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…और ऐसे टीम इंडिया बन जाएगी नंबर-1 टी-20 टीम

टीम इंडिया ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ वनडे सीरीज तो गंवा चुकी है लेकिन टी-20 सीरीज में उसके पास इस हार का बदला लेने का मौका जरूर होगा. टीम इंडिया 26 जनवरी से शुरू तीन मैचों की टी-20 सीरीज में अगर क्लीन स्वीप कर लेती है तो वो टी-20 की नंबर-1 टीम बन जाएगी.

टीम इंडिया अगर तीनों मैच जीतती है तो उसके मौजूदा 110 प्वॉइंट के बजाय 120 प्वॉइंट हो जाएंगे और वह रैंकिंग में टॉप पर पहुंच जाएगी. ऑस्ट्रेलिया के ऐसी स्थिति में 118 के बजाय 110 प्वॉइंट रह जाएंगे और वह आठवें स्थान पर खिसक जाएगा.

अगर भारत 2-1 से जीत दर्ज करता है तो ऑस्ट्रेलिया छठे नंबर पर खिसक जाएगा और भारत सातवें नंबर पर रहेगा. भारत अभी आठवें नंबर पर है जबकि ऑस्ट्रेलिया दूसरे नंबर पर है. वेस्टइंडीज और श्रीलंका के भी ऑस्ट्रेलिया के बराबर 118 प्वॉइंट हैं लेकिन कैरेबियाई टीम दशमलव की गणना में पहले और श्रीलंका तीसरे स्थान पर है.

दूसरी तरफ ऑस्ट्रेलिया को टॉप पर पहुंचने के लिए केवल सीरीज में जीत की दरकार है. अगर ऑस्ट्रेलिया 2-1 से जीत दर्ज करता है तो उसके 120 प्वॉइंट हो जाएंगे जबकि 3-0 से जीत से ऑस्ट्रेलिया के 124 और भारत के 103 प्वॉइंट रह जाएंगे.

भारत अगर हारता है तब भी आठवें नंबर पर बने रहेगा क्योंकि नौवें नंबर की टीम अफगानिस्तान के 80 प्वॉइंट हैं. इस बीच न्यूजीलैंड दक्षिण अफ्रीका और पाकिस्तान को पीछे छोड़कर पांचवें स्थान पर पहुंच गया है. पाकिस्तान के खिलाफ 2-1 की जीत से न्यूजीलैंड को दो प्वॉइंट मिले जबकि पाकिस्तान को एक प्वॉइंट का नुकसान हुआ.

इसके उलट बांग्लादेश स्कॉटलैंड से पीछे 11वें स्थान पर खिसक गया है. उसने जिम्बाब्वे के खिलाफ सीरीज 2-2 से बराबर कराईइ थी. जिम्बाब्वे को चार प्वॉइंट मिले और वह 14वें स्थान पर बना हुआ है. टॉप पर काबिज वेस्टइंडीज और आठवें नंबर के भारत के बीच केवल आठ प्वॉइंट्स का अंतर है और ऐसे में मार्च-अप्रैल में होने वाली आईसीसी टी-20 चैंपियनशिप में कोई भी टॉप पर काबिज टीम चैंपियन बन सकती है.

आईसीसी टी-20 खिलाड़ियों की रैंकिंग में विराट कोहली टॉप 10 में शामिल अकेले बल्लेबाज हैं. वह ऑस्ट्रेलिया के एरोन फिंच (854 प्वॉइंट) के बाद दूसरे स्थान पर हैं. कोहली के 845 प्वॉइंट हैं. आर अश्विन ने भी 681 प्वॉइंट के साथ गेंदबाजों की लिस्ट में अपना दूसरा स्थान बनाए रखा है. वेस्टइंडीज के सैमुअल बद्री (751 प्वॉइंट) टॉप पर काबिज हैं.

भारतीय कप्तान के रूप में धोनी के दिन खत्म: चैपल

आस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान इयान चैपल का मानना है कि महेंद्र सिंह धोनी भारत की सीमित ओवरों के कप्तान के रूप में जरूरत से ज्यादा समय तक बने रह गये हैं और इसका भारतीय टीम पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है.

चैपल ने कहा है, कप्तानों का प्रभाव कुछ निश्चित समय तक होता है जिसके बाद टीम के प्रदर्शन पर उनका प्रभाव खत्म हो जाता है और और उनकी उपस्थिति से टीम को नुकसान पहुंचता है. महेंद्र सिंह धोनी इस स्थिति में कुछ समय पहले पहुंच गये थे. वर्तमान भारतीय टीम को नये विचारों और उत्साह की सख्त जरूरत है. जब विरोधी टीम चार वनडे पारियों में लगभग 1300 रन बना रही हो तो इसके लिये केवल सपाट पिचों और लचर गेंदबाजी को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है.

उन्होंने कहा, मनुका ओवल में जहां उन्होंने रविंद्र जडेजा को मिशेल मार्श पर हावी होने के लिये कहा, तो उसे छोड़कर धोनी अपने गेंदबाजों को खास प्रेरित नहीं कर पाये. यह सही है कि वे अच्छी गेंदबाजी नहीं कर पाये लेकिन गेंदबाज क्षेत्ररक्षण की सजावट से भी प्रेरित नहीं थे.

चैपल का मानना है कि भारत के टेस्ट कप्तान विराट कोहली टीम में नया जोश ला सकते हैं जैसा कि वह लंबी अवधि के प्रारूप में साबित कर चुके हैं. उन्होंने कहा, ऐसा नहीं है कि भारत के पास विकल्प नहीं है. विराट कोहली ने खुद को आक्रामक कप्तान साबित कर दिया है और वह बल्लेबाजी में भी शानदार फार्म में है.

चैपल ने कहा, जब धोनी ने शुरूआत की थी तो वह सभी प्रारूपों में बेहद चतुर कप्तान थे और उन्हें खूब सफलताएं मिली. लेकिन जब कोई कप्तान अपने समय से अधिक पद पर बना रहता है तो उसका टीम पर गलत प्रभाव पड़ता है.

तो क्या सलमान-कैटरीना एक साथ मनाएंगे वेलेंटाइन डे

काफी दिनों से रणबीर और कैटरीना के ब्रेकअप की ख़बरें मीडिया की सुर्ख़ियों में बनी हुई थी. जहां एक ओर रणबीर कैटरीना के अलग होने की ख़बरें आ रही थी वहीं दूसरी ओर कैटरीना और उनके एक्स बॉयफ्रेंड सलमान खान को एक बार फिर से साथ देखे जाने की ख़बरें आ रही थी.

सलमान खान बिग बॉस 9 को होस्ट कर रहे हैं. कैटरीना कैफ अपनी आगामी फिल्म 'फितूर' के प्रमोशन के लिए बिग बॉस के फिनाले में पहुंची थी. कैटरीना अभिषेक कपूर की आगामी फिल्म 'फितूर' में आदित्य कपूर के साथ अहम किरदार में नजर आएंगी. कश्मीर घाटी की लव स्टोरी और प्यार को पाने के लिए एक युवा के फितूर को इसमें दिखाया गया है.

कैटरीना आदित्य कपूर और अभिषेक कपूर के साथ 'फितूर' के प्रमोशन के लिए बिग बॉस में पहुंची थी. सूत्रों के मुताबिक कहा जा रहा था कि सलमान शो के दौरान रणबीर और कैटरीना के ब्रेकअप पर सवाल जरूर करेंगे लेकिन सलमान ने ऐसा नहीं किया. जबकि चालाक सलमान अपनी एक्स गर्लफ्रेंड कैटरीना कैफ से उनके वैलेंटाइन डे के प्लान के बारे में जानकारी प्राप्त कर रहे थे.

दरसअल बात ये हैं की फितूर 12 फरवरी को रिलीज हो रहीं हैं जिस बात पर सलमान ने शो के दौरान कमेंट किया की मेरा कोई वैलेंटाइन डे पर प्लान नहीं है तो मैं तो फिल्म देखने जरूर जाऊंगा,उन्ही के साथ खड़ी तब्बू ने इस बात पर चुटकी लेते हुए कहा की मेरा भी वैलेंटाइन पर कोई प्लान नहीं है. उसके बाद लाइन में आदित्य कपूर खड़े थे जिन्होंने कहा मेरा कुछ पक्का नहीं है हो भी सकता यहां उनका इशारा श्रद्धा कपूर की तरफ था हम सभी इसी बात को जानते हैं.

इसके बाद कैटरीना कैफ जब तक की कुछ रणबीर के साथ वैलेंटाइन प्लान के बारे में बताती उनके एक्स बॉयफ्रेंड सलमान खान ने जलन के मारे टॉपिक ही बदल दिया. सलमान ने फैंस को 12 फ़रवरी को फिल्म देखने के लिए अपील की.

अब इस मॉडल के साथ डेट कर रहे हैं राहुल महाजन

बिग बॉस और फिर अपने स्वयंवर के जरिए चर्चा में आए राहुल महाजन को अब नई हमसफर मिल गई है. डिम्पी महाजन को तलाक देने के बाद एक साल से तन्हा जिंदगी गुजार रहे राहुल इन दिनों एक मॉडल के साथ क्वालिटी टाइम बिता रहे हैं.

खबरों की मानें तो अमृता नाम की एक मॉडल और एक्ट्रेस के संग डेटिंग कर रहे हैं. गौरतलब है कि राहुल ने एक साल पहले डिम्पी महाजन से तलाक ले लिया था और डिम्पी ने भी एक बिजनेसमैन से शादी कर नई जिंदगी की शुरुआत कर ली थी. 

टीवी शो स्वयंवर से अपनी अलग पहचान बनाने वाले राहुल महाजन ने बीते साल पत्नी डिम्पी महाजन से तलाक लिया है. इसके बाद डिम्पी ने भी दुबई के एक बिजनेसमैन से शादी कर अपने नए सफर की शुरुआत कर दी थी.

अब खबरे सामने आ रही हैं कि राहुल इन दिनों मॉडल और एक्ट्रेस अमृता माने को डेट कर रहे हैं. राहुल इससे पहले भी दो शादियां कर चुके हैं. हालांकि उनकी दोनों शादियां कामयाब नहीं रहीं. अगर अब राहुल अमृता से शादी करते है,  तो उनकी यह तीसरी शादी होगी. खबरों के अनुसार राहुल-अमृता की मुलाकात केरल में एक शूटिंग के दौरान हुई. जहां वह एक हिन्दी-तमिल फिल्म में काम कर रहे हैं. सेट पर दोनों दोस्त बने.

जिसके बाद से दोनों ने एक दूसरे को डेट करना शुरु कर दिया. राहुल टीवी के बहुत सारे रियलटी शो में भाग भी ले चुके हैं. राहुल हमेशा से ही अपने रिलेशनशिप को लेकर चर्चा में रहे है. राहुल अपने बेबाक अंदाज से भी सुर्खियां बटोरते रहते हैं.

मांझी के लिए अवार्ड न मिलने पर नवाजुद्दीन को मलाल नहीं

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने फिल्म 'मांझी' और 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' में शानदार अभिनय के बावजूद अवार्ड न मिलने पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की है. नवाजुद्दीन का कहना है कि ''व्यावसायिक अवार्ड शो में उनकी फिल्म को अगर अवार्ड नहीं मिलता तो उससे उनको कोई फर्क नहीं पड़ता.''

अधिकतर अवॉर्ड शो के दौरान 'बजरंगी भाईजान', 'पीकू' और 'बाजीराव मस्तानी' जैसी फिल्मों को सराहा गया. नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने फिल्म 'मांझी' में दशरथ मांझी का किरदार निभाया था. इस फिल्म में दशरथ मांझी अपने गांव को सड़क तक मिलाने के लिए अकेले पूरा पहाड़ काटता है. इस फिल्म ने दर्शकों के दिल को जीत लिया था. हालांकि अवार्ड्स के मामले में मांझी कमाल नहीं कर पाई. मांझी को एक भी अवार्ड न मिलने पर नवाजुद्दीन बहुत नाराज हैं. नवाजुद्दीन सिद्दीकी हाल ही में 22nd Lions Gold Awards में नजर आए, वहां उनसे पूछा गया कि क्या आपको इस बात का कोई दुःख नहीं है?

इसपर बहुत प्यार से जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि  ''व्यावसायिक अवार्ड शो में उनकी फिल्म को अगर अवार्ड नहीं मिलता तो उससे उनको कोई फर्क नहीं पड़ता. जिसको अवार्ड मिलता है वह खुश होता है जिसको नहीं मिलता है वह उदास हो जाता है. यही दुनिया की रीत है.'' जिस अवार्ड फंक्शन में नवाजुद्दीन पहुंचे थे उन्होंने उस अवार्ड फंक्शन के बारे में कहा कि ये फंक्शन मेरे लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां सिर्फ उन लोगों को फिल्मों को चुना गया है, जिन्होंने वास्तव में अपने अभिनय से लोगों का दिल जीता है और मैं इस बात से बहुत खुश हूं.

 Lions Gold Awards के सिवा मुझे और किसी भी अवार्ड फंक्शन में मेरी फिल्म 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' के लिए अवार्ड से नहीं नवाजा गया. मेने उस फिल्म में फैजल खान का जो किरदार निभाया वह बहुत प्रतिष्ठित किरदार हैं. अब मुझे मेरी फिल्म मांझी के लिए Lions Gold Awards में  अवार्ड दिया जा रहा है जो किसी भी और अवार्ड शो में नहीं मिला.

केतन मेहता का कहना है कि फिल्म व्यापारिक लिहाज से ज्यादा कमाई नहीं कर पाई, लेकिन नवाजुद्दीन और राधिका के अभिनय ने लोगों को फिल्म देखने पर मजबूर कर दिया था. आखिर में नवाजुद्दीन ने कहा मुझे नाम और शोहरत से कोई फर्क नहीं पड़ता में बस एक अच्छा अभिनेता बनना चाहता हूं.

हाईवे प्रोजेक्ट: किसानों को मिलेगा अधिक मुआवजा

हाईवे प्रोजेक्ट के लिए अपनी जमीन छोड़ चुके किसानों को नए भूमि अधिग्रहण कानून के तहत अधिक मुआवजा मिलेगा, बशर्ते कि उन्हें पुराने कानून के तहत मुआवजा दिया जाना बाकी हो. इस कदम से करीब 2,000 मामलों में फंसी करोड़ों रुपए के प्रोजेक्ट को सिरे चढ़ाने में मदद मिलेगी. सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने हाल ही में घोषणा की है, कि सरकार किसानों को अधिक मुआवजा देने पर विचार कर रही है और साथ ही उन्हें हिस्सेदारी देने पर भी विचार कर रही है.

एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, मंत्रालय ने एनएचएआई, एनएचआईडीसीएल और अन्य को ऐसे मामलों में जहां मुआवजे पुराने कानून के तहत निर्धारित किए गए, लेकिन भूमि मालिकों को मुआवजे का भुगतान नहीं किया गया है, नए कानून के तहत मुआवजा बढ़ाने का निर्देश दिया है. यह व्यवस्था उचित मुआवजा का अधिकार एवं भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्भुगतान कानून, 2013 के प्रावधानों के तहत की गई है.

उन्होंने कहा कि यह निर्णय उन किसानों पर भी लागू होगा जिनके मुआवजे एक जनवरी, 2015 से पूर्व निर्धारित किए गए थे, किंतु अधिग्रहित भूमि का कब्जा नहीं लिया गया है. मंत्रालय ने भारत के अतिरिक्त महाधिवक्ता पिंकी आनंद से इस पर कानूनी राय मांगी है.

सरकार ने रेट्रोस्पेक्टिव क्लॉज के तहत मुआवजे की परिभाषा को भी बदल दिया है. पुराने बिल के मुताबिक अगर संबंधित व्यक्ति को मिलने वाला मुआवजा उसके खाते में नहीं भी गया है और सरकार ने अदालत में या सरकारी खाते में मुआवजा जमा करा दिया है तो उसे मुआवजा ही माना जाएगा.

अब मेट्रो स्टेशनों पर होगी सामान की डिलीवरी

फरवरी से दिल्ली मेट्रो के विभिन्न स्टेशन ई कामर्स पोर्टलों के लिए टर्मिनल के रूप में भी काम करेंगे. ये आनलाइन रिटेल कंपनियां अपने ग्राहकों को चुनिंदा स्टेशनों पर उत्पाद की आपूर्ति का विकल्प देंगी, ताकि वे अपनी सुविधा के अनुसार वहां से अपना सामान ले सकें. यह सुविधा गुड़गांव और नोएडा समेत 10 स्टेशनों पर उपलब्ध होगी.

इस व्यवस्था से उन्हें सुविधा होगी जो आनलाईन खरीद करते हैं लेकिन आम तौर आर्डर प्राप्त करने के लिए वे घर पर नहीं होते हैं. अब वे पोर्टल से कह सकते हैं कि उनके सामानों की आपूर्ति तय मेट्रो टर्मिनल पर करें जहां से वे यात्रा के दौरान अपना सामान प्राप्त कर सकें.

दिल्ली मेट्रो रेल कार्पोरेशन (डीएमआरसी) के एक अधिकारी ने कहा कि क्रेडिट या डेबिट कार्ड के जरिए आपूर्ति पर भुगतान का विकल्प भी उपभोक्ताओं को प्रदान किया जाएगा. यह सुविधा गुड़गांव और नोएडा समेत 10 स्टेशनों पर उपलब्ध होगी.

इस सुविधा के लिए जिन स्टेशनों का चुनाव किया गया है उनमें मेट्रो की व्यस्त लाइनों पर मौजूद एमजी रोड, हुडा सिटी सेंटर, नोएडा सेक्टर -18, लक्ष्मी नगर, वैशाली, नेहरू प्लेस, द्वारका सेक्टर-9, कश्मीरी गेट, राजीव चौक और जीटीबी नगर स्टेशन शामिल हैं. मेट्रो के एक अधिकारी ने कहा, यह ई- रिटेल कंपनियों के ग्राहकों को आखिरी गंतव्य पर आपूर्ति की सुविधा संबंधी पहल है. जो डीएमआरसी के लिए आय अर्जित करने का जरिया होगा क्योंकि हम ऐसे खोके, कियोस्क बनाने के लिए जगह प्रदान करेंगे.

 

बिन पुस्तक सब सून

आज का युवा कल का भविष्य है, लेकिन इस युवा की दशा और दिशा गढ़ने वाले स्कूलकालेज आज स्वयं ही प्रश्न के दायरे में हैं. पिछले कई सालों से देखा जा रहा है कि छात्र कालेज जाते ही नहीं हैं. क्लासरूम में छात्रों की उपस्थिति मात्र 15 से 20% देखी गई है. इस से भी बड़ी दुख व चिंता की बात यह है कि भविष्य के इन सृजनकर्ताओं के हाथों में सृजन संसार के निर्माण में सहायक किताबों की भूमिका ही गायब है. किताबों की जगह मोबाइल ने ले ली है.

स्कूलकालेजों में युवाओं के हाथों से किताबें धीरेधीरे दूर होती जा रही हैं. यहां तक कि कई स्थानों पर छात्र परीक्षाएं भी बिना किताबों के ही दे रहे हैं. कहने को तो  वे बड़ीबड़ी डिग्रियां हासिल कर रहे हैं, नौकरियां भी पा रहे हैं लेकिन चिंता की बात यह है कि भले ही हाथ में बड़ी डिग्रियां हों, लेकिन किताबों का साथ छूटता जा रहा है. अब उन के हाथ में एक कौपी और गाइड होती है. टैक्स्ट बुक को न पढ़ कर विद्यार्थी गाइड पढ़ना पसंद करते हैं, क्योंकि उस में सभी उत्तर भी मिल जाते हैं और मेहनत भी नहीं करनी पड़ती.

टैक्स्ट बुक से दूरी, गाइड जैसी हैल्प बुक से प्रेम के लिए जिम्मेदार भी टीचर्स और छात्र दोनों हैं. छात्र टैक्स्ट बुक पढ़ते समय अध्यापक से अच्छी हैल्पबुक की राय भी लेते हैं. कहीं टीचर्स हैल्पबुक्स बताने में पूरी रुचि दिखाते हैं तो कहीं छात्र को टैक्स्ट बुक्स पढ़ने की ही सलाह दी जाती है. जब विकल्प मौजूद हैं तो छात्र दिमाग लगाना पसंद नहीं करते. वे इन किताबों के जरिए परीक्षाएं पास तो जरूर कर लेते हैं लेकिन उन का ज्ञान नहीं बढ़ता. आगे चल कर वे ऐसे ही शौर्टकट रास्ते के द्वारा अन्य परीक्षाएं भी पास कर लेना चाहते हैं लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिलती.

किताबों से दूर क्यों भाग रहे बच्चे

आखिर छात्र किताबें क्यों नहीं पढ़ रहे हैं? इस सवाल का जवाब प्राध्यापकों को ही देना होगा. हमारे युवा किताबों से दूर क्यों हो रहे हैं? जबकि वे नेताओं के भड़काने से धरनाप्रदर्शन करने में अपनी सारी ऊर्जा खर्च कर देते हैं. लेकिन यही ऊर्जा वे पढ़ने में क्यों नहीं लगाते? अच्छी किताबें क्यों नहीं पढ़ते? आज इस बात पर चर्चा क्यों नहीं होती कि ये छात्र किताबों से विमुख क्यों होते जा रहे हैं.

वे सैल्फी लेने में इतना दिमाग लगाते हैं लेकिन उन का ध्यान किताबों की ओर नहीं जाता, आखिर क्यों? महात्मा गांधी ने भी पुस्तक को सर्वश्रेष्ठ मित्र कहा था. यह कैसी विडंबना है कि एक तरफ तो छोटे बच्चे किताबों का भारी बस्ता लिए स्कूल जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ कालेज जाने वाले छात्रों के हाथ में केवल एक नोटबुक होती है. यह किस तरह की व्यवस्था निर्मित हो रही है. उन के दिमाग में यह क्यों नहीं आता कि किताबें केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं होतीं, बल्कि ज्ञान के निरंतर विस्तार में वे अहम भूमिका निभाती हैं. उन्हें ताउम्र अपने साथ रखना चाहिए.

आप का एक जिगरी दोस्त साथ छोड़ देगा लेकिन किताबें कभी साथ नहीं छोड़तीं. ये हमेशा आप को एक रास्ता दिखाती हैं. अच्छी पुस्तकें भटकते मानव को राह दिखाती हैं. सच तो यह है कि संघर्ष के दौर में जब आदमी हारने लगता है, तब पुस्तक में प्रकाशित आत्मकथाएं, उपन्यास, जीवनियां आदि हमें राह दिखाती हैं. एक छात्र और पुस्तक का संबंध वैसा ही होता है जैसे योद्धा का तलवार से या लेखक का कलम से. आज के युवा पुस्तकालय से दूर क्यों भाग रहे हैं. उन्हें किताबें क्यों नहीं भा रहीं? कोई छात्र बिना किताब के विद्यार्थी कैसे कहला सकता है? यह कैसी बीमारी है जो हमारे छात्रों को लग रही है? इसे कैसे दूर किया जाए? इस के लिए हमारे प्राध्यापकों को ध्यान देना होगा वरना वह दिन दूर नहीं जब बिन किताब के छात्र नकल के बल पर पास होते रहेंगे और बेरोजगार घूमते रहेंगे.

हुनर की कमी

देश में आज 5 से 30 वर्ष के सिर्फ 60 फीसदी युवा हैं. लेकिन इस में केवल 35 लाख लोगों के लिए स्किल ट्रेनिंग का इंतजाम है. वहीं चीन से तुलना कर के देखें तो वहां हर साल 9 करोड़ लोग ऐसी ट्रेनिंग ले रहे हैं. सीआईआई की इंडिया स्किल रिपोर्ट 2015 के मुताबिक भारत में हर साल सवा करोड़ शिक्षित युवा रोजगार की तलाश में इंडस्ट्री के दरवाजे खटखटाते हैं. लेकिन उन में केवल 37% ही रोजगार के काबिल होते हैं. इस मामले में हमारी नींद बड़ी देर से खुली है जबकि जरमनी, जापान, कोरिया जैसे देशों ने इस के जरिए ही दुनिया पर अपना दबदबा कायम किया.

दरअसल, जिस शिक्षा प्रणाली के बल पर हम यहां तक पहुंचे हैं, वह हमें पढ़नालिखना तो सिखा देती है पर हुनरमंद नहीं बनाती? क्योंकि केवल रट्टा मार लेने मात्र से विषय में पारंगतता हासिल नहीं की जा सकती. रहीसही कसर सरकार भी पूरी कर रही है, क्योंकि स्किल ट्रेनिंग के लिए तकनीकी संस्था खोलने की वह जरूरत ही नहीं समझती, विस्तारीकरण तो दूर की बात है. सरकार का आईआईटी जैसे बड़े संस्थान खोलने पर ध्यान जरूर रहा, लेकिन छोटेछोटे तकनीकी संस्थान खोलने का उसे जरा भी खयाल नहीं आया. प्राइवेट सैक्टर को तो ऐसे संस्थान खोलने की अनुमति दी गई पर वे इतने महंगे हैं कि उन तक देश के गरीब वर्ग की पहुंच ही संभव नहीं हो पाती. सरकार को स्किल इंडिया के सपने को पूरा करने के लिए बुनियादी स्तर पर ही व्यावसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी होगी. शिक्षा उत्पादन की जरूरतों के अनुसार देनी होगी. हमें यह भी देखना होगा कि दुनिया के अन्य देशों ने अपना विकास कैसे किया. ज्ञानविज्ञान में खोज और नएनए आविष्कारों के बिना आज किसी देश के विकास की कल्पना ही नहीं की जा सकती. इस का सब से बड़ा उदाहरण जापान है जो परमाणु युद्ध में बरबाद हो गया था, लेकिन अपने कठिन परिश्रम से वह तमाम चुनौतियों का मुकाबला करते हुए फिर उठ खड़ा हुआ.

यही जज्बा हमारे युवाओं में भी होना चाहिए. युवा सरकार से, शिक्षकों से ऐसी शिक्षा व्यवस्था की पुरजोर मांग करें जिस से उन्हें व्यावहारिक ज्ञान भी मिले और तकनीक भी सीखने को मिले. बापदादा के जमाने से चली आ रही पाठ्यपुस्तकों को छात्र अपडेट करने की मांग करें.

यू टर्न लेते युवा

आज के अधिकतर युवा कैरियर की सही दिशा तलाशने में कन्फ्यूज हैं. मातापिता भी उन पर दबाव डाल कर अपना कैरियर चुनने को कहते हैं. आज के दौर में यह जरूरी नहीं कि डाक्टर या इंजीनियर बन कर ही देश की सेवा की जा सकती है, बल्कि जिस क्षेत्र में हुनर हासिल है, उस में भी पहचान हासिल की जा सकती है. पढ़ाई के दौरान या फिर नौकरी की शुरुआत करते समय एक गलत मोड़ आप के पूरे जीवन को प्रभावित कर सकता है. दूसरों को देख कर या उन से प्रभावित हो कर कदम उठाने के बजाय अगर आप खुद की पसंद को ठीक से समझते हुए उपयुक्त दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो आप के कामयाब होने की उम्मीदें कई गुना बढ़ जाएंगी. लेकिन कुछ गलत निर्णयों के कारण कभी कितने गलत परिणाम देखने को मिलते हैं.

बनारस की पूनम को उस के पापा सीपीएमटी की तैयारी कराना चाहते थे. उन्होंने नैट पर सर्च कर के कोटा में एक अच्छी कोचिंग में उस का दाखिला करा दिया. होस्टल की अच्छी व्यवस्था देख कर वे उसे होस्टल दिलवा कर घर वापस आ गए. प्रारंभ में पूनम बहुत खुश थी. लेकिन एक महीना बीततेबीतते उस का मन उचटने लगा. होस्टल की लड़कियों के साथ वह एडजस्ट नहीं हो पा रही थी. इस का असर उस की पढ़ाई पर भी पढ़ने लगा. अब वह कोचिंग में भी खोईखोई रहती थी.

होस्टल में रूमपार्टनर उसे रात को पोर्न फिल्में देखने को कहती. लेकिन वह इस का विरोध करती थी. ऐसे में उस का अन्य साथियों से झगड़ा होने लगा. उस की रूमपार्टनर हमेशा मोबाइल पर जोरजोर से गाने सुनती, जिस से वह रात को पढ़ भी न पाती. अब उसे ऐसा लगने लगा कि इस माहौल में उस की सीपीएमटी की तैयारी नहीं हो सकती. उस ने मम्मीपापा को इस की सूचना दी. पापा ने उसे समझाया कि बेटे मैं तुम्हारा होस्टल बदल दूंगा. लेकिन वह न मानी और एक दिन पापा को बिन बताए सारा सामान ले कर होस्टल से घर चली आई. मम्मी ने उसे खूब डांटा. कोचिंग का पूरे साल भर का पैसा भी बरबाद चला गया. लेकिन उस के दिमाग में तो बस एक ही धुन सवार थी कि वह अब नहीं पढ़ेगी. पढ़ाई के प्रति ही उसे घृणा पैदा हो गई.

इलाहाबाद के तुषार का वहीं एक इंजीनियरिंग कालेज में उस के पापा ने दाखिला करा दिया. पिता अपने बेटे के बेहतर भविष्य को ले कर आश्वस्त हो गए. लेकिन अभी कुछ ही दिन बीते थे कि तुषार ने पापा को रात के 1 बजे फोन किया. मम्मीपापा इतनी रात को फोन की घंटी सुन घबरा गए. तुषार ने रोते हुए कहा कि मैं अब यहां एक पल भी नहीं रहूंगा. उन्होंने उसे समझाने की कोशिश की. नईनई जगह है, पहली बार घर से दूर गए हो, धैर्य से काम लो, कुछ दिन में मन लगने लगेगा. पापा के समझाने पर तो तुषार ने मनमसोस कर कुछ दिन तो काटे, लेकिन वह बारबार मम्मी से घर वापस आने की बात कहा करता था. मम्मी भी उसे समझाती थीं कि बेटे केवल 4 साल की तो बात है, इंजीनियरिंग कर लेने के बाद तुम्हें अच्छी नौकरी मिल जाएगी और खूब पैसा कमाओगे. कुछ दिन तक तो तुषार ने मां की बात को किसी तरह मान लिया. लेकिन एक दिन उस ने ऐसा कदम उठा लिया जिस ने सभी को अचंभित कर दिया. मम्मीपापा ने एक दिन अखबार में उस का फोटो देखा जिस में लिखा था कि तुषार ने पंखे से लटक कर फांसी लगा ली. उस के मम्मीपापा तुरंत खबर मिलते ही वहां पहुंचे. तुषार के कमरे में एक सुसाइड नोट मिला जिस में लिखा था, ‘मां अब मैं तुम्हारे पास कभी नहीं आऊंगा. हमेशाहमेशा के लिए तुम से दूर जा रहा हूं.’ तुषार के मम्मीपापा ने कभी सपने में भी यह नहीं सोचा था कि उन का लाड़ला ऐसा कदम उठा लेगा.

युवाओं का दोष नहीं

ऐसा लगता है कि आज के युवा कन्फ्यूज हैं. उन्हें यह पता नहीं कि वे क्या करें? आज के युवा प्रतिभावान होने के बावजूद अपने लिए उपयुक्त कैरियर की दिशा तलाशने में कन्फ्यूज रहते हैं. वे कब किस से प्रभावित हो कर उसे रोल मौडल बना लें, कहानहीं जा सकता. उन के मन में जोश तो होता है, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि उन की सटीक पसंद क्या है. कौन सा कोर्स उन्हें भविष्य में कामयाबी की ओर ले जाएगा, उन्हें ठीक से पता नहीं होता.

ऐसे में मातापिता का यह फर्ज होता है कि उन्हें सही रास्ता दिखाएं. लेकिन अकसर गार्जियन उन पर अपने विचार जबरदस्ती थोप देते हैं. उन्हें ऐसा करने को मजबूर कर देते हैं जो वे करना नहीं चाहते. इसलिए गार्जियन को भी उन के मन की बात जाननी चाहिए और उसी के अनुसार अपनी राय देनी चाहिए. अब ऐसे में छात्र खुद के ज्ञान विस्तारीकरण के लिए किताबों पर निर्भर होते तो उन के आत्मविश्वास का लैवल भी हाई होता, क्योंकि जानकारी सदैव उत्साह ही देती है. नए विचार सोचने को देती है.

उन की भी बातें मानें

अगर आप स्वयं को खुश देखना चाहते हैं तो कुछ भी करने या पढ़ने के लिए अपने मन की बातों को समझें. यह देखें कि आप क्या करना चाहते हैं. पेरैंट्स को बच्चों से खुल कर बात करनी चाहिए, क्योंकि हो सकता है वह डर के कारण आप से अपने मन की बात न बता रहा हो. आप ने उसे पाला है तो आप से अच्छा और कोई भी नहीं, जो उस के मन की बात जान सकता हो. आज के दौर में युवा यह न सोचें कि डाक्टर या इंजीनियर, बन कर ही आप को पहचान मिल सकती है. आज के समय में जिस भी क्षेत्र में आप हुनरमंद हैं, उसी में प्रसिद्धि मिल सकती है. इसलिए हुनर को तराशने का प्रयास करना चाहिए. जब आप अपने हुनर के विपरीत जाते हैं तो सफलता आप से दूर चली जाती है. इस के लिए किताबों को अपना साथी बनाना होगा. सफलता का कोई भी शौर्टकट रास्ता नहीं होता.

नए साल में कुछ इस तरह बदलें अपना अंदाज

न्यूईयर ईव का मतलब फुल नाइट मौजमस्ती, खानापीना, डीजे पर थिरकना और 12 बजते ही एकदूसरे को शुभकामनाएं देने व मैसेज भेजने का सिलसिला शुरू हो जाता है. यहां तक कि हम न्यू ईयर के जश्न के लिए कई दिन पहले से तैयारियां शुरू कर देते हैं ताकि सैलिबे्रशन में कहीं कोई कमी न रहने पाए. हर जगह और हर स्तर पर अपनेअपने तरीके से न्यू ईयर मनाया जाता है, क्योंकि यह इंटरनैशनल फैस्टिवल जो है. कोई भी देश न्यू ईयर मनाने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ना चाहता.

आखिर हम नए साल का जश्न मनाते ही इसीलिए हैं ताकि जिस जश्न के साथ हम ने नए साल का स्वागत किया है वही उल्लास और उत्साह पूरे साल हमारे जीवन में बना रहे. न कोई दुख हमारे जिंदगी को छुए और हम हर दम यों ही चहकते रहें, लेकिन युवाओं को इस बात को समझना होगा कि न्यू ईयर का जश्न एक दिन मना कर फीका न पड़े साथ ही यह भी समझें कि आखिर नया साल है  क्या?  नए साल का मतलब नई शुरुआत, नई सोच, विचारों को नई दिशा देना है. खुद को बदल कर समाज व देश में नई क्रांति लाना है. जब हम इस बात को समझ जाएंगे तो हमें सिर्फ पहली जनवरी या फिर 31 दिसंबर की ईव पर ही जश्न मनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी बल्कि हमारे लिए हर दिन जश्न का दिन होगा. तो फिर इस बार न्यू ईयर पर जश्न के साथसाथ अपनी सोच को भी नई दिशा दें.

जश्न में न रहने पाए कमी

सब नए साल का स्वागत अपनेअपने तरीके  से करते हैं. कोई इस दिन को दोस्तों संग मनाना पसंद करता है तो कोई फैमिली के साथ. आप चाहे इस दिन को किसी के साथ भी मनाएं लेकिन फन में कमी नहीं रहनी चाहिए. साथ ही आप का मूड भी पार्टी के लिए तैयार होना चाहिए. जिस तरह ‘ये दिन न मिलेंगे दोबारा’ ठीक उसी तरह न तो 31 दिसंबर, 2015 की ईव दोबारा आएगी और न ही 1 जनवरी, 2016 की सुबह इसलिए फन में कमी न आने दें. इस के लिए पहले से ही तैयारी करनी चाहिए वरना लास्ट मूवमैंट पर तैयारी करने का मतलब है अपना मूड खराब करना.

आप पहले से ही केक और्डर कर दें ताकि 12 बजते ही केक खिला कर एकदूसरे का मुंह मीठा करवा कर उस के साथ यही कामना की जाए कि केक की मिठास की तरह ही हमारा पूरा साल, हमारे रिलेशन, हमारी दोस्ती में मिठास बरकरार रहे. खाने में भी वैराइटी ला कर पार्टी वाली फीलिंग पैदा की जाए. घर को ऐसे सजाएं जैसे दीवाली पर सजाते हैं. हो सके तो क्रिएटिव आइडियाज द्वारा पार्टी को नया लुक देने की कोशिश करें.

डीजे वाले बाबू मेरा गाना बजा दो

न्यू ईयर का जश्न हो और डीजे न हो बात कुछ जमती नहीं. युवाओं को तो आज वही पार्टी पसंद आती है जिस में डीजे हो. युवा खानेपीने से समझौता कर सकते हैं लेकिन डीजे से नहीं. 31 दिसंबर की ईव पर आप को जगहजगह डीजे लगे हुए दिख जाएंगे जिन पर थिरकने के लिए युवा आतुर रहते हैं. वे पहले से ही अपनी पसंद के गानों की कलैक्शन करनी शुरू कर देते हैं और पार्टी वाले दिन डीजे वाले बाबू से फरमाइश कर के अपनी पसंद के गाने बजवाते हैं और डीजे पर मौजमस्ती करते हैं. 5 मिनट में 12 से 15 गाने प्ले हो जाते हैं जिन पर युवाओं का नौनस्टौप थिरकना जारी रहता है. इस बीच न उन्हें खाने का होश होता है और न ही टाइम का पता चलता है. बस, मस्ती औन द फ्लोर औफ डीजे.

फिल्म देख कर करें ऐंजौय

अगर आप इस बार घर पर या फिर रैस्टोरैंट में पार्टी करने के मूड में नहीं हैं तो दोस्तों के साथ मूवी देखने का प्रोग्राम बनाएं. वहां आप को मूवी के साथसाथ दोस्तों की कंपनी को भी ऐंजौय करने का मौका मिल जाएगा. वैसे तो पेरैंट्स से लेट नाइट मूवी शोज देखने की परमिशन नहीं मिलती, लेकिन इस दिन शायद ही किसी के पेरैंट्स रोकटोक करें, क्योंकि पूरी रात चहलपहल व सेफ्टी के पुख्ता इंतजाम होते हैं. उस रात आप फुल औफ कौमेडी मूवी देखें. ऐसी फिल्म के सीन्स याद कर आप अपने आप ही बाद में भी हंसते रहेंगे. मूवी के बाद आप मस्ती करते हुए घर लौटें और फिर एसएमएस कर एकदूसरे को बधाई दें.

जश्न को न पड़ने दें फीका

युवा हर चीज का स्वागत तो करते हैं लेकिन उस को हमेशा के लिए अपनी लाइफ में कायम नहीं रख पाते, जिस से एक दिन के जश्न के बाद फिर से उन की लाइफ नीरस सी होने लगती है और वे फिर से रीफ्रैश होने के लिए किसी फैस्टिवल का इंतजार करने लगते हैं. युवाओं को यह समझना होगा कि नए साल से ज्यादा उन्हें हर पल कुछ नया करने के बारे में सोचना चाहिए जिस से उत्साह बना रहे वरना हर साल की तरह यह साल भी आ कर चला जाएगा. आप इस साल अपना लक्ष्य निर्धारित करें कि मुझे इस साल कालेज में टौप करना है या फिर इस क्षेत्र में कामयाबी हासिल करनी है चाहे इस के लिए मुझे कितनी ही कड़ी मेहनत करनी पड़े और जब आप अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेंगे तो आप को कितनी खुशी होगी इस बात का अंदाजा शायद ही आप लगा पाएं. इसलिए हर साल की तरह इस साल को अपने हाथ से न जाने दें और कोई नया मुकाम हासिल करें, जिस से आप के लिए हर दिन, हर महीना किसी जश्न से कम नहीं होगा.

समाज व देश के लिए कुछ करने का बीड़ा उठाएं

साल आता है और चला जाता है और हम ऐसे में सिर्फ यही सोचते रह जाते हैं कि यह साल भी आ कर चला गया. अगर आप चाहते हैं कि साल के अंत में आप पछताएं नहीं कि इस साल मैं ने कोई खास काम नहीं किया तो इस बार आप समाज को स्वच्छ बनाने का बीड़ा उठाएं और इस की शुरुआत अपने घर से ही करें. जहां खाया वहीं कूड़ा फेंक दिया वाली अपनी आदत को त्याग दें.

अगर आप बस या ट्रेन में ट्रैवल करते हुए कुछ खा रहे हैं तो उस का खाली पैकेट यहांवहां फेंकने के बजाय अपने बैग में रखें और अगर आप को आसपास भी कोई गंदगी फैलाता हुआ दिखे तो उसे ऐसा करने से रोकें और सफाई का महत्त्व समझाएं. यह न सोचें कि दोचार लोगों के प्रयास से कौन सा देश या समाज में सुधार हो जाएगा, क्योंकि अगर हर इंसान ऐसा सोचेगा तो कोई भी सुधार करने की पहल नहीं कर पाएगा.

देखादेखी न लें रैजोल्यूशन

नया साल आए और हम रैजोल्यूशन न लें ऐसा संभव नहीं है. युवा अपने दिमाग से नहीं बल्कि देखादेखी रैजोल्यूशंस लेते हैं जैसे अगर एक फ्रैंड ने कहा कि मैं तो इस साल एमबीए कोर्स में ही ऐडमिशन लूंगा तो दूसरा फ्रैंड भी देखादेखी एमबीए कोर्स में ही ऐडमिशन लेने का रैजोल्यूशन ले लेता है, भले ही उसे इस के लिए कितनी ही कीमत क्यों न चुकानी पड़े और परिणाम बेकार ही क्यों न हो. युवाओं को इस बात को समझना होगा कि हर व्यक्ति की कार्यक्षमता अलग होती है और यह जरूरी नहीं कि जिस कार्य में एक व्यक्ति सक्षम हो उस में दूसरा व्यक्ति भी सक्षम हो, इसलिए सोचसमझ कर व खुद का विश्लेषण करने के बाद ही कोई रैजोल्यूशन लें.

बैड हैबिट्स को कहें अलविदा

अलविदा 2014, अलविदा 2015 कहते हुए तो आप युवाओं को देख लेंगे, लेकिन कोई भी पुराने साल को विदा करते वक्त यह नहीं कहता कि हम इस साल से अपनी सारी बुरी आदतों को त्याग देंगे. इस साल की शुरुआत आप अपनी सारी बुरी आदतों को त्याग कर करें. अगर आप में हर वक्त औनलाइन रहने की बुरी आदत है तो आप उसे छोड़ें. ऐसा आप एकदम से नहीं बल्कि धीरेधीरे ही कर पाएंगे. आप खुद से वादा करें कि आप रोजाना 2-3 घंटे ही नैट से जुड़ेंगे और अगर आप का मन इस से और जुड़ने को करेगा तो आप अपने मन को समझाएंगे कि ऐसा करने से आप अपने तय लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाएंगे. ठीक इसी तरह आप अपनी अन्य बुरी आदतों को भी अपनी दृढ़इच्छाशक्ति से छोड़ें.

व्यवहार में लाएं सौफ्टनैस

अच्छे व्यवहार का जादू सिर चढ़ कर बोलता है. किसी के दिल को जीतना तो सौफ्ट व्यवहार की बदौलत ही संभव है. कड़वे व तीखे बोल वाले व्यक्ति को देख कर अकसर लोग उस से कटने की कोशिश करते हैं, इसलिए नए साल पर अपने व्यवहार में परिवर्तन ला कर लोगों के दिलों पर राज करें. इस तरह आप नए साल पर जश्न मनाने के साथसाथ कुछ ऐसा भी करें जिसे आप हमेशा याद रखें व आप को साल के अंत में पछताना न पड़े कि मैं ने हर साल की तरह इस साल को भी अपने हाथ से जाने दिया.

रकिंग : फिटनैस का नया मंत्र

दिल्ली के मयूर विहार में रहने वाला 27 वर्षीय सौरभ रोजाना सुबह एक बैग पीठ पर टांग कर घर से निकल पड़ता है. देखने से तो लगता है कि औफिस जा रहा है लेकिन उस की ड्रैस कुछ और ही बताती है. ट्रैक सूट और स्पोर्ट्स शूज पहन कर सौरभ घर से निकल पड़ता है और करीब एकडेढ़ घंटे बाद वापस भी आ जाता है. आखिर वह जाता कहां है? एक दिन सौरभ के पड़ोसी ने जब उस से पूछा तब पता चला कि वह रोजाना रकिंग के लिए जाता है. सुनने में अजीब लगने वाला यह शब्द इन दिनों फिटनैस प्रेमियों के बीच खासा प्रचलित हो रहा है. रकिंग का अर्थ है अपनी पीठ पर वजन लाद कर समूह में चलना. यह वजन कम करने में मददगार है और शरीर को मजबूती भी प्रदान करता है.

कैसे करें

रकिंग को अमूमन समूह में किया जाता है लेकिन कुछ लोग इसे अकेले भी करते हैं. एक बैग में अपनी क्षमतानुसार वजन डाल कर इसे पीठ पर टांग लिया जाता है. उस के बाद एक निश्चित दूरी  तक अपनी गति में चला जाता है. इस की तीव्रता को बढ़ाने के लिए बैग में अधिक वजन डाल सकते हैं या दूरी बढ़ा सकते हैं. कार्डियोवस्कुलर और वजन कम करने के उद्देश्य से रकिंग सप्ताह में 5-6 दिन बिना रुके आधे घंटे तक करनी चाहिए.

लाभ

वर्कआउट का एक मस्ती भरा और आसान तरीका है रकिंग. चूंकि इस में सिर्फ पैदल चलना है तो आप को किसी विशेष कौशल की आवश्यकता ही नहीं है. समूह में रकिंग करने से व्यक्ति प्रेरित होता है, बातचीत करने और हंसने का भी मौका मिलता है जो अपनेआप में एक व्यायाम है. इस से शरीर सुदृढ़ बनता है, मांसपेशियों में जंग नहीं लगता और वजन कम करने में भी मदद मिलती है. हां, यह जरूर है कि यदि आप स्ट्रैंथ ट्रेनिंग की खोज में हैं या बाइसेप्स ट्राइसेप्स चाहते हैं तो यह वेट टे्रनिंग वर्कआउट का विकल्प नहीं हो सकता. दरअसल, कुछ मांसपेशियां रकिंग के दौरान बिलकुल भी काम नहीं करतीं.

क्या चाहिए

एक बेहतरीन बैक पैक और वजन के लिए पानी भरी बोतलें, किताबें, राशन या अन्य कोई वजनी वस्तु, पीने के लिए पानी की बोतल, आरामदायक कपड़े, बेहतरीन  वौकिंग शूज और खुशमिजाज लोगों का समूह रकिंग के लिए जरूरी है.

कहां जाएं

रकिंग के लिए आप जौगिंग ट्रैक से ले कर सड़क पर भी चल सकते हैं. यदि चैलेंजिंग वर्कआउट करना है तो ऊपर जाने वाली सड़क लीजिए या ऐसी सड़क जो ऊबड़खाबड़ हो.

शरीर का पोस्चर

आप का सीधे खड़े हो कर चलना जरूरी है. आप को पीठ पर दबाव महसूस नहीं होना चाहिए. पीठ में दर्द या स्लिप डिस्क वालों के लिए यह वर्कआउट वर्जित है. सीधे खड़े हो कर अपने कंधों को रिलैक्स करने दीजिए, अपने कदम तेज करने के बजाय आराम से चलिए. पैर की उंगलियों के बजाय एड़ी के बल चलना चाहिए. जमीन पर हलके कदम रखने से जोड़ों पर दबाव कम पड़ता है.

जरूरी बातें

यदि आप के बैक पैक से आप की पीठ, गरदन या कंधों में दर्द हो रहा है, तो तुरंत वजन को कम कर लीजिए. समय के साथ वजन धीरेधीरे बढ़ा सकते हैं. वर्कआउट के बाद स्ट्रैचिंग जरूर करें. कंधों के पिछले हिस्से के लिए कुछ व्यायाम अलग से कर सकते हैं. यदि आप को कंधे, पैर, जोड़ों या अन्य किसी मांसपेशी में दर्द होने लगे तो कुछ दिन आराम करने के बाद दोबारा रकिंग की शुरुआत कर सकते हैं.          

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