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सुशांत के कमरे में परिणीति

किसी दृश्य को जीवंत बनाने के लिए निर्देशक क्याक्या करते हैं, इसे सम?ाना मुश्किल है. पिछले दिनों सुशांत सिंह राजपूत और परिणीति चोपड़ा 3 दिनों तक एक कमरे में एकसाथ रहे, ताकि उन की आने वाली फिल्म ‘शुद्ध देसी रोमांस’ के एक गीत ‘तेरे मेरे बीच’ की शूटिंग ओरिजिनल लगे. दोनों के बीच एक बेहद प्यारभरी कैमिस्ट्री लाई गई है. दोनों पहली बार इस फिल्म में साथ काम कर रहे हैं. इसलिए दोनों के बीच दोस्ती जरूरी थी.

 

 

चेन्नई एक्सप्रैस

कई सालों से ईद के मौके पर सलमान खान की फिल्में जोरशोर से रिलीज होती रही हैं लेकिन इस बार सलमान खान की नहीं, शाहरुख खान की फिल्म ‘चेन्नई एक्सप्रैस’ देश के लगभग 3,500 सिनेमाघरों में रिलीज हुई है. इस फिल्म की रिलीज से पहले शाहरुख खान ने फिल्म का खूब प्रचार किया. इस से दर्शकों में इस फिल्म को देखने की काफी उत्सुकता थी. लेकिन फिल्म देख कर लगा, यह तो मुंबइया लवस्टोरी पर बनी साधारण फिल्म है.

‘तुझे देखा तो ये जाना सनम…’ फिल्म ‘दिल वाले दुलहनिया ले जाएंगे’ का यह गाना आज भी बजता है तो यंगस्टर्स के दिलों की धड़कनें बढ़ जाती हैं. इसी गाने को बैकग्राउंड में रखा गया है.

फिल्म का प्रेजैंटेशन खूबसूरत है. दक्षिण भारत के चायबागानों के बीच से गुजरती चेन्नई एक्सप्रैस ट्रेन खूबसूरत नजारे दिखाती है. बैकग्राउंड में कलकल बहता झरना, प्राकृतिक सुंदरता, किरदारों के रंगबिरंगे कौस्ट्यूम्स फिल्म को काफी दर्शनीय बना देते हैं.

निर्देशक रोहित शेट्टी की फिल्मों में कौमेडी, ऐक्शन और ड्रामा की?भरपूर डोज होती है. उस ने चेन्नई एक्सप्रैस को सही ट्रैक पर दौड़ाने के लिए इसी फार्मूले को दोहराया है. फिल्म में लेदे कर कुल 4 प्रमुख पात्र हैं, शाहरुख खान, दीपिका पादुकोण, नायिका का पिता (सत्यराज) और आदमकद तंगबलि (निकेतन धीर). बाकी सारे पात्र तमिल बोलते हैं, इसलिए उन्हें कम फुटेज दी गई है. पूरी फिल्म में शाहरुख खान और दीपिका पादुकोण ही छाए हुए हैं.

फिल्म की रफ्तार काफी तेज है. राहुल (शाहरुख खान) के मातापिता उस वक्त मर गए थे जब वह 8 वर्ष का था. उसे दादादादी ने पालापोसा. राहुल जब 40 वर्ष का हुआ, उस के दादा गुजर गए. दादी ने अपने पति की अस्थियों को रामेश्वरम में विसर्जन करने के लिए राहुल से कहा. राहुल अस्थियों को ले कर चेन्नई एक्सप्रैस ट्रेन में चढ़ता है. उस के दोस्त कल्याण स्टेशन पर राहुल का इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि राहुल रामेश्वरम न जा कर गोआ में मौजमस्ती करने का प्लान बना चुका है. ट्रेन में राहुल की मुलाकात मीना (दीपिका पादुकोण) से होती है जिसे उस के डौन पिता के गुंडे जबरदस्ती वापस घर ले जाना चाहते हैं, परिस्थितियां राहुल को मीना के गांव खम्मन ले जाती हैं, जहां उसे मीना से शादी का नाटक करना पड़ता है. मीना का पिता उस की शादी तंगबलि से करना चाहता है परंतु राहुल तंगबलि और उस के गुंडों से अकेले ही निबट कर मीना का हाथ थाम लेता है.

रोहित शेट्टी ने फिल्म में बहुत से ऐसे सीन डाले हैं जिन की कोई तुक नहीं है. जंगल में शाहरुख खान से मिलने वाले एक बौने का सीन ऐसा ही है. दीपिका पादुकोण के साथ उस की कैमिस्ट्री लाजवाब है. दीपिका काफी ग्लैमरस लगी है. रात को बिस्तर पर शाहरुख खान के साथ सोने में उस ने जो कौमेडी की है, वह लाजवाब है. क्लाइमैक्स घिसापिटा है.

इस फिल्म को चूंकि दक्षिण में फिल्माया गया है इसलिए इस पर दक्षिण का प्रभाव साफ नजर आता है. दक्षिण भारत में प्रचलित कई अंधविश्वासों को इस फिल्म में फिल्माया गया है. दीपिका पादुकोण को गोद में उठा कर शाहरुख खान का मंदिर की 300 सीढि़यां चढ़ना और इस से सुखी दांपत्य जीवन की कामना करना, ऐसा ही अंधविश्वास है.

निर्देशक ने गीतों के जरिए फिल्म की सुंदरता को दिखाया है. आउटडोर लोकेशनें काफी सुंदर हैं. विशाल शेखर का संगीत अच्छा है. लुंगी डांस अच्छा बन पड़ा है.

मद्रास कैफे

कहने को यह यह एक पौलिटिकल थ्रिलर फिल्म है पर अंत में अधकचरी डौक्युमैंट्री के स्तर से ऊपर न उठ पाई. इस से पहले ‘विकी डोनर’ जैसी हिट फिल्म बनाने वाले निर्देशक शुजीत सरकार ने इस फिल्म को बनाने के लिए कई साल तक रिसर्च की.

‘मद्रास कैफे’ 80 के दशक में श्रीलंका में हुए गृहयुद्ध को दर्शाती है. इस गृहयुद्ध का ही नतीजा था कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को 1991 में एलटीटीई (लिबरेशन टाइगर औफ तमिल ईलम) ने निशाना बना कर बम से उड़ा दिया था. इस फिल्म में उक्त घटना से मिलतीजुलती घटना को अंजाम देते दिखाया गया है. शुजीत सरकार का कहना है कि उन की फिल्म पूर्व प्रधानमंत्री हत्याकांड पर आधारित नहीं है. विरोधाभासी सोच के कारण न तो यह थ्रिलर बन पाई न रिचर्ड एटनबोरो की ‘गांधी’ की तरह इतिहास का हिस्सा.

चाहे जो हो, इस फिल्म में श्रीलंका में हुए गृहयुद्ध की घटनाओं पर दर्शकों को कुछ तो पता चलता है. इस गृहयुद्ध में हजारोंलाखों सिविलियनों को गोलियों से भून डाला गया था, लोग दानेदाने को मुहताज हो गए, पूरा उत्तरी श्रीलंका गोलाबारी की आग में झुलसता रहा. शुजीत सरकार ने इन सभी घटनाओं और किरदारों को अपनी कल्पनाशक्ति से सजीव करने का प्रयास किया है.  इस तरह की सच्ची घटनाओं पर अच्छी फिल्मों को बनाने की और भी जरूरत है ताकि हमारी आज की युवा पीढ़ी, जिस ने इस तरह की घटनाओं के बारे में केवल पढ़ा व सुना है, अपनी आंखों से वह सब घटता हुआ देख सकें.

इस फिल्म की कमजोरी यह है कि मुख्यपात्र जो काल्पनिक है कहीं से भी कहानी में फिट नहीं बैठता और उसे दिखाने, बारबार दिखाने के चक्कर में वेलुपलाई प्रभाकरन व राजीव गांधी गौण हो गए. श्रीलंका के प्रधानमंत्री तो हैं ही नहीं मानो यह देश के एक राज्य की बात हो सिर्फ.

1980 के दशक में श्रीलंका में चले गृहयुद्ध के दौरान भारत ने अपनी शांतिसेना को वहां भेजा था. भारत वहां शांतिपूर्वक चुनाव करवा कर स्थिति को संभालने की कोशिश कर रहा था. भारतीय फौज काफी तादाद में श्रीलंका भेजी गई थी. वास्तव में वह शांतिसेना काफी पिट कर लौटी थी. इस तथ्य को निर्देशक छिपा गया.

इस फिल्म की कथा के अनुसार, भारत की रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग (रा) द्वारा कई गुप्त मिशन चलाए गए थे. एक मिशन के तहत रा प्रमुख आर डी (सिद्धार्थ बसु) भारतीय सेना के अफसर विक्रम (जौन अब्राहम) को श्रीलंका भेजता है. विक्रम वहां अपने ही विभाग के एक अन्य अफसर बाला (प्रकाश बेलावडी) से मिलता है. विक्रम जाफना में चल रही सिविल वार के बीच एलटीएफ (एलटीटीई के बदले दिया गया नाम) के प्रमुख अन्ना भास्करन वास्तव में वेलुपलाई भास्करन (अजय रत्नम) की गतिविधियों पर नजर रखता है. अन्ना भास्करन वहां अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है. वह भारत की शांतिसेना का विरोध करता है. यहां विक्रम की मुलाकात एक फोटो जर्नलिस्ट जया (नरगिस फाखरी) से होती है.

एक दिन विक्रम का अपहरण हो जाता है. उस का मिशन फेल हो जाता है. तभी उसे पता चलता है कि उस के मिशन को नाकाम करने के पीछे बाला जैसे उस के सहयोगियों का हाथ है. विक्रम को अपहरणकर्ताओं से छुड़ा कर भारत वापस बुला लिया जाता है. शांतिसेना की भी वापसी हो जाती है. तभी खुफिया विभाग को खबर मिलती है कि उस पूर्व प्रधानमंत्री की जान को खतरा है, जिस ने यह शांतिसेना भेजी थी. विक्रम सुबूत जुटाने के लिए सिंगापुर भी जाता है जहां उस की मुलाकात एक पूर्व रा अधिकारी से होती है, जो उसे कई टिप्स देता है. एक रैली में जा रहे पूर्व प्रधानमंत्री को बचाने की सारी तैयारियां कर ली जाती हैं. लेकिन विक्रम और उस के साथियों के वहां तक पहुंचने से पहले ही पूर्व प्रधानमंत्री को बम से उड़ा दिया जाता है.

फिल्म की यह कहानी और इस की पटकथा की लिखने में काफी मेहनत तो की गई है और निर्देशन भी सधा हुआ है पर इतिहास दिखता ही नहीं है.  सरकारी कायदेकानूनों की आड़ में सुरक्षा एजेंसियां साजिश की जानकारी मिलने के बाद भी किस तरह उसे नजरअंदाज कर देती हैं, इस का चित्रण बखूबी किया गया है.

निर्देशक ने पात्रों के चयन में सावधानी बरती है. सारे फिल्म के पात्र रियलिस्टिक लगते हैं सिवा मुख्यपात्र जौन अब्राहम के. फिल्म इंटरनैशनल लैवल की लगती है. फिल्म के संवाद अच्छे हैं. नरगिस फाखरी की भूमिका छोटी है मगर जानदार है. उस ने ज्यादातर अंगरेजी में ही संवाद बोले हैं. वह क्यों परदे पर लाई गई, यह अस्पष्ट है.

फिल्म में गाने नहीं हैं मगर पार्श्व संगीत अनुकूल है. छायांकन काफी अच्छा है. फिल्म की शूटिंग भारत में ही कई जगहों पर की गई है. जाफना वाले क्षेत्र को भारत में क्रिएट कर वहां शूटिंग की गई है, मगर फिल्म देख कर लगता है जैसे शूटिंग जाफना के ही क्षेत्र में की गई है. इस के अलावा बैंकौक, मलयेशिया और अमेरिका में भी शूटिंग की गई है.

इस फिल्म को सराहनीय केवल इसलिए कहा जा सकता है कि भारतीय फिल्म निर्माता असल जीवन पर फिल्में बनाने में अब बढ़चढ़ कर रुचि ले रहे हैं. देश की समस्याएं कुछ समय तक जो भुला दी गई थीं, वे इन फिल्मों के जरिए उन अर्धशिक्षित दर्शकों तक पहुंच रही हैं. जिन्होंने पढ़ना छोड़ दिया है.

सत्याग्रह

यह एक राजनीतिक फिल्म है जिस में भ्रष्टाचारी खलनायक है. सत्ता में बैठे अफसर, नौकरशाह और राजनीतिबाज एक के बाद एक घोटाले किए जा रहे हैं. 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला, कौमनवैल्थ घोटाला, कोयला घोटाला और अब एनएसईएल (शेयर बाजार) घोटालों ने भ्रष्टाचार की सारी सीमाएं तोड़ दी हैं.

आज जनता भ्रष्टाचार से भूख, गरीबी व महंगाई से भी ज्यादा परेशान है. जिस का सरकारी दफ्तर से वास्ता पड़ जाए उस का दिल डूब जाता है  कि न जाने इस भव्य भवन के अंधे काले गलियारों में उस का क्या होगा. हाथ में फाइल दबाए वह सरकारी शेरों के सामने मेमने की तरह दुबकता घूमता है.

प्रकाश झा ने इस फिल्म के माध्यम से भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मुहिम छेड़ी है. फिल्म में भारत की एक ऐसी तसवीर पेश की गई है जहां हर सरकारी दफ्तर में रिश्वतखोर मौजूद हैं.

प्रकाश झा की यह खासीयत है कि वे जिन मुद्दों को उठाते हैं उन का ट्रीटमैंट खास तरह से करते हैं. ‘सत्याग्रह’ में उन्होंने सरकारी तंत्र के खिलाफ युवाओं के आक्रोश को दिखाया है. यह फिल्म अन्ना हजारे के आंदोलन से प्रेरित है और फिल्म के कई दृश्य अन्ना हजारे की मूवमैंट के दौरान दिल्ली के रामलीला मैदान के दोहराव हैं.

कहानी देश के एक कतिपय शहर अंबिकापुर की है, जहां एक रिटायर्ड प्रिंसिपल द्वारका आनंद (अमिताभ बच्चन) अपने बेटे अखिलेश और बहू सुमित्रा (अमृता राव) के साथ रहता है. वह सिद्धांतवादी है और देश को भ्रष्टाचार की दलदल से बाहर निकालने की कोशिश में लगा है. अखिलेश जिले में बन रहे एक फ्लाईओवर प्रोजैक्ट में इंजीनियर है और फ्लाईओवर के निर्माण में चल रहे घपले को उजागर करना चाहता है, तभी एक दुर्घटना में उस की मौत हो जाती है.

मंत्री बलराम सिंह (मनोज वाजपेयी) 25 लाख रुपए के मुआवजे का ऐलान करता है. 3 महीने बाद भी जब अखिलेश की पत्नी को मुआवजा नहीं मिल पाता तो द्वारका आनंद भ्रष्ट डीएम को थप्पड़ मार देता है. पुलिस उसे पकड़ कर जेल में डाल देती है, तो वह भ्रष्टाचार के खिलाफ एक आंदोलन छेड़ देता है. उस के इस आंदोलन में दिल्ली में एक टैलीकौम कंपनी चला रहा बिजनैस टायकून मानव राघवेंद्र (अजय देवगन) भी शामिल हो जाता है. वह पता लगाता है कि अखिलेश को मंत्री बलराम सिंह ने ही मरवाया था. वह अपने साथ एक छात्र नेता अर्जुन (अर्जुन रामपाल) और एक टीवी चैनल की पत्रकार यास्मीन (करीना कपूर) को भी मिला लेता है. वह पूरे जिले के लोगों को भी इस आंदोलन के साथ जोड़ता है. बलराम सिंह झुक जाता है और द्वारका आनंद को रिहा कर देता है.

जेल से छूटने के बाद द्वारका आनंद बलराम सिंह को 7 दिनों के अंदर सिस्टम को दुरुस्त करने की चेतावनी देता?है. वह आमरण अनशन पर बैठ जाता है और यह आंदोलन बड़े जन सत्याग्रह में तबदील हो जाता है. सोशल मीडिया इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में मददगार साबित होता है लेकिन भ्रष्ट मंत्री बलराम सिंह, द्वारका आनंद को मरवा देता है. जनता उग्र हो जाती है और बलराम सिंह को मारने पर उतारू हो जाती है परंतु मानव जनता को शांत कर बलराम सिंह को कानून के हवाले कर देता है.

फिल्म की कहानी में झोल ही झोल हैं.  अन्ना हजारे मूवमैंट के अरविंद केजरीवाल का पार्ट अदा कर रहे मानव (अजय देवगन) ने 3 साल में 6 हजार करोड़ कैसे कमा लिए, यह बताया ही नहीं गया. वह अखिलेश से आखिर इतना लगाव क्यों रखता था कि उस ने 6 हजार करोड़ की कमाई संपत्ति बांट दी. सिद्धांतवादी द्वारका आनंद ने आखिर 25 लाख रुपए मंत्री की घोषणा पर ले क्यों लिए जबकि मंत्री बेईमान है. मुआवजा सरकार देती है, मंत्री नहीं. फिर इस मुआवजे के लिए सुमित्रा जिस दफ्तर में बारबार जाती है वह करता क्या है और उस दफ्तर का औचित्य क्या है?

प्रकाश झा की फिल्मकथा नुक्कड़ नाटक जैसी लगती है जिस में भाषण देने के अलावा किसी को कुछ आताजाता नहीं. आज के युवा इस फिल्म को खुद से जोड़ कर देख रहे हैं क्योंकि अब उन्हें समझ में आने लगा है कि अगर मंत्री, प्रधानमंत्री ठीक ढंग से काम नहीं कर रहे हैं तो उन्हें सत्ता से बाहर करने का अधिकार उन के पास है.

इस विषय पर जितनी फिल्में बन रही हैं उन में नेताओं और अफसरों का ट्रीटमैंट उसी तरह का है जैसा 1970 से 1990 तक के दशकों में माफिया गैंगों या डौनों का होता था. मध्यांतर से पहले फिल्म की रफ्तार धीमी है. फिल्म का निर्देशन अच्छा है परंतु भ्रष्टाचार पर फोकस की गई इस फिल्म में लव ऐंगल और आइटम सौंग डालने की भला क्या तुक थी? करीना कपूर और अजय देवगन के लिप टु लिप किस सीन की भी कतई जरूरत नहीं थी.

अमिताभ बच्चन ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उस का मुकाबला कोई नहीं कर सकता. द्वारका आनंद के किरदार में उस ने जान डाल दी है. अजय देवगन का किरदार भी दमदार है. उस के किरदार में कई शेड्स हैं. वह आज के युवाओं की तरह सोचता है. हमेशा सही समय पर सही फैसले लेता है परंतु फिर भी कहींकहीं गलतियां कर बैठता है.

करीना कपूर पत्रकार की भूमिका में बिलकुल भी फिट नहीं बैठी. भ्रष्ट नेता के किरदार में मनोज वाजपेयी के अभिनय में पुराना घिसापिटापन है. अगर फिल्म की विशेषता है तो यह कि इस विषय पर फिल्में बनने लगी हैं जिस में रिश्वतखोरी से लड़ते आम नागरिक की व्यथा ज्यादा दिखाई गई है. प्रकाश झा अगर सराहनीय हैं तो केवल इसलिए.

फिल्म में 2 गाने हैं- ‘जनता का राज’ और ‘रघुपति राघव राजाराम’ दोनों ही गाने सिचुएशन के अनुसार फिट किए गए हैं. छायांकन अच्छा है. छायाकार ने हजारों लोगों की भीड़ के दृश्यों को कुशलता से फिल्माया है.

यह भी खूब रही

मेरी बिल्ंिडग में एक दक्षिण भारतीय परिवार रहता है. उस परिवार की एक सदस्या मेरी सहेली है. उस की सास को जरा भी हिंदी नहीं आती है. लेकिन उन से मेरी थोड़ीबहुत इशारों में बात हो जाती है.
एक बार मेरी सहेली काफी बीमार हो गई. मैं ने सोचा, फोन कर के उस का हालचाल पूछूं. जब मैं ने फोन किया तो उस की सास ने उठाया. हैलोहैलो होती रही, लेकिन न उन्हें मेरी भाषा समझ आई न मुझे उन की.
अचानक मुझे ‘बागोनारा’ शब्द याद आया, जो मेरी सहेली ने बताया था, जिस का अर्थ होता है, ‘सब ठीक है.’ मैं ने जैसे ही उन्हें बागोनारा बोला, वे समझ गईं कि मैं उन की बहू की सहेली बोल रही हूं और उन्होंने झट उस से मेरी बात करा दी. हम दोनों फोन पर खूब हंसीं.
सरोज गर्ग, मुंबई (महाराष्ट्र)

एक सेवानिवृत्त शिक्षक हर माह पैंशन लेने बैंक जाया करते थे. एक दिन जब वे पैंशन लेने बैंक गए तो वहां प्रत्येक काउंटर पर लंबीलंबी कतारें लगी थीं. जिस कतार में वे लगे वह कतार आगे सरक नहीं रही थी क्योंकि उस काउंटर का बाबू थोड़ी देर काम कर के कुछ समय के लिए गायब हो जाता था. उस की इस हरकत से परेशान वे महाशय उस काउंटर क्लर्क के पास पहुंचे और कहने लगे, ‘‘क्यों जी, आप इस के पहले किसी टीवी चैनल पर ऐंकरिंग करते थे क्या?’’
बाबू एकदम चौंक गया. बोला, ‘‘आप ने कैसे पहचाना?’’
‘‘यही कि आप थोड़ी देर के लिए काउंटर पर आते हो और हम लोगों से छोटे से ब्रेक की अनुमति ले, ‘कहीं जाइएगा नहीं’ कह कर पता नहीं कहां गायब हो जाते हो.’’ उन की इस बात से उस बाबू के काम में गति आ गई.
प्रकाश दर्प, इंदौर (म.प्र.)

मेरी बेटी पहली बार ससुराल से घर आई थी और उसी दिन उस की दूसरी विदाई थी. मैं विदाई की तैयारी में लगी थी. दामादजी को देने के लिए एक सोने की अंगूठी बनवाई थी. जाने से कुछ देर पहले ही मैं ने उन्हें वह अंगूठी देते हुए आग्रह किया कि वे अंगूठी पहन कर देख लें, सही है या नहीं.
उन्होंने डब्बी हाथ में ले कर खोली. देख कर बोले, ‘‘यह मेरे लिए नहीं है, अपनी बेटी को दे दीजिए.’’
मुझे बुरा लगा कि मेरे दिए हुए उपहार को वे इस तरह ठुकरा रहे हैं. मैं ने फिर भी उन से जिद की तो उन्होंने डब्बी को बंद कर के मुझे वापस कर दिया.
मैं ने उदास मन से डब्बी खोल कर देखी, तो हैरान रह गई. उस में मेरी बेटी के कान के बुंदे थे.
सुषमा सिन्हा, वाराणसी (उ.प्र.)

सैफरीना की प्रेम कहानी

रानी को राजा से प्यार हो गया. पहली नजर में दिल बेकरार हो गया. यह प्रेम कहानी है करीना कपूर और सैफ अली खान की. दिलोजान से सैफ पर फिदा करीना की जबानी प्रेम कहानी पेश कर रही हैं असावरी जोशी.

करीना कपूर और सैफ अली खान की प्रेम कहानी को थोड़ी सी बोल्ड, थोड़ी सी अलग कह सकते हैं. करीना कहती हैं, ‘‘2007 मेरे जीवन का सब से महत्त्वपूर्ण साल था. सबकुछ हाथ से निकल गया था, टूट गया था. मन की भड़ास बाहर किसी के साथ शेयर भी नहीं कर सकती थी. इसी बीच फिल्म ‘टशन’ की शूटिंग के लिए मैं और सैफ लद्दाख में थे. वैसे मैं ने और सैफ ने फिल्म ‘एल ओ सी कारगिल’ में एकसाथ काम किया था लेकिन तब हमारी इतनी ज्यादा बातचीत नहीं हुई थी. सैफ तो हमेशा से ही सभी के साथ अदब से पेश आते थे.

‘‘फिल्म ‘टशन’ के सैट पर भी हमारी ज्यादा बातचीत नहीं हो पाती थी. एक दिन होटल के लाउंज में मैं अपनी सहेली के साथ थी और मैं ने उन्हें देखा. होटल के पूल पर वे लाउंजचेयर पर लेटे थे. वे सिर्फ जीन्स में ही थे और उसी में वे हौट और सैक्सी दिख रहे थे. मुझे वे एकदम से अच्छे लगे. उस के बाद भी हमारे बीच उतनी ज्यादा बातचीत नहीं हो रही थी.

‘‘आहिस्ताआहिस्ता हमारे बीच फ्रैंडशिप होने लगी. पहले शौट के बाद हमारे बीच पहली बार ज्यादा बातें हुईं और उन्होंने इस बीच मुझे इतना हंसाया कि पूछो मत.’’ वर्ष 2007 की यादें फोन पर शेयर करते वक्त करीना बहुत ही प्रसन्न मुद्रा में लगी थीं, ‘‘उस के बाद हमारे बीच एक सुंदर सा रिश्ता साकार होने लगा. हम बाहर जाने लगे, मिलने लगे. जिसे हम डेटिंग कहते हैं और हम ने कभी किसी से कुछ भी छिपाया नहीं. इन मुलाकातों के बाद मैं ने दिल से सैफ को अपना जीवनसाथी मान लिया.’’

एक दिन सैफ सीधे करीना की मम्मी के पास गए और कहा कि करीना मेरे लिए बनी है, अब मुझे अपना जीवन इसी के साथ गुजारना है. इस बाबत करीना कहती हैं, ‘‘मेरी मम्मी को हमारे बारे में पहले से ही सबकुछ मालूम था, इसलिए उन के इनकार करने का सवाल ही नहीं था. फिर हम ने लिव इन रिलेशन में रहने की शुरुआत की. यह समय मेरी लाइफ का सब से अच्छा समय था. इसी दौरान हमारा रिश्ता और भी मजबूत होता गया. इस सुंदर रिश्ते ने हमें इतनी सारी खुशियां दीं कि हम दोनों को शादी के बंधन की कभी जरूरत ही महसूस नहीं हुई. लेकिन अम्मीजी यानी सैफ की मां की यही इच्छा थी कि हम विवाह बंधन में बंधें, हम ने इस का पालन किया.

‘‘अब तो हमारी शादी हो गई है. शादी के पहले भी मैं सैफ के घर जाती थी, उन के परिवार के साथ वक्त बिताती थी. हम पूरे 4 साल लिव इन रिलेशन में रहे. ‘‘सैफ ने मुझे जीना सिखाया. सैफ बहुत ही खुले विचारों के हैं. उन्होंने मुझे फिल्मों से आगे देखने के लिए प्रेरित किया. उन का स्वभाव मुझे बहुत अच्छा लगता है.’’

सैफ के व्यक्तित्व पर करीना दिल से मोहित हैं. उन के अनुसार, ‘‘सैफ का राजसी, कुलीन व्यक्तित्व तो किसी को भी मोहित करता है लेकिन उस से भी ज्यादा उन की काबिलीयत मुझे ज्यादा लुभाती है. हमारा प्रेम का रिश्ता दिनोंदिन मजबूत होता जा रहा है. इस में सैफ का शादीशुदा होना, उन के बड़े बच्चे होना, अमृता के साथ अलगाव होने के बाद भी उन का और एक अफेयर होना, मैं हिंदू तो उन का मुसलिम होना, ये सभी चीजें बहुत ही मामूली हैं. इन के बारे में मैं ने कभी कुछ सोचा ही नहीं. इसलिए दुनिया वाले मुझे नासमझ समझते हैं तो वह मैं नहीं हूं. यह फैसला मैं ने पूरी संजीदगी से लिया है.

‘‘शादी से पहले हमारा एकसाथ रहना यानी जीवन का पूरा लुत्फ उठाने जैसा है. हम ने हर छुट्टियां एकसाथ बिताई हैं. स्कीइंग, फिश्ंिग, कैरम, स्विमिंग इन सभी चीजों का हम ने एकसाथ मजा लिया है. सैफ ने मुझे क्या नहीं सिखाया है, उन्होंने बहुत सारी किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित किया. सैफ के कारण मैं ने फ्रैंच भाषा सीखी. आल्प्स पर्वतों की कड़ाके की ठंड का मजा हम दोनों ने एकसाथ लिया है.’’

करीना आगे कहती हैं, ‘‘हमारा सहजीवन तो 5-6 साल पहले ही शुरू हुआ, हम दोनों ने मिल कर एक पेंट हाउस लिया और उसे सजाया. इतनी खुशी मुझे पहले कभी नहीं मिली थी. जीवन इतना सुंदर होता है, यह सैफ के कारण ही मैं समझ पाई. शादी से पहले भी मैं उन के परिवार का एक हिस्सा थी और अब तो हूं ही. सैफ के बच्चों से मुझे बहुत ही लगाव है. वे भी मुझ से अदब से पेश आते हैं. शादी से पहले एकसाथ रह कर हमारे प्रेम में कोई कमी नहीं आई बल्कि अब तो शादी के बाद उस का स्वाद और भी बढ़ गया है.’’

सैफ और करीना की यह प्रेम कहानी वास्तव में आज के प्रेमीप्रेमिकाओं के लिए एक अच्छा उदाहरण है. वे दोनों करीब आए, इश्क पनपा और फिर अपने इश्क को सब की खुशी में बदलते हुए उसे कामयाबी के साथ परवान चढ़ाया.

पाठकों की समस्याएं

मेरे मातापिता के बीच प्यार में अकसर नोकझोंक होती रहती है लेकिन आजकल घुटने की तकलीफ के चलते मेरी मां खीझ उठती हैं. इसी परेशानी में उन्होंने एक दिन पिताजी से कह दिया कि अमुक काम नहीं हुआ तो वे घर छोड़ कर चली जाएंगी. मैं अपनी मां के इस व्यवहार से बहुत परेशान हूं.
आप के मातापिता में प्यारभरी नोकझोंक होना तो अच्छी बात है. प्यारभरी नोकझोंक किसी भी रिश्ते की उम्र बढ़ाती है. आप की मां के खीझभरे और चिड़चिड़े व्यवहार का कारण उन की घुटनों की तकलीफ है जिस का आप जल्द से जल्द इलाज कराएं. मां को किसी अच्छे आर्थोपैडिक सर्जन को दिखाएं. जब उन की शारीरिक परेशानी दूर हो जाएगी तो उन का रूखा व चिड़चिड़ा व्यवहार भी बदल जाएगा.

मैं 25 साल की विवाहिता हूं. मेरे 2 बच्चे हैं. पिछले दिनों मुझे पता चला कि शादी से पूर्व मेरे पति के अपनी भाभियों के साथ नाजायज संबंध थे. मुझे शक है कि वे संबंध आज भी बरकरार हैं. मैं जब भी पति को अपनी भाभियों के साथ बात करते देखती हूं, मुझे बहुत गुस्सा आता है और सारा गुस्सा बच्चों पर निकलता है.
आप की परेशानी का कारण आप का बेमतलब की जलन करना है. भाभियों से चुहलबाजी को अन्यथा न लें. उन के पतियों को भी आपत्ति होगी. बच्चों को मारनापीटना कोई समझदारी नहीं है. जब तक आप को प्रेम मिल रहा है खुद भी खुश रहिए और पति और बच्चों को भी खुश रखिए.

मैं 55 वर्षीय विकलांग, अकेली, तलाकशुदा महिला हूं. मेरी समस्या यह है कि मैं अपनी 30 वर्षीय बेटी की शादी कैसे करूं? कृपया सही समाधान बता कर मेरी मदद कीजिए.
आप की बेटी अगर शिक्षित और आत्मनिर्भर है तो समाज में उस के योग्य अनेक वैवाहिक रिश्ते मौजूद होंगे. योग्य वर के लिए मैट्रीमोनियल सर्विसेज की भी मदद ले सकती हैं. आप समाजसेवी संस्थाओं की भी मदद ले सकती हैं जो सामूहिक विवाह का आयोजन कराती हैं. तलाकशुदा होने और विकलांगता को अपनी राह का रोड़ा न समझें और साहस व आत्मविश्वास के साथ अपनी बेटी के लिए योग्य वर का चुनाव कर के उस का विवाह कराएं.

मैं 38 वर्षीय विवाहिता हूं. पिछले दिनों मैं ने अपने 12 वर्षीय बेटे को इंटरनैट पर पौर्न साइट देखते हुए पकड़ लिया. मुझे देखते ही वह झेंप गया. उस समय मैं ने भी उस से कुछ नहीं कहा. उस दिन के बाद से वह चुपचाप रहने लगा है. मुझे समझ नहीं आ रहा है मैं इस विषय पर अपने बेटे से बात करूं या नहीं, और करूं तो कैसे करूं?
उम्र के इस बदलाव भरे दौर में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों और गुप्तांगों में होने वाली उत्तेजना किशोरों को पौर्न साइट व अश्लील पत्रपत्रिकाएं देखने को उकसाती हैं. अगर आप इस विषय पर अपने बेटे से बात नहीं करेंगी तो वह चोरीछिपे अन्य गलत तरीकों से अपनी जिज्ञासा शांत करने का प्रयास करेगा. इसलिए आप अपनी झिझक से बाहर निकल कर इस विषय पर खुल कर अपने बेटे से बात करें और उसे सहीगलत की जानकारी दें. पौर्न साइटों पर ज्यादा नाकभौं न चढ़ाएं.

मैं 47 वर्षीय विवाहित पुरुष हूं. पत्नी की उम्र 45 वर्ष है. मेरी समस्या यह है कि पत्नी सैक्स में बिलकुल रुचि नहीं लेती. और तो और, इस विषय पर बात करने से भी कतराती है.
दरअसल, आप की पत्नी इस समय मेनोपोज के काल से गुजर रही हैं. इस समय सैक्स के प्रति अरुचि होना सामान्य है. मेनोपोज के समय एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी से उत्तेजना कम होती है. आप चाहें तो सैक्सोलौजिस्ट या सामान्य डाक्टर से संपर्क कर सकते हैं जो सही काउंसलिंग व दवाओं द्वारा मेनोपोज के प्रभाव को कम करने के उपाय बता सकता है.

मैं 25 वर्षीय शादीशुदा महिला हूं. शादी को 5 साल हो गए हैं. मेरी समस्या यह है कि मेरी ननद अपने 5 बच्चों के साथ हमेशा मेरी ससुराल यानी अपने मायके में लगभग रोज आती रहती है जिस से मेरा जीना हराम हो गया है. अपना घर होते हुए भी मुझे यह घर अपना नहीं लगता. पूरा समय ननद के बच्चों के काम में निकल जाता है. रसोई के कामों से फुरसत नहीं मिलती है. मैं और मेरे पति एकदूसरे के साथ समय नहीं बिता पाते. कोई रास्ता बताइए जिस से मेरी समस्या हल हो जाए.
आप की ननद का ऐसा करना सर्वथा अनुचित है. आप इस बारे में अपने पति व अन्य?घर वालों से बात कीजिए. उन्हें समझाइए कि अगर आप भी आप की ननद की तरह हमेशा अपने मायके में रहेंगी तो न तो आप के ससुराल वालों को अच्छा लगेगा, न ही आप की भाभी को. रिश्ते में मेलजोल अच्छी बात है लेकिन इतना?भी न हो कि इस से दूसरों को परेशानी हो. आप चाहें तो ननद के पति से इस बारे में बात कर सकती हैं. अपनी समस्या से उन्हें अवगत कराएं. अगर वे समझदार होंगे तो अपनी पत्नी को अवश्य समझाएंगे. आप ननद को उन के बच्चों की पढ़ाईलिखाई की तरफ ध्यान दिला कर भी उन का घर में आनाजाना कम करा सकती हैं.

 

मैं 16 वर्षीय 11वीं कक्षा का छात्र हूं. मेरी समस्या यह है कि पिछले कुछ दिनों से मेरे स्कूल के कुछ छात्र मेरे साथ गंदी हरकतें कर रहे हैं. जब मैं उन्हें ऐसा करने से मना करता हूं तो वे मुझे धमकाते हैं. मैं बहुत डर गया हूं. पढ़ाई से भी मेरा ध्यान भटक रहा है. क्या करूं?
आप बिना डरे अपने मातापिता व स्कूल टीचर को इस बारे में खुल कर बताएं. जैसे आप को बदनामी का डर है वैसे उन छात्रों को भी अवश्य होगा.

इन्हें भी आजमाइए

  1. एक नीबू के रस में 3 चम्मच शक्कर, 2 चम्मच पानी मिला कर घोल कर बालों की जड़ों में लगाएं व 1 घंटे बाद धो दें, बालों की रूसी दूर हो जाएगी और बाल गिरना भी बंद हो जाएंगे.
  2. यदि आप को पेटदर्द होता है तो भुनी हुई सौंफ चबाइए, तुरंत आराम मिलेगा. सौंफ की ठंडाई बना कर पीजिए, इस से गरमी शांत होगी और जी मिचलाना बंद हो जाएगा.
  3. शरीर के किसी भी भाग या हाथपैर में जलन होने पर तरबूज के छिलके के सफेद भाग में कपूर और चंदन मिला कर लेप करने से जलन शांत होती है.
  4. घर को नेचुरल लुक देने के लिए फूलों का प्रयोग करें. फूल ताजा व असली हों तो ठीक अन्यथा आर्टिफिशियल फूलों का इस्तेमाल कर सकते हैं.
  5. हींग में रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है. दाद, खाज, खुजली व अन्य चर्म रोगों में इस को पानी में घिस कर उन स्थानों पर लगाने से लाभ होता है.
  6. दही में अजवाइन मिला कर पीने से कब्ज की शिकायत दूर होती है.
  7. तुलसी के 5 पत्ते प्रतिदिन चबाएं, सांस की बदबू दूर होगी.

जीवन की मुसकान

बात 15 साल पहले की है. हम लोग सहारनपुर में थे. मेरे पति वहां सर्विस करते थे.
1995 में मेरे ससुर का निधन हो गया. बड़ा सा घर खाली रहता, सो, मेरे पति मुझे व मेरे दोनों बच्चों को जयपुर छोड़ गए. उस समय मेरा छोटा बेटा 10वीं में था. कुछ समय बाद मैं बहुत बीमार हो गई.
मेरे पति लंबे समय के लिए 2 बार मुझे सहारनपुर ले गए. इस बीच बच्चे अकेले ही जयपुर में रहे. जब मैं जयपुर आती तो मेरी पड़ोसिन कहती, ‘‘देखा, आप के न रहने से आप का छोटा बेटा दिनभर पतंग उड़ाता रहता है.’’
मैं बहुत दुखी होती व अपने को अपराधी समझती कि मेरे कारण मेरा बेटा पढ़ाई में मन नहीं लगा पा रहा है. वह पढ़ाई में पीछे हो जाएगा जबकि 10वीं की बोर्ड की परीक्षा है. आखिर परीक्षा का समय आ गया. मेरा दिल बहुत घबरा रहा था, पता नहीं क्या होगा. मैं तो यह ही सोच रही थी कि ज्यादा से ज्यादा पास भर होगा. इसलिए उस का रिजल्ट देखने का बिल्कुल भी उत्साह नहीं था.
गरमियों की छुट्टियों में हम लोग सो रहे थे कि एक दिन सुबहसुबह एक फोन आया जो मैं ने रिसीव किया. फोन मेरे बेटे के पिं्रसिपल का था. वे बोले, ‘‘बधाई हो, आप के बेटे की 10वीं की परीक्षा में पूरे राजस्थान में 35वीं रैंक आई है.’’
मुझे तो अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ.
मैं ने कहा, ‘‘सर, यह किसी और का रिजल्ट होगा.’’
जब उन्होंने कहा कि नहीं मैडम, आप के बेटे गरुड़ का ही है, तब मुझे विश्वास हुआ. मारे खुशी के बहुत देर तक मुझ से कुछ बोला ही नहीं गया.
थोड़ी देर बाद सामान्य हो कर मैं ने बेटे को जगा कर खूब प्यार किया. उस ने बिना किसी गाइडैंस के इतनी बड़ी उपलब्धि प्राप्त कर के मेरा सीना गर्व से चौड़ा कर दिया था.
आशा गुप्ता, जयपुर (राज.)

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हमारे एक रिश्तेदार हैं जिन की बाजार में दुकान है. उन का 16 वर्षीय बेटा अपने दोस्तों के साथ मिल कर पौकेटमनी इकट्ठा कर गिनती कर रहा था. उस के पापा ने पैसा देख कर डांट लगाते हुए कहा, ‘‘यह समय पढ़ाई का है या पार्टी मनाने का.’’
इस पर बेटे ने सहज ढंग से उत्तर दिया, ‘‘पापा, यह पैसा पार्टी के लिए नहीं, केदारनाथ धाम के पीडि़तों के लिए हम अपनी पौकेटमनी इकट्ठा कर भेज रहे हैं.’’
यह सुन कर वे चकित हुए और गर्व महसूस करने लगे.
शालिनी बाजपेयी, चंडीगढ़

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