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समाचार

गेहूं की खेती वाले इलाकों में तापमान ज्यादा बिना मौसम की गरमी घटा सकती है पैदावार

नई दिल्ली : पिछले कुछ अरसे से मौसम जिस तरह से करवटें ले रहा?है, उस से खेती की दुनिया पर बहुत खतरनाक असर पड़ रहा?है. कुछ अरसा पहले बेमौसम की बारिश ने तो खेती का कबाड़ा किया ही था और अब बेवक्त की गरमी ने रबी की फसल का हिसाब गड़बड़ा दिया है. बिना मौसम की गरमी से रबी सीजन की खास फसल गेहूं के उत्पादन में कमी आने के पूरे आसार हैं. कृषि वैज्ञानिकों व माहिर किसानों का कहना?है कि ज्यादा गरमी पड़ने से गेहूं की फसल समय से पहले ही पक जाएगी, नतीजतन पैदावार में गिरावट आ जाएगी. वैसे तमाम कृषि विशेषज्ञों और जानकार किसानों का यह?भी कहना है कि अगर अब भी बरसात हो जाए और तापमान घट जाए तो नुकसान उतना ज्यादा नहीं होगा, जितना होने का फिलहाल अंदेशा है. उत्तर भारत के गेहूं उगाने वाले खास इलाकों में फिलहाल दिन का तापमान सामान्य से करीब 7 डिगरी सेंटीग्रेड तो रात के वक्त का तापमान सामन्य से 5 डिगरी सेंटीग्रेड तक ज्यादा दर्ज किया जा रहा?है. तापमान के ये तेवर गेहूं व रबी की अन्य फसलों के लिए घातक साबित हो सकते हैं.

इस सिलसिले में भारतीय किसान यूनियन के महासचिव चौधरी युद्धबीर सिंह कहते हैं कि तापमान में इस किस्म की बढ़ोतरी से महज गेहूं ही नहीं, बल्कि सरसों के खेतों पर भी उलटा असर पड़ेगा. मौसम सामान्य हो तो इस दौरान पड़ने वाली ओस व धुंध की नमी से सरसों और गेहूं की फसलों को अच्छाखास फायदा पहुंचता है, मगर तापमान ज्यादा होने से ऐसा नहीं हो पा रहा?है. तापमान ज्यादा होने की वजह से सरसों की फसल में वक्त से पहले ही फूल निकल आए?हैं जो कि अच्छे आसार नहीं हैं.

माहिरों का मानना है कि अगर मौसम ऐसा ही रहा तो गेहूं की पैदावार में पक्केतौर पर गिरावट होगी. मोदी नगर इलाके के माहिर किसान व ‘भारतीय किसान यूनियन’ के मंडल अध्यक्ष (मेरठ) राजबीर सिंह कहते हैं कि इस तरह की गरमी से गेहूं के दाने की क्वालिटी पर बेहद खराब असर पड़ेगा और पैदावार में भी अच्छीखासी गिरावट होगी. हालात से चिंतित राजबीर सिंह ने कहा कि पिछले साल फरवरीमार्च में हुई बेमौसम बरसात की वजह से भी गेहूं की फसल बुरी तरह प्रभावित हुई?थी और अब की बार बेमौसम की गरमी की वजह से फसलें तबाह हो रही हैं. यानी नुकसान का सिलसिला लगातार जारी है, चाहे वह ज्यादा बरसात की वजह से हो या ज्यादा गरमी की वजह से. इन कुदरती आपदाओं से यह बात साफ हो जाती है कि बेवक्त या बेमौसम की चीजें मुफीद नहीं होती?हैं.

साल 2013-14 में गेहूं का उत्पादन 958.5 लाख टन रहा?था, जो साल 2014-15 में घट कर 889.5 लाख टन हो गया. अब 2015-16 में क्या तसवीर उभर कर सामने आएगी यह तो वक्त ही बताएगा, मगर असार अच्छे नहीं हैं. आमतौर पर गेहूं की बोआई नवंबर में शुरू होती है और अप्रैल तक फसल पक कर तैयार हो जाती?है. कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2015 दिसंबर तक 271.4 लाख हेक्टेयर रकबे में गेहूं की बोआई की गई थी, जो पिछले साल के मुकाबले काफी कम?है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (पूर्वी क्षेत्र) के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी पुष्पनायक का कहना है कि जैसे ठंडे देशों के लोग जब गरम मुल्कों में जाते?हैं तो उन्हें चर्मरोग हो जाते हैं, वैसे ही सर्दी के मौसम की फसल को जब गरमी मिलेगी तो उस खराब असर पड़ेगा ही.                                 

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किसानों को फसल बीमा का तोहफा

नई दिल्ली : सरकार ने नए साल के मौके पर देश के किसानों को खास तोहफा दिया है. इस का लाभ देश भर के 14 करोड़ किसान उठा सकेंगे. सरकार की इस घोषणा से मकर संक्रांति व पोंगल जैसे त्योहारों पर किसानों की खुशी दोगुनी हो गई.

नई फसल बीमा योजना को ले कर सरकार पूरी सावधानी बरत रही है, ताकि इस योजना का हश्र भी पिछली योजनाओं जैसा ही न हो जाए. पिछले 3 दशकों से चलाई जा रहीं अलगअलग फसल बीमा योजनाएं केवल 23 फीसदी किसानों तक ही पहुंच पाई हैं. इन योजनाओं में ज्यादातर उन किसानों को ही शामिल किया गया है, जिन्होंने बैंकों से कृषि लोन लिया था. इसलिए इसे फसल बीमा की जगह बैंक ऋण बीमा योजना के तौर पर ही जाना गया. प्रस्तावित मसौदे में सभी किसानों को शामिल करने के लिए इस का दायदा बढ़ाया गया है.

सरकार का अनुमान है कि प्रस्तावित नई फसल बीमा योजना में 50 फीसदी से अधिक किसान शामिल हो जाएंगे. इस के लिए बीमा प्रीमियम का 90 फीसदी से अधिक हिस्सा केंद्र व राज्य सरकारें वहन करेंगी. बीमा योजना की घोषणा के बाद सब्सिडी का बोझ देख कर राज्य सरकारें विरोध जता सकती हैं. किसानों को प्रीमियम के रूप में बीमित राशि का डेढ़ से ढाई फीसदी ही देना होगा.     

बेहतरीन

सोनालीका आईटीएल बना रही है कृषक समुदाय को मजबूत

नई दिल्ली : भारत की तीसरी सब से बड़ी ट्रैक्टर निर्माता कंपनी सोनालीका आईटीएल गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के किसानों के बीच सर्वाधिक पसंदीदा बन गई है.

सोनालीका आईटीएल ने किसानों को ट्रैक्टर्स और कृषि उपकरणों के सही इस्तेमाल के बारे में तालीम देने के लिए प्रशिक्षण केंद्र भी बनाए हैं. सोनालीका इंटरनेशनल ट्रैक्टर्स लिमिटेड के कार्यकारी निदेशक रमन मित्तल ने कहा कि हम अपने किसानों को सशक्त बनाने पर ध्यान दे रहे हैं. हमारे उत्पादों को बेहद कठिन हालात में बिना गड़बड़ी के काम करने लायक बनाया जाता है.

रमन मित्तल के मुताबिक आज के समय में सोनालीका आईटीएल की मौजूदगी दुनिया भर के 80 से?ज्यादा देशों में है और यह एकमात्र भारतीय कंपनी है, जो 20 यूरोपीय देशों में मौजूद है. गुजरात राज्य के राजकोट जिले के डुमियाणी गांव में 42 ट्रैक्टरों में से 35 सोनालीका?के हैं. इस के साथ ही अमरेली जिले के त्रंबकपुर गांव में इस्तेमाल होने वाले 80 फीसदी ट्रैक्टर्स सोनालीका के ही?हैं. सोनालीका आईटीएल ने राज्य में करीब 2500 ट्रैक्टरों की बिक्री की?है. राजकोट जिले के वाडला गांव के एक किसान जयेशभाई ढींगहानी साल 2007 से ही सोनालीका ट्रैक्टर्स इस्तेमाल कर रहे हैं. उन के पास 3 सोनालीका?ट्रैक्टर्स हैं और वे सालाना 3 लाख रुपए कमा रहे?हैं. सोनालीका आईटीएल हर साल अपने होशियापुर प्रशिक्षण केंद्र में गुजरात के करीब 4 सौ किसानों को प्रशिक्षण भी मुहैया कराती है.

राजस्थान के किसानों के बीच सोनालीका ट्रैक्टर्स काफी लोकप्रिय हो रहे?हैं. राज्य में अब तक 3 हजार से?ज्यादा?ट्रैक्टर्स की बिक्री की गई है. अपने उत्पादों के जरीए सोनालीका आईटीएल किसानों को कामयाब बनाने में मदद कर रही?है. उत्तर प्रदेश के किसानों के बीच भी सोनालीका ट्रैक्टर काफी लोकप्रिय हैं. सोनालीका ट्रैक्टर्स उन किसानों द्वारा भी पसंद किए जा रहे?हैं, जिन्होंने हाल ही में खेती शुरू की है. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के चौक गांव के जयसिंह जायसवाल ने बताया कि सोनालीका के आर×22 का इस्तेमाल करने के बाद उन्होंने पिछले महीनों में अपनी चावल मिल से 1.5 लाख रुपए की कमाई की?है. हरियाणा की गरौथा तहसील में 94 सोनालीका ट्रैक्टर्स हैं. राज्य में रबी और खरीफ दोनों फसलों की खेती की जाती है. सोनालीका ट्र्रैक्टर्स के हैवी ड्यूटी इंजन, खेतों की जुताई और दूसरे भारी काम करने में सक्षम हैं. इसीलिए किसानों?द्वारा उन्हें सराहा जाता है. झज्जर गांव के जितेंद्र कुमार ने कहा कि अपनी 15 एकड़ कृषि भूमि में सोनालीका ट्रैक्टर का इस्तेमाल करने के बाद उन की आय और उत्पादकता में काफी इजाफा हुआ?है.                           

मदद

सीआरपीएफ खरीद रही है गांव वालों के उत्पाद

पटना : बिहार के नक्सल प्रभावित इलाकों में गांव वालों की तरक्की के लिए सीआरपीएफ ने भी कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं, जिन से गांव वालों और सीआरपीएफ के बीच नया रिश्ता विकसित हो रहा है. पुलिस के डर से बिदकने वाले ग्रामीण अब सीआरपीएफ जवानों से घुलमिल कर रह रहे हैं और सीआरपीएफ गांव वालों से ही दूध, सब्जी, फल और अंडे खरीद रही है. इस से गांव वालों को अपने उत्पादों को बेचने के लिए गांव से बाहर नहीं जाना पड़ रहा है, जिस से उत्पादों की ढुलाई का खर्च बच रहा है. राज्य के नक्सली असर वाले औरंगाबाद, गया, जमुई, मुंगेर और बांका जैसे जिलों के तमाम गांवों में तैनात सीआरपीएफ के जवान पास के गांवों से ही अपनी जरूरतों का ज्यादातर सामान खरीद रहे हैं. गांव वालों का मानना है कि सीआरपीएफ के जवान जहां उन्हें नक्सलियों से सुरक्षा दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उन की माली हालत को भी बेहद मजबूत कर रहे हैं.

गौरतलब है कि पहले नक्सली गांवों से मुफ्त में भोजन का सामान उठा कर ले जाते थे. वे हर महीने किसी न किसी गांव से अपने लिए महीने भर के अनाज का इंतजाम किया करते थे और बदले में फूटी कौड़ी भी नहीं देते थे. सीआरपीएफ बिहार सेक्टर के आइजी शैलेंद्र कुमार बताते हैं कि सीआरपीएफ द्वारा नक्सली प्रभावित इलाकों के गांवों में चलाए जा रही कल्याणकारी योजनाओं की वजह से नक्सलियों के प्रति गांव वालों को लगावजुड़ाव खत्म होने लगा है. इस के अलावा सीआरपीएफ गांवों में हेल्थ चेकअप कैंपों का आयोजन भी कर रही है और बच्चों को किताब, कौपी, कलम, पेंसिल आदि बांट रही है. सीआरफीएफ द्वारा बुजुर्गों को मुफ्त में धोतियां और साडि़यां बांटी जा रही हैं. इस से गाव वालों और सीआरपीएफ के बीच भरोसे का रिश्ता कायम हुआ है.                       

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फैसला

जांच के बाद मिलेगा अनुदान

पटना : किसानों को अनुदान का लाभ पाने के लिए अपनी जमीन के खाताखेसरा की जांच करनी होगी. उस के बाद राष्ट्रीय किसान आयोग के द्वारा तय की गई किसान की परिभाषा को आधार मान कर ही किसानों को अनुदान दिया जाएगा. अनुदान की रकम आरटीजीएस के जरीए सीधे किसानों के बैंकखातों में जाएगी. राज्य के 14 लाख किसानों का उन के बैंक एकाउंट के साथ रजिस्ट्रेशन किया गया है. कृषि विभाग की समीक्षा बैठक के बाद कृषि मंत्री रामविचार राय ने बताया कि किसानों की बनाई गई सूची की जमीन स्तर पर जांच कराने के बाद सही किसानों को ही अनुदान का लाभ मिल सकेगा.

इस के साथ ही राज्य में कृषि यांत्रिकरण की रफ्तार को बढ़ाने के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रमों की भी समीक्षा की गई. कृषि मंत्री रामविचार राय ने कृषि यांत्रिकरण की धीमी गति पर नाराजगी जताई.         

तकाजा

किसानों को याद है मोदी का वादा

नई दिल्ली : पिछले दिनों वित्त मंत्री अरुण जेटली के साथ बजट से पहले हुई बैठक में किसानों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से किसानों के लिए किए गए वादों को पूरा करने के लिए कहा.

बैठक में किसानों ने कहा कि प्रधानमंत्री ने उन के लिए ऊंची आय का वादा किया था. किसानों ने कहा कि बीते 2 सालों से सूखे की वजह से काटन, चावल और कई दूसरी फसलों पर बुरा असर पड़ा है.

किसानों ने याद दिलाया कि साल 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी ने इस बात का वादा किया?था कि किसानों को उत्पादन की लागत से कम से कम 50 फीसदी तक का मुनाफा हो. किसानों की मांगों को देखते हुए वित्त मंत्रालय ने अगले 5 सालों में सिंचाई परियोजनाओं पर 5 सौ अरब रुपए खर्च करने का वादा किया. किसान नेता और कृषि विशेषज्ञों ने वित्त मंत्रालय से 4 फीसदी ब्याज दर पर 5 लाख रुपए तक का कृषि ऋण देने की भी मांग जोरशोर से की. किसानों ने यूरिया की सब्सिडी को सीधे किसानों के बैंक खातों में भेजने और पिछले 3 सालों की बकाया सब्सिडी के भुगतान के लिए बजट में 50 हजार करोड़ रुपए आवंटित करने की मांग की.

कृषि विशेषज्ञों ने कृषि उत्पादक संगठनों और कृषि सहकारी संगठनों की आय को आयकर के दायरे से बाहर रखने, मिल्क पाउडर के लिए बफर स्टाक बनाने और रबर आयात पर सुरक्षात्मक शुल्क लगाने की सिफारिश की. इस मौके पर अरुण जेटली ने कहा कि भारतीय कृषि के सामने मौजूद चुनौतियों में ज्यादा उपज देने वाली व प्रतिरोधी किस्म के बीजों से जुड़ी तकनीक से फायदा उठाते हुए उत्पादकता बढ़ाने की जरूरत भी शामिल है. जेटली ने आगे कहा कि इसी तरह पानी के सही इस्तेमाल की जरूरत पर भी ध्यान देना बेहद जरूरी?है. बोआई और कटाई जैसे कामों को भी नई तकनीकों के मुताबिक ही करना मुनासिब होगा. जेटली ने कहा कि समय पर बाजार संबंधी सूचनाएं मुहैया करा कर किसानों को ज्यादा से ज्यादा लाभ कराना भी कृषि की मौजूदा चुनौतियों में शामिल है.

वित्त मंत्री ने चर्चा आगे बढ़ाते हुए कहा कि खेती से जुड़े प्रोत्साहन ढांचे में तब्दीली कर के उत्पादकता बढ़ाने, बरबादी घटाने और आमदनी बढ़ाने पर जोर देना होगा. इस के साथ ही कृषि उत्पादों के व्यापार में बेहतरी के लिए नई तकनीकों का इस्तेमाल करना जरूरी?है. जेटली ने कृषि के क्षेत्र में और ज्यादा पैसा लगाने की जरूरत पर जोर दिया. बहरहाल, बजट से पहले की बैठक में मोदी के वादे को याद दिला कर किसानों ने सही काम किया है. लगातार 2 सालों से सूखे व अन्य कुदरती आपदाओं से तबाह किसानों ने सरकार से आगामी बजट में सिंचाई सुविधा से जुड़ी आवंटन राशि बढ़ाने की गुजारिश की है. इस के अलावा किसानों ने अपनी फसलों के खरीद मूल्यों में भी इजाफा करने की मांग की है. अब गेंद मोदी के पाले में है. अपनी कुरसी मजबूत करने के लिए उन्हें किसानों का भला तो करना ही होगा. आने वाले चुनावों में अपना सिक्का कायम रखने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को किसानों का खयाल रखना ही होगा.      

मुहिम

सरकारी तालाबों की मुफ्त बंदोबस्ती

पटना : बिहार में अब मछलीपालकों से टोकन राशि ले कर ही सरकारी तालाबों की बंदोबस्ती करने की कवायद शुरू की गई?है. तालाब की बंदोबस्ती के लिए महज टोकन रकम ली जाएगी. अब तक सरकारी जलकरों की नीलामी की जाती रही?है और इस के लिए बोली लगाई जाती थी. मछुआरों को नीलामी के लिए शुल्क जमा करना होता है. जलकरों में मछलीउत्पादन से जितनी आमदनी होती है, उस में से कम से कम 10 फीसदी सरकार को देना होता?है. इस से सरकार को सालाना 10 करोड़ रुपए तक की आमदनी होती है. पशुपालन और मत्स्यविभाग के मंत्री अवधेश कुमार सिंह ने बताया कि मछुआरों को राहत देने और मछलीउत्पादन में उन की दिलचस्पी बढ़ाने के लिए अब बंदोबस्ती शुल्क को खत्म करने पर विचार किया जा रहा है.

जलकरों को बंदोबस्ती से मुक्त कर देने से मछलीपालन में मछुआरों की दिलचस्पी और कमाई दोनों बढ़ेगी. इस के साथ ही मछुआरों को मछलीपालन की नई तकनीकों को सीखने के लिए दूसरे राज्यों में भी भेजा जाएगा. अनुसूचित जाति और जनजाति के मछलीपालकों को खास सुविधाओं के साथ मुफ्त में ट्रेनिंग भी दी जाएगी.                                                                                                   

कवायद

चावलमिलों पर नकेल कसने की तैयारी

पटना : बिहार में किसानों और सरकार से धान ले कर चावल नहीं लौटाने वाले मिलमालिकों को जेल भेजने की कवायद शुरू की गई?है. सरकार ने ऐसे चावलमिलों के मालिकों को गिरफ्तार करने और उन की कुर्कीजब्ती का आदेश जारी कर दिया?है. इस सिलसिले में 12 सौ बड़े बकायादार मिलमालकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई?है.

गौरतलब है कि पिछले 3 सालों से चावलमिलों के मालिक 1310 करोड़ रुपए का बकाया देने में टालमटोल कर रहे थे. इन मिलमालिकों पर साल 2013-14 के 150 करोड़ रुपए साल 2012-13 के 732 करोड़ रुपए और साल 2011-12 के 427 करोड़ रुपए बकाया हैं. धान ले कर चावल वापस नहीं करने के मामले में एसएफसी समेत कई विभागों के अफसरों और मुलाजिमों पर भी कानूनी कार्यवाही की जा रही है. कुल 394 अफसरों और मुलाजिमों की जांच की जा रही है और 184 पर मुकदमा दर्ज किया गया?है.

पटना की 64 चावलमिलों पर 55.61, भोजपुर की 90 मिलों पर 72.05, बक्सर की 152 मिलों पर 101, कैमूर की 357 मिलों पर 220, रोहतास की 191 मिलों पर 111, नालंदा की 84 मिलों पर 55.34, गया की 49 मिलों पर 40, औरंगाद

की 207 मिलों पर 62.15, वैशाली की 25 मिलों पर 23.66, मुजफ्फरपुर की 33 मिलों पर 66.51, पूर्वी और पश्चिम चंपारण की 153 मिलों पर 63, सीतामढ़ी की 52 मिलों पर 55.83, दरभंगा की 34 मिलों पर 39.83, शिवहर की 8 मिलों पर 17.78 और नवादा की 23 मिलों पर 20.48 करोड़ रुपए बकाया हैं. इस के अलावा अरवल, शेखपुरा, लखीसराय, मधुबनी, समस्तीपुर, सिवान, सारण व गोपालगंज आदि जिलों की सैकड़ों चावलमिलों पर करीब 90 करोड़ रुपए बकाया?हैं.

बिहार में चावलमिलों की धांधली पर रोक लगाने में सरकार बिलकुल नाकाम रही?है. बिहार महालेखाकार ने अपनी ताजा रिपोर्ट में बताया है कि धान को ले कर मिलमालिकों ने सरकार को करोड़ों रुपए का चूना लगाया है. साल 2011-12 में मिलमालिक 434 करोड़ रुपए का धान दबा कर बैठ गए और उस के बाद के साल में 929 करोड़ रुपए के धान की हेराफेरी कर के सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाया. इस के बाद भी सरकार ने मिलमालिकों के खिलाफ कार्यवाही करने में जरा सी भी दिलचस्पी नहीं ली. बिहार स्टेट फूड एंड सिविल सप्लाइज कारपोरेशन लिमिटेड से आरटीआई एक्टीविस्ट शिव प्रकाश राय ने इस बारे में पूरी सूचना मांगी थी. आरटीआई के तहत सूचना मिली कि साल 2011-12 में जिन मिलों पर धांधली का आरोप लगा था, उन्हीं मिलों को साल 2012-13 में भी करोड़ों रुपए के धान दे दिए गए. इतना ही नहीं केवल 50 हजार रुपए की गारंटी रकम पर ही 3 से 6 करोड़ रुपए के धान चावलमिलों को सौंप दिए गए. मिलों को धान देने के बारे में नियम यह है कि भारतीय खाद्य निगम मिलों से एग्रीमेंट करता?है, जिस के तहत मिलमालिक पहले निगम को 67 फीसदी चावल देते?हैं, जिस के बदले में उन्हें रसीद मिलती?है. उस रसीद को दिखाने के बाद ही निगम द्वारा मिलों को 100 फीसदी धान दिया जाता है.

आरटीआई एक्टीविस्ट शिवप्रकाश कहते?हैं कि उन्होंने साल 2012 में सरकार को धांधली के बारे में पूरे कागजात सौंप दिए थे. उस के बाद भी चावलमिलों के मालिकों के खिलाफ कानूनी कदम नहीं उठाए गए. अगर मिलमालिकों और धान का लेनदेन करने वाले अफसरों की पिछली 3-4 सालों के दौरान बनाई गई दौलत की बारीकी से जांच की जाए तो उन की संपत्ति आसमान पर पहुंची मिलेगी.                

तोहफा

मध्य प्रदेश को फिर मिला कृषि कर्मण अवार्ड

नई दिल्ली : कृषि क्षेत्र में बेहतरीन प्रदर्शन के लिए भारत सरकार ने मध्य प्रदेश को साल 2014-15 का कृषि कर्मण अवार्ड लगातार चौथी बार दिया है. इस से पहले भी 3 सालों तक यह अवार्ड मध्य प्रदेश को ही मिलता रहा?है.

इस मौके पर प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान व किसान कल्याण एवं कृषि विकास मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने प्रदेश के किसानों की जम कर तारीफ की व बधाई दी. मध्य प्रदेश को कृषि कर्मण अवार्ड के साथ 5 करोड़ रुपए की राशि भी दी जाएगी.   

इजाफा

संसद का खाना हुआ महंगा

नई दिल्ली : संसद की कैंटीन का खाना अकसर चर्चा का विषय बनता रहता?है. कभी उस के पकवानों की चर्चा की जाती है, तो कभी चीजों के दाम मुद्दा बनते हैं. अब नए साल के मौके पर संसद का खाना महंगा होने जा रहा?है. रियायती दरों पर खाना परोसे जाने संबंधी विवादों की वजह से ही दामों में इजाफा किया जा रहा है. नए शिड्यूल के मुताबिक 18 रुपए में मिलने वाली शाकाहारी थाली अब 12 रुपए के इजाफे के साथ 30 रुपए में मिलेगी. इसी तरह 33 रुपए में मिलने वाली थाली अब 27 रुपए के इजाफे के साथ 60 रुपए की हो जाएगी. थ्री कोर्स मील की कीमत 61 रुपए से बढ़ कर 90 रुपए हो जाएगी और पहले 29 रुपए में मिलने वाली चिकन करी 40 रुपए की हो जाएगी.

नए साल में होने वाली यह बढ़ोतरी सांसदों, लोकसभा अधिकारियों, राज्यसभा अधिकारियों, सुरक्षा अधिकारियों और मीडिया कर्मियों के साथसाथ संसद के विजिटरों पर?भी लागू होगी. इस मामले में लोकसभा सचिवालय की ओर से कहा गया कि कीमतों में यह बदलाव लोकसभा अध्यक्ष के आदेश से किया गया है. संसद की कैंटीन के दामों में यह इजाफा 6 साल बाद किया गया?है. आदेश के मुताबिक बीचबीच में कैंटीन की चीजों के दामों की समीक्षा की जाएगी. सचिवालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि संसद की कैंटीन में रियायती दरों पर मिलने वाले खाने का मुद्दा मीडिया में चर्चा का विषय बना रहता?है. इसी वजह से लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने संसद की फूड कमेटी को इस मामले में ध्यान देने के आदेश दिए थे. कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद कैंटीन को ‘न लाभ, न हानि’ के आधार पर चलाने का फैसला लिया गया.                    

इंतजाम

पुआल का होगा प्रबंधन

नई दिल्ली : दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में धुंध के कहर को थामने के लिए पर्यावरण मंत्रालय ने पंजाब सरकार के नए प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी है. इस के तहत धान की भूसी और पुआल के बेहतर प्रबंधन का बंदोबस्त किया जाएगा.

फिलहाल भूसी और पुआल को खेतों में जलाए जाने से दिल्ली और एनसीआर में वायु प्रदूषण में इजाफा होता है. नए प्रोजेक्ट में जीवाष्म ईंधन का इस्तेमाल किया जाएगा. इस के साथ ही केरल, तमिलनाडु व मध्य प्रदेश के प्रोजेक्टों को भी मंजूरी दे दी गई है.

पर्यावरण मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन से जुड़ी कमेटी ने इन प्रोजेक्टों को मंजूरी दे दी?है. तमिलनाडु सरकार के प्रोजेक्ट के तहत तटीय लोगों का पुनर्वास किया जाएगा. प्रोजेक्ट के तहत तटीय इलाके के 23 गांवों का भला होगा. इन प्रोजेक्टों का मकसद जलवायु परिवर्तन के खतरों को दूर करना और कार्बन उत्सर्जन घटाना?है.       

राहत

बगैर शुल्क मक्के का आयात

नई दिल्ली : भारत में मक्के की फसल की भी खासी अहमियत है, पर सूखे की वजह से लगातार दूसरे साल मक्के का उत्पादन कम होने के आसार हैं. हालात से निबटने के लिए केंद्र सरकार ने सरकारी उपक्रम पीईसी को 5 लाख टन मक्का शून्य शुल्क पर आयात करने की इजाजत दी है. बड़े पैमाने पर किए जाने वाले इस आयात से?स्टार्च और पोल्ट्री इंडस्ट्री की मांग को पूरा करने में सहूलियत होगी. मौजूदा वक्त में मक्के के आयात पर 50 फीसदी आयात शुल्क लगता है. बाहर से मक्का मंगाने पर शून्य शुल्क रियायत टैरिफ रेट कोटा (टीआरओ) के तहत स्टार्च, पोल्ट्री और पशुपालन उद्योग की मांग पर दी गई है. आयात के सिलसिले में एक सीनियर अफसर ने बताया कि वाणिज्य मंत्रालय ने?टीआरओ के तहत शून्य शुल्क पर 5 लाख टन और गैर अनुवांशिक तौर पर संशोधित मक्का आयात करने की इजाजत दी?है. इस आयात के लिए पीईसी लिमिटेड को जरीया एजेंसी बनाया गया है.

पशुपालन व मुरगीपालन के कारोबार में मक्के की काफी जरूरत पड़ती?है. इस आयात से हालात बेहतर होने की उम्मीद है.

योजना

बीज उत्पादकों को भी बोनस

पटना : धान पर मिलने वाले बोनस का फायदा बीज उत्पादकों को भी मिलेगा. बोनस को न्यूनतम समर्थन मूल्य से जोड़ कर बीज की दर तय की जाएगी.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने धान पर मिलने वाले बोनस की समीक्षा करते हुए कहा हुए कहा कि कुछ साल पहले तक बीज उत्पादकों को भी बोनस का लाभ दिया जाता था, जिसे फिर से लागू किया जाएगा. किसानों से बीज खरीदने के लिए तय होने वाली दर में समर्थन मूल्य और बोनस को जोड़ दिया जाएगा. दोनों के मूल्य को जोड़ने के बाद उस में 10 फीसदी की राशि और जोड़ी जाएगी. राज्य में किसानों से बीज खरीदने के लिए दर तय करने का फार्मूला पहले से ही तय है. न्यूनतम समर्थन मूल्य केंद्र सरकार द्वारा तय किया जाता है, इसलिए इस में राज्य सरकार की भूमिका कम होती है. इस के बाद भी बिहार सरकार ने यह फैसला लिया है कि अगर समर्थन मूल्य पर केंद्र या राज्य सरकार किसी भी तरह के बोनस का ऐलान करती है, तो बीज उत्पादक किसानों को भी फायदा मिलेगा. इस के अलावा बीज उत्पादकों को बढ़ावा देने के लिए बीज ग्राम और मुख्यमंत्री तीव्र बीज विस्तार जैसी योजनाएं भी चल रही हैं. इसी का नतीजा है कि राज्य के किसान अब खुद ही बड़े पैमाने पर बीज का उत्पादन करने लगे हैं.

बिहार में हर साल 3.07 लाख क्विंटल धान के बीज, 7.20 लाख क्विंटल गेहूं के बीज और 75 हजार क्विंटल मक्के के बीज की जरूरत होती है.                      

तरक्की

चीनी के उत्पादन में इजाफा

नई दिल्ली : चीनी का चकल्लस तो साल भर चलता ही रहता है. किसान भुगतान की मांग करते हैं और चीनीमिलें टालू मिक्सचर मिलाती रहती हैं. ऐसे में सरकार भी हाथापांव मारती नजर आती है. इन सब गतिविधियों के बीच अच्छी बात यह कही जा सकती है कि चीनी के कुल उत्पादन में गिरावट होने के अंदाजे के बावजूद चालू सीजन में उत्पादन में इजाफा जारी है. इंडियन शुगरमिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के मुताबिक 31 दिसंबर 2015 तक चीनी के उत्पादन में साल 2014 के 31 दिसंबर तक हुए उत्पादन के मुकाबले 6.5 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

पिछले अक्तूबर, नवंबर व दिसंबर के दौरान चीनी का उत्पादन 75 लाख टन हुआ, जबकि इस साल गन्ने की पेराई ने वाली मिलों की कुल तादाद बीते साल के मुकाबले बेहद कम रही है. इस्मा का अंदाजा है कि इस साल चीनी का उत्पादन 2.7 करोड़ टन तक पहुंच सकता है. गौरतलब है कि पिछले साल चीनी का उत्पादन 2.8 करोड़ टन हुआ था. इस्मा के आंकड़ों के मुताबिक 31 दिसंबर 2015 तक देश भर में कुल 470 चीनी मिलों में पेराई शुरू हो चुकी थी, जबकि 31 दिसंबर 2014 तक 490 चीनीमिलों में पेराई बाकायदा शुरू हो चुकी थी. बहरहाल, फिलहाल तो चीनीमिलों का काम बिल्कुल चौकस ही कहा जा सकता है.   

इजाफा

मैनपुरी के किसानों को 4 गुना मुआवजा

मैनपुरी : उत्तर प्रदेश सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पिछले दिनों मैनपुरी का पक्षी विहार देखने अचानक जा पहुंचे. उसी दौरान उन्होंने कहा कि ग्रीन फील्ड एक्सप्रेसवे बनने से सब से ज्यादा विकास मैनपुरी और कन्नौज जिलों का होगा.

मुख्यमंत्री ने कहा कि एक्सप्रेसवे और ‘समान पक्षी विहार’ के लिए अधिग्रहीत की गई जमीन का किसानों को 4 गुना मुआवजा दिया जाएगा. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव स्थानीय सांसद तेज प्रताप सिंह यादव के साथ बगैर किसी सूचना के ‘समान पक्षी विहार’ देखने जा पहुंचे थे, उन के इस तरह यकायक आने से शासन में एकबारगी खलबली सी मच गई. मुख्यमंत्री ने पक्षी विहार पहुंचने के बाद वहां मौजूद ग्रामीणों से सहज तरीके से बातचीत की. उन्होंने बेहद तसल्ली से गांव वालों की दिक्कतों का जायजा लिया. ग्रामीणों ने सहज तरीके से अपनी समस्याओं का खुलासा किया और मुख्यमंत्री ने उन्हें समस्याओं से निबटने के तरीके बताए. मुख्यमंत्री के मैनपुरी आने की जानकारी मिलते ही हाथों में बैनर थाम कर नारे लगाते हुए काफी तादाद में किसान भी पक्षी विहार पहुंच गए. तमाम किसानों ने एक सुर से ‘समान पक्षी विहार’ के लिए अधिग्रहीत की गई जमीन का वाजिब मुआवजा दिलाने की मांग की

अखिलेश यादव ने किसानों से दोस्ताना तरीके से बात करते हुए उन्हें यकीन दिलाया कि आगामी बजट में खास प्रावधान कर के किसानों को उन की जमीनों का वाजिब मुआवजा दिलाया जाएगा. अखिलेश यादव ने माहिर नेता की तरह मीठीमीठी बातें करते हुए कहा कि देश भर में सब से ज्यादा बिजली उत्पादन करने की दिशा में उन की सरकार तेजी से कदम बढ़ा रही है. मुख्यमंत्री ने किसानों के जख्मों को सहलाने के अंदाज में कहा कि सूबे में भयंकर बरसात व ओलों की बारिश की वजह से तमाम किसानों की फसलें बुरी तरह तबाह हो गई थीं. इन आपदाओं में सब से ज्यादा तबाही बुंदेलखंड इलाके में हुई. मौसमी मार से तबाह किसानों को संभालने का भरोसा दिला कर मुख्यमंत्री ने मैनपुरी की फिजा में अपना रंग जमा दिया. इस बात में अब शक की कोई गुंजाइश नहीं है कि अखिलेश यादव भी अब एकदम परफैक्ट व माहिर नेता बन चुके?हैं.                             

अजूब

मछली 78 लाख रुपए की

टोक्यो : क्या कोई सोच सकता है कि मछली जैसी मामूली चीज भी लाखों के दाम में बिक सकती है और वह भी लाखदोलाख में नहीं, बल्कि 78 लाख रुपए में. आमतौर पर तो लोग सौ डेढ़ सौ रुपए प्रति किलोग्राम की दर से मछली खरीद कर तरकारी पकाते हैं और ठाठ से दावत उड़ाते हैं.पर यहां मामला सौडेढ़सौ का नहीं, बल्कि लाखों का है. यह हकीकत है कि एक जापानी खरीदार ने ‘ब्लूफिन टूना’ नामक मछली को 77 लाख 94 हजार रुपए यानी 1 लाख 17 हजार डालर में खरीदा. इस मछली को जापान के सुकिजी मछली बाजार में नए साल के मौके पर नीलामी के लिए रखा गया था.

इस ‘ब्लू फिन टूना’ मछली का वजन 2 सौ किलोग्राम है. यह गायब होने की कगार पर पहुंच चुकी प्रजाति की मछली है. नीलामी में लगाई गई इस मछली को जापान के उत्तरी तट के नजदीक से पकड़ा गया था. पिछले साल के मुकाबले इस नए साल (2016) के मौके पर यह मछली काफी महंगी बेची गई. सब से महंगी बेची गई ‘ब्लूफिन टूना’ नामक मछली की जापान में बहुत इज्जत यानी डिमांड है.

दरअसल जापान में इस मछली के कारोबार पर पाबंदी है, इसी वजह से इस का रुतबा ज्यादा है. मगर सवाल यह उठता है कि पाबंदी के बावजूद यह मछली लापता होने के कगार पर कैसे पहुंची? 

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राहत
उत्तर प्रदेश को 1304 करोड़

नई दिल्ली : फिलहाल खेती की दुनिया में जाड़े का मौजूदा मौसम फिजा बिगाड़े हुए है. सर्दी में गरमी का असर गेहूं और सरसों की खेती के लिए कहर बन रहा है. किसान बारिश के रास्ते सर्दी की बाट जोह रहे हैं. इस बीच उत्तर प्रदेश सूबे के सूखापीडि़तों के लिए राहतभरी खबर आई है.

केंद्र ने सूखा प्रभावितों के लिए के लिए उत्तर प्रदेश को 1304. 52 करोड़ रुपए की मदद देने का ऐलान किया है. एक बड़े स्तर की बैठक में इस मदद को मंजूरी दी गई. सूखे की चपेट में आने वाले सूबों को केंद्रीय मदद देने के मुद्दे पर गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सरकार के कई मंत्रियों के साथ एक उच्चस्तरीय बैठक की थी.  इसी बैठक में उत्तर प्रदेश के अलावा आंध्र प्रदेश को 433.77 करोड़ रुपए और ओडिशा को 815 करोड़ रुपए की केंद्रीय मदद देने पर मुहर लगाई गई. तेलंगाना को मदद मुहैया कराने के मामले में समिति बाद में फैसला लेगी. तमाम सूबों को मदद की यह रकम ‘राष्ट्रीय आपदा राहत कोष’ (एनडीआरएफ) से दी जाएगी. समिति ने सूखे से प्रभावित सूबों से लौटी केंद्रीय टीम की रिपोर्ट की जांच करने के बाद इस मदद का खुलासा किया. राजनीति से जुड़े लोगों का कहना है अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को मद्देनजर रखते हुए उत्तर प्रदेश को मोटी रकम देने का फैसला लिया गया है. वैसे उत्तर प्रदेश सूबे की सरकार ने केंद्र सरकार से सूखे से तबाह किसानों की मदद के लिए 2 हजार करोड़ रुपए की मांग की थी. उत्तर प्रदेश के लिहाज से कारगर साबित होने वाली इस बैठक में राजनाथ सिंह के अलावा वित्त मंत्री अरुण जेटली, कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह और नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढि़या ने भी हिस्सा लिया.                  

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मुद्दा

पेड़ काटने के लिए आनलाइन अर्जी

लखनऊ : अब पहले जैसा जमाना नहीं रहा कि जब जिस की मर्जी हुई तो बगैर पूछेताछे कोई भी पेड़ काट डाला. अब पेड़ काटने का परमिट लेने के लिए मार्च से बाकायदा आनलाइन आवेदन करना होगा. वन विभाग ने पूरे इंतजाम को साफ करने के लिहाज से यह कदम उठाया?है. इस साल की 7 जनवरी से जो भी मरमिट जारी किए गए या आगे जारी किए जाएंगे, उन्हें विभागीय वेबसाइट पर अपलोड करना भी जरूरी होगा. निजी जमीन पर लगे पेड़ भी वन विभाग की इजाजत से ही काटे जा सकते हैं, यह इजाजत डीएफओ के दफ्तर से मिलती है. इस के बदले विभाग तय फीस भी लेता है. पहले परमिट जारी करने में घपलों की शिकायतें वन मुख्यालय को मिलती थीं, पर आनलाइन आवेदन से हालात बेहतर होंगे.स्वतंत्र भारत के बाशिंदों को इस तरह के फरमान ज्यादा पसंद नहीं आते, मगर इन्हें मानना तो पड़ता ही?है.                   

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बंदोबस्त
एमएमटीसी के जरीए दाल का आयात

नई दिल्ली : दाल के नाटक को सरकार दोहराने का मौका नहीं देना चाहती, इसीलिए वह इस के इंतजाम की मुहिम में जुट गई है. घटिया मानसून से फसल खराब होने के अंदेशे से अभी तक दाल के दाम चढे़ हुए हैं. यह बात सरकार के लिए चिंता का मामला है. यही सब देखते हुए दाल की कीमतों को घटाने के इरादे से सरकार ने 5 हजार टन तुअर दाल के आयात का फैसला लिया है. इस आयात के लिए टेंडर मांगे गए हैं. इस आयात के बाद घरेलू बाजार में तुअर दाल की हालत सुधर जाएगी और इस की कीमतों में गिरावट की उम्मीद बढ़ जाएगी. सरकारी कंपनी एमएमटीसी के जरीए 5 हजार टन तुअर दाल के आयात के लिए निविदाएं (टेंडर) मांगे गए हैं. दाल की मात्रा को टेंडर में मिलने वाली कीमतों के मुताबिक बढ़ाया भी जा सकता है.

दाल की आपूर्ति बेहतर होने से दाल के दामों में बीते दिनों कुछ कमी आने के बाद सरकार को लगता है कि नए साल में कीमतों में फिर से इजाफा हो सकता है. इसी खौफ की वजह से सरकार ने आयात के जरीए आपूर्ति बढ़ा कर कीमतें घटाने के इरादे से यह कदम उठाया है. काबिलेगौर है कि घरेलू बाजार में दाल की औसत कीमत अभी भी 180 रुपए प्रति किलोग्राम बनी हुई है. एमएमटीसी ने म्यांमार, मलावी व मोजंबीक से तुअर की दाल की ताजा फसल से 5 हजार टन दाल के आयात के लिए बोलियां मांगी हैं.

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मुद्दा

भंडारण सेवाओं पर छूट की मांग

नई दिल्ली : किसानों और कृषि संबंधी तमाम सेवाओं को कदमकदम पर?छूट की दरकार रहती है. कई मामलों में उन्हें छूट मिलती?भी है और करीबकरीब हर मामले में वे?छूट की मांग करते?हैं. छूट पाना किसानों की फितरत में शामिल है. पिछले दिनों उद्योग चैंबर ऐसोचैम ने वित्त मंत्रालय को सौंपे गए बजट पूर्व ज्ञापन में?छूटों की मांग की है. चैंबर का मानना है कि केंद्र सरकार को कृषि उत्पादों के भंडारण के लिए मुहैया कराई जाने वाली वेयरहाउस मैनेजमेंट और लैबोरेटरी टेस्टिंग जैसी सेवाओं को सेवा कर से छूट देनी चाहिए. इस के अलावा चैंबर ने सलाह दी?है कि जमीन और कृषि यंत्रों को लीज पर देने और गांवों में मुहैया कराई जाने वाली दूसरी सेवाओं या कृषि उत्पादों की मार्केटिंग जैसी सेवाओं को?भी सेवा कर के दायरे से अलग रखना चाहिए. हकीकत तो यह है कि किसानों और खेती के मामलों में आमतौर पर सभी सरकारें खुले दिल से छुटों का पिटारा खोल देती?हैं. इस के बावजूद किसान कभी खुश नहीं हो पाते. वाकई किसानों को खुश करना किसी चुनौती से कम नहीं नहीं?है.    

सवाल किसानों के

सवाल : राजमा की खेती में कितना बीज लगेगा. उस के कीटरोगों का इलाज भी बताएं?

-कौशल शर्मा, सहारनपुर, उत्तर प्रदेश

जवाब : राजमा की खेती के लिए पहाड़ी इलाकों में 80 किलोग्राम व मैदानी इलाकों में 50-60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीज लगेगा.

राजमा में एफिड व थ्रिप्स के इलाज के लिए डाइमेथियोएट 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से इस्तेमाल करें. पोड बोरर के इलाज के लिए कार वाइल 50 डब्ल्यूपी 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से इस्तेमाल करें. एवील व्हाइट फ्लाई के इलाज के लिए स्प्रे फोसेलोन 35 ईसी 1.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से इस्तेमाल करें. रस्ट के इलाज के लिए सल्फर 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

सवाल : मुझे नाशपाती की खेती के बारे में जानकारी दें?

-सर्वजीत, सरायकेला, झारखंड

जवाब : नाशपाती की खेती समशीतोष्ण जलवायु (जहां गरमीसर्दी बराबर मात्रा में पड़ती हो) में की जाती है. इस की खेती के लिए भारी या दोमट मिट्टी अच्छी रहती है.

नाशपाती को 3 वर्गों में बांटा जाता?है:

चाइना नाशपाती : इस वर्ग में चाइना, सिनसिंसिस, पत्थर नाख व ट्रवेंटिएथ सेंचुरी प्रजातियां शामिल हैं, जो मैदानी क्षेत्रों में उगाई जा सकती?हैं.

यूरोपियन नाशपाती : इस वर्ग में लैक्सटन सुपर्ब, विलयम्स व कान्फरेंस प्रजातियां शामिल हैं. इस वर्ग की नाशपातियां कोमल, रसीली व जायकेदार होती हैं.

हाईब्रिड प्रजातियां?: इस वर्ग में लिकट, स्मिथ, काइफर व सुवाने प्रजातियां शामिल हैं. इन्हें पहाड़ी इलाकों में लगाया जाता?है.

नाशपाती की रोपाई सर्दियों में 3-5 मीटर की दूरी पर करनी चाहिए.

सवाल : मैं टमाटर की खेती करना चाहता हूं. इस बारे में जरूरी जानकारी दें?

-शिवशंकर, सीतापुर, उत्तर प्रदेश

जवाब : टमाटर को साल में 2 बार यानी जूनजुलाई व नवंबर में लगा सकते हैं. 1 हेक्टेयर में टमाटर लगाने के लिए 225 वर्गमीटर क्षेत्र में नर्सरी तैयार करते?हैं, जिस के लिए 400-500 ग्राम बीज की जरूरत होती है.

पूसा हाईब्रिड 1, 2, 4 के अलावा पूसा सदाबहार, पूसा उपहार, अर्का विकास, पूसा अर्लीड्वार्फ, पूसा शीतल व रोमा वगैरह टमाटर की उम्दा प्रजातियां?हैं.

सवाल : मुझे जैविक खेती के बारे में जानकारी दें?

-अरविंद कुमार, पश्चिमी चंपारन, बिहार

जवाब : जैविक खेती के जरीए उम्दा क्वालिटी का उत्पादन बगैर खतरनाक रसायनों के इस्तेमाल के प्राप्त किया जाता?है. जैविक खेती अपनेआप में एक खास विषय है, जिस के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क कर सकते हैं.           

डा. अनंत कुमार, डा. प्रमोद कुमार मडके, डा. देवेंद्र पाल कृषि विज्ञान केंद्र, मुरादनगर, गाजियाबाद

औषधीय व मसाला फसल अजवायन की उन्नत खेती

तमाम बीजीय मसालों में अजवायन की खास जगह है. इस का इस्तेमाल सब्जियों व अचारों में मसाले के रूप में किया जाता है. इस के बीज पेट की तकलीफों में दवा का काम करते हैं. अजवायन में प्रोटीन, वसा, रेशा, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, फास्फोरस व लोहा जैसे गुणकारी तत्त्व पाए जाते हैं. इस की खास महक इस में मौजूद तेल के कारण होती है. अजवायन के बीजों में 2 से 4 फीसदी तक थाईमोलयुक्त तेल पाया जाता है, जिसे बहुत सी आयुर्वेदिक औषधियों व कई उद्योगों में इस्तेमाल किया जाता है.

जलवायु : अजवायन सर्दी के मौसम में उगाई जाने वाली फसल है. इस की अच्छी बढ़वार व पैदावार के लिए ठंडा व सूखा मौसम ठीक होता है. सिर्फ बीज पकने के दौरान कुछ गरम मौसम की जरूरत होती है.

जमीन : अच्छी पैदावार के लए भुरभुरी दोमट व मटियार दोमट जमीन मुफीद रहती है. इस के लिए अच्छे जलनिकास वाली, जीवांश पदार्थ वाली और नमी बरकरार रखने वाली जमीन अच्छी होती है. अजवायन के लिए रेतीली जमीन ठीक नहीं होती है.

उन्नत किस्में : अजवायन बोने के लिए ज्यादातर देशी किस्मों को ही चुना जाता है. इस की ज्यादा पैदावार देने वाली उन्नत किस्में हैं ऐऐ 1, ऐऐ 2, गुजरात अजवायन, गऐ 19-80, लाभ सलेक्शन 1 व 2 और पंत रुचिका.

बोआई का समय : मध्य अक्तूबर से मध्य नवंबर तक.

बीज दर : 4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर

खेत की तैयारी : पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के बाद 2-3 जुताइयां देशी हल या हैरो से करनी चाहिए. इस के बाद पाटा लगा कर मिट्टी को बारीक कर के खेत को समतल करें. अच्छे अंकुरण के लिए खेत में पर्याप्त नमी होना जरूरी है. इस के लिए पलेवा कर के ही खेत तैयार करें.

खाद व उर्वरक : अच्छी पैदावार के लिए बोआई के करीब 3 हफ्ते पहले खेत में 10 से 15 टन प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की सड़ी खाद या कंपोस्ट खाद डालनी चाहिए. सामान्य उर्वरता वाली जमीन के लिए 40 किलोग्राम नाइट्रोजन और 20 किलोग्राम फास्फोरस की प्रति हेक्टेयर की दर से जरूरत पड़ती है. नाइट्रोजन की आधी मात्रा व फास्फोरस की पूरी मात्रा खेत में बोआई से पहले डालनी चाहिए. पोटाश खाद मिट्टी की जांच के मुताबिक जरूरत पड़ने पर डालनी चाहिए. नाइट्रोजन की बची मात्रा बोआई के 30 व 60 दिनों के अंतर पर 2 बार में डालनी चाहिए.

सिंचाई : अजवायन की फसल में करीब 4-5 सिंचाइयों की जरूरत पड़ती है. एक हलकी सिंचाई बोआई के फौरन बाद कर सकते हैं. मौसम व मिट्टी की किस्म के आधार पर 15-25 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की जा सकती है.

बीजोपचार : रोगों से बचाव के लिए 2.5 ग्राम कार्बंडाजिम, केप्टान या थीरम से प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार कर के ही बोआई करें.

बोआई की विधि : अजवायन की बोआई छिटक कर या कतारों में की जाती है. कतारों में बोआई 45 सेंटीमीटर की दूरी पर की जाती है. पौधे से पौधे की दूरी 15 से 20 सेंटीमीटर होनी चाहिए. छिटकवां विधि में बीजों को समतल क्यारियों में समान रूप से बिखेर कर हाथ से मिट्टी में मिला देना चाहिए.

निराईगुड़ाई व खरपतवार निकालना : अजवायन में 2 से 3 बार निराईगुड़ाई की जरूरत पड़ती है. करीब 30 दिनों के अंतर पर निराईगुड़ाई की जानी चाहिए. पहली निराईगुड़ाई के दौरान फालतू पौधों को निकाल देना चाहिए.

रासायनिक खरपतवार नियंत्रण के लिए पेंडीमिथीलीन की 1 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से ले कर 500-600 लीटर पानी में घोल कर बोआई के बाद खेत में छिड़कें. छिड़काव के समय मिट्टी  में नमी होना जरूरी है.

रोगों व कीटों का इलाज

चूर्णिल आसिता या छाछिया (पाउडरी मिल्ड्यू) : इस रोग से पौधों पर सफेद चूर्ण जमा हो जाता है. पौधे पीले हो कर कमजोर हो जाते हैं और जल्दी पक जाते हैं. उपज में कमी होती जाती है. इस रोग के इलाज के लिए 25 किलोग्राम सल्फर डस्ट का प्रति हेक्टेयर की दर से बुरकाव करें. घुलनशील गंधक 0.2 फीसदी या केराथेन 0.1 फीसदी घोल या केलिक्सिन 0.05 फीसदी घोल का छिड़काव करने से भी यह रोग ठीक हो जाता है. जरूरत पड़ने पर 15 दिनों बाद दोबारा दवा का इस्तेमाल करें.

झुलसा (ब्लाइट) : फसल में फूल आने के दौरान वातावरण में नमी ज्यादा होने पर, इस रोग का प्रकोप तेजी से होता है. इलाज के लिए मैंकोजेब 0.2 फीसदी घोल का छिड़काव रोग की शुरुआती अवस्था में करें.

मोयला (चैंपा) : फूल आने की अवस्था में मोयला कीटों का प्रकोप अधिक होता है. ये पौधे के कोमल भागों का रस चूस लेते हैं, जिस से उपज में कमी हो जाती है. इस कीट की रोकथाम के लिए 0.03 फीसदी डाइमिथोएट 30 ईसी या मिथाइल डिमेटान 125 ईसी या मेलाथियान 0.1 फीसदी को 500 से 700 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें. छिड़काव शाम के समय करें ताकि मधुमक्खियों पर इस का कम असर पड़े.

कटाई व पैदावार : अजवायन की फसल करीब 130 से 180 दिनों में पक कर तैयार होती है. मौसम व बोआई के अनुसार अजवायन की कटाई फरवरी से मई तक की जाती है. फसल पकने पर फूल आने बिलकुल बंद हो जाते है और बीज भूरे रंग के हो जाते हैं. इस अवस्था में फसल को काट कर सूखने के लिए छायादार जगह पर कुछ दिनों तक फर्श पर छोड़ दिया जाता है. अच्छी तरह सूखने के बाद डंडों से पीट कर बीजों को अलग कर लिया जाता है.

उपज : उन्नत तकनीक अपना कर सिंचित क्षेत्रों में 10 से 15 क्विंटल और असिंचित क्षेत्रों में 4 से 6 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज हासिल की जा सकती है.

भंडारण : अजवायन के बीजों का भंडारण नमी रहित गोदामों में करना चाहिए. अच्छी तरह सुखाई व साफ की गई अजवायन को बोरियों में भर कर भंडारण करें या फिर बाजार में बेचने के लिए भेज दें.

कुछ कहती हैं तसवीरें

दम लगा कर भाग : नए साल की शुरुआत में अबूधाबी में हुआ जानवरों की रेस का जलसा लाखों लोगों को लुभा गया. जलसे में अरबी नस्ल के घोड़ों के अलावा आलीशान ऊंटों व परिंदों ने बढ़चढ़ कर भाग लिया.

तिल की फसल का रोगों व कीटों से बचाव

तमाम तिल उगाने वाले देशों में भारत का नाम सब से ऊपर है. भारत के राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक सूबों में बड़े पैमाने पर तिल बोया जाता है. भारत में सभी मौसमों में तिल लगाया जाता है. दुनिया में तिल की मांग तेजी से बढ़ रही है. तिल में सेहत सुधारने के सभी गुण मौजूद हैं. इस में उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन व जरूरी अमीनो अम्ल मौजूद होते हैं, जो बुढ़ापा रोकने में मददगार होते हैं. तिल के तेल को तेलों की रानी कहा जाता है, क्योंकि इस में त्वचा निखारने और खूबसूरती बढ़ाने के गुण मौजूद होते हैं. तिल की फसल में भी कई रोग व कीट लग जाते हैं, जिस से इस के उत्पादन व गुणवत्ता पर काफी असर पड़ता है.

तिल के खास रोग

फाइटोफ्थोरा अंगमारी : यह रोग ‘फाइटोफ्थोरा पैरासिटिका’ नामक फफूंद से होता है. सभी आयु के पौधों पर इस रोग का हमला हो सकता है, पर पुष्प अवस्था तक पौधे इस की ज्यादा चपेट में आते हैं. शुरू में यह रोग जमीन की सतह के साथ पौधों के तनों पर नम काले दागों के रूप में दिखाई पड़ता है. इस से तनों पर काली धारियां बन जाती हैं. रोग ज्यादा फैलने से पौधों की मौत हो जाती है.

इलाज

* एक खेत में लगातार तिल की बोआई न करें.

* बोआई के लिए अच्छी, रोग रहित व रोगरोधी किस्म का चुनाव करना चाहिए.

* संक्रमण रोकने के लिए बोआई से पहले 0.3 फीसदी थीरम, केप्टान या रिडोमिल से बीजोपचार करें.

* रोग के लक्षण दिखाई पड़ते ही फसल पर मैंकोजेब 0.2 फीसदी या कापर आक्सीक्लोराइड 0.3 फीसदी घोल का छिड़काव करना चाहिए.

तना व मूल विगलन : यह रोग ‘मैक्रोफोमिना फैजियोलिना’ कवक से होता है. रोगग्रस्त पौधे की जड़ व तने भूरे रंग के हो जाते हैं. जब जमीन की सतह के पास इस का संक्रमण होता है, तब अचानक पौधे मुरझाने लगते हैं. पौधे का संक्रमण वाला भाग काले रंग का हो जाता है और कोयले जैसा दिखाई देने लगता है. रोगी पौधे को ध्यान से देखने पर काले दाने दिखाई देते हैं. रोगी पौधे जल्दी पक जाते हैं और उत्पादन घट जाता है.

इलाज

* कम से कम 2-3 साल का फसलचक्र अपनाएं जिस में धान, मक्का, गेहूं आदि फसलें शामिल करें.

* रोगग्रस्त खेत के अवशेषों को जला कर खेत की सफाई करें.

* बोआई से पहले बीजों को कार्बंडाजिम 0.1 फीसदी और थीरम 0.2 फीसदी या ट्राइकोडर्मा विरिडि 0.4 फीसदी से उपचारित करें.

* ट्राइकोडर्मा विरिडि मित्र फफूंद 2.5 किलोग्राम गोबर की खाद में मिला कर बोआई से पहले खेत में डालने से रोग में कमी होती है.

* तिल व मोठ की मिश्रित खेती से रोग कम होता है.

सरकोस्पोरा पत्ती धब्बा :

* इस रोग से बचाव के लिए स्वस्थ बीजों से बोआई करें.

* खेत में पौधों के रोगी अवशेषों व खरपतवारों को न रहने दें.

* फसलचक्र अपनाएं.

* रोग की शुरुआती अवस्था में पत्तियों पर 0.05 फीसदी कार्बंडाजिम या 0.2 फीसदी मैंकोजेब घोल का छिड़काव करें.

आल्टरनेरिया पत्ती धब्बा (झुलसा) : यह रोग ‘आल्टरनेरिया सिसेमी’ कवक से होता है. इस के असर से पत्तियों पर छोटे व भूरे धब्बे पड़ जाते हैं और बाद में पत्तियां झड़ जाती हैं.

इलाज

* स्वस्थ व प्रमाणित बीजों से बोआई करें.

* ऊपर बताई गई विधि से बीजोपचार करें और फसलचक्र अपनाएं.

* रोग के लक्षण दिखाई देते ही मैंकोजेब 0.2 फीसदी या आइप्रोडियान 0.1 फीसदी या कार्बंडाजिम व मैंकोजेब 0.1 फीसदी का छिड़काव करें.

छाछिया (पाउडरी मिल्ड्यू) : यह रोग ‘एरीसायफी ओरोंटाई’ या ‘एरीसायफी सिकोरेसिएरम’ कवक से होता है. पत्तियों व पौधों के सभी ऊपरी भागों पर रोग के लक्षण सफेद चूर्ण के रूप में दिखाई पड़ते हैं. रोगी पत्तियां झड़ जाती हैं. बीज अधपके रहजाते हैं. पौधा पीला व कमजोर हो जाता है.

लाज

फूल खिलने से फली बनते समय तक यदि रोग के लक्षण दिखाई पड़ें, तो सल्फेक्स (घुलनशील गंधक) 0.2 फीसदी घोल का छिड़काव करें. जरूरत के मुताबिक 10 दिनों बाद दोबारा छिड़काव करें.

बैक्टीरियल ब्लाइट : यह रोग ‘जेंथोमोनास सिसेमी’ और ‘स्यूडोमोनास सिसेमी’ नामक जीवाणुओं द्वारा होता है. रोग के लक्षण पत्तियों पर अनियमित छोटे धब्बों के रूप में दिखते हैं, जो बाद में तादाद में बढ़ते हैं और भूरे रंग के हो जाते हैं. वातावरण में अधिक तापमान होने और बारबार बौछारों वाली बारिश होने से यह रोग महामारी बन जाता है.

इलाज

* बोआई के लिए जीवाणु रहित बीजों का इस्तेमाल करें.

* रोगी पौधों के अवशेषों व खरपतवारों को नष्ट कर दें. बीजों को स्ट्रेप्टोसाइक्लीन 0.02 फीसदी घोल में 2 घंटे डुबो कर सुखाने के बाद बोआई करें.

* रोग की शुरुआत में स्ट्रेप्टोसाइक्लीन 0.01 फीसदी घोल का छिड़काव 15 दिनों के अंतराल पर जरूरत के मुताबिक करें.

* रोगरोधी किस्मों का इस्तेमाल करें.

पर्णभित्ता (फिलोडी) : यह रोग ‘फाइटोप्लाज्मा’ जीवाणु से होता है. रोगी पौधों के पुष्पांग हरी पत्तियों जैसे हो जाते हैं. प्रभावित पौधे गुच्छों  में छोटीछोटी पत्तियां उत्पन्न करते हैं.

इलाज

* खेतों को खरपतवार नष्ट कर के साफ रखें.

* रोगी पौधे दिखाई पड़ते ही उखाड़ कर नष्ट कर दें.

* दक्षिण भारत में फसल को जल्दी बोना ठीक रहता है, जबकि उत्तर भारत में फसल को देर से बोना फायदेमंद होता है.* बोआई के 25 से 40 दिनों बाद फसल पर मिथाइल डिमेटान या क्यूनालफास (1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी) के घोल का छिड़काव करें

पर्ण कुंचन (लीफ कर्ल) : यह रोग ‘निकोटियाना वायरस 10’ नामक विषाणु से होता है. शुरू में संक्रमित पौधों की पत्तियां नीचे की तरफ मुड़ जाती हैं. निचली सतह पर शिराएं मोटी हो कर उभर जाती हैं. बाद में संक्रमित पौधे छोटे रह जाते हैं और बिना फलियां बने ही नष्ट हो जाते हैं.

इलाज

* यह रोग वायरस जनित है और ‘बेमेसिया टेबेसाई’ नामक सफेद मक्खी से फैलता है, इसलिए खेत में रोगी पौधे दिखाई देते ही उन्हें नष्ट कर दें और मिथाइल डिमेटान (1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी) के घोल का छिड़काव करें.

* खरपतवार नष्ट कर के खेत साफ रखें.

* रोगरोधी किस्मों का प्रयोग करें.

तिल के खास कीट

तिल पत्तीमोड़क व फलीछेदक (एंटीगेस्ट्रा कैटालुनालिस) : इस की सूंडि़यां कोमल पत्तियों को खाती हैं और पत्ती की भीतरी जाली छोड़ जाती हैं. यह क्रिया फसल की शुरुआती अवस्था में होती है. बाद में सूंडि़यां फूलों के भीतरी भाग को खाती हैं. ये फली छेद कर पके बीजों को भी खाती हैं.

इलाज

बोआई के 35 दिनों बाद क्यूनालफास 25 ईसी की 1.5 लीटर मात्रा पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़कें. फिर 45 दिनों की अवस्था पर नीम के तेल की 10 मिलीलीटर मात्रा 1 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़कें. तिल के साथ मूंग की मिश्रित खेती से तिल में पत्तीछेदक व फलीछेदक कीटों का हमला कम होता है.

तिल गाल मक्खी (एस्फोनडाइलिया सिसामी) : यह फूल के भीतरी भाग को खाना शुरू करती है और बाद में फूल के सभी भागों को नष्ट कर देती है. गाल मक्खी की लटों के कारण फलियां फूल कर गांठ का रूप ले लेती हैं.

इलाज

मैलाथियान 5 फीसदी  चूर्ण या मिथाइल पैराथियान 2 फीसदी चूर्ण 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुरकें. पानी की सुविधा वाले इलाकों में कारबेरिल 50 फीसदी घुलनशील चूर्ण 0.1 फीसदी या मोनोक्रोटोफास 0.04 फीसदी के घोल का छिड़काव करें.

तिल हाकमाथ (एकरोनसिया स्टीक्स) : यह तिल का प्रमुख कीट नहीं है. यह तिल की पत्तियों को खाता है और पौधे की सभी पत्तियों को नष्ट करता है. जब फसल पकती है, तब से पूरे मौसम तक यह कीट सक्रिय रहता है.

इलाज

जब इस कीट का हमला दिखाई पड़े तो कारबेरिल या मोनोक्रोटोफास ऊपर बताए अनुसार छिड़कने से बचाव हो जाता है. यह कीट दिखने में बहुत बड़ा होता है.

बिहार रोमयुक्त सूंड़ी (डाइक्रिसिया आबलिगा) : इस के लारवे सभी पौधों पर आक्रमण करते हैं. इस की सूंडि़यां दूसरे पौधों पर जा कर केवल तने को छोड़ कर सभी भागों को नष्ट कर देती हैं. उत्तर भारत में सितंबरअक्तूबर महीनों के दौरान यह कीट ज्यादा घातक हो जाता है.

इलाज

कीटनाशी क्यूनालफास या मोनोक्रोटोफास द्वारा ऊपर बताए तरीकों से इस की भी रोकथाम की जाती है.

ठंडा तरबूज करेगा जेब गरम

गरमियों के तपिश भरे दिनों में अगर कुदरती तौर पर ठंडक पहुंचाने वाली चीज की बात की जाए तो तरबूज पहले नंबर पर आएगा. इस की खेती ज्यादातर उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आसाम, तामिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, बिहार व पश्चिम बंगाल राज्यों में की जाती है. अगर उन्नत तरीके से इस की थोड़ी अगेती खेती कर ली जाए तो मार्केट में पहले पेश हो कर यह ठंडा फल किसानों की जेब भी खूब गरम कर सकता है. बेबी वाटरमैलन की बढ़ रही है मांग : इस बारे में कृषि विज्ञान केंद्र, दरियापुर, रायबरेली (उत्तर प्रदेश) के उद्यान विशेषज्ञ डा. एसबी सिंह कहते हैं कि किसानों को अच्छा मुनाफा लेने के लिए बोआई से पहले यह तय कर लेना चाहिए कि तरबूज की बिक्री आसपास के बाजारों में करनी है या फिर उसे बड़े शहरों में भेजना है. आजकल महानगरों में छोटे परिवारों की संख्या ज्यादा होने से छोटे आकार के तरबूजों (2-3 किलोग्राम वजन वाले) की मांग ज्यादा बनी रहती है. ऐसे तरबूजों को बेबी वाटरमैलन (छोटा तरबूज) के नाम से जाना जाता है. बेबी वाटरमैलन को फ्रिज में भी आसानी से रख सकते हैं. वैसे देहातों में आज भी बड़े आकार के तरबूजों की ही मांग ज्यादा है.

जमीन : तरबूज की फसल के लिए बलुई दोमट जमीन बेहतर होती है. इसी वजह से नदियों के किनारे की दियारा जमीन इस के लिए सब से अच्छी मानी जाती है. जमीन में जलनिकासी और सिंचाई का अच्छा इंतजाम होना चाहिए. जलभराव से इस फसल को काफी नुकसान पहुंचता है. परीक्षणों के मुताबिक पाया गया है कि दोमट मिट्टी जिस का पीएच मान 6.5 से 7 के बीच हो तरबूज की खेती के लिए ज्यादा बढि़या होती है.

बोआई का समय : तरबूज के बीजों के जमाव के लिए 21 डिगरी सेंटीग्रेड से नीचे का तापमान सही नहीं होता है. यह पाले को बर्दाश्त नहीं कर पाता है. इस की बढ़वार के लिए ज्यादा तापमान की जरूरत होती है. इसी वजह से इस की बोआई देश में अलगअलग समय पर की जाती है. उत्तरी भारत के मैदानी भागों में तरबूज की बोआई जनवरी के शुरुआती दिनों से ले कर मार्च तक की जाती है. उत्तरीपूर्वी और पश्चिमी भारत में इस की बोआई नवंबर से जनवरी तक की जाती है. दक्षिणी भारत में इस की बोआई दिसंबर से जनवरी महीनों के दौरान की जाती है.

खेत की तैयारी : सब से पहले खेत की गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए. उस के बाद 3-4 जुताइयां कल्टीवेटर या देशी हल से कर के मिट्टी को खूब भुरभुरी बना लेना चाहिए. नमी की कमी होने पर पलेवा जरूर करना चाहिए.

प्रजातियां : बेहतर होगा कि आप इलाकाई विशेषज्ञ से राय ले कर अपने इलाके के लिहाज से मुनासिब प्रजातियां ही बोएं. आप की सुविधा के लिए यहां तरबूज की तमाम प्रजातियों की एक सूची दी जा रही है.

बीज दर : बोआई करने से पहले बढि़या अंकुरण के लिए बीजों को पानी में भिगो दें. इस के बाद किसी फफूंदीनाशक दवा जैसे कार्बेंडाजिम, मैंकोजेब या थीरम से बीजशोधन करें. आमतौर पर छोटे बीज वाली किस्मों के लिए प्रति हेक्टेयर 2-3 किलोग्राम बीज पर्याप्त होते हैं. बड़े बीजों वाली किस्मों के लिए प्रति हेक्टेयर 5 किलोग्राम बीज लगते हैं.

बोआई की विधि : तरबूज की फसल पानी नहीं बर्दाश्त कर पाती है, लिहाजा इसे थोड़ा ऊपर 1 मीटर लंबे और 1 मीटर चौड़े रिज बेड में बोना चाहिए. इस से भी अच्छा होगा कि बीजों को अलगअलग किसी बर्तन जैसे मिट्टी के प्याले वगैरह में रख कर तैयार करें, इस से पौधे ज्यादा तंदुरुस्त होंगे.

पौधों को लाइनों में ही लगाना चाहिए. लाइन से लाइन की दूरी पौधों की किस्म पर निर्भर करती है. सुगर बेबी किस्म के लिए लाइन से लाइन की दूरी 2 मीटर और पौधे से पौधे की दूरी 0.6 मीटर मुनासिब होती है.

खाद व उर्वरक : मिट्टी की जांच कराए बिना खाद व उर्वरकों की मात्रा तय नहीं की जा सकती है. मोटे तौर पर 200-300 क्विंटल खूब सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डालनी चाहिए. 100-120 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से ले कर उस की आधी मात्रा शुरू में डालनी चाहिए और बाकी आधी मात्रा बोआई के लगभग 1 महीने बाद टापड्रेसिंग के रूप में देनी चाहिए. अगर बाद में नाइट्रोजन की कमी महसूस हो तो 2 फीसदी यूरिया के घोल का पर्णीय छिड़काव किया जा सकता है.

बोआई के समय 50-60 किलोग्राम फास्फोरस और 50-60 किलोग्राम पोटाश भी प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में समान रूप से डालनी चाहिए. सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी पाए जाने पर 20-25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर के हिसाब से बोआई के समय ही प्रयोग करना चाहिए.

खरपतवार : खरपतवारों की रोकथाम के लिए बोआई के बाद व जमाव से पहले या नर्सरी में तैयार किया हुआ पौधा है, तो पौधरोपण के कुछ ही दिनों बाद पेंडीमेथलीन दवा की 3.5 लीटर मात्रा 800-1000 लीटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए. समयसमय पर निराईगुड़ाई भी करते रहना चाहिए.

सिंचाई : सिंचाई हमेशा हलकी होनी चाहिए और पानी का ठहराव कभी नहीं होने देना चाहिए. 6-7 दिनों में सिंचाई की जरूरत पड़ती रहती है. फल पकने के समय सिंचाई रोक देनी चाहिए, क्योंकि इस अवस्था में सिंचाई करने से फलों के फटने व मिठास घटने की संभावना बढ़ जाती है. फलों की तोड़ाई करने से 1 हफ्ते पहले सिंचाई जरूर बंद कर देनी चाहिए.

कीट व रोग : कद्दू वर्गीय होने के कारण लगभग वे सारी बीमारियां और कीट इस में भी लगते हैं, जो करेला, कद्दू व लौकी वगैरह में पाए जाते हैं. फफूंदजनित बीमारियों से बचाव के लिए मैंकोजेब जैसे किसी फफूंदीनाशी और कीटों की रोकथाम के लिए किसी हलके कीटनाशी जैसे मैलाथियान वगैरह का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

भंडारण : तोड़ाई करने के बाद तरबूज के फलों का भंडारण 1 हफ्ते से ले कर 3 हफ्ते तक 2.20 डिगरी सेंटीग्रेड से 4.40 डिगरी सेंटीग्रेड तापमान और वायुनमी 80-85 फीसदी होने पर किया जा सकता है.

मौसम की मार घट रही गेहूं की पैदावार

इस साल मौसम के बदले मिजाज ने सभी को चौंका कर रख दिया है. खेतीकिसानी के माहिरों के माथे पर चिंता की लकीरें हैं, तो किसान एक तरह से सकते में हैं कि आखिरकार यह हो क्या रहा है. जाड़ों में पहले सी ठंडक क्यों नहीं है. किसानों की चिंता खुद को ले कर कम और फसलों को ले कर ज्यादा है, जिन्हें बोआई से ले कर कटाई तक एक तय तापमान और नमी की जरूरत रहती है. मौसम की गड़बड़ी से गेहूं सहित रबी की सभी फसलों का रकबा काफी घट गया है. तापमान में बदलाव का आलम यह है कि जानकार और माहिर हैरान हैं और एकदम से किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रहे. इस के लिए लगातार दुनिया भर के मौसम को बदलने वाली वजहों की निगरानी की जरूरत है और वजह मिल भी जाए तो उस के बाद एक बड़ी जरूरत उस के मुताबिक खेतीकिसानी का कैलेंडर बनाने और उस पर अमल करने की होगी, जो आसान काम नहीं होगा.

केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय ने बीती 3 जनवरी को जो आंकड़े गेहूं की घटती पैदावार को ले कर जारी किए, वे वाकई चिंताजनक हैं और देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डालने वाले हैं.

मंत्रालय के मुताबिक लगातार दूसरे साल सूखा पड़ने और जाड़े के मौसम में ठंडक न पड़ने से गेहूं की बोआई पिछड़ गई है. रबी के मौसम की सब से बड़ी फसल गेहूं की बोआई आमतौर पर अक्तूबर महीने में शुरू हो जाती है और नवंबर के आखिर तक चलती है. लेकिन बीते साल के अक्तूबरनवंबर के महीनों में ठंडक पहले जैसी नहीं थी, इसलिए गेहूं की बोआई का रकबा बमुश्किल 271.46 लाख हेक्टेयर तक ही पहुंच पाया, जबकि बीते सीजन में इसी वक्त तक 293.16 लाख हेक्टेयर रकबे में गेहूं की बोआई हो चुकी थी यानी महज 1 साल में मौसम के बदलते मिजाज के चलते गेहूं की बोआई का रकबा 21.7 लाख हेक्टेयर कम हो गया.

इस आंकड़े का सीधा असर पैदावार और किसानों की माली हालत पर पड़ना तय है. अब देशभर में गेहूं की पैदावार 9 करोड़ टन का तयशुदा आंकड़ा छू पाएगी, इस में शक है. गौरतलब है कि साल 2014-15 में देश में गेहूं की पैदावार 889.5 लाख टन हुई थी. अगर मौसम के तेवर यही रहे तो इस साल गेहूं की पैदावार 850 लाख टन के आसपास सिमट जाने का अंदेशा है. वक्त रहते अगर मौसम के बदलते मिजाज के मुताबिक खेतीकिसानी के तौरतरीके नहीं बदले गए, तो यह घाटा लगातार बढ़ना तय है. जलवायु के लिहाज से देश के सभी सूबे गेहूं की खेती के लिए मुफीद हैं, पर सब से बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में गेहूं की खेती सब से ज्यादा होती है. इस के बाद पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और बिहार का नंबर आता है. इन सभी सूबों में मौसम आमतौर पर एक सा रहता है. गेहूं की बोआई के वक्त ठंडक रहती है और कटाई के वक्त तक धीरेधीरे गरमी बढ़ जाती है.

यह गेहूं की फसल की खूबी है कि वह तापमान का उतारचढ़ाव बरदाश्त कर जाती है और किसान को निराश नहीं करती. इस का बीज 4-5 डिगरी सेल्सियस पर भी अंकुरित हो जाता है और 35 डिगरी सेल्सियस पर भी, लेकिन ज्यादा और अच्छे अंकुरण के लिए सही तापमान 20-25 डिगरी सेल्सियस है. कम और ज्यादा तापमान पर अंकुरण कम होता है, जिस से पैदावार भी कम होती है. देश में गेहूं की प्रति हेक्टेयर औसत पैदावार 30 क्विंटल है, लेकिन इस के लिए जरूरी है कि तापमान फसल की मांग और जरूरत के मुताबिक रहे. पिछले अक्तूबरनवंबर में तापमान औसत से ज्यादा रहा, इस से अंकुरण कम हुआ.

इसी तरह गेहूं की बेहतर बढ़वार के लिए सही तापमान 25 डिगरी  सेल्सियस माना जाता है. बोआई के समय तापमान कम हो और फसल की बढ़वार के साथ बढ़ता जाए तो नतीजा बेहतर होता है. मार्च के महीने में औसत तापमान 25 डिगरी  सेल्सियस होने से फसल समय पर और अच्छी पकती है. लेकिन जब दिसंबरजनवरी जैसे ठंडे महीनों में ही औसत तापमान 30 डिगरी सेल्सियस रहे जैसा कि इस साल हुआ, तो ज्यादा पैदावार की उम्मीद करना बेमानी है.

जनवरी के महीने में जब बाली में दाना पड़ रहा होता है तब गेहूं की फसल को ज्यादा ठंडक की जरूरत होती है, जो हर साल पड़ती भी थी. लेकिन इस साल हैरतअंगेज तरीके से दिसंबर का महीना गरम रहा, जिस का फर्क गेहूं की फसल पर देखने में आया. कहीं दाने बराबर नहीं पड़े, तो कहीं फसल पीली पड़ कर मुरझा गई. कहीं रोग और कीटों ने अपना असर दिखाया, तो कहीं फसल बढ़ी ही नहीं. अंदाजा है कि इस से प्रति हेक्टेयर 5 क्विंटल का नुकसान हुआ. अगर यही हाल रहा तो फरवरी में पारा 25 डिगरी सेल्सियस से ऊपर ही रहेगा, जो गेहूं को जल्द पकाएगा. नतीजा यह होगा कि दाना छोटा व घटिया होगा और फसल इसी महीने में पक कर पीली पड़ जाएगी.

और भी हैं वजहें

बात अकेले तापमान में उतारचढ़ाव की नहीं है, बल्कि इस से जुड़ी और भी वजहें हैं जिन के चलते गेहूं की पैदावार पर बुरा असर पड़ रहा है. इस साल बारिश भी औसत से कम हुई और गरमी ज्यादा रही, जिस से जमीन में नमी की कमी रही. नतीजा यह हुआ कि असिंचित इलाकों में किसानों ने जैसेतैसे गेहूं बोने की तसल्ली कर ली.

रहीसही कसर बारिश ने पूरी कर दी, जो इस साल ढंग से हुई ही नहीं. बढ़वार के वक्त अगर एक बार भी हलकी बारिश हो जाए तो गेहूं की फसल अच्छी तरह बढ़ती है और उस में दाने भी खूब पड़ते हैं. इस साल गेहूं की फसल वही किसान ले पा रहे हैं, जिन के पास सिंचाई के साधन हैं और हर कोई जानता है कि ऐसे किसानों की तादाद 25 फीसदी भी नहीं है. मौसम के बदलाव से गेहूं पर रोगों व कीटों का हमला भी ज्यादा होता है. गंजबासौदा के एग्रीकल्चर कालेज के प्रोफेसर आशीष श्रीवास्तव बताते हैं कि गेहूं को सब से ज्यादा नुकसान रस्ट यानी रतुआ बीमारी पहुंचाती है, जिस की रोकथाम के तमाम उपायों के बाद भी पैदावार में 10 फीसदी तक गिरावट आती है. आशीष  बताते हैं कि जैसे कमजोर आदमी को बीमारियां जल्द अपनी गिरफ्त में ले लेती हैं, वैसे ही गेहूं की फसल पर तापमान का असर पड़ रहा है. हर फसल एक तय तापमान पर बढ़ती और पकती है. इस में 5-6 डिगरी सेल्सियस का अंतर ज्यादा असर नहीं डालता, लेकिन इस से कम या ज्यादा अंतर होने पर बीमारियां और कीड़े ज्यादा असर दिखाते हैं. कीटनाशक रसायनों का इस्तेमाल फसल की लागत बढ़ाता है. इस के बाद भी परेशानी खत्म होना पक्का नहीं होता.

यानी दिक्कत कम पैदावार की ही नहीं, बल्कि फसल की बढ़ती लागत की भी है. सिंचाई, खाद और कीटनाशक वगैरह सभी ज्यादा तादाद में किसानों को बढ़ते तापमान के चलते फसलों को देने पड़ रहे हैं.

क्या करें किसान

घटतेबढ़ते तापमान पर किसानों का कोई जोर नहीं चलता. ऐसे कारगर तरीके भी कोई नहीं बता सकता, जिन से वे इस मार और घाटे को कम कर सकें. सीहोर के एक खेती के माहिर डीएम राठौर की मानें तो यह ठीक है कि खेतीकिसानी मौसम के हाथ में है, लेकिन गेहूं की फसल के लिए किसान कुछ एहतियात बरतें तो घाटा कुछ कम किया जा सकता है. ये उपाय हैं :

* गेहूं की फसल में सिंचाई ज्यादा और कम वक्त के अंतर से करें. 10-12 दिनों के अंतर पर सिंचाई करते रहने से गरमी का असर कम किया जा सकता है.

* निराई के बाद खरपतवारों को फेकें नहीं, बल्कि उन्हें खेत में ही बिछा दें जिस से नमी भाप बन कर कम से कम मात्रा में उड़े.

* ज्यादा तापमान के दिनों (25 डिगरी सेल्सियस से ज्यादा) में 2 फीसदी यूरिया का घोल खेत में डालें. इस से खेती की बढ़वार रुकेगी नहीं.

* खेतों में कृषिक्रियाएं जरूरत के मुताबिक ही करें और खाद भी उचित मात्रा में ही डालें.

* अगर अगले साल अच्छी फसल लेनी है, तो बारिश के बाद कम जुताई करें ताकि खेत में नमी बनी रहे. जुताई के तुरंत बाद बोआई करें, जिस से नमी का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल हो सके.

* देर से बोई जाने वाली किस्मों का इस्तेमाल करें. गेहूं की ऐसी खास किस्में हैं एचडी 2327, जे 405, गिरिजा, हीरा, एचडी 2285 और राज 3765.

मौसम आधारित फसल बीमा योजना

जयपुर समेत राजस्थान के 12 जिलों में मौसम आधारित फसल बीमा योजना लागू है, जिस के तहत बीमा कंपनी सरकार व किसानों से प्रीमियम ले कर अपना खजाना भर रही है, लेकिन रिस्क कवर देने के नाम पर कंपनी सरकार व किसानों से ठगी कर रही है. दिलचस्प बात तो यह है कि बीमा कंपनी किसानों से ज्यादा सरकार से फायदा उठा रही है. वजह साफ है, सरकार पहले तो बीमा कंपनी को प्रीमियम की आधी राशि देती है और फिर फसल खराब होने पर अरबों रुपए किसानों को मुआवजे के रूप में देती है, जबकि फसल खराब होने पर बीमा कंपनी द्वारा किसानों को क्लेम देना चाहिए. देखने में आया है कि बीमा कंपनी किसानों को कभीकभार फसल खराब होने का मुआवजा तो देती है, लेकिन यह मुआवजा ऊंट के मुंह में जीरा जितना ही होता है. गौरतलब है कि बीमा कंपनी किसानों को क्लेम दे तो सरकारी खजाने से किसानों को अरबों रुपए मुआवजा देने की नौबत ही न आए.

बावजूद इस के मौसम आधारित फसल बीमा योजना की शर्तें भी इतनी जटिल हैं कि यह मामला हर किसी की समझ में नहीं आता और बीमा कंपनी कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से हर साल अरबों रुपए का प्रीमियम चट कर जाती है. यानी हर हालत में बीमा कंपनी रिस्क कवर देने में फिसड्डी है और सरकार को इस की भरपाई करनी पड़ती है. इस में यह भी मजे की बात है कि किसानों को फसल बीमा दिलाने में सरकार के नुमाइंदों की ओर से भी कुछ खास नहीं किया जा रहा है.

यह है हकीकत

रबी या खरीफ फसल में ज्यादा बारिश होने, ओले पड़ने या अकाल पड़ने पर सरकार किसानों को सरकारी खजाने से अरबों रुपए का मुआवजा देती है, जबकि प्राकृतिक आपदा या अकाल की स्थिति में फसल बीमा योजना के तहत किसानों को बीमा क्लेम दिया जाना चाहिए. बीमा क्लेम मिलने के बाद किसानों को किसी मदद या अनुदान की जरूरत ही नहीं रहेगी. ऐसे में महज उन किसानों को ही अनुदान देना होगा, जिन्होंने केसीसी के तहत कर्ज नहीं लिया हुआ है. हालांकि ऐसे किसानों की तादाद अब बहुत कम रह गई है.

इन का होता है बीमा

किसान क्रेडिट कार्ड यानी केसीसी के तहत बैंकों से कर्ज लेने वाले किसानों का खुद ही अनिवार्य फसल बीमा हो जाता है. बीमा प्रीमियम की आधी राशि किसान के खाते से काटी जाती है, जबकि आधी राशि सरकार देती है. यह फसल के अनुसार कमज्यादा हो सकती है. केसीसी के तहत कर्ज लेने वाले किसानों को आमतौर पर बैंक वाले इस बारे में नहीं बताते, जिस के कारण किसान कभी क्लेम की बात भी नहीं करते. वैसे किसान चाहें तो अपनी मर्जी से भी फसल बीमा करा सकते हैं.

दिखावा बने बीमामापन मौसमयंत्र

मौसम आधारित बीमा योजना में बीमा कंपनी कई जगहों पर  आटोमैटिक यानी अपनेआप चलने वाले मौसमयंत्र लगवाती है, जिन की रिपोर्ट के आधार पर क्लेम तय होता है. जयपुर में कुल 637 ग्राम पंचायतें हैं, लेकिन आटोमैटिक मौसमयंत्र महज 35 ही हैं. आज जहां 1 किलोमीटर दायरे में भी बारिश व अकाल का कहर हो सकता है, वहीं यह बीमा कंपनी 40 से 50 किलोमीटर की दूरी का मौसम एक ही यंत्र से रिकार्ड करती है, जो कभी भी सटीक नहीं हो सकता है.

किसानों की कमाई के लिए सूअरपालन व मछलीपालन

पहले दलहन, तिलहन व गन्ना आदि को ही किसानों की नकदी फसल माना जाता था, क्योंकि इन्हें बेच कर किसान रुपए प्राप्त करते थे, लेकिन अब सूअरपालन और मछलीपालन भी किसानों के लिए नकदी के जरीए बन गए हैं. सूअरपालन और मछलीपालन असम के किसानों के लिए काफी फायदेमंद हैं. वक्त के साथसाथ अब मछलीपालन और सूअरपालन के तरीके में काफी बदलाव आ चुका है. सूअरपालन और मछलीपालन अलगअलग न कर के एकसाथ करना काफी फायदेमंद होता है. एक ही जगह पर दोनों का पालन आसानी से हो जाता है.

सूअरपालन करने में काफी पानी की जरूरत पड़ती है. जिस तालाब में मछलीपालन किया जाता?है, उसी तालाब में अलग से पानी की जरूरत नहीं पड़ती है. असम में मछली और सूअर के कारोबारियों के लिए यह तरीका काफी फायदेमंद साबित हो रहा है. मछलीपालन के लिए तालाब के पानी को हमेशा साफ रखा जाता है. उसी पानी का इस्तेमाल सूअरपालन में करने से सूअरों को बीमारी का खतरा कम रहता है. देश के कई अन्य राज्यों में भी अब सूअरपालन और मछलीपालन एकसाथ हो रहा है. ऐसा करने से इस कारोबार में खूब फायदा मिलता है, क्योंकि इस तरीके से कम उत्पादन लागत में मछली और सूअर के मांस दोनों का ही भरपूर उत्पादन होता है.

असम में मांस और मछली दोनों की काफी मांग है. इसीलिए वहां के ढेर सारे बेरोजगार युवकयुवतियां इस समय सूअरपालन व मछलीपालन के काम में लगे हुए हैं और मोटी रकम कमा रहे?हैं. मछलीपालन व सूअरपालन के काम को सरल बनाने और किसानों को इस बारे में नईनई जानकारियां मुहैया कराने के लिए ‘भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद’ की पूर्वोत्तर शाखा ने प्रदेश में एक योजना भी चला रखी है. इस के अलावा ‘राष्ट्रीय सूअर अनुसंधान संस्थान’ की ओर से भी किसानों को इस बारे में जानकारियां मुहैया कराई जा रही हैं. ये संस्थान मछलीपालन व सूअरपालन में प्रदेश के किसानों की मदद भी कर रहे?हैं, इस से किसानों को काफी फायदा पहुंच रहा है. गौरतलब है कि ‘राष्ट्रीय सूअर अनुसंधान संस्थान’ के निदेशक इस व्यवसाय को आगे बढ़ाने में काफी जोरशोर से लगे हुए हैं. उल्लेखनीय है कि प्रदेश का एकमात्र ‘पालन महाविद्यालय’ नगांव जिले के रोहा में मौजूद है. इस महाविद्यालय के अधिकारी इस क्षेत्र में अपना अहम योगदान देते रहते हैं. ऐसे में मछलीपालन और सूअरपालन का काम छोटे किसानों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो रहा है.

खाद नहीं जैविक खाद : घटेगी लागत बढ़ेगा मुनाफा

चालू मौसम में गेहूं की बोआई के समय एक बार फिर से खाद की बढ़ी कीमतों से किसानों की लागत बढ़ रही?है और मुनाफा घट रहा?है. ऐसे में अगर किसान रासायनिक खाद की जगह पर जैविक खाद का प्रयोग करें तो न केवल किसानों का मुनाफा बढ़ेगा, बल्कि खेत की सेहत भी ठीक रहेगी. रासायनिक खाद का प्रयोग खेत की मिट्टी की जांच के बाद ही जरूरत के अनुसार करें. अंधाधुंध रासायनिक खाद का प्रयोग करने से पैदावार बढ़ने के बजाय खेत को नुकसान होता है और खेती की लागत भी बढ़ती है. ऐसे में किसान को ही परेशान होना पड़त है.

जिस समय किसान अपने खेतों में बोआई कर रहे थे, उस समय खाद की दुकानों से डीएपी खाद गायब हो गई?थी, जिस से किसानों को महंगे दामों पर खादें खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा. जब किसान गेहूं की फसल काटने के लिए तैयार हो रहे थे और गेहूं की फसल में आखिरी बार खाद डालने की बारी आई तो दुकानों से यूरिया खाद गायब हो गई. यूरिया संकट ने किसानों के सामने समस्या खड़ी कर दी. रबी की फसलों विशेषकर गेहूं की फसल में जनवरीफरवरी के दौरान खाद डालने की जरूरत होती है. इस समय तक गेहूं में दूसरी और तीसरी सिंचाई की जरूरत होती है. इस के बाद यूरिया खाद डाली जाती?है.

यूरिया खाद दुकानों में भरपूर मात्रा में न होने से किसानों को महंगे दामों पर इसे खरीदना पड़ रहा है. इस के चलते यूरिया के लिए मारामारी मची है. उत्तर प्रदेश के बहुत सारे जिलों में यूरिया खाद की कालाबाजारी शुरू हो गई?है. तमाम किसान कृषि विभाग को इस बारे में शिकायतें भी भेज रहे?हैं, लेकिन विभाग इस बात को मान ही नहीं रहा है कि प्रदेश में यूरिया खाद की कोई कमी है. उत्तर प्रदेश में यूरिया खाद का भाव 3 सौ रुपए प्रति बोरी है. खाद की कमी के चलते किसानों को 375 से 400 रुपए प्रति बोरी खाद खरीदनी पड़ रही?है. सब से बड़ी परेशानी उन जिलों में है, जहां पर सहकारी संस्थाएं काम नहीं कर रही?हैं. मगर अब खाद की कमी से परेशान होने की जरूरत नहीं?है. किसानों को इस की जगह पर जैविक खाद का प्रयोग करना चाहिए. इस से पैदावार बढ़ेगी और लागत मूल्य कम होगा.

रासायनिक खाद की जगह जैविक खाद

गेहूं की बोआई के समय प्रदेश में डीएपी खाद की कमी हो गई थी, जिस का प्रभाव गेहूं की फसल पर पड़ रहा है. डीएपी खाद की कमी को पूरा करने के लिए किसान गेहूं में यूरिया ज्यादा डालना चाह रहे थे. अब यूरिया भी नहीं मिल रही है, जिस से गेहूं की पैदावार पर असर पड़ेगा. गेहूं की बोआई के समय ही आलू की बोआई भी होती है, इसलिए आलू किसान भी डीएपी खाद न मिलने से परेशान हुए थे. किसान सेवा केंद्रों पर आधी रात से लाइन लगाए खड़े किसान जब बेकाबू हो जाते थे, तो धरनाप्रदर्शन करने लगते?थे, जिसे काबू करने के लिए पुलिस को लाठियां चलानी पड़ती थीं. किसानों को खाद मिलने की जगह पर पुलिस की लाठियां खानी पड़ती थीं.

उस समय भी कृषि विभाग के अधिकारी खाद की कमी को नहीं मानते थे. अफसरों का कहना था कि किसान खाद को खरीद कर जमा कर रहे हैं, जिस से बाजार में खादों के दाम बढ़ गए हैं. किसान जबरदस्ती की हड़बड़ी दिखा कर परेशानी पैदा कर रहे हैं. किसानों का कहना?है कि जब तक गेहूं की बोआई चली तब तक खाद का संकट बना रहा. कृषि विभाग ने रबी फसलों की बोआई के लिए बहुत सारी योजनाएं तो पहले बना ली थीं, पर खाद संकट न हो इस की कोई योजना नहीं बनाई. इसी का नतीजा है कि डीएपी के बाद यूरिया खाद का संकट आ गया है. कृषि विभाग ने हर जिले में खाद वितरण पर नजर रखने के लिए कंट्रोल रूप भी बनाए थे, जहां पर किसान अपनी शिकायत दर्ज करा सकते थे. यह व्यवस्था की गई कि खाद का वितरण सरकारी कर्मचारी की मौजूदगी में ही किया जाए. इस के लिए ब्लाक, तहसील या फिर विभाग का कर्मचारी वहां पर मौजूद रहे. इस के बाद भी जिलेवार हालात बहुत खराब दिखे.

जब बोआई का समय आता है तभी बाजार से खाद गायब हो जाती है. खाद की कमी से कालाबाजारी होने लगती है. किसानों को महंगे दामों पर खाद खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता?है. नए तरीके से बनाएं जैविक खाद : खाद की कमी केवल बड़े शहरों में ही नहीं है. छोटे शहरों का?हाल भी बुरा है. जालौन जिले के माधौगढ़, आटा व जोल्हूपुर इलाके के किसान डीएपी और यूरिया खाद के न मिलने से परेशान हैं. जालौन के किसानों का कहना?है कि मटर, चना, मसूर, तिलहन और गेहूं की बोआई के समय डीएपी खुले बाजार में मौजूद नहीं थी, जिस के कारण उन्हें बहुत परेशान होना पड़ा.

सरकार ने किसानों को राहत देने के नाम पर सरकारी कीमत पर खाद वितरण का काम पीसीएफ और सहकारी समितियों के द्वारा कराने की योजना भी बनाई, समितियों के जरीए उन किसानों को खाद मिल रही?है, जो समितियों के सदस्य हैं. जरूरत इस बात की है कि रासायनिक खाद की जगह पर जैविक खाद का प्रयोग किया जाए. किसानों को नए तरीके से जैविक खाद बनाने के तरीके बताए जाएं, जिस से उन को लाभ हो. समितियों के कर्मचारियों के द्वारा भी खाद की बिक्री में मनमानी की जा रही?है. ये लोग मनचाहे तरीके से खाद बांटते हैं. कुछ समितियां लाइसेंस धारक खाद विक्रेताओं को अधिक पैसे ले कर खाद बेच देती हैं. समितियों द्वारा 1 एकड़ खेत के लिए 1 बोरी खाद दी गई थी, जो जरूरत से काफी कम थी.

फतेहपुर और कानपुर जिलों में भी खाद की कमी नजर आती?है. साधन सहकारी समितियों में खाद की खेप आते ही दबंग और बड़े किसान उस पर कब्जा कर लेते?हैं. इस से छोटे किसानों को खाद का संकट पैदा हो जाता है. बाजार में खाद की कीमत उछाल मारने लगती है. अफरातफरी में किसान खाद को ज्यादा खरीद लेते हैं. खाद की कमी की परेशानी को दूर करने का एकमात्र उपाय है कि जैविक खाद का प्रयोग बढ़ाया जाए. इस से ही किसानों को लाभ होगा.

जलवायु परिवर्तन का खेती पर प्रभाव

महिला किसानों में जागरूकता जरूरी

महिलाओं की खेती में भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण है. गांवों में ज्यादातर खेती महिला किसानों के जिम्मे होती है. आज खेती पर जलवायु परिवर्तन का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ रहा है. समय पर बरसात न होने से गेहूं और धान सहित हर फसल की पैदावार प्रभावित हो रही है. ऐसे में जरूरी है कि महिला किसानों को भी ऐसे बदलाव की जानकारी हो. प्रचारप्रसार के जरीए ही महिला किसानों को जागरूक किया जा सकता है. गांव में रहने वाले ज्यादातर कमजोर और गरीब परिवारों  के लोग कम रकबे की खेती करते हैं. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सब से अधिक इन पर पड़ता है. बड़े किसान इस से कम प्रभावित होते हैं, पर छोटे किसान इस से ज्यादा प्रभावित होते हैं. ऐसे में जरूरी है कि उन्हें खेती पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और उस से बचाव कीजानकारी दी जाए. लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में गोरखपुर एनवायरन्मेंटल एक्शन ग्रुप ने 2 दिवसीय एक राज्य स्तरीय ‘महिला किसान संवाद’ का आयोजन किया. इस का उद्घाटन कृषि राज्यमंत्री राधे श्याम सिंह ने किया.

राधे श्याम सिंह ने कहा कि आज आवश्यकता है महिला किसानों द्वारा किए जा रहे प्रयासों को बड़े पैमाने पर प्रसारित करने की. महिला किसानों द्वारा की जा रही गतिविधियों को बड़े पैमाने पर पहचान दिलाने की भी जरूरत है. छोटी जोत की महिला किसानों द्वारा किए गए सफल प्रयोगों की जानकारी को बड़े स्तर पर ले जाना चाहिए. इस आयोजन में जमीनी स्तर पर जुड़ी महिला किसानों, कृषि क्षेत्र व आजीविका से जुड़े स्वैच्छिक संगठनों, शोधकर्ताओं व कृषि क्षेत्र से जुड़े तमाम अधिकारियों ने हिस्सा लिया.

बीज और खाद का सही इस्तेमाल

कृषि राज्यमंत्री राधे श्याम सिंह ने कहा कि महिला किसानों के जलवायु के मुताबिक कृषि के परंपरागत ज्ञान, बीज चयन, संरक्षण व जैविक खाद विधियों को कृषि प्रसार सेवाओं के तहत जोड़ा जाए. उन्हें जलवायु परिवर्तन नापने केयंत्रों का ज्ञान दिया जाए व उन्हें चलाने में उन का सहयोग लिया जाए. यह काम हर पंचायत में पक्केतौर पर हो. महिलाओं को जलवायु परिवर्तन व उस के जीवन और सेहत पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में जानकारी देने के साथ ही जलवायु परिवर्तन से निबटने के तरीकों के विषय में जानकारी दी जाए. महिला किसानों की खातिर मौसमबदलाव के जोखिम से निबटने के लिए बीमा, फसल बीमा, कृषि दुर्घटना बीमा और पशु बीमा का लाभ तय हो. महिला किसानों को किसान की प्रचलित परिभाषाओं के दायरे में लाया जाए, ताकि जलवायु अनुकूलन कृषि को बढ़ावा मिले और देश की खाद्य सुरक्षा व आर्थिक सुरक्षा में उन का योगदान तय हो सके.

छोटी जोत पर ज्यादा ध्यान की जरूरत

डा शीराज वजीह (अध्यक्ष, गोरखपुर, एनवायरन्मेंटल एक्शन ग्रुप) ने कार्यशाला का मकसद बताते हुए कहा कि कार्यशाला में जलवायु परिवर्तन से जुड़े कामों में महिला किसानों की अहमियत पर चर्चा की गई. उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में जलवायु परिवर्तन के कारण खराब हालात पैदा हो रहे हैं. यहां पर लगभग 80 फीसदी आबादी की आजीविका का जरीया आज भी छोटी जोत की खेती या खेतिहर मजदूरी है. इस में भी करीब 93 फीसदी काम महिला किसानों द्वारा किए जाते हैं. रोपाई व बोआई से ले कर भंडारण तक के सभी कामों में महिला किसानों का योगदान होता है.

महिला किसानों ने बताया अच्छी फसल का राज

रामरती देवी साड़े कलां, मेहदावल, संत कबीरनगर से आई थीं. उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से बचने के लिए उन्होंने खाली पड़ी बेकार जमीन की खुदाई करा कर तालाब तैयार कराया. उस में मछलीपालन किया और ऊपर मुरगीपालन भी किया. मेड़ों पर केले व दूसरे पेड़ लगाए. मुरगियों की बीट को वे मछलियों के भोजन के रूप में इस्तेमाल करती हैं. तालाब के पोषक पानी से वे खेतों की सिंचाई करती हैं. उर्मिला देवी मेदिनीपुर, घुघली, महाराजगंज से आई थीं. उन्होंने बताया कि उन की खेती बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में है. मौसम की खराबी की वजह से वे भिंडी, करेला व बंडा वगैरह की मिश्रित खेती करती हैं. उन्हें 8500 रुपए लागत के मुकाबले सिर्फ भिंडी से 67 हजार रुपए की आमदनी 5 महीने में हुई. उसी जमीन में बोड़ा, सरपुतिया, करेला व बंडा की खेती से 8500 रुपए की लागत के मुकाबले 73450 रुपए की आमदनी हुई.

संतरी देवी कुशीनगर से आई थीं. उन्होंने बताया कि उन की खेती बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में है. मौसम की गड़बड़ी की वजह से खेती की लागत में लगातार इजाफा हो रहा है, पर उस हिसाब से फायदा नहीं हो रहा है. आखिरकार साल 2013 के खरीफ में उन्होंने छोटे पैमाने पर टांगुन, मंडुआ व सांवा की खेती शुरू की. इन मोटे अनाजों की खेती में लागत कम लगती है और फसल में रोग व कीड़ों का प्रकोप भी नहीं रहता. ऐसा करने के बाद उन्हें अच्छी पैदावार हासिल हुई. कार्यशाला में प्रदेश के तमाम जिलों से करीब 3सौ महिला किसानों के साथ तमाम कृषि विशेषज्ञों ने भाग लिया. एके विश्नोई, डा. वीके तोमर, नवीन राय, प्रशांत अंचल, केके सिंह, विजय पांडेय, डा. बीसी श्रीवास्तव व डा. अरविंद खरे जैसे खेती के माहिरों ने भी इस बात पर जोर दिया कि महिला किसानों को भी जलवायु परिवर्तन और दूसरे मसलों के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए.      

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