दो घड़ी तन्हा भी बैठा जाए
कैसे हो खुद से ये पूछा जाए

नहीं दिखता बहुत करीब से भी
तुम को कुछ दूर से देखा जाए

अपने बारे में सभी सोचते हैं
सब के बारे में भी सोचा जाए

इल्म की शमा को रौशन कर के
तीरगी का गुमां तोड़ा जाए

सब को खुद ही तलाशनी मंजिल
जाते राही को न रोका जाए

घर तो अपना सजा लिया ऐ ‘सरल’
दिल के जालों को भी झाड़ा जाए.

मुकुल सरल
 

आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें

सरिता डिजिटल

डिजिटल प्लान

USD4USD2
1 महीना (डिजिटल)
  • 5000 से ज्यादा फैमिली और रोमांस की कहानियां
  • 2000 से ज्यादा क्राइम स्टोरीज
  • 300 से ज्यादा ऑडियो स्टोरीज
  • 50 से ज्यादा नई कहानियां हर महीने
  • एक्सेस ऑफ ई-मैगजीन
  • हेल्थ और ब्यूटी से जुड़ी सभी लेटेस्ट अपडेट
  • समाज और राजनीति से जुड़ी समसामयिक खबरें
सब्सक्राइब करें

डिजिटल प्लान

USD48USD10
12 महीने (डिजिटल)
  • 5000 से ज्यादा फैमिली और रोमांस की कहानियां
  • 2000 से ज्यादा क्राइम स्टोरीज
  • 300 से ज्यादा ऑडियो स्टोरीज
  • 50 से ज्यादा नई कहानियां हर महीने
  • एक्सेस ऑफ ई-मैगजीन
  • हेल्थ और ब्यूटी से जुड़ी सभी लेटेस्ट अपडेट
  • समाज और राजनीति से जुड़ी समसामयिक खबरें
सब्सक्राइब करें

प्रिंट + डिजिटल प्लान

USD100USD79
12 महीने (24 प्रिंट मैगजीन+डिजिटल)
  • 5000 से ज्यादा फैमिली और रोमांस की कहानियां
  • 2000 से ज्यादा क्राइम स्टोरीज
  • 300 से ज्यादा ऑडियो स्टोरीज
  • 50 से ज्यादा नई कहानियां हर महीने
  • एक्सेस ऑफ ई-मैगजीन
  • हेल्थ और ब्यूटी से जुड़ी सभी लेटेस्ट अपडेट
  • समाज और राजनीति से जुड़ी समसामयिक खबरें
सब्सक्राइब करें
और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...