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आपके पत्र

सरित प्रवाह, सितंबर (प्रथम) 2013

‘सीमा पर हमला’ के तहत आप के विचार पढ़े तो याद आया कि पाकिस्तान ने अपने संविधान में संशोधन कर अपने प्रधानमंत्री को सेना का ‘सुप्रीम कमांडर’ घोषित कर उन को ‘असीमित पावर’ दी थी लेकिन जिस तरह पाक सेना बारबार एलओसी पर भारतीय सैनिकों का खून बहा कर, अंतर्राष्ट्रीय कायदेकानूनों का उल्लंघन कर रही है और पाक पीएम मेमने की तरह मरी सी आवाज में शांति, भाईचारे व वार्त्ता का राग अलाप रहे हैं वह यह कड़वा सच ही उजागर करती है कि इस्लामाबाद की गद्दी पर चाहे कोई भी पीएम बन बैठे, राज वहां की सेना ही करेगी.

दुख है तो बस इस बात का कि हमारे प्रशासक आतंकवाद से ग्रस्त पड़ोसी की ही मानो हां में हां मिलाते हुए उस के जैसी राह पकड़ लेते हैं. यह हमारे राष्ट्रीय नेतृत्व की अक्षमता, कायरता व कमजोरी को ही प्रमाणित करता है.

ताराचंद देव रैगर, श्रीनिवासपुरी (न.दि.)

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‘सीमा पर हमला’ शीर्षक से प्रकाशित आप की संपादकीय टिप्पणी पढ़ी. अच्छी लगी. सीमा के प्रहरी को सलाम. भारतवर्ष के प्रहरियों की हौसलाअफजाई कर के आप ने सभी देशवासियों का उत्साहवर्धन किया है. पाकिस्तान के जवानों द्वारा हमारे प्रहरियों को धोखा दे कर मारना घोर निंदनीय है. हमारी वर्तमान सरकार की नीयत में खोट होने के चलते हमारी विदेश नीति धराशायी होती प्रतीत हो रही है.

डा. जसवंत सिंह, कटवारिया सराय (न.दि.)

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आप की टिप्पणी ‘सीमा पर हमला’ पढ़ी. आप ने सच कहा, जंग खुद एक मसला है, हल नहीं. पाकिस्तान 66 सालों से भारत के खिलाफ लगातार विषवमन कर रहा है. समझौता ऐक्सप्रैस चले, दोनों देशों के गायक, क्रिकेटर, फिल्मकार, साहित्यकार कितना ही संवाद क्यों न साधें, वहां के हुक्मरानों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उन की कुरसी की सलामती के लिए कश्मीर मुद्दे को बनाए रखना एकमात्र शर्त है. उन का एक ही एजेंडा है आतंकियों को शह देना. पाक कभी न सुधरने वाली शै है.पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बेशक जर्जर है, वह युद्ध झेल नहीं सकता पर भारत को उकसाने की कार्यवाही लगातार जारी रखे हुए है. दरअसल, अमेरिका, सार्क देशों पर निगाह रखने के लिए पाकिस्तान को अपना बेस कैंप बनाना चाहता है. अमेरिका संयुक्त राष्ट्र संघ को अपने पांव की जूती समझता है. वह उस को उकसाना और सहलाना दोनों काम साथसाथ करता है.

आप ने सही कहा है कि कूटनीतिक स्तर पर ही कश्मीर मसले के समाधान की पहल होनी चाहिए.

इंदिरा किसलय, नागपुर (महा.)

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संपादकीय टिप्पणी ‘सीमा पर हमला’ में पाकिस्तानियों द्वारा की गई भारतीय जवानों की हत्या पर जो आक्रोश प्रकट किया है वह भारत की जनता का भी है. हमला चाहे सैनिकों द्वारा किया जाए या घुसपैठियों द्वारा, पाक सेना का हाथ अवश्य होता है. निश्चय ही दोनों देश युद्ध लड़ने की हालत में नहीं हैं. कितना अच्छा होता कि पाकिस्तान लोकतंत्र के साथ अपने देश को विकास के मार्ग पर ले जाता पर उस की मति मारी गई है. वह हमेशा भारत के साथ युद्ध छेड़ने की फिराक में रहता है. भारत से दुश्मनी बनाए रखने और अमेरिका से पैसे ऐंठने को वह बड़ी राजनीति समझता रहा है.

पाकिस्तान न तो खुद चैन से जीएगा और न ही पड़ोसियों को चैन से जीने देगा. इसलिए, अच्छा यही होगा कि भारत इन हमलों का प्रतिकार तो करे पर युद्ध में उलझने से बचे.

माताचरण पासी, वाराणसी (उ.प्र.)    

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संपादकीय टिप्पणी ‘सीमा पर हमला’ में आप के विचार पढ़े. हर बड़ी घटना के बाद सरकार कहती है कि सीमाओं की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाएंगे, हर जरूरी कदम उठाए जाएंगे और सेना सीमा की रक्षा करने में सक्षम है. वहीं सेना कहती है कि बस, सरकार के आदेश का इंतजार है. यही हमारी कमजोरी समझी जाने लगी है. ऐसी कमजोरी कि सीमा पर हमारे जवानों को मारा जा रहा है.समय की नजाकत को देखते हुए चीन व पाकिस्तान को उन्हीं की भाषा में जवाब देने और बंगलादेश, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, म्यांमार सीमा पर चौकसी कड़ी करने का आदेश देने में सरकार को हिचक नहीं होनी चाहिए. जम्मू के पुंछ में अघोषित पाकिस्तानी हमले में शहीद 5 जवानों में से 1 बिहरा (बिहार) के विजय कुमार राय की पत्नी पुष्पा देवी द्वारा ‘मुआवजा नहीं जवाबी कार्यवाही चाहिए’ कहते हुए मुआवजा लौटा देना गौरतलब है. यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि 2014 तक अफगानिस्तान से नाटो सैनिकों की वापसी के बाद हमारी चुनौतियां और बढ़ेंगी.

कृष्णकांत तिवारी, भोजपुर (बिहार)

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आप की टिप्पणी ‘किसानों की जमीन’ और ‘पिटाई समस्या का हल नहीं’ पढ़ीं. आप के विचार समाज के लोगों को जागरूक करने की दिशा में बेहद कारगर हैं. यह पीड़ाजनक बात है कि सरकारें कानून का खौफ खाए बिना किसानों की जमीनों की छीनाझपटी कर अरबों रुपयों का बंदरबांट कर रही हैं. बेचारे किसान ठगे जा रहे हैं. यह तो भला हो न्यायालयों का, ‘कानून को ठेंगा’ दिखाने वालों को वे यह बता रहे हैं कि कानून से बड़ा कोई नहीं है चाहे वह आम आदमी हो या राजनेता.

प्रदीप गुप्ता, बिलासपुर (हि.प्र.)

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भूमि की बंदरबांट

सितंबर (प्रथम) अंक में प्रकाशित ‘भूमि अर्जन विधेयक 2011 : कानून के सहारे हक’ लेख में देश के आजाद होने से अब तक जिस प्रकार से देश के नेताओं, नौकरशाहों, भूमाफियाओं, उद्योगपतियों, धार्मिक संतों द्वारा भूमि पर कब्जा करने का उल्लेख किया गया है वह सराहनीय है. मैं भूमि अर्जन विधेयक 2011 के संबंध में देश की लोकप्रिय पत्रिका सरिता के माध्यम से भारत सरकार लोकसभा, राज्यसभा के सदस्यों से सुझावों के रूप में कहना चाहूंगा कि कहने को तो भारत कृषि प्रधान देश है और इस की आबादी 130 करोड़ है. देश की इस आबादी को अन्न, फल, सब्जी व खाद्य पदार्थ की जितनी जरूरत है उस के मुताबिक कृषि की उतनी उपजाऊ जमीन को सुरक्षित रखा जाए ताकि देश को जमीन के अभाव में अनाज व खाद्य पदार्थ विदेशों से आयात न करना पड़े.

देश के उद्योगपतियों, राजनेताओं व नौकरशाहों और तथाकथित संतों ने देश की कृषि भूमि पर फार्म हाउस व धार्मिक आश्रमों के नाम पर जितनी उपजाऊ जमीन पर कब्जा कर रखा है उसे वापस लेने का प्रस्ताव भी विधेयक में शामिल किया जाए.

देश के महानगरों, नगरों व कसबों में भूमाफियों ने गरीब काश्तकारों से कौड़ी के भाव में काफी कृषिभूमि ले कर कब्जा कर रखा है, वे बाद में आवास एवं व्यापारिक प्रतिष्ठानों को बढ़े हुए दामों पर बेचेंगे. इस तरह की सभी जमीनें सरकार वापस लेने हेतु भूमि अर्जन विधेयक में प्रस्ताव रखे.

जगदीश प्रसाद पालड़ी, जयपुर (राज.)

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राजनीति का काला चेहरा

सितंबर (प्रथम) अंक में प्रकाशित लेख ‘लोकतंत्र में लूटतंत्र की ताकत’ में काफी निर्भीकता से रेतमाफिया व सत्ता के गठबंधन का कच्चा चिट्ठा प्रस्तुत किया गया है. चुनावों में बेशुमार चंदा देने वालों के गैरकानूनी गोरखधंधों को प्रश्रय देना सियासत का चरित्र बन गया है. सियासतदानों के गैरकानूनी रास्ते में अडं़गा डालने वाले कर्मनिष्ठ व ईमानदार अधिकारियों को प्रताडि़त किया जाता है.

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा एसडीएम दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन व उन्हें क्लीन चिट देने वाले डीएम रविकांत सिंह के स्थानांतरण की कार्यवाही निर्लज्जता, स्वार्थपरता और तानाशाही की पराकाष्ठा है. राजस्थान में एसपी पंकज चौधरी, हरियाणा में आईएएस अशोक खेमका, गुजरात में आईपीएस अशोक भट्टर का भी कुछ ऐसा ही हश्र हुआ है. क्या इस प्रकार की कार्यवाहियों से साहसी व कर्तव्यपरायण अफसर कुंठित व हतोत्साहित नहीं होते हैं?

अर्चना विकास खंडेलवाल, जबलपुर (म.प्र.)

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सितंबर (प्रथम) अंक पढ़ा. ‘लैपटौप का लौलीपौप’ लेख में दर्शाया गया है कि यह सपा सरकार की एक लुभावनी चाल है, बिलकुल सही है. यह युवा वोटरों को लुभाने की तकनीक मात्र है. देखा जाए तो अभी हमारे देश की शैक्षणिक प्रणाली उतनी विकसित नहीं हुई है कि छात्रों को लैपटौप व टैबलेट पर आश्रित होना पड़े. मीडिया के बाद यदि कोई छात्र तकनीकी क्षेत्रों में अपना कैरियर बनाना भी चाहता है तो इस के लिए वह जिस संस्थान में नामांकन करवाता है वहां आवश्यकतानुसार लैपटौप या टैबलेट दिए जाते हैं, जिस की कीमत उन की फीस में ही संलग्न होती है.गौरतलब है कि विश्व में जनसंख्या जिस प्रकार बढ़ रही है, भविष्य में खाद्यान्न का संकट एक बहुत बड़ी समस्या बनने वाली है. ऐसे में लैपटौप बांट कर ग्रामीण युवकों का शहरीकरण करना क्या अनुचित नहीं है? क्या लैपटौप चलाने वाले युवकयुवती अच्छे कृषक बन पाएंगे? भविष्य की आवश्यकता को देखते हुए सरकार को चाहिए कि वह युवकों को कृषि क्षेत्र की ओर प्रोत्साहित करे. लैपटौप के बदले में कृषियंत्र या कृषि संबंधी जानकारी दे ताकि भविष्य में खाद्यान्न संकट की समस्या उत्पन्न न हो. सरकार को यह सोचना चाहिए कि डाक्टर या इंजीनियरों की संख्या दोचार कम भी हो, तो भी कोई बात नहीं परंतु किसानों की कमी मनुष्य ही नहीं बल्कि  जीवजंतुओं की भी मौत का कारण बनती है.

आरती प्रियदर्शिनी, गोरखपुर (उ.प्र.)

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खुदगर्जी से कायम नाजायज रिश्ते

सितंबर (प्रथम) ‘ब्लैकमेलिंग का फसाद यौन शोषण’ पढ़ कर लगा जैसे वर्तमान समय में सैक्स को महत्त्वाकांक्षा की सीढ़ी और इस के पूरा न होने पर ब्लैकमेलिंग का हथियार बना दिया गया है. राजनीतिज्ञों के साथ सैक्स स्कैंडल ज्यादा जुड़े रहे हैं. इस का अहम कारण है राजनीतिज्ञों की मानसिकता कि जब वे सत्ता पर काबिज होते हैं तो उन्हें याद ही नहीं रहता कि उन का ध्येय देशसेवा है.

राजकुमार का 3 वर्ष से यौन शोषण होता रहा, फिर भी वह चुप था. उस ने राघवजी को अपने लक्ष्यप्राप्ति का साधन बनाया. दंड का भागी तो यह लड़का भी है. बेहद दुखद स्थिति है कि हम ऐसे राजनेताओं को पाल रहे हैं जिन का चरित्र ही खराब है. नारायण दत्त तिवारी का चरित्र तो उस तसवीर के साथ जगजाहिर हो गया था जब राजभवन में वे 3 लड़कियों के साथ रंगरेलियां मना रहे थे. लेकिन उज्ज्वला शर्मा जैसी महिलाएं भी कम दोषी नहीं जो कभी तो अपनी उम्मीदों को परवान चढ़ाने के लिए प्रेयसी बनती हैं और कभी यौन शोषण का आरोप लगाती हैं. मधुमिता ने भी यही किया और जान गंवा बैठी. फिलहाल, गोआ में एक राजनेता कई लड़कियों के साथ मौजमस्ती करते हुए पकड़े गए. आखिर कैसे घिनौने प्रतिनिधियों को चुन रहे हैं हम.

सवाल उठता है उन का जो यौन शोषण का आरोप लगाते हैं. आखिर क्यों वे ऐसे आरोप मढ़ते हैं? अभी यौन शोषण और बलात्कार जैसे शब्द भ्रमित करते हैं. तस्लीमा नसरीन ने लेखक सुनील गंगोपाध्याय पर यौन शोषण का आरोप लगाया क्योंकि उन की पुस्तक ‘द्विखंडिता’ पर रोक लगाई गई. लेखिका ने ट्वीट किया, ‘सुनील गंगोपाध्याय ने मेरी किताब पर रोक लगवाई. उन्होंने मेरा और दूसरी महिलाओं का यौन शोषण किया. वे साहित्य अकादमी के अध्यक्ष हैं, यह शर्मनाक है.’

मतलब, यदि पुस्तक हिट होती तो सब जायज था. अभिनेत्री रंजीता ने स्वामी नित्यानंद पर आरोप लगाया कि उन्होंने 40 बार उस का रेप किया.

दरअसल, आज यौन शोषण शब्द तब उभरता है जब कोई महत्त्वाकांक्षा की सीढ़ी से लुढ़कता है. जब स्त्रीपुरुष आपसी सहमति से एकदूसरे से संबंध बनाते हैं तो फिर वहां शोषण जैसा सवाल ही कहां रह जाता है. सच तो यह भी है कि प्राकृतिक यौन तुष्टि केवल पुरुष ही नहीं स्त्री भी करती है और इस के लिए वह तत्पर भी रहती है. इसलिए यौन शोषण जैसा घटिया शब्द बोलना बंद हो. जितना दोष यौन शोषक का है उतना ही शोषित का भी. इसे मजाक न बनाएं.

शशिकला सिंह, सुपौल (बिहार)

मुग्धा की चाहत

फिल्म ‘फैशन’ से अपना कैरियर शुरू करने वाली मुग्धा इस साल तिग्मांशु धूलिया की ‘साहिब बीवी और गैंगस्टर रिटर्न’ के अलावा प्रकाश झा की ‘सत्याग्रह’ में भी दिखीं, पर सिर्फ कैमियो रोल में. फिल्मों के उतारचढ़ाव के बारे में वे कहती हैं, ‘‘हर किसी की जिंदगी में उतारचढ़ाव आते हैं. मेरा काम कड़ी मेहनत करना है और मैं उसे दिल से कर रही हूं.’’

दरअसल, फिल्म इंडस्ट्री में यह माने नहीं रखता कि आप कितने बड़े या कितने छोटे स्टार हैं. आप का अभिनय कैसा है यह तब तय होता है, जब फिल्म रिलीज होती है.             

ऐश करेंगी वापसी

पहले यह खबर आई थी कि ऐश्वर्या राय बच्चन निर्देशक संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘रामलीला’ में आइटम डांस से फिल्मों में रीएंट्री करने वाली हैं. फिर उस खबर का खंडन आया कि ऐश का ऐसा कोई इरादा नहीं है. हां, हिमेश की फिल्म ‘मासूम’ से उन की एंट्री संभव है. हिमेश 1983 में बनी ‘मासूम’ की जोड़ी नसीरुद्दीन शाह और शबाना आजमी की जगह अभिषेक और ऐश को लेना चाहते हैं. यह पुरानी फिल्म ‘मासूम’ की रीमेक होगी. हिमेश ऐश की सुविधा के मुताबिक डेट्स तय करने के लिए तैयार हैं. अगर अभिषेक व ऐश ने फिल्म साइन कर दी तो 2014 के शुरुआती दिनों में इस की शूटिंग शुरू हो जाएगी.

 

अमायरा की गुटरगूं

फिल्म ‘इसक’ से फिल्मों में डेब्यू करने वाली अमायरा दस्तूर रीयल लाइफ में फिल्म ‘इसक’ के कोस्टार प्रतीक बब्बर के साथ हर जगह नजर आ रही हैं. ‘इसक’ के रोमियोजूलियट की लव कैमिस्ट्री धीरेधीरे हकीकत में बदलती नजर आ रही है. हालांकि इश्कविश्क के सवालों पर गोलमाल जवाब देने वाली यह जोड़ी हाल में ही एक फैशन वीक के दौरान रैंप शो में एकसाथ नजर आई. अमायराजी, भले ही आप प्रतीक के इश्क में गिरफ्तार हुई हों या नहीं पर आप को एक बात तो मालूम ही होगी कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते.

 

रब्बा मैं क्या करूं

इस फिल्म को देख कर लगा कि ‘आरजू’, ‘आंखें’, ‘गीत’ जैसी सुपरहिट फिल्में और ‘रामायण’ जैसा लंबा टीवी सीरियल बनाने वाले रामानंद सागर की अगली पीढ़ी ने अपने बापदादाओं का नाम मिट्टी में मिला डाला है. फिल्म के निर्देशक अमृत सागर ने एक फिल्म ‘1971’ बनाई थी.

फिल्म शादी के माहौल पर है जिस में सैक्सी कौमेडी डाली गई है. इस शादी के माहौल में निर्देशक ने एक लवगुरु के फंडों को शामिल किया है. यह लवगुरु है श्रवण (अरशद वारसी). कहने को तो फिल्म का नायक आकाश चोपड़ा है परंतु ज्यादा फुटेज अरशद वारसी को मिली है.

फिल्म की कहानी शुरू होती है साहिल (आकाश चोपड़ा) और स्नेहा (ताहिरा कोचर) के मिलने से. दोनों एकदूसरे को बचपन से जानते हैं. साहिल स्नेहा को प्रपोज करता है. शादी की तैयारियां शुरू हो जाती हैं. साहिल का चचेरा भाई श्रवण (अरशद वारसी) खुद को लवगुरु समझता है. वह अपनी खूबसूरत बीवी (रिया सेन) की आंखों में धूल झोंक कर दूसरी लड़कियों से इश्क करता है. वह साहिल को बीवी को बेवकूफ बनाने की कला सिखाता है. शादी में साहिल का मामा पोपट भाई (परेश रावल) भी आता है. वह भी चालू किस्म का है. बीवी के सामने ही दूसरी औरतों को फ्लर्ट करता है. साहिल का अंकल सूमी (शक्ति कपूर) भी अपनी बीवी को बेवकूफ बना कर ऐयाशी करता है. साहिल को लगता है कि अगर वह श्रवण के बताए रास्ते पर चलेगा तो उस की जिंदगी भी मस्त हो जाएगी. लेकिन लवगुरु के चक्कर में पड़ कर उस की शादी टूटने के कगार पर पहुंचती है तो उसे अक्ल आती है.

मध्यांतर के बाद शक्ति कपूर, टीनू आनंद और परेश रावल की सैक्स कौमेडी डाली गई है. परेश रावल का काम अच्छा है. अरशद वारसी भी जमा है. राज बब्बर ने अपनी दमदार एंट्री दर्ज कराई है. फिल्म का गीतसंग?ीत साधारण है. छायांकन अच्छा है.

वंस अपोन ए टाइम इन मुंबई दोबारा

यह फिल्म 2010 में आई अजय देवगन और इमरान हाशमी की फिल्म ‘वंस अपोन ए टाइम इन मुंबई’ की सीक्वल है. पिछली फिल्म के मुकाबले इस फिल्म की तुलना करें तो निराशा ही हाथ लगेगी. गैंगस्टरों पर बनी फिल्मों में अकसर हिंसा का डोज ज्यादा होता है, लेकिन इस फिल्म में रोमांस है. शायद इसीलिए दर्शकों को ज्यादा मजा नहीं आ पाता.

निर्देशक मिलन लूथरिया ने अपनी इस फिल्म में संवाद अच्छे लिखवाए हैं. उस ने पूरा ध्यान अक्षय कुमार से बुलवाए गए संवादों पर लगाया है. लगता है इस चक्कर में वह कहानी पर ध्यान देना भूल गया है.

सुलतान (अजय देवगन) की मौत के बाद शोएब (अक्षय कुमार) मुंबई पर राज करना चाहता है. उस के अवैध धंधे की जडे़ें खाड़ी देशों तक फैली हैं. असलम (इमरान खान) उस का दायां हाथ है. शोएब ने बचपन से उसे पाला है. एक दिन असलम की जिंदगी में यास्मीन (सोनाक्षी सिन्हा) आती है, जो हीरोइन बनने आई है. शोएब उस पर लट्टू हो जाता है और उसे हीरोइन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ता. लेकिन जब उसे असलम और यास्मीन के इश्क की खबर मिलती है तो वह असलम का दुश्मन बन बैठता है. दोनों के बीच लड़ाई छिड़ जाती है. उधर पुलिस शोएब को पकड़ने के लिए घेराबंदी कर चुकी है. असलम को शोएब की गोली लगती है तो शोएब भी पुलिस की गोलियों से जख्मी हो जाता है. यास्मीन शोएब को खूब भलाबुरा कहती है और कहती है कि उस ने कभी उस से प्यार नहीं किया. यहीं फिल्म का द एंड हो जाता है.

फिल्म की यह कहानी न तो पूरी तरह प्रेम त्रिकोणीय बन पड़ी है, न ही खूनखराबे वाली.फिल्म का निर्देशन साधारण है. संगीत कुछ अच्छा है. एक गीत ‘तैयब वली प्यार का दुश्मन…’ फिल्म ‘अमर अकबर एंथोनी’ से लिया गया है. छायांकन अच्छा है.

 

जंजीर

एक ईमानदार पुलिस इंस्पैक्टर और एक क्रिमिनल खलनायक. 70-80 के दशक में इस तरह के कथानक वाली फिल्मों पर खूब तालियां बजती थीं, पर अब दर्शकों को यह सब नाटकीय लगता है. ‘जंजीर’ 1973 में आई अमिताभ बच्चन और प्राण की फिल्म ‘जंजीर’ का सीक्वल नहीं है, हां, इसे पिछली फिल्म का रीमेक जरूर कह सकते हैं. जब किसी सुपरहिट फिल्म का रीमेक बनता है तो दर्शकों की उस से उम्मीदें बढ़ जाती हैं. पर इस ‘जंजीर’ में ऐसा कुछ नहीं है जो दर्शकों को बांध सके. निर्देशक अपूर्व लखिया ने पिछली सुपरहिट ‘जंजीर’ की पटकथा को काफी तोड़ामरोड़ा है.

कहानी पिछली ‘जंजीर’ जैसी ही है. एसीपी विजय खन्ना (रामचरण) ईमानदार पुलिस इंस्पैक्टर है, जिस के कई ट्रांसफर हो चुके हैं. इस बार उस का ट्रांसफर मुंबई में हुआ है जहां तेजा (प्रकाश राज) पैट्रोल में मिलावट कर हर साल 1 हजार करोड़ रुपए की कमाई करता है. विजय के इलाके में एक व्यक्ति को जिंदा जला दिया जाता है. इस हादसे की एकमात्र गवाह एक एनआरआई युवती माला (प्रियंका चोपड़ा) है. विजय जिंदा जलाने वाले व्यक्ति को पकड़ कर जेल में डाल देता है परंतु अदालत में पेश करने से पहले ही तेजा उसे जेल में ही मरवा देता है. विजय को सस्पैंड कर दिया जाता है. अब विजय को शेरखान (संजय दत्त) की मदद लेनी पड़ती है. पुलिस कमिश्नर विजय को निर्दोष मानते हुए उसे बहाल कर देता है.

इस कहानी में विजय के किरदार को एंग्री यंगमैन दिखाया गया है. यही किरदार पुरानी ‘जंजीर’ में अमिताभ बच्चन ने निभाया था. रामचरण का इस भूमिका में अमिताभ से कोई मुकाबला नहीं है. वह दक्षिण भारत के स्टार चिरंजीवी का बेटा है. बौलीवुड में उस की यह पहली फिल्म है.

प्रियंका चोपड़ा ने ‘पैसा फेंक तमाशा देख’ स्टाइल में ऐक्टिंग की है. शेरखान की भूमिका में संजय दत्त का भला प्राण से क्या मुकाबला. प्रकाश राज गुंडा कम जोकर ज्यादा लगता है. फिल्म की गति तेज रखी गई है. संगीत थोड़ाबहुत अच्छा है. फिल्म में मारधाड़ बहुत है. छायांकन अच्छा है.

शुद्ध देसी रोमांस

यह रोमांस 70-80 के दशक का नहीं है जब युवा एकदूसरे की बांहों में बांहें डाले किसी पार्क या सुनसान जगहों पर जा कर अपने प्यार का इजहार करते थे. बौलीवुड वाले भी प्यार का इजहार कराने के लिए गार्डनों में हीरोहीरोइन को ले जाते थे जहां वे दोनों गाना गाते थे, जैसे ‘बागों में बहार है, कलियों पे निखार है, मुझ को तुम से प्यार है…’ इस फिल्म में दिखाया गया रोमांस एकदम देसी है यानी एकदम तेज वाला फास्ट अट्रैक्शन. लड़के को लड़की मिली, लड़की ने कहा, ‘तुम मुझे किस कर सकते हो?’ लड़के ने झट से अपने होंठ लड़की के होंठों से चिपका दिए. लो, हो गया प्यार. नहींनहीं, यह प्यार नहीं, सिर्फ अट्रैक्शन है. जब मामला शादी तक पहुंचता है तब दोनों भाग निकलते हैं. यही है ‘शुद्ध देसी रोमांस.’ दरअसल, इसे विदेशी रोमांस कहा जाए तो ज्यादा सही होगा.

फिल्म का टाइटल तो ‘शुद्ध देसी रोमांस’ है परंतु इस में बहुत सारे किस सीन हैं और किस करने का तरीका विदेशी है. आज के युवा किस तरह की जिंदगी जीते हैं और उन के प्रपोज करने का तरीका क्या है, फिल्म इस बारे में बताती है.

‘शुद्ध देसी रोमांस’ एक फन फिल्म है जिस के मुख्य किरदार आप को कन्फ्यूज लगेंगे, साथ ही आप को भी कन्फ्यूज करते दिखेंगे और आप उन के कन्फ्यूजन को खुल कर एंजौय करेंगे. हमारेआप के बीच बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं जो हर वक्त कन्फ्यूज रहते हैं. वे प्यार करने की हिम्मत तो जुटा लेते हैं पर शादी के मामले में कन्फ्यूज रहते हैं. जिस से प्यार किया है उस से शादी करें या नहीं, इस बात का फैसला वे नहीं कर पाते. ‘शुद्ध देसी रोमांस’ में कुछ इसी तरह का कन्फ्यूजन है. फिल्म युवाओं के मतलब की है.

इस फिल्म को निर्देशक मनीष शर्मा ने निर्देशित किया है, जिस ने इस से पहले ‘बैंड बाजा बरात’ निर्देशित की थी. उस ने एक सीधीसादी कहानी को नयापन देने की कोशिश की है.

कहानी राजस्थान के जयपुर शहर में रहने वाले नौजवान रघु राम (सुशांत सिंह राजपूत) की है. वैसे है तो वह एक गाइड पर शादियों में किराए का बराती बन कर जाना उस का पार्टटाइम काम है. गोयल साहब (ऋषि कपूर) शादियां कराने का काम करता है. वह रघु की शादी फिक्स कराता है. वह एक युवती गायत्री (परिणीति चोपड़ा) को रघु की बहन बना कर शादी में साथ ले जाता है. बस में बैठेबैठे रघु, गायत्री की ओर आकर्षित हो जाता है. बरात के पहुंचने पर रघु मंडप से भाग खड़ा होता है.

यहीं से शुरू होती है रघु की नई लवस्टोरी. वह गायत्री के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहने लगता है. दोनों शादी का फैसला कर लेते हैं लेकिन ऐन शादी वाले दिन गायत्री मंडप से भाग निकलती है. उसे कन्फ्यूजन है कि रघु के साथ उस की निभ सकेगी या नहीं.

कहानी में एक मोड़ फिर से आता है. एक अन्य शादी में रघु की मुलाकात उसी लड़की तारा (वाणी कपूर) से होती है जिसे वह पहली बार शादी के मंडप में छोड़ कर भागा था. दोनों में नजदीकियां फिर से बढ़ने लगती हैं कि गायत्री फिर से उस की लाइफ में आ जाती है. रघु अब भी गायत्री से शादी करने का फैसला नहीं ले पाता और भाग कर घर आ जाता है, जहां दोनों फिर से रिलेशनशिप में रहने लगते हैं.

इस फिल्म की कहानी, पटकथा, संवाद, गीत जयदीप ने लिखे हैं. उस ने ऐसी कहानी लिखी है जिस में रोमांस तो है ही, किरदार पहले ही फ्रेम में एकदूसरे से प्यार करने लगते हैं. शादी कराने बस में जा रहे रघु और गायत्री का किस सीन यही तो दर्शाता है.

गायत्री और रघु के संवाद काफी फनी लगते हैं और दर्शकों के चेहरों पर मुसकराहट आने लगती है. पूरी फिल्म में हंसी की फुलझडि़यां छूटती रहती हैं. सभी कलाकारों का अभिनय अच्छा है. सुशांत सिंह राजपूत की यह दूसरी फिल्म है. अपनी पहली फिल्म ‘काय पो छे’ में उस ने अपनी प्रतिभा दिखाई थी. इस फिल्म में भी उस के कपड़े पहनने व बोलने का ढंग सब कुछ देसी लगता है.

गोयल साहब की भूमिका में ऋषि कपूर ने कमाल की ऐक्टिंग की है. उस का बतियाना और लोगों को बेवकूफ बनाना दर्शकों को अच्छा लगता है.

परिणीति चोपड़ा इस से पहले ‘इशकजादे’ में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी है. वाणी कपूर ने भी थोड़ाबहुत प्रभावित किया है. फिल्म का निर्देशन मध्यांतर से पहले अच्छा है, लेकिन मध्यांतर के बाद फिल्म निर्देशक के हाथ से फिसलती चली गई है, लगता है किरदारों के साथसाथ निर्देशक खुद भी कन्फ्यूज हो गया है. लेकिन चांस की बात है कि यह कन्फ्यूजन दर्शकों को अच्छा लगने लगता है. फिल्म में दिखाए गए किस सींस को कम किया जा सकता था.

फिल्म का गीतसंगीत सामान्य है. ‘तेरे मेरे बीच क्या है…’ गीत अच्छा बन पड़ा है. अधिकांश फिल्म की शूटिंग जयपुर में की गई है. छायांकन अच्छा है.

 

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