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प्यार का बादल

प्रियतम की बांहों में सपने संजोता

होंठों को सहला गया प्यार का बादल

मौसम की कलियों ने चटख दिखलाई

आंखों ने आंखों की भाषा समझाई

सांसों की ताल पर गुनगुनाता हुआ

सात रंग जगा गया प्यार का बादल

तारों ने खेली खूब आंखमिचौली

सुहानी सी रात बनी रही सहेली

पांखुरी गुलाब सा मंद मुसकराता

भीतर तक लहरा गया प्यार का बादल

धीरे से टपकते शबनम के मोती

संदली हवा जागती न सोती

रेशम की तार सा तन को गुदगुदाता

इतिहास इक रचा गया प्यार का बादल.

                 – राजेंद्र निशेश

सैलानियों को मुग्ध करता साउथ इंडियन पैकेज

भारत के दक्षिणी भाग को दक्षिण भारत भी कहते हैं. अपनी संस्कृति, इतिहास तथा प्रजातीय मूल की भिन्नता के कारण यह शेष भारत से अलग पहचान बना चुका है. इतना भिन्न हो कर भी यह भारत की विविधता का एक अंगमात्र है. लिहाजा, यहां पर्यटन के इतने अनोखे ठिकाने हैं कि सैलानी एक बार में दक्षिण भारत के सभी टूरिज्म स्पौट्स कवर कर ही नहीं पाते. आइए, इस साउथ इंडियन पैकेज के जरिए करें दक्षिण भारत के कुछ चुनिंदा पर्यटन स्थलों की मजेदार सैर.

मुन्नार

मुन्नार का स्थान केरल की प्रसिद्धि में बड़ा योगदान देने वाले पर्यटन स्थलों में अव्वल है. यह हिल स्टेशन एक समय दक्षिण भारत के पूर्व ब्रिटिश प्रशासन का ग्रीष्मकालीन रिजौर्ट हुआ करता था. खूबसूरत चाय के बागान, हरीभरी घाटियां, सुहाना मौसम, ऊंचीऊंची चोटियां, अभयारण्य, प्राकृतिक खुशबू से भरी हवा के अलावा वह सबकुछ है जो सैलानियों को यहां खींच लाने के लिए काफी है. यहां की कलकल करती झीलें और घने जंगल देख कर प्रकृति के सर्वोत्तम रूप का नजारा हो जाता है. यहां नीलकुरंजी नामक दुर्लभ फूल  पाया जाता है जो पूरी पहाड़ी को नीला कर देता है. यह 12 वर्षो में केवल एक बार ही खिलता है.  ऐसे ही खूबसूरत नजारों और चौंकाने वाले प्राकृतिक उपहारों से लबरेज मुन्नार आना हर सैलानी का सपना होता है.

दिलचस्प माट्टूपेट्टी

समुद्रतल से लगभग 1,700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित माट्टूपेट्टी मुन्नार से करीब 13 किलोमीटर दूर स्थित है. इस जगह की खासीयतों में स्टोरेज मेसनरी बांध और खूबसूरत झील सब से ज्यादा चर्चित हैं. नीले पानी से लहलहाती इस झील में पर्यटकों के लिए जहां आनंददायक नौकाविहार की सुविधा है वहीं बांध में ठहरा विशाल जल देख कर प्रकृति और तकनीक के अनोखे संगम के दीदार होते हैं. इस जगह की पौपुलैरिटी का क्रैडिट इंडोस्विस लाइवस्टौक परियोजना द्वारा संचालित डेयरी फार्म को भी जाता है. हरेभरे चाय के बागान, ऊंचेनीचे घास के मैदान और शोला वन के साथसाथ माट्टूपेट्टी ट्रैकिंग के लिए आदर्श स्थल है. यहां आ कर सैलानी केरल के हरभरे मिजाज को दिल में सहेज कर लौटते?हैं.

पल्लिवासल, चिन्नकनाल और अनरियरंगल

मुन्नार में प्रवेश करते ही कई पर्यटक उत्सुकतावश पल्लिवासल, चिन्नकनाल और अनरियरंगल की तिकड़ी का जिक्र कर ही देते हैं. वजह, ये तीनों ही ठिकाने सब के पसंदीदा जो हैं. पल्लिवासल मुन्नार के चितिरपुरम से लगभग 13 किलोमीटर दूर स्थित है. यह केरल का पहला हाइड्रोइलैक्ट्रिक परियोजना स्थल है. टूरिस्टों का फेवरेट पिकनिक स्पौट बन चुका यह स्थल व्यापक प्राकृतिक नजारों से भरा पड़ा है. वहीं चिन्नकनाल के झरने, जिसे आमतौर पर पावर हाउस वाटरफौल कहा जाता है, खड़ी चट्टान पर समुद्रतल से 2 हजार मीटर की ऊंचाई से गिरते हैं तो पर्यटकों की आंखें एकटक देखती रह जाती हैं. चिन्नकनाल से लगभग 7 किलोमीटर आगे बढ़ने पर आप अनरियरंगल पहुंच जाएंगे. यह जगह चाय के हरेभरे पौधों का गलीचा है. शानदार जलाशय की सैर एक अविस्मरणीय अनुभव है. अनरियंगल बांध चारों ओर से चाय के बगीचों व सदाबहार वन से घिरा है.

चाय बागान और राष्ट्रीय उद्यान

मुन्नार की अन्य खूबियों में चाय बागान और राष्ट्रीय उद्यान का जिक्र न हो, ऐसा कैसे हो सकता है. ये दोनों ही नेमतें प्रकृति से उपहारस्वरूप मिलती हैं. चाय बागानों को तो मुन्नार की अपनी अलग विरासत माना  जाता है. इस विरासत को सब तक पहुंचाने के लिए केरल की ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं में चाय बागानों की उत्पत्ति और विकास के कुछ सूक्ष्म और दिलचस्प पहलुओं को सुरक्षित रखने व प्रदर्शनीय बनाने के लिए मुन्नार में टाटा टी द्वारा कुछ वर्ष पहले एक संग्रहालय की स्थापना की गई. यहां आ कर चाय बागान के विविध आयामों से गहराई से वाबस्ता होने का मौका मिलता है.

इस चाय संग्रहालय में दुर्लभ कलाकृतियां, चित्र और मशीनें रखी गई हैं. यह संग्रहालय टाटा टी के नल्लथन्नी एस्टेट का एक दर्शनीय स्थल है. इसी तरह मुन्नार से 15 किलोमीटर दूर स्थित इरविकुलम राष्ट्रीय उद्यान भी मुन्नार के प्रमुख आकर्षणों में पहली कतार पर आता है. 197 वर्ग किलोमीटर में फैला यह उद्यान तितलियों, जानवरों और पक्षियों की अनेक दुर्लभ प्रजातियों का ठिकाना है. यहां ट्रैकिंग का भी माकूल इंतजाम है. लहरदार पर्वतों पर धुंध की चादर का नजारा देख कर आप को एकबारगी अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं आएगा. 

रोमांच की सौगात : मुन्नार शहर के नजदीक झरने, झील और पहाड़ी सैलानियों को कभी न भूलने वाले रोमांच की नई दुनिया में ले जाते हैं. पावरहाउस वाटरफौल्स तो रोमांच के शौकीन पर्यटकों का पसंदीदा ठौर है. इस के अलावा मुन्नार के प्रमुख आकर्षणों में पोत्त नमेड, आट्टुकल, राजामाला, ईकोपौइंट, मीनूली और नादूकानी हैं जो अपने अंदर पर्यटन का एक अलहदा संसार समेटे हैं.

कब जाएं

मुन्नार की पर्वतमालाएं सुखद मौसम वाली हैं जहां पर्यटक सालभर भ्रमण के लिए आ सकते हैं.

कैसे पहुंचें

मुन्नार पहुंचने के लिए आप हवाईमार्ग, रेलमार्ग या सड़कमार्ग तीनों का इस्तेमाल कर सकते हैं. कोच्चि अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा मुन्नार के लिए सब से नजदीकी हवाई अड्डा है. नजदीकी रेलवे स्टेशन तमिलनाडु का थेनी है जो मुन्नार से 60 किलोमीटर की दूरी पर है.

ऊटी

दक्षिण भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में ऊटी का नाम सब से ऊपर आता है. यहां की मनोहारी सीनरी आप ने ज्यादातर हिंदी फिल्मों के दृश्यांकन में देखी होगी. यही वजह है कि नवविवाहितों के घूमने के लिए ऊटी पहला विकल्प होता है. नीलगिरि की सुंदर पहाडि़यों में स्थित यह शहर आधिकारिक तौर पर उटकमंड कहा जाता है लेकिन संक्षिप्त तौर पर इसे ऊटी कहते हैं. कहा जाता है कि इस का नाम यहां की घाटियों में 12 वर्ष में एक बार फूलने वाले कुरुंजी फूलों के कारण पड़ा. ये फूल नीले रंग के होते हैं तथा जब ये फूल खिलते हैं तो घाटियों को नीले रंग में रंग देते हैं. विशेष यह है कि औफ सीजन में भी यहां का प्राकृतिक सौंदर्य अलग ही सुरम्यता व आकर्षण बिखेरता है. ऊटी से बहुत सी ऐतिहासिक कथाएं भी जुड़ी हैं. चारों ओर फैली हरियाली, देशीविदेशी पेड़पौधे सैलानियों को मुग्ध कर देते हैं.

ऐतिहासिक महत्त्व : इस शहर में ब्रिटिश संस्कृति तथा वास्तुकला का प्रभाव दिखता है. कहते हैं कि अंगरेज यहां की आबोहवा से इतने प्रभावित हुए कि वे ऊटी को टी क्वीन औफ हिल स्टेशंस कहते थे. उन्होंने ऊटी के निकट स्थित वेलिंगटन शहर में मद्रास रेजीमैंट की स्थापना की. उस दिन से वेलिंगटन मद्रास रेजीमैंट का केंद्र बना हुआ है. कला और इमारतों की वास्तुकला, घरों के डिजाइन और निर्माण की शैली सभीकुछ ब्रिटिशकाल से मिलतीजुलती है.

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने ऊटी का विकास भी किया तथा यहां नीलगिरि में चाय, सागौन और सिनकोना का उत्पादन प्रारंभ किया. ऊटी में तथा इस के आसपास चाय और कौफी के अनेक बागान हैं. ऊटी भारत का एकमात्र मीटर गेज पहाड़ीरेलमार्ग है. मद्रास के तत्कालीन राज्यपाल लौर्ड वैनलौक की देखरेख में स्विस तकनीक द्वारा इस रेलमार्ग का निर्माण कराया गया था. दक्कन में दोड्डाबेट्टा सब से ऊंची चोटी है जिस की ऊंचाई 8 हजार फुट है. दोड्डाबेट्टा ऊटी से 10 किलोमीटर दूर है.

ऊटी झील

ऊटी झील को देखना अनोखा और सुखद अनुभव है. झील को घेरे रंगबिरंगे फूल इस की खूबसूरती को नया रंग देते हैं. मनोरम दृश्य के अलावा यहां और भी कई विकल्प हैं जो पर्यटक को यहीं का हो जाने को मजबूर कर देते हैं. मसलन, झील में मोटरबोट, पैडलबोट और रोबोट्स में बोटिंग का लुत्फ भी उठाया जा सकता है. 2.5 किलोमीटर लंबी इस झील में फिशिंग का आनंद भी उठा सकते हैं.

बोटैनिकल गार्डन

22 एकड़ में फैले इस गार्डन में प्रकृति से स्नेह रखने वालों के लिए बहुतकुछ है. 650 दुर्लभ किस्म के पेड़पौधों के साथसाथ अद्भुत और्किड, रंगबिरंगे लिली, खूबसूरत झाडि़यां व 2 हजार साल पुराने पेड़ का अवशेष यहां की विशेषता है. इस की स्थापना 1847 में की गई थी. इस खूबसूरत बाग में एक पेड़ के जीवाश्म संभाल कर रखे गए हैं जिस के बारे में माना जाता है कि यह 20 मिलियन वर्ष पुराना है.

कालहट्टी जलप्रपात

झील की तरह कालहट्टी जलप्रपात भी ऊटी आने का खूबसूरत बहाना है. लगभग 100 फुट ऊंचा यह प्रपात सौंदर्य से भरा पड़ा है. यहां विभिन्न प्रकार के पर्वतीय पक्षियों को देख कर मन उल्लास से भर जाता है. प्रपात पहुंचने के लिए ऊटी से केवल 13 किलोमीटर का सफर करना पड़ता है. झरने के अलावा कालहट्टीमसिनागुडी की ढलानों पर जानवरों की अनेक प्रजातियां भी देखी जा सकती हैं, जिन में चीते, सांभर और जंगली भैंसा शामिल हैं.

रोज गार्डन

ऊटी का रोज गार्डन बहुत खूबसूरत है. इस गार्डन की स्थापना 1995 में की गई थी. यह उद्यान 10 एकड़ में फैला हुआ है. रोज गार्डन में लगभग 200 प्रकार के गुलाब के फूलों का संग्रह है. इस गार्डन को दक्षिण एशिया का सब से उत्कृष्ट गार्डन का पुरस्कार मिला है.

डौल्फिंस नोज और डोड्डाबेट्टा

डोड्डाबेट्टा ऊटी से मात्र 8 किलोमीटर दूर स्थित है. वहीं डौल्फिंस नोज ऊटी से बेहद नजदीक है. दोनों ही जगह प्रकृति  के दिलचस्प नजारे पेश करते हैं. डोड्डाबेट्टा नीलगिरि का सब से ऊंचा पर्वत है. यहां से पूरे इलाके की खूबसूरती के दीदार बड़े आराम से हो जाते हैं. जब मौसम साफ होता है तब यहां से दूर के इलाके भी दिखाई देते हैं जिन में कोयंबटूर के मैदानी इलाके भी शामिल हैं. इस के अलावा डौल्फिंस नोज एक खूबसूरत पिकनिक स्पौट है. यहां से कोटागिरी के कैथरज फौल्स का नजारा भी देखा जा सकता है. यहां बच्चों के साथ पिकनिक का अपना ही मजा है.

वाइल्ड लाइफ सैंक्चुरी

एक तरफ ऊटी में जहां झील और हिल्स जैसे शांत व रमणीय इलाके हैं वहीं वाइल्ड लाइफ सैंक्चुरी के भी मजेदार विकल्प हैं. ऊटी से 67 किलोमीटर दूर स्थित वाइल्ड लाइफ सैंक्चुरी में वनस्पति और जंतुओं की कुछ दुर्लभ प्रजातियां और  हाथी, सांभर, चीतल, हिरन आसानी से देखे जा सकते हैं. यहां उड़ते रंगबिरंगे पक्षी और थेप्पाक्कडु हाथी कैंप सैलानियों का दिल जीत लेते हैं.

जायका खाने का : ऊटी में चाइनीज रेस्टोरैंट काफी हैं. सब से मशहूर है नीलगिरि पुस्तकालय के पास स्थित शिंकोज. वहीं दक्षिण भारतीय भोजन के लिए पर्यटक कुरिंजी का रुख करते हैं. यह शहर चाय, हाथ से बनी चौकलेट, खुशबूदार तेल और मसालों के लिए प्रसिद्ध है. कमर्शियल रोड पर हाथ से बनी चौकलेट कई तरह के स्वादों में मिल जाएगी.

खरीदारी : हौस्पिटल रोड की किंगस्टार कन्फैक्शनरी हाथ से बनी चौकलेट के लिए प्रसिद्ध है. कमर्शियल रोड की बिग शौप से विभिन्न आकार और डिजाइन के गहने खरीदे जा सकते हैं. यहां के कारीगर पारंपरिक तोड़ा शैली के चांदी के गहनों को सोने में बना देते हैं. तमिलनाडु सरकार के हस्तशिल्प केंद्र पुंपुहार में बड़ी संख्या में लोग हस्तशिल्प से बने सामान की खरीदारी करने आते हैं.

कैसे पहुंचें

ऊटी आने के लिए निकटतम हवाई अड्डा कोयंबटूर है. यहां से बस, रेल और कार द्वारा ऊटी पहुंचा जा सकता है. ऊटी रेलमार्ग से भी जाया जा सकता है. यदि यहां बस से आना चाहें तो कोयंबटूर, मैसूर, बेंगलुरु और आसपास के दूसरे शहरों से बस सेवाएं भी उपलब्ध हैं.

कब जाएं

यहां का मौसम पूरे वर्ष खुशनुमा रहता है, हालांकि ठंड में दक्षिण भारत के अन्य भागों की तुलना में यहां का मौसम अधिक ठंडा होता है.

पुडुचेरी

अगर आप सोचते हैं कि बीच के नाम पर भारत में सिर्फ गोआ ही अच्छी जगह है तो आप गलतफहमी में हैं और आप की गलतफहमी पुडुचेरी आते ही दूर हो जाएगी. इसलिए अगर आप भी सैरसपाटे के लिए समुद्रतट जाने की योजना बना रहे हों तो पुडुचेरी जरूर आ कर देखिए. सांस्कृतिक विविधता के दिलकश नजारे तो हैं ही, साथ में विदेशी शासन के समय की जीवनशैली का प्रभाव देखना भी विंटेज इफैक्ट देता है. शांत और सुकून भरे पर्यटन स्थलों की चाह रखने वालों के लिए यह जगह अद्भुत है. पूर्वी तट पर तमिलनाडु से मिला हुआ पुडुचेरी आप को पर्यटन का हर वह सुखांत अनुभव देगा जो आप जीवनभर अपनी यादों में सहेज कर रख सकते हैं. तो चलिए सागर तट का और साथ में विभिन्न सांस्कृतिक धरोहरों का आनंद लेने के लिए बनाइए पुडुचेरी जाने की योजना.

ऐतिहासिक महत्त्व : पुडुचेरी पहले फ्रांसीसी शासन के अधीन था. सितंबर 2006 से इस का नाम पांडिचेरी से बदल कर पुडुचेरी कर दिया गया है जिस का तमिल भाषा में अर्थ है नया गांव. इस की सब से ज्यादा चर्चा लंबे समय तक फ्रांसीसी कालोनी के रूप में रहने और महर्षि अरविंद द्वारा स्थापित आश्रम के कारण है. स्थापत्य कला और संस्कृति की दृष्टि से यह बेहद धनी जगह है. पुडुचेरी पर पुर्तगाल, नीदरलैंड और रोमन शासन भी रहा. वर्ष 1670 में यहां फ्रांसीसी आ गए थे और 1816 में पुडुचेरी पर फ्रांस का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हुआ. फ्रांसीसी शासन में डुप्ले पहला गवर्नर था. आज भी पुडुचेरी में डुप्ले की मूर्ति फ्रांसीसी शासन की याद दिलाती है, हालांकि फ्रांस का असर केवल डुप्ले की प्रतिमा से नहीं, बल्कि पुडुचेरी के समूचे रहनसहन पर नजर आता है. उस की संरचना ही फ्रांसीसी स्थापत्य कला के आधार पर की गई थी.

सड़कें और गलियां समानांतर हैं और सारी गलियां 90 डिगरी के कोण पर मिलती हैं. भारत 1947 में आजाद हुआ पर पुडुचेरी को 1 नवंबर, 1954 को आजादी मिली. लगभग 300 वर्ष तक फ्रांसीसी शासन के अधीन रहने के कारण यहां तमिल, तेलुगू व मलयालम के साथसाथ फ्रांसीसी भाषा न केवल प्रचलन में है बल्कि इसे सरकारी भाषा के रूप में मान्यता भी मिली हुई है.

फ्रैंच परंपरा आरोविले

हर सैलानी को जो जगह सब से ज्यादा भाती है वह है आरोविले. फ्रैंच क्वाटर्स, भोजन, परंपरा और फ्रैंच कालोनी यहां के प्रमुख आकर्षण हैं. आप यहां विश्व स्तर के कई समुद्रतटों का आनंद उठा सकते हैं. अगर आप को धूप व पानी पसंद हैं तो आप यहां जी भर मस्ती कर सकते हैं. यहां के समुद्रतट बहुत शांत और खूबसूरत हैं. यहां के बीच पर कई पेड़ एक लाइन में हैं. इस के अलावा यहां कई स्मारक हैं जो आप देख सकते हैं, जैसे चर्च, औपनिवेशिक इमारतें और प्राचीनकाल के मंदिर, बोटैनिकल गार्डन,  संग्रहालय आदि.

पुडुचेरी बीच

कहते हैं कि पुडुचेरी बीच किसी समय में यहां का प्रमुख आकर्षण था. लेकिन अरियानकुप्पम सागर में एक नए बंदरगाह के निर्माण के कारण होने वाली सामुद्रिक हलचल इस सुंदर बीच के विनाश का कारण बनी. फिलहाल बीच के अवशेष के रूप में सिर्फ रिपरैप शिलाखंड की समुद्री दीवार बची है जो ऐतिहासिक तौर पर देखने वाली जगह है.

बहरहाल, इस के ऊपर एक लाफोक्स प्लेस नाम का आर्टिफिशियल तट बनाया गया है. इस का शाब्दिक अर्थ है नकली बीच. शाम के समय तट पर ट्रैफिक की आवाजाही बंद कर दी जाती है जिस से समुद्र के किनारे टहलने के लिए यह एक आदर्श जगह बन जाती है.

और भी है बहुतकुछ : यहां आ कर लगता है मानो देश के बाहर किसी सुनियोजित, सुव्यवस्थित और साफसुथरे शहर में आ गए हैं. सैंट लुई स्ट्रीट, फैंकोसमार्टिन स्ट्रीट, रोमा रोलां स्ट्रीट, विक्टर सिमोनेल स्ट्रीट आदि खाने और खरीदारी के लिए पर्यटकों को खासे भाते हैं. बीच रोड के अंतिम छोर पर गांधी मंडपम है जहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा है, जो नक्काशी वाली छतरी और स्तंभों से घिरी है. 1826 में स्थापित पुराना बोटैनिकल गार्डन भी खूबसूरत स्थान है. इस का मुख्यगेट नक्काशीदार फ्रांसीसी शैली में है. इस में 1,500 पौधों की प्रजातियां हैं. गार्डन में म्यूजिकल फाउंटेन का आनंद लेना न भूलें.

कैसे पहुंचें

सब से आसान रास्ता ट्रेन या हवाई जहाज से चेन्नई पहुंच कर वहां से बस या टैक्सी से पुडुचेरी पहुंचने का है. आप बेंगलुरु या मदुरै होते हुए भी पुडुचेरी आ सकते हैं. पुडुचेरी के लिए चैन्नई से सीधी और नियमित ट्रेनें हैं.

कब जाएं

यहां दिन गरम होते हैं लेकिन शाम व रातें खुशनुमा होती हैं. ज्यादातर लोग यहां आने के लिए गरमी खत्म होने का इंतजार करते.

सच का डर

‘जो बोलेगा उस का मुंह हम तोड़ेंगे’, यह नारा उन सरकारों का होता है जो तानाशाही होती हैं. यह नारा हर धर्म का होता है जो सत्य, त्याग, धैर्य, संतोष, शांति की बात करता है. यह नारा हर उस पार्टी का होता है जो लोकतंत्र की बात करती है. यह नारा हर खाप का होता है जो अपने समाज को एकजुट रखना चाहती है. यह नारा हर उस बड़े कौर्पोरेट घराने का होता है जो व्यवसाय चलाने के लिए स्वतंत्रता की मांग रातदिन करता है. यह कैसा समाज है जो केवल बोलने से डर जाता है और आम घर ही नहीं, ताकतवर सरकार, धर्म, व्यापार, पार्टी भी डर के मारे कांपने लगते हैं कि कहीं बोलने वाला सच न बोल दे, कहीं पोलपट्टी न खुल जाए. बोलने का हक संविधान ने ही नहीं दिया, यह तो नैसर्गिक है, सदियों का है. तभी तो मानव ने उन्नति की है. बोल कर ही दरिंदों को काबू में लाया गया है. सच बोल कर ही समाज ने अपनी सुरक्षा की है, सभ्यता का विकास किया है. सच का अर्थ ही है जो असल में हो रहा है या हुआ है उसे स्वीकारो, चाहे वह सही था या गलत.

यदि सच बोलने पर पाबंदी लगने लगे तो अदालतें निरर्थक हो जाएंगी. गवाहों से यह उम्मीद क्यों की जाती है कि वे सच बोलें जबकि सरकार, धर्म, समाज, व्यापार और खाप कहते रहते हैं, खबरदार सच बोला तो. सरकारी पाठ्यपुस्तकों में सच की महिमा पढ़ाई जाती है, प्रवचनों में सच का महत्त्व बताया जाता है, स्वर्ग या भगवान के पास जाने का रास्ता बताया जाता है, व्यापार कहते हैं कि सच में उन का माल सब से बढि़या है. फिर सच से डर क्या? लैसली उडविन से डर लगता है कि उस का सच कहीं कालिख न पोत दे. प्रिया पिल्लै  से डर था कि कहीं वह इंगलैंड जा कर भारत के पर्यावरण की दुर्दशा का सच न बोल दे. योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण से डर था कि कहीं वे आम आदमी पार्टी का सच न बोल दें. दलित लेखकों पर मुकदमे दायर करे गए कि उन्होंने सच लिखा. 

सच असल में सब से बड़ा हथियार है. महात्मा गांधी ने सच का हथियार अपनाया, हालांकि उन के बारे में असल सच आज भी छिपा है और पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काट्जू जैसे कुछ बोल देते हैं तो संसद विरोध प्रस्ताव पास करने दौड़ती है. सच से लगभग हर कोई डरता है क्योंकि हर कोई अपने द्वारा किए गए गलत कामों से घिरा है और उन्हें छिपाता है. साधारण घर का पति सच से डरता है कि उस की मौज पत्नी द्वारा पकड़ी न जाए. एक लड़की प्रेमी से डरती है कि उस के दूसरे प्रेमी का सच खुल न जाए. हम आखिर ऐसे समाज में रहते क्यों हैं जहां सच छिपाने की लगी रहती है जबकि कोई गलत काम अपने निशान छोड़े बिना नहीं रहता. यह सभ्यता का कैसा विकास है कि इसे झूठों की बुनियाद पर किया जा रहा है और इसीलिए हर जगह तनाव है, विवाद है, युद्ध है, लूट है, हत्याएं हैं, बलात्कार हैं. प्रकृति तो सच पर जीती है. मानव ने प्रकृति पर विजय पाई है और लगता है उस विजय के तोहफे के रूप में उस ने सच को दफना दिया है.

परिपक्वता की ओर ‘आप’

आम आदमी पार्टी के अंदरूनी झगड़े यह साफ करते हैं कि पार्टी अब परिपक्वता की ओर बढ़ रही है और उस के सदस्यों को राजनीति की पथरीली व दलदली जमीन का एहसास होने लगा है. अब तक पार्टी आदर्शवाद से जुड़ी थी जो न व्यावहारिक होता है न उपयोगी. आदर्श की बातें केवल मंचों पर कही जाती हैं जबकि राजनीति ठोस धरातल पर चलती है, हवा में नहीं. अरविंद केजरीवाल ने यह बात समझ ली थी कि पार्टी को चलाने के लिए व्यावहारिक फैसले लेने पड़ते हैं. उन को साथ ले कर चलना होता है जो किसी स्वार्थ के कारण पार्टी में आए हैं और उन पर अगर कुछ काले छींटे पड़े हों तो चिंता नहीं करनी चाहिए. दूसरी तरफ शांति भूषण, प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव महा संतों की तरह शुद्ध सफेद चोले को महत्त्व दे रहे थे क्योंकि उन के वश का गंदी गलियों में घूमना, साधारण घरों में घुसना, जमीन पर कड़कड़ाती ठंड में सोना, धरने देना आदि नहीं. वे एअरकंडीशंड माहौल के स्टूडियो नेता हैं, उन्हें जमीनी लोगों की बू पसंद नहीं. ये दोनों 2 छोरों पर बैठे लोग थे, सो उन को अलग होना ही था. सिद्धांतों की बात ठीक है पर आम व्यक्ति चाहता है कि कैसे भी हो, उसे सुख मिले. कार्यकर्ता चाहता है कि उस को वोट देने वालों का भला हो. प्रशांत भूषण व योगेंद्र यादव जैसे चाहे जितने भी योग्य लोग हों, उन की वाक्पटुता वोटों को जमा नहीं कर सकती. वोट लेने के लिए तो सब का दिल भी और सब का स्वार्थ भी ध्यान में रखना होगा. आम आदमी पार्टी का प्रयोग उस के ताजा विवाद के बावजूद जिंदा रहेगा क्योंकि यह एक तरफ पुश्तैनी नेतृत्व वाली कांग्रेस और दूसरी तरफ कट्टर विघटनकारी, अंधविश्वासी भारतीय जनता पार्टी का पर्याय है. दोनों मुख्य पार्टियां सब को साथ ले चलने में असमर्थ हैं. आम आदमी पार्टी का स्वरूप पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस व ओडिशा की बीजू जनता दल की तरह है जो किसी खास वाद से नहीं बंधी हैं. दोनों व्यक्तिविशेष पर चल रही हैं. दोनों में तथाकथित आंतरिक लोकतंत्र भी नहीं है पर दोनों सफल हैं.

ऊपर से आम आदमी पार्टी अपेक्षाकृत युवा नेताओं की पार्टी है जिस में उत्साही, कर्मठ लोग हैं. अरविंद केजरीवाल को कुछ बुरा प्रैस कवरेज मिलेगा, भाजपा और कांग्रेस को भड़ास निकालने का मौका मिला लेकिन उन का राजनीतिक सफर अभी समाप्त नहीं हुआ है.

अश्क

आंसू को आंखों से गिरने न दीजिएगा
जितना संभालोगे इन्हें उतने ही ये गिरते रहेंगे
मेहमाननवाजी इन की अब बंद भी कीजिए
दूजे मेहमान को भी अब तो आने दीजिए

अश्कों से अपना नाता अब तो तोड़ दीजिए
चंद कसमों की तरह इन्हें भी भुला दीजिए
मेलमिलाप अब इन से जरा रोक लीजिए
और कुछ न सही सपनों का पहरा ही लगा दीजिए

मोतियों को अब भले आसरा न आंखों में दीजिए
और कुछ न सही इन्हें खुश्क ही रहने दीजिए.

– जोनाली कर्मकार

 

बात ऐसे बनी

मैं जिस हिंदी पुस्तकालय में रोज जाता हूं वहां हिंदी को बढ़ावा देने के लिए हाल ही में नियम बनाया गया कि पाठकों को काउंटर पर रखे रजिस्टर में अपना नाम, पता व समय केवल हिंदी में ही दर्ज करना होगा. मगर वहां आने वाले अधिकांश पाठक इसे सुन कर भी अनसुना कर अंगरेजी का ही प्रयोग कर रहे थे. मैं ने प्रबंधक को सुझाव दिया कि वहां एक तख्ती पर सूचना लिखवा कर रख दें तो शायद पाठकों पर इस का कुछ असर पड़ जाए. अगले दिन जब मैं पुस्तकालय में गया तो वहां एक तख्ती पर सूचना लिखी थी, ‘अपना नाम व पता केवल हिंदी में ही दर्ज करें,’ वाह, ऐसे बनी न बात.

मुकेश जैन ‘पारस’, बंगाली मार्केट (न.दि.)

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रक्षाबंधन का दिन था. मेरी ननद राखी के त्योहार के लिए दिल्ली स्थित हमारे घर आई हुई थीं. खाना खाने के बाद ननद ने कहा, ‘‘चलो भाभी, कनौट प्लेस चलते हैं शौपिंग के लिए.’’ हम लोग गाड़ी से कनौट प्लेस गए. गाड़ी पार्क कर के आगे बढ़े ही थे कि गलत पार्किंग के कारण ट्रैफिक पुलिस वाले चालान काटने को आ गए. मेरे वापस वहां पहुंचने पर वे 200 रुपए का चालान काटने लगे. एक बार तो मैं सोच में पड़ गई फिर एकाएक मैं ने कहा, ‘‘भैया, रक्षाबंधन वाले दिन तो ऐसा मत करो.’’ मेरे बोल सुन कर वे निरुत्तर हो गए और बिना चालान काटे ही वापस चले गए.   

मधू गोयल, गाजियाबाद (उ.प्र.)

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एक दिन शाम को जब चाय की चुस्कियों के साथ मैं अपने दिनभर की थकान दूर कर रही थी तभी पति हंस कर चिढ़ाते हुए बोले, ‘‘तुम दिनभर करती क्या हो जो थक जाती हो? बस, 2 रोटी बनाईं और काम समाप्त.’’ इन की बातें सुन कर मैं स्तब्ध रह गई. मैं ने कोई जवाब नहीं दिया. रात के भोजन के समय जब ये डाइनिंग टेबल पर आए तब भोजन के नाम पर एक तश्तरी में 2 रोटी देखकर बोले, ‘‘यह क्या है?’’ ‘‘ये मेरे दिनभर का काम है पर इसे मैं ही खाऊंगी क्योंकि मुझे बच्चे को दूध पिलाना है,’’ यह कह कर मैं ने रोटियां ले लीं. ये मुझे कुछ देर देखते रहे. पहले तो कुछ समझ नहीं पाए परंतु जब समझ में आया तब चुपचाप कमरे में चले गए. हंसी में कही बात किसी के दिल को कितना चोट पहुंचा सकती है, इस बात का एहसास उन्हें उस दिन हुआ. उस दिन के बाद इन्होंने कभी हंसी में भी मेरे दिल को दुख नहीं पहुंचाया.

रेणुका श्रीवास्तव, लखनऊ (उ.प्र.)

बिना सब्सिडी की रसोई

हम लोगों की जिंदगी बिना सब्सिडी के सालों चली. पहले सब्सिडी होती कहां थी? यों कहीं होती भी रही हो तो सरकारें जतलाती नहीं थीं. वे चुपचाप दे देती थीं, ले रख स्टाइल में, जैसे सास, बेटी की विदाई के वक्त दामाद के खीसे में जबरदस्ती नोट डाल रही हो. आजकल एकदम उलट हो रहा है. सरकारें डंके बजाए जा रही हैं. सब्सिडी का बोझ न उठाया जाएगा? कम करना हमारी मजबूरी है. कम कर के रहेंगे. हायरमिडिल क्लास के लिए अच्छे दिनों की गिनती शुरू भी न हो पाई थी कि उलटी गिनती शुरू होने के दिन आ गए. लोग कहते हुए याद करेंगे, वे भी दिन थे, सरकार हर थाली में ‘सब्सिडी कृपालु’ के रूप में पसरी हुई थी. बैगन के भुर्ते में, सब्सिडी की खुशबू हुआ करती थी. दाल के तड़के में, सब्सिडी समाई हुई थी. कुकर जब सीटी बजाता था तो लगता था सब्सिडी का शंखनाद हो रहा है.

क्या सस्ते का जमाना था.

एक सिलेंडर में महीनेभर की फैमिली मौज हो जाया करती थी. मिडिल, हायरमिडिल क्लास के ये छोटेछोटे मजे छीन के कोई चैन से भला कैसे रह सकता है? अब पड़ोसिन से मिलने पर बातें यों होने की नौबत है, तुम्हारे ‘वे’ बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर अब कहां से जुगाड़ करते हैं, बहनजी? हमें भी बताओ न, बहुत दिनों से गाजर का हलवा नहीं बनाया. टोमैटो का सीजन निकला जा रहा है सौस बनाने की कौन कहे, सिलेंडर चुक जाएगा? इस से अच्छा तो बाजार से खरीद के इस्तेमाल करने में अक्लमंदी है. आप क्या कहती हैं, मिसेज कविता? आप के यहां सिलेंडर के अकाल तो पड़ते नहीं होंगे, भाई साहब फूड विभाग वाले हैं. एक मंगाओ चार आ जाते होंगे. अरे मिसेज शीला, वे दिन अब लद गए. ये कह रहे थे, अब संभाल कर गैस खर्च करो. आधार कार्ड के जरिए सिलेंडर एकएक को गिनगिन कर मिलेंगे. इफरात में जलानेउड़ाने का जमाना अब रहा नहीं, समझ लो.

पहले बिना किसी झिझक के एकदूसरे के घर से सिलेंडर उठा लाते थे. अचानक दालमखनी बनातेबनाते सिलेंडर बोल गया, किसी को तनिक भी परेशान होने की नौबत ही न आत थी. पड़ोसी को अधपकी दालमखनी दो, वे तड़का लगा कर दे जाती थीं, बता देती थीं कि अपने हिस्से की रख ली है. अरी रमीला, जानती है, कल से आप के भाईसाहब के घर से फौज आने को है. वे बोलेंगे जानबूझ कर हम बहाना बना रही हैं. आज ही सिलेंडर को खत्म होना था, ब्लैक वाला लगवाना ही पड़ेगा. तेरे पास कौंटैक्ट नंबर है, तो देना जरा.

एक जमाने में जब कोई यह कहती, दीदी, अब इज्जत आप के हाथ में है, बचा लो. सुनने वाली महिला बड़ी दीदी का रोल बखूबी निभा लेती, अरे घबराने की जरूरत नहीं, सिलेंडर की ही क्या बात और कुछ चाहिए तो ले जाओ. यही सीन अब बदले रूप में बहानेबाजी की शक्ल अख्तियार करने को है. क्या बताएं बहन, हम ने महीनेभर पहले लगाया है, आजकल में यह खत्म होने को है. सिलेंडर की कहो ही मत. वैसे, साफ मना करने में हमें बुरा तो लग रहा है पर क्या करें? अपने समय में कोई मदद को सामने न आएगा, तब हम कहां भटकेंगे. कहते हैं जब प्रकृति देती है, तो छप्पर फाड़ कर देती है. 60-70 के दशक में आकाश के बादल अतिप्रसन्न हुआ करते थे. छप्परफाड़ू थे वे. पानी बरसता तो छप्पर में छेद करता नीचे रसोई में आता. गृहिणियों को आग लगाने का समय ही न मिलता, वे आग जलाने में ही इतना व्यस्त रहतीं कि बेकार के दूसरे काम देख न पातीं.

रेल की पटरी के किनारे घर होते, ढेर सा कोयला ट्रैक पर पड़ा मिल जाता, जिसे जितना उठाना हो उठा ले जाए. तब भी ईमानदारी से लोग सिर्फ सुबह या शाम के लायक उठा लाते. घर में जमा रखने का झंझट कौन पाले? जंगल में लकडि़यां बेहिसाब काटो, गठरियां ले जाओ, पूछने वाला कोई महकमा न था. बिजली की चोरी से हीटर में खाना बना लो, किसी सब्सिडी का सवाल न था. उन दिनों के खाने से सोंधी सी महक, आज की बेस्वाद सब्सिडी वाले खाने से कहीं ज्यादा उड़ा करती थी.

ब्राजील की रंगीनियां

ब्राजील के नगर साओ पाओलो का नाम लेते ही महानगरों की एक मिलीजुली तसवीर आंखों के सामने उभर आती है. अमेरिका के महानगरों की तरह वहां भी आधुनिकता के प्रभावस्वरूप गगनचुंबी अट्टालिकाओं का जंगल तो जरूर उभर आया है, लेकिन इस जंगल के पीछे छिपे सहृदय, भावुक, अलमस्त तथा सदैव आप की सहायता के लिए तत्पर ऐसे लोग भी हैं जो अमेरिकी नगरों में कम ही देखने को मिलते हैं. अगर कहीं आप भाषा की दीवार लांघ कर उन के करीब पहुंचने में सफल हो गए तो फिर तो ये अपना सारा कामधाम छोड़ कर आप की हरेक प्रकार की सहायता करने के लिए तत्पर हो जाएंगे. इस बात का अनुभव हमें साओ पाओलो पहुंचने के अगले दिन ही हो गया था.

एक अच्छी बात यह हुई कि पहले दिन ही हमारी मुलाकात एक भारतीय से हो गई, जो थोड़ीबहुत पुर्तगाली जानता था. उस के आग्रह पर हम अगले दिन उस के साथ ही शहर का जायजा लेने निकले. पहली नजर में हमें 2 करोड़ जनसंख्या वाला यह महानगर, जो न सिर्फ ब्राजील का बल्कि पूरे दक्षिण अमेरिका का सब से बड़ा शहर है, बहुत भीड़भड़क्के वाला तथा कुछकुछ अस्तव्यस्त सा लगा. लेकिन फिर एक सप्ताह तक शहर के विभिन्न स्थानों पर अपने भ्रमण के दौरान हम ने महसूस किया कि बड़ेबड़े बिल्डरों ने अपनी गगनचुंबी अट्टालिकाओं से जहां दूरदूर तक नगर को विस्तार दे दिया है, वहीं दूसरी ओर इस महानगर के कुछ नई पीढ़ी के उद्यमियों ने पुराने ऐसे इलाकों को भी नया आकार देना शुरू कर दिया है, जहां कभी संभ्रांत लोगों का जाना भी वर्जित था. रुआ औगस्ता, जो कभी शहर का मशहूर रैडलाइट एरिया हुआ करता था, ऐसे ही स्थानों में से एक है. आज यहां बड़ेबड़े मौल, आकर्षक शोरूम तथा बुटीक तो उभर ही आए हैं, साथ ही यहां शहर के कुछ प्रसिद्ध रेस्तरां, क्लब तथा बार भी बन गए हैं, जहां हर रात पर्यटकों तथा स्थानीय लोगों के दिल धड़कते हैं.

आप को साओ पाओलो का वाकई दर्शन करना हो तो रुआ औगस्ता जाना पड़ेगा. इस का एक सिरा एवेनीदा यूरोपा कहलाता है, जहां कारों के बड़ेबड़े शोरूम हैं. यहां आप को फरारी तथा मर्सिडीज जैसी महंगी से महंगी कारें बिकती नजर आएंगी. वहीं उस से थोड़ा आगे आप को बड़ेबड़े बुटीक भी दिखाई देंगे, जिन में आधुनिकतम फैशन से सजीधजी सुंदरियां अपनी मनपसंद पोशाक खरीदती नजर आएंगी. जाहिर है कि ये दुकानें भी ऊंची हैं और इन की चीजें भी दुकान जितनी ही ऊंची कीमतों की हैं, दुनिया के हर बड़े से बड़े ब्रैंड की पोशाकें. इन बुटीक से आगे आप को कलात्मक फिल्मों का प्रदर्शन करने वाला एक सिनेमाघर, एक चर्च तथा कुछ छोटीछोटी दुकानें दिखाई देंगी. दूसरे सिरे पर रुआ औगस्ता एवेनीदा पौलिस्ता से मिलता है, जहां पहुंच कर इस सड़क की पहचान एकदम से बदल जाती है. यहां आप को लोग पुर्तगाली के अलावा चीनी, अरबी तथा स्पेनिश जैसी अनेक भाषाओं में बात करते हुए दिखाई देंगे.

उल्लेखनीय है कि जापान, चीन, अफ्रीका, बोलीविया, कोलंबिया, स्पेन, पुर्तगाल आदि दुनिया के अनेक देशों से लोग काम की तलाश में यहां आते रहे हैं और कालांतर में वे यहीं के हो कर रह गए हैं. इन विभिन्न देशों के मिलेजुले रंगों से ब्राजील का एक अपना ही अनोखा रंग उभरा है, जो दुनिया के सभी देशों से एकदम अलग है और जिस ने ब्राजील को अपनी एक विशिष्ट पहचान दे दी है. हां, तो हम रुआ औगस्ता के दूसरे सिरे की बात कर रहे थे जिस पर आगे बढ़ने पर आप लोअर औगस्ता क्षेत्र में पहुंच जाएंगे. यहां अभी भी कुछ पुराने वेश्यालय मौजूद हैं जो कभी इस पूरे क्षेत्र की पहचान हुआ करते थे.

इस पूरे क्षेत्र का भरपूर आनंद लूटना हो तो आप किसी दिन रात को यहां आइए. यहां के नाइट क्लब तथा बार (मदिरालय) आप को न सिर्फ सांभा नृत्यों तथा जैज म्यूजिक में डूबे मिलेंगे बल्कि दुनियाभर के संगीत तथा नृत्य शैलियों का आनंद भी आप यहां लूट सकेंगे. स्टूडियो एसपी यहां का ऐसा ही क्लब है, जहां ब्राजील की बारबरा यूजीनिया जैसे सुप्रसिद्ध संगीतकार अपनी अनोखी संगीतकला का प्रदर्शन करते रहते हैं. बारबरा पहले रिओ द जैनेरो में रहती थीं और जब एक बार इस क्लब ने उन्हें साओ पाओलो में अपने संगीत का प्रदर्शन करने के लिए बुलाया तो वे हमेशा के लिए यहीं की हो गईं. रिओ की खास बात यह है कि यहां आप को ज्यादातर जैज म्यूजिक ही सुनने को मिलेगा, इस के विपरीत इस महानगर के संगीतकार अपने शो में संगीत की विभिन्न शैलियों का प्रयोग करते रहते हैं.

इस पूरे क्षेत्र की एक खास विशेषता यह भी है कि शनिवार तथा रविवार को यहां नौजवान लड़केलड़कियां अपनीअपनी मोटरसाइकिल पर अंधेरा होते ही आने लगते हैं और फिर वे गली के नुक्कड़, क्लबों के डांसफ्लोर पर या फिर मदिरालयों में अपने लिए मित्र ढूंढ़ने लगते हैं. इस काम में उन्हें ज्यादा देर नहीं लगती क्योंकि ऐसा नहीं है कि केवल लड़के ही पहल करते हैं, बल्कि अगर किसी लड़की को कोई लड़का अच्छा लगता है तो वह भी पहल कर सकती है. इस मामले में लड़के तथा लड़कियां, दोनों ही हर प्रकार की वर्जनाओं से मुक्त होते हैं. कई बार यह दोस्ती केवल उस एक रात को ही समाप्त हो जाती है और कई बार वह कई सप्ताह, कई साल या फिर पूरी जिंदगी भी चल सकती है.

रुआ औगस्ता के जैसा ही एक अन्य बोहेमियन स्थान है विला मैडेलीना, जहां अनेक बार, रेस्तरां तथा कला दीर्घाएं हैं और जहां आप मौजमस्ती की एक शाम गुजार सकते हैं. इस के एकदम विपरीत है शहर के अमीरजादों की बस्ती में स्थित मौल सिदादे जार्डिम, जिस के मुख्यगेट को पदचारियों के लिए बंद रखा जाता है और जिस के भीतर केवल वे अमीरजादे ही प्रवेश कर सकते हैं जो अपनी करोड़ों की कीमत वाली लंबीलंबी कारों में आते हैं. ये लोग यहां दुनिया की बड़े से बड़े ब्रैंड की महंगी से महंगी नायाब चीजें खरीदने आते हैं. जाहिर है कि हम और आप जैसे पर्यटकों को केवल बाहर से ही इस मौल पर नजर डाल कर संतोष करना पड़़ता है. केवल 2-3 साल पहले तक साओ पाओलो में अपराधों तथा अपराधियों की संख्या इतनी बढ़ गई थी कि लोगों को अंधेरे के बाद घर से निकलने के लिए कई बार सोचना पड़ता था. लेकिन पुलिस तथा सरकार के कड़े कदमों के कारण अब आप आधी रात को बिना किसी भय अथवा खतरे के इस महानगर की अधिकांश सड़कों पर घूम सकते हैं.

इन भीड़भाड़ वाले इलाकों से अगर आप का मन भर गया हो तो आप किसी दिन ईस्टाकाओ द लुज नामक एक पुराने गुफानुमा रेलवे स्टेशन को देखने जा सकते हैं, जिस का निर्माण 20वीं शताब्दी के शुरुआती दिनों में कुछ अंगरेज निवेशकों ने किया था. अब इस स्थान को पुर्तगाली भाषा का संग्रहालय बना दिया गया है. इस संग्रहालय में ब्राजील में पुर्तगालियों के आने तथा उन की भाषा के विकास की पूरी कहानी देखने को मिल जाएगी. आज पुर्तगाली ही इस देश की आधिकारिक भाषा है. इस के निकट ही इस शहर का मशहूर पब्लिक आर्ट म्यूजियम है, जिस का जीर्णोद्धार 1990 में ब्राजील के मशहूर आर्किटैक्ट पाओलो मेंडेस द रोशा ने किया था. कांच तथा कंक्रीट की यह आधुनिकतम इमारत बरबस ही आप का ध्यान अपनी ओर खींच लेगी.

ब्राजील तथा लेटिन अमेरिका के अन्य देशों की कला तथा संस्कृति की एक झलक देखने के लिए आप कुछ समय इस संग्रहालय में बिता सकते हैं. यहां आप को इस क्षेत्र के चित्रकारों के साथसाथ पिछले 500 साल पुराने दुनिया के कुछ महानतम कलाकारों की कृतियां देखने को मिल जाएंगी. ब्राजील पहुंच कर आप को पेले की याद न आए, ऐसा तो मुमकिन ही नहीं है. यह एक हकीकत है कि पेले तथा फुटबाल के खेल के कारण ही आज ब्राजील को दुनियाभर के लोग जानने लगे हैं और शायद इसीलिए ब्राजील ने इस महानगर में एक फुटबाल म्यूजियम ही बना दिया है. 3-4 साल पुराने इस संग्रहालय में आप को ब्राजील के पेले जैसे फुटबाल से जुड़े खिलाडि़यों के अलावा इस खेल में देश की विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय जीतों से जुड़े स्मृति चिह्न संजो कर रखे गए हैं.

एक शनिवार को हम साओ पाओलो का सुप्रसिद्ध खुले मैदान में लगा एक साप्ताहिक बाजार प्राका बेनीसितो कैलिक्तो देखने भी गए, जो एवेन्यू हेनरिक शौमैन के पास ही स्थित है. यह बाजार हर शनिवार को सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहता है और यहां के 3 दर्जन स्टौल पर सस्ते कपड़े, बरतन तथा खानेपीने की चीजों के अलावा ऐसे पुराने सोवेनियर भी मिल जाएंगे, जो उस पुरातन ब्राजील की याद दिलाते हैं, जहां कभी गन्ने तथा कौफी की खेती बहुतायत से होती थी. आज भी ब्राजील में एक बड़े पैमाने पर इन दोनों चीजों की खेती होती है और कुछ भारतीय कंपनियों ने यहां अपनी शुगर मिलें भी लगा रखी हैं.

इस महानगर में दुनिया के कुछ मशहूर रेस्तरां मिल जाएंगे, जो अपने भोजन तथा सर्विस, दोनों के लिए मशहूर हैं और जिन में लगभग हरेक देश के व्यंजन उपलब्ध हैं. अगर आप की दिलचस्पी आर्किटैक्चर में है तो आप एवेनीदा पौलिस्ता जा सकते हैं, जहां ऊंचीऊंची इमारतों में लगभग सभी बड़ी अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तर मौजूद हैं. इस इलाके का उल्लेख हम पहले भी कर चुके हैं. यह ब्राजील का प्रमुख बिजनैस सैंटर है. यह शहर पुराने गिरजाघरों के लिए भी मशहूर है. अगर आप की दिलचस्पी कोई पुराना गिरजाघर देखने में हो तो आप यहां का भव्य मैट्रोपोलिटन कैथेड्रल देखने भी जा सकते हैं. साओ पाओलो से हमें न्यूयौर्क जाना था. हमारे भारतीय मित्र ने हमें सलाह दी कि हम सीधे न्यूयौर्क जाने के बजाय एक दिन के लिए ब्राजील के सब से मशहूर पर्यटन स्थल रिओ द जैनेरो रुकते हुए जाएं, जो साओ पाओलो से हवाई जहाज द्वारा कुल 1 घंटे की दूरी पर है.

जाहिर है कि अपने देश से इतनी दूर स्थित इन देशों की यात्रा का अवसर बहुत कम ही मिल पाता है, अत: वापसी में हम एक दिन के लिए रिओ में भी रुक गए. साओ पाओलो के मुकाबले रिओ एक छोटा शहर है और अपने समुद्र तटों तथा चारों ओर से इस नगर को घेरे मनमोहक पहाडि़यों के लिए जाना जाता है. दिन में इस के पर्यटकों से घिरे कुछ विश्वस्तरीय बीचों का लुत्फ उठाने के बाद हम केबल कार में बैठ कर छोटीछोटी पहाडि़यों पर बिखरी प्राकृतिक छटा का आनंद लेने चले गए. हमारे पास केवल एक ही दिन था, जिस का हम अधिकतम उपयोग करने के लिए उत्सुक थे. इस के बाद हम कारकोवाडो पर्वत पर दुनियाभर में मशहूर क्राइस्ट-द रिडीमर की प्रतिमा देखने गए. क्राइस्ट के अलावा यहां पर अमेरिका की स्टैच्यू औफ लिबर्टी, पेरिस का ऐफिल टावर तथा वाशिंगटन के व्हाइट हाउस के अलावा आप को ‘आर्ट डको स्टैच्यू’ भी देखने को मिलेगी, जिस का निर्माण 1931 में पूरा हुआ था.

यहां का रिओ सिनैरियम क्लब दुनिया के 10 सर्वश्रेष्ठ क्लबों में से एक है. यहां बैठ कर हम बैंड पर बजती धुनों का आनंद लेते रहे. यहां सुस्ता कर हमारी सारी थकान उतर गई थी और हम अपनी अगले दिन की न्यूयौर्क की लंबी उड़ान के लिए अपनेआप को तरोताजा महसूस कर रहे थे.

भारत भूमि युगे युगे

नोबेल में तिनका

हमारे देश में समाजसेवियों की छवि एक ऐसे आदमी की है जिस के कंधे पर टैगोर छाप झोला हो, बड़ी खिचड़ी दाढ़ी हो और जो खादी का मैला कुरतापजामा पहनता हो. नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने इस छवि को तोड़ते हुए साबित किया कि समाजसेवा एक पूर्णकालिक व्यवसाय है जिस में तमाम तरह के त्याग करने में समाजसेवी हिचकता नहीं, वह भी सूटबूट और चमकदमक का हकदार होता है. इसे समाजसेवा में भी पसरी गिरोहबाजी कह लें या षड्यंत्र, कैलाश का चैरिटेबल ट्रस्ट मुक्ति प्रतिष्ठान शक के दायरे में है, 1997 से एक मुकदमा अदालत में चल रहा है जिस में नोबेल विजेता पर आरोप है कि उन्होंने व्यक्तिगत सुविधाओं व जरूरतों के लिए ट्रस्ट के पैसों का हेरफेर किया जिस के रिकौर्ड गायब हैं. आरोप गंभीर है और इस पर आज नहीं तो कल कैलाश सत्यार्थी को सफाई देनी ही पड़ेगी, वरना खामोशी हमेशा से ही स्वीकारोक्ति समझी जाती रही है.

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राजनीति का खेल

आर्य लड़ने की अपेक्षा लड़ाने में बड़े पारंगत थे. बालिसुग्रीव, रावणविभीषण, युद्ध कौशल और युद्ध कला के उदाहरण हैं, जिन्हें अपनों से दगाबाजी करने के एवज में रामचंद्र ने राजपाट दिया. यही बिहार में हुआ, चूंकि यह लोकतंत्र है इसलिए यहां यह खेल लोकतांत्रिक तरीके से हुआ. फर्क बस इतना था कि भाजपा ने जीतनराम मांझी का साथ देने से इनकार कर दिया क्योंकि उस के पास पहले से ही रामविलास पासवान जैसे राजा मौजूद हैं. नीतीश के दोबारा सीएम बनने से पासवान कुछ तो दुखी और शर्मिंदा हुए होंगे जिसे आधुनिक सामाजिक भाषा में ‘गिल्ट’ कहा जाता है. राजनीति में जाति का तड़का न हो तो वह मूंग की दाल जैसी बेस्वाद लगती है जिसे मजबूरी में पासवान ने निगला.

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मुफ्त की सलाह

मुफ्त सलाह देने के मामले में छोटेबड़े सब एक समान हैं. खांसी तक में निशुल्क परामर्श मिल जाते हैं. जो लोग घरेलू नुस्खों के जानकार नहीं होते वे झट से कहते हैं, फलां डाक्टर से मिल लो, बड़ा काबिल है, एकाध दो खुराक में ठीक कर देगा. कुछ दिन पहले मुझे भी ऐसा ही मुफ्त का परामर्श मिला था. दूसरे की परेशानी और बीमारी का मजा उठाने हेतु सलाह दे कर अपनापन हथियाने का मजा ही अलग है. दिल्ली पुलिस कमिश्नर बी एस बस्सी के ‘ऐट होम’ रिसैप्शन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से ज्यादा उन की अनवरत खांसी में रुचि लेते उन्हें बेंगलुरु के क्रौनिक खांसी विशेषज्ञ डा. नागेंद्र के यहां जाने की सलाह दे डाली तो लगा कि मफलर के बाद अब केजरीवाल की खांसी भी ब्रैंड बनती जा रही है.

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उड़ती रंगत

बहुचर्चित व्यापमं महाघोटाले को ले कर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के चेहरे की रंगत उड़ी हुई है. फर्जी तरीके से मैडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश और घूस ले कर सरकारी नौकरियां दिलाने का विवाद खत्म होता नहीं दिखाई दे रहा है. कांगे्रस महासचिव दिग्विजय सिंह ने शिवराज सिंह को इस बार तकनीकी तरीके से घेरते हुए आरोप लगाया है कि जांच एजेसियों ने कागजों में लालपीला किया है. जहांजहां सीएम का नाम लिखा था, उसे काट कर उमा भारती का नाम लिख दिया गया है. साफ है इस घोटाले का समापन जब भी होगा धमाकेदार होगा लेकिन शिवराज सिंह चौहान की नई दिक्कत यह है कि इसी घोटाले के चलते रामनरेश यादव को राज्यपाल पद छोड़ना पड़ा है और विपक्ष उन से पद छोड़ने की जिद पर अड़ा हुआ है. इस बीच, उन के मंत्रिमंडल में शामिल एक वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय उन्हें सांकेतिक तौर पर कमजोर जाहिर करते हुए उन पर भरोसा जता रहे हैं.

बिंब प्रतिबिंब

शिल्पा के खिलाफ एफआईआर

फिल्म अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी का फिल्म कैरियर तो खासा नहीं रहा लेकिन बिजनैसमैन राज कुंद्रा से शादी रचाना जरूर उस के लिए फायदेमंद रहा. राज के साथ शिल्पा आज कई कंपनियों की मालकिन हैं. जहां व्यापार आता है वहां लेनदेन को ले कर धोखाधड़ी के मामले भी दिखने लगते हैं. कोलकाता की एक कंपनी ने उन के खिलाफ धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है. शिकायतकर्ता के मुताबिक, शिल्पा समेत कई लोगों ने निवेश की गई रकम को 2 साल में 10 गुना करने का फर्जी वादा किया था. चिटफंड जैसा दिखता यह बिजनेस सिर्फ शिल्पा ही नहीं, देशभर में कई लोग चला रहे हैं. दिक्कत तो यह है लोग लालच में आ ही जाते हैं. वे सबक लेने को राजी ही नहीं.

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परदे पर सुचित्रा

बायोपिक फिल्मों की परंपरा को बढ़ाते हुए बंगाल की सदाबहार अभिनेत्री सुचित्रा सेन के जीवन पर आधारित फिल्म बनाई जा रही है. हिंदी व बंगला क्लासिक फिल्मों में नजर आईं सुचित्रा सालों से बेहद निजी जीवन जी रही थीं. इतना निजी कि एक बड़े सरकारी पुरस्कार को ग्रहण करने से उन्होंने सिर्फ इसलिए मना कर दिया था कि उन्हें सार्वजनिक तौर पर स्टेज पर आना पड़ता. फिलहाल तो वे इस दुनिया में नहीं हैं. उन पर बनने वाली फिल्म में विद्या बालन मुख्य भूमिका में नजर आएंगी. हालांकि विद्या के पास बेनजीर भुट्टो को परदे पर निभाने का औफर आया था पर उन्होंने सुचित्रा सेन के किरदार को रजामंदी दी. बायोपिक बनाने से प्रचार संबंधी फायदा तो मिलेगा, साथ में यह चुनौती भी रहेगी कि उन के अज्ञातवास वाली जिंदगी के पन्ने कैसे खोले जाएं.

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घरेलू हिंसा की शिकार रति

घरेलू हिंसा की चपेट में सिर्फ मध्यवर्ग की स्त्रियां और पिछड़े समाज की गैरशिक्षित महिलाएं ही नहीं हैं बल्कि सालों से फिल्मी दुनिया में खासा मुकाम हासिल कर चुकी कथित स्वतंत्र अभिनेत्रियां भी हैं. एक जमाने की कामयाब अभिनेत्री रति अग्निहोत्री को ही ले लीजिए, पिछले दिनों उन्होंने अपने पति के खिलाफ पुलिस स्टेशन में एक मामला दर्ज कराया. उन के मुताबिक पति अनिल वीरवानी उन्हें पीटते और धमकाते हैं. पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया. उन्होंने कथित पिटाई के कारण हाथों पर बने निशान भी दिखाए. बहरहाल, अनिल और रति के बीच इस तरह के झगड़े की बात यही जाहिर करती है कि महिला कितनी भी कामयाब या पढ़लिख जाए लेकिन आमतौर पर पतियों का नजरिया एक ही होता है.

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क्षेत्रीय सिनेमा के सहारे

इन दिनों क्षेत्रीय फिल्मों का बाजार हिंदी व अंग्रेजी फिल्मों को जोरदार टक्कर दे रहा है. बात चाहे राष्ट्रीय पुरस्कारों की हो या कमाई की. इधर कुछ सालों से पंजाबी, मराठी, भोजपुरी और बंगला भाषा की फिल्मों ने दक्षिण भारतीय फिल्मों जैसा बाजार कायम कर लिया है. लिहाजा, बौलीवुड के कई नामी कलाकार, जो बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं, रीजनल फिल्मों का रुख कर रहे हैं. सलमान खान के साथ ग्रैंड डैब्यू करने वाली अभिनेत्री जरीन खान भी कुछ ऐसा ही कर रही हैं. खबर है कि बिंदु दारा सिंह के कहने पर उन्होंने ‘इश्क माय रिलीजन’ साइन कर ली है. यह फिल्म पंजाबी भाषा में बन रही है. क्षेत्रीय फिल्मों को कम सफल या कहें बेरोजगार अदाकारों के लिए बड़ा विकल्प बनते देखना सुखद है.

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होशियारी हौलीवुड की

भारत में फिल्मों की दुनियाभर की बढ़ती कमाई ने हौलीवुड का ध्यान काफी समय से खींच रखा है. लिहाजा, कई हौलीवुड फिल्म स्टूडियो मुंबई में अपना डेरा डाल चुके हैं. इस के साथ वे अपनी अंगरेजी फिल्मों को भारत में प्रोमोट करने के लिए किसी भारतीय कलाकार से 50-60 सैकंड की भूमिका करवा कर एक तीर से दो शिकार कर रहे हैं. अनिल कपूर, इरफान व बिग बी जैसे कलाकारों को ले कर देसी दर्शक जुटाने में मसरूफ हौलीवुड अब ‘फास्ट ऐंड फ्यूरियस’ की 7वीं कड़ी में अभिनेता अली फजल के रोल की बात कर प्रचार कर रहा है जबकि प्रोमो में अली की झलक भी नहीं है. भारतीय कलाकारों को इस तरह के मार्केटिंग हथकंडों का शिकार बनने से बचना चाहिए.

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