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खेल खिलाड़ी

बेटियां नहीं हैं पीछे

आज हर क्षेत्र में लड़कियां कामयाबी की सीढि़यां चढ़ रही हैं. गणतंत्र दिवस परेड में महिला सशक्तीकरण की झांकी महिलाओं की उपलब्धियों का उदाहरण थी. महिलाओं की इसी महत्ता को महिमामंडित करने के लिए 8 मार्च को ‘वर्ल्ड वूमंस डे’ मनाया जाता है. टैलीविजन, पत्रपत्रिकाएं, समाचारपत्र महिलाओं की उपलब्धियों को सामने लाने में पीछे नहीं रहते. घर की चारदीवारी को लांघ कर महिलाओं ने अपना दमखम खेलों में भरपूर दिखाया है. हरियाणा की 2 बहनें गीता और बबीता ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुश्ती में अपने दमखम से विरोधी पहलवानों को चित कर के अनेक पदक जीत कर उस समाज को, उन लोगों को बदल दिया है जो यह सोचते हैं कि महिलाओं का काम सिर्फ चूल्हाचौका, बच्चे जनना, घर संभालना है. सायना नेहवाल, सानिया मिर्जा, दीपिका पल्लीकल, आकांक्षा सिंह, सुनीता रौय, ज्वाला गुट्टा, प्राची तेहलान, तान्या सचदेव, दीपिका कुमारी जैसी महिला खिलाडि़यों ने यह साबित कर दिया है कि हम किसी से कम नहीं.

हमारे देश में मातापिता ही बेटी को खेल के क्षेत्र में जाने से रोकते हैं. वजह शारीरिक, सामाजिक, वैवाहिक अड़चनें आड़े आती हैं. लेकिन ऐसी सोच गलत है, वजह बेबुनियाद है. उन्हें एक मौका तो दीजिए. उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें, फिर देखिए बेटों से बढ़ कर साबित होंगी बेटियां. गीता और बबीता के पिता महाबीर सिंह तारीफ के काबिल हैं जिन्होंने अपनी दोनों बेटियों को पहलवानी के क्षेत्र में आगे बढ़ने की हौसलाअफजाई की. नतीजतन, आज दोनों फ्री स्टाइल रेसलिंग में एक के बाद एक सफलता हासिल कर महिला पहलवानों के लिए आइकन बन गईं. तभी तो कहते हैं, बेटियां एक घर नहीं, दोदो घरों का नाम रोशन करती हैं.

*

विश्व कप की खुमारी

ओवल मैदान पर विश्वकप की खुमारी का रोमांच तब और बढ़ गया जब वेस्टइंडीज के खिलाड़ी क्रिस गेल ने जिम्बाब्वे के खिलाफ तूफानी पारी खेलते हुए 147 गेंदों में 215 रनों की पारी खेली. उस दिन स्टेडियम में बैठे दर्शक फील्डर बन गए और फील्डर दर्शक. ऐसा इसलिए क्योंकि गेल ने 10 चौके और 16 छक्के जड़ कर दर्शकों को ऐसा करने के लिए मजबूर कर दिया. विश्वकप में ऐसी ताबड़तोड़ बल्लेबाजी आज तक किसी ने नहीं देखी. इस से पहले भारतीय बल्लेबाज शिखर धवन की बैटिंग परफौर्मेंस को ले कर चिंताएं बढ़ गई थीं. पर पहले पाकिस्तान के खिलाफ 73 रन की पारी, उस के बाद दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 146 गेंदों में 137 रनों की पारी खेल वे फिर शीर्ष पर पहुंच गए.

इस मामले में श्रीलंकाई शेर भी कम नहीं. बंगलादेश के खिलाफ खेलते हुए तिलकरत्ने दिलशान ने 146 गेंदों पर 161 रन तो वहीं कुमार संगकारा ने 76 गेंदों पर 105 रन की पारी खेल कर उन की टीम ने लगातार तीसरी बार विश्वकप फाइनल खेलने का अपना इरादा जता दिया है. ऐसे में भला दक्षिण अफ्रीका के कैप्टन एबी डिविलियर्स कहां पीछे रहने वाले थे. वेस्टइंडीज के खिलाफ खेलते हुए डिविलियर्स ने 66 गेंदों पर 162 रन की पारी खेल कर विरोधी टीमों को कम से कम डरा तो दिया ही है. क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल है और किसी एक टीम को तो हारना ही पड़ता है लेकिन इस तरह के अचंभे कभीकभार होते हैं पर जब होते हैं तो खेल का रोमांच और बढ़ जाता है. फिलहाल हारजीत को भुला कर खेल का मजा लीजिए.

क्रिकेट से जुड़ी एक और बात. भारतीय क्रिकेट जगत में सालों पहले बेआबरू हो कर निकले बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष जगमोहन डालमिया ने सुपर सिक्सर मारते हुए जोरदार वापसी की है. कहते हैं राजनीति में कोई परमानैंट दोस्त या दुश्मन नहीं होता, लिहाजा, श्रीनिवासन खेमे को भी उन्हें निर्विरोध बीसीसीआई का नया अध्यक्ष चुनना पड़ा. बड़ा सवाल यह है कि क्रिकेट की इतनी फजीहत होने के बावजूद खेल संघ से जुड़े बड़े पदों पर अभी भी पुराने धुरंधरों और दामन में दाग लिए नामों को ही बिठाया जा रहा है, जबकि उन लोगों को दरकिनार किया जा रहा है जो पूर्व खिलाड़ी रहे हैं.

दिन दहाड़े

हम लोग घर के लौन में बैठे थे. पौधे बेचने वाले 2 आदमी आए. उन की साइकिल पर अमरूद के पौधे रखे थे. हम ने उन से अमरूद व अशोक वृक्ष के पौधे लगाने की बात की तो उन्होंने बताया कि अमरूद का पौधा 50 व अशोक का पौधा 60 रुपए का है. उन्होंने दोनों पौधे 100 रुपए में लगाने की बात कह कर हमारे यहां पौधे लगा दिए. हम ने उन से पूछा कि पौधों में खाद व पानी कैसे देना है तो उन्होंने कहा कि जो खाद आप के पास है, वही काम आ जाएगी. पौधों को पानी 2 दिन बाद ही देना. हमारे पड़ोसियों ने भी उन से पौधे लगवाए. उन्होंने लाल अमरूद का पौधा लगवाया जिस के लिए उन्होंने 100 रुपए दिए. उन्होंने खाद व पानी देने की बात की तो उन्होंने हमें कही बात दोहराई. इस के अलावा उन्होंने अपनेआप को जयपुर का रहने वाला बताया. पौधे वाले आजतक पलट कर नहीं आए. कोई भी पौधा हमारे यहां नहीं पनपा, न पड़ोसियों के घर पर पनपा. इस तरह हम दिन दहाड़े ठगे गए.

गुलाब सिंह राजपूत, चूरू (राज.)

*

गरमी का मौसम था. एक दिन मेरा देवर उन्नाव से दोपहर को मोटरबाइक द्वारा कानपुर आ रहा था. धूप काफी तेज थी. तभी रास्ते में 2 लड़के चले जा रहे थे. तुरंत मोटरबाइक के सामने आते हुए बोले, ‘‘अंकलजी, अंकलजी, हमें भी मोटरबाइक पर बैठा कर वहां मोड़ पर छोड़ दो. धूप बहुत तेज है.’’ मोटरबाइक धीरे करते हुए  मेरे देवर ने कहा, ‘‘बेटे, मैं 2 जनों को नहीं बैठा सकता,’’ तुरंत उन में से एक बोला, ‘‘अंकल, कृपया मुझे ही बिठा लें. मेरी तबीयत खराब है.’’ देवरजी ने गाड़ी रोक दी. इस से पहले वे कुछ बोलते, दोनों लड़के लपक कर गाड़ी पर बैठ गए और उन्हें धक्का दे कर सड़क पर गिरा दिया. एक लड़का मोटरबाइक पर बैठा रहा. दूसरे ने कहा, ‘‘बाबूजी, सबकुछ जेब से निकाल कर हमें दे दो.’’ उन से घड़ी, मोबाइल, फोन, अंगूठी पर्स सबकुछ छीन लिया. इस के बाद भी दोनों ने देवर की खूब पिटाई की और पास ही के एक गड्ढे में गिरा दिया. और तुरंत मोटरबाइक ले कर भाग गए. मेरे देवर किसी तरह गड्ढे से बाहर निकले. उस सुनसान रास्ते पर एक पुरुष दिखाई दिया. उन्हें सब किस्सा सुना कर उन के साथ पास ही की एक पुलिस चौकी पर पहुंच कर एफआईआर लिखवाई. कई दिनों की दौड़धूप के बाद उन को पुलिस ने उन की गाड़ी मिल जाने की सूचना दी. गाड़ी को देख कर उन्हें रोना आ गया क्योंकि मोटरबाइक के ओरिजनल पार्ट्स गायब थे.

कैलाश भदौरिया, गाजियाबाद (उ.प्र.)

महायोग : 11वीं किस्त

अब तक की कथा :

ईश्वरानंद से मिल कर दिया को अच्छा नहीं लगा था. वह समझ नहीं पा रही थी कि धर्मानंद क्यों ईश्वरानंद का आदेश टाल नहीं पाता. ईश्वरानंद कोई सामूहिक गृहशांति यज्ञ करवा रहे थे. उसे फिर धर्मानंद के साथ उस यज्ञ में शामिल होने का आदेश मिलता है. बिना कोई विरोध किए दिया वहां चली गई. उस पूजापाठ के बनावटी माहौल में दिया का मन घुट रहा था परंतु धर्मानंद ने उसे बताया कि प्रसाद ग्रहण किए बिना वहां से निकलना संभव नहीं. वह दिया की मनोस्थिति समझ रहा था. अब आगे…

दिया बेचैन हुई जा रही थी.  जैसेतैसे कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा हुई और भीड़ महाप्रसाद लेने के लिए दूसरी ओर लौन में सजी मेजों की ओर बढ़ने लगी. अचानक एक स्त्री ने आ कर धीरे से धर्मानंद के कान में कुछ कहा.

धर्मानंद अनमने से हो गए, ‘‘देर हो रही है.’’

‘‘लेकिन गुरुजी ने आप को अभी बुलाया है. आप के साथ में कोई दिया है, उसे भी बुलाया है.’’

एक प्रकार से आदेश दे कर वह स्त्री वहां से खिसक गई. दिया ने भी सब बातें सुन ली थीं. कहांकहां फंस जाती है वह. नहीं, उसे नहीं जाना.

‘‘आप हो कर आइए. मैं खाना खाती हूं.’’

‘‘दिया, प्लीज अभी तो चलिए. नहीं तो गड़बड़ हो जाएगी.’’

‘‘मैं कोई बंदी हूं उन की जो उन का और्डर मानना जरूरी है?’’ दिया की आवाज तीखी होने लगी तो धर्मानंद ने उसे समझाने की चेष्टा की.

‘‘मैं जानता हूं तुम उन की बंदी नहीं हो पर तुम नील और उस की मां की कैदी हो. वैसे मैं भी यहां एक तरह से कैद ही हूं. इस समय मैं जैसा कह रहा हूं वैसा करो दिया, प्लीज. हम दोनों ही मिल कर इस समस्या का हल ढूंढ़ेंगे.’’

धर्मानंद दिया का हाथ पकड़ कर पंडाल के अंदर ही अंदर 2-3 लौन क्रौस कर के दिया धर्मानंद के साथ गैराजनुमा हाल में पहुंची.

धर्मानंद ने एक दीवार पर लगी हुई एक बड़ी सी पेंटिंग के पास एक हाथ से उस सुनहरी सी बड़ी कील को घुमाया जिस पर पेंटिंग लगी हुई थी. अचानक बिना किसी आवाज के पेंटिंग दरवाजे में तबदील हो गई और धर्मानंद उस का हाथ पकड़े हुए उस दरवाजे में कैद हो गया. अंदर घुसते ही पेंटिंग बिना कुछ किए बिना आवाज के अपनेआप फिर से पहली पोजीशन पर चिपक सी गई. सामने ही ईश्वरानंदजी का विशाल विश्रामकक्ष था. ईश्वरानंदजी गाव तकिए के सहारे सुंदर से दीवान पर लेटे हुए थे, उन के सिरहाने एक स्त्री बैठी थी जो उन का सिर दबा रही थी तो एक उन के पैरों की ओर बैठी पैरों की मालिश कर रही थी.

‘‘आओ, धर्मानंद, आओ दिया, क्या बात है, आज देर कैसे हो गई? काफी देर से पहुंचे आप लोग? और हम से क्या मिले बिना जाने का प्रोग्राम था?’’दिया ने देखा दोनों स्त्रियां किसी मशीन की भांति चुपचाप माथे और पैरों की मालिश कर रही थीं.

‘‘अरे भई, जरा धर्मानंद और दिया को एकएक पैग तो बना कर दो. अभी तक खड़े हो दोनों, बैठो.’’

चुपचाप दोनों सामने वाले सोफे पर बैठ गए. दिया का दिल धकधक करने लगा. अब क्या प्रसाद के नाम पर पैग भी. नहीं, उस ने धर्मानंद का हाथ फिर से कस कर दबा दिया.अचानक न जाने किधर से उस दिन वाली अंगरेज स्त्री आ कर खड़ी हो गई और मुसकराते हुए पैग तैयार करने लगी.

‘‘हैलो धर्मानंद, हाय दिया,’’ उस ने दोनों को विश किया.

‘‘प्लीज रहने दें, हम तो बस महाप्रसाद लेने ही जा रहे थे,’’ धर्मानंद ने मना किया.

‘‘ऐसे कैसे चलेगा, धर्म, तुम्हें होता क्या जा रहा है? एकएक पैग लो यार. सिर फटा जा रहा है. सुबह से ये सब विधि करवाते हुए पूरे बदन में दर्द हो रहा है. दो, दिया को भी दो, धर्म को भी,’’ ईश्वरानंद ने फिर आदेश दिया.

‘‘गुरुजी, इस समय रहने दें और दिया तो लेती ही नहीं है.’’

‘‘अरे, लेती नहीं है तो क्या, आज ले लेगी, गुरुजी के साथ.’’

‘‘यहां आओ, दिया. उस दिन भी तुम से कुछ बात नहीं हो सकी,’’ ईश्वरानंद ने उसे अपने पास दीवान पर बैठने का इशारा किया.

दिया मानो सोफे के अंदर धंस जाएगी, इस प्रकार चिपक कर बैठी रही.

‘‘मैं किसी को खा नहीं जाता, दिया. देखो ये सब, कितने सालों से मेरे साथ हैं. आज तक तो किसी को कुछ नुकसान पहुंचाया नहीं है. डरती क्यों हो?’’

‘‘लाओ, बनाओ एकएक पैग और जाओ तुम लोग भी प्रसाद ले लो, फिर यहां आ जाना.’’

गुरुजी के आदेश पर दोनों स्त्रियां ऐसे उठ खड़ी हुईं मानो किसी ने उन का कोई स्विच दबा दिया हो, रोबोट की तरह. हाय, क्या है ये सब? मानो किसी ने हिप्नोटाइज कर रखा हो. दिया ने सुना हुआ था कि ऐसे लोग भी होते हैं जो आंखों में आंखेंडाल कर अपने वश में कर लेते थे. सो, दिया ईश्वरानंद से आंखें नहीं मिला रही थी. सब के सामने पैग घूम गए. सब से पहले ईश्वरानंद ने लिया, चीयर्स कह कर गिलास ऊपर की ओर उठाया, एक लंबा सा घूंट भर लिया और धर्मानंद को लेने का इशारा किया.

‘‘प्लीज, नो,’’ दिया जोर से बोली.

धर्मानंद का उठा हुआ हाथ वहीं पर रुक गया और ईश्वरानंद भी चौंक कर दिया को देखने लगे.

‘‘प्लीज, चलो धर्मानंद, आय एम वैरी मच अनकंफर्टेबल,’’ उस के मुंह से अचानक निकल गया.

‘‘क्यों घबरा रही हो, दिया? एक पैग लो तो सही, सब डर निकल जाएगा. लो,’’ ईश्वरानंद अपने स्थान से उठ कर दिया की ओर बढ़े तो दिया धर्मानंद के पीछे छिप गई.

‘‘गुरुदेव, दिया के लिए यह सब बिलकुल अलग है, नया. प्लीज, अभी रहने दें. बाद में जब यह कंफर्टेबल हो जाएगी…’’ धर्मानंद ने ईश्वरानंद की ओर अपनी एक आंख दबा दी.

ईश्वरानंद उस का इशारा समझ कर फिर से जा कर धप्प से अपने स्थान पर विराजमान हो गए. उन के चेहरे से लग रहा था कि वे दिया व धर्म के व्यवहार से क्षुब्ध हो उठे हैं. परंतु लाचारी थी. जबरदस्ती करने से बात बिगड़ सकती थी और वे बात बिगाड़ना नहीं चाहते थे.

‘‘दिया इतनी होशियार है, मैं तो कहता हूं कि यह अगर अपना हुलिया थोड़ा सा बदलने के लिए तैयार हो तो मैं इसे अच्छी तरह से ट्रेंड कर दूंगा और फिर देखना लोगों की लाइन लग जाएगी, इस के प्रवचन सुनने और इस के दर्शनों के लिए.

‘‘दिया, तुम्हारी पर्सनैलिटी में तो जादू है जो तुम नहीं जानतीं, मैं समझता हूं. तुम्हारे लिए सबकुछ नया है पर शुरू में तो सब के लिए नया ही होता है न?’’ ईश्वरानंद प्रयत्न करना नहीं छोड़ रहा था.

‘‘गुरुजी, आज दिया को जरा घुमा लाता हूं. बेचारी घर के अंदर रह कर बोर हो जाती है. आज आप भी थके हुए हैं. मैं फिर कभी इसेले कर आऊंगा.’’

‘‘ठीक है पर प्रसाद जरूर ले कर जाना. उस के साथ आने वाले दिनों के कार्यक्रम की लिस्ट भी मिलेगी.’’

बाहर जाने वाले लोगों के हाथ पर एक मुहर लगाई जा रही थी. उन लोगों के हाथों पर भी मुहर लगाई गई. जब वे अपना जमा किया हुआ सामान लेने पहुंचे तो उन्हें उन का सामान तभी दिया गया जब उन्होंने अपने हाथ दरबानों को दिखाए. साथही एक लिस्ट भी दी गई जिस पर ईश्वरानंदजी द्वारा संयोजित होने वाले कार्यक्रमों का विवरण था और ‘परमानंद सहज अनुभूति’ के सदस्यों का उन कार्यक्रमों में उपस्थित होना अनिवार्य था.शाम के 3:30 बजे थे. धर्मानंद ने गाड़ी निकाली और बाहर निकल कर दिया चारों ओर देख कर लंबीलंबी सांसें ले रही थी. घुटन से निकल मुक्त वातावरण में वह अपने फेफड़ों के भीतर पवित्र, शुद्ध, सात्विक सांसें भर लेना चाहती थी.  गार्डन पहुंच कर दोनों गाड़ी से उतरे. लौन पर बैठते ही सब से पहले दिया ने अपना पर्स  खोला. मोबाइल देखा, कितने सारे मिसकौल्स थे.

‘‘देखिए धर्म, इस में नील की मां के भी कई मिसकौल्स हैं,’’ दिया ने धर्मानंद की ओर मोबाइल बढ़ा दिया.

‘‘अरे, मैं भूल गया दियाजी, उन्होंने कहा था न कि पूजा खत्म होते ही मुझे रिंग दे देना. मैं अभी उन्हें कौल करता हूं.’’

‘‘क्या जरूरत है, धर्म?’’

‘‘जरूरत है, दिया. इन लोगों से ऐसे छुटकारा नहीं मिल सकता. इन्हें शीशे में उतारने के बाद ही कुछ हो सकेगा.’’

उस ने नील की मां को फोन किया और स्पीकर का बटन दबा दिया जिस से दिया भी सुन सके.

‘‘रुचिजी, पूजा हो गई है और हम वहां से निकल रहे हैं.’’

‘‘कैसी हुई पूजा, धर्मानंदजी? आप साथ ही में थे न? दिया ने कुछ गड़बड़ी तो नहीं की?’’

‘‘कैसी बात कर रही हैं आप? मेरे साथ थी वह, क्या कर सकती थी?’’

‘‘आप के पास नहीं है क्या दिया?’’

‘‘अगर होती तो आप से ऐसे खुल कर बात कैसे कर सकता था?’’

‘‘कहां गई है?’’

‘‘जरा वाशरूम तक. मैं ने ही कहा जरा हाथमुंह धो कर आएगी तो फ्रैश फील करेगी. वहां तो उस का दम घुट रहा था.’’

‘‘यही तो धर्मानंदजी, क्या करूं, मैं तो बड़ी आफत में पड़ गई हूं. उधर…आप के पास तो फोन आया होगा नील का?’’ वे कुछ घबराए स्वर में बोल रही थीं. जब नील से फोन पर बात होती थी तब भी वे इसी स्वर में बोलने लगती थीं.

‘‘नहीं, रुचिजी, क्या हुआ? नील का तो कोई फोन नहीं आया मेरे पास. सब ठीक तो है?’’ धर्म ने भी घबराने का नाटक किया.

‘‘अरे वह नैन्सी प्रैगनैंट हो गई है. बच्चे को गिराना भी नहीं चाहती.’’

‘‘तो पाल लेगी अपनेआप, सिंगल मदर तो होती ही हैं यहां.’’

‘‘नहीं, पर वह चाहती है कि मैं पालूं बच्चे को. अगर मैं बच्चा पालती हूं तो वह नील से शादी कर लेगी वरना…’’

‘‘तो इस में आप को क्या मिलेगा?’’

‘‘मिलने की बात तो छोडि़ए, धर्मजी. मुझे तो इस लड़के ने कहीं का नहीं रखा. दिया का क्या करूं मैं?’’

‘‘हां, यह तो सोचना पड़ेगा. मैं तो समझता हूं कि रुचिजी, अब बहुत हो गया, अब तो इस के घर वालों को खबर कर ही देनी चाहिए.’’

‘‘मरवाओगे क्या? वे तो वैसे ही यहां आने के लिए तैयार बैठे हैं…और आप को पता है उन की परिस्थिति क्या चल रही है? वे तो हमें फाड़ ही खाएंगे…’’

‘‘दिया आ रही है, रुचिजी. मैं बाद में आप से बात करूंगा.’’  

‘‘अरे कहीं मौलवौल में घुमाओ. बियाबान में क्या करेगी? कुछ खरीदना चाहे तो दिलवा देना. आज उसे पैसे नहीं दिए. वैसे पहले के भी होंगे ही उस के पर्स में, पूछ लेना…’’ नील की मां की नाटकीय आवाज सुनाई दी.

‘‘हां जी, देर हो जाए तो चिंता मत करिएगा.’’

‘‘चिंताविंता काहे की, मेरी तो मुसीबत बन गई है. समझ में नहीं आता और क्या पूजापाठ करवाऊं? ईश्वरानंदजी से भी मशवरा कर लेना.’’

‘‘हां जी-हां जी, जरूर. अभी रखता हूं, नमस्ते.’’

मोबाइल बंद कर के दिया की आंखों में आंखें डाल कर धर्मानंद बोला, ‘‘आई बात कुछ समझ में?’’

‘‘आई भी और नहीं भी आई, धर्मजी. जीवन कैसे मेरे प्रति इतना क्रूर हो सकता है? मेरा क्या कुसूर है? मैं कांप जाती हूं यह सोच कर कि मेरे घर वालों की क्या दशा होगी लेकिन मैं उन्हें सचाई बताने से भी डरती हूं. क्या करूं?’’

‘‘दिया, दरअसल मैं खुद यहां से निकल भागना चाहता हूं. मगर मैं यहां एक जगह फंसा हुआ हूं,’’ वह चुप हो गया.

दिया का दिल फिर धकधक करने लगा. कहीं कुछ उलटासीधा तो कर के नहीं बैठे हैं ये.

‘‘नहीं, मैं ने कुछ गलत नहीं किया है. मैं दरअसल यहां एमबीए कर रहा हूं और सैटल होना चाहता हूं पर अगर ईश्वरानंद को पता चल जाएगा तो वे मेरा पत्ता साफ करवा देंगे.’’

‘‘क्यों? उन्हें क्या तकलीफ है?’’ दिया ईश्वरानंद के नाम से चिढ़ी बैठी थी.

‘‘तकलीफ यह है कि मैं उन के बहुत सारे रहस्यों से वाकिफ हूं और अगर मैं ने उन का साथ छोड़ दिया तो उन्हें डर है कि मैं कहीं उन की पोलपट्टी न खोल दूं…’’

‘‘क्या आप को यह नहीं लगता कि ये सब गलत है?’’

‘‘हां, खूब लगता है.’’

‘‘फिर भी आप इन लोगों के साथी बने हुए हैं?’’

‘‘बस, इस में से निकलने का रास्ता ढूंढ़ रहा हूं.’’

‘‘सच बताइए, धर्म, मेरा पासपोर्ट आप के पास है न?’’

दिया ने धर्म पर अचानक ही अटैक कर दिया. धर्म का चेहरा उतर गया पर फिर संभल कर बोला, ‘‘हां, मेरे पास है पर आप को कैसे पता चला?’’

‘‘मैं ने आप की और नील की मां की सारी बात सुन ली थी उस दिन मंदिर में,’’ दिया ने सब सचसच कह दिया.

‘‘और…आप उस दिन से मुझे बरदाश्त कर रही हैं?’’

‘‘मैं तो नील और उस की मां को भी बरदाश्त कर रही हूं, धर्म. मैं इन सब दांवपेचों को न तो जानती थी और न ही समझती थी परंतु मेरी परिस्थिति ने मुझे जबरदस्ती इन सब पचड़ों में डाल दिया.’’

‘‘बहुत शर्मिंदा हूं मैं, दिया. पर मैं भी आप की तरह ही हूं. मुझे भी उछाला जा रहा है. एक फुटबाल सा बन गया हूं मैं. सच में ऊब गया हूं.’’

धर्म की आंखों में आंसू भरे हुए थे. दिया को लगा वह सच कह रहा था.

‘‘मैं नील के घर से भागना चाहती हूं, धर्म,’’ दिया ने अपने मन की व्यथा धर्म के समक्ष रख दी.

‘‘कहां जाओगी भाग कर?’’

‘‘नहीं मालूम, कुछ नहीं पता मुझे. वहां मेरा दम घुटता है. मैं इंडिया वापस जाना चाहती हूं,’’ दिया बिलखबिलख कर रोने लगी, ‘‘आप नहीं जानते, धर्म, मैं किस फैमिली से बिलौंग करती हूं. और मेरी ही वजह से मेरे पापा का क्या हाल हुआ है?’’

‘‘मैं सब जानता हूं, दिया. इनफैक्ट, मुझे आप के घर में हुई एकएक दुर्घटना का पता है, यह भी कि नील व उस की मां भी ये सब जानते हैं.’’

‘‘क्या? क्या जानते हैं ये लोग? क्या इन्हें मालूम है कि मेरे पापा की…’’ दिया चकरा गई.

‘‘हां, इन्हें सब पता है और इन्हें यह सब भी पता है जो आप को नहीं मालूम,’’ धर्म ने सपाट स्वर में कहा.

‘‘क्या, क्या नहीं पता है मुझे?’’ दिया अधीर हो उठी थी.

‘‘अब मैं आप से कुछ नहीं छिपा पाऊंगा, दिया. मेरा मन वैसे ही मुझे कचोट रहा है. मैं भी तो इस पाप में भागीदार हूं.’’

‘‘पर आप तो उस दिन नील की मां से कह रहे थे कि आप यहां थे नहीं, तब किसी रवि ने मेरी जन्मपत्री मिलाई थी.’’

‘‘ठीक कह रहा था, दिया. पर सब से ऊपर तो ईश्वरानंद बौस हैं न?’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि जब तक उस की मुहर नहीं लग जाती तब तक बात आगे कहां बढ़ती है. रवि भी तो इन का ही मोहरा है. उस ने भी जो किया या बताया होगा, ईश्वरानंदजी के आदेश पर ही न.’’

‘‘पर आप तो उस दिन नील की मां से कह रहे थे कि रवि आप का चेला है. आप उसे यह विद्या सिखा रहे हैं?’’

दिया चाहती थी कि जितनी जल्दी हो सके उसे ऐसा रास्ता दिखाई दे जाए जिस से वह इस अंधेरी खाई से निकल सके.

‘‘अच्छा, एक बात बताइए, धर्म. कहते हैं कि मेरे ग्रह नील पर बहुत भारी हैं और यदि वह मुझ से संबंध बनाता है तो बरबाद हो जाएगा. पर नैन्सी से उस के शारीरिक संबंध ग्रह देखने के बाद बने हैं क्या?’’

‘‘क्या बच्चों जैसी बात करती हैं? उस जरमन लड़की से वह ग्रह देखने के बाद संबंध स्थापित करता क्या?’’

‘‘तो उसे कैसे परमिशन दे दी उस की मां ने? बच्चों जैसी बात नहीं, धर्म, मूर्खों जैसी बात है. जिस लड़की को पूरी तरह ठोकपीट कर ढोलनगाड़े बजा कर लाए उस के ग्रहों के डर से अपने बेटे को बचा कर रखा जा रहा है और जिस लड़की के शायद बाप का भी पता न हो, वह नील की सर्वस्व है. क्या तमाशा है, धर्म?’’

‘‘हां, तमाशा ही तो है, दिया. तुम वैसे भी सोचो, पूरी दुनिया में ग्रह मिलाए जाते हैं क्या? विदेशों में तो वैसे ही संबंध बन जाते हैं, फिर भी यहां पर इस अंधविश्वास की चिंगारी जल रही है. तुम ने देखा, कितने गोरे थे ईश्वरानंद के प्रोग्राम में. यह तमाशा नहीं तो फिर क्या है?’’

दिया बोली, ‘‘धर्म, क्या मुझे पता चल सकता है कि मेरे घरवाले कैसे हैं? मैं समझती थी कि नील व उस की मां इस बात से बेखबर हैं कि मेरी फैमिली पर क्या बीती है.’’

‘‘नहींनहीं, वे लोग सबकुछ जानते हैं, दिया. इनफैक्ट, एकएक घटना. एक बात सुन कर तुम चौंक जाओगी, समझ में नहीं आता तुम्हें बताऊं या नहीं?’’

‘‘अब सबकुछ तो पता है. कुछ बताओगे भी तो क्या होगा. हां, शायद इन लोगों को समझने में मुझे मदद मिल सके,’’ दिया ने धीरे से कहा.

‘‘मैं जानता हूं तुम्हारे लिए कंट्रोल करना मुश्किल हो जाएगा पर न जाने क्यों मैं तुम से अब कुछ भी छिपाना नहीं चाहता.’’

‘‘तो बता दो न, धर्म. क्यों अपने और मेरे लिए बेकार का सिरदर्द रखते हो. एक बार कह कर खत्म कर दो बात,’’ दिया पूरा सच जानने के लिए बेचैन हो रही थी.

अपनेआप को संयत करते हुए धर्म ने कहा, ‘‘दिया, यह तुम्हारी शादी का जो जाल है न, वह भी ईश्वरानंद का ही फैलाया हुआ है.’’

‘‘क्या,’’ दिया मानो कहीं ऊंचाई से नीचे खाई में गिर पड़ी, ‘‘यह कैसे हो सकता है?’’ उस के मुख से ऐसी आवाज निकली मानो जान ही निकली जा रही हो.

‘‘दिया, इतना कुछ देखनेसुनने, सहने के बाद भी तुम कितनी भोली हो. इस दुनिया में सबकुछ हो सकता है, सबकुछ. यह रिश्ता ईश्वरानंद का ही भेजा हुआ था. यह एक पासा फेंकने जैसी बात है. उन्होंने पासा फिंकवाया और तुम्हारी दादी लपेटे में आ गईं. वह जो तुम्हें किसी शादी में बिचौलिया मिला था न.’’

‘‘बिचौलिया? मतलब?’’ दिया का दम निकला जा रहा था.

‘‘बिचौलिया यानी बीच का आदमी. जो तुम्हारी दादी के पास तुम्हारे रिश्ते की बात ले कर आया था.’’

‘‘अच्छा, तो?’’

‘‘तो यह कि वह ईश्वरानंद का ही आदमी था. तुम्हें आश्चर्य होगा कि वह आदमी ईश्वरानंद के लिए इसी प्रकार काम करता है, जिस के लिए उस को खूब  पैसा मिलता है. न जाने कितनी लड़कियां लाया है वह हिंदुस्तान से और वह केवल ईश्वरानंद का ही नहीं, न जाने ऐसे कितने दूसरे लोगों के लिए काम करता है.’’

दिया की आंखें फटी की फटी रह गईं. ऐसा भी हो सकता है क्या? जीवन में इस प्रकार की धोखाधड़ी. दिया पसीने से तरबतर अपना मुंह पोंछने लगी.

‘‘मैं तुम्हें डराना नहीं चाहता पर है यह सच. तुम्हें मंदिर में एक खूब मोटी सी औरत मिली थी न जिस से रुचिजी बहुत बातें करती रहती हैं. क्या नाम है उस का…हां…शिक्षा…शिक्षा के लिए वह आदमी 3 लड़कियां लाया है इंडिया से.’’

‘‘क्यों? शिक्षा भी ये सब धंधे करती है क्या?’’ दिया के मुंह से घबराई हुई आवाज निकली.

‘‘नहीं, शिक्षा धंधा तो नहीं करती. शिक्षा का बेटा डायबिटिक है, वैसे वह इंपोटैंट भी है. मालूम है, उस ने अपने बेटे की 3 शादियां करवा दी हैं?’’

‘‘3 शादियां…? क्या तीनों बहुएं उसी घर में रहती हैं…’’ अचानक दिया पूछ बैठी.

‘‘नहीं, एक शादी होती है तो बहू पर घर का सारा काम डाल दिया जाता है. बहुत पैसे वाले लोग हैं ये. बहुत बड़ा घर है. वैसे तो 3 घर हैं इन के पर जिस में रहते हैं वह बहुत बड़ा घर है. 60 वर्षों से भी पहले इन की पीढ़ी यहां पर आई थी और यहीं इन के दादा लोग बस गए थे. इन के घर की औरतें पढ़ीलिखी नहीं हैं. बस, यहां रहते हैं इतना ही…अब जब लड़के की शादी होती है, बहू आती है तो वह लड़के से किसी भी प्रकार संतुष्ट नहीं हो पाती. फिर जब तक उस के पक्के होने की मुहर लगती है वह तब तक ही उस के घर रहती है. जैसे ही उसे इस देश में रहने की परमिशन मिली वह उन के घर से भाग खड़ी होती है और कहीं भी मजदूरी कर के अपनेआप को सैटल कर लेती है. इस तरह से शिक्षा के लड़के की 3 शादियां हुईं और ये सब काम उसी आदमी के हैं जिस ने तुम्हारा रिश्ता पक्का कराया था.’’

‘‘तो लड़की यहां कैसे आती है, उस का वीजा वगैरह?’’ दिया ने पूछा.

‘‘यह सब तो इन के बाएं हाथ का खेल है. पूरा एक रैकेट है दिया, जिस में कोई अपनेआप आ फंसता है तो कोई ग्रहों और ज्योतिष के चक्कर में फंसा लिया जाता है.’’

‘‘तब तो मैं बहुत बुरी तरह उलझी हुई हूं. अगर मैं किसी से बात करती हूं तो मुझ पर और अंकुश लग जाएंगे?’’

‘‘नहीं, ऐसा नहीं है. यहां बहुत से ‘हैल्पेज होम्स’ भी हैं. ‘ओल्ड ऐज होम्स’ की तरह, पुलिस में भी इन्फौर्म कर सकते हैं और ऐंबैसी से भी हैल्प मिल सकती है. बस, बात इतनी सी है कि हमें थोड़ा इंतजार करना होगा.’’

‘‘क्यों? क्यों करना होगा इंतजार? धर्म अगर आप मुझे सच में प्रोटैक्ट करना चाहते हैं तो प्लीज मुझे जल्दी से जल्दी इस गंद से निकलने में हैल्प करिए,’’ दिया उतावली सी हुई जा रही थी.

‘‘दिया, मैं चाहता हूं कि आप के साथ मैं भी इस दलदल से निकल भागूं जबकि मैं जानता हूं कि ईश्वरानंदजी मुझे इतनी आसानी से निकलने नहीं देंगे. उन का कोई न कोई आदमी हम पर नजर रखे ही होगा.’’

दिया घबरा कर इधरउधर देखने लगी तो धर्म हंस पड़ा.

‘‘अरे, इतना आसान थोड़े ही है यह पता लगाना. यह तो पूरा चैनल है जो हर तरफ फैला हुआ है. दुनियाभर में चलता है इन का व्यापार. इतनी आसानी से आप को जाने देंगे वे लोग? इन का तो कोई मकसद भी सौल्व नहीं हुआ है अब तक.’’

‘‘तब फिर कैसे?’’ दिया ने हकला कर पूछा और रूमाल से अपना पसीना पोंछने लगी.

‘‘थोड़ा पेशेंस रखना होगा और कुछ दिन. मैं चाहता हूं कि मेरा एमबीए भी पूरा हो जाए और किसी को खबर हुए बिना हम किसी न किसी तरह यहां से निकल भागें.’’

‘‘यह कोई सपना देख रहे हैं क्या, धर्म?’’

‘‘नहीं, सपना नहीं है. जब यह सपना नहीं है कि आप इस कैद में आ कर फंसी हुई हैं तो वह भी केवल सपना नहीं कि आप इस कैद से छूट सकती हैं. हां, मुश्किलें तो बहुत आएंगी, इस में शक नहीं है.’’

धर्म के साथ रहने पर समय का पता ही नहीं चलता था. युवा उम्र में वैसे भी स्वाभाविक रूप से विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण होता है. उस पर, दिया की स्थिति तो बेपेंदी के लोटे की तरह हो गई थी. इस इकलौते सहारे में ही वह सबकुछ ढूंढ़नेलगी थी. केवल 2 बार के मिलने से ही उसे यह बात ठीक प्रकार समझ में आ गई थी कि धर्म भीतर से बहुरूपिया नहीं है बल्कि ऐसी परिस्थितियों में उलझा हुआ है कि वह भी उन में फंस कर अपने पंख फड़फड़ा रहा है. जब 2 लोग एक सी मुसीबत में घिर जाते हैं तो उन की समस्या भी एक हो जाती है और विचार भी एक ही दिशा में चलने लगते हैं.

‘‘धर्म, मुझे नहीं जाना नील के घर,’’ अचानक ही दिया ने यह बचपने का सा विचार धर्म के समक्ष परोस दिया.

धर्म का मुंह चलतेचलते रुक गया, ‘‘तो कहां जाओगी?’’

‘‘कहीं भी, आप के साथ.’’

‘‘मेरे साथ?’’

‘‘हां, क्यों, आप मुझे अपने घर पर नहीं रख सकते?’’

‘‘नहीं, वह बात नहीं है, दिया, पर यह कैसे संभव है? थोड़ा पेशेंस रखो,’’ धर्म ने दिया को समझाने का प्रयास किया.

‘‘कहां से रखूं पेशेंस? मुझ में पेशेंस है ही नहीं अब, कहां से लाऊं?’’

‘‘हम ऐसे हार नहीं मान सकते, दिया. मुझे कुछ टाइम दो सोचने का,’’ धर्म उस को पकड़ कर फिर से लौन में जा बैठा.

‘‘धर्म, मैं एक उलझन से निकलती हूं तो दूसरी में फंस जाती हूं. मुझे अभी आप ने बताया कि ईश्वरानंद ने ही मुझे फंसाया है पर जब पिछली बार आप के साथ उन से मिली थी, तब तो वे पूछ रहे थे कि यह दिया कौन?’’

‘‘दिया, आप को अब तक यह बात समझ में नहीं आई कि ये सब नाटक है. तब अगर वे बता देते तो आप पर अपना प्रभाव कैसे डाल पाते? आप को तो अपने झांसे में लेना ही था न उन्हें? फिर रुचिजी की और उन की बहुत पुरानी दोस्ती है. पिछली बार तक तो वे, इन के यहां आने पर, इन के हर प्रोग्राम में आती थीं. लगता है इस बार वे जानबूझ कर नहीं आना चाहतीं. शायद, कहीं पोल न खुल जाए, इसलिए.’’

‘‘वह तो कुछ पैरों के दर्द के कारण…’’ दिया बोली तो उस की बात को बीच में काटते हुए धर्म बोला, ‘‘पैरों का दर्दवर्द सब ड्रामा है, दिया. कुछ तो कहेंगी और करेंगी न? और हां…आप अपनेआप को थोड़ा कंट्रोल में रखो जिस से और मुश्किलें न बढ़ें तभी कोई रास्ता निकल सकेगा वरना…’’

तभी धर्म के मोबाइल की घंटी बजी.

-क्रमश:

 

इन्हें भी आजमाइए

  1. दांतों में दर्द होने पर लहसुन को कच्चा पीस कर दांतों पर रख लें, इस से तुरंत आराम मिलेगा क्योंकि लहसुन में ऐंटी बैक्टीरियल तत्त्व होते हैं जो दांत पर सीधा प्रभाव डालते हैं.
  2. भारी खाना खाने के बाद एक चम्मच काला जीरा खाने से लाभ मिलता है. यह कब्ज को दूर कर पाचन क्रिया को आरामदायक बनाता है. यह पेट के कीड़ों को भी मारता है.
  3. अगर बच्चे का वजन कम है तो मलाई वाला दूध पिलाएं. अगर उसे पीने में अच्छा नहीं लगता है तो शेक बना कर दें, लेकिन उस के शरीर में मलाई पहुंचनी चाहिए.
  4. आंखों की थकान का इलाज है कैमोमाइल चाय. तुरंत राहत मिल जाएगी. यह आप की आंखों के आसपास की सूजन को कम करने में भी असरदार है.
  5. खांसी व कफ से तुरंत राहत के लिए अदरक, लहसुन और शहद का पेस्ट बनाएं और चाय में मिला कर के पिएं.
  6. कैनवस जूतों से ज्यादा बदबू आने पर एक चम्मच बेकिंग सोडा को तली में फैला दें और धो दें. इस से बदबू नहीं आएगी.
  7. अगर आप के चेहरे की त्वचा काफी तैलीय है तो मुलतानी मिट्टी का लेप लगा कर 5 मिनट के बाद धो दें.

निगाहें तुम्हारी

किनारा कहां है

सहारा कहां है

क्षितिज पर ठहरती

नहीं हैं निगाहें

समंदर की लहरें

कदम चूमती हैं…

हवा चल रही है

किसे छल रही है

झुका जा रहा है

ये मदहोश अंबर

सुवासित हवाएं

यहां झूमती हैं…

किसी ने पुकारा

मिला फिर किनारा

ये जुल्फों का साया

ये दिलकश नजारा

निगाहें तुम्हारी

मुझे चूमती हैं.

     – अहद ‘प्रकाश’

मेरे पापा

मैं बीए फाइनल की परीक्षा में फेल हो गई. मुझे इस बात का बहुत दुख हुआ और मैं बहुत रोई भी. मुझे इस बात का डर सता रहा था कि इस के लिए घर में बहुत डांट पड़ने वाली है. मेरे पापा घर आए तो उन्होंने मुझ से ये शब्द कहे, ‘‘गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में, वो तिफ्ल क्या गिरे जो घुटनों के बल चले,’’ पापा के मुंह से उन की यह बात सुन कर मैं नए सिरे से पढ़ाई में लग गई और अच्छे नंबरों में पास हो कर दिखाया.   

उषा वधावन, अमृतसर (पंजाब)

*

मेरे पापा मुझे और मेरे छोटे भाई को बहुत चाहते थे. बात मेरे विवाह की है. मेरे विवाह वाले दिन हमारे घर से 3 घर छोड़ कर एक महिला की मृत्यु हो गई थी. यह सुन कर पापा ने बरात का बैंडबाजा, घर का संगीत आदि रुकवा दिया और सुबह जल्दी ही मेरी विदाई करवा दी. आज इस बात को 26 साल हो गए लेकिन आज भी लोग इस बात को याद कर के उन की प्रशंसा करते नहीं थकते. पापा की ऐसी और भी कई बातें हैं जिन्हें याद कर के हम अपनेआप को गौरवान्वित महसूस करते हैं. पापा की तरह धैर्यवान, सरल स्वभाव और ईमानदार व्यक्ति मैं ने आज तक नहीं देखा.

मीता श्रीवास्तव, रायबरेली (उ.प्र.)

*

बात 1980 की है. मेरे पापा शिक्षा विभाग में पोस्टग्रेजुएट टीचर के पद पर कार्यरत थे. मैं गंगटोक के एक पब्लिक स्कूल में चौथी कक्षा का छात्र था. होली पर्व के पश्चात शिष्टाचारवश पापा शिक्षा निदेशक से मिलने के लिए गए. शिक्षा निदेशक ने पापा से कहा था, मि. सिंह, शिक्षा विभाग आप के नाम का प्रस्ताव डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन औफिसर के लिए करना चाहता है परंतु एक शर्त होगी कि आप को गंगटोक छोड़ कर किसी अन्य जनपद में जाना होगा. निदेशक ने पापा से मुझे तत्कालीन स्कूल के छात्रावास में रखने का अनुरोध भी किया था. पापा ने निदेशक को धन्यवाद दिया. साथ ही पापा ने उन से कहा था, ‘‘सर, यदि आप मेरे लिए इतने उदार हैं तो मेरे पुत्र के कक्षा 12वीं उत्तीर्ण करने तक मुझे गंगटोक में ही रहने दें.’’ पापा मेरी तिब्बती भाषा के अध्ययन में कोई रुकावट नहीं चाहते थे. कारण, इस भाषा को पढ़ने की व्यवस्था केवल गंगटोक में ही थी. मैं आज सिक्किम में सिविल इंजीनियर हूं. मुझे अपने पापा पर गर्व है कि उन्होंने अपनी पदोन्नति को नहीं बल्कि प्राइमरी स्टेज से ही मेरे अध्ययन और तिब्बती भाषा के प्रति मेरे लगाव की ओर विशेष ध्यान दिया.

दीपक सिंह, गंगटोक (सिक्किम)

महायोग : 13वीं किस्त

अब तक की कथा :

आगे की योजना तैयार करने के लिए धर्म दिया को अपने घर ले आया. धर्म के घर आ कर दिया ने धर्म से पासपोर्ट दिखाने के लिए कहा. धर्म ने घरभर में पासपोर्ट तलाश कर लिया परंतु कहीं नहीं मिला. दिया को फिर से धर्म पर संदेह होने लगा. दोनों ने मशवरा किया और भारतीय दूतावास जाने का फैसला कर लिया. अब आगे…

रातभर दिया उनींदी रही. शरीर थका होने के कारण उसे बुखार भी आ गया था. धर्म का दिमाग बहुत असहज और असंतुलित सा था. कहीं ईश्वरानंद की सीआईडी तो उस के पीछे नहीं है?अचानक फोन की घंटी टनटना उठी. घबराते हुए धर्म ने फोन उठाया. दूसरी तरफ नील की मां थीं.

‘‘जी, क्या बात है, रुचिजी?’’

‘‘धर्मानंदजी, दिया को अभी यहां ले कर मत आना. नील के साथ नैन्सी भी आज यहां पहुंच गई है. बड़ी मुश्किल हो जाएगी,’’ वे काफी घबराई हुई थीं.

‘‘नैन्सी तो जानती है कि कोई मेहमान आई हुई हैं आप के यहां,’’ धर्म ने उन्हें उन के ही जाल में लपेटने का प्रयत्न किया.

‘‘आप नहीं जानते, मेरे लिए बड़ी मुश्किल हो जाएगी. आप उसे अपने पास ही रखिए. मैं आप को बताऊंगी, उसे कब यहां लाना है.’’

बेशक कुछ समय के लिए ही सही, पर धर्म व दिया के रास्ते का एक कांटा तो अपनेआप ही हट रहा था.

तेज बुखार के कारण दिया शक्तिहीन सी हो गई थी. धीरेधीरे चलती हुई वह रसोई में आ कर धर्म के पास बैठ गई.

‘‘धर्म, अब हमें एंबैसी चलना चाहिए. देर करने का कोई मतलब नहीं है,’’ दिया ने कहा.

‘‘पर दिया, तुम इस लायक तो हो जाओ कि थोड़ा चल सको. एक तो कल से तुम ने कुछ ठीक से खाया नहीं है, दूसरे, बुखार के कारण और भी कमजोर हो गई हो.’’

‘‘मुझे वहां कोई चढ़ाई थोड़े ही चढ़नी है, धर्म? एंबैसी में जल्दी पहुंच सूचित करना बेहद जरूरी है.’’

अचानक ही धर्म की दृष्टि कांच की खिड़की से बाहर गई और वह हड़बड़ा कर रसोई से निकल कर ड्राइंगरूम की ओर भागा. दिया को कुछ समझ में नहीं आ रहा था. किसी ने धीरे से दरवाजे पर खटखट की थी. आंखें खोल कर जब दिया ने इधरउधर दृष्टि घुमाई तो धर्म का कहीं अतापता नहीं था. वह डर गई. अचानक धर्म आया और  होंठों पर हाथ रख कर उस ने दिया को चुप रहने का संकेत भी किया. संकट को देखते हुए धर्म ने पुलिस को फोन कर दिया था.

एक बार फिर खटखट हुई. अब धर्म ने जा कर दरवाजा खोला व आगंतुकों को ले कर अंदर आ गया.

‘‘दरवाजा खोलने में इतनी देर क्यों हुई, धर्मानंदजी?’’

आगंतुकों में एक तो उस के चेले के समान रवींद्रानंद यानी रवि था और दूसरा पवित्रानंद, जो धर्म से काफी सीनियर था.

‘‘क्या बात है? यहां कैसे?’’ धर्मानंद ने सहज होने का प्रयास किया.

उसे शक तो था ही परंतु मन में कहीं भ्रांति भी थी कि वह ईश्वरानंद से कह कर, उन्हें बता कर आया था इसलिए शायद…

‘‘आप ने गुरुजी को इन्फौर्म भी नहीं किया? वे परेशान हो रहे हैं. आप को समझना चाहिए कि उन्हें आप की और दियाजी की कितनी चिंता है. एक तो आप कल के फंक्शन में से गायब हो गए और दूसरे…खैर, गुरुजी बहुत परेशान हो रहे हैं.’’

‘‘गुरुजी को फोन पर, इन्फौर्म कर देते,’’ रवींद्रानंद ने फिर से अपना मुंह खोला.

धर्म उसे घूर कर रह गया था.

‘‘दियाजी कहां हैं?’’ पवित्रानंद ने सपाट प्रश्न किया.

‘‘रसोई में. गुरुजी जानते हैं वे मेरे साथ हैं. फिर परेशानी क्यों?’’ धर्म ने ऊंचे स्वर में कहा कि दिया सुन सके. परंतु पवित्रानंद आंधी की भांति रसोई में प्रवेश कर गया जहां दिया आंखें मूंदे कुरसी से गरदन टिका कर बैठी थी.

‘‘दियाजी,’’ पवित्रानंद ने धीरे से, बड़े प्यार से दिया को पुकारा.

दिया चौंकी, आंखें खोल कर देखा तो अचानक घबरा कर खड़ी होने लगी. उस का चेहरा पीला पड़ा हुआ था और वह बहुत अस्तव्यस्त दिख रही थी.

‘‘अरे बैठिए, आप बैठिए, मैं पवित्रानंद,’’ उस ने दिया के समक्ष नाटकीय मुद्रा में अपने दोनों हाथ जोड़ दिए.

भय के कारण दिया को दिन में ही तारे दिखाई देने लगे थे. अचानक पवित्रानंद ने दिया के माथे पर अपना हाथ घुमाया.

‘‘अरे, आप को तो बुखार है,’’ पवित्रानंद ने उसे सहानुभूति की बोतल में उतारने की चेष्टा की.

धर्म और रवींद्रानंद भी वहां आ चुके थे.

‘‘धर्म, आप ने बताया नहीं, दियाजी बीमार हैं?’’ पवित्रानंद के लहजे में शिकायत थी.

‘‘गुरुजी जानते हैं,’’ धर्म ने ठंडे लहजे में उत्तर दिया.

दिया की समस्या अभी अनसुलझी पहेली सी बीच में लटक रही थी जिस का जिम्मेदार कहीं न कहीं धर्म स्वयं को मान रहा था.

‘‘धर्म, चलो दिया को ले चलते हैं. गुरुजी ही ट्रीटमैंट करवा देंगे,’’ अचानक पवित्रानंद ने धर्म के समक्ष प्रस्ताव रख दिया.

‘‘पर, ऐसी हालत में?’’ दिया के स्वेदकणों से भरे हुए मुख पर दृष्टिपात करते हुए धर्म ने कहा.

‘‘कुछ देर और इंतजार कर लेते हैं, फिर चलेंगे. तब तक दिया भी कुछ ठीक हो जाए शायद.’’

‘‘कम से कम गुरुजी को सूचित तो कर दें,’’ कह कर पवित्रानंद ने अपना मोबाइल निकाल कर गुरुजी से बात करनी प्रारंभ की ही थी कि किसी ने दरवाजा खटखटाया.

‘‘प्लीज, ओपन द डोर,’’ बाहर से किसी अंगरेज की आवाज सुनाई दी.

‘‘कौन होगा?’’ पवित्रानंद ने जल्दी से बात पूरी कर के मोबाइल बंद कर अपनी जेब में डाल लिया.

एक बार फिर खटखट हुई

‘‘कौन होगा?’’

‘‘मैं कैसे बता सकता हूं? खोलना पड़ेगा न,’’ धर्म आगे बढ़ा और दरवाजा खोल दिया.

‘‘पुलिस…’’ रवींद्रानंद और पवित्रानंद दोनों चौंक उठे. वे धर्म की ओर प्रश्नवाचक मुद्रा में देखने लगे.

धर्म ने मुंह बना कर कंधे उचका दिए. वह क्या जाने भला. परंतु पवित्रानंद ने भी घाटघाट का पानी पी रखा था. उस के मस्तिष्क में घंटियां टनटनाने लगी थीं.

‘‘हू इज दिया?’’ लंबेचौड़े ब्रिटिश पुलिस पुरुषों के पीछे से एक खूबसूरत महिला ने झांका.

‘‘हू इज दिया?’’ प्रश्न एक बार फिर उछला.

दिया ने अपनी ओर इशारा कर के बता दिया कि वही दिया है.

‘‘ऐंड यू?’’ बारीबारी से तीनों पुरुषों के नाम पूछे गए.

कोई चारा नहीं था. गुरुजी के प्रिय भक्तों को अपना नाम बताना पड़ा. समय ही नहीं मिला था कि वे अपने लिए कोई झूठी कहानी गढ़ पाते. धर्म ने भी अपना नाम बताया. दिया अंदर से कुछ डर रही थी. धर्म की भी पोलपट्टी अभी खुल जाएगी. पर जब पुलिस ने धर्म से कुछ पूछताछ ही नहीं की तब दिया को आश्चर्य हुआ. वह चुप ही रही. महिला पुलिस मिस एनी ने दिया को सहारा दिया और ड्राइंगरूम में ले आई. दौर शुरू हुआ दिया से पूछताछ का. दिया काफी आश्वस्त हो चुकी थी. उस ने अपनी सारी कहानी स्पष्ट रूप से बयान कर दी. साथ ही पवित्रानंद व रवींद्रानंद की ओर इशारा भी कर दिया कि विस्तृत सूचनाओं का पिटारा वे दोनों ही खोल सकेंगे. एनी के साथसाथ बाकी पुलिस वाले भी बहुत सुलझे हुए थे. पुलिस वालों ने रवींद्रानंद और पवित्रानंद के मोबाइल भी जब्त कर लिए. अब तो भक्तजनों के पास कोई चारा ही नहीं रह गया था, कैसे गुरुदेव को सूचना दी जाए? दोनों जल बिन मछली की भांति तड़प रहे थे. संबंधित विभागों को सूचनाएं प्रेषित कर दी गई थीं. अप्रत्याशित घेराव के कारण ईश्वरानंद के चेलों के चेहरे के रंग उड़ गए थे, वे एकदूसरे की लाचारी देख कर मुंह पर टेप चिपका कर बैठ गए थे. निराश्रित से बैठे रेशमी वस्त्रधारियों के श्वेत वस्त्र धीरेधीरे झूठ व बदमाशी के धब्बों से मैले होते जा रहे थे और मुख काले. उन के नेत्रों में भयभीत भविष्य की तसवीर उभर आई थी.

चारों लोगों को 2 गाडि़यों में 2-2 पुलिसकर्मियों के साथ बांट दिया गया. एक गाड़ी नील के घर के लिए व दूसरी ईश्वरानंद के आनंद में विघ्न डालने के लिए निकल पड़ी थी. पुलिस वाले आपस में वार्त्तालाप कर रहे थे. उन्हें महसूस हो रहा था कहीं यह घटना वर्षों पूर्व घटित घटना का कोई हिस्सा तो नहीं हो सकती? एनी शीघ्र ही दिया से घुलमिल गई थीं. दिया ने धर्म के बारे में भी सारी बातें एनी को बताईं तो एनी धर्म से भी बहुत सहज हो गई थीं. पुलिसकर्मियों के मन में दिया व धर्म दोनों की छवि साफसुथरी लग रही थी. पुलिस ने जो कुछ भी धर्म से पूछा उस ने बड़ी ईमानदारी से सब प्रश्नों के उत्तर दिए थे. दिया तो सबकुछ बता ही चुकी थी, रहासहा सच उस ने गाड़ी में नील के घर की ओर आते हुए उगल दिया था. एनी ने उस से बिलकुल स्पष्ट रूप से पूछा था कि वह क्या चाहती है?

दिया ने बड़े सपाट स्वर में कहा था कि वह उन सब लोगों के लिए बड़ी से बड़ी सजा चाहती है जो धर्म के नाम पर देह का व्यापार कर के उस के जैसी मासूम लड़कियों का जीवन बरबाद करने में जरा सा भी संकोच नहीं करते. न जाने उन लोगों के हाथ कितनी मासूम लड़कियों के खून से रंगे हुए होंगे. दिया ने अपने विवाह से ले कर, नील के व्यवहार, मिसेज शर्मा की दकियानूसी बातें, अपने मानसिक उत्पीड़न के बारे में विस्तारपूर्वक खुल कर एनी से बात की थी. गाड़ी में बैठेबैठे ही काउंसिल जनरल औफ इंडिया से फोन पर बात कर ली गई थी. एनी ने दिया से उस के पासपोर्ट नंबर के बारे में पूछा, दिया को नंबर याद नहीं था. धर्म के मुख से निकल गया था कि पासपोर्ट और कहीं नहीं, ईश्वरानंद की कस्टडी में ही होगा. बातों ही बातों में रास्ता जल्दी ही कट गया.

कमजोरी के बावजूद दिया अंदर व बाहर से काफी स्वस्थ महसूस करने लगी थी. एनी ने दिया की पीड़ा महसूस की और उस के कंधे पर सहानुभूति भरा हाथ रख कर उसे आश्वस्त कर दिया. कुछ देर पश्चात पुलिस ने मिसेज शर्मा के घर पर दस्तक दे दी. दरवाजे की आवाज से मिसेज शर्मा चौंक उठीं. ड्राइंगरूम में तिगड़ी जमी हुई थी. नील, नैन्सी और रुचिका यानी मिसेज शर्मा. तीनों सोफों पर जमे पड़े थे. खैर, दरवाजा खोलने वे ही आई थीं, चहकती सी. धर्मानंद को देखते ही उन की चहकन को ब्रेक लग गया, दिया भी मुंह बनाए साथ ही खड़ी थी.

‘‘धर्मानंदजी, क्या कहा था मैं ने आप से?’’ उन की स्नेहमयी मुद्रा अचानक  रौद्रमयी मुद्रा में परिवर्तित हो उठी, जैसे उन की पीठ पर चाबुक पड़ गया हो.

दरवाजे के बाहर से ही ड्राइंगरूम के दृश्य के स्पष्ट दर्शन हो रहे थे. धर्म उन की बात का कुछ उत्तर दे पाता, इस से पहले ही पुलिसवर्दी में 1 पुरुष व 1 महिला ने धर्म और दिया के पीछे से अपने गोरे मुखड़ों के दर्शन दे दिए. पुलिस वालों को देखते ही उस की रौद्रमयी मुद्रा की घिग्गी सी बंध गई. वे न तो कुछ बोल पाईं और न ही नील को पुकार पाईं. उन के पैर लड़खड़ाने लगे और वे लगभग गिरने को हुईं कि महिला पुलिस ने उन्हें अपनी मजबूत बांहों में थाम लिया और एक के बाद एक सब ने ड्राइंगरूम में प्रवेश किया, जहां प्रणय में डूबा हंसों का जोड़ा किल्लोल कर रहा था. कमरे में कदमों की आहट सुन कर हंसों का जोड़ा बिदक गया.

‘‘धर्म, ह्वाट इज दिस? ऐंड यू?’’ नील ने दिया की ओर इशारा किया.

नील का वाक्य पूरा होने से पहले ही सब लोग कमरे में प्रवेश कर चुके थे और चुपचाप नैन्सी व नील के सामने वाले सोफे पर निश्चिंतता से बैठ चुके थे. कोई कुछ भी समझ पाने की स्थिति में नहीं था. मानो कोई चलचित्र सा सब की दृष्टि के आगे चल रहा था. सब से पीछे नील की मां को थामे एसीपी एनी कमरे में पहुंच गईं और उन्होंने उन्हें एक कुरसी पर लगभग लिटा सा दिया था.

अब एनी के हाथ में दूसरे पुलिसकर्मी ने पैन और कागज देने चाहे. एनी ने उस को ही लिखने का इशारा किया और स्वयं चारों ओर का जायजा लेने लगीं.

‘‘हाऊ मैनी मैंबर्स आर हियर?’’

‘‘थ्री,’’ नील ने नैन्सी को आलिंगन मुक्त कर दिया था.

‘‘नेम आफ द मैंबर्स?’’

‘‘मिसेज रुचिका शर्मा, नील शर्मा ऐंड दिया शर्मा,’’ नील फटाफट बोल गया.

‘‘इज शी दिया?’’ पुलिसमैन ने नैन्सी की ओर इशारा कर के पूछा.

‘‘नो.’’

‘‘हू इज शी?’’

‘‘शी इज नैन्सी.’’

‘‘शी इज योर वाइफ?’’

‘‘नो, शी इज माय गर्लफ्रैंड.’’

‘‘हू इज दिया?’’

‘‘दिया, दैट गर्ल,’’ नील ने दिया की ओर इशारा किया.

‘‘हू इज शी? इज शी योर सिस्टर?’’

‘‘नो, शी इज अवर गैस्ट फ्रौम इंडिया.’’

‘‘इज शी स्टेइंग हियर?’’

‘‘यस.’’

‘‘वी वौंट टू सी हर पासपोर्ट.’’

नैन्सी का इश्क काफूर हो गया था. नील और उस की मां की सांसें रुकने लगीं. जिस धर्म पर वे लोग हमेशा अपने एहसानों की गठरी लादे रखते थे, आज उसी ने उन की पीठ पर वार किया था. मिसेज शर्मा के दिमाग में भन्नाहट भर उठी थी. तभी नील मुड़ कर फोन उठाने लगा, ‘‘नो, नो कौल प्लीज,’’ पुलिस वाले ने नील के हाथ से फोन ले लिया.

‘‘इट्स अर्जेंट,’’ नील ने कहा.

दोनों पुलिसकर्मियों ने एकदूसरे की ओर देखा और इशारों से बात कर के आखिरकार उसे फोन करने की इजाजत दे दी. वे दोनोें ही नहीं बल्कि धर्म व दिया भी जानते थे कि नील इस समय किस से बात करना चाहता है.

‘‘यस,’’ नील के डायल करते ही उधर से रोबीली आवाज आई. यह वह आवाज तो नहीं थी जो उस का उद्धार कर पाती.

उस ने फिर से कहा, ‘‘हैलो.’’

‘‘यऽऽऽ..स,’’ फिर वही भारी आवाज.

नील के मस्तिष्क को उस आवाज ने मानो ट्रैप कर लिया. माजरा क्या है? उस की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था. वह तो गुरुजी का पर्सनल फोन था जिस को उठाने की इजाजत स्वयं ब्रह्मा, विष्णु, महेश को भी नहीं थी. एक बार फिर ट्रायकरने के चक्कर में नील ने फिर से रिडायल का बटन दबा दिया.

‘‘मे आय टौक टू गुरुजी, प्लीज,’’ निहायत डरतेडरते उस ने पूछा.

‘‘नो, यू कांट,’’ फिर वही रोबीली आवाज.

‘‘हू इज दैट साइड?’’

‘‘दिस इज इंस्पैक्टर जौर्ज, हू इज देयर?’’

यह सुनते ही नील को काटो तो खून नहीं. उस के हाथ कंपकंपाने लगे. उस ने चुपचाप रिसीवर रख दिया और धर्म को घूरने लगा.उधर, नैन्सी के चेहरे पर भी हवाइयां उड़ रही थीं. कहां तो वह नील की मां को पोते का प्रलोभन दे कर उसे ब्लैकमेल करने लगी थी, कहां वह स्वयं इस पुलिसवुलिस के चक्कर में फंस रही है. 

‘‘नील, आय वौंट टू गो फ्रौम हियर,’’ नैन्सी अचानक अपना बैग समेट कर खड़ी हो गई.

‘‘नो, यू कांट गो फ्रौम हियर,’’ एनी ने बड़े स्पष्ट व सपाट स्वर में उस की बात काट दी.

‘‘बट, आय एम नौट द फैमिली मैंबर. आय एम जस्ट ए फ्रैंड औफ नील,’’ उस ने स्वयं को बरी करने का प्रयास किया.

‘‘मैम, यू आर प्रेजेंट हियर, यू कांट गो. एवरीबडी हैज टू बी पे्रेजेंट ऐट द पुलिस स्टेशन,’’ एनी ने बड़े धीरज मगर सख्ती से उसे समझाने का प्रयास किया.

‘‘बट…ह्वाय शुड आय? आय हैव नो कनैक्शन विद द फैमिली,’’ वह लगभग चीखी.

‘‘डोंट वरी, आफ्टर सम इन्क्वायरीज यू वुड बी रिलीव्ड, नो प्रौब्लम,’’ एनी ने उसे कंधों से पकड़ कर बड़े आराम से सोफे पर बिठा दिया.

नैन्सी बेचारी रोने को हो आई. खूबसूरत नैन्सी के गुलाबी मुखड़े पर बेचारगी पसर आई थी. निकलने का कोई रास्ता ही नजर नहीं आ रहा था. बुरी फंसी. भुनभुन करती हुई वह कभी नील को तो कभी उस की मां को घूरने लगी. मिसेज शर्मा का तो और भी बुरा हाल था. वे कभी दिया, कभी धर्म तो कभी नैन्सी को घूरे जा रही थीं. ‘कमाल है, ऐसे लोग भी होते हैं? अभी तो यह लड़की यहां बैठी नील से फ्यूचर प्लान डिसकस कर रही थी और अभी आय एम नौट फैमिली मैंबर हो गई. और यह धर्म का बच्चा? हाय, कितना बड़ा घाव दिया है इस बेहूदे ने. कहां तो रुचिजी, रुचिजी करता आगेपीछे घूमता रहता था और इस खूबसूरत बला के चक्कर में पड़ते ही हमें पुलिस तक पहुंचा दिया. इस की मां की बीमारी में इतनी हैल्प की और इस ने ही पीठ में छुरा घोंप दिया.’

‘‘यस, प्लीज शो दियाज पासपोर्ट,’’ एनी ने अपने असिस्टैंट से रिपोर्ट के कागज ले कर उन्हें पलटते हुए मिसेज शर्मा से कहा. मिसेज शर्मा अपनी सोच की गुफा से अचानक बाहर आ गिरीं. अब तक तो अंधेरा ही था, अब तो सामने ही इतनी गहरी खाई दिखाई दे रही थी उन्हें और उन के बेटे को. उस में कूदना ही पड़ेगा. कैसे निकल भागे? उन्होंने बेबस दृष्टि बेटे पर डाली.

‘‘मैडम, एक्च्वली…मिसिंग…’’ नील के पास और कुछ बताने का रास्ता ही नहीं था.

‘‘मिसिंग? ह्वेन? डिड यू रिपोर्ट एबाउट द पासपोर्ट?’’ पुलिस का रुख कड़ा होता जा रहा था.

‘‘दैट मस्ट बी विद धर्मानंद,’’ नील ने धर्म को लपेटने का प्रयास किया. वह जानता तो था ही कि उस की मां ने पासपोर्ट धर्म को दिया था.

एनी बहुत नाराज दिखाई दे रही थीं. पासपोर्ट के बारे में तो नील व उस की मां को भी यही मालूम था कि वह धर्म के पास है. अब? बात तो उलझती ही जा रही थी. उधर, सोफे पर बेचैनी से पहलू बदलती हुई नैन्सी अपने बचाव की फिराक में कभी नील के कान में भुनभुन करती, कभी उसे घूर कर देखती. नील बेचारा परेशान हो गया. वहां से कहीं और जा कर बैठ भी नहीं सकता था. सारे सोफे भरे हुए थे. हार कर उस ने एक बार और कोशिश करनी चाही. ‘‘प्लीज, कोऔपरेट, एवरीबडी,’’ एनी ने इशारा किया और इंस्पैक्टर ने सब को बाहर चलने का रास्ता दिखाया.

सब को पुलिस की गाड़ी में बैठने के आदेश मिले. नील की मां बेचारी और लंगड़ाने लगीं, उन के पैरों का दर्द असहनीय हो उठा. एनी ने उन्हें सहारा दे कर गाड़ी में बिठा दिया. बचारा नील, मां को घूरते हुए सोचने लगा कि उन के कारण ही वह दिया को हाथ तक न लगा पाया और अब नैन्सी भी उस के हाथों से फिसल रही है. न इधर के रहे, न उधर के. पुलिस की दूसरी गाड़ी पवित्रानंद और रवींद्रानंद को ईश्वरानंदजी के पास ले जा रही थी. दोनों की जान सांसत में थी. उन के मोबाइल भी जब्त कर लिए गए थे. पुलिस वालों ने उन से आश्रम का रास्ता दिखाने को कहा. मना करने या रास्ता न दिखाने का तो प्रश्न ही नहीं था. अचानक पवित्रानंद का मोबाइल बजा. अफसर ने मोबाइल का स्पीकर औन कर के उसे पकड़ा दिया.

‘‘अरे, कहां रह गए हैं आप लोग? दिया और धर्म मिल गए क्या?’’ ईश्वरानंद की रोबीली आवाज थी. आवाज सुन कर पवित्रानंद के चेहरे से लग रहा था कि उस के गले में किसी ने पत्थर अड़ा दिया था.

‘‘बोल क्यों नहीं रहे हो? कब आ रहे हो? धर्म और दिया साथ ही हैं न?’’

प्रश्नों का पुलिंदा खोल कर बैठ गया था ईश्वरानंद. पवित्रानंद को काटो तो खून नहीं. अफसर ने उसे उत्तर के लिए इशारा किया.

‘‘जी, हम लोग आ ही रहे हैं.’’

‘‘दिया साथ में ही है न?’’ फिर से वही प्रश्न.

पुलिस अफसर हिंदी बोलने में हिचकिचाते थे परंतु हिंदी व पंजाबी समझने में उन्हें कोई विशेष दिक्कत नहीं होती थी. पवित्रानंद को गुरुजी के कुछ ऐसे प्रश्नों के उत्तर देने के लिए बाध्य होना पड़ा जो पुलिस जानना चाहती थी. पवित्रानंद को डर था कहीं उस की बातें टेप न हो रही हों. उस ने बस इतना ही कहा, ‘‘थोड़ी देर में पहुंच रहे हैं, रास्ते में ही हैं.’’

पुलिस की गाड़ी को गलियों में घूमते हुए काफी देर हो गई थी. अफसर भन्ना उठे, उन्होंने सख्ती से कहा कि वे चुपचाप उन्हें आश्रम पहुंचा दें वरना वे कुछ और सोचते हैं. वे समझ चुके थे कि गाड़ी घुमा कर ये होशियार बंदे उन का समय बरबाद करना चाहते थे.

घबराए हुए तो थे ही दोनों. काफी देर से पुलिस को मूर्ख भी बना रहे थे. समझ गए थे कि अब यह खेल अधिक देर तक नहीं खेला जा सकता. इसलिए उन्होंने परमानंद धाम के सही मार्ग की दिशा में गाड़ी मुड़वा दी. केवल 5 मिनट बाद ही गाड़ी एक गैरेजनुमा दरवाजे के बाहर खड़ी थी.वही मुख्यद्वार, वही गैरेजनुमा बड़ा सा हौल जहां धर्म, दिया को ले कर पहली बार आया था. बिलकुल सुनसान पड़ा था वह स्थल. सुंदर, सजी हुई जगह पर कोई जीवजंतु नहीं. हां, जंतु ही तो थे वे लोग, धर्म के नाम पर झूठ और मक्कारी के ना म पर पलने वाले कीड़े. बिना मस्तिष्क का प्रयोग किए कहीं पर भी रेंग जाने वाले.

अफसरों ने दोनों भक्तों से कईकई बार गुरुजी के बारे में पूछा पर उत्तर नदारद. पवित्रानंद व रवींद्रानंद चैन की सांस ले रहे थे. उन्हें भय था कि रात के कार्यक्रम के बाद अब सब लोग अपनेअपने दैनिक कार्यों में उलझ गए होंगे और प्रतिदिन की भांति यहां पर कोई न कोई मिल ही जाएगा. ओह, बच गए, दोनों की आंखों में चमक आ गई थी. अचानक सामने वाली दीवार पर लगी गोल्डन पेंटिंग ऊपर उठी और उस में से 3-4 लोगों ने हौल में प्रवेश किया. ओह, तो यह बात है. पुलिस अफसर ने पेंटिंग के पीछे से निकलने वाले लोगों को एक ओर बिठा दिया और उन से ईश्वरानंद के बारे में पूछताछ करने लगे पर किसी ने कुछ नहीं बताया. पुलिस सभी का मोबाइल जब्त कर चुकी थी.

अफसर ने आगे बढ़ कर पेंटिंग को हिलानेडुलाने का प्रयास किया लेकिन तब तक पेंटिंग दीवार पर चिपक चुकी थी. अफसर ने वहां बैठे हुए लोगों को पेंटिंगनुमा दरवाजे को खोलने का आदेश दिया परंतु कोई टस से मस नहीं हुआ. पुलिस अफसर जौर्ज को पता चल चुका था कि नील, उस की मां, नैन्सी, धर्म व दिया आदि पुलिस स्टेशन पहुंच चुके थे. उस ने फोन कर के दिया व धर्म को भी वहां से आने वाली पुलिस फोर्स के साथ बुला लिया था. लगभग 20-25 मिनट में पुलिस की गाड़ी सब को भर कर वहां पहुंच गई थी. इन लोगों के पहुंचने तक स्थिति वैसी ही बनी हुई थी. अब पुलिसकर्मी डंडों से दीवार को बजाबजा कर अंदर जाने का मार्ग खोजने का प्रयास करने लगे थे. परंतु रहस्य था कि खुल नहीं रहा था.             

-क्रमश:

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