की दुर्गंध से बच सकते हैं. रोजाना नीबूपानी पिएं. इस से ठंडक का एहसास होगा और शरीर से पसीना कम आएगा. खाना खाने से पहले और बाद में अदरक की चाय पिएं. ताजी अदरक की जड़ को बारीक काट लें और चुटकीभर नमक के साथ मिला लें. भोजन से पहले इसे थोड़ा सा चबा लें. भोजन के साथ गरम पानी पीने से भी मदद मिल सकती है. लाइट और कम मसाले वाली चीजें खाएं. एक बार में ज्यादा खाना खाने के बजाय छोटेछोटे पोर्शन में खाएं.
परफ्यूम और डिऔडरैंट्स प्रयोग करें
परफ्यूम और डिऔडरैंट्स दुर्गंध को रोकने में मदद कर सकते हैं. सही डिऔडरैंट्स का चयन करें और उन का नियमित रूप से उपयोग करें. डिऔडरैंट आप के शरीर पर पसीने से पैदा होने वाली दुर्गंध को कम करता है. डिऔडरैंट यह सुनिश्चित करता है कि पसीने वाली त्वचा पर रोगाणुरोधी एजेंट लगाए जाएं. वे एजेंट गंध पैदा करने वाले बैक्टीरिया को मारते हैं या कम से कम धीमा कर देते हैं.
एक अच्छा डिऔडरैंट हलके स्पर्श के साथ यह काम करता है जिस से आप को जलन नहीं होती. डिऔडरैंट सुनिश्चित करता है कि कोई भी शख्स आप के शरीर से उत्पन्न किसी भी गंध को महसूस न कर सके, बल्कि उसे आप के शरीर से हलकी मोहक सी डियो की खुशबू का एहसास हो. बहुत से अच्छे डिऔडरैंट्स एंटीपर्सपिरेंट भी होते हैं. अगर आप को बहुत अधिक पसीना आता है तो इस प्रकार के एंटीपर्सपिरेंट डिऔडरैंट्स एकसाथ पसीने और पसीने से पैदा होने वाली दुर्गंध से निबटते हैं.
कुछ अच्छे डिऔडरैंट्स
• नीविया फ्रैश ऐक्टिव ओरिजनल 48 औवर्स डिऔडरैंट
• एडिडास डायनमिक पल्स डिऔडरैंट
• डव मेन+ केयर एंटीपर्सपिरेंट डिऔडरैंट
• पार्क एवेन्यू स्टौर्म डियो
• नाइक अर्बन मस्क डिऔडरैंट
• एक्स डार्क टैंपटेशन डिऔडरैंट
• वाइल्ड स्टोन डिऔडरैंट
• फोग मार्को बौडी स्प्रे फौर मेन
• नीविया डिऔडरैंट व्हाइटनिंग स्मूद स्किन
• बाली सीक्रेट्स नैचुरल डिऔडरैंट
• नीविया डिऔडरैंट रोल औन
• स्वाव एंटीपर्सपिरेंट डिऔडरैंट
• इंडस वैली नैचुलर डिऔडरैंट स्टिक
• फौरएवर लिविंग एलो एवर शील्ड डिऔडरैंट स्टिक
स्वच्छता का खयाल रखें
बेहतर आदतों को अपनाते हुए नियमित स्वच्छता बरतने और एंटीसैप्टिक उत्पादों का उपयोग कर के आप शरीर की दुर्गंध को कम कर सकते हैं. आप नहाने के लिए रोजाना डेटौल बौडीवाश का इस्तेमाल कर सकते हैं. इस के साथ ही हैंड सैनिटाइजर व वाइप्स का इस्तेमाल भी स्वच्छता में मददगार होगा.
धुले व साफ कपड़े पहनें
अच्छी तरह से साफ किए, धुले कपड़े पहनने से आप के शरीर की दुर्गंध को दूर करने में मदद मिल सकती है. कपड़ों को स्वच्छ और गंधमुक्त रखने के लिए लौन्ड्री सैनिटाइजर का उपयोग करें.
स्वस्थ आहार और पानी है फायदेमंद
स्वस्थ आहार लेना, पर्याप्त पानी पीना और विटामिन सी युक्त फलों व सब्जियों का सेवन करना शरीर की दुर्गंध को कम करने में मदद कर सकता है. सल्फर युक्त भोजन, जैसे प्याज, लहसुन, ब्रोकली, पत्तागोभी आदि खाने से बचें. कौफी जैसे हार्डड्रिंक से भी बचें. धूम्रपान न करें क्योंकि यह शरीर की गंध को बढ़ाता है.
तनाव से रहें दूर
तनाव को नियंत्रित करने से शरीर की दुर्गंध कम हो सकती है. तनाव कम करने के लिए नियमित रूप से योग और मैडिटेशन करें. सकारात्मक सोचें और अच्छी जीवनशैली बनाए रखें.
पैरों को भी रखें दुर्गंधमुक्त
पैरों की दुर्गंध दूर करने के लिए पैरों की उचित देखभाल करनी जरूरी है. जैसे, बाकी शरीर साफसुथरा रखते हैं, धोते हैं, उसी तरह पैर भी धोएं और फिर सूखा रखें. उचित पेडिक्योर करें.
शरीर की दुर्गंध दूर करने के घरेलू उपाय
• कुछ नीबू लें और उन्हें निचोड़ कर उन का रस एक कटोरे में निकाल लें. स्प्रे बोतल को नीबू के रस से भरें. इस बोतल की मदद से नीबू के रस को अपनी दुर्गंध देने वाली त्वचा पर स्प्रे करें. अपनी त्वचा पर नीबू के रस का छिड़काव करने के 5 मिनट बाद एक साफ कपड़े से अपनी त्वचा को पोंछ लें. यह घरेलू उपाय शरीर की दुर्गंध के लिए प्रभावी घरेलू उपचारों में से एक है. नीबू त्वचा के पीएच मान को कम करता है और त्वचा के ऊपर पड़े गंध पैदा करने वाले बैक्टीरिया को मारता है और उन की वृद्धि को कम करता है.
• नीम के कुछ पत्ते लें और उन्हें पीस कर एक अच्छा पेस्ट बना लें. नीम के कुचले हुए पत्तों को एक चलनी में रखें और इस का रस प्याले में छान लें. स्प्रे बोतल में नीम का रस भरें. नीम के रस की कुछ बूंदों को अपनी त्वचा पर स्प्रे करें और इसे पोंछने के बाद इसे कम से कम एक या दो मिनट तक लगा रहने दें. नीम में उच्च औषधीय गुण और जीवाणुरोधी गुण होते हैं, त्वचा पर नीम के रस की उपस्थिति गंध पैदा करने वाले बैक्टीरिया और उन के विकास को गायब कर देती है.
• फिटकरी का एक टुकड़ा लें और उसे पानी में डुबो दें. फिटकरी के टुकड़े को त्वचा के बदबूदार हिस्से पर मलें और ऐसे ही रखें. फिटकरी में उच्च एंटीसैप्टिक और जीवाणुरोधी गुण होते हैं. फिटकरी को त्वचा पर लगाने से दुर्गंध दूर होती है और बदबू पैदा करने वाले बैक्टीरिया मर जाते हैं. यह घरेलू उपाय शरीर की दुर्गंध के लिए एक शक्तिशाली घरेलू उपचार है. नहाने के बाद नियमित रूप से इस घरेलू उपाय का पालन करें.
• 7 से 8 टमाटर लें और उन्हें मैश कर के टमाटर का बारीक पेस्ट बना लें. एक छलनी लें और टमाटर के पेस्ट को प्याले में निकाल कर टमाटर का रस निकाल लें. इस टमाटर के रस को पानी की बाल्टी में मिला कर टमाटर के मिश्रित पानी से नहा लें. टमाटर में उच्च अम्लीय गुण होते हैं. इस पानी से नहाने से त्वचा पर बैक्टीरिया जीवित नहीं रहते हैं.
• कुछ शलजम लें और उन्हें अच्छी तरह से कुचल कर एक चलनी के ऊपर रखें और उस का रस गिलास में छान लें. शलजम के रस को अपने अंडरआर्म्स और शरीर के ग्रोइन एरिया पर लगाएं, इस रस को अगले स्नान तक लगाएं. शलजम में शरीर से दुर्गंध को दूर करने के गुण सब से ज्यादा होते हैं. यह शरीर से दुर्गंध पैदा करने वाले बैक्टीरिया को भी साफ करता है.
• सफेद सिरका का एक छोटा कटोरा लें और एक कौटन को सिरके में डुबोएं. सिरका त्वचा के पीएच को कम करता है और त्वचा के वातावरण को सामान्य करता है. सिरका में उच्च अम्लीय गुण होते हैं. गंध पैदा करने वाली त्वचा पर इस का प्रयोग गंध पैदा करने वाले बैक्टीरिया को मारता है और शरीर को एक बदबूदार गंध को छोड़ने से रोकता है.
• पानी में सेंधा नमक मिला कर नहाने से बैक्टीरियल इंफैक्शन को कम करने में मदद मिलती है. यह एक्टिव बैक्टीरिया को मारता है और पसीने की दुर्गंध को कम करता है. इस के अलावा सेंधा नमक की खास बात यह है कि यह शरीर पर एक्ने और दाने भी कम करने में मददगार है.
हाल ही में भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) अहमदाबाद द्वारा किए गए एक शोध के अनुसार 15 से 60 साल की कामकाजी महिलाएं घरेलू काम पर 7.2 घंटे बिताती हैं जबकि पुरुषों द्वारा 2.8 घंटे बिताए जाते हैं. यह आंकड़ा महिलाओं के पास समय की भारी कमी दर्शाता है. टाइम यूज सर्वे (टीयूएस) पर आधारित इस शोध में कहा गया है कि पैसा कमाने वाली महिलाएं घर की सफाई, भोजन तैयार करने, देखभाल करने जैसे कामों में पुरुषों की तुलना में काफी ज्यादा समय खर्च करती हैं.
रिसर्च में 24 घंटे का डेटा इकट्ठा किया गया है. सुबह 4 बजे से ले कर अलगे दिन सुबह 4 बजे तक के दौरान काम का डेटा शामिल है. डेटा के आकलन से पता लगाया गया है कि भारत में महिला और पुरुष के बीच समय का आवंटन जैंडर तय करता है. जैंडर के आधार पर बनी भूमिकाएं समय और काम के बंटवारे में भूमिका निभाती हैं.
पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के पास फुरसत का समय 24 प्रतिशत कम होता है. इस अध्ययन में यह भी पता चला है कि पुरुष प्रतिदिन लगभग 150 मिनट अधिक अपने रोजगार के लिए खर्च करते हैं. महिलाओं के समय का एक बड़ा हिस्सा उन के रोजगार की स्थिति के बावजूद घरेलू जिम्मेदारियों को पूरा करने में खर्च हो जाता है. नौकरीपेशा महिलाओं के लिए इस का परिणाम ‘सैकंड शिफ्ट’ के तौर पर निकलता है. जाहिर है घर के काम और बच्चे की देखभाल का बोझ अभी भी महिला साथी पर असमान रूप से पड़ता है. यह ऐसी स्थिति है जो 3 दशकों में बहुत अधिक नहीं बदली है.
साल 2021 के आंकड़ों के अनुसार भारत के कुल लेबर फोर्स में 19.23 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं. आज महिलाओं के बाहर काम करने का चलन बढ़ गया है. लेकिन महिलाओं के ऊपर घर की जिम्मेदारियां उन के लिए बोझ बन रही हैं. इस वजह से वे अधिक आमदनी वाली नौकरियों और पदोन्नति के लिए प्रतिस्पर्धा करने में कम सक्षम होती हैं और अगर वे कम कमाती हैं तो इस का मतलब साफ़ है कि जरुरत पड़ने पर और घर में कोई इमरजैंसी आने पर उन्हें ही नौकरी से इस्तीफ़ा देना पड़ता है.
जैंडर के आधार पर किसी भी काम को बांटा नहीं जा सकता है लेकिन रूढ़िवादी नियमों में घर के काम और जिम्मेदारियों को महिलाओं के लिए ही तय कर दिया गया है भले ही इस वजह से वे कितनी ही परेशानियां क्यों न सहन कर रही हों.
ज्यादातर कामकाजी महिलाओं की दिनचर्या रोज सुबह जल्दी शुरू हो जाती है. सुबह घर के सारे काम करने और खाना बनाने के बाद वे दफ्तर के लिए निकलती हैं. पूरा दिन औफिस के काम कर के थकीहारी लौटती हैं और फिर चाय पी कर घर के काम में फिर से जुट जाती हैं. इन सब के बीच थोड़ा सा भी समय मिलता है तो बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी भी निभाती हैं वे.
इन सब के बावजूद पूरी दुनिया में बात जब महिलाओं और उन के काम की आती है तो कहा जाता है कि औरतें करती ही क्या हैं. घर पर रहने वाली औरतों को तो और भी नकारा समझा जाता है. पितृसत्तात्मक सोच महिलाओं की मेहनत को स्वीकारने से इनकार कर देती है. जबकि दोहरे काम के कारण महिलाओं के लिए जीवन और भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाता है.
कई शोधों से यह बात भी सामने निकल कर आई है कि काम के इस दोहरे बोझ की वजह से महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है. घर और नौकरी दोनों को साथसाथ संभालते हुए स्थिति बहुत तनावपूर्ण बन जाती है. पति पत्नी के रिश्ते में खटास आनी शुरू हो जाती है. इस से रिश्ते टूटने लगे हैं.
समय आ गया है जब हम इस समस्या को समझें और लड़कियों को जैंडर के हिसाब से लादे गए कामों से आजादी दें. घर में मां अपने बच्चों में अंतर न करें और बेटा हो या बेटी, दोनों को ही समानरूप से घर के काम में हाथ बंटाने की शिक्षा दें. आजकल वैसे भी बच्चे एक या दो ही होते हैं. अगर लड़का है तो उसे भी कई दफा बाहर होस्टल में रह कर या दूसरे शहर में अकेले जा कर रहना होता है. ऐसे में अगर उसे खाना बनाना व दूसरे काम करने आएंगे तो उस की जिंदगी आसान हो जाएगी. उसे नौकरों या दूसरों के भरोसे नहीं रहना पड़ेगा. वह सुकून से अपना खाना बना कर खा सकेगा और कपड़े-बरतन वगैरह धोने या घर साफ़ रखने में सक्षम होगा.
यही नहीं, आज के शादीशुदा पुरुषों को भी पत्नी के साथ साझेदारी कर के घर और बाहर के काम निबटाने चाहिए. इस से रिश्तों में समझ और प्यार बढ़ता है. पति को घर के काम और पत्नी को बाहर के काम जैसे कुछ खरीदना, बैंक, लोन आदि के काम करना या घर से जुड़े फैसले लेने में अपने पति का साथ देना चाहिए. इस तरह पतिपत्नी एकदूसरे के बिना भी घरबाहर दोनों संभाल सकेंगे और एकदूसरे का इतना साथ मिलने से उन के रिश्ते में कभी दरार भी नहीं आएगी.
किराने का सामान खरीदना हो या बरतन-कपड़े धोना या बिल भरना या कूड़ा उठाना, घर में श्रम विभाजन के बजाय श्रम साझेदारी के कौन्सैप्ट को स्वीकार करने से वैवाहिक झगड़ों से बच सकेंगे.
एक नए अध्ययन से पता चलता है कि कार्यों का बंटवारा कारखानों के लिए अच्छा है. परिवारों के लिए कार्यों को साझा करना बेहतर औप्शन है. यूटा विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफैसर डेनियल कार्लसन ने अपने कुछ सर्वेक्षणों में पाया कि जो जोड़े अलगअलग तरह के विशिष्ट काम करते थे और उन में से कोई भी काम साझा नहीं करते थे वे अपने रिश्ते से उतने संतुष्ट नहीं थे जितने वे जोड़े जो कम से कम 3 काम साझा करते थे.
जब पतिपत्नी घर के काम आपस में साझेदारी करते हुए निभाते हैं तो उन के रिश्ते ज्यादा खूबसूरत और मजबूत बनते हैं. इस का मतलब यह है कि दोनों एक ही तरह के काम कर रहे हैं यानी दोनों की भागीदारी सामान है. यह रिश्तों में निष्पक्षता की भावना है. इस तरह मिलजुल कर वे जितने ही ज्यादा काम करते हैं उन में समानता और संतुष्टि की भावना उतनी ही ज्यादा होगी और इस से रिश्ता भी बेहतर रहता है.
इस का एक कारण यह भी है कि सभी घरेलू कार्य समानरूप से आसान या कठिन नहीं होते हैं. कुछ काम दूसरों की तुलना में अधिक एंजौय करने लायक होते हैं तो कुछ इरिटेटिंग भी होते हैं. ऐसा ही कुछ बाहर के कामों में भी होता है. उदाहरण के लिए जब आप किराने की खरीदारी करने जाते हैं तो आप को घर से बाहर जाना पड़ता है और लोगों के साथ बातचीत करने का मौका मिलता है. संभव है कि आप की वहां किसी दोस्त से मुलाक़ात हो जाए. इस तरह आप यह काम मजे लेते हुए और दोस्त के साथ गपें मारते हुए करते हैं. मगर वहीं घर में आप की पत्नी बाथरूम और टौयलेट साफ़ करने का काम कर रही है जिस में कोई ख़ुशी नहीं मिल रही. बस, मेहनत और अरुचि लग रही है. ऐसे में आप दोनों काम को समान पैमाने पर नहीं रख सकते क्योंकि लगने वाला समय भले ही सामान हो मगर श्रम और कंफर्ट का लैवल अलग है.
पत्नी चाहेगी कि किसी दिन आप बाथरूम साफ़ करो और किसी दिन वह कर लेगी. तभी वह आप के साथ समानता का एहसास करेगी और ज्यादा संतुष्ट रह पाएगी. बात बहुत छोटी सी है मगर रिश्ते को कहीं न कहीं इफैक्ट करती है.
कार्यों को साझा करने से रिश्ते मजबूत बनते हैं क्योंकि चीजों को एकसाथ करने से सहयोग और एकजुटता की भावना को बढ़ावा मिलता है. दोनों उस काम को बेहतर तरीके से करने के उपाय ढूंढ सकते हैं और काम को आसान कैसे बनाया जाए, इस पर दोनों की सोच काम करेगी. इस से रिजल्ट अच्छे निकलेंगे. अब वह समय गया जब पुरुष कमाने वाला और स्त्री घर संभालने वाली मानी जाती थी और दोनों के उसी अनुरूप दायित्व बंटे हुए थे. अब जब पत्नियां भी कमा रही हैं तो स्वाभाविक है कि पुरुषों को भी घर के काम में साझेदारी करनी होगी.
रूस की सीमाओं पर कुछ महीनों से युवाओं की लंबी कतारें नजर आ रही हैं. अनेक रूसी युवक देश छोड़ने की हड़बड़ी में हैं. जौर्जिया से सटी रूस की सीमा पर वाहनों की मीलों लंबी कतारें यह बताने के लिए काफी हैं कि रूस से बड़ी संख्या में लोग पलायन कर रहे हैं जिस में युवाओं की संख्या बहुत ज्यादा है. ज्यादातर युवा जौर्जिया की तरफ रुख कर रहे हैं. दरअसल जौर्जिया रूस के उन कुछ पड़ोसी देशों में से है जहां जाने के लिए रूसी को वीजा लेने की जरूरत नहीं पड़ती है.
अनेक रूसी युवा पड़ोसी देशों में जाने के लिए पैदल या साइकिल के जरिए भी सीमा पार कर रहे हैं. अधिकांश युवा इसलिए देश छोड़ रहे हैं क्योंकि उन्हें अपनी पढ़ाई जारी रखनी है और उन को आशंका है कि रूसी राष्ट्रपति द्वारा आंशिक लामबंदी की घोषणा के तहत उन्हें युद्ध में झोंका जा सकता है. इसलिए वे 12-12 घंटे कतार में खड़े हो कर सीमा पार जाने का इंतजार कर रहे हैं.
कुछ जगह जहां हवाई रास्ते से जाया जा सकता है, वहां के लिए भी युवाओं की भीड़ उमड़ रही है. सैन्य बुलावे की घोषणा यानी कौल-अप के बाद इस्तांबुल, बेलग्राद या दुबई में फ्लाइट के दाम आसमान छू रहे हैं. तुर्किए मीडिया की मानें तो एकतरफा टिकट की बिक्री में बेतहाशा वृद्धि दर्ज की गई है. वहीं गैर वीजा वाली जगहों पर जाने वाली फ्लाइट के दाम भी 1,000 यूरो से ऊपर चले गए हैं. रूसी युवाओं के पलायन का जहां जरमनी के गृहमंत्री ने स्वागत किया है वहीं लिथुआनिया, लातविया, इस्टोनिया और चेक रिपब्लिक के स्वर बदले हुए हैं और उन्होंने रूसी शरणार्थियों को शरण देने से इनकार कर दिया है.
गौरतलब है कि जिस दिन से रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने आंशिक सैन्य लामबंदी की घोषणा की है, उस के बाद से ही रूसी युवाओं का पलायन शुरू हो गया है. यह संख्या लगातार बढ़ रही है. पुतिन की सैन्य लामबंदी के तहत देश के 3 लाख युवाओं को यूक्रेन से लड़ने के लिए बुलाया गया है. इस के लिए युवाओं को जबरन सेना में भरती किए जाने की खबरें छनछन कर आ रही हैं.
मजे की बात यह है कि जो युवा देश छोड़ कर नहीं जा पा रहे हैं, युद्ध के मैदान में जाने से बचने के लिए उन्होंने अपने जैंडर चेंज करवाने शुरू कर दिए हैं. उल्लेखनीय है कि रूस में सिर्फ एक फौर्म भर कर लिंग परिवर्तन किया जा सकता है. इस के लिए सर्जरी की जरूरत नहीं होती. सरकारी नियम के अनुसार अगर कोई व्यक्ति सिर्फ कागजों पर जैंडर चेंज करवा लेता है, तो उस के पास शादी करने और बच्चा गोद लेने का अधिकार आ जाता है.
सरकार को भी लग रहा है कि अब जैंडर चेंज के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. माना जा रहा है कि जो युवा पिछले साल सितंबर में सेना के ड्राफ्ट से पहले देश नहीं छोड़ पाए थे, अब उन्होंने कागजी कार्रवाई के लिए प्राइवेट क्लीनिक का रुख करना शुरू कर दिया है. रूस में पिछले साल से अब तक 2.5 लाख से ज्यादा युवा जैंडर चेंज करा चुके हैं.
अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में ऐसी खबरें आने के बाद रूस की काफी किरकिरी हो रही है. हाल ही में रूसी प्रशासन ने सफाई देते हुए कहा कि केवल उन्हीं लोगों को सैन्य बुलावा यानी कौलअप भेजा गया है जो सैन्य सेवा दे चुके हैं या जिन के पास युद्ध का अनुभव और विशेष कौशल है. मगर इस दावे के उलट रूस के युवाओं का कहना है कि ऐसा नहीं है और उन लोगों के पास भी बुलावा पहुंचा है जो किसी तरह का कोई सैन्य अनुभव नहीं रखते हैं. कौलअप के विरोध में रूस के मास्को और सेंट पीटर्सबर्ग जैसे बड़े शहरों में लोगों ने बड़े प्रदर्शन भी किए हैं. खबर है कि इन प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ने करीब 1,300 लोगों को गिरफ्तार किया और उन्हें पुलिस स्टेशन में सैन्य बुलावे से जुड़ा मसौदा जबरन थमाया गया.
सैन्य लामबंदी को ले कर रूस के भीतर लोगों की प्रतिक्रिया काफी नकारात्मक है. लोगों को अंदेशा है कि सैन्य लामबंदी के लिए जिस संख्या की घोषणा की गई है, उस से कई गुना ज्यादा संख्या बड़े स्तर पर भरती करेंगे. यूके के रक्षा मंत्री का कहना है कि रूसी जनता के बीच सैन्य बुलावा बुरी तरह विफल रहा है. इस से साफ जाहिर होता है कि रूस के पास अब यूक्रेन से मुकाबला करने के लिए पर्याप्त सैन्यबल नहीं रहा है.
एक रिपोर्ट के अनुसार रूसी सेना ने अभी तक जंग के मैदान में अपने 7,70,000 सैनिकों को खोया है. इन में से साढ़े 5 लाख ऐसे सैनिक हैं जो इतनी बुरी तरह से घायल हैं कि वे दोबारा से युद्ध नहीं लड़ सकते. मगर युद्ध में जान गंवाने वाले रूसी सैनिकों के बारे में पुतिन उसी तरह सूचना छिपाए हुए हैं जिस तरह भारत में नरेंद्र मोदी इलैक्टोरल बौंड से मिले चंदे की सूचना जनता से छिपाए रही. अनेक स्रोतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार यूक्रेन से युद्ध में रूस के 3 से 4 लाख सैनिक मारे गए हैं. रूस का सैन्यबल बुरी तरह कमजोर हो चुका है. यही वजह है कि रूस अब अपने देश के युवाओं को जबरन सेना में भरती कर उन्हें जंग के मोरचे पर भेजना चाहता है, मगर देश के युवा दगा देने लगे हैं. वे सेना में ड्राफ्ट किए जाने से बचने के लिए तरहतरह के तरीके ढूंढ रहे हैं. यहां तक कि मौत से बचने के लिए वे अपना देश और परिवार तक छोड़ने को तैयार हैं.
रूस के सामने इस वक्त सैनिकों की संख्या को बढ़ाना सब से बड़ी चुनौती है. इस समस्या से निबटने के लिए रूस ने अब एजेंटों के माध्यम से अन्य देशों के युवाओं को भी बड़ेबड़े पेमेंट का लालच दे कर रूसी सेना में भरती करने का उपक्रम कर रहा है. रूस के निशाने पर अनेक ऐसे गरीब देश हैं जहां युवाओं के पास नौकरी नहीं है, उन के परिवार के पास खाने के लिए भोजन नहीं है, तन पर कपड़े नहीं हैं. भारत और नेपाल जैसे देश भी रूस की इस लिस्ट में शामिल हैं.
भारत सरकार की ‘अग्निवीर योजना’ से हताश हो कर भारतीय सेना से किनारा करने वाले नेपाल के गोरखा सैनिक भी इस समय बड़ी संख्या में रूसी सेना में शामिल हो रहे हैं. नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड और विदेश मंत्रालय ने खुलासा किया है कि यूक्रेनी सेना से जंग लड़ते हुए अब तक नेपाल के 6 गोरखा सैनिक मारे जा चुके हैं. मगर इन के शव तक रूस से नहीं आ सके और हिंदू होने के बाद भी उन्हें वहां मिट्टी में दफना दिया गया है.
इस खबर के बाद भी बड़ी संख्या में नेपाली सैनिकों के रूस पहुंचने का सिलसिला जारी है, क्योंकि भूखे मरने से बेहतर है जंग लड़ते हुए मरना. आलम यह है कि हर दिन नेपाल का एक नागरिक मास्को स्थित नेपाली दूतावास से लौटाया जा रहा है. ये नेपाली गोरखा सैनिक रूस की सेना में शामिल होने के लिए पहुंच रहे हैं. नेपाली अखबार ‘काठमांडू पोस्ट’ की रिपोर्ट के अनुसार हाल ही में 15 हजार गोरखा सैनिक रूसी सेना में शामिल हुए हैं और यूक्रेन से युद्ध लड़ रहे हैं. अखबार कहता है कि नेपाल की सरकार ने अपने नागरिकों को रूस की सेना में शामिल होने की अनुमति नहीं दी है लेकिन इस के बाद भी हर दिन कोई न कोई नेपाली गोरखा मास्को पहुंच रहा है.
नेपाल सरकार की ओर से गोरखा सैनिकों को केवल ब्रिटेन और भारतीय सेना में शामिल होने की अनुमति है. मगर कुछ पैसे मिलने के लालच में नेपाल के युवा न सिर्फ रूस बल्कि यूक्रेन की सेना में भी शामिल हो रहे हैं. भारतीय सेना ने जब से अग्निवीर योजना शुरू की है तब से अपनी दिलेरी के लिए मशहूर नेपाली गोरखा सैनिक इंडियन आर्मी में भरती नहीं हो रहे हैं. उन के पास अब रूस जैसे युद्धग्रस्त इलाकों में जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है.
युद्ध में लड़ाकों की कमी पूरी करने के लिए रूस की कुछ एजेंसियां भारत के बेरोजगार युवाओं को भी फंसाने के लिए गहरी साजिश रच रही हैं. रूस में रह रहे कुछ भारतीयों के साथसाथ कुछ भारतीय कंपनियां इस साजिश में ‘ब्राउन बीयर’ के मददगार बने हुए हैं. इस साजिश के तहत, भारतीय नौजवानों को बेहतर जिंदगी का सब्जबाग दिखा कर रूस भेजा जा रहा है. इस साजिश की भनक लगते ही केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने अपनी जांच शुरू कर दी है. अब तक की जांच में खुलासा हुआ है कि एक छोटे से अंतराल में जालसाजों ने दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र, पुदुचेरी, केरल, तमिलनाडु और राजस्थान सहित देश के कई राज्यों में अपना जाल फैलाया है.
ये जालसाज नौजवानों को शिक्षा और हैसियत के हिसाब से नौकरी औफर कर रहे हैं. जैसे, किसी को सेना संबंधी कार्यों की जौब औफर की जा रही है, तो किसी को सिक्योरिटी गार्ड और हैल्पर बनवाने के नाम पर जाल में फंसाया जा रहा है. रूसी सैनिक बनने के इच्छुक विदेशियों को प्रतिमाह लगभग 600 यूरो (लगभग पचपन हजार रुपए) की पेशकश की जा रही है और पुतिन की सरकार ने वादा किया है कि एक साल के बाद, उन की पूर्ण रूसी नागरिकता की प्रक्रिया में तेजी लाई जाएगी.
सीबीआई की जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि इस पूरी साजिश को रूस में बैठे 2 भारतीय नागरिक संचालित कर रहे हैं, जिन की पहचान मोहम्मद मोइनुद्दीन और संतोष कुमार के रूप में हुई है. मोहम्मद मोइनुद्दीन मूल रूप से राजस्थान का रहने वाला है, जबकि संतोष कुमार तमिलनाडु का बाशिंदा है. इन दोनों ने मिल कर भारत के विभिन्न राज्यों में एजेंट्स का बड़ा जाल बिछा कर न जाने कितने नौजवानों को यूक्रेन-रूस युद्ध की आग में झोंक दिया है.
सीबीआई की अब तक की जांच में भारत की 5 कंपनियों सहित कुल 19 लोगों के नाम का खुलासा हुआ है, जो रूसी एजेंसियों के इशारे पर साजिश का जाल बिछाने में लगे हुए हैं. चंद रुपयों के लालच में रूसी एजेंसियों के हाथ की कठपुतली बने इन जालसाजों की तलाश में सीबीआई की छापेमारी जारी है. फिलहाल, यह छापेमारी दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र, पुद्दुचेरी, केरल, तमिलनाडु और राजस्थान के विभिन्न इलाकों में की जा रही है.
कुछ भारतीय युवा यह सोच कर मुश्किल में फंस गए हैं कि रूस जा कर वे लाखों रुपए कमा सकेंगे. हाल के दिनों में कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र, जम्मूकश्मीर और तेलंगाना से 16 लोग रूस गए हैं. इन के परिजनों का कहना है कि एजेंटों ने उन्हें नौकरी के नाम पर बुलाया और फिर उन की भरती रूसी सेना में करा दी. जबकि एजेंटों ने उन से कहा था कि उन्हें रूस में हैल्पर और सिक्योरिटी से जुड़ी नौकरियां दी जाएंगी, सेना में नहीं. हाल के दिनों में ये खबरें आई हैं कि रूसयूक्रेन युद्ध में रूसी सैनिकों के साथ भारतीय नागरिक भी हैं, जो उन के साथ युद्ध के मैदान में तैनात हैं.
फैसल खान नाम का एक एजेंट, जो दुबई में बैठ कर ‘बाबा व्लौग्स’ नाम से एक यूट्यूब चैनल चलाता है, ने अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो पोस्ट कर दावा किया कि रूस में हैल्पर के तौर पर काम कर अच्छी कमाई की जा सकती है. इस तरह उस ने भारतीय युवाओं को इन नौकरियों की तरफ आकर्षित किया. नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं ने दिए गए फोन नंबर पर संपर्क किया.
इस एजेंट ने कुल 35 भारतीय युवाओं को रूस भेजने की योजना बनाई थी. पहले बैच में 3 लोगों को 9 नवंबर, 2023 को चेन्नई से शारजाह भेजा गया. शारजाह से इन्हें 12 नवंबर को रूस की राजधानी मास्को ले जाया गया. 16 नवंबर को फैसल खान की टीम ने 6 भारतीयों को और फिर 7 भारतीयों को रूस पहुंचाया. इन से कहा गया था कि उन्हें हैल्पर के तौर पर काम करना होगा, सैनिकों के तौर पर नहीं.
इन भारतीयों के परिजनों का कहना है कि उन्हें कुछ दिनों की ट्रेनिंग दी गई जिस के बाद उन्हें 24 दिसंबर, 2023 को सेना में शामिल कर लिया गया. इन में हैदराबाद से मोहम्मद अफसान, तेलंगाना के नारायणपुर से सूफियान, उत्तर प्रदेश से अरबाज हुसैन, कश्मीर से जहूर अहमद, गुजरात से हेमिल और कर्नाटक के गुलबर्गा से सैय्यद हुसैन, समीर अहमद और अब्दुल नईम का नाम सामने आया है. अब उन के परिजनों ने केंद्र सरकार से अपने बेटों की सकुशल भारतवापसी की गुहार लगाई है.
यह मामला तब सामने आया जब रूस गए भारतीय युवाओं का लंबे वक्त तक अपने परिवारों से संपर्क नहीं हो सका और हाल के दिनों में उन के कुछ वीडियो सामने आए जिन में ये युवा हताशा में मदद मांगते दिखे. 2 वीडियो वायरल भी हुए. एक वीडियो में तेलंगाना के सुफियान और कर्नाटक के सैय्यद इलियास हुसैन, मोहम्मद समीर अहमद कहते हैं, “हमें सिक्योरिटी हैल्पर के तौर पर नौकरी दी गई थी लेकिन यहां रूसी सेना में शामिल कर लिया गया. रूसी अधिकारी हमें यहां फ्रंटलाइन तक ले कर आए. हमें यहां युद्ध के मैदान में जंगल में तैनात कर दिया गया. बाबा व्लौग के एजेंट ने हमारे साथ धोखा किया है.”
एक अन्य वीडियो में उत्तर प्रदेश के रहने वाले अरबाज हुसैन अपनी बात कहते हैं कि उन्हें युद्ध के मैदान में उतार दिया गया था और बड़ी मुश्किल से वे वहां से बच कर निकले हैं. उन्होंने गुहार लगाई कि उन्हें किसी भी कीमत पर बचाया जाए.
रूस और यूक्रेन के बीच चल रही जंग में युद्धभूमि में भारतीय नागरिकों की तैनाती को ले कर भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपनी प्रतिक्रिया दी है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “हमें इस बात की जानकारी मिली है कि कुछ भारतीय नागरिक रूसी सेना में सपोर्ट स्टाफ के तौर पर नौकरी कर रहे हैं. उन्हें जल्द वहां से डिस्चार्ज करने के लिए भारतीय दूतावास लगातार रूसी अधिकारियों के साथ संपर्क में है. हम सभी भारतीय नागरिकों से अपील करते हैं कि वे सावधानी बरतें और इस संघर्ष से दूर रहें.”
आज हमारे आसपास ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिन्हें हम देखते हैं और देख कर भूल जाते हैं. मसलन, मैं ने अपनी दवाइयां कहां रख दी हैं, कल कौन से मेहमान आए थे, क्या तुम ने मु?ो बाजार से कुछ लाने को कहा था, शायद मैं कुछ भूल रहा हूं, पर क्या भूल रहा हूं यह याद नहीं आ रहा. ऐसी अनेक बातें हमें सुनाई देती हैं और कई बार तो हमारे साथ घटती भी हैं, जिन्हें हम नजरअंदाज कर देते हैं.
अगर युवा अवस्था में किसी के साथ ऐसा हो तो सोचते हैं कि हो सकता है वह भूल गया हो या लापरवाह हो. अगर किसी के साथ बुढ़ापे में हो तो कहा यह जाता है कि उम्र का दोष है, जबकि यह दोष न तो उम्र का है और न ही लापरवाही का. यह कुसूर है उस बीमारी का जिसे अल्जाइमर्स या डिमैंशिया अवस्था कहते हैं.
अल्जाइमर्स बीमारी से आज देशविदेश में अनेक लोग पीडि़त हैं. अल्जाइमर्स ऐसी बीमारी है जिस से मरीज धीरेधीरे अपनी याद्दाश्त खोने लगता है. इस का कोई इलाज नहीं है. लेकिन इस बीमारी को जल्दी पहचान लिया जाए तो मरीज की बेहतर देखभाल की जा सकती है.
अल्जाइमर्स बढ़ता हुआ, न्यूरोलौजिकल, डिसऔर्डर वाला रोग है जिस में ब्रेन सैल्स डैड होने लगते हैं.
भारत में 7 प्रतिशत जनसंख्या 60 वर्ष से ऊपर है और इन में 3 प्रतिशत स्मरण शक्ति के विभिन्न रोगों से पीडि़त हैं. दुनियाभर में करीब 5 करोड़ लोग इस बीमारी की विभिन्न स्टेजों में हैं. इस बीमारी के बारे में लोग बहुत कम जानते हैं. यह रोग इन लोगों के व्यवहार, निर्णय लेने की क्षमता और दिनचर्या पर प्रतिकूल असर डालता है.
अल्जाइमर्स रोग से पीडि़त व्यक्ति अपना सामान भूल जाते हैं और नई जगहों पर भ्रमित हो जाते हैं. इस के कारण मस्तिष्क की ज्ञानतंतु वाली अनेक कोशिकाएं निष्क्रिय हो जाती हैं. यह याद रखने और स्पष्टता से सोचने की योग्यता पर असर डालता है. डिमैंशिया वह अवस्था है जिस में मानसिक योग्यताएं, विशेषकर याद्दाश्त, कम हो जाती हैं.
जिन कामों और बातों को याद रखने में व्यक्ति पहले सामर्थ्यवान था अब वे ही बातें वह भूलने लगता है. व्यक्ति गाड़ी चलाने, भोजन करने या शब्द बोलने में भी परेशानी महसूस करने लगता है. अधिक काम होने से वह घबरा भी जाता है.
न्यूरोलौजिस्ट बताते हैं कि यह बीमारी वैसे तो 60 साल से अधिक उम्र के लोगों को होती है पर अब यह युवाओं को भी होने लगी है. युवाओं में यह आनुवंशिक कारणों से होती है और इस का प्रतिशत भी बहुत कम है जबकि बुजुर्गों में यह अकसर देखी जा सकती है.
आज भी भारत के उन क्षेत्रों में यह समस्या कम है जहां ग्रामीण परिवेश है. इस का कारण तनाव न होना और संतुलित आहार है. यह औरतों में ज्यादा होती है क्योंकि वे पुरुषों से ज्यादा उम्र तक जीती हैं. प्रदूषण भी इस बीमारी के होने का एक कारण हो सकता है. शराब पीने वालों को यह ज्यादा होती है.
न्यूरोलौजिस्ट कहते हैं कि इस बीमारी का कोई अंत नहीं है. हां, इस पर काबू जरूर पाया जा सकता है. यदि इस पर काबू पाना है तो उच्चशिक्षा देना,
हरीलाल सब्जियां, अंकुरित अनाज, दूध और दूध से बने पदार्थ, सोयाबीन तथा मछली खाना श्रेष्ठ होता है. दवाइयों से इस का अंत नहीं किया जा सकता.
इस बीमारी से ग्रसित लोग कई बार अवसाद या उन्माद की चरम सीमा पर पहुंच जाते हैं. इन सब के कारण परिवार व देखरेख करने वालों पर बहुत तनाव हो जाता है. स्मरण शक्ति कम होना एक बीमारी का सूचक है, सो, प्रारंभिक अवस्था में ही इस के निदान व उपचार से व्यक्ति विशेष को लाभ होगा, साथ ही, परिवार की समस्या भी कम हो जाएगी.
गैलेंटामाइन, खिस्टिगाइन, डोनेपेजिल, क्लोनिस्ट्रीज जैसी दवाएं बनी हैं जो हलके अल्जाइमर्स में कुछ फायदा दे सकती हैं पर ये डाक्टरों के कहने पर ही ली जा सकती हैं. ये दवाएं ब्रेन द्वारा याद्दाश्त बनाए रखने के लिए निकलने वाले कैमिकल एसोटीलकोलीन के कम होते उत्पादन को धीमा करती हैं पर ब्रेन, उम्र होने पर, इन्हें और कम बनाने लगता है और धीरेधीरे दवाओं के बावजूद याद्दाश्त समाप्त हो जाती है.
आधुनिक समय में एक ही रोग से पीडि़तों की देखभाल के लिए स्पैशल क्लीनिकों की आवश्यकता बढ़ती जा रही है. जरूरत है-
सवाल
मैं 24 वर्ष की युवती हूं और एक रिलेशनशिप में हूं. घर की किन्हीं वजहों के कारण मां मेरी शादी जल्दी कर देना चाहती हैं. मैं ने अपने बौयफ्रैंड से बात की कि वह मेरे घर वालों से बात करे कि उसे मुझ से शादी करनी है. लेकिन बौयफ्रैंड अभी जल्दी शादी नहीं करना चाहता क्योंकि वह अभी सैटल नहीं हुआ है. उसे अभी अच्छी जौब नहीं मिली है और उस की एक बहन है जिस की शादी उस के माता पिता पहले करना चाहते हैं. सो, मैं ने बौयफ्रैंड से ब्रेकअप कर लिया और मातापिता ने जो लड़का मेरी शादी के लिए चुना है, मैं उसे अपने रिलेशनशिप के बारे में सबकुछ बता देना चाहती हूं. मातापिता के चुने लड़के का कहना है कि वह मु झे बहुत पसंद करता है और जल्दी से जल्दी शादी करना चाहता है. मैं उसे अंधेरे में नहीं रखना चाहती, मैं अपने बौयफ्रैंड के साथ सैक्स कर चुकी हूं और यह बात मैं उस लड़के को बताना चाहती हूं ताकि भविष्य में कोई दिक्कत न आए. सोचती हूं कि अगर मैं ने उसे बता दिया तो कहीं वह यह बात अपनी फैमिली को न बता दे और वे लोग मेरे परिवार वालों को न बता दें. अगर ऐसा हुआ तो फिर मैं अपने परिवार वालों का सामना कैसे करूंगी? कुछ सम झ नहीं आ रहा, क्या करूं?
जवाब
देखिए, शादी से पहले बौयफ्रैंड के साथ आप की रिलेशनशिप को वह लड़का किस रूप में लेता है, हम नहीं जानते. हां, लेकिन जैसा कि आप ने लिखा है कि वह आप को बहुत पसंद करने लगा है और जल्दी से जल्दी शादी करना चाहता है, तो हो सकता है पुरानी बातों को दरकिनार कर आप के साथ खुशहाल शादीशुदा जिंदगी बिताने में उसे कोई एतराज न हो. वैसे भी शादी करना जिंदगी का एक अहम फैसला होता है. उस की शुरुआत सचाई से की जाए तो अच्छा है. लेकिन आप को डर है कि आप के घर वालों को लड़के के जरिए उस के घर वालों के जरिए से आप के रिलेशनशिप के बारे में पता चल जाएगा तो आप अपने घरवालों का सामना नहीं कर पाएंगी. तो ऐसा कीजिए कि उस लड़के को पहले विश्वास में लीजिए. कहें कि आप के रिलेशनशिप की बात अपने तक रखे. आप की बात सुनने के बाद शादी करने में उसे कोई एतराज नहीं, तो जाहिर सी बात है, यह राज राज ही रहेगा और यदि शादी करने से मना करता है तो वह अपने घर वालों को कोई भी रीजन दे कर शादी से इनकार कर दे. वैसे आजकल लड़केलड़की का बौयफ्रैंडगर्लफ्रैंड बनाना कोई बुरी बात नहीं मानी जाती और शादी से पहले फिजिकल रिलेशन भी बन रहे हैं. यदि वह लड़का खुले विचारों का हुआ तो स्थिति को सम झेगा. सब उस लड़के की सोच पर निर्भर करता है. ज्यादा मत सोचिए और जो आप करने की सोच रही हैं वैसा ही करिए. लाइफ में जितना बोल्ड स्टैप उठाना सीखेंगी उतना ही अच्छा रहेगा.
अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem
10 मार्च, 2024 को प्रधानमंत्री मोदी ने अपने यूट्यूब चैनल ‘नरेंद्र मोदी’ पर एक विज्ञापन वीडियो पोस्ट किया, जिस का टाइटल उन्होंने ‘सेफ्टी एंड सिक्योरिटी औफ औल इंडियन एश्योर्ड ऐज दे आर मोदी का परिवार’. यह वीडियो उस श्रंखला में एक वीडियो था जिस में 3 मार्च को पटना के गांधी मैदान में ‘इंडिया अलायंस’ की पहली बड़ी रैली हुई.
इस रैली से एक दिन पहले यानी 2 मार्च को औरंगाबाद में एनडीए की रैली थी जिस में बिहार के मुख्यमंत्री और खुद प्रधानमंत्री मोदी मौजूद थे. एनडीए के मुकाबले भीड़, भाषण और चर्चाओं को ले कर ‘इंडिया’ अलायंस की रैली सफल और चर्चा में रही. यहीं से लालू प्रसाद यादव ने मोदी के ‘परिवारवाद’ के आरोपों का जवाब दिया. जिस के बाद भाजपा ने सोशल मीडिया पर ‘मोदी का परिवार’ कैंपेन चलाया.
इसी कैंपेन के तहत मोदी ने अपने यूट्यूब अकाउंट से विज्ञापन वीडियो पोस्ट की, जिस में एक लड़की जो विदेश में कहीं फंसी थी और एयरपोर्ट पर आ कर अपने पापा से कहती है कि ‘पापा, मोदी ने हमें बचा लिया.’ यह लाइन सोशल मीडिया पर मीमर और ट्रोलर के लिए पंच लाइन बन गई, जिस चलते आज जहांतहां सोशल मीडिया पर इस वीडियो का मजाक बनाया जा रहा है.
जाहिर है सोशल मीडिया अनोखी जगह है, जहां कभी भी कोई भी चीज उछल आती है. यह मेनस्ट्रीम मीडिया से हट कर एक ऐसा टूल बन कर उभरा है जिस पर आम लोगों का भी एक हद तक फिलहाल सीधा नियंत्रण बना हुआ है. और इस चलते ढेर सारा पैसा प्रचार में खर्च करने के बावजूद कभीकभी सोशल मीडिया पर पार्टियों द्वारा सरकाई कोई पोस्ट या वीडियो यूजर्स के लिए ऐसा मीम मैटीरियल बन जाता है कि चाह कर उस का डैमेज कंट्रोल नहीं हो पाता. ‘आलू से सोना बनाने वाली मशीन’ के जिस खेल में कभी भाजपा खेलती थी, सोशल मीडिया इतना अनियमित हो चला है कि जो भस्मासुर जैसा जो वरदान उसे कभी मिला था अब वह खुद भी इस में जलने लगी है, जैसा ‘पापा’ वाले वीडियो के साथ हो रहा है.
यही कारण भी है कि मेनस्ट्रीम मीडिया को अपने नियंत्रण में लेने के बाद अब भाजपा सरकार सोशल मीडिया के पीछे हाथ धो कर पड़ गई है. वह चाहती है कि इनफौर्मेशन के पूरे तंत्र पर सिर्फ उसी का नियंत्रण हो.
20 मार्च, 2024 को पीआईबी के अंतर्गत लाया गया फैक्ट चैक यूनिट उसी कड़ी में एक है, जिस पर अगले ही दिन यानी 21 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने लोग लगा दी है. फैक्ट चैक यूनिट दरअसल सरकार की तरफ से ऐसा विभाग होगा जो सोशल मीडिया (फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर व अन्य माध्यमों) में किसी जानकारी को फेक या गलत बता सकती है. और यदि यह यूनिट किसी जानकारी को गलत बता देती है तो संबंधित प्लेटफौर्म को उस जानकारी को तुरंत हटाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा.
इस के अनुसार इंटरनैट से उस का यूआरएल भी ब्लौक करने की बात कही गई है. पिछले साल अप्रैल में सरकार ने इस के नाम का ऐलान किया था. यह सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2021 (इनफौर्मेशन एंड टैक्नोलौजी नियम 2021) में संशोधन के बाद लाया गया था. इस की स्थापना नवंबर 2019 में की गई थी.
अब सुप्रीम कोर्ट ने इस यूनिट पर रोक लगा दी है यह कहते हुए कि इस से अभिव्यक्ति की आजादी को ख़तरा है. सरकार के आईटी नियमों में बदलाव को ले कर सिविल सोसाइटीज, विपक्षी दलों और डिजिटल मीडिया संस्थानों ने पहले ही अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी. उन का कहना था कि इस तरह के नियमों से सोशल मीडिया पर सरकार का हस्तक्षेप बढ़ेगा और अपनी बात कहने की आजादी में एक बड़ी रुकावट बनेगी.
सरकार ने भले इसे ले कर कहा कि वह इस यूनिट को विश्वसनीय तरीके से चलाएगी पर संशय इसी बात का है कि सरकार इस यूनिट का बेजा इस्तेमाल कर सकती है और अपने अनुसार इनफौर्मेशन को नियंत्रण कर सकती है. वह अपने खिलाफ उठ रही आवाजों, आलोचनाओं, सवालों को दबा सकती है.
आईटी नियमों में संशोधन के खिलाफ एडिटर्स गिल्ड औफ इंडिया, न्यूज ब्रौडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन और एसोसिएशन औफ इंडियन मैगजीन ने बौम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिस में कहा गया था कि ये नियम असंवैधानिक और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं.
इसे ले कर तब इंटरनैट फ्रीडम फाउंडेशन, भारतीय डिजिटल स्वतंत्रता संगठन ने 2023 के संशोधन पर बयान जारी किया था जिस में इस की प्रासंगिकता पर चिंता जताई गई. उन्होंने कहा, “सरकार की किसी भी यूनिट को औनलाइन सामग्री की प्रामाणिकता निर्धारित करने के लिए इस तरह की मनमानी, व्यापक शक्तियां सौंपना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को दरकिनार करता है.
“इस प्रकार यह असंवैधानिक अभ्यास है. इन संशोधित नियमों की अधिसूचना भाषण और अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार, विशेषरूप से समाचार प्रकाशकों, पत्रकारों, गतिविधियों आदि पर द्रुतशीतन प्रभाव को मजबूत करती है.”
एडिटर्स गिल्ड औफ इंडिया ने यह भी इस पर आपत्ति जताई कि “फेक न्यूज तय करने की शक्तियां पूरी तरह से सरकार के हाथ में होना प्रैस की आजादी के विरोध में है.”
इसी मसले पर संबंधित विरोधी पक्षों ने कोर्ट में याचिका डाली. तब याचिका की सुनवाई में फैसला देते हुए जस्टिस जी एस पटेल ने संशोधन के विरोध में और जस्टिस नीला गोखले ने पक्ष में फैसला दिया था. जब मामला तीसरे जज जस्टिस चंदूरकर के पास गया तो उन्होंने संशोधन पर स्टे लगाने से मना कर दिया.
हालांकि पहले केंद्र सरकार ने कहा था कि मामले की सुनवाई पूरी होने तक वह फैक्ट चैक यूनिट की अधिसूचना जारी नहीं करेगी, लेकिन तीसरे जज के संशोधन पर रोक लगाने से मना करने के बाद कोर्ट ने सरकार को अधिसूचना लाने की इजाजत दे दी थी.
तब बौम्बे हाईकोर्ट के फैसले से नाखुश याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की और संशोधन पर रोक लगाने की मांग की. जिस के बाद 21 मार्च को सुप्रीट कोर्ट ने इस पर रोक लगाई.
हालांकि यह रोक देश में अभिव्यक्ति की आजादी चाहने वालों के लिए जरूर सुकून देने वाली है पर कितने दिनों यह सुकून रहेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता, क्योंकि सरकार के पास ऐसे तमाम हथकंडे हैं जिन से वह अपनी मनमरजी चला रही है. क्योंकि मामला यहां सिर्फ नियंत्रण का नहीं है, बल्कि पूरी मीडिया तंत्र को हाईजैक करने का है.
एक हाथ वह मुद्दों पर आधारित मीडिया हाउसों को नियंत्रण तो कर रही है तो दूसरे हाथ अपने भ्रामक विचारों और झूठे दावों का प्रचार कर रही है. यानी, यह सोचीसमझी रणनीति के तहत सूचना तंत्र को हाईजैक करना है. लोकनीति सैंटर फौर स्टडी सोसाइटी ने पिछले साल हुए मध्य प्रदेश, छतीसगढ़ और राजस्थान में चुनावी पार्टियों द्वारा फेसबुक और इंस्टाग्राम में किए सोशल मीडिया प्रचार पर हुए खर्चों के आंकड़े सामने रखे.
रिपोर्ट 90 दिनों के खर्चों का ब्योरा देती है, जिस में भाजपा और कांग्रेस में ढाई गुने का अंतर था. जहां कांग्रेस ने इन तीनों राज्यों में तकरीबन 99 लाख रुपए खर्च किए, वहीँ भाजपा ने 2 करोड़ 68 लाख रुपए खर्च किए.
इसी तरह ‘द हिंदू’ अखबार की रिपोर्ट बताती है कि फरवरी 2019 से ले कर फरवरी 2023 तक, यानी इन 5 सालों के बीच भारतीय जनता पार्टी ने कुल 33 करोड़ रुपए सोशल मीडिया में अपने प्रचारप्रसार के लिए खर्च किए. गौर करने वाली बात यह कि यह उस पूरे पैसे का लगभग 10 प्रतिशत है जो सभी विज्ञापनदाताओं ने (यानी हर तरह के) उस अवधि में भारत में फेसबुक विज्ञापन चलाने के लिए खर्च किया. फेसबुक को भारत से विज्ञापन के माध्यम से 360 रुपए की कमाई हुई.
फेसबुक पर अपनी उपलब्धियां बताने के साथसाथ बनाए गए ये पेज विपक्षी पार्टियों को बदनाम और भ्रमित करने वाली जानकारियों से भरे पड़े हैं. भारत में फेसबुक के शीर्ष 15 विज्ञापनदाताओं में से 6 भाजपा द्वारा संचालित पेज हैं. उन में से 2 आईएनसी द्वारा संचालित हैं.
इस सूची में ‘एक धोखा केजरीवाल ने’ भी शामिल है, जो सिर्फ एक बदनामी वाला पेज है जो नियमित रूप से दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को बदनाम करता है, जिन्हें ईडी ने गिरफ्तार कर लिया है. ‘ठग्स औफ झारखंड’ के नाम से बनाए एक अन्य पेज में सोरेन परिवार और विपक्ष को टारगेट करने के लिए बनाया गया है. इस पेज में आधे से ज्यादा कंटैंट भ्रमित करने वाला है.
ऐसे ही ‘द फ्रस्ट्रेटेड बंगाली’ पेज बनाया गया जिसे अब डाउन कर दिया गया है. इस पेज में लास्ट पोस्ट 26 मई, 2022 में डाली गई. यह पोस्ट भाजपाविरोधी दलों, खासकर ममता बनर्जी, को टारगेट करती है जिस पर साढ़े 6 लाख से अधिक फौलोअर्स हैं. यह सिर्फ विरोधी पार्टियों को टारगेट नहीं कर रहा, बल्कि एक विचारधारा के रूप में भी भ्रम फैलाया जा रहा है, जहां मीम के रूप में ढेरों फेक इनफौर्मेशन ठेली जा रही है, जैसे ‘भीमटा मुक्त भारत’ खासकर बहुजन व दलित विरोधी पेज के रूप में बनाया गया है. इस पेज में भीम राव आंबेडकर का मजाक बनाया जाता है, इस पेज के भाजपा से जुड़ने का तथ्य क्लियर नहीं पर इस पेज पर भाजपा समर्थित सामग्री डाली जाती हैं. ऐसे ढेरों पेज इस समय सोशल मीडिया पर संगठित रूप से काम कर रहे हैं.
इसे थोड़ा और बारीकी से समझने की जरूरत है. 8 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी ने 5 हजार से ज्यादा सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को देशभर से बुलाया और अवार्ड दिया. इसे ‘नेशनल क्रिएटर्स अवार्ड’ कहा गया. अल्लेपुछल्ले इन क्रिएटर्स के लाखों में फौलोअर्स और सब्सक्राइबर्स हैं.
इन में से कुछ ऐसे क्रिएटर्स थे जिन की जीहुजूरी वाले पोडकास्ट में बड़ेबड़े केंद्रीय मंत्रियों के इंटरव्यू भरे पड़े हैं और कुछ ऐसे थे जिन के कंटैंट से भाजपा को राजनीतिक और वैचारिक रूप से कोई समस्या नहीं. देशभर के इन्फ्लुएंसर्स को एक मंच पर बुलाना कोई सामान्य घटना नहीं थी. इसे विकेंद्रित नव सूचना केंद्रों पर मोदी और भाजपा की पकड़ बनने के बढ़ते कदम के रूप में देखा जाना चाहिए.
मेनस्ट्रीम न्यूज चैनलों में आम जनता के मुद्दे गायब हैं. वहां इतना समझा जा चुका है कि ये चैनल सरकारपरस्त जानकारी ही परोस रहे हैं, एकजैसी खबरें, प्रोपगंडा खबरें आदि. सारा दिन मोदी की तारीफ देख कर लोगों का मोहभंग हो रहा है और वे यूट्यूब या सोशल मीडिया का सहारा ले रहे हैं.
आज न्यूजफीड यूट्यूब चैनलों को देखें तो सब से ज्यादा उन यूट्यूब चैनलों को देखा जा रहा है जो एंटीएस्टेब्लिशमैंट खबरें दे रहे हैं. हाल ही में ध्रुव राठी के ‘द डिक्टेटर’ वीडियो को पहले 24 घंटे में 1 करोड़ से अधिक लोगों ने देखा जो अपनेआप में किसी पौलिटिकल कंटैंट वाली वीडियो का एक बड़ा रिकौर्ड था. तेजस्वी, राहुल और अखिलेश के भाषण ज्यादा वायरल हो रहे हैं.
यह बात भाजपा जानती है कि मेनस्ट्रीम चैनलों में जनता के मुद्दों के लिए घटते स्पेस से लोग अपने दुखों को बताने के लिए यूट्यूब चैनलों और वैबसाइट्स का सहारा ले रहे हैं, नहीं तो अपना समय रील्स और अधकचरे एक्स्प्लैनर को देखते हुए काट रहे हैं. भाजपा की कोशिश यह है कि- एक, उन क्रिएटर्स के साथ कोलैब कर अपने पाले में कर लिया जाए जिन के फौलोअर्स हैं, दूसरे, जो पाले में नहीं आ रहे उन्हें स्ट्राइक डाउन जैसे नियमों के तहत बांध दिया जाए. उन के कंटैंट पर रोक लगा दी जाए. यानी, सूचना का सिर्फ एक ही माध्यम बने और वह सिर्फ सत्ता पक्ष का ही हो.
इस खेल में भाजपा अभी भी इसलिए आगे है क्योंकि इलैक्टोरल बौंड जैसी स्कीम से उस के पास अथाह पैसा आ चुका है. जजों व नेताओं को धमकाने व खरीदने का काम वह काफी पहले से करना शुरू कर चुकी है. उस के पास मीडिया तो पहले से थी ही, अब सोशल मीडिया पर भी पूरी तरह नियंत्रण जमा लेना चाहती है.
लेखक : डा. अवनीश चंद्र
भारत में हर छठा व्यक्ति मनोरोगी है. उसे उपचार की आवश्यकता है. कर्नाटक राज्य में 8 फीसदी व्यक्ति इस रोग से ग्रस्त हैं. आंकड़े बताते हैं कि आमतौर से 30 से 49 वर्ष की आयु के व्यक्तियों में मनोरोग के लक्षण होते हैं. गांवों की अपेक्षा शहरों में मानसिक रोगी अधिक पाए जाते हैं. अधिकतर इस का कारण गरीबी होता है.
वैसे तो 30 से 49 वर्ष की आयु के बीच रोगियों में मनोरोगों का पाया जाना सामान्य बात है परंतु इन के लक्षण किसी भी आयु के व्यक्ति में हो सकते हैं. डाक्टरी उपचार का मकसद रोगी को समाज व कार्यालय में पुनर्स्थापित करना होता है. दवाएं जीवनभर चलती हैं. दवा के सेवन में कोताही नहीं बरतनी चाहिए. उपचार को बंद करने से रोग की पुनरावृत्ति हो जाती है. दवाएं मनोरोग विशेषज्ञ की सलाह से ही घटानी अथवा बढ़ानी चाहिए.
विशेषज्ञों की मानें तो अधिकतर मामलों में रोगी के परिजन उसे तभी अस्पताल लाते हैं जब पानी सिर के ऊपर से गुजर जाता है. आखिर हम मानसिक परेशानियों को नकारने की कोशिश क्यों करते हैं? क्या दिमाग हमारे शरीर का हिस्सा नहीं है? यदि रोगियों को शुरुआती दौर में लक्षण पहचान कर अस्पताल लाया जाए तो कम तीव्रता वाली सस्ती दवाओं से ही गुजारा संभव होता है. इस से मरीज पर दवाओं के कम साइड इफैक्ट्स पड़ते हैं.
मानसिक रोगियों के परिजनों का सुखचैन, खानापीना सब हराम हो जाता है. अगर बीमारियां गंभीर हैं, मसलन किसी को अजीबोगरीब आवाजें सुनाई पड़ रही हैं, व्यक्ति कुछ ऐसा देख या सुन रहा है जो दूसरे नहीं या अगर वह खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहा है तो ऐसे में परिवार और दोस्तों की जिम्मेदारी है कि वे उसे डाक्टर के पास ले जाएं क्योंकि ऐसी हालत में मरीज कभी खुद स्वीकार नहीं करेगा कि वह बीमार है.
उस का इलाज सिर्फ थेरैपी या काउंसलिंग से या फिर दवाइयों की जरूरत भी पड़ेगी, इस का फैसला डाक्टर करेगा. ऐसे में सलाह है कि परिवार में घटित घटनाओं के घटने पर उत्पीडि़त व्यक्ति की रोजाना की जिंदगी पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दें. इसे यहां एक तालिका के जरिए दर्शाया जा रहा है.
मनोरोग विशेषज्ञ को सर्वप्रथम रोगी की सामाजिक व आर्थिक स्थिति से वाकिफ होना आवश्यक है. वह समाज के किस खंड का है, उस की शिक्षा व योग्यताएं क्या हैं वगैरह. इस के अलावा यदि उसे यह भी ज्ञात हो कि वह किन लोगों के संपर्क में रहा है व कौनकौन सी भाषाएं जानता है, तो विशेषज्ञ को, रोगी द्वारा अपना हालचाल बताते समय उस ने कौन से शब्द किस प्रकार से कहे हैं, रोग को जांचने में अधिक दिक्कत नहीं होगी.
मसलन, यदि हिंदीभाषी व्यक्ति ऐसा शब्द इस्तेमाल करता है जो किसी दक्षिण भारतीय राज्य की भाषा में भी हो और उस में उस का अर्थ एकदम खास हो तो रोग के प्रकार का निदान भलीभांति हो सकता है.
विशेषज्ञ यह भी तय करें कि मरीज किस हद तक असफलता का कारण दूसरों के सिर मढ़ता है. कुछ मरीज ऐसे भी होते हैं जो अपनी असफलता के लिए स्वयं को इतना अधिक जिम्मेदार मानते हैं कि स्वयं को माफ नहीं करते. एक गलत धारणा यह भी है कि डिप्रैशन या दिमागी तकलीफ सिर्फ उसे ही होती है, जिस की जिंदगी में कोई बहुत बड़ा हादसा हुआ हो या जिस के पास दुखी होने की बड़ी वजहें हों.
डिप्रैशन के दौरान इंसान के शरीर में खुशी देने वाले हार्मोन जैसे कि औक्सिटोसिन का बनना कम हो जाता है. यही वजह है कि डिप्रैशन में व्यक्ति चाह कर भी खुश नहीं रह पाता. इसे दवाइयों, थेरैपी और लाइफस्टाइल में बदलाव ला कर बेहतर किया जा सकता है.
कोई भी व्यक्ति स्वयं में संपूर्ण नहीं है. स्वयं से प्रतिकार करना ठीक नहीं है. जीवन को पूरा जिएं और परिवार के दायित्वों को भी निभाएं, इसी में खुशियां निहित हैं. संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, जानबू झ कर गलत कार्य न करना, नशे व तंबाकू से दूर रहना आदि प्रसन्न रहने के गुर हैं.