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हमारी बेडि़यां

बात मई महीने की है. मेरी बहू के चाचाजी की मृत्यु हो गई थी. उन की अरथी उठने में दोपहर के 12:30 बज चुके थे. धूप अपने चरम पर थी. चाचाजी के बेटे ज्यों ही पैर में चप्पल डालने के लिए आगे बढ़े, उसी समय एक बुजुर्ग ने उन से कहा, ‘अरे बेटा, यह क्या कर रहे हो, बेटे तो नंगेपैर ही अरथी उठाते हैं.’ हमारे शहर में शववाहन की व्यवस्था नहीं है तथा मुक्तिधाम भी बहुत दूर है. चिलचिलाती धूप में बिना चप्पल के नंगेपैर चलने के कारण चाचाजी के बेटे के पैरों में छाले पड़ गए और तीव्र गरमी के कारण उन्हें बुखार भी हो गया जिस की वजह से उन्हें अस्पतल में भरती रहना पड़ा.

– विद्यादेवी व्यास, रतलाम (म.प्र.)

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पूर्वी उत्तर प्रदेश में रिवाज है कि जब नई दुलहन आती है तो सब से पहले गृहप्रवेश के बाद बहू को रसोई में ले जाते हैं. सारा खाना जो उस के आने के उपलक्ष्य में बनवाया गया होता है उसे बहू से छुआ कर ‘बहुतबहुत’ कहलवाया जाता है. मान्यता है ऐसा कर घर हमेशा भरापूरा रहता है. मेरे एक रिश्तेदार के यहां शादी थी. बरात पास के शहर में गई थी. दूसरे दिन लौटने में शाम हो गई. बहू की प्रारंभिक रस्में करा कर उस की ननद व जेठानियां रसोई में ले गईं. एक तो यात्रा की थकान, दूसरे घूंघट. बहू ने आदेशानुसार खाने में उंगलियां डालना शुरू कर दिया. चूल्हे पर भरी कड़ाही कढ़ी रखी थी. बहू ने जैसे ही कढ़ी में उंगलियां डाल कर ‘बहुतबहुत’ कहना चाहा, मारे जलन के चिल्ला पड़ी. कढ़ी भीतर से बहुत गरम थी. बेचारी दो दिन तक इस अजीबोगरीब रिवाज के कारण उंगलियां पकड़े बैठी रही.

– निधि अग्रवाल, फिरोजाबाद (उ.प्र.)

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हमारी मौसी के बच्चे जीवित नहीं बचते थे, पैदा होते ही खत्म हो जाते थे. उन के यहां एक बेटा हुआ. वह 1 माह का हो गया. तभी गांव में एक ढोंगी बाबा आया. उस ने मौसी से कहा कि सूर्यग्रहण के समय इस बच्चे को कपड़े उतार कर घूरे पर डाल आना तथा एक पैर घूरे में गाड़ देना. आगे सब ठीक हो जाएगा. कुछ दिनों के बाद सूर्यग्रहण हुआ. मौसी ने बाबा के कहे अनुसार किया. सूर्यग्रहण खत्म होने के बाद मौसी उस बच्चे को घूरे पर से उठा लाईं. गोबर में पैर दबे होने के कारण पैर में संक्रमण हो गया. बच्चा बड़ा होता गया, पैर सड़ता गया. तमाम डाक्टरों से इलाज कराया, पैर का गलना जारी रहा. आखिरकार, घुटने के नीचे से पैर कटवाना पड़ा.

– एस पी सिंह, लखनऊ (उ.प्र.)

फिल्मों की फिसलती जबान

झल्ली पटाका, होर नचदी, साला खड़ूस, आज फिर पीने की तमन्ना है, कमीना है दिल, कुकु माथुर की झंड हो गई, फुकरे, कमीने, बंबू लग गया, हर फ्रैंड कमीना होता है और क्यूतियापा. ये तमाम अश्लील और गालियों के लहजे वाली जबान किसी और की नहीं, बल्कि उस सिनेमा की है जो इन दिनों समाज और समाज की जबान को गालियों भरे डायलौग, हिंगलिश टाइटल की खिचड़ी और स्लैंग भाषा के पैरों तले कुचलने पर आमादा है. शायद इसीलिए आज की फिल्मों के टाइटल, किरदार, थीम और संवाद व गाने के नाम बदजबानी से भरे पड़े हैं. इस से पहले तक तो फिल्मों में सिर्फ अश्लीलता और द्विअर्थी संवादों का रोना था लेकिन अब हिंदी के साथ अंगरेजी के बेस्वाद कौकटेल और गालियों के मौकटेल ने यूथ व टीन जैनरेशन की जबान ही गंदी कर दी है.

फिल्मकारों को शायद इस बात का इल्म नहीं है कि कुछ अलग करने के नाम पर जो फूहड़ता वे परोस रहे हैं वह तुरंत यूथ की जबानी डिक्शनरी में दर्ज हो जाती है. फिर वे आपसी संवादों में दोस्तों को फुकरे, फेल होने पर झंड हो गई या बंबू लग गया जैसी भाषा का बेपरवाही से प्रयोग करते हैं. ये सब फिल्मों की फिसलती जबान के साइड इफैक्ट ही तो हैं जो असर बन कर नैक्स्ट जैनरेशन की बातचीत के लहजे पर बदजबानी का लेबल चस्पां कर रहा है.

सालों पहले फिल्म खलनायक के विवादित गीत, ‘चोली के पीछे…’ पर बवाल मचाने वाले अब हनी सिंह के गाने ‘… में दम हो तो बंद करवा लो’ पर कितने मजे के साथ शादी और पार्टी में थिरकते हैं, सब जानते हैं. ‘शूटआउट ऐट वडाला’ में पौर्न स्टार सनी लिओनी पर फिल्माया गया बेहूदा गाना ‘लैला तेरी ले लेगी…’ बदजबानी की सभी हदें लांघ जाता है. सनी पर ही ‘मस्तीजादे’ में इतने अश्लील संवाद व दृश्य रचे गए हैं जिन्हें लिखना मुमकिन नहीं है. यही कहानी ‘क्या कूल हैं हम 3’ की भी है. मानो एडल्ट सर्टिफिकेट के साथ इन्हें किसी भी तरह के भौंडेपन को दिखाने का लाइसैंस मिल जाता है.

कह के लूंगावाले किरदार

अनुराग कश्यप की बहुचर्चित फिल्म ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ के पोस्टर्स पर बोल्ड अक्षरों में ‘तेरी कह के लूंगा’ छापा गया था. इस पर गाना भी बना. इस स्लैंगनुमा वाक्य का असर देखिए कि फिल्म की रिलीज के पहले ही दिल्ली के जनपथ से ले कर लखनऊ और मुंबई के बाजारों में ‘तेरी कह के लूंगा’ लोगो वाली टी शर्ट की जोरदार बिक्री हुई. दोस्तों में ‘तेरी कह के लूंगा’ वाला मजाक शुरू हो गया.

फिल्मकारों के मानसिक दिवालिएपन का नमूना फिल्म ‘ग्रैंड मस्ती’ में दिखा. फिल्म में 3 अभिनेत्रियों के नाम क्रमश: रोज, मेरी और मारलो रखे गए. फिर इन नामों को एकसाथ रोज मेरी मारलो बारबार बोल कर न सिर्फ हंसी का विद्रूप चेहरा दिखा, बल्कि महिलाओं को भी स्लैंग के कीचड़ में घसीटा गया. इसी तरह फिल्म ‘फुकरे’ में एक किरदार का नाम चूचा था. रणबीर कपूर की फिल्म ‘ये जवानी है दीवानी’ में पहाड़ पर चढ़ने के दौरान एक महिला किरदार का संवाद है कि ‘तू पहाड़ चढ़ने आया है या लड़कियां…’ इस बदजबानी से न तो सैंसर को कोई एतराज है और न ही भाषा के तथाकथित ठेकेदारों को.

गालियों की कौमेडी

यशराज बैनर तले बनी फिल्म ‘शुद्ध देसी रोमांस’ में किराए के बराती अरेंज करने वाला एक मारवाड़ी किरदार हर दूसरे सीन में बहन की गाली देसी लहजे में ‘भेंडचो-भेंडचो’ बोल कर जबरन हंसाने की कोशिश करता है. इस बात की परवा किए बगैर कि ये भद्दी गाली सिनेमाघरों व टीवी में महिला व छोटेछोटे बच्चों के कानों में दर्ज हो रही है. ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ में भी गालियां कौमिक अंदाज में दिखीं. एकता कपूर की फिल्म ‘रागिनी एमएमएस 2’ में तो अंगरेजी के एफ अक्षर वाली गाली चिल्लाचिल्ला कर दी गई. कुछ अरसे पहले तक प्रकाश झा की फिल्मों ‘गंगाजल’, ‘अपहरण’ आदि में लोकल जबान का पुट दे कर गाली परोसी जाती थी लेकिन तब फिल्म की थीम सीरियस होती थी और अब कौमिक. एकता कपूर की फिल्म ‘क्या कूल हैं हम 3’ और ‘मस्तीजादे’ पर तो सैंसर को 100 से ज्यादा कट और साउंड बीप लगाने पड़ रहे हैं.

फूहड़ टाइटल्स, हिंगलिश खिचड़ी

फिल्में हिट कराने के कुछ प्रचलित टोटकों में टाइटल को बोल्ड व स्लैंगनुमा बनाना भी शामिल है. एकता कपूर की फिल्म ‘कुकू माथुर की झंड हो गई’ को ही ले लीजिए. दिल्ली के टीनएजर्स के इर्दगिर्द बनी इस फिल्म में किसी का फेल होना, झंड होना बताया गया है. एमटीवी पर भी ‘झंड होगी सब की’ सीरियल प्रसारित हुआ. पहले इस शो का नाम ‘बकरा’ था लेकिन बीते सालों में जब शो की लोकप्रियता धुंधलाने लगी तो इस का नाम ‘झंड होगी सब की’ कर दिया गया. इस शो में सैलिब्रिटी को बेवकूफ बना कर उस के मुंह से कहलवाया जाता है कि मेरी झंड हो गई. ‘कमीने’ में शाहिद कपूर शान से खुद को कमीना कहते हैं. फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ में ‘हर एक फ्रैंड कमीना होता है…’ गाना दोस्ती की कितनी फूहड़ परिभाषा व्यक्त करता है, सोचने वाली बात है. इस तरह फिल्म ‘बंबू’, ‘ओ तेरी’, ‘ले गया सद्दाम’ जैसे टाइटल न सिर्फ भाषा से खिलवाड़ करते हैं बल्कि समाज के एक बडे़ तबके को गंदी बातें बोलना भी सिखाते हैं.

साजिद खान की फिल्म ‘हमशकल्स’ को गौर करें तो हिंदी या उर्दू में हमशक्ल के बहुवचन के लिए कोई अलग शब्द नहीं है. इस पर साजिद खान का बेतुका तर्क है कि फिल्म में 3 हमशक्ल हैं तो वे हमशकल्स हो जाएंगे. टाइटल के प्रति ऐसी लापरवाही कई फिल्मों में दिखाई पड़ी है. शाहिद कपूर की फिल्म ‘फटा पोस्टर निकला हीरो’ में ‘निकला’ को उच्चारण के हिसाब से ‘निखला’ लिखा गया था. टाइगर श्रौफ की फिल्म ‘हीरोपंती’ को ले कर किसी को खयाल नहीं रहा कि सही शब्द हीरोपंथी है. करण जौहर की फिल्म ‘हंसी तो फंसी’ को अंगरेजी में लिखते समय हंसी और फंसी में ‘एन’ लगाने की चिंता नहीं की गई. अंगरेजी अक्षरों का उच्चारण लिखते तो नाम हंसी तो फंसी होता. यह भाषा और जबान के साथ लापरवाही नहीं तो और क्या है. यह एक सांस्कृतिक सवाल है और इसे महज हिंदी के हित की चिंता के भीतर नहीं देखना चाहिए.

स्लैंग ट्रैंड और गुंडा

90 के दशक में मिथुन चक्रवर्ती फिल्मों में लगभग आउट होते जा रहे थे, लिहाजा उन्होंने अपनी तमाम जमापूंजी को ले कर ऊटी में होटल व्यवसाय शुरू किया और वहीं शिफ्ट हो गए. अपने नए बिजनैस को पुश करने के लिए मिथुन ने बी और सी ग्रेड की फिल्में इस शर्त पर स्वीकार कीं कि सारी फिल्म ऊटी में शूट होंगी और फिल्म का कास्ट ऐंड कू्र सिर्फ उन के ही होटल में ठहरेगा. इस तरह वे यूनिट के साथ न सिर्फ फिल्म चंद दिनों में पूरी कर लेते बल्कि उन के होटल भी खूब कमाई करने लगे. इस तरह महीने में मिथुन की 2 से 3 फिल्में रिलीज होतीं और छोटे शहरों में अच्छी कमाई भी करतीं. उस दौर की फिल्मों को मिथुन फैक्ट्री फिल्म कहा गया.

उसी दौर में सी ग्रेड फिल्मों के नामी निर्देशक कांति शाह ने मिथुन को ले कर फिल्म ‘गुंडा’ बनाई. फिल्म में हर किरदार का नाम गालियों जैसा था और संवादों में फूहड़ता कूटकूट कर भरी थी. बलात्कार के दृश्यों को फूहड़ हास्य और अश्लील अंदाज में पेश किया गया. अपने चीप और चीजी कथानक के चलते फिल्म ने आश्चर्यजनक तौर से सफलता हासिल की. इस की आलोचना भी हुई लेकिन इस ने एक कल्ट स्टेटस हासिल कर लिया. आज यूट्यूब पर यूथ इस फिल्म की मजेदार समीक्षा कर रहे हैं.

इन तमाम घटनाक्रमों को बताने का असल मकसद यह बताना है कि तब की बी और सी ग्रेड की फिल्मों के तेवर आज की ए गे्रड फिल्मों में पूरी तरह से नजर आ रहे हैं. कौन सोच सकता था कि आज की फिल्में अश्लीलता और भाषा के खिलवाड़ के मामले में ‘गुंडा’ जैसी फिल्मों को पीछे छोड़ देंगी.

सवाल यह है कि मानसिक दिवालिएपन के कगार पर खड़े फिल्म उद्योग को भाषा, व्याकरण के साथ इस तरह का भद्दा मजाक करने का हक किस ने दिया, समाज के नए तबके और नई पीढ़ी की जबान खराब करने का हक किस ने दिया. मनोरंजन के नाम पर दर्शकों के सामने परोसे जा रहे फूहड़पन के खिलाफ न तो सैंसर बोर्ड अपनी आवाज बुलंद करता है और न ही धर्म व संस्कृति के नाम पर बातबात में हंगामा मचाने वाले लोग आवाज उठा रहे हैं. आखिर कब तक सिनेमा की इस फिसलती जबान के साइड इफैक्ट से बेखबर फिल्मकार बदजबानी, अश्लीलता और भाषा के साथ खिलवाड़ कर कमाई का यह धंधा जारी रखेंगे?     

गजेंद्र चौहान: छात्रों के लिए युद्धिष्ठिर नहीं दुर्योधन

‘‘आ गए सत्संग में हम, संग सत् का हो गया, दुर्गति जाती रही, जब गुरु के मत का हो गया. परम आदरणीय, परम पूजनीय, आसाराम बापूजी को दंडवत् प्रणाम करता हूं…’’ ये शब्द गजेंद्र चौहान ने एक प्रवचन कार्यक्रम के दौरान आसाराम के लिए कहे थे.

गजेंद्र को आसाराम के साथ सभा में नृत्य करते हुए भी देखा गया. वही आसाराम, जो एक नाबालिग लड़की का रेप करने के मामले में जेल में बंद है.

धर्म के प्रचार के लिए गजेंद्र कई प्रकार के अंधविश्वास को गढ़ने वाले चमत्कारी लौकेट का विज्ञापन करते देखे गए. जब भी उन से देश के विकास की बात की गई, तो उन्होंने हमेशा नरेंद्र मोदी को धर्म का रखवाला बताया. उन की वजह से ही देश में कुछ होगा, अन्यथा नहीं, ऐसा वे कहते हैं.

वर्ष 1988 में टैलीविजन धारावाहिक महाभारत में चौहान ने युधिष्ठिर की भूमिका निभाई थी. इस के अलावा उन्होंने कई ऐसी फिल्मों में काम किया जिन्हें सी ग्रेड या ‘सौफ्ट पौर्न’ मूवी कहा जा सकता है. गजेंद्र चौहान की फिल्म और टैलीविजन इंस्टिट्यूट औफ इंडिया, पुणे में नियुक्ति को वहां के छात्र सिरे से नकारते आ रहे हैं. गजेंद्र का इस बारे में कहना है, ‘‘मैं 35 साल से इस क्षेत्र में हूं. जो काम मिला, उसे किया क्योंकि इंडस्ट्री में गौडफादर के बिना काम नहीं मिलता. कला का कोई ग्रेड नहीं होता. छात्रों का विरोध विपक्ष की साजिश है.’’

एफटीआईआई के छात्र उन की नियुक्ति को सत्ताधारी पार्टी द्वारा शक्ति प्रयोग मानते हैं. छात्रों का मानना है कि चौहान किसी भी रूप में उन का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते क्योंकि इस से पहले इस पोस्ट पर ए गोपालकृष्णन, गिरीश कर्नाड, सईद मिर्जा जैसे अनुभवी और प्रतिभाशाली लोगों की नियुक्ति हुई थी. उस लिहाज से गजेंद्र चौहान का ऐक्टिंग कैरियर सी ग्रेड का है.

नियुक्ति के तकरीबन 6 महीने बाद ही अभिनेता और भाजपा सदस्य गजेंद्र चौहान भारतीय फिल्म एवं टैलीविजन संस्थान में चेयरमैन का पदभार संभाल लिया. चौहान की नियुक्ति के विरोध में एफटीआईआई के छात्रों ने पिछले साल 12 जून से ले कर 28 अक्तूबर तक हड़ताल की थी. हड़ताल खत्म होने के बाद छात्रों ने कक्षा में जाना शुरू किया था लेकिन वे आज भी चौहान से संतुष्ट नहीं और आगे भी प्रदर्शन करते रहेंगे. दिल्ली के खामपुर गांव के रहने वाले गजेंद्र ने औल इंडिया मैडिकल साइंस से पैरामैडिकल की पढ़ाई पूरी की. वहीं काम किया. अभिनय के शौक की वजह से वे मुंबई आए और रोशन तनेजा के ऐक्टिंग स्कूल में अभिनय सीखा.

युधिष्ठिर की भूमिका उन के जीवन का टर्निंग पौइंट था, जिस में उन के काम की सराहना की गई. लेकिन बाद में उन्होंने कई बी और सी ग्रेड की फिल्मों में काम किया. अभिनय के साथसाथ उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया. भारतीय जनता पार्टी के साथ उन का नाम हमेशा जुड़ा रहा. उन का कहना है कि मैं ने कला में राजनीति से अधिक समय बिताया है. ऐसे में मुझे एक मौका एफटीआईआई में काम करने का मिलना चाहिए.

अभिनेता ऋषि कपूर छात्रों का समर्थन करते हैं. उन के हिसाब से छात्र अगर गजेंद्र को नहीं चाहते तो उन्हें उस पद से त्यागपत्र दे देना चाहिए. भाजपा समर्थक अनुपम खेर का भी कहना है कि गजेंद्र पढ़ेलिखे हैं लेकिन इस पद के लिए सिनेमा की अच्छी जानकारी रखने वाला व्यक्ति चाहिए. जो निसंदेह गजेंद्र में नहीं है. इस के अलावा रजनीकांत, अमिताभ बच्चन, श्याम बेनेगल, दिबाकर बैनर्जी आदि सभी ने अनुपम खेर के मत का ही समर्थन किया.

अगर चौहान के फिल्मी ग्राफ पर नजर डाली जाए तो पहली फिल्म ‘जंगल लव’ थी जिस में उन की भूमिका बहुत छोटी थी. ‘खुली खिड़की’ जैसा नाम से स्पष्ट है. ‘मर्डर मिस्ट्री’ में कई पात्रों के बीच गजेंद्र पर भी संदेह किया जाता है. गजेंद्र की फिल्मों की सूची अगर देखें तो निर्देशक ने उन्हें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने लायक समझा ही नहीं. इस बारे में गजेंद्र का कहना है, ‘‘बड़ी फिल्मों में महत्त्वपूर्ण भूमिका केवल गौडफादर होने से मिलती है. इस का अर्थ यह नहीं है कि मैं अभिनय नहीं कर सकता. अभी भी मैं टीवी पर ‘अधूरी कहानी हमारी’ में पिता की भूमिका निभा रहा हूं.’’

गजेंद्र चौहान ने काफी जद्दोजहद के बीच एफटीआईआई के अध्यक्ष का पद संभाला है. आंदोलनकारी छात्रों ने ‘गजेंद्र गोबैक’ के नारे लगाए. चौहान ने आंदोलन को ले कर कहा, ‘‘इस से सब से अधिक नुकसान छात्रों का हो रहा है. उन का शैक्षणिक सत्र खराब हो चुका है. यहां प्रवेश पाना बहुत कठिन होता है. पूरे भारत से चुन कर हर विषय में केवल 10 छात्र ही प्रवेश पाते हैं. ऐसे में उन की शिक्षा ठीक से न हो पाना दुखदायी है. मैं सकारात्मक सोच के साथ छात्रों की समस्याओं को निबटाना चाहता हूं. सरकार ने जिम्मेदारी दी है, उसे पूरा करने के लिए यहां पर हूं.’’ सरकार द्वारा किसी और को चेयरमैन बनाए जाने के सवाल पर उन का कहना था कि यह सरकार के ऊपर है कि वह किस का चुनाव करती है. ‘‘मैं काम पर विश्वास करता हूं. अगर मुझे मौका मिला है तो कर के दिखाऊंगा.’’ प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ उन का कहना है कि कानून अपना काम करेगा पर अगर वे मुझ से संपर्क करेंगे तो मैं अवश्य, जितना संभव होगा, सहायता करूंगा.

पुलिसिया कार्यवाही के बीच गजेंद्र चौहान ने एफटीआईआई में प्रवेश तो पा लिया है, अब देखना है कि आगे वे किस तरह से छात्रों के बीच अपनी साख जमाते हैं. विचारों का भगवाकरण जो नरेंद्र मोदी के साथ शुरू हुआ है, कहां तक जाएगा, इस पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता. सिनेमा जैसी विधा पर पहले ही धर्म की मुहर लग जाए तो फिल्मों का नाश जरूर होगा. चाहे हिंदू धर्म का उद्धार हो या न हो

प्रतिक्रिया

उम्र के 45 साल भी पूरे नहीं हुए कि मैं ब्लडप्रैशर, शुगर की दयादृष्टि का पात्र बन गया. लाख काबू पाने की कोशिश करता हूं मगर ब्याहता बीवी की तरह ये मेरा साथ छोड़ने को तैयार ही नहीं. उस पर लोगों की नसीहतें और परहेज, डाक्टर की दवाएं, इन सब ने मिल कर मुझे ज्यादा बीमार बना दिया.

पत्नी एक आदर्श ब्याहता का फर्ज निभाती, उन सब नसीहतों का पालन करती, बल्कि मुझ से जबरन पालन करवाती. करेले का जूस, करेले की सब्जी, सोयाबीन, इन सब को झेलझेल कर मेरी खानेपीने की इच्छाशक्ति ही लुप्त हो रही थी, इस पर मेरे वजन को ले कर डाक्टर ने मुझे घूमनेफिरने की हिदायत दे डाली. चैन की नींद जो आज तक नसीब होती थी, उस के भी अब लुप्त होने की आशंका थी.

‘‘अरे-रे…अब तो बख्शो मुझ गरीब को,’’ मैं विचारों में खोया था कि देखा पत्नी फिर से नाश्ते में करेले की सब्जी, मेथी की रोटी मेरे सामने ले आई.

‘‘क्यों जी, क्या बुराई है इन सब में? क्या पकड़े ही रखोगे मेरी इन सौतनों को,’’ वह दवा की शीशी हाथ में नचाते हुए बोली.

तभी मेरा बेटा जिम में पसीना बहा कर मेरे कमरे में आया. मां के सुर में सुर मिलाने की कमी थी शायद.

‘‘डैडी, मम्मी ठीक कहती हैं, मेरे दोस्तों के फादर आप से भी ज्यादा उम्र के हैं, मगर फिटनैस के मामले में जवानों को भी पछाड़ते हैं.’’

‘‘बेटा, तू कल से जिम छोड़, अपने डैडी को मौर्निंग वाक पर ले जाया कर. वैसे भी डाक्टर बता रहे थे कि सुबहशाम की सैर इन के लिए अच्छी है,’’ पत्नी ने अपनी शुभ राय अपने होनहार बेटे को देते हुए कहा.

अगले दिन से यह अभियान भी शुरू हो गया. मेरा श्रवण बेटा, जो सिर्फ मां का ही आज्ञाकारी था, पिता की आज्ञा का पालन जो कभीकभी, वह भी जेब ठंडी होने पर ही करता था, मुझे 5 बजे उठा कर पास के ही गार्डन में ले गया. 2-4 दिन की जद्दोजहद के बाद मुझे इस आदत को अपनाना पड़ा.

उस दिन मेरे श्रवण बेटे को दूसरे शहर जाना पड़ा. इसलिए, पत्नी ने मुझे उठाया और आनाकानी करने पर दरवाजे से बाहर धकेल दिया. अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. मरता क्या न करता, जाना पड़ा. मगर सुबह की ठंडी हवा बैंच पर बैठते ही मुझ पर हावी हो गई और मन में एक झपकी और लेने की सोची. वैसे भी आज मेरे साथ कोई रोकनेटोकने वाला नहीं था. मगर तभी एक मधुर आवाज मेरे कानों में पड़ी.

‘‘हैलो अंकल,’’ नजर उठाई तो देखा 20-21 वर्ष की सुंदर सी बाला जौगिंग सूट में मुझ से ही मुखातिब थी.

‘‘हैलो…’’ मैं झेंप मिटाते हुए इधरउधर देखते हुए बोला. इस से पहले मैं ने उसे यहां नहीं देखा था या फिर वह मुझे नजर ही नहीं आई थी.

‘‘कमऔन अंकल,’’ वह हाथ का इशारा करते हुए आगे बढ़ गई और साथ ही मुझे मुड़मुड़ कर देखती रही, उठने का इशारा करती रही. मैं शर्म से पानीपानी हो रहा था. आलस्य ने आज मेरी चुगली कर दी थी. मैं झेंप मिटाने के लिए वहीं खड़ा बंदर की तरह उछलकूद करता रहा. आगे बढ़ने की हिम्मत जुटा ही न सका.

अगले दिन फिर वही रुटीन, वह मुझे आज भी वहीं मिली. दौड़तेदौड़ते वह मेरे पास आ कर रुक गई.

‘‘हाय अंकल,’’ वह मेरे साथसाथ तेज कदमों से चलती हुई बोली. साथ ही बातों का सिलसिला भी चलता रहा. मगर मुझे उस का बारबार अंकल कहना अखरता रहा.

‘‘बाय द वे, मुझे रजत शर्मा कहते हैं,’’ मैं ने उस की बात बीच में काटते हुए कहा, ‘‘आप चाहें तो मुझे रजत या फिर शर्माजी कह सकती हैं.’’

वह मेरी इस बात पर मुसकराई. अगले दिन मैं अपने बेटे से पहले ही उठ कर तैयार हो गया. शाम को मैं ने बालों को डाई किया था. अपनेआप को बारबार आईने में देखा. अपनी छोटीछोटी कमियों को दूर किया. जैसे, मूंछ में सफेद 2-4 बाल न दिखें और ऐसी ही छोटीछोटी कई कमियां. अब तो रोज सुबह होने का इंतजार रहता है. मैं और खुशी अच्छे दोस्त बन रहे थे. पत्नी और बेटा मेरे इस व्यवहार से कुछ संदिग्ध तो थे, मगर खुश थे. 1 महीने में ही मेरा पेट दिखना बंद हो गया था और शरीर में नई जान आ गई थी. शुगर और बीपी भी नौर्मल हो गए थे.

उस दिन मेरे बेटे का जन्मदिन था. उस के सभी दोस्त आ गए थे. मैं ने भी सोचा कि बेटे को मुंहतोड़ जवाब दूं. उसे और उस की मां को खुशी से मिलवाऊं. उस दिन बड़े जोरशोर से औरों की फिटनैस का बखान कर रहे थे. उन्हें भी तो पता चले मेरी ‘मार्केट वैल्यू’ और उस समय उन की प्रतिक्रिया देख कर मैं भी खुश होना चाहता था. मगर खुशी उस दिन सुबह गार्डन में दिखी ही नहीं. उस का फोन नंबर लेने के बारे में कभी सोचा ही नहीं था. मगर आज यह बात मुझे अपनी बेवकूफी लगी. मन उदासी से भर गया. आफिस में भी काम में मन नहीं लगा. शाम को सभी पार्टी की तैयारी में व्यस्त थे तभी ‘हैलो शर्माजी’ सुन कर मैं पीछे पलटा. सामने खुशी मुसकरा रही थी. तभी मेरा बेटा खुशी के पीछे आ खड़ा हुआ. डैड, यह है खुशी, माय फ्रैंड और दोनों ही एकदूसरे की ओर देख मुसकरा दिए. अब मेरी प्रतिक्रिया देखने लायक थी

उस का सच

उस के बारे में सुन कर धक्का तो लगा, किंतु आश्चर्य नहीं हुआ. कोसता रहा खुद को कि क्यों नहीं लिया गंभीरता से उस की बातों को मैं ने?

बीता वक्त धीरेधीरे मनमस्तिष्क पर उभरने लगा था…

लगभग 6 दशक से अधिक की पहचान थी उस से. पहली कक्षा से पढ़ते रहे थे साथसाथ. दावे से कह सकता हूं कि उस के दांत साफ करने से ले कर रात को गरम प्याला दूध पीने की आदत से परिचित था. उस की सोच, उस के सपने, उस के मुख से निकलने वाला अगला शब्द तक बता सकता था मैं.

पिछली कई मुलाकातों से ऐसा लगा, शायद मैं उसे उतना नहीं जानता था जितना सोचता था. हम दोनों ने एक कालेज से इंजीनियरिंग की. समय ने दोनों को न्यूयौर्क में ला पटका. धीरेधीरे मकान भी दोनों ने न्यूयौर्क के क्वींज इलाके में ले लिए. रिटायर होने के बाद धर्मवीर 10-12 मील दूर लौंग आईलैंड के इलाके में चला गया. तब से कुछ आयु की सीमाओं और कुछ फासले के कारण हमारा मिलनाजुलना कम होता गया.

पिछले 2 वर्षों में जब भी वह मुझ से मिला, उस में पहले जैसी ऊर्जा न थी. चेहरा उस का बुझाबुझा, बासे सलाद के पत्तों की तरह. उस की आंखों में जगमगाते दीये के स्थान पर बिन तेल के बुझती बाती सी दिखाई दी, जैसे जीने की ललक ही खो दी हो. उसे जतलाने की हिम्मत नहीं पड़ी. किंतु मैं बहुत चिंतित था.

एक दिन मैं ने उस के यहां अचानक जा धमकने की सोची. घंटी बजाई, दरवाजा पूरा खोलने से पहले ही उस ने दरवाजा मेरे मुंह पर दे मारा. मैं ने अड़ंगी डालते कहा, ‘अरे यार, क्या बदतमीजी है. रिवर्स गियर में जा रहे हो क्या? लोग तो अंदर बुलाते हैं. गले मिल कर स्वागत करते हैं. चायपानी पिलाते हैं और तुम एकदम विपरीत. सठियाये अमेरिकी बन गए लगते हो. अपना चैकअप करवाओ. ये लक्षण ठीक नहीं. देख, अभी शिकायत करता हूं,’ इतना कह कर मैं ‘भाभीभाभी’ चिल्लाने लगा.

‘क्यों बेकार में चिल्ला रहा है, तेरी भाभी घर पर नहीं है.’

‘चलो मजाक छोड़ता हूं. यह बताओ, हवाइयां क्यों उड़ी हैं? चेहरा देखा है आईने में? ऐसे दिखते हो जैसे अभीअभी तुम ने कोई डरावना सपना देख लिया हो. तुम्हारा ऐसा व्यवहार? समझ से बाहर है.’

‘बस, यार. शर्मिंदा मत करो.’

‘ठीक है. उगल डालो जल्दी से जो मन में है वरना बदहजमी हो जाएगी.’

‘कोई बात हो तो बताऊं?’ इतना कहते ही उस की आंखें भर आईं.

‘धर्मवीर, कभी ध्यान से देखा है खुद को, कितना दुबला हो गया है?’

‘दुबला नहीं, कमजोर कहो, कमजोर? कमजोर हो गया हूं.’

‘यार, कमजोर तो तू कभी नहीं था.’

‘अब हो गया हूं. कायर, गीदड़ बन गया हूं.’

‘किसी चक्करवक्कर में तो नहीं पड़ गया?’ मैं ने मजाक में कहा.

‘दिमाग तो ठीक है तेरा? तू भी वही धुन गुनगुनाने लगा. आजकल तो यह हाल है, झूठ और सच की परिभाषाएं बदल चुकी हैं. अज्ञानी ज्ञान सिखा रहा है. कौवा राग सुना रहा है. झूठों का बोलबाला है. कुकर्म खुद करते हैं, उंगली शरीफों पर उठाते हैं. तू तो जानता है, मेरा जमीर, मेरे कर्तव्य, मेरे उसूल कितने प्रिय हैं मुझे,’ इतना कहते ही उस के चेहरे पर उदासी छा गई.

‘हां, अगर ऐसी बात है तो चल, कहीं बाहर चल कर बात करते हैं.’

धर्मवीर ने पत्नी के नाम एक नोट लिखा, चाबी जेब में डाली और दोनों बाहर चल पड़े. सर्दी का मौसम शुरू हो चुका था. न्यूयौर्क की सड़कों पर कहींकहीं बर्फ के टुकड़े दिखाई दे रहे थे. सर्द हवाएं चल रही थीं. दोनों कौफीहाउस में जा कर बैठ गए और 2 कौफी मंगवाईं.

‘धर्मवीर, अब बताओ तुम ने दरवाजा क्यों बंद किया?’

‘हरि मित्तर, बात ही कुछ ऐसी है, न तो तुम्हें समझा सकूंगा और न ही तुम समझ पाओगे. तुम्हारे आने से पहले ‘वह’ आई थी. उस की झलक पाते ही बर्फ सा जम गया था मैं. बस, दे मारा दरवाजा उस के मुंह पर. ऐसी बेरुखी? इतनी बदतमीजी? क्यों की मैं ने? यह मेरी सोच से भी बाहर है. शर्मिंदा हूं अपनी इस हरकत पर, कभी माफ नहीं कर सकूंगा स्वयं को?

‘छीछीछी, नफरत हो रही है खुद से? सोचता हूं अगर मैं उस की जगह होता तो मुझे कैसा लगता? उस क्षण बुद्धि इतनी भ्रष्ट हो गई थी कि पूछा तक नहीं कि क्या काम है? क्या चाहिए? क्यों आई हो? हो सकता है पत्नी से कोई जरूरी काम हो? जीवन के इस पड़ाव में इतनी गुस्ताखी? क्या उम्र के साथसाथ नादानियां भी बढ़ती जाती हैं? सोच की शक्ति कम हो जाती है क्या? यह दोष बुढ़ापे पर भी नहीं मढ़ सकता. शेष इंद्रियां तो अक्षत (सहीसलामत) हैं. शायद भीरु हो गया हूं. चूहा बन गया हूं. बदतमीजी एक नहीं, दो बार हुई थी. 2 मिनट बाद ‘वह’ फिर अपनी सहेली को साथ ले कर आई. हाथ में कुछ किताबें थीं. लगता था सहेली कार में बैठी थी. मैं ने फिर वही किया. दरवाजा पूरा खोलने से पहले ही उस के मुंह पर दे मारा. बचपन से सीखा है अतिथियों का सम्मान करना. अभी बड़बड़ा ही रहा था कि फिर घंटी बजी. मैं दरवाजे तक गया. दुविधा में था. हाथ कुंडी तक गया, दरवाजा खोलते ही बंद करने ही वाला था कि तुम ने अड़ंगी डाल दी.’

‘यार यह ‘वह’ ‘वह’ ही करता रहेगा या कुछ बताएगा भी कि यह ‘वह’ शै है क्या?’

‘छोड़ यार, बेवजह किसी औरत का नाम लेना मैं ठीक नहीं समझता. जब हम क्वींज छोड़ कर लौंग आइलैंड में आए, सभी पड़ोसियों ने धीरेधीरे ‘कुकीज’ आदि से अपनाअपना परिचय दिया. उन में एक पड़ोसन ‘वह’ भी थी. थोड़े ही समय में उस का सरल निश्छल व्यवहार देख कर तुम्हारी भाभी की उस से दोस्ती हो गई. उन पतिपत्नी का हमारे यहां आनाजाना शुरू हो गया. निशा से यह बरदाश्त नहीं हुआ.’

‘यह निशा कौन है?’

‘दरअसल तुम्हारी भाभी की बचपन की सहेली है. उसी के कारण हम लौंग आइलैंड आए थे. जिस का बूटा सा कद, कसरत करने वाले गेंद की गोलाई सा शरीर और अल्पबुद्धि एवं उद्देश्य, सब के ध्यान का केंद्र बने रहना. जैसे सोने पे सुहागा. रानी मधुमक्खी निशा कैसे बरदाश्त कर सकती थी अपने राज्य क्षेत्र में किसी और का आगमन? उसे अपने क्षेत्र में खतरा लगने लगा. उस ने तुम्हारी भाभी के मस्तिष्क में शंकारूपी विष के डंक मारने शुरू कर दिए. वह विष इतना फैला कि नासूर बन गया.’

‘धर्मवीर, एक मिनट, फोन आ रहा है,’ कह कर मैं फोन सुनने लगा :

‘हां, बोलो मेमसाहब?’

‘जी, कहां रह गए. शाम को विवेक साहब के पास जाना है.’

‘ठीक है, तुम तैयार रहना. मैं 1 घंटे में पहुंच जाऊंगा.’ कह कर मैं फिर से मित्र से मुखातिब हुआ- ‘धर्मवीर, जाना पड़ेगा, हाईकमान का आदेश हुआ है. यह मोबाइल फोन भी जासूस से कम नहीं.’

‘सुनो, भाभी से जिक्र मत करना. तुम्हें तो पता है, औरतें ही सदा हमदर्दी का पात्र बनती हैं. हर तरफ औरतों की ताड़नाओं, अत्याचारों के चर्चे होते रहते हैं. ऐसी बात नहीं कि पुरुष औरतों के अत्याचारों के शिकार नहीं होते. जबान के खंजर पड़ते रहते हैं उन पर और वे चुप्पी साधे हृदय की व्यथा लिए अंधेरों में विलीन हो जाते हैं. न ही कोई उन्हें सुनता है और न ही विश्वास करता है.’

‘धर्मवीर, चिंता मत करो, समय के साथ सब ठीक हो जाएगा. स्थिति को सुधारने की कोशिश करते रहो. चलता हूं, जल्दी मिलेंगे.’

हरि मित्तर से मिल कर धर्मवीर का मन थोड़ा हलका हुआ. घर की दहलीज पार करते ही धर्मवीर की पत्नी ने प्रश्नों की बौछार कर दी.

‘कहां गए थे? बोलते क्यों नहीं? उसी से मिलने गए होगे? शर्म नहीं आती इस उम्र में? पता नहीं क्या जादू कर दिया है उस नामुराद कलमुंही ने?’

‘देखो विमला, तुम चाहती हो तो मैं फिर बाहर चला जाता हूं. तुम्हें जो कहना है, कहो. किसी और को बीच में घसीटने की कोई आवश्यकता नहीं,’ इतना कह कर मैं अपने कमरे में चला गया.

हरि मित्तर से मिले केवल 3 दिन ही हुए थे. धर्मवीर का मन हरि से बातें करने को बेचैन था. उस ने हरि को फोन किया. वह घर पर नहीं था. धर्मवीर ने संदेश छोड़ दिया.

शाम को फोन की घंटी बजी.

‘हां, बोलो हरि?’

‘धर्म, कल क्या कर रहे हो? चलना है कहीं?’

‘कल? कल नहीं, परसों ठीक रहेगा, तुम्हारी भाभी कहीं बाहर जाने वाली है.’

‘ठीक है, परसों जैक्सन हाइट में, वह ‘पायल’ वाला डोसे बहुत अच्छे बनाता है. वहीं मिलेंगे 12 बजे.’

डोसा खातेखाते हरि ने पूछा, ‘धर्मवीर, घर पर हालात कुछ सुधरे या नहीं?’

‘नहीं यार, क्या बताऊं. तुम्हारी भाभी को शंका का घुन लग गया है. उस की सोच अपाहिज हो गई है जो मेरे घर को बरबाद कर के ही रहेगी. निशा अपना काम करती जा रही है.’

‘लगभग 5 दशक दिए हैं इस घर और पत्नी को. शिकायत का कभी अवसर नहीं दिया. अब वही घर जेल लगता है. जहां अब सांस भी आजादी से नहीं ले सकता. अपनी इच्छानुसार वस्तु यहां से वहां नहीं टिका सकता. किसी से खुल कर बात नहीं कर सकता. जहां वर्षों की वफादारी पर विश्वास न कर के, खोखले, ओछे लोगों की बातें पत्थर की लकीर मानी जाती हैं. अब तो उन की ताड़ना के दायरे केवल हम दोनों के बीच ही नहीं रहे, बल्कि सामाजिक स्थलों में, परिचित लोगों के बीच हमें लताड़ना उन का मनोरंजन बन गया है. अब तुम्हीं बताओ, क्या साझेदारी इसे कहते हैं? क्या यही सुखी जीवन है? हरि, तुम भी तो शादीशुदा हो?’

‘धर्मवीर, भाभी तो बहुत पढ़ीलिखी और समझदार हैं, फिर इतनी असुरक्षित भावनाएं क्यों?’

‘हां, सो तो है, किंतु सोच सिमट गई है. क्या फायदा ऐसी पढ़ाई का, जिस की रोशनी में जीवन का रास्ता साफसाफ नजर आने के बावजूद आदमी उस पर चल न सके. घूमफिर कर शक की आग में खुद और दूसरों को भस्म करने की ठान ले.’

‘विश्वास नहीं होता. आज तक जब भी कहीं आदर्श दंपती का संदर्भ आता है, वहां तुम दोनों का उदाहरण दिया जाता है. स्थिति नाजुक है, बहुत समझदारी से काम लेना होगा. इतने वर्षों की साधना को हाथों से फिसलने मत देना. प्यार से समझाने का प्रयत्न करो.’

‘समझाऊं? किसे समझाऊं? जो सुनने को तैयार नहीं? जिस के लिए अर्थों की सारी ऊहापोह अब बासी हो गई है. स्थिति अब यह है कि मैं मुंह तक आए शब्द निगलने लगा हूं. किस के पक्ष में हथियार डालूं? सचाई के या उस झूठ के, जो मेरे घर में अशांति पैदा कर रहे हैं? सखी निशा का तो यह हाल है, अंगूर नहीं मिले तो खट्टे हैं. निशा की उकसाने की खुराकें तुम्हारी भाभी के चित्र पर पत्थर की लकीरें बन गई हैं, जैसे परमानैंट मार्कर से लिखी हों. निशा की बातों को ले कर उन के मन और मस्तिष्क को कुंठा की धुंध घेरने लगती है. उसी धुंध में झूठ का पल्ला भारी हो जाता है और सच दब जाता है. तुम तो जानते हो, झूठ से हमें कोई हमदर्दी नहीं.’

‘परेशान तो भाभी भी होंगी? पूछो उन से कि ऐसा उन्होंने क्या देखा, या तुम ने क्या किया? हर पल तो उन्हीं के पास बैठे रहते हो?’

‘जरूर होती होगी. कुछ देखा हो तो बताएं. कभीकभी तो अचानक उस के भीतर तूफानी तूफान करवटें ले बैठता है. तब वह जहान भर का अनापशनाप बोलने लगती है. कहीं का सिर, कहीं का धड़, मनगढ़ंत किस्से-लोग बातें करते हैं, तुम्हारी छवि खराब होती है, वगैरावगैरा. बस, मुंह खोलते ही चुभते कटाक्ष, काल्पनिक गंभीर इल्जाम मुझ पर थोपने आरंभ कर देती है. उस समय उस की बातों के गुलाब कम और कांटे अधिक मेरे दिल पर खरोंचें छोड़ जाते हैं.

‘मैं एक बार फिर चुप्पी साध लेता हूं. फिर कभी पास आ कर बैठ जाती है. कभी आधी रात को मेरे कमरे में आ कर पूछती है, आप ने बात करना क्यों छोड़ दिया? मुझे अच्छा तो नहीं लगता. पर बात भी क्या करूं, उन्हें मेरे शब्दों की अपेक्षा ही कहां है?  हजार बार कह चुका हूं, विमला, तुम्हारे सिवा कभी किसी को नहीं चाहा. मैं रिश्तों की अहमियत जानता हूं. पूरा जीवन तुम्हें दिया है. अब बचा ही क्या है मेरे पास?

‘कहती है, झूठ बोलते हो. अब तो वही है तुम्हारी सबकुछ? बदनाम कर देगी, तुम्हें? इस्तेमाल कर के छोड़ देगी तुम्हें? तुम नहीं जानते…आदमखोर है आदमखोर.

‘उस दिन मैं ने भी कह दिया, विमला, यह सबकुछ कहने की आवश्यकता नहीं. कैनवास तुम्हारे पास है. रंग तुम्हारे दिमाग में. जैसी चाहो तसवीर बना लो.

‘मैं गुस्से से बड़बड़ाता बाहर चला गया. हरि मित्तर, तुम्हीं बताओ, 70 से ऊपर आयु हो गई है. वैसे भी वर्षों से अलगअलग कमरों में बिस्तर हैं. क्या शोभा देती हैं ऐसी बातें? इस उम्र में अश्लील वाहियात तोहमतें सहता हूं. मेरी पत्नी होते हुए क्या वह नहीं जानती मेरी क्षमता? ऐसी घिनौनी बातें मुझे अंधेरी सुरंग में धकेल देती हैं.’

‘यार, स्थिति गंभीर है. तुम दोनों कहीं छुट्टियों पर क्यों नहीं चले जाते. बच्चों के पास चले जाओ…इस वातावरण से दूर.’

‘सभी उपाय आजमा चुका हूं. मेरे साथ कहीं चलने को तैयार ही नहीं होती. जबर्दस्ती तो कर नहीं सकता. एक आत्मनिर्भर स्वतंत्र अमेरिकी भारतीय नारी है. कुछ पूछते ही बौखला सी जाती है. मेरी हर बात, हर हावभाव, मेरे हर काम में मुझे अपमानित करने के लक्षण ढूंढ़ती रहती है.

‘आजकल तो यह अपने गुप्त समाचार विभाग की बिल्लियों के बहुत गुणगान करती रहती है. वह भूल जाती है कि मैं एक लंबे काल से उस के दुखसुख का साथी, जिसे मक्कार, झूठा, बेईमान, बदमाश, चोर, निर्लज्ज घोषित कर दिया गया है. जैसेजैसे उस के कटाक्ष लंबे होते जाते हैं, मेरे दुख बढ़ते जाते हैं. रही बात बच्चों की, तुम्हीं बताओ, भारतीय अमेरिकी बहुओं के घर भला कितने दिन जा कर रहा जा सकता है?’

‘धर्मवीर, मुझे तुम्हारी चिंता होने लगी है. बस, यही कह सकता हूं कि वार्त्तालाप का रास्ता खुला रहना जरूरी है.’

‘हरि मित्तर, कोशिश तो बहुत करता हूं. पर जब परिचित लोगों के सामने मेरी धज्जियां उड़ाई जाती हैं, लांछन लगाए जाते हैं तब मैं बौखला जाता हूं. बोलता हूं तो मुसीबत, नहीं बोलता तो मुसीबत. इस उम्र में इतना तोड़ डालेगी, वजूद इतना चकनाचूर कर डालेगी, कभी सोचा न था. जब स्थिति की जटिलता बेकाबू होने लगती है, मैं उठ कर बाहर चला जाता हूं या किताबों को उथलपुथल करने लगता हूं. तब दोनों अपनेअपने कोकून में बंद रहने लगते हैं, मानो एकदूसरे को रख कर भूल गए हों. साथ ही तो रह जाता है केवल? दिन बड़ी मुश्किल से गुजरते हैं. जैसे छाती पर कोई पत्थर रखा हो और रातें, जैसे कभी न होने वाली सुबह. कामना करता हूं, इस से अच्छा तो बाहर सड़क पर किसी खूंटी पर टंगा होता. थोड़ा जीवित, थोड़ा मृत. फिर सोचता हूं कहीं दूर भाग जाऊं जहां कम से कम ये लंबे दिनरात कलेजे पर अपना वजन महसूस करते तो नहीं गुजरेंगे. पूरे घर की हवा में उदासी छितरी रहती है. तब एहसास होता है, शायद यह उदासी मेरे मरते दम तक हवा में ही ठहरी रहेगी. तू भली प्रकार से जानताहै कि मेरे भीतर एक कैदखाना है. कैसे भाग सकता हूं यथार्थ से.

‘रही बात से बात कायम रखने की? जरूरत उस की है, मात्र उस की. इन लंबेलंबे दिनों और काली रातों के अटूट मौन में आवाज बनाए रखने की गरज भी उस की है, मात्र उस की. मेरी भावनाओं को कुचल कर चीथड़ेचीथड़े कर दिए हैं उस ने. गरीब हो गया हूं भावनाओं से. सरकतेरपटते रहते हैं मेरे शब्द, बेअसर, सपाट. तुम्हारी भाभी की चेतना सुनती नहीं, मस्तिष्क सोकता नहीं.’

हरि मित्तर ने घड़ी देखते हुए कहा, ‘धर्मवीर, बहुत देर हो गई है. मौसम भी खराब होता जा रहा है. अब चलते हैं. जल्दी ही मिलेंगे.’

धर्मवीर आज सबकुछ उगलने को तैयार था. धर्मवीर की बातें सुन कर हरि का मन भारी हो गया. उसे इस समस्या का कोई हल दिखाई नहीं दे रहा था कि वह कैसे धर्मवीर की सहायता करे.

धर्म को लगा जैसे कोई तो है, जो उसे समझता है. फोन की प्रतीक्षा करतेकरते धर्म ने 4 दिन बाद हरि को फोन किया, ‘हैलो हरि, कैसे हो?’

‘ठीक हूं, और तुम?’

कुछ ही देर में धर्म हरि के द्वार पर था.

‘धर्मवीर, आज तुम मेरे यहां आ जाओ. तुम्हारी भाभी अपने भाई के यहां गई है.’

‘चाय बनाओ, आता हूं.’

‘अंदर आओ धर्म, बैठो. आज मैं तुम्हें अपने इलैक्ट्रौनिक खिलौने दिखाता हूं. यह है मेरा आईपौड और यह ‘वी’ इस में अलगअलग खेल हैं. 4 लोग एकसाथ खेल सकते हैं. जब कुछ करने को नहीं मिलता, हम बूढ़ाबूढ़ी खेलते रहते हैं. या फिर ताश. चलो, एक गेम तुम्हारे साथ हो जाए. ध्यान भी दूसरी ओर जाएगा और समय का भी सदुपयोग हो जाएगा.’

‘नहीं यार, यह मुमकिन नहीं. मुझे समय व्यतीत करने की कोई समस्या नहीं. चलो, अगलीपिछली बातें करते हैं.’

‘धर्मवीर, अभी तक मैं यह समझ नहीं पाया कि तुम इतना कुछ अकेले क्यों सहते रहे? एक बार जिक्र तो किया होता?’

‘चाहता तो था किंतु कब एक शून्य मेरे चारों ओर भरता गया, पता ही नहीं चला. कोई ऐसा दिखाई भी नहीं दिया जिस से ऐसी व्यक्तिगत बात कर सकता, जो मेरे भयावह शून्य को समझता और मेरी बरबादी का कहानी पर विश्वास करता. 2 बार आत्महत्या का प्रयत्न भी किया. मुझे लगा, मुक्ति का रास्ता यही है. जानते हुए भी कि सब अलगअलग अपनीअपनी सूली पर चढ़ते हैं. कोई किसी के काम नहीं आता. किसी का दुख नहीं बांटता. केवल मुंह हिला देते हैं या तमाशा देखते हैं.’

‘धर्मवीर, मेरी तो सोच भी जवाब दे चुकी है. तुम किसी करीब के रिश्तेदार से बात कर के तो देखो या काउंसलिंग की मदद ले कर देखो. घर के वातावरण को सामान्य रखने का प्रयत्न करो. शायद कोई परिवर्तन आ जाए.’

‘हरि, यह भी सुन लो, एक दिन घर पर बहुत मेहमान आने वाले थे. सुबह से तुम्हारी भाभी अपने विरोधी भावों की धूपछांव में अपना कर्तव्य निभाती रही. दिन अच्छी तरह से बीता. शाम की चाय के समय किसी ने पूछ लिया कि तुम्हारी ‘उस’ सहेली का क्या हाल है?

‘‘उस’ शब्द सुनते ही मेरी पत्नी की उनींदी सी सुस्ती एकदम तन गई. उस का कभी न रुकने वाला राग शुरू हो गया. सभी मेहमानों के सामने उस ने मुझ पर अनेक लांछन लगा कर मेरे चरित्र की धज्जियां उड़ा दीं. एक ही झटके में मुझे घर छोड़ने को कहा. सामने बैठे मेरी जिह्वा तालू से चिपकने लगी. एक मौन जमने लगा. मैं चुप. सब चुप. खामोशी का एक पहाड़ और भीतर की उदासी मुझे चुभने लगी. मुझे लगा, शायद यह मौन सदा के लिए हमारे साथ बैठ जाएगा. मैं ने गहरी पीडि़त सांसें लीं. रुदन की अतिशयता से मेरा शरीर कांपने लगा. मैं पसीने से तर हो गया.

‘मेरे सीने में एक बेचैनी सी घर कर गई. अपनी खुद्दारी को इतना घायल कभी नहीं पाया. उस की बातों से ऐसा लगा, मानो अपराधबोध की छोटी सी सूई मन के अथाह सागर में डाल दी गई हो, जो तल में बैठ कर अपना काम करने लगी. उस ने भीतर से मुझे अस्थिर कर दिया. वह लगातार कहर ढाती शब्दावली का बोझ डालती रही. मैं अपने ही घर में कठघरे में खड़ा रहा जिस का प्रभाव मेरे रोजमर्रा के जीवन पर पड़ने लगा.’

‘धर्म, अगर तुम कहो तो मैं भाभी से बात कर के देखूं?’

‘ना-ना, जब से विमला को पता लगा कि हम दोनों हर हफ्ते मिलते हैं, उस ने तुम्हें दलाल के खिताब से सुशोभित कर दिया है. अब अपनी ही नियति में अकेला निशब्द सब सहता जा रहा हूं. मेरे उसूलों की गड्डमड्ड. उस दिन मेहमानों के सामने उस की निर्लज्जता का रूप देख कर मैं सकते में आ गया. वह रूप मेरे मन पर चिपका रहा. मैं चूरचूर हो गया. उसे मेरे टुकड़े भी पसंद नहीं थे. पर टुकड़े तो उसी ने किए थे. उस ने ही मेरे उसूलों को अस्वीकारा और मुझे 2 टुकड़ों में बांट दिया. मैं सफाई के बोझ से दबा पड़ा हूं. न जाने कौन सा मेरा हिस्सा हृदय रोग के हमले के बाद मर जाने वाले हृदयकोष्ट की तरह ठंडा हो गया.’

वह हमारी आखिरी मुलाकात थी. इस के बाद मुझे उस से मिलने का अवसर ही नहीं मिला.

काश उस से मिल पाता. आज इस वक्त मैं धर्मवीर के अंत्येष्टि संस्कार पर उस के घर बैठा खुद को धिक्कार रहा हूं. वह चिल्लाता रहा. मेरा दोस्त मोमबत्ती की तरह पिघलपिघल कर अंधेरों में विलीन हो गया. रहरह कर मुझे उस के शब्द याद आ रहे थे – ‘हरि, मेरे शब्दों की उसे (विमला) अपेक्षा ही कहां थी?’ मेरे भीतर का एहसास कातर पलपल छटपटाता रहा. मैं बोल नहीं पा रहा था पर उस के कहे शब्द बारबार मस्तिष्क को झकझोर रहे थे- ‘तारतार कर देने से वस्तु ही मिट जाती है. और मैं तो टर्रटर्र टर्राता रहा, विमला तुम्हीं को चाहा है, सिर्फ तुम्हीं को. चाहो तो अग्नि परीक्षा ले लो.’

नकली नोटों का सरकारी छापाखाना

पाकिस्तान में भारतीय मुद्रा के नकली नोट छपने की खबरें अकसर आती हैं. ये नकली नोट नेपाल के रास्ते भारत लाए जाते हैं. इस तरह की खबरों से लगभग सभी लोग चौकन्ना रहते हैं और सजगता के साथ बड़े नोट स्वीकार करते हैं. खुद सरकार की तरफ से नोटों की पहचान के बारे में सूचनाएं प्रसारित होती रहती हैं. इस से समाज में नकली नोटों के बारे में खासी जागरूकता आई है. उधर, होशंगाबाद की सरकारी प्रैस में ही नकली नोट छपने की खबर है. यह कर्मचारियों की लापरवाही का परिणाम है लेकिन यह लापरवाही गरीब को भारी पड़ने वाली है.

एक खबर के अनुसार, होशंगाबाद की सरकारी प्रिंटिंग प्रैस में गलती से 20 हजार करोड़ रुपए के 1 हजार मूल्य के नोट बिना सुरक्षा तार के छपे हैं. उन में से 10 हजार करोड़ रुपए के एकएक हजार के नोट बाजार में आ चुके हैं. समय रहते गलती पकड़े जाने पर 6 हजार करोड़ रुपए के 1-1 हजार रुपए के नोट जला दिए गए हैं. इस तरह की स्थिति तबाह करने वाली होती है. जिस व्यक्ति को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है उस से इस तरह की गलती की उम्मीद नहीं की जा सकती. यह बेहद और अतिमहत्त्व की जिम्मेदारी है. यह मानवीय भूल है लेकिन इस तरह की भूल भविष्य में नहीं होगी, यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है. 

अब आ गया इंटैलीजैंट कमोड

विज्ञान ने इस कदर हमारे जीवन को बदला है कि आज हम बिना साइंस के एक दिन भी जीने की कल्पना नहीं कर सकते. सुबह के उठने से ले कर शाम को सोने तक हम कहीं न कहीं विज्ञान से जुड़े रहते हैं. लासवेगास में चल रहे कंज्यूमर इलैक्ट्रौनिक शो में जापानी कंपनी टोटो ने इंटैलीजैंट कमोड का प्रदर्शन किया. यह इंटैलीजैंट कमोड पहले अपनेआप को कीटाणुमुक्त करता है, इस के बाद उपयोग करने वाले की सफाई करता है वह भी किसी और की सहायता लिए बिना. औटोमैटिक तरीके से ठंडे या गरम पानी की बौछार से सफाई करता है. मौसम को देखते हुए कमोड में लगे सैंसर उसी तरह के पानी का उपयोग करते हैं. इस्तेमाल के बाद भी आप को फ्लश करने की जरूरत नहीं है, वह भी आप के कमोड सीट छोड़ते ही अपनेआप हो जाएगा.

पेपर लैस सुपर हाइड्रोफिलिसिटी तकनीक पर आधारित यह कमोड पूरी तरह पर्यावरण के अनकूल है और न के बराबर हानिकारक अवशिष्ट निकालता है.

कोहरे से साफ पानी

हमारे यहां तो जैसे ही कोहरा पड़ना शुरू होता है, हवाई उड़ानों, ट्रेनों, सभी पर इस की मार पड़ती है. पर मोरक्को के निवासियों ने इस का नया उपयोग खोज लिया है. ग्रीन टैक्नोलौजी की मदद से वे कोहरे से साफ पानी पैदा कर रहे हैं. साउथ वैस्टन मोरक्को के समुद्र तट के समीप गांवों में ताजे मीठे पानी की किल्लत हमेशा रहती थी. वहां की महिलाओं को मीठे पानी की तलाश में कई मीटर का सफर तय करना पड़ता था. पास में मौजूद पहाडि़यों पर बड़ेबड़े धातु के छोटेछोटे छिद्रों वाले पैनल लगाए गए. उन पैनलों की निचली सतह पर पाइप लगाए गए. कोहरा इन धातु के पैनलों से आर्द्र हवा के कारण छोटीछोटी बूंदों में परिवर्तित हो जाता है.

समुद्र के पास और पहाड़ी पर होने की वजह आर्द्र हवा की उपलब्धता वहां सहज रहती है. पैनल पर स्थित ये बूंदें निचली सतह से होती हुई पाइप में इकट्ठा होती रहती हैं. जहां से लंबे पाइपों द्वारा उन को एक टैंक में स्टोर किया जाता है. जहां से पाइप के माध्यम से इन्हें घरों तक और पशुओं के चारागाहों तक पहुंचाया जाता है. इस विधि से प्राप्त पानी का खर्चा, टैंकर के पानी की तुलना में काफी कम आता है. यह एकदम साफ, स्वच्छ, प्राकृतिक स्रोत से प्राप्त पानी होता है.

फिल्म रिव्यू: क्या कूल हैं हम-3

यह पौर्न फिल्म ‘क्या कूल हैं हम’ की सीक्वल है. पिछली दोनों फिल्मों की तरह ही इस फिल्म में द्विअर्थी संवादों व फूहड़पन की भरमार है. फिल्म को बनाने वालों में किसी जमाने में मशहूर ऐक्टर रह चुके जितेंद्र की पत्नी शोभा कपूर और उन की बेटी एकता कपूर भी शामिल है. इस फिल्म ने अश्लीलता की सारी हदें तोड़ दी हैं. फिल्म का टाइटल भले ही ‘क्या कूल हैं हम’ हो परंतु यह फिल्म ‘क्या हौट हैं हम’ लगती है.

फिल्म की कहानी कन्हैया (तुषार कपूर) और उस के दोस्त रौकी (आफताब शिवदासानी) की है. कन्हैया की हरकतों से तंग आ कर उस का पिता (शक्ति कपूर) उसे घर से निकाल देता है. वह रौकी के साथ मिल कर अपने दोस्त मिकी (कृष्णा) के पास पताया चला जाता है. वहां कृष्णा पौर्न फिल्में बनाता है. एक दिन कन्हैया की नजर शालू (मंदना करीमी) पर पड़ती है, जिसे देखते ही उसे उस से प्यार हो जाता है. शालू अपने पिता (दर्शन जरीवाला) के साथ कन्हैया के घर आना चाहती है. कन्हैया रौकी को बाप बनने को कहता है परंतु मिकी कन्हैया का बाप बन कर उस के घर पहुंचता है. फिर वहां ऐसा घालमेल मचता है कि कन्हैया के 3-3 बाप होते हैं. असली बाप भी पहुंच जाता है. अंत में सारे किरदार समुद्र की रेत में धंस जाते हैं जिन्हें मिकी एअरबैलून के सहारे ऊपर खींच लेता है.

यह फिल्म पिछली दोनों फिल्मों के मुकाबले कमजोर है. पुरानी फिल्मों के सीन और गानों पर फूहड़ ऐक्ंिटग की गई है. हीरोइनों ने कम कपड़े पहन कर अपने उभारों व हावभावों से दर्शकों को रिझाने की कोशिश की है.

तुषार कपूर ने अब तक जितनी भी फिल्में की हैं सब में फ्लौप ही रहा है. आफताब शिवदासानी भी फ्लौप ऐक्टर है. कृष्णा की मौजूदगी कौमेडी नाइट्स से ज्यादा कुछ भी नहीं दर्शाती. फिल्म के संवाद द्विअर्थी और वाहियात हैं. गीतसंगीत बेकार है. छायांकन जरूर अच्छा है. फिल्म ऐसे युवाओं के लिए है जो पौर्न साइटें या अश्लील फिल्में देखना पसंद करते हैं, परिवार वालों के लिए तो कतई नहीं. इस तरह की फिल्मों पर सरकार द्वारा पाबंदी लगानी चाहिए.

फिल्म रिव्यू: चाक एन डस्टर

यह फिल्म शिक्षा के व्यवसायीकरण पर है. फिल्म एकदम सीधीसादी है, कहीं घुमावफिराव नहीं है, फिर भी काफी हद तक मन को छू लेती है. फिल्म अध्यापकों का सम्मान करना सिखाती है. आज के छात्र अपने शिक्षकों को भूल गए हैं. जिन शिक्षकों ने उंगली में कलम पकड़ा कर उन्हें लिखना सिखाया, पढ़ना सिखाया, उन्हें वे कभी हैप्पी बर्थडे तक विश नहीं करते जबकि सैलिब्रिटीज को ‘हैप्पी बर्थडे’ का मैसेज करना नहीं भूलते.

आज के दौर में यह फिल्म इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि आजकल नर्सरी स्कूलों में दाखिलों की चर्चा जोरों पर है. पब्लिक स्कूल वाले दाखिलों को ले कर खूब मनमानी कर रहे हैं. क्योंकि एडमिशन पर अदालतों तक को हस्तक्षेप करना पड़ता है. पब्लिक स्कूलों के रवैए से अभिभावक ही परेशान नहीं हैं, शिक्षकों को भी मैनेजमैंट परेशान करते हैं. उन से जम कर काम तो लिया जाता है परंतु उन की परेशानियों को नजरअंदाज कर दिया जाता है.

यह फिल्म कई मामलों में तो स्कूलों की पोल खोलती है परंतु कुछ मामलों में चुप्पी साध लेती है. बच्चों के ऐडमिशन के मामले में यह अभिभावकों की परेशानियों से मुंह फेर लेती है. फिल्म की कहानी कई हिस्सों में गुदगुदाती है, किरदारों से जोड़ती है, साथ ही कहींकहीं यह सपाट भी हो जाती है. कहानी एक निजी स्कूल की है. अनमोल पारीख (आर्यन बब्बर) स्कूल का ट्रस्टी है. स्कूल की अध्यापिकाओं में विद्या सावंत (शबाना आजमी) और ज्योति ठाकुर (जूही चावला) दोनों अपने छात्रों को मन से पढ़ाती हैं और खूब मेहनत करती हैं.

एक दिन स्कूल की पुरानी प्रिंसिपल इंदुशास्त्री (जरीना वहाब) को हटा कर सुपरवाइजर कामिनी गुप्ता (दिव्या दत्ता) को मैनेजमैंट पिं्रसिपल बना देता है. नई प्रिंसिपल के हिटलरी रवैए से स्कूल की सारी अध्यापिकाएं परेशान हैं. एक दिन कामिनी गुप्ता विद्या की काबिलीयत पर ही प्रश्न उठा देती है और उसे स्कूल से निकाल देती है. कामिनी गुप्ता स्कूल के बच्चों की फीस भी बढ़ा देती है. अध्यापिकाओं की मिलने वाली सुविधाएं भी खत्म कर देती है. विद्या को दिल का दौरा पड़ जाता है. उसे अस्पताल में भरती कराया जाता है. ज्योति ठाकुर खुल कर मैनेजमैंट के खिलाफ खड़ी होती है. उसे भी नौकरी से निकाल दिया जाता है. बात मीडिया तक पहुंचती है. एक न्यूज चैनल की रिपोर्टर भैरवी ठक्कर (रिचा चड्ढा) मामले को उछालती है. मैनेजमैंट मामला रफादफा करना चाहता है.

वह इन दोनों को स्कूल में वापस इस शर्त के साथ लेना चाहता है जब दोनों अपनी काबिलीयत साबित करें. इस के लिए एक क्विज में उन्हें हिस्सा लेना है. जीतने पर इन दोनों को 5 करोड़ रुपए इनाम भी मिलेंगे और मैनेजमैंट माफी मांग कर उन्हें वापस नौकरी पर भी ले लेगा. क्विज में दोनों सभी सवालों के सही जवाब दे कर जीत जाती हैं और उन की वाहवाही होती है. मैनेजमैंट की किरकिरी होती है.

फिल्म की कहानी ठीक है परंतु लगता है कहानी पर ज्यादा मेहनत नहीं की गई है. निर्देशक ने फिल्म में कई सवाल उठाए हैं, मसलन, क्या टीचर्स सम्मान के हकदार नहीं हैं? टीचर्स को आदर तक नहीं मिलता. रिस्पैक्ट सिर्फ पैसे वालों को मिलती है. टीचर्स को परीक्षा भवन में 3 घंटे की ड्यूटी के सिर्फ 25 रुपए मिलते हैं, एकएक परीक्षा की कौपी को चैक करने के लिए 4.25 रुपए मिलते हैं (निर्देशक का यह कहना सही नहीं लगता).

फिल्म का निर्देशन अच्छा है परंतु संवाद सपाट हैं. भावपूर्ण दृश्यों में संवाद असर नहीं छोड़ पाते. शबाना आजमी और जूही चावला की कैमिस्ट्री जमी है. दिव्या दत्ता ने नैगेटिव भूमिका अच्छी तरह की है. फिल्म का क्लाइमैक्स जोरदार है. ऋषि कपूर का क्विज आयोजन मजेदार बन पड़ा है. उस ने ‘कौन बनेगा करोड़पति’ की तर्ज पर क्विज का आयोजन किया है. इस फिल्म के बाद लगता है ऋषि कपूर को छोटे परदे पर भी बहुत से औफर मिलने लगेंगे. फिल्म के गीत शिक्षा से संबंधित ही हैं. उन का फिल्मांकन बढि़या हुआ है. छायांकन अच्छा है.   

 

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