16 दिसंबर, 2012 को एक छात्रा के साथ चलती बस में हुए निर्मम बलात्कार के दोषियों को मौत की सजा तो देनी ही चाहिए थी. उन का अपराध ही ऐसा था कि न उस पर रहम की दुहाई सुनी जा सकती है और न कम आयु के जोश का बहाना. पशुओं से भी बदतर जो बरताव उन 6 जनों ने एक अनजानी लड़की से किया वह केवल सैनिकों द्वारा शत्रुओं की औरतों से मध्ययुगों में किया जाता था. दिल्ली जैसे शहर में लोग इस तरह खूंखार हो सकते हैं, यह कल्पना भी नहीं की जा सकती. लगा ही नहीं कि ये 6 जने हजारों साल सभ्यता का पाठ सिखाने वाले समाज की देन हैं.

बलात्कार तो आम हैं और ये सैक्स की भूख का परिणाम कहे जा सकते हैं पर बलात्कार के दौरान अंगभंग करना, योनि में स्टील रौड डालना, हाथ डाल कर अंतडि़यां निकाल लेना कल्पना से भी बाहर है. सफेदपोश लोग कितने जहरीले हो सकते हैं, इस की कल्पना भी असंभव है. उन दोषियों को तो अदालत ने सजा दे दी पर उस समाज को क्या सजा दी जिस ने ऐसे खूंखार जानवर पैदा किए. आखिर किन परिवारों में इस तरह का व्यवहार सिखाया गया है? यह पाठ कौन पढ़ाता है कि बलात्कार का आनंद लो और हिंसा के जरिए उस आनंद को बढ़ाओ? हमारी शिक्षा, तथाकथित धर्म के उपदेश, सुगठित व्यवस्था आखिर किस काम की कि लड़की को अकेले देखा और 6 जने उस पर टूट पड़े.

ऐसे समाज पर धिक्कार है जो इन को अपने बीच पालता है. ये मानसिक रोगी नहीं थे, ये समाज के दिए काले रंग में ही पुते थे. कठघरे में 4 के अलावा समाज भी था. यह बात दूसरी है कि समाज ने अपना दोष इन पर मढ़ दिया और खुद को सभ्य, कानूनप्रिय साबित कर दिया.

 

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