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गरमी में भिंडी की खेती

सदाबहार सब्डी की खेती सभी प्रकार की जमीन में हो सकती है, मगर अच्छे जलनिकास वाली दोमट मिट्टी व जैविक खादों से भरपूर खेत इस के लिए ज्यादा बढि़या साबित होते हैं. इस की खेती हलकी अम्लीय जमीन में भी की जा सकती है.

1.बोआई का समय : गरमियों की भिंडी की खेती करने के लिए आसाम, बंगाल, उड़ीसा और बिहार के कुछ हिस्सों में जनवरी के अंत तक बोआई कर दी जाती है. इन सूबों में पाले का खतरा कम होता है. उत्तर भारत के राज्यों में भी भिंडी की अगेती फसल लेने के लिए जनवरी में ही पलवार आदि बिछा कर इस की खेती आसानी से कर सकते हैं. अगर ऐसा मुमकिन न हो तो उत्तरी राज्यों में मध्य फरवरी तक इस की बोआई कर देनी चाहिए. दरअसल इस के बीजों का जमाव 20 डिगरी सेंटीग्रेड से नीचे नहीं हो पाता?है. इसलिए यदि तापमान अनुकूल न हो तो पलवार का सहारा जरूर लेना चाहिए. पहाड़ी इलाकों में भिंडी की बोआई अप्र्रैल और मई में की जाती है.

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2.बीज दर : भिंडी के बीज काफी कठोर होते हैं, लिहाजा बीज के जमाव में 10-12 दिन तक लग जाते?हैं. इसलिए बेहतर है कि बोने से पहले बीजों को 24 घंटे के लिए पानी में भिगो दें या 12 घंटे भिगोने के बाद किसी सूती कपड़े को भिगो कर उस में बीजों को रख दें. इस से जमाव जल्दी होने की संभावना बढ़ जाएगी. जहां तक बीज दर की बात है तो आमतौर पर 20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से जरूरी होते?हैं.

3.खेत की तैयारी : भिंडी की खेती के लिए मिट्टी खूब भुरभुरी होनी चाहिए. खेत को 1 बार गहराई से मिट्टी पलटने वाले हल से और 2-3 बार हैरो या देशी हल से जोत कर बढि़या तरीके से तैयार करना चाहिए.

सिंचाई एकसमान मिले इस के लिए खेत का समतलीकरण भी खूब अच्छी तरह से करें. यदि खेत में पर्याप्त नमी नहीं है, तो बोआई से पहले 1 बार सिंचाई जरूर कर देनी चाहिए. पलेवा भी किया जा सकता है.

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4.खाद व उर्वरक : बोआई से 2 हफ्ते पहले खेत में खूब सड़ी हुई गोबर की खाद 30 टन प्रति हेक्टेयर की दर से डालनी चाहिए. रासायनिक उर्वरकों को खेत की मिट्टी की जांच के अनुसार ही प्रयोग करना चाहिए. वैसे मोटे तौर पर 80 किलोग्राम नाइट्रोजन,40 किलोग्राम फास्फोरस व 50 किलोग्राम पोटाश प्रयोग किया जा सकता?है.

5.प्रजातियां : अपने इलाके के अनुकूल रोगरोधी प्रजातियों की ही बोआई करनी चाहिए.

सिंचाई ?: 5-6 दिनों पर या जरूरत के हिसाब से सिंचाई करते रहना चाहिए.

6.खरपतवार नियंत्रण : भिंडी में यदि शुरुआती 30-40 दिनों के अंदर खरपतवार पर नियंत्रण कर लिया जाए तो फसल अच्छी होती है. इसलिए बोआई के बाद व जमाव से पहले ही किसी अच्छे खरपतवारनाशी जैसे पेंडीमिथलीन या एलाक्लोर का इस्तेमाल करना चाहिए.

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7.खास रोग व कीट : भिंडी की फसल को कीटों और रोगों से तकरीबन 40-50 फीसदी तक नुकसान होता है, लिहाजा कीटों व रोगों की सही तरीके से रोकथाम करनी चाहिए. भिंडी के खास रोग व कीट निम्न प्रकार हैं:

8.पीत शिरा मोजैक : यह भिंडी का सब से खतरनाक रोग है. वायरस से होने वाले इस रोग की वजह से कई बार पूरी फसल चौपट हो जाती?है. रोग के ज्यादा बढ़ने पर इस का इलाज मुमकिन नहीं हो पाता है. इस रोग का फैलाव सफेद मक्खी द्वारा होता है. इस रोग की वजह से पत्तियों पर नसों का पीला जाल सा दिखाई पड़ता है, शिराएं सामान्य से मोटी, चमकीली व पीली हो जाती हैं, पत्तियां छोटी रह जाती हैं और पूरा पौधा बौना रह जाता?है.

इलाज

इस की रोकथाम के लिए विषाणु फैलाने वाली सफेद मक्खियों पर काबू पाना बेहद जरूरी?है. पीत शिरा मोजैक अवरोधी प्रजातियां जैसे पंजाब पद्मिनी, पंजाब 8, परभनी क्रांति, हिसार उन्नत या अपने क्षेत्र विशेष की अवरोधी प्रजातियों का चयन करना चाहिए. खेत में इस रोग के लक्षण दिखाई देते ही प्रभावित पौधों को तुरंत सावधानीपूर्वक उखाड़ कर जला दें. जरूरत पड़ने पर अच्छी दवाओं जैसे इंडोक्साकार्बा का आधा मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए.

9.चूर्णिल आसिता : यह फफूंद के कारण फैलने वाली बीमारी है. फफूंद के बीजाणु पत्तियों की निचली सतह पर सफेद रंग के चूर्ण की तरह जमा हो जाते?हैं. ज्यादा प्रभावित पत्तियां पीली पड़ कर गिर जाती हैं. इस की रोकथाम के लिए रोग के लक्षण दिखाई पड़ते ही 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से सल्फरयुक्त कोई रसायन या मैंकोजेब जैसे किसी फफूंदीनाशी का इस्तेमाल करना चाहिए.

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10.पत्तीधब्बा : यह रोग भी फफूंद के कारण फैलता है. इस में पहले पत्तियों पर छोटेछोटे गोल, अंडाकार या अनियमित आकार के गहरे भूरे धब्बे पड़ते?हैं, जो बाद में बढ़ कर पूरी पत्ती को घेर लेते हैं. अंत में पत्ती सूख कर गिर जाती है. इस की रोकथाम के लिए मैंकोजेब का 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बना कर 2-3 बार छिड़काव करें.

11.तनाबेधक व फलबेधक कीट : इस कीट की सूड़ी का रंग सफेद होता है, जिस के ऊपर काले और भूरे धब्बे पाए जाते?हैं. इसलिए इसे चित्तीदार सूड़ी भी कहते?हैं. ये सूडि़यां तने व फलों में छेद कर के नुकसान पहुंचाती हैं, नतीजतन तने व फल मुरझा कर गिर जाते?हैं.

इस कीट की सूंडि़यां भिंडी के फूलों, कलियों व पौधों की कोमल टहनियों को नुकसान पहुंचाती हैं. इन के प्रकोप से कलियां नहीं खिलतीं, फूल झड़ने लगते हैं और फल खाने लायक नहीं रह जाते हैं.

इलाज

रोकथाम के लिए प्रभावित शाखाओं व फलों को तोड़ कर नष्ट कर दें. प्रकाश प्रपंच और फेरोमोन ट्रैप का इंतजाम करें. जरूरी होने पर कृषि वैज्ञानिकों की सलाह से किसी रासायनिक दवा का कुछ दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें.

12.हरा फुदका (जैसिड) : ये हरे रंग के कीट होते हैं, जिन की पीठ के पिछले भाग पर काले रंग के धब्बे पाए जाते हैं. ये पौधे की पत्तियों व नर्म भागों से रस चूसते?हैं, जिस से पत्तियां मुड़ जाती हैं और बाद में धीरेधीरे सूखने लगती हैं. रासायनिक रोकथाम के लिए मैलाथियान दवा की 2 मिलीलीटर मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें.

13.सफेद मक्खी : ये पत्तियों की निचली सतह पर बैठ कर रस चूसती हैं, जिस से पत्तियां पीली पड़ जाती?हैं और पौधों की बढ़वार रुक जाती है, पौधों में फूलों व फलों की संख्या कम हो जाती है. यह कीट अपने शरीर से एक मीठा पदार्थ भी छोड़ता है, जिस के ऊपर काली फफूंद उग आती है.

इलाज

रोकथाम के लिए खेत में उगे खरपतवारों को नष्ट कर देना चाहिए. रासायनिक इलाज के लिए डायमेथोएट (रोगोर) दवा का 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

तोड़ाई : भिंडी की तोड़ाई प्रजातियों के अनुसार फूल खिलने के 5-7 दिनों बाद की जाती?है. केवल नरम भिंडियों की तोड़ाई ठीक रहती है.

कुछ ध्यान देने वाली बातें

.* रासायनिक दवाओं द्वारा रोकथाम करने की दशा में, दवाओं का बेहतर तरीके से पत्तियों व तनों के पिछले भागों पर भी प्रयोग करें. कई बार लोग दवाओं का छिड़काव तो कर देते?हैं, मगर फिर भी इस का पूरा फायदा नहीं मिल पाता है. इस की वजह यह?है कि कीड़े या उन के लारवे वगैरह पीछे छिपे रह जाते?हैं और उन पर दवा नहीं पड़ पाती है.

* रासायनिक दवाओं के घोल में किसी अच्छे चिपकने वाले रसायन का प्रयोग करें, इस से ज्यादा प्रभावकारी असर होगा.

* समस्या से नजात पाने के लिए ज्यादा खतरनाक रसायन का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि भिंडियों को जल्दी ही सब्जी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है.

फरवरी के दौरान होने वाले खेती के खास काम

फरवरी में सर्दी के तेवर ढीले पड़ने से पिछले महीनों से ठंडाए किसान काफी राहत और सुकून महसूस करते हैं. फरवरी के मध्यम मौसम में किसानों को हर घड़ी बीमार पड़ जाने का खौफ नहीं रहता और वे खुल कर काम करने की हालत में रहते हैं. जनवरी में तो किसानों का ज्यादा वक्त आग तापते ही बीतता है. कंबल पर कंबल लादने के बाद भी बदन सर्दी से सुन्न बना रहता है, मगर फरवरी की फिजा और आबोहवा तनबदन में चुस्तीफुरती भरने वाली होती है.

काम चाहे गन्ने की बोआई का हो या तेजी से तैयार हो रही गेहूं की फसल की देखभाल का, किसान पूरी शिद्दत से जुट जाते हैं. फरवरी में सुस्ती एकबारगी नौदोग्यारह हो चुकी होती है और खेतों में चहलपहल बढ़ जाती है.

आइए लेते हैं एक जायजा, फरवरी के दौरान खेतीजगत में होने वाले खास कामों का :

* शुरुआत मिठास से करें, तो 15 फरवरी के बाद गन्ने की बोआई का सिलसिला शुरू किया जा सकता है. बोआई के लिए गन्ने की ज्यादा पैदावार देने वाली किस्मों का चुनाव करना चाहिए. किस्मों के चयन में अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों से मदद ली जा सकती है.

* गन्ने का जो बीज इस्तेमाल करें वह पक्के तौर पर बीमारी रहित होना चाहिए. इस के बावजूद बोआई से पहले बीजों को अच्छे किस्म के फफूंदीनाशक से उपचारित कर लेना चाहिए. बोआई के लिए 3 पोरी व 3 आंख वाले गन्ने के स्वस्थ टुकड़े बेहतर होते हैं.

* गन्ने के जिन खेतों में रटून यानी पेड़ी की फसल रखनी हो, तो नौलख फसल यानी पौधा फसल की कटाई खेत की सतह से बिलकुल सटाते हुए बढि़या धारदार गंड़ासे से करें.

* सही समय से बोई गई गेहूं की फसल में फरवरी में फूल लगने लगते हैं. इस दौरान खेत की सिंचाई हर हालत में कर देना जरूरी है. सिंचाई करते वक्त इस बात का खयाल रखें कि ज्यादा तेज हवाएं न चल रही हों. हवा चल रही हो तो उस के थमने का इंतजार करें और मौसम ठीक होने पर ही खेत की सिंचाई करें. हवा के फर्राटे के बीच सिंचाई करने से पौधों के उखड़ने का पूरा खतरा रहता है.

* इस बीच चना, मटर व मसूर के खेतों का मुआयना कर लेना चाहिए. अगर फसल पर फलीछेदक कीट का हमला नजर आए, तो बगैर चूके मोनोक्रोटोफास दवा का इस्तेमाल करें.

* चूर्णी फफूंदी नामक बीमारी मटर की फसल को काफी नुकसान पहुंचाती है. इस का हमला होने पर बचाव के लिए कैराथेन दवा के 0.06 फीसदी घोल का छिड़काव करें. कैराथेन काफी कारगर दवा है, लिहाजा इस के इस्तेमाल के बाद फसल उम्दा होगी.

* साल का यह दूसरा महीना लोबिया, राजमा व भिंडी जैसी फसलों की बोआई के लिए मुफीद होता है. अगर इन चीजों की खेती का इरादा हो, तो इन की बोआई निबटा लेनी चाहिए.

* मध्य फरवरी यानी 15 फरवरी के बाद तेल की फसल सूरजमुखी की बोआई करना मुनासिब रहता है. अगर यह फसल लगानी हो तो 15 से 29 फरवरी के बीच इस की बोआई कर देनी चाहिए. बोआई के लिए अपने इलाके के मुताबिक किस्मों का चयन करें. इस के लिए कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक से भी बात कर सकते हैं. हां, सूरजमुखी के बीजों को बोने से पहले कार्बंडाजिम या थीरम से उपचारित करना न भूलें.

* यदि अभी तक टमाटर की गरमी वाली फसल की रोपाई का काम बाकी पड़ा है, तो उसे फटाफट निबटाएं.

* टमाटर के पौधों की रोपाई 45×60 सेंटीमीटर के फासले पर करें. रोपाई धूप ढलने के बाद यानी शाम के वक्त करें. रोपाई के बाद बगैर चूके हलकी सिंचाई करें.

* जनवरी के दौरान लगाए गए टमाटर के पौधों को नाइट्रोजन मुहैया कराने के लिए पर्याप्त मात्रा में यूरिया डालें. ऐसा करने से फसल उम्दा होगी.

* यह महीना बैगन की रोपाई के लिहाज से भी मुफीद होता है, लिहाजा उम्दा नस्ल का चयन कर के बैगन की रोपाई निबटा लें.

* बैगन की उम्दा फसल के लिए रोपाई से पहले खेत की कई बार जुताई कर के उस में खूब सड़ी हुई गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद भरपूर मात्रा में मिलाएं. इस के अलावा खेत में 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस व 80 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से डाल कर अच्छी तरह खेत की मिट्टी में मिला दें.

* बैगन के पौधों की रोपाई भी सूरज ढलने के बाद यानी शाम के वक्त ही करें, क्योंकि सुबह या दोपहर में रोपाई करने से धूप की वजह से पौधों के मुरझाने का डर रहता है. रोपाई करने के फौरन बाद पौधों की हलकी सिंचाई याद से करें.

* फरवरी में ही मैंथा की बोआई भी निबटा लेनी चाहिए. इस के लिए 400-500 किलोग्राम जड़ों का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. बोआई से पहले 30 किलोग्राम नाइट्रोजन, 75 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

* मैंथा की बोआई करने से पहले खेत के तमाम खरपतवार निकालना न भूलें, क्योंकि ये फसल की बढ़वार में रुकावट पैदा करते हैं. बोआई के बाद खेत की हलकी सिंचाई करना न भूलें.

* अपने आम के बगीचे का मुआयना करें. इन दिनों आम में चूर्णिल आसिता बीमारी का काफी अंदेशा रहता है, लिहाजा कैराथेन दवा का छिड़काव करें. श्यामवर्ण और छोटी पत्ती वाले रोग की रोकथाम के लिए ब्लाइटाक्स 50 और जिंक सल्फेट का छिड़काव करें. ऐसा करने से आम के पेड़ महफूज रहेंगे.

* बीमारियों के साथसाथ इन दिनों आम के पेड़ों को कुछ कीटों का भी खतरा रहता है. अगर कीटों का हमला नजर आए तो कृषि विज्ञान केंद्र के फल वैज्ञानिक की राय ले कर कीटों का निबटारा करें.

* आम के साथसाथ सदाबहार फल केले के बागों का खयाल रखना भी लाजिम है. बाग में फैली तमाम सूखी पत्तियां बटोर कर खाद के गड्ढे में डाल दें. बाग की बाकायदा सफाई के बाद 15 दिनों के फासले पर 2 दफे सिंचाई भी करें.

* केले की उम्दा फसल हासिल करने के लिए बाग की निराईगुड़ाई करने के बाद पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन व पोटाश वाली खादें डालें.

* केले के पेड़ों पर अगर किसी बीमारी या कीटों का हमला नजर आए तो तुरंत उस का इलाज फल वैज्ञानिक की राय के मुताबिक करें.

* इस महीने नीबू नस्ल के पौधों के लिए बोआई करना मुनासिब रहता है, लिहाजा नीबू, संतरा व मौसमी वगैरह के बीजों की बोआई पौधशाल में की जा सकती है. पौधशाला में कली बांधने का काम भी निबटाएं.

* पहले से लगे नीबू, संतरा व मौसमी वगैरह के पेड़ों में नाइट्रोजन व पोटाश वाली खादें माहिरों से राय ले कर डालें.

* आड़ू के पेड़ों का मुआयना करें. उन में पर्णकुंचन माहू कीट लगने पर पत्तियां सिकुड़ जाती हैं. अगर कीट का असर हो तो बचाव के लिए मेटासिस्टाक्स दवा का छिड़काव करें. एक बार का छिड़काव पूरी तरह कारगर न हो, तो 2 हफ्ते बाद दोबारा छिड़काव करें.

* आड़ू के पेड़ पूरी तरह स्वस्थ भी नजर आएं, तो भी उन में निराईगुड़ाई कर के जरूरी खादें डालना न भूलें.

* इस कम ठंडे महीने में अंगूर की कलमें लगाना सही रहता है. कलमों की रोपाई के लिए उम्दा नस्ल की कलमों का बंदोबस्त करें.

* अंगूर की कलमों की रोपाई के साथसाथ पहले से लगी बेलों की देखभाल भी जरूरी है. अकसर इस दौरान अंगूर की बेलों पर श्यामवर्ण रोग लग जाता है. ऐसी हालत में इलाज के लिए ब्लाइटाक्स 50 ईसी दवा का इस्तेमाल करें. इस कारगर दवा के छिड़काव से श्यामवर्ण बीमारी ठीक हो जाती है.

* आमतौर पर फरवरी तक ठंडक का मौसम काफी हद तक खत्म सा हो जाता है, लिहाजा कई पशुपालक लापरवाह हो जाते हैं और अपने मवेशियों को सर्दी से बचाने के उपाय बंद कर देते हैं. मगर ऐसा करना अकसर काफी घातक साबित होता है, लिहाजा सावधान रहें.

* हकीकत तो यह है कि जाती हुई सर्दी इनसानों के साथसाथ जानवरों को भी बीमार करने वाली होती है, इसलिए सर्दी से बचाव के उपाय एकदम से बंद न कर के धीरेधीरे बंद करें. बेहतर तो यह होगा कि मार्च की शुरुआत तक अपने जानवरों को गरम कपड़े ओढ़ा कर रखें.

* अपने मुरगामुरगियों के मामले में भी चौकन्ने रहें ताकि वे बीमार न होने पाएं.

* गाय या भैंस हीट में आए तो उसे पशु चिकित्सक के जरीए गाभिन कराने में लापरवाही न बरतें.

बहुफसली बोआई यंत्र : न्यूमैटिक प्लांटर

यह मशीन देखने में सीडड्रिल मशीन जैसी ही लगती है. इस यंत्र से सभी प्रकार के बीजों की बोआई सफलतापूर्वक कर सकते?हैं. इसे मक्का, मटर, मूंगफली, बाजरा, सूरजमुखी, सोयाबीन, चना व कपास वगैरह के बीज बोने के लिए इस्तेमाल किया जाताहै. इस मशीन से बीजों का अंतर रखने के लिए पौधे से पौधे की दूरी तय रहती?है. इस मशीन से एक ही बार में एक से ज्यादा फसलों की बोआई की जा सकती है.

इस मशीन में सेंट्रीफ्यूगल ब्लोअर लगा होता है. यह ब्लोअर हवा के दबाव से बीज को उठा कर बीज बोने की प्रकिया पूरी करता?है. बीज की दर आप अपनी मनचाही मात्रा के अनुसार तय कर सकते?हैं. इस न्यूमैटिक प्लांटर को ट्रैक्टर के पीछे जोड़ कर चलाया जाता है. इस मशीन को कुछ खास निर्माता ही बनाते?हैं. हम आप को नेशनल न्यूमैटिक प्लांटर के बारे में कुछ खास जानकारी दे रहे?हैं.

न्यूमैटिक प्लांटर की विशेषताएं

* इस से एक ही समय में एक ही जगह एक ही बीज गिरता?है. छूटने या डबल बीज गिरने की गुंजाइश न के बराबर होती?है.

* बोआई के समय बीज को कोई नुकसान नहीं पहुंचता?है.

* बोआई के दौरान बीजों के बीच सही दूरी होने से फसल अच्छे तरीके से होती है, नतीजतन अच्छी पैदावार मिलती?है.

* बीज की सही गहराई पर बोआई करने से, फसल की बढ़वार एकसमान होती?है.

* डेप्थ व्हील व प्रेस व्हील से बीज की गहराई को नियंत्रित किया जा सकता?है.

* इस मशीन का इस्तेमाल करने से मजदूरी में कमी आती है और बोआई में होने वाला खर्च कम होता है. साथ ही समय की बचत भी होती है.

* इस मशीन से आप 2, 4 या 6 लाइनों में अपनी मरजी के मुताबिक बोआई कर सकते?हैं.?

* इस के इस्तेमाल से कीमती बीजों की बचत होती है.

अधिक जानकारी के लिए नेशनल एग्रो इंडस्ट्रीज के फोन नंबरों : 91-161-2222041, 5087853, 4641299 और मोबाइल नंबर 91-8146101101 पर संपर्क कर सकते हैं.

केसरिया पेड़ा स्वाद और सेहत से भरपूर

खानेपीने की चीजों में केसर का इस्तेमाल करने से शरीर को ताकत और ताजगी मिलती है. पेड़ा अकेली ऐसी मिठाई है, जिसे कई तरह से बनाया जाता है. एक पेड़ा चाकलेट कलर का होता है, तो दूसरा सफेद रंग का होता है.

केसर और बादाम से तैयार होने वाला केसरिया पेड़ा हलके पीले रंग का होता है. वैसे तो इस पेड़े को हमेशा पसंद किया जाता है, पर जाड़ों में इसे ज्यादा पसंद किया जाता है. केसर और बादाम से तैयार होने के कारण इस से शरीर को ताकत और ताजगी मिलती है. भारत के पड़ोसी देश नेपाल में भी यह पेड़ा बहुत पसंद किया जाता है. भारत में 5 सौ रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिकने वाला केसरिया पेड़ा नेपाली करेंसी में 8 सौ रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिकता है. नेपाल में सर्दियों का मौसम लंबे समय तक चलता है, लिहाजा केसरिया पेड़ा वहां सब से ज्यादा पसंद किया जाता है.

केसरिया पेड़ा बनाना सरल होता है. इसे आसानी से बना कर इस का रोजगार भी किया जा सकता है. गांव के लोग इसे बना कर अपने आसपास के बाजारों में बेच सकते हैं. बनाने की विधि सरस होने और रखरखाव में ज्यादा परेशानी न होने की वजह से यह अधिक सरल रोजगार हो गया है. केवल मिठाई का रोजगार करने वाले लोग ही नहीं, दूसरे लोग भी इसे बना कर बेच सकते हैं. कई जगहों पर तो इसे फेरी लगा कर भी बेचा जाता है. ऐसे में केसरिया पेड़े का रोजगार करना सरल होता है.

केसरिया पेड़ा बनाने की सामग्री : खोया 500 ग्राम, पिसी चीनी 200 ग्राम, इलायची पाउडर 1 चम्मच, बादाम 5-6 (बारीक कटे), पिस्ता 5-6 (बारीक कटे), केसर 6-7 धागे, हरी इलायची 9-10 (दरदरी कुटी हुई), गरम दूध 1 कप.

बनाने की विधि?: केसरिया पेड़ा बनाने के लिए केसर के धागों को कुनकुने दूध में भिगो कर रख दें. खोए को हलके हाथों से मसलें. इस से यह मुलायम हो जाएगा. अब इस मुलायम खोए को हलकी आंच पर चढ़ा कर हलका सा भून लें. भूने हुए खोए को?ठंडा होने दें. फिर उस में केसर वाले दूध को मिलाएं. फिर पिसी चीनी व इलायची पाउडर डाल कर अच्छी तरह मिलाएं. पेड़े बनाने के लिए हथेलियों में थोड़ा सा घी लगा चिकना कर लें. पेड़े के मिश्रण को गोलगोल घुमाते हुए अंगूठे से दबा कर पेड़े का आकार बना लें. तैयार पेड़े के ऊपर कटे पिस्ते और बादाम के टुकड़े लगा दें. केसर मिला होने के कारण इस का रंग अलग दिखता है.

नेपाल की रहने वाली पेड़े की शौकीन प्रीना तिवारी कहती हैं, ‘नेपाल में ऐसे ही पेड़ों की मांग ज्यादा होती है. काठमांडू शहर की तमाम दुकानों में केसरिया पेड़ा मिलता?है. भारत से आने वाले लोग भी यहां के पेड़ों को खूब पसंद करते हैं.’ पेड़ों को पसंद करने का दूसरा कारण यह है कि इन को लंबे समय तक संभाल कर रखना सरल होता है. इन्हें कहीं से लाने या ले जाने में भी दिक्कत नहीं होती?है. पुरानी मिठाई होने के कारण पेड़ों का चलन सभी जगहों पर है.’ 

अफ्रीका: एक तो गरीबी उस पर आतंकवाद

सारी दुनिया भले ही आईएस से खौफ  खा रही हो लेकिन विश्व के प्रतिष्ठित थिंकटैंक और आतंकवाद सूचकांक बनाने वाली संस्था इंस्टिट्यूट फौर इकोनौमिक्स ऐंड पीस द्वारा हाल ही में जारी रिपोर्ट के मुताबिक बोको हराम ने वर्ष 2014 में आतंकवाद से हुई मौतों के मामले में आईएस को पीछे छोड़ दिया है. यह आंकड़ा इस तथ्य की तरफ  संकेत करता है कि अफ्रीका के नाइजीरिया देश में सक्रिय बोको हराम ज्यादा चर्चित न होने पर भी हत्या करने के मामले में बहुचर्चित और दुनियाभर में खौफ  पैदा करने वाले आईएस से आगे है. इस तरह वह दुनिया का सब से खूंखार आतंकी संगठन बन चुका है. इन के बाद नाम आते हैं तालिबान, फुलानी और सोमालिया के अलशबाब का.

रिपोर्ट के मुताबिक, पहले 5 आतंकवादी संगठनों में से 3 संगठन अफ्रीका के हैं. फुलानी उग्रवादी उत्तरी और मध्य नाइजीरिया में सक्रिय हैं और अकसर ईसाई किसानों पर हमले करते हैं. पिछले वर्ष उन्होंने 1,229 हत्याएं कीं. सोमालिया, केन्या और अन्य पड़ोसी देशों में सक्रिय अलशबाब नामक संगठन ने पिछले वर्ष 1,012 हत्याओं को अंजाम दिया. इसे अलकायदा का सोमालियाई संगठन भी कहा जाता है. इस के बारे में कहा जाता है कि उस के पास कुख्यात आतंकी समूह अलकायदा का शरीर और तालिबान का उग्र तेवर है.

आतंक का बढ़ता दायरा

पहले 5 आतंकी संगठनों में 3 अफ्रीकी आतंकी संगठनों का होना इस बात का प्रतीक है कि अफ्रीका में आतंकवाद तेजी से फैलता जा रहा है. यह कंगाली में आटा गीला वाली कहावत को सच साबित कर रहा है. एक तो अफ्रीका की बेहद गरीबी, ऊपर से आतंकवाद की मार, और उस से होता बड़े पैमाने पर विस्थापन. अफ्रीकी देशों में आतंकी संगठन कुकुरमुत्तों की तरह जगहजगह उग आए हैं. पेरिस पर हुए हमले के एक हफ्ते बाद अफ्रीकी देश माली की राजधानी बोमाको के रोडिसन ब्लू होटल में जिहादी आतंकियों ने 27 लोगों को मौत के घाट उतार दिया. उन्होंने सभी को कुरान की आयतें सुनाने को कहा. जिन्होंने सुना दीं उन्हें छोड़ दिया और जो नहीं सुना पाए उन्हें गोली मार दी. अफ्रीका में जगहजगह इस तरह के हमले हो रहे हैं. सोमालिया, नाइजीरिया, माली, ट्यूनीशिया, मिस्र, चाड, कैमरून आदि की सूची बहुत लंबी है. कई जिहादी संगठन सक्रिय हो गए हैं जैसे मुजाओ अंसार, अलशरीया, साइंड इन ब्लड बटालियन आदि. कहीं फुटबौल खेलते किशोरों को गोली से भून दिया जाता है तो कहीं सैकड़ों छात्राओं को अगवा कर उन की आतंकवादियों के साथ शादी कर दी जाती है. काफिरों के सिर कलम किए जाते हैं. समलैंगिकों को फांसी दी जाती है. जजिया वसूला जाता है. इस वहशीपन का दायरा बढ़ता ही जा रहा है.

सब से खतरनाक आतंकी संगठन है बोको हराम जो नाइजीरिया में सक्रिय है. बोको हराम ने कुछ अरसे पहले खिलाफत का अगुआ कहलाने वाले आईएसआईएस का साथ निभाने की शपथ ली है. आईएस इस समय दुनिया का सब से खतरनाक आतंकी संगठन है. आईएसआईएस का नेता अबूबकर अल बगदादी खुद को खलीफा घोषित कर चुका है. फिलहाल बोको हराम को नाइजीरिया में उस के पड़ोसी देशों की मल्टिनैशनल फोर्स ने कमजोर कर दिया है. शायद इसलिए यह आईएस से हाथ मिला कर खुद को मजबूत करना चाहता है. इस से पहले तो बोको हराम ने खुद को खलीफा घोषित किया हुआ था लेकिन उसे बहुत सफलता नहीं मिली. इसलिए वह अब आईएस की शरण में आ गया है. दोनों संगठनों में सब से बड़ी समानता यह है कि दोनों ही अपने चरम हिंसा और हैवानियत के लिए दुनिया में बदनाम हैं.

कुछ अरसे पहले नाइजीरिया स्थित जाबा गांव में बोको हराम के कुछ सदस्यों ने 68 लोगों की हत्या कर दी. भारी हथियारों से लैस आतंकी बोर्नो प्रांत के गांव में सभी दिशाओं से घुस आए. उन्होंने वहां पर स्थानीय लोगों पर गोलियां बरसानी शुरू कर दीं, भागते हुए लोगों के ऊपर भी उन्होंने गोलियां बरसाईं. इन मारे जाने वाले लोगों में किशोर और बुजुर्ग भी शामिल थे. इस के 2 दिन बाद ही शहर मेदुईगुरी में हुए 5 आत्मघाती हमलों में 54 लोग मारे गए, 143 घायल हुए. अफ्रीकी देश नाइजीरिया में इस तरह के नरसंहार अब आम बात हो चुके हैं. रोजाना बोको हराम के हैवानियत की कोई न कोई खबर अखबारों की सुर्खियों में होती है. नाइजीरिया के कई राज्यों में मजबूत पकड़ रखने वाले बोको हराम में उस ने महिलाओं और बच्चों सहित 500 से अधिक लोगों का अपहरण किया. बोको हराम ने 2011 में पुलिस के खिलाफ आत्मघाती हमले किए और राजधानी अबुजा में संयुक्त राष्ट्र के कार्यालय पर हमला किया. बोको हराम ने पड़ोसी देशों में भी हिंसा का तांडव मचाना शुरू कर दिया जिसे देखते हुए कैमरून, चाड और नाइजीरिया जैसे देशों ने मिल कर उस से निबटने का फैसला किया और संयुक्त रूप से लगभग 7,500 सैनिकों को बोको हराम के खिलाफ  उतारा.

नाइजीरिया में अभी चुनाव हुए जबकि बोको हराम लोकतंत्र और चुनाव का घोर विरोधी है, इसलिए उसे रोकने के लिए उस ने बड़े पैमाने पर हिंसा का तांडव किया. बोको हराम देश से मौजूदा सरकार का तख्ता पलट करना चाहता है और उसे एक पूरी तरह इसलामिक देश में तबदील करना चाहता है. कहा जाता है कि बोको हराम के समर्थक वहाबी मुसलमान हैं. बोको हराम इसलाम के उस संस्करण को प्रचलित करता है जिस में मुसलमानों को पश्चिमी समाज से संबंध रखने वाली किसी भी राजनीतिक या सामाजिक गतिविधि में भाग लेने से वर्जित किया जाता है. इस में चुनाव के दौरान मतदान में शामिल होना, टीशर्ट, पैंट पहनना और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा लेना शामिल है. बोको हराम के नेता अबू बकर शेकाऊ ने एक वीडियो में ऐलान किया था, ‘मैं कसम खा कर कहता हूं कि नाइजीरिया में लोकतंत्र को जीवित नहीं रहने दूंगा. हम इस के खिलाफ जंग छेड़ रहे हैं और इसे हरा कर छोड़ेंगे. लोगों की सरकार, लोगों द्वारा सरकार और लोगों के लिए सरकार जैसी अवधारणा जल्द खत्म हो जाएगी और अल्लाह की सरकार और अल्लाह के लिए सरकार कायम होगी.’

हमलों की ताजा लहर से जाहिर होता है कि संयुक्त अभियान की सफलता के दावों के बावजूद नाइजीरिया और उस के पड़ोसी देशों, कैमरून, चाड और नाइजर के सामने चुनौती कम नहीं हुई है. बीते 6 साल में विद्रोहियों की हिंसा की वजह से 20 हजार से अधिक लोगों की जानें जा चुकी हैं. 10 अफ्रीकी देशों के समूह मध्य अफ्रीकी राज्यों का आर्थिक समुदाय यानी सीईईएसी ने इसलामिक आतंकवादी गुट बोको हराम से लड़ने के लिए 87 मिलियन डौलर का आपातकालीन कोष बनाने का निर्णय लिया है. पिछले 5 सालों में आतंकवादियों ने उत्तरी नाइजीरिया में हजारों लोगों का कत्ल करने के अलावा सैकड़ों लोगों का अपहरण भी किया है. बोको हराम नाइजीरिया के होसा भाषा के 2 शब्द से बना है, जिस का अर्थ पश्चिमी शिक्षा लेना वर्जित है, बोको का मतलब है नकली और हराम का मतलब वर्जित. अरबी में इस संगठन का आधिकारिक नाम जमात-ए-एहली सुन्ना लिदावित वल जिहाद है यानी जो लोग जिहाद फैलाने के लिए प्रतिबद्ध हों. मुसलिम धर्मगुरु मोहम्मद यूसुफ  ने वर्ष 2002 में बोको हराम की स्थापना की.

फिर अबू बकर शेकाऊ नेता बना. यह समूह 1990 के आखिर से कई प्रकार से मौजूद रहा है. बोको हराम, अलकायदा, अलशबाब के बीच बातचीत होने, प्रशिक्षण और हथियारों की कडि़यां पाए जाने की रिपोर्ट्स आई हैं. शेकाऊ पहले इस समूह का उपकमांडर था. जुलाई 2010 में, शेकाऊ ने बोको हराम के नेतृत्व का सार्वजनिक रूप से दावा किया और उस ने नाइजीरिया में पश्चिमी हितों पर हमला करने की धमकी दी. उस महीने के अंत में, शेकाऊ ने अलकायदा के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त करते हुए एक दूसरा बयान जारी किया और अमेरिका को धमकी दी. शेकाऊ के नेतृत्व में बोको हराम एक बार फिर ताकतवर हो गया.

मासूमों का शिकार

शेकाऊ के नेतृत्व में बोको हराम ने लगातार छोटे बच्चों को अपना निशाना बनाया है. अप्रैल 2014 को बोको हराम ने उत्तरी नाइजीरिया से लगभग 300 लड़कियों को उन के स्कूल से अपहरण कर लिया. एक वीडियो संदेश में, शेकाऊ ने इस अपहरण की जिम्मेदारी लेने का दावा किया, लड़कियों को गुलाम बनाया और उन्हें बाजार में बेचने की धमकी भी दी. हाल ही में इन लड़कियों के अपहरण का 1 साल पूरा हुआ. इस के अलावा वह छोटे लड़कों और लड़कियों का आत्मघाती दस्तों के तौर पर प्रयोग करता है.

रहम शब्द तो शायद इस संगठन की डिक्शनरी में ही नहीं है. कुछ समय पहले बोको हराम के आतंकवादियों ने नाइजीरिया के उत्तरपूर्व के शहर बाच्चा पर बड़ा हमला कर सैन्य अड्डे को लूट लिया. पूरे शहर में आग लगा दी. सड़कों व गलियों को लाशों से पाट दिया. बोको हराम के उक्त हमले में 20 हजार से अधिक लोग मारे गए. इस से पहले भी बोको हराम के लड़ाकों ने इस शहर पर बड़ा हमला किया था. भुखमरी के लिए दुनियाभर में चर्चित सोमालिया में सक्रिय है खूंखार आतंकी संगठन अलशबाब. कुछ अरसे पहले पाकिस्तान के पेशावर में छात्रों पर हुए नृशंस आतंकी हमले की घटना इस बार केन्या में दोहराई गई. सोमालिया के खूंखार आतंकवादी संगठन अलशबाब के आतंकियों ने ग्रेनेड और स्वचालित हथियारों से गैरीसा यूनिवर्सिटी के होस्टल में सो रहे छात्रों पर हमला बोल दिया. हमलावरों की अंधाधुंध गोलीबारी में 147 छात्र मारे गए और 79 से ज्यादा घायल हुए. चश्मदीदों के मुताबिक चरमपंथियों ने ईसाई छात्रों को अलग खड़ा कर गोलियों का निशाना बनाया. केन्या में 1998 में अमेरिकी दूतावास पर हमले के बाद यह सब से बड़ा हमला था. इस से 2 दिन पहले अलशबाब के आतंकवादियों ने सोमालिया के मका अलमुकर्रम होटल को 12 घंटे से अधिक समय तक कब्जे में रखा था जिस में सुरक्षा बलों की कार्यवाही में 6 हमलावरों समेत कम से कम 24 लोगों की मौत हुई.

अलशबाब के लिए ऐसी नृशंस हिंसा करना नई बात नहीं है. कई बार तो लगता है कि बोको हराम और अलशबाब में यह साबित करने की होड़ लगी है कि कौन कितना खूंखार है. इस से पहले, 2011 में अलशबाब ने नैरोबी के मशहूर मौल वैस्टगेट में कई विदेशियों समेत 50 से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतारा था. अलशबाब ने हमले की जिम्मेदारी लेते हुए कहा था कि केन्याई बलों द्वारा सोमालिया में घुस कर चलाए गए अभियान का यह जवाब है. सोमालिया के दक्षिण में करीब 4 हजार केन्याई सैनिक मौजूद हैं, जहां वे साल 2011 से ही चरमपंथियों के खिलाफ युद्ध छेड़े हुए हैं. अलशबाब इस का विरोध कर रहा है और उस ने हमले की कड़ी चेतावनी दी थी.

तालिबानी मानसिकता

अफ्रीका के खूंखार आतंकी संगठन अलशबाब का पूरा नाम हरकत उल शबाब अल मुजाहिदीन है, लेकिन यह अलशबाब के नाम से मशहूर है. शबाब का मतलब होता है युवा. इसे अलकायदा का सोमालियाई संगठन भी कहा जाता है. इस चरमपंथी संगठन को साल 2012 में कई देशों ने आतंकी संगठन की श्रेणी में डाल दिया है. अलशबाब का दक्षिणी सोमालिया में खासा प्रभाव है. एक जमाने में वहां के कुछ इलाकों पर उस का कब्जा भी था.

अलशबाब का मकसद सोमालिया की फैडरल सरकार को गिरा कर इसलामी सरकार स्थापित करना है. वह उस सैन्य संगठन ‘इसलामिक कोर्ट यूनियन’ का एक गुट है जिसे साल 2006 में वर्तमान फैडरल सरकार ने संयुक्त राष्ट्र और इथियोपियाई सेना की मदद से हटाया था. 2006 से पहले इस सैन्य संगठन का मध्य और दक्षिणी सोमालिया पर कब्जा था. आयरो अलशबाब का पहला मुखिया था. उसी की अगुआई में अलशबाब ने तालिबान से संपर्क साधा और अपने लड़ाकों को अफगानिस्तान में तालिबान से ट्रेनिंग दिलाई. अलशबाब तालिबान की तर्ज पर सोमालिया में काम करने लगा. अलशबाब के पास करीब 15 हजार ट्रेंड आतंकी हैं. कभी शबाब का मुखिया था गोडाने. मोगादिशू के दक्षिण में एक अमेरिकी हवाई हमले में गोडाने की मौत हो गई. उस के बाद अहमद उमर को नया नेता घोषित किया गया. सोमालिया के ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में अलशबाब का खासा प्रभाव है. अलशबाब ने सोमालिया में काम कर रहे विदेशी एनजीओ और संयुक्त राष्ट्र के संगठनों पर भी तरहतरह के आरोप लगा कर उन के खिलाफ  हमले किए.

तालिबान से अपने लड़ाकों को ट्रेनिंग दिलाने वाले इस संगठन की सोच भी तालिबान जैसी ही है. वर्ष 2007 में माली के गाउ शहर में आतंकवादी हमले के बाद अलशबाब ने संगीत और नृत्य पर पाबंदी घोषित करते हुए उन पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की. उस के आतंकवादियों ने युगांडा में 11 जुलाई, 2010 को 76 लोगों की सिर्फ  इसलिए हत्या कर दी कि युगांडा सरकार ने सोमालिया में आतंकवादियों से लड़ने के लिए अपने सैनिक भेजने का फैसला लिया था. अक्तूबर 2011 से ले कर मार्च 2013 तक अलशबाब ने केन्या में इसी मुद्दे को ले कर बम विस्फोट किए और सैकड़ों जानें लीं. फरवरी 2012 में अलशबाब के तत्कालीन नेता गोडाने ने वीडियो जारी कर के अयमान अल जवाहिरी के नेतृत्त्व वाले अलकायदा में विलीन होने की घोषणा की थी. लेकिन इसे ले कर अलशबाब के नेताओं में फूट पड़ गई और यह विलय लागू नहीं हो पाया. फिर भी अलकायदा और अफ्रीका के एक प्रमुख आतंकवादी संगठन बोको हराम के साथ अलशबाब का गठबंधन चलता रहा.

अलकायदा की घटती ताकत और समर्थन के चलते इसलामी कट्टरपंथियों के बीच अब अलशबाब अधिक लोकप्रिय हो रहा है. सालों से सरकारी सेनाओं व संयुक्त राष्ट्र की सेनाओं से लड़ने के कारण अलशबाब को कठोर सैनिक प्रशिक्षण मिला है. अत्याधुनिक हथियारों से लैस अनुभवी लड़ाके इस संगठन को बेहद बेरहम और खतरनाक बनाते हैं.

अलशबाब का काम करने का अपना तरीका है जिस में रहम और करम की कोई गुंजाइश नहीं है. इस के आतंकवादी सोमालिया में 10 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को आतंकवादी बनाने के लिए बाकायदा स्कूल चलाते हैं और उन के दिलोदिमाग में नफरत के बीज बो कर उन्हें पश्चिमी देशों में हमलों को अंजाम देने के लिए तैयार करते हैं. आतंकवादी स्कूलों में 10 साल से छोटे बच्चों को आत्मघाती बम हमलों के बारे में शिक्षा दी जाती है और कहा जाता है कि अगर वे इन गतिविधियों में शामिल होंगे तो उन्हें तथाकथित जन्नत नसीब होगी. यह संगठन आमतौर पर सार्वजनिक स्थलों को चिह्नित कर के अंधाधुंध हमले करता है. इस का मकसद है, ऐसी दहशत फैलाना जिस से अफ्रीकी देशों में ईसाई और मुसलमानों के बीच तनाव बढ़े. सोमालिया स्थित अलशबाब का इतिहास बहुत पुराना नहीं है और न ही इस संगठन में सक्रिय सदस्यों की संख्या ही बहुत बड़ी है. अलकायदा, आईएसआईएस, तालिबान, बोको हराम, लश्करे तौयबा आदि कुख्यात आतंकवादी संगठनों की तरह अलशबाब भी इसलाम की वहाबी विचारधारा को मानता है. इस कारण शियाओं और सूफियों का विरोधी है जो मजारों और दरगाहों को मानते हैं. वहाबी विचारधारा इस के खिलाफ है. सोमालिया, जो मुख्यतया सूफी परंपरा का अनुयायी रहा है, वहां सऊदी हस्तक्षेप ने वहाबियत का जहर भर दिया. वहाबी आतंकवाद अब अफ्रीका के देशों में फैलता जा रहा है. नतीजतन, अफ्रीकी मुसलिम देश सूफीवाद और वहाबी इसलाम के बीच संघर्ष का अखाड़ा बनते जा रहे हैं. अलशबाब सोमालिया में वहाबी आतंकी संगठन अलकायदा का सहयोगी संगठन है. वह केवल सोमालिया ही नहीं, इथियोपिया, केन्या में भी आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देता है. लेकिन सोमालिया में अब सूफी संगठन के लोगों ने अलशबाब का मुकाबला करने के लिए बंदूकें उठा ली हैं.

चीन: आबादी नियंत्रण का नुस्खा पड़ गया उलटा

दशकों तक 1 संतान की नीति के चलते चीन में इन दिनों कामकाजी लोगों की कमी की समस्या पैदा हो गई है. फर्राटे से आगे बढ़ती चीनी अर्थव्यवस्था को मुद्रा के अवमूल्यन से बड़ा झटका लगा है. इसे संभालने के लिए चीन को बड़े कार्यबल की जरूरत होगी. पर लगभग साढ़े 3 दशक पहले आबादी नियंत्रण के मद्देनजर लिया गया फैसला अब उस के गले की फांस साबित होने जा रहा है. 1 संतान की नीति के कारण एक तरफ चीन में बुजुर्गों की तादाद बढ़ती चली गई है तो दूसरी ओर युवाओं की संख्या में भारी कमी हो गई है जो उस के लिए चिंता का विषय है. इस स्थिति का प्रभाव सीधे कार्यबल पर पड़ने जा रहा है.

विशेषज्ञों की राय है कि अनुमानतया 1 संतान की नीति के कारण चीन ने अब तक कम से कम 40 करोड़ जन्म को रोका है. कार्यबल की समस्या का एहसास चीन को 5 साल पहले ही हो चुका था, लेकिन आबादी के मामले में अपनी नीति की समीक्षा करने और उस के मद्देनजर फैसला लेने में सरकार ने देर लगा दी. स्थिति इस कदर गंभीर हो गई कि चीन को 1 संतान की नीति बदलनी पड़ी. और अब चीन ने उस विवादास्पद नीति को खत्म कर देश में दो बच्चों की नीति को लागू कर दिया है. बिगड़ते लिंगानुपात और जन आक्रोश के चलते लिए गए इस फैसले से चीन की दुनियाभर में आलोचना हुई. हालांकि अब दो बच्चों की नई नीति लागू होने पर भी अलग तरह की सामाजिक समस्या पेश आ रही है.

जनता की मुसीबत

चीन ने जब 1 संतान नीति को देश में लागू किया तब पूरे विश्व समेत खुद चीन में इस की जम कर आलोचना की गई. मानवाधिकार का भी मामला उठा. लेकिन जल्द ही चीनी परिवार अपनी 1 संतान से ही खुश रहने लगा और अपनी पूरी सोचसमझ को 1 संतान पर केंद्रित कर लिया. यानी चीनी आबादी 1 संतान की नीति में रचबस गई. लगभग साढ़े 3 दशकों के बाद इस में बदलाव, चीनी जनता के लिए आसान नहीं है. ऐसा क्यों? कोलकाता में ब्यूटीपार्लर चलाने वाली रोजी चैंग, जो 1960 से भारत में हैं और अब बाकायदा भारतीय नागरिक हैं, का कहना है कि उन के तमाम रिश्तेदार चीन के विभिन्न प्रांतों में हैं. उन का मानना है कि 1 संतान की नीति ही सही है. यह अब उन की जीवनशैली में रचबस गई है. इस से बाहर निकलना अब लगभग नामुमकिन है. एक अच्छी जीवनशैली में ज्यादा बच्चे बाधक बन जाते हैं. बच्चों की परवरिश में भी इस का असर पड़ता है.

वहीं, कोलकाता में लेदर शू की दुकान चलाने वाले कौंग लू का कहना है कि उन का पोता चीन में है, जो 5 साल के बच्चे का पिता है. वह दूसरी संतान के बारे में कतई सोचना नहीं चाहता. उस का कहना है कि मौजूदा स्थिति में दूसरे बच्चे के बारे में सोचना इसलिए भी सही नहीं होगा क्योंकि समाज का इन्फ्रास्ट्रक्चर अभी उस तरह का नहीं है. सब से पहले तो पतिपत्नी दोनों कामकाजी हैं. उन के लिए दूसरे दुधमुंहे बच्चे की देखभाल संभव नहीं. बच्चों के लिए अच्छी गवर्नेस व आया भी नहीं मिलती है, जो बच्चों को सही परवरिश दे सके. वहीं, 3 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए उपयुक्त तरह के प्ले स्कूलों व किंडरगार्टन स्कूलों की कमी है. जाहिर है इसे अपनाने में दिक्कत पेश आनी है.

सामाजिक बदलाव

गौरतलब है कि 1980 में आबादी पर नियंत्रण करने के लिहाज से चीन ने 1 संतान की नीति को लागू किया था. इस से पहले चीन में एक परिवार में 3 से 4 बच्चे हुआ करते थे. लेकिन 1979 में सरकार ने1 संतान नीति की घोषणा की, जिसे 1980 में पूरी तरह से लागू कर दिया गया. इस नियम का उल्लंघन करने वालों पर कड़ी कार्यवाही की भी घोषणा की गई थी, जिस में जुर्माने से ले कर नौकरी से हाथ धोने और जबरन गर्भपात कराने तक की सजा का प्रावधान रखा गया था. हालांकि एक समय के बाद कुछ प्रांतों में विशेषरूप से अल्पसंख्यकों व ग्रामीण दंपतियों को 1 से अधिक बच्चे पैदा करने की छूट दे दी गई थी.

बहरहाल, इस नीति के कारण चीनी समाज में बड़ा बदलाव आया. कुछ बदलाव सकारात्मक था तो कुछ नकारात्मक. परिवार में बच्चे अकेलेपन के शिकार होने लगे. आस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं द्वारा बीजिंग में कराए गए एक सर्वे की रिपोर्ट में पाया गया कि 1980 के बाद पैदा हुए बच्चों में मातापिता की आकांक्षाओं का बोझ बढ़ने लगा. इस से उन में आत्मविश्वास की कमी आई है. 1980 के बाद पैदा हुए बच्चे तुलनात्मक रूप से निराशावादी, कम भरोसेमंद पाए गए. प्रतिस्पर्धा को झेलने की मानसिकता भी कम पाई गई. एक सामाजिक समस्या यह भी रही कि चीनी समाज में लड़कों की पैदाइश पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा. जाहिर है इस दौरान भारत की ही तरह गर्भ परीक्षण के बाद कन्याभू्रण की हत्या का चलन शुरू हो गया. इस का असर चीन के समाज में नजर आने लगा. लड़केलड़कियों के अनुपात में भारी गिरावट आ गई. विवाह में समस्या के साथ तरहतरह के सामाजिक अपराध बढ़ने लगे.

परिवार में बच्चे या तो कुत्तों के साथ पलने लगे या टेडीबियर के साथ. बताया जाता है कि 1980 के दशक में चीन में कुत्ते पालना साम्यवाद के खिलाफ माना जाता था. इसी के साथ यह पूरी तरह से कानूनी भी नहीं था. इसीलिए कम ही लोग कुत्ते पालते थे. संभवतया इसीलिए चीन में टैडीबियर का चलन बढ़ा. बड़ी संख्या में बच्चे अपने सहोदर भाईबहन के बजाय टैडीबियर के साथ बड़े होते रहे हैं. 1 संतान नीति के कुछ सकारात्मक पक्ष भी थे. सब से पहले तो मातापिता का ध्यान 2 या 3 के बजाय 1 बच्चे पर केंद्रित हो गया. उधर, बच्चों को मातापिता का प्यार अन्य भाईबहनों के न होने से बंटा नहीं. बच्चों की परवरिश के मद्देनजर खर्च का दबाव कम हो गया. इस से परिवार की आय एक हद तक बढ़ भी गई. अभिभावक बच्चों की उच्चशिक्षा पर जोर देने लगे. अकेली संतान वाले परिवार पहले की तुलना में कहीं अधिक शिक्षित होने लगे. हालांकि इस का एक अन्य पक्ष यह भी रहा कि चीन में शिक्षा दिनोंदिन महंगी होती चली गई.

घटती श्रमिक आबादी

चीन की चिंता तब बढ़ी जब 2013 में नैशनल ब्यूरो औफ स्टैटिस्टिक्स की ओर से जनसांख्यिकी के मद्देनजर एक रिपोर्ट आई, जिस में कहा गया था कि 2012 में देश में 35 लाख श्रमिकों की कमी देखने में आई है. वहीं, संयुक्त राष्ट्र संघ के जनसंख्या विभाग के अनुसार, अगली सदी तक चीन में श्रमिक आबादी महज 54.8 करोड़ रह जाएगी और दुनिया के सब से बड़े श्रमिक आबादी वाले देश में कार्यबल के लिए लगातार कमी चिंता का विषय है. 1949 में जन्मदर प्रति 1 हजार में 227 थी, 1981 में यह 53 पर पहुंच गई. लेकिन तब इस कमी की गंभीरता को भांपा नहीं जा सका था. अब जा कर देखने में आ रहा है कि जन्म नियंत्रण दर में तेजी से गिरावट के चलते उम्र के बीच अंतराल एक खाई बन गई है. बताया जाता है कि 2030 तक चीन की आबादी में उम्र के अंतराल में जो इजाफा होगा वह लगभग एकतिहाई होगा. मालूम हो कि चीन का श्रमिक तबका देश में बुनियादी ढांचे के निर्माण और निर्यात आधारित विनिर्माण उद्योग से जुड़ा हुआ है, इसीलिए चीन के आर्थिक मौडल पर यह गिरावट बहुत बड़ा प्रभाव डालने वाली है.

यह स्थिति तब और भी गंभीर मानी जाने लगी जब कार्यबल की समस्या का असर अर्थव्यवस्था पर पड़ने का अंदेशा गहराने लगा. चीनी अर्थव्यवस्था में लगातार वृद्धि को देखते हुए यह माना जाने लगा था कि जैसे 19वीं सदी ब्रिटिश सदी और 20वीं सदी अमेरिकी सदी रही है वैसे 21वीं सदी चीनी सदी होगी. गौरतलब है कि चीन का जीडीपी अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर है. पिछले 30 सालों के इस सफर में चीन ने एक के बाद एक कई देशों को पछाड़ा है. 2007 में जरमनी की अर्थव्यवस्था को पछाड़ने के बाद 2010 तक आतेआते जापानी अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन गई चीनी अर्थव्यवस्था. चीन तब अमेरिका के समकक्ष खड़ा हो गया. इस समय चीनी अर्थव्यवस्था 4.99 खरब डौलर की है. इस समय चीन विश्व का दूसरा सब से बड़ा व्यापारिक राष्ट्र, सब से बड़ा निर्यातक और दूसरा सब से बड़ा आयातक है. नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री रौबर्ट फौजेल का मानना है कि 2040 तक चीनी अर्थव्यवस्था 123 खरब डौलर तक पहुंच जाएगी. लेकिन विकास की इन नई ऊंचाइयों तक पहुंचने में बाधा बन सकती है चीन में कार्यबल की कमी. यह कमी 30 सालों के किएधरे पर पानी फेर देगी.

बदलाव पर नजर

अब चीन 1 संतान नीति से आधिकारिक रूप से पीछे हटने को मजबूर हुआ. इसी के साथ चीनी बाजार में एक बड़ा बदलाव देखने में आ रहा है. उधर, विश्व में वित्तीय सेवा मुहैया कराने वाली कंपनी क्रैडिट सुइस का अनुमान है कि 2017 से ले कर अगले 5 सालों तक यानी 2021 तक हर साल चीन में अतिरिक्त 30 से 50 लाख बच्चे पैदा होंगे. इसी अनुमान के मद्देनजर, बच्चों का सामान बनाने वाली कंपनियों को जबरदस्त बढ़ावा मिला है. बताया जा रहा है कि अभी से चीनी शेयर बाजार में बच्चों की परवरिश से संबंधित सामान तैयार करने वाली कंपनियों की चांदी ही चांदी है. इन दिनों पेरांबुलेटर, नैपी, बेबीफूड की मांग में बड़ा इजाफा होने का अनुमान है. इसी वजह से निवेशक बच्चों की सामग्री बनाने वाली कंपनियों में निवेश के लिए आगे आ रहे हैं.

यह और बात है कि बच्चों की सामग्री बनाने वाली कंपनियों के शेयर के भाव ऊपर की ओर चढ़ रहे हैं तो गर्भ निरोधक चीजों के निर्माता कारोबार में मंदी झेलने को मजबूर हैं. इस का सब से बड़ा असर कंडोम उद्योग पर पड़ा है. चीन में कंडोम की आपूर्ति करने वाली जापानी कंपनी ओकामोतो इंडस्ट्रीज पर सब से बुरा असर पड़ा है. जापान में पर्यटन के लिहाज से आए चीनी लोगों के बीच कंपनी का कंडोम बहुत लोकप्रिय बनते ही कंपनी ने अपने पांव चीन में फैलाए. बताया जाता है कि यह कंपनी अकेले चीन में कंडोम की सप्लाई कर के महज 3 सालों में बड़ी कंपनी के रूप में उभर कर सामने आई थी. लेकिन 1 संतान नीति में ढील देने की घोषणा के बाद इन कुछ दिनों में इस कंपनी की बिक्री में केवल टोकियो में ही 10 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है. वहीं, गर्भ निरोधक गोलियों की बिक्री में भी गिरावट आई है. गर्भ निरोधक कंपनियों को उम्मीद है कि 2 बच्चों की परवरिश में होने वाले खर्च के मद्देनजर सरकारी प्रतिबंध उठा लिए जाने के बावजूद दंपतियों को इस की तैयारी में अभी कम से कम 1 साल तो लगेगा ही. जाहिर है रातोंरात जन्म दर बढ़नी मुमकिन नहीं होगी. यही एक उम्मीद है गर्भ निरोधक सामान का कारोबार करने वाली कंपनियों को.

 इसे विडंबना नहीं तो क्या कहा जाए, विश्व की सब से बड़ी आबादी वाले देश के रूप में दुनिया की आलोचना झेलता रहा है चीन. फिर उस ने आबादी नियंत्रण के लिए जो नीतिगत फैसले लिए वे आज उसी की अर्थव्यवस्था के लिए सिरदर्द बन कर उभर रहे हैं.

बहुत मुसकराई होगी

पढ़ कर दर्दीला अफसाना

हाल ही में तुम

बहुत मुसकराई हो

कुछ देर रोने के बाद

यादों के आशियाने में छिपे

झरोखे को ढूंढ़ पाने के दौरां

जहां बोझल होती थीं पलकें

चेहरा तुम्हारा चूमती थीं

सुबह की देख कर किरणें

चांद के ढल जाने के बाद

तुम बहुत मुसकराई होगी

कुछ देर रोने के बाद.

          – राजीव रोहित

बहुत मुसकराई होगी

पढ़ कर दर्दीला अफसाना

हाल ही में तुम

बहुत मुसकराई हो

कुछ देर रोने के बाद

यादों के आशियाने में छिपे

झरोखे को ढूंढ़ पाने के दौरां

जहां बोझल होती थीं पलकें

चेहरा तुम्हारा चूमती थीं

सुबह की देख कर किरणें

चांद के ढल जाने के बाद

तुम बहुत मुसकराई होगी

कुछ देर रोने के बाद.

          – राजीव रोहित

मेरे पापा

मेरे पापा नेकदिल, बहुत जिम्मेदार, स्पष्टवादी एवं सत्यप्रिय इंसान थे. सभी लोग उन्हें अजातशत्रु कहते थे. हम दोनों बहनों को उन्होंने अच्छे संस्कार दिए. आज उन्हीं की बदौलत हम पढ़लिख कर स्वावलंबी हैं.  जीवन के हर मोड़ पर, जिस के पिता साथ हों, वह इंसान सचमुच खुशहाल होता है. उन्होंने शिक्षा विभाग में 38 वर्ष अध्यापन कार्य किया. अध्यापन उन का शौक था. उन की अंगरेजी बहुत अच्छी थी. हर कठिनाई, हर समस्या में जो पिता अपने बच्चों का हाथ थामे रहे, उस से बढ़ कर नेक इंसान भला कौन हो सकता है. उन्होंने सिर्फ अपनी ही दोनों बेटियों पर स्नेह नहीं लुटाया, बल्कि अपने सभी छोटेबड़े भायों, भतीजी, भतीजों को भी खूब प्यार करते थे.

उन के भतीजे कहते हैं कि मेरे चाचा तो बहुत रौयल थे. उन को संसार छोड़े 8 वर्ष हो चुके हैं लेकिन ऐसा महसूस होता है कि वे अभी भी हमारे साथ हैं.

मायारानी श्रीवास्तव, मिर्जापुर (उ.प्र.)

*

मेरे जिंदादिल, कर्मठ पापा अचानक कूल्हेजांघ के मल्टीपल फ्रैक्चर की चपेट में इतनी बुरी तरह आए कि डाक्टरों ने औपरेशन के लिए हाथ खड़े कर दिए. उन की दुनिया पलंग पर सिमट कर रह गई. चलनाफिरना बिल्कुल बंद, ऐसे में मैं ने छुट्टी ले कर पूरा समय उन्हें देने का निर्णय किया. उन की दवा व देखभाल कर के मुझे जितना सुख मिलता उस से अधिक दुख उन की विवशता की पीड़ा से हरदम डबडबाई आंखें देख कर होता था. दूसरों के चार काम कर के खुशी बटोरने वाले लोगों का इस तरह दूसरों पर निर्भर हो जाने के दर्द का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है.

पिताजी खाली नहीं बैठते थे. कुछ न कुछ करते ही रहते. अब कुछ न करने के लिए विवश थे. पिताजी बारबार प्यार से कहा करते थे, ‘‘बेटा, जैसा सुख तुम मुझे दे रहे हो वैसा ही तुम्हें प्राप्त होगा. यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि जो जस करइ सो तस फल चाखा.’’ 4 महीने इस तरह बिता कर उन्होंने संतुष्ट मन से संसार से विदा ली. आज मैं जीवन की संध्या में हूं. शक्ति क्षीण हो गई है और बीमार रहता हूं. जब अपने बेटेबहू और उन के बच्चों को खुशीखुशी अपनी सेवा करते देखता हूं, बेटे को नियमित रूप से दोनों समय अपने हाथ से दवा खिलाते और अपने व्यस्त प्रोफैशनल समय में से समय निकाल कर प्रतिदिन अपने साथ व्यतीत करते देखता हूं तो लगता है, पापा की कही बात सच हो रही है.

प्रभुदयाल माहेश्वरी, जनकपुरी (न.दि.)

बिकने बिकाने के दौर में

कई दिनों से बराबर महसूस कर रहा था कि पोता अपनी दादी के साथ खींची मेरी पुरानी फोटो से परेशान है. इस बारे में उस ने मुझ से कई बार हंसीहंसी में गंभीरता से कहा भी, ‘‘दादू, या तो दीवार पर से इस फोटो को हटा दो या फिर इस घर से खुद हट जाओ. पुराने इस्तेमाल हो चुके सामान की अब यहां कोई जगह नहीं. यार दादू, समझते क्यों नहीं कि अब पुरानी चीजें संभाल कर रखने का रिवाज खत्म हो गया है. अगर आंखों में जरा सी भी रोशनी बची हो तो देखो, लोग कैसे घर का बेकार पड़ा सामान निकालनिकाल कर नोटों से फटी जेबें भरे जा रहे हैं और एक आप हो कि बाबाआदम के जमाने में जी रहे हो. अगर अपने पर तरस नहीं आता तो हम पर तो तरस खाओ, दादू.

‘‘जरा सुनो तो दादू, पूरे महल्ले में जहां पहले सब आपस में बहानेसहाने एकदूसरे पर चीखनेचिल्लाने के बाद ही अन्नजल ग्रहण करते थे, आज उसी महल्ले में बस एक ही आवाज सुनाई देती है, ‘बेच दे.’ और एक आप हो कि अपने कानों में रुई घुसेड़े…माई डियर दादू, लोग आजकल खरीदने के कम बेचने के चक्कर में अधिक हैं. वे अपना सबकुछ बेचने पर उतारू हैं. उन्हें उन का जीवन तक खरीदने वाला कोई मिल जाए तो…बेकार के सामान का अब क्या काम?  इसीलिए तो जिस के दिल में जो आ रहा है, बेचे जा रहा है. आह रुपया, वाह रुपया, ओह रुपया कहता हर मुंह बड़बड़ाता अपने घर का तो अपने घर का, दूसरे के घर के सामान पर भी हाथ साफ करते वह धड़ल्ले से क्वीकर और ओएलएक्स पर सामान की फोटो अपलोड कर बेचे जा रहा है, और एक आप हो कि पुरानी चीजों को सीने से लगाए…’’

‘‘तो तुम ही कहो अब इन का क्या करूं? ये पुरानी चीजें मुई छोड़ने के बाद भी नहीं छूटतीं. मैं ने अपने को हाशिए पर डालते हुए पोते से पूछा तो वह बोला, ‘‘बुरा मत मानना दादू, ये आप के वक्त की इस्तेमाल हो चुकी, धूल चाटती ईमानदारी अब किस काम की? ये

आप के वक्त की वैल्यूज बेकार हो गई हैं. ये रिश्तों का प्यार आज किस काम का?

‘‘आप के जमाने की हमदर्दी की ओर तो अब कोई देखता तक नहीं. आज की सोसाइटी में माफ करना दादू, इन्हें पूछता ही कौन है? और एक आप हो कि… देखो तो, ये सब घर के कोने में पड़ेपड़े सड़ रहे हैं और घर में बदबू फैला रहे हैं. अगर घर से इन्हें बाहर नहीं किया तो देख लेना, घर में एक दिन प्लेग फैल जाएगा. आधे से अधिक घर तो आप के जमाने की ऐसी ही बेकार, बीमार चीजों से अटा पड़ा है.’’

‘‘तो?’’

‘‘आप कहो तो इस पुरानी ईमानदारी के अमेरिका में एक ग्राहक 200 डौलर देने को तैयार है. रिश्तों में प्यार के लिए भी ओएलएक्स पर 4 खरीदार हैं. फटी हमदर्दी की फोटो ओएलएक्स पर आप कहो तो अपलोड कर देता हूं. कोई न कोई तो फंस ही जाएगा. आप की पुरानी वैल्यूज के 5 हजार डौलर देने वाला लंदन में एक ग्राहक है मेरे पास. आप कहो तो…?’’

‘‘प्यार के भी खरीदार? ईमानदारी के भी खरीदार? अरे वाह, खरीदने वाले क्याक्या खरीद रहे हैं, कमाल है.’’

‘‘हां दादू, आप को क्या पता, वे आप के वक्त के भाईचारे के तो 50 हजार रुपए देने की बात कर रहे हैं,’’ पोता जोर से उछला.

‘‘नहीं, यह तो तुम्हारी दादी के वक्त का प्यार है. मैं इसे नहीं बेच सकता. बस, इसी के सहारे तो जी रहा हूं.’’

‘‘दादू, क्या करना पुराने प्यार का? यह जमाना प्यार का थोड़े ही है. आज अगर कोई मन से प्यार करता है तो लोग उसे गधा ही समझते हैं. आज का वक्त तो बस दिखावे का है दादू, पैसे का है. वैसे भी, प्यार से पेट थोड़े भरता है दादू?’’

‘‘पर मन तो भरता है मेरे यार.’’

‘‘ओह दादू, आप भी न, रह गए न पुराने के पुराने दादू. इन से जो पैसे मिलेंगे उतने में तो घर में 50 नई चीजें आ जाएंगी दादू. हम भी मौडर्न हो जाएंगे.’’

‘‘तो मुझे भी बेच दे.’’

‘‘लो, अभी आप की फोटो क्वीकर पर अपलोड कर देता हूं. आप के तो मुंहमांगे दाम मिलेंगे,’’ पोते ने उछलते हुए कहा तो मैं उस का मुंह ताकता रह गया.

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