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आर्थिक खबरें

शेयर बाजार में अस्थिरता का माहौल

शेयर बाजार में अस्थिरता का माहौल है. देश के कई आर्थिक मोरचों, जैसे मुद्रास्फीति की दर घटने, तिमाही परिणाम बेहतर रहने, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की भारतीय अर्थव्यवस्था के साकार रहने की भविष्यवाणी व वित्तमंत्री के विकास दर में सुधार के अनुमान के बाद भी शेयर सूचकांक में उथलपुथल हो रही है. इस की वजह अंतर्राष्ट्रीय बाजार की कमजोर स्थिति को माना जा रहा है. हमारा शेयर बाजार अंतर्राष्ट्रीय बाजारों के इशारे पर घटताबढ़ता ज्यादा नजर आ रहा है. किसी भी मजबूत बाजार के लिए इतनी संवेदनशील स्थिति उचित नहीं है.

यदि हमें मजबूत होना है तो मजबूती का आधार इस तरह की संवेदनशीलता पर ठीक नहीं है. यह अच्छा है कि बाजार को प्रधानमंत्री पर भरोसा है. महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव के बाद एक्जिट पोल भाजपा के पक्ष में आए तो बाजार में 3 दिन की सुस्ती टूटी और वह तेजी पर बंद हुआ. चुनाव की तारीख के दिन तो बाजार 350 अंक टूट कर 2 माह के निचले स्तर पर पहुंचा. रुपए का भी यही हाल रहा. बाजार को मोदी से उम्मीद है तो यह उम्मीद बरकरार रहनी चाहिए.

एक देश एक मोबाइल का तोहफा

मोबाइल अखिल भारतीय पोर्टेबिलिटी पर पिछले 3 साल से संशय की स्थिति बनी हुई है. हर साल उपभोक्ता को उम्मीद रहती है कि इसी वर्ष से यह व्यवस्था लागू हो जाएगी लेकिन कुछ न कुछ अड़चन सामने आ जाती है. मोबाइल पोर्टेबिलिटी सेवा प्रदाता को बदलने की तो लागू हो चुकी है लेकिन एक देश एक मोबाइल का मुद्दा अभी सुलझा नहीं है. हाल ही में दूरसंचार आयोग ने कह दिया है कि अगले वर्ष मार्च के बाद से यह व्यवस्था लागू हो जाएगी. इस व्यवस्था के लागू होने के बाद सेवा प्रदाता को 2 दिन में नए शहर में उपभोक्ता को यह सेवा उपलब्ध करानी होगी. इस व्यवस्था के लागूहोने से उपभोक्ता के लिए उस का मोबाइल नंबर एक तरह से दूसरी पहचान बन जाएगी. मोबाइल हर एक का उपकरण बन गया है और यह सुविधा देश के हर नागरिक की जरूरत बन गई है इसलिए जितना हो सके उसे इस से जुड़ी सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए. सेवा प्रदाता मनमानी नहीं करें, इस पर भी कड़ी नजर रखी जानी चाहिए.

कीमत घटने का लाभ कौन डकार रहा है

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का दाम 5 साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंचने वाला है. थोक सूचकांक की दर भी सितंबर में 5 साल के निचले स्तर 2.38 फीसदी पर दर्ज की गई और खुदरा बाजार में भी मुद्रास्फीति की दर में लगातार गिरावट आ रही है. यह माहौल बन गया है कि सबकुछ सस्ता हो गया है. आंकड़ों का यह खेल हमेशा भ्रम पैदा करता है जबकि यह पूरी तरह से गुमराह करने वाला काम होता है. सियासत के लिए आंकड़ों की बाजीगरी जनमत जुटाने की शतरंजी चाल होती है और सत्ता के लोलुप नेता इन आंकड़ों पर खूब सियासत करते हैं.

महंगाई घटने का आंकड़ा तो आता है लेकिन बाजार में सामान्य उपभोक्ता की जेब पर कोई फर्क नहीं पड़ता है, उसे तो जो कीमत महंगाई बढ़ने के दिन चुकानी पड़ी थी उसी दर पर महंगाई का आंकड़ा घटने की खबर वाले दिन भी चुकानी पड़ती है. डीजल की कीमत बढ़ती है तो बस, आटो व अन्य सार्वजनिक यातायात संचालक किराया बढ़ा देते हैं लेकिन जब तेल 5 साल में सब से कम कीमत पर उतर आता है तो किराया नहीं घटाया जाता है. यह हालत सरकारी बसों में भी है और निजी वाहन मालिक भी ऐसा ही करते हैं. बढ़े किराए को घटाना किसी भी संगठन को रास नहीं आता है. तेल कंपनियां अंधाधुंध मुनाफा कमा रही हैं. अपने कर्मचारियों को मालामाल कर रही हैं. जनता सिर्फ लूट का निशाना बनी हुई है. तेल कंपनियां अपने कर्मचारियों को सरकारी कर्मचारी की तर्ज पर वेतन, भत्ते या ओवरटाइम देने के लिए तैयार नहीं हैं. आम जनता को लूट रही तेल कंपनियों पर नियंत्रण क्यों नहीं है. संभव है कि ट्रांसपोर्ट मालिकों से कमीशन पहुंचता हो, इसे देखा जाना चाहिए.

रियलिटी बाजार पर नियामक जरूरी

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड यानी सेबी सूचना छिपाने के 2007 के एक मामले में देश के सब से बड़े बिल्डर डीएलएफ के अध्यक्ष के पी सिंह तथा कंपनी के 6 निदेशकों पर 3 साल तक शेयर बाजार से पूंजी जुटाने पर प्रतिबंध लगा दिया है. सेबी के पूर्णकालिक सदस्य राजीव अग्रवाल के 44 पेज के इस आदेश के साथ ही भारतीय रियलिटी बाजार में भूचाल आ गया है. कंपनी को अब पैसा जुटाने के लिए अपनी संपत्ति को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. डीएलएफ पर आए इस संकट के साए से इस क्षेत्र के लिए एक नियामक की जरूरत की मांग को बल मिला है. इस क्षेत्र के लिए कहा जाता है कि यहां पैसा बहता है और उस पर नियंत्रण की कोई व्यवस्था नहीं है. अंसल जैसे कुछ बिल्डर भी पहले शीर्ष पर चढ़ कर जमीन पर उतरे हैं. शेयर बाजार में डीएलएफ के शेयरों की कीमत जमीन पर उतर आई है. सेबी ने 2007 के जिस इश्यू को जारी करते समय सूचना छिपाने के लिए डीएलएफ को झटका दिया उस समय बिल्डर ने रिकौर्डतोड़ पैसा जुटाया था. बिल्डरों पर नकेल कसने की व्यवस्था नहीं है. उच्च न्यायालय ने चारमंजिले भवन के एक निर्माता को बुकिंग कराने वालों का पैसा लौटाने का आदेश दिया है.

इसी तरह से मुंबई की कोका कोला सोसाइटी के 100 फ्लैट तोड़े गए और फिर हाल ही में एक अन्य मामले में प्रतिस्पर्धा आयोग के फैसले को सही ठहराते हुए प्रतिस्पर्धा अपीलीय न्यायाधिकरण ने डीएलएफ पर 630 करोड़ रुपए का दंड लगाया. रियलिटी बाजार के लिए नियामक होता तो शायद लोगों को बड़े स्तर पर लूट का शिकार नहीं होना पड़ता. हालत यह है कि रियलिटी क्षेत्र के कारोबारियों के सब से बड़े संगठन रियल एस्टेट डैवलपर एसोसिएशन औफ इंडिया के एक शीर्ष पदाधिकारी का एक अखबार में बयान आया कि रियलिटी क्षेत्र पर सेबी के प्रतिबंध का असर नहीं पड़ेगा क्योंकि 94 प्रतिशत बिल्डर शेयर बाजार से जुड़े नहीं हैं. सवाल है कि इतना पैसा कहां से जुटाया जा रहा है? बैंक बिल्डरों को खूब कर्ज दे रहे हैं. पूंजी जुटाने के परंपरागत तरीके शेयर बाजार से रियलिटी एस्टेट दूर भागता है तो पैसा बनाने वाली इस मशीन के मूल तक पहुंचने के प्रयास सरकारी स्तर पर क्यों नहीं होते हैं? सरकार ने बिल्डरों को लूटमार करने की खुली छूट किसलिए दे रखी है? रियलिटी बाजार में छोटेबड़े काम के लिए पंजीकरण को अनिवार्य किया जाना चाहिए.

पाठ्यक्रम की पुस्तकें कैसी हों

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद देश की बेहद महत्त्वपूर्ण संस्था है क्योंकि यहीं पाठ्यक्रम पुस्तकों का चयन होता है और इस बात की खुशी है कि परिषद इस का विशेष ध्यान रखती है कि वर्णों, जातियों, मान्यताओं, विचारधाराओं और धर्मों में पुस्तकें विभाजित न हों. पाठ्यक्रम की पुस्तकों को विशुद्ध रूप से ज्ञान के रूप में ही देखा जाना चाहिए.

देखने में यह भी आया है कि कुछ दूसरी संस्थाएं भी हैं जो पाठशालाओं और मदरसों में आपसी सद्भावना वाली पाठ्यसामग्री नहीं जुटा पा रही हैं जबकि स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयों की पुस्तकों का बड़ा महत्त्व होता है. यहां जो कुछ भी पढ़ाया जाता है उस का असर हर छात्र के मन में न केवल जीवनभर बना रहता है बल्कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्थानांतरित भी होता जाता है. इसलिए इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि कोई भी विचार इन पुस्तकों में ऐसा नहीं होना चाहिए जिस से सांप्रदायिक तालमेल या किसी प्रकार की द्वेष भावना का प्रचार हो.

सभी पाठ्यपुस्तकें, चाहे वे विभिन्न भाषाओं की हों या अन्य किसी विषय की हों, इस बात का खास ध्यान रखा जाना चाहिए कि उन में प्रकाशित सामग्री मूल रूप से धर्मनिरपेक्ष हो. इस का असर यह होगा कि जब बच्चे मदरसों या सरस्वती शिशु मंदिर जैसे धर्मपोषित शिक्षा संस्थानों से आगे बढें़गे तो उन में सद्भावना का प्रचार होगा. शिक्षाविद और लेखक प्रदीप कुमार जैन का कहना है कि विभिन्न शिक्षा संस्थानों में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में कई अंश ऐसे हैं जो बच्चों के मन में जातिगत, धार्मिक, सामाजिक और लैंगिक भेद का पता दे रहे हैं. ये पुस्तकें नन्हेमुन्नों के दिमाग में न केवल अंधविश्वास की नींव डाल रही हैं बल्कि उन्हें इस तरह का पाठ पढ़ा रही हैं कि आगे चल कर वे एकदूसरे से नफरत ही करते रहें. यही कारण है कि आज हिंदू मुसलमानों को शक की निगाह से देखते हैं और मुसलमान हिंदुओं को.

भेदभाव पैदा करती पुस्तकें

आएदिन आवाज आती है कि अमुक किताब में मुसलमानों को विदेशी आक्रमणकारी घोषित किया गया है या हिंदुओं के लिए ‘काफिर’ शब्द इस्तेमाल किया गया है. कहीं शिकायत आती है कि जमात-ए-इसलामी की पुस्तकों में लिखा है कि अकबर का पतन जिहालत और सत्ता के नशे के कारण, गैर मुसलिम रानियों और शियाओं के प्रभाव के कारण हुआ.

दूसरी तरफ सरस्वती शिशु मंदिर की पुस्तकों में गणित जैसे विषय को भी वैदिक विचारधारा के चश्मे से देखा जाता है. एक प्रश्न इस प्रकार का भी है कि रामचरितमानस की 110 चौपाइयां प्रतिदिन पढ़ने पर 12,970 चौपाइयां कितने दिनों में पूर्ण होंगी. इसी प्रकार से इसी संस्था की एक पुस्तक में लिखा है कि सम्राट अशोक एक महान शासक थे. बाद में उन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण किया और यज्ञों में बलि देना छोड़ दिया जिस के कारण समाज में कायरता फैल गई. ऐसी ही एक धार्मिक मिसाल सरकारी स्कूल में पढ़ाई जा रही भूगोल की पुस्तक में मिलती है जिस में लिखा गया है कि गंगा का उद्गम भगीरथ के सिर से हुआ है.

लता वैद्यनाथन का कहना है कि सरकारी स्कूल की कक्षा 5, 6, 7 और 8 की अंगरेजी और गृहविज्ञान पुस्तकों में लैंगिक मतभेद और पुरुष प्रधानता की बू आती है क्योंकि इन में दर्शाया गया है कि नारी पुरुष के मुकाबले कमजोर होती है जैसे, पिता कमाई करते हैं और माता रसोई में काम करती हैं, लड़के फुटबाल, हौकी, क्रिकेट आदि मेहनत के खेल खेलते हैं और लड़कियां घर में बैठती हैं या बाग में झूला झूलती हैं आदि. इस से बच्चों के बालमन में इस प्रकार की बात बैठ जाती है कि नारी के बस का कुछ भी नहीं है.

क्या हमारी पुस्तकों में कुछ इस प्रकार की बातें नहीं आ सकतीं कि महारानी अहल्याबाई होलकर ने मुसलमानों के लिए मसजिदों का निर्माण कराया. उसी प्रकार धर्म के प्रति औरंगजेब ने दिल्ली के ऐतिहासिक बाजार चांदनी चौक में अपने मराठा सिपहसालार अप्पा गंगाधर से खुश हो कर अप्पा गंगाधर मंदिर (गौरीशंकर मंदिर) की स्थापना की न केवल अनुमति दी बल्कि उस के निर्माण में सहायता की. यही नहीं, चांदनी चौक के शुरू में ही दिगंबर जैन लाल मंदिर को औरंगजेब के समय उर्दू मंदिर कहा जाता था.

हकीकत तो यह है कि एक ही क्षेत्र में रहने वाले हिंदुओं और मुसलमानों में इतनी समानता है जो अलगअलग इलाकों में रहने वाले हिंदुओं और मुसलमानों में नहीं होती. मसलन, बंगाल में रहने वाले मुसलमान के रीतिरिवाज, भाषा आदि बंगाल के हिंदू से अधिक मेल रखते हैं न कि दिल्ली वाले या पंजाब वाले मुसलमान से. इसी प्रकार केरल के हिंदू के रीतिरिवाज केरल के मुसलमान से अधिक समानता रखेंगे. यदि हम उस की तुलना उत्तर प्रदेश या हिमाचल के हिंदू से करें तो कोई भेद देखने को नहीं मिलता सिवा इस के कि वह हिंदू है.

बंगलादेश में हिंदू ईद मनाते हैं और मुसलमान दुर्गापूजा में उन का साथ देते हैं. बनारस के शिवाला महल्ले के हिंदू अपने मुसलमान भाइयों के साथ मुहर्रम में शामिल होते हैं. ऐसे ही राजस्थान में मुसलमान तानसेन और मीराबाई के पर्व को उसी उत्साह के साथ मनाते हैं जैसे हिंदू हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर जाते हैं. मैसूर के श्रीरंगपट्टनम में टीपू सुलतान और उन के पिता हैदर अली का हिंदू मंदिरों को संरक्षण देना कोई ढकीछिपी बात नहीं है. ये कुछ उदाहरण पूर्णरूप से इस बात को दर्शाते हैं कि भारत की संस्कृति आपसी मेलजोल पर आधारित मिश्रित संस्कृति है. यह बात समझ से बाहर है. इसी प्रकार की परस्पर सद्भावना वाली सामग्री हमें अपनी पाठ्यपुस्तकों में देनी चाहिए.

सद्भावना की जरूरत

आज जरूरत इस बात की है कि मदरसों के सभी उलेमा इस बात को पुरजोर ढंग से बताएं कि इसलाम में दूसरे धर्मों के प्रति कोई नफरत की भावना नहीं है. हजरत मुहम्मद (सल्ल.) दुनिया में खुदा का यह पैगाम ले कर आए थे कि वह रब्बुल मुसलिमीन अर्थात केवल मुसलमानों का रब नहीं बल्कि रब्बुल आलमीन अर्थात सभी का भगवान है और उन पर रहमत करने वाला है.

जिहाद, काफिर, वंदेमातरम, अल्पसंख्यक, कोटा, परिवार नियोजन, उर्दू, 4 शादियां, तलाक आदि ऐसे मुद्दे हैं जिन पर आएदिन बवंडर खड़ा होता रहता है. ये सभी मुद्दे ऐसे हैं जिन में कहीं से कहीं तक गैर मुसलिमों के खिलाफ न तो नफरत का इजहार किया गया है और न ही कहीं कोई टकराव है. कट्टरपंथी और जिहाद के नाम पर लड़ने वाले लोग अकसर युद्ध के समय कुरआनी आयतों को दिखा कर इसलाम को बदनाम करने का प्रयास करते हैं.

मुसलमान सोचते हैं कि हिंदू उन्हें मुगलों के समय में किए गए जुल्मों की सजा, बाबरी मसजिद तोड़ कर, उन्हें म्लेच्छ बता कर और पाकिस्तान से संबंधों को ले कर, दे रहे हैं. इन सब पर आमनेसामने बैठ कर बात की जा सकती है और इन का हल निकाल कर एकदूसरे के प्रति नफरत की भावना को खत्म किया जा सकता है.

वास्तव में होता यह है कि जब अलगअलग शिक्षा संस्थानों के लिए पुस्तकें तैयार की जाती हैं तो ढंग के प्रकाशकों से न तो बात की जाती है और न ही सुलझी विचारधारा के लेखकों की रचनाएं प्रकाशित की जाती हैं. पिछले दिनों संचार माध्यमों से यह शिकायत मिली कि मध्य प्रदेश में सरकारी स्कूलों की पुस्तकों पर ‘कमल’ छपा हुआ है जोकि भाजपा का चुनाव चिह्न है. इस प्रकार की बातों से दूर रहने की जरूरत है. हजरत अमीर खुसरो की खानकाह से यह संदेश गया कि धर्म चाहे कोई भी हो, लोगों को मिल कर रहना चाहिए. वास्तव में हिंदी का जन्म हजरत अमीर खुसरो की हिंदवी भाषा से ही हुआ है. हजरत अमीर खुसरो मिश्रित संस्कृति के संगीत के रसिया थे.

मतभेद दूर करें

आज जरूरत इस बात की है कि खुले दिल से हिंदू और मुसलमान एकदूसरे को स्वीकार करें और जो भी मतभेद हैं, उन का समाधान किया जाए. यह काम तब तक नहीं होगा जब तक दोनों वर्ग खुल्लमखुल्ला एकदूसरे के सामने अपनी शिकायतें न रखें. शुतुरमुर्ग वाली पद्धति यहां नहीं चलेगी कि जब सार्वजनिक रूप से हिंदूमुसलमान मिलें तो सामने मीठे बोल बोलें और जब अपनेअपने संप्रदायों में बात करें तो दूसरों को शक्की बताएं. आमतौर पर देखा गया है कि जब एक मुसलमान दूसरे मुसलमान से या एक हिंदू दूसरे हिंदू से बात करता है तो उस का लहजा सांप्रदायिक होता है. हां, जब एक मुसलमान हिंदू से बात करता है तो दोनों धर्मनिरपेक्ष हो जाते हैं और आपसी सद्भाव पर विचार करते हैं. यह दोहरा मानदंड है. जब तक ईमानदारी से हिंदू और मुसलमान एकदूसरे से पेश नहीं आएंगे तब तक दोनों में नफरत का प्रचार होता रहेगा.

वास्तव में होना यह चाहिए कि अपनेअपने वर्गों में धर्मनिरपेक्ष हिंदुओं और मुसलमानों को कट्टरपंथी लोगों को समझाना चाहिए कि हिंदू और मुसलमान एकदूसरे के दुश्मन नहीं बल्कि दोस्त हैं, पूरक हैं. यदि इन बातों को ध्यान में रख कर पाठ्यपुस्तकों को प्रकाशित किया जाए तो  कोई दोराय नहीं कि सभी वर्गों में मेलमिलाप का प्रचार व प्रसार न हो.

पाठकों की समस्याएं

मैं 22 वर्षीया अविवाहिता हूं और बहुत भावुक किस्म की हूं. मेरे घर में एक बार किसी बात पर क्लेश हो गया था, उस समय गुस्से में आ कर मैं ने खुद को आग लगा ली, उस वक्त आवेश में होश खो बैठी थी. फलस्वरूप मेरा चेहरा और छाती जल गए. सर्जरी कराने की हैसियत नहीं है. तब मेरी सगाई हो चुकी थी लेकिन मेरे जलने की घटना के बाद वह टूट गई. मैं मंगेतर को दिलोजान से चाहती हूं, उसे भुला नहीं पा रही. अब हाल यह है कि सारे दिन रोती हूं. मेरे घर वाले मुझ से नफरत कर रहे हैं. मां दिनरात ताने मारती हैं कि मैं ने ही अपने हाथों सब उजाड़ा है. यह सब गुस्से में हुआ था. अब एक तो मुझे अपनी सुंदरता खोने का दुख है, दूसरे, सगाई टूटने का, क्या होगा मेरा? आप ही जीने की राह सुझाइए.

निसंदेह आप ने गलत किया, पर जो हो चुका उसे बदला तो नहीं जा सकता. यह तमाम प्रकरण ही खेद का विषय है. इसे एक दुखद प्रसंग समझ कर धीरेधीरे भूलना ही होगा. अब आप को अपने अंदर हिम्मत तो पैदा करनी ही होगी. खेद की बात यह है कि आप के घर वाले आप से अच्छा व्यवहार नहीं कर रहे, हालांकि समय के साथसाथ वे ठीक हो  जाएंगे. आप को अब पूरी हिम्मत और आत्मविश्वास के साथ एक नया जीवन शुरू करना होगा. उत्साह के साथ नए जीवन की शुरुआत कीजिए.

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मैं एक 23 वर्षीया विवाहिता, 2 छोटे बच्चों की मां हूं. मेरे पति बेहद जिद्दी इंसान हैं, वे परदेस में रहते हैं और मैं यहां उन के संयुक्त परिवार के साथ रहती हूं. पति की जरा सी बात न मानो तो वे जोर से चिल्लाने व मारनेपीटने लग जाते हैं. घर के लोग भी उन के आते ही मेरी शिकायत करते हैं और उन का मुझ पर चीखना शुरू हो जाता है. मेरी कोई बात नहीं मानते. अगर कहती हूं, नौकरी कर लूं तो कहते हैं, तलाक ले ले. क्या करूं?

आप पति के साथ ही बाहर चली जाएं तो अच्छा रहेगा और वहां जा कर पति का विश्वास जीतने की कोशिश करें. उन की बात का विरोध न करें. घर वाले आप की शिकायत करते हैं तो कुछ बदलाव आप अपने व्यवहार में ला कर देखिए, फर्क पड़ेगा. क्या पति की बात का जवाब कुछ गलत अंदाज में देती हैं आप? रही बात कि पतिदेव झगड़ालू किस्म के हैं तो जब निभाने का प्रश्न आता है तो आप को ही समझौता करना होगा. एक बार उन के अनुसार चलेंगी तो वे भी आप से लड़नाझगड़ना छोड़ कर आराम से बातचीत करेंगे.

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मैं 25 वर्षीय अविवाहित, सेना में कार्यरत हूं. कुछ समय पहले विवाह के लिए एक लड़की देखी जो देखने में साधारण थी. कन्या पक्ष द्वारा जवाब मांगने पर हम ने कहा कि सोच कर बताएंगे. इस बीच मेरी बहन ने लड़की के विषय में पता किया तो मालूम हुआ कि लड़की का चरित्र ठीक नहीं है. इस बीच लड़की ने मुझे पत्र लिखे, जिन का मैं ने औपचारिक सा एक जवाब दे दिया था. अब आलम यह है कि उन्होंने कई लोगों को पत्र दिखाए और अब वे लोग धमकी दे रहे हैं कि हमारी लड़की से शादी करनी पड़ेगी. बोलते हैं कि कोर्ट में कहेंगे कि लड़के वाले दहेज मांग रहे हैं, ये लड़की ने स्वयं मेरे कमान अफसर को संबोधित कर पत्र लिखा है कि आप की यूनिट में मेरा मंगेतर है जो शादी से मुकर रहा है. क्या ये लोग मुझे झूठे आरोप में फंसा सकते हैं? मेरी मरजी के खिलाफ यह शादी हो सकती है? तनाव में मैं ने पीना भी शुरू कर दिया है, क्या करूं?

आप एक बहादुर वीर सैनिक हैं. देश का गर्व हैं और एक छोटी सी मुश्किल से घबरा गए. वैसे जब आप को विवाह करना ही नहीं था तो उसे अपना पता देना ही नहीं चाहिए था, न पत्र का जवाब ही देना चाहिए था. आप अपने कमान अफसर को सब बात बता दें और समझा दें कि लड़की वाले आप को ब्लैकमेल कर रहे हैं. वे सब स्थिति समझ कर आप का साथ देंगे. लड़की वाले कुछ भी नहीं कर सकते. शादी की बात हुई नहीं तो दहेज कहां से आ गया. आप ने पत्र में कुछ ऐसा तो नहीं लिखा था जो वे आप के पत्र दिखाते फिर रहे हैं. आप स्थिति से घबरा कर पीना बंद कर के अपने काम पर ध्यान दीजिए, लड़की वाले कुछ नहीं कर सकते. आप स्पष्ट रूप में उन को मना कर दें, तो वे स्वयं ही चुप हो जाएंगे.

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मैं 25 वर्षीय विवाहित पुरुष हूं, 6 महीने पहले ही विवाह हुआ है. हनीमून के समय से ही पत्नी मुझे परेशान करने लगी, घर में मेरा व मांबाप का कोई भी कहना नहीं मानती, घर का कोई काम नहीं करती, दिनभर बिस्तर पर लेटी रहती है और रातभर जागती है, कभी कहती है पेट में दर्द है, कभी सिर में. डाक्टर को दिखाया तो उस की दवा फेंक देती है, कहती है कि मैं उस के मांबाप के पास रह कर बिजनैस करूं और अपने मांबाप को छोड़ दूं, जो मैं कतई नहीं कर सकता. सासससुर उसे समझाने के बजाय उस की गलत हरकतों को बढ़ावा देते हैं. एक बार उस ने बताया कि उस का शादी से पहले दिमाग का इलाज हो चुका है. अब मनोचिकित्सक के पास जाना नहीं चाहती. मेरा कई बार आत्महत्या करने का दिल करता है पर मांबाप का ध्यान आ कर कदम पीछे कर लेता हूं, क्या करूं? राह सुझाइए?

आप की शादी गलत लड़की से हुई है और आप ने बताया कि उस का मनोचिकित्सक से इलाज भी हो चुका है. आप आत्महत्या का विचार कभी मन में ना लाएं. यद्यपि हम तो यही चाहते हैं कि घर हमेशा बसे  रहें पर आप के केस में आप का पत्नी से तलाक लेना ही ठीक रहेगा, कोशिश करिए कि सहमति से तलाक हो जाए, फिर कुछ समय बाद आप नया जीवन शुरू कर सकते हैं.

मेरी मां

मम्मी के बारे में मेरी अनगिनत यादें हैं. हम सब से दूर हुए मां को 12 वर्ष हो गए, फिर भी ऐसा लगता है जैसे वे हमारे साथ हैं, हमारे जीवन के हर अनुभव में. वे बहुत खुशमिजाज महिला थीं, जहां भी जातीं वहां का माहौल खुशनुमा बन जाता. मेरे पापा, भाई और हम दोनों बहनें ही उन की सारी दुनिया थी. मम्मी को घूमने का बहुत शौक था. घर के सारे काम खुद करने के बाद भी, जहां हम कहते, होटल या बाजार या फिर कोई फिल्म देखने, झट से तैयार हो जातीं. उन के मुंह से हम ने कभी ‘न’ नहीं सुना. मेरी मां भाई से ज्यादा मुझे प्यार करती थीं. मेरी हर बात पूरी करती थीं. उन का कहना था, ‘इसे यहां पर अपनी मरजी से रहने दो, शादी के बाद पता नहीं कैसा घरपरिवार मिले.’ आज मम्मी हमारे बीच नहीं हैं पर उन के आशीर्वाद से हमारी जिंदगी वैसी ही है जैसा सपना उन्होंने हमारे लिए देखा था.

वर्षा चितलांग्या, चेन्नई (तमिलनाडु)

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मैं अपनी मम्मी की बहुत शुक्रगुजार हूं. वे आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उन की हिदायतें, उन की बातें, उन की सीख हमारे बीच है. उन का आशीर्वाद हमारे साथ है. बात उस समय की है जब मेरा बेटा सालभर का था. उस ने चलना शुरू किया था. मैं घर के कामों में व्यस्त थी. बेटा अपनी हरकतों से कभी हंसा रहा था तो कभी मैं परेशान हो रही थी. वह अपनी तरफ मेरा ध्यान आकर्षित करने की कोशिश कर रहा था. धीरेधीरे वह बाहर बरामदे में चला गया. इधर मैं धुले कपड़े बौक्स में रखने लगी. तभी मुझे उस की कुलबुलाहट सुनाई दी. मुझे लगा, वह मुझे बुलाने की कोशिश कर रहा है. लेकिन मैं ने उस की तरफ ध्यान न दे कर काम में ध्यान लगा लिया. उस की आवाजें जारी थीं. तभी मेरे मस्तिषक में मेरी मम्मी की बात कौंधी, ‘बेटा, तुम काम में कितने ही व्यस्त हो लेकिन बच्चों को थोड़ीथोड़ी देर बाद देखते रहो. पता नहीं, वे किस मुसीबत में फंस जाएं.’ यह ध्यान आते ही मैं बाहर दौड़ी तो देखा कि बेटा रेलिंग में सिर फंसाए रो रहा है.

रेलिंग ऊपर से चौड़ी तथा नीचे से संकरी थी. उस ने ऊपर से अपना सिर डाल कर नीचे आ कर गरदन फंसा ली थी. अब उस से निकला नहीं जा रहा था. यह दृश्य देखते ही मेरे होश उड़ गए. मैं ने धैर्यपूर्वक बच्चे को उस में से निकाला और फिर प्यार किया. अगर मुझे अपनी मम्मी की बात समय पर याद न आती तो पता नहीं क्या होता?

पूनम सिंघल, पश्चिम विहार (न.दि.)

खेल आयोजनों की चमक दिखावे के फेर में दिवालिया होते देश

आज का युग दिखावे व चमकधमक का है. यदि आप ऐसा नहीं करते तो समाज में आप की हैसियत शून्य मानी जाती है. आधुनिक युग की यह थ्योरी हर जगह और हर क्षेत्र में लागू होती है, अंतर्राष्ट्रीय जगत में तो और भी ज्यादा, जहां दिखावे व शोशेबाजी का जबरदस्त बोलबाला है. गत दिनों स्कौटलैंड के ग्लासगो में संपन्न राष्ट्रमंडल खेलों में बहुत खुले हाथों से पैसा बहाया गया पर रिकवरी 10 फीसदी भी नहीं हुई. अनुमान लगाया जा रहा है कि आयोजक देश को इस से बहुत जबरदस्त घाटा झेलना पड़ा है.

ऐसी ही कहानी गत दिनों संपन्न हुए विश्वकप फुटबाल टूर्नामैंट की है जिस में धमाकेदार चमचमाते आयोजन के लिए ब्राजील को खूब वाहवाही मिली, भले ही अरबों डौलर फूंक कर भी वह फिसड्डी रहा. ब्राजील में भी गत दिनों संपन्न विश्वकप फुटबाल टूर्नामैंट के आयोजन पर 154 अरब डौलर का खर्चा आया, जिस में से 62 करोड़ डौलर अकेले रियो डी जेनेरियो के उस मरकाना स्टेडियम के नवीनीकरण पर फूंक डाले गए, जिस में कुल जमा एक यानी फाइनल मैच खेला गया था. कर्ज ले कर इतनी मोटी राशि फूंकने के बावजूद ब्राजील न तो टूर्नामैंट जीत सका, न ही उस की कुछ कमाई ही हुई.

भव्य आयोजन का दिखावा

इसी तरह 19 सितंबर, 2014 से दक्षिण कोरिया में हुए एशियाई खेलों के बाबत हुए खर्चों को ले कर भी जबरदस्त होहल्ला मचा क्योंकि मेजबान देश का मेजबान शहर इंचियोन पहले से ही घोर कर्ज की दलदल में नाक तक डूबा हुआ है. इस एशियाई आयोजन की लागत अब 3.89 बिलियन अमेरिकी डौलर आंकी गई है. अपै्रल 2007 में जब इस आयोजन का जिम्मा इस शहर को सौंपा गया था तब इस की लागत मात्र 1.62 बिलियन अमेरिकी डौलर आंकी गई थी. mचर्चा है कि मेजबान शहर ने इस के लिए कई अरब डौलर का विदेशी कर्ज अपनी सरकार की गारंटी पर लिया है. यह स्थिति केवल ब्राजील की ही नहीं, बल्कि हर उस देश की हो जाती है जो किसी भी प्रकार के क्षेत्रीय या अंतर्राष्ट्रीय खेल टूर्नामैंट आयोजित करने का जिम्मा ले लेता है.

दरअसल, आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेल टूर्नामैंट आयोजित करना सभी देशों में प्रतिष्ठा का विषय बन गया है. खेल आयोजन की जिम्मेदारी के लिए पहले तो जम कर लौबिंग व रिश्वत आदि समेत हर संभव जुगाड़बाजी की जाती है और जब आयोजन का जिम्मा मिल जाता है तो भारीभरकम कर्ज ले कर तैयारियों, नवीनीकरण व आधुनिकीकरण के नाम पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है. अधिक से अधिक दिखावा करते हुए आयोजन को भव्य से भव्य बनाने की कोशिश की जाती है चाहे नतीजा कुछ भी क्यों न हो.

शायद यकीन न हो लेकिन हकीकत यह है कि ब्राजील ने अपने मरकाना स्टेडियम का पिछले 7 सालों के दौरान यह चौथा नवीनीकरण किया है जिस पर अब तक कुल 293 करोड़ डौलर का खर्चा आया है, परंतु इस से भी बड़ी बात यह है कि उस की राष्ट्रीय फुटबाल टीम को पिछले एक दशक के दौरान एक बार भी इस स्टेडियम में खेलने का मौका नहीं मिला. mब्राजील के इसी स्टेडियम में 2 साल बाद यानी वर्ष 2016 में ओलिंपिक खेलों का उद्घाटन समारोह होगा और अब इस के लिए एक बार फिर से इस का नए प्रारूप में नवीनीकरण किया जाएगा. खबर है कि मूलत: फुटबाल के इस स्टेडियम को उद्घाटन समारोह स्थल में परिवर्तित करने बाबत एक बार फिर से करोड़ों डौलर फूंके जाएंगे. ओलिंपिक कमेटी के पैमाने बहुत अलग व काफी खर्चीले साबित होते हैं. उन्हें झेलना किसी छोटेमोटे देश के बस की बात नहीं है.

घाटे का सौदा

विश्व बैंक की रिपोर्ट बताती है कि लगभग सभी प्रकार के वैश्विक खेल आयोजन घाटे का सौदा साबित हो रहे हैं. फुटबाल, क्रिकेट, ओलिंपिक, एशियाई, राष्ट्रमंडल जैसे तमाम खेल आयोजन से पिछले 2 दशकों के दौरान कई देश या तो बरबाद हो गए या फिर घोर कर्ज में डूब गए. रिपोर्ट में बड़े विस्तार से बताया गया है कि पर्यटन और दर्शकों के लिहाज से भी ये आयोजन बिलकुल फिसड्डी साबित हुए हैं क्योंकि इन से एक फीसदी से भी कम राजस्व ही अर्जित हो पाया. रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक लोकप्रिय खेल क्रिकेट व फुटबाल हैं और रिटर्न की यह हालत इन के गढ़ों की है.

फुटबाल के खास रसियों में शुमार जरमनी में फीफा विश्व कप फुटबाल टूर्नामैंट वर्ष 2006 में आयोजित किया गया. टूर्नामैंट के दौरान लगभग सभी स्टेडियमों में दर्शकों की उपस्थिति औसत से भी काफी कम दर्ज की गई और पर्यटकों की आमद में भी सामान्य दिनों की अपेक्षा भारी कमी पाई गई. जरमनी को इस टूर्नामैंट से कुल मिला कर रिकौर्ड 134 अरब डौलर का नुकसान झेलना पड़ा था. तीसरे नंबर पर रहे जरमनी के नागरिक आज तक इस का दंश झेल रहे हैं. इसी प्रकार 2003 में दक्षिण अफ्रीका, जिंबाब्वे और केन्या तथा वर्ष 2007 में वैस्टइंडीज में संपन्न विश्व कप क्रिकेट टूर्नामैंट पूरी तरह घाटे का सौदा साबित हुए और इन सभी देशों के क्रिकेट बोर्ड अपनी लागत तक की भरपाई नहीं कर पाए. वर्ष 2004 में ओलिंपिक की मेजबानी करने वाला ग्रीस आयोजन के बाद दिवालिया हो गया. विश्व में ओलिंपिक खेलों का जनक ग्रीस को माना जाता है और इस नाते उस पर आयोजन की भव्य से भव्य बनाने का भारी वैश्विक दबाव था. अपनी आनबानशान के लिए उस ने बाजार में अरबों डौलर का कर्ज लिया जिस से बाद में तमाम देशों की अर्थव्यवस्था की चूलें हिल गईं और खुद वह दिवालिया हो गया. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा यूरो का अस्तित्व भी एकबारगी डगमगा गया था.

इन सब से ऊपर बड़ी चिंताजनक व हास्यास्पद बात यह है कि आयोजन समाप्त होने के बाद स्टेडियम व खेलगांवों की दशा अत्यंत शोचनीय हो जाती है और उसे कोई पूछने वाला भी नहीं होता. जैसे ग्रीस में आज ओलिंपिक गांव कचराघर में तबदील हो चुका है तथा विभिन्न खेलों के लिए बनाए गए शानदार स्टेडियम स्थानीय आबादी के रोजमर्रा के काम आ रहे हैं. हकीकतन, रखरखाव व देखभाल के अभाव में ये अब खंडहर में तबदील हो चुके हैं. इस तरह के खेल आयोजन का सर्वाधिक फायदा संबंधित खेल संगठन को मिलता है न कि आयोजक देश को. वर्ष 2006 में जरमनी में आयोजित विश्व कप फुटबाल टूर्नामैंट में जरमनी को तो भारी घाटा हुआ पर विश्व फुटबाल संगठन यानी फीफा, जो टूर्नामैंट का कर्ताधर्ता है, मात्र 90 करोड़ डौलर का निवेश कर 324 करोड़ डौलर की कमाई कर गया.

कमोबेश सभी टूर्नामैंटों की ऐसी ही हालत है. वर्ष 2010 में विश्व कप फुटबाल टूर्नामैंट की मेजबानी करने वाले दक्षिण अफ्रीका का भी यही हाल रहा. दक्षिण अफ्रीका को जहां भारी नुकसान उठाना पड़ा वहीं फीफा ने मात्र 124 करोड़ डौलर खर्च कर 472 करोड़ डौलर की कमाई की. बड़ी मशक्कत के बाद वर्ष 2012 के ओलिंपिक खेलों की मेजबानी हासिल करने वाले ब्रिटेन को अरबों पौंड का घाटा झेलना पड़ा हालांकि लाभहानि के असली आंकड़े उस ने आज तक दुनिया को नहीं बताए. अपना देश भी इतने महंगे आयोजनों के दुष्परिणाम झेल चुका है. वर्ष 2010 में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में पानी की तरह पैसा बहाया गया और अब समस्त रद्दोबदल व नवनिर्माण की धज्जियां उड़ रही हैं. खेलगांव समेत तमाम स्टेडियम बूचड़खानों में तबदील हो गए व जगहजगह सड़कों के किनारे लगे बुलैटपू्रफ शीशे करदाताओं के खूनपसीने की कमाई का मखौल उड़ा रहे हैं. औरों की तरह हमारी सरकार ने भी वास्तविक नफेनुकसान का चिट्ठा आज तक दुनिया के सामने नहीं रखा. पर अनुमान है कि इस आयोजन में सरकार को मोटा नुकसान उठाना पड़ा है.

वित्तीय भागीदारी जरूरी

असलियत तो यह है कि इस तरह के महंगे आयोजन हमेशा घाटे का सौदा सिद्ध होते हैं. कई अंतर्राष्ट्रीय व स्वतंत्र एजेंसियों के अध्ययन में भी यही तथ्य निकल कर आया है. चीन जैसे देश भले ही नफेनुकसान के सारे तथ्य पी जाएं और अपनेआप को सूरमा बताते फिरें, पर हकीकत में, यह झूठी शान व दिखावे के सिवा कुछ नहीं होता. होना तो यह चाहिए कि इस तरह के अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामैंटों के आयोजन के लिए एक कोष बना दिया जाए, आयोजन से पूर्व बजट मुकर्रर किया जाए और इन टूर्नामैंटों में भाग लेने वाला प्रत्येक देश उस में अनिवार्य रूप से समानुपातिक भागीदारी करे. फीफा, अंतर्राष्ट्रीय ओलिंपिक कमेटी और अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट संघ जैसी वैश्विक संस्थाएं किसी देश की बड़ी मशक्कत के बाद उसे संबंधित खेलों की मेजबानी देती हैं और फिर मेजबान देश पर इसे अधिक से अधिक खर्च करने यानी भव्य से भव्य बनाने का दबाव डालती हैं. जब सभी देश समानरूप से वित्तीय भागीदारी करेंगे तो संगठन भी अनावश्यक दबाव नहीं डाल पाएंगे और मेजबान पर भी बेहद कम वित्तीय भार पड़ेगा. और तब खेलों में भी पारदर्शिता व स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होगी.

भारत भूमि युगे युगे

छप्परफाड़ बोनस

इस बार दीवाली सूरत के हीरा व्यापारी साबजीभाई ढोलकिया के नाम रही जिन्होंने अपने संस्थान के कर्मचारियों को 50 करोड़ रुपए के उपहार बांट दिए. इन में गहने, फ्लैट्स व नकदी शामिल रहे. इसे दान या उपहार कुछ भी कह लें, उन के इस कदम ने नौकरमालिक यानी कर्मचारीनियोक्ता के संबंधों को झकझोर दिया है जिस पर तय है कि लंबी बहस होगी.

बिलाशक करोड़ों का यह बोनस प्रचार के लिए नहीं था. साबजीभाई बहुत नीचे से ऊपर उठे हैं, लिहाजा उन के इस बयान का स्वागत किया जाना चाहिए कि इस से रत्नकारों, जिन में सुनार भी शामिल हैं, की छवि चमकेगी. दूसरी अहम बात उन का यह कहना था कि अगर मैं हार्वर्ड में पढ़ा होता तो इतनी दरियादिली नहीं दिखा पाता. व्यावसायिक क्रूरता किसी सुबूत की मुहताज नहीं, लेकिन कुछ व्यापारी, उद्योगपति ऐसे हैं जो अपने कर्मचारियों के योगदान को पुरस्कृत भी करते हैं.

सिद्धू का यज्ञ

पूर्व क्रिकेटर व भारतीय जनता पार्टी के नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने अमृतसर के होली सिटी स्थित अपने नए घर में  अपने जन्मदिन यानी 20 अक्तूबर को 101 ब्राह्मण इकट्ठा कर रखे थे. सालभर से सिद्धू एक यज्ञ करवा रहे थे जिस का मकसद घर की सुख, शांति, स्वास्थ्य वगैरह थे. इन्हीं दिनों सिद्धू अपनी  सुरक्षा व्यवस्था में कटौती किए जाने से भी चर्चा में थे.

अंधविश्वासों को बढ़ावा देते इस यज्ञ से धर्मों की वास्तविकता, जो दरअसल आपसी बैर है, भी उजागर हुई जब सिख धर्म के पैरोकारों ने इस बात पर एतराज जताया कि नवजोत सिद्धू को शिवलिंगों के बीच बैठ कर मंत्रोच्चार वगैरह नहीं करना चाहिए था. यानी पाखंड करने और फैलाने के लिए दूसरे धर्म का सहारा लेने की जरूरत नहीं, इस का इंतजाम तो हर धर्म में है.

राजभवन में भागवत

आम तो आम देश का खास और बुद्धिजीवी आदमी भी यह तय नहीं कर पा रहा कि आखिर देश चला कौन रहा है भाजपा, एनडीए, नरेंद्र मोदी या फिर आरएसएस लेकिन यह साफ दिख रहा है कि आरएसएस और उस के मुखिया मोहन भागवत की पूछपरख काफी बढ़ रही है. बीते दिनों उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने मोहन भागवत को राजभवन में आमंत्रित किया तो मीडियाकर्मियों ने सवालों की बौछार लगा दी. मौका था ‘राजभवन में राम नाईक’ पुस्तक के विमोचन का जो तबदील हो गया ‘राजभवन में मोहन भागवत क्यों,’ जिस पर नाईक का कहना था कि राजभवन सभी के लिए खुला है. भागवत तो मेरे निजी मित्र हैं तो उन्हें कैसे न बुलाता. आरएसएस को उदारवादी सामाजिक संगठन की मान्यता दिलाने में जुटे हिंदूवादियों की यह कोशिश साजिश ही कही जाएगी कि वे कट्टर हिंदूवाद को सत्ता के जरिए थोप रहे हैं.

स्मृति साड़ी हाउस

इसे हार की कसक और 2019 में जीत के लिए तैयारी ही कहा जाएगा कि अमेठी लोकसभा सीट से राहुल गांधी के हाथों हारने के बाद भी केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने दीवाली के ठीक पहले तकरीबन 7 हजार साडि़यां इस संसदीय क्षेत्र में बंटवाईं और उन के साड़ी वितरकों ने संकेत भी दिया कि साड़ी बांटने का यह सिलसिला जारी रहेगा. इत्तफाक से उसी दौरान निर्वाचन आयोग सरकार से सिफारिश कर रहा था कि पेड न्यूज को अपराध की श्रेणी में रखा जाए. पर ऐसे अनपेड तोहफों को किस श्रेणी में रखा जाएगा, इस सवाल का जवाब भी दिया जाना जरूरी है. स्मृति ने कितने पैसे इस बाबत खर्च किए, इस का विवरण नहीं मिला है. मतदाताओं को लुभाने का यह टोटका सनातनी है, लेकिन चल रहा है. हैरानी नहीं होनी चाहिए अगर जल्द ही राहुल गांधी पैंटशर्ट अमेठी भिजवाने लगें.

यह कब तक चलेगा मी लौर्ड?

अदालतों का काम है फैसला देना और शासनप्रशासन का दायित्व है, अदालतों के फैसलों को लागू करना. लेकिन ऐसा लगता है कि सरकारों ने अदालती आदेशों की अनदेखी करना तय कर लिया है, खासकर पर्यावरणीय मामलों में. रेत खनन, नदी भूमि, तालाब भूमि, प्रदूषण से ले कर प्रकृति के विविध जीवों के जीवन जीने के अधिकार तक के बारे में देश की छोटीबड़ी अदालतों ने जाने कितने अच्छे आदेश बीते वर्षों में दिए हैं.

लेकिन उन सभी की पालना सुनिश्चित हो पाना, आज भी एक चुनौती की तरह हम सभी को मुंह चिढ़ा रहा है. कितने अवैध कार्यों को ले कर रोक के आदेश भी हैं और आदेश के उल्लंघन का परिदृश्य भी. किसी भी न्यायतंत्र की इस से ज्यादा कमजोरी क्या हो सकती है कि उसे अपने ही आदेश की पालना कराने के लिए कईकई बार याद दिलाना पड़े. आखिर यह कब तक चलेगा और कैसे रुकेगा? बहस का यह बुनियादी प्रश्न है.

आदेश 1 : दादरी जलक्षेत्र

उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर जिले की दादरी तहसील का एक गांव है बील अकबरपुर. यहां स्थित विशाल जलक्षेत्र 300 से अधिक दुर्लभ प्रजातियों के पक्षियों का घर है. वास्तव में यह जलक्षेत्र नदी के निचले तट की ओर स्थित बाढ़ क्षेत्र है. रिकौर्ड में दर्ज इस का मूल रकबा 72 हेक्टेअर था. वर्ष 2009 में जांच के दौरान कुछ पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने मात्र 32.7 हेक्टेअर रकबा ही शेष पाया. बाकी पर अतिक्रमण हो चुका था. खासकर, एक निजी विश्वविद्यालय द्वारा किए गए अतिक्रमण को ले कर मामला प्रकाश में आया. इस संबंध में दायर मामले पर विचार करते हुए राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने वर्ष 2012 में इस जलक्षेत्र के 500 मीटर के दायरे में किसी भी निर्माण पर रोक लगा दी थी. यह न्यायिक आदेश की प्रशासनिक अवहेलना नहीं तो और क्या है कि बावजूद इस के, निर्माण कार्य जारी रहा. लिहाजा, 2 वर्ष बाद 19 सितंबर, 2014 को राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण मौके की वीडियोग्राफी करने का आदेश देने को विवश हुआ.

आदेश 2 : मूर्ति विसर्जन

अदालती आदेश की पालना में ढिलाई का एक दिलचस्प मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा वर्ष 2012 में नदियों में मूर्ति विसर्जन को लगाई रोक को ले कर है. उत्तर प्रदेश शासन ने अदालत के सामने एक बार फिर हाथ खड़े कर दिए कि वह मूर्ति विसर्जन की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं कर पा रहा है. यह लगातार तीसरा साल है कि जब शासन ने अलगअलग बहाने बना कर छूट हासिल की है. हकीकत यह है कि शासन ने मूर्ति विजर्सन की वैकल्पिक व्यवस्था के लिए अभी तक राशि ही जारी नहीं की है तो वैकल्पिक व्यवस्था कहां से हो? जाहिर है कि इस अदालती आदेश की पालना में शासन की कोई रुचि नहीं. किंतु फिर भी इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा छूट पर छूट दिए जाना, आश्चर्यजनक भी लगता है और विरोधाभासी भी.

आदेश 3 : रिवर रेगुलेटरी जोन

यह मामला 18 सितंबर का है. राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने ‘रिवर रेगुलेटरी जोन’ को ले कर स्पष्ट विचार पेश न करने को ले कर केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को एक बार फिर कठघरे में खड़ा किया. रिवर रेगुलेटरी जोन यानी नदी नियमन क्षेत्र को समुद्री नियमन क्षेत्र की तर्ज पर एक ऐसे क्षेत्र के रूप में परिभाषित और अधिसूचित किया जाना अपेक्षित है कि नदियों के बाढ़क्षेत्र में बढ़ आए अतिक्रमण को रोकने की कानूनी बाध्यता सुनिश्चित की जा सके. गौरतलब है कि हिंडन यमुना बाढ़ क्षेत्र में अतिक्रमण के इसी मामले की सुनवाई करते हुए गत वर्ष न्यायाधिकरण ने मंत्रालय से पूछा था कि वह क्या कार्यवाही कर रहा है. 2 दिसंबर, 2013 कोे मंत्रालय ने मंजूर किया था कि देश की सभी नदियों के किनारों के ‘नदी नियमन क्षेत्र’ कैसे हों, इस पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए उस ने विशेषज्ञ समूह गठित कर लिया है. लेकिन पिछले 10 महीनों के दौरान हुई 8 सुनवाइयों के बावजूद मंत्रालय ने कोई रिपोर्ट पेश नहीं की.

बहानेबाजी पर नरमी

इतनी बार बहाने बना कर तो कोई एक छोटे से बच्चे को नहीं बहलाफुसला सकता, जितनी बार इस मामले में मंत्रालय ने हरित न्यायाधिकरण के आदेश की अनसुनी की है. नदियों के प्रवाह और भूमि की सुरक्षा पर हमारी सरकारों का यह रवैया तब है कि जब उत्तराखंड व हिमाचल में गत वर्ष घटी त्रासदी की याद अभी मिटी नहीं है और जम्मूकश्मीर में तूफान से हुई मौतों पर आंसुओं के बहने का सिलसिला अभी जारी है. ताज्जुब है कि 10 महीने बाद भी मंत्रालय वही कह रहा है कि ‘नदी नियमन क्षेत्र’ की व्यावहारिकता जांचने के लिए उस ने विशेषज्ञ समूह बनाया है. जल संसाधन मंत्रालय कह रहा है कि उसे और समय चाहिए और न्यायाधिकरण है कि अभी भी देरी की वजह पूछ रहा है.

सरकारें अक्षम, वसूलो हर्जाना

समझ में नहीं आता कि यदि ‘रिवर रेगुलेटरी जोन’ को परिभाषित और अधिसूचित करने को ले कर मंत्रालय कोई रिपोर्ट पेश नहीं कर पा रहा तो अदालत उसे अक्षम करार दे कर नदी पर काम करने वाली किसी अन्य भारतीय एजेंसी को यह काम क्यों नहीं सौंप देती. राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण चाहता तो यह काम जिओग्राफिकल सर्वे औफ इंडिया या उस जैसे किसी अन्य विशेषज्ञ को सीधे सौंप सकता है. 3 साल बीत जाने के बावजूद, उत्तर प्रदेश शासन द्वारा मूर्ति विसर्जन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था न कर पाने को ले कर इलाहाबाद हाईकोर्ट भी यही रुख अपना सकता है.

बेहतर तो यह होता कि नदी, भूगोल, प्रदूषण और पानी पर काम करने वाली विशेषज्ञ भारतीय एजेंसियां स्वयं पहल कर अपनी अक्षमता का सुबूत देते हुए अदालत से कहतीं कि वे यह काम कर सकती हैं, अदालत यह काम उन्हें सौंप दे. खर्च और विलंब के कारण हुए पर्यावरणीय नुकसान के हर्जाने की वसूली संबंधित सरकारों के संबंधित विभाग व अधिकारियों की तनख्वाह से की जाती.

दो पहलू और भी

उक्त तीनों मामले तो ताजा नजीर मात्र हैं. दिल्ली में जंगल क्षेत्र के चिह्नीकरण के लिए राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने गत वर्ष दिल्ली के वन विभाग को 6 माह का समय दिया था. वन विभाग ने चिह्नीकरण कर डिजिटल नक्शा बनाने में 1 साल लगा दिया. ऐसे मामलों को देख कर हम अंदाजा लगा सकते हैं कि देश के लिए अहम जाने कितने ही आदेशों की पालना को ले कर सरकारी रवैया ऐसा ही होगा. इन उदाहरणों से यह भी स्पष्ट है कि सरकारें जिन मामलों की पालना करना नहीं चाहतीं, उन में ऐसा ही टालू रवैया अपनाती हैं. छिपा एजेंडा यानी किसी अवैध कार्य को जारी रखने में शासनप्रशासन की सहमति होती है. जो प्रशासक सहमत नहीं होते, रेत खनन के 2 मामलों में उन का हश्र हम नोएडा और चंबल में देख चुके हैं. शायद यहां एक अहम प्रश्न, पालना करने वालों की सुरक्षा का भी है. किंतु हकीकत का यह पहलू सिर्फ कौर्पोरेट लालच के खिलाफ आए आदेशों की पालना का है. दूसरा पहलू इस से जुदा है. कौर्पोरेट हित के मामलों में जारी आदेशों की पालना सरकारें बिना समय गंवाए करती हैं. दिल्ली में ई-रिकशा संबंधी मूल आदेश समाने है, जिस के जारी होने के अगले ही दिन एक नामी आटो कंपनी के तिपहिया का विज्ञापन कमोबेश सभी अखबारों में दिखाई दिया. राजस्थान से ले कर बिहार तक जुगाड़ गाडि़यों को ले कर भी कुछ ऐसा ही चित्र था. बहस इस विरोधाभास को ले कर भी उतनी ही जरूरी है, जितनी कि पर्यावरणीय मामलों में ढिलाई को ले कर. क्या हम करेंगे?

स्वच्छता अभियान : सामाजिक सोच में बदलाव जरूरी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘स्वच्छ भारत अभियान’ 2 अक्तूबर से जिस जोशोखरोश के साथ शुरू हुआ, लगातार कायम नहीं रह पाया. 2 सप्ताह बीततेबीतते फिर चारों ओर वही गंदगी का आलम दिखने लगा है. गलियों, सड़कों के किनारे कूड़े के ढेर देखे जा सकते हैं. मोदी ने सरकारी कर्मचारियों को स्वच्छता की शपथ दिलाते हुए कहा था कि यह अभियान लगातार चलता रहना चाहिए जब तक हमारे सारे शहर साफ नजर नहीं आने  लगें. शपथ में कहा गया था, ‘‘मैं स्वच्छता के प्रति समर्पित रहूंगा और इस की खातिर समय दूंगा. न मैं खुद गंदगी फैलाऊंगा और न किसी को फैलाने दूंगा.’’ मोदी के इस अभियान की शुरुआत के साथ ही केंद्रीय मंत्री, सांसद, विधायक, पार्षद झाड़ू ले कर रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, सड़कों, गलियों में सफाईर् करते दिखाईर् दिए. अभिनेता, खिलाड़ी गांवों को गोद ले रहे हैं पर शीघ्र ही स्वच्छता का बुखार उतरता दिख रहा है.

अधिकतर नेताओं का मकसद सफाईर् से नहीं था. झाड़ू हाथ में ले कर उन के फोटो अखबारों में छपे और खानापूरी हो गई. इसी तरह अफसरों द्वारा भी सफाई की औपचारिकता निभ गई. जनता में भी पहले की तरह कूड़ाकचरा जहांतहां फेंकने, गंदगी फैलाने की आदत में कोई बदलाव नहीं आया. जिंदगी फिर पुराने ढर्रे पर चल पड़ी है.

मोदी ने 2 अक्तूबर को नई दिल्ली में पंचकुइयां रोड के पास जिस वाल्मीकि मंदिर से इस अभियान की शुरुआत की थी, उसी के बाहर इधरउधर कूड़ा बिखरा पड़ा है. दिल्ली में जगहजगह कूड़े के ढेर नजर आ रहे हैं. डलावघर गंदगी से उफन रहे हैं. आसपास रहने वाले लोगों के लिए जीना मुहाल हुआ जा रहा है. देश में गंदगी का क्या आलम है उस का जायजा लेने की शुरुआत दिल्ली से ही करते हैं. जहां मोदी सरकार खुद मौजूद है. दिल्ली के विख्यात दर्शनीय जापानी पार्क के पास स्थित रोहिणी सैक्टर 15 का जी ब्लौक करीब 180 गलियों वाला क्षेत्र है. यहां 2 डलावघर हैं. एक ए ब्लौक के कोने पर और दूसरा बिजली दफ्तर के पास. ये दोनों कूड़ाघर गंदगी से अटे पड़े हैं. कूड़ा बीनने वाले लोग इन में से अपने काम की चीजें बीन लेते हैं.

इलाके में करीब 120 सफाई कर्मचारी हैं. यह इलाका उत्तरी दिल्ली नगरनिगम क्षेत्र में आता है जो भारतीय जनता पार्टी के पास 8-10 सालों से है. सफाई का सिस्टम यह है कि सुबह 6.30 बजे नगर निगम के सफाई कर्मचारी आते हैं, वे निगम के हर्बल पार्क में बने एक कमरे में लगी बायोमीट्रिक मशीन से अपनी हाजिरी लगा कर गलियों, सड़कों पर सफाई करने चले जाते हैं.

इन कर्मचारियों में औरतें और पुरुष दोनों हैं. ये झाड़ू निकाल कर सड़क किनारे कूड़ा इकट्ठा करते चलते हैं और फिर इस कूड़े को डलावघर में डंप कर दिया जाता है. डंप किए हुए कूड़े को उठाने की जिम्मेदारी दूसरे लोगों की है. दिल्ली में कई डलावघरों में इकट्ठा कूड़ा उठाने का जिम्मा निगम कर्मियों के पास है तो कुछ डलावघर निजी ठेकेदारों के हवाले हैं. डलावघरों का कूड़ा निगम की ट्रकनुमा बड़ी गाडि़यों द्वारा उठा कर जीटी करनाल रोड बाईपास पर बने कूड़ा केंद्र में डंप किया जाता है.

सफाईर् कर्मियों के ऊपर सफाई सुपरवाइजर और उन से ऊपर सैनेटरी इंस्पैक्टर होते हैं. कर्मचारियों की हाजिरी 2 बार होती है, साढे़ 6 बजे और फिर साढे़ 11 बजे. ढाई बजे कर्मचारियों की छुट्टी हो जाती है. मजेदार बात यह है कि सफाई कर्मचारी दलित जाति के हैं लेकिन ज्यादातर सुपरवाइजर और इंस्पैक्टर ऊंची जातियों से आते हैं.

किस के भरोसे कूड़ाघर

इस व्यवस्था के अलावा नगर निगम द्वारा छोटी गाडि़यों के जरिए भी गलीगली घूम कर कूड़ा इकट्ठा कराया जाता है. इन में निगम और निजी कंपनियों दोनों के लोग हैं. ऐसी गाड़ी में केवल ड्राइवर होता है जो सायरन बजाता चलता है  और लोग अपने घर का इकट्ठा कूड़ा इस गाड़ी में डाल देते हैं. इस के अलावा घरघर से कूड़ा एकत्रित करने वाले निजी लोग भी हैं जो निचली जातियों के लड़कों को पैसा दे कर घरों से कूड़ा उठवाते हैं. इलाके का सारा कूड़ा जीटी करनाल रोड पर जाता है. जीटी करनाल रोड का यह कूड़ा केंद्र विशाल कूड़े का पहाड़ बन चुका है. दिल्ली में ऐसे एक दर्जन केंद्र बताए जाते हैं. लेकिन इन केंद्रों से कूड़ा निष्पादन का कोई पुख्ता इंतजाम न तो निगम के पास, न ही सरकार के पास है. इन कूड़ा केंद्रों की गंदगी और बदबू दूरदूर तक फैल कर वातावरण को दूषित कर रही है और बीमारियां बढ़ा रही है.

भेदभाव की सड़ांध

सफाई कर्मचारियों की अपनी समस्याएं भी हैं. स्वच्छता अभियान से सफाई कर्मियों पर दबाव बढ़ा है. सफाई सुपरवाइजर, इंस्पैक्टर इलाकों में ज्यादा चक्कर लगाने लगे हैं. अपने इलाके के साथसाथ सफाई कर्मचारियों को दूसरी जगहों पर ले जा कर भी उन से सफाई कराई जाती है. पर उन्हें समाज में हिकारत से देखा जाता है. उन के साथ छुआछूत, भेदभाव आज भी कायम है. सफाईकर्मी जगदीश बताता है, ‘‘हमारे सरकारी स्कूल में बेटे को 3 बार फेल कर दिया गया. टीचर कहते हैं, पढ़ कर क्या करेगा. टीचर जानबूझ कर हमारे बच्चों की ओर ध्यान नहीं देते. प्राइवेट स्कूलों में गरीबों का कोटा है पर वहां हमारे बच्चों को लेते नहीं हैं.’’ महिला सफाई कर्मचारी सुशीला कहती है कि निगम वरदी, झाड़ू भी समय पर नहीं देता. हमें खुद अपने ही पैसे से झाड़ू खरीदनी पड़ती है. एक झाड़ू और डंडा 150 रुपए का आता है. ड्यूटी दूर एरिया में लगाईर् जाती है. आनेजाने में वक्त और पैसा अधिक लगता है. कईकई कर्मचारी तो रोहतक, सोनीपत, पानीपत तक से यहां आते हैं. इन्हें मात्र 6 से 10 हजार रुपए तनख्वाह दी जाती है. कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें न ईएसआई की चिकित्सा सुविधा दी जाती है, न पैंशन न ग्रेच्युटी की. नए लोगों के लिए पैंशन की सुविधा भी छीन ली गई है. हजारों कर्मचारी ठेके पर काम करने को मजबूर हैं. सफाई के इस काम में बड़ी धांधली है, भ्रष्टाचार है. ऊंची जातियों के अफसर ठेकेदारों से मिल कर ज्यादा लोगों के वेतन उठा लेते हैं.

यह भी कहा जाता है कि दिल्ली के सभी नगर निगमों में ऐसे कर्मचारी भी हैं जो खुद कहीं और काम करते हैं लेकिन अपनी जगह कम पैसे दे कर किसी और को सफाई करने भेज देते हैं. ऐसे में न ये कर्मचारी जिम्मेदारी से अपना काम करते हैं न इन के अधिकारी साफसफाई को गंभीरता से लेते हैं, जो ऊंची जातियों के हैं. यानी मिलीभगत से गड़बडि़यां चल रही हैं.

कर्मचारी और कामचोरी

सफाई कर्मचारियों में भी आदतन निकम्मापन है. बहुत से कर्मचारियों का यूनियनों में दबदबा है. वे अपनी पगार लेने के अलावा और कोई काम नहीं करते. दिल्ली में सफाई मजदूर वर्ग से जुड़ी दर्जनभर से ज्यादा यूनियनें हैं, जिन का काम दफ्तरों में नेतागीरी करना ही है. हाजिरी दे कर पार्कों में बैठे रहते हैं, ताश खेलते हैं, फिर अपने घर चले जाते हैं. अनेक कर्मचारी तो ड्यूटी के समय और बाद में शराब के नशे में रहते हैं.

भ्रष्टाचार का कूड़ा

ऐसे कर्मचारियों के संगठनों वाले स्वतंत्र संयुक्त मोरचा के अध्यक्ष संतलाल चावरिया भ्रष्टाचार की बात मानते हुए कहते हैं कि सफाई इंस्पैक्टर 50-50 हजार रुपए महीना निगम पार्षद तक पहुंचाते हैं. सफाई कर्मियों के पैसे खा लिए जाते हैं. उन की वरदी, साबुन, रेहड़ी, झाड़ू के पैसे इंस्पैक्टर उठा लेते हैं. जबकि कर्मचारी प्रदूषण से जूझते हैं, उन्हें मास्क तक नहीं दिए जाते. यह हालत दिल्ली में ही नहीं, कमोबेश हर जगह है. इसलिए हमारे शहर दुनिया के सब से गंदे शहरों में शुमार हैं. कुछ समय पहले ब्रिटेन की महारानी भारत आई थीं तो उन्होंने अपने देश में लौट कर कहा कि दिल्ली बहुत गंदा शहर है. विश्वभर में यह बात फैली और हमारे यहां इस की चर्चा काफी दिनों तक होती रही. तब केंद्र में इंद्रकुमार गुजराल सरकार थी. बाद में दिल्ली सरकार और नगर निगम के अफसरों की नींदें खुलीं और सफाई के नाम पर खासखास सड़कों पर झाड़ू लगाई गई, चूने की लकीरें साफसाफ दिखने लगीं. कुछ समय बाद फिर वही हाल.

लुटियंस जोन को छोड़ दिया जाए तो बाकी दिल्ली कूड़े के ढेर में तबदील दिखती है. गलियों, सड़कों से नाक पर रूमाल रख कर गुजरना पड़ता है. अवैध कालोनियों में तो हालात और बदतर हैं. गंदगी ने शहरों के जीवन की गुणवत्ता को छीन लिया है. चारों तरफ फैली भयानक गंदगी निम्नता की सीमा तक पहुंच रही है.

बदहाल नगरपालिका

कुछ समय पहले देश में नगरपालिकाएं, नगर परिषद गरिमापूर्ण संस्थाएं होती थीं. उन में प्रतिष्ठित लोग चुने जाते थे. वे जनता की समस्याओं का खयाल रखते थे और समाधान करते थे. सफाईर्, बिजली, पानी से ले कर शिक्षा, स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जाता था. आज हालत यह है कि माननीय सदस्य आएदिन शोरशराबे, हुल्लड़बाजी, राजनीतिक स्वार्थों और योजनाओं का पैसा अफसरों, ठेकेदारों, दलालों के साथ मिल कर डकारने की जुगत में रहते हैं.

देश में रोजाना हजारों मीट्रिक टन कचरा पैदा होता है. मुंबई और दिल्ली में दर्जन से अधिक कचरे के ढेर हैं जो अब पहाड़ की शक्ल ले चुके हैं. मुंबई में 100 हैक्टेअर से अधिक जगह में फैले देवनार कूड़ा स्थल पर 100 लाख टन से ज्यादा कूड़े का ढेर लग चुका है. कुछ ऐसा ही हाल दूसरे महानगरों और शहरों का है. यह कचरा जन स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. आज कितने ऐसे शहर हैं जिन पर गर्व किया जा सकता है? क्या आप स्वच्छता के मामले में अपने शहर पर गर्व कर सकते हैं?

हम हैं जिम्मेदार

हमारे मन में अपने शहर के प्रति गर्व की भावना उत्पन्न कैसे होगी, जब हर कदम पर हम उसे ज्यादा से ज्यादा गंदा बनाने में खुद शामिल हैं. बाहर दुनिया के किसी भी देश में लोगों को अपने शहर में भारत की तरह खुलेआम बेशर्मी से थूकते, पेशाब करते, कूड़ा फेंकते नहीं देखा जाता. ऐसा करते हमें न शर्र्म आती है, न पश्चात्ताप होता है और न किसी का भय रहता है. हम घर का कूड़ा गलियों, सड़कों पर बिना किसी हिचक के ऐसे फेंक देते हैं मानो गलियों, सड़कों, महल्ले की सफाई से हमें कोई मतलब नहीं है. ये सब करने में गांव और शहर वाले सब बराबर से जिम्मेदार हैं. अकसर हमारे शहरों की सड़कें, गलियां तभी साफसुथरी दिखती हैं जब कोई मंत्री,  नेता आने वाला होता है या विश्व का कोई नेता या विश्व बैंक का अफसर, वरना हम गंदगी में रहने, जने के आदी हो  चुके हैं. आदत ऐसी कि साफसुथरी जगह पर हमें नींद नहीं आती.   

हमारे यहां स्वच्छता को ले कर कोई सख्त, प्रभावी कानून नहीं है. हालांकि अनुच्छेद-21 के तहत लोगों को पानी और सफाई का संवैधानिक मौलिक अधिकार प्राप्त है. संविधान में सफाई का काम करने वाली निचली जातियों के साथ छुआछूत निषेध कानून भी है पर सफाई के मामले में सामाजिक व्यवस्था ज्यादा प्रभावी साबित हो रही है. लोग निचली जातियों पर ही सफाई के लिए निर्भर हैं. 74वें संविधान संशोधन द्वारा राज्य सरकारों की पानी आपूर्ति और सैनिटेशन की जिम्मेदारी का हस्तांतरण स्थानीय निकायों को कर दिया गया. इस के लिए राज्य सरकारों द्वारा वित्तीय मदद, नीतिनिर्धारण से स्थानीय निकायों का पूरी तरह सशक्तीकरण कर दिया गया लेकिन मुंबई, दिल्ली जैसे शहरों की  स्लम और अवैध बस्तियों में रहने वाली करीब 50 फीसदी आबादी को न्यूनतम शहरी कानून नकारते हैं. लिहाजा, यहां सफाई और पानी की आपूर्ति के प्रति कोई ध्यान नहीं दिया जाता.

2004 में शहरी विकास मंत्रालय ने सैनिटेशन के लिए सुधार की गाइडलाइन जारी की थी और पब्लिकप्राइवेट पार्टनरशिप पर जोर दिया था. इस से हुआ यह कि पिछले कुछ सालों में सफाईर् के कामों के लिए निजी कंपनियां निगमों द्वारा लाई गईं. इस में हुआ केवल इतना कि सफाई करने वाले और कूड़ा उठाने वाले लोग तो वही दलित ही रहे पर यह काम कराने वाली कंपनियां और ठेकेदार ऊंची जाति के आ गए.

जवाबदेही तय नहीं

असल में भारत की यह गंदगी धार्मिकसामाजिक देन है. हमारा व्यवहार अलग ही है. यहां सफाई के काम को नीचा आंका जाता है. सफाई करने वालों को नीची नजरों से देखा जाता है. हम सफाई जैसे महत्त्वपूर्ण काम को जातिगत पेशा मानते हैं. एक ऐसा कर्म जिसे निचली जातियां ही कर सकती हैं. प्रथा है, मैला, गंदगी, कूड़ाकचरा हम करते हैं, उसे उठाता कोई और है.सफाई का जिम्मा हम ने सदियों पहले समाज के सब से निचले वर्ग को दे दिया था. वही वर्ग आज तक कूड़ाकचरा उठाने से ले कर हमारा मलमूत्र तक साफ करता आ रहा है.    

यह वर्ग अब शिक्षित, समझदार हो रहा है और जातिगत पेशे से छुटकारा पाना चाहता है इसलिए निकृष्ट, नीचा समझे जाने वाले सफाई के काम में इन की अब अधिक रुचि नहीं है, न इन के ऊपर बैठे अफसरों को. कचरा उठाने के लिए जिम्मेदार संस्थाएं सफाई करने, इकट्ठा करने और ढुलाई में नाकाम साबित हो रही हैं. ऐसे में मोदी के स्वच्छता अभियान में सफाईकर्मियों अफसरों में सक्रियता और कार्यकुशलता में कोई अंतर नहीं आया है. हो सकता है प्रधानमंत्री मोदी वास्तव में महात्मा गांधी की तरह स्वच्छतापसंद व्यक्ति हों या स्वच्छता का संदेश देशभर में फैला कर जनजन को जागृत करना चाहते हों या फिर सफाई अभियान उन की कोई मजबूरी हो लेकिन सत्य यह है कि वे अंतर्राष्ट्रीय नेता बन रहे हैं. स्वयं दुनिया का दौरा कर रहे हैं और दुनिया के नेताओं को भारत में आमंत्रित कर रहे हैं.

विश्व बैंक जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं और कईर् नामीगिरामी कंपनियां भारत आ रही हैं. भारत में अगर जगहजगह गंदगी देखने को मिलेगी तो कौन यहां आना, निवेश करना पसंद करेगा. लिहाजा, फायदे के लिए ऐसा किया जा रहा है.

खुद को बदलें

यह सच है कि भारत पर गंदगी और भ्रष्टाचार का धब्बा लगा है. अंतर्राष्ट्रीय निवेशक आजकल इस बात को ज्यादा तवज्जुह देने लगे हैं कि जहां वह पैसा लगाना चाहते हैं वे देश, उस के शहर साफसुथरे हों. इसलिए निवेश तब मिलेगा जब हमारे शहर साफसुथरे होंगे. यहां का वातावरण विदेशियों के अनुकूल होगा. लिहाजा, मोदी जानते हैं पैसा स्वच्छता से आएगा. सवाल है कि स्वच्छता को ले कर मोदी के इरादे नेक हैं लेकिन साफसफाई के प्रति हमारी जो पुरानी सामाजिक सोच है, क्या उस में बदलाव आ पाएगा? जब तक हमारी सोच औरों से सफाई करवाने वाली रहेगी, तब तक गंदगी हमारे जीवन में रचीबसी रहेगी. हम गंदगी फैला कर औरों के लिए अपराध कर रहे हैं. स्वच्छता की भावना हमारे गुणों में शामिल नहीं है. हमें स्वच्छता की सामूहिक भावना, सामूहिक विवेक को विकसित करना पड़ेगा.

ड्रैगन जैसा न हो भारत का विकास

आज जापान और चीन में इस बात को ले कर होड़ लग गई है कि भारत में ज्यादा निवेश कौन करे? निवेशकों में होड़ तभी होती है जब लाभ ज्यादा हो. शायद इस दृष्टि से दुनिया आज भारत को सब से मुफीद देशों में माप रही है. किंतु इस होड़ को ले कर हम इतने खुश क्यों हैं? शायद इसलिए कि हम निवेश के भूखे राष्ट्र हैं और चीन ने अगले 5 साल में भारत में 20 अरब डौलर का निवेश करने की घोषणा की है. सीमा पर जारी रार के बावजूद आर्थिक मोरचे पर 12 दस्तावेजी करार की कड़ी के जरिए भारत व चीन ने एकदूसरे का लाभ लेने की कोशिश की है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत और चीन को एक जिस्म, दो जान कहा है. शायद प्रधानमंत्री को भरोसा है कि हाथ मिलाते रहिए, एक दिन दिल भी मिल ही जाएंगे. यह आशा बलवती हो. किंतु इस खुशी में हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि जिस तरह जरूरत से ज्यादा किया गया भोजन जहर है, ठीक उसी तरह किसी भी संज्ञा या सर्वनाम का जरूरत से ज्यादा किया गया दोहन भी एक दिन जहर ही साबित होता है. चीन अपनी धरती पर यही कर रहा है. भारत अपने यहां यह न होने दे. चीन निवेश करे, किंतु द्विपक्षीय सहमत शर्तों पर.

गंगा जलमार्ग हेतु भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण द्वारा जारी विज्ञापन में कहा गया है कि परामर्शदाताओं का चयन, रोजगार आदि विश्व बैंक कर्जदाताओं के निर्देशों के अनुसार होगा. यह न हो.

विकास के मानकों की अनदेखी

यह सच है कि चीन ने अपनी आबादी को बोझ समझने के बजाय एक संसाधन मान कर बाजार के लिए उस का उपयोग करना सीख लिया है. यह बुरा नहीं है. ऐसा कर भारत भी आर्थिक विकास सूचकांक पर और आगे दिख सकता है. किंतु समग्र विकास के तमाम अन्य मानकों की अनदेखी कर के यह करना खतरनाक होगा. त्रासदियों के आंकड़े बताते हैं कि आर्थिक दौड़ में आगे दिखता चीन प्राकृतिक समृद्धि, सेहत और सामाजिक मुसकान के सूचकांक में काफी पिछड़ गया है. उपलब्ध रिपोर्ट बताती है कि चीनी सामाजिक परिवेश में तनाव गहराता जा रहा है. अमेरिका की ‘गैलप’ नामक अग्रणी सर्वे एजेंसी के मुताबिक, दुनिया के खुशहाल देशों की सूची में भारत, चीन से 19 पायदान ऊपर है. भारत के 19 फीसदी लोग अपने रोजमर्रा के काम और तरक्की से खुश हैं, तो चीन में मात्र 9 प्रतिशत.

जनवरी 2013 से अगस्त 2013 के महीनों में करीब 50 दिन ऐसे आए, जब चीन के किसी न किसी हिस्से में कुदरत का कहर बरपा. औसतन 1 महीने में 6 दिन. बाढ़, बर्फबारी, भयानक लू, जंगल की आग, भूकंप, खदान धंसान और टायफून आदि के रूप में आई कुदरती प्रतिक्रिया के ये संदेशे कतई ऐसे नहीं हैं कि इन्हें नजरअंदाज किया जा सके. खासतौर पर तब, जब उत्तराखंड और कश्मीर के जलजले के रूप में ये संदेशे अब भारत में भी आने लगे हैं.

यह कमाना है या गंवाना?

6 जनवरी, 2013 की बात करें तो चीन में व्यापक बर्फबारी से 7 लाख 70 हजार लोगों के प्रभावित होने का आंकड़ा है. प्रदूषण की वजह से चीन की 33 लाख हैक्टेअर भूमि खेती लायक ही नहीं बची. ऐसी भूमि में उत्पादित फसल को जहरीला करार दिया गया है. तिब्बत को वह ‘क्रिटिकल जोन’ बनाने में लगा हुआ है. अपने परमाणु कचरे के लिए वह तिब्बत को ‘डंप एरिया’ के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है. तिब्बत में मूल स्रोत वाली नदियों में बह कर आने वाला परमाणु कचरा उत्तरपूर्व भारत को बीमार ही करेगा.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2013 में प्राकृतिक आपदा की वजह से दुनिया ने 192 बिलियन डौलर खो दिए. आपदा का यह कहर वर्ष 2014 में भी जारी है. विकसित कहे जाने वाले कई देश स्वयं को बचाने के लिए ज्यादा कचरा फेंकने वाले उद्योगों को दूसरे ऐसे देशों में ले जा रहे हैं, जहां प्रति व्यक्ति आय कम है. क्या यह किसी अर्थव्यवस्था के ऐसा होने का संकेत है कि उस से प्रेरित हुआ जा सके? क्या ऐसी मलिन अर्थव्यवस्था में तबदील हो जाने की बेसब्री उचित है? गौरतलब है कि जिस चीनी विकास की दुहाई देते हम नहीं थक रहे, उसी चीन के बीजिंग, शंघाई और ग्वांगझो जैसे नामी शहरों के बाशिंदे प्रदूषण की वजह से गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं. चीन के गांसू प्रांत के लांझू शहर पर औद्योगिकीकरण इस कदर हावी है कि वह चीन के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शुमार हो गया है.

सचेत रहे भारत

बीते 11 अप्रैल की घटना है. लांझू शहर को आपूर्ति किया जा रहा पेयजल इतना जहरीला पाया गया कि आपूर्ति ही रोक देनी पड़ी. आपूर्ति जल में बेंजीन की मात्रा सामान्य से 20 गुना अधिक पाई गई यानी एक लिटर पानी में 200 मिलीग्राम. बेंजीन की इतनी अधिक मात्रा सीधेसीधे कैंसर को अपनी गरदन पकड़ लेने के लिए दिया गया न्योता है. प्रशासन ने आपूर्ति रोक जरूर दी, लेकिन इस से आपूर्ति के लिए जिम्मेदार ‘विओलिया वाटर’ नामक ब्रितानी कंपनी की जिम्मेदारी पर सवालिया निशान छोटा नहीं हो जाता. भारत के लिए इस निशान पर गौर करना बेहद जरूरी है.

गौरतलब है कि यह वही विओलिया वाटर है, जिस की भारतीय संस्करण बनी ‘विओलिया इंडिया’ नागपुर नगर निगम और दिल्ली जल बोर्ड के साथ हुए करार के साथ ही विवादों के घेरे में है. सरकारी के स्थान पर निजी कंपनी को लाने के पीछे तर्क यही दिया जाता है कि गुणवत्ता सुधरेगी और सेवा का स्तर ऊंचा होगा. लेकिन सवाल तो यह है कि ‘पीपीपी’ के बावजूद गुणवत्ता की गारंटी नहीं है. यदि निजी कंपनी को सौंपे जाने के बावजूद दिल्ली का सोनिया विहार संयंत्र अकसर दिन में एक बार गंदला पानी ही नलों तक पहुंचाता है, तो फिर ‘पीपीपी’ किस काम की?

अनुभव बताते हैं कि ‘पीपीपी’ का मतलब परियोजना लागत का जरूरत से ज्यादा बढ़ जाना है. परियोजना लागत के बढ़ जाने का मतलब ठीकरा बिलों और करों के जरिए जनता के सिर फूटना है. यदि चीन जैसे सख्त कानून वाले देश में ‘विओलिया वाटर’ जानलेवा पानी की आपूर्ति कर के भी कायम है, इस से ‘पीपीपी’ मौडल में भ्रष्टाचार की पूरी संभावना की मौजूदगी का सत्य ही स्थापित होता है. बावजूद इस के, यदि भारतीय जनता पार्टी के घोषणापत्र में उक्त तीन पी के साथ पीपल यानी लोगों को जोड़ कर चार पी यानी ‘पीपीपीपी’ की बात कही गई थी, तो अच्छी तरह समझ लीजिए ‘मनरेगा’ की तरह ‘पीपीपीपी’ भी आखिरी लाइन में खड़े व्यक्ति को बेईमान बनाने वाला साबित होगा.

निजी कंपनी का काम मुनाफा कमाना होता है. वह कमाएगी ही. ‘कौर्पाेरेट सोशल रिसपौंसिबिलिटी’ का कानूनी प्रावधान भले ही हो, बावजूद इस के लाभहानि की जगह ‘अधिकतम लाभ’ के इस मुनाफाखोर युग में किसी कंपनी से कल्याणकारी निकाय की भूमिका निभाने की अपेक्षा करना गलत है. एक कल्याणकारी राज्य में नागरिकों की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति सरकार की जिम्मेदारी होती है. इसे सरकार को ही निभाना चाहिए. जरूरत प्राकृतिक संसाधनों के व्यवसायीकरण से होने वाले मुनाफे में स्थानीय समुदाय की हिस्सेदारी के प्रावधान करने से कहीं ज्यादा, प्राकृतिक संसाधनों के शोषण को रोकने की है.  

लाभ के साथ हित भी जरूरी

यह भी न हो कि निवेशकों की शर्त पर चलतेचलते भारत की सरकार भी निवेशक जैसी हो जाए और परियोजनाओं में वह भी सिर्फ लाभ ही देखे जबकि सभी का हित भूल जाए. पारंपरिक रूप में भारतीय व्यापारी, लाभ के साथ हित का गठजोड़ बना कर व्यापार करता रहा है. यह गठजोड़ सरकार कभी न टूटने दे. भारत अब उसी वैश्विक होड़ में शामिल होता दिखाई दे रहा है, जिस में चीन और अमेरिका हैं.

सरकार को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि भारतीय विकास का भावी मौडल चाहे जो हो, वह चीन सरीखा तो कतई नहीं हो सकता. चीनी अर्थव्यवस्था का मौडल घटिया चीनी सामान की तरह है जिस का उत्पादन, उत्पादनकर्ता, उपलब्धता और बिक्री बहुत है किंतु टिकाऊपन की गारंटी न के बराबर. चीन आर्थिक विकास की आंधी में बहता एक ऐसा राष्ट्र बन गया है जिसे दूसरे के पैसे और सीमा पर कब्जे की चिंता है पर अपनी तथा दूसरे की जिंदगी व सेहत की चिंता कतई नहीं. यह खुद चीन के कारनामे बयान कर रहे हैं.

तेल ने बचाई साख

नरेंद्र मोदी अपने कर्मों से अच्छे दिन तो नहीं ला पा रहे पर दुनिया के दूसरे देशों के अच्छे कर्मों का वह फायदा जरूर उठा ले जाएंगे. पिछले एक साल से कच्चे तेल, जिस से पैट्रोल, डीजल, गैस, मिट्टी का तेल, प्लास्टिक बनते हैं, के दाम लगातार गिर रहे हैं. पहले कच्चे तेल के विश्व बाजार में दाम जम कर बढ़े थे और उस के चलते हर चीज के दाम बढ़ गए थे. लिहाजा, महंगाई उफान पर थी. मनमोहन सिंह सरकार इसी की शिकार हुई थी. अब पूरे विश्व में अर्थव्यवस्थाएं लड़खड़ाने लगी हैं जिस से कच्चे तेल की मांग घट रही है. ऊपर से अमेरिका ने अपने देश में तेल या उस की जगह ले सकने वाली प्राकृतिक गैस को निकालने का सस्ता तरीका ढूंढ़ कर, जम कर उत्पादन शुरू कर दिया है. अमेरिका के पंपों पर पैट्रोल अब कोकाकोला से भी सस्ता बिक रहा है, लगभग 300 रुपए का गैलन. अमेरिका 88 लाख बैरल तेल का उत्पादन कर रहा है जो 1986 से अब तक सब से ज्यादा है.

पश्चिमी एशिया में युद्ध का माहौल होने के कारण वहां भी मांग कम हो गई है. वहां के देश सड़कों, मकानों, उद्योगों पर पैसा खर्च नहीं कर रहे. वहां के शासक ज्यादा तेल उत्पादन कर के पैसा पश्चिमी देशों में जमा कर रहे हैं ताकि तख्ता पलटे तो भी उन्हें लगातार पैसा मिलता रहे. चीन के अलावा दुनिया के तकरीबन सभी देशों में कच्चे तेल की खपत घट रही है. अब आम लोगों को बढ़ते प्रदूषण से छुटकारा मिलेगा, फायदा होगा क्योंकि मांग कम होने का परिणाम होगा वातावरण में कम धुआं. नेता कई बार तो अच्छा काम करते हैं पर कई बार उन्हें दूसरों के अच्छे कामों का फायदा बैठेबिठाए ही मिल जाता है. तेल के मोरचे पर नरेंद्र मोदी सरकार ने अब तक कुछ नहीं किया है पर विश्व बाजार ने उन की इज्जत बचा ली.

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