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डीजे का शोरशराबा

पार्टियों में डीजे बुलवा कर देर रात तक म्यूजिक चलवाना अब शहरों तक ही सीमित नहीं है. हर गांव के नुक्कड़ पर एक बोर्ड दिख जाएगा जिस में म्यूजिक पार्टी का विज्ञापन भी होगा और नाचने वाली युवतियों के मस्त फोटो भी. गांवों में हमेशा से नाचनेवालियां आती रही हैं पर अब डीजे पूरे तामझाम, स्पीकर्स, कनसोलों, मिक्सर्स, नियौन और एलईडी लाइट्स के साथ पधारते हैं ताकि बाई ही न नाचे हर जना ठुमका लगा ले. इस में अपने आप में बुराई नहीं है पर होता यह है कि इस से पहले जम कर बोतलें खुल जाती हैं और युवक तो युवक उन के चाचाताऊ और युवतियां भी पी कर नाचने को उतावली हो जाती हैं. दिक्कत यह होती है कि हर कोई चाहता है कि उसी का मनचाहा गाना बजे, बारबार बजे, डीजे उस समय किराए पर आता है पर अपनेआप को महज भोंपू वाला नहीं समझता, आर्टिस्ट समझता है. डीजे वैराइटी बनाए रखने के लिए और मांग के अनुसार प्रैफरैंस देने के चक्कर में किसी की मांग को अनदेखा करने लगते हैं और किसी की देरी कर देते हैं. मेहमान इस पर बिगड़ जाते हैं और हाथापाई तो हो ही जाती है, गोलियां तक चल जाती हैं और जेसिका लाल जैसा मामला भी हो जाता है.

वैसे झगड़ा करने और बंदूक निकालने के लिए जरूरी नहीं कि मामला गंभीर हो. यह छोटे से मामले पर भी हो सकता है. पर जब किसी पार्टी में हो तो अफसोस होता है, मेजबान तो यही चाहता है कि सभी मेहमान खुश रहें और उस की पार्टी ऐंजौय करें पर जिद्दी पियक्कड़ अपनेआप को माइकल जैक्सन दर्शाने से नहीं मानते और न केवल स्टेज घेरे रहते हैं, डीजे को बंधक बनाने की भी कोशिश करते हैं. होना तो यह चाहिए कि पार्टी में मेजबान की चले, जिस ने डीजे का पैसा दिया वह रिक्वैस्ट करे और कोई नहीं. पार्टी में व्यवहार के तरीके सीखने नहीं होते, ये अपने आप आ जाते हैं, पर सिरफरों की कमी नहीं होती. असल में जब से पार्टियों में मौज के नाम पर पीना और नाचना शामिल हो गया है, पार्टियों का मुख्य उद्देश्य सोशलाइजिंग खत्म होने लगा है. पार्टी में म्यूजिक कानफोड़ू होगा तो कौन किस से क्या बात कर सकता है. पार्टी में आवाजें कहकहों की हों, किस्से कहानियों की हों, आपसी रोनेधोने की हों न कि डीजे के साउंड सिस्टम और उस से लड़ने वाले मेहमानों की.

लखनऊ में भी न धुल सका हैदराबाद का दाग

आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद से उत्तर प्रदेश की राजधनी लखनऊ की दूरी 14 सौ किलोमीटर के करीब है. हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के दलित छात्र रोहित वेमुला की खुदकुशी का मामला प्रधानमंत्री की लखनऊ यात्रा पर भारी पडा. उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का मैच आखिरी ‘स्लाग ओवर’ में चल रहा है. विधानसभा चुनाव के 4 साल बीत चुके हैं अब आखिरी साल चल रहा है. इस साल के अंत तक ही चुनाव की घोषणा होनी है .हर दल ने अपने अपने हिसाब से चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं.

भारतीय जनता पार्टी के लिये यह चुनाव इसलिये भी खास है क्योकि यहां से प्रधनमंत्री और गृहमंत्री सहित 73 सांसद जीत कर लोकसभा पहुंचे थे. 2014 से 2017 के बीच 3 साल के फासले में लोकसभा चुनाव के परिणाम कसौटी पर होगे. बिहार चुनाव में भाजपा के ‘सवर्णवाद’ की हवा निकलने के बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा नये समीकरण तलाश रही है. वह पिछडी जातियों के साथ दलित समीकरण को भी बनाने में लगी है.

लखनऊ यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लखनऊ में बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में हिस्सा लेने आये तो हैदराबाद के दलित छात्र रोहित की खुदकुशी पर रोष प्रगट करते अम्बेडकर विश्वविद्यालय के छात्रों ने ‘मोदी मुर्दाबाद’ और ‘मोदी वापस जाओं’ जैसे नारे लगाने शुरू कर दिये. इनमें अम्बेडकर विश्वविद्यालय के गोल्ड मेडल विजेता छात्र रामकरन और अमरेद्र आचार्य जैसे छात्र भी शरीक थे. प्रधानमंत्री को इस तरह के विरोध की आशंका पहले से थी. अपने भाषण में नरेन्द्र मोदी ने रोहित की मौत पर 2 बार मौन रह कर भावुकता पूर्वक अपनी संवेदना प्रगट की. प्रधानमंत्री ने रोहित को मां भारती का लाल बताया. यही नहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी सरकार के कामों को अम्बेडकर के सपनों से जोडने की कोशिश करते कहा कि अमेरिका में पढने के बाद भी अम्बेडकर ने भारत में काम करने का संकल्प लिया था. मोदी ने लखनऊ यात्रा में काल्विन ताल्लुकेदार कालेज में ई-रिक्शा बांटने का कार्यक्रम भी रखा था. यहां भी गरीबों से चारपाई पर आमने सामने बैठ कर बात की. इसके बाद प्रधनमंत्री मोदी अम्बेडकर महासभा के आफिस गये जहां डाक्टर भीमराव अम्बेडकर के अस्थिकलश पर पुष्प चढाये.

लखनऊ में अपने 4 घंटे के कार्यक्रम में प्रधनमंत्री मोदी ने 3 कार्यक्रमों में हिस्सा लिया. सभी जगह दलित और अम्बेडकरवाद से अपनी सरकार के कामों को जोडने का प्रयास किया. प्रधानमंत्री ने वैसे तो अपने पूरे दौरे में किसी तरह की चुनावी बात नहीं की पर कुछ न कहते हुये भी पार्टी के दलित एजेंडें को तय कर दिया. भाजपा के थिंक्स टैंक अब पार्टी के अम्बेडकरवाद की चर्चा से चुनावी तैयारी शुरू करना चाह रहे है. वैसे तो भाजपा और उसके संगठन सामाजिक समरसता और दलित उत्थान का बेहद समर्थन करते है पर उनकी कथनी और करनी का फर्क सामने दिखता है. विद्यालयों को शिक्षा का मंदिर कहा जाता है वहां पर जिस तरह की जाति और धर्म की जकडन है हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में रोहित की खुदकुशी ने उसे उजागर कर दिया है. अगर यही मायनों में देश और समाज का भला करना है तो राजनीति को जाति और धर्म के वोट बैंक से बाहर निकल कर काम करना होगा. सही मायनों में तभी बाबा साहब का सपना सकार हो सकेगा.

थिएटर को बहुत ज्यादा मिस करता हूं: वरुण शर्मा

सिनेमा में भले ही बहुत बड़ा बदलाव आ गया हो, मगर बौलीवुड के गैर फिल्मी परिवार से आने वाले लोगों के लिए दरवाजे अभी भी पूरी तरह खुले नहीं हैं. वास्तव में अभी बौलीवुड फैमिली बिजनैस ही बना हुआ है. चंद फिल्मी परिवार ही पूरी तरह से हावी हैं. ऐसे में जालंधर के एक गैर फिल्मी व उच्च शिक्षा हासिल करने वाले वरुण शर्मा का बौलीवुड में आ कर अपनी पहचान बनाना बहुत बड़ी उपलब्धि है. वे अब तक ‘फुकरे’, ‘वार्निंग’, ‘डौली की डोली’, ‘किसकिस को प्यार करूं’ के अलावा शाहरुख खान व काजोल के साथ फिल्म ‘दिलवाले’ में नजर आ चुके हैं. प्रस्तुत हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश :

आप ने अभिनय को ही कैरियर बनाने की बात कब सोची?
बचपन से ही मुझे अभिनेता बनना था. यों तो मूलत: मैं जालंधर से हूं पर मेरी स्कूली शिक्षा कसौली के द लौरेंस स्कूल, सनावर से हुई. स्कूल की पढ़ाई के ही दौरान मेरे पिता का देहांत हो गया था. इसलिए मुझे कसौली छोड़ कर चंडीगढ़ आ कर अपनी मम्मी के साथ रहना पड़ा और फिर मेरी आगे की पढ़ाई चंडीगढ़ में ही हुई.

मुझे याद है, जब मैं छोटा था, तो एक दिन फिल्म ‘बाजीगर’ देखते हुए फिल्म का यह गाना, ‘कालीकाली…’ आते ही उस पर नृत्य करने लगा था. उस वक्त मेरे मातापिता को लगा कि यह बचपना है और यह सब 2-3 माह बाद खत्म हो जाएगा, पर मेरे अंदर नृत्य व अभिनय की दीवानगी बढ़ती ही चली गई. अभिनेता संजय दत्त भी सनावर से ही पढ़े हुए हैं. हमारे स्कूल के स्थापना दिवस पर संजय दत्त मुख्य अतिथि बन कर आए थे.

मैं उन से मिलना चाहता था और उन के सामने अपनी कला को दिखाना चाहता था. इसलिए मैं ने अपने शिक्षक से प्रार्थना कर एक नाटक में छोटा सा किरदार निभाया पर संजय दत्त से कोई बात नहीं हो पाई. मैं उन से बात करने व उन से मिलने के लिए कुछ देर तक उन के पीछेपीछे चलता रहा और मैं ने तय कर लिया कि कुछ भी हो जाए अब तो मुझे यही करना है.

पर जैसा कि मैं ने पहले बताया कि पिता के देहांत की वजह से मुझे 10वीं तक की पढ़ाई पूरी करने से पहले ही जालंधर लौटना पड़ा. उस के बाद मेरी शिक्षा जालंधर और चंडीगढ़ में हुई. मैं ने फिल्म विधा में स्नातक की डिग्री ‘इंडिया थिएटर अकादमी’ चंडीगढ़ से ली. चंडीगढ़ में रहते हुए आशू शर्मा के साथ जुड़ कर थिएटर किया. फिर कुछ विज्ञापन फिल्में करने के कारण एक दिन मुंबई चला आया. अब कुछ फिल्में रिलीज हो चुकी हैं. कलाकार के तौर पर लोग मुझे भी पहचानने लगे हैं.

चंडीगढ़ से मुंबई पहुंचने के आप के अनुभव कैसे रहे?
मैं चंडीगढ़ में इंडियन थिएटर अकादमी से फिल्म मेकिंग में पढ़ाई करने के बाद आगे की ट्रेनिंग लेने और फिल्मों में अभिनय करने के मकसद से मुंबई आया था. यहां मैं ने बतौर सहायक कास्टिंग डायरैक्टर अपने कैरियर की शुरुआत की थी. मैं नंदनी श्रीकांत के साथ भी बतौर सहायक कास्टिंग डायरैक्टर के रूप में काम करते हुए ट्रेनिंग लेता रहा. मैं ने उन्हें साफसाफ बता दिया था कि मेरा मकसद अभिनय करना है पर मैं कुछ समय के लिए आप के साथ जुड़ना चाहता हूं. नंदनी श्रीकांत के साथ काम करते हुए मैं ने ‘स्टूडैंट औफ द ईयर’, ‘यह जवानी है दीवानी’, ‘एक मैं और एक तू’, मीरा नायर की फिल्म ‘लेफटिस्ट फंडामैंटलिस्ट’ और बंगला फिल्म ‘ताशेर देश’ के लिए मौडलिंग की.

कास्टिंग के दौरान मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला. क्योंकि जब एक ही स्क्रिप्ट पर 400 कलाकार अलगअलग ढंग से परफौर्म करते थे, तब कैमरे के पीछे खड़े हो कर उसे रिकौर्ड करते हुए हम बहुत कुछ सीखते थे. जब मुझे पहली फिल्म ‘वार्निंग’ मिली तब मैं ने कास्टिंग का काम करना बंद कर दिया और अभिनय में ही पूरी तरह से डूब गया. ‘वार्निंग’ की शूटिंग खत्म होते ही मैं ने ‘फुकरे’ के लिए औडिशन दिया और मेरा चयन हो गया. ‘फुकरे’ फिल्म रिलीज होने के बाद मेरी जिंदगी बदल गई.

फुकरेफिल्म रिलीज होने के बाद किस तरह से जिंदगी बदली?
‘फुकरे’ फिल्म रिलीज होने के बाद सभी को मेरा काम इतना पसंद आया कि अब मुझे औडिशन देने की जरूरत नहीं पड़ती. अब निर्देशक मुझे बुलाता है और सीधे कहानी सुनाता है. ‘फुकरे’ के बाद मैं ने अरबाज खान की फिल्म ‘डौली की डोली’ में सोनम कपूर के साथ, अब्बास मस्तान की फिल्म ‘किसकिस को प्यार करूं’ में कपिल शर्मा के साथ और अब रोहित शेट्टी निर्देशित फिल्म ‘दिलवाले’ में शाहरुख खान, काजोल, वरुण धवन, बोमन ईरानी के साथ काम किया है. लोग मेरे काम की तारीफ कर रहे हैं.

आप ने दिलवालेफिल्म की. मगर दिलवालेमें शाहरुख खान, काजोल, वरुण धवन और कृति सैनन हैं. फिल्म के प्रमोशन में भी इन्हें महत्त्व दिया गया. ऐसे में आप को खुद के लिए खतरा महसूस नहीं हुआ?
मेरा ध्यान इस तरफ गया ही नहीं. कैरियर की शुरुआत में ही काजोल और शाहरुख खान जैसे सुपर स्टार कलाकारों के साथ फिल्म का हिस्सा बनने का अवसर मिल रहा था तो इनकार करने का सवाल ही नहीं था. फिर इस में बोमन ईरानी, संजय मिश्रा, वरुण धवन सहित कई दिग्गज व प्रतिभाशाली कलाकार भी हैं.

मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही बात थी कि इन बेहतरीन कलाकारों के बीच मुझे भी अपनी प्रतिभा को दिखाने का अवसर मिलेगा. मुझे काफी कुछ सीखने को मिलेगा और दुनिया के सामने मेरी कला भी पहुंच सकेगी. इसलिए मेरे मन में कभी भी दूसरों से खुद के लिए खतरा पैदा होने वाली बात नहीं आई.

आप के अनुसार दिलवालेफिल्म क्या है?
‘दिलवाले’ एक मनोरंजक फिल्म है, जिस में रोमांस, ड्रामा, ऐक्शन, इमोशन सब कुछ है. मेरा किरदार सिद्धू का है जो बहुत फन लविंग करैक्टर है. मगर यह किरदार मेरी पहले की फिल्मों के किरदारों से काफी अलग है. पर यह गंभीर किस्म का किरदार नहीं है. यह किरदार भी फनी है, जोकि लोगों को हंसाता है. इस में मेरे साथ एक नई लड़की चेतना पांडे है, जिस के संग मेरी प्रेम कहानी है. फिल्म में सिद्धू की शादी का भी मसला है. मेरी कोशिश तो यही रही है कि मैं लोगों के चेहरे पर मुसकराहट ला सकूं. फिल्म में मेरे तमाम सीन्स शाहरुख खान, काजोल व वरुण धवन के साथ हैं. हम ने पूरे 180 दिन शूटिंग की है.

जब कोई फिल्म 180 या उस से अधिक दिन तक फिल्माई जाती है तो उस के तमाम दृश्यों पर कैंची चलने की उम्मीदें बढ़ जाती हैं. आप को डर नहीं लगा था?
मुझे इस बारे में कुछ पता नहीं. पर मुझे नहीं लगता कि फिल्म में ऐसा कोई सीन फिल्माया गया, जिसे काटने की जरूरत पड़ेगी. पहले के समय में तो कई साल तक फिल्म फिल्माई जाती थी. मैं बहुत नासमझ हूं. मैं तो अभी बौलीवुड से जुड़ा हूं. बौलीवुड की कार्यप्रणाली को समझने की कोशिश में लगा हुआ हूं. फिलहाल तो मेरे दिमाग में यही बात रहती है कि अपना काम ईमानदारी व अच्छे से करो, तो परिणाम भी अच्छे मिलेंगे.

शाहरुख खान को ले कर क्या कहेंगे?
वे बहुत बेहतरीन इंसान और कलाकार हैं, अभिनय के क्षेत्र में एक बहुत बड़ा मुकाम हासिल करने के बाद भी वे सैट पर काफी रिहर्सल करते हैं. वे अपने सहकलाकारों की भी हौसलाअफजाई करते हैं. वे सैट पर हर छोटेबड़े कलाकार के साथ घुलमिल जाते हैं. शूटिंग के दौरान वे सैट पर ही ज्यादातर मौजूद रहते हैं. उन के अंदर काम के प्रति जो पैशन है, वह बहुत कम लोगों में नजर आता है. उन्हें काम करते देख मुझे लगा कि मैं बहुत कम मेहनत करता हूं और मुझे कामयाबी पाने के लिए उन की तरह मेहनत करनी होगी.

तो क्या आप सिर्फ कौमेडी करते हुए नजर आएंगे? क्योंकि अब तक आप अपनी हर फिल्म में कौमेडी किरदार ही निभाते आए हैं?
यह सच है कि अब तक मैं अपनी हर फिल्म में कौमेडी करता आया हूं. इस बात को ले कर मुझे तमाम लोगों ने टोका भी है. कुछ लोगों ने कहा कि यदि मैं ने इसी तरह सिर्फ कौमेडी किरदार निभाए, तो एक कौमेडियन की इमेज में बंध कर रह जाऊंगा. मैं ने भी सुना है कि बौलीवुड में कलाकारों को इमेज में बांध कर रख दिया जाता है. पर हकीकत यह है कि जब मैं ने फिल्मों में काम करना शुरू किया था, तो मुझे खुद पता नहीं था कि मैं कौमेडी कर पाऊंगा.

पहले मैं थिएटर किया करता था. थिएटर पर मैं ने ‘अंधा युग’ सहित करीबन 20-25 नाटकों में गंभीर किरदार निभाए हैं. पर मैं ने पहली बार फिल्म ‘फुकरे’ में कौमेडी की थी. यहां तक कि मेरे कैरियर की पहली फिल्म ‘वार्निंग’ भी गंभीर फिल्म थी. पर ‘फुकरे’ में मेरा चूजे का किरदार इतना लोकप्रिय हो गया कि उस के बाद लोगों ने मुझे कौमेडी के लिए ही याद करना शुरू कर दिया. मैं ने सोचा कि जिस चीज को मैं दिल से कर रहा हूं क्यों न उसे आगे बढ़ाया जाए. लेकिन इस का यह मतलब नहीं है कि मैं सिर्फ कौमेडी करना चाहता हूं. मैं गंभीर, इमोशनल नैगेटिव किरदार भी निभाना चाहता हूं.

थिएटर को आप मिस करते हैं या नहीं?
थिएटर को बहुत ज्यादा मिस करता हूं. वास्तव में हमारे जैसे कलाकार मुंबई से दूर थिएटर करते रहते हैं. पर मुंबई पहुंचते ही हमारी प्राथमिकता यह होती है कि हम विज्ञापन फिल्में करते हुए रोजमर्रा के खर्च को निकालें और फिल्मों के लिए कोशिश करें. फिल्मों से जुड़ने के संघर्ष में इतना समय निकल जाता है कि थिएटर हम से दूर हो जाता है. फिल्म मिलने के बाद हम सभी उस में इस कदर व्यस्त हो जाते हैं कि थिएटर को ले कर हम कुछ सोच नहीं पाते हैं. इस की दूसरी वजह यह भी है कि नाटक करने के लिए बहुत समय देना पड़ता है. एक नाटक के लिए लगातार डेढ़ 2 माह का समय रिहर्सल के लिए देना भी चाहिए तभी उस में परफैक्शन आएगा. मगर मुंबई पहुंचने के बाद फिल्मों के चक्कर में कुछ समय के लिए थिएटर छूट जाता है. पर जब हम फिल्मों में काम करने लगते हैं, तो फिर से थिएटर शुरू किया जा सकता है. मैं फिल्मों में व्यस्त हूं. मगर 2 फिल्मों के बीच समय निकाल कर चंडीगढ़ अपने थिएटर गुरु आशू शर्मा से मिलने चला जाता हूं. उन्हीं के माध्यम से मैं नीलम मानसिंह चौधरी व अन्य रंगकर्मियों से मिला था, जिन के साथ चंडीगढ़ में रहते हुए थिएटर किया करता था. बीचबीच में चंडीगढ़ जा कर मैं आशू शर्मा के साथ किसी पुराने नाटक की रिहर्सल करता हूं, जिस से हम अपने अंदर की कला को पौलिश कर पाते हैं अन्यथा एक जैसा काम करने से बोरियत महसूस होने लगती है.

क्या यह माना जाए कि सहायक या कास्टिंग डायरैक्टर के रूप में काम करना फिल्मों में प्रवेश करने का जरिया या यों कहें कि स्टैपिंग स्टोन है?
मैं ऐसा नहीं मानता. मुझे लगता है कि जब कोई इंसान बाहर से मुंबई आता है और फिल्मों से जुड़ना चाहता है, तो उसे किसी न किसी क्षेत्र में बतौर सहायक काम करना चाहिए. क्योंकि मुंबई में पहली जरूरत होती है सुबह उठ कर घर से बाहर निकलने की. यदि आप सुबह उठ कर घर से बाहर नहीं निकलेंगे तो दिन भर घर में रहने की घुटन आप की प्रतिभा को नुकसान पहुंचाती है. बतौर सहायक ऐसी जगह काम करना चाहिए, जहां आप कुछ सीख सकें. जो लोग कास्टिंग डायरैक्टर के रूप में काम कर रहे हैं वे कभी नहीं सोचते कि शायद मेरा खुद का नंबर लग जाएगा. मेरा शुरू से मानना है कि कोई भी कलाकार खुद किसी फिल्म को नहीं चुनता है बल्कि फिल्म खुद कलाकार को चुनती है. जब मैं मुंबई आया तो यदि कास्टिंग में मुझे मौका न मिलता, तो मैं बतौर सहायक निर्देशक या फिल्म विधा के किसी अन्य क्षेत्र में काम करता, क्योंकि मैं घर पर रहने के बजाय सैट पर रहना पसंद करता हूं.

दिलवालेफिल्म देखने के बाद आप के चंडीगढ़ के दोस्तों की क्या प्रतिक्रिया रही?
देखिए, मेरे परिवार का कोई भी व्यक्ति फिल्मों से नहीं जुड़ा है. बौलीवुड में मैं किसी को नहीं जानता था, इसलिए जब मैं फिल्मों से जुड़ा तो मेरे दोस्तों को भी बड़ा आश्चर्य हुआ था. अब फिल्म ‘दिलवाले’ देखने के बाद उन का उत्साह भी बढ़ गया है. मेरे वे दोस्त जो थिएटर से जुड़े हुए हैं, उन्हें लगता है कि यदि वरुण शर्मा बौलीवुड में अपनी पहचान बना सकता है, उसे सफलता मिल सकती है तो वे भी अवश्य कुछ नया कर सकते हैं. यदि वरुण बड़े कलाकारों के साथ काम कर सकता है, तो वे भी कुछ बड़ा काम कर सकते हैं. मेरी सफलता से मेरे दोस्तों को इस बात का एहसास हो गया कि कुछ भी असंभव नहीं है.

मेरे स्कूल के कुछ दोस्तों ने कहा है कि गैर फिल्मी परिवार का एक लड़का यदि अरबाज खान की फिल्म ‘डौली की डोली’ या शाहरुख व काजोल के साथ ‘दिलवाले’ कर सकता है, तो अब कोई भी कुछ भी कर सकता है. मुझे इस बात का गर्व है कि अब मैं भी लोगों के लिए आत्मविश्वास का कारण बन सकता हूं.

आप अपने पुराने दोस्तों के संपर्क में हैं?
जी हां, मेरी राय में हर इंसान के साथ उस के वे दोस्त जरूर होने चाहिए, जोकि उसे बचपन से जानते हैं क्योंकि ऐसे दोस्तों के बारे में आप सबकुछ जानते हैं. मैं आज भी अपने ऐसे दोस्तों के संपर्क में हूं. हर दिन उन से कम से कम फोन पर तो बात करता हूं. मेरे दोस्त अपनी राय भी मेरे सामने खुल कर रखते हैं.

फिल्म दिलवालेदेखने के बाद आप की मम्मी की क्या प्रतिक्रिया रही?
वे बहुत खुश हैं. आज मैं जो कुछ भी हूं उन्हीं की वजह से हूं. जब मैं स्कूल में पढ़ाई कर रहा था तभी मेरे पिता का देहांत हो गया था. उसी के बाद मेरी मम्मी ने ही मेरी परवरिश की. मैं तो ऐसी इंडस्ट्री में आया था, जहां कुछ भी निश्चित नहीं होता, पर मुझे सफलता मिली. इस से वे खुश हैं. उन को फिल्म ‘दिलवाले’ बहुत पसंद आई. अब तो वे मेरे साथ मुंबई में ही रहती हैं. मुझे खुशी है कि मैं ने जो सपना देखा था और अपनी मम्मी से जो वादा किया था वह सब पूरा हो रहा है.

फिल्म किसकिस को प्यार करूंको देखने वालों की राय है कि इस फिल्म में आप कपिल शर्मा पर हावी रहे हैं?
मैं ऐसा नहीं मानता मगर यदि किसी को ऐसा लगा तो यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात है. सब से बड़ा सच तो यह है कि कपिल शर्मा भारत के सब से बड़े हंसाने वाले कलाकार हैं. बेहतरीन स्टैंडअप कौमेडियन हैं. वे नंबर वन ऐंकर हैं. कौमेडी का नाम आते ही सब से पहला नाम कपिल शर्मा का आता है. उन के साथ मेरी तुलना होना ही बहुत बड़ी बात है. मुझे फायदा यह हुआ कि कपिल शर्मा की जो लोकप्रियता है, उस की वजह से मैं भी लोगों के घरों तक पहुंच पाया. जिन लोगों ने मेरी ‘फुकरे’ या ‘डौली की डोली’ फिल्में नहीं देखी थीं, उन्होंने भी कपिल शर्मा की वजह से फिल्म ‘किसकिस को प्यार करूं’ में मुझे देखा और पसंद भी किया.

यानी आप भी लोगों को हंसाने में कामयाब रहे?
मैं तो एक चीज मानता हूं कि यदि हम लोगों को हंसा सकते हैं तो यह बहुत बड़ी बात है. मुझे याद है कि जब ‘किसकिस को प्यार करूं’ फिल्म की रिलीज के कुछ दिन बाद मैं ने अपना ट्विटर अकाउंट देखा तो उस में एक इंसान ने लिखा था कि उन की मां बीमार है. वे अकसर अपसैट रहती हैं और अपनी मां का दिल बहलाने के लिए घर से बाहर नहीं ले जा पाते. उन्होंने अपनी मां को लैपटौप पर फिल्म ‘किसकिस को प्यार करूं’ दिखाई. फिल्म देख कर उन की मां बहुत खुश हुईं. इस के लिए उन्होंने मेरा शुक्रिया अदा किया था.

आप को नहीं लगता कि बौलीवुड में मिथ है कि एक सफल स्टैंडअप कौमेडियन सफल कलाकार नहीं बन सकता?
देखिए, स्टैंडअप कौमेडी में कलाकार का अपना आत्मविश्वास बहुत माने रखता है. कपिल शर्मा सफल कलाकार हैं. वे बहुत मेहनत करते हैं और उन की कौमिक टाइमिंग भी बहुत अच्छी है.

सिनेमा में आ रहे बदलाव को आप किस तरह से देखते हैं?
हकीकत यह है कि अब सिनेमा का दर्शक बहुत बदल चुका है और दर्शकों की बदली हुई रुचि ने सिनेमा को बदलने पर मजबूर किया है. पहले छोटे बजट की फिल्मों के दर्शक नहीं हुआ करते थे पर अब ऐसा नहीं रहा. अब तो नए कलाकारों से सजी अच्छे कंटैंट वाली छोटे बजट की फिल्म को भी दर्शक बहुत पसंद कर रहे हैं.

अब दर्शक हर तरह की फिल्म देखना चाहते हैं. दर्शकों की रुचि में आए बदलाव की वजह से हमारे जैसे प्रतिभाशाली नए कलाकारों को काम करने का अच्छा अवसर मिल रहा है. अब उस तरह की फिल्में बन रही हैं, जिन में हमें अपने अंदर की प्रतिभा को विकसित करने का अवसर मिल रहा है.

इस के अलावा क्या कर रहे हैं?
बहुत जल्द अभिषेक डोगरा की फिल्म ‘तफरी’ की शूटिंग शुरू करने वाला हूं.

आप खुद पंजाबी हैं मगर पंजाबी फिल्में नहीं कर रहे हैं?
मैं खुद पंजाब से हूं. पंजाबी अच्छी लगती है. मैं पंजाबी और हिंदी फिल्में देखते हुए ही बड़ा हुआ हूं इसलिए मैं ने पंजाबी फिल्म ‘यारां द कैचअप’ की. वैसे भी पंजाबी सिनेमा तेजी से ग्रो कर रहा है और काफी अच्छी फिल्में बन रही हैं. मैं सोचता हूं कि साल दो साल में कम से कम एक पंजाबी फिल्म भी अवश्य करूं. मैं खुद को हमेशा पंजाबी भाषा के लोगों के साथ जोड़ कर रखना चाहता हूं. 2015 का वर्ष तो फिल्म ‘किसकिस को प्यार करूं’ और ‘दिलवाले’ में काम करते निकल गया. इसलिए पंजाबी फिल्म नहीं कर पाया जबकि मेरे पास 2 फिल्मों के औफर थे. मगर 2016 में पंजाबी फिल्में करने का मन है.                      

 

रियो ओलंपिक: क्या इस बार इंडिया लाएगा गोल्ड

भारत इस बार रियो ओलंपिक की तैयारी ज़ोर-ओ-शोर से कर रहा है और ऐसी उम्मीद है कि मैडल के मामले में लंदन ओलंपिक में मिले 6 मैडल का रिकार्ड शायद तोड़ दे और कम से कम एक गोल्ड जीत ले. लंदन ओलंपिक में भारत ने दो रजत और चार कांस्य पदक जीते थे. ये मैडल उसे निशानेबाज़ी, कुश्ती, बैडमिंटन और बॉक्सिंग में जीते थे.

टेनिस
सानिया मिर्ज़ा ने 2015 का साल जिस अंदाज़ में ख़त्म किया है उससे लगता है कि वो भारत के गोल्ड के सूखे को रियो में ख़त्म कर दें. वैसे उन्हें इस साल सफलता महिला युगल में मिली है जिसमें उनकी साथी मार्टीना हिंगिस हैं लेकिन इस सफलताओं से उनका मनोबल बहुत ऊंचा है और वो ये कमाल मिश्रित युगल में भी दिखा सकती हैं. उन्होंने अभी तक अपना पार्टनर चुना नही है. इसके पहले वो लिेंडर पेस के सात जोड़ी बना चुकी हैं.

बैडमिंटन
विश्व की नंबर दो खिलाड़ी सायना नेहवाल से रियो ओलंपिक में बहुत उम्मीदें रहेंगी. हाल ही में उनका प्रदर्शन बहुत शानदार रहा है और वह विश्व की नंबर एक खिलाड़ी भी बन गई थीं.

बॉक्सिंग
लंदन ओलंपिक में महिला बॉक्सिंग में मैरी कोम ने कांस्य पदक जीतकर सबको हैरान कर दिया था. इस सफलता ने उन्हें रातों रात स्टार बना दिया था. यहां तक कि उनके जीवन पर फ़ीचर फिल्म भी बन गई जो सफल भी रही थी. रियो ओलंपिक के बाद मैरी शायद बॉक्सिंग से सन्यास ले लें और ज़ाहिर है वो कांस्य को सोने में बदलना चाहेंगी. विजय कुमार से भी उम्मीद की जा सकती थी लेकिन वह पेशेवर बॉक्सर बन चुके हैं.

तीरंदाज़ी
भारत को 2014 एशियाई खेलों में पदक दिलाने वाली पुरुष कंपाउंड टीम और रिकर्व श्रेणी में दुनिया की नंबर एक तीरंदाज रह चुकी दीपिका कुमारी से रियो ओलंपिक में काफी उम्मीद रहेगी. तीन बार वर्ल्ड चैंपियनशिप में रजत पदक जीत चुकी और मौजूदा वर्ल्ड रैंकिंग में आठवें नंबर पर मौजूद दीपिका कुमारी इस बार महिला टीम का नेतृत्व कर रही हैं. महिला टीम में शामिल अन्य खिलाड़ियों में 2010 एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीतने वाली लक्ष्मी रानी मांझी और रिमिल बुरीउली भी शामिल हैं.

निशानेबाज़ी
भारतीय निशानेबाज़ जीतू राय ने विश्व चैंपियनशिप में रजत पदक जीत कर रियो 2016 ओलंपिक के लिये जिस तरह  क्वालिफ़ाई किया है उससे पदक की उम्मीदें जागी हैं. रियो ओलंपिक में अपनी जगह पक्की करने वाले वो पहले भारतीय निशानेबाज़ हैं. जीतू ने ग्रानाडा में 51वीं विश्व निशानेबाज़ी चैंपियनशिप में पुरुषों की 50 मीटर पिस्टल स्पर्धा में रजत पदक जीता था. वह बस थोड़े से अंतर से ही स्वर्ण पदक हासिल करने से चूक गए थे.

कुश्ती
दो बार के ओलंपिक पदक विजेता पहलवान सुशील कुमार ने गुरुवार को भरोसा जताया कि अगले साल होने वाले रियो ओलंपिक खेलों में भारत कुश्ती के साथ दूसरे खेलों में भी शानदार प्रदर्शन कर तमगे जीतेगा. सुशील का कहना है कि ‘रियो ओलंपिक खेलों के लिये हमारे पास खिलाड़ियों की जबर्दस्त टीम है. सुशील कुमार के अलावा योगेश्वर से भी काफी उम्मीदें हैं.

डिस्कस थ्रो
इस बीच भारत के शीर्ष डिस्कस थ्रोअर विकास गौड़ ने भी रियो ओलंपिक का टिकट कटा लिया. गत अप्रेल में आईएएएफ के दिशा निर्देशों में पुरुषों के डिस्कस थ्रो के लिए क्वालीफाई कट ऑफ मार्क 66 मीटर था, लेकिन आईएएएफ परिषद ने इसे घटाकर 65 मीटर करने का फैसला किया है. गौडा ने मई में जमैका आमंत्रण एथलेटिक्स टूर्नामेंट के दौरान 65 मीटर की दूरी पार की थी. जिसका लाभ उन्हें अब मिल गया. राष्ट्रमंडल खेलों स्वर्ण पदक विजेता 32 वर्षीय गौडा ने मई में किंगस्टन में 65.14 मीटर दूर तक थ्रो कर खिताब जीता था.

जहां तक हाकी का सवाल है भारत ने कुछ बेहतर प्रदर्शन तो किया है लेकिन मैडल की उम्मीद करना शायद ठीक नही होगा.

मैक्सवेल का बड़ा बयान, बोले स्वार्थी हैं भारतीय क्रिकेटर्स

ऑस्ट्रेलिया के गलैन मैक्सवेल का बल्ला तो आग उगलता ही है उनकी ज़बान भी कम आग नहीं उगलती. मैक्सवेल नतीजों की परवाह किये बग़ैर बेख़ौफ अपनी राय का इज़हार करने के लिये जाने जाते हैं.

मैक्सवेल कितने बेबाक हैं इसका अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि वह पिच, बाउंड्री लॉ और कोच डैरन लेहमैन पर अपनी बेबाक टिप्पणी के लिये विवादों में फंस चुके हैं.

मेलबर्न में 96 की जिताऊ पारी खेलने के बाद उन्होंने फिर ऐसी टिप्पणी कर दी जिससे काफी वबाल, ख़ासकर बारचीय मीडिया में, मच गया. उन्होंने कहा कि भारतीय बल्लेबाज़ जब किसी रिकॉर्ड के पास पहुंच जाते हैं तो स्वार्थी हो जाते हैं.

मैक्सवेल ने मैच के बाद प्रेस कॉंफ़्रेंस में कहा था, "वे शायद सुनिश्चित कर रहे थे कि रिकॉर्ड बन जाए. कुछ लोग रिकॉर्ड्स के लिये खेलते हैं और कुछ नहीं." भारतीय मीडिया में इस बयान का ये अर्थ लगाया गया कि मैक्सवेल ने भारतीय बल्लेबाज़ों को स्वार्थी कहा.

पांचवे वनडे के पहले मैक्सवेल ने कहा कि उन्हें मालूम था कि भारतीय बल्लेबाज़ों पर उनकी टिप्पणी के बाद मीडिया हंगामा मचाएगा. मैक्सवेल ने कहा, "मुझे मालूम है, मालूम था कि हंगामा मचेगा लेकिन मैं परवाह नहीं करता."

मैक्सवेल ने विराट कोहली की चौथे वनडे में बैटिंग के बारे में बात की और इशारे में कह दिया कि जब वह (कोहली) अपने 25वें वनडे शतक के क़रीब पहुंचने लगे तो उनकी बैटिंग धीमी हो गई थी.

उन्होंने कहा, "मुझे एक तस्वीर भेजी गई. लिखा था- विराट कोहली ने 63 बॉल पर 84 रन बनाए (दरअसल उसने 61 बॉल पर 84 रन बनाए थे), और फिर 89 बॉल पर 100 रन (84 बॉल,100 रन) या शायद ऐसा ही कुछ. कोहली ने सेंचुरी पूरी करने के लिये अपने आख़िरी 11 रन 22 बॉलों पर बनाये.''

किस बात का अफसोस है आफताब शिवदसानी को..?

शुक्रवार को रिलीज हुई एडल्ट कामेडी जानर की फिल्म ‘‘क्या कूल हैं हम 3’’ के बाक्स आफिस पर सफल होने को लेकर लोग आशान्वित नहीं है. मगर लगातर कई एडल्ट कामेडी फिल्मों का हिस्सा रहे इस फिल्म में राकी का किरदार निभाने वाले अभिनेता आफताब शिवदसानी का दावा है कि इस फिल्म को हर परिवार देखना चाहेगा. सोलह साल का फिल्मी करियर होने के बावजूद वह कोई खास सफलता हासिल नहीं कर पाए हैं. पर इसके लिए वह खुद को दोषी नहीं मानते हैं. उन्हे गम है कि लोगों ने उनकी मेहनत की कद्र नहीं की. एक मुलाकात के दौरान खुद आफताब शिवदसानी ने कहा- ‘‘16 साल के करियर में काफी उतार चढ़ाव हुए. कभी खुशी कभी गम पाया. कई बार मुझे लगता कि हमने जो निर्णय लिए वह गलत थे. फिर कभी लगा कि हम अपनी तकदीर बदल नहीं सकते. हम अपना अतीत बदल नहीं सकते. पर वर्तमान और भविष्य बदल सकते हैं. इसलिए मुझे अपने किसी भी निर्णय को लेकर कोई पछतावा नही है. मुझे किसी भी फिल्म को करने का गम नही है.

मैने ‘‘अनकही’’, ‘आओ विष करे’ और ‘‘शुक्रिया’’ फिल्मों में काफी मेहनत की थी. यह फिल्में मेरे दिल के करीब थी, पर नहीं चली. यह फिल्में मेरे करियर को आगे बढ़ा सकती थी. मुझे इन फिल्मों के अफसल होने का अफसोस नहीं है. मुझे अफसोस इस बात का है कि मैं जो मेहनत करता हूं, वह लोगों को दुर्भाग्यवश दिखायी नहीं देती.’’

आफताब शिवदासानी ने खुद कुछ वर्ष पहले फिल्म ‘‘आओ विश करे’’ का निर्माण व इसमें अभिनय भी किया था. इस फिल्म की असफलता के लिए वह खुद का बचाव करते हुए कहते हैं- ‘‘इस फिल्म की मार्केटिंग व वितरण में कमी रह गयी थी. इस फिल्म का निर्माण मैने स्वयं किया था. हमने कोई कसर नहीं छोड़ी थी. उस वक्त मार्केटिंग और वितरण मेरे हाथ में नहीं था. आज की तारीख में फिल्म बनाना आसान है, पर उसे वितरित करना कठिन है. इसलिए आज फिल्मकार फिल्म का निर्माण करने से पहले आश्वस्त होने का प्रयास करता है कि उसकी फिल्म सही ढंग से रिलीज हो सकेगी. पर मैं फिल्म निर्माण से निराश नहीं हुआ. मैं पुनः फिल्म बनाना चाहता हॅूं.’’

लगातार एडल्ट कामेडी फिल्में करने पर सफाई देते हुए आफताब कहते हैं-‘‘मेरे पास जिन फिल्मों के आफर आए, उनमें से मुझे इस तरह की फिल्में सफल होने लायक लगी, इसलिए मैने चुनी. ग्रैंड मस्ती’,‘क्या कूल हैं हम 3’ जैसी एडल्ट कामेडी फिल्में एक के बाद एक आती गयी. यदि इन फिल्मों के बीच में मुझे कुछ अन्य फिल्में चुनने का अवसर मिल जाता, तो आज आप यह धारणा न बनाते कि मैं सिर्फ सेक्स या एडल्ट कामेडी वाली फिल्में ही करना चाहता हूं.

दूसरी बात इस तरह की जो धारणा होती है, वह सदैव के लिए नही होती.बौलीवुड में हर शुक्रवार को धारणा बदल सकती है. फिल्म इंडस्ट्री अंधी, बहरी या गूंगी नहीं है, उन्हे पता होता है कि इस बंदे में टैलेंट है. यह बंदा दूसरे जानर की फिल्म में भी छा सकता है. लेकिन एक मौके की जरुरत होती है. यदि ऐसा मौका मिलता रहे,तो हर शुक्रवार को लोगों की सोच व धारणा बदल सकती है.’’

फिल्म ‘‘क्या कूल हैं हम 3’’ में आफताब ने राकी का किरदार निभाया है, जो कि जिंदगी में सिर्फ मजा लेना जानता है. आफताब का दावा है कि वह निजी जिंदगी में राकी जैसे नहीं है. आफताब कहते हैं- ‘‘मैं निजी जिंदगी में राकी के ठीक विपरीत हूं. मैं निजी जिंदगी में सच्चे प्यार में यकीन करता हूं. मेरे लिए मेरा परिवार बहुत अहमियत रखता है. मेरी पत्नी ने इस फिल्म की पूरी शूटिंग देखी है. उन्हे कामेडी के तौर पर बहुत मजा आया. निजी जिंदगी में पत्नी के साथ मेरा रिश्ता ऐसा है कि मैं उनसे कुछ भी नहीं छिपाता. उनका सेंस आफ ह्यूमर कमाल का है. मेरा दावा है कि सिर्फ मेरा परिवार ही नहीं,बल्कि हर परिवार इस फिल्म को देखकर इंज्वाय करेगा.इस फिल्म में परिवार है और हमने संस्कार पर ही खेला है. यह कहना गलत होगा कि हम पार्न फिल्मों की तरफ बढ़ रहे हैं.’’ 

सोशल मीडिया को भविष्य बताते हुए आफताब कहते हैं- ‘‘मैं सोशल मीडिया पर बहुत सक्रिय हूं. यही हमारा भविष्य है. इसका पहुंच बहुत है, फिर चाहे आप इसे इंस्टाग्राम कहें या ट्वीटर कहें या फेसबुक या व्हाटसअप कहें. अब सब फोन पर चर्चा कर रहे हैं. मैं धार्मिक इंसान हूं. मैं तो कभी कभी बुद्धिजम पर ट्वीट करता हूं. सोशल मुद्दों पर ट्वीट नहीं करता. हमारा देश सामाजिक मुद्दो को लेकर कुछ ज्यादा ही संजीदा है. मैं ऐसी चीजों से दूर रहता हूं. इसके मायने यह नहीं हैं कि किसी मुद्दे को लेकर मेरी अपनी कोई राय नहीं है. मेरी अपनी राय है, लेकिन उसे सही जगह और सही समय पर ही व्यक्त करता हूं. सोशल मीडिया खुला मैदान है. कोई सेंसरशिप नहीं है. कोई कुछ भी किसी के बारे में भी लिख सकता है. यह स्वतंत्र माध्यम है, जिसके अपने फायदे और अपने नुकसान हैं.’’

क्या कूल हैं हम 3: अश्लील हरकतों, बिकनी शो का मुरब्बा

बौलीवुड भेड़चाल से कभी नहीं उभर सकता. इसका ताजातरीन उदाहरण है-‘‘क्या कूल हैं हम’’ सीरीज की तीसरी फिल्म ‘‘क्या कूल हैं हम-3’’. दो साल पहले एडल्ट कॉमेडी फिल्म ‘‘ग्रैंड मस्ती’’ ने बाक्स आफिस पर सौ करोड़ क्या कमा लिए, हर फिल्मकार को लगने लगा  है कि अब वह एडल्ट कॉमेडी के नाम पर कुछ भी परोसकर दर्शकों को मूर्ख बना सकते है और अपनी तिजोरी को भर सकते हैं.

‘‘ग्रैंड मस्ती’’ के लेखक मिलाप झवेरी ने ही फिल्म ‘‘क्या कूल हैं हम 3’’ के संवाद लिखते हुए फूहड़ द्विअर्थी संवादों की पराकाष्ठा पार कर डाली है. उपर से मिलाप झवेरी दावा करते हैं कि अब दर्शक इसी तरह की फिल्में देखना चाहते हैं. इसी के चलते अगले हफ्ते बतौर लेखक व निर्देशक अपनी फिल्म ‘‘मस्तीजादे’’ भी लेकर आने वाले हैं. 

निर्देषक उमेश घाड़गे ने पार्न कामेडी जानर के नाम पर ‘‘क्या कूल हैं हम 3’’ में पार्न इंडस्ट्री का बहुत भद्दा और गलत स्वरुप पेश किया है. उपर से फिल्म के अंत में ‘कपड़े उतारने मात्र से किसी के संस्कार गलत नहीं हो जाते’’ बात कह कर अपनी भद पिटवाली. फिल्म के अंत में उन्होने अपने किरदारो से यह वाक्य कहलवा दिया, मगर वह  इस बात को अपनी फिल्म के कथानक में नही पिरो सके. पूरी फिल्म कहानी विहीन है. फिल्म के कुछ दृश्य ऐसे हैं, जिन्हे देखकर ‘‘क्या कूल हैं हम 3’’ सीरीज की ही पिछली फिल्मों के सीन याद आ जाते हैं.

फिल्म की नायिकाओं को पूरी फिल्म में उन्होने सिर्फ बिकनी में ही पेश किया. निर्देशक  ने पूरी फिल्म में सिर्फ अश्लीलता परोसने का ही काम किया है. फिल्म में कहीं भी बेवजह गाने आ जाते हैं. कहानी न होने की वजह से बीच बीच ऐसे जोक्स या फिल्मों पर स्पूफ भर दिए गए हैं, जो दर्शकों का मनोरंजन करने की बजाय उन्हे बोर ही करते हैं. शोले या चेन्नई एक्सप्रेस जैसी फिल्मों के स्पूफ दृश्य तो अश्लीलता की सारी हदें पार कर गए हैं.

फिल्म की कहानी दो दोस्तों कन्हैया (तुषार कपूर) और राकी (आफताब शिवदसानी) की है. दोनो अपनी जिंदगी में सिर्फ खोते रहते हैं. कन्हैया को आज भी सच्चे प्यार की तलाश है. राकी को तो सिर्फ सेक्स या अश्लीलता की बाते सोचने या अश्लील हरकते करने के अलावा कुछ आता नहीं. एक दिन इनकी हरकतों की वजह से कन्हैया का पिता लेले (शक्ति कपूर), कन्हैया को घर से बाहर का रास्ता दिखा देता है. तब यह दोनों अपने पुराने मित्र मिकी (कृष्णा अभिषेक) के बुलाने पर थाइलैंड पहुच जाते हैं, जहां मिकी पार्न फिल्में बनाता रहता है.

एक दिन कन्हैया की मुलाकात शालू (मंदाना करीमी) से होती है, और उसे लगता है कि वही उसका सच्चा प्यार है. फिर शालू के पिता का आगमन और कन्हैया के परिवार के लोगों के इकट्ठे होने को लेकर कन्फ्यूजन, पुरानी फिल्मों के स्पूफ आदि के साथ हर किरदार सेक्स के पीछे भागता नजर आता है.यानी कि इंसान सेक्स के अलावा कुछ और सोच ही नहीं सकता.

फिल्म के एक सीन में मिकी का दावा है कि वह डर्टी पिक्चर्स बनाकर पैसे भले ही कमाता है, मगर इन्ही पैसो से वह सोमालिया के भूखे बच्चों की भूख मिटाता है. इस तरह वह नेक काम ही कर रहा है. लेखक, निर्माता व निर्देशक के इस तर्क के अनुसार तो हर अपराधी नेक काम ही करता है. तो क्या फिल्मकार हर किसी को गलत काम करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहते हैं.

फिल्म की निर्माता एकता कपूर और शोभा कपूर का तो बौलीवुड से पुराना नाता है. पर यह भूल गए कि ‘‘शौकीन’’ जैसी एडल्ट कामेडी फिल्में पहले भी बनती रही हैं.

‘‘क्या कूल है हम’’की इस तीसरी फिल्म में रितेष देशमुख की जगह आफताब शिवदसानी आ गए हैं, जिन्होने फिल्म को फूहड़ व अश्लील बनाने में ज्यादा योगदान दिया. तुषार कपूर के अभिनय में ऐसा कुछ नहीं है, जिसकी प्रशंसा की जा सके. मंदाना करीमी भी अभिनेत्री के तौर नहीं उभरती. मंदाना करीमी के साथ ही जिजेल ठकराल व क्लौडिया सिसेल भी अभिनेत्री के तौर पर आकर्षित नहीं करती हैं. कुल मिलाकर ‘‘क्या कूल हैं हम 3’’ देखने के लिए  दर्षक अपनी गाढ़ी कमाई खर्च नहीं करना चाहेगा.

सोच देशहित की

फिल्मी सितारों में से कुछ का बढ़ती कट्टरता के खिलाफ मुंह खोलना आश्चर्य की बात नहीं क्योंकि जहां भी विचारों की अभिव्यक्ति की बात हो वहां दूसरे की सुनने का कर्तव्य, बोलने के अधिकार का हिस्सा है और सिनेमा कहता है तो दूसरे सुनते हैं. देश में भगवाधारी जो माहौल बना रहे हैं यदि इसी तरह परतदरपरत बढ़ता रहा तो देश की सोच की शक्ति उत्तरी कोरिया या अफगानिस्तान की तरह की सी हो जाएगी, इस में शक नहीं.

शाहरुख खान जैसे मुसलिम ऐक्टर आमतौर पर इस तरह के मामलों में डर के कारण दखल नहीं देते क्योंकि उन के प्रशंसकों में हर तरह के लोग होते हैं. सो, वे विवाद से बचना चाहते हैं. देश में बिजनैस के शिखर पर बैठे अभिनेता अमिताभ बच्चन कितने ही सद्व्यवहार के पाठ पढ़ा लें पर इस पोंगापंथी के खिलाफ मुंह नहीं खोल रहे क्योंकि वे तो खुद महापोंगापंथी हैं जिन्होंने अपनी रेड्डी बहू को अपनाने से पहले कई अपमानजनक पाखंड कराए थे. वे भगवाई आदेशों को बुरा किस मुंह से कहेंगे. वे तो देश के सारे मंदिरमसजिदों में सिर झुका आए हैं- फिल्मी नाटकीयता के कारण या किसी दिमागी दिवालिएपन के कारण.

शाहरुख खान की देश में बढ़ती धार्मिक असहनशीलता के प्रति चिंता सच है, बनावटी नहीं. यह हर जगह दिखने लगी है. बिहार के चुनावों में बढ़चढ़ कर दिखी. दिल्लीमुंबई में दिख रही है. गांवों की गलियों में दिख रही है. फेसबुक, व्हाट्सऐप और ट्विटर पर दिख रही है.

अगर हमारी नहीं मानोगे तो पाकिस्तान भेज देंगे, हमारा समर्थन नहीं करोगे तो देशद्रोही कहेंगे, हमारी बात पर मोहर लगा दो वरना हमारी पुलिस तुम्हारा काम तमाम कर देगी, हमारे जैसे बनो वरना हमारी भीड़ तुम्हारा घर जला देगी. यह हठधर्मी आज धर्म का हिस्सा बन गई है और शाहरुख खान उन हजारों में से एक हैं जिन्हें चिंता है कि इस तरह से देश फिर काला उपमहाद्वीप बन जाएगा. पाकिस्तान और बंगलादेश तो पहले ही वैचारिक अंधकार में डूबे हैं और अच्छे दिनों की रोशनी इतनी जल्दी काली आंधी में तबदील हो जाएगी, यह सोचा न था.

एक चुनाव जीत लेना भारत के वर्तमान और भविष्य का ठेकेदार बन जाना नहीं है. चुनाव केवल सरकार चलाने के लिए 500 लोगों को चुनने के लिए होता है, भविष्य की लकीरें खींचने के लिए. सरकार मर्यादाएं लांघ कर काम करेगी, 2500 साल पुराना ऋषिमुनियों का जमाना लाने का काम करेगी तो देश तीरकमानों और बैलगाड़ी वाला ही बन कर रह जाएगा. शाहरुख खान जैसे जानेपहचाने चेहरों की सख्त जरूरत है जो देश की सोचें, सरकार या उसे चलाने वाले मुट्ठीभर लोगों की नहीं.

बागबानी के ये भी हैं फायदे, आप भी जानिए

एक समय था जब बहुमंजिला इमारतों में आशियाना नहीं तलाशा जाता था, खुले आंगन और छोटे से बगीचे वाले आशियाने को प्राथमिकता दी जाती थी. बगीचे पर तो खासतौर पर ध्यान दिया जाता था, क्योंकि यही उन के घर की साजसज्जा का जरीया होता था और अपनी पसंद की सब्जियां वगैरह उगाने का भी. वक्त ने करवट बदली, तो आधुनिकता ने आंगन भी निगल लिया और बगीचा भी. लेकिन एक बार फिर लोगों में अपने घर पर एक छोटा सा बगीचा तैयार करने की उत्सुकता को देखा जा रहा है. भले ही लोग गार्डन को जरूरत या शौक के नजरिए से न देख लाइफस्टाइल स्टेटस में इजाफा समझ कर अपने आशियाने में जगह दे रहे हों, लेकिन होम गार्डन के ट्रैंड पर उन्होंने अपनी सहमति की मुहर जरूर लगा दी है.

इस बाबत बागबानी विशेषज्ञा डाक्टर दीप्ति कहती हैं, ‘‘बगीचा होना अब घर की शान समझा जाता है. लोग इस में फैंसी पौधे और फूल उगाते हैं, जो घर की खूबसूरती को बढ़ाते हैं. असल में गार्डन होना और गार्डनिंग करने में बहुत अंतर है. भले गार्डन आशियाने की रौनक को बढ़ा दे, मगर उस में रहने वालों को इस का असली सुख तभी  मिलेगा जब वे इस की उपयोगिता को भी समझेंगे.’’

उपयोगिता बागबानी की

बागबानी समय का सब से अच्छा सदुपयोग है. बागबानी विशेषज्ञ डाक्टर आनंद सिंह कहते हैं, ‘‘आज की भागतीदौड़ती दिनचर्या में किसी के पास वक्त नहीं है. लोग औफिस के काम से फुरसत पाते हैं तो घरेलू कार्यों में मसरूफ हो जाते हैं. फिर अगर समय मिलता है तो वीकैंड में शौपिंग करने निकल जाते हैं. कई बार तो  फुजूलखर्ची करते हैं. ऐसे में मानसिक संतुष्टि मिलने के बजाय उलटा अवसाद घेर लेता है. अत: इस से अच्छा तो यह हो कि घर पर रह कर कुछ रचनात्मक काम किया जाए. इस में बागबानी से बेहतर और कोई विकल्प नहीं हो सकता है, क्योंकि यह आप को मानसिक सुख देने के साथसाथ अच्छी सेहत और भरपूर ज्ञान भी देगा.’’

यहां डच (जरमनी) लोगों का उदाहरण देना सही रहेगा, क्योंकि वहां करीब करीब सभी लोगों के पास अपना बगीचा है, जिस में खाली समय में वे बागबानी करते हैं. उन्हें मौल्स में घूमने से ज्यादा बेहतर बागबानी करना लगता है. यहां आम लोग ही नहीं वरन सैलिब्रिटीज भी गार्डनिंग का शौक रखते हैं. एक डच पत्रिका में जरमनी के मशहूर शैफ, जौन लफर के अनुसार, यदि वे देश के मशहूर शैफ न बन पाते तो खुशी से गार्डनिंग के पेशे में आते. वैसे शैफ जौन अभी भी अपने पेशे के अलावा गार्डनिंग में खास दिलचस्पी रखते हैं. यही वजह है कि वे अपने पौटेड प्लांट्स कलैक्शन के पैशन को छिपा नहीं पाते.

वैसे जरमनी ही नहीं हमारे देश में भी बहुत से लोग बागबानी का शौक रखते हैं, लेकिन विस्तृत जानकारी के अभाव और इस की उपयोगिता से अनजान होने की वजह से अपने शौक को बढ़ावा नहीं दे पाते. फिर भी कुछ सैलिब्रिटीज की बात करें तो बौलीवुड के अभिनेता और अभिनेत्रियां, जिन का ज्यादा वक्त शूटिंग करते ही बीतता है, खाली वक्त में या तो पार्टी करना पसंद करते हैं या फिर छुट्टियां बिताने विदेश पहुंच जाते हैं. लेकिन कुछ अरसा पहले एक इंटरटेनमैंट वैबसाइट को दिए इंटरव्यू में अभिनेत्री सेलिना ने कहा कि वे अपने प्रोफैशन से वक्त मिलते ही छत पर बनाई अपनी बगिया में पहुंच जाती हैं. वहां उन्हें नए पौधे लगाना, उन में खाद डालना, पानी देना बहुत अच्छा लगता है. उन्हें गार्डनिंग का शौक इस कदर है कि इस के लिए उन्होंने विशेषतौर पर ट्रेनिंग भी ली है और वक्त मिलने पर वे बागबानी से जुड़ी किताबें भी पढ़ती रहती हैं.

लाइफ इंश्योरैंस पौलिसी है बागबानी

मगर सेलिना जैसे लोग बहुत कम हैं, जो अपने गार्डनिंग के पैशन को उभारने की जगह उसे दबा देते हैं. वजह, जानकारी का अभाव ही है. डाक्टर दीप्ति कहती हैं, ‘‘बहुत से लोग बागबानी का शौक रखते हैं. पर उस में खर्र्च करना नहीं चाहते, उन्हें बागबानी में निवेश की कोई संभावना नहीं दिखती, जबकि बागबानी एक लाइफ इंश्योरैंस पौलिसी की तरह है. आप उस में जितना समय देंगे आप की सेहत उतनी ही अच्छी रहेगी.’’

नैशनल ज्योग्राफिक औथर एवं रिसर्चर डैन बटनर के अध्ययन के अनुसार, बागबानी करने वालों का जीवन आम लोगों से 14 वर्ष अधिक होता है. कैसे, आइए जानें:

– बागबानी दिन में ही की जाती है, इसलिए जाहिर है कि बागबानी के दौरान सूर्य के संपर्क में आना पड़ता है, जिस से शरीर को विटामिन डी मिल जाता है. विटामिन डी शरीर को कैंसर और हृदय से जुड़ी बीमारियों से बचाता है.

– यह भ्रम है कि मिट्टी में हाथ सनने से बैक्टीरिया चिपक जाते हैं, जिस से संक्रमण का  खतरा रहता है. दरअसल, मिट्टी प्राकृतिक बैक्टीरिया, मिनरल्स, माइक्रोऔर्गैनिज्म का प्रमुख स्रोत होती है. रोजाना मिट्टी के स्पर्श से शरीर का इम्यून सिस्टम अच्छा होता है.

– लोगों में भ्रांति है कि नंगे पैर जमीन पर रखने से वे मैले हो जाते हैं. लेकिन यह सोचना गलत है. त्वचा का धरती से सीधा संपर्क शरीर में इलैक्ट्रिकल ऐनर्जी द्वारा पौजिटिव इलैक्ट्रोंस जेनरेट करता है.

– आधुनिक जीवनशैली में बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने लोगों को अवसाद के आगोश में धकेल दिया है, जिस से तमाम तरह की बीमारियां जन्म ले रही हैं. बागबानी इन बीमारियों से बचने का एक सरल उपाय है, क्योंकि इस से मिलने वाला सुख शरीर पर प्रत्यक्ष रूप से असर डालता है और दिमाग को तनावमुक्त रखता है.

– बागबानी का अर्थ केवल फूल उगाना नहीं. घरों में किचन गार्डन भी तैयार किया जा सकता है. इस से मिलने वाली सब्जियां आप के शरीर को पोषण देने के साथसाथ ऐंटीऔक्सिडैंट भी देंगी और जहरीले तत्त्वों से भी शरीर की सुरक्षा करेंगी.

– बागबानी करने वालों को जिम जाने की जरूरत भी नहीं पड़ती, क्योंकि बागवानी में काम करते हुए ही पूरी ऐक्सरसाइज हो जाती है.

कम जगह और पैसों में भी संभव

यह सच है कि बागबानी महंगा शौक है.  लेकिन आप चाहें तो कम पैसों में भी यह संभव हो सकती है. जरा सोचिए, फल और सब्जियों के आसमान छूते भाव के चलते अपनी जेब ढीली करने से बेहतर यही है कि घर पर ही इन्हें उगा लिया जाए, जो आप को अच्छा स्वाद, सेहत और संतुष्टि देने के साथसाथ आप के बजट को भी बिगड़ने नहीं देंगी. डाक्टर दीप्ति कहती हैं, ‘‘आजकल बड़े शहरों में ताजा हवा के लिए औक्सीजन जोन बनाए जा रहे हैं. वहां लोग भारी कीमत चुका कर चंद घंटे गुजारने जाते हैं. लेकिन चंद घंटों में मिली ताजा हवा से क्या होता है? ऐसा आप महीने में 1 बार कर सकते हैं. रोज तो पैसे खर्च नहीं कर सकते न? इसलिए यदि आप घर पर ही बागबानी करें तो घर पर ही ताजा हवा का आनंद लिया जा सकता और वह भी फ्री में. जो कीमत आप औक्सीजन जोन की ऐंट्री की चुकाएंगे उसी में बीज, खाद और गमले आ जाएंगे. सब से बड़ी बात तो यह है कि अपने हाथों से उगाई सब्जी खाने में जिस स्वाद और संतुष्टि की अनुभूति होगी उस से बेहतर और क्या सुख हो सकता है.’’

डाक्टर आनंद सिंह कहते हैं, ‘‘बाजार में सुंदर टमाटर, बैगन, लौकी देख कर लोग उन पर टूट पड़ते हैं. लेकिन यह ध्यान रहे कि सब्जी दिखने में जितनी सुंदर होगी उतनी ही नकली होगी. घर पर उगाई सब्जियां भले ही दिखने में उतनी खूबसूरत न हों, लेकिन स्वाद और सेहत के मामले में उन का कोई मुकाबला नहीं.’’

कभीकभी खर्चे के अलावा कुछ और परेशानियां बागबानी के शौकीनों को घर पर बगीचा तैयार करने से रोक देती हैं. छोटा घर और कम जगह इन परेशानियों में से ही हैं. लेकिन घर कितना भी छोटा क्यों न हो पौधे लगाने के लिए थोड़ी जगह मिल ही जाती है. यदि वह भी न मिले तो आजकल हैंगिंग गार्डन का फैशन चलन में है. इस विधि के अनुसार गमलों को फर्र्श पर रखने की जगह दीवारों या खूंटे के सहारे हवा में टांग दिया जाता है. इस से फर्श भी खाली रहता है और बागबानी का शौक भी पूरा होजाता है.

अपनी रूममेट को ऐसे बनाएं बैस्ट फ्रैंड

कभी पढ़ाई के चलते तो कभी नौकरी के कारण आजकल लड़कियां अपने शहर, परिवार से दूर दूसरे शहर में रहती हैं. ऐसे में जब वे हौस्टल या पीजी में किसी दूसरी लड़की के साथ रूम शेयर करती हैं, तो अपने साथसाथ उन्हें उस की परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है. तब कुछ लड़कियों को लगता है कि उन की जिंदगी में तो बिना बात की टैंशन आ गई है.

‘‘मेरी रूममेट को हर दिन कोई नई प्रौब्लम, कोई नई बीमारी होती है. मुझे तो समझ में नहीं आता कि मैं यहां अपने लिए आई हूं या उस की सेवा करने के लिए.’’ यह कहना है एक परेशान लड़की का.

ऐसे में कुछ लड़कियां मदद करने से बचने के लिए खुद की बीमारी का बहाना बनाने लगती हैं तो कुछ रात में जागते हुए भी सोने का नाटक करती हैं. कुछ तो ऐसी भी होती हैं जिन की रूममेट बीमार है तो क्या हुआ वे अपना प्लान कैंसिल नहीं करतीं. कुछ साथ में तो रहती हैं पर उन के बीच नहीं बनती. वे न तो एकदूसरे से बात करती हैं और न ही एकदूसरे की मदद करती हैं.

सपना हरियाणा के एक छोटे शहर रेवाड़ी की है और पिछले 2 सालों से दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रही है. सपना की रूममेट कुछ ऐसी ही है. सपना के साथ एक कमरे में रहते हुए भी बहुत कम बात करती है. उस के बीमार पड़ने पर भी मदद के लिए आगे नहीं आती.

सपना बताती है, ‘‘एक बार मेरी तबीयत अचानक खराब हो गई. मुझे चक्कर आ रहा था. मैं इस हालत में नहीं थी कि अकेले डाक्टर के पास जा पाऊं. मैं ने अपनी रूममेट से कहा तो उस ने यह कह कर मना कर दिया कि आज मेरी एक फ्रैंड का बर्थडे है. मैं अभी उस की पार्टी में जा रही हूं. वापस आ कर तुम्हारे साथ चल सकूंगी. उस वक्त मुझे लग रहा था कि ऐसी रूममेट के साथ रहने का फायदा क्या है, जब वह मेरी मदद नहीं कर सकती? मेरी प्रौब्लम को तो वह अपने लिए आफत समझती है.’’

सभी एकजैसी नहीं

लेकिन हर रूममेट सपना की रूममेट की तरह ही हो, यह जरूरी नहीं है. कुछ रूममेट आगे आ कर मदद भी करती हैं. लेकिन हड़बड़ी में या जानकारी के अभाव में वे कभीकभी ऐसी गलती कर देती हैं जिस की वजह से दोनों को परेशानी होती है.

भोपाल की रहने वाली सोनी कहती है, ‘‘एक बार मेरी रूममेट के चेहरे पर दाने निकल आए थे. मैं ने उस की मदद के लिए गूगल पर सर्च कर के उसे दवा का नाम बता दिया. लेकिन उस दवा को लेने से दाने के साथसाथ उस के चेहरे पर लाल निशान भी नजर आने लगे. अब वह मुझ पर चिल्लाने लगी कि मेरी वजह से उस का फेस खराब हो गया. मैं ने जानबूझ कर उसे गलत दवा दी. यह सुन कर मैं सोचने लगी कि मैं ने दवा का नाम बता कर क्यों आफत मोल ली? इस से तो अच्छा होता मैं उस की मदद ही न करती.’’

अगर आप भी किसी के साथ रूम शेयर करती हैं और आप का व्यवहार भी कुछ इसी तरह का है कि आप अपनी रूममेट की बीमारी या प्रौब्लम को आफत समझती हैं तो अपनी सोच और व्यवहार में थोड़ा बदलाव लाएं. इसे भी अपनी दोस्ती का एक हिस्सा समझें, जिसे आप को अच्छे से निभाना है. आप को यह बात अच्छी तरह समझनी चाहिए कि आप अकेले रहती हैं और यहां आप की रूममेट ही आप की मदद करेगी. लेकिन जब आप उस की मदद करेंगी, तभी वह भी आप की मदद के लिए तैयार रहेगी. इसलिए उस की बीमारी को आफत समझने के बजाय उस की मदद करें.

जब रूममेट हो बीमार

– जब आप की रूममेट बीमार पड़ जाए तो उसे अपने पास रखी कोई भी दवा न दें, क्योंकि यह जरूरी नहीं कि आप की जो समस्या रही हो, वही समस्या उस की भी हो. आप के इस तरह से कोई भी दवा खिलाने से उस की समस्या और भी बढ़ सकती है.

– आजकल कुछ लड़कियां ऐसा भी करती हैं कि इंटरनैट पर दवा का नाम खोजती हैं कि कौन सी बीमारी में कौन सी दवा लेनी चाहिए. ऐसी गलती बिलकुल भी न करें क्योंकि जरूरी नहीं कि इंटरनैट पर दी गई जानकारी सही हो.

– रात के समय आप की रूममेट की तबीयत खराब हो जाए तो उठने के डर से सोने का बहाना न करें बल्कि उस की मदद करें.

– कई लड़कियां सोचती हैं कि मैं अपनी चीज किसी को क्यों दूं. ऐसा सोचना गलत है. अपनी किसी भी चीज को शेयर करने में हिचकिचाहट न करें. अगर आप की रूममेट को उस की जरूरत है तो अवश्य दें.

– कई बार ऐसा होता है कि रूममेट के बीमार पड़ने पर हम इंतजार करते हैं कि वह हम से कहेगी या पैसे देगी तब हम दवा खरीद कर लाएंगे. ऐसा बिलकुल न करें बल्कि खुद पहल कर के उस से पूछें कि उसे किसी चीज की जरूरत तो नहीं.

– अगर आप दोनों कालेज स्टूडैंट हैं और तबीयत खराब होने की वजह से आप की रूममेट कालेज नहीं जा पा रही है तो नोट्स शेयर करने में बिलकुल हिचकिचाहट न करें. यह न सोचें कि आप अपना नोट्स उसे दे रही हैं, तो कहीं उस के ज्यादा नंबर न आ जाएं.

– अगर वह चिड़चिड़ा व्यवहार करे तो इस बात को दिल से लगा कर न बैठ जाएं कि आप उस की मदद कर रही हैं और उस ने आप से ऐसा कह दिया. अकसर लोग तबीयत खराब होने पर चिड़चिड़ा व्यवहार करते हैं.

– अगर उस के फोन का बैलेंस खत्म हो गया है तो अपने फोन से उसे काल करने दें. हो सके तो उस का फोन रिचार्ज भी करवा दें.

– इसी बीच अगर पीजी रूम खाली करना पड़े तो सिर्फ अपने लिए ही न खोजें बल्कि अपनी रूममेट के बारे में भी सोचें. अपने साथसाथ उस के लिए भी खोजें.

– तबीयत खराब होने पर हर इंसान घबरा जाता है और अकेले रहने पर घबराना लाजिम है. इसलिए आप उसे समझाएं कि घबराने वाली कोई बात नहीं है आप उस के साथ हैं.

– उस के घर वालों से फोन पर बात करती रहें. उन्हें समझाएं कि उन की बेटी ठीक है. आप उस का पूरा ध्यान रख रही हैं.

– तबीयत ज्यादा खराब है, तो संभव हो सके तो एक दिन की छुट्टी ले लें. अगर जाना जरूरी हो तो फोन पर उस का हालचाल पूछती रहें कि उस की तबीयत कैसी है, उसे किसी चीज की जरूरत तो नहीं.

अपना ध्यान रखना न भूलें

कहीं ऐसा न हो कि रूममेट का ध्यान रखने में आप इतनी व्यस्त हो जाएं कि अपना ध्यान रखना ही भूल जाएं. अगर आप भी बीमार पड़ गईं तो आप का ध्यान कौन रखेगा? इसलिए अपनी रूममेट का ध्यान रखने के साथसाथ आप को अपना ध्यान रखना भी जरूरी है ताकि आप स्वस्थ रहें. अपने खानपान का ध्यान रखें. साथ ही कुछ सावधानियां भी जरूरी हैं. जैसे उसे सर्दीजुकाम या बुखार हो तो कोशिश करें कि उस की किसी भी चीज को छूने के बाद हाथ जरूर धोएं.

कभी दोस्ती कभी आफत

– कई बार ऐसा होता है कि अगर आप की रूममेट का कैरेक्टर ठीक नहीं हो तो उस की वजह से आप को भी परेशानी होती है. जब आप उसे डाक्टर के पास ले कर जाती हैं, तब आसपास के लोग आप के बारे में भी वैसा ही सोचने लगते हैं. आप के कैरेक्टर पर कमैंट करते हैं. अगर उस ने कुछ उलटासीधा कर लिया हो तो डाक्टर की डांट भी आप को ही सुननी पड़ती है.

– अगर उस के पास पैसे नहीं हैं तो नशा करने के लिए आप से पैसे उधार ले कर वह भूल जाती है या आप की छोटीछोटी चीजों को चुरा कर इस्तेमाल कर लेती है.

– कई बार बीमार पड़ने पर पार्टनर नखरे दिखाने लगती है कि मुझे यह नहीं खाना, वह नहीं खाना. मोबाइल में बैलेंस न हो तो आप के फोन से फोन करने लगती है. उस के जानपहचान वालों के फोन आप के फोन पर आने लगते हैं. तबीयत खराब होने पर उस का फोन बारबार क्यों न बजता रहे, उसे कोई प्रौब्लम नहीं होती, लेकिन अगर एक बार भी आप का फोन बज जाए तो उसे प्रौब्लम होने लगती है. वह चाहती है कि रूम में आप उस के अनुसार रहें. वह एक तरह से आप को इमोशनली ब्लैकमेल करती है. अगर आप की रूममेट इस तरह का व्यवहार करती है, तो उस की मदद करने के साथसाथ थोड़ी सावधानी भी अवश्य बरतें.                

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