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जो बोलेगा मारा जाएगा : निशाने पर समाजसेवी

महाराष्ट्र की प्रगतिशील राज्य की छवि को बारबार कुचलने की कोशिश जारी है. कामरेड गोविंद पानसरे पर हुआ जानलेवा हमला और उस से उन की हुई मौत से फिर एक बार सामाजिक कार्यकर्ताओं पर होने वाले हमलों का विषय गंभीर हुआ है. महाराष्ट्र को और कितनी मौत चाहिए, यह सवाल आम जनमानस से ले कर सोशल मीडिया तक में चर्चा का विषय बना हुआ है. ‘जो बोलेगा मारा जाएगा’ ऐसा ही कुछ महाराष्ट्र में हो रहा है. महाराष्ट्र के नेता कामरेड गोविंद पानसरे और उन की पत्नी पर कोल्हापुर में दिनदहाड़े हमला हुआ. इलाज में सफलता मिलते न देख कर उन्हें मुंबई स्थित बीच कैंडी अस्पताल में दाखिल कराया गया, जहां उन की मौत हो गई. पानसरे की मौत के बाद भी कोई हमलावर पुलिस की गिरफ्त में नहीं आया है. इस के पहले डा. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या में शामिल किसी भी हत्यारे को पकड़ने में सरकार को सफलता नहीं मिली है.

महाराष्ट्र में आरटीआई कानून लागू होने के बाद से ले कर आज तक कई कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले हुए हैं. इन में डा. नरेंद्र दाभोलकर और गोविंद पानसरे के नाम भी जुड़ गए हैं. भले ही ये दोनों किसी की सूचना नहीं इकट्ठा करते थे लेकिन गलत कुरीतियों के खिलाफ जम कर अपनी बात रख कर उस के कार्यान्वयन से पीछे नहीं हटते थे. दाभोलकर और पानसरे की हत्या से पहले पुणे के सतीश शेट्टी की हत्या हुई थी. पिछले 11 सालों में कितने लोगों ने आरटीआई ऐक्ट का इस्तेमाल और सामाजिक मामलों को उठाने के कारण अपनी जान गंवाई और कितने लोगों पर जानलेवा हमले हुए, इस का जवाब न केंद्र के पास है, न राज्य सरकार के पास. सामाजिक आंदोलन की अगुआई करने वालों पर हमला होना नई बात नहीं है.

13 जनवरी, 2010 को सतीश शेट्टी (38) की तलेगांव दाभाड़े में हत्या की गई. अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान से जुड़े सतीश ने वहां के जमीन घोटाले की जानकारी निकाली थी. मौर्निंग वाक के दौरान उन की हत्या हुई, जिस का सुराग आज तक नहीं लग पाया है. सीबीआई ने अप्रैल 2014 में क्लोजर रिपोर्ट सौंप कर मामला बंद किया था जबकि उन के हत्यारों तक सीबीआई पहुंची थी पर राजनीतिक दबाव के कारण मामला आगे बढ़ नहीं पाया. फिर एक बार सीबीआई ने सतीश शेट्टी की फाइल खोल दी है. 20 अप्रैल, 2010 को विट्ठल गीते की मौत हुई, उस पर बीड के वाघबेट गांव में जानलेवा हमला हुआ. उन्होंने साईनाथ विद्यालय में चल रही अनियमितता का भंडाफोड़ किया था. 22 दिसंबर, 2010 को ही कोल्हापुर में दत्तात्रय पाटील की हत्या हुई थी. पाटील ने नगरसेवकों की हौर्सट्रेडिंग बाबत जनहित याचिका दायर की थी तथा पावरलूम कारखानों की पोल खोली थी.

महाराष्ट्र में सामाजिक कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले की घटनाएं चर्चित रही हैं. प्रसिद्ध अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता श्रीराम लागू पर वर्ष 1991 में सांगली में एक गुट ने लाठियां बरसाई थीं. उसी वर्ष डा. नरेंद्र दाभोलकर पर हथियारों से लैस एक गुट ने हमला किया था लेकिन दाभोलकर ने पुलिस में शिकायत करने से इनकार कर दिया था. 16 मार्च, 2010 को रेत माफिया ने सामाजिक कार्यकर्ता सुमेरिया अब्दुल अली, नसीर जलाल और एक पत्रकार पर महाड में जानलेवा हमला किया था. महाड पुलिस ने एक विधायक के पुत्र पर मामला भी दर्ज किया. चर्चगेट स्थित ओवल बिल्डिंग में नयना कथपलिया पर 8 जनवरी, 2010 को फायरिंग हुई थी. वे एसआरए योजना, हौकर्स और अतिक्रमित जमीन कब्जेदारों के खिलाफ आंदोलन करती थीं.

कहां हैं हत्यारे

एक बार हमले से बचे डा. नरेंद्र दाभोलकर, जो अंधश्रद्धा निर्मूलन के लिए संघर्षरत थे, की 20 अगस्त, 2013 को पुणे में हत्या की गई. मौर्निंग वाक के दौरान अज्ञात हमलावरों ने उन्हें गोलियों से भून डाला था. आज तक उन के हत्यारे पुलिस गिरफ्त से बाहर हैं. महाराष्ट्र के कोल्हापुर में टोल के खिलाफ आंदोलन करने वाले कामरेड गोविंद पानसरे को भी गोलियों से 16 फरवरी को टारगेट किया गया. 5 दिन मौत से संघर्षरत पानसरे ने मुंबई स्थित बीच कैंडी अस्पताल में 20 फरवरी को दम तोड़ा.

कौमनवैल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव (सीएचआरआई) द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज के अनुसार, केंद्र सरकार के पास सामाजिक और आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमले की आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है. कार्मिक, लोकशिकायत एवं पैंशन मंत्रालय ने हाल के वर्षों में मामले से यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि केंद्र सरकार ऐसे मामलों के आंकड़े एकत्र नहीं करती. उस का तर्क है कि सामाजिक और आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हुआ हमला कानूनव्यवस्था की बहाली का मामला है जो राज्यों के अधीन है.

बीते 11 वर्षों के रुझान इस बात का संकेत करते हैं कि उपेक्षा, अन्याय और भ्रष्टाचार का शिकार हुआ तबका सामाजिक कार्यकर्ताओं की हिम्मत को पस्त करने के लिए उन के ऊपर बड़ी तादाद में हमले कर रहा है. मिसाल के लिए, बीते 11 वर्षों में महाराष्ट्र में सामाजिक और आरटीआई कार्यकर्ताओं पर 55 बार हमले हुए हैं और इन में 10 मामलों में कार्यकर्ताओं की हत्या हुई है. अगर सही बात कही जाए तो जल, जंगल और जमीन के अलावा सामाजिक कुरीतियों तथा भ्रष्टाचार को उजागर करने का मामला हो तो सामाजिक और आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या या उन के उत्पीड़न की आशंका सब से ज्यादा है.

महाराष्ट्र में सामाजिक और आरटीआई कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले होने की घटनाओं की बढ़ती तादाद के बावजूद सरकार की तरफ से कोई व्यवस्था नहीं की गई है कि कार्यकर्ता बेखौफ हो कर काम कर सकें. जब तक शासन और प्रशासन इन की सामाजिकता और संघर्ष को तवज्जुह नहीं देता है तब तक ऐसे कितने ही शेट्टी, दाभोलकर और पानसरे बेमौत मारे जाते रहेंगे. इस का जवाब शायद किसी के पास नहीं है.

बिहार बोर्ड परीक्षा : नकल के भरोसे नई नस्ल

कोई पानी का पाइप पकड़ कर जेम्स बौंड की तरह ऊपर चढ़ रहा है, कोई स्कूल के छज्जे पर स्पाइडरमैन की तरह चढ़ गया है, कोई जुगाड़ लगा कर खिड़की से लटक कर खुद को सुपरमैन समझ रहा है, कोई छलांगें मार कर फिल्मी हीरो की तरह छत पर जा पहुंचा है. इन सारी मशक्कतों ने बिहार को देशभर में मजाक बना कर रख दिया है. अपनेअपने बच्चों को इम्तिहान में पास कराने के लिए ये जनाब चिट और पुर्जे उन तक पहुंचा रहे थे, ताकि उन का भाई, बेटा, भतीजा, बेटी, बहन आदि बगैर पढ़ेलिखे ही नकल कर मैट्रिक का इम्तिहान पास कर सकें.

अपनों को नकल करा कर इम्तिहान पास कराने की जुगाड़बाजी ने बिहार के सुशासन का दावा करने वाली सरकार की छीछालेदर कर दी है. उस के ऊपर से सरकार के तालीम मंत्री ने यह कह कर करेला चढ़ा नीम पर वाली स्थिति पैदा कर दी कि इस कदाचार को रोकना सरकार के बूते की बात नहीं है. राज्य की शिक्षा व्यवस्था पर पहले भी कई सवालिया निशान लगते रहे हैं, पर नकल के ताजा फोटोग्राफोें से यह सवाल एक बार फिर उठ खड़ा हुआ है.

बिहार में मैट्रिक की परीक्षा में चोरी का खुला खेल सालाना जलसे की तरह हो गया है. हर साल परीक्षा शुरू होने के पहले बिहार विद्यालय परीक्षा समिति नकल पर रोक लगाने के बड़ेबड़े दावे करती है. सभी जिलों के डीएम और एसपी को नकल रोकने के लिए कड़े कदम उठाने के फरमान जारी किए जाते हैं. नतीजा वही है टांयटांय फिस्स. घरघर में बच्चों को नकल कराने की छिड़ी जंग की तैयारी के सामने सरकार के सारे दावे हवा हो जाते हैं. फिर कुछेक परीक्षा सैंटरों की परीक्षा को कैंसिल कर फिर से परीक्षा लेने की तारीख का ऐलान होता है और सरकार व प्रशासन एक बार फिर इतमीनान से चादर तान कर सो जाता है. उस के ऊपर से परीक्षा को ‘स्वेच्छा’ बनाने के चक्कर में अभिभावक यह भूल जाते हैं कि नकल को बढ़ावा दे कर वे अपने ही बच्चों का कैरियर बरबाद कर रहे हैं. बिहार के स्कूलों से पास ज्यादातर बच्चों को जब दूसरे राज्यों में कोई तवज्जुह नहीं मिलती है तो वे सिर पीटते हैं.

मजबूर सरकार

परीक्षा समिति के सचिव श्रीनिवास चंद्र तिवारी कहते हैं कि केवल प्रशासन के सहारे कदाचार को रोक पाना मुमकिन नहीं है. इस में बच्चों और उन के अभिभावकों का सहयोग बहुत जरूरी है. अगले साल से कदाचार को रोकने के लिए परीक्षा से पहले समिति के द्वारा कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा. इस के जरिए अभिभावकों और बच्चों को जागरूक किया जाएगा. अब देखना है कि ऐसी किसी कार्यशाला का आयोजन हो पाता है या नहीं? अगर होता है तो क्या कोई इस में भाग लेता है और क्या कोई असर होता है या अगले साल फिर मैट्रिक की परीक्षा में कदाचार का खुल कर खेल होगा और सरकार हर साल की तरह कदाचार को रोकने के नए प्लान का ऐलान कर खर्राटे भरने लगेगी?

परीक्षा में चोरी को रोक पाना सरकार के बूते के बाहर की बात है. शिक्षा मंत्री के इस जवाब पर पटना हाईकोर्ट ने शिक्षा मंत्री पी के शाही को लताड़ लगाते हुए कह डाला कि अगर मंत्री कदाचार रोकने में लाचार हैं तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए. अगर शिक्षा मंत्री ही यह कहे कि परीक्षा में नकल रोकना सरकार के बूते की बात नहीं है तो उन को अपने पद पर बने रहने का हक नहीं है. मुख्य न्यायाधीश एल नरसिम्हा रेड्डी ने कहा कि जिस राज्य ने पूरी दुनिया को ज्ञान की रोशनी बांटी, वहीं शिक्षा का बंटाधार हो रहा है.

पी के शाही का कहना है कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं कहा है. मैट्रिक की परीक्षा में नकल रोक पाना अकेले सरकार के बूते की बात नहीं है, इस के लिए अभिभावकों को भी साथ देना होगा. परीक्षा केंद्रों पर विद्यार्थियों की संख्या के तीनचारगुना गार्जियन भीड़ लगाए रहते हैं, ऐसे में उन्हें कंट्रोल करना मुश्किल हो जाता है.

सूबे में कुल 1,217 परीक्षा केंद्रों पर 14,26,209 विद्यार्थियों ने इस साल मैट्रिक की परीक्षा में भाग लिया. इन में 7,66,987 लड़के और 6,59,222 लड़कियां थीं. पिछले साल के मुकाबले डेढ़ लाख से ज्यादा विद्यार्थियों ने इस साल परीक्षा में हिस्सा लिया.

अभिभावकों की भूमिका

पटना हाईकोर्ट के वकील उपेंद्र प्रसाद कहते हैं कि शिक्षा के अधिकार अधिनियम-2009 के तहत पहली से 8वीं कक्षा तक के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा मुहैया कराना सरकार का दायित्व है. इन क्लासों में जब ज्यादातर बच्चे लिखित परीक्षा में फेल हो कर स्कूल छोड़ने लगे तो सरकार ने लिखित परीक्षा को बंद कर केवल मौखिक परीक्षा ले कर बच्चों को प्रमोट करने का फैसला किया. इस से बच्चे पढ़ाई से कतराने लगे. गार्जियन को भी यह मतलब नहीं होता है कि उन के बच्चे क्या पढ़ रहे हैं. वे बस बच्चों का रिपोर्ट कार्ड देख कर और फेल नहीं होने पर ही खुश होते रहे.

ऐसे बच्चों को जब मैट्रिक की परीक्षा में सवालों का लिखित जवाब देना पड़ता है तो उन के पसीने छूट जाते हैं. अभिभावक भी जानते हैं कि उन के बच्चे बगैर चिटपुर्जों के पास नहीं हो सकेंगे तो वे भी उन तक पुर्जा पहुंचाने के लिए जीजान लगा देते हैं. परीक्षाओं में नकल की बढ़ती आपाधापी की सब से बड़ी वजह यह है कि जब सरकारी स्कूलों और पढ़ाई की क्वालिटी ही दुरुस्त न हो तो विद्यार्थी क्या और कैसे पढ़े? बिहार के सरकारी स्कूलों में 2 लाख 15 हजार शिक्षकों की कमी है. 1 लाख 70 हजार प्राइमरी स्कूलों और 45 हजार मिडिल व हाई मिडिल स्कूलों में शिक्षक के पद खाली हैं. उन खाली पदों पर नियुक्ति के लिए केवल तारीख दर तारीख का ही ऐलान होता रहा है. शिक्षा का अधिकार कानून के तहत 35 विद्यार्थियों पर 1 अध्यापक होना आवश्यक है पर अभी 48 विद्यार्थियों पर 1 शिक्षक है. उस के बाद भी ज्यादातर शिक्षकों को ही ‘मिड डे मील’ योजना में लगा दिया गया है. ऐसे में काफी शिक्षक रसोइया बन कर रह गए हैं.

पटना के ही एक सरकारी स्कूल के शिक्षक कहते हैं कि सरकारी स्कूल में शिक्षा के स्तर को गाली देना एक फैशन सा बन गया है. राज्य में शिक्षकों को कभी जनगणना, कभी वोटर आईडी, कभी पल्स पोलियो मुहिम तो कभी बच्चों को दोपहर का खाना खिलाने के काम में लगा दिया जाता है. ऐसे में शिक्षक क्या और कब पढ़ाए? विद्यार्थी ऐसे में क्या खाक पढ़ेंगे? जब स्कूलों में पूरे सिलेबस की पढ़ाई ही नहीं हुई तो बच्चे क्या करेंगे? उन्हें और उन के गार्जियन किसी भी तरह से अपने बच्चों को पास कराने और बढि़या अंक दिलाने की जुगाड़ में लग जाते हैं, क्योंकि अंकों के आधार पर ही कालेजों में दाखिले मिलते हैं.

परीक्षा शुरू होने के पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था कि कदाचार को किसी भी हाल में बरदाश्त नहीं किया जाएगा. इस के बाद भी 17 मार्च से ले कर 24 मार्च तक चली मैट्रिक की परीक्षा में कदाचार के अजीबोगरीब नमूने देखने को मिले. वैशाली जिले के महनार प्रखंड के सरकारी स्कूल भवन की खिड़कियों, छज्जों और पाइपों के सहारे लटके नकल करवाने वालों की जांबाजी को समूची दुनिया ने देखा और मजाक उड़ाया, पर सूबे के मुख्यमंत्री, मंत्री से ले कर अधिकारी यही राग अलापते रहे कि कदाचार को बरदाश्त नहीं किया जाएगा. बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के आंकड़ों के मुताबिक, 8 दिनों तक चली परीक्षा में कुल 1,828 विद्यार्थियों को नकल करने के जुर्म में सजा दी गई. कदाचार फैलाने के आरोप में करीब 200 अभिभावकों से जुर्माना वसूला गया.

मैट्रिक की परीक्षा में नकल को ले कर देशभर में हुई बिहार की छीछालेदर के मसले पर सफाई देते हुए बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के अध्यक्ष लालकेश्वर सिंह कहते हैं कि सभी जिलों के डीएम और एसपी को कदाचार को रोकने और उसे बढ़ावा देने वालों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने का निर्देश दिया गया था. परीक्षा सैंटर की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करना प्रशासन की जिम्मेदारी है.

जिम्मेदार कौन?

पटना विश्वविद्यालय के प्रोफैसर पी के पोद्दार का मानना है कि आज के दौर में पढ़ाई के गिरते स्तर के लिए बच्चे, गार्जियन और सरकार सभी जिम्मेदार हैं. सरकारी नौकरियों में पंचायत, प्रखंड से ले कर जिला स्तर तक की बहाली के लिए मार्क्स को ही आधार बनाया जाता रहा है. आज से 10-15 साल पहले तक परीक्षाओं में चोरीछिपे ही नकल चलती थी, पर आज तो बच्चे डंके की चोट पर नकल कर रहे हैं. इस से ज्यादा गंभीर बात यह है कि बच्चों के अभिभावक भी अब उन का साथ देने लगे हैं. अब ऐसी परीक्षा का क्या फायदा? केवल डिगरी पाने के लिए परीक्षा हो रही है? नकल करने वाले बच्चे कल डाक्टर, इंजीनियर, वकील, अफसर और क्लर्क बनेंगे तो किस तरह से वे अपनी जवाबदेही को पूरा करेेंगे?

निरंकुश धर्म

धर्म का अर्थ अंधभक्ति. अंधभक्ति से अगर कू्ररता, आतंक, मारपीट, हिंसा, हत्या, आगजनी, औरतों का बलात्कार होता हो तो धर्म माफ करता है सिवा धर्म के सहीगलत उपदेशों के विरोध के. धर्म के नाम का महल केवल जोरजबरदस्ती पर टिका है जो बहुत चतुराई से लोगों के दिमाग की सफाई कर पैदा किया जाता है, भक्तों के पैदा होने से ले कर मरने तक की दिमाग सफाई. तभी अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में एक अर्धविक्षिप्त मगर शिक्षित औरत को सरेआम सड़कों पर पीटपीट कर भीड़ द्वारा मार डाला गया कि उस ने कुरान को जला डाला था. वैसे यह घटना अद्भुत नहीं क्योंकि हर धर्म यही करता है और अपने भक्तों में से बाहर जाने वाले या अपने आलोचकों को ज्यादा धमकाता है बजाय विधर्मियों के.

इस बार नया यह हुआ है कि तालिबानियों के साए में पलने वाले अफगानिस्तानी समाज ने इस औरत के पक्ष में आवाज उठाई है और उन लोगों को गिरफ्तार करने की मांग की जिन्होंने सरेआम पीटपीट कर पुलिस के सामने उस औरत को मारा. उस औरत के जनाजे में सैकड़ों औरतों ने सम्मिलित हो कर संदेश दिया है कि धर्म के खिलाफ भी आवाज उठाई जा सकती है. अफगानिस्तानी सरकार औरतों को मारने वालों पर कोई कार्यवाही करेगी, इस में संदेह है. जब भारत जैसे संविधान से चलने वाले, गैर धार्मिक देश में धर्म की पोल खोलने वालों को सरकारी संरक्षण नहीं, सरकारी आतंक का सामना करना पड़ता है तो अफगानिस्तान तो तालिबानियों का गढ़ है.

धर्मग्रंथ, देवीदेवता, धर्म के उसूलों पर सच बोलने वालों के लिए धर्मचालित शासक अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं ताकि इस बहाने शासकों के खिलाफ बोलने वालों को भी डरायाधमकाया जा सके. धर्म के प्रचारकों को संरक्षण देना सरकार, उद्योगपतियों, व्यापारियों, चालबाजों के लिए बहुत लाभदायक रहता है. उस अफगानी औरत की क्या मजाल कि वह धर्म की प्रतीक कुरान का अपमान करे जिस की करोड़ों प्रतियां छप चुकी हैं और करोड़ों ही धूप, पानी, दीमक, सील आदि से स्वत: नष्ट होती रहती हैं. प्रकृति के खिलाफ तो धर्म के ठेकेदार कुछ कर नहीं पाते, सो वे आम आदमी को अकसर लपेटे में ले लेते हैं.

पाक से गिड़गिड़ाहट कैसी

जम्मूकश्मीर के मुख्यमंत्री ने पुलिस और सेना पर आतंकवादियों के हमले को ले कर पाक से कहा है कि वह आतंकवाद रोके. नई सरकार की यह पेशकश समझ से परे है. जब देश की लाखों की पुलिस और फौज कश्मीर की रक्षा के लिए तैनात है फिर आतंकवादियों की हिम्मत कैसे हुई कि वे पाकिस्तान से भारत घुस आए और हमला कर डाला. और अगर हमला कर डाला तो फिर पाकिस्तान से गिड़गिड़ाने का क्या लाभ? अगर पाकिस्तान सरकार, सेना या वहां पनप रहे आतंकवादी प्रशिक्षण केंद्र जानबूझ कर कश्मीर में अलगाववाद की आग जलती रहने देना चाहते हैं तो क्या राजनाथ सिंह की आपत्ति और मुफ्ती मोहम्मद सईद की गिड़गिड़ाहट से वे चुप हो जाएंगे?

कश्मीर भारत के गले में फांस तो बना रहेगा, यह मान कर चलना पड़ेगा. जब तक देश का समाज धर्म के नाम पर बंटा रहेगा, कोई वजह नहीं कि मुसलिम बहुल कश्मीर के लोगों में कुछ ऐसे न हों जो आजाद कश्मीर या पाकिस्तान में मिलने के सपने न देखते हों. जब देश के बाकी हिस्सों में मंचों पर भगवाई लोग खुलेआम हिंदू भारत और संतों, शंकराचार्यों के निर्देशों पर चलने वाली सरकारों की बात करते हैं तो कश्मीर कैसे अछूता रह सकता है. वहां के धर्म के अनुसार, कट्टरपंथी अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए बेचैनी पैदा करेंगे और स्थानीय या बाहरी आतंकवादी इस का लाभ उठाएंगे ही.

हां, इतना आश्चर्य जरूर है कि आखिर ये कट्टरवादी आतंकी आत्मघात के लिए तैयार युवाओं को भारत में लगातार कैसे भेज पा रहे हैं और 2 दिनों में 2-2 के गुट में उन्होंने भारीभरकम फौजी कैंपों पर हमले ही नहीं किए, घंटों तक फौज को परेशान भी रखा.

यह है काला ताजमहल

विश्व आश्चर्य ताजमहल जिसे मुगल शहंशाह शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में श्वेत संगमरमर से आगरा में बनवाया था, वहीं, शाहजहां यमुना के उस पार मेहताब बाग में अपने लिए एक काला ताजमहल बनवाना चाहता था. शाहजहां का ख्वाब, आगरा में 14 फरवरी, 2015 को विश्व के सुप्रतिष्ठित रेत कलाकार ओडिशा के पद्मश्री सुदर्शन पटनायक ने पूरा कर के दिखा दिया. ताजमहल के पूर्वी गेट से मात्र 500 मीटर दूर विकसित ताज नेचर वाक के एक टीले पर सुदर्शन ने इस ख्वाब को मूर्त रूप दिया. ताज नेचर वाक खुद में एक खुशनुमा क्षेत्र है जहां 9 टीलों से ताज की खूबसूरती अलगअलग रंगों में नजर आती है. 1998 में विकसित यह हरित पट्टी क्षेत्र 46 किस्म के 69 रंगों के फूलों का धरती पर बिखरा एक ऐसा गुलदस्ता है जहां प्रकृति हर मौसम में गुलजार रहती है. ताज के सामने यमुना और ओडिशा के सागर तट की रेत से बनाया गया यह काला ताजमहल अपने शिल्प एवं बारीकियों की दृष्टि से किसी भी तरह शाहजहां के ताजमहल से उन्नीस नहीं लगता.240 फुट ऊंचे शाहजहां के ताज को बनवाने में जहां 2,200 कारीगरों ने 20 वर्षों का समय लिया था वहीं सुदर्शन का 15 फुट ऊंचा काला ताजमहल 22 कारीगरों की सहायता से मात्र 1 सप्ताह में ही तैयार हो गया.

पर्यटन के अनूठे ठौर

जिंदगी चलते रहने का नाम है, जो रुक गई वो जिंदगी कहां. इसी फलसफे पर चलती दुनिया सैरसपाटे को जिंदगी में हर्षाेल्लास और नवऊर्जा संचारित करने का जरिया मानती है. इन छुट्टियों में आप भी मजा लीजिए पर्यटन के नए व अनोखे ठौरठिकानों का, जिन में रोमांटिक डैस्टिनेशन, वाइल्ड लाइफ एडवैंचर, साउथ इंडियन हरियाली के साथ विदेश के रंगीन नजारे भी हैं.

फ़िल्मी जगत

टीवी वाला थप्पड़

चुइंगम की तरह खींचे जा रहे धारावाहिकों में सासबहू और साजिश के दौरान बनावटी थप्पड़ों की गूंज तो आप ने कई बार सुनी होगी लेकिन सीरियल के सैट पर कलाकार अपनी खुन्नस निकालने के लिए सहयोगी कलाकार को तमाचे रसीदने लगे तो थोड़ा अजीब सा लगता है. मामला भले ही अजीब लगे लेकिन टीवी धारावाहिक ‘दीया और बाती हम’ की अभिनेत्री दीपिका यानी संध्या ने अपने कोऐक्टर अनस यानी सूरज को पूरी यूनिट के सामने तमाचा जड़ दिया. चूंकि दोनों के बीच मनमुटाव चल रहा था. लिहाजा, इसे उसी का नतीजा माना जा रहा है जबकि संध्या के मुताबिक, सूरज ने उन्हें गलत तरीके से छुआ, सो उन्हें थप्पड़ मिला. बहरहाल, आपसी संबंधों की कड़वाहट को यों सरेआम इस तरह इजहार करना तर्कसंगत कतई नहीं कहा जा सकता.

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टूरिज्म का फिल्मी बाजार

आमिर खान का इंडियन टूरिज्म कैंपेन ‘अतिथि देवो भव:’ काफी चर्चित हुआ था. अमिताभ बच्चन तो बाकायदा गुजरात राज्य के पर्यटन ब्रैंड ऐंबैसेडर भी बने. अब अभिनेता सैफ अली खान भी टूरिज्म को बढ़ावा देते नजर आएंगे. यह बात अलग है कि छोटे नवाब भारतीय पर्यटन का प्रचार नहीं बल्कि इंगलैंड नैशनल टूरिज्म से जुड़े हैं और उन्हें इंगलैंड नैशनल टूरिज्म एजेंसी ने अपना ब्रैंड ऐंबैसेडर नियुक्त किया है. सैफ विजिट ब्रिटेन का प्रचार करेंगे और बौलीवुड ब्रिटेन कैंपेन चलाएंगे. एजेंसी को उम्मीद है इस से ज्यादा भारतीय पर्यटक इंगलैंड आएंगे वैसे, पर्यटकों का तो पता नहीं लेकिन इतना तो तय है कि फिल्म स्टार्स ऐसे कैंपेन की बदौलत फिल्मों से ज्यादा कमाई कर डालते हैं.

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गोरेपन का हौवा

टीवी पर आने वाले हर दूसरे, तीसरे विज्ञापन में महिलाओं को गोरा करने वाली फैयरनैस क्रीम का प्रचार किया जाना आम बात है. और तो और, अब मरदों वाली क्रीम के विज्ञापन में पुरुषों को भी गोरा बनाने के लुभावने औफर्स दिए जा रहे हैं.फिल्म क्वीन और 5 शौकीन्स से चर्चा में आईं अभिनेत्री लीना हेडन इस विचार के खिलाफ हैं. चूकि वे खुद सांवली हैं लिहाजा गोरेपन को ले कर महिलाओं के पूर्वाग्रह से वाकिफ हैं. लीजा के मुताबिक, महिलाओं को गोरे रंग का हौवा नहीं बनाना चाहिए. वे अपनी पढ़ाईलिखाई, कैरियर और अंदरूनी अच्छाइयों को निखारें तो गोरेपन की अनिवार्यता ही नहीं रहेगी. सुनने में ये बातें जरूर शिक्षाप्रद लग सकती हैं लेकिन सच यह भी है कि फिल्मों में ही सांवली रंगत की हीरोइनों को मुश्किलें पेश आती हैं, ऐसे में सामान्य जीवन में इस हौवे से बचना मुश्किल ही लगता है.

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बैन की सनक

निर्भया कांड पर बनी डौक्यूमैंट्री फिल्म को बैन करने के फैसले पर फजीहत झेल रही सरकार से लगता है सैंसर बोर्ड कोई खास सबक नहीं ले रहा. शायद इसीलिए ‘बदलापुर’, ‘एनएच 10’ और ‘दम लगा के हईशा’ के कई संवादों पर कैंची चलाने के बाद सैंसर बोर्ड ने अब एक हौलीवुड फिल्म गेट हार्ड को एडल्ट कंटेंट के चलते भारत में बैन करने की भूमिका बना दी है. हालांकि खबर यह भी है कि सैंसर बोर्ड से परेशान निर्माता ने खुद ही फिल्म को रिलीज न करने का फैसला किया. वहीं, बोर्ड फिल्म को इंटरनैट पर रिलीज करने से भला कैसे रोकेगा, कहीं इंडियाज डौटर जैसा मामला न हो जाए.

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गीता कपूर फंसी

हाल में शाहरुख खान के घर के बाहर बने अवैध चबूतरे को ले कर देशव्यापी हल्ला हुआ. हालांकि ऐसे अवैध निर्माण हर दूसरी गली या महल्ले में आम हैं. शायद फिल्मी सितारा होना मामले को तूल मिलने की बड़ी वजह है. कोरियोग्राफर गीता कपूर को 12 मार्च की सुबह पुलिस ने हिरासत में ले लिया. दरअसल, मुंबई के ओशीवाड़ा इलाके में गीता की कार से एक बाइक सवार टकरा गया. बताते हैं कि उस शख्स के पैर में फ्रैक्चर हुआ है. चूंकि कार गीता कपूर की थी सो उन से पूछताछ हो रही है.  कानून सब के लिए बराबर है और होना भी चाहिए लेकिन सैलिब्रिटीज के मामले में अकसर बातें बढ़ाचढ़ा कर गढ़ी जाने से बचना जरूरी है.

जीवन की मुसकान

मैं एक विद्यालय में गणित शिक्षक के रूप में कार्यरत हूं. विज्ञान शिक्षक नहीं रहने के कारण प्राचार्य बारबार मुझे विज्ञान पढ़ाने के लिए बाध्य कर रहे थे. मैं हमेशा नकारात्मक जवाब दे रहा था. एक दिन उन्होंने रजिस्टर में विज्ञान पढ़ाने के लिए मुझे लिखित रूप में आदेश दे दिया. बाध्य हो कर मुझे स्वीकार करना पड़ा. मैं ने कड़ी मेहनत और लगन से विज्ञान पढ़ाना शुरू कर दिया. शुरूशुरू में मुझे परेशानी के साथसाथ भय भी लग रहा था लेकिन लिखित आदेश का पालन करना मेरा कर्तव्य था. लेकिन विज्ञान के दूसरे शिक्षक आने के बावजूद बच्चे अभी भी मुझे ही विज्ञानशिक्षक के रूप में देखना चाहते हैं. इतना ही नहीं, जब बच्चों का परीक्षाफल निकला तो विज्ञान में बच्चों का प्रदर्शन बहुत ही बेहतर था और मुझे गणित शिक्षक के रूप में तो नहीं पर, विज्ञान शिक्षक के रूप में प्रशस्ति प्रमाणपत्र अवश्य मिला. अपने पूर्वाग्रह पर आज मुझे दुख ही नहीं, शर्मिंदगी महसूस हो रही है.

अशोक कुमार महतो, सुंदरगढ़ (ओडिशा)

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मैं और मेरी देवरानी एकसाथ रहते हैं. मेरे पति और देवर रिश्तेदारी में दिल्ली गए हुए थे. मेरे पोते को रात से हलका बुखार था. हम दोनों के बेटेबहुएं जौब पर गए हुए थे. दिन में डेढ़ बजे बच्चे को काफी तेज बुखार हो गया. उस की आंखें पलटने लगीं. हम दोनों बहुत घबरा गए. हमारे पास 1200 रुपए ही थे. एटीएम कार्ड नहीं था. पास में एक रिकशा वाला रहता था, उसे बुलाया. हमें घबराया देख कर वह बोला, ‘‘आंटीजी, आप डाक्टर को दिखाइए, मैं पैसे बाद में ले लूंगा.’’ नजदीक के डाक्टर को दिखाया. उन्होंने बच्चे को 2 घंटे अस्पताल में रखा. बच्चे को कुछ फर्क पड़ा तब हम घर आए. हमारे पास जो रुपए थे वे डाक्टर को दे दिए, दवा कैसे लाएं. तुरंत दवा भी देनी थी. कालोनी में ज्यादा जानपहचान न थी. अचानक दरवाजे की घंटी बजी. दरवाजा खोला तो एक अपरिचित चेहरा था. (जब मेरे देवर लखनऊ में रह कर पढ़ते थे वे तब उन के दोस्त व रूमपार्टनर थे.) वे लंदन में रहते थे. उस वक्त भारत आए हुए थे. सरप्राइज देने के विचार से देवर से मिलने आए थे. जब उन्होंने हमारी समस्या सुनी तो तुरंत जा कर दवा ले कर आए. साथ ही 10 हजार रुपए हमें दे गए. जब तक बेटेबहू आए तब तक बच्चे की हालत संभल गई थी.

देवर ने फोन पर मित्र से बात की तो पता चला कि वे वापस चले गए हैं. जब उन्हें धन्यवाद दिया तो कहने लगे कि पोते से बढ़ कर रुपए नहीं होते. मैं तुम्हारे काम आ पाया, मुझे बहुत खुशी है. तुम से नहीं मिल पाया, यह दुख है. 

माला वाही, लखनऊ (उ.प्र.)

स्मार्ट टिप्स

  1.  एक कटोरे में गरम पानी लें. उस में थोड़ा साबुन मिला दें. उस में अपने आई ग्लास को डुबोएंगे तो सारी गंदगी दूर हो जाएगी. बाद में नरम सूखे कपड़े से पोंछ लें, आई ग्लास चमकने लगेगा. ऐसा हफ्ते में 1 बार अवश्य करें.
  2.  घर में पेंट करवाने से पहले देख लें कि वह रंग फर्नीचर के रंगों के साथ मेल करेगा या नहीं, साथ ही हमेशा चटख रंगों का प्रयोग करें क्योंकि इस से मूड अच्छा बना रहता है.
  3.  कौंटैक्ट लैंस साफ करने से पहले अपने हाथ ऐंटी बैक्टीरियल साबुन या सैनिटाइजर से साफ करें. वरना आप के हाथ में मौजूद बैक्टीरिया आंख में प्रवेश कर जाएगा.
  4.  ऐसा वार्डरोब लें जिस में छोटेछोटे अनेक ड्रौअर्स बने हों जिस से आप ज्वैलरी या फिर छोटेमोटे कपड़े आराम से रख सकें.
  5.  घर में कालीन बिछाने के बजाय हार्ड फ्लोरिंग करवा सकते हैं. यह मेंटेन करने में आसान होती है और देखने में काफी अच्छी लगती है.
  6.  सफेद सिरके को गरम पानी के साथ मिलाएं और इस से फर्श साफ करें. सारे कीटाणुओं का सफाया हो जाएगा और फर्श चमक उठेगा.
  7.  अपने लैपटौप को साल में एक बार किसी कंप्यूटर प्रोफैशनल से जरूर साफ करवाएं, जिस से अंदर की धूलमिट्टी साफ हो सके.

सूक्तियां

पूर्णता

आप किसी चीज को बिलकुल पूर्ण समझते हैं तो इस का मतलब यह है कि आप ऐसी चीज में विश्वास करते हैं जो न है, न कभी थी और न कभी होगी.

लाभ

यह जानने के बाद कि एक अच्छे मौके का लाभ कैसे उठाया जाए, यह सीखना भी जरूरी है कि आसानी से मिलने वाले लाभ को कैसे छोड़ा जाए.

धर्म

लोग धर्म के लिए लड़ेंगे, झगड़ा करेंगे, धर्म पर लिखेंगे, भाषण देंगे और उस पर मर भी जाएंगे, लेकिन जीवन में उस के अनुकूल रहेंगे नहीं.

सफलता

कभी न गिरना शान की बात नहीं है, शान की बात तो यह है कि जब भी हम गिरें, उठ कर खड़े हो जाएं.

यश

दूसरों द्वारा प्रशंसा पाने की अपेक्षा अपने कामों द्वारा यश पाना अधिक अच्छा है.

विकार

विकार आग की तरह है, वह मनुष्य को घास की तरह जलाता है.

व्यवहार

व्यवहार वह आईना है जिस में हर किसी का प्रतिबिंब देखा जा सकता है.

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