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यश की वापसी

अभिनेता यश टोंक को एक बार फिर से एकता कपूर के धारावाहिक ‘पवित्र बंधन’ में अभिनय करने का मौका मिल रहा है. यश का कहना है कि यह मेरे कैरियर की सब से अच्छी बात होगी कि मुझे एक बार फिर गिरीश की भूमिका में अभिनय करने का अवसर मिल रहा है. कहानी बहुत दिलचस्प है.

ऐसा लग रहा है कि एकता अपने पुराने स्टार्स को दोहराना पसंद करती हैं. पर दर्शक उन्हें कितना अपनाएंगे, वह बाद में पता चलेगा क्योंकि इस धारावाहिक की लीड कैरेक्टर तो रितु धुधानी हैं.                      

लोकेशन की तलाश

‘गैंग्स औफ घोस्ट’ का एक खास गाना मुंबई के शक्ति मिल्स में फिल्माया जाना था लेकिन कुछ दिनों पहले शक्ति मिल्स में हुई बलात्कार की घिनौनी घटना के कारण पूरी टीम ने यह गाना दूसरी जगह फिल्माने का निर्णय लिया है.

निर्देशक सतीश कौशिक कहते हैं कि हम इस घटना से काफी आहत हैं. इसलिए गाना अब कहीं और शूट किया जाएगा. यह निर्णय शायद सभी के लिए राहतपूर्ण हो. गौरतलब है कि फिल्म ‘गैंग्स औफ घोस्ट’ में सौरभ शुक्ला और रजत कपूर के साथ अभिनेत्री माही गिल बेहद सैक्सी रूप में नजर आएंगी. फिलहाल, फिल्म पूरी होने की राह देख रही हैं.

 

मीडिया से खफा

चिकनी चमेली के नाम से मशहूर कैटरीना कैफ कुछ दिनों से मीडिया से कुछ ज्यादा ही खफा हैं. तभी तो क्रिसमस में रिलीज होने वाली फिल्म ‘धूम 3’ पर बात करने के बजाय वे मीडिया की उस हरकत पर बिफर जाती हैं जब उन की बिकनी पिक्स रणबीर कपूर के साथ लीक हुई थी. हाल में अपने साक्षात्कार में कैटरीना ने कहा कि स्टार को मिस्टीरियस होना चाहिए. अगर मैं अपने जीवन की कुछ बातें खुद तक ही रखना चाहती हूं तो इस में गलत क्या है? लेकिन मीडिया इस बात को नहीं समझता. यही वजह है कि मैं मीडिया से दूर रहना चाहती हूं.

 

मैजिक गर्ल

‘कहो न प्यार है’ और ‘गदर’ जैसी ब्लौकबस्टर फिल्मों से अपना कैरियर शुरू करने वाली अभिनेत्री अमीषा पटेल ने स्वयं द्वारा लिए गए कुछ गलत फैसलों के चलते अपना कैरियर लगभग खत्म कर लिया. खैर, अच्छी खबर यह है कि अमीषा पटेल एक अच्छी निर्माता के तौर पर अपने कैरियर में ‘देसी मैजिक’ नाम की फिल्म ले कर लोगों के सामने आ रही हैं. अमीषा, हम तो यही चाहेंगे कि आप जोरदार वापसी करें.

 

गर्दिश में हीरो

शाहिद कपूर फिल्म ‘फटा पोस्टर निकला हीरो’ में सलमान खान की नकल करते हुए दिखाई दिए. शाहिद का कहना है कि वे सलमान के बहुत बड़े फैन हैं और उन की तरह अभिनय करना उन का मजाक नहीं, बल्कि आदर व्यक्त करना है. प्रमोशन के दौरान वे ‘बीइंग ह्यूमन’ की टीशर्ट भी पहने हुए नजर आए.

शाहिद की सोच अच्छी है पर दर्शक शाहिद के अभिनय को ही देखना पसंद करेंगे न कि किसी और की नकल. लगता है शाहिद के तारे गर्दिश में हैं, तभी तो उन्हें अपनी फिल्म में सलमान जैसे बड़े सितारे का सहारा लेना पड़ा.

 

ग्रैंड मस्ती

यह फिल्म वर्ष 2004 में आई फिल्म ‘मस्ती’ का सीक्वल तो नहीं है परंतु बहुतकुछ उस जैसी है. पूरी फिल्म पोर्नोग्राफिक कौमेडी से भरी पड़ी है. सैक्स फैंटेसी और द्विअर्थी संवादों से मालामाल यह फिल्म अग्रिम पंक्ति के दर्शकों को ध्यान में रख कर बनाई गई लगती है. परिवार के किसी सदस्य के साथ बैठ कर देखने लायक यह कतई नहीं है. पता नहीं सैंसर बोर्ड वालों ने इसे पास कैसे कर दिया.

इस तरह की बोल्ड सब्जैक्ट वाली फिल्में अब काफी बनने लगी हैं. इस तरह की फिल्म टीवी धारावाहिकों की निर्माता एकता कपूर भी बनाने लगी हैं. थोड़ा इंतजार करिए, उन की अगली पोर्नोग्राफिक फिल्म ‘रागिनी एमएमएस 2’ तैयार हो चुकी है, शीघ्र ही वह परदे पर होगी. इस तरह की फिल्में समाज में विकृतियां ही पैदा करती हैं.

‘ग्रैंड मस्ती’ की कहानी एकदम साधारण है. कालेज की पढ़ाई पूरी कर चुके तीन दोस्तों मीत (विवेक ओबराय), अमर (रितेश देशमुख) और प्रेम (आफताब शिवदासानी) की अब शादी हो चुकी है. पर तीनों ही अपनी शादीशुदा जिंदगी से खुश नहीं हैं. उन की सैक्स लाइफ बोरिंग है. तीनों एक दिन अपने पुराने कालेज पहुंच जाते हैं. वहां वे पिं्रसिपल (प्रदीप रावत) के रोबदार चेहरे को देख कांप जाते हैं. उन के खौफ के चलते कोई लड़का किसी लड़की की तरफ आंख उठा कर भी नहीं देखता. कालेज में इन तीनों की मुलाकात पिं्रसिपल की बेटी मैरी (ब्रूना अब्दुल्ला), बहन रोज (मरियम जकरिया) और बीवी मारलो (कायनात अरोड़ा) से होती है. तीनों ही उन के प्रेमजाल में फंस जाते हैं, मगर तीनों की बीवियां ऐन मौके पर उन्हें इस मुसीबत से बचा लेती हैं.

इस फिल्म में शुरू से आखिर तक निर्देशक ने पूरा ध्यान अंग प्रदर्शन और द्विअर्थी संवादों पर लगाया है. दर्जनों सुंदरियां बिकनी पहने फ्लर्ट करती हुई आप को दिख जाएंगी. फिल्म का क्लाइमैक्स ठंडा और घिसापिटा है. फिल्म का संगीत औसत है. छायांकन अच्छा है. ग्रैंड मस्ती की मस्ती से बच कर रहें, कहीं ऐसी मस्ती आप पर भारी न पड़ जाए.   

फटा पोस्टर निकला हीरो

यह एक ऐक्शन कौमेडी फिल्म है जिस में शाहिद कपूर रणबीर कपूर के पोस्टर को फाड़ कर बाहर निकला है. ‘घायल’ और ‘दामिनी’ जैसी गंभीर फिल्में बनाने वाले निर्देशक राजकुमार संतोषी ने इस बार कौमेडी में अपना हाथ आजमाया है. वैसे, इस से पहले वे ‘अजब प्रेम की गजब कहानी’ जैसी कौमेडी फिल्म बना चुके हैं. इस फिल्म में वे भूल गए हैं कि उन्हें ऐक्शन फिल्म बनानी है या कौमेडी. दर्शकों को शाहिद कपूर से बहुत उम्मीदें थीं. काफी अरसे के बाद वे परदे पर नजर आए परंतु इस फिल्म में उन्होंने अपने चाहने वालों को निराश ही किया है.

फिल्म की कहानी है एक नौजवान विश्वास (शाहिद कपूर) की. जब वह पैदा हुआ था तभी उस का पिता, एक भ्रष्ट इंस्पैक्टर, अपने परिवार को छोड़ कर भाग गया था. मां सावित्री (पद्मिनी कोल्हापुरे) ने उसे पालापोसा, बड़ा किया. मां चाहती है कि उस का बेटा पुलिस में भरती हो कर ईमानदार पुलिस इंस्पैक्टर बने परंतु विश्वास पर तो हीरो बनने का भूत सवार है.

पुलिस में इंटरव्यू देने का बहाना कर वह मुंबई पहुंच जाता है. वह फिल्मों में कहानियां लिखने वाले एक स्ट्रगलर जोगी (संजय मिश्रा) से मिलता है. विश्वास को फिल्मों में छोटेमोटे रोल मिलने लगते हैं. तभी उस की जिंदगी में काजल (इलियाना डिकू्रज) उस वक्त आती है जब विश्वास फोटोशूट कराने के लिए नकली पुलिस की वरदी में जा रहा होता है. काजल उसे असली पुलिस इंस्पैक्टर समझ लेती है और गुंडों से भिड़ जाने को ललकारती है.

यहीं से विश्वास की जिंदगी में तूफान आ जाता है. उधर उस की मां मुंबई पहुंच जाती है तो गैंग वाले उस की मां को कैद कर लेते हैं. विश्वास अपनी मां को गैंग वालों के हाथों से छुड़वा लेता है. तभी उसे पता चलता है कि गैंग का डौन नैपोलियन (मुकेश तिवारी) उस का पिता है जो बचपन में ही परिवार को छोड़ कर भाग गया था और अब वह पूरी मुंबई पर रासायनिक ब्लास्ट कर उसे खत्म करना चाह रहा है.

वह अकेले दम पर पूरे गैंग को पकड़वाता है और अपनी मां के आगे कसम खाता है कि मैं अब कभी पोस्टर हीरो नहीं बनूंगा, सच्चा हीरो बन कर देश की हिफाजत करूंगा. फिल्म की यह कहानी 70-80 के दशक जैसी है. मध्यांतर से पहले इस कहानी में कौमेडी है तो मध्यांतर के बाद फुल ऐक्शन. फिल्म का पूर्वार्ध भाग धीमा है और बोर करता है. उत्तरार्ध वाले हिस्से में शाहिद कपूर ने 2 डांस किए हैं. एक गाने पर डांस करते वक्त शाहिद कपूर ने कई बेहतरीन डांसरों को भी पीछे छोड़ दिया है.

अभिनय की दृष्टि से शाहिद कपूर ने कहींकहीं फनी ऐक्ंिटग की है. उस ने कई भावुक दृश्यों में अपना टेलैंट भी दिखाया है. अतिथि की भूमिका में सलमान खान फिल्म का आकर्षण है. नरगिस फाखरी का आइटम सौंग दर्शकों को अच्छा लगेगा. संजय मिश्रा की कौमेडी भी अच्छी लगेगी. इलियाना डिकू्रज मिसफिट है.

फिल्म का निर्देशन औसत दरजे का है. गीतसंगीत कुछ अच्छा है. एक गीत ‘मैं रंग शरबतों का तू मीठे घाट का पानी…’ अच्छा बन पड़ा है. फिल्म का छायांकन अच्छा है.

 

लंच बौक्स

कहते हैं न कि किसी के दिल तक पहुंचने का रास्ता उस के पेट से हो कर जाता है, ‘लंच बौक्स’ में रखे स्वादिष्ठ खाने ने भी दर्शकों के दिलों को जीत लिया है. यह सीधी, सच्ची और सरल सी फिल्म है.

फिल्म में गिनेचुने 4 पात्र हैं. निर्देशक रितेश बत्रा ने इन चारों किरदारों को कहीं भटकने नहीं दिया है. ये किरदार दर्शकों को बांधे रखते हैं. 2 प्रमुख एडल्ट किरदारों के बीच रोमांस लंच बौक्स के जरिए ही फलताफूलता है.

फिल्म की कहानी है मुंबई के एक दफ्तर में नौकरी करने वाले विधुर साजन (इरफान खान) और एक बच्चे की मां इला (निमरत कौर) की.  इला के पति ने उस में रुचि लेना कम कर दिया है. इला को लगता है कि उस के पति के संबंध किसी और औरत से बन गए हैं. वह रोजाना अपने पति के लिए लंच बौक्स में खाना रख कर डब्बा वाले के जरिए उस के दफ्तर भेजती है. पर वह डब्बा उस के पति के पास न पहुंच कर साजन (इरफान खान) के पास पहुंचने लगता है और साजन का एक रेस्तरां से आने वाला डब्बा उस के पति के पास पहुंचता है. पहले डब्बा भरा ही वापस आ जाता था पर अब वापस आने पर खाली लंच बौक्स आता है. साजन खाली डब्बे में खाने की तारीफ कर एक पत्र रख देता है. इला को पता चल जाता है कि डब्बा किसी और के पास जा रहा है.

यहीं से इला की जिंदगी में बदलाव आता है. पत्रों के जरिए दोनों में रोमांस पैदा होता है. कुछ दिन तक पत्रों का सिलसिला चलता रहता है. दोनों एक रेस्तरां में मिलने का फैसला करते हैं. पर वहां पहुंच कर साजन को अपनी बढ़ती उम्र और इला की कम उम्र का एहसास होता है तो वह उस से बिना मिले ही वापस लौट जाता है. अंत में दोनों मिलते हैं या नहीं यह स्पष्ट नहीं किया गया.

इस फिल्म को जितनी वाहवाही मिली है यह उस के लायक नहीं है. लंच बौक्स के बदले जाने के कारण उपजे रोमांस को ज्यादा तूल देने की जरूरत नहीं है क्योंकि इस तरह का रोमांस अकसर रौंग नंबर मिल जाने के कारण हो जाता है और इंटरनैट पर तो यह आम प्रक्रिया है कि अनजाने से प्रेम व्यक्त करें.

अगर खासीयत है तो यह कि घर के उबाऊ कामों या एकरस दफ्तरी जिंदगी में एक नए जने का आना, वह भी सिर्फ लंच बौक्स में रखे पत्रों के माध्यम से, काफी सुहाना है. निर्देशक ने जिस खूबी से नायक व नायिका की रोजाना की एक जैसी जिंदगी का चित्रण किया है उस से करोड़ों लोग वाकिफ हैं, उसे झेलते भी हैं पर व्यक्त नहीं कर पाते.

क्या लंच बौक्स का प्रेम वास्तविक बन सकता है? क्या एक युवा औरत, एक बच्ची की मां, एक ऐसे पति की पत्नी जिसे पत्नी में रुचि न रह गई हो, सब बंधन तोड़ कर लंच बौक्स में रखे पत्रों के फलसफे के आधार पर नई खुशनुमा जिंदगी शुरू कर सकती है? क्या एक रिटायर्ड पुरुष ऐसी औरत को जीवन जीने का संबल दे सकता है? अफसोस, निर्देशक के पास इन अहम सवालों का कोई जवाब नहीं और यहीं यह फिल्म उद्देश्यहीन हो गई.

फिल्म की कहानी धीरेधीरे डैवलप होती है. इस कहानी में 2 किरदार और भी हैं. एक, शेख (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) अकाउंटैंट की टे्रनिंग लेने के लिए साजन के पास आता है और दूसरा, जो दिखाई नहीं पड़ता, उस की सिर्फ खनकदार आवाज सुनाई पड़ती है. वह किरदार है आंटी (भारती अचरेकर). इला के ऊपर वाले फ्लैट में वह रहती है. फिल्म का निर्देशन कमाल का है. निर्देशक ने सभी कलाकारों से बेहतरीन काम लिया है. निमरत कौर को देख कर लगा ही नहीं कि वह पहली बार किसी फिल्म में काम कर रही है. खुद में सिमटी इला के किरदार को जब पति का तिरस्कार मिलता है और किसी ऐसे पुरुष का साथ मिलता है जिसे वह जानती तक नहीं तो वह उस रास्ते पर आगे बढ़ चलती है. उस के अभिनय में सादगी है, गहराई है.

फिल्म के संवाद बहुत अच्छे हैं. इला अपनी सारी बातें पत्र में हिंदी में लिखती है जबकि साजन अपने पत्र में यदाकदा अंगरेजी भाषा का प्रयोग करता है. फिल्म का यह पक्ष आम हिंदीभाषी दर्शकों को फिल्म से दूर ही रखेगा.

 

हर घर का संगीत है लोकगीत – मालिनी अवस्थी

मशहूर लोकगायिका मालिनी अवस्थी आज के कानफोड़ू संगीत के दौर में अपने लोकगीतों की मिठास से संगीत प्रेमियों का दिल जीत रही हैं. तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद सफलता के मुकाम पर पहुंची मालिनी से कुमार अभय ने बातचीत की.

लोककला के क्षेत्र में मालिनी अवस्थी एक जानापहचाना नाम है. इस क्षेत्र में उन के विशिष्ट योगदान के आधार पर भोजपुरी अकादमी ने उन्हें अपना अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक राजदूत यानी ब्रैंड एंबैसेडर बनाया था. लेकिन मनोज तिवारी सहित भोजपुरी फिल्मों के कई कलाकारों के विरोध के चलते मालिनी अवस्थी ने यह कहते हुए इस पद को छोड़ दिया कि कोई भी पद कला से ऊपर नहीं है. गौरतलब है कि मालिनी को ले कर यह विवाद इसलिए हुआ था क्योंकि वे भोजपुरी के बजाय अवधी भाषा की हैं.

वर्ष 2012 में रिलीज हुई बौलीवुड की फिल्म ‘एजेंट विनोद’ का एक गाना ‘दिल मेरा मुफ्त का…’ काफी मशहूर हुआ था. यह गाना चर्चा में इसलिए भी आया कि इसे लोकगीतों की गायिका मालिनी अवस्थी ने गाया था. आमतौर पर मालिनी को लोग ठुमरी, दादरा, कजरी और होरी गाने गाते व नृत्य करते देखा करते थे. पर हिंदी फिल्म ‘एजेंट विनोद’ के इस आइटम सौंग को मालिनी की आवाज में सुनना लोगों के लिए अनोखा था. मालिनी कहती हैं, ‘‘गाना कोई भी हो, सुनने वालों के दिल में उतर जाए तो एक कलाकार के लिए यह सम्मान की बात है.’’

लखनऊ के एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मी मालिनी के मातापिता की भी वही इच्छा थी, जो उस समय का चलन था. यानी बेटी बड़ी हो तो फौरन ब्याह कर दो. बस. मालिनी कहती हैं, ‘‘मांपिताजी ने मेरी शादी भी छोटी ही उम्र में कर दी. बच्चे भी जल्दी हो गए. मगर दिल के अंदर एक कलाकार की जो छटपटाहट थी, वह बारबार आगे बढ़ने और कुछ कर दिखाने को प्रेरित करती थी. सो, मैं ने शास्त्रीय संगीतज्ञ गिरजा देवी के सान्निध्य में संगीत का प्रशिक्षण लेना शुरू किया तो लगा, सपना हकीकत में जरूर बदलेगा.’’

आप ने लोकगीतों को ही गायिकी के लिए क्यों चुना? इस सवाल पर मालिनी मुसकराते हुए कहती हैं, ‘‘देखिए, लोकगीतों में एक गंभीरता होती है. एक ठहराव होता है. कश्मीर से कन्याकुमारी तक विभिन्न लोकगीत लोगों के लिए संजीवनी का काम करते हैं. भारत जैसे देश में जहां हजारों भाषाएं बोली जाती हैं, लोकगीतों में भी विविधता है. यह घरघर का संगीत है.’’

एक सफल गायिका होने के साथसाथ मालिनी अच्छी गृहिणी, मां और पत्नी भी हैं. वे बताती हैं, ‘‘ब्याह कर ससुराल आई तो यहां संस्कार और तहजीब तो थे पर बंदिशें नहीं थीं. ससुराल वालों ने मेरी खूब हौसलाअफजाई की. बढ़ते बच्चों को पालना और कैरियर संवारना, दोनों एकसाथ आसान नहीं था पर घर वालों ने पूरा सहयोग दिया.

‘‘पति प्रशासनिक अधिकारी हैं और काम के सिलसिले में काफी व्यस्त रहते हैं. पर उन के सुलझे खयालों ने मुझे कदमकदम पर प्रोत्साहित किया. नतीजतन, मैं आगे बढ़ती चली गई. हमारा दांपत्य आज अगर बेहद मजबूत है तो इस की मुख्य वजह हमारा आपसी प्यार और एकदूसरे पर गहरा विश्वास है.’’

मालिनी देशविदेश में भी लोकसंगीत की छाप छोड़ चुकी हैं. वे कहती हैं, ‘‘संगीत और खासकर लोकसंगीत के कद्रदान विदेशों में भी कम नहीं हैं. वहां के मंचों पर प्रस्तुति देना हर कलाकार का सपना होता है.’’

क्या कभी प्रस्तुति के दौरान दर्शकों की ऐसी कोई प्रतिक्रिया मिली है, जिसे आप बरदाश्त न कर पाई हों? इस सवाल पर मालिनी कहती हैं, ‘‘कभी नहीं. मैं ने जहांजहां प्रस्तुति दी, दर्शकों से असीम स्नेह और प्यार मिला. मैं तो भारतीय महिलाओं से अपील करती हूं कि वे जिस क्षेत्र में भी जाएं, हमेशा सकारात्मक सोच रखें. गलत मानसिकता महिलाओं को आगे बढ़ने से रोकती है. हां, परिवार वालों का सहयोग जरूरी है. शिक्षा को शुरू से अहमियत दें तो हर मुश्किल रास्ते आसान हो जाते हैं. लोग क्या कहेंगे, इस पर ध्यान न दें.’’

मालिनी अवस्थी को उन के लोकसंगीत गायकी के लिए वर्ष 2003 में ‘सहारा अवध सम्मान’ से सम्मानित किया गया और वर्ष 2012 के उत्तर प्रदेश चुनाव में भारतीय चुनाव आयोग द्वारा उन्हें ब्रैंड एंबैसेडर भी बनाया गया था. वे टीवी के कई रिऐलिटी शोज में बतौर जज भी नजर आई हैं.

मालिनी कहती हैं, ‘‘आज भले ही मुझे बौलीवुड फिल्मों के गीत गाने के औफर मिलने लगे हैं पर मेरी असली लोकप्रियता लोकसंगीत की गायकी से ही हुई. मैं भोजपुरी, गजल, सूफियाना, ठुमरी में भावप्रधान गीत गाना पसंद करती हूं और इन्हें लोग दिल से सुनते हैं. जो गंभीरता लोकगीतों में है वह किन्हीं और गानों में नहीं है. और फिर इंसान वही गाता है जो उस की सोच होती है.’’

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