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जैनेरिक दवाएं : स्वास्थ्य सेवाओं में मायूस

जैनेरिक दवाओं के उत्पादन और निर्यात में भारत दुनिया में सब से आगे है, जबकि ज्यादातर भारतीय बीमारी में दवाओं का खर्चा नहीं सह सकते. कई देशों से मरीज भारत में सस्ते इलाज के लिए आते हैं. नतीजतन, देश में ‘मैडिकल टूरिज्म’ फलफूल रहा है. वहीं 70 प्रतिशत भारतीय मरीजों के लिए डाक्टरी सेवा उपलब्ध नहीं है.

अस्पतालों में हर हजार भारतीयों के लिए मात्र 1.5 बैड उपलब्ध हैं जबकि चीन, ब्राजील, थाईलैंड और दक्षिणी कोरिया में हर हजार मरीजों के लिए औसतन 4 बैड हैं. देश के दोतिहाई नागरिक स्वास्थ्य सेवा पर खर्च निजी पैसे से ही करते हैं.

हमारे देश के ज्यादातर आंकड़े देश के स्वास्थ्य का दुखद खाका खींचते हैं. उदाहरणार्थ, रेलगाड़ी के लंबे सफर में सुबह खिड़की के बाहर गांवों के दृश्य चिंताजनक बन जाते हैं जब हम यूनिसेफ के इन आंकड़ों को ध्यान में लाते हैं. भारत की 50 फीसदी जनसंख्या बाहर खुले में शौच करती है. ब्राजील और चीन में यही संख्या 7 प्रतिशत और 4 प्रतिशत ही है. वहीं, देश की अधिकांश आबादी मल को फेंकने का सही इंतजाम करना तो दूर, मल को बाहर ही छोड़ देती है या फिर लापरवाही से कूडे़ के साथ फेंक देती है. नतीजतन, जो बीमारियां पनपती हैं उन के चंगुल में सिर्फ ये गरीब गांववासी ही नहीं, पूरी जनता फंसती है. फिर भी साल दर साल हमें गांवों में वही के वही दृश्य देखने को मिलते हैं. साफ है कि इस समस्या का समाधान काफी मुश्किल है.

देश की भारी जनसंख्या और लोगों की बीमारियों की तरफ लापरवाही या बीमारियों को उचित महत्त्व न देना, ये 2 वजह हैं कि दुनिया की कई बीमारियों, जैसे डेंगू ज्वर, हैपेटाइटिस, तपेदिक, मलेरिया और निमोनिया ने हमारे देश में ज्यादा भयंकर रूप धारण कर लिया है और आज इन के जानेमाने इलाज हमारे यहां काम ही नहीं करते.

वर्ल्ड बैंक की एक हालिया रिपोर्ट में भारतीय बच्चों का स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ा चौंकाने वाला है. भारत के 3 साल से कम उम्र के बच्चों में 47 प्रतिशत यानी 6 करोड़ बच्चे कुपोषित हैं. यह संख्या दुनिया के कुल (3 साल से कम उम्र के) कुपोषित बच्चों की संख्या का एकतिहाई है यानी भावी चमकते भारत के लगभग आधे नागरिक जन्म से ही रोगी होंगे. स्वस्थ भारत का स्वप्न और भी दूर जाते हुए दिखता है, क्योंकि खुशहाल भारतीयों की देश से निकल कर ज्यादा विकसित देशों में जा बसने के इरादे रखने वालों की संख्या बढ़ती हुई दिखती है.

देश में स्वास्थ्य कर्मचारियों की भारी कमी है. भारत को कई लाख डाक्टरों और नर्सों की जरूरत है. मैडिकल काउंसिल औफ इंडिया के अनुसार, वर्ष 2006 में देश की विभिन्न स्टेट मैडिकल काउंसिल्स में 6,96,747 डाक्टर पंजीकृत थे पर इन में से 75 प्रतिशत बड़े शहरों में, 23 प्रतिशत छोटे शहरों में और मात्र 2 प्रतिशत गांवों में प्रैक्टिस कर रहे हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 250 लोगों की आबादी पर कम से कम 1 डाक्टर होना चाहिए जबकि देश के 6 अच्छे राज्यों में 1,600 लोगों की आबादी पर 1 डाक्टर है. वर्ष 1965 में देश में 83 मैडिकल कालेज थे. आज लगभग 50 साल बाद यह संख्या 335 है.

देश में डाक्टरों की कमी है, जबकि विदेश में बेहतर अवसरों की तलाश में डाक्टर देश छोड़ कर जा रहे हैं. भारतीय सरकार नौजवानों को अच्छा प्रशिक्षण देने में तो कामयाब हुई मगर उन्हें उपयुक्त जौब देने में चूक गई. इस तरह से देश के कई भागों, विशेषकर गांवों में, जहां दोतिहाई भारतीय रहते हैं, स्वास्थ्य सेवाएं दयनीय हैं. ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि चिकित्सकीय देखभाल के चलते कर्ज में दब कर हर साल 2 करोड़ भारतीय गरीबी रेखा के और नीचे आ जाते हैं.

12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-2017) में सरकार के एक प्रस्ताव के अनुसार, सरकारी अस्पतालों में सैकड़ों जरूरी दवाएं मरीजों को मुफ्त उपलब्ध होंगी. पर ये दवाएं जैनेरिक यानी उन के कैमिकल नाम से जानी जाएंगी और दी जाएंगी. ये सामान्य दवाएं होंगी. योजना के तहत सरकारी डाक्टर 350 जरूरी दवाओं की सरकार द्वारा तैयार की गई सूची से ही नुसखा लिख सकते हैं, ताकि बड़ी कंपनियां ही उस का फायदा न उठाएं. 5 सालों तक लागू इस व्यवस्था में केंद्रीय सरकार 200 अरब रुपए और राज्य सरकारें 66 अरब रुपए खर्च करेंगी.

वैसे पिछले दशकों में सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दवाओं का वितरण बड़ी रफ्तार से घटा है. जहां 1987 में अस्पताल में भरती मरीजों को निर्धारित दवाओं में 31 प्रतिशत मुफ्त थीं वहीं 2004 तक केवल 9 प्रतिशत को इस सुविधा में रखा गया. दवाओं की कीमत कम रखने के लिए लगभग 35 वर्षों तक भारत सरकार दवाओं के लिए पेटेंट नहीं लागू कर रही थी, इस वजह से आज देश में जैनेरिक दवाओं के उत्पादन का एक फलताफूलता उद्योग उभरा है. पंचवर्षीय योजना के तहत बांटी जाने वाली दवाएं सिपला, ल्यूपिन व रैनबैक्सी जैसी भारतीय कंपनियां तैयार करेंगी.

कुछ संभावित रोड़े

इस योजना के रास्ते में कई रोड़े आ सकते हैं :

  1. जैनेरिक दवाएं किसी पेटेंट से नहीं बंधी होतीं, इसलिए कोई भी कंपनी इन का निर्माण कर सकती है. यह बात तो है कि जितनी कंपनियां एक दवा के निर्माण में लगी होंगी, उतनी ही उस दवा के मूल्य में कटौती होगी. मगर इस बात पर भी ध्यान देना जरूरी होगा कि दवा की गुणवत्ता आश्वासन की जांच करने के लिए कोई सरकारी संस्था भी तैनात हो.
  2. दवा अस्पतालों में उपलब्ध हों और ज्यादा से ज्यादा जरूरतमंद इस का फायदा उठा पाएं, इस के लिए भी सरकारी दखल का होना जरूरी है.
  3. इस प्रणाली की सफलता में महत्त्वपूर्ण योगदान सरकारी डाक्टरों का होगा जो स्थानीय तौर पर मौजूद होते हैं.

सैद्धांतिक रूप से इस योजना के सफल होने के आसार अच्छे दिखे हैं लेकिन यह भी मानना पक्का है कि यह नेताओं और अफसरों के लिए पैसा कमाने का जरिया बन जाएगी. देश में स्वास्थ्य सेवा अपनेआप में एक प्रमुख उद्योग है. 2008 में सब से विकासशील देशों के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का 9 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवा पर खर्च किया गया. अमेरिका 16 प्रतिशत, फ्रांस 11.2 प्रतिशत और स्विट्जरलैंड 10.7 प्रतिशत खर्चने के साथ विश्व में स्वास्थ्य पर सर्वोच्च खर्च करने वाले देश हैं. इन के मुकाबले में भारत स्वास्थ्य में अपने जीडीपी का केवल 1.4 प्रतिशत खर्च करता है और चीन 2.3 प्रतिशत. सालों के बीतने के साथ यह खर्च हर देश में बढ़ा ही है, जाहिर है कि आने वाले सालों में स्वास्थ्य पर खर्च और बढ़ेगा. भारत की उत्पादकता कम है, क्योंकि इस की बड़ी जनसंख्या असल में बीमार है.

आमतौर पर स्वास्थ्य सुविधा व्यवस्था का निधिकरण 4 तरीकों से होता है. आम जनता से कर वसूली, निजी कंपनी द्वारा स्वास्थ्य बीमा, खुद मरीज द्वारा भुगताया खर्च या उदार या निजी संगठनों द्वारा दान.

भारत में स्वास्थ्य खर्च अधिकांश नागरिकों के आउट औफ पौकेट यानी खुद का भुगताया हुआ ही है. हमारे देश का कर आधार भी सरकार की इस कोशिश को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं है. इसलिए सरकार की मुफ्त जैनेरिक दवाएं बांटने की यह कोशिश एक कामचलाऊ प्रबंध ही हो सकता है. दीर्घावधि निर्वाह के लिए यदि हमारे देश के नीतिनिर्धारक सामाजिक, निजी, व्यावसायिक और सरकारी स्रोतों को ले कर विशिष्ट रूप से भारतीय जरूरतों के लिए कोई नई प्रणाली बना पाएं, तो शायद कुछ बात बन सकती है.      

गर्मजोशी से राजन का स्वागत

इसे संयोग ही कह सकते हैं कि रिजर्व बैंक के गवर्नर पद पर रघुराम राजन की तैनाती के बाद से शेयर बाजार में खुशहाली लौटी है और रुपया गिरावट की ओर बढ़ने के बजाय सुधार का रुख करने लगा. नए गवर्नर के पदभार संभालने के बाद कई दिनों तक रुपए में सुधार रहा और उस में मजबूती का स्तर बेहद उत्साहजनक बना रहा.

उधर, शेयर बाजार का सूचकांक लंबे अरसे बाद 20 हजार अंक के मनोवैज्ञानिक स्तर तक पहुंचा. 10 सितंबर को तो सूचकांक 4 साल में पहली बार 1 दिन में 729 अंक की रिकौर्ड ऊंचाई पर पहुंचा. 4 दिन तक बाजार में उछाल रहा लेकिन 5वें दिन सूचकांक स्थिर रहा, हालांकि निफ्टी में 5वें दिन भी बढ़त जारी रही.

जानकार इस की बड़ी वजह सीरिया के बदले रुख को मानते हैं. उन का कहना है कि सीरिया पर अमेरिकी कार्यवाही की बढ़ती आशंका से बाजार में घबराहट थी लेकिन युद्ध नहीं होने की संभावना बनते ही बाजार का माहौल बदल गया. वैश्विक बाजार भी सुधरे.

इसी बीच, अगस्त में भारत का निर्यात 13 फीसदी बढ़ने, कारों की बिक्री 15 प्रतिशत चढ़ने और नौकरियों की संभावना बढ़ने जैसे कई सकारात्मक आंकड़ों के परिणामों की बदौलत शेयर बाजार में जम कर बिकवाली हुई. इसी दौरान सरकार ने कहा कि रुपए के लगातार मजबूत होने से डीजल के दाम नहीं बढ़ाए जाएंगे. इन सब परिस्थितियों का बाजार पर सकारात्मक असर पड़ा जिस से सूचकांक में सुधार रहा. सितंबर के दूसरे पखवाड़े में तो सेंसैक्स 20 हजार के अंक को पार कर गया. यानी दीवाली से पहले शेयर बाजार में दीवाली मन रही है.

एटीएम से निकल रहे नकली नोट

हम लोग तकनीकी का बखूबी इस्तेमाल करते हैं. हम बाबूगीरी से परेशान हैं इसलिए मशीन से होने वाले काम को तवज्जुह देते हैं. भला हो तकनीकी विशेषज्ञों का जिन्होंने संचार क्रांति ला कर काम को आसान कर दिया है. हमें दलालों से बचाया और लंबी लाइन में खड़े होने से मुक्ति दी है. रेल टिकट के लिए अब धक्के खाने से बच गए हैं.

गांवदेहात में जाइए तो वहां भी एटीएम से पैसा निकालने का प्रचलन बढ़ा है. एक आंकड़े के अनुसार, पिछले वर्ष अप्रैल से इस वर्ष मई तक एटीएम मशीन से पैसे निकालने की दर 37 प्रतिशत बढ़ी है. नैशनल पेमैंट कौर्पोरेशन औफ इंडिया ने कहा है कि इस अवधि में एटीएम से भुगतान 41 हजार 360 करोड़ रुपए से बढ़ कर 56 हजार 525 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है. लोगों में एटीएम के इस्तेमाल के प्रति और बढ़ते रुझान को देखते हुए बैंकों ने भी इस मशीन के विस्तार पर खास फोकस किया है और वे जगहजगह एटीएम मशीनों को स्थापित कर रहे हैं.

बैंकों में मानो एटीएम मशीन लगाने की होड़ मची है. पिछले वर्ष जनवरी में 69 हजार एटीएम मशीनें थीं जिन की संख्या बढ़ कर अब 1 लाख 22 हजार के करीब पहुंच चुकी है. रिजर्व बैंक औफ इंडिया ने तो अब ‘ह्वाइट लैवल’ मशीन लगाने की अनुमति भी दे दी है. ह्वाइट लैवल मशीन बैंक की नहीं बल्कि निजी कंपनी की होती है. टाटा कम्युनिकेशंस सौल्यूशन और मुथूट फाइनैंस जैसी बड़ी कंपनियां इस क्षेत्र में कूद रही हैं. इस का मतलब यह हुआ कि अब और तेजी से एटीएम मशीनें लगेंगी लेकिन इस में भी धोखा है.

एटीएम मशीनों से नकली नोट भी निकल रहे हैं. ग्राहकों के साथ यहां सब से बड़ी दिक्कत यह है कि उस वक्त उस का सुनने वाला कोई नहीं होता जब वह नकली नोट ले कर उस बैंक में पहुंचता है जिस की एटीएम मशीन से वह नकली नोट निकला है. बैंक अधिकारी ग्राहक की शिकायत को सिरे से नकार देते हैं और सुबूत पेश करने की हिदायत देते हैं. ऐसे में ग्राहक के पास सिवा उस स्लिप के कुछ नहीं होता. ज्यादातर ग्राहक तो उसी वक्त स्लिप को फाड़ कर वहां रखे डस्टबिन में फेंक देते हैं.

बात घुमाफिरा कर आखिरकार ग्राहक पर आती है. खमियाजा उसे ही भुगतना पड़ता है. कुछ एक ग्राहक ऐसे होते हैं जो इस की पड़ताल कर पाते हैं. सवाल है कि आखिर यह मिलीभगत कहां और किस से हो रही है, इस बात की भी गारंटी होनी चाहिए. यह गारंटी मशीन दे सकती है लेकिन जब वह हमारे निकाले नोट के नंबर भी रिकौर्ड करे. उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में एटीएम से नकली नोट न मिलने की गारंटी मिल सकेगी.

संतूर होटल को भी डकार गए सरकारी गिद्ध

सरकारी क्षेत्र की सार्वजनिक कंपनियां लाभ वाले क्षेत्र को भी घाटे में ही चलाती हैं. सरकार की व्यवस्था ही ऐसी है कि उसे अपने कमाऊ संस्थानों से लाभ देने की उम्मीद भी कम ही रहती है. दिल्ली परिवहन निगम हमेशा घाटे में चलता है जबकि कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली की खूनी बसें नाम से कुख्यात रही निजी बसों के मालिकों ने बोरे भर कर उन्हीं सड़कों पर रुपए समेटे हैं.

निजी क्षेत्र के होटल जम कर कमाई कर रहे हैं और लगातार अपना विस्तार करने में लगे हैं जबकि कमाऊ क्षेत्र में सेंध लगाने के मकसद से बने सार्वजनिक क्षेत्र के भारतीय होटल निगम यानी एचसीआई लगातार घाटे में चल रहा है, इस के सभी होटल नुकसान में चल रहे हैं.

मोटी तनख्वाह देने वाला यह निगम अच्छी सेवा मुहैया कराने में असफल रहने के कारण सफेद हाथी बना हुआ है. सरकारी बाबुओं और नेताओं की ऐशगाह बने एचसीआई के होटल अब बहुत कम हैं और जो हैं भी उन्हें बंद किया जा रहा है. यही निगम दिल्ली और श्रीनगर में संतूर होटल चलाता है लेकिन दोनों होटलों में घाटा बढ़ा तो सरकार ने इस के प्रबंधन को निजी हाथों में देने का फैसला कर लिया.

दोनों होटल लीज की जमीन पर चल रहे हैं और लाभ देने वाली मुरगियां हैं लेकिन सरकारी कर्मचारियों के निकम्मेपन के कारण दोनों होटलों पर ताला जड़ कर निजी हाथों में सौंपने की खबर सब के लिए कष्टदायी है.

सरकारी क्षेत्र के दिल्ली और मुंबई में ‘सेफ एअर’ नाम से 2 फ्लाइट किचन हैं लेकिन दोनों 1 दशक से अधिक समय से घाटे में हैं. सवाल है कि सरकारी क्षेत्र की कंपनियां फेल क्यों हो जाती हैं? जबकि वही प्रोजैक्ट निजी हाथों में जाते ही सोने के अंडे देने वाली मुरगी साबित होते हैं.

ऐसे उद्योगों में दरअसल, पिछले दरवाजे से बड़े सरकारी हाकिमों और नेताओं तक थैलियां पहुंचती हैं. इसीलिए सरकारी कंपनियों के उच्च अधिकारी मनमरजी से संस्थानों को चलाते हैं. इस में मरता, पिसता छोटा कर्मचारी है. दबता आम आदमी है जिसे कुचल कर हमारे नेता और अफसर अपनी आर्थिक तरक्की के रास्ते निकालते हैं.

अर्थशास्त्री ‘जमीन’ पर चलें

हमारे अर्थशास्त्री ‘जमीन’ पर चलें तो देश का कायापलट जल्द होगा. रुपया भले ही दिलों की धड़कन बढ़ा रहा है लेकिन मानसून की अच्छी बारिश ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का काम किया है. आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि कई वर्षों के बाद मानसून खुशियां बिखेरता नजर आया है. उम्मीद की जा रही है कि अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार आएगा.

कृषि क्षेत्र के लिए इस बारिश को खुशहाली लाने वाली बारिश माना जा रहा है. कृषि पैदावार में अच्छी बढ़ोतरी की उम्मीद है. अच्छी खेती की वजह से कृषि ऋण के 30 फीसदी तक बढ़ने की आशा व्यक्त की जा रही है. अच्छी फसल से किसान की आय बढ़ेगी और देश को खाद्य सुरक्षा की जमीनी गारंटी मिल सकेगी. वहीं देश की आर्थिक विकास दर में कृषि क्षेत्र की भागीदारी बढ़ेगी.जानकार कहते हैं कि बढि़या बारिश के नतीजे में ग्रामीण क्षेत्रों में कारों की बिक्री 20 से 22 प्रतिशत तक बढ़ेगी और तिपहिया वाहनों की बिक्री का आंकड़ा 40 फीसदी तक बढ़ सकता है. टैलीविजन, फ्रिज आदि की जरूरत भी ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ रही है, इन की बिक्री में भी इजाफा हो सकता है.

दरअसल, खरीफ की फसल इस बार पिछले साल की तुलना में दोगुना हो सकती है क्योंकि इस बार 5 लाख हैक्टेयर भूमि पर जुताई हुई है. देश के सशक्तीकरण में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 58.2 फीसदी बताई जा रही है. कृषि क्षेत्र के प्रति लोगों का ध्यान घट रहा है क्योंकि बिचौलिए इस मेहनतकश वर्ग का शोषण कर के अपने कौलर सफेद बनाए रखते हैं. यदि सरकार कृषि पैदावार पर ध्यान दे तो देश का कायापलट हो सकता है. लेकिन मुश्किल यह है कि हमारे अर्थशास्त्री जमीन की ओर कम देखते हैं.

 

जीवन की मुसकान

बात मेरी शादी के कुछ महीने पहले की है. मेरे पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. मेरी मां और पिता बड़ौदा में थे और मैं चेन्नई में. शादी में बहुत पैसा खर्च हो रहा था. पिताजी को चेन्नई ट्रांसफर किए जाने का आदेश मिल गया था, सो उन्हें कोई कर्ज भी नहीं दे रहा था.
मेरे होने वाले पति ने मेरे पिताजी को लोन दिलवा दिया था. पिताजी की चिंता कम हो गई थी. मुझे शादी होने के कई महीनों बाद तक यह बात पता ही नहीं थी. जब मुझे यह बात पता चली तो मेरे मन में पति के प्रति सम्मान और बढ़ गया.

भूमा विजयराघवन, चेन्नई (तमिलनाडु)

मेरा छोटा भाई आयूष असम अभियांत्रिकी महाविद्यालय में प्रथम वर्ष का छात्र है. वह पढ़ाई के प्रति गंभीर रहता है. घर से उस का महाविद्यालय
15 किलोमीटर दूर है. हाल ही में आयोजित किए गए भारत बंद के दिन मैं ने उसे महाविद्यालय जाने से मना किया लेकिन वह नहीं माना और चला गया.
लौटते वक्त उसे कोई साधन नहीं मिला और इतनी दूर पैदल चलना मुश्किल था. तभी उसे सेना के 2 ट्रक दिखे. उस ने सैनिक भाइयों को अपनी समस्या बताई तो उन्होंने उसे घर के पास वाले बस स्टौप पर छोड़ दिया. मेरे देश के सैनिक देश व देशवासियों के प्रति कितने समर्पित हैं, यह सोच कर मैं खुश व संतुष्ट हो जाता हूं.

पीयूष सोमानी, गुवाहाटी (असम)


कुछ समय पहले की बात है. मैं अपनी बेटी के साथ पानीपत से दिल्ली बस से जा रही थी. मैं ने कंडक्टर को टिकट के लिए 500 रुपए दिए. उस के पास खुले पैसे न होने के कारण उस ने टिकट के पीछे लिख दिया कि 370 रुपए बाद में ले लेना.
बस में भीड़ होने के कारण मैं पैसे लेना भूल गई और वह कंडक्टर भी देना भूल गया. दिल्ली आने पर हम उतर गए. थोड़ी देर बाद मुझे याद आया और अपनी गलती का एहसास हुआ. लेकिन मेरे पास पछतावे के सिवा कुछ नहीं था.
कुछ दिन दिल्ली रुकने के बाद हम लोग वापस पानीपत आ रहे थे. बस में कंडक्टर टिकट के लिए आया. मैं पर्स से पैसे निकालने लगी तो मेरे हाथ में वह पुराना टिकट आ गया जिस के पीछे 370 रुपए लिखे थे, मैं उसे देखने लगी. इतने में कंडक्टर आ गया, शायद उस ने वह पुराना टिकट देख लिया था.
वह बोला, ‘‘बहनजी, 4 दिन पहले आप पानीपत से दिल्ली आई थीं.’’ मेरे ‘हां’ कहने पर उस ने कहा, ‘‘आप के 370 रुपए मेरे पास गलती से रह गए थे. तब से मैं हर रोज बस में आप को पैसे वापस देने के लिए देखता था.’’
आज के समय में ऐसी ईमानदारी देख कर मैं नतमस्तक हो गई.

पूनम जैन, पानीपत (हरियाणा)

दूसरों की नहीं विशेषज्ञों की सुनें

‘सुनो सब की, करो मन की’ उक्ति  से कोई भी अपरिचित न होगा.  मन का करना सही होता है पर केवल तभी जब वह वैज्ञानिक सोच से बुद्धिमत्तापूर्वक किया जाए और जरूरी नहीं कि विवेक या वैज्ञानिक सोच सभी में हो क्योंकि प्रत्येक इंसान को सभी क्षेत्रों का ज्ञान नहीं होता. और अज्ञानता होने पर सिर्फ विशेषज्ञ की सलाह पर चलना ही सही कदम होगा.

सामाजिक परिवेश में जीवन में आने वाली विविध प्रकार की परेशानियों के उदाहरणों से हम रूबरू होते ही रहते हैं. लेकिन कुछ परेशानियों के लिए हम स्वयं ही जिम्मेदार होते हैं. आइए, कुछ उदाहरणों से रूबरू होते हैं जो समाज में आसपास ही देखे गए हैं.

सर्वप्रथम मैं अपना स्वयं का अनुभव ही बताना चाहूंगी. कुछ समय पूर्व चिकनगुनिया नामक बीमारी फैली थी. इस बीमारी की चपेट में मैं भी आ गई. मुझे हाथपैरों के जोड़ों में जकड़न के साथ बुखार था. डाक्टर द्वारा लिखित दवाओं का निश्चित डोज लेने के पश्चात भी कुछ लक्षण यथावत थे. एक परिचित ने सलाह दी कि पैरों का व्यायाम करें. मैं ने व्यायाम शुरू किया. नतीजा नकारात्मक रहा. जब इस संबंध में चिकित्सक से परामर्श लिया तो उन्होंने बताया कि इस बीमारी में व्यायाम नहीं करना चाहिए. इस अनुभव से मैं ने जाना कि बीमारी में विशेषज्ञ की सलाह के बगैर कुछ नहीं करना चाहिए.

स्वास्थ्य संबंधी घरेलू नुस्खे समाचार- पत्रों व पत्रिकाओं में छपते रहते हैं. वैसा ही एक नुस्खा एक महिला, जो कि एक प्राइवेट फर्म में अच्छे पद पर कार्यरत हैं, ने पढ़ा. नुस्खे के अनुसार, उन्होंने ककड़ी की स्लाइस आंखों पर रखी और नतीजा यह हुआ कि आंखों पर सूजन आ गई, शायद कुछ रस आंखों में चला गया. नतीजतन, उक्त महिला को चिकित्सक की सलाह लेनी पड़ी.

एक निकट के रिश्तेदार का अनुभव भी यहां बांटना चाहूंगी. उन की गरदन में हमेशा दर्द रहता था. पेन रिलीफ बाम लगाने पर भी कोई विशेष फर्क नहीं पड़ा. लक्षणों से स्पौंडोलाइटिस की शंका हुई और लगा कि इस से संबंधित व्यायाम क्यों न किया जाए. सो, शुरू कर दिया. दर्द घटने के बजाय बढ़ने लगा. डाक्टर से जांच करवाने पर पता चला कि स्पौंडोलाइटिस की शुरुआत थी. लेकिन यह मान्यता कि इस बीमारी की शुरुआत में ही व्यायाम करना शुरू कर देने से बीमारी नहीं होगी, सरासर गलत है. बीमारी की प्रारंभिक अवस्था में डाक्टर द्वारा लिखी दवाएं लेना आवश्यक है. दर्द से पूरी तरह मुक्ति मिलने के कुछ समय बाद व्यायाम शुरू करने से बीमारी आगे के लिए नियंत्रण में आ सकती है.

मानसिक बीमारियों में बीमारी की तरह न ले कर कुछ बुरे प्रभावों को कारक माना जाता है. 12वीं कक्षा में आते ही सुलभा का मन पढ़ाई से उचटने लगा. उस में मानसिक बीमारी ‘डिप्रैशन’ के लक्षण आने लगे थे. लेकिन रिश्तेदारों ने सलाह दी कि शादी करने पर सब ठीक हो जाएगा. घर वालों ने सलाह मान कर शादी कर दी. ससुराल में जाने पर भी बीमारी वैसी ही बनी रही और उसे मायके भेज दिया गया. अब एक मनोचिकित्सक द्वारा उस का इलाज किया जा रहा है.

घरेलू कलह से नजात पाने के लिए अनेक सामाजिक संस्थाएं कार्यरत हैं. यहां परिवार के प्रत्येक सदस्य को बातचीत द्वारा स्वस्थ व निष्पक्ष रहने की सलाह दी जाती है, इन की सलाह द्वारा कितने ही घर फिर से बस जाते हैं. इस के बावजूद रिश्तेदारों के कहने पर एक श्रीमतीजी ने स्वयं अपना घर उजाड़ डाला. दरअसल, प्रतिदिन सासबहू के झगड़े होते रहते थे. लोगों के कहने पर बेटाबहू को अलग कर दिया. इस से बेटा आर्थिक परेशानी से तो जूझ ही रहा है साथ ही, परिवार के मुखिया इस सदमे के चलते बीमार हो गए.

इन नकारात्मक उदाहरणों के साथ आइए कुछ सकारात्मक उदाहरणों से भी रूबरू होते हैं जिन में लोगों ने अपने विवेक से काम ले कर समस्या का सामना किया.

एक प्राइवेट बैंक के मैनेजर पद पर कार्यरत एक सज्जन ने नया फ्लैट खरीदा. शिफ्ट करने के दूसरे दिन से एक के बाद एक विपत्ति आने लगी. कुछ दिनों के लिए वे डिप्रैशन में चले गए. उन की इस स्थिति पर दया खाते हुए रिश्तेदार कहने लगे कि बेचारे को मकान फला नहीं. उन्होंने सलाह भी दे डाली, ‘मकान को वास्तु के अनुरूप बदलवा लो.’ किसी की भी सलाह न मानते हुए उक्त श्रीमान ने समस्या के मूल में जा कर कारण समझा और समाधान किया.

श्रुति को कैरियर चुनने में कठिनाई हो रही थी. तनाव दिनोंदिन बढ़ रहा था लेकिन उस ने समझदारी दिखाई. कैरियर काउंसलर से संपर्क किया और सही मार्गदर्शन पाया.

इन घटित घटनाओं के अलावा विभिन्न शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, व्यक्तिगत प्रकार की समस्याओं से नजात पाने के लिए इंसान स्वविवेक के अभाव में गलत तरीकों से जूझता रहता है. इस के लिए वह लुभावने विज्ञापनों का सहारा ले कर भ्रमित होता भी पाया गया है.

समस्या का धैर्यपूर्वक मुकाबला करते हुए सिर्फ संबंधित विशेषज्ञ की सलाह पर चलें और समय व धन दोनों की ही बरबादी से बचें.

सूक्तियां

अंत:करण
मनुष्य का अंत:करण उस के आकार, संकेत, गति, चेहरे की बनावट, बोलचाल तथा आंख और मुख के विकारों से मालूम पड़ जाता है.
बदला
महान पुरुष जो उपकार करते हैं उस का बदला नहीं चाहते. भला संसार जल बरसाने वाले बादलों का बदला किस प्रकार चुका सकता है?
आशा और आत्मविश्वास
आशा और आत्मविश्वास ही वे वस्तुएं हैं जो हमारी शक्तियों को जाग्रत करती हैं और हमारी उत्पादन शक्ति को दोगुनातिगुना बढ़ा देती हैं.
उद्यम
उद्यम ही सफलता की कुंजी है. बिना उद्यम किए थाली की रोटी भी अपने मुंह में नहीं जाती.
महान
महान व्यक्ति न किसी का अपमान करता है और न उस को सहता है.
आलसी
आलसी मनुष्य सदा ऋणी और दूसरों के लिए भार रूप रहता है.
खर्च
छोटेछोटे खर्चों से सावधान रहो. थोड़ाथोड़ा जल रिसतेरिसते बड़ेबड़े जहाज डूब जाते हैं.

यह भी खूब रही

एक बार हम सब बैठ कर यह बात कर रहे थे कि किस में कितने ग्राम खून है. तभी दादी तपाक से बोलीं, ‘‘मैं ने कभी चैक तो नहीं करवाया है पर अब तो सिर्फ 100 ग्राम ही खून बचा होगा.’’  दादी के इतना कहते ही हम सब हंसतेहंसते लोटपोट हो गए.

आरती, भिवानी (हरियाणा)

 

कुछ दिन पहले हमारे एक परिचित अपनी बेटी, जिसे वे प्यार से टुकटुक कहते हैं, के साथ श्रीलंका घूमने गए. घूमतेघूमते टुकटुक एक दिन उन से आगे निकल गई. उस की मम्मी ने आवाज लगाई, ‘‘टुकटुक, रुक जा.’’ इतने में एक थ्रीव्हीलर उन के पास आ कर रुक गया और चालक ने उन से पूछा कि आप को कहां जाना है? उन्होंने कहा कि हम तो अपनी बेटी को बुला रहे थे. दरअसल, वहां थ्रीव्हीलर को टुकटुक कहते हैं.

निर्मलकांता गुप्ता, कुरुक्षेत्र (हरियाणा)

 

बात बहुत पुरानी है. उस वक्त परिवार में बहुएं साड़ी ही पहना करती थीं. बड़ों के सामने सलवारसूट नहीं पहना जाता था. हमारे घर में जेठजी के बेटे की शादी हुई तो बहूरानी आई. जैसा कि आजकल चलन है, बच्चे साड़ी न पहन कर सूट या अन्य कुछ पोशाक पहनना पसंद करते हैं, वह भी सलवारसूट पहना करती थी. यह पहनावा मेरी सास को पसंद नहीं आता था.उस समय हम ग्वालियर में थे. मेरी सास कभीकभी हमारे पास आया करती थीं. वे जेठजी के साथ बुलंदशहर में रहा करती थीं. एक दिन जब मेरे दोनों बच्चे भी मेरे पास बैठे थे, वे बोलीं, ‘‘बहू ऐसे कपड़े पहनती है, अच्छा नहीं लगता, कोई क्या कहेगा.’’ मेरे मुंह से निकला, ‘‘बेटी भी पहनती है, उस ने पहन लिए तो क्या हुआ, साड़ी में बंधन लगता होगा.’’

मेरा बेटा, जो यह सुन रहा था, बोला, ‘‘अम्मा, जिस में कंफर्ट महसूस हो वह ही पहनना चाहिए.’’ मेरी सास, जो गांव की सरल स्वभाव की महिला थीं, थोड़ी देर तो चुप रहीं फिर कुछ सोच कर बोलीं, ‘‘कम फटने की क्या बात है, साड़ी भी उतनी ही फटती है, जितना सूट फटता है.’’

उन की बात सुन कर मैं व मेरे दोनों बच्चे खिलखिला कर हंस पड़े. मेरी सास ‘कंफर्ट’ का मतलब ‘कम फटना’ समझ रही थीं.

स्नेह अग्रवाल, मयूर विहार (दिल्ली)

 

मेरे बेटे की शादी थी. विदाई के समय बहू सब से गले मिल कर रो रही थी. उस के पापा भी रो रहे थे. मैं काफी भावुक हूं. किसी की भी विदाई पर मुझे रोना आ जाता है. उस के पापा मेरे ही पास खड़े थे. मुझे रोते देख मेरी भतीजी बोली, ‘‘बूआ, आप भी इन के गले मिल कर क्यों नहीं रोतीं, भाभी की तरह?’’ बात की नजाकत को समझ कर सभी हंसने लगे. बहू के पापा भी मुसकराते हुए बोले, ‘‘यह गले लगना उधार रहा.’’ माहौल हलका हो गया.

ममता, बीकानेर (राजस्थान)

बस एक उदासी

खोल दिए हैं पलकों के द्वार

उड़ा दिए सपनों के पाखी

चुने थे कहांकहां से

ढूंढ़ यहांवहां से

 

बादल की नीली शाखों

तारों की स्वप्निल आंखों में

नानीदादी की लोरी

या प्रकृति की बोरी में

 

अब सूखा आस का चारा

उम्मीदों का रिक्त भंडारा

प्रेम की धारा सूखी

मन की धरती रूखी

 

धूमिल दूषित आकाश

तमस से हारा प्रकाश

सांस की पूंजी चुकने को

जीवन की गति रुकने को

 

जर्जर पिंजरा दिया छुड़ाए

सपने पाखी दिए उड़ाए

मुक्त हुए नैनों के वासी

बाकी, बस एक उदासी.

जसबीर कौर

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