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हमारी बेडि़यां

हमारे समाज में आज भी बहुत सी कुरीतियां फैली हैं. मुझे उसी रास्ते से गुजरना पड़ता है जिस पर से मृत शरीर को ले कर जाते हैं. कभीकभी रास्ते में बहुत से खीलमखाने बिखरे हुए मिलते हैं. परंपरानुसार लोगों का यह विश्वास है कि ऐसा करने से वृद्ध लोगों की आत्मा को शांति मिलती है. ऐसा कर के वे वृद्ध व्यक्ति को सम्मान दे रहे हैं. यह कैसी शांति व सम्मान है? खीलमखाने तो सड़क पर बिखरे पड़े रहते हैं, राह चलते व्यक्तियों के पैरों से वे कुचले जाते हैं. वे बाद में किसी मतलब के नहीं रह जाते.

– संतोष शर्मा, मोदी नगर (उ.प्र.)

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‘मंगल’ शब्द वैसे तो शुभ होने से जुड़ा है लेकिन शानू के अभिभावक उस की शादी किसी मांगलिक लड़के के साथ ही करना चाहते थे, अन्यथा वे मानते थे कि कुछ अनर्थ हो जाएगा. सीए करने के बाद शानू मुंबई में एक अच्छी कंपनी में काम करने लगी थी. वह समयसमय पर घर आती रहती थी. अंधविश्वास के कारण उस के मातापिता को बिरादरी का ही सीए लड़का जो मांगलिक भी हो, मिलना मुश्किल होता जा रहा था. उम्र कहां रुकती है, 35 वर्ष के बाद मातापिता ने हार मान कर कहा, चलो, अब समझौता करना पड़ेगा अन्यथा शानू कुंआरी ही रह जाएगी. आज शानू 5 सालों से सीए लड़के, जो मांगलिक नहीं है, के साथ शादी कर के बड़े आराम का जीवन काट रही है. कोई अनर्थ नहीं हुआ. अभिभावकों के अंधविश्वास के चक्कर में वह 40 की भी हो कर कुंआरी ही रहती. उस के मातापिता को अब एहसास हो गया कि जमाना कितना तरक्की कर रहा है और वे कितने पीछे रह गए.

– तरुणा मालपाणी

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हमारे यहां रिवाज है कि शादी के समय जब दूल्हा द्वारपूजा से शादी के मंडप तक आता है, तो उसे पैदल नहीं आना होता, उस का बड़ा भाई गोद में उठा कर लाता है. मेरी बहन की शादी में उस के सब से बड़े जेठ को यह काम करना था. उन का कुछ महीने पहले ही स्कूटर से ऐक्सिडैंट हुआ था. शादी के दिन वे माने नहीं और जिद पर अड़ गए कि अपने छोटे भाई को वे ही गोद में उठा कर ले जाएंगे. बस, फिर क्या था, भाई को उठा कर ले जाने की खुशी में उन्हें यह ध्यान ही नहीं रहा कि 5 मिनट के रास्ते में उन की कमर का क्या हाल हुआ. डाक्टरी जांच पर पता चला कि वे स्लिप डिस्क के शिकार हो गए हैं और 3 महीने का बैडरैस्ट करना पड़ेगा.

वाह री, हमारी बेडि़यां, 21वीं सदी में तो तोड़ दे इन्हें हमारा समाज, वरना बैठेबिठाए कितने कष्ट झेलने पड़ जाते हैं.

– श्वेता मिश्रा, गुड़गांव (हरि.)

कमजोरियों को कामयाबी में बदलती प्रियंका चोपड़ा

प्रियंका चोपड़ा ने बौलीवुड में बतौर अभिनेत्री बेहद औसत शुरुआत की थी. उन्हें देख कर कोई नहीं कहता था कि यह सितारा एक दिन हौलीवुड में भी अपनी कामयाबी के झंडे गाड़ देगा. बीते दिनों प्रियंका ने अपने अमेरिकी टीवी शो ‘क्वांटिको’ के लिए बैस्ट एक्ट्रैस का ‘पीपुल्स चौइस’ अवार्ड जीत कर इतिहास रच दिया. वे पहली भारतीय अभिनेत्री हैं जिन्होंने इस अंतर्राष्ट्रीय खिताब को अपने नाम किया है.

बीता साल प्रियंका के लिए कई माने में खास रहा. पहले तो फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ की कामयाबी, फिर अमेरिकी शो में मिली शोहरत और हालिया रिलीज ‘जय गंगाजल’ का ट्रेलर. प्रकाश झा की फिल्म ‘गंगाजल’ के इस सीक्वल में प्रियंका खाकी वरदी में दबंगई करेंगी तो वहीं क्वांटिको के अगले सीजन की भी तैयारियां उन के ‘सितारा’ कद को ऊंचा करने का काम कर रही हैं. करीब 50 फिल्मों में अलगअलग भूमिका निभा कर अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा देश में ही नहीं, विदेशों में भी काफी पौपुलर हो चुकी हैं. वे बौलीवुड की सब से अधिक फीस पाने वाली अभिनेत्रियों में से एक हैं. फिल्मी बैकग्राउंड से न होने के बावजूद उन्होंने अपनेआप को हर चरित्र में सिद्ध किया, अपनी अलग पहचान बनाई. यह काम आसान नहीं था. जब उन्होंने फिल्मी क्षेत्र में कदम रखा तो लोगों ने उन्हें कई तरह से निराश किया, पर वे डटी रहीं और कामयाब हुईं.

सफलता के इस मुकाम पर पहुंच कर प्रियंका कहती हैं, ‘‘मैं बहुत खुश हूं कि मेरा काम सब को पसंद आया. काशीबाई का चरित्र मेरे लिए आसान नहीं था. इतने कम संवाद में भूमिका निभाना कठिन था. यह चरित्र मेरे लिए चुनौती था.

‘‘मेरा कैरियर ही मेरी ‘ग्रोथ’ है. मुझे हर बार हर चरित्र से डर लगता है. विदेश में मैं जब ‘क्वांटिको’ कर रही थी तो मेरे पसीने छूट रहे थे. क्योंकि मैं अमेरिकन नहीं, फिर भी उन्हें विश्वास दिलाना था कि मैं अमेरिकन हूं, जो मुझे अभिनय के द्वारा करना था. मैं ने वहां का संवाद बोलने का तरीका सीखा, आज 120 जगहों पर क्वांटिको प्रसारित किया जा रहा है. मेरा नाम ‘बैस्ट एक्ट्रैस’ के लिए वहां नौमिनेट हुआ और अवार्ड भी मिला.’’

काशीबाई के किरदार को ले कर प्रशंसित हो रही प्रियंका इस किरदार की तैयारी को ले कर बताती हैं, ‘‘महाराष्ट्र में रहने के बाद मैं इस चरित्र को करने को काफी उत्सुक थी. मेरी पूरी टीम इस के पीछे थी. मुझे साड़ी पहनने में 2 घंटे का समय लगता था. उस जमाने में ‘रौयल्टी’ का पैमाना अलग होता था. राजा रवि वर्मा की पेंटिंग ही हमारी प्रेरणा थी. मैं एक पेशविन की भूमिका निभा रही थी, ऐसे में हेयर और मेकअप पर अधिक ध्यान देना था. मेरे बालों में एक भी इलैक्ट्रौनिक वस्तु का प्रयोग नहीं किया गया. मेरी हेयरड्रैसर हाथ से ‘कर्ल’ बनाती थी जिसे बनाने में डेढ़ घंटा लगता था ताकि विश्वसनीय लगे. बिंदी मेरे मेकअप आर्टिस्ट सिंदूर से रोज पेंट करते थे, क्योंकि बिंदी चिपका नहीं सकते थे.

‘‘मैं एक कलाकार हूं. हर चरित्र को निर्देशक के अनुसार निभाना मेरा काम है. फिल्म सफल होती है तो लगता है कि मैं उस चरित्र में उतर पाई. बर्फी, मैरी कौम, फैशन, बाजीराव मस्तानी-ये मेरे जीवन की माइलस्टोन फिल्में हैं.’’

‘मिस वर्ल्ड’ से यहां तक के सफर को ले कर प्रियंका का मानना है, ‘‘यहां तक पहुंचना मेरे लिए गर्व की बात है. 17-18 साल पहले जब मैं ने अभिनय के क्षेत्र में कदम रखा तो पता नहीं था कि मैं कौन हूं, कैसे कपड़े पहनने हैं, कैसे बात करनी है, 6 से 7 साल लगे मुझे ये सब समझने में. समझ में आ गया है कि आप सब को खुश नहीं कर सकते. सब में कुछ न कुछ कमी है. उसी पर काम किया. मुझे याद है जब मैं इंडस्ट्री में आई थी, लोग मुझे काली और सांवली कहते थे. मैं ने अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बनाया. मेहनत से काम किया. इतना बेहतर कि कोई मना ही न कर सके.’’

समाज को ले कर आप क्या बदलाव चाहती हैं, इस विषय पर उन का कहना है, ‘‘हमारे देश में 60 प्रतिशत युवा ऐसे हैं जिन्हें नौकरी नहीं मिलती. उन के लिए नौकरी की व्यवस्था और महिलाओं के लिए पूरी शिक्षा, ताकि वे अपने परिवार व समाज की सोच को बदल सकें.’’

फिलहाल कैरियर के लिहाज से वे स्वीकार करती हैं, ‘‘मेरे पास 6-7 फिल्मों की चौइस है जिन में से केवल 2 फिल्में करने का समय है, क्वांटिको की शूटिंग करनी है. सिंगिंग का काम थोड़ाथोड़ा कर रही हूं. कुछ रीजनल फिल्म बनाने की योजना है. हौलीवुड की फिल्में मैं तब कर पाऊंगी जब वे मेरे अनुसार होंगी और उन के लिए मेरे पास वक्त होगा.’’

हालांकि इस से इनकार नहीं किया जा सकता कि मैरी कौम, एतराज और बाजीराव मस्तानी जैसी चंद फिल्में छोड़ कर उन के द्वारा निभाए गए किरदार औसत ही रहे लेकिन मार्केटिंग में शाहरुख खान की तरह प्रियंका ने कैरियर को एक नई दिशा दी. फिलहाल प्रियंका साल में ज्यादातर वक्त अमेरिकी शो की शूटिंग और वहां की ग्लैमरस पार्टियों में बिताती हैं. अभी तो उन्हें काम मिल रहा है लेकिन हौलीवुड का रवैया एशियन कलाकारों के साथ कुछ खास नहीं रहा है. कबीर बेदी, सईद जाफरी से ले कर ओमपुरी व नसीरुद्दीन शाह जैसे नाम इस बात की तसदीक करते हैं. बहरहाल, प्रियंका इन दिनों अपने कैरियर को ले कर बेहद गंभीर हैं और यह जरूरी भी है.

फिल्म रिव्यू: वजीर

इस फिल्म का शतरंज के खेल से सीधेसीधे तो कुछ लेनादेना नहीं है परंतु फिल्म में जो चालें दिखाई गई हैं वे शतरंजी चालों जैसी हैं. फिल्म में शतरंज की चालों और रंगबिरंगे बोर्ड दिखाए गए हैं, जिन्हें शतरंज के खेल की जानकारी नहीं है उन्हें बताया गया है कि इस खेल में घोड़ा ढाई चाल चलता है, ऊंट टेढ़ी चाल चलता है, हाथी के सामने वाला प्यादा जब मरता है तो वह पागल हो जाता है. सब से बड़ी बात प्यादा जब सही चाल चलेगा तो वह वजीर बन जाएगा. फिल्म में अमिताभ बच्चन को छोटा सा प्यादा बताया गया है जो अपनी चालें चल कर वजीर बन जाता है. ‘वजीर’ उन लोगों को समझ अच्छी तरह आएगी जो शतरंज के खेल से वाकिफ हैं. वैसे यह रोचक थ्रिलर मर्डर मिस्ट्री है, जिस की परतें परत दर परत खुलती जाती हैं और अंत में ही पता चलता है कि कौन क्या है.

फिल्म की शुरुआत काफी अच्छी है, मगर मध्यांतर के बाद यह आम मुंबइया फिल्म बन कर रह जाती है. कहानी का क्लाइमैक्स पहले ही पता चल जाता है, यह फिल्म की कमजोरी है. फिल्म सीरियस है, हंसने का मौका नहीं देती, हीरोइन सुंदर है परंतु फिल्म में रोमांस नदारद है. इमोशन दिल पर कोई असर नहीं छोड़ पाते. फिर भी फिल्म अगर बांधे रखती है तो अमिताभ बच्चन और फरहान की दमदार अदायगी के कारण.

फिल्म की कहानी दिल्ली पुलिस ऐंटी टैररिस्ट स्क्वायड के अफसर दानिश (फरहान अख्तर) से शुरू होती है. रूहाना (अदिति राव हैदरी) उस की पत्नी है और 6 साल की नूरी उस की बेटी है. एक आतंकवादी मुठभेड़ के दौरान दानिश की बेटी की मौत हो जाती है. वह बेटी के गम को भुला नहीं पाता और आत्महत्या की असफल कोशिश करता है. तभी उसे वहां पड़ा एक पर्स मिलता है. वह पर्स लौटाने जिस घर में जाता है वहां उस की मुलाकात पंडित ओंकारनाथ (अमिताभ बच्चन) से होती है, जो बच्चों को शतरंज का खेल सिखाते हैं. पंडितजी दानिश को बताते हैं कि उस की बेटी की हत्या एक मंत्री यजाद कुरैशी (मानव कौल) ने की थी.

पंडितजी और दानिश में दोस्ती हो जाती है. एक दिन पंडितजी को पता चलता है कि उस की बेटी की हत्या की फाइल बंद कर दी गई है तो वह मंत्रीजी की कार पर जूता फेंकता है. तभी यजाद कुरैशी का वजीर (नील नितिन मुकेश) पंडितजी पर हमला कर देता है. वजीर दानिश को भी धमकी देता है कि वह पंडितजी को कश्मीर जाने से रोके. दानिश के रोकने से पहले ही वजीर पंडितजी की कार को बम से उड़ा देता है.

कश्मीर में चुनाव होने वाले हैं. यजाद कुरैशी के पीछेपीछे दानिश भी वहां पहुंच जाता है. यजाद कुरैशी दरअसल एक आतंकवादी था. उस ने पूरे गांव को ही खत्म कर दिया था. उसी ने पंडितजी की बेटी को मार डाला था. उस के बारे में सचाई जान कर दानिश उसे खत्म कर देता है. अंत में पता चलता है कि दानिश खुद एक मोहरा बन रहा था जब उसे एक पेनड्राइव मिलती है जिस में उसे बताया जाता है कि किस तरह पहली चाल जो दानिश को पंडितजी के घर तक ले आई थी और आखिरी चाल यजाद कुरैशी तक ले गई. इस तरह शतरंज के खेल में वजीर कौन बना यह आखिरी लमहों में पता चलता है. फिल्म की यह कहानी रोमांचक है. भले ही कहानी हवाहवाई हो परंतु कहानी को हकीकत पर खड़ा करने की कोशिश की गई है. व्हीलचेयर पर बैठे अमिताभ बच्चन ने अपने किरदार में जान डाल दी है. निर्देशन में भी झोल है. एक अपाहिज इंसान को एक तेजतर्रार अफसर को अपने मकसद के लिए है. प्यादा बनाने के लिए इतनी जानकारी कहां से मिलती है. नील नितिन मुकेश का होना न होना बराबर है. अदिति राव हैदरी की भूमिका छोटी सी है और बेअसर है. मानव कौल की भूमिका और ज्यादा होती तो अच्छा होता. फिल्म का गीतसंगीत सामान्य है. संवाद अच्छे हैं. अधिकांश फिल्म दिल्ली में शूट की गई है. छायांकन अच्छा है.

नोबेल का मच्छर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एकाएक ही क्यों पाकिस्तान गए थे, इस सवाल का जवाब लोग अपनेअपने तरीके से ढूंढ़ते रहे पर कांग्रेसी नेता मनीष तिवारी की मानें तो नरेंद्र मोदी को नोबेल के मच्छर ने काट लिया है. वे चाहते हैं कि उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिले, इसलिए वे पाकिस्तान गए थे.

मच्छर के काटने से मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियां ही नहीं होतीं बल्कि नोबेल की बीमारी भी लग जाती है. यह मच्छर कहां पाया जाता है, यह तो मनीष ने नहीं बताया पर अपनी बौखलाहट का दैनिक संस्करण जरूर व्यक्त कर दिया. वे कभी यह कहते हैं कि भाजपा और संघ का बस चले तो लाहौर में राम मंदिर बनवा दें और कभी सत्ता पर सेना के कब्जा जमाने की भूमिका पर व्याख्यान देने लगते हैं. अच्छी बात यह है कि भगवा खेमे ने इस आरोप का यह कहते खंडन नहीं किया कि मोदी शांति की कोशिश कर रहे हैं और इतिहास गवाह है कि जो जितना ज्यादा कट्टर होता है वही शांति और भाईचारे की बातें ज्यादा करता है.

 

नई इमारत क्यों

लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने एक प्रस्ताव के जरिए देश में नए संसद भवन के लिए एक अदद नई इमारत की जरूरत जताई है. सुमित्रा के तर्क ये हैं कि मौजूदा संसद भवन 88 साल पुराना हो गया है और इस में आने वालों की संख्या बढ़ रही है. इन में कर्मचारी, सुरक्षाकर्मी, मीडियाकर्मी और आम लोग भी शामिल हैं. बात कमजोर न लगे, इसलिए उन्होंने यह भी याद दिला डाला कि 2026 के बाद लोकसभा सीटों की संख्या के बढ़ने की संभावना है. ऐसे में यह भवन और छोटा पड़ने लगेगा.

बातें सच हैं लेकिन सच यह भी है कि जब संसद में हंगामा ही मचना है, कुरसियां फेंकी जानी हैं, सांसदों को सवाल नहीं पूछना और महिला सांसदों की साडि़यों पर चर्चा करनी है तो फिर नई इमारत की जरूरत क्या? बेहतर होता सुमित्रा ताई यह कहतीं कि सभी सांसद नियमित आएं, बहस में हिस्सा लें, सवाल पूछें और सुझाव दें, तो बात में वजन होता.

जाति का रोग

जाति पूछना राष्ट्रीय रोग है तो बगैर पूछे अपनी जाति बताना महारोग है. अभिनेता अनुपम खेर की जाति ज्यादा लोग नहीं जानते थे पर जैसे ही उन्होंने बीते दिनों यह कहा कि जिस दिन जम्मूकश्मीर से धारा 370 हट जाएगी उस दिन कश्मीर समस्या सुलझ जाएगी. इस बयान से कई लोगों को पता चला कि अनुपम एक प्रतिभाशाली अभिनेता ही नहीं, बल्कि कश्मीरी पंडित भी हैं जो कश्मीरी पंडितों की अलग टाउनशिप की हिमायत करते हैं. कश्मीर समस्या का इतना संक्षिप्त हल हर वह शख्स भी तुरंत बता देता है जो नहीं जानता कि दरअसल यह समस्या है क्या. इस वर्ग ने तो 370 को ही समस्या मान लिया है जो किसी न किसी रूप में पूरे देश में लागू है. अब उम्मीद की जानी चाहिए कि नरेंद्र मोदी इस बाबत पहल करेंगे क्योंकि सहिष्णुता के मुद्दे पर अनुपम खेर ने वक्त रहते उन की मदद की थी.

राम रचि राखा

इन दिनों मंदिर राजनीति की कमान संभाल रहे भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने अनूठा फार्मूला दिया है कि मुसलमान 3 मंदिर हमें दे दें बदले में 39,997 मसजिद ले जाएं. दिल्ली विश्वविद्यालय में राममंदिर निर्माण पर  दो दिवसीय सेमिनार संपन्न करा देने वाले स्वामी ने जता दिया है कि धर्मस्थल एक उत्पाद की तरह होते हैं जिन का विनिमय भी किया जा सकता है.

भगवा खेमा किस जुगाड़ में है, यह हर कोई समझ रहा है. भाजपा कमजोर हो रही है, इसलिए मंदिर को ले कर आक्रामक होती जा रही है. उसे लगता है कि ऐसे में सत्ता में रहने के लिए राम का सहारा ही काम आएगा. ऐसे में तय है स्वामी जैसे नेता नरेंद्र मोदी की लुटिया डुबो कर ही दम लेंगे जिन के लिए लोकतंत्र भी धर्म की तरह एक मजाक है.

ऐसा भी होता है

हमारे कसबे में बालाजी टे्रडिंग कंपनी के नाम से एक दुकान खुली जो कि किसी भी घरेलू सामान की आधी राशि जमा कराने पर 15 दिन के बाद उस सामान की डिलीवरी देती थी. मेरे पति भी बाजार से लौटते समय 3,800 रुपए में सोफासैट व एक ड्रैसिंग टेबल की राशि जमा करा आए. पूरे कसबे के लोग 13-14 दिन तक काफी तादाद में सामान बुक कर चुके थे. जब 15वें दिन मेरे पति व अन्य लोग अपने सामान की डिलीवरी लेने पहुंचे तो देखा कि जो दुकान अभी तक सजीसंवरी रह कर सामान से भरी हुई थी वहां पर ताला लगा हुआ था. कंपनी मालिक सामान व सभी के पैसे ले कर चंपत हो चुका था.

सुनीता वर्मा, दौसा (राजस्थान)

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बात कई साल पहले की है. हमारा आरक्षण झांसी से गोरखपुर की ट्रेन में था. मेरे पति ने कुली को कोच और सीट नंबर बताया और मुझे उस के साथ जाने को कहा. जब मैं अपने रिजर्व कूपे में पहुंची तो वहां पहले से ही 3 लोगों का परिवार बैठा था. मेरे बताने पर कि हमारा रिजर्वेशन है, उन्होंने उठने से मना कर दिया. टिकट कलैक्टर से कहा तो उस ने कहा कि आप का डब्बा पीछे है. मुझे लगा कि मुझे समझने में गलती हुई है और मैं पीछे जाने के लिए पलटी तो मेरे पति आ गए और उन्होंने बताया कि यही कूपा हमारा है.

सारी बात जान कर मेरे पति को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा, ‘‘ठीक है जब तक ये सीटें हमें नहीं मिलतीं तब तक मैं ट्रेन को नहीं चलने दूंगा.’’ इतना कहना था कि वे लोग अपनी जगह चले गए. बाद में टिकट कलैक्टर ने बताया कि वे यात्री रेलवे औफिसर थे और उन का रिजर्वेशन जिस कोच में था उस के डब्बों की हालत काफी खराब थी. वे लोग अपना आराम पाने के लिए दूसरे को परेशान कर सकते हैं यह सोच कर दुख हुआ.

विमला सिंह, नागपुर (महा.)

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एक बार कई दिनों तक लगातार बरसात होने के बाद जब मौसम साफ हुआ तो मैं अपने खेतों में लगी हुई धान की फसल को देखने निकला. तभी मेरी नजर सामने से आ रहे एक काले रंग के सांप पर पड़ी. उस से बचाव का मैं कोई उपाय करता कि वह सांप भी शायद मुझ से डर कर पानी से भरे धान के खेत में कूद कर भागने लगा. मैं भी मारे डर के तुरंत भाग निकला. काफी दूर आने पर जब देखा कि सांप नहीं दिखाई पड़ रहा है तो जान में जान आई.

– विष्णु वर्मा, फैजाबाद (उ.प्र.)

हौसले तेरे हैं बुलंद

कैसे ये मासूम पाखी तूफान से टकराएंगे

आंधियों में किस तरह लौट कर घर आएंगे

इन की हिम्मत में है जोखिम से खेलना

जोखिमों से खेलते एक दिन मर जाएंगे

गमलों में ये बदबू सी क्यों आने लगी

बदल दो पानी वरना पेड़ सब मर जाएंगे

दूध सांपों को क्या पिलाएं इस साल

बांबियों में नहीं, संसद की गली मुड़ जाएंगे

अब परिंदे भी सयाने हो गए सैयाद सुन

ये मिल कर कफस तेरा उड़ा ले जाएंगे

मुंतजिर हूं चांदतारों को जरा झपकी लगे

तुझे दुनिया की नजरों से चुरा ले जाएंगे

हम को मत छेड़ो नींव के पत्थर हैं हम

जो हमें उकसाया, सारे महल गिर जाएंगे

नहीं मांगेंगे किसी से अपने हिस्से की खुशी

हक के वास्ते हर कुर्सी से लड़ जाएंगे

परों की फिक्र मत कर, रख नजर में मंजिलें

हौसले तेरे तुझे आसमान पर ले जाएंगे.

                  – आर पी मिश्रा परिमल

नेपाल: चौपट हुआ पर्यटन कारोबार

पिछले साल आए तेज भूकंप के झटकों से नेपाल उबर भी नहीं पाया था कि पिछले 4 महीने से जारी मधेशी आंदोलन ने नेपाल की पर्यटन इंडस्ट्री की कमर पूरी तरह से तोड़ दी है. हर साल करीब 8 लाख विदेशी पर्यटक नेपाल पहुंचते हैं. नेपाल को होने वाली कुल कमाई का 52 फीसदी हिस्सा पर्यटन उद्योग से ही आता है. भूकंप ने जहां कई ऐतिहासिक इमारतों और पर्यटन स्थलों का नामोनिशान मिटा डाला वहीं मधेशियों की लड़ाई, हिंसा, आगजनी और पुलिस फायरिंग से घबरा कर बचेखुचे पर्यटक भी अब नेपाल जाने से कतराने लगे हैं.

रोजगार पर खतरा

नेपाल की राजधानी काठमांडू समेत भक्तपुर, ललितपुर, पोखरा, लुम्बिनी, तिलोत्तमा, भैरवा, बुटवन आदि इलाकों में पयटकों की भारी भरमार रहती है. हर साल 8 से 9 लाख विदेशी पर्यटक नेपाल घूमने आते हैं. इन पर्यटकों से नेपालियों को भारी कमाई होती है. पोखरा का गाइड रामा सिंह बताता है कि हर साल अप्रैल से ले कर अक्तूबर तक सैलानियों की भरमार रहती थी. सैलानियों की वजह से ही अधिकतर नेपालियों की रोजीरोटी चलती रही है. भूकंप ने हजारों नेपालियों की रोजीरोटी छीन ली है. दरबार स्क्वायर, धरहरा टावर, जानकी मंदिर समेत नेपाल की 7 ऐतिहासिक इमारतें और धरोहर जमीन में मिल चुकी हैं. पर्यटकों का उन जगहों पर आनाजाना बंद हो चुका है.

गौरतलब है कि नेपाल के मशहूर दरबार स्क्वायर को तो यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित कर रखा था, जो भूकंप के बाद दुनिया के नक्शे से गायब हो चुका है. इस का असर नेपाल की माली हालत पर पड़ना ही था. नेपाल ने भूकंप के झटकों से उबरना शुरू किया तो मधेशी आंदोलन ने नेपाल के पर्यटन कारोबार और उस की माली हालत को पूरी तरह से तोड़ कर रख दिया है.

नेपाल के सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि देश की अर्थव्यवस्था 1,178 अरब रुपए की है. इस में से 52.2 फीसदी पर्यटन, 33.7 फीसदी खेती और 14 फीसदी कैसिनो, बिजली व अन्य उत्पादनों से आता है. बाकी रकम नेपाल से बाहर रहने वाले नेपालियों की कमाई होती है जो वे अपने देश में भेजते हैं.

कैसे उबरेगा नेपाल

काठमांडू के भृकुटिमंडपम में स्थित नेपाल पर्यटन बोर्ड के दफ्तर का एक मुलाजिम कहता है कि भूकंप की चोट से उबरने में नेपाल को 50 साल से ज्यादा का वक्त लगने का आकलन किया गया था पर मधेशी आंदोलन की वजह से तो देश को उबरने में 100 साल से ज्यादा का समय लग जाएगा. पिछले साल अप्रैल महीने में तो पर्यटन सीजन की शुरुआत ही हुई थी कि भूचाल आ गया. अब पर्यटक भी लंबे समय तक नेपाल आने से डर रहे हैं. पर्यटकों का भरोसा दोबारा बहाल होने में काफी समय लग जाएगा. ऐसी हालत में नेपाल की माली हालत का बद से बदतर होना तय है.

अभी कुछ साल पहले ही तो नेपाल ने नए सिरे से अपने कदम जमाने शुरू किए थे क्योंकि पिछले 10 सालों तक चले गृहयुद्ध और माओवादियों के आतंक से वह बुरी तरह टूट चुका था. उस दौरान भी पर्यटक नेपाल आने से कतराने लगे थे. विदेशी पर्यटकों में भरोसा जगाने के लिए नेपाल सरकार ने साल 2011 को काफी धूमधाम के साथ पर्यटन वर्ष के रूप में मनाया था और 10 लाख पर्यटकों के नेपाल आने का लक्ष्य तय किया था. इस में नेपाल काफी हद तक कामयाब होने लगा था तो भूकंप और उस के बाद अब मधेशी आंदोलन ने उसे फिर से जीरो पर पहुंचा दिया है. नेपाल में पिछले 4 महीनों से जारी मधेशी आंदोलन पर काबू पाने में नेपाल सरकार नाकाम रही है और वह लगातार इस के लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा रही है.

मधेशी पेंच

भारत से सटा समूचा तराई इलाका ‘जय मधेश’ की गूंज से थर्रा रहा है और नेपाल सरकार कान में तेल डाल कर सो रही है. नवलपुर समेत जहांतहां हुई पुलिस फायरिंग के विरोध में सर्लाही और रौतहट में हिंसक वारदातें होती रहीं. मलंगवा के जिला अधिवक्ता संघ के दफ्तर को मधेशियों ने आग के हवाले कर दिया. अपने आंदोलन को तेज करने के लिए मधेशी सोनबरसा, भिट्ठामोड़ और बैरगानिया बौर्डर के पास नो मैंस लैंड पर पिछले 3 महीनों से धरने पर बैठे हुए हैं.

नेपाल की कुल आबादी 2 करोड़ 95 लाख है जिस में से डेढ़ करोड़ मधेशी हैं. नेपाल में कुल 103 जातियां हैं जिन में 56 जातियां मधेशियों की हैं. नेपाल में 60 के दशक में बने नागरिक ऐक्ट में भारतीय मूल के लोगों के साथ धोखा किया गया था. तराई में रहने वाले 1 करोड़ से ज्यादा मधेशियों को नेपाल के स्कूलों में दाखिले से ले कर प्रौपर्टी खरीदने तक पर आफत है. हर जगह उन्हें संदेह की नजरों से देखा जाता है और बाहरी समझा जाता है. नेपाल के सिमरी इलाके में रहने वाले मधुर सिंह कहते हैं कि तराई में रहने वाले करीब 70 लाख मधेशियों के पास नेपाल की नागरिकता ही नहीं है. नागरिकता पाने के लिए वे कई सालों से सरकार से गुहार लगा रहे हैं पर किसी भी स्तर पर उन की कहीं कोई सुनवाई नहीं होती है. नागरिकता नहीं होने की वजह से उन्हें स्कूल में दाखिला लेने, सरकारी नौकरी पाने, उद्योगधंधा शुरू करने के लिए बैंकों से कर्ज लेने, गाड़ी खरीदने तक हर काम में दिक्कतें होती हैं.

मधेशी पीपुल्स राइट्स फोरम के कपिलवस्तु से सांसद अभिषेक प्रताप शाह ने बताया कि नेपाल की कुल आबादी का 52 फीसदी मधेशी हैं. इस के बाद भी उन की अनदेखी की जाती रही है. नेपाल में मेची से महाकाली नदी तक और भारत के दार्जिलिंग से ले कर उत्तराखंड तक मधेशी बसे हुए हैं. साजिश के तहत एक बार फिर मधेशियों की पहचान और वजूद पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं. इतना ही नहीं, देश को होने वाली कुल आमदनी में 80 फीसदी मधेशियों का योगदान है. इस के बाद भी नेपाल की सत्ता में इन की भागीदारी नहीं है. तराई पर रहने वाले हाशिए पर हैं और पहाड़ी पर रहने वाले राज कर रहे हैं. 6 साल पहले मधेश विद्रोह के दौरान 54 मधेशी मारे गए थे. पिछले 4 महीनों से चल रहे ताजा आंदोलन में 70 मधेशियों समेत 20 पुलिस वालों की मौत हो चुकी है.

कारोबारी बेहाल

मधेशी आंदोलन की वजह से नेपाल का पर्यटन और होटल कारोबार पूरी तरह चौपट होने लगा है जिस से नेपाल की माली हालत का और भी चरमराना तय है. आंदोलन, हिंसा, आगजनी, ठप सड़कें, पुलिस फायरिंग, लाठीचार्ज आदि की वजह से नेपाल जाने वाले पर्यटकों की संख्या में 90 फीसदी तक की गिरावट आ चुकी है. भारतीय पर्यटकों समेत अन्य विदेशी पर्यटक नेपाल जाने से कतरा रहे हैं जिस से होटलों और रैस्टोरेंट्स में सन्नाटा पसरा हुआ है. ट्रैवल एजेंसियों का कामकाज भी पूरी तरह से ठप हो गया है.

वीरगंज में पिछले 24 सालों से रैस्टोरेंट का करोबार कर रहे जितेन थापा कहते हैं कि पिछले 1 साल से उन का और उन के जैसे कई कारोबारियों का कामकाज ठप पड़ा हुआ है. भूकंप के बाद देश में नई सरकार बनने और नया संविधान लागू होने के बाद लोगों के मन में यह उम्मीद बंधी थी कि अब नेपाल पटरी पर वापस लौट सकेगा लेकिन मधेशी आंदोलन की वजह से लोगों की उम्मीद एक बार फिर टूट चुकी है. नेपाल में पर्यटन उद्योग की बरबादी और तबाही को ले कर इस उद्योग से जुड़े लोग एकजुट होने लगे हैं और सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने की तैयारी कर रहे हैं. नेपाल होटल संघ, नेपाल एसोसिएशन औफ टूर ऐंड ट्रैवल्स, नेपाल पर्वतारोहण संघ और टूर ऐंड गाइड एसोसिएशन समेत सैकड़ों ट्रैवल्स एजेंसियों ने सरकार से गुहार लगाई है कि नेपाल की हालत को जल्द से जल्द सामान्य बनाया जाए, वरना होटल, ट्रैवल्स, टूरिस्ट, गाइड, रैस्टोरेंट आदि का धंधा पूरी तरह से बंद हो जाएगा और इस से जुड़े हजारों लोगों के सामने रोजीरोटी की बड़ी समस्या पैदा हो जाएगी. उन के सामने भुखमरी के हालात पैदा होने लगे हैं.

नेपाल पर्यटन विभाग के रिकौर्ड के मुताबिक, हर साल करीब 8 लाख पर्यटक नेपाल पहुंचते हैं. इन में करीब 2 लाख पर्यटक भारत के रास्ते ही नेपाल पहुंचते हैं. बिहार के रास्ते वीरगंज, गढ़वा, समेरा, शिखंडी, काठमांडू, पोखरा, हेटौडा समेत करीब 20 पर्यटक स्थलों तक पहुंचा जा सकता है. हिमालय की गोद में बसे प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर नेपाल के कुल 75 में से 26 जिलों में भूकंप ने काफी नुकसान पहुंचाया था और मधेशियों की लड़ाई से 22 जिले पूरी तरह से हिंसा, धरना, प्रदर्शन, आगजनी को चपेट में फंस गए हैं. नेपाल की 52 फीसदी कमाई प्राकृतिक नजारों, ऐतिहासिक इमारतों और विदेशी पर्यटकों से होती है, इस के बाद भी सरकार इसे बचाने के लिए कोई ठोस पहल करने के बजाय मधेशियों को नेपाल की बदहाली के लिए और मधेशियों के आंदोलन के लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा कर अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाने की शुतुरमुर्गी कवायदों में लगी हुई नजर आ रही है.

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