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जेलों का जंजाल

अमेरिका में जेलों को सरकारी विभाग ही नहीं चलाते, प्राइवेट कंपनियां भी चलाती हैं जो सरकार से कैदियों के रखने का खर्च लेती हैं. अमेरिकी सरकारें 4,800 अरब रुपए सालाना कैदियों पर खर्च करती हैं जिस का बहुत बड़ा हिस्सा इन प्राइवेट कंपनियों को ही जाता है. अब पता चलने लगा है कि ये कंपनियां जेलों में कैदी बढ़ते रहें, इस के लिए नएनए कानूनों की वकालत पर मोटा पैसा खर्च करती हैं और अगर कहीं कोई सरकार किसी कानून को ढीला करना चाहे तो उस के विरोध में चुने गए जनप्रतिनिधियों को पटाने में लग जाती हैं.

हमारे देश में भी यही हो रहा है. यहां जेलों में कैदियों की गिनती बढ़ रही है और जनता के मन में बैठाया जा रहा कि जिस पर आरोप लगे उसे जेल मिले, बेल नहीं. किसी को भी जेल में देख कर हमें पाशविक सुख का अनुभव होता है. यह गलत है. जेल के कई लाभ होते हैं पर सब से बड़ा यही होता है कि उद्दंड अपराधी को कुछ देर के लिए समाज से दूर कर दिया जाता है. पर जेल को निरर्थक सजाघर की तरह इस्तेमाल करना जेल अधिकारियों को अपार अधिकार देना है जो अमेरिका की निजी जेलों जैसे हैं. निजी जेलों में कंपनियां अपने मुनाफे देखती हैं, यहां जेलर व जेल अधिकारी.

जेलों में अपराधी जमा हो जाते हैं और इसलिए यह कहना कि वहां अपराध नहीं होते और अपराधी को अपराधभाव का दुख होता है गलत होगा. जेलों का होना जरूरी है पर उन में कैदी इतने कम हों कि जब तक कोई विशेष बात न हो, किसी को जेल में न डाला जाए. एक अपराधी या आरोपी के जेल में जाने से एक तरह से पूरा परिवार जेल में चला जाता है. मानसिक अवसाद छा जाता है. बहुत सा पैसा वकीलों की भेंट चढ़ जाता है. जेलों में भी हर तरह की रिश्वतें देनी पड़ती हैं. बच्चे परेशान हो जाते हैं. समाज उन्हें हिकारत से देखता है. अपराधी पेशेवर हो या अपराध गलती से हो, जेल में उस के साथ वही व्यवहार होता है और बाहर समाज उस के परिवार के साथ वही व्यवहार करता है. जेलों को धंधा नहीं बनाया जा सकता. आज चाहेअनचाहे अमेरिका में कंपनियों के लिए और यहां अफसरों के लिए यह धंधा बन गया है. विधायिका और न्यायपालिका को इस पर तुरंत रोक लगानी चाहिए.

क्यों जीती भाजपा

भारतीय जनता पार्टी को महाराष्ट्र व हरियाणा विधानसभाओं के चुनावों में मिली जीत के बाद कांगे्रस और दूसरी छोटी पार्टियां ही अप्रासंगिक नहीं हो गई हैं, भारतीय जनता पार्टी की पिछली पीढ़ी भी हाशिए पर चली गई. धर्म के स्थान पर विकास और सुशासन के मुद्दे पर लड़े गए इन 2 विधानसभाओं के चुनावों की इस जीत का श्रेय नरेंद्र मोदी की व्यावहारिक नीतियों को जाएगा. नरेंद्र मोदी मई से ही भावनाओं की जगह व्यावहारिकता की नीतियों पर चल रहे हैं और उन्होंने जातीय व धार्मिक भेदभाव को इस कदर अनावश्यक कर दिया कि जातीय, मुसलिमों, दलितों, पिछड़ों की मांगों को ले कर चलने वाली पार्टियां निरर्थक हो गईं.

देश की जनता शासन में बदलाव चाहती है जबकि कांगे्रस और दूसरी क्षेत्रीय पार्टियां शासन सुधार की बात करने तक को तैयार न थीं. ऐसे में जनता को भाजपा के रूप में विकल्प मिल गया. कांगे्रस व अन्य पार्टियां आज अपने नेताओं के लिए मौजूद दिखती हैं जनता के लिए नहीं. एक तरह से नरेंद्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी का भी कायापलट कर दिया है और उसे संकुचित व संकीर्ण दायरे से निकाल कर जनमानस के सामने पेश किया है. जो लोग पहले अपनेअपने इलाकों में सत्तारूढ़ पार्टी के शासन में घुटन महसूस कर रहे थे, अब एक नई सरकार और उसे चलाने वाली एक नई पार्टी की ओर देख सकते हैं जो इतिहास, धर्म, जाति, पोंगापंथी से ऊपर नजर आ रही है और देश के व्यापारों, उद्योगों, आर्थिक विकास को प्राथमिकता दे रही है.

नरेंद्र मोदी की इस दूसरी विजय के पीछे यही नीति परिवर्तन है जिस कारण मतदाताओं ने बनावटी व अनावश्यक भावनाओं में बह कर वोट नहीं दिया आशा की जानी चाहिए कि दूसरी पार्टियां इस से सबक सीखेंगी. हर नेता को अब जनता के लिए काम कर के दिखाना होगा, केवल बातों से चुनाव जीतना आसान नहीं है.

 

मोदी पर दारोमदार

भारतीय जनता पार्टी को महाराष्ट्र व हरियाणा विधानसभाओं के चुनावों में मिली जीतों ने उपचुनावों में हुई उस की हारों के धब्बे धो दिए हैं. हालांकि ये 2 राज्य भाजपा की झोली में आ गिरे हैं पर यह भी दिख रहा है कि नरेंद्र मोदी की सफलता अब लोकसभा चुनावों जैसी नहीं है. तर्क दिया जा सकता है कि महाराष्ट्र में भाजपा का अपनेआप बहुमत न पाने के पीछे शिवसेना का अलग चुनाव लड़ना था पर यह भी तो मानना होगा कि शिवसेना ने नरेंद्र मोदी की मुखालफत का जोखिम लिया और अपनेआप को भाजपा की कठपुतली होने से बचा लिया.

जो दिख रहा है उस से साफ है कि अन्य राज्य भी भाजपा की झोली में आ गिरेंगे और जम्मूकश्मीर भी भाजपाई हो जाए, तो आश्चर्य न होगा.

इस की मुख्य वजह चाहे जो भी हो, भाजपा की ये जीतें एक तरह से 1971 की इंदिरा गांधी की जीतों की तरह गहरा सामाजिक प्रभाव डालेंगी. गरीबी हटाओ और समाजवाद के नारे पर पनपी कांगे्रस ने तब सरकारीकरण की एक ऐसी लहर छोड़ी कि देश निकम्मेपन, लाइसैंसराज, रिश्वतखोरी और विघटन का शिकार हो गया. इंदिरा गांधी ने हर चीज को दिल्ली के प्लानिंग कमीशन के इशारे पर चलाना शुरू कर दिया. देश का जो तानाबाना अंगरेजों ने अपने प्रभाव वाले क्षेत्र में बुना था जिस में बराबरी, बोलने की आजादी, व्यवसाय की छूट, कानून का राज काफी हद तक कायम था, को उन्होंने 5-7 सालों में समाप्त कर डाला.

इंदिरा गांधी 1975 तक देश पर मानसिक बोझ डाल गई थीं और जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने उन के लोकसभा के चुनाव को खारिज किया तो देश ने राहत की सांस ली, भले ही यह सांस कुछ दिन की रही. बाद में देश ने वह आतंक देखा जो अंगरेजों के समय में भी नहीं दिखा था. उस के बाद देश नहीं संभला. 1977-80 की जनता पार्टी की सरकार भारी बहुमत के बावजूद डगमग रही. 1981-84 के बीच सिख अलगाववाद ने देश का जीना मुहाल कर दिया.

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी नरेंद्र मोदी से भी ज्यादा बहुमत से जीते पर 2 साल में उन की आभा उतर गई. श्रीलंका में भारतीय सेना तमिल टाइगरों के हाथों बुरी तरह पिटपिटा कर आई. बोफोर्स तोप का मामला तूल पकड़ गया. राजीव गांधी हीरो की जगह चोर बन गए.

कहने का अर्थ है कि इंदिरा गांधी, जनता पार्टी और राजीव गांधी की भारी चुनावी जीतों का नतीजा देश का दीवाला निकालने में परिवर्तित हो गया. देश बहुत उथलपुथल से गुजरा. बाबरी मसजिद का मामला गरमाता रहा. पहले महंगाई की मार पड़ी फिर आर्थिक गिरावट. 1998 से 2004 के ढुलमुल शासन में भी कोई उल्लेखनीय काम न हो पाया. अब 10 साल बाद देश को बहुमत वाली स्थायी सरकार मिली है पर क्या नरेंद्र मोदी की बातें मंचों से उतर कर देश को बदल सकेंगी? ऐसे सवाल महत्त्व के होने लगे हैं क्योंकि नरेंद्र मोदी अब भारतीय जनता पार्टी से भी ऊपर पहुंच चुके हैं. उन्हें नागपुर का आदेश मानने को भी मजबूर नहीं किया जा सकता.

नरेंद्र मोदी एक सपना देख कर काम कर रहे हैं. देश करवट ले, जिस पौराणिक स्वर्णयुग की बात की जाती है उसे वे साकार कर के दिखा दें. एक साफ, स्वस्थ, सफल, सुशासित देश. ऐसा देश जहां कानून का राज हो, जहां व्यवसायी खुल कर काम करें, जहां हर चीज मेक इन इंडिया हो और भारत आबादी की तरह आर्थिक सक्षमता में भी विश्व में दूसरे नंबर पर हो. पर क्या वे उस लायक सामाजिक व राजनीतिक परिवर्तन ला रहे हैं? नौकरशाही के बलबूते पर देशों को नहीं चलाया जा सकता. घंटेघडि़यालों से प्रगति मिलती तो सऊदी अरब, येरुशलम और इटली सब से अधिक सफल देश होते. नरेेंद्र मोदी कहीं यज्ञहवनों से देश की शुद्धि के मंत्र पढ़ कर विकास तो नहीं करना चाह रहे? सफल भव: कहने से काम नहीं चलता.

देश को सफल बनाने के लिए जो जजबा हर देशवासी में पैदा करना है वह अभी दिख नहीं रहा. देश पिछली सरकारों से बुरी तरह त्रस्त था और उन से छुटकारा पा कर खुश है. पर यह न भूलें कि पिछली सरकारों ने लाखों ऐसे लोग पैदा किए थे जो परजीवी थे और आम जनता को चूस कर पनपे थे. वे निष्क्रिय हुए हैं, मरे नहीं हैं. वे फिर पनपेंगे. नरेंद्र मोदी के पास उन कैंसर सैलों को नष्ट करने के लिए टाइटेनियम डाइऔक्साइड की नैनोट्यूबें नहीं हैं. उन्होंने पैस्टीसाइड छिड़क कर जिंदा, लुटेरे शासकों को बेहोश किया है पर उन की जगह धर्म के नाम पर सदियों से कमाई करने वाले पुरोहित वर्ग को एक नई आशा दी है जिस का स्वच्छता, सफलता, सुदृढ़ता, सुशासन से कोई लेनादेना नहीं. नरेंद्र मोदी के पीछे भारी भीड़ है पर अफसोस है कि नकशा केवल उन के पास है और उस कुशलता की तकनीक भी जो किसी समाज को बदल सकती है.

नरेंद्र मोदी की विजय ने विचारकों को डरा दिया है. क्या प्रैस व लोकतंत्र स्वतंत्र रहेंगे, इस पर संदेह होने लगा है. क्या प्रैस को नरेंद्र मोदी के दोष निकालने की छूट मिलेगी? क्या समाज के माकूल परिवर्तन की बात की जा सकती है जिस से नरेंद्र मोदी के पंडों, नौकरशाहों, व्यापारियों और विदेशी भारतीयों को हानि होने का डर हो अगर कहीं ऐसा हुआ तो पहले शांति होगी, फिर घुटन और फिर आंधी आएगी जो वह सब नष्ट कर देगी जो शांति के दिनों बना होगा. ऊंची उठती लहरें कब सुनामी बन जाएं, क्या मालूम.

जातिवाद के शिकार कांटों का ताज क्यों है स्वीकार

ब्रिटिश शासन से आजादी पा लेने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण घटना देश में गणतंत्र की स्थापना और धर्मनिरपेक्ष संविधान का लागू हो जाना थी. लेकिन जल्द ही संवैधानिक सुरूर समाज के दिलोदिमाग से उतर गया और पुराना गणतंत्र यानी जातिवाद फिर से दशक दर दशक नएनए तरीकों से पैर पसारने लगा. आज हालत यह है कि देश के एक सूबे बिहार के मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी के अपने ही राज्य के मधुबनी शहर के एक मंदिर में पूजा करने के बाद प्रबंधन द्वारा मंदिर को धुलवाए जाने पर बहस हो रही है कि मुख्यमंत्री छुआछूत के शिकार हो गए.

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्या ने यह कह दिया कि शादियों में गौरी पुत्र गणेश की पूजा नहीं करनी चाहिए. इस पर पार्टी सुप्रीमो मायावती ने मौर्या की निजी राय कहते हुए पल्ला झाड़ लिया. बहरहाल, यह सवाल न यहां से शुरू होता है और न खत्म. भारतीय समाज में लगातार इन सवालों पर बहस ही नहीं, बल्कि आंदोलन भी हुए. अंबेडकर से पहले और पेरियार के बाद भी यह सिलसिला कायम है. मायावती, जो भले आज इस सवाल से कन्नी काट रही हैं, उत्तर प्रदेश की सत्ता में उन के कायम होने में इसी वैचारिकी की नींव रही है.

सवाल यह है कि आज क्यों इन सवालों से इन्हीं सवालों को उठाने वाले अपना नाता तोड़ रहे हैं? यह कोई राजनीतिक भटकाव है या फिर दलितों के पूरे समाज में समाहित होने की प्रक्रिया, जिस में वे समाहित हो जाने में ही अपना हित समझते हैं? जो राजनीति जाति, धर्म, भाषा या अस्मिता पर आधारित होती है उस का इसी लय में बह जाने का खतरा हर वक्त बरकरार रहता है. ‘तिलक, तराजू और तलवार, इन को मारो जूते चार’ की जगह  ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ कहना ऐसे ही नहीं शुरू कर दिया, यह सिर्फ हिंदू धर्म के देवीदेवताओं के प्रति आकर्षणमात्र नहीं था बल्कि यह नरम हिंदुत्व के प्रति आकर्षण था. ‘हाथी आगे बढ़ता जाएगा, ब्राह्मण शंख बजाएगा’ कहतेकहते ‘हाथी’ उसी जातिवादी अहाते में चला गया जहां से निकलने के लिए उस का संघर्ष था और हाथी को दिल्ली ले जाने वाले ‘विकास के रथ’ पर सवार हो कर दिल्ली चले गए. यह एक रणनीति थी, जो अस्मिता आधारित संकीर्ण जातिवादी राजनीति को ‘नरम हिंदुत्ववादी’ राजनीति की तरफ ले कर चली गई. और ‘सर्वजन हिताय, बहुजन सुखाय’ वाले भ्रम में रह गए जो ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ कह देने मात्र से हल नहीं होगा.

महापुरुषों की अनदेखी

दलित नेताओं ने धर्म, आडंबर, रूढि़वादी और जातिवादी व्यवस्था से दलित समाज को दूर रहने के तमाम संदेश दिए थे. इन प्रचारकों की सोच थी कि अगर दलितों को अपनी हालत में सुधार करना है तो धर्म और पाखंड की जंजीरों को तोड़ना होगा. आज का दलित समाज दलित नेताओं व विचारकों के मानअपमान को ले कर मरनेमारने पर भले तैयार हो जाता हो पर उन के विचारों पर चलने को तैयार नहीं है. जिन दलित विचारकों ने जीवनभर मूर्तिपूजा का विरोध किया, उन की मूर्तियां लगा कर ही दलित अपने को महान समझ रहा है. वह जातिवादी व्यवस्था का अंग बनने के लिए कट्टरपंथियों की ही तरह पूजापाठ और पाखंड को मानने लग गया है. दलितों को सुधारने का काम करने वाले राजनीतिक और गैर राजनीतिक संगठन अपने हित के लिए काम कर रहे हैं. वे साफतौर पर मानते हैं कि जब तक दलित खुद सुधरने को तैयार नहीं होंगे उन के हालात नहीं सुधर सकते.

सियासी भटकाव

हालिया संपन्न ‘कर्पूरी ठाकुर भागीदारी महासम्मेलन’ में बसपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्या की बातों का विश्लेषण निहायत जरूरी हो जाता है कि वे भागीदारी की क्या रूपरेखा खींच रहे थे. उन्होंने कहा कि कट्टर व्यवस्था के लोगों ने पिछड़ों और निचलों का दिमाग नापने के लिए गोबर और गणेश का सहारा लिया था. यह सही भी है कि ऐसे डाक्टर, इंजीनियर होने का क्या मतलब जो यह दिमाग न लगाएं कि क्या गोबर का टुकड़ा भगवान के रूप में हमारा कल्याण कर सकता है, क्या पानसुपारी खा सकता है, क्या पैसे ले सकता है, क्या पत्थर की मूर्ति दूध पी सकती है? ऐसा कह कर उन्होंने कट्टरपंथियों की भी बुद्धि नाप ली और साबित कर दिया कि इन से जो चाहो, कराया जा सकता है.

इस घटना का विश्लेषण उन भावनाओं, जो किसी दलित के मंदिर में जाने के बाद आहत हो कर शुद्धिकरण करवाती हैं, से दूर हट कर करना होगा. और यह सिर्फ दलितोंपिछड़ों से जुड़ा सवाल नहीं है, बल्कि राष्ट्रनिर्माण का सवाल भी है, जो वैज्ञानिकता के बगैर अपूर्ण है. आजादी के 67 साल पूरे होने के बाद भी देश में रहने वाले गरीबों,खासकर दलितों की हालत में बहुत सुधार नहीं हुआ है. यह हाल तब है जब दलितों के हालात सुधारने के लिए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर बहुत सारे प्रयास हो रहे हैं. आरक्षण जैसी योजनाओं का लाभ जागरूक दलितों ने उठा कर अपने हालात में सुधार कर लिया पर वे अपनी बिरादरी को क्या कुछ नया दे रहे हैं?

दलितों में वर्ग

दलितों के मुख्यरूप से 2 हिस्से हैं. एक हिस्सा वह है जो जागरूक था. उस ने आजादी के बाद दलितों के उत्थान के लिए चलने वाली योजनाओं का लाभ उठाया. दलितों का यह हिस्सा आज जातिवादी व्यवस्था का अंग बन चुका है. पढ़ालिखा होने के कारण यह हर योजना का आसानी से लाभ उठा रहा है. दलितों का दूसरा हिस्सा अपने हालात को सुधारने के लिए तैयार नहीं है. बहुत सारे प्रयासों के बाद भी ये लोग अभी भी अनपढ़ और पिछडे़ बने हुए हैं. ये बच्चों की शादी कम उम्र में कर देते हैं. खुद हर तरह का नशा करते हैं और बच्चों को इस से दूर रहने को कहते भी नहीं. तमाम सरकारी स्कूल होने के बाद भी बच्चों को पढ़ने के लिए नहीं भेजते. जानकारी के अभाव में दलितों के हित में चलने वाली सरकारी योजनाओं का ये लाभ भी नहीं ले पाते. अभी भी ये अपनी तरक्की के लिए दूसरों की ओर ताकते रहते हैं.

दलित समाज की एक बिरादरी मुसहर है. उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में इस बिरादरी के लोग बहुतायत में पाए जाते हैं. दलित समाज में ये सब से नीचे पायदान पर खड़े नजर आते हैं. सब से पिछड़े होने के कारण सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर इन को ऊपर उठाने के लिए बहुत सारे काम किए गए. इस के बाद भी ये पूरी तरह से बदहाल हैं. आज भी ये चूहा मार कर खाने के लिए मजबूर हैं. इन के घरों की औरतें पत्तल बनाने का काम करती हैं जबकि मर्द नशाखोरी करते हैं.

वाराणसी में मुसहर समाज की तरक्की के लिए काम करने वाले ‘आसरा’ संगठन के अजय पटेल कहते हैं, ‘‘हमारे संगठन के बहुत प्रयासों के बाद कुछ लोगों को, गरीबों के लिए दिए जाने की इंदिरा आवास योजना के तहत आवास देने की शुरुआत की गई है. इस के पहले इतने साल बीत जाने के बाद अभी तक कोई इंदिरा आवास इन लोगों को नहीं मिला था. जिस गांव के लोग जागरूक हैं और अपने हक की आवाज उठा रहे हैं, उन को सरकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है.’’

पाखंड के शिकार दलित

दलित समाज के जिन लोगों के पास पैसा आया वे संपन्न होने के बाद धर्म के पाखंड को बढ़ाने वाला काम कर रहे हैं. इस का नुकसान यह हुआ कि जो राजनीतिक दल उन की बेहतरी के लिए काम करने की कोशिश करते थे वे भी पुराने सिद्धांतों को छोड़ कर नई विचारधारा बना कर चलने लगे हैं. ऐसे में दलित समाज के उत्थान के लिए किए जाने वाले काम कमजोर पड़ गए या फिर खत्म कर दिए गए. इस को समझने के लिए बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा का उदाहरण सब से आसान दिखता है. जातिवादी व्यवस्था का विरोध कर बसपा ने अपने जनाधार को बढ़ाया. जब उसे राजनीतिक ताकत हासिल हो गई तो उस ने अपनी पुरानी विचारधारा को छोड़ दिया. इस का नुकसान दलितों के साथ ही साथ खुद बसपा को भी हुआ. आज दलितों के लिए बसपा की नीतियां उसी तरह की हैं जैसी किसी दूसरे राजनीतिक दल की. बसपा की नीतियों के बदलने का लाभ जातिवादी व्यवस्था ने उठाया और वह दलितों क ो बसपा से अलग करने में सफल हो गई.

दिखावे की तरक्की

दलितों के हितों में काम करने वाले राजनीतिक और स्वयंसेवी संगठन दलितों में तरक्की का दिखावा करने की कोशिश में उन को मुद्दों से भटकाने का काम कर रहे हैं. ये संगठन होली में दलितों को रंग खेलने, दीवाली में दीये जलाने और मंदिरों में पूजा करवाने को ही तरक्की का हिस्सा मान लेते हैं. ऐसा करते समय वे भूल जाते हैं कि जिस जातिवादी व्यवस्था का वे अंग बनते जा रहे हैं वह उन की तरक्की में सब से बड़ी बाधा रही है. दलित राजनीति, जिस के मूल में ब्राह्मणवादी व्यवस्थाविरोधी स्वर थे, ने अपने समाज के लोगों में मनुष्य से मनुष्य के बीच भेद करने वाले विभाजनकारी विचार को निशाना बनाया था. पर उस राजनीति के भटकाव के बाद उस समाज का भटकाव कोई आश्चर्यजनक नहीं है. यह तो होना ही था. मौजूदा दलित इस बात को भांप रहे हैं कि सिर्फ कोरी वैचारिक बात करने से भेदभाव का हल नहीं होगा, बल्कि व्यावहारिकता में इस को अपनाना होगा. दलित नेताओं से दूर हुआ जनमत, तो वह ‘पत्थर को दूध पिलाने वालों’ के साथ चला गया है. दलित राजनीति आज दलित समाज में उभरे मध्यवर्ग के समझौतावादी हो जाने को एक खतरे के रूप में महसूस कर रही है लेकिन वह कुछ कर नहीं पा रही.

वर्णवादी प्रवृत्ति

लोकसभा चुनावों में उच्च वर्ग ने भाजपा के प्रति आकर्षण का सब से ज्यादा माहौल बनाया. ठीक इसी तरह की वर्णवादी प्रवृत्ति पिछड़ी जातियों में भी पनप रही है. मध्यवर्ग में पिछड़ी जातियों का शामिल हुआ वर्ग भाजपा के प्रभाव में आ रहा है. वह उस हिंदुत्ववादी प्रक्रिया के तहत आया है जो उस की पहचान के सवाल को हल करने का दावा ही नहीं करती, उस का हल ढूंढ़ने का प्रयास भी करती है. नए हिंदुत्ववादियों ने दलितों व पिछड़ों के मध्यवर्ग को सवर्णों की तरह कर्मकांडी बना दिया और उन्हें उन सब पाखंडों को करने की छूट दे दी जिन्हें वे पहले दूर से देखते थे. तो फिर ऐसे में वह दलितपिछड़ा जो किसी वैचारिकता नहीं बल्कि पहचान के सवाल पर किसी मायामुलायम के साथ गया था, क्यों उन के साथ अब भी रहेगा?

मायावती तो पेरियार की मूर्ति के सवाल पर भाजपा के सामने इस से पहले भी घुटने टेक चुकी हैं. 2002 में भाजपा के सहयोग से चल रही बसपा सरकार द्वारा जब लखनऊ के अंबेडकर पार्क में पेरियार की मूर्ति को लगवाने की बात सामने आई तो भाजपा, बजरंगदल व अन्य हिंदुत्ववादी संगठनों ने विरोध किया. जिस के बाद मूर्ति नहीं लग पाई. पेरियार की मूर्ति एक मूर्ति नहीं, बल्कि वह सशक्त विचार है, जो भाजपा सरीखे संगठनों को भारतीय समाज में अस्तित्व में रहने को एक कलंकित भाव में देखता था. इसीलिए इस विचार से आतंकित संगठनों ने 2007 में ‘तीसरी आजादी’ नाम की एक सीडी का भी विरोध किया था. मायावती यदि किसी की भी मूर्ति न लगवातीं तो ठीक था पर पहले सुझाव दे कर पीछे हटना असल में हाथ झटकना ही तो है.

मंदिर क्यों गए सीएम

बिहार के मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी, जो स्वयं के महादलित होने की वजह से समाज में बरती जा रही अस्पृश्यता व पूर्वाग्रह का शिकार खुद को कह रहे हैं, पर भी सवाल उठता है कि वे उस मंदिर में आखिर क्या करने गए थे? मांझी जब कहते हैं कि सोचिए, हम कहां खडे़ हैं, हम जातिवाद से घिर गए हैं, तो उन्हें भी यह सोचना चाहिए कि मंदिर, जहां वे गए थे वह भारतीय लोकतंत्र का कोई सदन नहीं, बल्कि पाखंडवादी व्यवस्था के तहत संचालित वह सदन है जिस के मूल विचार में दलितों का, पिछड़ों का प्रवेश वर्जित है. मांझी को उन के इस बयान के बाद उठ रहे उन सवालों से ज्यादा वहां जाने की अपनी वैचारिकी पर सोचना होगा. उन का कहना ‘वे महादलित हैं, इसलिए उन के साथ ऐसा हुआ, वे झूठ नहीं बोल रहे,’ उन को एक अपरिपक्व वैचारिक नेता के रूप में ही स्थापित करता है.

आज अगर खुद ऊंची जाति वाले और आरएसएस जैसे हिंदूवादी संगठन जातिगत समानता की बात करते हैं तो हैरत होना स्वाभाविक है कि आखिरकार इस चमत्कार के पीछे राज या साजिश क्या है और है भी कि नहीं.

राज भी साजिश भी

दरअसल 25 फीसदी आबादी वाला इलाका ही देश नहीं है जहां लाइटें चमचमाती हैं, भव्य मौल्स सीना ताने खड़े हैं और जहां जाति पूछ कर कोई भी बरताव नहीं करता. लेकिन बचा 75 फीसदी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, जहां दलितों का शोषण ब्राह्मणों के साथ खुद दलितों के अगड़े भी करने लगे हैं. आजादी के बाद पहली दफा ऐसा वक्त और माहौल देखने में आ रहा है कि दलित खुलेआम धरमकरम कर रहा है, पैसे लुटा रहा है और इसी बूते पर वह मुख्यधारा से जुड़ जाने की गलतफहमी पाले बैठा है. उधर, लोकसभा चुनाव भाजपा ने मंदिर या धर्म के मुद्दे पर नहीं बल्कि सामाजिक बराबरी के दम पर जीता है. पिछले दशक में एक बार फिर हिंदू शब्द की परिभाषा बदली गई है. इधर आरएसएस ने भी पैंतरा बदलते दलितों और आदिवासियों के नाम पर आनुषंगिक संगठन बना डाले हैं जिन का काम आदिवासी और दलितों को उन के हिंदू होने का एहसास कराते रह कर उन्हें यह बताना है कि तुम हिंदू हो और हिंदू शब्द या धर्म के माने जो भी निकालो लेकिन यह स्वीकार लो कि इस में जातिपांति थी और रहेगी.

इसी दौरान हैरतअंगेज तरीके से दलितों के लिए काम करने वाले सामाजिक संगठन सिमट कर रह गए. कांशीराम ने जो सामाजिक आक्रोश पैदा किया था वह एक समझौते में तबदील हो गया. यह समझौता था हम जातिवाद की विसंगतियों को विकास के जरिए सुधारने की कोशिश करेंगे. दलित अब पहले की तरह दीनहीन और गरीब नहीं रह गया है, लिहाजा पंडेपुजारियों का काम भी ज्यादा चल पड़ा. आरक्षण से सरकारी नौकरियों और शहरीकरण या शिक्षा से  दलितों के पास आए पैसे को लूटनेखसोटने की उन में होड़ मच गई. कांग्रेस इस बदलाव को भांप नहीं पाई और यह मान कर बैठी रही कि देश में अभी भी छुआछूत और जातिपांति है जिस के चलते भाजपा को सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलेंगी. इसी गलतफहमी ने उसे महज 44 सीटों पर समेट कर रख दिया.

नया वर्णवाद

प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी सिर्फ विकास की बात कर रहे हैं. विदेशों में झंडे गाड़ते फिर रहे हैं, लेकिन हिंदुत्व या जातिपांति की बात उन्होंने नहीं की. आरएसएस ने जरूर बड़े सधे ढंग से कहा कि सदियों से वंचितों और शोषितों को गले लगाने का वक्त आ गया है. शुक्र इस बात का है कि उस ने माना तो कि देश में ये चीजें यानी भेदभाव, छुआछूत और जातिपांति थीं.

2 राज्यों के विधानसभा चुनावों, खासतौर से महाराष्ट्र में, इस का खासा असर देखने को मिला, जहां आरपीआई जैसे दलित हिमायती दलों का सूपड़ा ठीक वैसे ही साफ हो गया जैसे उत्तर प्रदेश में बसपा का हुआ था. बिहार में रामविलास पासवान भाजपा कीगोद में थे, इसलिए केंद्रीय मंत्री बन सवर्णों के साथ बैठे हैं. इस समीकरण और बदलाव को राजनीतिक के बजाय सामाजिक कहना ज्यादा सटीक लगता है क्योंकि वह इसी शर्त और तर्ज पर स्वीकारा गया है. दलित वर्ग के जिन जागरूक लोगों को दलित हितों की बात कहनी और करनी चाहिए थी, वे पंडेपुजारियों की भाषा बोलने लगे हैं. दानदक्षिणा झटकने के लिए दलितों को 2 वर्गों में बांट दिया गया है. ज्यादा पैसे वाले दलित ब्राह्मणों के खाते में गए तो कम पैसे वाले दलितों को उन्हीं की जाति के पंडों ने घेर लिया.

इक्कादुक्का लोगों और संगठनों ने इस नए वर्णवाद की साजिश के खिलाफ बोलने की कोशिश की पर उन की आवाज नक्कारखाने में तूती सरीखी साबित हुई. पढ़ेलिखे बुद्धिजीवी दलितों का एक बड़ा तबका हालात देख हताश है कि आखिर यह हो क्या रहा है, और इस से दलितों को फायदा क्या. मजबूरी और बेबसी में अभी खामोश और तटस्थ बैठा यह वर्ग आज नहीं तो कल, मुंह जरूर खोलेगा लेकिन तब तक कट्टर जातिवाद नए और पुराने धर्मग्रंथों के आदेशों को नए ढंग से अपने मुनाफे के लिए मोड़ लेंगे. लड़ाई या मुद्दा अभी भी संविधान बनाम धर्मग्रंथ है जिन में विकट का विरोधाभास है. इन में से देश में चल क्या रहा है, इसे समझने के लिए दिमाग पर ज्यादा जोर देने की जरूरत नहीं. देश में आज भी सही मानों में गणतंत्र नहीं वर्णतंत्र चल रहा है.

सनातनी रोड़ा

नए परिवर्तन से सभी सहमत हों, ऐसा भी नहीं है. जीतनराम मांझी के मुद्दे पर रांची में पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद ने साफ कहा कि दलितों को मंदिर में नहीं जाना चाहिए, यह शास्त्रसम्मत बात है. इस से पहले दूसरे शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद, शिरडी वाले साईंबाबा और उन की पूजा को ले कर खासा बवाल मचा चुके थे जोहिंदू नहीं, सनातन धर्म की व्याख्या कर रहे थे. भव्य आलीशान वातानुकूलित मठों में बैठे इन शंकराचार्यों की स्थिति रईस दलितों जैसी ही है जिन्हें चिंता अपनी दुकानदारी की है. सनातन धर्म का फंडा ज्यादा नहीं चला क्योंकि वह प्राचीन शास्त्रवादी था जिसे दलित तो दलित, सवर्णों की भी नई पीढ़ी स्वीकारने को तैयार नहीं. आधुनिक संस्थान में इंतजाम ये किए गए हैं कि सब अपनी हैसियत के मुताबिक लूटेंखसोटें और कमाएं, कोई दूसरे के रास्ते में अड़ंगा नहीं डालेगा.

दलितपिछड़े असलियत में धर्म के बिचौलियों के बिछाए जाल में फंस रहे हैं जिस में सदियों से उच्च सवर्ण पहले ही शिकार हैं जो कर्मकांडों, पाखंडों, रीतिरिवाजों पर अपनी औरतों से दुर्व्यवहार भी करते हैं, अपना पैसा भी नष्ट करते हैं और खुद को शारीरिक कष्ट देते हैं. वास्तु, कुंडली, तीर्थयात्राओं, व्रत, उत्सवों के मारे सवर्ण, धर्म की लकीर पीटपीट कर कोई विशेष स्थान ग्रहण नहीं कर रहे पर अब दलित व पिछड़े उसी को दोहरा कर खुश हो रहे हैं. अब हो यह भी रहा है क दलित पंडे अपने मुताबिक धर्म और संस्कृति की व्याख्या करते हुए दलितों से पैसा बना रहे हैं. ज्यादा पैसे वाले दलितों में कर्मकांडों और मोक्ष की छटपटाहट को ब्राह्मण भुना रहे हैं. जिन्हें वाकई नीची जाति वालों से परहेज है बस, उन्हें ही शंकराचार्यों का बैनर रास आ रहा है.

दलित, महादलित, पिछड़े, अतिपिछड़े यह समझौता करते दिख रहे हैं कि उन का शोषण जाति के नाम पर भले ही हो पर उन्हें प्रताडि़त न किया जाए. इस बात के लिए वे पैसा चढ़ा रहे हैं. वे, दरअसल, सामाजिक दुत्कार से बचना चाह रहे हैं. व्यवस्था यह कर दी गई है कि अगर चक्रव्यूह से बचना है तो रास्ता धर्म से हो कर ही जाएगा, किसी संविधान, लोकतंत्र या गणतंत्र से नहीं.

– राजीव कुमार यादव के साथ लखनऊ से शैलेंद्र सिंह, भोपाल से भारत भूषण द्य

देसी टीवी पर विदेशी सीरियलों की नकल

कुछ अरसा पहले चीन ने अपने मुल्क में टैलीविजन पर प्रसारित होने वाले कई विदेशी शोज को प्राइम टाइम से बाहर कर दिया था. इस के पीछे चीन का मकसद देसी मनोरंजन और वहां के उद्योग को बढ़ावा देना था. भले ही इस फैसले के पीछे चीन का तानाशाही रवैया दिखता हो लेकिन उस की अपने देश की संस्कृति और मनोरंजन उद्योग की तरक्की के प्रति यह चिंता नाजायज नहीं कही जा सकती. वहीं, भारत में ठीक इस का उलटा हो रहा है. एक तो पहले से ही भारत में विदेशी मीडिया समूहों का वर्चस्व है, ऊपर से टीवी पर दिखाए जाने वाले ज्यादातर देसी सीरियल्स अमेरिकी शोज की भोंडी नकल या कहें देसी संस्करण बन कर रह गए हैं.

हमारे यहां प्रसारित होने वाले तकरीबन सभी रिऐलिटी शोज किसी न किसी विदेशी चैनल के शो की नकल होते हैं, खासतौर से अमेरिकी व ब्रिटिश शोज के, चाहे वह कौन बनेगा करोड़पति (हू वांट्स टू बी मिलेनियर) हो, कौमेडी नाइट विद कपिल (दी कुमार्स) हो, बिग बौस (बिग ब्रदर) हो, या फिर इंडियन आइडल (अमेरिकन आइडल), इंडियाज गौट टैलेंट (अमेरिकाज गौट टैलेंट), मास्टर शेफ (मास्टर शेफ आस्ट्रेलिया), इस जंगल से मुझे बचाओ (आई एम अ सैलिब्रिटी…गेट मी आउट औफ हिअर) या खतरों के खिलाड़ी (फिअर फैक्टर) हों. इन में से ज्यादातर शोज कौपीराइट ले कर बनाए गए हैं और कुछ वहां के शोज की मूल अवधारणा चुरा कर निर्मित किए गए हैं.

असल नकल साथसाथ

मजेदार बात यह है कि कई बार एक ही शो के देसी और विदेशी संस्करण एकसाथ टीवी के प्राइम टाइम पर देखे जा सकते हैं. उदाहरण के तौर पर एएक्सएन चैनल पर जब फियर फैक्टर आता था तो लगभग उसी दौरान कलर्स पर खतरों के खिलाड़ी का प्रदर्शन होता. ऐसा इसलिए चूंकि कई विदेशी चैनल भारत में टैलीकास्ट होने लगे हैं. बहरहाल, अमेरिकी कार्यक्रम को भारत में दिखाना कोई जुर्म नहीं है. समस्या है तो उन के कंटैंट को ले कर. दरअसल, भारत में प्रसारित होने वाले शोज के असल संस्करण अमेरिका और इंगलैंड के कल्चर के हिसाब से बने हैं. लिहाजा, उन में वहां के समाज की उन्मुक्तता, न्युडिटी, गालीगलौज और विचारधारा आना स्वाभाविक है. लेकिन जब इन के भारतीय संस्करण बनाए जाते हैं तो मामूली फेरबदल के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की जाती है.

रिश्तों में छिछोरपन

इन दिनों भारी टीआरपी बटोर रहे कौमेडी शो कौमेडी नाइट विद कपिल को बतौर उदाहरण ही देखते हैं. ब्रिटिश कौमिक शो ‘दी कुमार्स’ का प्लौट उड़ा कर बनाए गए इस शो में स्टैंड अप कौमेडियन कपिल शर्मा हास्य के नाम पर डबल मीनिंग चुटकुले, अश्लील इशारे और फुजूल किरदारों को पेश करते हैं. जैसा कि मूल शो में एक बुजुर्ग महिला किरदार को काफी ठरकी और बड़बोला किस्म का दिखाया गया है. उसी तर्ज पर कपिल ने भी अपने शो में एक नशेड़ी दादी का किरदार चस्पां कर दिया. दादी के किरदार में अली असगर की बेहद सस्ती और अश्लील हरकतें देख कर अच्छाखासा दर्शक शर्मिंदा हो जाए.

शायद तभी ‘तारक मेहता का उलटा चश्मा’ में जेठा भाई की प्रमुख भूमिका कर रहे दिलीप जोशी सवाल उठाते हैं कि किस घर में दादी इतनी दारू पी कर ऐसी छिछोरी हरकतें करती है जैसा कि इस शो में दिखाया जा रहा है. ऐसे ही शोज आने वाली पीढ़ी को पारिवारिक रिश्तों के प्रति गंभीर होने नहीं देते. चोरी के इन टीवी संस्करणों के साइड इफैक्ट अपने अश्लील और विवादास्पद कंटैंट के चलते कई बार प्राइम टाइम से बेदखल हुए शो ‘बिग बौस’ में भी बेशर्मी से उघड़ कर सामने आते हैं. अमेरिकी रिऐलिटी शो ‘बिग ब्रदर’ पर आधारित ‘बिग बौस’ में जानबूझ कर उस तरह की फिल्मी और सामाजिक हस्तियां शामिल की जाती हैं जो किसी न किसी तरह विवादास्पद रही हों. कोई फूहड़ और बड़बोली आइटम डांसर तो कोई गे फैशन डिजाइनर तो कोई रईस बिगड़ा नवाबजादा इस शो में जरूर शामिल होता है. पूरे सीजन इस शो में टास्क के नाम पर एकदूसरे को मांबहन की बीपनुमा गालियां देना, स्विमिंग पूल पर जिस्म उघाड़ कर मसाजबाजी और चुगलखोरियां ही दिखाई जाती हैं. इतना ही नहीं, हर बार 2 लोगों के बीच फर्जी प्रेमप्रसंग क्रिएट किया जाता है और फिर चोरीछिपे कैमरे में उन की कामक्रिया की खबरें भी उड़ाई व कथित तौर पर दिखाई भी जाती हैं. टीआरपी की भूख में मनोरंजन के नाम पर वे तमाम सीमाएं लांघी जाती हैं जो देशी दर्शकों के जेहन पर निगेटिव इंपैक्ट डालती हैं.

सट्टेबाजी का प्रचार

हमारे देश में जुआ अपराध को बढ़ावा देने वाला कितना जानलेवा खेल है, सब जानते हैं. पुलिस भी जहांतहां छापे मार कर जुआ खेलने वालों को पकड़ती रहती है. लेकिन जब यही जुआ किसी रिऐलिटी शो की आड़ में खेला जाता है तो लोग भूल जाते हैं कि हमारे समाज में किस तरह की मानसिकता पैदा होगी. अमेरिकन शो ‘डील या नो डील’, ‘हू वांट्स टू बी मिलेनियर’ की तर्ज पर बने ‘डील या नो डील’, ‘कौन बनेगा करोड़पति’, ‘जीतो छप्पर फाड़ के’, ‘सवाल दस करोड़ का’ और ‘क्या आप पांचवीं पास से तेज हैं’ जैसे झटपट पैसा जिताने वाले शो जुआ नहीं तो और क्या हैं.

गैर सामाजिक

‘स्टार वर्ल्ड’ पर एक सीरियल आता था, नाम था ‘वाइफ स्वैप’. लगता था इस शो की भारत में नकल नहीं की जा सकती, न इस पर आधारित कोई भारतीय संस्करण बन सकता है. यकीन नहीं होता था कि भारत में कोई महिला इस तरह के शो के लिए तैयार हो जाएगी, किसी अपरिचित के घर में 8 दिन बिताने को. सिर्फ बिताने को ही नहीं, उस के घर की सारी जिम्मेदारी लेने को. लेकिन एक चैनल पर ‘मां एक्सचेंज’ प्रोग्राम बना. यहां की महिलाएं भी तैयार हो गईं, घर की अदलाबदली को. इस में महशूर मौडलअभिनेत्री पूजा बेदी एक मध्यवर्गीय कौमेडियन के घर 8 दिनों के लिए शिफ्ट हुई थीं, शो का प्लौट वही था. महिला को 4 दिन उस घर के कायदेकानून के अनुसार रहना पड़ता है और बाकी के 4 दिन वह उस घर के सदस्यों के लिए अपने नियम बनाती है, जिस का पालन उन्हें हर हाल में करना होता है.

भारतीय समाज में नामुमकिन बात को इस शो में सिर्फ इसलिए दिखाया जा सका क्योंकि यह विदेशी शो की नकल मात्र था, वरना यहां कोई ऐसे कार्यक्रम की कल्पना भी नहीं कर सकता.

मासूमों से छिनता बचपन

इसी तरह छोटे बच्चों, किशोरों और युवाओं को सिंगिंग, ऐक्ंिटग टैलेंट पर बेस्ड रिऐलिटी शो के नाम पर न सिर्फ उन से 18-18 घंटे काम करवा कर बाल मजदूरी करवाई जाती है, बल्कि उन से उन का बचपन, शिक्षा, दोस्ती और कीमती समय भी छीना जाता है. यहां भी अमेरिकी शो ‘अमेरिकन आइडल’, ‘डांस विद सैलिब्रिटी’, ‘अमेरिकाज गौट टैलेंट’ और ‘एक्स फैक्टर’ की तर्ज पर ‘इंडियन आइडल’, ‘झलक दिखला जा’, ‘इंडियाज गौट टैलेंट’ और ‘एंटरटेनमैंट के लिए कुछ भी करेगा’ जैसे देसी संस्करण काम कर रहे हैं. प्रतिभाओं को नुमाइशी सामान बना कर उन से डांस और गायन प्रतियोगिताएं करवाई जाती हैं. मोबाइल से मैसेज का बड़ा बाजार अंधाधुंध कमाई करता है. जीतने वाले को प्रायोजक की तरफ से बड़े इनाम की घोषणा की जाती है और हर प्रतियोगी से उस के घर की दुखभरी कहानी सुनवा कर एसएमएस की भीख मंगवाई जाती है.

गुमनामी का अंधेरा

एक सर्वे के मुताबिक ऐसे ही रिऐलिटी शो की बदौलत सिर्फ मुंबई में 1 लाख से ज्यादा गायक स्ट्रगल कर रहे हैं और किसी को कोई मुकाम हासिल नहीं हो रहा. चैनल वाले प्रायोजकों के साथ मिल कर जनता का पैसा अंटी कर झोली भरभर कमाई करते हैं और इन प्रतिभाओं के हाथ सिवा नाकामयाबी के कुछ नहीं आता. वरना अब तक न जाने कितने इंडियन आइडल बन चुके हैं, कहां हैं वे सब? अमेरिकी तर्ज पर रिऐलिटी शो से शायद ही कोई सुपर सिंगर बना हो. ऊपर से इस तरह के विदेशी शो की देखादेखी किशोर और युवा अपनी पढ़ाईलिखाई छोड़ कर इन रिऐलिटी शोज के पीछे भागने से भी गुरेज नहीं करते.

जानलेवा तमाशा

ऐडवैंचर का शौक दुनिया में हर जगह है लेकिन खतरों के साथ खेलने का ऐडवैंचर अमेरिका जैसे मुल्कों में ज्यादा ही लोकप्रिय है. वहां सुरक्षा को ले कर जागरूकता भी ज्यादा है, इसीलिए वहां ‘फियर फैक्टर’ काफी हिट शो माना जाता है. हालांकि इस में ऐडवैंचर के नाम पर छिपकली और केकड़ों को पकड़ना, कई बार उन्हें खाना, कीचड़ में लोटना और हवा में कूदफांद करना ही शामिल होता है. लेकिन इस का भी देसी संस्करण ‘खतरों के खिलाड़ी’ के नाम से बनाया गया. पहले इस शो को अक्षय कुमार होस्ट करते थे. ताजा सीजन निर्देशक रोहित शेट्टी ने होस्ट किया था. असफल और गुमनाम फिल्मी कलाकारों की लंबी फौज यहां भी ऊटपटांग स्टंटबाजी करती है.

रचनात्मकता का अभाव

ये तो महज उदाहरण हैं. इंडियन टैलीविजन ऐसे ही सैकड़ों शोज से पटा है, जो न सिर्फ हमारे समाज को बहका रहे हैं बल्कि युवाओं को बरगला भी रहे हैं. हमारे यहां के ज्यादातर टीवी मालिक विदेशी हैं. लिहाजा, भारतीय मूल्यों पर आधारित शो बनाने की इन से उम्मीद नहीं की जा सकती. लेकिन जो बना सकते हैं वे भी नहीं बना रहे. अगर हम गुणवत्ता वाले कार्यक्रमों के लिए विदेशी शोज के मुहताज हैं तो हम जरूर वैचारिक दिवालिएपन से जूझ रहे हैं. हम भूल जाते हैं कि झटपट कमाई के उद्देश्य से बनाए गए ये फूहड़ और चोरी के शोज भविष्य की एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर देंगे जो ओरिजिनल आइडिया न तो सोच पाएगी और न ही कुछ रचनात्मक सृजित कर पाएगी. फिर आखिर में टीवी पर सिर्फ विदेशी शोज ही टैलीकास्ट होंगे.

क्या हम मनोरंजन के बड़े और सार्थक माध्यम टैलीविजन को पाश्चात्य देशों की मुट्ठी में देना चाहते हैं? कम से कम दूसरे मुल्क तो यही चाहते हैं कि यहां घुसपैठ कर के वे मनमुताबिक मनोरंजन बेचें. जवाब खोजना जरूरी है वरना इस तरह हम वैचारिक तौर पर न अमेरिकी होंगे और न भारतीय. क्या हम सासबहू और साजिश से भरे शोज, विदेशी शोज के भारतीयकरण और फूहड़ हास्य ही बनाने लायक रह गए हैं?

चारफुटिया छोकरे

जब कोई हर्ष मामर जैसा बाल कलाकार ‘आई एम कलाम’ और ‘जलपरी’ जैसी फिल्मों में काम करता है तो उसे जरूर वाहवाही मिलती है. वही बाल कलाकार जब हाथ में पिस्तौल लहराते हुए किसी का मर्डर करता दिखता है तो यह सोचने पर विवश हो जाना पड़ता है कि क्या यही हमारे देश का भविष्य है? क्या यह भारत का ‘कलाम’ बनने लायक है?

‘चारफुटिया छोकरे’ बाल शोषण और बच्चियों के ट्रैफिकिंग पर बनी फिल्म है. फिल्म का विषय गंभीर है परंतु इस का ट्रीटमैंट गंभीर नहीं है.  मसालों में लिपटी यह फिल्म जायके को बिगाड़ देती है. इस फिल्म की कहानी में बहुत सारी बातें हैं. गांव में किसान के कर्जा न चुका पाने पर उस के बैल खोल कर ले जाने का जिक्र है तो किसान के बेटे द्वारा साहूकार के आदमी का मर्डर भी है. गांव में एक दबंग की दबंगई है तो किशोरियों को जबरन उठा कर उन से देह शोषण कराने की कहानी भी है. इस के अलावा एक एनजीओ द्वारा गांव में स्कूल बनवाने की बात भी है, साथ ही दबंगों द्वारा नायिका की अस्मत लूटने की कोशिश भी है.

दरअसल यह फिल्म कहना तो बहुत कुछ चाहती है परंतु ढंग से अपनी बात कह नहीं पाती. फिल्म की कहानी एक गांव से शुरू होती है. गांव के लठैत एक किसान द्वारा कर्ज न चुका पाने पर उस की हत्या कर देते हैं. किसान का बेटा अवधेश (हर्ष मायर) 4 फुट लंबा है. वह अपने बाप के कातिल को मार डालता है और अपने 2 दोस्तों गोरख (शंकर मंडल) और हरि (आदित्य जीतू) के साथ भाग जाता है. तीनों को गांव का एक दबंग नेता लखन (जाकिर हुसैन) संरक्षण देता है. तीनों चारफुटिए छोकरे के नाम से मशहूर हो जाते हैं.

गांव में एक युवती नेहा (सोहा अली खान) एक स्कूल खोलना चाहती है. वह एनआरआई है. उस का सामना भ्रष्ट दबंग लखन से होता है. उसे लखन द्वारा किशोरियों के देह शोषण की बात पता चलती है. वह न सिर्फ इन चारफुटिए छोकरों को सही राह पर लाती है, लखन जैसे गुंडे का खात्मा भी करती है. फिल्म की यह कहानी कहींकहीं डौक्यूमैंटरी सरीखी लगती है.  फिल्म की सब से बड़ी खामी कलाकारों के अभिनय की है.

सोहा अली खान बहुत सी फिल्में करने के बावजूद फिल्मों में चल नहीं पाई है. अन्य कलाकारों ने भी ढीलाढाला अभिनय किया है. एक अकेला जाकिर हुसैन ऐसा कलाकार है जिस ने कुछ कर दिखाया है. फिल्म का निर्देशन कमजोर है. हालांकि फिल्म बाल अपराधियों को सही रास्ते पर लाती दिखती है लेकिन साथ ही पुलिस की बर्बरता को भी दिखाती है कि वह गांव के दबंगों के इशारे पर 12-13 साल के किशोरों का भी एनकाउंटर करने से भी नहीं चूकती. विदेशों में इस तरह की फिल्म भले ही वाहवाही बटोर ले हमारे यहां ऐसी फिल्म ज्यादा नहीं चलने वाली. ‘बच्चों को स्कूल में शिक्षा मिले, प्यार मिले, संरक्षण मिले’ रवींद्रनाथ टैगोर की इस उक्ति को हवा में उड़ते दिखा दिया गया है.

हैप्पी न्यू ईयर

बौलीवुड में अब एक के बाद एक बिग बजट की फिल्में बनने लगी हैं. हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘बैंगबैंग’ का बजट भी सवा सौ करोड़ का था. अब शाहरुख खान की रिलीज हुई नई फिल्म हैप्पी न्यू इयर का बजट भी 150 करोड़ का माना जा रहा है. इस से पहले सलमान खान की कई फिल्मों का बजट भी 100 करोड़ से अधिक था. ‘हैप्पी न्यू ईयर’ का बजट भले ही 150 करोड़ का हो परंतु फिल्म की कहानी सवा रुपए वाली है. इस सस्ती सा कहानी पर शाहरुख खान ने 150 करोड़ रुपए लगा कर फिल्म को भव्य बनाया है. कोई और फिल्म निर्माता अगर इस फिल्म को बनाता तो फिल्म की कहानी की धज्जियां उड़ जातीं.

‘हैप्पी न्यू ईयर’ को दीवाली के मौके पर रिलीज किया गया है. पिछले कई महीनों से शाहरुख खान इस फिल्म का प्रमोशन कर रहा था. टीवी पर फिल्म के प्रोमोज बारबार दिखाए जा रहे थे जिन में एक ही डायलौग दोहराया जा रहा था, ‘इस दुनिया में 2 तरह के लोग होते हैं – विनर्स और लूजर्स’. जाहिर है शाहरुख खान खुद को विनर साबित करना चाह रहा था. शाहरुख खान ने इस से पहले रोहित शेट्टी के निर्देशन में ‘चेन्नई ऐक्सप्रैस’ फिल्म बनाई, जो खूब चली. ‘चेन्नई ऐक्सप्रैस’ फुल एंटरटेनमैंट फिल्म थी. ‘हैप्पी न्यू ईयर’ में भी एंटरटेनमैंट का मसाला है. परंतु ‘चेन्नई एक्सप्रैस’ जैसा नहीं है. ‘हैप्पी न्यू ईयर’ में शाहरुख खान अपनी बांहें फैलाता है तो उस के फैंस खुश हो जाते हैं. लेकिन जब वह फाइटिंग करता है तो लगता है उस का दमखम अब टूटने की कगार पर है. इसी लिए उस ने बारबार अपने 8 पैक ऐब्स दिखाए हैं.

हम तो यही कहेंगे कि ‘बौलीवुड में 2 तरह की फिल्में बनती हैं – अच्छी और खराब.’ तो जनाब, हैप्पी न्यू ईयर न तो बहुत अच्छी है, न खराब. फिल्म की लंबाई बहुत ज्यादा है. फिल्म का फर्स्ट हाफ आप को कुछकुछ इरिटेट करता है, सैकंड हाफ दिलचस्प है. फिल्म का कैनवास काफी बड़ा है. फिल्म चमचमाती और कलरफुल है. आंखों को चुंधियाती है. किरदारों के कौस्ट्यूम्स शानदार हैं. सैकंड हाफ में दुबई में शूट की गई फिल्म की सिनेमेटोग्राफी भव्य है. डांस सीक्वैंस बढि़या हैं. फिल्म में कौमेडी भी है. देशभक्ति भी है. यह अच्छा है कि करोड़ों डौलर के हीरों की चोरी वाली इस फिल्म में गोलीबारी नहीं है.

कहानी है चार्ली (शाहरुख खान) की, जो बोस्टन से पढ़ कर आया है. उसे अपने पिता की मौत का बदला एक डायमंड किंग चरण ग्रोवर (जैकी श्रोफ) से लेना है. इस के लिए उसे चरण ग्रोवर के करोड़ों डौलर के हीरे चुरा कर उसे फंसाना है. वह एक टीम बनाता है. इस टीम में वह टैमी (बोमन ईरानी), नंदू (अभिषेक बच्चन) जग (सोनू सूद), राहन (विवान शाह) और मोहिनी (दीपिका पादुकोण) को शामिल करता है. चरण ग्रोवर ने हीरों को एक जबरदस्त तिजोरी में बंद कर रखा है और वह तिजोरी उस के बेटे विकी ग्रोवर (अभिषेक बच्चन की दूसरी भूमिका) के अंगूठे को टच करने से खुलती है. इन हीरों को चुराने के लिए चार्ली की यह टीम दुबई में होने वाली एक वर्ल्ड डांस कंपीटिशन में हिस्सा लेती है. पूरी टीम योजनाबद्ध तरीके से हीरों को चुराती है और वर्ल्ड डांस चैपियनशिप भी जीतती है. दुबई पुलिस चरण ग्रोवर और उस के बेटे को गिरफ्तार कर जेल भेज देती है.

फिल्म की बदले की यह कहानी मध्यांतर से पहले काफी धीमी गति से चलती है. मध्यांतर के बाद भी फिल्म में सभी किरदारों को चोरी का प्लान बनाते हुए ही दिखाया गया है. सिर्फ क्लाइमैक्स में ही हीरों को चुराने का सीन रोमांचक बन पड़ा है. फिल्म का निर्देशन कुछ हद तक अच्छा है. उस ने अभिषेक बच्चन से अच्छी कौमेडी कराई है. फिल्म की लोकेशंस, गीतसंगीत सब कुछ अच्छा है. शाहरुख खान अपने किरदार में पहले की फिल्मों की अपेक्षा कमजोर रहा है. उस के चेहरे पर उम्र अपना प्रभाव दिखाती है. सोनू सूद ने अपने गुस्सैल स्वभाव से दर्शकों को हंसाया है. उस के कानों से निकलते धुएं को देख कर दर्शक जम कर हंसते हैं. बोमन ईरानी भी ठीकठाक है. विवान को अभी बहुत कुछ सीखना पड़ेगा. एक बंद हो चुके डांस बार में काम करने वाली डांस गर्ल के किरदार में दीपिका पादुकोण ने अपने डांस का जलवा बिखेरा है. दुबई के होटल अटलांटिक और उस के आसपास की लोकेशनें मन मोह लेती हैं.

इस फिल्म को बना कर शाहरुख खान भले ही लूजर नहीं विनर बन जाए, नए साल की शुरुआत में ‘हैप्पी न्यू ईयर’ सेलिबे्रट करे परंतु अगर वह यह सोचे कि उस ने दर्शकों को कोई तोहफा दिया है तो यह उस की भूल होगी.

सैफ शर्मिला को नोटिस

दीवाली पर आतिशबाजी करना, तेज आवाज में संगीत बजाना और पार्टी करना सब को पसंद है. लेकिन यह पसंद कभीकभी भारी पड़ जाती है, जैसा कि सैफ अली खान और शर्मिला टैगोर के साथ हुआ. हुआ यों कि सैफ, शर्मिला अपने परिवार के साथ पटौदी पैलेस में पार्टी कर रहे थे. यह पार्टी पैलेस के आसपास रहने वालों को कुछ खास रास नहीं आई. लिहाजा, उन्होंने शिकायत कर दी. शिकायत मिलते ही प्रशासन ऐक्शन में आया और आननफानन नोटिस जारी कर दिया. उम्मीद है कि भविष्य में सैफ और उन का परिवार पार्टी करते समय आसपास वालों का भी ध्यान रखेंगे.

जेल में पीके

संजय दत्त भले ही जेल में सजा काट रहे हों लेकिन उन की फिल्में धड़ाधड़ रिलीज हो रही हैं. जल्द ही उन की आमिर खान के साथ फिल्म ‘पीके’ और इमरान हाशमी के साथ ‘उंगली’ रिलीज होगी. दिलचस्प बात तो यह है कि ‘पीके’ के टे्रलर रिलीज के मौके पर फिल्म के निर्माता विधु विनोद चोपड़ा ने इच्छा जताई कि यह फिल्म संजय दत्त को जेल में दिखाई जाए. गौरतलब है कि संजय दत्त पुणे के यरवदा जेल में हैं. वैसे संजय दत्त इस फिल्म में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं जबकि आमिर खान प्रमुख भूमिका में हैं. देखना होगा कि विधु की संजय को फिल्म दिखाने की कोशिश क्या रंग लाती है.

रोम में छाई हैदर

निर्देशक विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘हैदर’ भारतीय सिनेमाघरों में जबरदस्त प्रशंसा बटोरने के बाद रोम में झंडे गाड़ रही है. दरअसल, फिल्म का इटली में प्रीमियर रखा गया था, जहां इस फिल्म को उत्साहजनक रिस्पौंस मिला. और तो और, इस फिल्म ने एक इतिहास भी रच दिया. शेक्सपियर के मशहूर उपन्यास ‘हैमलेट’ पर आधारित इस फिल्म को 9वें रोम फिल्म फैस्टिवल में ‘पीपल्स चौइस अवार्ड’ दिया गया है. गौरतलब है कि यह अवार्ड इस से पहले किसी भी भारतीय फिल्म को नहीं मिला. जैसे ही अवार्ड मिलने की बात फिल्म की स्टारकास्ट को पता चली, वे फूले नहीं समाए. शाहिद कपूर ने जहां ट्विटर पर अपनी खुशी का इजहार किया, वहीं श्रद्धा ने भी इस जीत पर खुशी जाहिर की.

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