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अरेबियन मेकअप: चेहरे पर बिखेरें ब्रश का जादू

पार्टी रात की है और आप उस में छा जाना चाहती हैं, तो आप की ओवरऔल पर्सनैलिटी के अलावा कपड़े, फुटवियर, ऐक्सैसरीज और मेकअप का दमकना भी जरूरी है. ब्यूटी फील्ड में मेकअप की बात की जाए तो बीत गया वह दौर जब मेकअप सिर्फ बिंदी, लिपस्टिक तक ही सीमित होता था. आज चेहरे पर ब्रश का जादू बिखेरने के लिए कई तरह का मेकअप ब्यूटीपार्लर्स में उपलब्ध है. मसलन, डे मेकअप, नाइट मेकअप, ऐयर ब्रश मेकअप, ऐक्वा मेकअप, मिनरल मेकअप, इजिंप्टियन मेकअप, मैट मेकअप आदि. आप मौके की नजाकत देखें और उसी के अनुरूप चेहरे पर ब्रश का जादू बिखराएं.

मेकअप तकनीक में एकदम नया है अरेबियन मेकअप. अगर आप को बोल्ड लुक पसंद है, तो अरेबियन मेकअप जरूर लुभाएगा. इस में रंगों की भरमार है जैसे गोल्ड, सिल्वर, मेहंदी ग्रीन, क्रिमसन रैड, औरेंज, फ्यूशिया आदि. अरेबियन मेकअप आप स्वयं भी कर सकती हैं, बशर्ते आप का मेकअप में हाथ माहिर हो.

पेश है, अरेबियन मेकअप की जानकारी:

फेस मेकअप
किसी भी मेकअप की तरह इस की शुरुआत भी फाउंडेशन से ही होती है. लेकिन इस में फाउंडेशन के लिए सूफले या मूज का प्रयोग किया जाता है. सूफले या मूज का प्रयोग चेहरे को जहां तरोताजा दिखाता है, वहीं बेदाग भी. इस के अलावा यह चेहरे से अवांछित तेल को भी सोख लेता है नतीजतन चेहरे पर इस की महीन परत दिखती है. पीच रंग के ब्लशऔन से गालों को उभारा जाता है. यह रंग जहां गालों को हाईलाइट करता है, वहीं इस से चेहरा भी ग्लोइंग दिखता है. आप ब्लशऔन की जगह ब्रोंजर से ब्रोजिंग भी कर सकती हैं.

आई मेकअप
अरेबियन लुक में सब से अहम है आई मेकअप. इस में आंखों का मेकअप काफी वाइब्रैंट और कलरफुल किया जाता है. आंखों को आकर्षक बनाने के लिए उन के इनर कौर्नर्स पर सिल्वर, सैंटर में गोल्डन व आउटर कौर्नर्स पर डार्क मेहंदी कलर का आईशैडो लगाया जाता है. इस के बाद कट क्रीज लुक देते हुए ब्लैक कलर से आंखों के आसपास कंटूरिंग की जाती है. इस से आंखें स्मोकी, बड़ी और आकर्षक नजर आती हैं. आईब्रोज के नीचे पर्ल गोल्ड शेड से हाईलाइटिंग की जाती है. आंखों में चमक जगाने के लिए आईलिड पर ग्लिटर्स लगाए जाते हैं. आंखों की इनर्स पर सिल्वर, सैंटर पर गोल्ड और बाहर की तरफ ग्रीन शेड के ग्लिटर का प्रयोग किया जाता है. ऐसा करने से आई मेकअप आंखों को खूबसूरत दिखाएगा.

अंत में आंखों की शेप को डिफाइन करने के लिए अरेबियन स्टाइल को अपना सकती हैं. इस में लाइनर से ऊपर व नीचे दोनों तरफ बाहर विंग निकाल दें और इनर कौर्नर्स पर लाइनर को थोड़ा नुकीला कर दें. अब बाहर निकली दोनों विंग की स्पेस को सिल्वर ग्लिटर से फिल कर दें. आंखों को कंप्लीट सैंसुअल लुक देने के लिए पलकों पर आर्टिफिशियल लैशेज जरूर लगाएं. लैशेज को आईलैश कर्लर से कर्ल कर के मसकारे का कोट लगाएं ताकि वे नैचुरल लैशेज की तरह लगें. वाटर लाइन पर बोल्ड काजल लगा कर आई मेकअप को कंप्लीट करें.

लिप मेकअप
यों तो लिप मेकअप हमेशा आई मेकअप को ध्यान में रख कर ही किया जाता है, लेकिन अरेबियन मेकअप में ओवरऔल लुक बोल्ड रहता है. ऐसे में आंखों व होंठों पर बोल्ड शेड का प्रयोग अनिवार्य है. बोल्ड शेड में क्रिमसन रैड, औरेंज या फिर फ्यूशिया कलर की प्रमुखता रहती है.                      

IPL में नई जर्सी में दिखेंगे कैप्टन कूल महेंद्र सिंह धौनी

कैप्टन कूल महेंद्र सिंह धौनी इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में आठ साल तक पीली जर्सी में नजर आए और चेन्नई सुपरकिंग्स की कप्तानी करते रहे. लेकिन इस बार उनकी टीम भी नई है और जर्सी भी. धौनी राइजिंग पुणे सुपरजाइंट्स की ओर से खेलेंगे.

धौनी के जहन में चेन्नई सुपरकिंग्स की याद अभी भी ताजा है. उनका कहना है कि पुरानी टीम को भुला पाना बहुत मुश्किल है. धौनी ने राइजिंग पुणे सुपरजाएंट्स के मालिक संजीव गोयंका के साथ टीम की ऑफिशियल जर्सी लॉन्च की.

माही के नाम से मशहूर धौनी ने इस मौके पर बेहद भावुकता के साथ कहा, 'आईपीएल शुरू होने के बाद से मैंने आठ साल चेन्नई टीम के साथ गुजारे. अब नई टीम के साथ खेलना कुछ अजीब लग रहा है. चेन्नई के लोगों से मुझे और टीम को बहुत प्यार मिला था. लेकिन एक प्रोफेशनल होने के नाते हमें जीवन में आगे बढ़ना होता है.'

धौनी ने कहा, 'चेन्नई से हटकर एक नई टीम के साथ उतरने पर मैं कुछ अलग महसूस कर रहा हूं लेकिन मैं शुक्रगुजार हूं पुणे का, जिन्होंने मुझे अपनी टीम में चुना और टीम का कप्तान बनाया. एक प्रोफेशनल होने के नाते हमारा यह दायित्व होता है कि हम चाहे किसी फ्रेंचाइजी से खेलें या फिर अपने देश की टीम से खेलें हमें अपना शत प्रतिशत प्रदर्शन देना होता है.'

 

VIDEO: मैदान पर भिड़े पाक क्रिकेटर शहजाद और वहाब

पाकिस्तान के दो क्रिकेटर अहमद शहजाद और वहाब रियाज पाकिस्तान सुपर लीग (पीएसएल) के मैच के दौरान आपस में भिड़ गए. दोनों के बीच हल्की सी हाथापाई भी हुई, जिसके बाद पीसीबी ने दोनों पर भारी जुर्माना लगाया.

अनुशासनहीनता के लिए पीसीबी ने भारी जुर्माना लगाया है और भविष्य के लिए चेतावनी जारी की है. संयुक्त अरब अमीरात में पीएसएल मैच के दौरान रियाज और शहजाद का आपस में झगड़ा हो गया था. यह घटना क्वेटा ग्लेडिएटर्स और पेशावर जाल्मी के बीच मैच के दौरान हुई जब पांचवें ओवर में दोनों पाकिस्तानी खिलाड़ी आपस में न सिर्फ उलझ गए बल्कि दोनों के बीच धक्का मुक्की भी हुई और उन्होंने एक दूसरे को अपशब्द कहे.

शहजाद पर मैच फीस का 30 फीसदी जुर्माना लगाया गया है जबकि रियाज पर 40 फीसदी जुर्माना लगाया गया है. मैच रेफरी रोशन महानामा ने उनके खिलाफ यह कार्रवाई की है. क्वेटा के बल्लेबाज असद शफीक ने टीम साथी शहजाद को दूर किया जबकि पेशावर के कप्तान शाहिद आफरीदी रियाज को दूर ले गए और शांत कराया. आगामी एशिया कप और टी-20 वर्ल्ड कप के लिये वहाब को पाकिस्तानी टीम का हिस्सा बनाया गया है.

तारा और उनके टीनएज प्यार की कड़वी याद

बालीवुड में ‘‘मस्तराम’’ जैसी बोल्ड फिल्म से अपने अभिनय करियर की शुरूआत करने वाली तारा अलिषा बेरी ने टीनएज के कथानक वाली फिल्म ‘‘द परफैक्ट गर्ल’’ में अभिनय कर जबरदस्त शोहरत बटोरी थी. इन दिनों वह केपटाउन में फिल्मायी गयी विक्रम भट्ट निर्देशित अति बोल्ड व सेक्सी फिल्म ‘‘लव गेम्स’’ में अभिनय कर चर्चा में है.

फिल्म ‘द परफैक्ट गर्ल’’ में टीनएज लवर का किरदार निभा चुकी तारा अलीषा बेरी को भी टीनएज में किसी से प्यार हो गया था. जो बाद में उनका नहीं हो पाया. मगर उस प्यार को वह आज तक नहीं भुला पायी हैं. खुद तारा अलीषा बेरी कहती हैं-‘‘मेरा पहला प्यार रोमांटिक नहीं, बल्कि काफी ड्रामैटिक था. यह बड़ी दुःखद कहानी है. मैं बचपन से सोचती थी कि जब भी मैं किसी इंसान से मिलूंगी और मुझे लगेगा कि वह मेरी जिंदगी में होना चाहिए, तो वह हमेशा मेरी जिंदगी में रहेगा. पर ऐसा नहीं हो पाया.

मुझे लगता है कि उस वक्त मैं अपनी जिंदगी के बहुत खराब वक्त से गुजर रही थी. और वह पहला इंसान था, जिससे मैं अपनी जिंदगी की सारी बातें कह पायी थी. फिर वह जा रहा था, उसे वापस नहीं आना था, पर हम रोक नहीं पाए. यह टीनएज उम्र की बात है. यह वह उम्र होती है, जब आपके शरीर के हारमोंस बदल रहे थे. ऐसे वक्त में हम किसी से भी प्यार कर बैठते हैं. उस वक्त मेरी जिंदगी में वह युवक आया था, जिससे मैं हर तरह की बात कर रही थी. उससे जुड़ गयी थी. अब वह प्यार था या सिर्फ आकर्षण था, कह नहीं सकती. मेरे हिसाब से वह मेरा प्यार ही था. उसके बाद से वह मुझे मिला नहीं. पर मेरी मम्मी को लगता है कि शायद वह वापस आए और हमारी फिर से मुलाकात हो. मेरी मम्मी को उसके बारे में पता था.’’

टीनएज में प्रेमी को खोन के बाद प्यार को लेकर अपनी सोच के बारे में तारा अलीषा बताती हैं-‘‘अब मेरी जिंदगी में बहुत खुशी है. मैने देखा है कि लोग रिश्ते में एक दूसरे को बहुत नीचा गिराने का प्रयास करते हैं. अगर मैं किसी के साथ हूं, तो हम दोनों को एक दूसरे को सहयोग और खुशी देनी चाहिए. तनाव नहीं देना चाहिए. पर जब हम किसी के साथ जुड़े होते हैं, उस वक्त छोटी सी बात भी तनाव दे देती है. वैसे मैं किसी डिमांडिंग रिलेशनशिप में रहकर जिंदगी नही जी सकती. मेरी राय में जब आप अपनी जिंदगी में खुश होते हैं, तो आप कुछ न कुछ देते ही हो. फिलहाल मेरी जिंदगी में खुशी है.’’

ज्ञातब्य है कि तारा आलिषा बेरी की मां नंदिनी सेन भी अदाकारा हैं और जबकि किरण खेर उनकी सौतेली मां हैं.

गौरव अरोड़ा को मिला महेश भट्ट कैंप का सहारा

मशहूर माडल गौरव अरोड़ा इन दिनों बहुत खुश हैं. उनकी खुशी की वजह यह है कि उन्हे भी जान अब्राहम और इमरान हाशमी की ही तरह महेश भट्ट कैंप का सहारा मिल गया है. जी हां! जानन अब्राहम और इमरान हाशमी को बालीवुड में लांच करने का श्रेय महेश भट्ट को ही जाता है. अब महेश भट्ट की प्रोडक्शन कंपनी ‘‘विशेष फिल्मस’’ ने माडल गौरव अरोड़ा को एक नहीं बल्कि दो फिल्मों के लिए अनुबंधित किया है. सूत्रों के अनुसार ‘‘विशेष फिल्मस’’ के बैनर तले बन रही विक्रम भट्ट निर्देशित फिल्म ‘‘लव गेम्स’’ के अलावा ‘‘राज’’ सीरीज की चौथी फिल्म ‘‘राज 4’’ में भी गौरव अरोड़ा अभिनय करते हुए नजर आने वाले हैं.

अति बोल्ड व अति सेक्सी फिल्म ‘‘लव गेम’’ में गौरव अरोड़ा के साथ फिल्म ‘सिटी लाइट’ फेम अभिनेत्री पत्र लेखा और ‘मस्तराम’ फेम अभिनेत्री तारा अलीशा बेरी नजर आएंगी. जबकि फिल्म ‘‘राज 4’’ में गौरव अरोड़ा के साथ इमरान हाशमी भी होंगे. जान अब्राहम के बाद यह पहला मौका होगा जब गौरव अरोड़ा के रूप में महेश भट्ट किसी मशहूर माडल को बौलीवुड में ब्रेक दे रहे हैं.

केप टाउन में फिल्मायी जा चुकी फिल्म ‘‘लव गेम्स’’ से बौलीवुड में कदम रखने से उत्साहित गौरव अरोड़ा कहते हैं-‘‘भट्ट कैंप की फिल्म ‘लव गेम्स’ मेरे करियर की पहली फिल्म है. मैं बहुत खुश हूं कि जान अब्राहम, इमरान हाशमी और कंगना रानौट जैसे सफलतम कलाकारों को बालीवुड में लांच करने वाले महेश भट्ट जी ने मुझे अपनी कंपनी की फिल्म में अभिनय करने का मौका दिया है. मुझे लगता है कि किसी भी कलाकार के लिए बालीवुड में इससे बेहतरीन शुरूआत कुछ हो ही नहीं सकती. मेरी दूसरी खुशनसीबी है कि मुझे पत्रलेखा जैसी संजीदा अदाकारा के  साथ काम करने का अवसर मिला.’’

न्याय के इंतजार में पथराई बूढ़ी आंखें

चेहरे पर झुर्रियां, कंपकंपाती आवाज, आंखों पर मोटा चश्मा और बिना सहारे ठीक से चल पाने में असमर्थ 75 साल की एक बूढ़ी महिला को जिंदगी के आखिरी पड़ाव में जब सहारे की सख्त जरूरत थी तब उस पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. न्याय पाने के लिए पिछले 15 साल से कोर्टकचहरी के चक्कर लगाती उस बूढ़ी महिला की आंखों में उम्मीद की एक भी किरण अब नजर नहीं आती. हां, आंखों से आंसुओं की धार जरूर बहती है.

यह बूढ़ी महिला बेबस जिंदगी गुजार रही है. उस में जीने के लिए मोह नहीं है. मोह हो भी तो कैसे क्योंकि इस विधवा ने एकचौथाई जीवन तो पुलिसथानों व अदालतों के चक्कर काटतेकाटते गुजार दिया है. उस की बूढ़ी हड्डियों में अब इतनी जान नहीं है कि वह कोर्टकचहरी के चक्कर लगाती फिरे.

यह सचाई है जयपुर के चाकसू इलाके के कोटखावदा गांव की रहने वाली नर्बदा देवी की, जो 75 साल की हो चुकी है और पिछले 15 साल से दहेज उत्पीड़न के मामले में कोर्ट के चक्कर लगा रही हैं. नर्बदा देवी को दिल की बीमारी है. उस के जोड़ों में भी दर्द रहता है. जिस की वजह से वह ठीक से उठबैठ भी नहीं पाती. आंखों से दिखना भी कम हो गया है. 2 साल पहले ही उसे लकवे का अटैक पड़ चुका है, जिस से उस का दाहिना हाथ ठीक से काम नहीं करता.

नर्बदा के खिलाफ जो दहेज उत्पीड़न का मामला था उस की सुनवाई तकरीबन 15 साल से चल रही है. जब यह घटना घटी थी, उस समय नर्बदा की उम्र 60 साल रही होगी.

तारीख पर तारीख का एक और मामला है. दहेज उत्पीड़न के मामले में ही पिछले 12 साल से केस लड़ रहे 72 वर्षीय रामजीवन को बीते साल अगस्त माह में आजीवन कारावास यानी 14 साल की सजा हुई है. 72 साल की उम्र में हालत यह है कि उस को उठनेबैठने के लिए भी सहारे की जरूरत पड़ती है, तो आजीवन कारावास भोगने में उस की क्या हालत होगी, इस का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है. अगर यही फैसला 10 साल पहले आया होता तो शायद रामजीवन इसे झेलने की स्थिति में होता.

कहते हैं बच्चा और बूढ़ा एकसमान, यानी मातापिता को बच्चों के लालनपालन में जो मेहनतमशक्कत करनी पड़ती है, उन्हें जो प्यारदुलार देना पड़ता है, वैसी ही देखभाल बूढ़ों की भी करनी पड़ती है. ऐसे में किसी वृद्ध को जेल की कालकोठरी में डाल दिया जाना क्या उचित है?

सीखचों में कैद विचाराधीन कैदी

एक सवाल यह भी है कि अदालती मुकदमों में जटिलताओं के चलते विचाराधीन कैदियों को जेल में कैद रखा जा रहा है. दरअसल, इन में से ज्यादातर कैदी गरीब व कमजोर तबके से होते हैं, जो जमानत नहीं ले पाते और जेल में ही कैद रहते हैं. देश की अदालतों में आज लाखों मामले विचाराधीन हैं, जिन में सालोंसाल से फैसला नहीं हो पा रहा. देश में सैंट्रल जेल, जिला कारागार, उप कारागार, महिला कारागार, खुली जेलों समेत कुल 1,382 कारागारों में कैदियों की क्षमता 3 लाख 30 हजार निर्धारित है, लेकिन इन में कैदी इस से कहीं ज्यादा है. सब से चर्चित तिहाड़ जेल हो या छोटे शहर की कोई जेल, हर जगह निर्धारित तादाद से ज्यादा कैदी बंद हैं. इस वजह से कई बार कानूनव्यवस्था पर काबू पाना भी मुश्किल हो जाता है.

जेलों में कैद तकरीबन 4 लाख कैदियों में आधे से ज्यादा ऐसे हैं जिन्हें सजा नहीं मिली, फिर भी वे सालों से बंद हैं. जबकि न्याय का सिद्धांत कहता है कि सजा मिलने से पहले किसी को गुनाहगार नहीं माना जा सकता. इस समय देश की हरेक जेल में विचाराधीन कैदियों की तादाद 70 फीसदी तक है. जेलों में सजायाफ्ता कैदी कम और विचाराधीन कैदी ज्यादा हैं. ऐसे आरोपियों को भी जेल में कैद कर रखा है जिन का ट्रायल ही शुरू नहीं हुआ है. यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि ऐसे लोग भी हैं जिन पर आरोप साबित होने पर मिलने वाली सजा का पूरा वक्त ट्रायल के दौरान जेल में ही कट गया है. यह वाकई त्रासदीपूर्ण है. ऐसे लोगों की तादाद कम नहीं है, जो जमानती अपराध में कैद हैं. उन का हक है कि वे जमानत पर छूट कर बाहर आ सकें, लेकिन अभी तक वे जेल में कैद हैं.

महज शक के आधार पर सैक्शन 107 और 110 वाले मामलों में कैद लोगों को जेल में डाल कर रखा गया है. असलियत में इस का दोषी हमारा कानूनी सिस्टम ही है. यह बहुत ही धीमा काम करता है, जिस का खमियाजा लोगों को बेवजह भुगतना पड़ता है कि वे सालोंसाल जेलों में बंद रहते हैं. गरीब के लिए तो हालात और भी ज्यादा बदतर हो जाते हैं, अमीर बिरादरी तो जमानत पा कर बाहर आ जाती है. जब कानून साफतौर पर कहता है कि जमानती अपराध में जेल में कैद न रखा जाए और सैक्शन 107 व 110 में शक के आधार पर कैद में न रखें. तो सवाल है कि क्या मजिस्ट्रेट या हाईकोर्ट के जज को यह कानून मालूम नहीं है, जो विचाराधीन को जेल में रखवाते हैं.

जब कानून साफ है तो इन्हें कैद में रखने की प्रैक्टिस क्यों जारी है? सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा हुआ है, ‘बेल नौट जेल’ लेकिन अब तक इस का उलटा ही होता आया है, ‘जेल नौट बेल’, यानी जेल में अंदर बंद रखो, बाहर मत आने दो. इस गड़बड़ी में सब से बड़ा दोष हमारी पुलिस फोर्स का रहा है. वह शक के आधार पर लोगों को पकड़ लेती है और माली तौर पर कमजोर व पिछड़े लोगों को इस वजह से नहीं छोड़ती कि वे गायब हो जाएंगे. लेकिन यह तरीका सरासर गलत है. पुलिस हमेशा ‘एंटी पुअर’ सोच के नजरिए से काम करती है. यही वजह है कि अमीर लोग इस सिस्टम का भरपूर फायदा उठाते हैं.

जब इस सच को सब जानते हैं कि किसी आरोपी का 5 साल तक ट्रायल ही शुरू नहीं हुआ, तो बेहतर यही होगा कि उसे जेल में न डाला जाए. हालांकि हत्या, बलात्कार व डकैती जैसे गंभीर मामलों के आरोपी को जेल में रखा जा सकता है लेकिन मामूली चोरी के इल्जाम पर कैद रखना ठीक नहीं है. इसी तरह निचले स्तर पर न्यायिक तंत्र की बड़ी गलती है. मजिस्ट्रेट और सैशन जज कानून का पूरी तरह से पालन ही नहीं करते.

गलती पुलिस व अदालत की

आईपीएस अफसर रह चुके ज्ञानप्रकाश पिलानियां का कहना है, ‘‘अगर मामले की जांच चल रही है तो यह सरासर पुलिस की गलती है कि उस ने आरोपी को गिरफ्तार तो कर लिया लेकिन चार्जशीट पेश नहीं की है. इस बारे में जवाबदारी पुलिस की ही रहनी चाहिए. अगर ट्रायल में देरी हो रही है तो उस हालत में पुलिस और कोर्ट का कुसूर हो सकता है. लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि हमारे पुलिसिया तंत्र पर बहुत बड़ा बोझ है. जांच अफसर के पास इतने मामले होते हैं कि उस में न्याय कराने की ताकत ही नहीं होती.

‘‘अदालतों में भी मामले सालोंसाल लटके पड़े रहते हैं. जैसेतैसे अगली सुनवाई को लेने को ले कर टालमटोल चलती रहती है. ऐसा लगता है सारा सिस्टम ही इसी कवायद में लगा रहता है कि मामला खत्म ही नहीं होना चाहिए. ट्रायल को पुलिस और कोर्ट दोनों ही मुसीबत समझते हैं. दूसरी खामी यह है कि निचले स्तर पर बढि़या निगरानी ही नहीं होती है. सैशन कोर्ट और हाईकोर्ट को जांच करनी चाहिए कि मामले के निबटारे में इतनी देरी क्यों हो रही है और यह देरी जायज है या नाजायज?

‘‘अभी फुरती किसी भी स्तर पर दिखाई नहीं पड़ रही है. मामलों को लटकाते रहना वकीलों को भाता है. वे भी कमाई जारी रखने के लिए तारीख पर तारीख लेते रहते हैं. हर पेशी पर वे मोटी रकम वसूलते रहते हैं. दुनिया में कितने ही पुलिस और कानूनी तंत्र मैं ने देखे हैं. लेकिन जितनी देरी भारत में होती है उतनी और कहीं नहीं होती. बेहतर तो यह होगा कि हमें दंड न्याय प्रक्रिया को सुधारने पर जोर देना चाहिए था. सुधार भी ऊंचे लेवल से शुरू होना चाहिए था. रही बात पुलिस सुधार की, तो जब मैं पुलिस में था, तब भी खूब सुनी थी और अब भी वही सुन रहा हूं कि इस महकमे में कोई सुधार होता नहीं दिख रहा. ‘‘यही हाल न्यायिक सुधार का भी है. रसूखदार और अमीर लोगों को तो यह देरी अच्छी लगती है. वे पैसे के बल पर जमानत ले लेते हैं, तारीख बढ़वा लेते हैं लेकिन गरीब व कमजोर लोगों के लिए यह हालत भयानक है. मौजूदा सिस्टम ऐसा है जिस में बाहुबल, पैसा और राजनीतिक पहुंच वाले ही कामयाब हो रहे हैं.’’

मौजूद है नियम

दंड प्रक्रिया संहिता संशोधन अधिनियम 2005 के तहत संहिता में धारा 436-ए जोड़ी गई थी. इस धारा में कहा गया है कि विचाराधीन कैदी ने उसे अपराध के लिए दी जाने वाली सजा का आधे से अधिक समय जेल में काट लिया हो, तो उसे जमानत की जगह निजी मुचलके पर छोड़ा जा सकता है. ऐसे अपराधों को अलग रखा गया जिन में आजीवन कारावास या फांसी की सजा सुनाई जा सकती हो. साथ ही, यह भी कहा गया कि अपराध के लिए निर्धारित अधिकतम केंद्र अवधि से अधिक समय के लिए विचाराधीन कैदी को जेल में नहीं रखा जा सकता.

जेलों में विचाराधीन कैदियों की भारी तादाद को देखते हुए केंद्र सरकार रिहाई का प्रयास कर रही है. जनवरी 2013 में गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों के निजी सचिवों से रिहा होने के काबिल कैदियों की सूचियां तैयार करने और उन्हें रिहा करने के लिए जिला स्तर पर समीक्षा समितियां गठित करने को कहा था. ये समितियां जिला न्यायाधीशों की अध्यक्षता में बननी थीं और हर 3 महीने में समीक्षा की जानी थी, लेकिन ज्यादातर राज्यों में अभी तक समितियां ही नहीं बन पाईं.

क्या कहते हैं आंकड़े

कुल 3,85,135 कैदी देशभर की जेलों में बंद हैं. इन में से 66.2 फीसदी कैदी विचाराधीन हैं. देशभर की तमाम जेलों में इन विचाराधीन कैदियों की कुल संख्या 2,54,857 है. 1,226 विचाराधीन महिला कैदी अपने बच्चों के साथ जेल में रहने को मजबूर हैं. हैरान करने वाली बात यह है कि जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों में सब से ज्यादा तादाद युवाओं की है. 18 से 30 साल की उम्र के इन युवाओं की तादाद 46 फीसदी है. इस के बाद 40 फीसदी कैदी 31 से 50 साल की उम्र के हैं. दिलचस्प बात यह है कि 2,028 विचाराधीन कैदियों को जेल में 5 साल से ज्यादा का वक्त बीत गया है. गौरतलब है कि आपराधिक मामलों की सुनवाई में देरी की सब से बड़ी वजह, देश की जेलों में क्षमता से 12 फीसदी ज्यादा लोग कैद हैं. औसत 8 कैदियों पर एक जेलकर्मी है.

स्टार्टअप में महिलाओं की हिस्सेदारी की पहल

देश में रोजगार के अवसर बढ़ाने और उद्योगों के विस्तार के लिए 16 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘स्टार्टअप इंडिया’ को लौंच किया. इस से पहले मोदी देश में ‘मेक इन इंडिया’ की शुरुआत कर चुके हैं और इन दोनों योजनाओं का मकसद देश में कारोबार को बढ़ावा देना तथा औद्योगिक विकास के देशी स्वरूप को विकसित करना है. मेक इन इंडिया के तहत छोटी जरूरत की वस्तु से ले कर देश की सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण बड़ेबड़े उपकरणों तक का निर्माण देश में करना है. स्टार्टअप इंडिया के तहत हर हाथ को हुनर देना है. प्रत्येक व्यक्ति में कौशल विकसित कर के छोटेछोटे कारोबार शुरू कर के देश को औद्योगिक विकास की बुलंदियों तक पहुंचाना है.

प्रधानमंत्री के इस योजना को शुरू करने के बाद केंद्र सरकार के औद्योगिक नीति और संवर्द्धन विभाग के सचिव अमिताभ कांत ने स्पष्ट किया है कि महिलाओं की भागीदारी के बिना स्टार्टअप की सफलता अधूरी है. उन का विश्वास है कि समाज में असमानता को समाप्त करने के लिए और महिलाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के वास्ते उन्हें स्टार्टअप से जोड़ने के लिए पहल करने की सख्त जरूरत है. महिलाएं उद्यमी बनें, इस के लिए उन के भीतर आत्मविश्वास विकसित करना जरूरी है. यह काम जिला स्तर पर औद्योगिक केंद्रों के जरिए ज्यादा प्रभावी तरीके से किया जा सकता है.

उन का मानना है कि महिलाएं स्टार्टअप इंडिया में ज्यादा भागीदारी कर सकें, इस के लिए छोटेछोटे कसबों में जिला औद्योगिक केंद्रों के जरिए कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी. यदि इस पहल पर ईमानदारी से काम होता है तो निश्चित रूप से महिलाओं की सामाजिक बराबरी में भागीदारी बढ़ेगी और स्टार्टअप योजना को गति मिलेगी.

सैक्स लाइफ: कबाड़ा करती गलतफहमियां

सैक्स ऐसा विषय है जिस के बारे में अंगूठाछाप इंसान से ले कर विशारद की उपाधि ले चुके विद्वान तक खुद को ऐक्सपर्ट मानते हैं और अपने मित्रों व परिजनों को अपने ज्ञान से सिंचित करते रहते हैं. लेकिन सच इस के ठीक विपरीत है. ज्यादातर लोग, चाहे वे अनपढ़ हों या डिगरीधारी, इस विषय पर आधीअधूरी, सुनीसुनाई और आधारहीन जानकारियां रखते हैं. इसी जानकारी के आधार पर वे अपने ज्ञान से मित्रों को सिंचित करने के बजाय चिंतित कर देते हैं. महिलाओं व पुरुषों में सैक्स को ले कर कई तरह की गलतफहमियां और भ्रामक जानकारियां रहती हैं, जिन की वजह से उन की सैक्स लाइफ चौपट हो जाती है. आइए, जानते हैं ऐसी ही कुछ गलतफहमियों और भ्रमों के बारे में. ह्यूमन सैक्सुअल रिस्पौंस के लेखक विलियम मास्टर्स एवं वर्जिनिया जौन्सन ने इन के बारे में काफी पहले बताया था, लेकिन ये भ्रम आज भी ज्यों के त्यों मौजूद हैं.

भ्रम : सैक्सुअल परफौर्मेंस पर फोकस करना जरूरी है

सच : यह एक बड़ी भूल है. सैक्स कोई प्रोजैक्ट नहीं है जिस की एकएक ऐक्टिविटी पूर्वनियोजित और डैडलाइन से बंधी हो. अगर आप पहले से सोची हुई योजना पर अमल करते हुए अपने पार्टनर को छूते हैं और उस की ठीक वैसी ही प्रतिक्रिया नहीं पाते हैं, तो आप को निराशा ही हाथ लगेगी और आप कभी ठीक से सैक्स का आनंद नहीं उठा पाएंगे. मास्टर्स एवं जौन्सन कहते हैं, परफौर्मेंस का विश्लेषण करने के बजाय चीजों को अपने तरीके से होने दें और सैक्स का भरपूर आनंद उठाएं.

भ्रम : एक ही पार्टनर के साथ बारबार सैक्स से ऊब होने लगती है.

सच : सैक्स में ऊब होने की वजह लंबे समय तक एक ही पार्टनर के साथ समागम नहीं, बल्कि अपने पार्टनर की इच्छाओं को ठीक से न समझ पाना है.

मास्टर्स एवं जौन्सन का मानना है कि जीवनभर एक ही साथी के साथ यौन समागम निरंतर आनंददायक हो सकता है, बशर्ते साथी की इच्छा का सम्मान किया जाए और उस का सहयोग किया जाए. संबंधों में ऊब से बचने और ताजगी बरकरार रखने के लिए यौन संबंधों को जरा क्रिएटिव, एडवैंचरस और प्लेफुल बनाना जरूरी है. नए तरीके, नई जगह आजमाना जरूरी है, न कि नया पार्टनर.

भ्रम : पुरुषों में सैक्स किशोरावस्था में चरम पर होता है, फिर ढलान पर आने लगता है.

सच : दरअसल, टेस्टोस्टेरौन नामक पुरुष हार्मोन, जो यौन संबंधों में रोमांच जगाता है, वह 18-19 वर्ष की आयु में सब से उच्च स्तर पर होता है, लेकिन यह गलत है कि इस के बाद यह ढलान पर आने लगता है. वैसे भी पुरुषों का सैक्स पूरी तरह फिजियोलौजी पर निर्भर नहीं करता. वह खुद के बारे में कैसा महसूस करता है, अपने पार्टनर के बारे में क्या सोचता है और उस के शरीर की सैक्सुअल संबंधों में कैसी प्रतिक्रिया है आदि सारी बातें सैक्सुअल परफौर्मेंस को प्रभावित करती हैं. अपनी हैल्थ और फिटनैस पर ध्यान देने वाले पुरुष अधेड़ावस्था या वृद्धावस्था में भी अपने जीवनसाथी के सहयोग से अच्छा सैक्स करने में सक्षम होते हैं.

भ्रम : सैक्स में महिलाओं को पुरुषों से कम दिलचस्पी होती है.

सच : अगर कोई महिला पूरी तरह से स्वस्थ है, प्रसन्नचित्त रहती है, उस में ऊर्जा है और समय भी है, तो उस में सैक्स इच्छा निश्चित तौर पर एक पुरुष से ज्यादा होती है. इस बात से लगभग सभी सैक्स स्पैशलिस्ट सहमत हैं. लेकिन फिर भी महिलाओं को ले कर यह भ्रम इसलिए व्याप्त है क्योंकि शुरू से ही वे ऐसे माहौल में पलीबढ़ी होती हैं जहां उन्हें सौम्य बने रहने, कम बोलने और सैक्स जैसे विषयों पर चर्चा करने से बचने की सलाह दी जाती है. भले ही आजकल कुछ महिलाएं सैक्स पर खुल कर चर्चा करने से नहीं कतरातीं पर अब भी ज्यादातर महिलाएं सैक्स के मामले में पैसिव रहती हैं और अपनी फीलिंग्स का खुल कर इजहार करने से बचती हैं. लेकिन इस का मतलब यह बिलकुल नहीं कि उन को सैक्स की इच्छा नहीं होती.

भ्रम : महिला को ‘खुश’ करने की जिम्मेदारी पुरुष की.

सच : बिलकुल गलत. और यह भी गलत है कि पुरुष को खुश करने की जिम्मेदारी महिला की होती है. विशेषज्ञ कहते हैं सैक्स न तो सिर्फ पुरुष द्वारा करने की चीज है न ही महिला द्वारा. सैक्स तो वह आनंददायक प्रक्रिया है जो स्त्री और पुरुष एकदूसरे के साथ करते हैं, इसलिए इस में किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि दोनों की जिम्मेदारी होती है कि वे एकदूसरे को खुश करने की कोशिश करें और अपने पार्टनर की पसंदीदा ऐक्टिविटीज करें. सैक्स क्रिया के दौरान पति या पत्नी को अपने साथी की जरूरत या उस की चाह के मुताबिक यौन क्रीड़ा कर के उसे संतुष्ट करना चाहिए.

भ्रम : हफ्ते या 10 दिन में एक बार ही सैक्स करना चाहिए, वरना ऊब होने लगती है.

सच : कई लोग कहते हैं कि सैक्स करने से कमजोरी आ जाती है, कई कहते हैं कि लंबे अंतराल पर सैक्स करने से ज्यादा आनंद आता है वरना ऊब होने लगती है. ये दोनों बातें गलत हैं. सैक्स ऐक्सपर्ट लौरी मिंट्ज कहते हैं, ‘‘आप हफ्ते में कितनी बार सैक्स करते हैं, यह आप की इच्छा पर निर्भर करता है. अगर आप बीमार नहीं हैं, कोई सैक्सुअल डिजीज से पीडि़त नहीं हैं या किसी प्रकार की मजबूरी नहीं है, तो आप अपनी इच्छानुसार यौन क्रीड़ा का आनंद उठा सकते हैं. सैक्स का मतलब रोज संभोग करना नहीं, एकदूसरे को पुचकारना, बांहों में लेना और दुलारना भी आनंददायक हो सकता है.’’

प्यार की बात करो

जब कभी

इश्क प्यार की बात करो

न कभी

जीतहार की बात करो

दो घड़ी ये

मिलन की हमारे लिए

कीमती हैं

दीदार की बात करो

डर गए तो

गए इस जमाने से हम

अब चलो

आरपार की बात करो

संग मिल के सनम

खाई थी जो कसम

वक्त है इकरार का

बात करो.

  – शंभु शरण मंडल

पोंगापंथियों का नया अड्डा: सोशल मीडिया

सोशल मीडिया यानी फेसबुक, वाट्सऐप और ट्विटर के जरिए पोंगापंथ को बढ़ावा देने का काम बड़ी तेजी से होने लगा है. फेसबुक और वाट्सऐप पर रोज ऐसे मैसेज सैकड़ों की संख्या में आते हैं जिन में पूजापाठ, हवनयज्ञ और तमाम तरह के दोषों को दूर करने के उपाय बताए जाते हैं. कुछ संदेशों में तो मैसेज फौरवर्ड करने के लिए कहा जाता है. मैसेज फौरवर्ड करने पर लाभ और न करने पर हानि का भय भी दिखाया जाता है. खास मौकों को छोड़ दें तो वाट्सऐप ग्रुप में सब से अधिक मैसेज पोंगापंथी विचारों को फैलाने वाले ही आते हैं. इस तरह के मैसेज से धर्म के धंधे को बढ़ावा मिल रहा है. सोशल मीडिया को हथियार बना कर इस काम को किया जा रहा है. पश्चिमी सभ्यता की आलोचना करने वाले पश्चिम से आई इस तकनीक की बुराईन कर के उस का सहारा ले रहे हैं.

सोशल मीडिया के जरिए धर्म और दूसरी तरह की बातों को एक से दूसरे तक पहुंचाने में कोई मेहनत नहीं करनी होती. फेसबुक पर शेयर कर के या वाट्सऐप पर फौरवर्ड कर के एक मैसेज को दूसरे तक पहुंचाया जाता है. एक बार मैसेज जब फौरवर्ड हो जाता है तो बहुत सारे लोग खुद भी अपनेआप ऐसे मैसेज को आगे भेजने लगते हैं. ऐसे मैसेज को मैसेज का ट्रेंड होना या वायरल होना भी कहा जाता है. फेसबुक पर ऐसे फोटो वाले मैसेज एकदूसरे को शेयर या टैग किए जाते हैं. वाट्सऐप पर फोटो को ओपन करने से लोग बचने की कोशिश करते हैं तो मैसेज को टाइप कर के भेजा जाने लगा. यह मैसेज एक जगह पर टाइप कर के वाट्सऐप किए जाते हैं. धीरेधीरे ये बहुत सारे लोगों तक पहुंच जाते हैं. सोशल मीडिया पर मैसेज के तेजी से ट्रेंड होने के रिकौर्ड में सब से ज्यादा धार्मिक मैसेज का है. अश्लील या फनी मैसेज भी धर्म के मैसेज से कम तेजी से फैलते हैं.

बड़ा माध्यम है वाट्सऐप ग्रुप

वाट्सऐप ग्रुप मैसेज और प्रचारप्रसार का सब से बड़ा जरिया बन गया है. एक ग्रुप में 100 मैंबर होते हैं. किसी ग्रुप में मैसेज पहुंचने का मतलब होता है कि वह 100 लोगों तक एक बार में ही पहुंच जाता है. ऐसे में अगर कोई मैसेज 100 ग्रुप में पहुंच जाए तो वह 10 हजार लोगों तक पहुंच सकता है. इतने लोगों तक पहुंचने के बाद मैसेज आगे भी फौरवर्ड होने लगता है. मैसेज को इस तरह से बनाया जाता है कि हर आदमी उस से अपना जुड़ाव महसूस करता है. मैसेज के संदेश से लोगों को धार्मिक रूप से डराने की कोशिश की जाती है. धर्म से जुड़ी सलाहें इस तरह के मैसेज में दी जाती हैं जो आदमी को अपने लाभ की लगती हैं. पोगापंथ का प्रचार करने वाले अब रोज राशिफल और दूसरे तमाम तरह के मुहूर्त को बताने लगे हैं.

धर्म का प्रचार करने वाले पहले भी इस तरह के साधनों का प्रयोग करते थे. पोस्टकार्ड और पैंफलेट के जरिए ऐसा प्रचार होता था. अखबारों में विज्ञापन व किस्सेकहानी के जरिए भी इस तरह के प्रचार किए जाते थे. ये सभी माध्यम खर्चे वाले होते थे. इन के जरिए संदेश को आगे फैलाने में परेशानी व समय भी लगता था. वाट्सऐप और फेसबुक के जरिए मैसेज को आगे पहुंचाने में समय व पैसा दोनों ही बचते हैं. ज्यादा लोगों तक और सीधी पहुंच होने से यह तेजी से लोकप्रिय होता जा रहा है. कुछ समय पहले धार्मिक भावनाओं को भड़काने में सोशल मीडिया का बड़ा हाथ सामने आया. कई जगहों पर प्रशासन द्वारा इस के खिलाफ कड़े कदम उठाए गए. धार्मिक प्रचार इस तरह के कानून के दायरे में न आने से बच जाता है. इस का कोई विरोध भी नहीं करता. इस वजह से इस को आगे बढ़ाने में अड़चन नहीं आती है.

मुफ्तखोरी का जरिया

वाट्सऐप पर मैसेज मुफ्तखोरी का जरिया बन गए हैं. इस के जरिए पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ और ऐसे ही तमाम यज्ञ के जरिए संतमहात्मा के कपड़े पहनने वाले का इंतजाम हो जाता है. पढ़ेलिखे, नई उम्र के लोग इस तरह के धार्मिक कर्मकांडों को बहुत जानतेसमझते नहीं थे. अब इस तरह के मैसेज के जरिए उन को इन सब की जानकारी होने लगी है. वे जब कभी परेशानी में पड़ते हैं तो इस ओर उन का ध्यान जाता है. ऐसे मैसेज नई उम्र के युवाओं को बहकाने का काम करते हैं.

ऐसे मैसेज का प्रचार करने वाले अपने लिए दानदक्षिणा का इंतजाम कर लेते हैं. मैसेज ऐसे होते हैं जिन से यह लगता है कि हर समस्या का निदान यहां पर है. पुत्र या पुत्री प्राप्ति के लिए आयुर्वेद ग्रंथों का हवाला दे कर समझाया जाता है कि माहवारी के बाद कब संबंध बनाएं. मैसेज के जरिए केवल आदमी की सोच को ही प्रभावित नहीं किया जाता बल्कि उस के बैडरूम के अंदर बनने वाले संबंधों को भी प्रभावित करने का प्रयास होता है. मैसेजों में धर्म का प्रचार करने वाले संदेशों को तर्क और विज्ञान की कसौटी पर भी खरा साबित करने का प्रयास होता है. यज्ञ करने के पीछे तर्क दिया जाता है कि जल, वायु और पृथ्वी को इस के जरिए शुद्ध किया जा सकता है, यही नहीं, प्रदूषण को रोक कर ओजोन परत को भी बचा सकते हैं. मैसेजों में 5 तरह के यज्ञ को जरूर बताया जाता है.

दरअसल, यज्ञ और हवन के नाम पर कर्मकांड करने वालों को दक्षिणा मिल जाती है. इस तरह के मैसेज के विरोध में तर्क सहित कोई बात समझाने की कोशिश नहीं की जाती है कि जिस से पढ़ने वाला इस को सही न माने और तर्क सहित अपनी बात करे. इस तरह सोशल मीडिया के रूप में धर्म का प्रचार करने वालों को एक बड़ा हथियार मिल गया है. ऐसे में अगर सोशल मीडिया का प्रयोग करने वालों को सच समझाया नहीं गया तो वे धर्म के अंधविश्वास और रूढि़वादिता का शिकार हो जाएंगे. धर्म का प्रचार करने वालों के मुकाबले ऐसी बातों की पोल खोलने वालों की संख्या और प्रयास दोनों ही सीमित हैं.

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