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ई-मोड पर कर्मचारी भविष्य निधि

सार्वजनिक क्षेत्र का कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी ईएफपीओ जमाने के साथ बदल रहा है. संगठन ने तय कर दिया है कि इस साल अगस्त तक वह पूरी तरह से भविष्य निधि से निकासी की प्रक्रिया को सरल बना कर ई-मोड पर ला देगा.
कर्मचारियों को अब तक भविष्यनिधि की अपनी रकम वापस पाने के लिए तरहतरह के दस्तावेजों के झंझट से गुजरना पड़ता था और सभी आवश्यक औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद उसे उस की कमाई का चैक मिल पाता था. एक तरह से उसे सेवानिवृत्ति पर साबित करना पड़ता था कि उस के भविष्य निधि में जो पैसा है वह उसी के वेतन से काटा गया है, इसलिए इस का भुगतान उसे किया जाना चाहिए.
ईएफपीओ के ई-मोड पर आने से औपचारिकताएं कम नहीं होंगी लेकिन कर्मचारी को इस के लिए अब ईएफपीओ के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे. आवश्यक जांचपड़ताल के बाद उस का पैसा सीधे उस के बैंक खाते में पहुंच जाएगा. ईएफपीओ के करीब 93 फीसदी काम ई-भुगतान के जरिए हो रहे हैं लेकिन अगले 3-4 माह में यह कार्यालय पूरी तरह से ई-भुगतान पर निर्भर हो जाएगा. कर्मचारी के भविष्य निधि की रकम का अलग से बैंकड्राफ्ट अथवा चैक बनाने की आवश्यकता नहीं होगी, पैसा सीधे उस के खाते में पहुंच जाएगा.
ईएफपीओ का काम लगातार बढ़ रहा है. पिछले वित्त वर्ष में उस का काम पहले साल की तुलना में 13 फीसदी बढ़ा है और इस में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. समाप्त वित्त वर्ष से पहले इस संगठन ने एक करोड़ लोगों के मामले निबटाए थे जबकि 2013-14 में 1 करोड़ 22 लाख लोगों के मामले सुलझाए हैं. उम्मीद की जा रही है कि ई-भुगतान के जरिए कर्मचारियों की निधि का भुगतान करने से न सिर्फ संगठन की कार्यक्षमता बढ़ेगी बल्कि कर्मचारियों को भी इस का सीधा लाभ मिलेगा.

छोटे शहरों का तेजी से रुख करती मौल संस्कृति

 
महानगरों में मौल संस्कृति का प्रचलन शुरू हुआ था तो खुदरा व्यापारियों की आजीविका को ले कर तरहतरह की चिंताएं व्यक्त की गईं. साथ ही यह भी चर्चा रही कि अपने महल्ले के आसपास जरूरत का सामान खरीदने के आदी भारतीय समाज में मौल संस्कृति ज्यादा प्रभावशाली साबित नहीं होगी. शुरुआती दौर में ये दोनों चिंताएं बेबुनियाद साबित हुईं लेकिन इस संस्कृति का असली रंग अब दिखने लगा है. महानगरों में फैला मौल का जाल कमजोर पड़ रहा है और कारोबारी जिस उम्मीद में मौल में घुसे थे उन्हें उतनी सफलता मिलती नजर नहीं आ रही है.
वाणिज्य उद्योग संगठन यानी एसोचेम का कहना है कि मैट्रो शहरों में 300 से 350 मौल ऐसे हैं जिन में 75-80 फीसदी जगह खाली पड़ी है. दरअसल, आम उपभोक्ता की यह धारणा बन गई है कि मौल में सामान अपेक्षाकृत महंगा होता है. उधर, छोटे शहरों के उपभोक्ता वर्ग की धारणा इस के उलट है. उस का मानना है कि मौल संस्कृति ठीक है. वहां अच्छी क्वालिटी और अपेक्षाकृत सस्ती दर पर बेहतर सामान मिलता है. साथ ही, मौल में खरीद से उस की महानगर की जीवनशैली जैसे संभ्रांत होने के एहसास की भी पूर्ति हो जाती है. तेजी से आय में बढ़ोतरी छोटे नगरों के उपभोक्ताओं को ‘ऊंची दुकान’ पर आने को उकसा रही है. उसे लगता है कि ऐसा कर के उस के संभ्रांत होने की पुष्टि हो रही है.
शायद यही वजह है कि मौल छोटे नगरों में तेजी से विकसित हो रहे हैं. मौल निर्माण से जुड़ी एक सलाहकार कंपनी का कहना है कि अगले 5-7 साल में करीब एक हजार मौल विकसित किए जाने हैं. इन में 70 प्रतिशत छोटे नगरों में विकसित होने हैं.
कंपनी का कहना है कि मौल देहरादून, रायपुर, लखनऊ, नागपुर, कोच्चि, विजयवाड़ा और मैसूर जैसे शहरों में करीब 700 बनाए जाने की योजना है. छोटे नगरों में उपभोक्ता के पास पैसा है, जगह है और व्यापारियों के सामने कम प्रतिस्पर्धा है, इसलिए इन नगरों में मौल संस्कृति तेजी से पनप रही है. स्थिति यह है कि दूरदराज के राज्यों के जिला मुख्यालयों में भी, छोटे ही सही, मौल तैयार हो रहे हैं.
 

भारत भूमि युगे युगे

सियासी भाईबहन
चचेरे, ममेरे, फुफेरे और मौसेरे भाईबहनों के साथ बचपन में गुजारा वक्त जिंदगीभर जेहन में महफूज रहता है. जिस में सिर्फ मीठी यादें, शरारतें और झूठमूठ की लड़ाइयां होती हैं. ये यादें मुसकराने की वजह भी होती हैं, इसलिए लोग अकसर कहते यह हैं कि बचपन कितना अच्छा होता है, और लौट कर क्यों नहीं आता. प्रियंका वाड्रा और वरुण गांधी की लड़ाई सियासी है जिस में वरुण शालीनता दिखाते हार कर भी जीत गए हैं. एक सधे नेता की तरह वे नपातुला बोले, धैर्य नहीं खोया और उकसावे में नहीं आए यानी बचपना नहीं दिखाया. रिश्तेदारों के बीच बैर के बीज हमेशा की तरह इस मामले में भी मांबाप के बोए हुए हैं, तो इस में इन वयस्क बच्चों का भला क्या दोष?
 
हवाई जीवन
नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी ने 45 से भी ज्यादा दिन हैलिकौप्टर और हवाई जहाजों में गुजारे, वहीं इन्होंने चायनाश्ता किया, लंचडिनर लिया, रणनीतियां बनाईं, चिंतनमनन किया और जहां भी उतरे, भीड़ के सामने चेहरे पर ओढ़ी मुसकराहट के साथ हाथ हिला कर उस का अभिवादन किया. भाषण दिया और दूसरे शहर की तरफ उड़ लिए. हवा में तो ये खूब रह लिए, अब बारी जमीन की है. यह जमीन किस के हिस्से में आती है यह तो समय ही बताएगा. दुनियाभर के लोग शाम ढले पक्षियों की तरह वापस घर आने को फड़फड़ाते हैं, जिस से नौकरी या कारोबार की थकान बीवीबच्चों, घर वालों के साथ बैठ कर उतार सकें. इन की दुनिया बहुत छोटी पर महत्त्वपूर्ण होेती है, जो नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी को अलगअलग वजहों के चलते नसीब नहीं है जिस की चर्चा प्रचार के दौरान अप्रिय तरीके से हुई भी.
 
कारोबार के गुर
लाखों लोगों को नौकरी देने वाले रिलायंस के मुखिया मुकेश अंबानी की 22 वर्षीय बेटी ईशा अंबानी अमेरिका की नामी कंसल्ंिटग कंपनी मेकेंजी में बतौर कंसल्टैंट नौकरी करेगी, इस खबर को जिस ने भी सुना, हैरानी से यही कहा कि भला मुकेश अंबानी की बेटी को नौकरी की क्या जरूरत. दरअसल, जरूरत अनुभव की, कर्मचारियों से काम निकालने और कारोबारी गुर सीखने की है. जो पिता और अपनी कंपनी से दूर रह कर ही हासिल किए जा सकते हैं. व्यावसायिक दुनिया बेहद क्रूर होती है. और यही क्रूरता सीखने के लिए ईशा मेकेंजी में है. खुद पढ़ाने के काबिल होते हुए भी मांबाप संतान को दुनियादारी सीखने के लिए स्कूल भेजते हैं, यही मुकेश कर रहे हैं. वे चाहते हैं कि उन की बेटी अपने नाम से जानी और पहचानी जाए.
 
पितामह की भूमिका 
क्या सचमुच लालकृष्ण आडवाणी नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाए जाने पर सहमत हो गए हैं, इस सवाल का सही जवाब 16 मई के बाद ही मिलेगा. वह भी उस सूरत में जब एनडीए बहुमत में आए. कल तक बातबात में बच्चों की तरह रूठ जाने वाले और मोदी के नाम पर नाकभौं सिकोड़ लेने वाले भाजपा के इस पितृ पुरुष के  दिल में दरअसल है क्या, इस का अंदाजा राजनीति के अच्छेअच्छे जानकार नहीं लगा पा रहे. आम और खास दोनों तरह के लोगों को आडवाणी का मोदीमय चरित्र न तो रास आ रहा है न ही गले उतर रहा है और न ही लोग इस पर भरोसा कर पा रहे हैं. इस से जाहिर है कि आडवाणी को आम जनता हलके  में नहीं लेती और उम्मीद कर रही है कि जरूरत पड़ने पर वे कोई धमाका जरूर करेंगे.
 

नए रिकौर्ड की तरफ शेयर सूचकांक

शेयर बाजार में उतारचढ़ाव के बीच मजबूती का रुख है. अप्रैल में बाजार लगातार 5वें सप्ताह हलके उतारचढ़ाव के बीच तेजी पर बंद हुआ. अप्रैल के दूसरे और तीसरे सप्ताह के दौरान बाजार में अवकाश का माहौल रहा. 7 से 20 अप्रैल के बीच बाजार में सिर्फ 7-8 दिन ही कारोबार हुआ. इस दौरान जम कर मुनाफावसूली हुई और उतारचढ़ाव का दौर भी जारी रहा. बाजार में जो गिरावट दिखी उस की वजह मार्च में महंगाई के 3 माह के उच्चतम स्तर पर पहुंचने, बैंक ऋण दरों में कटौती होने की धूमिल संभावनाओं के साथ ही रुपए पर दबाव की स्थिति रही.
थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति की दर मार्च में 5.70 प्रतिशत रही जो 3 माह में सर्वाधिक थी जबकि फरवरी में यह दर 4.86 फीसदी के साथ 9 माह के न्यूनतम स्तर पर थी. बाजार में गिरावट भी जम कर हुई और 16 अप्रैल को 208 अंक की गिरावट के साथ सूचकांक 3 सप्ताह के निचले स्तर पर जा पहुंचा. रुपया भी उस दिन 3 सप्ताह के न्यूनतम स्तर पर बंद हुआ. इस से बाजार में मुनाफावसूली का दौर तेज हुआ और दिग्गज कंपनियों के शेयरों में गिरावट का रुख रहा.
उधर, कंपनियों के तिमाही परिणाम आने शुरू हुए तो बाजार में फिर रौनक बढ़ने लगी और सूचकांक 23 हजार अंक के स्तर की तरफ बढ़ने लगा. 22 अप्रैल को कारोबार के दौरान सूचकांक नए स्तर पर पहुंचा लेकिन बाद में गिर कर बंद हुआ. अगले कारोबारी सत्र में सूचकांक ने फिर नया स्तर कायम किया और यह 22,877 अंक पर जा पहुंचा. रुपया हालांकि कमजोर पड़ा लेकिन बीएसई और निफ्टी नए स्तर की तरफ छलांग लगाते रहे.

नेताओं के खोखले बोल वादें हैं वादों का क्या

अरसे से चुनाव दर चुनाव जनता को वादों की नियमित खुराक दे रहे नेता आज भी वादों का लौलीपौप दिखा कर चुनाव जीतने की फिराक में हैं. सवाल है कि जनता को वोट देने के लिए जबतब उकसाती रहे मीडिया, फिल्मी कलाकार और सामाजिक संस्थाएं घिसेपिटे वादों की रट लगाए इन सियासतदानों के गिरेबां क्यों नहीं पकड़ते, पड़ताल कर रहे हैं भारत भूषण श्रीवास्तव.
कतरी सराय, गया (बिहार) के मर्दाना ताकत के इश्तिहारों और राजनेताओं के वादों, दावों व आश्वासनों में एक अद्भुत समानता यह है कि दोनों ही की जरूरत आजादी के बाद से ही बनी हुई है, बावजूद इस हकीकत के कि देश से न बीमार व कमजोर लोग खत्म हुए हैं न ही राजनीति में परेशानियों व समस्याओं का हल ढूंढ़ने वालों का टोटा पड़ा है.
लोकसभा चुनाव का नजारा देख लगता यह है कि चुनाव को भी लोगों के मनोरंजन और वक्त काटने का जरिया बना दिया गया है. 1952 के पहले लोकसभा चुनाव की तरह पुरानी बातें दोहराई जा रही हैं और 62 साल पुराने वादे किए जा रहे हैं कि बस, इस दफा वोट हमें दे दो फिर आप की सारी तकलीफें दूर हो जाएंगी, हम सड़कें बनवा देंगे, पानी देंगे, बिजली चौबीसों घंटे मिलेगी, कि सभी को रोजगार मिलेगा, और भ्रष्टाचार तो बस यों चुटकियों में दूर हो जाएगा.
एक बात हजार तरीकों से कैसे की जा सकती है, नेताओं को इस में महारत हासिल है. मंच के सामने इकट्ठा भीड़ बीचबीच व आखिर में थोक में तालियां पीट कर नेता का उत्साह बढ़ा कर चली जाती है. फिर घरों, दफ्तरों और चौराहों पर अपनी राय सार रूप में यह देती है कि ये क्या कर लेंगे, सब एक से हैं, सारी मारामारी कुरसी के लिए है.
इस भीड़ की पीठ पर कई लोग, संस्थाएं, मीडिया, धर्मगुरु और चुनाव आयोग तक लाठी मार रहे हैं कि चलो, वोट डालो, अपनी सरकार चुनो और जागरूकता दिखाओ, तभी उस का भला होगा. इस बार 10-12 फीसदी ज्यादा लोगों ने जागरूकता दिखा भी दी और वोट डाल कर मतदान प्रतिशत बढ़ा दिया. इस भीड़ ने जो चुनावी मौसम में गला फाड़ कर राजनीति पर चर्चा और बहस करती है, दबी आवाज में यह पूछा कि जो वादे आप कर रहे हैं उन्हें पूरे कैसे करेंगे. दबी आवाज में इसलिए कि वोट डालने के लिए उकसाने वालों ने यह नहीं कहा कि राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों और नेताओं के लुभावने भाषणों पर जिरह मत करने लगना. यह कानूनी अनुबंध नहीं है सिर्फ वादा है जिस पर चल कर नेता को संसद और राजनीतिक दल को सत्ता में पहुंचना है.

अपनी डफली अपना राग
भारतीय जनता पार्टी ने काला धन वापस ला कर गरीबी दूर करने की बात प्रमुखता से कही तो लोग चकरा उठे क्योंकि यह गरीबी पनपने की नई वजह बताती बात भी थी. दूसरी अहम बात यह उजागर हुई कि विदेशों में जमा सारा काला धन कांग्रेसियों का है क्योंकि वे सब से ज्यादा वक्त सत्ता में रहे हैं और इस दौरान बजाय देश चलाने के काला पैसा इकट्ठा करते रहे हैं. देश के नामी उद्योगपति भी इस गोरखधंधे में शामिल हैं.
भारतीय मतदाता बड़ा दिलचस्प और तर्कशील भी है. बारबार काले धन का राग अलापा गया तो लोग प्रतिप्रश्न यह करने लगे कि इस बात की क्या गारंटी कि आप भी काला धन जमा नहीं करेंगे और विदेशों से इसे लाएंगे कैसे, क्या स्विस बैंक वाले आप के कह देने से ही थाली में खरबों रुपया सजा कर वापस दे देंगे? गांधी, नेहरू परिवार का दामाद 2-3 लाख रुपए की पूंजी लगा कर 300 करोड़ रुपए का आसामी बन बैठा तो क्या आप का बेटा, दामाद, भाई या भतीजा ऐसा नहीं बनेगा, इस की क्या गारंटी?
इधर कांग्रस ने कालेपीले धन पर ज्यादा तवज्जुह नहीं दी. उस ने समाज पर अपनी शाश्वत मनोवैज्ञानिक पकड़ को भुनाते व रोजगार की बात करते हुए ‘हर हाथ शक्ति हर हाथ तरक्की’ का नारा दिया और उस में भी औरतों पर ज्यादा फोकस किया. वजह, महिलाएं अब तेजी से शिक्षित हो रही हैं, जाहिर है रोजगार के लिए इसलिए उन्हें लालच दिया गया कि पुलिस बल में 25 फीसदी महिलाओं को नौकरियां दी जाएंगी.
लोग बेहतर जानते हैं कि बीते 10 सालों में 25 तो दूर की बात है ढाई फीसदी महिलाओं को भी रोजगार नहीं मिला है और न ही आगे मिलना है.
बुरे दिनों से छुटकारा चाहते लोग 
दरअसल, लोग अच्छे दिन नहीं चाहते बल्कि बुरे दिनों, जो बाबुओं, बाबाओं और इंस्पैक्टरों की देन हैं, से छुटकारा पाना चाहते हैं और आजादी के बाद से भ्रमित हैं कि सालों पहले इंदिरा गांधी के जमाने में जो गरीबी दूर हो जानी चाहिए थी वह बढ़ती क्यों जा रही है? सालों पहले ही कांग्रेसी जुल्मोसितम और तानाशाही यानी इमरजेंसी से तंग आ कर हम ने सत्ता जनता पार्टी को दे दी थी, वह क्यों अपने कहे को पूरा नहीं कर पाई?
पर हर चुनाव में वादे इतने आत्म- विश्वास से किए जाते हैं कि लोगों को अपने अनुभवों पर शक होने लगता है, जो इस चुनाव में भी हुआ. सड़क, बिजली, पानी, खाना, खाद, बीज, कपड़े, शिक्षा, स्वास्थ्य सब सस्ते में देने का वादा इन चलतीफिरती क्लीयरैंस सेल में देखने को मिला तो एक दफा लगा, नहीं, ये झूठ नहीं बोल रहे हैं, इस बार शायद दे ही देंगे.
पीछे मुड़े तो एहसास हुआ कि अब तक वे इन्हीं वादों पर मरतेमिटते रहे हैं. यह ठीक है कि मंगलसूत्र, साडि़यां और लैपटौप तक फ्री मिले लेकिन कुछ हजार लोगों को जिस का ढिंढोरा इस तरह पीटा गया मानो पूरे सवा अरब लोगों को दे दिया हो. राज्य का हो या केंद्र का, केवल जनसंपर्क विभाग ही मुस्तैदी से काम करता है. उस के द्वारा एक फोटो हजारों बार छोटे परदे पर दिखवाया और अखबारों में छपवाया जाता है जिस में वादा पूरा होता लगता है.
हकीकत उलट है. किसी को कुछ नहीं मिलता है, उलटे इन सामानों की खरीदारी पर एक घपला और उत्पन्न हो जाता है. यानी योजनाएं बनती ही भ्रष्टाचार करने के लिए हैं तो फिर नईनई योजनाओं का ऐलान क्यों? लोग समझ जाते हैं कि नए सिरे से नए भ्रष्टाचारों और घपलों की इबारत लिखी जा रही है. वोट चाहे किसी को भी दे दो, यह तो होगा ही क्योंकि सब के झोले में योजनाएं हैं. हैरत की बात यह है कि जिन 25 फीसदी लोगों के टैक्स से सरकार चलती है उस के लिए किसी के पास कुछ नहीं है. जाहिर है सारा झमेला 75 फीसदी जनता के लिए है जो जाने क्यों अब तक गरीब, अशिक्षित, अस्वस्थ और बेरोजगार है.

ब्रैंड से चमके नेता
बीते साल कड़कड़ाती सर्दी में दिल्ली से एक नई रोशनी उठी थी जो अभी भी टिमटिमा रही है. आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल नए नायक बन कर उभरे पर महज 49 दिनों में फुस्स हो गए. लोग बड़े निराश हुए कि जब ईमानदारों का यह हाल है तो बेईमान ही क्या बुरे हैं, कम से कम वे कुरसी पर तो बने रहते हैं.
अरविंद केजरीवाल ने पूरी साफगोई से कहा कि नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी दोनों उद्योगपतियों की थैली में रहते हैं, हम बाहर हैं इसलिए हमें वोट  दो. इधर, मोदी और गांधी मंदमंद मुसकराते रहे. उत्साह, अनुभव से हार गया और लोगों ने आप को बड़ा मौका देने से तौबा कर ली क्योंकि उन्हें 49 दिन की ईमानदार नहीं 5 साल की बेईमान सरकार चाहिए थी. जनता जानती है कि चुनाव खर्च का भारीभरकम पैसा भी उसी के खीसे से जाता है.
भाजपा ने नरेंद्र मोदी को आगे कर दिया जो ठेठ देसी अंदाज में बोलते हैं. नरेंद्र भाई ने एक झटके में जड़ उखाड़ कर मंच से लहरा दी कि देखो, गांधीनेहरू परिवार पनपता रहा है, हम और आप ज्यों के त्यों हैं. चाय बेचने वाले को यानी उन्हें खुद को प्रधानमंत्री बनाओ तो बात बने.
कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी रैडीमेड खानदानी ब्रैंड हैं. वे भी भले मानुष हैं जो सिर्फ देशचिंता में कुंआरे बैठे हैं. दाद देनी होगी उन की हिम्मत की कि अभी भी लोगों से वादों पर वादे किए जा रहे हैं. उन्हें लगता है कि लोग मनरेगा, फूड सिक्योरिटी और भूमि अधिग्रहण बिल के भभके में आ गए हैं.
किसानों की आत्महत्याएं थमने का नाम नहीं ले रहीं, न ही भुखमरी कम हो रही है. रोज हजारों भूखेनंगे लोग पोटली और बरतनभांडे सिर पर उठाए शहरों की तरफ भाग रहे हैं. ये अपनी मरजी से भूमि त्याग रहे हैं क्योंकि पेट रोटी से भरता है.
इन ब्रैंडेड नेताओं से फायदा यह हुआ कि सारी जवाबदेही इन व्यक्तित्वों में सिमट कर रह गई. अब वादे पूरे न हों तो इन्हें ढूंढ़ते रहना. कभी पकड़ में आ जाएं तो गिरेबान पकड़ कर पूछना कि क्या हुआ आप के वादों का और कुरता फट कर हाथ में आ जाए तो फिर सरकार बदल देना.
गड़बड़ यहां है
चुनावी  हल्ले में किसी का ध्यान इस तरफ नहीं जाने दिया जाता कि क्यों कोई कानून ऐसा नहीं है जो इन नेताओं और दलों को अपने वादे पूरे करने को बाध्य करे. पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने केरल के एक मामले में व्यवस्था देते हुए कहा था कि नेता और पार्टियां ऐसे वादे न करें जिन्हें पूरा करना मुमकिन न हो. पर यह बात समस्या की व्याख्या थी, हल नहीं.
छत्तीसगढ़ की बस्तर सीट से ‘आप’ की उम्मीदवार सोनी सोरी ने अपने वादे स्टांपपेपर पर छपवा कर बांटे लेकिन मीडिया ने उन्हें भाव नहीं दिया. होना यही चाहिए कि नेताओं से वादे और दलों के घोषणापत्र स्टांपपेपर पर ही लिए जाने चाहिए और इन की फोटोकौपियों को वैधानिक मान्यता मिलनी चाहिए जिस से सुनने वाले भले ही भूल जाएं पर 5 साल बाद वादा करने वाले न भूलें, न मुकर पाएं.
अफसोस तो इस बात का है, जिस का फायदा तमाम दल और नेता उठाते हैं, कि जनता जल्द भूल जाती है कि उस ने किन शर्तों और मुद्दों पर अपना सांसद चुना था. पर सांसद जीतने के बाद हारफूलमाला पहन कर ट्रेन या हवाई जहाज से दिल्ली कूच कर जाता है और अपने कार्यकर्ताओं को 20 फीसदी कमीशन पर क्षेत्र में कार्य करने को छोड़ जाता है.
हारा हुआ चिल्लाता रहता है कि देखो, जीत कर भाग गया. अब 5 साल बाद ही मुंह दिखाएगा. अब मुझे न चुनने की सजा भुगतो. एक गड्ढा तक नहीं भरने वाला. 2-4 दिन भड़ास निकालने के बाद वह भी गुम हो जाता है और 5 साल न जीते हुए से पूछता, न ही जनता को याद दिलाता कि कितने वादे पूरे हुए. उस की इस अल्पकालिक भुनभुनाहट और खीझ पर लोग ध्यान नहीं देते और कमानेखाने में व्यस्त हो जाते हैं. उन की नजर में दोनों बराबर हैं, एक चला गया और एक रह गया. जो ज्यादा चिल्लाएगा तो अगली बार उसे भेज देंगे. यानी हालत ‘कोई नृप होय हमें का हानि’ जैसी है.
यही यह मानसिकता है जिस के चलते सपनों के इन सौदागरों का कारोबार फलफूल रहा है. इन्हें मालूम है कि लड़़ने के बाद इन के कान उमेठने का हक जनता को नहीं है, इसलिए 5 साल खूब पैसा बनाओ. जनता को तो अब इस पर भी एतराज नहीं रहा, वह सिर्फ इतना कहती है, कुछ तो हम पर और अपने किए वादों को पूरा करने पर भी खर्च करो.
नेताजी और दलों ने करोड़ों, अरबों रुपया फूंका होता है, पहले उसे सूद समेत वे वसूलते हैं फिर दूसरीतीसरी पीढ़ी के लिए तिजोरी भरते हैं. इस के बाद भी जनता का नंबर नहीं आता क्योंकि तब तक 5 साल हो गए होते हैं. लिहाजा, और नएनए वादे किए जाते हैं. सांसद ज्यादा बदनाम हो तो पार्टी उम्मीदवार बदल देती है यानी वह अपनी समस्या हल कर लेती है.
जीत के बजते ढोलनगाड़े लोकतंत्र के उत्सव के नहीं बल्कि जनता के एक बार और बेवकूफ बनने व ठगे जाने की खुशी के होते हैं. यह सोचना बेमानी है कि पार्टियों और उन के नेताओं में कोई बड़ा बैर है. ये लोग दरअसल कतरी सराय, गया के हकीमों की तरह एकजुट हैं कि इलाज के लिए तो आओ, पैसे किसी को भी दो उस में कोई फर्क नहीं पड़ना क्योंकि हम सब आखिरकार एक ही कुनबे के तो हैं.

किन्नरों को तीसरे लिंग का दरजा विभाजन क्यों?

 
किन्नर और मानवाधिकारवादी सुप्रीम कोर्ट द्वारा मिली किन्नरों को तीसरे लैंगिक समूह की मान्यता पर फूले नहीं समा रहे हैं. वे इस मुगालते में हैं कि इस अदालती फरमान से किन्नरों से भेदभाव बंद हो जाएगा और इन की सामाजिक व आर्थिक स्थितियों में क्रांतिकारी परिवर्तन आएंगे. विभिन्न जाति, वर्ग और धड़ों में बंटे भारतीय समाज में क्या इन्हें स्वीकृति मिलेगी, इस पर संशय व्यक्त कर रहे हैं जगदीश पंवार.
 
सुप्रीम कोर्ट के किन्नरों को तीसरे  लैंगिक समूह की मान्यता दे कर उन्हें मूलभूत अधिकार व सुविधाएं देने के आदेश की खूब वाहवाही हो रही है. कोर्ट ने नया कुछ नहीं किया है. भारतीय संविधान में बराबरी के हक की बात दोहराते हुए सरकारों को निर्देशभर दिया है. कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से कहा है कि समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए इस उपेक्षित समूह को पिछड़ा वर्ग मान कर उस की भलाईर् के लिए विशेष सुविधाएं दिलाई जाएं. इस आदेश से किन्नर और मानवाधिकारवादी खुश हैं.
भारत के किन्नरों के कल्याण के लिए यह आदेश एक बड़ा कदम माना जा रहा है. इस फैसले को सामाजिक रूढि़यों को तोड़ने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है. इसे एक शुरुआत बताया जा रहा है पर सवाल उठता है कि पहले से ही विभिन्न वर्गों, समूहों में बंटे हमारे समाज में कोर्ट की स्वीकृति के बाद भी क्या इस वर्ग को समाज में बराबरी की स्वीकृति मिल पाएगी? कानून समानता का हक दिला पाएगा?
दरअसल, किन्नरों के कल्याण के लिए काम करने वाली संस्था नैशनल लीगल सर्विस, माता नसीब कौर जी वूमैन सोसायटी और किन्नर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट में किन्नरों की पहचान के साथ उन्हें कानूनी दरजा देने की मांग संबंधी याचिका दाखिल की थी. इसे स्वीकार करते हुए उच्चतम न्यायालय के जस्टिस के एस राधाकृष्णन व ए के सीकरी की पीठ ने 15 अप्रैल को इस समुदाय को बराबरी के अधिकार को जायज बताते हुए उन्हें वे तमाम हक और सुविधाएं मुहैया कराने को कहा जो एक आम नागरिक को प्राप्त हैं. 
कोर्ट ने निर्देश दिए कि किन्नरों की सामाजिक और लिंगानुगत समस्याओं का निराकरण करें. उन्हें चिकित्सा व अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराएं. महिला, पुरुष की तरह इन के लिए अलग टौयलेट बनाए जाएं. शिक्षण संस्थानों में प्रवेश और नौकरियोें में आरक्षण दिया जाए.
कानूनी विभाजन
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान में सभी को बराबरी का दरजा दिया गया है और लिंग के आधार पर भेदभाव की मनाही की गई है. यह मौलिक अधिकार का हनन है. किन्नरों को बराबरी का हक देने के लिए संविधान या कानूनों में किसी तरह के फेरबदल की जरूरत नहीं है क्योंकि भारतीय संविधान में ही सभी नागरिकों के लिए समान अधिकारों का प्रावधान है.  हर किसी को वह सारे अधिकार मिलने चाहिए जो संविधान में बताए गए हैं. संविधान में बराबरी का हक देने वाले अनुच्छेद 14,15,16 और 21 का लिंग से कोई संबंध नहीं है इसलिए यह सिर्फ स्त्रीपुरुष तक सीमित नहीं है. इस में किन्नर भी शामिल हैं.
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी का लिंग उस की आंतरिक भावना से तय होता है कि वह पुरुष महसूस करता है या स्त्री या फिर तीसरे लिंग में आता है. किन्नर को न तो स्त्री माना जा सकता, न पुरुष. वे तीसरे लिंग में आते हैं. किन्नर एक विशेष सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक समूह है इसलिए इन्हें स्त्रीपुरुष से अलग तीसरा लिंग माना जाना चाहिए.
दुनियाभर में मानवाधिकार संगठनों द्वारा किए जा रहे बराबरी के अधिकारों की मांग के सिलसिले में कुछ अन्य देशों में भी किन्नरों को कानून में समानता का हक दिया गया है पर दुनियाभर में उन की सामाजिक स्थिति कमोबेश एक जैसी ही है. किन्नर सदियों से समाज का ही अंग माने गए हैं लेकिन भेदभाव के शिकार रहे, हमेशा हाशिए पर रहे. उन को समाज की मुख्यधारा से दूर रखा  गया. 
 तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दिए जाने के बाद उन के सामाजिक और शैक्षणिक विकास के लिए उन्हें वे सभी सुविधाएं देनी होंगी जो स्त्रियों को अलग से दी जा रही हैं. उन्हें अलग टौयलेट, अलग मैट्रो कंपार्टमैंट, अलग बर्थ, बसों में अलग सीटें, नौकरियों में आरक्षण देने को क्या समाज स्वीकार कर पाएगा? शिक्षा, नौकरी के लिए पहले से ही भेदभाव चला आ रहा है. जाति, धर्म, वर्ग के बीच मारामारी मची हुई है. 
किन्नरों का इतिहास पुराना है. जब से सृष्टि बनी है, स्त्री और पुरुष के अलावा एक ऐसा प्राणी भी पैदा होता रहा है जिस का न स्त्री जननांग होता है, न पुरुष अंग. ऐसे जन को किन्नर या हिजड़ा कहते हैं. पुराणों में भी इन का जिक्र है. महाभारत में पांडवों के सहयोगी शिखंडी का जिक्र है. ब्रहन्नला की भी कहानी है, जिस में अर्जुन को नपुंसक बना दिया जाता है. 
किन्नर पहले सेनाओं में भी होते थे. इतिहास में जिक्र है कि राजा लोग उन्हें अपने हरमों में भी कामकाज के लिए रखते थे. ऐसा इसलिए कि वे उन की रानियों के साथ यौन संबंध न बना सकें.
असल में किन्नर ऐसा इंसान होता है जो लैंगिक विकृति के कारण न नर होता है न मादा. जन्मजात किन्नरों की संख्या बहुत कम है. अधिकतर बाद में बनने वाले हैं. इन के अपने देवीदेवता, मंदिर हैं. जानकारों का कहना है कि  नए बनने वाले किन्नरों का यह समुदाय दीक्षासंस्कार करता है जिस के तहत उस का लिंग, अंडकोश और अंडकोश की थैली हटा दी जाती है. समाज में किन्नरों के प्रति दोहरा रवैया अपनाया गया है. एक तरफ लोग खुशी के मौकों पर इन की मौजूदगी को शुभ मानते हैं, दूसरी ओर ये सामान्य इंसान की तरह रोजगार, शिक्षा हासिल नहीं कर सकते. शिक्षा, रोजगार उन को कोई नहीं देना चाहता. अब समाज में समुचित जगह न मिलने की वजह से किन्नरों को नाचगा कर, भीख मांग कर या वेश्यावृत्ति के जरिए अपना गुजारा चलाना पड़ता है. 1994 में उन्हें यह अधिकार दिया गया था कि वे खुद को स्त्री या पुरुष में से कोई एक विकल्प के रूप में अपनी पहचान कर सकते हैं. पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसैंस जैसे दस्तावेजों में वे अब तक स्त्री या पुरुष के रूप में अपनी पहचान जाहिर करते आए हैं. 2005 में भारतीय पासपोर्ट आवेदन फौर्म में स्त्रीपुरुष के अलावा तीसरा विकल्प दिया गया. 
 कोर्ट का हालिया आदेश समाज का एक और कानूनी विभाजन है. यह वैमनस्य को बढ़ाने वाला होगा. पिछले दिनों केंद्र और उस से पहले कुछ राज्यों में जाट समुदाय को पिछड़ा वर्र्ग में शामिल करने के फैसले से दूसरी पिछड़ी जातियों में वैमनस्य बढ़ा. 
दरअसल, हमारे कानून ने समाज में विभिन्न विभाजन रेखाएं बना रखी हैं. इस में समाज को  एकाकार नहीं किया गया. बात समानता की लिखी हुई जरूर है पर बंटवारा किया गया है. अनेकता में एकता बिलकुल नहीं है. यह अनेकता बनाई गई है. प्रकृति के भेदभाव को छोड़ दें तो स्वयं हम ने समाज को बांटा है. ऊंचनीच, छोटाबड़ा, स्त्रीपुरुष और अब स्त्रीपुरुष से अलग एक तीसरा लिंग.
धर्म ने किया विभाजन 
समाज का विभाजन धर्म के स्वार्थी लोगों ने किया. स्त्रीपुरुष के बीच भेदभाव सदियों से चला आ रहा है. अलग स्कूल, अलगअलग कालेज, ट्रेनों, बसों में अलग सीटें, अलग डब्बे, अलग टौयलेट, हर कामों के लिए अलग लाइनें. ये विभाजन क्यों? विभाजन की वजह से ही भेदभाव हो रहा है.
क्या दलितों के आरक्षण के साथ जातीय भेदभाव खत्म हो गया? दलितों को शिक्षा और नौकरी में आरक्षण के पीछे संविधान का मूल उद्देश्य इस वर्ग की सामाजिक, आर्थिक तरक्की के साथसाथ जाति व्यवस्था को खत्म करना था. मगर जाति व्यवस्था 60 साल बाद भी पूरे दमखम के साथ जिंदा है. 
अब होगा यह कि किन्नर को कानूनन एक अलग जाति, मजहब की तरह अलग वर्ग के रूप में मान्यता मिल गई है. समाज पहले से ही स्त्री को ले कर भेदभाव से ग्रस्त है. महिलाएं बराबरी के लिए संघर्ष कर रही हैं. उन्हें समानता का अधिकार देने के लिए कई  कानून बनाए गए लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद स्त्री के साथ भेदभाव कम नहीं हो पा रहा.
स्त्रीपुरुष दोनों एक ही हैं. एकदूसरे के पूरक हैं. इन्हें प्रकृति ने एकदूसरे के लिए पैदा किया. किन्नर भी अलग नहीं हैं लेकिन धर्र्म ने स्त्रीपुरुष के बीच भेद उत्पन्न किया. स्त्री को निकृष्ट तो पुरुष को उस से श्रेष्ठ बताने की कोशिशें कीं. फिर कानूनों व सरकारों ने इन्हें अलग किया. बसों, गाडि़यों में इन के लिए अलग डब्बे, अलग सीटें, पढ़नेलिखने के लिए अलग स्कूल, अलग टौयलेट बनाए गए.
इस विभाजन को समाज ने मान्यता दी पर क्या आम घरों में महिलाओं के लिए अलग कमरे, अलग किचन, अलग टौयलेट हैं? घर, परिवार में स्त्रीपुरुष, लड़केलड़कियां एकसाथ रह सकते हैं. एक बाथरूम, एक टौयलेट शेयर कर सकते हैं तो बाहर अलगअलग क्यों? जब प्रकृति ने उन्हें एकसाथ रहने के लिए बनाया है तो सामाजिक, कानूनी स्तर पर विभाजन क्यों?
हमारी प्रवृत्ति भेदभाव की नहीं है. यह जन्मजात नहीं है. बचपन से हमारी सोच में इसे घोला गया है और यह काम धर्म की खाने वालों ने कराया है. धर्म का इतिहास देखें तो इस की फितरत ही एकदूसरे के बीच असमानता की खाई पैदा करने की रही है.
किन्नरों की सामाजिक, आर्थिक दशा सुधरे, इस पर किसी को आपत्ति नहीं होगी पर विभाजन कई परेशानियां उत्पन्न करेगा. यह भेदभाव धर्मजनित है. धर्म ने स्त्रीपुरुष के बीच विभाजन खड़ा किया. पुरुष को स्त्री से श्रेष्ठ साबित करने के लिए अनेक उपदेश गढे़ गए. समाज के दिमाग में गहरे तक भेदभाव की सोच को बैठाया गया. इसी तरह किन्नरों को अलगथलग रखा गया. समाज जानवरों को एकसमान मानता है पर इंसानों को एक नहीं मानता.  
किन्नर को खुद को स्त्री या पुरुष मानने की आजादी होनी चाहिए. जैसा कि न्यायालय ने स्वयं कहा है कि उसे यह एहसास अंदर से होता है कि वह स्त्री है या पुरुष. फिर तीसरा विभाजन कैसे? क्या अदालत के आदेश में विरोधाभास नहीं है?
इस से पहले अदालत ने समलैंगिकों की शादी और यौन संबंधों को गैरकानूनी करार दिया था. इस तरह के कानून और आदेश व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन करने वाले हैं. ये आजादी पर बंदिश लगाते हैं. हरेक को यह अधिकार होना चाहिए कि वह शादी करे या न करे. जब किसी को शादी न करने का हक है तो उसे यह स्वतंत्रता भी होनी चाहिए कि वह अपना जीवन समलिंगी के साथ बिताए या विपरीतलिंगी के.
व्यक्तिगत मामला
यौन संबंधों और शादी के मामले में जिस तरह जाति, धर्म की बंदिशें धर्म के ठेकेदारों ने खड़ी की हैं वैसी ही समलिंगियों के साथ भी खड़ी ?की हैं. यौन रिश्तों में न जाति, धर्म की दीवार होनी चाहिए न ही लिंग की. एक ही लिंग वाले 2 जने यौन संबंध कैसे बनाते हैं, इस से अदालत और समाज को क्या लेनादेना. यह पंडों, मुल्लाओं जैसा फतवा है. यौन आनंद कोई कैसे लेता है, यह 2 जनों का आपसी निजी मामला होता है. इस के लिए अलगअलग लिंगों का होना बिलकुल जरूरी नहीं है. इस तरह तो क्या हस्तमैथुन को भी अप्राकृतिक मान कर गैरकानूनी घोषित कर देना चाहिए और उन लोगों को ढूंढ़ना चाहिए जो ऐसा करते हैं? कोई कैसे यौन आनंद ले, यह व्यक्तिगत है. इस में धर्म, कानून को बीच में नहीं आना चाहिए. हां, अगर किसी के साथ बिना मरजी के जबरदस्ती यौन रिश्ते बनाए जाएं तो वह ठीक नहीं.   
किन्नर अपने परंपरागत पेशे से बाहर निकल पाएंगे, आसान नहीं होगा. उन के प्रति समाज के नजरिए को बदलना कानूनी अधिकार मिलने से कहीं अधिक मुश्किल है. 
आज समाज में ‘हिजड़ा’ शब्द एक गाली के तौर पर प्रयोग किया जाता है. यानी किसी को अपमानित करना हो तो उसे हिजड़ा कह दो. यह नामर्द का अर्थ देता है.
अदालत के हालिया आदेश के बाद सवाल यह भी उठता है कि समलैंगिकता के बारे में धारा 377 का क्या होगा, जिस में सिर्फ विपरीतलिंगी की शादी को जायज माना गया है. किन्नर क्या आपस में शादी कर पाएंगे, जैसाकि अब तक करते आ रहे हैं? या कोई सामान्य स्त्री या पुरुष इस तीसरे लिंग से वैवाहिक रिश्ता कर पाएगा?
असल में बिना विभाजन के, बिना भेदभाव के स्त्रीपुरुष और किन्नरों के हिलमिल कर रहने की नीति को अमल में लाए जाने पर जोर दिया जाना चाहिए. 
आदर्श समाज वह होगा जहां स्त्रीपुरुष, किन्नर एकमेक हो कर रहें. कोई भेदभाव न हो. तीनों के लिए अलग कुछ न हो. सब कुछ साझा हो. स्कूल, कालेज, घर, नौकरी, बस, ट्रेन, टौयलेट एक ही हों. प्रेम, विवाह, यौन संबंधों में जाति, धर्म की तरह लिंग की भी बंदिशें न हों. ये चीजें विभाजन, भेदभाव को और समाज में वैमनस्य को बढ़ाती हैं, इसलिए इन से बचा जाना चाहिए ताकि एक बेहतर समाज उभर कर निकले जिस में बराबरी ही बराबरी हो, भेदभाव नहीं.

राजनीति का जातीय गणित

विकास और बदलाव के तमाम दावों के बीच देश में चुनावी नतीजे जातीय आंकड़ों पर टिक जाते हैं. चुनाव में जाति का गणित सिर्फ दलित या पिछड़े वर्ग तक सीमित नहीं है बल्कि ऊंची जातियां भी ब्राह्मण, ठाकुर और वैश्य के खांचे में बंटी हैं. वहीं, मुसलिम भी कई जातियों में बंटे हुए हैं. ये तमाम जातियां चुनावी समर में हारजीत का जातीय आधार कैसे तैयार करती हैं, पड़ताल कर रहे हैं शैलेंद्र सिंह.
मोहनलालगंज लोकसभा सीट सुरक्षित सीट है. यहां केवल दलित वर्ग के नेता ही चुनाव लड़ते हैं. यह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सटी हुई सीट है. लखनऊ का विस्तार होने से शहरीकरण का असर इस इलाके में भी दिखता है. चुनाव प्रचार के दौरान इस लोकसभा क्षेत्र के नगराम, समेसी, हरौनी, गोसांईगंज जैसे गांव और कसबों को करीब से देखने का मौका मिला. लगातार दलित बिरादरी के सांसद बनने के बाद भी इस लोकसभा क्षेत्र में रहने वाली दलित बिरादरी की हालत काफी खराब और उपेक्षित ही है.  
गांव में सड़कें और पक्के खड़ंजे वाले रास्ते बन जाने से बदलाव दिखता है. लेकिन जब इस बदलाव को महसूस करने की कोशिश की जाती है तो सच सामने आ जाता है. नगराम और गोसांईगंज जाने वाली सड़क पर समेसी गांव पड़ता है. यहां ओबीसी और दलित जातियों के लोग सब से अधिक संख्या में रहते हैं. इन ओबीसी जातियों के लोग आर्थिक दृष्टि से मजबूत स्थिति में नहीं हैं. बहुत सारे परिवार दलित परिवारों जैसी हालत में ही रहते हैं. इस के बावजूद ओबीसी वालों और दलितों के बीच सामाजिक रूप से वही दूरी है जो दलितों और सवर्णों के बीच है. यही कारण है कि यहां की लोकसभा की सीट और विधानसभा की सीटों पर ज्यादातर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार ही जीतते रहे हैं.
यहां से सपा के टिकट पर 2 बार लोकसभा सीट जीतने वाली रीना चौधरी कहती हैं, ‘‘वोट पूरी तरह से जातीय समीकरणों को देख कर दिए जाते हैं. समाजवादी पार्टी को पिछडे़ वर्ग के वोट मिलते हैं, ऐसे में दलित प्रत्याशी खडे़ होने का उस को लाभ मिलता है. यहां अभी भी छुआछूत की बुरी बीमारी मौजूद है. बात करने पर भले ही यहां लोग इस बात से इनकार करें पर आपस में ये लोग भेदभाव करते हैं. यह भेदभाव केवल दलित और पिछड़ों में ही नहीं है, दलितों की अलगअलग बिरादरियों के बीच भी ऐसी दूरी बनी हुई है.’’ 
मन में भेदभाव कायम
लखनऊ-रायबरेली राजमार्ग से 6 किलो- मीटर दूर समेसी में रहने वाले रैदास बिरादरी के गजेंद्र कहते हैं, ‘‘अभी भी लोगों के मन में भेदभाव कायम है. किसी भी सामाजिक आयोजन में ऐसे भेदभाव को महसूस किया जा सकता है. जो लोग सत्ता के साथ आगे बढ़ गए हैं उन को ऐसे हालात का सामना नहीं करना पड़ता है, पर सामान्य दलित के साथ भेदभाव कायम है. अभी भी अगर हम किसी सवर्ण के यहां जाते हैं तो हमें खानेपीने के लिए अलग बरतन दिए जाते हैं और बरतन हमें खुद ही धोने पड़ते हैं.’’ 
समेसी से 7 किलोमीटर आगे बढ़ने पर नगराम कसबा आता है. यहां मुसलिम बिरादरी की संख्या ज्यादा है. दलित और पिछड़ी बिरादरी के लोग भी काफी संख्या में यहां रहते हैं. दलितों के बीच आपस में छुआछूत क्यों है? इस बारे में पासी बिरादरी के रामकेवल कहते हैं, ‘‘रैदास बिरादरी के लोगों से छुआछूत का व्यवहार होता है. इस की अपनी वजह है. ये लोग मरे जानवर उठाने का काम करते थे. इस के अलावा जिस बिरादरी के लोग मांसाहार हैं उन के साथ भी छुआछूत का व्यवहार होता है. सामान्यतौर पर बाजार में छुआछूत नहीं दिखती पर जब कोई निजी आयोजन होता है तो यह भेदभाव साफतौर पर देखा जाता है.’’ रामकेवल अनाज की खरीदफरोख्त करते हैं. वे आगे कहते हैं, ‘‘जमीनी स्तर पर जो भेदभाव बना हुआ है उस का असर चुनाव में भी साफ दिखता है.’’
नगराम से 12 किलोमीटर दूर गोसांईगंज के रहने वाले रामाधार चौधरी खेती करते हैं. वे कहते हैं, ‘‘शहर और कसबों में रहने वाले सामाजिक समानता की बात करते हैं, पर जब वोट देने का नंबर आता है तो उन की सोच पूरी तरह से जातिवादी हो जाती है. पिछले कुछ सालों से दलित और पिछडे़ भी अगड़ी जातियों की तरह पूजापाठ, व्रत, उपवास करने लगे हैं. उन को लगता था कि हो सकता है कि इस तरह से वे भी अगडे़ हो जाएं पर यह भेदभाव वहां कायम है. दलित के घर का प्रसाद भगवान के भय से कई लोग ले तो लेते हैं पर बाद में उसे किसी जानवर या पक्षी को खिला देते हैं. कानूनी दांवपेंच के  डर से छुआछूत भले ही न होती हो पर निजी जीवन में अभी भी इस का पूरा असर कायम है.’’
सपा नेता रीना चौधरी कहती हैं, ‘‘चुनाव में जीत का आधार पूरी तरह से जातीयता तय करती है. मजेदार बात यह है कि जितना इस को खत्म करने का प्रयास किया जाता है, यह भावना उतनी ही बढ़ती जा रही है. केवल दलित और पिछडे़ ही नहीं ऊंची जातियां भी ठाकुर, ब्राह्मण और वैश्य बिरादरी में बंटी हुई हैं. यही कारण है कि बसपा ने सोशल इंजीनियरिंग की बात की. दलित की अगुआई करने वाली इस पार्टी ने सोशल इंजीनियरिंग के बहाने ऊंची जातियों के वोटबैंक का लाभ उठाने की कोशिश की. धर्म के बाद आज भी सब से पहले लोगों को जाति का खयाल आता है.’’
जातीय विचारधारा
आजादी के कुछ समय बाद ही यह महसूस होने लगा था कि जातिवाद इस देश का बड़ा नुकसान करेगा. इसलिए जाति का विरोध शुरू हो गया. दलित बिरादरी के लिए डा. भीमराव अंबेडकर ने जिस तरह से आंदोलन चलाया उसी तरह से सोशलिस्ट पार्टी ने पिछड़ों की आवाज उठाई. सोशलिस्ट पार्टी के विचारक 
डा. राममनोहर लोहिया ने नारा दिया था ‘सोशलिस्टों ने बांधी गांठ, पिछडे़ पावें सौ में साठ’. यहीं से आगे समाजवादी विचारधारा का जन्म हुआ. 
राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण ने जो मुहिम चलाई वह कुछ दिनों में ही कांग्रेस विरोध की राजनीति में बदल गई. खासतौर पर यह विरोध कांग्रेसी नेता इंदिरा गांधी के खिलाफ रहा. 1975 में इमरजैंसी के दौरान इस गठजोड़ का असर दिखा. इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर हो गईं. सामाजिक और जातीय आंदोलन करने वाली सोशलिस्ट पार्टी राजनीतिक बदलाव की हिमायती हो गई. 
जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया ने भले ही राजनीति से दूरीबनाए रखी पर उन के अनुयायी जातीयता खत्म करने के बजाय उस का हिस्सा बन गए. बिहार में लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, नीतीश कुमार और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और अजित सिंह ने जाति के बंधन को तोड़ने का सामाजिक काम नहीं किया. उन को वोटबैंक की राजनीति रास आने लगी. वे टिकट बंटवारे से ले कर मंत्री बनाने और सरकारी नौकरी में ट्रांसफर से ले कर पोस्ंिटग तक में जातीयता का खयाल करने लगे.  
सामाजिक चिंतक हनुमान सिंह ‘सुधाकर’ कहते हैं, ‘‘जाति के विरोध में जो विचारधारा बनाई गई, समय के साथ वह वोटबैंक में बदल गई और यह वोटबैंक नई जातीय विचारधारा बन गई. पिछडे़ ही नहीं, दलितों के साथ भी ऐसा ही हुआ. मायावती के मुख्यमंत्री बनने के बाद दलितों के विकास के लिए कोई काम नहीं हुआ. मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग की बात कर के दलितों को एक नए ब्राह्मणवादी समाज का हिस्सा बना दिया. यहां सामाजिक रूप से न सही पर आर्थिक रूप से वैसा ही भेदभाव होने लगा जैसा पहले होता था.’’
अखिल भारतीय पासी समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामलखन पासी कहते हैं, ‘‘बसपा ने दलित आंदोलन का लाभ तो लिया पर सत्ता में आने के बाद इस आंदोलन के मुद्दे को आगे नहीं बढ़ाया, जिस की वजह से उत्तर प्रदेश से बाहर बसपा का विस्तार नहीं हो सका. अब बसपा में भी जाति विभाजन होने लगा है. कुछ उपजातियां पार्टी से अलग अपना भविष्य देखने लगी हैं.’’
विकास की बात व जाति का साथ
16वीं लोक सभा चुनाव के पहले हर दल विकास, कुशासन, भ्रष्टाचार, काला धन, सड़क और पानी पर चुनाव लड़ने जैसी बड़ीबड़ी बातें कर रहा था. चुनावी प्रक्रिया शुरू होते ही नेता जातिरूपी बातें करने लगे. नेताओं की इन्हीं बड़ीबड़ी बातों का प्रतिफल है कि आजादी के 67 साल बाद भी जाति की जकड़न समाज को छोड़ने को तैयार नहीं है. नरेंद्र मोदी की पिछड़ी जाति को प्रचारित किया जाता है. देश में वोट देने वाले लोगों को पहली बार पता चलता है कि नरेंद्र मोदी पिछड़ी बिरादरी के हैं.  
जाति का प्रभाव राजनीति की दशा और दिशा दोनों तय करता है, यह हमेशा से होता आया है. उत्तर प्रदेश में मायावती ने जिस सोशल इंजीनियरिंग की बात साल 2007 में की थी, तमिलनाडु में 60 के दशक में गैर ब्राह्मण फार्मूले के रूप में इस का प्रयोग किया गया था. कम्युनिस्टों के प्रभाव वाले राज्यों में भी जाति का प्रभाव दिखता रहा है. हरियाणा में बनी 20 सरकारों में 13 मुख्यमंत्री जाट बिरादरी के बने क्योंकि वहां जाट बिरादरी के लोगों की तादाद ज्यादा है.  
लहर नहीं जातीयता पर भरोसा  
नरेंद्र मोदी दूसरे उम्मीदवारों को यह बता रहे थे कि देश में उन के नाम की लहर है. लेकिन जब वे खुद उत्तर प्रदेश के वाराणसी से लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला करते हैं तो जातीय समीकरण ठीक करने लगते हैं. वाराणसीलोकसभा क्षेत्र में करीब 16 लाख मतदाता हैं. यहां पर ब्राह्मण 2 लाख 50 हजार, मुसलिम 3 लाख, भूमिहार 2 लाख, बनिया 2 लाख, पटेल व कुरमी 2 लाख, दलित 2 लाख व बाकी अन्य जातियां हैं. पटेल, कुरमी और पिछड़ी जातियों के वोट अपने साथ जोड़ने के लिए नरेंद्र मोदी की पहल पर भाजपा को अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल से समझौता करना पड़ा. नरेद्र मोदी को अपनी लहर पर यकीन नहीं था इस कारण उन्होंने अनुप्रिया पटेल की शर्तों पर समझौता किया.  
भाजपा को चिंता थी कि अगर अपना दल से समझौता नहीं हुआ तो नरेंद्र मोदी को वाराणसी मेंजीतना मुश्किल हो जाएगा.  बिहार में जातीय समीकरण सुधारने के लिए भाजपा ने नरेंद्र मोदी का विरोध कर एनडीए छोड़ने वाले लोक जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान को अपना सहयोगी दल बना लिया. दिल्ली में भी भाजपा का सदा विरोध करने वाले इंडियन जस्टिस पार्टी के उदित राज को साथ लेना पड़ा. 

बिहार का जातीय गणित
बिहार में जातीय गणित काफी उलझा हुआ है. यादव और मुसलिम बिरादरी का एक समूह है जिसे एमवाई समीकरण के नाम से जाना जाता है. दूसरा समूह यादव, मुसलिम और अति पिछड़ी जातियों वाला है. इस के अलावा दलित, मुसलिम जातियों का भी एक समूह है. इन समूहों पर लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान का असर है. पहले पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों के दोनों हिस्सों पर लालू प्रसाद यादव का प्रभाव था. नीतीश कुमार के आने से लालू का गणित गड़बड़ा गया और वे सत्ता से बाहर हो गए. नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री बनने के लिए सुशासन की  बातें तो बहुत कीं पर बाद में वे भी जातीय गणित में ही उलझ कर रह गए. 
बिहार में हर पार्टी दलित और पिछड़ी जातियों के साथ मुसलिमों को भी अपने खेमे में लेना चाहती है. ऐसे में जातीयता के साथ ही साथ वोटों के धार्मिक ध्रुवीकरण का भी पूरा खयाल रखा जाता है. नीतीश कुमार ने अतिपिछड़ी जातियों को गोलबंद करने के लिए पंचायतों में अतिपिछड़ों को 20 फीसदी का आरक्षण दिया. उन्होंने अतिपिछड़ा वर्ग आयोग बना कर 100 से अधिक अतिपिछड़ी जातियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की पहल की. नीतीश का अतिपिछड़ा मोह यों ही नहीं है. बिहार में अतिपिछड़ी जातियों का वोटबैंक सब से बड़ा है. मुसलिमों में ऐसे लोगों के लिए पसमांदा समाज और दलितों में ऐसे लोगों के लिए महादलित कैटेगरी को बनाया गया. 
बिहार में वोट हासिल करने के लिए बिरादरी की राजनीति करनी मजबूरी होती है. लोकसभा चुनावों में टिकट बांटने से ले कर वोट पाने के लिए भाषणों तक में बिरादरी के स्वाभिमान और सम्मान का हवाला दिया गया. बिहार के समीकरण देश की राजनीति की दिशा तय करने का काम करेंगे. जो स्थान कभी उत्तर प्रदेश में मुलायम और मायावती का था वह इस लोकसभा चुनाव के बाद बिहार में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव का होने वाला है. केंद्र की राजनीति में इन का कद इसलिए बड़ा है क्योंकि बिहार में जातीयता दूसरों के मुकाबले कहीं ज्यादा मजबूत शक्ल में है.
दूसरे राज्यों में फैली बीमारी
उत्तर प्रदेश और बिहार की इस जातीय बीमारी ने मध्य प्रदेश, हरियाणा और तमिलनाडु तक को अपनी चपेट में ले लिया. दलित चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘जातीय बीमारी का हाल वैसा ही था कि दर्द की दवा के साथ दर्द और भी बढ़ता गया. जैसेजैसे समाज में शिक्षा का प्रभाव फैला, जातीयता और भी गहरी होती गई. आज की तारीख में पढ़ेलिखे दलित और पिछड़ी बिरादरियों के नेता ज्यादा कर्मकांडी होने लगे हैं. उन को लगता है कि अगडे़ इसलिए सम्मान पाते हैं चूंकि वे पूजापाठ करते हैं. ऐसे में वे भी वही सब करने लगे जो अगड़ी जातियों के नेता करते थे. कई बार तो दलित व पिछडे़ नेता रामायण की उन चौपाइयों को बडे़ ही आदर और गर्व के साथ पढ़ते हैं जिन में खुद उन को ही बुराभला कहा गया होता है.’’
शिक्षा के मामले में अगडे़ राज्यों में गिने जाने वाले तमिलनाडु के जातीय समीकरणों को देखें तो यह बात साफ भी हो जाती है. तमिलनाडु में 4 करोड़
75 लाख मतदाता हैं. वहां लोकसभा की 39 सीटें हैं. वहां सब से ज्यादा 53 फीसदी ओबीसी जातियों के मतदाता हैं. 
20 फीसदी दलित, 12 फीसदी ईसाई, 9 फीसदी मुसलिम और 6 फीसदी ऊंची जातियों के मतदाता हैं. दक्षिण राज्यों के पढ़ेलिखे मतदाता भी जातीय समीकरण देख कर अपने वोट करते हैं. 
29 लोकसभा सीटों वाले मध्य प्रदेश में भी जातीय समीकरण के आधार पर प्रत्याशी तय किए जाते हैं. मंडल कमीशन लागू होने के बाद इस राज्य में भी ऊंची जातियां हाशिए पर चली गई हैं. यहांसब से अधिक 35 फीसदी ओबीसी,21 फीसदी आदिवासी, 20 फीसदीऊंची जातियां, 15 फीसदी दलित और 9 फीसदी मुसलिम आबादी है. 
लोकदल के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का मानना था कि गैरबिरादरी में शादियों के चलन से जातिगत भावना कमजोर होगी. समाज में गैरबिरादरी में शादी का चलन शुरू हो गया. जिस को देख कर यह लगता है कि जैसे जातीयता की भावना कमजोर पड़ रही है. सही माने में देखें तो इस प्रचलन के बाद भी जातीयता खत्म नहीं हो रही है.  इस संबंध में गैरबिरादरी में शादी कर चुकी शबाना खंडेलवाल कहती हैं, ‘‘गैरबिरादरी में शादी एक तरह से व्यक्तिगत फैसला होता है. ऐसे में इस का कोई सामाजिक असर नहीं पड़ता.’’ 
जातीय राजनीति के आधार पर भी वोट देने के बाद जनता को कुछ नहीं मिलता है. उत्तर प्रदेश और बिहार में दलितपिछड़ों की अगुआई करने वाले मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान की राजनीति इस का उदाहरण हैं. इन लोगों ने अपनी बिरादरी के लोगों का भला करने की जगह पर अपने परिवार का भला किया.  
उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री अशोक यादव कहते हैं, ‘‘बिरादरी की राजनीति करने वाले लोगों ने कभी भी बिरादरी का भला नहीं किया. वे बिरादरी को केवल वोटबैंक समझते हैं. बिरादरी का कोई नेता अपने बल पर जब आगे बढ़ता है तो उस को पीछे करने में बिरादरी के नेता हर संभव काम करते हैं.’’ 
भ्रष्टाचार दरकिनार
समाज में जाति का जलवा ऐसा कायम है कि भ्रष्टाचार करने वाले नेता बचाव के लिए इसे हथियार के रूप में प्रयोग करते हैं. मायावती, लालू प्रसाद यादव और बाबू सिंह कुशवाहा आदि ऐसे तमाम नेता हैं जो भ्रष्टाचार के जाल में फंसने के बाद कहते हैं कि जातिगत भेदभाव के चलते उन को परेशान करने के लिए भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए हैं. जाति के लोग इस बात को सही मान भी लेते हैं. बाबू सिंह कुशवाहा बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती के करीबी थे. स्वास्थ्य विभाग में हुए घोटाले का उन पर आरोप लगा. आरोप लगने के बाद मायावती ने बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी से बाहर निकाल दिया. उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के समय बाबू सिंह कुशवाहा भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. भाजपा को भरोसा था कि बाबू सिंह कुशवाहा के चलते कुशवाहा समुदाय के वोट उस को मिल जाएंगे. लेकिन विरोधके बाद बाबू सिंह कुशवाहा को भाजपा से बाहर जाना पड़ा. इस के बाद वे जेल गए. 
लोकसभा चुनाव के पहले बाबू सिंह कुशवाहा की पत्नी और भाई समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए. बाबू सिंह कुशवाहा जेल में बंद हैं. उन की पत्नी ने सपा के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा. बाबू सिंह कुशवाहा के समर्थक तर्क देते हैं कि मायावती ने बाबू सिंह कुशवाहा को फंसाया है. ऐसे लोग बाबू सिंह कुशवाहा को बिरादरी का समर्थक व अगुआ मानते हैं. राजनीतिक लेखक डा. रजनीश कहते हैं, ‘‘जातियां अपना नेता ऐसा चाहती हैं जो अगड़ों का हर तरह से मुकाबला कर सके. ऐसे में वे भ्रष्टाचार करने वाले दबंग नेता में ही अपना मसीहा तलाश करने लगती हैं. उन को लगता है कि यही उन के स्वाभिमान की रक्षा कर सकेगा. यही वजह है कि जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं उन के पीछे जातिबिरादरी पूरी मजबूती से खड़ी होती है.’’ 
मायावती, मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव अपने लोगों को यह समझाते हैं कि उन को फंसाने के लिए उन की राजनीति को कमजोर करने के लिए साजिशन उन को फंसाया गया है. जाति का स्वाभिमान बन चुके ऐसे नेता बिरादरी के लिए हर हालत में गर्व का विषय होते हैं.  
धार्मिक सोच से जुड़ी जातीयता  
डा. रजनीश कहते हैं, ‘‘जाति और धर्म के बीच सीधा संबंध है. धर्म की बात करने वाले ग्रंथों में समाज का जातीय विभाजन किया गया था. यही बाद में छुआछूत और भेदभाव का भी आधार बना. आज धर्म बदलने की घटनाओं के पीछे इसी भेदभाव का हाथ होता है. धर्म के आधार पर दलित, पिछड़ों को हिंदू धर्म में माना जाता है. जब बराबरी की बात आती है तो उन को अलग कर दिया जाता है. इसी कारण जातियों का बंटवारा जातीय आधार पर होने लगता है. हिंदुत्व की राजनीति करने वाले लोगों को दलित आदिवासियों की याद तभी आती है जब वे धर्म परिवर्तन करते हैं.
ऐसे में जब तक इन तथ्यों को सही तरह से नहीं देखा जाएगा तब तक यह भेदभाव चलता रहेगा.’’ 
छुआछूत की भावना को मजबूत करने में धार्मिक कर्मकांडों का बहुत महत्त्व है. धार्मिक रूप से हाशिए पर ढकेले गए ऐसे लोगों को लगता है कि जब वे जातिगत रूप से मजबूत होंगे तभी समाज की मुख्यधारा में शामिल रह सकते हैं. ऐसे में वे धार्मिक उत्पीड़न से लड़ने के लिए जातीयता को ही सब से प्रमुख हथियार मानते हैं. मायावती की मजबूती का सब से प्रमुख कारण यही है. दलित चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘दलित बिरादरी के लोगों को बसपा के सत्ता में आने पर सम्मान मिलने लगा. उन का सामाजिक उत्पीड़न कम हुआ. छुआछूत और भेदभाव की घटनाएं कम हुईं. इसी कारण दलित वर्ग मायावती के हर काम को नजरअंदाज कर उन का समर्थन करता है.’’ 
दरअसल, जिस भी बिरादरी का जितना अधिक शोषण और उत्पीड़न होता है वह उतना ही बड़ा जातिवादी बन कर उभरता है. अपनी रक्षा के लिए वह वर्ग एकजुट होता है जिसे जातिवाद का नाम दिया जाता है. अगर हिंदू धर्म में छुआछूत नहीं होती तो जातीय विभाजन की खाई इतनी गहरी नहीं हो सकती थी. जातिवाद को खत्म करने के लिए धार्मिक कुरीतियों को खत्म करना होगा. और जब जातिवादी भेदभाव खत्म होगा तभी देश का मतदाता जातीयता की जकड़न से मुक्ति पा सकेगा वरना राजनीतिबाज उन का जातिवादी दोहन करते रहेंगे.

एअरहोस्टेस की ड्रैस

 
आमतौर पर विकसित देशों में लड़कियों को अपनी इच्छानुसार कपड़े पहनने या न भी पहनने की इजाजत है पर फिर भी छोटे कपड़ों पर विवाद खड़ा हो जाता है. जापान एअरलाइंस ने अपनी एअरहोस्टेसों के लिए जो नई स्कर्ट डिजाइन कराई है वह घुटनों से काफी ऊपर है. इस पर एअरहोस्टेसों की यूनियन ने आपत्ति जताई है.
लड़कियों के कपड़ों पर तरहतरह की नीतियां बनाना और लड़कों को खुला छोड़ना असल में गलत है. जिन देशों में लड़कियों को ऊपर से नीचे तक ढका रखा जाता है वहां वे सुरक्षित हैं, यह गारंटी कोई नहीं ले सकता. अरब देशों में, पाकिस्तान में या अफगानिस्तान में, क्या औरतें सुरक्षित हैं? वहां तो बलात्कार होने पर सजा औरत को दी जाती है, इसलिए औरतें इस जहर को पी जाती हैं.
अमेरिका और यूरोप में बलात्कार उतने ही होते हैं जितने भारत जैसे देश में, जहां औरतें उन के मुकाबले ज्यादा ढकी रहती हैं. औरतों से छेड़खानी किए जाने की घटनाएं सभी जगह तकरीबन बराबर ही होती हैं. जिन देशों में समाज व्यवस्था, कानून, पुलिसिंग सब ठीक हैं वहां दूसरे अपराधों की तरह औरतों, चाहे वे जैसे कपड़े पहनें, के प्रति भी कम अपराध होते हैं.
अगर एक एअरलाइंस अपने ग्राहकों को लुभाने के लिए स्टंट करती है तो यह उस का हक है. यह स्टंट भी तभी तक चलेगा जब तक दूसरी एअरलाइंस इसे नहीं अपनातीं. अगर सभी की एअरहोस्टेसें मिनी स्कर्ट पहनें तो शायद कोई आंख उठा कर भी न देखे. दरअसल, लड़कियों को नौकरी देने से पहले ही बता दिया जाए कि उन्हें मिनी स्कर्ट पहननी होगी या बुरका पहनना होगा तो फिर उन की मरजी. नौकरी पाने के बाद चूंचूं करना गलत है.

कैसीनो जैसा क्रिकेट

 
भारतीय क्रिकेट लास वेगास के जुएखाने की तरह है और अदालतें व मीडिया जितना इस की तह में खोज रहे हैं उतना पता चलता है कि सब एक से बढ़ कर एक हैं. न्यायमूर्ति मुकुल मुद्गल ने अपनी इंडियन प्रीमियर लीग पर सौंपी अपनी रिपोर्ट में 13 नामों का जिक्र किया है. इन में बोर्ड औफ क्रिकेट कंट्रोल औफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष एन श्रीनिवासन का नाम भी है. यह रिपोर्ट अभी गुप्त है. सुप्रीम कोर्ट ने इतना कहा है कि श्रीनिवासन समेत अन्य 12 पर गंभीर आरोप हैं पर चूंकि जांच अभी बाकी है इसलिए वह रिपोर्ट को प्रकाशित नहीं कर रहा क्योंकि इस में बड़े नाम हैं.
क्रिकेट राजनीति और नौकरशाही की तरह इस देश की संस्कृति की पोल खोलता है. राजनीति देशसेवा की जगह स्वयंसेवा और नौकरशाही अपने दायित्व से भटक कर मालिकशाही बन गई है. दोनों ने जनता को जम कर लूटा है. और यह लूट जारी रहेगी, भ्रष्टाचारमुक्त देश का चाहे जितना नारा दिया जाए क्योंकि बेईमानी इस देश की संस्कृति का हिस्सा है. हमारे पौराणिक इतिहास की देन देवीदेवता हमारे आज के नेताओं, अफसरों और अब खिलाडि़यों की तरह की सफेद चमक के पीछे काले घृणित काम करते रहे हैं.
जैसे हम देवीदेवताओं को उन के गंभीर दोषों के बावजूद पूजते रहते हैं वैसे ही खिलाडि़यों को पूज रहे हैं, जैसे देवीदेवताओं और नेताओं को नोटों के हार पहनाते हैं, खिलाडि़यों की बनाई चीजें खरीद कर उन्हें अरबखरबपति बना रहे हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने 12 नाम इसीलिए जाहिर नहीं किए कि कहीं पूजनीय ‘देवताओं’ की पोल खुलने पर जनता भड़क न उठे.
सट्टेबाजों ने क्रिकेट को खेल से तमाशा और फिर तमाशे से जुआ बनाया. उन्होंने हर मैच, बौल, छक्के, चौके पर बोली लगा कर उसे कैसीनो बना दिया. हर बौल पर लाखों नहीं, करोड़ों की बोली लग सकती है क्योंकि बौलर और बैट्समैन को हिस्सा दे कर उस से अपने अनुसार कराया जा सकता है. यह फिक्सिंग ऐसी है जो सस्ते कैसीनो को भी मात देती प्रतीत होती है. स्टेडियमों को लास वेगास के कैसीनो बनाने में खिलाडि़यों, प्रबंधकों और सट्टेबाजों ने कोई कसर नहीं छोड़ी. आज शिकायत खिलाडि़यों या क्रिकेट प्रेमियों से कम, सरकार से ज्यादा है जो पुरस्कार देदे कर क्रिकेट की महिमा बढ़ाने में लगी रहती है.  
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