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शिक्षा अधिकार कानून प्राइवेट स्कूलों के ठेंगे पर

शिक्षा अधिकार कानून के तहत देश में रहने वाले गरीब बच्चों को यह अधिकार दिया गया है कि वे भी अच्छे व महंगे प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई कर सकें. साल 2009 में जब से केंद्र सरकार ने इस कानून को लागू किया उसी समय से प्राइवेट स्कूलों ने इस का विरोध शुरू कर दिया था. साल 2012 में उच्चतम न्यायालय ने इस को पूरे देश में लागू कर दिया. स्टेट औफ नेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, शिक्षा अधिकार कानून के तहत देश के प्राइवेट स्कूलों में 21 लाख सीटें कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए रखी गई हैं. इन में से 6 लाख यानी करीब 30 फीसदी केवल उत्तर प्रदेश में हैं. 24 मार्च, 2015 तक 6 लाख सीटों में से केवल 54 ही दाखिले हो सके हैं. जिस समय शिक्षा अधिकार कानून का मसौदा बना था उसी समय प्राइवेट स्कूलों की लौबी इस में ऐसे नियम बनवाने में सफल हो गई जो शिक्षा अधिकार कानून के लागू होने में बाधा बने हैं.

3 दिसंबर, 2012 को सरकार द्वारा जारी शासनादेश के नियम 6 के अनुसार, गरीब और कमजोर वर्ग के बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में प्रवेश से पहले उन के पड़ोस के सरकारी स्कूल में दाखिला दिए जाने का प्रयास किया जाएगा. अगर उन को वहां दाखिला नहीं मिलता है तो वे शिक्षा अधिकार कानून की धारा 12 के तहत प्राइवेट स्कूलों में दाखिला पा सकेंगे. यह शासनादेश शिक्षा अधिकार कानून को लागू करने की राह में बाधा बना हुआ है. शिक्षा अधिकार कानून के साथ शुरू से ही खिलवाड़ होता आ रहा है. जब इस कानून को पूरे देश में लागू किया गया तो इस का खर्च प्रदेश सरकारों से उठाने के लिए कहा गया था. इस के चलते राज्य सरकारों ने इस में रुचि नहीं ली. अप्रैल 2014 में केंद्र सरकार ने शिक्षा अधिकार कानून को सर्व शिक्षा अभियान से जोड़ दिया, जिस के बाद राज्यों का खर्च केंद्र सरकार ने अपने ऊपर ले लिया.

उत्तर प्रदेश में शिक्षा विभाग ने सब से पहले लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, आगरा, मुरादाबाद, बरेली, इलाहाबाद, गोरखपुर, फैजाबाद, मेरठ और नोएडा जैसे 11 जिलों में इस को लागू करने की शुरुआत की. इन जिलों के बेसिक शिक्षा अधिकारियों को शिक्षा अधिकार कानून के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए कहा गया. इस के लिए एक हैल्पलाइन नंबर भी दिया गया, जिस से गरीब बच्चे अपना अधिकार लेने के लिए प्राइवेट स्कूलों में दाखिला लें. 7 अप्रैल, 2015 को लखनऊ के जिलाधिकारी ने 36 बच्चों की पहली सूची जारी की. इन में से 31 बच्चों का प्रवेश लखनऊ के सिटी मोंटेसरी स्कूल की इंदिरानगर, शाखा में हो गया. प्रवेश की आखिरी तारीख 15 अप्रैल रखी गई. 8 अप्रैल को इन बच्चों के मातापिता स्कूल गए तो उन को 15 अप्रैल को आने के लिए कहा गया. जब ये लोग 16 अप्रैल को फिर स्कूल गए तो स्कूल वालों ने प्रवेश लेने से मना कर दिया. स्कूल और बच्चों के मातापिता दोनों ही अदालत की शरण में पहुंचे हैं. अदालत के फैसले तक बच्चों का भविष्य अधर में लटका है. अभ्युदय फाउंडेशन की संचालिका समीना बानो कहती हैं, ‘‘शिक्षा अधिकार कानून देश के कई राज्यों में बहुत अच्छी तरह से चल रहा है. उत्तर प्रदेश में प्राइवेट स्कूल इस कानून को लागू करने में रोडे़ अटका रहे हैं. यह गलत है. सिटी मोंटेसरी स्कूल के प्रबंधक जगदीश गांधी कहते हैं, ‘‘हमारे पास सीटें खत्म हो गई हैं तो कैसे प्रवेश दें. हमें जो परेशानियां आ रही हैं उन को ले कर ही हम अपनी बात विस्तार से कह रहे हैं. 31 बच्चों का प्रवेश केवल एक ही स्कूल में क्यों किया जा रहा है, यह समझ नहीं आ रहा है. जबकि उसी जगह पर दूसरे प्राइवेट स्कूल भी हैं.’’

गरीबअमीर बच्चों का भेदभाव

देश में शिक्षा की दोहरी प्रणाली चल रही है. एक तरफ महंगी शिक्षा देने वाले प्राइवेट स्कूल हैं जहां अमीरों के बच्चे पढ़ते हैं. ये फाइवस्टार स्कूल हैं. दूसरी तरफ सरकारी स्कूल हैं जहां पर मुफ्त में शिक्षा के साथ ही साथ खाना, किताबें और यूनीफौर्म के अलावा पढ़ने वाले बच्चों को वजीफा भी मिलता है. सरकारी स्कूलों को सुधारने के लिए सरकार जितने भी काम कर रही है, सरकारी स्कूलों की हालत उतनी ही खराब होती जा रही है. सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के भेद को खत्म करने के लिए सरकार ने शिक्षा अधिकार कानून बनाया और प्राइवेट स्कूलों से कहा कि वे अपने विद्यालय की 25 फीसदी सीटें गरीब वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित रखें. इस के लिए सरकार प्राइवेट स्कूलों को प्रति बच्चा 450 रुपए क्षतिपूर्ति देने की बात कहती है.

प्राइवेट स्कूलों को डर है कि गरीब बच्चों के साथ पढ़ने से अमीर बच्चे उन के स्कूल से अपना नाम कटा सकते हैं. इसलिए वे शिक्षा अधिकार कानून के तहत बच्चों को अपने यहां प्रवेश नहीं देना चाहते हैं. प्राइवेट स्कूलों का दूसरा तर्क है कि सरकार सरकारी स्कूल में प्रति बच्चा 2200 रुपए व्यय करती है. जब वही बच्चा प्राइवेट स्कूल में पढ़ने आता है तो उस को केवल 450 रुपए देने की बात कहती है. प्राइवेट स्कूलों ने ऐसे कई पेंच फंसा कर बच्चों को प्रवेश देने में आनाकानी की है. अभी जिन बच्चों का प्राइवेट स्कूलों की दहलीज तक जाने का साहस हुआ है उन के पीछे किसी न किसी प्रकार से स्वयंसेवी संगठन रहे हैं. अगर इन बच्चों के मातापिता को अपने आप चल कर इन प्राइवेट स्कूलों तक जाना होगा तब तो प्राइवेट स्कूल मालिक इन को स्कूल में शायद घुसने ही नहीं देंगे. जिन स्कूलों ने दबाव में आ कर गरीब बच्चों का प्रवेश शिक्षा अधिकार कानून के तहत लिया है, वहां बच्चों को तमाम परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं. गरीब बच्चों को पहली बार बडे़ स्कूलों में प्रवेश तो मिल गया पर उन के पास पढ़ाई की बुनियादी सुविधाएं, जैसे किताबें, ड्रैस नहीं हैं.

5 साल के बाद शिक्षा अधिकार कानून क ा पालन शुरू किया गया है. इस को देख कर कहा जा सकता है कि अमीरी और वर्णव्यवस्था जैसे रोडे़ शिक्षा अधिकार कानून को लागू नहीं होने दे रहे हैं. जिस दिन शिक्षा अधिकार कानून के तहत अमीर और गरीब बच्चे एकसाथ एक ही क्लास में पढ़ सकेंगे, उस दिन सही माने में शिक्षा अधिकार कानून सफल हो सकेगा.

लचर न्याय व्यवस्था

केंद्र सरकार का कहना है कि उस ने अदालतों में बकाया मामलों की गिनती घटाने के लिए सुबह व शाम को अदालतें चलाने के लिए काफी पैसा दिया है पर इस का इस्तेमाल नहीं हो रहा क्योंकि वकीलों की एसोसिएशनें इस प्रयोग को अपनाना नहीं चाहतीं. लोक अदालतों व कानूनी सहायता के लिए स्वीकृत किए गए पैसे का उपयोग नहीं हो रहा है क्योंकि वकील आमतौर पर लोक अदालतों के पक्ष में नहीं हैं. हमारी न्याय व्यवस्था असल में एक बड़ी माफिया बन गई है जिस में मुवक्किल, वकील, सरकार, अदालत सब भरभर कर पैसा बना रहे हैं. अदालतों में मामले यदि बकाया रहते हैं तो कुछ तड़पते हैं तो ज्यादातर लोग मौज करते हैं. अदालतों में तारीखें देने पर खूब पैसा बनता है. सर्वोच्च न्यायालय तक में मामले की जल्दी या देर से सुनवाई के लिए हेराफेरी हो सकती है. सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने मार्च 15 में एक मामले में इस बारे में फटकार लगाई भी थी. निचली अदालतों में तो न जाने क्याक्या होता है.

मामला लटका रहे तो वकीलों की बनती है. हर थोड़े दिन पर तारीख पड़ती है. दोनों तरफ के वकील बिना कुछ किए फीस लेते हैं जबकि सुनवाई होती नहीं. अदालत में जाने वाले मुंह लटका कर लौटते हैं. सरकार को भी मजा रहता है. सरकारी कारिंदे मामला दायर कर घर बैठ जाते हैं और सरकारी वकील उन का काम करते रहते हैं, पिसता है नागरिक. सरकार जानती है कि नागरिक थकहार जाएगा, इसलिए सरकारी आदमी पहले से लेदे कर फैसला करने का हक रखता है. यदि अदालतों में मामले सही समय पर निर्णायक हो जाएं तो भ्रष्टाचार 5 प्रतिशत ही रह जाए और यह स्थिति सरकार, वकीलों, अदालतों आदि के लिए भयावह है. इसीलिए, वे अदालतों का सुधार नहीं चाहते.

केंद्र सरकार का कहना है कि सुबहशाम की अदालतों के स्वीकृत 2,500 करोड़ रुपए में से 234 करोड़ रुपए इस्तेमाल हुए, लोक अदालतों के लिए स्वीकृत 300 करोड़ रुपए में से 65 करोड़ रुपए, जजों के प्रशिक्षण पर 400 में से 157 करोड़ रुपए, न्यायिक एकेडमी पर 300 में से 17 करोड़ रुपए और अदालतों के मैनेजरों पर 300 में से 37 करोड़ रुपए ही खर्च हुए. कुल स्वीकृत 5,000 करोड़ रुपए में से 930 करोड़ रुपए ही खर्च किए गए. सवाल पैसे की कमी का नहीं, सवाल उस पैसे का है जो जनता के जरिए न्याय व्यवस्था और शासन व्यवस्था की जेब में जाता है, जो लाखोंकरोड़ों का है.

स्मार्ट सिटी : कब और क्यों?

नरेंद्र मोदी की सरकार स्मार्ट सिटीज बनाने की बात कर रही है. इस के पीछे किसानों की जमीन छीनने और बिल्डर लौबी को खुश करने की बात छोड़ दें तो भी सवाल उठता है कि स्मार्ट सिटीज होंगी कैसी? क्या वे आज के शहरों से अलग होंगी? शाहजहांबाद के बाद अंगरेजों ने जब नई दिल्ली बनाई थी तो वह स्मार्ट सिटी ही थी पर अब उस में क्या स्मार्टनैस बची है? कनाट प्लेस, राजपथ, खान मार्केट ऊपर से कितने ही अच्छे लगें, जरा सी परत के पीछे झांकेंगे तो आम शहरों की तरह लगेंगे.  मुफ्त की जमीन थी तो सड़कें चौड़ी जरूर हैं पर क्या मकानों, सड़कों, पानी, सीवर, सफाई आदि का इंतजाम अच्छा है?चंडीगढ़ और गांधीनगर भी नए शहरों की तरह बसाए गए पर आज क्या उन में स्मार्टनैस बची है?

 कुछ शहरों में जबरन लोगों को अवैध निर्माण नहीं करने दिया जा रहा, फिर भी लोग कर ही लेते हैं. नए शहरों में कोनों पर गुमटियां बन गई हैं. गलियों में कूड़े के ढेर हैं. सड़कें टूटी हैं. ट्रैफिक लाइटें गायब हैं. अगर अमीरों के इलाके अच्छे लगते हैं तो शहरों में, नई दिल्ली व चंडीगढ़ में भी, गंदे इलाकों की भरमार है. दरअसल, स्मार्ट सिटी चल ही सकती है गंदे इलाकों पर जहां सेवा करने वालों को भेड़बकरियों (गायों की तरह नहीं, वे तो माता हैं) की तरह गंदी बस्तियों में रहने को मजबूर कर दिया जाता है. हर स्मार्ट सिटी के स्मार्ट इलाकों में जितने लोग रहते हैं उन से कई गुना ज्यादा लोग गरीब इलाकोें में रहेंगे. अगर उन गरीबों के पास पैसा न होगा तो वे छोटे मकानों, खंडहरों, टीनटप्परों में रहेंगे. चाहे जितनी कोशिश कर लो, स्मार्ट सिटी को जिंदा रखने के लिए बड़ेबड़े गरीब इलाके बनाने ही होंगे.

कुछ देशों ने स्मार्ट सिटी की सेवा करने के लिए 50-60 किलोमीटर की दूरी पर सेवा देने वालों की बस्तियां बसाई हैं ताकि वे 2 घंटे लगा कर आएं, 8-10 घंटे स्मार्ट सिटी वालों की सेवा करें और फिर 2 घंटे लगा कर लौट जाएं अपनी गंदी बस्तियों में. यह कोई स्मार्ट बात नहीं है, अमीरों के लिए गरीबों को लूटना है. स्मार्ट सिटी तब बन सकती है जब पूरे देश में विकास हो रहा हो, सब के हाथ में अतिरिक्त पैसा आ रहा हो. सब अमीर हो रहे हों. मेहनत कर के जो पैसा मिले वह इतना हो कि साफसुथरा मकान मिल सके, शहर के पास पैसा हो कि वह साफसफाई करा सके, ट्रैफिक लाइटें ठीक हों, सड़कें मजबूत हों, सीवर सिस्टम काम कर रहे हों. देश में कुछ स्मार्ट सिटीज बनाने की बात कम्युनिस्टी सोच है जो दिखाने के लिए कुछ शहरों को आकर्षक बनाते थे. यह तो लोकतंत्र है और लोकतंत्र में यह नहीं चलेगा. अगर स्मार्ट सिटीज बन भी गईं तो उन को खराब किए जाने या उन के खराब होने में समय न लगेगा.

संशोधन पर पैंतरेबाजी

भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन पर पैंतरेबाजी और तीखी हो गई है क्योंकि अब राहुल गांधी ने कांगे्रस के विरोध की कमान संभाल ली है. उन्होंने 20 अप्रैल को लोकसभा में सूटबूट वाली सरकार को आड़े हाथों लिया. उन्होंने मोदी सरकार को उद्योगपतियों व अमीरों की सरकार बता कर उसे कठघरे में खड़ा कर दिया. भूमि अधिग्रहण कानून 2013 में संशोधन का प्रस्ताव रख कर नरेंद्र मोदी सरकार ने एक बवंडर खड़ा कर दिया और चाहे वह कानून बन भी जाए, मगर हर इंच जमीन लेने पर उसे उस हायहत्या के लिए तैयार रहना होगा जो ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के सिंगूर में टाटा की फैक्टरी की जमीन को ले कर की थी या मेधा पाटेकर ने सरदार सरोवर बांध को ले कर की थी.

भारतीय जनता पार्टी चाहे जितना कहती रहे कि नया संशोधन विकास का मंत्र फूंकेगा, लेकिन वास्तव में वह ऐसा है नहीं. असल में उस के द्वारा दावा किया जा रहा वाला विकास किसानों की छाती रौंद कर होगा और उस का लाभ शहरी निवासियों व उद्योगपतियों तक ही सीमित रहेगा. यह तर्क कि इस कानून से शहरीकरण बढ़ेगा और गरीबों को मकान मिलेंगे, बिलकुल बेकार है. अगर शहरीकरण कराना है तो हर किसान को इजाजत दे दो कि वह गेहूं बोए या मकान बोए, उस की जमीन है, वह जो चाहे करे. पर नहीं, तब सरकारें स्टैंप ड्यूटी, चेंज इन यूज (इस्तेमाल के बदलाव), एनओस (अनापत्ति प्रमाणपत्र) के नाम पर बीच में आ जाती हैं. अगर शहरी सरकारी अफसर या बिल्डर किसान की जमीन पर मकान बना सकता है तो किसान खुद क्यों नहीं? उसे इजाजत दो, शहरीकरण खुदबखुद हो जाएगा, बिना अधिग्रहण के.जहां बात उद्योग लगा कर नौकरियां पैदा करने की है, तो किसान को छूट दो कि वह खेती करे या फैक्टरी लगाए. तब सरकार इजाजत देने या न देने वाली कौन है? अगर मुनाफा होगा तो किसान खुद मुनाफा कमा लेगा. वह वही काम करेगा जि स में उसे लाभ होगा.सरकार तो अपने हाथ पक्के करने चाहती है, लड़कालड़की की शादी में व्यर्थ में पंडा बन कर मोदी दक्षिणा कमाना चाहते हैं. देश के विकास के लिए किसान की बलि क्यों दे रहे हो, सरकारी अफसरों की, नौकरशाही की बलि दे कर देखो, 1991-95 की  तरह देश चमकने लगेगा.

जरूरत है सरकारी दखल कम करने की, चाहे वह खेती पर हो या शहरों पर. न पटवारी, न नंबरदार, न तहसीलदार, न थानेदार चाहिए और न कर इंस्पैक्टर, न कंपनी रजिस्ट्रार, न स्टैंप ड्यूटी अफसर. ये विकास को रोक रहे हैं. सुशासन में इन का योगदान 10 प्रतिशत भी नहीं है, 90 प्रतिशत काम ये नागरिकों को रोकने का करते हैं. भूमि अधिग्रहण कानून नहीं, शासकीय अधिकार अधिग्रहण कानून की जरूरत है. लेकिन उसे चाहता कौन है? न नेता, न अफसर, न अमीर.

नेपाल में प्रकृति का प्रकोप

नेपाल में भयंकर भूकंप से हुई मौतों और तबाही से साफ है कि अब नई तकनीक को अपनाना जरूरी हो गया है क्योंकि मानव को यदि सुरक्षा चाहिए तो प्रकृति को पूरी तरह समझना होगा और उस से निबटने की तैयारी करनी होगी. कठिनाई यह है कि भूकंप के बाद पंडों ने प्रार्थना करनी शुरू कर दी और दुनियाभर में बजाय भूकंप पीडि़तों की सहायता के लिए पैसा व सामान जुटाने के, लोगों से कहा जाने लगा कि भूकंप पीडि़तों के लिए वे दुआ मांगें. प्रकृति अपना काम अपने तरीके से करती है और वह किसी काल्पनिक ईश्वर की नहीं सुनती. हिमालय के पहाड़ ढीली जमीन के बने हैं क्योंकि वैज्ञानिकों का अनुमान है कि दक्षिण भारत एक द्वीप था जो एशिया महाद्वीप की ओर ढाई करोड़ साल से हर साल 3 से 4 सैंटीमीटर की गति से बढ़ रहा है. पहले जहां समुद्र था वहीं अब हिमालय है और यह प्रक्रिया आज भी जारी है. वैज्ञानिकों के मुताबिक इस इलाके में जमीन की परतों के हिलने से भूकंप आते रहेंगे.

बजाय प्रार्थना करने के, लोगों को अब सुरक्षित मकान बनाने होंगे. इस क्षेत्र में ऐसे मकान ही बनें जो भूकंप के साधारण झटके सह सकें. अभी भी जो मकान गिरे हैं वे ज्यादा कमजोर थे और शायद बिना तकनीकी सलाह के बनाए गए थे. वरना तो पूरा इलाका ही ध्वस्त हो जाता. भूकंपों से लड़ने के लिए दुनियाभर में कोशिशें की जानी होंगी. मानव जब चांद और मंगल पर पहुंच सकता है, पहाड़ों को लांघ सकता है, समुद्र में सुरंगें बना सकता है तो भूकंपों से क्या डरना? तकनीक है पर उसे खुल कर अपनाना होगा. बजाय यह सोचें कि भूमिपूजन कर लिया तो सब भला होगा, यह सोचा जाए कि कैसे मुकाबला करना होगा प्रकृति की मार से. भूकंप ही नहीं, आंधी, तूफान, आग, सुनामी, बाढ़ सब से निबटना आज आदमी को आता है पर बहुत लोग अपनेआप ढिलाई करते हैं और चार पैसे बचाने के लिए खुद को व दूसरों को खतरों में डालते हैं. इन से निबटने के लिए सरकार का डंडा नहीं, लोगों में समझ पैदा करनी होगी. आज का मानव सुरक्षित है तो विज्ञान व तकनीक के सहारे. अफसोस यह है कि मंदिर उस भगवान के बनते हैं जो है ही नहीं और उस विज्ञान को ‘टेकेन फौर ग्रांटेड’ लिया जाता है जो जीवन में नई जान डाल रहा है. वैज्ञानिकों को केवल अच्छा मजदूर समझा जाता है जबकि नेताओं, अभिनेताओं, खिलाडि़यों और पुजारियों की पूजा होती है जो न भूकंपों के बारे में जानते हैं और न कुछ करना चाहते हैं. अगर जीवन और सुरक्षित करना है तो समाज को चाहिए कि वह उन वैज्ञानिकों को आदर व सम्मान दे जो समाज को कुछ दे रहे हैं, प्रकृति की ताकतों से लड़ना सिखा रहे हैं, जान बचा रहे हैं.

अवार्ड वाला सिनेमा

फिल्मों की 2 तरह की श्रेणियां बनती जा रही हैं. पहली जो मेडिकोर विषय पर बनी आम मसाला फिल्में हैं, जिन्हें मास सिनेमा भी कहते हैं, आसानी से रिलीज हो जाती हैं और करोड़ों कमा डालती हैं. दूसरी श्रेणी में आर्ट या कहें औफबीट फिल्में आती हैं जो आर्थिक तंगी के बावजूद बनती हैं. ऐसी फिल्में बमुश्किल रिलीज होती हैं लेकिन अवार्ड खूब बटोरती हैं. हाल में फिल्म ‘बेयरफुट टू गोआ’ भी इसी श्रेणी में शामिल हो गई. मजेदार बात यह है कि इसे क्राउड फंडिंग यानी लोगों से चंदा मांग कर रिलीज किया गया है. अच्छी बात यह है कि सिनेमा के शौकीन ऐसी फिल्मों को प्रोत्साहित करने के लिए सिर्फ जबान ही नहीं, बल्कि अपनी जेबें भी ढीली कर रहे हैं.

विश्वरूपम टू उत्तमा विलेन

कमल हासन दक्षिण भारत में काफी पौपुलर स्टार हैं. वे चाहें तो वहां के लोकप्रिय मसाला डोसा सिनेमा में मसरूफ रह सकते हैं लेकिन उन्हें फिल्मों में चुनौतीपूर्ण प्रयोग करने की आदत अरसे से लगी है. उन की पिछली फिल्म विश्वरूपम को जहां मुसलिम संगठनों का देशव्यापी विरोध झेलना पड़ा था वहीं उन की लेटेस्ट फिल्म उत्तमा विलेन हिंदू संगठन वीएचपी के निशाने पर आ गई है. हर बार की तरह इस बार धर्म की भावनाएं आहत होने की नौटंकी रची जा रही है. ऊपर से तुर्रा यह कि वीएचपी के साथ विरोध के सुर में सुर मिलाने के लिए मुसलिम संगठन भी आगे आ रहे हैं.

फिल्मों का फैमिली बिजनैस

बंगाल टाइगर अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती अभिनेता तो थे ही, नेता भी बन चुके हैं. बेहद समझदारी दिखाते हुए उन्होंने कैरियर के आखिरी दौर में ऊटी में होटल का बिजनैस खड़ा किया और वहीं पर हिंदी की बी व सी ग्रेड फिल्मों की फैक्टरी खड़ी कर दी. आर्थिक तौर पर स्थिर होते ही मिथुन बौलीवुड में फिर कायदे के रोल करने लगे. लगे हाथों बेटे मिमोह को फिल्मों में एक बार नहीं, कई बार लौंच किया लेकिन हर बार वह फेल हुआ. नाम बदल कर महाअक्षय करने से भी काम नहीं बना. इसी बीच, अपने दूसरे बेटे रिमोह को भी बतौर असिस्टैंट डायरैक्टर फिल्मी दुनिया में उतारने वाले मिथुन को शायद इस बात का एहसास नहीं है कि हीरो बनना सब के बस में नहीं होता. बेहतर होता कि वे अपनी मेहनत से कमाया पैसा फ्लौप फिल्मों के बजाय कहीं और लगाते. यहां तो नुकसान ही नुकसान दिख रहा है.

फटा पोस्टर निकला डायरैक्टर

अब तक तो फिल्मों के पोस्टर फाड़ कर हीरो ही बाहर निकलते आए हैं लेकिन अब डायरैक्टर कुणाल कोहली भी हीरो बनने का सफर पूरा कर चुके हैं. आमिर खान के साथ फिल्म ‘फना’ और सैफ अली खान के साथ ‘हम तुम’ बना चुके कुणाल चाहते तो अपनी आगामी फिल्म ‘फिर से’ में किसी बड़े स्टार को कास्ट कर सकते थे लेकिन इस बार वे अपनी फिल्म में हीरो बन कर आ रहे हैं. ट्रैंड बदल रहा है, साथ ही सिनेमा में प्रयोग भी हो रहे हैं. लेकिन करोड़ों रुपए दांव पर लगा कर अगर सिर्फ हीरो बनने का शौक पूरा करने के लिए फिल्म बनाई जा रही है तो कहीं मामला उलटा न पड़ जाए. वैसे अभी तक हीरो तो सफल निर्देशक बने हैं लेकिन निर्देशकों को सफल हीरो बनते कम देखा गया है. उम्मीद है यह पूर्वाग्रह टूटेगा.

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