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2020 तक सामाजिक क्षेत्र में नौकरियों की बहार

सरकार ने अप्रैल में नया कंपनी अधिनियम बनाया है. इस कानून के तहत कंपनियों को सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन आवश्यक रूप से करना है. उस कानून के दायरे में आने वाली कंपनियों को अपनी कुल कमाई का 2 फीसदी खर्च सामाजिक जिम्मेदारियों पर करना पड़ेगा. नए कानून के तहत जिन कंपनियों का कुल लाभ 5 करोड़ रुपए अथवा कुल कारोबार 1 हजार करोड़ रुपए है उन्हें आवश्यक रूप से 2 फीसदी पैसा अपने कुल लाभ का सामाजिक विकास के लिए खर्च करना होगा. कंपनियों को यह पैसा शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला तथा बाल कल्याण जैसी योजनाओं पर खर्च करना होगा.

यदि सरकार के इस नियम का सख्ती से पालन होता है तो इन संगठनों के लिए कंपनियों को आज के हिसाब से एक अनुमान के अनुसार 22000 करोड़ रुपए इस क्षेत्र में लगाने होंगे. यह निधि यदि सामाजिक विकास के लिए सही तरीके से खर्च होती है तो अगले 6 साल में इस क्षेत्र में 1 लाख से अधिक युवकों के लिए नौकरी के अवसर उपलब्ध हो सकेंगे. नए नियम के तहत 16 हजार से अधिक कंपनियां आ रही हैं. इस कानून का ज्यादा फायदा दूसरी और तीसरी श्रेणी के शहरों को मिलेगा. इसलिए रोजगार के ज्यादा अवसर भी उन्हीं शहरों में उपलब्ध होंगे. जाहिर है इस क्षेत्र में भी प्रोफैशनलों को ही महत्त्व दिया जाएगा. उस में प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण, गरीबी उन्मूलन, कौशल विकास, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों के प्रोफैशनलों के लिए ही नौकरी के अवसर होंगे. मतलब, जिन युवकों के पास उन क्षेत्रों में अच्छी काबिलियत होगी, विशेषज्ञता हासिल होगी उन्हें 3 से 6 लाख रुपए तक की सालाना सैलरी आसानी से इस क्षेत्र में मिल जाएगी. यह खुलासा ईवाई (अर्नस्ट ऐंड यंग) के अध्ययन में हुआ है. यह एक सलाहकार कंपनी है.

भारत डेढ़ दशक में सब से निचले पायदान पर

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को किसी भी विकासशील देश के ढांचागत विकास की धुरी माना जाता है. विकासशील ही नहीं विकसित, देशों को भी अपने सतत विकास के लिए ढांचागत सुधार की सुविधा को जारी रखना आवश्यक है और इस प्रक्रिया के सुचारु संचालन के लिए विदेशी निवेश यानी एफडीआई का प्रवाह आवश्यक है. एफडीआई उसी देश में ज्यादा होता है जहां निवेशकों को लगता है कि देश की आर्थिक नीति अनुकूल है और उन्हें इस निवेश से फायदा होगा. ताजा सूचना के अनुसार, भारत विदेशी निवेशकों का विश्वास अर्जित करने वाले प्रमुख देशों की सूची से फिसल कर 7वें स्थान पर चला गया है. वैश्विक सलाहकार संस्था एटी कीर्नी ने करीब 300 निवेशक कंपनियों में एक सर्वेक्षण कराया है जिस में कहा गया है कि भारत के प्रति निवेशकों का सम्मान घटा है.

वर्ष 2005, 2007 तथा 2012 में भारत दूसरे स्थान पर था और 2010 में हम इस क्रम में तीसरे स्थान पर रहे लेकिन इस बार भारत 7वें स्थान पर आ गया है. जून के पहले पखवाड़े में जारी इस सूची के अनुसार, 2001 के बाद भारत की रैंकिंग इस क्षेत्र में सब से निचले पायदान पर है. इस बार अमेरिका पहले स्थान पर है जबकि पिछले वर्ष चीन को पहला स्थान हासिल था. भारत के आर्थिक विकास के लिए एफडीआई का प्रवाह निरंतर बना रहना आवश्यक है और निवेशकों का विश्वास तब ही अर्जित किया जा सकता है जब राजनीतिक स्थिरता, सरकार की आर्थिक नीतियां आक्रामक और विकासपरक हों.

जानकारों का कहना है कि एफडीआई विकास की प्रक्रिया में तेजी लाता है, इसलिए विदेशी निवेशकों का भरोसा जीतना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए.

बैंक का पैसा डकारना आसान नहीं होगा

जालसाजी हमारी धड़कनों में इस तरह से रचबस गई है कि बेईमान आज सामाजिक प्रतिष्ठा का हकदार बन गया है. बेईमानी कर के पैसा कमाने वाला स्मार्ट है, समझदार है, प्रगतिशील है, परिवार का नाम रोशन करने वाला है और प्रतिष्ठा का हकदार है. शादीविवाह की बात हो तो जरूर पूछा जाता है कि लड़के की ऊपर की कितनी कमाई होती है. भ्रष्टाचार को मिटा कर राजनीति की नौका पर सवार हो कर देश का भाग्यविधाता बनने का सपना देख रहे आम आदमी पार्टी का नेता अरविंद केजरीवाल जब कहता है कि मुझे पैसे ही कमाने होते तो आयकर कमिश्नर रह कर ही कमा लेता. इस का सीधा मतलब है कि आयकर विभाग का आयुक्त भ्रष्टाचारी होता है. भ्रष्टाचार का खेल जिस भूमि पर चल रहा हो और उसे नियंत्रित करने के बजाय इस तरह से उसे महिमामंडित किया जा रहा है तो यह उम्मीद करना ठीक नहीं है कि ‘अच्छे दिन आने वाले हैं.’

बहरहाल, जिन लोगों ने बैंकों से पैसा लिया है और उस पैसे को हजम करना चाहते हैं, हालांकि उन की पैसा लौटाने की क्षमता है, ऐसे बेईमानों पर नकेल कसने के लिए आयकर विभाग और सरकारी क्षेत्र के बैंकों के बीच सहमति बनी है. सहमति के तहत आयकर विभाग कर्जदार की संपत्ति की पूरी सूचना बैंकों को उपलब्ध कराएगा. सूचना के आधार पर बैंक अपना पैसा वसूल करने का प्रयास करेगा. बैंक कानूनी तौर पर कर्जदार की संपत्ति जब्त नहीं कर सकता लेकिन उस के पास कर्जदार का जो विवरण होगा और उस की जो जानबूझ कर पैसा नहीं लौटाने की मंशा है, उस आधार पर बैंक ऋणवसूली न्यायाधिकरण यानी डीआरटी में शिकायत दर्ज कर सकता है और ट्रिब्यूनल बैंक को जानबूझ कर कर्ज लौटाने से बच रहे कर्जदार की संपत्ति को बेचने का आदेश दे सकता है.

सार्वजनिक बैंकों का इस तरह के लोगों पर करीब पौने 2 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है जिस की वापसी की बैंकों को कम उम्मीद है लेकिन यदि यह सूत्र काम कर गया तो सरकारी बैंकों में एक तरह से डूबे हुए ऋण की वसूली से नया उत्साह आएगा.’

शेयर बाजार में रिकौर्ड उत्साह

रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने केंद्र की नई सरकार के कार्यकाल में पहली बार मौद्रिक नीति की घोषणा की और बैंक दरों को यथावत बनाए रखा. ब्याज दरों को पहले की तरह यथावत बनाए रखने के साथ ही उन्होंने बैंकिंग क्षेत्र के लिए अच्छीखासी निधि देने की भी घोषणा की ताकि ऋण का प्रवाह बना रहे. उन की इस नीति का शेयर बाजार ने स्वागत किया और सूचकांक रिकौर्ड 25000 अंक पर बंद हुआ.

हालांकि रुपए को यह रास नहीं आया और रुपया 3 सप्ताह के निचले स्तर पर चला गया. मई के आखिरी सप्ताह में रुपया शुरुआती बढ़त के बावजूद गिरावट पर रहा. 29 मई को डौलर के मुकाबले रुपया लगातार चौथे सत्र में गिरावट पर बंद हुआ.

जून का पहला कारोबारी दिवस शेयर बाजार के लिए उत्साह भरा रहा और बाजार ने 3 सप्ताह में एक दिन में सर्वाधिक 467 अंक की छलांग लगाई. बाजार में यह तेजी वैश्विक बाजार के असर के कारण भी देखने को मिली. विदेशी निवेशकों के साथ ही खुदरा निवेशकों ने बाजार में खूब उत्साह बनाए रखा. यही उत्साह है कि सूचकांक कारोबार के दौरान 25 हजार अंक का रिकौर्ड छू चुका है.

टीवीएस स्टार सिटी प्लस का स्मार्ट लुक

बाजार में वैसे तो विभिन्न कंपनियों के अनेक मौडल मौजूद हैं लेकिन टीवीएस ने मोटरसाइकिल की सवारी करने वालों के लिए अपने स्टार सिटी मौडल को नए रूप में उतारा है. यह नई मोटरसाइकिल ‘टीवीएस स्टार सिटी प्लस’ है. प्लस का अर्थ पहले से कुछ बेहतर है और नया होना है.

इस मोटरसाइकिल के इंजन की बात करें तो इस में 109.7 सीसी का इकोथ्रस्ट इंजन है. यह नया इंजन 8.3 हौर्सपावर की शक्ति देता है. 50-60 किलोमीटर प्रतिघंटे की स्पीड में चलाने पर इस में कोई वाइबे्रशन या आवाज नहीं होती. अगर आप 90 की स्पीड में भी इसे टौप गियर में चलाते हैं तो भी थोड़ी सी ही आवाज या वाइबे्रशन होती है लेकिन यह किसी भी तरह से आप के ड्राइविंग के आनंद को कम नहीं करती. यह एक तेज गति की मोटरसाइकिल है.

109 किलोग्राम की यह हलकी मोटरसाइकिल स्टीयरिंग के साथ बखूबी मेल खाती है. इस का सस्पैंशन बेहतर है जो वाहन चलाने वाले को अच्छा अनुभव देता है. टेढ़ेमेढ़े, गड्ढे वाले रास्तों पर यह बिना संतुलन खोए तेज गति से चलती है. इस का एनवीएच स्तर बहुत ही अच्छा है.

स्टार सिटी प्लस एक स्मार्ट दिखने वाली मोटरसाइकिल है. इस के नए डिजाइन को टीवीएस द्वारा ‘मौडर्न फ्लो मोशन’ का नाम दिया गया है. नई बाइक को अपमार्केट अपील देने के लिए डिजाइनर्स ने स्टार सिटी के कर्व्स की जगह शार्प लाइंस दी हैं. इस में फाइव स्पोक के एलौय व्हील्स हैं जो सड़क पर अधिक ग्रिप देते हैं. इस में एनालौग/ डिजिटल इंस्ट्रूमैंट क्लस्टर के साथ सर्विस इंडिकेटर, क्लीयर लैंस, इंडीकेटर, क्रोम हैंडल बार, रंगीन शौक औब्जर्वर स्ंिप्रग जैसे नए फीचर्स हैं, जो इसे स्टाइलिश लुक देते हैं. हैंड्सबार, सीट व फुट पैग्स के बीच सही अंतर दिया गया है. इस की फोम की सीट न ज्यादा मुलायम है न ज्यादा सख्त यानी बैठने में आराम.

नई स्टार सिटी सुपर रिफाइंड और सुपर कंफर्टेबल है. हालांकि नई स्टार सिटी प्लस में डिस्क बे्रक का विकल्प नहीं है लेकिन बाइक के ड्रम बे्रक इस की प्रतियोगियों को टक्कर देने के लिए काफी हैं. कुल मिला कर टीवीएस के हाथों में एक विजेता है जो बाइकलवर्स को अवश्य पसंद आएगा.

-दिल्ली प्रैस की अंगरेजी पत्रिका मोटरिंग वर्ल्ड से

देवदासियां: धर्मगुरुओं की हवसपूर्ति

सुप्रीम कोर्ट ने 13 फरवरी को कर्नाटक के मुख्य सचिव को दिए एक निर्देश में कहा था कि वे सुनिश्चित करें कि किसी भी मंदिर में किसी लड़की को देवदासी की तरह इस्तेमाल न किया जाए. इस के बावजूद धर्म के नाम पर औरतों के यौन शोषण का सिलसिला थमता नहीं दिखता. कर्नाटक के 10 और आंध्र प्रदेश के 14 जिलों सहित मुल्क के तमाम हिस्सों में औरत को देवदासी बना कर धर्म की बलि चढ़ाया जा रहा है. लंबे अरसे से प्रशासन इस कुप्रथा से बेखबर बना हुआ है.

मंदिरों में देवदासियों द्वारा सेवा करना नई बात नहीं है. खासतौर से दक्षिण भारतीय मंदिरों में देवदासियों का चलन प्राचीन समय से चला आ रहा है. ये देवदासियां सफेद साड़ी पहनती हैं और मंदिरों के पुजारियों के हर आदेश का पालन करना अपना धार्मिक फर्ज समझती हैं. इन देवदासियों को बताया जाता है कि पुजारी का स्थान भगवान से भी बड़ा होता है और उस के हर आदेश का पालन करना उन की जिंदगी का एकमात्र मकसद होना चाहिए.

कई वर्ष पहले दक्षिण भारत के एक मंदिर में एक 10 वर्षीय अबोध बालिका को देवदासी बनाया गया था, जो वहां के पुजारी के हर आदेश को मानने के लिए विवश थी. बाद में उस की बड़ी बहन भी देवदासी बनी और ये बहनें पुजारी के शोषण और जुल्म का शिकार होती रहीं.

इसी तरह आंध्र प्रदेश के एक मंदिर में 5 देवदासियां वहां के पुजारी की हवस का शिकार होती रहीं. दिलचस्प बात यह है कि इन लड़कियों के मातापिताओं के धर्मगुरुओं ने इन्हें यहां देवदासी के रूप में सौंपने का आदेश दिया था क्योंकि वे भी जल्द धर्म का प्रसाद और भगवान की कृपा हासिल करना चाहते थे. इतनी कम उम्र में देवदासी के रूप में लड़कियों को सौंपने के पीछे अंधविश्वास तो है ही, गरीबी भी एक बहुत बड़ा कारण है. इन देवदासियों की स्थिति ‘रखैल’ जैसी है, यह बात इन के मातापिता और ग्रामसमाज के लोग भी जानते हैं. लेकिन कोई प्रतिरोध नहीं करता है. कारण साफ है, सभी को यह डर सताता है कि यह धर्म के खिलाफ हो जाएगा.

जिन मंदिरों में ये देवदासियां रहती हैं, वहां खूब भीड़ होती है. मंदिर के पुजारी की आज्ञा के बगैर इन देवदासियों को किसी से बात करने की मनाही होती है.

देवदासी प्रथा का प्रचलन सनातन धर्म में शताब्दियों से है. दक्षिण भारत के कई राज्यों में हजारों की तादाद में सनातन हिंदू धर्म के मंदिरों में देवदासी धर्मगुरुओं, पुरोहितों, ब्राह्मणों, स्वामियों और धर्माधिकारियों की सेवा करती थीं. वैसे तो यह कहा जाता था कि ये मंदिर और देवमूर्तियों की सेवा (सफाई और साजसज्जा) करती हैं लेकिन परदे की आड़ में ये मंदिर के पुजारी की ‘रखैल’ के रूप में रहती थीं. देवदासियां जाति के मुताबिक ‘निम्न’ जाति की ही होती थीं, आज भी दक्षिण में नीची कही जाने वाली जाति की ही देवदासियां मंदिरों में तथाकथित ‘देवसेवा’ में लगी हुई हैं.

इस तरह आज भी आधुनिक समाज में हजारों लड़कियां धर्म के नाम पर देवदासी बनने के लिए मजबूर की जाती हैं. हैरानी की बात यह भी है कि जिन राज्यों में हजारों की तादाद में देवदासियों का खुल्लमखुल्ला शोषण होने की बात कही जा रही है उन राज्यों में देवदासी प्रथा के खिलाफ अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है.

जिन देवदासियों का मानसिक व यौन शोषण होता है वे उस परिवार से संबंध रखती हैं जो अमूमन निर्धन तो होता ही है, अशिक्षित और अंधविश्वासी भी होता है. पहले ऐसे परिवार की खोज मंदिर के पुजारी के जरिए करवाई जाती है. और ऐसे परिवारों को वरीयता दी जाती है जहां लड़कियां सुंदर और मांसल हों. फिर मंदिर के पुजारी का आमंत्रण ‘देवपूजा’ के नाम पर उस परिवार को दिया जाता है और यह भी बताया जाता है कि तुम्हारे भाग्य चमके हैं, अब तुम्हारी खराब आर्थिक स्थिति का अंत होने वाला है. तुम परिवार के साथ ‘देवता की सेवा में’ फलां तारीख को आ जाना.

आमंत्रण पा कर वह मजबूर और धर्मभीरु परिवार निर्धारित तारीख को परिवार के साथ पहुंच जाता है. पहुंचते ही उस के परिवार की शानदार आवभगत की जाती है. इतनी इज्जत पा कर वह सबकुछ मानने को तैयार हो जाता है, जो पुजारी कहता है. धर्म की दुहाई, आर्थिक मदद और स्वर्ग दिलाने की ठेकेदारी पुजारी की तरफ से दी जाती है. परिवार पुजारी को लड़कियां सौंप कर चला जाता है. पुजारी लड़कियों को यह समझाने में कामयाब हो जाता है कि उन की शादी मंदिर की मूर्ति से कर दी जाएगी. इस से देवता प्रसन्न होंगे और उन की सारी (हर तरह की) परेशानियां दूर हो जाएंगी. नाम तो होता है पत्थर के देवता के साथ शादी होने का लेकिन हनीमून उन के संग मंदिर का पुजारी ही मनाता है.

यह भी होता है

यह एक देवदासी की आपबीती है. बात कुछ साल पहले की है. आंध्र प्रदेश का एक गांव, जहां जोगरी पैदा हुई और पलीबढ़ी. परिवार दलित और गरीब. प्रथम दरजे का अंधविश्वासी और अशिक्षित भी. पास के ही एक गांव से एक दिन वहांके मंदिर के पुजारी का आमंत्रण आया. आमंत्रण पुजारी ने एक नौकर के जरिए भिजवाया था. परिवार के साथ एक खास उत्सव में बुलवाया गया था. साथ में यह भी लिखा था कि देवता की कृपा हासिल करने के लिए मेरे मातापिता को चढ़ावे के रूप में अपनी 1 या 2 लड़कियों की देवता से शादी कर देनी चाहिए.

जोगरी का मानना था कि मैं खुशीखुशी मंदिर गई क्योंकि मुझे बताया गया था कि मंदिर के देवता की कृपा मुझे मिलेगी और परिवार की सारी दिक्कतें हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगी. एक दिन परिवार के साथ मैं मंदिर पहुंची. शाम हो चुकी थी. गरीब होने के कारण हम सब पैदल ही आए थे. उस दिन 6 घंटे पैदल चलना पड़ा था. मैं थक चुकी थी. मंदिर परिसर में पहुंचते ही मैं ने एक हट्टाकट्टा आदमी देखा जो कंट्ठीमाला गले में डाले हुए था और जिस के माथे पर चंदन से बना हुआ त्रिशूल चमक रहा था. मैं देखते ही डर गई थी लेकिन मातापिता ने मुझे समझाते हुए कहा कि डरो नहीं, ये हमारे देव हैं, इन के निमंत्रण से ही हम सब यहां आए हैं.

इस के बावजूद मैं डर रही थी. थोड़ी देर बाद उत्सव शुरू हो गया. मुझे खूब सजाया गया और फिर मुझे बताया गया कि मैं आज से देवता की जोगिन बन कर यहीं रहूंगी. मंदिर के पत्थर के देवता से मेरी मरजी के खिलाफ मेरीशादी कर दी गई. फिर चुपके से मेरे पापा और मां मुझे छोड़ कर चले गए.

रात में वह हट्टाकट्टा पुजारी मेरे पास आया. मैं देखते ही डर गई थी. तब मेरी उम्र केवल 12 वर्ष थी. मैं न शादी का मतलब जानती थी और न ही हनीमून का. उस पुजारी ने मेरे साथ हरकत करनी शुरू की तो मैं ने उसे मना किया. मैं बहुत डर रही थी, उस रात तो उस ने मेरी प्रार्थना पर मुझे और परेशान नहीं किया लेकिन अगली रात उस ने जबरन मेरे साथ बलात्कार किया. मैं चीखतीचिल्लाती रही और हबशी मेरी इज्जत लूटता रहा.

पुजारियों की स्थिति

देवदासियों की स्थिति जहां बद से बदतर है वहीं देवदासियों के रूप में और आंध्र प्रदेश की जोगिन कही जाने वाली महिलाओं की हालत भी बद से बदतर है. लेकिन मंदिर के पुजारियों की ऐयाशी भरी जिंदगी पर उंगली उठाने वाला कोई नहीं. न तो सामाजिक संस्थाएं और न ही राज्य सरकारें इन के खिलाफ कोई कठोर कदम उठाती हैं.

पुजारियों के घर में उन के इस कुकृत्य के खिलाफ न तो उन की पत्नियां कदम उठाती हैं और न घर के दूसरे सदस्य ही. बल्कि घर वाले हर तरह से इन की मदद ही करते हैं. ऐसा लगता है ‘रखैल’ के रूप में देवदासियों के साथ ताल्लुकात रखने की यहां एक लंबी परंपरा चल रही है.

गीता, रामायण या पुराणों में देवदासियों का कोई जिक्र भले ही न हो लेकिन दक्षिण के राज्यों की तमाम पौराणिक पुस्तकों में इस के बारे में वर्णन किया गया है. दरअसल, दक्षिण भारत में देवदासीप्रथा को धर्म का एक हिस्सा ही मान लिया गया है. दक्षिण के पौराणिक ग्रंथों में धर्मगुरुओं, पुरोहितों और पुजारियों को भगवान जैसी प्रतिष्ठा दी गई है. इन का कोई भी कुकर्म अपराध नहीं माना गया है. आम आदमी धर्मग्रंथों के मकड़जाल में फंस कर अपनी लड़कियों को इन्हें सौंप आता है, जिन की हालत जानवरों से भी गईबीती कर दी जाती है.

जिल्लतभरी जिंदगी

जिन धर्मस्थानों और मंदिरों को मानवता के रक्षक के रूप में प्रचारित किया जाता है उन जगहों पर सदियों से कैसीकैसी काली करतूतें की जाती रही हैं, उन्हें समझना है तो देवदासियों की जिंदगी में झांक कर देखा जा सकता है. युवावस्था तो त्रासदी में कटती ही है, ढलती उम्र में उन्हें लावारिस गाय की तरह छोड़ दिया जाता है.

आज जरूरत है इस प्रथा को जड़ से खत्म करने की. जो महिलाएं मंदिरों पर धर्मगुरुओं की हवस की शिकार हैं उन्हें नई जिंदगी दे कर, रोटी, कपड़ा और मकान का सहारा दिया जाए. केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को इस प्रथा को खत्म करने के लिए आगे आना चाहिए और उन समाजकर्मियों को भी जो अंधविश्वासों, पाखंडों, गंदी प्रथाओं व सामाजिक बुराइयों के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं

भोपाल के नवाब की जायदाद सैफ ने उलझाया विवाद

पारिवारिक बंटवारा जज्बाजी तौर पर तो तकलीफदेह होता ही है लेकिन वक्त रहते न हो तो जायदाद के लिहाज से भी नुकसानदेह साबित होने लगता है जैसा कि भोपाल रियासत के आखिरी नवाब हमीदुल्लाह खान के वारिसों के बीच हो रहा है.  तकरीबन 1 हजार करोड़ रुपए की जायदाद के बंटवारे को ले कर मामला फिर अधर में लटक गया है और ऐसा लग भी नहीं रहा कि यह जल्द सुलझ पाएगा.

 इस दफा तीसरी पीढ़ी के वारिसों के अहं, महत्त्वाकांक्षाएं, पूर्वाग्रह, जिद और लालच आड़े आ रहे हैं. मौजूदा जायदाद के 7 वारिसों में से कोई भी समझौता करने के मूड में नहीं दिख रहा. सो, गेंद अब अदालत और सरकार के पाले में है. इस लड़ाई से नवाब मंसूर अली खान उर्फ नवाब पटौदी की बेगम आयशा सुल्तान यानी अपने जमाने की मशहूर फिल्म ऐक्ट्रैस शर्मिला टैगोर की अदालत के बाहर समझौता कर जायदाद बांट लेने की कोशिशों को तगड़ा झटका लगा है और इस दफा यह झटका देने वाले कोई और नहीं उन के ही बेटे बौलीवुड के कामयाब अभिनेता सैफ अली खान हैं, वरना वे अपनी मंशा में कामयाब होती दिख रही थीं.

क्या है फसाद

भोपाल रियासत की त्रासदी या खूबी यह रही है कि यहां अधिकांश वक्त बेगमें काबिज रहीं जो कोई हर्ज की बात न थी पर अब जिस तरह बंटवारे का मसौदा और मामला उलझ रहा है उसे देख लगता है कि पुरुष बेहतर तरीके से बंटवारे को अंजाम दे सकते हैं, फिर चाहे वे मध्यवर्गीय परिवारों के हों, रियासतों के हों या रजवाड़ों के.

1926 में भोपाल के आखिरी नवाब हमीदुल्लाह खान ने रियासत संभाली थी.  हमीदुल्लाह के चूंकि कोई बेटा नहीं था, इसलिए उन्होंने अपनी मंझली बेटी साजिदा सुल्तान को शासक नियुक्त कर दिया था. कायदे से यह जिम्मेदारी उन की बड़ी बेटी आबिदा सुल्तान को मिलती पर वे शादी करने के बाद अपने बेटे शहरयार के साथ पाकिस्तान जा कर बस गईं. छोटी बेटी राबिया सुल्तान भी अपनी ससुराल में चली गईं.

साजिदा बेगम की शादी पटौदी राजघराने के नवाब इफ्तिखार अली खान के साथ हुई थी. इन दोनों के 3 संतानें हुईं जिन में सब से बड़े थे मंसूर अली खान पटौदी, जिन्हें टाइगर के नाम से भी जाना जाता है. वे अपने जमाने के मशहूर क्रिकेटर थे और सिने तारिका शर्मिला टैगोर से प्यार कर बैठे और शादी हुई तो शर्मिला ने धर्म के साथ नाम भी बदल कर आयशा सुल्तान रख लिया.

साजिदा और इफ्तिखार की 2 बेटियों यानी मंसूर अली की दोनों बहनों सालेहा सुल्तान और सबीहा सुल्तान की शादी हैदराबाद में हुई थी.  बेटा होने के कारण मंसूर अली खान घोषित तौर पर नवाब मान लिए गए पर तब देश आजाद हो चुका था और राजेरजवाड़ों के दिन लदने लगे थे. सरकार ने दबाव बना कर रियासतों का विलीनीकरण करना शुरू कर दिया था जो उस वक्त के हालात को देखते जरूरी भी था.

आमतौर पर बेटियां पैतृक संपत्ति में हिस्से के लिए कानून का सहारा कम ही लेती थीं. भोपाल रियासत के मामले में भी यही होता लेकिन विवाद की शुरुआत एक छोटे से अहं और असुरक्षा को ले कर हुई. मंसूर अली खान की छोटी बहन सबीहा अपने पति मीर अर्जुमंद अली के साथ साल 2002 में रुकने के लिए भोपाल स्थित अपने घर यानी फ्लैग स्टाफ हाउस पहुंचीं तो उन्हें यह कह कर मुलाजिमों ने चलता कर दिया कि यह नवाब मंसूर अली खान का घर है जो उन्हें उन की मां साजिदा दे कर गई थीं.

यह मालिकाना हक जता कर बहनों को टरकाने की नाकाम कोशिश थी.  इस से पहले सबीहा ने कभी जायदाद को ले कर भाई से किसी तरह का विवाद या फसाद खड़ा नहीं किया था लेकिन सालेहा जरूर मंसूर अली खान को जायदाद की बाबत नोटिस देती रही थीं.

जाहिर है फ्लैग स्टाफ हाउस, जिसे अहमदाबाद पैलेस के नाम से भी जाना जाता है, से यों चलता कर देने से सबीहा ने खुद को बेइज्जत महसूस किया और सीधे अदालत में मामला दायर कर दिया. इस पर मंसूर अली ने थोड़ी समझदारी दिखाते यह व्यवस्था कर दी कि अगर बहनों को फ्लैग स्टाफ हाउस में रुकना ही है तो वे अपने खानेपीने और मुलाजिमों का खर्च खुद उठाएं. यानी मंसूर अली उन भाइयों में से नहीं थे जो अपनी बहनों, बहनोइयों और भांजे, भांजियों के आने पर खुश होते हैं और उन का स्वागतसत्कार करते हैं. उलटे, वे तो बहनों को नसीहत दे रहे थे कि मां के मकान में ठहरो तो खानेपीने के और दीगर खर्चे खुद उठाओ.

यह बात सबीहा और सालेहा दोनों को नागवार गुजरी और उन्होंने अदालत से गुजारिश की कि उन्हें फ्लैग स्टाफ हाउस का संयुक्त स्वामी घोषित किया और माना जाए. यह वाद हालांकि सबीहा ने दायर किया था लेकिन इस का फायदा सालेहा को भी मिला. अक्तूबर 2005 में जिला अदालत ने सबीहा के पक्ष में फैसला दिया जिस का फायदा सालेहा को भी मिला.  जल्द ही उन का बेटा फैज बिन जंग सामान ले कर फ्लैग स्टाफ हाउस में जा कर रहने लगा.

कानूनी पचड़े में रियासत

हैरत की बात यह रही कि अपने स्वभाव के विपरीत जाते मंसूर अली खान ने भांजे का स्वागत किया और बहनों समेत उन के बच्चों के लिए भी कमरे आरक्षित कर दिए. एक दफा ऐसा लगा कि भाई व बहनों के बीच अब कड़वाहट खत्म हो रही है पर मामला उलट निकला. हुआ यह था कि मंसूर अली खान ने गुपचुप तरीके से फ्लैग स्टाफ हाउस का सौदा 64 करोड़ रुपए में कर दिया था.  सौदे की भनक लगते ही सबीहा फिर भड़क उठीं और इस दफा उन्होंने भाई के साथसाथ सालेहा को भी पक्षकार बना डाला.

इन दोनों ने ही सबीहा के नोटिसों का कोई जवाब नहीं दिया तो मामला और उलझ गया. हमीदुल्लाह के एक भाई औबेदुल्ला खान ने भी जायदाद पर हक जताते हुए खुद को वारिस बताया. फिर तो वारिसों की बाढ़ सी आ गई. हर कोई अदालत जा कर खुद को नवाब भोपाल की जायदाद का हिस्सेदार बताने लगा. इन में बेगम साजिदा की बहन यानी मंसूर अली खान की खाला राबिया सुल्तान की संतानें भी हैं.

दर्जनभर मुकदमे अभी भी अदालतों में चल रहे हैं. हालांकि साजिदा बेगम की संतानों के अलावा किसी का हिस्सा कानूनी तौर पर नहीं बनता है लेकिन दिक्कत यह है कि अब साजिदा के ही बेटेबेटी और उन की भी संतानें बंटवारे को ले कर अपनीअपनी मरजी और ख्वाहिशें थोप रही हैं जिस से बंटावारे का बंटाधार हो चुका है.

समझदारी शर्मिला की

नवाब मंसूर अली खान की मौत के बाद शर्मिला टैगोर ने समझदारी दिखाते हुए भोपाल की जायदाद को ले कर सुलह की पेशकश ननदों से की तो बीती अप्रैल के महीने में बात बनती नजर आई.

समझदारी के अलावा सुलह के लिए जिस शांत दिमाग और सब्र की जरूरत होती है वह शर्मिला में है, इसलिए उन्होंने बाकायदा अपनी ननदों को भोपाल बुलाया और खुद अपनी तरफ से पहल की. अब तक सबीहा और सालेहा को भी समझ आ गया था कि बेवजह की अदालती लड़ाई से किसी को कुछ हासिल नहीं होना. दूसरे, उन का बैरविवाद या अहं जो भी था वह भाई मंसूर अली खान से था, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं.

अरसे बाद शर्मिला की पहल पर नवाब खानदान के सभी सदस्य अप्रैल के तीसरे हफ्ते में फ्लैग स्टाफ हाउस में इकट्ठा हुए और बंटवारे पर बातचीत की. बातचीत का पहला दौर पुरानी कड़वाहटों से लबरेज रहा जिस में यह चर्चा भी हुई कि सैफ अली खान की पत्नी करीना कपूर ने क्यों इसलाम कुबूल नहीं किया और उस ने कैसे सैफ अली की पहली पत्नी अमृता सिंह के बच्चों को बहलाफुसला लिया है.

इन बातों के कोई माने या ताल्लुक बंटवारे से नहीं हैं, न ही यह अधिकृत है. आमतौर पर होता यह है कि जब भी नवाबों या राजघरानों के सदस्य मिलबैठ कर सुलह की कोशिश करते हैं तो उन के मुलाजिम, जिन में ड्राइवर, रसोइए, घरेलू नौकर और माली भी शामिल रहते हैं, अपने मन से टुकड़ोंटुकड़ों में सुनी गई बातों में नमकमिर्च लगा कर उन्हें चटपटा बना कर मीडिया के सामने परोस देते हैं.

इस मामले में भी यही हुआ पर शर्मिला बंटवारे को ले कर संजीदा थीं, इसलिए उन्होंने मुकम्मल सब्र रखा और बातचीत जारी रखी. तुम ने यह किया था, उस ने यह कहा था, यह गलत था जैसी बातों पर उन्होंने तवज्जुह नहीं दी और सभी की भड़ास निकल जाने दी. इस का फायदा यह हुआ कि सभी वारिस अदालत के बाहर समझौता कर बंटवारे पर राजी हो गए और 16 अप्रैल को छोटेमोटे सामानों का बंटवारा भी हो गया. उन में फानूस, पेंटिंग्स, क्रौकरी, स्टैच्यू, कालीन, पलंग और दूसरे फर्नीचर सहित चांदी के बरतन भी शामिल थे.

सैफ ने अड़ाई टांग

बंटवारे का फार्मूला क्या था, यह तो नवाब परिवार के सदस्यों ने दीवारों के बाहर नहीं जाने दिया पर अंदाजा यह लगाया गया कि शरीयत के मुताबिक, मंसूर अली खान के वारिसों को कुल जायदाद का 50 फीसदी और दोनों बहनों को 25-25 फीसदी मिलना तय हुआ है. पर इस फार्मूले की अहम शर्त यह थी कि फ्लैग स्टाफ हाउस भी मंसूर अली खान के किए सौदे के मुताबिक बेच दिया जाएगा. यही शर्मिला चाहती थीं क्योंकि मुंबई के खरीदार, जिन के नाम अभी उजागर नहीं हुए हैं, सौदे के बाबत दबाव बना रहे थे.

लेकिन 26 अप्रैल को सैफ अली खान ने मां के किएधरे पर यह कहते पानी फेर दिया कि वे फ्लैग स्टाफ हाउस नहीं बेचना चाहते और बाकी वारिसों यानी बूआओं को उन के हिस्से की कीमत देने के लिए तैयार हैं. इस से लगता है कि सैफ खरीदारों से संपर्क कर चुके थे.

सैफ अली के इस कदम के पीछे उन की बड़ी बूआ सालेहा खान का भी हाथ है और पत्नी करीना कपूर का भी, जो तकरीबन 10 एकड़ में फैली इस इमारत में शानदार होटल खोलना चाहती हैं और पति को इस बाबत अपनी इच्छा से अवगत करा कर राजी भी कर चुकी हैं. निर्देशक प्रकाश झा की एक फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में करीना भोपाल आई थीं तब पहली नजर में ही उन्हें अपने ससुराल की यह कोठी फ्लैग स्टाफ हाउस भा गई थी और इस का व्यावसायिक उपयोग करने का मन उन्होंने बना लिया था. इस के उलट, दूसरी तरफ सालेहा की मंशा आज के भाव में इस कोठी को बेचने की लग रही है जिस से ज्यादा पैसा मिले.  आज के हिसाब से इस की कीमत 200 करोड़ रुपए से भी ज्यादा आंकी जाती है.

सच कुछ भी हो पर इस विवाद से किसी का भला नहीं हो रहा है. शर्मिला टैगोर की पहल का असर इतना भर हुआ कि छोटेमोटे सामान का बंटवारा हो गया. अपने हिस्से में आया सामान उन्होंने बांध कर सुरक्षित रख दिया और ननदों ने जो चाहा था उन्हें दे दिया.

अब क्या होगा

जायदाद बंटवारे के इस विवाद को 3 पीढि़यों ने भुगता है पर कोई नतीजा कुछ नहीं निकला. जैसे ही सैफ अली ने फ्लैग स्टाफ हाउस बेचने पर एतराज जताया तो प्रदर्शनकारी संगठन भी इकट्ठा हो कर हायहाय करने लगे.

29 अप्रैल को जब शर्मिला टैगोर अपने हिस्से का सामान बंधवा रही थीं तब सहारा सामाजिक संगठन समिति ने बंटवारे के खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिया.  इस पर शर्मिला घबरा गईं और पुलिस को बुला लिया. इस संस्था के मुखिया मेराज खान मस्तान का कहना है कि नवाब भोपाल की कई निशानियां भोपाल शहर की ऐतिहासिक धरोहर हैं, इन्हें न तो बेचा जाना चाहिए न ही बाहर जाने देना चाहिए.

ऐसा हुआ भी. 30 अप्रैल को ही दायर एक याचिका पर जबलपुर हाइकोर्ट की डबल बैंच के चीफ जस्टिस एम खानविलकर व जस्टिस के के द्विवेदी ने बंटवारे पर रोक लगाने के आदेश जारी कर दिए. साफतौर पर हालफिलहाल हाईकोर्ट इस दलील से सहमत है कि जमीनों के अलावा पुरातत्त्व महत्त्व की वस्तुएं न बेची जाएं.

विवाद को हवा मिली तो 22 मई को मुंबई से शत्रु संपत्ति संचालनालय की टीम भी भोपाल आ कर नवाब हमीदुल्लाह की जमीनजायदाद खंगालने में जुट गई. यह टीम बेवजह नहीं आई थी. दरअसल, नवाब खानदान के ही किसी सदस्य ने ही मुंबई में या मुंबई जा कर दरख्वास्त लगाई थी. यह टीम निष्कांत और शत्रु संपत्तियों की जांच करेगी.

आजादी के दिन यानी 15 अगस्त, 1947 के बाद से 7 मई, 1954 तक जो जायदादें लावारिस रह गई थीं उन्हें निष्कांत और 1954 के बाद की लावारिस पड़ी संपत्तियों को शत्रु संपत्ति कहा जाता है.  यहां दिलचस्प बात यह है कि बंटवारे के वक्त जो लोग भारत छोड़ कर पाकिस्तान चले गए पर उन की जमीनें भारत में ही छूट गईं, उन जमीनों को निष्कांत संपत्ति माना गया. और जो लोग पाकिस्तान छोड़ कर भारत आए उन्हें ये जमीनें यानी निष्कांत संपत्तियां एक तरह से एवज में दी गईं.

बेवजह की कवायद

अब इस संचालनालय को नवाब भोपाल की कुछ और जायदादों का पता चल रहा है. जाहिर है इस के वारिस भी वही लोग होंगे जो अभी झगड़ रहे हैं लेकिन इस काम में बड़ी खामियां और पेचीदगियां भी हैं. मसलन, आजादी के बाद से अब तक का रिकौर्ड खंगाला जाएगा कि कब कौन सी जमीन किस के नाम और कहां दर्ज थी, दर्ज थी भी कि नहीं.

बंटवारा विवाद से परे देखें तो यह बेवजह की कवायद है. जो लोग नवाबों और राजाओं की लावारिस जमीनों पर सालों से रह रहे हैं उन्हें अब बेदखल करना या परेशान करना उन के साथ ज्यादती होगी. नवाबी काल में जो जमीन किसी की नहीं होती थी वह स्वत: ही नवाब की हो जाती थी. यही अब लोकतंत्र में हो रहा है. तो दोनों में फर्क क्या कि जो जमीन किसी की नहीं वह सरकारी हो जाती रही है.

बहरहाल, मामला उलझता दिख रहा है. ऐसे में पेशियां होती रहेंगी और किसी के हाथ कुछ न लगेगा. नवाब खानदान के सभी सदस्य काफी रईस हैं. सभी बंटवारे में अपनेअपने स्वार्थ और अहं अड़ा रहे हैं सिवा शर्मिला टैगोर के, जिन्हें अपनी कोशिश पर पानी फिरते देख, मायूस हो कर, खाली हाथ जाना पड़ा. उन के बेटे सैफ अली खान के पास भी करोड़ों की जायदाद है और बहू करीना कपूर खान तो अरबों की मालकिन हैं ही.

फिर क्या होगा, यह सवाल अब दिलचस्प होता जा रहा है जिस का सार यह है कि अब अगली पीढ़ी भी यह मुकदमा लड़ेगी और नवाब खानदान के मुंहलगे लोग मलाई चाटेंगे. इन खुशामदियों की हर मुमकिन कोशिश यह रहती हैकि बंटवारा न हो. अगर हुआ तो उन्हें बैठेबिठाए की खीरपूरी मिलनी बंद हो जाएगी.

भोपाल रियासत की 1 हजार करोड़ रुपए की जायदाद पर दर्जनभर मुकदमे विभिन्न अदालतों में चल रहे हैं. बेगम साजिदा सुल्तान की मौत के 20 साल बाद भी जायदाद का बंटवारा नहीं हो सका है. अब इकलौती तरकीब मंसूर अली खान के वारिसों और बहनों सालेहा व सबीहा के बीच यह बची है कि वे एक बार फिर अदालत के बाहर समझौता करें और एकसाथ अदालत में पेश हो कर समझौते पर कानूनी ठप्पा लगवाएं. वरना जैसा होता है कि तीसरी पीढ़ी के बीच बैर बेवजह बढ़ेगा जिस से किसी को कोई फायदा नहीं. पर ऐसा तभी मुमकिन होगा जब ये ‘नवाब’ अपनी ठसक छोड़ते हुए जायदाद की कीमत और अहमियत समझें.  इस बाबत उन्हें भड़काने वाले और गुमराह करने वालों की कमी नहीं, मगर समझाने वालों का जरूर टोटा है.

इस से साबित यह भी होता है कि पैतृक संपत्ति का बंटवारा अगर वक्त रहते न हो तो रिश्तों में खटास तो डालता ही है, साथ ही, बेवजह अदालतों के भी चक्कर कटवाता है जिस से किसी को फायदा नहीं होता.

यह है जायदाद

भोपाल नवाब की सही जायदाद का अंदाजा तो किसी को नहीं पर इस की देखरेख के लिए बनी एजेंसी औकाफ ए शाही, जिस की मुखिया इन दिनों मंसूर अली खान और शर्मिला टैगोर की बेटी सोहा अली खान हैं, के मुताबिक फ्लैग स्टाफ हाउस के अलावा नवाब की कोई 400 एकड़ जमीन भोपाल में है.

भोपाल के नजदीक रायसेन की दरगाह भी नवाब की है. और उस से लगी जमीन भी नवाब की है. इस के अलावा पुराने भोपाल के पौश इलाके भारत टाकीज के सामने की बेशकीमती 4 एकड़ जमीन भी नवाब की है. सीहोर में भी नवाब की जमीनें हैं और भोपाल से ही सटे इसलाम नगर में भी हैं. अंदाजा है कि सोनेचांदी का बंटवारा 16 अप्रैल, 2014 में शर्मिला टैगोर और मंसूर अली खान की बहनों के बीच रजामंदी से हो गया है.

भोपाल की जमीन में से अधिकांश को सरकार अधिगृहीत कर चुकी है पर उस का मुआवजा अभी तक नहीं मिला है.  इस बाबत भी नवाब के वारिस कोई पहल नहीं कर रहे. दूसरी तरफ, राज्य सरकार भी यह सोचती हुई खामोश है कि वह मुआवजा किसकिस को दे, पहले नवाब खानदान बंटवारा तो कर ले. यानी जमीन अधिग्रहण के वक्त विवाद नहीं देखे गए थे पर मुआवजा देने के नाम पर देखे जा रहे हैं. इस की वजह नवाब के वारिसों में फूट होना ही है.

बदायूं बलात्कार कांड : धूमिल होती देश की अस्मत

भारत का शुमार विश्व के सब से तेजी से विकसित होने वाले देशों में है. ऊंची इमारतें, सड़कें और सड़क पर दौड़ती महंगी गाडि़यां ही विकास की निशानी नहीं हैं, विकास का सही अर्थ है समाज के हर तबके का विकास हो, उस का सम्मान हो और हर तबके की पूरी सुरक्षा हो.

देश के एक सूबे उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के कटरा सआदतगंज में घटी घटना देश के चेहरे से विकास के मुखौटे को नोच कर अलग फेंक देती है. इस गांव में रहने वाली 2 नाबालिग लड़कियों के साथ गैंगरेप कर के उन का गला दबा कर पेड़ पर टांग दिया जाता है. पूरे मसले पर जिस तरह से जातीयता खुल कर सामने आई उस से साफ पता चलता है कि रूढि़यों और धार्मिक आडंबरों में फंसा यह देश आज भी अनपढ़ ही है.

पुराने धार्मिक ग्रंथों में बलात्कार या धोखे से संबंध बनाने की घटनाओं को देखें तो दोष औरत को ही दिया जाता था. अहल्या और गौतम ऋषि की कहानी कुछ ऐसी ही है. इंद्र ने अहल्या के पति गौतम ऋषि का छद्म रूप धर अहल्या कोधोखे में रख कर उस के साथ अनैतिक संबंध बनाए. यह बात जब अहल्या के पति गौतम ऋषि को पता चली तो उन्होंने सारा दोष अहल्या के मत्थे ही मढ़ दिया. उस को श्राप दे कर पत्थर की मूर्ति बना दिया. आज भी बलात्कार की शिकार महिला को ही दोषी माना जाता है. जबकि बलात्कार करने में पूरा दोष पुरुष का होता है. लिहाजा, दोष औरत के सिर मढ़ने की प्रवृत्ति के चलते बहुत सारी औरतें सचाई नहीं बतातीं. औरतों के खिलाफ अपराध करने वालों के हौसले बढ़ते हैं.

बदायूं की घटना में अपराध करने वालों का हौसला इसीलिए बढ़ा क्योंकि औरतें लंबे समय से वहां इस तरह के उत्पीड़न झेलती रही हैं.

ऐसी घटनाओं से देश की इज्जत पूरे विश्व के सामने धूल में मिल जाती है. बदायूं की घटना पर संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने कहा कि भारतीय समाज को ‘लड़के तो लड़के हैं’ वाली सोच छोड़ देनी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने भारत को महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के मामलों में नाइजीरिया और पाकिस्तान के बराबर ला खड़ा किया है.

कुछ दिन पहले समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने मुंबई बलात्कार कांड को ले कर चुनावी भाषण में कहा था, ‘लड़के तो लड़के हैं. छोटीमोटी गलतियां हो जाती हैं. इस का मतलब यह नहीं कि उन को फांसी की सजा दी जाए.’ संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव ने इस बयान को सामने रखते हुए कहा कि देश के विकास में आधी आबादी का प्रमुख हाथ होता है. ऐसे में उस को नजरअंदाज कर के आगे नहीं बढ़ा जा सक ता है. 

उत्तर प्रदेश एसटीएफ यानी स्पैशल टास्क फोर्स के आईजी आशीष गुप्ता ने कहा, ‘‘उत्तर प्रदेश में दुराचार की रोज 10 घटनाएं घट रही हैं. जनसंख्या के हिसाब से देखें तो यह संख्या कम है.’’ आशीष गुप्ता ने दुराचार की सामाजिक वजहों पर चर्चा करते हुए आगे कहा कि ऐसे मामलों में 60 से 65 फीसदी घटनाएं शौच जाते समय होती हैं. गांव के घरों में शौचालय का न होना एक बड़ी परेशानी है. आशीष गुप्ता की यह बात सच हो सकती है. शर्म की बात यह है कि आजादी के इतने दिन बीत जाने के बाद भी गांव में घरों में शौचालय बनाने को प्रमुखता नहीं दी गई. जब देश में ऐसे हालात हों तो उसे विकसित राष्ट्र की श्रेणी में कैसे रखा जा सकता है?

उत्तर प्रदेश में पिछले 20 सालों से ज्यादातर बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी की ही सरकारें रही हैं जो दलित और पिछड़ी जातियों की बेहतरी का दावा करती हैं. इस के बाद भी इन जातियों की हालत क्या है, यह बदायूं की घटना में साफ दिखाई देती है. इन सरकारों ने दलित और पिछड़ों को शौचालय तक देने लायक काम नहीं किया. 10 हजार की आबादी वाले कटरा सआदतगंजके एक भी घर में शौचालय नहीं है.2 लड़कियों के साथ बलात्कार और हत्या के बाद अब इस गांव में शौचालय बनाने की मुहिम चल पड़ी है. आग लगने पर कुआं खोदने वाले ऐसे काम प्रशासन पहले भी करता रहा है.  

जाति पर सफाई

बदायूं से 25 किलोमीटर दूर कटरा सआदतगंज गांव उसहैत थाने के अंतर्गत आता है. यहां की ज्यादातर आबादी दलित, पिछड़ी, अनुसूचित जनजाति की है. यहां की रहने वाली लड़कियां स्कूल कम ही जाती हैं. इस की सब से बड़ी वजह यह है कि यहां लड़कियां या औरतें पूरी तरह से अपने को असुरक्षित महसूस करती हैं. अकेली किसी लड़की या औरत का, रात तो क्या दिन में भी, बाहर निकलना खतरे से खाली नहीं होता. गांव के आदमी इतने दबंग हैं कि राह चलती औरत पर किसी भी तरह की टिप्पणी कर देते हैं. औरत पर संबंध बनाने के लिए तरहतरह के दबाव डाले जाते हैं. औरतों को जबरन उठा लिया जाता है और 2-3 दिनों बाद छोड़ दिया जाता है. खेत में काम करने गई औरत के साथ जोरजबरदस्ती किया जाना आम बात है. दबंगों के डर से औरतें थाना पुलिस में शिकायत नहीं करतीं. अगर कोई औरत ऐसा करे भी तो पुलिस उस की सुनती नहीं है. पुलिस कई बार तो पीडि़ता को ही मुकदमे में फंसा देती है. ऐसे में दबंगों के हौसले बढ़ते जा रहे हैं.

कटरा सआदतगंज गांव में पैदा हुई रानी (बदला हुआ नाम) की मां का देहांत 3 साल पहले हो चुका था. पिता ने दूसरी शादी कर ली थी. रानी की दादी उस का पालनपोषण कर रही थी. रानी स्कूल पढ़ने जाती थी. पढ़ने और घर के कामकाज में होशियार होने के कारण उस की सौतेली मां भी उस को पसंद करने लगी थी. रानी सरस्वती ज्ञान मंदिर में पढ़ने जाती थी. उस की चचेरी बहन भी उसी के साथ पढ़ने जाती थी.

रानी के पिता किसान हैं. रानी खूब पढ़ कर अपने परिवार का सहारा बनना चाहती थी. उस के पिता उसे बेटी से ज्यादा बेटा मानते थे. उन को लगता था कि बड़ी हो कर वह उन का सहारा बनेगी. जब घर के लोग खेतों में काम करने के लिए चले जाते तो वह घर में खाना बनाती, सब के कपड़े धोती और पानी भरती थी. इस के बाद भी वह अपनी पढ़ाई में होशियार थी. 

 27 मई, 2014 की शाम बुधवार के दिन रानी अपनी चचेरी बहन के साथ शौच के लिए घर से बाहर गई. 15 साल की रानी की बहन उस से केवल 1 साल छोटी (14 साल की) थी. देर शाम तक दोनों वापस घर नहीं आईं तो रानी की सौतेली मां उस के पिता के साथ गांव में उन को ढूंढ़ने के लिए निकली. दोनों बेटियां नहीं मिलीं तो ये लोग थाने गए. पुलिस ने उन को वापस भगा दिया. पुलिस ने कहा कि 2 घंटे के बाद आना. रोतेकलपते उस परिवार की रात बीत गई. अगले दिन सुबह ये लोग पुलिस के पास गए. पुलिस के रूखे व्यवहार को देखते ये लोग फरियाद करने के लिए बदायूं जाने की तैयारी में लग गए. इस बीच, पुलिस ने गाली देते हुए कहा, ‘जाओ देखो, किसी पेड़ पर लटकी मिल जाएंगी दोनों’.

उधर, गांव की एक औरत दूध लेने के लिए जा रही थी तो गांव के बाहर आमों के बाग में आम के एक पेड़ पर दोनों लड़कियों को लटकते देखा. वह भाग कर आती है और गांव में इस बारे में बताती है. पुलिस मौके पर पहुंच कर मामले को रफादफा करने की कोशिश करती है लेकिन गांव के लोग पुलिस को पेड़ से लाश उतारने नहीं देते हैं.

हत्या और बलात्कार की शिकार ये लड़कियां ओबीसी यानी अति पिछड़ी जातियों की शाक्य बिरादरी में आती थीं. यह बिरादरी सामाजिक और आर्थिक हालात में दलित जातियों जैसी ही होती है. कमजोर जाति की होने के कारण पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया. घटना की जानकारी जब बदायूं से बाहर निकल कर आती है तो पूरे समाज में गुस्सा फैल जाता है. राजनीतिक दल भी सक्रिय हो जाते हैं. बसपा प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के बदायूं जाने के बाद दलित उत्पीड़न की बात सामने आती है. केंद्र सरकार इस बात पर आपत्ति जाहिर करती है कि मुकदमे में दलित उत्पीड़न की धारा को क्यों शामिल नहीं किया गया? प्रदेश सरकार ने तब बताया कि हादसे की शिकार लड़कियां दलित नहीं, ओबीसी जाति की हैं. 

पुलिसिया करतूत का खुलासा

पुलिस ने गुनाहगारों के साथ मिल कर न केवल गुनाह को अंजाम दिया बल्कि अपराध को छिपाने का भी काम किया. इस को ले कर प्रदेश की पुलिस कठघरे में है. बदायूं की इस घटना ने दिल्ली में हुए निर्भया कांड की याद दिला दी. केवल देशभर के मीडिया ने ही इस घटना को प्रमुखता से नहीं छापा बल्कि  बीबीसी, न्यूयार्क टाइम्स और डेलीमेल जैसे बड़े विदेशीमीडिया ने इस घटना को प्रमुखता से जगह दी. हर घटना की तरह सत्तापक्ष में बैठी अखिलेश सरकार ने दबाव में आ कर पुलिस के अफसरों को इधरउधर करना शुरू किया. बदायूं कोई ऐसावैसा जिला भी नहीं है. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव यहां से सांसद चुने गए. लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को जो 5 सीटें मिली हैं उन में बदायूं भी एक है. इस के बाद भी यहां के हालात ऐसे हैं.

बदायूं के कटरी क्षेत्र में गुंडई, दबंगई और बदमाशों का बोलबाला है. यहां कभी अपहरण एक उद्योग की तरह चलता था. यहां गंगा और रामगंगा नदी की कटरी में 9 ऐसे थाने हैं जहां पर अपराध का बोलबाला है. कटरा सआदतगंज कांड के बाद यह क्षेत्र सब की नजर में आ गया है. समाजवादी पार्टी के लिए बदायूं सब से प्रमुख जिला है. इस वजह से जिले के22 थानों में से 11 थानों में यादव बिरादरी के थानेदार तैनात हैं. कटरी क्षेत्र में आने वाले 9 थानों में से 6 में एक ही जाति के पुलिसदारोगा तैनात हैं. यहां पर घटना के समय गंगा सिंह यादव तैनात थे. अब उन की जगह पर विजय गौतम को तैनात किया गया है. 

?पूर्व आईपीएस अधिकारी और दलित चिंतक एस आर दारापुरी कहते हैं, ‘‘गांव में आज भी सामंती सोच कायम है. पुराने सामंतों की जगह नए सामंत पैदा हो चुके हैं जो पुरानी व्यवस्था को अपने प्रभाव से चलाना चाहते हैं. यही वजह है कि गांवों में घटने वाली ऐसी घटनाओं में दलित समाज और कमजोर तबके की औरतों को निशाना बनाया जाता है. पुलिस जाति और प्रभाव देख कर काम करती है. इस के लिए पुलिस का जातिकरण और राजनीतिकरण दोनों ही जिम्मेदार हैं. थाने पर पुलिस का व्यवहार सभी तबकों के लिए समान नहीं है. शिकायत दर्ज करने से पहले उस की जाति को पूछा जाना इस बात का प्रमाण है कि कमजोर तबके के साथ जातिगत व्यवहार किया जाता है. पुलिस को और अधिक संवेदनशील बनाने की जरूरत है. इस के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा बताए गए पुलिस सुधारों को लागू करने की जरूरत है.’’

कैसे बदलेंगे हालात

वास्तविकता यह है कि समाज में आज भी कमजोर तबके  के हालात नहीं बदले हैं. उस की बहुओं और बेटियों को अपनी जागीर समझने कीकोशिश की जाती है. बदायूं की दोनों लड़कियां जाति से पिछड़ी जरूर थीं पर उन के हालात दलित जैसे ही थे. इसी कारण पुलिस ने समय पर उन की बात नहीं सुनी. अखिलेश सरकार मसले को समझे बगैर जिस तरह के कदम उठा रही है उस से किसी तरह के सामाजिक बदलाव की उम्मीद नजर नहीं आ रही. और जब तक सामाजिक बदलाव नहीं होगा, ऐसी घटनाओं से देश का सिर शर्म से झुकता रहेगा.

कर्मठता की अहमियत

कर्मठता, परिश्रम, उत्साह, साहस प्रकृति में चारों ओर बिखरे हैं. हर जीव या जीवित वस्तु अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अद्भुत कर्मठता व साहस दिखाती है. सैकड़ों किस्म की तितलियों के रंग आसपास के माहौल जैसे होते हैं ताकि वे उन में छिप कर शत्रु से बच सकें. पेड़पौधे धूप पाने के लिए टेढ़ेसीधे बढ़ते हैं और पानी व मिनरल पाने के लिए अपनी जड़ों को नीचे और नीचे ले जाते हैं. प्रकृति में जो भी जीवित है वह संघर्ष करता रहता है.

यही मानव के साथ है. भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने 2014 के चुनावों में साबित कर दिया कि एक ऐसी विचारधारा, जिस के अनुयायी जनता के मात्र 10-12 प्रतिशत हैं, पर आधारित होने पर भी वे कर्मठता से, परिश्रम से, एकजुटता से, प्रतिबद्धता से 31 प्रतिशत वोट पा कर जीत सकते हैं.

जब यूनानी, हूण, शाक, फारसी, मुगल, अंगरेज, पुर्तगाली, फ्रांसीसी भारत आए थे, उन की तादाद मुट्ठी भर थी. लेकिन अपनी कर्मठता से, अपनी गहरी सोच से, प्रकृति के गुणों से सीख कर उन्होंने न केवल भारत में पैर जमाए, यहां राज भी किया. यहां के बहुसंख्यक लोग, जिन के पास न साधनों की कमी थी, न हथियारों की, इन लोगों के हाथों शिकस्त खाते रहे क्योंकि वे कर्मठ न थे. वे प्रकृति की दया पर जीना चाहते थे. कांगे्रस ने गांधी के नेतृत्व में उस समय की सक्षम अंगरेज सरकार के सामने कर्मठता की राह अपनाई और बिना हथियारों के ही उन्हें देश से निकल जाने को मजबूर कर दिया. उस के बाद कांगे्रस का रंगरूप बदलने लगा. उस ने ‘जो मिल गया उस पर मौज करो’ की संस्कृति अपना ली. न देश के लिए कुछ करना, न अपने सिद्धांतों के लिए. नतीजा यह हुआ कि 1967 तक वह लड़खड़ाने लगी.

बीचबीच में कर्मठ नेता आए तबतब वह संभली भी पर इस बार ज्यादा कर्मठ, परिश्रमी, उत्साही लोगों ने उस को ऐसी पटकनी दी कि शायद वह कभी न उठ सके. जीवन के हर क्षेत्र में ऐसा होता है. कोई भी अपनी कर्मठता को नहीं छोड़ सकता. अगर छोड़ेगा तो शिकस्त खाएगा. प्रकृति का नियम है कि सदा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते रहो या फिर गुलामी करो. यदि सफल बनना है तो कर्मठता कभी न छोड़ो. अगर सुरक्षित भविष्य चाहिए तो होश संभालते ही कर्मठता का पाठ सीखो. अगर 2 घंटे पढ़ने से काम चल जाता है तो भी 6 घंटे पढ़ो. घर के कामों को बोझ न समझो, उन्हें कर्मठता की टे्रनिंग समझो. घर को पेंट करने के काम को चुनौती समझ कर हाथ में लो. मां या पिता का हाथ बंटा कर अपने को हीन नहीं, श्रेष्ठ समझो. जो करोगे वह सिखाएगा, आने वाले कल के लिए तैयार करेगा.

कर्मठता इंसान को स्वस्थ बनाती है. चेहरे पर आत्मविश्वास की छाप छोड़ती है. कर्मठ ही कक्षा में सब से ज्यादा पूछा जाता है. दूसरों के काम करना अपनी कर्मठता की परीक्षा लेना है. पेड़ अपने किसी लक्ष्य को ले कर ऊंचा नहीं होता. उसे अपने को बचाना है, दूसरों के मुकाबले ज्यादा टिकना है इसलिए और ऊंचा होता है और जड़ें फैलाता है. इसी तरह अपने को ऊंचा करना, अपनी पहुंच फैलाना हरेक की जरूरत है.

जो मातापिता की दया पर जीना चाहते हैं उन के कुछ साल तो सही गुजरते हैं पर बाद में दशकों उन्हें पिसना पड़ता है. अगर अभाव न भी हो तो यह साफ होता है कि उन के वश में कुछ करना नहीं है. वे आत्ममुग्ध हो सकते हैं पर आत्मविश्वासी नहीं. वे बड़बोले होते हैं, कर्मठ नहीं. आप को खुद तय करना है कि क्या करना है.

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