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पाठकों की समस्याएं

मैं 29 वर्षीय युवक हूं. 2 सालों से मेरी एक लड़की से दोस्ती है. मैं उसे पसंद करता हूं. हमारे बीच रोजाना बातचीत होती थी लेकिन पिछले कुछ दिनों से उसे न जाने क्या हो गया है कि वह मुझे फोन तो करती है लेकिन सिर्फ हायहैलो कह कर फोन रख देती है. मुझे समझ नहीं आ रहा कि अचानक उसे ऐसा क्या हो गया है कि वह इस तरह का व्यवहार कर रही है. क्या मैं इसे अपनी दोस्ती का अंत समझूं? सलाह दें.

अचानक से आप के रिश्ते में आप की गर्लफ्रैंड की तरफ से अलगाव या बेरुखी का व्यवहार दर्शाता है कि आप की दोस्त को आप में अब कोई रुचि नहीं रही है. वह आप के प्रति उदासीन हो चुकी है. फिर भी आप उस के कुछ संकेतों जैसे अगर वह आप से मिलनेजुलने में कतराए और अगर मिलने के लिए मान भी जाए तो इंतजार करवाए, अपने दोस्तों से आप को दूर रखने लगे तो इस रिश्ते को बायबाय करने में ही अपनी भलाई समझें क्योंकि एकतरफा रिश्ते की कोई मंजिल नहीं होती.

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मैं 32 वर्षीय विवाहित पुरुष हूं. आईआईटी फर्म में नौकरी करता हूं. 4 वर्ष पूर्व मेरा विवाह हुआ था. मेरी 3 वर्ष की बेटी है. पिछले कुछ दिनों से पता नहीं मुझे क्या हो गया है कि मैं छोटीछोटी बात पर चिड़चिड़ा जाता हूं, बातबात पर गुस्सा आ जाता है. मेरी पत्नी व बेटी भी मेरे इस व्यवहार से हैरान हैं. मेरी बेटी अब मेरे साथ उस तरह नहीं हंसतीखेलती जैसे पहले खेलती थी. मुझे क्या करना चाहिए?

आप के चिड़चिड़ेपन का कारण कहीं औफिस का कोई तनाव तो नहीं. अगर ऐसा है तो उसे पहले दूर करने का प्रयास करें. इस के अलावा कई बार सोशल साइट्स पर जरूरत से अधिक समय बिताना, पूरी तरह आराम न करना, पूरी नींद न लेना भी किसी के चिड़चिड़ेपन का कारण हो सकता है.

दरअसल, हमारे शरीर में कई तरह के हार्मोन स्रावित होते हैं जो शरीर को सुचारु रूप से चलाने के लिए जरूरी होते हैं. समय पर नहीं सोने से शरीर की डायरनल रिदम नामक प्रणाली बाधित होती है और व्यक्ति में चिड़चिड़ेपन के लक्षण उत्पन्न होते हैं. चिड़चिड़ेपन को दूर करने के लिए खानपान व जीवनशैली व्यवस्थित रखें. परिवार के साथ अच्छा समय बिताएं. सब सामान्य हो जाएगा.

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मेरा बेटा 10वीं कक्षा का छात्र है लेकिन उस की लंबाई केवल 5 फुट है. अपने छोटे कद के कारण उस के भीतर हीनभावना घर कर रही है. वह शिकायत करता है कि स्कूल में उस के साथी छात्र उस का मजाक बनाते हैं. उस के मन से हीनभावना निकालने के लिए मैं क्या करूं?

किसी भी व्यक्ति की लंबाई बढ़ने या घटने में उस के शरीर में स्थित अनेक हार्मोन्स का योगदान होता है. शारीरिक जांच द्वारा पता लगाया जा सकता है कि किस हार्मोन की कमी से आप के बच्चे की लंबाई नहीं बढ़ रही है. इस के लिए किसी बाल विशेषज्ञ या एंड्रोकाइन विशेषज्ञ की राय लें. वैसे भारतीय जलवायु के अनुसार, लड़कों में 18 वर्ष तक लंबाई बढ़ती है, इसलिए अभी आप के बेटे की लंबाई अगले 2 वर्षों में बढ़ सकती है. इस दौरान उचित खानपान, व्यायाम व खेलकूद द्वारा भी लंबाई को बढ़ाया जा सकता है.

जहां तक हीनभावना की बात है, आप अपने बेटे की अन्य विशेषताओं यानी खूबियों को प्रोत्साहित करें और बताएं कि कद में छोटे होने के बावजूद उस में कई खूबियां हैं जो उसे औरों से बेहतर बनाती हैं. उस का आत्मविश्वास बढ़ाएं.

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मैं 30 वर्षीया कामकाजी महिला हूं. मेरा विवाह एक संयुक्त परिवार में होने जा रहा है जहां मेरे व मेरे होने वाले पति के अलावा मेरे सासससुर भी हैं. मैं थोड़ी टैंशन में हूं कि मैं उन के साथ कैसे मैनेज करूं, ताकि कोई समस्या पेश न आए. क्या मैं उन की अपेक्षाओं पर खरी उतर पाऊंगी? क्या उन के साथ रहने से हम पतिपत्नी के रिश्ते पर कुछ प्रभाव पड़ेगा. समस्या का समाधान करें.

ससुराल वालों के साथ सकारात्मक रिश्ते बनाने के लिए आप को कुछ तरीके अपनाने होंगे जैसे अगर आप औफिस से घर पहुंचें और आप की सास ने डिनर तैयार कर रखा हो तो उन की तारीफ करें. यह न सोचें कि इस में क्या खास बात क्या है. कई बार ससुराल वालों को नई बहू के व्यवहार और तौरतरीकों को समझने में थोड़ा समय लगता है, ऐसे में अपनी पहचान खोए बिना इन्हें खुद को सही तरीके से समझने का मौका दें. घर में अगर किसी बात को ले कर मतभेद हों तो पति से तरफदारी की उम्मीद किए बिना सासससुर से सीधे संवाद के जरिए मुश्किल का समाधान ढूंढ़ें और इस दौरान उन की बात भी धैर्यपूर्वक सुनें. घर के छोटेबड़े फैसलों में उन की राय लें, इस से उन्हें लगेगा आप उन्हें मानसम्मान दे रही हैं.

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मैं विवाहित महिला हूं. उम्र 42 वर्ष है. समस्या यह है कि घरेलू परेशानियों की वजह से पति और मेरे बीच आएदिन मतभेद होते रहते हैं. सहवास में भी मेरी इच्छा या अनिच्छा उन के लिए कोई माने नहीं रखती. इसी बीच मेरी दोस्ती फेसबुक पर एक लड़के से हुई है. वह उम्र में मुझ से काफी छोटा है. उस से चैटिंग करना मुझे अच्छा लगता है. मैं बहुत असमंजस की स्थिति में हूं. एक तरफ पति की बेरुखी है तो दूसरी ओर नवयुवक के प्रति आकर्षण. मैं क्या करूं, सलाह दें.

आप बेवजह भटक रही हैं. पति और आप का साथ बरसों पुराना है. थोड़े से मतभेद के चलते उम्र के इस पड़ाव पर किसी आम युवक के प्रति आकर्षण आप को शोभा नहीं देता. वह लड़का आप के साथ सिर्फ टाइमपास कर रहा है. आप अपने पति के साथ अपने मतभेदों को सुलझाइए और मन को व्यर्थ मत भटकने दीजिए वरना आप की विवाहित जिंदगी में तूफान आ सकता है.

आप के पत्र

 ‘शराब पर पाबंदी’ शीर्षक से प्रकाशित संपादकीय टिप्पणी में आप का चिंतन अच्छा लगा. यों तो आजादी के बाद कुछ सरकारों द्वारा नशाबंदी की कोशिश की गई थी पर संपादकीय में बताए कारणों से वे फेल रहीं. शराबबंदी से सरकारों की आय घटती है. आप का चिंतन कि शराब कोई भोजन नहीं कि उस के बिना आदमी जी न सके, बहुत ही सटीक है. प्रकृति भी पहली बार शराब तथा धूम्रपान करने वाले की आंखें लाल कर, खांसी से चेतावनी देती है. आमदनी का जो सवाल है तो वह नशाबंदी के फायदे के आगे कुछ भी नहीं. कुछ साल पहले सरकारें लौटरी टिकट बेच पैसे बनाती थीं पर बाद में उसे बंद कर लोगों को जुआरी होने से बचाया. सरकारें तब भी चलती रहीं. उसी तरह शराब की आमदनी को भुला दिया जाना चाहिए. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार यदि शराबबंदी में कामयाब हुए तो यह देश के लिए हितकारी होगा.

माताचरण पासी, देहरादून (उ.खं.)

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‘शराब पर पाबंदी’ में आप की प्रतिक्रिया पढ़ी. बेशक बिहार के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री की यह पहल जायज ही मानी जाएगी. मगर इस का श्रेय उन्हें तभी मिल पाएगा जब राज्य में यह पाबंदी लग पाएगी. कारण, स्पष्ट है कि राज्य में ही नहीं, केंद्र यानी देश में भी जनहितार्थ न जाने कितने कायदेकानून राजस्व को ठोकर मार कर घोषित किए जाते हैं. मगर देश में प्रचलित नेतागीरी, अफसरगीरी, दादागीरी तथा मुफ्तखोरी यानी भ्रष्टाचारी तत्त्वों का अटूट गठबंधन सभी को धत्ता बताते हुए ऐसे जनहितैषी आदेशों को टांयटांय फिस्स कर करवा देता है. यों कानून व्यवस्था का मसला ये तत्त्व चाहे खड़ा करें या न करें, मगर मुफ्त के माल को लार टपकाती मानव प्रवृत्ति से भला कौन परिचित नहीं. इस के चलन पर अगर शासक वर्ग रोक नहीं लगा पाया, तो इस पाबंदी को कोई भी सफल नहीं कर सकता.

बेशक, राज्य में हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में राज्य के नागरिकों ने अपनी जागरूकता का परिचय देते हुए भाजपा को हरा कर केंद्र की सत्ता तक को झटका दिया है. अब वे मिल कर राज्य में घोषित शराबबंदी को ईमानदारी व दृढ़ता से सफल बनाएं, तो उन को जागरूक या बौद्धिक माना जाएगा, वरना इसे तथाकथित जागरूकता यानी जातिवाद के फेर तथा अवसरवादी बदलाव का द्योतक ही माना जाएगा. यही कमी इस राह का रोड़ा है.

ताराचंद देव रैगर, श्रीनिवासपुरी (न.दि.)

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सभी संपादकीय टिप्पणियां निर्भीक व बेमिसाल हैं. असहिष्णु बने हर धर्म की कट्टरता ही है जो आतंक के साए में खूनी होली खेली जा रही है. स्त्रियों पर बेहिसाब जुल्म करने की प्रेरणा, एकदूसरे के प्रति हिंसक घृणा के असीम स्रोत धर्मग्रंथ ही हैं. अगर भाजपा ने अपने सहयोगी दलों के तोप बने मुंह पर भाईचारे की पट्टी नहीं बांधी तो वह दिन दूर नहीं कि जब वह राजनीति के आकाश में डूबती नजर आएगी.

सारे देशों को आपसी वैमनस्यता को दरकिनार करते हुए एकजुट हो कर खूनी हिंसा को पनाह देते सारे धर्मों की कट्टरता की जड़ों को काट फेंकना होगा.

बलात्कार, दुराचार, यौन हिंसा आदि सारे कुकर्मों को पनाह देने वाली शराब ही है, जिस पर पाबंदी लगाने का नीतीश कुमार का प्रयासरत कदम बेमिसाल है, जिस का देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को, यहां तक कि केंद्र सरकार को भी, सारे घाटों को एक ओर रख कर, अनुसरण करना चाहिए. प्रगतिशील समाज में पानी की तरह बहाए जाने वाले इस विष ने कितने घर उजाड़े हैं और कितनी जिंदगियां तबाह की हैं. शराब हर तबके के पारिवारिक जीवन को बरबाद कर रही है.

रेणु श्रीवास्तव, पटना (बिहार)

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संपादकीय टिप्पणी ‘शराब पर पाबंदी’ एक प्रशंसनीय टिप्पणी है. आज अगर लोग परेशान हैं तो उस का मुख्य कारण शराबखोरी है. यह एक ऐसा कुआं है जिस में शराबी तो डूबता ही है उस का परिवार, बालबच्चे सब बेमौत मरते हैं. यह सारी बुराइयों की जड़ है. इस की लत के आदी हर जगह हैं. यह एक ऐसी आदत है जो एक बार जिसे अपने चंगुल में ले ले, इस से कभी भी, किसी भी हालत में उबर नहीं सकता. धनदौलत तो सारा समाप्त हो ही जाता है. इस का खमियाजा औरतों और बच्चों को भी भुगतना पड़ता है. इस की लत जिसे पड़ जाए उस के बालबच्चे भूखों मरने लगते हैं. उन को समाज में मुंह दिखाना भी मुश्किल होता है. शराब पी कर गाड़ी, ट्रक, बस चलाने वाले खुद तो मरते ही हैं, दूसरों को भी मार डालते हैं. शराब को किसी भी दृष्टिकोण से फायदेमंद नहीं माना जा सकता है बल्कि सदियों से शराब सरकारी खजाने को भरने का काम कर रही है.

नीतीश कुमार का बिहार राज्य में शराब बंद कराना अति प्रशंसनीय कदम है. भले ही इस में राजस्व की हानि हो रही हो, मगर इस नुकसान से सब से ज्यादा फायदा वहां के उन लोगों को होगा जिन की औरतें और बालबच्चे दानेदाने को मुहताज हो रहे थे. आजकल तो इस का चलन इतना ज्यादा हो चुका है कि चाहे शादीब्याह हो, जन्म, मुंडन, तिलक कुछ भी हो अगर शराब न परोसी गई तो लोग उस उत्सव को उत्सव ही मानने को तैयार नहीं होते. पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए चाहे खुशी हो या गम. मजदूर लोग इसलिए पीते हैं कि उन की थकावट उतर जाती है. क्या ही अच्छा होता बिहार की तरह और प्रदेशों में भी नशाबंदी हो जाती तो भारत सरकार की काया ही पलट जाती.

एक अन्य टिप्पणी ‘करों के बढ़ते जंजाल’ में आप ने सत्य बताया है. आजकल बहुत से करों का हिसाब करना पड़ता है. इन करों का बढ़ता बोझ नौकरशाही की देन है, जिस ने समयसमय पर नेताओं को बेवकूफ बना कर इसे लागू करवाया. क्या उन्हें यह पता नहीं था कि करों का बढ़ता बोझ जनता पर किस तरह भारी पड़ेगा और इस की वसूली में जनता को कितना कष्ट होगा.

सब का समय एकसमान नहीं रहता. भारतीय जनता पार्टी को अपनी औकात पता चल गई कि दिल्ली व बिहार के चुनाव परिणाम ने अब उस की दिशा ही बदल दी है. अत: मजबूर हो कर प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को बुला कर संसद में मिला कर महत्त्वपूर्ण कानून बनवाने में सहायता मांगी है. सरकार मुख्यतया गुड्स एवं सर्विसेज टैक्स यानी जीएसटी कानून पास करवाना चाहती है जिस से आशा है कि उत्पादकों एवं व्यापारियों को बेहद फायदा होगा जिस से आशा है कि खरबों की पूंजी व मेहनत का लाभ जनता को मिलेगा.

कैलाश राम गुप्ता, इलाहाबाद (उ.प्र.)

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भाजपा जब केंद्र की सत्ता में आई तो उम्मीद जगी कि भारत की तसवीर बदलने वाली है. लेकिन यहां भी एक भारी गलती हुई, भाजपा भी पश्चिमी सभ्यता की तर्ज पर अपने बुजुर्गों को एक तरफ कर सत्ता के संचालन में दुर्योधन बन सामने आई.

भारतीय संस्कृति के आधार पर यदि भाजपा बड़ेबुजुर्गों के तजरबों को सिरआंखों पर रख, धैर्य धारण कर सत्ता चलाती तो अवश्य ही बिहार का चुनाव जीतती. यह सौ फीसदी सही है कि मोदी की दूरदर्शिता तारीफ के काबिल है. वे एक बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी हैं. पूरे भारत को उन की कार्यप्रणाली, खुली सोच पर गर्व है लेकिन संगठन में शक्ति है. बड़ों के आदर से सफलता मिलती है. यह नहीं भूलना होगा.

हां, यदि पार्टी में कोई अराजक तत्त्व है, उस पर सम्मिलित रूप से निर्णय ले कर किसी निर्णय पर पहुंचना होगा.

राममंदिर के मुद्दे को भाजपा अधिकारस्वरूप नहीं बल्कि सर्वसहमति से अयोध्या में राममंदिर बनाए तो परिणाम अच्छे रहेंगे.

रेखा सिंघल, हरिद्वार (उ.खं.)

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धर्म के नाम पर जो लड़ाइयां लड़ी जाती हैं उन में निर्दोषों का खून बहता है. लोग सर्वधर्म सद्भावना के रास्ते पर चलने लगें तो आतंकवाद अपनेआप खत्म हो जाएगा. आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता. किसी भी व्यक्ति को आतंकवाद के रास्ते पर चलाने वाला जो धार्मिक कट्टरवादी है, उसे सही रास्ते पर लाना जरूरी है. आतंकवाद खत्म करने के लिए आतंकवादी बनाने वाले गिरोह को खत्म करने का अभियान चलाना जरूरी है.

– रविकांत शर्मा, हुगली (प.बं.)

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जानेअनजाने व्यक्ति कभीकभी ऐसी बात बोल जाता है जो उसी पर भारी बैठती है. वह यह नहीं सोचता कि बात उसी के नेता पर लागू हो सकती है. अमित शाह ने बयान दिया है कि जो व्यक्ति 60 साल के ऊपर के हैं वे सारी जिम्मेदारी छोड़ कर समाजसेवा में लग जाएं. 60 साल के ऊपर के प्रधानमंत्री मोदी भी हैं. शुरुआत उन्हीं से हो. वैसे प्रणब मुखर्जी, अमिताभ बच्चन जैसी कितनी ही शख्सियतें हैं जो 60 साल के ऊपर की हैं. ऐसे में आप ने इन को हटाने का ठेका ले रखा है क्या? एक व्यक्ति ताउम्र कामनाओं की पूर्ति में लगा रहता है. उस से आप कैसे कह सकते हैं कि आप घर बैठें, मुझे काम करने दें.

– दिलीप गुप्ता, बरेली (उ.प्र.)

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दिसंबर (द्वितीय) अंक में प्रकाशित लेख ‘पोंजी स्कीमों का फलताफूलता कारोबार’ में लेखक ने बताया कि किस तरह कम समय में ज्यादा फायदा देने का लालच दे कर, सैकड़ों प्रकार की स्कीमें चला कर, विभिन्न कंपनियां निवेशकों को लूट रही हैं. लेकिन यहां हम दोष केवल कंपनियों के माथे पर मढ़ कर अपने गंवारूपन, मूर्खता तथा अपनी लालची प्रवृत्ति की शर्मनाक सोच से मुक्त नहीं हो सकते, जिस के तहत लार टपकाते हुए हम बिना कमाई असंभावित लाभ बिना परिश्रम से मगर अनजानी राह से आने वाली दौलत के लिए टूट पड़ते हैं. तब क्यों नहीं हम यह अंदाजा लगा पाते हैं कि जिस दुनिया में पाईपाई के लिए आज का इंसान अपनेपरायों का खून तक बहाने से परहेज नहीं करता, ऐसे में क्यों कोई भी कंपनी या इंसान अपनी अकूत दौलत को बेमतलब यों ही लोगों की बचत के नाम पर बांटता फिरेगा?

क्या यह घोर आश्चर्य का विषय नहीं कि जब तक सहारा समूह, सारदा चिटफंड, सांई इंटरप्राइजेज जैसी कंपनियां बड़ेबड़े कार्यालय खोल कर तथा बड़ेबड़े विज्ञापनों के माध्यम से हजारोंलाखों निवेशकों को लूट नहीं लेती हैं, तब तक केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक, सेबी तथा ईडी जैसी जांच एजेंसियों की आंखें नहीं खुलती हैं.

– टी सी डी गाडेगावलिया, पश्चिम विहार (न.दि.)

सभ्य समाज का बदरंग चेहरा

अब तक देश में बढ़ते यौन हिंसा के मामलों में सिर्फ जनता का ही आक्रोश सड़कों पर दिखता आया है. लेकिन नए साल के मौके पर पहली बार दिल्ली पुलिस आयुक्त भीमसेन बस्सी का वार्षिक संवाददाता सम्मेलन में जबरदस्त आक्रोश तब दिखा जब उन्होंने रेपिस्टों को गोली मारने सरीखा विवादास्पद बयान दे डाला. बयान पर भले ही संवैधानिक व कानूनीतौर पर असहमति जताई जा रही हो लेकिन इस तरह के बयान जाहिर करते हैं कि देश में किस तरह से इंसानियत को शर्मसार करने वाले दरिंदे मासूमों का यौन उत्पीड़न कर रहे हैं. बलात्कार व यौन हिंसा के लगातार बढ़ते मामलों को देख जब राजधानी के पुलिस आयुक्त को इतना उबाल आ सकता है तो जरा सोचिए जिन पर यह दरिंदगी बीतती होगी. उन का व उन के परिवार क्या हाल होता होगा.

कुन्नू पड़ोसी युवक था. उस का अकसर नरेश के घर पर आनाजाना था. विश्वास के दायरे में एक दिन वह नरेश की 5 साल की मासूम बेटी गुडि़या को चौकलेट का लालच दे कर अपने साथ ले गया. कामुकता का शिकार कुन्नू गुडि़या को अपने घर की छत पर ले गया और उसे हवस का शिकार बनाने लगा. खून से लथपथ बेचारी गुडि़या दर्द से तड़पती रही. कामांध की संवेदनाएं जैसे मर चुकी थीं. आखिरकार गुडि़या तड़पतड़प कर बेहोश हो गई. इस के बाद भी हैवान का दिल नहीं पसीजा. इस बीच गुडि़या के परिजन उसे खोजते हुए छत पर पहुंचे तो दिल दहला देने वाला नजारा देख कर सन्न रह गए. वह बेहोश गुडि़या के शरीर को नोच रहा था.

कुन्नू रंगेहाथों पकड़ा गया और लहूलुहान गुडि़या को अस्पताल में भरती कराया गया. अंदरूनी घावों व अत्यधिक रक्तस्राव से गुडि़या की सांसों की डोर हमेशा के लिए टूट गई. इस बारे में सोचने भर से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

यह दर्दनाक घटना महज एक उदाहरण भर है. वहशी व दरिंदगी भरे इस तरह के मामले आएदिन समाज व इंसानियत को शर्मसार कर रहे हैं. मासूम बच्चियां कामुकता की शिकार हो रही हैं. यह हाईटैक हो चुके उस समाज में कोढ़ग्रस्त इंसानियत की हकीकत भी है जिसे ‘सभ्य’ कहा जाता है. बेटियों को पूजने के ढोंग से ले कर कई तरह की बातें की जाती हैं, लेकिन इस के बावजूद, मासूम बेटियां ही सब से ज्यादा खतरे में हैं. उस उम्र में भी जिस में वे भोलेपन के पायदान पर गंदे इरादों से पूरी तरह अनजान होती हैं. उन की मासूमियत को हैवानियत के पंजों तले रौंदा जाता है. समाज में हर रोज हजारों जोड़ी गंदी नजरें ‘गुडि़या’ जैसी मासूमियत को खोजती हैं और उन्हेें नोंच लेना चाहती हैं. दूसरे शब्दों में, असुरक्षा का यह ऐसा दायरा है जो अभिभावकों की फिक्र बढ़ा रहा है.

सभ्य समाज का यह बदरंग चेहरा है, जहां 2 साल की बच्ची तक हवस का शिकार बना ली जाती है. वासना के भूखे नर भेडि़ए कब किस मासूम को अपना शिकार बना लें, कोई नहीं जानता. 7 वर्षीय निशा एक दिन घर के बाहर खेल रही थी. इसी बीच मूलचंद नामक अधेड़ उसे बहाने से एक निर्माणाधीन प्लौट में ले गया और उस के साथ गलत काम करने का प्रयास किया. निशा के शोर मचाने पर सड़क पर आतेजाते लोग वहां पहुंचे और मूलचंद को पकड़ कर पुलिस को सौंप दिया. निशा ने हिम्मत कर के शोर न मचाया होता तो वह न सिर्फ दरिंदगी का शिकार होती, बल्कि पहचान छिपाने के लिए आरोपी उस की हत्या भी कर सकता था. दुराचार के बाद हत्या की वारदातें भी घटित होती हैं. विकृत मानसिकता व असंवेदनशीलता को दर्शाने वाली ऐसी घटनाएं देश के कोनेकोने में हो रही हैं. उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर के बाबूपुरवा क्षेत्र में घर के बाहर से खेलते हुए लापता हुई ढाई साल की बच्ची का शव झाडि़यों में पड़ा पाया गया. वह अर्द्धनग्न हालत में थी और उस के गले में गमछा कसा हुआ था. एक वहशी ने हैवानियत का शिकार बनाने के बाद उसे बेरहमी से मार डाला था. पुलिस ने दुष्कर्म के आरोपी युवक को गिरफ्तार कर लिया. पहचाने जाने के डर से उस ने बच्ची की हत्या की थी.

शामली जिले की 7 वर्षीय रीना के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. एक पड़ोसी युवक टिंकू ने रीना को अकेले पा कर अपनी हवस का शिकार बनाया. रीना व टिंकू के परिवारों के बीच मेलजोल था. टिंकू की नीयत रीना पर बिगड़ गई. वह उसे बहाने से खेत में ले गया और उस के साथ बलात्कार किया. टिंकू को लगा कि रीना उस का भेद खोल देगी, तो उस ने सलवार से गला घोंट कर रीना की हत्या कर दी. शव मिलने के बाद शक के आधार पर टिंकू को गिरफ्तार कर लिया गया. जयपुर के सांगानेर स्थित एक मदरसे में 7 वर्षीय बच्ची तालीम लेने के लिए गई. अंधेरा होने के बाद जब वह घर नहीं पहुंची तो परिजनों ने उस की तलाश शुरू की. बच्ची की रोने की आवाज सुन कर वे छत पर पहुंचे. वह खून से सनी बिलख रही थी. बच्ची को आईसीयू में भरती कराया गया. उसे किसी कामांध की करतूत से भीतरी चोटें आई थीं.

ग्वालियर में एक अधेड़ पृथ्वीराज 2 साल की पड़ोस की बच्ची को बिस्कुट दिलाने के बहाने ले गया और उस के साथ बुरा काम किया. उस दरिंदे की हैवानियत के बाद मासूम बच्ची को गहन चिकित्सा के बाद 48 घंटे बाद होश आया और पूरी तरह ठीक होने में 3 माह लग गए. घर से ले कर स्कूल तक बच्चियां असुरक्षित हैं. राजधानी दिल्ली में ही एक 4 वर्षीय नर्सरी की छात्रा के साथ कैब चालक ने छेड़छाड़ की. बच्ची ने यह बात घर आ कर बताई तो उस की मां की शिकायत पर चालक मनोज कुमार को जेल भेज दिया गया. गोहाना में एक निजी स्कूल में पढ़ने वाली 3 साल की बच्ची रोते हुए घर पहुंची. उस की छाती पर दांत से काटने का निशान मिला. उस के साथ एक बस चालक ने स्कूल की छुट्टी के बाद यौन शोषण किया. चालक को पुलिस ने जेल में डाल दिया.एक नामचीन स्कूल में दूसरी कक्षा की छात्रा के साथ सफाईकर्मी द्वारा यौनशोषण का मामला प्रकाश में आया. महाराष्ट्र के अकोला स्थित नवोदय स्कूल की 55 छात्राओं ने शिक्षकों पर यौनशोषण का आरोप लगाया.

इस तरह के मामलों पर सामाजिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि आज लोगों की वासना सीमाओं को लांघ चुकी है. इस के लिए वह माहौल के अलावा फिल्मों व टैलीविजन को भी बड़ा जिम्मेदार मानते हैं. पारिवारिक मूल्यों का पतन भी इस का जिम्मेदार है. एलएलआरएम मैडिकल कालेज के प्रमुख अधीक्षक डा. सुभाष सिंह कहते हैं कि मासूम बच्चियों के मामले जब अस्पताल में आते हैं, तो वे चौंक जाते हैं. पता चलता है कि संवेदना किस हद तक दम तोड़ रही है. बलात्कारी किसी न किसी रूप में परिवार के संपर्क में रहने वाला होता है. ऐसी घटनाएं बच्ची की मानसिकता पर जिंदगीभर के लिए कटु आघात डाल सकती हैं. ऐसे मामलों को पतन के तौर पर देख कर सटीक कदम उठाए जाने चाहिए.

बीते कुछ वर्षों में बच्चों का यौन शोषण बढ़ा है. 50 फीसदी मामलों में बच्चों का शोषण वहां होता है जहां उन का विश्वास या रोजमर्रा का कोई रिश्ता हो. भारत में बच्चों का एक बड़ा हिस्सा यौन उत्पीड़न का शिकार है. हर 5 में से 1 बच्चा शिकार होता है. 5 से 12 साल की उम्र में बच्चे सब से ज्यादा शिकार होते हैं. घरों से ले कर स्कूल तक यह सिलसिला चलता है.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, सख्त कानून बनाए जाने के बावजूद पिछले दशक में सब से ज्यादा तेजी महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में दर्ज की गई है. वर्ष 2004 में बलात्कार के 18,233 मामले दर्ज किए गए, वहीं वर्ष 2014 में ये बढ़ कर 36,735 हो गए. बलात्कार के अपराध में 101.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई. इसी तरह वर्ष 2004 में हत्या के 33,608 मामले दर्ज किए गए, वहीं वर्ष 2014 में ये 33,981 हो गए. हत्या के अपराध में 1.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई. सभी मामले दर्ज होते हों, ऐसा नहीं है. पिछले 10 सालों में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में 50 फीसदी की वृद्धि हुई है.

मासूमियत का शिकार करने वाला किस शक्ल में होगा, यह पहचान करना थोड़ा कठिन है. हरियाणा के एक नामी स्कूल की अध्यापिका नाम न छापने की शर्त पर बताती हैं कि जब वे छोटी थीं तो उन के यहां काम करने वाले नौकर ही उन के साथ गंदी हरकतें करते थे. बड़े हो कर उन्हें हकीकत समझ आ गई. स्तब्ध करने वाली एक घटना इलाहाबाद में हुई. बाल सुधार गृह में एक 6 साल की बच्ची ने अपने साथ हुए अत्याचार की बात एक दंपती को बताई जिस के बाद सुधार गृह की अधीक्षक उर्मिला गुप्ता को निलंबित करते हुए चौकीदार विद्याभूषण को गिरफ्तार कर लिया गया. वह बाल सुधार गृह में आने वाली बच्चियों का यौन उत्पीड़न करता था. उस ने कुबूल किया कि उस ने 10 साल से कम उम्र की कई लड़कियों के साथ दुराचार किया था.

मनोविज्ञानियों की राय में पारिवारिक मूल्यों का पतन भी इस तरह के मामलों का जिम्मेदार है. हर मनुष्य बुराइयों के साथ जन्म लेता है. कुछ लोग अपनी बुराइयों पर नियंत्रण कर लेते हैं. जो ऐसा नहीं कर पाते उन में दुष्कर्म की भावना जैसी बुराई भी घर बना लेती है. इस तरह की मनोवृत्ति का शिकार व्यक्ति बच्चियों की मासूमियत और जानपहचान का गलत फायदा उठाते हैं. वे इस की ताक में रहते हैं. उन के लिए वे सौफ्ट टारगेट होती हैं. यह सच है कि अमानवीय घटनाओं के आंकड़े पूरी सामाजिक व्यवस्था पर सवाल हैं. देश में बच्चों की आबादी का एक खासा हिस्सा यौन शोषण का शिकार है.

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव: तुरुप का पत्ता धर्म

अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों की दौड़ अब निर्णायक मोड़ पर जा पहुंची है. चुनावी सरगर्मी चरम पर है. उम्मीदवारों के चयन का दौर अंतिम चरण में है. रिपब्लिकन और डैमोके्रटिक दोनों पार्टियों से कौनकौन राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार के तौर पर नामित किए जाएंगे, अब शीघ्र ही तय होगा. फिलहाल ओपिनियन पोल में आतंकवाद का मुद्दा सब से ऊपर है. रिपब्लिकन पार्टी की ओर से अमेरिका के जानेमाने अरबपति डोनाल्ड ट्रंप धर्म के ट्रंप कार्ड यानी धर्म को तुरुप के पत्ते के तौर पर इस्तेमाल कर शीर्ष पर खड़े हैं. डैमोक्रेटिक पार्टी में हिलेरी क्लिंटन आगे हैं और फिर बर्नी सैंडर्स हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव के दूरगामी अंतर्राष्ट्रीय प्रभावों के कारण विश्वभर की निगाहें इस चुनाव पर लगी हुई हैं. ओपिनियन पोल बता रहे हैं कि रिपब्लिकन वोटर इसलाम को ले कर काफी आशंकित हैं. अमेरिका को पूरी तरह धर्म के आधार पर बांटने और एकजुट करने की कवायद जारी है. यह अमेरिकी सियासत का खतरनाक रुझान है. विश्व के लोकतंत्र समर्थक देशों ने रिपब्लिकन नेताओं के बयानों की निंदा की है.

विश्व के सब से पुराने लोकतांत्रिक देश में वे तमाम मुद्दे उठ रहे हैं जो भारत में उठते हैं. हर तरह की तिकड़में जारी हैं. धर्म, नस्ल, अमीरी, गरीबी, बेरोजगारी हर उस चीज को राष्ट्रपति पद के दावेदार भुनाने में लगे हैं जिन के बल पर उम्मीदवारी हासिल की जा सके. भले ही अमेरिका आज आर्थिक, बेरोजगारी, नस्लीय भेदभाव जैसी समस्याओं से जूझ रहा है.

इतिहास देखें तो मालूम होता है कि आखिरी पंक्ति के दावेदार भी ऐन वक्त पर शीर्ष, दूसरे या तीसरे स्थान पर आ जाते हैं. इस चुनाव में भी यही दिख रहा है. इस का प्रमुख कारण प्रचार,पैसा और मतदान है. डैमोके्रटिक पार्टी में 4 दावेदार हैं जिन में शीर्ष पर हिलेरी क्लिंटन, फिर बर्नी सैंडर्स, मार्टिन ओमाले और लारेंस लेसिंग हैं. उधर रिपब्लिकन पार्टी में 15 दावेदार हैं. इन में सब से ऊपर डोनाल्ड ट्रेप फिर बेन कार्सन, मार्को रूबियो, जेब बुश, टेड क्रूज प्रमुख हैं. कुछ दिनों पहले रूबियो शीर्ष पर थे.

खतरनाक रुझान

अमेरिकी चुनावों में धर्म का जम कर इस्तेमाल होता आया है. रिपब्लिकन जहरीले और भड़काने वाले बयान देते रहते हैं. चुनावी बहसों में मुसलिम विरोधी खूब बातें हो रही हैं. डोनाल्ड ट्रंप और बेन कर्सन की जबानें हूबहू भारत के योगी आदित्यनाथ और साक्षी महाराज की तरह हैं. ट्रंप ने कहा कि अमेरिका में मुसलमानों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए. उन्होंने कहा था, ‘‘जिहाद के नाम पर हमला करने वालों का मानवता पर कोई विश्वास नहीं है और जब तक हमारे देश के प्रतिनिधि पूरी तरह से इस समस्या को समझ नहीं लेते तब तक देश में मुसलमानों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया जाए.’’

इस से पहले वे कह चुके हैं देश में मसजिदों को बंद कर दिया जाए. उन के इस तरह के बयानों पर काफी होहल्ला हो रहा है. ट्रंप यह भी कहते आए हैं कि ओबामा मुसलमान हैं और वे अमेरिकी नागरिक नहीं हैं. ट्रंप इस से पहले अमेरिका में मुसलमानों पर कड़ी निगरानी रखने की बात कह चुके हैं. उन्होंने दक्षिण कैरोलीना में एक रैली में कहा कि हमारे पास कोई विकल्प नहीं है. अगर बड़े कदम नहीं उठाए गए तो 9/11 की शैली में और भी हमले हो सकते हैं.

ट्रंप ने प्रचार मुहिम में कहा कि प्यू रिसर्च व अन्य संस्था के अनुसार, मुसलिम आबादी का एक बड़ा वर्ग अमेरिकियों से बहुत नफरत करता है. सैंटर फौर सिक्योरिटी पौलिसी का हवाला देते हुए वे कहते हैं कि सर्वेक्षण में शामिल 25 प्रतिशत लोगों का मानना है कि वैश्विक जिहाद के तौर पर अमेरिका में अमेरिकियों के खिलाफ हिंसा न्यायोचित है जबकि 51 प्रतिशत ने स्वीकार किया कि अमेरिका में मुसलमानों को शरीयत से शासित होने का विकल्प होना चाहिए.

डोनाल्ड ट्रंप की रैलियों में अश्वेतों व लैटिन अमेरिकी लोगों के खिलाफ उग्र स्वर सुनाई देते हैं. उन की रैलियों में अश्वेतों के साथ मारपीट हो चुकी है. उन्होंने एक बार रंगभेद से संबंधित आंकड़े ट्वीट किए और कहा कि अमेरिका में गोरों की 81 प्रतिशत हत्याएं कालों ने कीं लेकिन बाद में सच सामने आया कि 2014 में गोरों की 82 प्रतिशत हत्याएं गोरों ने ही की थीं. इस सचाईर् के बाद भी उन्होंने माफी नहीं मांगी.

ट्रंप रंगभेद का समर्थन कर रहे हैं, यह कोई नई बात नहीं है. पिछले 138 सालों से यह सिलसिला जारी है. रंगभेद का तीखा विरोध 1955 में पहली बार सामने आया था जब एक बस में कालों के लिए आरक्षित सीट को रोजा लुईस मौले पार्क्स नामक अश्वेत महिला ने एक गोरी महिला को देने से इनकार कर दिया था. रोजा को हिरासत में ले लिया गया था. इस फासीवादी हरकत पर अश्वेत इतने क्रुद्ध हो गए कि रोजा की गिरफ्तारी नागरिक एवं मानव अधिकारों की लड़ाई में तबदील हो गई. उस समय अमेरिका में अश्वेतों के साथ इस हद तक बुरा बरताव था कि उन्हें नागरिक अधिकारों के प्रति लंबा संघर्ष करना पड़ा, तब कहीं जा कर 1965 में अश्वेतों को गोरे नागरिकों के बराबर मताधिकार दिया गया. इस के पहले तक अश्वेत मताधिकार से वंचित थे.इस अधिकार के मिलने के बाद ही ओबामा का एक अश्वेत राष्ट्रपति बनना संभव हुआ.

इस के बावजूद अब भी श्वेतअश्वेत के बीच सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक असमानताएं बनी हुई हैं. जातीय विभेद अमेरिका की कड़वी सचाईर् है. अब भी गोरों की बस्ती में अश्वेतों के घर बिरले ही मिलते हैं. अमेरिका में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले करीब 4.5 करोड़ लोग हैं, इन में से 80 फीसदी काले हैं. अभी भी अमेरिका की कुल आबादी में कालों की संख्या सिर्फ 15 प्रतिशत है पर वहां की जेलों में अपराधियों की कुल संख्या में 45 प्रतिशत कैदी काले हैं. यह नस्लभेद की बदरंग तसवीर है. ट्रंप ने अमेरिकामैक्सिको सीमा पर विशाल लंबी दीवार बनाने की मांग भी की है जिस की कीमत वे कहते हैं कि मैक्सिको से वसूलेंगे. चौतरफा विरोध के बाद ट्रंप ने धमकी दे दी कि वे रिपब्लिकन पार्टी छोड़ कर निर्दलीय भी चुनाव लड़ सकते हैं. उन्होंने दावा किया कि 70 प्रतिशत मतदाता उन के साथ हैं. ट्रंप अपने पूरे प्रचार में मुसलमानों के खिलाफ रहे हैं. वे लोगों के डर से खेल रहे हैं ताकि अपने प्रचार में समर्थन जुटा सके. उन की नीति अंधविश्वासी और असंवैधानिक है.

रिपब्लिकन पार्टी के अफ्रीकी वंशीय बेन कार्सन भी मुसलमानों की खिलाफत कर चुके हैं. बेन कर्सन ओपिनियन पोल में कहते रहे हैं कि मुसलिम अमेरिका का राष्ट्रपति बनने लायक नहीं है क्योंकि उन का मजहब अमेरिकी सिद्धांतों के खिलाफ है. दूसरे रिपब्लिकन दावेदार पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश के भाई जेब बुश ने कहा था कि इराक और सीरिया के सिर्फ ईसाई शरणार्थियों को ही देश में शरण देनी चाहिए, मुसलमानों को नहीं. रिपब्लिकनों के इस तरह के बयानों से उन्हें चुनावी फायदा मिल रहा है. इस के पीछे वजह है कि रिपब्लिकन ईसाई और यहूदी वोटरों को रिझाना चाहते हैं. उन्हें इन का समर्थन मिल रहा है.

असल में कौर्पोरेट घराने और अमेरिकी चर्च रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवारों को खूब पैसा दे रहे हैं ताकि अमेरिका में अमीरों व कट्टरपंथियों का दबदबा बना रहे. उधर, डैमोके्रटिक पार्टी के दावेदार मुसलिम वोटों को अपने समर्थन में करने के लिए उन के पक्ष में बोलते रहे हैं. हिलेरी क्लिंटन, बर्नी सैंडर्स, मार्टिन ओमैली उन में शामिल हैं. हिलेरी क्लिंटन मुसलिमों के विरोध की आलोचना करती रही हैं. 19 दिसंबर को न्यू हैंपशायर में मुसलमानों पर प्रतिबंध के बयानों को ले कर हिलेरी ने डोनाल्ड ट्रंप पर व्यंग्य कसते हुए कहा था कि वे आतंकी संगठन आईएस के सब से बढि़या नियोक्ता बन रहे हैं. हिलेरी चाहती हैं कि उन में 2000 के चुनाव का उत्साह लौट आए. उस दौर में वे पुलिस सुरक्षा लाइन तोड़ कर समर्थकों व आम लोगों के बीच में पहुंच जाती थीं.

ट्रंप का विरोध इस कदर बढ़ रहा है कि फ्लोरिडा में सैंट पीटर्सबर्ग के मेयर रिक क्रिसमैन ने तो अपने शहर में ट्रंप के आने पर ही रोक लगा दी. इस सब के बावजूद ट्रंप अपने बयानों पर अडिग हैं. संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून, व्हाइट हाउस, फ्रांस के प्रधानमंत्री मैनुअल वाल्स और कनाडा सरकार द्वारा ट्रंप के बयान की तीखी आलोचना की गई लेकिन दुनिया के सब से बड़े लोकतंत्र भारत की सरकार की ओर से कट्टर धार्मिक विचारों वाले रिपब्लिकन नेताओं के विवादास्पद बयानों पर खामोशी दिखाई दी. अमेरिकन इसलामिक परिषद के मुखिया इब्राहिम हूपर ने ट्रंप के बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया जताते हुए कहा कि हम फासीवाद के युग में प्रवेश कर रहे हैं. ट्रंप के बयान न केवल अमेरिकी मुसलमानों को तकलीफ पहुंचाएंगे, अमेरिकियों को भी इस से तकलीफ पहुंचेगी.

दरअसल, आतंकी संगठन आईएस लोगों को ट्रंप के वीडियो दिखा रहे हैं जिन में वे इसलाम और मुसलिमों के खिलाफ बोल रहे हैं ताकि चरमपंथी जिहादियों की भर्ती हो सके. आतंकी संगठन आईएस सोशल  मीडिया के जरिए दुनियाभर के लोगों को आकर्षित करने के लिए विशेष अभियान चला रहा है. रिपब्लिकन इन मुद्दों को खूब इस्तेमाल कर रहे हैं.

मूल्यों के खिलाफ

इस बीच, राष्ट्रपति बराक ओबामा को देश के नाम अपने संदेश में अपील करनी पड़ी कि धर्र्म और जाति के भेदभाव बिना सभी एकदूसरे के प्रति सहयोग का रुख अपनाएं. व्हाइट हाउस के उपराष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बेन रोड्स ने कहा कि ट्रंप का बयान अमेरिकी मूल्यों के खिलाफ है. ट्रंप के कट्टर बयानों का असर उन के कारोबार पर भी पड़ रहा है. लैंड मार्क ग्रुप ने डोनाल्ड ट्रंप की कंपनियों से अपने कारोबारी संबंध तोड़ने का ऐलान कर दिया. यह कंपनी पश्चिम एशिया में सब से अधिक खुदरा व्यापार करने वाली कंपनियों में से एक है. अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में चर्च का महत्त्व बढ़ जाता है. भारत में गुरुओं के आशीर्वाद की तरह अमेरिकी उम्मीदवार भी पोप, पादरियों की ब्लैसिंग प्राप्त करने के लिए चर्चों के चक्कर लगाने लगते हैं. दोनों ही पार्टियां धर्म का फायदा उठाती हैं. ईसाई और यहूदी संगठनों के यहां उम्मीदवार चक्कर लगाने लगते हैं. राष्ट्रपति चुनाव में ईसाई और यहूदी लौबिंग समूहों का काफी दबदबा रहता है. यहां यहूदी, इवैंजेलिकन क्रिश्चियन, बौद्ध, हिंदू और मोरमन प्रमुख धार्मिक ग्रुप हैं. दोनों दल इन का समर्थन हासिल करने के लिए हर हथकंडा अपनाते हैं.

2011 के सर्वे के अनुसार अमेरिका में लगभग 10 लाख 80 हजार वयस्क मुसलमान हैं जबकि 30 लाख के करीब अन्य आयु वर्ग के हैं. मुसलमानों की इस तादाद में ज्यादातर 63 फीसदी आप्रवासी हैं. मुस्लिम वोटरों में 70 प्रतिशत डैमोके्रटिक पार्टी के पक्ष में हैं और केवल 11 प्रतिशत रिपब्लिकन पार्टी की ओर हैं. धर्म का इस्तेमाल कर चुनाव लड़ने वाला हर नेता हिटलर की तरह भय पैदा कर लोगों को बहुमत के तौर पर एकजुट करता है लेकिन बहुमत लोकतंत्र नहीं बनाता. बहुमत का मतलब भी लोकतंत्र नहीं है. अमेरिकी चुनाव प्रचार से सवाल उठते हैं कि क्या अमेरिका के राष्ट्रपति पद के दावेदार हर नागरिक को समान समझते हैं? बिना जाति, धर्म, नस्ल, रंग, लिंग बराबरी का व्यवहार करते हैं?

वर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अमेरिकी संसद में अपने आखिरी अभिभाषण के दौरान साफ कहा है कि ऐसी किसी भी तरह की राजनीति को खारिज करने की आवश्यकता है जो लोगों को उन की जाति या धर्म के कारण निशाना बनाती है. अमेरिका भविष्य की चुनौतियों का तभी सामना कर सकता है जबकि लोग बदलाव स्वीकार करें. ओबामा ने यह भी कहा है कि विश्व हमारे शस्त्रागार के कारण हमारा सम्मान नहीं करता, वह हमारी विविधता और हमारे खुलेपन, सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार के लिए सम्मान करता है.

जानकारों का मानना है कि विश्व में आतंक के माहौल को देखते हुए अमेरिका में इस साल नवंबर में व्हाइट हाउस में किसी रिपब्लिकन के पहुंचने की संभावना है लेकिन ट्रंप जैसों की तो बिलकुल जरूरत नहीं है. आज विश्वभर में अमेरिका एक तरह से लोकतंत्र का मौडल स्टेट माना जाता है. शासन में व्यक्तिगत स्वतंत्रता से ले कर शिक्षा, रोजगार, धर्म सरकारी तौर पर भेदभाव के मामले में यह देश अन्य देशों से ऊपर है. हालांकि श्वेतअश्वेत के बीच यहां दीवारें खिंची रही हैं पर कानूनों के सहारे उसे मिटाने के प्रयास किए जाते रहे हैं. अमेरिका जैसे देश में ट्रंप की सोच वाले धार्मिक भेदभाव वाले सुझाव नहीं चल पाएंगे. ट्रंप केवल अमीरों की बात करते हैं. उधर, डैमोके्रट बर्नी सैंडर्स और हिलेरी एक तरह से भारत की कांग्रेस पार्टी जैसी हैं जो गरीबों के साथसाथ अमीरों व हर धर्म की बराबरी की बात कर रही हैं.

ऐसा नहीं है कि अमेरिका में परिवार, वंशवाद नहीं है. यहां भी परिवारवाद चलता है. पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश के भाई जेब बुश भी रिपब्लिकन पार्टी की ओर से दावेदार हैं पर वे पीछे चल रहे हैं. डैमोके्रटिक पार्टी के पूर्व रंगीले राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भारतीय मूल के बौबी जिंदल  रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से दावेदार थे पर वे पिछड़ कर हट गए हैं. वे भी अपने धार्मिक संकीर्ण विचारों के चलते मात खा गए. बौबी जिंदल ने धर्म परिवर्तन कर लिया था और ईसाई बन गए थे. अब वे ईसाइयत का गुणगान करने में लगे हैं. वे खुद को भारतीय भी नहीं कहते और न ही अमेरिका में रह रहे भारतीय प्रवासियों से अधिक जुड़ाव रखते हैं.

सरहदों में उलझी रमजान की घर वापसी

उस के सांवले चेहरे पर दुनियाभर की मासूमियत साफसाफ झलकती है. उस की उम्र तो किसी को ठीकठाक नहीं मालूम पर किशोर वय रमजान के चेहरे पर अब रंगत लौटने लगी है. उसे लगने लगा है कि जल्द ही वह अपने मुल्क में अपने पिता मुहम्मद काजल खान के आगोश में या फिर मां रजिया के आंचल में होगा जिन के लिए वह मुद्दत से तरस रहा है. अपनों की जुदाई का दर्द तो उसे तभी समझ आ गया था जब वह सरहद पार कर पाकिस्तान से बंगलादेश और वहां से भारत आया था. 23 अक्तूबर, 2013 को जब वह भोपाल रेलवे स्टेशन पर आवारा, बदहवास सा घूम रहा था तब मामूली पूछताछ के बाद रेलवे पुलिस वालों ने उसे ‘चाइल्ड लाइन’ संस्था को सौंप दिया था.

तब तक दुनियाभर की तमाम ठोकरें खा चुका रमजान हताश हो गया था लेकिन जल्द ही चाइल्ड लाइन के दूसरे अनाथ बच्चे और स्टाफ ही उस के अपने हो गए. सरहद ज्यादा बेरहम होती है या फिर सौतेली मां के सितम, यह रमजान शायद ही बता पाए पर इतना तय है कि नवंबर के महीने में उसे दूसरा जन्म मिला जब यह सुगबुगाहट हुई कि उस को पाकिस्तान ले जाने की तैयारियां हो रही हैं.

बीते 22 नवंबर को विदेश मंत्री सुषमा स्वराज रमजान से मिलीं, उस के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए उसे अपने मांबाप के पास भेजने का भरोसा दिलाया तो उस के मन की तमाम आशंकाएं दूर हो गईं. वह जानता था कि यह भरोसा दिलाने वाली शख्सीयत बहुत बड़ी हस्ती है, इसलिए उन से मिलने जाने से पहले वह सलीके से तैयार हुआ था और अपनी पसंदीदा टीशर्ट पहनी थी.

भोपाल में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज रमजान के साथ मीडिया से रूबरू हुईं और बताया, ‘‘हम ने रमजान की वापसी की खुद आगे बढ़ कर पहल की है. हमारे हाईकमीशन के अधिकारी इस की मां से मिल कर उन की सहमति भी ले आए हैं. हम इस की मां को वीजा देने को भी तैयार हैं लेकिन पाकिस्तान ने इस मामले पर कोई ध्यान नहीं दिया है अगर पाकिस्तान को रमजान के पाक नागरिक होने में कोई शक है तो वह मांबेटे का डीएनए टैस्ट करा के तसल्ली कर ले.’’ यह बात कतई सियासत की नहीं थी. भारत हाईकमीशन ने फोन पर रमजान की बातचीत उस की मां रजिया से करवाई थी तो रमजान रुंधे गले से मां ही बोल पाया था. अब गेंद पाकिस्तान के पाले में है कि वह रमजान को वीजा दे तभी उस की घर वापसी मुमकिन होगी. सुषमा ने उदारता दिखाते हुए यह भी कहा कि पाकिस्तान रजिया का ब्लड सैंपल भेज दे तो हम यहां उस का रमजान के डीएनए से मिलान कर सकते हैं.

इस पर रमजान को लगा कि इन के जरिए उस का भटकाव और अकेलापन दूर होने वाला है. सुषमा स्वराज उसे जरूर उस की सगी मां रजिया तक पहुंचा देंगी. इस के बाद वह मां के आंचल में सिर छिपा कर 3 साल की पीड़ा भूल जाएगा. घर और मुल्क से भागने की जो गलती उस ने की थी, वह सुधर जाएगी.

फिल्मों सी कहानी

हलके घुंघराले बालों वाले रमजान की कहानी का अंत क्या होगा, यह अभी भविष्य के गर्त में है लेकिन उम्मीद की जा रही है कि कहानी का फिल्मों जैसा ही सुखद अंत होगा क्योंकि रमजान बहुत कच्ची और कम उम्र में उम्मीद से ज्यादा दुख, तनाव और परेशानियां झेल चुका है. दरअसल, पाकिस्तान के कराची के मूसा कालोनी के मामूली परिवार में जन्मे रमजान का बचपन मांबाप की कलह की भेंट चढ़ा. इस कलह से हमेशा सहमा रहने वाला रमजान अब्बा और अम्मी दोनों को ही बराबरी से चाहता था. उस की मां रजिया और पिता का तलाक हुआ तो वह पिता के हिस्से में आया जो उसे बंगलादेश ले आए. वहां अब्बा ने दूसरी शादी कर ली. वहीं से रमजान पर मुसीबतों और दुश्वारियों का पहाड़ टूटा. सगी मां का लाड़प्यार और ममता वह भूल नहीं पाया. भूल सकता था बशर्ते सौतेली मां सौतेली मांओं जैसी क्रूरता नहीं दिखाती. उस ने नन्हे रमजान पर सितम ढाने शुरू कर दिए. महज 10 साल के रमजान ने सौतेली मां की जरूरत से ज्यादा ज्यादतियां सहीं और एक दिन हद हो गई जब सौतेली मां ने उस पर चोरी का झूठा इलजाम मढ़ दिया.

स्वाभिमानी रमजान से यह आरोप बरदाश्त नहीं हुआ तो उस ने अपनी सगी मां के पास वापस पाकिस्तान जाने का न केवल फैसला ले लिया बल्कि उस पर अमल भी कर डाला. इस उम्र में मां की सब से ज्यादा जरूरत बच्चे को होती है, लेकिन उस की सगी मां तो सरहद पार थी. फैसला तो ले लिया पर रास्ता रमजान को नहीं मालूम था फिर भी उसे उम्मीद थी कि पाकिस्तान ज्यादा दूर नहीं है, जैसेतैसे पहुंच ही जाएगा. हवाई जहाज से आते वक्त तो 2 घंटे ही लगे थे.

दुखी रमजान एक अनजाने सफर पर निकल पड़ा. उस वक्त उस की जेब में महज 85 रुपए थे जो एक बच्चे को बहुत लगते हैं. बौर्डर पर उसे भटकता देख कुछ लोग उसे पानी के रास्ते पार करवाने ले गए. वहां से रमजान असम के लवलीन स्टेशन पर आ गया. अब वहां से कहां, कैसे जाना है, यह उसे नहीं मालूम था. उस की हालत मेले में भटके बच्चे जैसी थी जो पूछपूछ कर कदम रख रहा था. जिस ने जिधर उंगली उठा दी, उधर ही चल पड़ा. असम से पाकिस्तान जाना मुमकिन नहीं था. लिहाजा, वहां के लोगों ने उसे रांची जाने का रास्ता दिखा दिया. ट्रेन में बैठ कर वह रांची पहुंच गया और लावारिसों सरीखा 3-4 दिन स्टेशन पर ही भटकता रहा. भूखाप्यासा, घबराया वह ढूंढ़ता था किसी भले चेहरे को जिस से पूछ सके कि अब कहां, कैसे जाऊं. एक सज्जन ने उस की कहानी सुन उसे ट्रेन के जरिए मुंबई जाने की सलाह दे डाली. रमजान ट्रेन में बैठ कर मुंबई जा पहुंचा. लेकिन भटकाव का सिलसिला यहां भी खत्म नहीं हुआ. मुंबई में भी वह लवलीन, और रांची की तरह भटकता रहा. शहर बदल रहे थे पर हालात जस के तस थे. जो मिल जाता, उस से पेट भर लेता. जहां जगह मिल जाती, रात गुजार लेता था.

मुंबई की भीड़भाड़ से घबराए रमजान की हालत जंगल में भटके पक्षी सरीखी हो चली थी. वह टूटने भी लगा था कि तभी किसी अनजान हमदर्द ने उसे दिल्ली जाने का रास्ता दिखा दिया. दिल्ली में वह हजरत निजामुद्दीन स्टेशन उतरा और सीधा दरगाह पर जा पहुंचा. वहां उस ने मां से मिलने की गुहार लगाई.

मुंबई के मुकाबले दिल्ली वाले नरमी से पेश आए. जिस किसी ने उस से जानकारी ली, रमजान ने बेहिचक बता दिया कि वह पाकिस्तानी है. इस जवाब पर उसे समझाइश यह मिली कि हमें तो बता दिया पर किसी और को यह बात मत बताना वरना मुश्किल में पड़ जाओगे. कइयों ने तो उसे तुरंत दिल्ली छोड़ देने की सलाह दे डाली. दिल्ली से भाग कर वह कहांकहां हो कर भोपाल आया था. उसे यह याद नहीं. लेकिन इतना उस के बालमन को समझ आ गया था कि दुनिया बेहद क्रूर है. 23 अक्तूबर, 2015 को जीआरपी वालों की निगाह उस पर पड़ी तो उन्होंने उसे लावारिस बच्चों को पनाह देने वाली संस्था ‘चाइल्ड लाइन’ को सौंप दिया.

चाइल्ड लाइन ने दी छत

इत्मीनान और सुकून देने वाली बात यह थी कि चाइल्ड लाइन में उसे छत और आराम दोनों मिल गए. वक्त पर खानेपीने को मिलने लगा और उसी की तरह भटके अनाथ हमउम्र बच्चे भी मिले जिन के संग खेलतेबतियाते वक्त कुछ बेहतर तरीके से कटने लगा. हालांकि वतन और मां की याद आते ही वह उदास और गुमसुम हो उठता था. जल्द ही चाइल्ड लाइन वालों ने उस का दाखिला अयोध्या नगर इलाके के एक प्राइवेट स्कूल में करा दिया. इस के पहले रमजान कभी स्कूल नहीं गया था लेकिन उस की मानें तो स्कूल जाना उस के लिए अब तक के सुखद अनुभवों में से एक था जहां सभी उस से प्यार और सहानुभूति से पेश आते थे. वतन पहुंच कर अम्मी से मिल पाने की उम्मीद टूटने लगी थी.

इस बीच, चाइल्ड लाइन ने अपनी जिम्मेदारी निभाते उस के घरवालों को ढूंढ़ने की मुहिम जारी रखी और इस बाबत मीडिया का सहयोग लिया. रमजान ने अब तक जो अपने बारे में बताया था, उस की बिना पर कराची के सोशल वैलफेयर डिपार्टमैंट को उस का फोटो भेजा गया. बीते सितंबर में उस के दादा ने यह फोटो देखा और पहचान की दावेदारी जता दी. शुरुआती पूछताछ और कार्यवाही में साबित हो गया कि रमजान कराची का ही रहने वाला है और अपने बारे में जो बता रहा है वह सच है. अब उसे पाकिस्तान भेजने की कवायद शुरू हो गई. इस दौरान मीडिया ने उस के बारे में छापा और दिखाया तो भोपाल में वह अजूबा सैलिब्रिटी हो गया. इन्हीं दिनों सलमान खान की फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा था, लिहाजा हर कोई चाहने लगा कि जैसे भी हो, रमजान को उस के घर भेजने के इंतजाम किए जाने चाहिए.

इस बाबत कोशिशें जारी हैं और मुमकिन है जल्द वह घर पहुंच भी जाए. भारतीय अधिकारियों ने जब उस की सगी मां रजिया से संपर्क किया तो उस ने कहा कि वह भारत आने को तैयार है लेकिन माली हालत आड़े आ रही है. उस के पास भोपाल आनेजाने के लिए पैसे नहीं हैं. दोनों देशों में से किसी एक देश की सरकार यह खर्च उठाए तो वह भोपाल आने को तैयार है. बकौल रजिया, ‘‘इतनी हमदर्दी देख मेरे मन में भारत को ले कर जो डर था, वह खत्म हो गया है. मैं यह नहीं समझती कि भारत एक इसलामविरोधी देश है.’’ लेकिन अब कानून आड़े आ रहा था. मां से बात कर रमजान खुश था और 23 नवंबर को उस ने कहा कि पाकिस्तान जा कर बताऊंगा कि भारत बहुत अच्छा देश है और यहां के लोग बहुत भले हैं.

संयोग से इस दिन अभिनेता आमिर खान के उस बयान पर देशभर में खासा बवाल मचा हुआ था जिस में उन्होंने पत्नी के हवाले से कहा था कि अब बच्चों को ले कर भारत में रहने में डर लगने लगा है. बात अजीब और विरोधाभासी थी जिस पर सियासत होती रही. दोनों धर्मों के लोग सोशल मीडिया पर जहर उगलते रहे. लेकिन मासूम रमजान को इस से कोई सरोकार नहीं था. वह भारत देश के लोगों का शुक्रगुजार और एहसानमंद था जिन्होंने पनाह दी, प्यार दिया और जो उसे मां के पास पहुंचाने की कोशिशें व सहयोग कर रहे थे. पर अब तक रजिया कानूनन यह साबित नहीं कर पाई थी कि रमजान उस का ही बेटा है और पाकिस्तानी नागरिक है. इस पर रमजान की मदद के लिए कानूनी हाथ उठने लगे. कुछ दिनों पहले ही भारत की युवती मूकबधिर गीता को देश लाने में अहम रोल निभाने वाले पानीपत के वकील मोमिन मलिक साथ देने को तैयार हो गए. बकौल मलिक, अब यह मामला अदालत से ही सुलझ सकता है.

दस्तावेजी दीवार मांबेटे की बीच खड़ी हो चुकी थी. जाहिर है इस मामले में जज्बातों से काम नहीं चलने वाला था. कानून के अलावा, दूसरी वजह देश का माहौल है जिस में विवादों और बयानों का जहर घुला है. भोपाल के लोगों को पाकिस्तान के रवैए पर हैरत होती रही कि वह जिम्मेदारी से कागजात तैयार करवाने में रजिया और रमजान की मदद क्यों नहीं कर रहा. यह सुषमा स्वराज की पहल का ही नतीजा कहा जाएगा कि मां को तरसते रमजान से पूछताछ करने के लिए पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के सचिव खादिम हुसैन भोपाल आए और भारतीय अधिकारियों के साथ तकरीबन 1 घंटे बंद कमरे में रमजान से पूछताछ की. मकसद तय है, रमजान की नागरिकता साबित करना था. इस बातचीत का ब्योरा जाहिर नहीं किया गया लेकिन इकलौती बात प्रमुखता से यह बताई गई कि जब रमजान से यह पूछा गया कि क्या चाहते हो, तो उस का जवाब था ‘मुझे मां के पास ले चलो.’

वापसी का इंतजार

रजिया का पासपोर्ट इन शब्दों के लिखे जाने तक नहीं बना था और बन भी जाए तो वह भोपाल आ कर सिवा बरसों के बिछड़े बेटे के मिलने के कुछ खास नहीं कर पाएगी. एक मां के पास यह साबित करने का कोई जरिया नहीं है कि उस का बेटा, उस का ही है. मुमकिन है एहतियात बरतते चाइल्ड लाइन वाले ही रजिया को रमजान से न मिलने दें क्योंकि 22 नवंबर को ही कराची से भोपाल आई एक महिला ने खुद को रमजान की मौसी बताते हुए उस से मिलने की ख्वाहिश जाहिर की थी. सबरुन्निशा नाम की इस कथित मौसी के रमजान से मिलने जाने की खबर आम हुई तो कई मीडियाकर्मी भी चाइल्ड लाइन पहुंच गए. सबरुन्निशा के मुताबिक, वह कराची के मूसा कालोनी में रहती है, जहां रमजान रहता है. मीडियाकर्मियों के होहल्ले से बात बिगड़ गई. चाइल्ड लाइन की संचालक अर्चना सराय से इस बाबत पूछा गया तो उन्होंने बताया कि यह महिला अपनी पहचान की जानकारी नहीं दे सकी, इसलिए पुलिस को बुलाना पड़ा.

यानी रमजान की वापसी में उम्मीदों के संग अड़ंगे भी हैं लेकिन रमजान इतना खुश है कि उस ने स्कूल जाना बंद कर दिया है. वह कहता है, अब पाकिस्तान जा कर ही पढ़ूंगा और वहां अपनी तालीम के बारे में बताऊंगा. रमजान के लिए सुकून देने वाली दूसरी खबर बीती 25 नवंबर को आई. पाकिस्तान के अंसार बर्नी ट्रस्ट ने भागादौड़ी कर यह साबित करने में कामयाबी हासिल कर ली कि रजिया और रमजान पाकिस्तान के ही रहने वाले हैं और उन की पहचान से संबंध रखते कागजात इस ट्रस्ट ने सरकार को सौंप दिए. देर इसलिए हुई कि रजिया का परिवार बंगलादेश से माइग्रेट हो कर पाकिस्तान आया था लेकिन उस ने वक्त रहते पाकिस्तान की नागरिकता हासिल कर ली थी. यानी कानूनी उलझन एक हद तक सुलझ गई है और रमजान के घर जाने का सही रास्ता अब खुल और मिल गया है.

अब रमजान एकएक दिन गिन रहा है कि कब ये कानूनी अड़चनें सुलझें और वह मां से मिले. इस से ज्यादा उस को कोई मतलब किसी बात से नहीं, न ही किसी से सरोकार है. चाइल्ड लाइन में अब दोस्तों के साथ उस की बातचीत का एक ही मुद्दा रहता है कि वह जल्दी पाकिस्तान जाएगा और वहां से फोन पर दोस्तों से खूब बातें करेगा और यहां की बातें वहां बताएगा. उस की मासूमियत में अब उम्मीद के पर लग गए हैं. एक नन्हे बच्चे ने बहुत कम उम्र और वक्त में देशदुनिया, सरहदों और रिश्तों का सच देख लिया है. अच्छी बात यह है कि एक सुरक्षित संस्था में आ कर उस का भटकाव खत्म हुआ और उसे पनाह भी मिली. अब इंतजार, बस वापसी का है.

मासिकधर्म पर भारी धर्म

कभी किसी ने खासतौर पर सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों ने तो कल्पना तक नहीं की होगी कि कभी उन्हें प्राकृतिक रूप से होने वाले महिलाओं में मासिकधर्म के मामले पर भी सुनवाई करनी पड़ेगी जिस का धर्मग्रंथों में विस्तार से उल्लेख है. धर्मप्रधान इस देश की अदालतों में रोजरोज बेमतलब के वक्त बरबाद करने वाले जो मुकदमे दायर किए जाते हैं उन में से एक सबरीमाला मंदिर में मासिकधर्म से गुजर रही महिलाओं के प्रवेश का विवाद भी है.

वैसे महिलाओं को कम मुश्किलें नहीं हैं मगर महीने के उन मुश्किल भरे 5 दिनों में बंदिशों का कोई अंत नहीं. घरपरिवार के बड़ेबुजुर्गों को स्पर्श नहीं किया जा सकता. उन्हें पीने के लिए पानी तक नहीं दिया जा सकता. धुले कपड़ों की अलमारी या ड्रौअर को हाथ नहीं लगाया जा सकता. रसोई में प्रवेश की मनाही होती है.

कहने की जरूरत नहीं कि पूजा, मंदिर, भगवान तो इन दिनों में दूर की ही कौड़ी हैं. मासिकधर्म को धार्मिक कुसंस्कार से जोड़ कर इन मुश्किल दिनों में महिलाओं को अछूत, अपवित्र माना जाता है. कुसंस्कार की बलिहारी है कि कुछ धार्मिक स्थलों में तो 5 दिनों की तो छोडि़ए, सिरे से महिलाओं के ही प्रवेश पर रोक है. इस मामले में दक्षिण के मंदिर काफी चर्चा में रहे हैं.

दक्षिण के ब्रह्मचारी अयप्पन के केरल में तिरुवनंतपुरम स्थित सबरीमाला मंदिर मासिकधर्म के दिनों से गुजरने वाली महिलाओं के लिए मैनस्ट्रुएशन स्कैनर लगाने की तैयारी में है. मंदिर के ट्रस्ट ‘सबरीमाला देवासम बोर्ड’ के पदाधिकारी प्रयार गोपालकृष्णन ने केरल में दिए एक साक्षात्कार में कहा है कि मासिकधर्म से गुजरने वाली किसी महिला को मंदिर में प्रवेश करने से रोकने के लिए मंदिर का ट्रस्ट एक विशेष तरह का स्कैनर लगाने पर विचार कर रहा है बशर्ते ऐसा कोई स्कैनर उन के हाथ लग जाए. मंदिर में प्रवेश करने से पहले महिलाओं को स्कैनर से हो कर गुजरना होगा.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने हाल में केरल सरकार से इस बाबत सवाल किया है कि सबरीमाला मंदिर में मासिकधर्म की उम्र वाली महिलाओं के प्रवेश पर बैन क्यों है? कोर्ट ने सरकार से यह भी पूछा है कि क्या यह सही है कि पिछले 1,500 वर्षों से महिलाओं का मंदिर परिसर में प्रवेश वर्जित है?

इस मामले में कोर्ट चाहे जो भी फैसला दे पर मासिकधर्म के वैज्ञानिक पहलू और शारीरिक क्रिया विज्ञान के मूलभूत सिद्धांतों से परे इस दिलचस्प मामले से कई अहम बातें एकसाथ उजागर हुईं जिन में पहली यह कि रजस्वला स्त्रियों से भगवान भी डरता है और उन्हें अछूत मानता है जबकि धर्म के नजरिए से देखें तो यह व्यवस्था भी उसी की बनाई हुई है. ऐसे में यह वाजिब है कि उस ने ऐसी चीज बनाई ही क्यों जिस से खुद उसे डरना पड़े.

दूसरी बात यह सामने आई कि मासिकधर्म से गुजर रही महिला की धार्मिक और सामाजिक स्थिति दलितों व शूद्रों सरीखी हो जाती है.तीसरी सब से अहम बात यह उजागर हुई कि आसानी से तो दूर की बात है, कोई तमाम कोशिशों के बाद भी यह दावा नहीं कर सकता कि फलां महिला रजस्वला वाले दौर से गुजर रही है. इस बात से सबरीमाला सहित तमाम मंदिरों के पंडेपुजारी आशंकित रहते हैं कि कहीं रजस्वला से गुजर रही महिला मंदिर में आ कर उन के ‘प्रभु’ की मूर्ति छू कर उसे अपवित्र न कर दे या फिर बाहर जा कर वह महिला यह हल्ला न कर दे कि वह तो उन के प्रभु को हाथ लगा आई और उसे कुछ नहीं हुआ.

गौरतलब है कि अयप्पा मंदिर में 10 से 50 साल तक की लड़कियों और महिलाओं के प्रवेश पर रोक को ले कर हमेशा से विवाद रहा है. संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का हवाला दिया जाता रहा है. इस प्रतिबंध पर मानवाधिकार संगठन और राष्ट्रीय महिला आयोग भी सवाल उठाते रहे हैं.

हालांकि अभी तक दुनिया में ऐसा कोई स्कैनर ईजाद नहीं हुआ है लेकिन देवासम बोर्ड के पदाधिकारी के इस बयान के साथ विरोधप्रदर्शन शुरू हो गया और मामला अदालत की चौखट तक पहुंच गया है. राज्य सरकार को अदालत में हलफनामा पेश करना पड़ा, जिस में उस ने महिलापुरुष के समानाधिकार की बात कहते हुए मंदिर के इस नियम पर विचार के लिए विद्वानों का एक पैनल बनाने का सुझाव दिया है.

नवंबर से ले कर जनवरी तक लाखों लोग अयप्पा के दर्शन को आते हैं. ऐसे में सरकार का तर्क है कि इतनी भीड़ के बीच महिलाओं को सुविधा देने में चूंकि दिक्कत पेश आती है, इसीलिए व्यावहारिक कठिनाइयों को देखते हुए सरकार ने महिलाओं के लिए अलग से तीर्थयात्रा का समय निर्धारित करने का सुझाव भी दिया है.

केरल के ही पद्मनाभस्वामी मंदिर में भी महिलाओं के प्रवेश पर रोक है. इस से पहले भी लड़कियों के मंदिर में प्रवेश को ले कर विवाद होते रहे हैं. 2006 में कन्नड़ अभिनेत्री जयमाला ने सबरीमाला बोर्ड को फैक्स भेज कर यह दावा किया था कि किशोरावस्था में उस ने एक बार गर्भगृह में भीड़ के साथ प्रवेश किया था. इतना ही नहीं, उस ने अयप्पा की मूर्ति को स्पर्श भी किया था. इस के बाद बहुत बड़ा विवाद खड़ा हो गया था. यहां तक कि जयमाला की गिरफ्तारी भी हुई.

अकेले सबरीमाला, शनि मंदिर ही नहीं, हमारे देश में ऐसे बहुत सारे धार्मिक स्थल हैं जहां महिलाओं के प्रवेश पर रोक है. केवल राजस्थान के पाली जिले में रनकपुर जैन मंदिर, पुष्कर में कार्तिकेय मंदिर में भी महिलाएं प्रवेश नहीं कर सकतीं. छत्तीसगढ़ के मावली माता मंदिर में यह रोक है. रोक का तर्क बड़ा अजीब है.

कहते हैं चूंकि मावली माता कुंआरी हैं इसीलिए महिलाओं का प्रवेश वहां वर्जित है, केवल पुरुष ही वहां पूजा कर सकते हैं. इसी तरह मध्य प्रदेश के मुक्तागीरी जैन मंदिर, जो कि जैनियों का बड़ा तीर्थस्थल है, में पश्चिमी पहनावे में महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंधित है. पुरुष पैंटशर्ट में प्रवेश कर सकते हैं. मध्य प्रदेश में ही जाटखेड़ा गांव में 300 साल पुराना पार्वती देवी का मंदिर है. 20 सीढि़यों की चढ़ाई वाले इस मंदिर में 17 सीढि़यों से ऊपर महिलाओं, लड़कियों को जाने की अनुमति नहीं है. 18वीं सीढ़ी पर लाल रंग से यह चेतावनी लिखी हुई है. लेकिन महिलाएं किसी अपशकुन के डर से सीढि़यां ही नहीं चढ़ती हैं. असम में 500 साल पुराने पतबौसी सत्र मंदिर में महिलाएं नहीं जातीं, हालांकि मंदिर परिसर में लिखित रूप से किसी तरह की चेतावनी या सूचना नजर नहीं आती है.

महिलाएं बेझिझक बढ़ें आगे

धर्म और उस के ठेकेदार भले ही मासिकधर्म से गुजर रही महिलाओं को दुत्कारने और कोसने का अपना धर्म निभाते रहें लेकिन महिलाओं में कतई यह निराशा, हताशा, अवसाद या कुंठा की बात नहीं होनी चाहिए. उन्हें सेनेटरी नेपकिंस के उत्साहभर देने वाले विज्ञापनों से सबक लेना चाहिए जिन में पूरे आत्मविश्वास से बताया जाता है कि उन 5 दिनों में वे कैसे बगैर किसी झंझट या परेशानी के न केवल अपने रोजमर्रा के कामकाज कर सकती हैं बल्कि खेलकूद में भी झंडे गाड़ सकती हैं. यानी दिक्कत की बात गीलापन या चिपचिप नहीं, बल्कि धर्म है जो मासिकधर्म से भी पैसा बनाने के जुगाड़ में है.

ताजे विवाद इस की मिसाल हैं जो महिलाओं ने नहीं, बल्कि पंडों ने परंपराओं का हवाला दे कर खड़े किए. मकसद, अपने कारोबार को इस फंडे पर चलाना है कि इन्हें वंचित रखो, फिर अपनी शर्तों और कीमत पर दे दो. भगवान के दर्शन से शूद्रों और रजस्वला से गुजर रही महिलाओं को दूर रख कर उन में इस उत्पाद के प्रति जिज्ञासा पैदा की गई और अब फसाद खड़े कर दुकान चलाई जा रही है. अदालत का फैसला जब आएगा तब देखा जाएगा लेकिन तबतक कुछ जागरूक और उत्साही महिलाओं, जिन्होंने खुद को आधुनिक भी मान लिया है, ने ऐलान कर दिया है कि वे मंदिरों में जाएंगी और दर्शन वगैरा करेंगी, यही धर्म के दुकानदार और कारोबारी चाह रहे हैं यानी महिलाएं अब भी उन के इशारों पर नाच रही हैं. जबरन मंदिरों में दाखिल हो कर महिलाएं कोई जंग नहीं जीत जाएंगी बल्कि उन की हार तय दिख रही है.

अब होगा यह कि वे मंदिरों में जाएंगी, धर्म की ब्रैंडिंग करेंगी, भीड़ बढ़ाएंगी और दिल खोल कर दक्षिणा भी देंगी. इस से फायदा क्या और किसे, यह बात अगर महिलाएं सोच पाएं तो ही आत्मसम्मान और स्वाभिमान हासिल कर पाएंगी वरना बेवजह की जिद से उन्हें कुछ हासिल नहीं होने वाला, बल्कि वाकई यह साबित हो जाएगा कि वे दलितों जैसी हालत और हैसियत की हैं जो सदियों से मंदिर में जाने की जिद पूरी करने के लिए यही सब करते रहे हैं और उस के एवज में धर्म का निचला हिस्सा बन कर पंडों की मंशा पूरी करते रहे हैं.

लेकिन इस बात में दोराय नहीं कि भारत के गांवों और छोटे शहरों में आज भी लड़कियों में मासिकधर्म के प्रति जागरूकता नहीं है. कई लड़कियां और औरतें आज भी कई सारी गलत जानकारियों, गलतफहमियों, अज्ञानता और पुरानी परंपराओं का शिकार हैं जिन के चलते महिलाओं को काफी तकलीफों का सामना करना पड़ता है. युवतियों की इन्हीं समस्याओं को दूर करने और उन में मासिकधर्म को ले कर जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से अदिति गुप्ता ने अपने पति तुहिन पौल के साथ मिल कर मैंस्ट्रूपीडिया डौट कौम (द्वद्गठ्ठह्यह्लह्म्ह्वश्चद्गस्रद्बड्ड.ष्शद्व) नाम की वैबसाइट बनाई है. अदिति इस वैबसाइट के जरिए बड़े ही रोचक, अनोखे और लुभावने अंदाज में लड़कियों व औरतों में मासिकधर्म के प्रति जागरूकता ला रही हैं.

अदिति की वैबसाइट को हर महीने 2 लाख लोग देखते हैं. इस वैबसाइट में 3 प्रमुख सुविधाएं हैं-क्विक गाइड, सवालजवाब और ब्लौग. वैबसाइट पर लोग मासिकधर्म से जुड़ी बातें जान सकते हैं, सवालजवाब कर सकते हैं तथा व्यावहारिक लेख लिख सकते हैं. अदिति ने 90 पन्नों की एक कौमिक्स भी निकाली है जो हिंदी और अंगरेजी दोनों भाषाओं में उपलब्ध है. अदिति का मानना है, ‘‘धर्म से जुड़ी बहुत सी मान्यताएं ऐसी हैं जिन का कोई वजूद ही नहीं है पर फिर भी वे हमें जकड़े हुए हैं, जैसे कि मासिकधर्म के समय मां ही अपनी बेटी पर रोकटोक करने लगती है कि यह न छुओ, वह न छुओ. यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है, लेकिन जैसे ही किसी एक पीढ़ी की स्त्री मान्यताओं को तोड़ देगी, माहवारी के बारे में सारी गलतफहमियां दूर हो जाएंगी.’’

अदिति का यह कार्य सराहनीय है पर सब से बड़ी विडंबना इस देश की यही है कि बहुत सारे राज्यों में रजस्वला के दौरान महिलाओं का मंदिरों में प्रवेश वर्जित है, रसोई में वे जा नहीं सकतीं, पति से संभोग नहीं कर सकतीं. अचार नहीं छू सकतीं. पेड़पौधों को हाथ नहीं लगा सकतीं, आईने में चेहरा देख नहीं सकतीं. इन राज्यों में गुजरात का नाम सब से ऊपर है. वहां 95 प्रतिशत महिलाओं के रसोई में प्रवेश करने पर बंदिश है.

नेपाल की चौपदी प्रथा

पश्चिमी नेपाल में भी रजस्वला स्त्रियों के साथ अछूतों के समान व्यवहार किया जाता है. पश्चिमी नेपाल के कई इलाकों में माहवारी के दौरान महिलाओं को अपने ही घर के अंदर आने की इजाजत नहीं दी जाती. उन्हें पानी के सार्वजनिक स्रोतों से भी दूर रखा जाता है. वे शादी व अन्य उत्सवों में भी नहीं भाग ले सकतीं.

माहवारी के दौर से गुजर रही महिलाओं को घर से बाहर बने एक दड़बेनुमा छोटे कमरे में रहना पड़ता है. (देखें मुखपृष्ठ)जहां ठंड से बचने व जंगली जानवरों से सुरक्षा के कोई उपाय नहीं होते. यह रिवाज यहीं खत्म नहीं होता, माहवारी वाली महिलाओं को जो व्यक्ति खाना देता है वह भी इस बात का खयाल रखता है कि जो खाना वह दे रहा है उस का स्पर्श भी उस से न हो. इस अमानवीय कुप्रथा के कारण कई महिलाएं व लड़कियां बाहर ठंड से और जंगली जानवरों के कारण मौत का शिकार बन चुकी हैं. नेपाली सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में इस कुप्रथा पर रोक लगा दी थी. पर धर्म के भय में जकड़ा समाज ऐसी कुप्रथाएं मानने के लिए आज भी महिलाओं को बाध्य करता है.

केवल हिंदू ही नहीं, इसलाम में भी रजस्वला महिलाओं के लिए प्रतिबंध है. 15वीं शताब्दी में मुंबई की वर्ली रोड पर बनी सूफी संत हाजी अली की दरगाह के ट्रस्ट ने 2011 से महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया. हालांकि इस प्रतिबंध के खिलाफ भारतीय मुसलिम महिला आंदोलन की ओर से बौंबे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया. संस्था की सहसंस्थापक नूरजहां नियाज का मानना है कि ट्रस्ट का यह कदम असंवैधानिक है. मासिकचक्र महिलाओं के शरीर का प्राकृतिक धर्म है. इस की वजह से महिलाओं को अशुद्ध कैसे करार दिया जा सकता है.

बौंबे हाईकोर्ट के जस्टिस वी एम कनाडे के नेतृत्व वाली पीठ ने हाजी अली ट्रस्ट से इस फैसले पर फिर से विचार करने को कहा. लेकिन ट्रस्ट ने अदालत को पत्र लिख कर बता दिया कि शरीयत कानून के तहत महिलाओं का मुसलिम संत की मजार के बहुत ज्यादा करीब जाना इसलाम के अंतर्गत गंभीर गुनाह माना गया है. ट्रस्ट ने संविधान के अनुच्छेद 26 का हवाला देते हुए धार्मिक मामलों के प्रबंधन को मौलिक अधिकार बताया है. हाजी अली दरगाह के अलावा दिल्ली की जामा मसजिद में सूर्यास्त के बाद और 11वीं सदी में बने हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह में महिलाओं के प्रवेश की मनाही है.

प्राकृतिक है मासिकधर्म

अगर वाकई भगवान नामक कोई शक्ति है तो कम से कम उस ने तो लड़केलड़की का भेद नहीं किया. अगर करता तो आज तथाकथित रूप से उस की यह सृष्टि ही नहीं होती. वैसे इस भेदभाव के लिए अकेले पुरुषवर्ग जिम्मेदार नहीं है. महिलाएं भी बड़ी संख्या में ऐसे अंधविश्वास का समर्थन करती हैं कि महीने के 5 दिनों तक लड़कियों का शरीर अपवित्र रहता है. लगभग हर घर में कुछ महिलाएं हैं जो आंखें मूंदे खुद तो परंपरा के नाम पर इन नियमों का पालन करती ही हैं, अपने बच्चों पर भी यह कुसंस्कार थोपती रहती हैं.

मासिकधर्म शर्मनाक नहीं, प्राकृतिक है. यह बात हर महिला को समझनी होगी, उसे इस कुसंस्कार को तोड़ने के लिए बेझिझक आगे आना होगा जैसा कि मासिक धर्म से जुड़ी परंपराओं के खिलाफ कनाडा में रहने वाली भारतीय मूल की रूपी कौर ने आवाज उठाई है. उन्होंने फोटो शेयरिंग साइट इंस्ट्राग्राम पर एक तसवीर शेयर की थी जिस में एक महिला की पैंट पर खून लगा था, महिला मासिकधर्म के दौर से गुजर रही थी. इंस्टाग्राम ने इस फोटो को जब यह कहते हुए हटा दिया कि यह फोटो ‘कम्यूनिटी गाइड लाइन के खिलाफ है’ तो रूपी ने उस फोटो को दोबारा शेयर किया और लिखा, ‘‘यह तसवीर न तो किसी ग्रुप की भावना को ठेस पहुंचाती है और न ही पोर्नोग्राफी को बढ़ावा देती है. यह कोई स्पैम भी नहीं है. यह मेरी खुद की तसवीर है, पीरियड आना शर्मनाक नहीं, प्राकृतिक है.’’

इंस्टाग्राम ने फिर उस पोस्ट को हटा दिया. विरोधस्वरूप रूपी इंस्टाग्राम के खिलाफ कोर्ट पहुंची, जहां कोर्ट ने रूपी को सही ठहराया और इंस्टाग्राम से माफी मांगने को कहा, जिस के बाद इंस्टाग्राम ने रूपी से माफी मांगी. मासिकधर्म से जुड़े अंधविश्वासों की यह लड़ाई बहुत लंबी है जिस के लिए अनेक रूपी कौर को सामने आना होगा. महिला जब वंश को बढ़ाती है तो पूरा खानदान खुशी मनाता है. जबकि वंश को आगे बढ़ाने के मुख्य आधार यही मासिक ऋतुस्राव ही तो है. यह नए जीवन के बीज का वाहक है. इसीलिए कहींकहीं इस की खुशी मनाई जाती है. कुछ राज्य हैं जहां लड़कियों के मासिकधर्म को धूमधाम से मनाया जाता है. तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, असम ऐसे राज्य हैं जहां लड़कियों के पहले ऋतुस्राव की खुशियां मनाई जाती हैं, परिजनों को भोज दिया जाता है.

असम में यह तोलिनी ब्याह के नाम से जाना जाता है. वहां मासिकधर्म शुरू होने पर केले के पेड़ से लड़की का ब्याह रचाया जाता है. पहले यह परंपरा केवल ब्राह्मण और निचली जाति में थी. हालांकि ब्राह्मण इसे छिप कर मनाया करते थे क्योंकि उन के बीच लड़की की शादी माहवारी शुरू होने से पहले कर दिए जाने का रिवाज था पर अब असम के हर वर्ग में यह परंपरा बड़ी धूमधाम के साथ चल पड़ी है. असम में ही लड़कियों के मासिकधर्म शुरू होने पर परिजनों को भोज दे कर खुशियां मनाई जाती हैं. हालांकि इस परंपरा में अंधविश्वास का भी पुट है और इसी कारण कड़े नियम भी हैं. पहला ऋतुस्राव शुरू होने के पहले दिन केवल पानी पी कर रहना पड़ता है, जमीन पर सोना होता है. दूसरे व तीसरे दिन फल और कच्चे दूध पर रहना पड़ता है. पका हुआ खाना उस के लिए वर्जित होता है. कहींकहीं तो लड़की को अपना खाना खुद बनाना पड़ता है. 3 दिनों तक लड़की को सूर्य की रोशनी से भी बचाया जाता है. जब तक रस्म पूरी न हो जाए, लड़की किसी पुरुष का मुंह नहीं देखती.

लड़की तीसरे दिन ऋतुस्नान के बाद ही कपड़े बदलती है. उसे पारंपरिक मेखला पहनाया जाता है. लड़की को सोनेचांदी के जेवर से दुलहन की तरह सजाया जाता है और केले के पेड़ के साथ उस का गठबंधन किया जाता है. लड़की की मामी अपने कंधे पर उसे उठा कर पूजास्थल तक लाती है. कुछ रस्मोरिवाज के बाद उस की मांग में सिंदूर भरा जाता है. शादी के बाद गोदभराई की रस्म की जाती है. उस के बाद पान, तांबुल और फूल वगैरा ले कर अंगोछे में बांध दिया जाता है. यह अंगोछा बच्चे का प्रतीक होता है. भोज में शामिल महिलाएं इस बच्चे को अपने गोद में लेती हैं. इस के बाद लड़की को भरपूर खाना खिलाया जाता है, जिस में मांस, मछली, चावल और चटनी समेत तरहतरह के व्यंजन व पकवान शामिल होते हैं.

कहते हैं इस उत्सव का मकसद यह जताना होता है कि लड़की ब्याह लायक हो गई है. इस के बाद बिहू उत्सव के दौरान कोई लड़का अगर किसी लड़की को पसंद कर लेता है तो वे भाग कर शादी करते हैं. ऐसे में शादी करवाने का मातापिता का अरमान अधूरा रह जाता है. इसीलिए पहली माहवारी शुरू होने पर इस मौके को धूमधाम से मनाया जाता है.

हर राज्य में हावी धर्म

आंध्र प्रदेश में भी पहले ऋतुस्राव का जश्न मनाया जाता है. लेकिन इन मुश्किल दिनों में बहुत सारी बंदिशें होती हैं. पहली बार रजस्वला हुई लड़की को लगातार 21 दिनों तक घर के एक कोने में लगभग बंद कर के रखा जाता है, ताकि उस पर किसी पुरुष की नजर न पड़े. यही नहीं, मौसम कोई भी हो, कमरे की पवित्रता को बरकरार रखने व बुरी ताकतों को दूर रखने के मकसद से 21 दिनों तक 24 घंटे आग जला कर रखी जाती है. बताया जाता है कि यह परंपरा तकरीबन हर जाति, समुदाय व वर्ग में है. एक तो लड़की का सामना पहली बार ऐसे शारीरिक बदलाव से होता है, दर्द और पीड़ा अलग से होती हैं, उस पर इतनी तरह की बंदिशें.

सदियों के संघर्ष के बाद आज लड़कियां हर जगह लड़कों के साथ चल रही हैं. जिन तमाम पेशों को परंपरागत रूप से लड़कों का माना जाता था, उन में आज लड़कियों को भी अपनी काबिलीयत साबित करने का मौका मिल गया है. लेकिन महीने के 5 दिन लड़कियों के जीवन पर अब भी भारी पड़ रहे हैं. महिलाओं को चाहिए कि वे उन 5 दिनों में ही नहीं, कभी भी मंदिरों में न जाएं. जो दुकानें उन्हें दोयम दरजे का कहती हैं, उन्हें दूर से ही ‘गुडबाई’ कर लें क्योंकि उन की हालत व सोच सुधर रही है. शिक्षित और सभ्य समाज उन्हें मासिकधर्म के दिनों में पहले जैसा तिरस्कृत नहीं करता. वे खाना बना रही हैं, दफ्तर भी जा रही हैं, पुरुषों से ज्यादा मेहनत भी कर रही हैं. मासिकधर्म को ले कर जो थोड़ेबहुत पूर्वाग्रह हैं वे दूर हो रहे हैं तो इस की वजह कोई धर्म नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता है जो शिक्षा से आ रही है.

बदलते दौर में बदलती सोच

मासिकधर्म के दिनों में नए दौर की युवतियां कोई परहेज नहीं करतीं. न ही वे किसी की परवा करतीं लेकिन नए विवाद उन में उत्सुकता पैदा कर रहे हैं. भले ही ऐसी युवतियों व महिलाओं की संख्या अभी कम हो लेकिन उन की सशक्तता जिन कथित कमजोरियों पर भारी पड़ती है, मासिकधर्म उन में से एक है. जाहिर है वक्त के साथ यह तादाद और बढ़ेगी. औरत होना और मासिकधर्म से गुजरना कोई पाप नहीं है, न ही बेचारगी का पर्याय है पर मंदिर जाना, जबरन दाखिल होना, घंटेघडि़याल बजाना, पैसे चढ़ाना, पंडेपुजारियों के पांव छूना जैसे कृत्य जरूर उन्हें बेचारी साबित करने के लिए काफी हैं जिस के लिए एक हद तक वे ही जिम्मेदार हैं. बदलते हालात में खुद को ढाल चुके पुरुष तो चाहने लगे हैं कि महिला घर के बाहर जाए और पैसा कमाए जिस से घरगृहस्थी की गाड़ी बेहतर ढंग से चले. ऐसे में महिला बाहर मंदिर में जा कर पैसा और वक्त बरबाद करेगी तो परिवार व समाज में बन रहे अपने मुकाम को ही खोएगी.       

औफिस में न बन जाएं पेज थ्री सैलिब्रिटी

‘‘डाक्टर साहिबा, मैं बहुत परेशान हूं. मेरे औफिस के कर्मचारी मुझे ले कर हर वक्त गौसिप करते हैं. ऐसा लगता है कि उन की आपसी बातचीत में चर्चा का विषय बस मैं ही होती हूं. मैं क्या खाती हूं, क्या पहनती हूं, कौन से गाने सुनती हूं, औफिस के बाद कहां और किस के साथ जाती हूं, किसे देख कर मुसकराती हूं…बस, यही सब. हर कोई मुझे कनखियों से देखता है और होंठ दबा कर रहस्यमयी तरीके से मुसकरा देता है. उन की हरकतों से कभीकभी तो इतना दम घुटता है कि औफिस जाने का मन ही नहीं करता. इसी समस्या के चलते मैं अब तक कई औफिस बदल चुकी हूं. यहां भी सब चटखारे लेले कर मेरी ही चर्चा करते थे. मेरी समझ में नहीं आता कि लोग मेरी लाइफस्टाइल और वर्किंगस्टाइल से इतनी ईर्ष्या क्यों करते हैं? कृपया मेरा मार्गदर्शन करें.’’

रोनिता कुंद्रा, उम्र 22 वर्ष (अखबार में डाक्टर की सलाह कौलम में प्रकाशित पत्र)

मिताली ने पहली जौब जौइन की. बड़े उत्साह के साथ उस ने औफिस जाना शुरू कर दिया. लेकिन बमुश्किल 8-10 दिन बीते होंगे. कई कलीग्स ने उसे प्रपोज करना शुरू कर दिया. कोई उसे कौफी पिलाने को उतावला था तो कोई मल्टीप्लैक्स में मूवी दिखाने को. एक ने तो मुंह पर कह दिया, ‘‘तुम बड़े खुले विचारों वाली लगती हो. चलो किसी होटल में चलते हैं.’’

मिताली ने बड़ी बेइज्जती महसूस की. रोंआसी हो कर उस ने उसी दिन से औफिस छोड़ दिया. मिताली ने कभी सोचा भी नहीं था कि लोगों के साथ बिंदास हो कर हंसीमजाक करने और वैस्टर्न स्टाइल के मौडर्न कपड़े पहनने से औफिस में उस के कैरेक्टर को ले कर इस तरह की धारणा बन जाएगी.

ऐसी समस्या का सामना औफिस जाने वाली युवतियों को कई बार करना पड़ जाता है. कलीग्स, क्लाइंट या बौस उन के काम में दिलचस्पी न ले कर पर्सनल लाइफ में ज्यादा रुचि लेने लगते हैं. दरअसल, ये युवतियां पहनावे, व्यवहार और हावभाव में असावधानी बरतती हैं और पेज थ्री सैलिब्रिटीज की तरह सजधज कर अपने औफिस या क्लाइंट के पास जाती हैं. इस वजह से लोगों में गलत संदेश चला जाता है और वे उन्हें ‘अवेलेबल’ या ‘चालू’ मान लेते हैं.

अगर आप चाहती हैं कि औफिस में जीना दुश्वार न हो, लोग आप को फैशन आइकन के रूप में न जान कर आप के काम के लिए पहचानें तो कुछ बातों पर ध्यान देना जरूरी है :

शोऔफ से बचें

याद रखें आप औफिस काम करने जाती हैं, नए फैशन का प्रदर्शन करने नहीं. आप को स्वत: अनुशासित हो कर अशोभनीय और अंग प्रदर्शन करने वाले कपड़ों से बचना चाहिए. नित नए हील सैंडिल, तड़कभड़क और ग्लिटर करने वाले कपड़े व एक्सेसरीज औफिस के लिए नहीं, पार्टियों के लिए होते हैं. गाढ़ी लिपस्टिक, कलर्ड आई शेडो और गालों पर रूज लगा कर औफिस जाएंगी तो स्वाभाविक है लोगों का ध्यान आप के काम पर कम मेकअप पर ज्यादा होगा.

पर्सनल न हों

औफिस में सहकर्मियों से दोस्ती हो जाए तो उसे औफिस तक ही निभाएं. न किसी को अपने घर आने का न्यौता दें, न खुद किसी के घर जाएं. हां, अपनी निजी जिंदगी के बारे में ज्यादा बातचीत कर के खुली किताब न बन जाएं. चाहे वह महिला सहकर्मी हो या पुरुष कलीग. बाद में ये बातें जंगल की आग की तरह फैल जाती हैं. महीने में एकाध बार किसी वजह से अपने सहकर्मी के लिए घर से टिफिन ले जाना अलग बात है, लेकिन रोजरोज किसी पुरुष सहकर्मी के लिए आप घर से ले जा कर खाना खिलाएंगी तो लोगों को उस का दूसरा अर्थ निकालने में देर नहीं लगेगी.

हाथमुंह पर नियंत्रण

सहकर्मियों के साथ बातचीत के दौरान किसी जोक के कारण या मजाक के कारण हंसनामुसकराना स्वाभाविक है, लेकिन अति उत्साहित हो कर ठहाके लगाना, ताली बजाना, उन के गाल पर चुटकी काटना, पीठ पर धौल जमाना या आंख मारना आप के लिए भले ही सिंपल व्यवहार या आदत हो, लेकिन सामने वाले को इस से गलत संकेत मिलता है. वह समझता है आप उस से ‘बहुत फ्रैंडली’ हो गई हैं. इसी प्रकार किसी के कान में फुसफुसा कर बात करने या काफी देर तक अकेले बैठ कर बातें करने से भी बचें.

विनम्र मगर दृढ़ बनें

औफिस में सभी सहकर्मियों के साथ विनम्र और आत्मीय व्यवहार करें और उन की यथासंभव मदद करें लेकिन अगर आप को लगे कि कोई सहकर्मी आप की विनम्रता को सीधापन या मूर्खता समझ कर आप को गलत तरीके से छू रहा है या कोई गलत हरकत कर रहा है तो पूरी दृढ़ता के साथ उस का विरोध करें. कोई द्विअर्थी बातों के जरिए गलत प्रस्ताव रखता हो तो पहली बार में ही मुंहतोड़ जवाब दे देने में ही समझदारी है ताकि वह अपनी सीमाओं को समझ जाए.

मोबाइल को संभाल कर रखें

पर्सनल मोबाइल या टैब में हम अपने खास मित्रों के कई ऐसे मैसेज सहेज कर रखते हैं जिन्हें सब के साथ शेयर नहीं किया जा सकता. कुछ निजी तसवीरें भी ऐसी हो सकती हैं, जिन्हें सीक्रेट रखना जरूरी है. ऐसे में सदैव सजग रहें कि कहीं आप का मोबाइल या टैब किसी दूसरे के हाथ न लग जाए. और वह ऐसे मैसेज या तसवीरों का गलत फायदा न उठा ले. बेहतर होगा पर्सनल गैजेट्स को लौक रखें.

सोशल मीडिया पर संभल कर

औफिस में लोग फेसबुक या ट्विटर पर आप को आसानी से खोज सकते हैं. बेहतर होगा कि कलीग्स को सोशल नैटवर्किंग पर न जोड़ें. उन्हें फ्रैंड लिस्ट में शामिल करने से आप की निजता छिन जाएगी. कई बार खुराफाती दिमाग के लोग यहां मौजूद आप की तसवीरों को गलत ढंग से भी पेश कर सकते हैं इसलिए सोशल मीडिया पर बेहद सतर्क रहें.

जीवन सरिता: बड़ा कौन, छोटा कौन

भारतीय समाज में यह आम धारणा है कि जिस व्यक्ति के पास अधिक धन, संपदा या संपत्ति हो या जिस व्यक्ति के पास बड़ा पद हो वही बड़ा व्यक्ति है, वही प्रतिष्ठित है. यदि किसी व्यक्ति के पास धन, संपदा या बड़ा पद नहीं है तो समाज में उसे प्रतिष्ठा की दृष्टि से नहीं देखा जाता. किसी के मन की संवेदनाएं, मानवतावादी दृष्टिकोण, बृहद हृदय या मन, किसी भी व्यक्ति को वांछित सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. मन में यह प्रश्न बारबार कौंधता है कि क्या बड़ा पद या पैसा ही, किसी व्यक्ति को बड़ा कहने के लिए पर्याप्त है? क्या यही किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को आंकने का एकमात्र पैमाना है?

जीवन के 65 पतझड़ झेलने के बाद भी मैं इस सामाजिक मान्यता को तोड़ने का प्रयास कभी नहीं कर पाया कि पैसा, पद या बड़ा व्यापार, किसी भी व्यक्ति को बड़ा मानने का आधार नहीं है, न हो सकता है. बस, मैं स्वयं भी जीवनभर समाज की इसी विचारधारा के साथ ही बहता चला गया. परंतु अकस्मात हाल में ही घटी 2 छोटीछोटी घटनाओं ने मुझे यह मानने के लिए विवश कर दिया कि पद या पैसा बड़ा होने का आधार नहीं है, बड़ा होने का एकमात्र आधार तो बड़ा मन होता है, वृहद हृदय होता है. यानी व्यक्ति की सोच होती है, व्यक्ति का ज्ञान होता है जो किसी को महान बनाता है. पद या पैसा न होने पर भी व्यक्ति पद व पैसा रखने वाले व्यक्ति से बड़ा हो सकता है.

दोनों घटनाओं को समझने के लिए यह आवश्यक है कि मैं पहले स्वयं के बारे में बता दूं. वास्तव में मैं ने एक न्यायाधीश के रूप में जीवन व्यतीत किया है और न्यायाधीश के कार्यकाल में लगभग 5 वर्ष की अवधि तक उच्च न्यायालय में रजिस्ट्रार जनरल के पद पर भी कार्य किया है. लगभग 31 वर्ष की सेवा के बाद सेवानिवृत्त होने पर फिर नियुक्ति भी हो गई थी और पद की सभी सुविधाएं प्राप्त होती रही थीं. न्यायाधीश का पद समाज में प्रतिष्ठित पद माना जाता है. समाज की इसी मान्यता के आधार पर मैं स्वयं को समाज का प्रतिष्ठित व्यक्ति मानता रहा और इसी भ्रम में जीता रहा. पद की गरिमा के अनुसार मुझे सब सुविधाएं भी प्राप्त रहीं. 3 महीनों की अवधि में मेरे साथ 2 घटनाएं घटित हो गईं जिन से मेरा प्रतिष्ठित होने का मिथ्या भ्रम चूरचूर हो गया.

व्यक्ति कर्म से होता है बड़ा

पहली घटना नैनीताल की है, जहां पर मैं ने अपर जिला न्यायाधीश एवं फिर उच्च न्यायालय में रजिस्ट्रार जनरल के पद पर कार्य किया है और अब फिर नियुक्ति के बाद भी मैं, प्रत्येक माह में 1 सप्ताह के लिए कैंप कोर्ट करने के लिए नैनीताल जाता हूं. सितंबर 2015 में अकस्मात मुझे उच्च न्यायालय के मेरे कार्यकाल में मेरे अनुसेवक का भाई मिला जो नैनीताल नगर के पास ही के गांव का निवासी है व उच्च न्यायालय में कार्यकाल के दौरान वह अपने भाई के साथ कई बार मुझ से मिला भी था. तब वह बेरोजगार था और मुझ से बारबार यही अनुरोध करता था कि वह अत्यंत निर्धन है, मैं उसे कोई कार्य दिला दूं ताकि उस के जीवन का निर्वाह हो सके. परंतु मैं उस की कोई सहायता नहीं कर पाया था.

अब वह संभवतया दैनिक मजदूरी पर कार्यरत है. अनायास ही भेंट होने पर उस ने मेरे पैर छुए और पूछा कि आप कहां ठहरे हो, कैसे हो और फिर कहा, ‘‘मैं आप को कुछ लहसुन देना चाहता हूं जो गांव में मेरे घर के आंगन में पैदा हुआ है.’’ और अगले दिन उस ने लगभग आधा किलो लहसुन मुझे ला कर दे दिया जो मेरे लिए एक बहुत छोटी वस्तु थी. मेरे लिए उस का मूल्य अल्प था परंतु उस ने यह कार्य कर के मुझे यह सोचने को विवश कर दिया कि भले ही वह निर्धन है, भले ही मैं उस के लिए कुछ न कर पाया, तब भी उस ने लहसुन को देने में कृतज्ञता प्रदर्शित की, जो उस के बड़ेपन को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त थी. मेरे पास भले ही कितने साधन हों परंतु मैं ने उस के लिए कभी कुछ नहीं किया. उस ने अपने कर्म से मुझे बता दिया कि निर्धन व साधनहीन हो कर भी कोई व्यक्ति कितना बड़ा हो सकता है.

दूसरी घटना अक्तूबर 2015 में देहरादून में घटित हुई जहां पर मैं आवासित हूं. आवास के पास ही स्थित ‘मानव केंद्र’ नाम का एक विस्तृत आश्रम है जहां मैं सुबह की सैर को जाता हूं. अकसर वहां पर मुझे बृजमोहन नामक एक कर्मचारी मिलता है व बड़े सम्मान के साथ नमस्ते करता है. वह आश्रम में ही रहता है. उस का परिवार उस के साथ नहीं रहता है. वह आश्रम में घास इत्यादि काटने का काम करता है. उस के पास ठीक से पहनने के कपड़े नहीं हैं. चूंकि सर्दी शुरू हो रही थी, सो, मैं ने घर पर बुला कर उसे एक अपना पुराना स्वेटर व 50 रुपए दे दिए. और ऐसा कर के मेरे मन में आया कि संभवतया मैं ने कोई बड़ा काम किया है.

मेरी इस छोटी सी उदारता से तो बृजमोहन एकदम खुश हो गया था परंतु मेरा यह भ्रम बहुत दिनों तक नहीं रह सका. इस घटना के 2 दिन बाद ही सुबह के भ्रमण के समय ही अचानक बृजमोहन ने मुझ से पूछा, ‘‘बाबूजी, क्या आप बाजरे की रोटी खाते हो?’’ मैं ने कहा, ‘‘हां, खाता तो हूं. परंतु यह बात तुम क्यों पूछ रहे हो?’’ तब उस ने बताया कि वह दीपावली पर अपने गांव जाएगा जो रेवाड़ी (हरियाणा) के पास है. वहां पर उस के खेत में बाजरे की फसल होती है. उस में से कुछ आप के लिए लाऊंगा. मैं ने कहा कि ठीक है, लेते आना, परंतु मैं उस का पैसा दूंगा. तब उस ने कहा, ‘‘बाबूजी, बाजरे का पैसा मैं बिलकुल नहीं लूंगा. वह तो मेरे खेत में उत्पन्न होता है.’’

उस की यह बात सुन कर मैं दंग रह गया. वह आश्रम में भोजन करता है. किसी के दिए हुए कपड़े पहनता है. उस के पास धन भी नहीं है तब भी वह मुफ्त में मुझे बाजरा देना चाहता हूं. उस के मन का बड़प्पन देख कर तो मुझे लगा कि मैं स्वयं उस के सामने कितना छोटा हूं कि मैं एक पुराना स्वेटर व 50 रुपए दे कर स्वयं को गौरवान्वित समझ रहा था, जो मेरा भ्रम मात्र था बृजमोहन ने मेरे दिए 50 रुपए के बदले मुझे 500 रुपए का बाजरा लाने का प्रस्ताव कर के मुझे बता दिया कि पद या पैसा बड़ा नहीं, बड़ा तो मन है. बृजमोहन ने मुझे दर्पण दिखा दिया कि सबकुछ होते हुए भी मैं बड़ा नहीं जबकि कुछ नहीं होते हुए भी वह बड़ा है और तब से मैं यह निर्णय नहीं कर पाता कि बड़ा कौन और छोटा कौन.

इन दोनों घटनाओं ने मुझे यह सिखा दिया कि धन, पद या संपदा किसी व्यक्ति को महान नहीं बनाते, बल्कि किसी व्यक्ति की विस्तृत एवं मानवता वाली सोच ही उसे प्रतिष्ठा प्रदान करती है.

मीत तुम्हारी वो बातें

हंसी रेशमी अधरों वाली
सजीसंवरी थी प्रातें
बिसरा मन का सूनापन
पाई थीं सतरंगी सौगातें

तनहा सी एक दुपहरी में
आए थे बादल मंडराते
भर अंक में की थी तुम ने

स्नेह की निर्झर बरसातें
ढलती थी सांझ सुरमई
पलपल प्यार को पाते
बातें करते कट जाती थीं

महकीचहकी वो रातें
किस से कहते कैसे कहते
मीत तुम्हारी वो बातें
कैसे सुनहले दिन बीते
कैसी बीतीं रुपहली रातें.

इन्हें भी आजमाइए

– बेकिंग सोडा कीटनाशक को पूरी तरह से साफ करता है, बड़े कटोरे में 5 गिलास पानी भरें फिर उस में . 4 चम्मच बेकिंग सोडा मिलाएं. अब इस पानी में सब्जियां और फल डुबो दें और 15 मिनट के बाद निकाल कर सुखा लें. ये खाने के लिए सुरक्षित हैं.

– खीरे में तुरंत मुंहासे को ठीक करने और साफ करने की शक्ति होती है. खीरे को कस लें और अपने चेहरे पर 1 घंटे के लिए लगाएं और फिर ठंडे पानी से चेहरा धो लें. इस से न केवल मुंहासे ठीक होते हैं बल्कि यह मुंहासों को होने से रोकता भी है.

– पीरियड्स में महिलाएं दर्द को कम करने के लिए बेकार की दवाएं न खाएं क्योंकि यह हार्मोन पर बुरा असर डालेगीं और शरीर पर भी. अच्छा होगा कि कोई घरेलू उपचार अपनाएं.

– आंवला हो या उस का पाउडर, दोनों ही बालों को काला करने में मददगार होते हैं. आंवले का रस अगर बादाम के तेल में मिक्स कर के बालों में लगाया जाए तो बाल काले होंगे.

– सौल्मन फिश में ओमेगा-3 फैटी एसिड होता है जो लहसुन के साथ मिल कर शरीर को काफी फायदा पहुंचाता है.

– पैनकेक के लिए कैचप की स्क्वीज बोतल का प्रयोग करें. इस से पैनकेक बनाने में आसानी होगी.

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