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डैटसन गो

विभिन्न कंपनियों के भिन्नभिन्न मौडल्स की कारों की मौजूदगी के बीच विदेशी कंपनी निसान अपने एक पुराने मौडल को भारतीय रंगढंग दे कर बाजार में पेश करने जा रही है. ‘डैटसन गो’ नाम से आने वाली इस कार के बारे में जानते हैं कुछ विशेष :

जानीमानी कार निर्माता कंपनी निसान एक ऐसे मौडल को पेश करने जा रही है जिसे उस ने लगभग 27 वर्ष पहले बनाना बंद कर दिया था. उस मौडल की उस वक्त अमेरिका में धूम मची थी. जी हां, हम बात कर रहे हैं डैटसन गो की, जिसे भारत, इंडोनेशिया, रूस, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील के बाजारों के लिए नया रूप दिया जा रहा है. डैटसन गो नाम से कार का यह मौडल अगले साल मार्चअप्रैल में सड़कों पर दौड़ता देखा जा सकता है.

कार को मारुती के अल्टो, ऐ-स्टार व एस्टिलो, शेवरले की स्पार्क और हुंडई की सैंट्रो, आई 10 से मुकाबले के लिए बाजार में उतारा जा रहा है. डैटगो में निसान के एक अन्य मौडल माइक्रा की अनेक खूबियां होंगी. मजे की बात यह है कि डैटसन का डैटगो मौडल करीब एक सदी पहले 1914 में भी अमेरिका में खासा मशहूर था. नया मौडल ह्वीलबेस अल्टो के मुकाबले ज्यादा चौड़ा होगा. चौड़ाई और ऊंचाई माइक्रा से कुछ कम होगी पर लंबाई इस से 5 मिमी ज्यादा रखी गई है. कार के बाहरी डिजाइन को सुंदर व आकर्षक बनाया गया है. कुल मिला कर यह कार छोटे परिवार की जरूरतों के अनुरूप होगी. कार में सुरक्षा मानकों का भी पूरापूरा खयाल रखा गया है.

कार की अंदरूनी साजसज्जा की बात करें तो इस में ड्राइवर समेत 5 लोग आसानी से बैठ सकते हैं. गियर और हैंडब्रेक को डैशबोर्ड के साथ फिट किया गया है ताकि गियर बदलते समय ड्राइवर का ध्यान न भटके. आगे की सीट के साथ पर्याप्त जगह रखी गई है ताकि छोटामोटा सामान रखा जा सके. साथ ही, सवारियों को पैर फैलाने के लिए भी पर्याप्त जगह है. सिर और छत के बीच भी पर्याप्त दूरी रखी गई है. कार को चलाने के लिए 1.2 लिटर का 3 सिलेंडर वाला आधुनिक इंजन है जो 7-10 बीएचपी शक्ति उत्पन्न करता है. कार का शतप्रतिशत उत्पादन भारत में किया जाएगा और इस की कीमत रखी गई है 4 लाख रुपए से कम. यानी मध्यवर्गीय उपभोक्ताओं की जेब व जरूरतों के अनुरूप. कार के आगे लगी जाली का डिजाइन भी भारतीय परंपराओं के अनुरूप रखा गया है. कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि विदेशी नाम वाली डैटसन पूरी तरह से भारतीय कार होगी. लेकिन इस के लिए आप को 6-7 महीने इंतजार करना पड़ेगा.

सौजन्य : बिजनैस स्टैंडर्ड मोटरिंग

पश्चिम बंगाल में उच्चवर्णों का वर्चस्व

राजनीति में धर्म और संप्रदायवाद की सत्ता भले ही कोई नई बात न हो लेकिन दशकों तक कम्युनिस्टों की सियासत के गढ़ रहे पश्चिम बंगाल में इन दिनों सियासी बाजार में यह मुद्दा गरम है कि ज्यादातर पार्टियों में उच्चवर्णों के नेताओं का कब्जा है. वर्ग संघर्ष के आदर्शों वाली पार्टी के नेता के इन विद्रोही तेवरों से सियासत का ऊंट किस करवट बैठेगा, जानने के लिए पढि़ए यह विश्लेषणात्मक लेख.

पश्चिम बंगाल में 34 वर्ष कम्युनिस्ट पार्टियों का शासन रहा हो या उस से पहले कांगे्रस का, पहली नजर में बिहार, उत्तर प्रदेश की तरह वहां जातिवाद का कभी बोलबाला नहीं रहा. लेकिन कुछ दिनों पहले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी माकपा के एक वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री अब्दुल रज्जाक मोल्ला ने पार्टी में उच्चवर्ण और ब्राह्मणवाद के खिलाफ मुंह खोला.

वर्गसंघर्ष के आदर्श पर चलने का दावा करने वाली माकपा के एक वरिष्ठ सदस्य द्वारा की गई इस टिप्पणी ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है. पिछले दशक में कोलकाता में बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा की मुखिया की मायावती ने माकपा पर निशाना साधते हुए पार्टी को मनुवादी करार दिया था और राज्य के दलित व पिछड़ों को एकजुट होने का आह्वान किया था. पर तब मायावती के आह्वान को अधिक तूल नहीं दिया गया था. राज्य में बसपा का कोई पुख्ता अस्तित्व भी नहीं है.

वहीं भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा अपनी हिंदूवादी विचारधारा के कारण इस प्रगतिशील राज्य में अपने पांव नहीं जमा पाई है. अब तक यही धु्रवसत्य माना जा रहा था कि बंगाल की राजनीति में जातिवादी समीकरण का कोई अस्तित्व है ही नहीं लेकिन रज्जाक मोल्ला के आरोप के बाद राज्य की राजनीति में खलबली मच गई है.

इस बारे में माकपा में सब से पहले वाममोरचा के शासनकाल में शिक्षा मंत्री रहे कांति विश्वास ने यह मुद्दा उठाया था. उन्होंने अपनी एक पुस्तक में लिखा है कि वर्ष 1977 में वाममोरचा के सत्ता पर काबिज होने के बाद मंत्रिमंडल में अनुसूचित जाति व जनजाति को प्रतिनिधित्व नहीं मिला. इस संबंध में कांति विश्वास ने ज्योति बसु और माकपा के तत्कालीन सचिव प्रमोद दासगुप्ता से बात भी की थी. नतीजतन, उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था.

उच्चवर्ग के कब्जे में पार्टियां

रज्जाक मोल्ला का कहना है कि राज्य में माकपा पूरी तरह से ब्राह्मण और कायस्थ जैसे उच्चवर्ग के कब्जे में है जबकि पार्टी के लिए खूनपसीना बहाने वाले अन्य वर्गों के नेताओंकार्यकर्ताओं की पार्टी में कोई खास पूछ नहीं है. पार्टी को नए सिरे से पूरी मजबूती के साथ खड़ा होना है और अपनी खोई जमीन को वापस पाना है तो पार्टी की कमान दलित और अल्पसंख्यक के हाथों में देनी होगी.

रज्जाक मोल्ला ने माकपा में लंबे अरसे से उच्चवर्णों की चली आ रही राजनीति को कठघरे में खड़ा किया है. सरसरी तौर पर राज्य की 3 प्रमुख पार्टियों माकपा, तृणमूल कांग्रेस और भाजपा में देखा जाए तो कमोबेश हर पार्टी में ब्राह्मण और उच्चवर्ण का बोलबाला है. इस संबंध में रज्जाक मोल्ला से बात करने पर उन्होंने पंचायत वोट के दौरान बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ताओं की हत्या का हवाला देते हुए कहा कि वोट के दौरान माकपा के 52 कार्यकर्ताओं की हत्या हुई और उन में से 50 प्रतिशत से भी अधिक अल्पसंख्यक समुदाय के कार्यकर्ता हैं, बाकी अनुसूचित जाति और जनजाति के हैं. पंचायत वोट की बलि चढ़े कार्यकर्ताओं में एक भी उच्चवर्ण का नहीं है.

कहते हैं कि वर्ष 1977 में पार्टी के सत्ता में आने से पहले से ही पार्टी के इन कार्यकर्ताओं ने बड़ा संघर्ष किया और अब भी पार्टी को जिंदा रखने की लड़ाई में अल्पसंख्यक और दलित कार्यकर्ता अपने प्राणों का बलिदान कर रहे हैं. लेकिन पार्टी के महंत बन बैठे हैं ब्राह्मण और कायस्थ जैसे उच्चवर्ण के नेता.

माकपा के पूर्व मंत्री कांति विश्वास ने भी इस सचाई को मानते हुए इसे चिंताजनक बताया है. अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी से निकल कर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का उदय हुआ. लेकिन काफी लंबे अंतराल में पार्टी की राज्य कार्यकारिणी में भले अल्पसंख्यक समुदाय को जगह मिली हो पर आदिवासी और जनजाति समुदाय को आज भी स्थान नहीं मिला है.

अल्पसंख्यक और शीर्ष दल

राज्य में माकपा की 19 सदस्यीय कार्यकारिणी में एकमात्र अल्पसंख्यक प्रतिनिधि मोहम्मद सलीम हैं. पूर्व राज्य सचिव अनिल विश्वास कायस्थ थे. बंगाल में लगभग पूरे वामशासन के दौरान विधानसभा के अध्यक्ष हसीम अब्दुल हलीम रहे. विमान बसु और ज्योति बसु कायस्थ और उन के बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य ब्राह्मण थे.

दरअसल, राज्य की राजनीति में लंबे समय तक वाममोरचे का ही शासन रहा है, जहां वर्ग संघर्ष और वर्ग शत्रु की ज्यादा चर्चा होती रही है. शायद इसीलिए राज्य राजनीति में जातिगत पैटर्न की ओर कभी किसी का ध्यान नहीं गया. इस मामले को पहली बार उठाया माकपा के नेता ने, जो अल्पसंख्यक समुदाय के हैं.

इस संबंध में राजनीतिक विश्लेषक अमल सरकार का कहना है कि वाममोरचा शासन को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए ममता बनर्जी लंबे समय से संघर्ष करती रही हैं. उन्हें सफलता तब मिली जब वे राज्य की अनुसूचित जाति व जनजातियों के वोट को लक्ष्य बना कर आगे बढ़ीं. 2011 में तृणमूल कांगे्रस को मिले वोट में एक बड़ा हिस्सा अनुसूचित जाति जनजाति का है लेकिन उन की पार्टी के शीर्ष पर भी उच्चवर्ण के नेता ही काबिज हैं. प्रदेश कांगे्रस और भाजपा में भी स्थिति बहुतकुछ एक जैसी ही है. इन पार्टियों के भी शीर्ष पदों पर उच्चवर्ण का ही कब्जा है. अगर तृणमूल कांगे्रस की बात करें तो ममता बनर्जी से ले कर सुब्रत मुखर्जी, दिनेश त्रिवेदी, पार्थ चटर्जी, सौगत राय और मुकुल राय सभी ब्राह्मण और कायस्थ हैं. अल्पसंख्यक समुदाय से फिरहाद हकीम और डेरेक ओ ब्रायन हैं. तृणमूल कांगे्रस पार्टी में उच्चवर्ण का बोलबाला होने के बारे में पूछे जाने पर सौगत राय ने इसे सिरे से नकारते हुए कहा कि कोई भी पार्टी हो, नेता तैयार होने की एक प्रक्रिया होती है. लंबे संघर्ष के बाद ही नेता तैयार होते हैं.

जहां तक विभिन्न समुदाय के प्रतिनिधित्व का सवाल है तो ममता बनर्जी की अगुआई में तृणमूल कांगे्रस में अन्य किसी पार्टी की तुलना में अल्पसंख्यक समुदायों की भागीदारी कहीं अधिक है. ममता के मंत्रिमंडल में भी अल्पसंख्यक समुदाय के अलावा आदिवासी जाति, जनजाति और महिलाओं का भी प्रतिनिधित्व अन्य किसी पार्टी की तुलना में कहीं अधिक है. अब अगर प्रदेश भाजपा की बात की जाए तो पार्टी कार्यकारिणी में राहुल सिन्हा, तथागत राय, असीम सोम और शमीक भट्टाचार्य उच्चवर्ण से ही हैं.

वहीं, प्रदेश कांगे्रस में प्रदीप भट्टाचार्य, मानस भुंइया, दीपा दासमुंशी, अधीर चौधुरी ये सभी उच्चवर्ण से हैं. अब्दुल मन्नान अल्पसंख्यक समुदाय से हैं. इस संबंध में अब्दुल मन्नान का कहना है कि यह भारतीय राजनीति की नियति ही है कि देश की अधिकांश पार्टियां दलित, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्यों को अपने निजी स्वार्थ के तहत पार्टी में स्थान देती हैं. यह आज ‘ओपेन सीक्रेट’ है. पश्चिम बंगाल में भी यही चलन है. इस में हैरानी जैसी कोई बात नहीं है.

बहरहाल, देश व उस के कई राज्यों में जारी सांप्रदायिक व जातिवादी राजनीति से अछूता रहा बंगाल अब शायद और अछूता न रह पाएगा. हालांकि मौजूदा मुख्यमंत्री ने विशेष आरक्षण की बात कर के मुसलिम कार्ड तो खेल ही दिया है.

पितापुत्र की जोड़ी साथ चले तो आगे बढ़े

राजनीति में परिवारवाद अब कोई मुद्दा नहीं रह गया है. ऐसे में पितापुत्र की जोड़ी नई बात नहीं है. कहीं यह जोड़ी हिट है कहीं फ्लौप. इस जोड़ी के हिट होने का फार्मूला क्या हो सकता है, पेश कर रहे हैं शैलेंद्र सिंह.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित हिंदी संस्थान में साहित्यकारों के पुरस्कार वितरण का एक कार्यक्रम चल रहा था. मंच पर कई खास लोगों के साथ उत्तर प्रदेश के  मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उन के पिता समाजवादी पार्टी यानी सपा के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव भी मंच पर बैठे हुए थे. 40 हजार रुपए का पुरस्कार पाने वाले एक लेखक ने मुख्यमंत्री की तारीफ की. इस बात को सुन कर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘‘40 हजार में काहे के मुख्यमंत्री, यह राशि तो और ज्यादा होनी चाहिए थी. इस में किसी तरह के बजट की परेशानी नहीं है.’’

बोलने की अपनी बारी आने पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा, ‘‘यह धनराशि पहले 20 हजार रुपए थी. इस को बढ़ा कर 40 हजार रुपए किया गया है.’’सामान्यतौर पर देखें तो इस बातचीत में विवाद जैसा कुछ नहीं है. पार्टी प्रमुख के नाते मुलायम सिंह को पूरा हक है कि वे अपने मुख्यमंत्री के कामकाज को ठीक करने का प्रयास करते रहे. यहां बात केवल राजनीतिक नहीं है. मुलायम और अखिलेश के बीच पिता और पुत्र का भी रिश्ता है.  इस नाते भी मुलायम अखिलेश को सम?ा सकते हैं.

दरअसल, सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव कई बार अलगअलग तरह से अखिलेश यादव के कामों की आलोचना सार्वजनिक रूप से करते रहे हैं. प्रदेश की खराब होती कानून व्यवस्था पर मुलायम सिंह यादव ने कुछ समय पहले कहा था, ‘‘मैं होता तो 15 दिन में प्रदेश की कानून व्यवस्था ठीक हो जाती.’’ आगरा में पार्टी के अधिवेशन में जब अखिलेश सरकार के कैबिनेट मंत्री आजम खां नहीं गए तो मीडिया ने मुलायम से यह सवाल किया कि आजम खां यहां भी नहीं आए और कैबिनेट की मीटिंग में भी नहीं जाते? मुलायम सिंह ने कहा, ‘‘आजम खां कैबिनेट मीटिंग में क्यों नहीं जाते, इस का जवाब मुख्यमंत्री अखिलेश से पूछा जाना चाहिए.’’

मुलायम और अखिलेश के बीच सम?ानेबु?ाने का दौर जब से अखिलेश मुख्यमंत्री बने हैं तभी से बराबर चल रहा है. शुरू में यह लग रहा था कि कुछ दिनों के बाद यह थम जाएगा. यही वजह है कि आज उत्तर प्रदेश में विरोधी पार्टी के लोग आरोप लगा रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में एक नहीं कई मुख्यमंत्री हैं.

साल 2012 में सपा पार्टी को उत्तर प्रदेश में पहली बार बहुमत से सरकार बनाने का मौका मिला था. उस समय खुद मुलायम सिंह यादव ने इस जीत का पूरा श्रेय अखिलेश यादव को दिया और उन को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री पद संभालने का मौका दिया. जिन अखिलेश यादव ने भाजपा, बसपा और कांग्रेस का विधानसभा चुनाव में पछाड़ कर सब से ज्यादा सीटें जीतीं, वे अपनी ही पार्टी में हाशिए पर कैसे आ गए?

राजनीति के जानकार मानते हैं कि मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश को मुख्यमंत्री की कुरसी पर तो बैठा दिया पर जो छूट और समर्थन उन को देना चाहिए था वह नहीं दिया. ऐसे में सपा के कुछ बडे़ नेता भी मुख्यमंत्री के सरल स्वभाव का बेजा लाभ उठाने लगे. उन के एकएक काम में दोष निकालने लगे. इस से विरोधी दलों का यह आरोप लगातार गहरा होता गया कि उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के अलावा मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव, आजम खां जैसे लोग सरकार चला रहे हैं. अखिलेश यादव को जिस तरह से कई बार अपने फैसले बदलने पड़े उस से यह बात और भी साफ हो जाती है.

मुलायम सिंह यादव की सब से बड़ी परेशानी यह है कि वे अपनी पार्टी के सरकार में होने के बाद भी आने वाले लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी का मजबूत जनाधार नहीं देख रहे हैं. वहीं, मुलायम को लगता है कि जिस तरह से कांग्रेस और भाजपा लोकसभा चुनाव के पहले अपना जनाधार खोती जा रही हैं उस से तीसरे मोरचे की संभावनाएं दिख रही हैं. ऐसे में मुलायम को लगता है कि वे इस अवसर का लाभ उठा सकते हैं.

वहीं, अखिलेश सरकार की खराब होती छवि के चलते मुलायम को अपने सपने पूरे होते नहीं दिख रहे हैं. वे बारबार अखिलेश की आलोचना करने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं. यही कारण है कि अखिलेश यादव का आत्मविश्वास कम होता जा रहा है.

प्रकाश और सुखवीर सिंह बादल

मुलायम और अखिलेश की ही तरह पंजाब में प्रकाश सिंह बादल उन के बेटे सुखवीर सिंह बादल की जोड़ी भी है. प्रकाश सिंह बादल जब पिछली विधानसभा के समय मुख्यमंत्री थे तो सुखबीर सिंह बादल पूरी तरह से पार्टी की कमान संभाल रहे थे. सरकार में भी उन का पूरा दखल था. मुलायम सिंह यादव से ज्यादा उम्र के होने के बाद भी प्रकाश सिंह बादल ने मुख्यमंत्री की कुरसी संभाली और बेटा सुखबीर बादल बाकी कामकाज देखता था.

एक तरफ प्रकाश सिंह बादल हैं जो खुद मुख्यमंत्री की कुरसी पर हैं और कामकाज उन का बेटा सुखबीर देखता है. दूसरी तरफ मुलायम सिंह यादव हैं जो खुद मुख्यमंत्री की कुरसी पर नहीं हैं पर मुख्यमंत्री के काम में उन का दखल बना हुआ है.

सामान्यरूप से जब आप पार्टी नेता की आलोचना करते हैं तो एक अलग बात होती है पर बेटे के काम की आलोचना करते समय हालात दूसरे होते हैं. ऐसे में पितापुत्र की जोड़ी के रूप में काम करने वाले लोगों, खासकर नेताओं को ज्यादा सचेत होना चाहिए.

बेहतर यही होगा कि सार्वजनिक रूप से आलोचना कम से कम हो. कमियों की चर्चा अकेले में होगी तो बेटे का आत्मविश्वास बना रहेगा और बाहरी लोग उस की आलोचना करने से पहले सोचने को मजबूर होंगे. कई बार बेटे जब जिद करते हैं या उन पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया जाता है तो पार्टी को नुकसान होता है. महाराष्ट्र में शिवसेना का उदाहरण इस की जीतीजागती मिसाल है.

किया भरोसा, टूटी पार्टी

बालासाहब ठाकरे ने शिवसेना को बनाया और महाराष्ट्र में उस की ताकत बढ़ाई. बालासाहब के पुत्र उद्धव ठाकरे और उन के भतीजे राज ठाकरे दोनों ही राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा रखते थे. उद्धव के मुकाबले राज ठाकरे में राजनीतिक क्षमता ज्यादा थी. पुत्रमोह में बालासाहब ठाकरे ने भतीजे राज ठाकरे को पीछे कर बेटे उद्धव ठाकरे को आगे बढ़ाना शुरू किया तो राज ठाकरे ने अलग हो कर ‘महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना’ यानी मनसे नाम से अलग पार्टी खड़ी कर दी. इस टूटन का प्रभाव शिवसेना पर पड़ा. उस का जनाधार कम होता गया. बीचबीच में कई बार राज व उद्धव के एक होने की खबरें आती रहीं पर ऐसा हो नहीं सका.

कहने का अभिप्राय यह है कि बालासाहब ने अगर राजनीतिक क्षमता का आकलन कर पार्टी की कमान सौंपी होती तो शिवसेना कमजोर नहीं पड़ती, उस का जनाधार बढ़ जाता. राजनीतिक दलों में कई बार परिवारवाद पार्टी की तरक्की में बाधा बनता है.

फारूक और उमर अब्दुल्ला

जम्मूकश्मीर में पितापुत्र की जोड़ी फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला के रूप में काम कर रही है.  फारूक अब्दुल्ला ने बेटे को सत्ता की कुरसी सौंपने के बाद अपने को केंद्र की राजनीति तक सीमित कर लिया. ऐसे में उन के बीच मुलायम और अखिलेश वाले हालात नहीं बन सके. साथसाथ चलने से न केवल दोनों अपनीअपनी जिम्मेदारी उठा रहे हैं बल्कि विरोधी दलों को आलोचना करने का मौका भी नहीं दे रहे हैं.

राष्ट्रीय लोकदल के नेता चौधरी अजित सिंह और उन का बेटा जयंत चौधरी भी पितापुत्र की एक ऐसी ही जोड़ी है. चौधरी अजित सिंह केंद्र की राजनीति में हैं, उन का बेटा उत्तर प्रदेश में पार्टी की कमान संभाल रहा है. लोकदल भले ही उत्तर प्रदेश में सत्ता की दौड़ में पीछे हो पर पितापुत्र के रूप में अजित और जयंत की जोड़ी में मतभेद खुल कर सामने नहीं आ रहे हैं.

इस के उलट, जहां पितापुत्र की जोड़ी ने ठीक से काम नहीं किया वहां जनता ने उन को सत्ता से बेदखल करने में कोई देरी नहीं की. तमिलनाडु में एम करुणानिधि और उन के बेटे स्टालिन का उदाहरण इस का प्रमाण है. करुणानिधि तमिलनाडु में मुख्यमंत्री थे. इस के बाद भी सत्ता के कामकाज में उन के बेटे स्टालिन का दखल था. ऐसे में जनता नाराज हुई और पितापुत्र की जोड़ी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया. राजनीति में ऐसी जोडि़यां कम नहीं हैं.

उत्तर प्रदेश में शिवपाल यादव और उन का बेटा अक्षय यादव एकसाथ राजनीति में हैं. बिहार में लोक जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान ने अपने बेटे चिराग पासवान को पार्टी संगठन में जगह दी है. विधानसभा के आने वाले चुनाव में इस जोड़ी की क्षमता को परखा जाएगा.

अलग राह से नहीं बनेगी बात

भाजपा नेता राजनाथ सिंह और उन के पुत्र पंकज सिंह, लालजी टंडन के बेटे गोपाल टंडन जैसे बहुत सारे पितापुत्रों की जोड़ी राजनीति में है. भाजपा कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगाती है पर उस की पार्टी में नेताओं की दूसरी पीढ़ी में पितापुत्र की जोड़ी बड़े पैमाने पर काम कर रही है.

हिमाचल प्रदेश में प्रेमकुमार धूमल और अनुराग ठाकुर की जोड़ी राजनीति में एकसाथ काम कर रही है. प्रेमकुमार धूमल भाजपा के मुख्यमंत्री के रूप में हिमाचल प्रदेश की सत्ता पर काबिज थे. उन के बेटे अनुराग ठाकुर सांसद हैं. विधानसभा चुनाव के समय पितापुत्र की इस जोड़ी ने मिल कर काम किया लेकिन आपसी तालमेल के अभाव के चलते पार्टी को जीत नहीं मिल सकी और भाजपा बाजी हार गई.

आज सभी दल अपने परिवार को राजनीति में ले आए हैं. ऐसे में इन को अलग सोच बनानी होगी. बेटे को जब बारबार सलाह दी जाएगी या उसे खुल कर काम करने नहीं दिया जाएगा तो परिणाम बेहतर नहीं होंगे. पितापुत्र की जोड़ी को ऊर्जा और अनुभव की तरह साथसाथ चलना होगा. तभी सफलता मिल सकती है. अगर दोनों अलगअलग चलेंगे तो पार्टी की नाव डूबने से कोई  बचा नहीं सकता.पितापुत्र की जोड़ी किसी भी कारण से असफल हो, पर जिम्मेदारी दोनों पर आएगी. ऐसे में साथ चलें, तभी सुधार हो सकता है.

धनकुबेर हुनर के शहंशाह

तमाम देशी और विदेशी अरबपतियों की सूची में भारतीयों की मौजूदगी अब सुर्खियां नहीं बटोरती क्योंकि अब हर साल फोर्ब्स पत्रिका में जारी होने वाली अरबपतियों की सूची में तमाम भारतीयों की मौजूदगी आम बात हो गई है. कुछ ऐसे ही हुनरमंदों के बारे में बता रहे हैं लोकमित्र.

हर साल सितंबरअक्तूबर माह में जारी होने वाली ‘फोर्ब्स’ पत्रिका की अरबपतियों की सूची में भारतीयों की मौजूदगी आम बात है. लेकिन इन सूचियों में अब ऐसे प्रोफैशनल अरबपतियों के नाम सामने आने लगे हैं जो अभी भी, पारंपरिक तरीके से सोचें तो, रईसियत के पर्याय नहीं. मसलन, सामान्य अध्यापकों और बाबुओं से ले कर मिस्त्रियों तक के बेटे या बेटियां अब इस श्रेणी में आने लगे हैं. अभिनेता अमिताभ बच्चन के पिता शिक्षा विभाग में कार्यरत थे. क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर के पिता मराठी के लेक्चरर थे वहीं महेंद्र सिंह धौनी के पिता एक सार्वजनिक उपक्रम में तकनीकी कर्मचारी थे. अभिनेता शाहरुख खान की मां का मिट्टी के तेल का डिपो था. अगर सरसरी निगाह से सोचें तो यह जेहन में नहीं आता कि इतनी सामान्य पृष्ठभूमि से उठ कर भी कोई अरबपति हो सकता है. नए अरबपतियों की सूची में यही एक नई और ध्यान खींचने वाली बात है.

अमिताभ बच्चन ग्लैमर की दुनिया के भले दशकों तक शहंशाह रहे हों लेकिन जब उन की कंपनी एबीसीएल डूबी तो उन पर कई करोड़ रुपए का कर्जा था. सुनने में तो यहां तक आया है कि कुछ दिनों के लिए उन्हें अपना एक बंगला भी गिरवी रखना पड़ा था. हो सकता है यह बात सही नहीं हो लेकिन इस सच से कोई इनकार नहीं कर सकता कि उन की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी. शायद उस दौर में उन के बड़े से बड़े शुभचिंतक को भी यह उम्मीद नहीं रही होगी कि एक दिन बिग बी इन सब चीजों से उबर जाएंगे और अपनी अद्भुत प्रतिभा व प्रोफैशनल निष्ठा की बदौलत बदलते दौर में भी रोल मौडल बन जाएंगे.

पर ऐसा ही हुआ. जिन दिनों यानी पिछली सदी के आखिरी दशक के मध्यार्द्ध में जब टीवी चैनलों का जादू फीका पड़ने लगा था, वे ‘कौन बनेगा करोड़पति’ जैसा सुपरडुपर हिट प्रोग्राम ले कर आए और देखते ही देखते फिर छा गए. इस प्रोग्राम की जबरदस्त सफलता से अमिताभ ने साबित कर दिया कि वे परदे की दुनिया के शहंशाह हैं, चाहे परदा छोटा हो या बड़ा.

आज भी विश्लेषणकर्ता, विशेषज्ञ यह साफसाफ कह पाने में असमर्थ हैं कि ‘कौन बनेगा करोड़पति’ ने जादू अपने कंटैंट की बदौलत बिखेरा या अमिताभ बच्चन की अद्भुत पेशेवराना प्रतिभा के चलते. जो लोग कहते हैं कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम अपने विषय के चलते ही सफलता का हकदार था उन की बात पूरी तरह से गलत नहीं है, लेकिन अमिताभ बच्चन जैसी सहज प्रस्तुति, अद्भुत चुंबकीय व्यक्तित्व, खनकता हुआ उन का बेहद शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता व शुद्धता में जादुई सी लगती उन की हिंदी. इन सब ने इस कार्यक्रम को सुपरडुपर हिट बनाने में अपना अद्भुत योगदान दिया था.

यही वजह है कि अमिताभ बच्चन ने कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम की असाधारण सफलता के चलते न सिर्फ अपनेआप को फिर से फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित कर लिया बल्कि आर्थिक संकट के तमाम दुश्चक्रों से बाहर निकल आए.

अपने कौशल, हुनर और विचार की बदौलत देश में जिन पेशेवरों ने बहुत ऊंचा स्थान हासिल किया है उन में अमिताभ के साथसाथ सचिन तेंदुलकर और शाहरुख खान भी मौजूद हैं.

सचिन तेंदुलकर से पहले शायद ही कभी किसी ने सोचा हो कि कोई खिलाड़ी 500 करोड़ रुपए का भी कौंट्रेक्ट साइन कर सकता है. भारत के खेल परिदृश्य में यह काल्पनिक रकम थी जिस पर सचिन तेंदुलकर ने कौंट्रेक्ट साइन किया. सचिन तेंदुलकर ने प्रतिभा की बदौलत खेल के मैदान में कमाई करने का वह रिकौर्ड बनाया है जिसे शायद ही आने वाले दिनों में कोई भारतीय तोड़ पाए. हालांकि आज भी सचिन तेंदुलकर को यूरोप और अमेरिका की टेनिस सर्किट के मुकाबले बहुत कम पैसा मिलता है लेकिन फिर भी वह इतना ज्यादा है जितना दुनिया के शायद ही किसी क्रिकेटर ने कभी कल्पना में भी हासिल किया हो.

महेंद्र सिंह धौनी भी उन्हीं की तरह आगे बढ़ रहे हैं. हालांकि अभी वे किसी सार्वजनिक की गई अरबपतियों की सूची का हिस्सा नहीं हैं लेकिन इन दिनों बाजार में उन की जो कीमत है, उतनी किसी और खिलाड़ी की नहीं है. कुछ मामलों में तो वे सचिन तेंदुलकर पर भी भारी पड़ते हैं.

बौलीवुड के बादशाह शाहरुख खान ने सफलता का शिखर छू कर न सिर्फ अमिताभ की कुरसी के लिए अपना मजबूत दावा कई साल पहले पेश किया था बल्कि अमिताभ की तरह ही उन की कमाई का ग्राफ भी लगातार ऊंचा रहा है.

वैसे पिछले कुछ सालों में सलमान खान और आमिर खान ने भी किसी भी तरह से शाहरुख से कम पैसा नहीं कमाया, लेकिन शाहरुख और इन दोनों खानों में एक खास फर्क है. शाहरुख ने विशुद्ध रूप से महज अपनी अभिनय प्रतिभा बेच कर यह मुकाम हासिल किया है जबकि बाकी दोनों खान पहले से ही आर्थिक रूप से बेहद संपन्न रहे हैं और दोनों की पृष्ठभूमि भी इन के पहले से ही फिल्मी रही है. शाहरुख खान कारवां में अकेले खान हैं जिन के आगेपीछे परिवार का कोई भी सदस्य इस इंडस्ट्री से जुड़ा नहीं रहा.

अरबपतियों की हुनरमंद पौध में शहनाज हुसैन, नैना लाल किदवई, किरण मजूमदार शा और इंदिरा नूई भी शामिल हैं. जहां किरण मजूमदार शा को विरासत में बायोएक्सपर्ट पिता और इसी क्षेत्र के विशेषज्ञ पति का साथ मिला, वहीं शहनाज हुसैन और नैना लाल किदवई ऐसी पृष्ठभूमि से ताल्लुक नहीं रखती हैं जो आज उन की शानदार सफलता का आधार है. इन्हीं में इंदिरा नूई भी शामिल हैं.

सच बात तो यह है कि इन भारतीय महिलाओं ने भारत के स्त्री समाजशास्त्र में चुपके से एक क्रांतिकारी अध्याय सृजित किया है, जिसे भविष्य में युगपरिवर्तक मोड़ के रूप में पढ़ा और समझा जाएगा. हर्बल क्वीन के नाम से मशहूर शहनाज हुसैन ने अपनी यात्रा एक छोटी सी पगडंडी से शुरू की थी. आज वे 4 अरब रुपए से ज्यादा के चौरस राजमार्ग की हर्बल क्वीन हैं. किरण मजूमदार शा देश की अकेली बायो क्षेत्र की सब से सफल शख्सीयत हैं, वहीं नैना लाल किदवई और इंदिरा नूई ने कौर्पोरेट बोर्डरूम में स्त्रियों के नेतृत्व को नई परिभाषा दी है.

कुल मिला कर आज की तारीख में भारत में 20 ऐसे अरबपति हैं जो पहली पीढ़ी के अरबपति हैं और ये सब के सब प्रोफैशनल हैं यानी इन्होंने अपनी बौद्धिक क्षमताओं से यह मुकाम हासिल किया है. हां, यह बात जरूर है कि इन में से कइयों के पीछे विरासत में शानदार बौद्धिक आधार रहा है. लेकिन धनकुबेरों के लिए जो पारंपरिक परिभाषा रही है कि मुंह में चांदी का चम्मच ले कर पैदा होने वाले ही अपने हाथ सोने के बनाते हैं, वैसा आधार उन के साथ नहीं रहा.

सिर्फ भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में आज इस तरह के हुनरमंद धनकुबेरों का जलवा है. चाहे कंप्यूटर किंग बिल गेट्स हों या सोशल मीडिया को धनकुबेर में बदल देने वाले मार्क जुकरबर्ग. बिल गेट्स ने अपनी किताब ‘रोड अहेड’ में एक जगह कहा है, ‘विचार संपदा की कुंजी है.’ हालांकि इस बात को अकेले बिल गेट्स ने ही कहा हो, ऐसा नहीं है. यह विचार उन के कहे जाने के पहले से ही मौजूद है. लेकिन जब बिल गेट्स कहते हैं तो यह बात इसलिए भी ज्यादा विश्वसनीय हो जाती है क्योंकि बिल गेट्स ने सिर्फ कहा भर नहीं है, कर के दिखाया भी है.

नए धनकुबेरों की सफलता कथा पुराने धनकुबेरों से कहीं ज्यादा रोमांचक है मगर मिथकीय नहीं है, क्योंकि इन की सफलता कथा में चमत्कार जैसे शब्द की कोई भूमिका नहीं है. अपने एक साक्षात्कार में बिल गेट्स ने कहा है, ‘मैं जहां भी भाषण देने जाता हूं, लोग मुझ से एक सवाल जरूर पूछते हैं. आप इतने सफल कैसे बने? और मैं बारबार यह जवाब दे कर थक चुका हूं कि सचमुच इस में कोई रहस्य नहीं है. मैं तो सिर्फ अपने आइडिया की बदौलत जो कुछ हूं, आप के सामने हूं.’

महान दार्शनिक एमर्सन ने अपनी मशहूर कृति कंडक्ट औफ लाइफ वैल्थ’ में कहा है, ‘‘संपदा वास्तव में अपने दौर में प्रकृति को समझना है.’’ नए दौर के धनकुबेरों ने यही किया है. आधुनिक धनकुबेरों ने सफलता की मिथकीय गाथाओं में बिलकुल नए आयाम जोड़े हैं.

मसलन, सचिन तेंदुलकर को लें. सचिन तेंदुलकर ने अगर अपना नाम हिंदुस्तान के 20 सब से रईस लोगों में शुमार करवाया है तो इसलिए नहीं कि वे यह लक्ष्य ले कर चले थे. उन की यह सफलता उन का क्रिकेट के प्रति अद्भुत समर्पण और जिजीविषा का नतीजा है. सिर्फ अपने प्रोफैशनल समर्पण और खेल के प्रति कमिटमैंट के चलते सचिन ने यह मुकाम हासिल किया है.सिर्फ नई पीढ़ी के धनकुबेरों में ही अपने विचार और हुनर के प्रति निष्ठा रही हो, ऐसा नहीं है और यह भी पूरी तरह से सच नहीं होगा कि सिर्फ इसी पीढ़ी ने इस तरह की सफलता हासिल की. अजीम प्रेमजी नई पीढ़ी के उद्योगपतियों में नहीं शुमार किए जाते. वे इस नई पीढ़ी से पहले की पीढ़ी के उद्योगपति हैं और सिर्फ राष्ट्रीय धनकुबेरों की सूची में ही दर्ज हों, ऐसा नहीं है. वे फोर्ब्स की इंटरनैशनल अरबपतियों की लिस्ट का भी हिस्सा हैं. उन की सफलता में भी धन से धन कमाने की जगह विचार को धन में बदल देने का कारनामा शामिल रहा है.

अजीम प्रेमजी के बापदादा अनाज और खाने के तेल का कारोबार करते थे. उन का पोस्टमैन वनस्पति घी काफी मशहूर रहा है. लेकिन जब अजीम प्रेमजी इस कारोबार के मुखिया बने तो उन्होंने कुछ ही दिनों के भीतर पुराने कारोबार को टाटा बायबाय कह दिया. उन्होंने सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हाथ आजमाया. हालांकि उन दिनों उन का पारंपरिक कारोबार जमाजमाया था, लेकिन जमेजमाए कारोबार को छोड़ कर उन्होंने कंप्यूटर और बाद में सौफ्टवेयर के क्षेत्र में अपना हाथ आजमाया और आज वे आईटी सैक्टर के सब से सफल कारोबारियों की सूची में महत्त्वपूर्ण

स्थान रखते हैं. कुछ साल पहले तक 17,600 करोड़ रुपए की नैटवर्थ के साथ वे भारत के सब से अमीर व्यक्ति थे, लेकिन आज उन की जगह मुकेश अंबानी ने ले ली है. मुकेश अंबानी अपने हुनर की बदौलत आज बुलंदियों पर हैं.

अपने विचारों और तकनीक के प्रति समर्पण के चलते जिन 2 और व्यक्तियों ने सफलता की अद्भुत ऊंचाइयां हासिल की हैं उन में एचसीएल के शिवनाडार और इन्फोसिस टैक्नोलौजी के एन आर नारायणमूर्ति हैं. दोनों में अद्भुत प्रोफैशनल क्षमता रही है.

एन आर नारायणमूर्ति को कुछ साल पहले ‘ईस्टर्न आई’ अखबार ने भारत के चौथे सब से प्रोफैशनल अरबपतियों में शुमार किया  था. उन के पास उस समय 47 अरब रुपए की संपत्ति थी. नारायणमूर्ति भी 80 के दशक की शुरुआत में ऐसे ही प्रतिभाशाली उभरते हुए सितारे थे जिन के पास मजबूत विचार और विश्वास था, लेकिन पूंजी नहीं थी. तमाम कोशिशों के बाद भी उन्हें पारंपरिक पूंजी के मालिक घास नहीं डाल रहे थे. लेकिन आखिरकार उन की प्रतिभा को उन की पत्नी सुधामूर्ति ने पहचाना और खुद अपने कैरियर को दांव पर लगा कर नारायणमूर्ति के महत्त्वाकांक्षी विचारों को आधार मुहैया कराया रिटायरमैंट के बाद. आज फिर से वे इन्फोसिस कंपनी के चेयरमैन पद पर काबिज हैं और इन्फोसिस को बुलंदियों पर पहुंचाने के लिए तत्पर हैं.

बहरहाल, आज विचार पूंजी बन चुका है बशर्ते आप को उस की मार्केटिंग करनी आती हो और उस का रिश्ता आम लोगों के साथ जोड़ना आता हो. इसीलिए आज के धनकुबेर पहले के धनकुबेरों से भिन्न हैं.

अर्थव्यवस्था की दुर्दशा करती सामाजिक व्यवस्था

देश की गिरती आर्थिक सेहत और रुपए की दुर्दशा पर आंसू बहाने वाली सरकार, जनता और उद्योग जगत को समझना चाहिए कि अर्थव्यवस्था को इस हालत तक पहुंचाने वाले वे खुद ही हैं. वास्तविकता तो यह है कि भारत की कमजोर आर्थिक व्यवस्था हमारी उस संस्कृति का नतीजा है जो सदियों से अकर्मण्यता व निकम्मेपन का संदेश देती रही है. धर्मप्रचारकों का अंधविश्वासी प्रचार, चमत्कार पर निर्भरता और सरकार व जनता का निठल्लापन किस तरह देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ रहा है, बता रहे हैं जगदीश पंवार.

देश की गिरती अर्थव्यवस्था को ले कर सरकार चिंतित है. उद्योग जगत निराश है और आम जनता नाखुश है. डौलर के मुकाबले रुपए की रिकौर्ड गिरावट के चलते आयातनिर्यात पर बुरा असर पड़ा है. रोजमर्रा की चीजों की बढ़ती कीमतों से जनता हैरानपरेशान है. प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह संसद में स्वीकार कर चुके हैं कि वास्तव में देश की आर्थिक सेहत ठीक नहीं है. वित्त मंत्री पी चिदंबरम आर्थिक बदहाली के लिए उन से पूर्व वित्त मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी के अदूरदर्शी फैसलों को जिम्मेदार बताते हैं. रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे सुब्बाराव जातेजाते कह गए कि सरकार की गलत राजनीतिक प्राथमिकताओं के चलते आर्थिक हालात खराब हुए हैं.

सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद रुपए में मामूली सुधार ही आ पाया पर महंगाई लगातार बढ़ रही है.  थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर अगस्त में लगातार तीसरे माह बढ़ कर 6.1 फीसदी पहुंच गई. खुदरा महंगाई की दर भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई है. आम आदमी सब से ज्यादा परेशान खानेपीने और पैट्रोलडीजल की बढ़ती कीमतों से है. पैट्रोल, डीजल की कीमतें पिछले 3 महीनों में छठी बार बढ़ीं. हालांकि पिछले दिनों पैट्रोल की कीमतें घटाई गईं पर प्याज, टमाटर व अन्य सब्जियां और तेल, दाल और आटा की कीमतें आसमान छू रही हैं. आने वाले दिनों में रसोई गैस व केरोसिन की कीमत में भी इजाफा होने की संभावना है.

दूसरी ओर आर्थिक प्रगति के लिए जरूरी नए उद्योगों व व्यापारों के लिए निवेशक हाथ पीछे खींच रहे हैं. निवेशकों की नजर में भारत में बेलगाम भ्रष्टाचार है. लालफीताशाही हावी है और बुनियादी ढांचे में ठहराव के साथ वित्तीय दबाव है. आयातनिर्यात पर भी असर पड़ रहा है. चालू खाते का घाटा 1991 के पहले के स्तर पर पहुंच गया है और राजकोषीय घाटे में सुधार के कोई लक्षण नजर नहीं आ रहे हैं. यानी आर्थिक सुधार जहां से शुरू हुए थे, यह सरकार वापस वहीं चली गई है. गौरतलब है कि 1992 में मनमोहन सिंह जब नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री थे तब आर्थिक नीतियों की शुरुआत की गई थी. कहा गया है कि भारत के पास अब केवल 7 माह का विदेशी मुद्रा भंडार बचा है और इस के बाद अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से मदद लेने की नौबत आ सकती है.

वर्ष 1991 में आर्थिक संकट इतना गहरा था कि पी वी नरसिम्हा राव सरकार को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से भारत का 67 टन सोना गिरवी रख कर 2.2 बिलियन डौलर का आपात कर्ज लेने के लिए बाध्य होना पड़ा था. आर्थिक हालात के बदतर होने के लिए सरकार की नीतियों को दोषी ठहराया जा रहा है लेकिन क्या वास्तव में हमारे देश के खराब आर्थिक हालात के कारण सिर्फ सरकारों की नीतियां ही हैं? क्या इस देश का हर नागरिक, हर संस्था देश के आर्थिक उत्पादन में मदद कर रहे हैं? क्या हर नागरिक अपना कर्तव्य निभा रहा है? किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में कमोबेश हरेक नागरिक का योगदान होता है लेकिन क्या यहां जनता अर्थोपार्जन कर अपने घर, परिवार, समाज और देश के विकास में सहायता कर रही है? क्या यहां का हरेक व्यक्ति आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर है? क्या नागरिक उत्पादकता में वे अपनी भागीदारी दे रहे हैं?

असल में देश की 1 अरब 30 करोड़ की आबादी में से केवल 10 प्रतिशत लोग ही कमाने वाले हैं. बाकी किसी न किसी के कंधे पर लटके हुए हैं. यानी दूसरों पर निर्भर हैं. उद्यमशीलता अवरुद्ध है. यहां मांग कर खाना या मुफ्त का खाना शर्म की बात नहीं, धर्म माना गया है. दरअसल, भारत की अर्थव्यवस्था की दिक्कतें अर्थशास्त्र से नहीं, सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी हुई हैं.

हमारी जो संस्कृति है वह अकर्मण्यता, निकम्मापन का संदेश देने वाली है. हमारे यहां पर किसी व्यक्ति को परिश्रम का पाठ पढ़ाया ही नहीं जाता. यहां निकम्मेपन का गुणगान किया गया है. निकम्मों का मानसम्मान किया गया है. काम करने का जिम्मा संपूर्ण समाज को नहीं, एक वर्ग को दिया गया. बाकी को उस पर निर्भर छोड़ दिया गया.

धर्म ने समाज को वर्णव्यवस्था के नाम पर बांट दिया. जिस में ब्राह्मण, क्षत्रिय को अर्थोपार्जन का काम नहीं दिया गया. ब्राह्मण सिर्फ पढ़नेपढ़ाने, पूजापाठ करनेकराने का काम करेगा, क्षत्रिय की जिम्मेदारी सिर्फ  रक्षा करने की होगी. अर्थाेपार्जन का काम केवल वैश्य का होगा. यानी व्यापार, वाणिज्य वैश्य करेगा. शूद्र को इन तीनों वर्णों की सेवा का जिम्मा दिया गया. दलित तो अछूत थे, समाज के अंग ही नहीं थे.

काम के बंटवारे की सदियों पुरानी इस सामाजिक व्यवस्था का असर अभी तक देखा जा सकता है. इस व्यवस्था की वजह से ही हमारे देश में लाखों पंडेपुजारी, साधुसंत, गुरु, महंत, प्रवचक, शंकराचार्य, मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर, ज्योतिषी, तांत्रिक, ओझा, मुल्ला, मौलवी, पादरी, गं्रथी किसी तरह की उत्पादता से दूर, निठल्ले बैठ कर मेहनतकश लोगों की कमाई पर ऐश कर रहे हैं.

इस देश में छोटेबड़े तकरीबन 5 करोड़ धर्मस्थल हैं. इन धर्मस्थलों के बाहर बगैर काम कर के खाने वाले कोई लाखों भिखारी बैठे हैं. जो इन धर्मस्थलों की महिमा गाते हैं और मुफ्त में खाने के हक को भगवान का दिया हक बताते फिरते हैं.

हमारे धर्मों और संस्कृतियों ने मेहनत के बजाय भिक्षावृत्ति का खूब गुणगान किया है. भीख मांगने वाले को आदर, सम्मान दिया गया. निकम्मों को ऊंचा ओहदा मिला. शूद्र अगर मेहनत कर शिल्प का काम करता है तो भी उसे सम्मान के काबिल नहीं माना गया. यानी हम मेहनतकश नहीं, बेकार लोगों की जमात पैदा कर रहे हैं जो इस देश, समाज और व्यक्ति पर बोझ बनी हुई है.

ब्राह्मण, पुरोहितों, पंडों के जवाब में दूसरे वर्ण ने भी अपनेअपने मंदिर, मठ, आश्रम स्थापित कर लिए और अपने पुरोहित बना लिए. यानी जो काम इन वर्गों के लिए धर्म ने निषिद्ध किया था, उन में से कुछ ने उसे अपना लिया. इस का मतलब है परिश्रम करने वाले लोगों की संख्या और सीमित हो गई. बिना काम किए लूटने वाला नया वर्ग पैदा हो गया. नई आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के बाद पिछले करीब 2 दशक से काम न करने वालों का एक नया वर्ग पैदा हो गया.

देश के धर्मस्थल हमारे कारखानों, फैक्टरियों, कंपनियों से ज्यादा धन पैदा कर रहे हैं. यहां जिस ने भगवा पहन लिया, देखते ही देखते वह करोड़ोंअरबों में खेलने लगता है. मजे की बात है कि बिना कुछ किएधरे हमारे यहां धर्म का साम्राज्य राज्य से भी ज्यादा समृद्ध और ताकतवर है. यानी आडंबर और पाखंड का कारोबार दिन दूना चमक रहा है. धर्म की अर्थव्यवस्था में मंदी की कभी कोई गुंजाइश नहीं रही.

हमारे देश में धर्म का सालाना कारोबार 50 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का होने का अनुमान है. यह दुनिया के कई छोटे देशों के वार्षिक बजट को मिला कर भी अधिक बैठता है. यह धन मेहनतकश लोगों का है जो धर्म व ईश्वर के नाम पर की जा रही बेईमानी, चालबाजी पर  बड़ी श्रद्धा के साथ चढ़ाया जा रहा है.

महाराष्ट्र के गणपति उत्सव की बात करें तो वहां पूजा के नाम पर केवल 10 दिन में 500 से 700 करोड़ रुपए बिना टैक्स दिए पंडों द्वारा वसूल कर लिए जाते हैं. यह धन देश के किसी एक छोटे राज्य के बजट के बराबर है. यहां हजारों की संख्या में पंजीकृत गणपति मंडल हैं और करीब इतने ही गैर पंजीकृत हैं. 10 लाख से अधिक घरों में गणपति की विधिविधान से पूजा कराने पंडे ही आते हैं. यह संख्या अलग है.

इसी तरह पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा उद्योग 40 हजार करोड़ रुपए सालाना का बताया जाता है. इस में एक हिस्सा स्वार्र्थी लोगों के पास जाता है जिस का कोई टैक्स भुगतान नहीं किया जाता.  इसी तरह बिना हींग, फिटकरी के देशभर में रामलीला उद्योग खूब पनप रहा है. इन धर्मस्थलों के पास लाखों एकड़ उपजाऊ भूमि नाजायज तरीके से हड़पी हुई है. हाल में बलात्कार के आरोप में जेल में बंद आसाराम के कब्जे में देशभर में हजारों एकड़ जमीन है. जिस जमीन पर अन्न उत्पादन या कलकारखाने लगने चाहिए, वहां पाखंड का धंधा चलाया जा रहा है.

देश के मंदिरों में सैकड़ों टन सोना दबाया जा रहा है. देवीदेवताओं के रथ, सिंहासन, घंटे, घडि़याल, छत्र, कंगूरे, दरवाजे, सीढि़यां, चौखटें सोने से सजाई जा रही हैं. गिरती अर्थव्यवस्था के चलते पिछले दिनों वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने जनता से सोने की खरीदारी न करने की अपील की थी लेकिन धर्मस्थलों में धड़ल्ले से पुण्य के बदले सोना चढ़ाया जा रहा है. आंध्र प्रदेश में तिरुपति मंदिर, महाराष्ट्र में शिरडी, मुंबई में सिद्धिविनायक, केरल में पद्मनाभस्वामी जैसे मंदिरों में अकूत सोना दबा है. कहा जाता है कि जितना सोना सरकार के पास नहीं है उस से कई गुना इन धर्मस्थलों में पड़ा है. यानी जो धन लिक्विडिटी में यानी चलन होना चाहिए, वह धर्मों की तिजोरियों में बंद है.

गांवों, कसबों और शहरों में लोग खाली बैठे गपें हांकते, ताश खेलते मिलते हैं. चौपाल में, पेड़ों के नीचे बैठे मिलेंगे, लड़ाईझगड़ा करते और झूठी चौधराहट करते मिलेंगे पर काम करते नहीं. घर में 10 सदस्य हैं तो कमाने वाला एक है. घर के सारे के सारे कमाने वाले नहीं. वे इसी एक की कमाई से ही संतुष्ट हैं. भले ही घर में अभाव हो. यह एक रिवाज, परंपरा सी बनी हुई है और इस पर लोगों को गर्व भी है. भूख, गरीबी में भी काम न करना, है न कमाल की बात.

मजे की बात है कि बहाने भी हजार हैं. घर में औरत अकेली है, अकेली औरत को छोड़ना ठीक नहीं, बच्चों को कौन देखे, घर में एक मर्द का रहना जरूरी है, पशुओं को संभाले कौन? यानी इस तरह के बहानों ने गरीबी, भुखमरी, बेकारी और अपराध को खूब बढ़ावा दिया.

कई तो धर्म के प्रचार में दिनरात एक कर रहे हैं. कोई जाति का नेता बना हुआ है, कोई  गोत्र का झंडा उठाए हुए है, कोई देवता का, कोई मजार का. कहीं भजनकीर्तन चल रहा है, कहीं गुरु का प्रवचन तो कहीं भागवत कथा चल रही है. कहीं साईं संध्या तो कहीं माता के जागरण या चौकी में जुटे हैं.

लोग घरों में पूजापाठ, हवनयज्ञ में लगे हुए हैं, तीर्थयात्रा पर हैं. ऐसे करोड़ों लोग हैं जिन्हें देख कर लगता है मानो ये इसी काम के लिए जन्मे हैं. और तो और, लोग इसे अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ रहे हैं.

गजब का माहौल है. अरे भई, फिर इस देश में काम कौन कर रहा है? ऐसे में जनता क्यों हल्ला मचा रही है कि महंगाई है, भ्रष्टाचार है, सरकार कुछ नहीं कर रही है. आप से पूछा जाए, आप क्या कर रहे हैं? क्या सारे काम सरकार ही करेगी? नागरिकों का कोई दायित्व नहीं?

हमें परिश्रम को छोड़ कर चमत्कारों पर भरोसा करने की सीख दी गई. खाली बैठ कर रामनाम की माला जपने से ही सबकुछ हासिल हो जाने का आश्वासन दिया गया. केवल पूजापाठ, प्रार्थना, हवनयज्ञ और मात्र ईश्वर के दर्शनों से ही मनोकामना पूर्ण होने की गारंटी दी गई.

खाली बैठे लोग नशाखोरी को अनिवार्य मानते हैं. यहां हर कोई किसी न किसी नशे का सेवन करता है. देश में लाखों लोग जुआ, सट्टे की लत के शिकार हैं. जुआ, सट्टा बिना मेहनत किए बैठेबिठाए पैसा कमाने का जरिया हमारी महाभारतकालीन परंपरा का हिस्सा है.

सरकारें धर्मों के विकास पर अरबों रुपए खर्च कर रही हैं. अमरनाथ, हज, वैष्णोदेवी, केदारनाथ जैसी यात्राओं के नाम पर खजाना खुला ही रहता है. इस से लोगों को अकर्मण्यता की ओर धकेला जा रहा है. क्या यह पैसा लोगों को कर्म की ओर प्रेरित करने में नहीं लगाना चाहिए?  होना यह चाहिए कि जो काम नहीं करता उसे खाने का हक भी नहीं.

आज संप्रग सरकार को खाद्य सुरक्षा बिल, रोजगार गारंटी, शिक्षा की गारंटी, निशुल्क स्वास्थ्य जैसे कानून और अरबों की योजनाएं हमारी इसी सदियों पुरानी सामाजिक व्यवस्था के कारण लानी पड़ रही हैं.

इस के विपरीत चीन, जापान, यूरोप के देश तरक्की करते जा रहे हैं. चीन, जापान में हर व्यक्ति को काम करने की प्रेरणा कानूनों और परंपराओं से मिली है. जापान में हर जन के हाथ काम में लगे हैं. उन का अपने देश की अर्थव्यवस्था में योगदान है. यूरोप पुनर्जागरण के बाद तेजी से तरक्की के रास्ते पर चल पड़ा. मार्टिन लूथर ने पोपशाही के खिलाफ बोलने का साहस किया और अमेरिका चर्च के झूठे पाखंडों से हट कर आर्थिक विकास की ओर मुड़ गया. फिर तो दुनिया का इतिहास बदल गया. जंगलों में रहने वाली गोरों की कौम ने दुनियाभर पर राज करना शुरू कर दिया.

क्या हमारे यहां ऐसा कोई शासक आया जिस ने गुरुडम के खिलाफ दो शब्द भी कहने की हिम्मत दिखाई? उलटे तमाम नेता, शासक गुरुओं के चरणों में नतमस्तक दिखाई पड़ते रहे. आंकड़े बताते हैं कि आज 1 चीनी नागरिक 1 भारतीय से तीनगुना ज्यादा अमीर है. 2012 में भारत की प्रति व्यक्ति आय घट कर चीन के मुकाबले सिर्फ

24 प्रतिशत रह गई. अकेला चीन भारत को 54 प्रतिशत माल का आयात कर रहा है. इस में बड़ी संख्या उपभोग की वस्तुओं की है. जबकि आयात किया जाने वाला माल आसानी से भारत में भी बनाया जा सकता है. हमारे यहां निर्यात की तुलना में आयात तेजी से बढ़ रहा है.

हम अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक व्यवस्था की वजह से अपनी क्षमता से बहुत कम प्रदर्शन कर पाते हैं. निकम्मापन, आरामतलबी हमारी नसनस में समाई हुई है, इसलिए तरक्की की दौड़ में हम पिछड़ रहे हैं. हमारा धर्म देश में सटोरिए, जुआरी, नशेड़ी, सट्टेबाज, कबूतरबाज, भ्रष्टाचारी, बेईमान और बिना मेहनत किए रातोंरात अमीर बनने की ख्वाहिश रखने वाली पीढि़यां पैदा कर रहा है, उद्यमशील व्यक्ति नहीं. लोगों में निचला, पिछड़ा बनने की होड़ लगी है. समाज इस बात में उलझा है कि लड़की की शादी किस गोत्र में हो.

हमारी यह पुरानी व्यवस्था गरीबी, काम किए बिना धन पाने की मानसिकता पैदा करती है, सो, आर्थिक समानता के बजाय आर्थिक असमानता बढ़ती जाती है. विकास, तरक्की को हमारी जातियों, धर्मों, वर्गों में बंटे समाज ने अवरुद्ध कर रखा है. आएदिन के दंगों, तनावों ने अरबों की संपत्ति को नष्ट किया. रहासहा उत्पादन ठप किया. हम इसी सोच के चलते बारबार अतीत के गीत गाते हैं. लफ्फाजी ज्यादा और काम कम करते हैं. बिना मेहनत किए कथित भगवान से ‘छप्पर फाड़ कर’ पाने की बेकार की उम्मीदें पाले रखते हैं. गरीबी, भुखमरी, बेकारी को हम पूर्व जन्म के कर्मों का फल मान कर कामधाम नहीं करते.

योजना आयोग के एक अध्ययन के अनुसार, उदारीकरण के बाद 1 करोड़ 40 लाख लोग खेती से बेदखल हो गए और विनिर्माण क्षेत्र में 53 लाख लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा है. यानी यह जमीन मेहनतकशों से छीन कर निकम्मों को दे दी गई.

सदियों से सरकारें सेना की ताकत बटोरने में ही लगी रहीं. राजामहाराजा हमेशा युद्धों में उलझे रहे. किसी अच्छे उद्देश्य के लिए नहीं, इसलिए ताकि दूसरे की धन, संपदा पर कब्जा किया जा सके.  हमारी सरकार नए पंडों की जमातें बन गईं जो काम नहीं करतीं, काम में रुकावट डालती हैं. पिछले ढाई हजार सालों में जो झंझावात चला वह देश, समाज, व्यक्ति के विकास के लिए नहीं, दूसरों पर वर्चस्व और लूटखसोट के लिए चला.

व्यवस्था गरीबों और आम लोगों को ही नहीं, अमीरों को भी सब्सिडी की रेवडि़यां बांट रही है. खाद्य सुरक्षा  बिल के तहत सरकार 1.20 लाख करोड़ रुपए बांट रही है तो 32 लाख करोड़ रुपए कौर्पोरेट को सब्सिडी के नाम पर भेंट कर रही है. इस दान के बावजूद औद्योगिक उत्पादन लगातार गिरता जा रहा है.

मौजूदा समय में सरकार ने उत्पादन के बजाय सर्विस उद्योग की ओर ध्यान केंद्रित किया पर इस से बिचौलिए, सटोरिए, दलाल पैदा हो गए. बेईमानी अधिक पनपी. लिहाजा, मनमोहन सिंह अब फिर सर्विस से ध्यान हटा कर उत्पादन की बात कहने लगे हैं.

पिछले साल कारोबार के बेहतर माहौल वाले देशों की सूची में भारत का स्थान 132 से फिसल कर 182वें पर आ गया. दिक्कत यह है कि सरकार भी धर्म की राह पर चल रही है. हम दूसरे देशों के बजाय आर्थिक उत्थान वाले कानून नहीं, निकम्मेपन को प्रश्रय देने वाले कानून ज्यादा बना रहे हैं. इन कानूनों में बिना मेहनत किए बैठेबिठाए लोगों को भोजन, मकान देने के पक्के इंतजाम हैं.

हमारे नेताओं का सारा ध्यान अयोध्या में राममंदिर बनाने में, केदारनाथ में पूजापाठ शुरू कराने में, लैपटौप बांटने, बेरोजगारों को भत्ता देने, नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने जैसी बातों में ज्यादा है. बजाय इस के कि इस देश में जो निठल्ली सोच है उस में बदलाव कैसे लाया जाए.

संसद का ज्यादातर समय फालतू की बहसों, मसलन, प्रधानमंत्री को चोर क्यों कहा? सत्ता पक्ष ने विपक्ष को बेईमान क्यों कहा? संसद, विधानसभाओं में प्रतिनिधि काम की ठोस बातें करने के बजाय नदारद रहते हैं या सोए देखे जा सकते हैं या फिर पौर्न वीडियो देखने में मशगूल रहते हैं.

धार्मिक नेताओं, संगठनों को चिंता इस बात की अधिक रहती है कि उन के धर्र्म के लोग दूसरे पाले में तो नहीं जा रहे हैं. दूसरे धर्म के लोग उन की निंदा तो नहीं कर रहे हैं. उन के तीर्थ, मंदिरों का विकास हो रहा है या नहीं. उन्हें चिंता इस बात की नहीं है कि उन के धर्म के लोगों की गरीबी कैसे दूर हो, उन को रोजगार कैसे मिले, वे मेहनत कर रहे हैं या नहीं.

मीडिया इस बात पर बहस करने में ज्यादा रुचि दिखा रहा है कि बलात्कारी आसाराम की जमानत होगी या नहीं, गैंग रेप केआरोपियों को सजा उम्रकैद होगी या मृत्युदंड? अमिताभ बच्चन की फिल्म चलेगी या नहीं? आज आप का दिन अच्छे शकुन से गुजरेगा या नहीं? यात्रा, नौकरी पर जा सकते हैं या नहीं? 300 से अधिक टैलीविजन चैनलों में से 1 में भी ऐसा कार्यक्रम नहीं देखने को मिल रहा जो लोगों को परिश्रम की प्रेरणा देता हो. इन पर नाच, गाने, धार्मिक पूजापाठ, कथाएं, खानेपिलाने और ढोंगी बाबाओं के खोखले प्रवचनों के प्रपंच दिनरात चलते रहते हैं.

ऐसे में इस देश की अर्थव्यवस्था की बेहतरी की बात कौन करेगा माली हालत कैसे सुधरेगी? इस देश में कितने लोग निकम्मे हैं, क्या उन्हें भोजन पाने का हक होना चाहिए? जिन का आर्थिक उत्पादन में कोई सहयोग न हो, उन से काम कैसे कराया जाए, क्या ऐसी किसी सोच पर अमल होगा?

अर्थशास्त्र में भूमि, श्रम, पूंजी और उद्यमिता उत्पादन के मूल साधन माने जाते हैं. क्या हमारी संस्कृति में, जनता और राज की सोच में ये सब चीजें शामिल हैं? किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती वहां के लोगों के परिश्रम, कर्मशीलता, काम के प्रति ईमानदार सोच, लगन पर निर्भर करती है. देश में विकास की चमक अगर फीकी दिखने लगती है तो इस का मतलब है विकास हवाई महल की तरह है जो हलके झोंके से ही भरभरा कर गिर सकता है. ठोस, मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए हर नागरिक के हाथ में काम होना जरूरी है.

सुरक्षा की महत्ता

भारत कुछ समय से कम से कम एशिया की बड़ी सैनिक शक्ति बनने की कोशिश कर रहा है. भारत का कोचीन में बना विक्रांत जब पानी में उतरा तो बहुत खुशी हुई कि भारत विशाल जहाज बना सकता है जिस पर हवाई जहाज उतर सकें पर उस उस के कुछ दिन बाद ही परमाणु ईंधन से चलने वाली पनडुब्बी सिंधुरक्षक में लगी आग ने भारतीय नौसेना को सकते में डाल दिया है. भारत के पास केवल 8 पुरानी पनडुब्बियां बची हैं और इस दुर्घटना के बाद उन की जांचपड़ताल कुछ ज्यादा ही होगी.

दूसरी ओर चीन के पास डीजल से चलने वाली 47 और परमाणु ईंधन से चलने वाली 8 पनडुब्बियां हैं. वह अपने बेड़े में लगातार विस्तार भी कर रहा है. हमारा प्रबल शत्रु पाकिस्तान भी बहुत पीछे नहीं जबकि उस का समुद्रतट उतना लंबा नहीं है जितना भारत का है. व्यापार की सुरक्षा के लिए नौसेना बहुत आवश्यक है क्योंकि किसी खटपट के चलते यदि शत्रु ने कभी जल रास्ते रोक दिए तो बहुत सी आवश्यक सामग्री, जिस में पैट्रोल सब से महत्त्वपूर्ण है, आना बंद हो सकता है.

हमारी सेना के उपकरणों में हादसे होते रहते हैं. जिस तरह हमारे टैंक, तोपें, मिग हवाई जहाज रखे जा रहे हैं, उस से लगता नहीं कि देश में किसी को रक्षा के महत्त्व का एहसास है. यहां सेना रिश्वत के मामलों में बंटवारे पर होती लड़ाई के समय चमकती दिखाई देती है.

हमारे नेता चुनाव रैलियों में या लालकिले पर चढ़ कर बड़ीबड़ी बातें करते हैं पर देश की सेना कितनी लुंजपुंज है, यह अब किसी से छिपा नहीं है. अरबों के खर्च के बावजूद सेना ऐसा भरोसा नहीं दिला पा रही कि वह रूस, चीन, इंगलैंड जैसे देशों से मुकाबला कर सकती है. हम आमतौर पर हथियारों के लिए उन्हीं रूस, अमेरिका, इटली, जरमनी, डेनमार्क आदि पर निर्भर रहते हैं जो पैसे तो मनमाने लेते हैं पर क्या देते हैं या जो देते हैं, क्या हम उन्हें चलाना भी जानते हैं, इस पर कोई बोलना नहीं चाहता.

अब भी समय है कि हम सेना को वैदिक ग्रंथों की तरह का दरजा दे कर आलोचना से ऊपर रखने की कोशिश न करें. देश में बुद्धिमानों व परिश्रम करने वालों की कमी नहीं पर वे राजनीति, कूटनीति व रिश्वतनीति नहीं जानते.

उन की आलोचना सुनने में कोई हर्ज नहीं है. अगर वे कह रहे हैं कि सेना में भ्रष्टाचार है, खरीदी में बेईमानी है, खरीदा गया सामान घटिया है, सैनिकों का मनोबल कमजोर है तो उसे सुना जाए. सेना पर पड़ा परदा हटाना चाहिए ताकि पनडुब्बी या मिग विमानों के गिरने के हादसों के कारण साफ हो सकें. यह बहस देशद्रोह नहीं होगी क्योंकि देश की सेना का असल हाल क्या है, विदेशियों को आमतौर पर मालूम रहता है.

सुरक्षा का एहसास तभी होगा जब हम अपने बारे में सच, पूरा सच जानेंगे. आधेअधूरे झूठ के सहारे सपने बुने जा सकते हैं, हकीकत का मुकाबला नहीं किया जा सकता.    

कश्मीर पर बयानबाजी

पूर्व सेना अध्यक्ष विजय कुमार सिंह  का सार्वजनिक रूप से यह मान लेना कि आजादी के बाद से ही सेना, जम्मूकश्मीर के मंत्रियों को शांति बनाए रखने के लिए पैसा देती रही है, एक गंभीर अपराध है. यह बात उन्होंने अपने बचाव में तब कही जब उन पर आरोप लगे कि वे पैसा दे कर जम्मूकश्मीर की सरकार को गिराना चाहते थे. अब वे यह नहीं कह रहे कि यह तथ्य गलत है बल्कि यह कि इस बात का खुलासा करने वाले को दंडित किया जाए.

जम्मूकश्मीर निसंदेह बहुत संवेदनशील राज्य है. मुसलिम बहुल इस राज्य पर सिख राज के जमाने से हिंदू शासकों ने कब्जा जमा लिया था और 1947 में राजा हरिसिंह नलवा ने काफी हिचक और नानुकुर करने के बाद ही भारत में उस के विलय की संधि पर हस्ताक्षर किए थे. उस देरी के कारण ही राजा का एकतिहाई हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में चला गया था और आज तक भारत उसे छुड़ा नहीं पाया है.

यही नहीं, भारत खासा पैसा खर्च करने के बावजूद वहां की जनता को पूरी तरह प्रभावित नहीं कर पाया कि उस का जीवन भारत में ज्यादा सुखी रहेगा. कश्मीर के कठमुल्ले कश्मीरियों को पाकिस्तान में विलय के लिए उकसाते रहते हैं. और पाकिस्तान अंगरेजों द्वारा नियुक्त रैडक्लिफ आयोग की रिपोर्ट के सिद्धांत के अनुसार, कश्मीर पर अपना हक मानता है. ऐसे में सिर्फ बयानबाजी से मामले को उलझाना बेवकूफी है.

पूर्व सेना अध्यक्ष वी के सिंह वास्तव में विवाद खड़े करने में माहिर हैं. कभी वे सेना की खरीद पर विवादों में आते हैं, कभी अपनी उम्र पर तो कभी अपने निजी गुप्तचर संगठन पर.  क्या भारतीय जनता पार्टी को ऐसे ही विवादित लोग मिलते हैं जो निर्माण की जगह विध्वंस में विश्वास करते हैं? नरेंद्र मोदी ने 2002 में धर्म के नाम पर मुसलमानों की सुरक्षा के एहसास का विध्वंस किया, लालकृष्ण आडवाणी ने राममंदिर के लिए बाबरी मसजिद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए राजग यानी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का.

राम मिलाए जोड़ी, एक अंधा एक कोढ़ी. सो वी के सिंह सही जगह पहुंचे हैं.

अदालत और जनप्रतिनिधि

जिन चुने प्रतिनिधियों पर अपराध साबित हो गया हो वे विधानसभा या लोकसभा के सदस्य नहीं रह सकते, सुप्रीम कोर्ट की कानूनों की इस व्याख्या ने हड़कंप मचा दिया क्योंकि कितने ही विधायक व सांसद ऐसे हैं जिन्हें 1 अदालत ने अपराधी करार दिया पर अभी उन की अपीलों पर विचार होना बाकी है. वे बाहर हैं क्योंकि उन्हें जमानत मिली हुई है और इसी नाते वे अपनी सदस्यता बनाए रख पा रहे हैं. चूंकि इस के दायरे में लालू प्रसाद यादव जैसे कई नेता आ रहे हैं, इसलिए कांगे्रस ने अध्यादेश बनाया ताकि वे आधेअधूरे सदस्य बने रह सकें. 

पर इस अध्यादेश पर जो जनरोष पैदा हुआ और जिस तरह से राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने आंख मूंद कर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया उस से कांग्रेस के तेवर ढीले पड़ गए. राहुल गांधी ने एक आम प्रैस सम्मेलन में अचानक पहुंच कर इस अध्यादेश को नौंनसैंस यानी बेहूदा और फाड़ कर फेंकने लायक घोषित कर दिया. उस से कांग्रेस ही नहीं, अध्यादेश का विरोध कर रहे दल भी सकते में आ गए.

अध्यादेश तो अब पानी में गया और नतीजे के तौर पर सोमवार, 30 सितंबर को रांची की एक विशेष अदालत के फैसले के अनुसार चारा घोटाले मामले में लालू प्रसाद यादव को मुजरिम करार दे दिया गया. यह घोटाला लालू प्रसाद यादव के तब के संयुक्त बिहार के मुख्यमंत्री रहते किया गया था. उन्हें सजा ही नहीं हुई, शायद वे वर्षों तक चुनाव भी न लड़ सकें. हां, अगर अपील में उन की जीत हो जाए तो बात दूसरी.

अपराध सिद्ध होने पर भारतीय कानून में अपील का अधिकार है. आमतौर पर गंभीर आपराधिक मामला न हो और केवल आर्थिक हो तो अपील के दौरान जमानत मिल जाती है. केवल जघन्य अपराधों में अदालतें अपील के दौरान अपराधी को जेल में रखती हैं. यह व्यवस्था ठीक है वरना अपील के अधिकार का मतलब ही नहीं रह जाएगा क्योंकि अगर अपील के दौरान अपराधी 10-12 वर्ष जेल में रहने के बाद निरपराध सिद्ध हो तो जेल में रहे दिन तो वापस नहीं मिलेंगे. अपील का अधिकार ही न हो तो सजा दी जा सकती है.

नेताओं का अपराधी होना गंभीर बात है पर इस का फैसला जनता के हाथ में है. जनता अगर अपराधियों को चुनती है तो उन्हें स्वीकारने के अलावा कोई चारा नहीं. कोई कानून नेताओं पर केवल इसलिए लागू हो कि राजनीति से अपराधी तत्त्व निकालने हैं, गलत होगा. कानून नेताओं पर उसी तरह लागू होना चाहिए जैसा आम आदमियों पर लागू होता है.

लगता यह है कि अदालतें राजनीति को साफ करने में जरूरत से ज्यादा उत्सुक हैं पर जनता को न्याय देने में बिलकुल नहीं. अगर अपराध हुआ तो पता चलने के 4-5 महीनों में सभी अदालतें फैसला क्यों नहीं दे सकतीं? यदि रेल दुर्घटना होती है तो बीमारों का इलाज क्या 5 साल बाद किया जाएगा? यदि बाढ़ आई है तो हफ्तों विचार तो नहीं किया जाएगा कि कैसे बाढ़ में फंसे लोगों को बचाया जाए? सो, अदालतों का काम न्याय करना है तो वे तुरंत करें.

अदालतों में देरी होने के कारण ही देश में आपाधापी है. किसी अफसर, सरकारी बाबू या नेता की अपराध करने की हिम्मत ही इसीलिए होती है क्योंकि वह जानता है कि पकड़ा गया तो अदालतें फैसला करने में 20 साल लगाएंगी. जब अदालतें अपने आप को नहीं सुधार सकतीं, तुरंत न्याय नहीं दे सकतीं तो वे नेताओं से कौन सी व कैसी नैतिकता की मांग कर सकती हैं?

आतंकवाद का आतंक

केन्या में 1 मौल पर और पाकिस्तान में 1 चर्च पर तालिबानियों व दूसरे मुसलिम आतंकवादियों के कू्रर हमलों पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए. धर्म की रीत ही यह है कि अपने विरोधियों या अपने भगोड़ों को मार डालो, नष्ट कर डालो, जला डालो. धर्म टिका ही हिंसा पर है जो जबरन थोपी जाती है और जिस के बल पर लोगों के मन में धर्म के प्रति आस्था, डर, विश्वास स्थापित किए जाते हैं.

कू्रर से कू्रर अपराधी भी अपनी हिंसात्मक करतूत को जायज ठहराने के लिए कोई न कोई स्पष्टीकरण पैदा कर लेता है कि वह जो कर रहा है, सही है और उस हालत में वही एकमात्र उपाय है. फर्क यह है कि कू्रर अपराधी को समाज सजा देता है पर हिंसक धार्मिक प्रचारक की पूजा की जाती है, उसे बहादुर कहा जाता है और मरने पर शहीद कहा जाता है.

केन्या के नैरोबी में और पाकिस्तान के पेशावर के चर्च में मरने वालों ने इसलाम के खिलाफ न तो कुछ किया था, न कहा था. केन्या, पाकिस्तान, अमेरिका हो या भारत, धार्मिक आतंकवादी गुनाह और सजा के चक्कर में नहीं पड़ते. उन्हें तो मोहरे चाहिए जिन पर आक्रोश जता कर वे यह साबित कर सकें कि उन के हाथ कितने लंबे हैं और उन के हथियार कितने खतरनाक हैं.

एक तरह से वे विधर्मियों या विदेशियों को नहीं, अपने देश में, अपने समाज में संदेश देते हैं कि उन की अनसुनी न की जाए वरना वे अपनों के साथ भी वही कर सकते हैं जो निहत्थे, निर्दोषों के साथ करते हैं. दरअसल, यह धर्म के खोखलेपन को छिपाने की तरकीब है और मानना पड़ेगा कि यह बेहद सफल है.

इसलामी देशों में इसी आतंकवाद के कारण लोग सत्ता के विरुद्ध विद्रोह नहीं कर रहे. अधिकांश मुसलिम कट्टर देश बेहद गरीब हैं. जहां तेल मिल गया वहां पैसा है. मुसलिम देशों में लोकतंत्र नहीं है. कट्टर मुसलिम देशों में तो औद्योगिक प्रगति भी न के बराबर है. दुनियाभर के गरीब मुसलिम तेल पैदा करने वाले देशों में गुलामी कर रहे हैं पर वे अपने शासकों और कट्टरपंथियों के खिलाफ कुछ नहीं बोल रहे.

मुसलिम देशों में समाज सुधार न के बराबर है. वहां औरतों को तो छोडि़ए, आदमियों को बराबर के अधिकार नहीं हैं. वहां की जेलें निर्दोषों से भरी हैं. केवल मुल्ला और तानाशाह मौज करते हैं. वे इंसानों को हिंसा का पाठ पढ़ा रहे हैं. सद्दाम हुसैन ने इराक में, कर्नल मुअम्मर गद्दाफी ने लीबिया में, राष्ट्रपति अल असद ने सीरिया में अपने ही लोगों पर गोलियां चलाईं, अपनों को मारा. हिंसा का पाठ पढ़नेपढ़ाने वाले मुसलिम आतंकवादी इतने तंगदिल और बदमिजाज हैं कि किसी पर भी बंदूक उठाने या बम फेंकने पर उन के दिल में दर्द नहीं होता. ऐसा हर धर्म के कट्टर लोग सदियों से करते रहे हैं, यहूदियों ने जीसस के साथ किया, शंकराचार्य ने बौद्धों के साथ किया, हिटलर ने यहूदियों के साथ भी ऐसा ही किया. इस बार की घटनाएं धर्मजनित हिंसा के इतिहास के पहाड़ में बारीक बालू के कणों की तरह हैं, इस से ज्यादा नहीं.

 

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