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‘बहू हमारी रजनी-कांत’ पर साहित्यिक चोरी का आरोप

सोमवार, 15 फरवरी से रात आठ बजे प्रसारित हो रहे सोनाली और अमीर जफर के साइंटिफिक कामेडी सीरियल ‘‘बहू हमारी रजनी-कांत’’ पर साहित्यिक चोरी का आरोप लगाया गया है. सूत्रों के अनुसार चैनल ने जब इस सीरियल का पहला प्रोमों ट्वीटर पर डाला था, तभी से इस सीरियल को लेकर कई तरह की खबरें गर्म हो गयीं थी. यूं तो एक जैसे विषय पर पहले भी कई फिल्में व सीरियल बन चुके हैं. मगर सीरियल ‘‘बहू हमारी रजनी-कांत’’ पर साहित्यिक चोरी का भी आरोप लग गया है. सूत्रों के अनुसार‘ ‘रैंडम चिकीबम’’ से जुड़े राहुल सुब्रमणियम ने ट्वीटर पर ट्वीट कर  इस सीरियल पर साहित्यिक चोरी का आरोप लगाया है, जिस पर सीरियल के निर्माता तथा ‘‘लाइफ ओके ’’चैनल से जुडे़ लोगों ने चुप्पी साध रखी है.

वास्तव में ‘‘यूट्यूब’’ पर एक साल पहले  प्रसारित ‘रैंडम चिकीबम’’ के वीडियो सीरीज ‘‘यू ट्यूब कामेडी हंट सीरीज’’ के लिए ‘‘रैंडम चिकीबम’’ के ‘‘द कामेडी हंट’’ को पुरस्कृत किया गया था. राहुल सुब्रमणियम के ट्वीट के अनुसार उनके इस वीडियो में एक युवक मैरिज कौंसिलर से ‘परफैक्ट वाइफ’ के लिए सलाह लेता है. और फिर यह बात सामने आती है कि यही हर युवक का सपना है और यही बात सीरियल के प्रोमो में थी, जिसके आधार पर राहुल ने साहित्यिक चोरी का आरोप लगाते हुए ट्वीट किया. मगर उनके इस ट्वीट का किसी ने कोई जवाब नहीं दिया. अब ‘रैंडम चिकीबम’ की टीम इस पर क्या कार्यवाही की जाए, इस पर विचार कर रही है.

‘द जंगल बुक’ एक सप्ताह पहले भारत में होगी रिलीज

मल्टीप्लैक्स के आने के बाद हालीवुड फिल्में बड़ी तेजी से भारत में पैर पसर रही हैं. मजेदार बात यह है कि हालीवुड फिल्में भारत में अंग्रेजी के अलावा हिंदी, तमिल, मलयालम व तेलगू भाषा में डब होकर रिलीज हो रही हैं और बाक्स आफिस पर भारतीय फिल्मों के मुकाबले कहीं ज्यादा अच्छा बिजनेस कर रही हैं. गत सप्ताह ‘‘फितूर’’ और ‘‘सनम रे’’ फिल्मों के साथ रिलीज हुई हालीवुड फिल्म ‘‘डेड पूल’’ ने बाक्स आफिस कलेक्शन के मामले में ‘‘फितूर’’ और ‘‘सनम रे’’ दोनों को बहुत पीछे छोड़ दिया है. इससे पहले भी कई हालीवुड फिल्में भारत में बाक्स आफिस पर जबरदस्त कमाई कर चुकी हैं.

इसी बात से प्रभावित होकर हालीवुड फिल्म प्रोडक्शन कंपनी ‘‘डिज्नी’’ ने अपनी फिल्म ‘‘द जंगल बुक’’ को अमेरिका के मुकाबले भारत में एक सप्ताह पहले रिलीज करने का निर्णय लिया है. जी हां! ‘‘द जंगल बुक’’ भारत में आठ अप्रैल और अमेरिका में 15 अप्रैल को रिलीज होगी.‘ ‘आयरन मैन’ फेम निर्देशक जोन फेवरीव की फिल्म ‘‘द जंगल बुक’’ में नवोदित अभिनेता नील सेठी के साथ ही बेन किंग्सले, बिल मुर्रे, स्कार्लेट जानसन, इदरिस एल्बा और क्रिस्टोफर वाकेन के अभिनय से सजी फिल्म में भारतीय दर्शकों के लिए कुछ खास पेश करने का भी दावा निर्माता की तरफ से किया जा रहा है.

फिल्म ‘‘द जंगल बुक’’ में शावक भेडि़यों के परिवार द्वारा पालन पोषण किए गए मोगली (नील सेठी) के स्वयं की खोज के नवीनतम रोमांचक कारनामों का महाकाव्य है. वह अपने घर को जान या समझ पाता, उससे पहले ही उसके परिवार ने उसका परित्याग कर दिया था. रूडयर्ड किपलिंग द्वारा लिखी गयी उसी साहसिक कहानियों का यह एनीमेशन रूपांतरण है.

जोन फेवरीव की फिल्म ‘‘द जंग बुक’’ में फोटो रियिालिस्टिक,जानवरों और वातावरण का सजीव मिश्रण है. इसके निर्माण में अत्याधुनिक तकनीक का सहारा लिया गया है. जंगल बुक के किस्से हमारी जिंदगी का आम हिस्सा रहे हैं. मोगली, बालू, बखीरा, का और शेरखान भारतीय दर्शकों के प्रिय पात्र हैं.

‘राकी हैंडसम’ में देखने को मिलेगा नोरा फतेही का जलवा

जान अब्राहम बतौर निर्माता व अभिनेता एक कोरियन फिल्म ‘‘द मैन फ्राम नो व्हेअर’’ का हिंदी रीमेक ‘‘राकी हैंडसम’’ के नाम से लेकर आ रहे हैं. इस एक्शन प्रधान रोमांचक फिल्म को बेहतरीन फिल्म बनाने में जान अब्राहम अपनी तरफ से कोई कसर नहीं बाकी छोड़ रहे हैं. सूत्रों के अनुसार इसी के चलते जान अब्राहम ने अपनी फिल्म ‘‘राकी हैंडसम’’ में ‘बांबें राकर्स’’ के लोकप्रिय गीत ‘‘राक द पार्टी’’ का रीमिक्स फिल्माया है. इस रीमिक्स गाने में सेंसुआलिटी के साथ नृत्य करती नजर आने वाली हैं मोरक्कन-कनाडियन अदाकारा नोरा फतेही.

इस गीत से खुश व उत्साही नोरा फतेही कहती हैं-‘‘मैं इस गीत को लेकर बहुत खुश हॅूं. जब फिल्म के निर्माताओं ने मुझे आडीशन के लिए बुलाया था, तो मुझे यकीन नहीं था. पर जब निर्माताओं ने मुझे बुलाया तो मैं बहुत खुश हुई थी. इस गीत के फिल्मांकन के बाद तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. यह मेरी खुशकिस्मती है कि निर्माता जान अब्राहम ने सबसे पहले फिल्म के इसी गाने को बाजार में लाने का निर्णय लिया है.’’

निशिकांत कामत निर्देशित फिल्म ‘‘राकी हैंडसम’’ में जान अब्राहम के साथ श्रुति हासन की जोड़ी है. इसके अलावा अन्य कलाकार हैं- निशिकांत कामत, शरद केलकर, नतालिया कौर और दिया चालवाड़.

डायरेक्ट इश्क: प्रेम पर हावी एक्शन

त्रिकोणीय प्रेम कहानी वाली फिल्म ‘‘डायरेक्ट इश्क’’ में रोमांस की बजाय बेवजह के कॉमेडी सीन के साथ एक्शन की बहुतायत है.

बनारस शहर की इस एक्शन प्रधान रोमांटिक कहानी के केंद्र में तीन मुख्य पात्र हैं. डाली पांडे (निधि सुबैया), विक्की शुक्ला (रजनीश दुग्गल) और कबीर (अर्जुन बिजलानी). डाली पांडे एक उभरती हुई गायक है. वह गंगा के घाट पर गंगा आरती भी गाती है. उसकी तमन्ना संगीत जगत में एक बड़ा मुकाम हासिल करना है. निडर डाली पांडे मनचले लड़कों की पिटायी करने से नहीं हिचकिचाती है. विक्की शुक्ला स्थानीय गुंडा है. काशी हिंदू विश्व विद्यालय के छात्रसंघ के चुनाव में ठाकुर (हेमंत पांडे) को हराकर अध्यक्ष बन जाता है. जबकि मूलतःबनारस का ही कबीर मुंबई में निखिल बजाज के साथ एक बड़ी इवेंट कंपनी चलाता है और म्यूजिक कंसर्ट आयोजित करता है.

बनारस में रह रही कबीर की दादी उसकी शादी के लिए परेशान है. दादी के बुलावे पर कबीर बनारस आता है. एक लड़की को नापसंद करने के बाद वह दादी से कहता है कि मुंबई में उसकी गर्ल फ्रेंड है. दादी कबीर की गर्ल फ्रेंड से मिलना चाहती है, इसलिए वह डाली पांडे को मुंबई में बहुत बड़ी गायक बनने का मौका देने का वादा कर अपनी दादी से अपनी गर्ल फ्रेंड के तौर पर मिलवा देता है. फिर कबीर व डाली की मुलाकातें होने लगती हैं. उधर एक दिन विक्की शुक्ला की मुलाकात डाली पांडे से हो जाती है और वह उससे प्यार कर बैठता है. अब विक्की शुक्ला, डाली से शादी करना चाहता है. पर डाली, विक्की से शादी करने से मना कर देरती है. कबीर, डाली को लेकर मुंबई पहुंचता है और संगीत का एक बहुत बड़ा शो आयोजित करता है. पर तभी निखिल बजाज की प्रेमिका की वजह से निखिल व कबीर अलग हो जाते हैं.

अब निखिल मुंबई के एक गुंडे रावड़े भाउ की मदद से डाली का अपहरण करवा देता है. इधर डाली की तलाश में विक्की मुंबई पहुंच चुका है. रावड़े भाउ, निखिल से पैसे लेकर डाली को मौत के घाट उतारना चाहता है. पर एन वक्त पर विक्की वहां पहुंच जाता है. विक्की, रावडे़ भाउ के के आदमियों को अधमरा कर रावड़े को भी मारने वाला होता है, तभी पुलिस आ जाती है. निखिल बजाज तथा रावड़े गिरफ्तार हो जाते हैं. विक्की, डाली से शादी के मंडप में चलने के लिए कहता है. पर डाली, कबीर के साथ संगीत के शो में पहुंचकर गाना गाकर वाहवाही बटोरती है. पर तभी उसे विक्की की दिलेरी याद आती है और वह कबीर का शादी का प्रस्ताव ठुकराकर बनारस पहुंचती है. बनारस में गंगा घाट पर विक्की से मिलती है और उसके साथ शादी के लिए हामी भर देती है.

‘‘डायरेक्ट इश्क’’ की कहानी पूरी तरह से आनंद राय की सफल फिल्म ‘‘रांझणा’’ से प्रेरित है. मगर रांझणा एक संजीदा प्रेम कहानी थी, जबकि निर्देशक राजीव एस रूइया की फिल्म ‘डायरेक्ट इश्क’ में कामेडी व एक्शन के साथ मसाला फिल्मों का सारा तड़का है. फिल्म के पात्र काफी लाउड हैं. दादी के संवादों में आंचलिक भाषा का उपयोग किया गया है. निर्देशक ने इस फिल्म में ‘गे’ सहित कुछ पात्र बेवजह के जोड़े हैं. पूरी फिल्म देखने के बाद अहसास होता है कि निर्देशक ने त्रिकोणीय प्रेम कहानी का प्लाट पकड़ लिया और फिर वह कई पात्र पिरोते चल गया, पर उसके दिमाग में यह स्पष्ट ही नही है कि वह फिल्म को किस दिशा में ले जाना चाहता है. फिल्म का अंत भी बड़ा अजीब सा है. विक्की शुक्ला भगवान शंकर से जब बात करता है, तो लोगों को हंसी आती है. फिल्म में बनारस को खूबसूरती के साथ चित्रित किया गया है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो रजनीश दुग्गल, अर्जुन बिजलानी और निधि सुब्बैया तीनों ने अपने अपने पात्रों के साथ न्याय किया है. कैमरामैन सुरेश बीसवानी बधाई के पात्र हैं. मगर फिल्म में दर्शकों को थिएटर के अंदर खींचने की ताकत नजर नहीं आती.

 

भुगतान बैंक: बैंकिंग की नई परंपरा की शुरुआत

भारतीय रिजर्व बैंक ने भुगतान बैंकों के संचालन को स्वीकृति प्रदान करने के साथ बैंकिंग की नई परंपरा की शुरुआत की है. भारतीय रिजर्व बैंक की नजर में भुगतान बैंक का उद्देश्य वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देना है जिस के तहत लघु बचत खाते खोलना, प्रवासी श्रमिक वर्ग, निम्न आय अर्जित करने वाले परिवारों, लघु कारोबारों, असंगठित क्षेत्र के अन्य संस्थानों व अन्य उपयोगकर्ताओं को भुगतान, विपे्रषण सेवाएं प्रदान करना आदि है क्योंकि आज भी अधिकांश भारतीय नागरिक गांवों में निवास करते हैं.

125 करोड़ से ज्यादा जनसंख्या वाले इस देश में आज भी लगभग 24 करोड़ लोग बैंकिंग सेवाओं से नहीं जुड़ पाए हैं.  हालांकि प्रधानमंत्री जनधन योजना के अंतर्गत बैंकिंग सेवा से दूर लोगों को बैंकिंग से जोड़ने के लिए चलाए गए अभियान से 19 करोड़ लोगों को बैंकों से जोड़ने में सफलता मिली परंतु आज भी केवल 68 प्रतिशत लोग बैंकिंग जमा एवं 52 प्रतिशत लोग ही बैंक ऋण सेवा से जुड़ पाए हैं. गांवों की बात तो छोड़ दीजिए, शहरी इलाकों में भी आज काफी संख्या में ऐसे लोग मिल जाएंगे जो अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा अपने घरों में ही रखते हैं जो कि असुरक्षित होता है. प्रबंधन संस्था ‘प्राइस वाटर कूपर’ के अनुसार, इस समय भारत में 1,70,000 बैंक शाखाएं, 1,80,000 एटीएम, 3,57,000 बैंकिंग कौरेसपौंडैंट और तकरीबन 1.1 मिलियन पौइंट औफ सेल्स हैं जो ग्राहकों को अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं और प्रौद्योगिकी में हो रहे विस्तार के कारण इन की संख्या में इजाफा हो रहा है.

आज ग्रामीण ही नहीं, बल्कि शहरी इलाकों में भी परंपरागत बैंकिंग के अभाव में गैर बैंकिंग संस्थानों ने कुकुरमुत्तों की तरह अपने पैर पसार लिए हैं और अपनी आकर्षक योजनाओं के जाल में लोगों को फंसा कर उन की जमापूंजी ले कर चंपत हो जाते हैं. हम अरबों रुपए का गोल्डन फौरेस्ट घोटाला, पर्ल, एग्रीटैक, सहारा जैसे घोटाले भूले भी नहीं थे कि पश्चिम बंगाल में सारदा चिटफंड का करोड़ों रुपए का घोटाला उजागर हो गया. देश की कानून व्यवस्था ऐसे संस्थानों को रोक पाने में अब तक नाकाम रही है. ऐसे संस्थान जब आम जनता के करोड़ोंअरबों रुपए ले कर चंपत हो जाते हैं तब जा कर मीडिया और प्रशासन में शोर होता है. कुछ दिनों बाद ऐसे संस्थानों का धंधा फिर से बेरोकटोक चलने लगता है.

आरबीआई की सोच का परिणाम

भारतीय रिजर्व बैंक अब तक यूनिवर्सल बैंक के तहत ग्राहकों को सभी प्रकार के बैंकिंग लेनदेन, जैसे जमाराशियां जुटाने, ऋण देने तथा निवेश करने हेतु लाइसैंस जारी करता था परंतु पहली बार भुगतान बैंकों के लिए डिफरैंशियल लाइसैंस जारी किया गया है जिन के द्वारा केवल सीमित सेवाएं ग्राहकों को प्रदान की जाएंगी. इस तरह के लाइसैंस जारी करने से पहले भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा नचिकेत मोर समिति गठित की गई थी जिस ने दिसंबर 2013 में डिफरैंशियल लाइसैंस जारी करने की सिफारिश की थी.

इस के अलावा वित्तीय क्षेत्र सुधारों पर 7 वर्ष पूर्व गठित रघुराम राजन समिति की रिपोर्ट में भी यह कहा गया था कि निर्धन वर्ग तक वित्तीय सेवाएं पहुंचाने के लिए बैंकिंग को परंपरागत ढांचे से बाहर लाने की जरूरत है. इस रिपोर्ट में अन्य प्रस्तावों सहित केवल जमाराशि स्वीकार करने वाले रघु निजी बैंक स्थापित करने तथा सेवा परिचालन की लागत कम रखने हेतु प्रौद्योगिकी का अधिकाधिक उपयोग करने की सिफारिश की गई थी. रिजर्व बैंक को यह कदम इसलिए उठाना पड़ा क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की पहुंच दूरदराज के गांवों तक नहीं हो पा रही थी. यदि ऐसे बैंक वहां पहुंचे भी, तो आधारभूत ढांचे के अभाव में प्रभावी तरीके से काम नहीं कर पा रहे थे.

क्या है भुगतान बैंक

भुगतान बैंक एक विशेष प्रकार का बैंक है जिसे सीमित दायरे में बैंकिंग कार्य करने की अनुमति दी जाती है. ये बैंक जमाओं पर आधारित हैं जो ग्राहकों का पैसा जमा तो कर सकते हैं परंतु ग्राहकों को ऋण नहीं दे सकते. ग्राहकों के धन को सुरक्षित रखना और जब भी जरूरत पड़े उन का भुगतान करना तथा ग्रामीण जनता में वित्तीय प्रवेश को बढ़ावा देना जिस के तहत लघु बचत खाते खोलना, प्रवासी श्रमिक वर्ग, निम्न आय अर्जित करने वाले परिवारों, लघु कारोबारों, असंगठित क्षेत्र की अन्य संस्थानों व अन्य उपयोगकर्ताओं को भुगतान एवं विप्रेषण सेवाएं प्रदान करना ही इन बैंकों का मुख्य उद्देश्य है. प्रारंभ में ये बैंक प्रत्येक ग्राहक से अधिकतम 1 लाख रुपए की जमाराशि स्वीकार कर सकते हैं तथा इन जमाराशियों को नकदी या सरकारी प्रतिभूतियों में ही निवेश कर सकते हैं.

भुगतान बैंक एटीएम/डैबिट कार्ड तो जारी कर सकता है परंतु क्रैडिट कार्ड जारी नहीं कर सकता. ये अपने ग्राहकों को विभिन्न प्रौद्योगिक प्रणालियों के माध्यम से भुगतान और धन भेजने की सेवाएं प्रदान कर सकते हैं व म्यूचुअल फंड इकाइयों और बीमा उत्पाद जैसे जोखिम रहित सरल वित्तीय उत्पादों का वितरण कर सकते हैं. इन्हें बैंकिंग नियमावली 1987 की धारा 22 के अंतर्गत लाइसैंस जारी किए गए हैं. ये बैंक अपनी बैंकिंग सेवा, गांवों, कसबों और छोटे कामगारों तक बैंकिंग सुविधाओं को पहुंचाने का प्रयास करते हैं जिस से छोटे कारोबारी भी इन के माध्यम से आसानी से अपना पैसा जमा व अन्य लेनदेन कर सकें. इन बैंकों द्वारा इंटरनैट बैंकिंग की सुविधा भी प्रदान की जा सकेगी. भुगतान बैंक प्रीपेमैंट कार्ड के अलावा गिफ्ट कार्ड और मैट्रो कार्ड के साथ प्रौद्योगिकी आधारित लगभग सभी सेवाएं दे सकते हैं.

बैंकिंग व्यवस्था को बढ़ावा

आज भी ग्रामीण एवं शहरी इलाकों के कई छोटे व्यापारी व कम आय वाले लोग नकदी लेनदेन किया करते हैं और अपनी नकदी घर पर ही रखते हैं जिस से एक तो उन की राशि असुरक्षित होती है, दूसरी ओर उन्हें अपनी धनराशि पर कोई ब्याज नहीं मिलता. वहीं बैंकों में न सिर्फ राशि सुरक्षित होती है बल्कि वह ब्याज भी अर्जित करती है.

भुगतान बैंकों के खुलने से ग्रामीण एवं छोटे शहरी कारोबारियों में बैंकिंग के प्रति एक नई सोच विकसित होगी. इस से देश में बैंकिंग व्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा. ग्रामीण जनता आज भी मानसिक व आर्थिक रूप से शहरी नागरिकों की तुलना में हीनभावना से ग्रस्त होती है और उस के पास धन होते हुए भी वह बैंकों से दूर रहती है. भुगतान बैंक ग्रामीण समृद्ध लोगों को बैंकिंग धारा से जोड़ने का प्रयास करेंगे तो वहीं निर्धनों में बैंकिंग प्रणाली के प्रति जागरूकता फैलाने का भी काम करेंगे.

भुगतान बैंक के खिलाड़ी

भारतीय रिजर्व बैंक ने रिलायंस इंडस्ट्रीज, आदित्य बिड़ला नूवो, वोडाफोन, भारतीय एयरटैल, डाक विभाग, विजय शेखर शर्मा (पेटीएम के सीईओ), चोलामंडलम डिस्ट्रीब्यूशन सर्विसेज, टैक महिंद्रा, एनएसडीएल लिमिटेड, फिनो पेटेक और दिलीप सांघवी (सन फार्मा के प्रमोटर) जैसे 11 बड़े प्रतिष्ठित संस्थानों को भुगतान बैंक का लाइसैंस दिया है. वे उन्नत प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने के साथ इस संकल्पना का बेहतरीन इस्तेमाल करते हुए आमजन तक मूल बैंकिंग सेवा पहुंचाने के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे. वहीं, ये बड़े औद्योगिक घराने अपनी पेशेवर दक्षता का इस्तेमाल करते हुए बैंकिंग रहित क्षेत्रों में तेजी से बैंकिंग सेवाएं पहुंचाएंगे जो शायद अपनी व्यावसायिक मजबूरी के कारण सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंक अब तक नहीं कर पाए हैं.

भुगतान बैंक का लाइसैंस देने से बैंकिंग प्रणाली में और अधिक धन आएगा तथा ग्रामीण इलाकों में बैंकिंग सेवाओं का विस्तार होगा और हर गांव, मौडल गांव बनता चला जाएगा, जैसा कि अन्य देशों में है. इन में से कई संस्थाएं अभी से ही विभिन्न सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ साझेदारी में अपनी सेवाएं देना चाहती हैं ताकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का नैटवर्क का इस्तेमाल कर दूरस्थ इलाकों में बैंकिंग सेवाएं पहुंचाई जा सकें. भुगतान बैंक का लाइसैंस प्रतिष्ठित व्यक्ति एवं संस्थानों को दिया गया है एवं इस बैंक का पूंजी आधार 100 करोड़ रुपए का होगा और इन पर वित्तीय विनियामक की नजर निरंतर नजर बनी रहेगी जिस से जनता का पैसा पूरी तरह सुरक्षित रहेगा. भविष्य में एनबीएफसी, कौर्पोरेट बैंकिंग प्रतिनिधि, मोबाइल टैलीफोन कंपनी, सुपर मार्केट, रियल एस्टेट की कोऔपरेटिव, सरकारी कंपनियां, अन्य वाणिज्यिक बैंक आदि को भी भुगतान बैंक का लाइसैंस मिल सकता है.

भुगतान बैंक की मुख्य विशेषताएं ये हैं:

– भुगतान बैंक का पूंजी आधार 100 करोड़ रुपए का होगा.

– भुगतान बैंक को सिर्फ भुगतान करने का अधिकार होगा. इन्हें ऋण सेवाएं देने और प्रवासी भारतीयों का खाता खोलने की अनुमति नहीं होगी.

– भुगतान बैंकों में शुरू में प्रति ग्राहक अधिकतम 1 लाख रुपए तक की राशि जमा रखने की अनुमति होगी.

– भुगतान बैंक एटीएम डैबिट कार्ड तथा अन्य पूर्व जमा वाले भुगतान कार्ड आदि जारी कर सकेंगे लेकिन ये बैंक क्रैडिट कार्ड जारी नहीं कर सकेंगे.

– ये बैंक बिना जोखिम वाले साधारण वित्तीय उत्पाद जैसे बीमा उत्पादों के वितरण आदि का काम भी कर सकते हैं.

– इन के जरिए एक जगह से दूसरी जगह पैसे का भुगतान किया जा सकेगा, ये अपने प्रतिनिधियों, एटीएम व शाखाओं से नकदी का भुगतान करने का काम करेंगे.

– इन्हें इंटरनैट के जरिए भुगतान सुविधा देने की भी छूट होगी. ये किसी वाणिज्यिक बैंक के प्रतिनिधि भुगतान बैंक बनने का भी काम कर सकते हैं लेकिन इन्हें किसी भी ग्राहक के खाते में एक लाख रुपए तक की राशि रखने की ही आजादी होगी.

सामान्य बैंकों को चुनौती

रिजर्व बैंक द्वारा भुगतान बैंक की घोषणा होते ही सब से पहले भारतीय स्टेट बैंक की प्रमुख अरुंधति भट्टाचार्य ने इसे सामान्य बैंकों के लिए खतरा बताया. उन का कहना था कि इस से सामान्य बैंकों को चुनौती का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि भुगतान बैंक बिना किसी जोखिम के आ रहे हैं और वे ऐसी प्रणाली और आपूर्ति मौडल में प्रवेश कर रहे हैं जो चुस्तदुरुस्त है.

ईकौमर्स कंपनियों का उदाहरण देते हुए अरुंधती भट्टाचार्य ने कहा कि यदि नए बैंक बड़े उद्योगपतियों को दिए जाते हैं और वे बाजार हिस्सेदारी हासिल करने के लिए पूंजी खर्च करने का फैसला करते हैं, तो ऐसे में मौजूदा ऋणदाताओं के लिए काफी मुश्किल स्थिति पैदा हो जाएगी. भुगतान बैंकों को वेतन समझौते जैसे विरासती मुद्दों से नहीं जूझना होगा.

इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने कहा कि भुगतान बैंकों के पास ऐसी कोई सेवा नहीं है जो सामान्य बैंक नहीं दे सकते परंतु भुगतान बैंक वह सब नहीं कर सकते जो सामान्य बैंक कर सकते हैं. उन्होंने यह भी कहा, ‘‘भुगतान बैंक उपयोगी साबित होंगे क्योंकि वे संभावित भागीदारों को बैंकिंग प्रणाली में ला सकते हैं. मौजूदा बैंक इस से अपनी लागत कम कर सकते हैं, इस तरह से भुगतान बैंक सामान्य बैंकों के लिए फीडर की तरह काम करेंगे.’’

वहीं, आईडीएफसी बैंक और बंधन बैंक अपना पूर्ण बैंकिंग परिचालन शुरू करते हुए जमाराशियों पर बाजार से अधिक ब्याज दर दे रहे हैं जिस के चलते वे अन्य बैंकों के लिए चुनौती पैदा कर रहे हैं.

भुगतान बैंक व्यावसायिक संगठन के रूप में अपना कामकाज शुरू करेंगे और उन का उद्देश्य निश्चित तौर पर व्यावसायिक होगा. अन्य निजी संस्थाओं की तरह इन बैंकों का मुख्य फोकस लाभ कमाने पर होगा. हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक ने प्रारंभिक तौर पर ऐसे व्यावसायिक संस्थानों को भुगतान बैंकिंग का लाइसैंस देने के साथसाथ कई पाबंदियां भी लगा दी हैं ताकि वे आम जनता के पैसे का दुरुपयोग नहीं कर पाएं और उन का पैसा न सिर्फ सुरक्षित रहे बल्कि उन्हें अपनी बचत राशि पर अधिक से अधिक ब्याज भी अर्जित हो सके.

देखने की बात है कि भुगतान बैंक के लिए लाइसैंस जितने भी संस्थानों को दिए गए हैं वे या तो बड़े व्यापारिक घराने हैं या फिर बडे़ व्यापारिक घराने के प्रवर्तक हैं जो अपनी ऊंची राजनीतिक पहुंच का फायदा उठाते हुए नीतिनिर्धारकों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं और यह अंदेशा भी है कि भविष्य में इन बैंकों पर लगाई गई पाबंदियों में ढील दी जा सकती है.

पूरे यकीन के साथ अभी यह नहीं कहा जा सकता कि भुगतान बैंकों का स्वरूप भविष्य में भी यही रहेगा या फिर वह कुछ वर्षों तक सेवा देने के बाद वे अपना पूंजी आधार बढ़ाने की मांग करते हुए पूर्ण सेवा वाले बैंक खोलने की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं जिस के परिणामस्वरूप अन्य बैंक विशेषकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए एक कठिन चुनौती खड़ी हो सकती है.

आरबीआई के फैसले पर सवाल

भारतीय रिजर्व बैंक ने जिन उद्देश्यों से बड़े एवं प्रतिष्ठित औद्योगिकी घरानों को भुगतान बैंक का लाइसैंस दिया है उस से कुछ सवाल तो जरूर खड़े होते हैं. एक ओर भुगतान बैंकों को मुख्य वित्तीय समावेशन के मुख्य स्रोत के रूप में कार्य करना है परंतु दूसरी ओर इन्हें ऋण एवं क्रैडिट कार्ड के अलावा समस्त प्रौद्योगिकी आधारित सेवाएं देने की अनुमति दे दी गई है.

वहीं, इन का कारोबार का दायरा भी निर्धारित नहीं किया गया है कि ऐसे बैंक सिर्फ ग्रामीण इलाकों में ही अपना कारोबार करेंगे और शहरी क्षेत्रों से दूर रहेेंगे. इन का कारोबार दायरा व्यापक होने के कारण शुरुआत में तो इन का जोर ग्रामीण क्षेत्रों में जरूर रहेगा परंतु धीरेधीरे इन का जोर शहरी युवाओं को लुभाने का रहेगा जो प्रौद्योगिकी आधारित सेवाओं को प्राथमिकता देते हैं.

यहां यह प्रश्न उठता है कि देश की ग्रामीण जनता एवं ऐसे लोग जो ज्यादा पढ़ेलिखे एवं नई तकनीकों से परिचित नहीं हैं तथा कई मामलों में एटीएम का संचालन भी ठीक तरीके से नहीं कर पाते और आएदिन धोखेबाजों द्वारा एटीएम का प्रयोग सिखाने के नाम पर उन के एटीएम से पैसे निकालने की घटना घटती है.

ऐसे में ग्रामीण अनपढ़ जनता एकाएक इतनी सारी प्रौद्योगिक आधारित जमा, भुगतान एवं निवेश संबंधित सुविधाओं को इस्तेमाल करने के लिए कैसे तैयार हो जाएगी. अगर वह तैयार हो भी गई तो छोटेमोटे लेनदेन से क्या इन कंपनियों का व्यापारिक हित सध पाएगा? क्या वे अपनी स्थापना के उद्देश्य को पूरा कर पाएंगे? क्या फिर वे नीतिनिर्धारकों को प्रभावित कर पूर्ण बैंकिंग सेवा प्रदान करने का लाइसैंस प्राप्त करेंगे? और फिर अपनी ऊंची एवं राजनीतिक पहुंच का फायदा उठा कर बैंकिंग उद्योग के लिए एक चुनौती नहीं खड़ी करेंगे, ये सवाल हैं जिन के जवाब भविष्य में ही मिलेंगे.                 

 

टुकड़ा टुकड़ा जिंदगी

इस टुकड़ा टुकड़ा जिंदगी को

हंस के मैं पी रही हूं

किस्तों में मिल रही है

किस्तों में जी रही हूं

कभी आंखों में छिपा रह गया था

इक टुकड़ा बादल

बरसते उन अश्कों को

दिनरात मैं पी रही हूं

अक्स टूटतेबिखरते

आईनों से बाहर निकल आते हैं

मेरा समय ही अच्छा नहीं

बस जज्बातों में जी रही हूं

अश्कों के धागे से जोड़ने

बैठी हूं टूटा हुआ दिल

मैं पलपल कतराकतरा

मोम बन पिघल रही हूं

झांझर की तरह पांव में भंवर

हालात ने बांधे हैं

रुनझुन संगीत की तरह

मैं खनक रही हूं

मौत, हसीं दोस्त की तरह

दरवाजे तक भी नहीं आती

मैं घडि़यां जिंदगी की

इकइक सांस पे गिन रही हूं

किस्तों में मिल रही है

किस्तों में जी रही हूं

टुकड़ाटुकड़ा जिंदगी को

हंस के मैं पी रही हूं.

 

–  वंदना गोयल

 

बच्चों के मुख से

हम सब को अपने एक संबंधी के घर विवाह उत्सव पर जाना पड़ा. व्यस्त रहने के कारण मैं ने अपनी नन्ही पंखुरी को कहा, ‘‘मैं काम में व्यस्त हूं कहीं भूल न जाऊं, मुझे 2 बजे याद दिलाना. मुझे जरमनी में अपने भाई से फोन पर बात करनी है.’’ 2 बजने से आधा घंटा पहले ही पंखुरी मुझ से भाई को फोन करने की जिद करने लगी. मैं ने कहा, ‘‘फोन तो 2 बजे करना है.’’ इस पर वह कहने लगी, ‘‘इतनी दूर फोन करना है तो उसे पहुंचने में कम से कम आधा घंटा तो लगेगा.’’उस के मुख से ऐसी बात सुन कर मुझे हंसी आ गई.

– माया चावला, पश्चिम विहार (न.दि.)

मैं अपनी सहेली के घर गई थी. उस के 3 साल के भतीजे तन्व से मैं बातें कर रही थी कि तभी तन्व की मम्मी उस का लंचबौक्स ले कर आईं और खाना पूरा न खाने पर उसे डांटने लगीं. तन्व बड़े ही प्यार से खड़ा हुआ और फिर बोला कि मम्मी, इतना गुस्सा नहीं करते, छोड़ो, बंद करो इस लंचबौक्स को. और फिर अपनी मम्मी से लिपट कर प्यार से किस करते हुए बोला, ‘‘रहने भी दो न मम्मा, ये गुस्सा.’’ हम सभी की हंसी छूट गई और मैं सोचने लगी, काश हम भी इतनी समझदारी से अपने मातापिता का गुस्सा शांत कर पाते.

– रिचा राय, गाजियाबाद (उ.प्र.)

मेरी बड़ी बेटी प्रणवी 6 साल की थी. वैसे तो यह कम बोलती थी पर जब बोलती थी तो ऐसा कुछ बोलती कि सभी हंसहंस कर लोटपोट हो जाते. 1 अगस्त को मेरी बहन का जन्मदिन आता है. मैं दोनों बेटियों को बता रही थी कि मौसी का जन्मदिन है. सुन कर छोटी बेटी बोली, ‘‘ममा, हम जाएंगे.’’ मैं ने मना किया तो बेटी ने पूछा, ‘‘क्यों?’’ मैं ने टालने के लिए कह दिया कि बूढ़े लोग अपना जन्मदिन नहीं मनाते. सुन कर उस ने मुझे देखते हुए कहा कि अच्छा, ‘‘मैं ने तो देखा था एक बूढ़े को जन्मदिन मनाते.’’ मैं ने पूछा, ‘‘कैसे?’’इस पर वह शरारत से बोली, ‘‘दरअसल वह बुढि़या थी…’’ और हंसने लगी. उस की बातें सुन कर मेरी जोर से हंसी छूट गई.

– पुष्पा बिष्ट, गाजियाबाद (उ.प्र.)

कच्चे मन पर हावी हिंसा

गांव की चौहद्दी से बाहर उस ने पहली बार कदम रखा है दिल्ली में. बदन पर मैलीकुचैली फटीचिथड़ी शौल. पति वर्षों से मानसिक रोगी है. पूरे घर और परिवार की जिम्मेदारी है उस पर. गांव में दुनियाजहान से बेखबर पति और 5 छोटे बच्चों को छोड़ कर काफी दिनों से वह दिल्ली में है. एक अनजाने डर और सिहरन को अपने कलेजे में समेटे हुए ठिठुरनभरी रात में सड़क पर सिर झुकाए उकडूं हो कर बैठी है यह औरत. आखिर कौन है यह औरत?

दिल्ली की चलती बस में दरिंदगी से बलात्कार की घटना में मुख्य अभियुक्त नाबालिग राजू की मां है यह औरत. दिसंबर की उस बदनाम रात को चलती बस में गैंगरेप मामले में हुई बेटे की गिरफ्तारी के बाद से यह औरत दिल्ली में थी. अब कहां है, किसी को खबर नहीं. उस का बेटा राजू 6 साल पहले रोजगार तलाशने अपने कुछ दोस्तों के साथ 11 साल की उम्र में गांव से दिल्ली आया था. गांव में आलू के खेत में मजदूरी से पूरे घर का पेट नहीं भर पाता था. इसीलिए बेटे ने कमाने के मकसद से घर छोड़ा और दिल्ली जा पहुंचा. शुरूशुरू में राजू ने बसस्टैंड में बसों को धोनेपोंछने से ले कर ड्राइवरोंकंडक्टरों की जीहुजूरी करने तक का काम किया. फि र गाड़ी में हैल्पर बना. हर महीने 600 रुपए भेजा करता था. तब इस औरत को बेटे में अपना बड़ा सहारा नजर आया था. पर बाद में, पहले पैसे आने बंद हो गए, फि र चिट्ठीपत्री भी.

मां ने सोचा, बेटे की कोई मजबूरी होगी. बहुत छानबीन की पर कुछ पता नहीं चला. फि र एक दिन उस की चौखट पर पुलिस आ कर खड़ी हो गई. उस ने बताया, ‘कालेज की किसी लड़की के साथ बलात्कार के आरोप में उस के बेटे को गिरफ्तार कर लिया गया है,’ यह सुन कर वह एकदम से हताश हो गई.  यह तो दिल्ली की घटना है. दिल्ली चूंकि राजधानी है इसलिए वहां घटी किसी भी घटना का शोर ज्यादा होता है. अन्य शहरों में भी ऐसी घटनाएं घटती रहती हैं, पर पूरा देश बेखबर ही रह जाता है.

आइए, एक नजर अब कोलकाता पर भी डालें. कोलकाता में 5 साल की छोटी सी बच्ची का बलात्कार करने में असफ ल 2 बच्चों ने उस की हत्या कर दी. हत्या के अभियुक्त इन बच्चों की उम्र 10 और 12 साल थी.

कोलकाता के अलीपुर के पास हेस्टिंग में सेना के जवान के रिहायशी कौंप्लैक्स में रहती थी 5 साल की झुमझुम दास. कुछ समय पहले ही वह अपनी मां गौरी दास के साथ इस कौंप्लैक्स में आई थी. अभियुक्त दोनों बच्चों के अभिभावक सेना के आवासीय कौप्ंलैक्स में अधिकारियों के घर बरतनझाड़ूपोंछा का काम करते हैं. गौरी दास इसी कौंप्लैक्स में कर्नल डी के जोशी के यहां काम करती थी. नियमानुसार यहां काम करने वाले नौकरचाकरों को अपने परिवार के साथ अलग से बने क्वार्टर में रहना पड़ता है. इसी कौंप्लैक्स के दूसरे ब्लौक की छत से झुमझुम की लाश मिली थी. इसी ब्लौक के 12 साल के सुमन वैद्य और 10 साल के मोहम्मद जहांगीर पर बच्ची के साथ बलात्कार करने में असफ ल होने के बाद डर से गला दबा कर हत्या करने का आरोप है.

अंधेरे में भविष्य
किशोर अपराध की जब कभी चर्चा हो, सजल बारुई और एक अन्य मामले में सुदीपा पाल की याद बरबस आ ही जाती है. दमदम (कोलकाता) के सजल बारुई (16 साल) ने 5 दोस्तों की मदद से अपने पिता, सौतेली मां और सौतेले भाई की बेरहमी से हत्या कर दी थी. इस खबर से पूरा शहर सकते में आ गया था. बताया जाता है कि बड़े ही ठंडे दिमाग से सजल ने बाकायदा योजना बना कर परिवार के सदस्यों की हत्या चाकू से गोदगोद कर की और उस के बाद सरसों के तेल से उस ने चाकू को साफ किया. फि र पारिवारिक सदस्यों की लाशों और चारों तरफ  फैले खून के बीच अपने दोस्तों के साथ फ्रिज में रखी मिठाइयां डाइनिंग टेबल पर बैठ कर सजल ने खाईं. पूरी योजना को अंजाम देने के बाद पुलिस को गुमराह करने के लिए उस के दोस्त सजल को कुरसी से बांध कर चले गए. ऐसा कर के यह साबित करने की कोशिश की गई थी कि हत्यारे बाहरी लोग थे और उन का मकसद डाका डालना था. लेकिन खुफिया पुलिस को शुरू से ही सजल पर शक था. लेकिन तहकीकात में पुलिस ने पाया कि सौतेली मां और भाई से दुश्मनी निकालने के लिए सजल ने ही इस पूरी घटना को अंजाम दिया. कड़ी जिरह के दौरान सजल टूट गया और उस ने अपना अपराध कुबूल कर लिया. अदालत ने सजल को आजीवन करावास की सजा सुनाई. अभी हाल ही में वह जेल की चारदीवारी से मुक्त हुआ.

किशोर उम्र में अपराध की सजा काटने के बाद भी सजल में कोई सुधार नहीं हुआ है. जेल में रहने के दौरान किडनीजनित समस्या के कारण उसे अस्पताल में भरती किया गया था. लेकिन अस्पताल में ड्यूटी पर तैनात पुलिस वाले को शराब पिला कर वह भाग गया और मुंबई जा पहुंचा. वहां उस ने ब्याह किया और पत्नी को ले कर वापस आसनसोल पहुंचा था कि पुलिस की गिरफ्त में आ गया. फ रार होने का मामला अलग से चल रहा है. दमदम के सजल बारुई के अलावा किशोर अपराध का एक और मामला उत्तर 24 परगना के नोआपाड़ा में सुदीपा पाल नाम की एक लड़की का है. शादीशुदा ट्यूटर के प्रेम में पड़ कर सुदीपा ने अपने पूरे परिवार को रसगुल्ले में पोटैशियम साइनाइट मिला कर खिला दिया था.

एक और मामले में मामूली बात को ले कर हुए झगड़े के बाद एक किशोर ने अपने दोस्त को मुहल्ले के पोखर में डुबो कर उस के मुंह में जलीय पौधा डाल दम घोट कर मार डाला था. चौथी कक्षा के एक बच्चे ने मूंगफ ली को ले कर हुए झगड़े के बाद दोस्त को ईंटभट्ठे में ले जा कर सिर कुचल कर मार डाला. दक्षिण कोलकाता में चेतला की घटना में किशोर शुभ्रज्योति घोष का मामला भी बड़ा गंभीर है. उस के पिता ने पारिवारिक झगड़े के कारण आत्महत्या कर ली थी. पिता की आत्महत्या के लिए शुभ्रज्योति अपनी बूआ और दादी को जिम्मेदार मानता था. बदले की भावना से शुभ्रज्योति ने स्कूल से जाते समय कालीघाट से हंसिया खरीद कर बैग में रख लिया और स्कूल के बाद सीधे अपने दादा, दादी के घर जा पहुंचा. वहां उस ने खाना खाया, टीवी देखा और वीडियो गेम खेलता रहा. दोपहर में मौका देख कर सब से पहले उस ने बूआ पर हमला किया. बाद में बूआ को बचाने की कोशिश करते दादादादी की भी हत्या कर दी.

बाल अपराध के आंकड़े
राष्ट्रीय बाल अपराध के आंकड़े देखें तो ये बड़े चौंकाने वाले हैं. देश के विभिन्न शहरों में बाल अपराध की घटनाओं में इजाफा हुआ है. राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, 2001 में बलात्कार के मामले में 399 किशोर अभियुक्त थे. 10 साल बाद यानी 2011 में यह संख्या 1,419  पहुंच गई. (केवल दिल्ली में 942 है.) हत्या के मामले में 2001 में जो संख्या 51 थी वह 2011 में 888 हो गई. अगर 2011 की बात करें तो उस साल 16-18 साल के उम्र के कुल 21,657 अभियुक्तों की गिरफ्तारियां हुईं. 12-16 साल तक कुल 11,019 और 7 साल से 12 साल तक 1,211 गिरफ्तारियां हुईं. 2011 में कुल 33,387 गिरफ्तारियों में 6,122 निरक्षर पाए गए. प्राथमिक स्तर तक शिक्षाप्राप्त अभियुक्तों की संख्या 12,803 रही. वहीं, माध्यमिक स्तर पर फेल हो जाने वालों की संख्या 10,519 और पास होने वालों की संख्या 4,443 है.

एनसीआरबी के आंकड़ों की मानें तो साल 2003 से 2013 के बीच 10 वर्षों के दौरान करीब 379,283 नाबालिग अपराधियों को गिरफ्तार किया गया. 2013 में 16 से 18 साल के 28,860 बाल अपराधियों को अलगअलग मामलों में पुलिस ने पकड़ा. दिलचस्प तौर पर इन में लड़कियों का प्रतिशत करीब 4.3 था यानी 1,867 लड़कियां बाल अपराध में गिरफ्तार की गईं. सिर्फ 2013 में समूचे देश में 43,506 किशोर अपराधी गिरफ्तार किए गए. इन में मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र का नाम क्रमश: पहले व दूसरे स्थान पर आता है.

आंकड़ों के मुताबिक साल 2003 से 2013 के दरम्यान मध्य प्रदेश में जहां 75,307 बाल अपराधी पकड़े गए वहीं महाराष्ट्र में किशोर अपराधियों की गिरफ्तारी का यह आंकड़ा 72,154 था. बाल अपराध से जुड़े ये आंकड़े वाकई हैरान करने वाले हैं. 

बहस और कानून में बदलाव
इन दिनों पूरे देश में बहस है कि ऐसे दरिंदों को क्या वाकई नाबालिग होने के नाम पर सजा से छूट मिलनी चाहिए? बाल सुधार गृह में रहने के बाद क्या इन में कोई बदलाव आएगा? ऐसे दरिंदों को समाज में रहने का क्या अधिकार दिया जाना चाहिए? इन सवालों का जवाब पाने की कोशिश में एक बार दिल्ली गैंगरेप की शिकार दामिनी की मां के उद्गार पर नजर डाल लेना बेहतर होगा.

पहली बार जब उन्होंने मुंह खोला तो कहा, ‘‘जिस लड़के को सब नाबालिग कह रहे हैं, उसी ने मेरी बेटी को पहले लोहे की रौड से मारा. उस के शरीर में रौड डाल कर आंतों को बाहर निकाल लिया. रो कर जब वह दया की भीख मांग रही थी, तब उस ने गंदीगंदी गालियां दीं. बावजूद इस के, कानून उसे नाबालिग कह कर छूट देगा. यह कैसा न्याय है.’’ और अब यह पूरे देश में चर्चा का विषय है. बाल अपराध के आंकडे़ कहते हैं कि इस पर बहुत पहले समीक्षा की जानी चाहिए थी.

इसी बहस के मद्देनजर नाबालिग कहलाने की उम्र सीमा को 18 से घटा कर 16 वर्ष कर दिए जाने की बाबत देशभर पर लंबी बहस चली. आखिरकार विभिन्न जघन्य अपराधों में नाबालिगों की भागीदारी के मामले में किशोर अपराधियों को वर्ष 2000 के जूवेनाइल जस्टिस ऐक्ट के तहत किसी तरह की राहत का लाभ न दिए जाने पर विभिन्न तबकों की ओर से विशेष जोर दिया गया. 

टीवी व सिनेमा का कुप्रभाव
हाल की कुछ घटनाओं के मद्देनजर मनोचिकित्सक और समाजशास्त्री इन घटनाओं के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक विश्लेषण में जुट गए हैं. दिनोंदिन बाल अपराध की बढ़ती घटनाओं के लिए समाजशास्त्री और मनोचिकित्सक फिल्मों, डांस रिऐलिटी शो और धारावाहिकों के जरिए समाज में फैल रही अपसंस्कृति को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. इस संबंध में जूवेनाइल वैलफेयर बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष और मनोचिकित्सक डा. हिरण्यमय साहा का कहना है कि पिछले 10 सालों में हमारे देश में हर जगह अपरिपक्व मन में 10.15 फीसदी की दर से हिंसक प्रवृत्ति और यौन अपराध में वृद्धि देखी जा रही है. उन का यह भी कहना है कि बेरोजगारी और अभाव के बीच असहिष्णुता और आपराधिक प्रवृत्ति में लगातार इजाफ ा हो रहा है. खासतौर पर निम्न और निम्नमध्यवर्ग में इस तरह की प्रवृत्ति कुछ अधिक देखने में आ रही है. उन के अनुसार, बच्चों के कोमल मन में आपराधिक प्रवृत्तियों के हावी होने में परोक्ष रूप से टीवी जिम्मेदार है. यह बुद्धू बक्सा हमें महज बुद्धू नहीं बना रहा है, बल्कि हमारे बच्चों के कच्चे मन की गहराइयों में आपराधिक प्रवृत्तियों की जड़ें भी जमा रहा है.

डा. साहा का कहना है कि मनोवृत्ति की बात अगर कहें तो हम सभी के मन में प्रेम, लगाव, खुशी की सकारात्मक प्रवृत्ति की ही तरह राग, द्वेष, क्रोध, हिंसा जैसी नकारात्मक प्रवृत्ति जन्म के साथ मौजूद रहती है. लेकिन माहौल के अनुरूप ये प्रवृत्तियां हम पर हावी होती हैं. इन दिनों समाज में विभिन्न तरह की असमानताओं के बीच बच्चों के मन में हिंसक प्रवृत्ति दबे पांव जडें जमाती जा रही है. टीवी पर अंधविश्वास और भूतप्रेत की कहानियों वाले धारावाहिक दिखाते हैं तो खबरों के चैनलों में भी आपराधिक वारदातों का नाट्य रूपांतर कच्चे मन पर हिंसा के बीज बो देता है. आजकल खबरों के चैनलों से ले कर मनोरंजन चैनलों तक में अपराध व अंधविश्वास सब से अधिक बिकाऊ कार्यक्रम हैं. इन कार्यक्रमों के रास्ते बच्चे वयस्कों की ‘गुप्त’ दुनिया में पहुंच जाते हैं.

डा. हिरण्यमय का कहना है कि ऐसी घटनाएं परिवार में भाईबहनों के बीच भी घटती हैं लेकिन वहां महज यौन जिज्ञासा प्रमुख होती है. ठंडे दिमाग से हत्या जैसी घटना नहीं घटती जो कि इन दोनों के बच्चों के मामले में देखने में आया है. यहां बेरहमी से की गई हत्या की वजह मनोविकार भी हो सकता है.

हाल की इन घटनाओं के मद्देनजर एक और बात उजागर होती है और वह यह है कि 90 के दशक में उदारवादी नीति के चलते आर्थिक सुधार की जो हवा चली उस से देश तथाकथित विकास के रास्ते चल पड़ा. सही माने में विकास की रोशनी समाज के सभी तबकों तक नहीं पहुंची. यही कारण है 2002 में बाल अभियुक्तों की संख्या में बढ़ोतरी हुई थी. और इन दिनों एक बार फि र से आर्थिक सुधार की बयार चल पड़ी है.

बदलाव की जरूरत
मोदी सरकार के आने से भी कुछ खास बदलाव नहीं नजर आ रहा है. बेरोजगारी और महंगाई की मार में गरीब और गरीब होते जा रहे हैं. मध्यवर्ग, निम्नमध्यवर्ग सभी निम्नवर्ग बनने की ओर जा रहे हैं. हर साल कम से कम 20 लाख लोग मजबूरी में गांव से शहरों की ओर निकल पड़ते हैं. अपनी जड़ों से कट कर जब ये लोग शहरों में आते हैं, तब शहरों में इन का ठिकाना गंदी, बदहाल बस्ती में होता है. शहरी चकाचौंध के बीच कमियों का एहसास हताशा को जन्म देता है. तब समाज के प्रति गुस्से के कारण जानेअनजाने में आपराधिक प्रवृत्तियां हावी हो जाती हैं.

किम जोंग उन: तानाशाही का क्रूर और युवा चेहरा

उत्तर कोरिया का नेता किम जोंग उन दुनिया के सब से क्रूरतम तानाशाहों में से है. ऐसे खूंखार सिरफि रे तानाशाह से अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश भी थर्राता है. इस सनकी तानाशाह ने हाइड्रोजन बम का परीक्षण कर सब को चौंका दिया है. जैसा कि वह दावा कर रहा है. 8 जनवरी को किम ने अपना 33वां जन्मदिन मनाया, लेकिन इस से 2 दिन पूर्व हाइड्रोजन बम का परीक्षण कर दुनिया को ऐसा सबक दिया कि चीन, जापान और अमेरिका में भूचाल आ गया.

किम जोंग उन अपने पिता किम जोंग इल और दादा किम जोंग संग से भी खतरनाक है. वह आतंक के जरिए उत्तर कोरिया में शासन करना चाहता है. किम इतना क्रूर है कि उस ने अपने फूफा को खूंखार शिकारी कुत्तों के हवाले कर दिया. पिछले वर्ष अपने रक्षा मंत्री को तोप से उड़ा दिया. उस की गलती सिर्फ  इतनी थी कि वह एक सैन्य कार्यक्रम में सो गया था, जिस में किम जोंग उन मौजूद था. किम जोंग उन के पिता की मृत्यु 2011 में हो गई तब से किम जोंग उन ने उत्तर कोरिया की कमान अपने हाथों में ली. तब से अब तक वह 70 से अधिक नेताओं व अधिकारियों को मौत के घाट उतार चुका है.

इस सनकी तानाशाह से वहां के लोग परेशान हैं. पूरे देश की आर्थिक हालत चरमराई हुई है. यूनीसेफ की रिपोर्ट की मानें तो उत्तर कोरिया की कुल आबादी तकरीबन ढाई करोड़ है. इस आबादी में 60 लाख लोग ऐसे हैं जिन के पास खाने के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम तक नहीं है. ह्यूमन राइट्स अब्यूजेज की रिपोर्ट के आंकड़े तो और भयावह हैं. रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2012 में उत्तरी कोरिया में 17 बंधकों को सरेआम मार डाला जबकि 2013 में यह आंकड़ा 80 पार कर गया. ऐसे ही साल 2013 में आई रिपोर्ट कहती है कि किम जोंग ने अपने कार्यकाल के दौरान करीब 1 लाख 20 हजार नेताओं को अलगअलग कारागारों में मामूली सी बातों पर सनक कर बंद कर दिया था.

इस तानाशाह ने वहां के नियमकायदे अपने अनुसार बना रखे हैं. नियम भी ऐसेवैसे नहीं, वहां हर किसी को जाने की इजाजत नहीं है. पर्यटकों के लिए कई तरह की पाबंदियां हैं. वहां पर्यटकों को बिना गाइड के घूमने पर पाबंदी है. पर्यटक अपने होटल से तभी बाहर निकल सकता है जब उस के साथ कोई गाइड हो. कैमरा, लैपटौप और मोबाइल की अनुमति नहीं है. पर्यटकों को वहां लोकल करैंसी इस्तेमाल करने की भी इजाजत नहीं है. वे या तो यूएस डौलर, यूरो या फिर चीन की करैंसी युआन ही इस्तेमाल कर सकते हैं. यहां तक कि उस ने अपने नाम तक का पेटेंट करवा रखा है. कोई भी नागरिक अपने बच्चे का नाम ‘किम जोंग उन’ नहीं रख सकता. अगर जिस किसी का पहले से ही यह नाम है तो उसे फरमान सुना दिया गया है कि वह अपना नाम जन्म प्रमाणपत्र से बदलवा ले वरना इस की सजा तो वहां के नागरिक जानते ही हैं.

सत्ता संभालने से पहले वह स्विट्जरलैंड में रहता था. वहीं से उस ने पढ़ाई की है, इसलिए किम को स्विज चीजें, रफ्तार से दौड़ती कारें और तेजतर्रार लड़कियां ज्यादा भाती हैं. उत्तर कोरिया के लोग चाहे भूख से मरें या बीमारी से, किम को किसी की परवा नहीं. जबकि दक्षिण कोरिया के मुकाबले उत्तर कोरिया की प्रति व्यक्ति आय 17 गुना कम है. गरीबी वहां की बड़ी समस्या है पर किम जोंग उन को इस से कोई फर्क नहीं पड़ता. अपनी ऐयाशी और सैन्य ताकतों को मजबूत बनाने के लिए वह कुछ भी कर सकता है. माना जाता है कि इस सनकी को अगर गुस्सा आ जाए तो मिनटों में क्या कर दे, किसी को पता नहीं.

दुनिया में ऐसे तानाशाहों की कमी नहीं जिन्होंने सत्ता में बने रहने के लिए खून की नदियां बहा दीं. जरमनी को एडोल्फ हिटलर ने यूरोप की धरती को यहूदियों के खून से रंग दिया. मुअम्मर अल गद्दाफी, जिसे कर्नल गद्दाफी के नाम से जाना जाता है, ने 42 साल तक लीबिया में राज किया और अरब देशों में तानाशाही व भ्रष्टाचार के बलबूते खूब पैसा बनाया. ट्यूनीशिया और मिस्र में गद्दाफी के खिलाफ खूब प्रदर्शन हुए. बाद में गद्दाफी एक संदिग्ध हमले में मारा गया.

इसी तरह एक और तानाशाह इदी अमीन ने युगांडा में 1971 में सत्ता हथिया ली. अमीन का शासनकाल, कहने को तो महज 8 साल रहा लेकिन वहां की जनता के लिए यह 80 साल से कम नहीं था. इदी अमीन पर 50 हजार लोगों को मारने का इल्जाम लगा. वह कम उम्र की लड़कियों का शौकीन था. वह शादीशुदा था और 5 पत्नियां व दर्जनों बच्चे थे. बावजूद इस के, कम उम्र की लड़कियों के साथ रंगरेलियां मनाने से वह बाज नहीं आता था. साल 2003 में उस की मौत हो गई तब जवान होती लड़कियों ने राहत की सांस ली. एक तानाशाह ऐसा था जिस का नाम याह्या खां था. वह 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध का कारण बना. उस ने 1969 में पाकिस्तान की सत्ता संभाली और वहां मार्शल कानून लागू कर दिया था.

इसी तरह अमेरिका के नाक में दम कर देने वाला एक तानाशाह सद्दाम हुसैन भी था जिस ने इराक में 2 दशकों तक राज किया. उस ने सुन्नी मुसलमानों के बीच अलग छवि बनाई और अलग समूह भी बनाया. अमेरिका उसे मारने का वर्षों तक प्रयास करता रहा पर अमेरिकी सैनिकों की आंखों में वह धूल झोंकता रहा. आखिरकार अमेरिकी सैनिकों ने उसे ढूंढ़ निकाला. वह टिकरित के पास एक बंकर में छिपा मिला और कड़े सुरक्षा घेरों के बीच उसे फांसी पर लटका दिया गया. ऐसे कई तानाशाह हुए हैं जो खुद तो बरबाद हुए ही, साथ ही, अपने मुल्क को भी बरबाद कर गए.

किम जोंग उन को लगता है कि उस के साथ ऐसा कुछ नहीं होगा. किम के पास परमाणु बमों का जखीरा है, इसलिए वह बाकी मुल्कों को धौंस दिखाता रहता है. जानकार मानते हैं कि उत्तर कोरिया ऐसे ही धौंस नहीं दिखाता. भले ही चीन आज हाइड्रोजन बम को ले कर उस की निंदा कर रहा हो लेकिन कहीं न कहीं चीन, उत्तर कोरिया को दिशानिर्देश देने में पीछे नहीं है. चीन पूरे प्रशांत महासागर में राज करना चाहता है. अमेरिका इस बात से बेखबर नहीं है, इसलिए अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जौन किर्बी ने साफ शब्दों में कह दिया कि उत्तर कोरिया के सभी उकसावों का उचित जवाब देंगे. अमेरिका को इस बात का विश्वास नहीं हो रहा है, इसलिए वह उस दावे की सचाई जानने के लिए टोही विमान भेज कर सुबूत इकट्ठा करने में जुट गया है.

हाल में खबर आई है कि उत्तर कोरिया लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल प्रक्षेपित करने की तैयारी में है. इस बात की पुष्टि सैटेलाइट तसवीरों के विश्लेषण से भी की जा रही है. यह खबर ऐसे में और चिंताजनक व गंभीर हो जाती है जब बीते दिनों उत्तर कोरिया ने हाइड्रोजन बम के परीक्षण का दावा किया था. दिलचस्प यह भी है कि इस खबर को ले कर सब से ज्यादा कान अमेरिका व जापान के खड़े हुए हैं. उत्तर कोरिया की सनक व तानाशाही से भरे फैसलों का विध्वंसक हथियारों से संबंध पूरी दुनिया के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है. अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार तो यहां तक कहते हैं कि चीन दुनिया में अपनी धमक बनाने व अमेरिका पर दबाव डालने के मकसद से उत्तर कोरिया को उकसाने का काम करता है. अगर इस थ्योरी में सचाई है तो एक हद तक वह अपनी इस कूटनीति में शायद सफल भी रहा है.

इस मामले में सब से दुखद पहलू यही है कि सत्ता, दैनिक, ऐयाशी व हथियारों की सनक के चलते यह मुल्क तबाही के कगार पर आ गया है. अगर किम जोंग उन अपनी सनक छोड़ कर देश की संपदासंपत्ति का इस्तेमाल देश की जनता के लिए करता तो उत्तर कोरिया की भी हालत दक्षिण कोरिया सरीखी संपन्न व खुशहाल होती. इस बीच, जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने भी इस की कड़ी निंदा की और कहा कि हाइड्रोजन बम परीक्षण हमारे देश के लिए गंभीर खतरा है. चीन की दुविधा यह है कि उत्तर कोरिया के इस परीक्षण से चीनी सीमा पर अस्थिरता का माहौल पैदा हो सकता है और वह अपने पड़ोस में खतरनाक हथियारों की होड़ से घबरा भी रहा है कि इसे कैसे रोका जाए. इस के लिए कई बार अधिकारियों ने यह कोशिश भी की कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और किम जोंग उन की मुलाकात हो पर अभी तक ऐसा हो न सका.

इधर, किम जोंग उन को इस परीक्षण से एक मजबूती मिली है. लेकिन किम के शासन में उत्तर कोरिया में अराजकता की स्थिति बनी हुई है और लाखों शरणार्थी चीन की तरफ  कूच कर रहे हैं.

 

 

सैल्फी के दीवाने युवा

‘तू मेरे साथ सैल्फी ले, मैं तेरे साथ सैल्फी लूंगा’ का जनून युवाओं के सिर चढ़ कर बोल रहा है, क्योंकि आज हर युवा अपनी लाइफ के हर मूवमैंट को जी भर कर न सिर्फ जीना चाहता है, बल्कि हर पल को कैप्चर भी करना चाहता है. इस के लिए उन्हें जहां कहीं भी मौका मिलता है वे सैल्फी लेने लगते हैं. यहां तक कि सैल्फी लेने के चक्कर में वे अपनी सेफ्टी तक को भी इग्नोर कर देते हैं. क्योंकि वे अपने ग्रुप में सैल्फी के माध्यम से सैंटर औफ अट्रैक्शन जो बनना चाहते हैं.

आप को यह जान कर हैरानी होगी कि जब औक्सफोर्ड डिक्शनरी ने 2013 में सैल्फी वर्ड को ‘वर्ड औफ द ईयर’ घोषित किया था तब भी किसी को इस बात का अंदाजा नहीं था कि इस का प्रचलन हद से ज्यादा बढ़ जाएगा, लेकिन हकीकत तो यही है कि आज युवा सैल्फी के पीछे पागलों की तरह बिहेव करने लगे हैं.

युवा टैक्नोलौजी का इस्तेमाल करें इस में कोई हर्ज नहीं, लेकिन हम इस के चक्कर में खुद का ही नुकसान कर बैठें तो इस में कोई समझदारी नहीं कहलाएगी. जैसे पानी के तेज बहाव के बीच खड़े हो कर या फिर जानवरों के साथ सैल्फी लेना आम देखा जाने लगा है, जो किसी भी सूरत में खतरे से खाली नहीं है.

कहने का तात्पर्य है कि सैल्फी का सीमित और सही प्रयोग होना चाहिए साथ ही सैल्फी के साथ कोई मकसद भी जुड़ा होना चाहिए. जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘सैल्फी विद डौटर’ अभियान शुरू किया. इस का मकसद बेटियों को हाईलाइट करना था, जो हमारे समाज व देश के लिए बड़े गर्व की बात है. इसलिए कोशिश यही करनी चाहिए कि किसी भी टैक्नोलौजी को यूज करते समय उस से ज्यादा से ज्यादा फायदा हो न कि उस का इस्तेमाल कर के टैक्नोलौजी को ही बदनाम करे. क्योंकि बुराई टैक्नोलौजी में नहीं बल्कि हमारे द्वारा की गई अति में है.

क्यों बढ़ा सैल्फी का चलन

फोटोज के लिए निर्भरता कम
पहले युवाओं को फोटोज क्लिक करवाने के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था. साथ ही उन के नखरे अलग सहने पड़ते थे, लेकिन मोबाइल कंपनियों द्वारा स्मार्टफोन्स में दी गई फ्रंट कैमरे की सुविधा ने युवाओं की इस प्रौब्लम को भी हल कर दिया है. अब वे कभी भी, कहीं भी, किसी भी मौके की सैल्फी खुद क्लिक करने लगे हैं. यहां तक कि अगर वे किसी ऐसी पार्टी में जाते हैं जहां किसी सैलिब्रिटी को इन्वाइट किया गया होता है तो वहां भी उन्हें फोटो के लिए कैमरामैन से रिक्वैस्ट नहीं करनी पड़ती कि प्लीज मेरा एक फोटो इन के साथ ले लीजिए बल्कि खुद ही उस सैलिब्रिटी के पास जा कर वन सैल्फी विद यू कह कर उन के साथ बिताए पल को कैप्चर कर लेते हैं और फिर सोशल साइट्स या अपनी डीपी पर लगा कर वाहवाही भी लूटते हैं.

ज्यादा अटै्रक्टिव फोटोज कैप्चर
किसी भी कार्य के लिए किसी अन्य पर निर्भरता हमें पूर्ण संतुष्टि प्रदान नहीं करती. एक तो उस के आगेपीछे चक्कर लगाते रहो और दूसरा जो और जैसा हम चाहते हैं वह मिले, इस की भी कोई गारंटी नहीं.

जैसे अगर हम किसी से अपना फोटो खिंचवाते हैं तो जरूरी नहीं कि वह फोटो बैस्ट ही खींचा गया हो और हमें पसंद आए, साथ ही हम उस से बारबार फोटो दिखाने की फरमाइश भी नहीं कर सकते जबकि हम जब सैल्फी लेते हैं तो हमारे पास उस को देखने का औप्शन भी होता है. अगर हमें लगता है कि इस पोज में परफैक्ट पिक नहीं आ रही तो हम झट से स्टाइल चेंज कर लेते हैं और तब तक प्रयास जारी रखते हैं जब तक परफैक्ट फोटो क्लिक न हो जाए.

फन और मजा भी
आप आउटिंग पर अपने फ्रैंड्स या फैमिली के साथ जाएं और सैल्फी न लें ऐसा हो ही नहीं सकता. वहां हम ने कैसे फ्रैंड्स व फैमिली के साथ गले में हाथ डाल कर मस्ती की, गोलगप्पे खाते हुए कैसेकैसे मुंह बनाए इन सब मूवमैंट्स को सैल्फी के माध्यम से आसानी से कैद किया जा सकता है. इतना ही नहीं हम फंकी स्टाइल्स व लुक्स की भी सैल्फी लिए बिना नहीं रह पाते, क्योंकि इस में हमें मजा जो आता है और जब बाद में हम इन्हीं सब पलों के फोटोज साथ मिल कर देखते हैं तो हंसहंस कर लोटपोट हो जाते हैं.

आप ही सोचिए, अगर हम टेढ़ेमेढ़े मुंह बना कर किसी और से फोटो क्लिक करवाएंगे तो हंसी के पात्र बनेंगे लेकिन जब हम खुद अपने अजीब स्टाइल्स के फोटोज खींचते हैं तो उस दौरान किसी का ध्यान हम पर नहीं जाता और ऐसे पोजों में सैल्फी लेने से हमें अलग ही खुशी मिलती है सो अलग.

लाइक्स से कौन्फिडैंस बूस्ट
हर कोई अपनी तारीफ सुनना चाहता है, क्योंकि अगर कोई हमारी तारीफ कर देता है तो हम मन ही मन सोचने लग जाते हैं कि जरूर हम में कोई बात तो है तभी हमारी प्रशंसा हुई है, इस से हमारा कौन्फिडैंस भी काफी बढ़ता है.

ठीक उसी तरह सैल्फी लेने और फिर उसे सोशल साइट्स या अपनी डीपी पर सैट करने के मात्र कुछ सैकंड में ही लाइक्स की लाइन लग जाती है. ढेरों लाइक्स देख कर हम खुशी के मारे फूले नहीं समाते और भविष्य में खुद को और बेहतर ढंग से प्रैजेंट करने की कोशिश करते हैं, जिस से हम प्रैजेंटटेबल तो बनते ही हैं साथ ही हमारा कौन्फिडैंस लैवल भी काफी बढ़ता है.

ग्रुप में हीरो बनने का मौका
फ्रैंड्स के बीच ऐंट्री करते ही या फिर दूर से आप को देखते ही आप के फ्रैंड्स आप के मस्त लुक की चर्चा करने लगें तो किसे अच्छा नहीं लगेगा.

जब से सैल्फी का प्रचलन बढ़ा है तब से युवा अपने लुक व अपनी हर ड्रैस का अपडेट डीपी या फिर सोशल साइट्स पर डालने लगे हैं. यहां तक कि अगर पूरे दिन में 8-9 बार भी डीपी चेंज हो जाए तो कोई बड़ी बात नहीं, क्योंकि वे ऐसा सोचते हैं कि अगर कोई फ्रैंड हमारा मैसेज नहीं भी चैक करे, लेकिन चेंज डीपी देख कर हमारा इनबौक्स जरूर खोलेगा और पिक देख कर कमैंट किए बिना भी नहीं रह पाएगा कि यार, तेरा लुक तो मस्त लग रहा है, तू कितनी स्मार्ट होती जा रही है वगैरावगैरा. आप की स्मार्ट व कूल पिक्स देख कर आप के कुछ फ्रैंड्स तो जैलेस तक फील करेंगे. इस तरह आप अपने ग्रुप में सैल्फी के कारण छा जाएंगे.

सैक्सी लुक के फोटोज लेना भी संभव
सैक्सी लुक की सैल्फी ले कर अपने बौयफ्रैंड या फिर गर्लफ्रैंड को भेजने की इच्छा हर किसी में होती है. जैसे युवतियां बी दिखाने वाली फोटोज से अपने बौयफ्रैंड के दिल में उतर जाना चाहती हैं, उसी तरह युवक भी कुछ ऐसे ही बिंदास लुक अपनी प्रेमिका को लुभाने हेतु पोस्ट करना चाहते हैं.

लेकिन पहले इस तरह के फोटोज भेजना ज्यादा संभव नहीं था, क्योंकि हमें फोटोज खिंचवाने के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था लेकिन जब से मोबाइल में फ्रंट कैमरे की सुविधा आई है तब से कैसा भी हौट से हौट लुक आप अपने प्रेमी या प्रेमिका को भेज सकते हैं. लेकिन ऐसा सिर्फ और सिर्फ सैल्फी लेने के कारण ही संभव हो पाया है.

मैंबर मिस होने का झंझट नहीं
पहले परिवार के सभी सदस्य या फ्रैंड्स एकसाथ फोटो नहीं खिंचवा पाते थे, क्योंकि एक मैंबर को फोटो जो खींचना पड़ता था, लेकिन अब फ्रंट कैमरे की सुविधा ने इस समस्या से नजात दिलवा दी है. अब सभी एकसाथ फोटो में नजर आ सकते हैं.

सैल्फी आप का आईना
अगर आप इंटरव्यू देने जा रहे हैं या फिर अपने किसी खास से मिलने और आप यह सोचसोच कर परेशान हैं कि आप प्रैजेंटटेबल लग रहे हैं कि नहीं, तो इस के लिए सैल्फी बैस्ट तरीका है.

आप सैल्फी ले कर यह देख सकते हैं कि आप कैसे दिख रहे हैं, फेस अट्रैक्टिव लग रहा है या नहीं. अगर आप को थोड़ी सी भी कमी लगती है तो आप उस में सुधार कर के खुद को बैस्ट रूप में प्रैजेंट कर सकते हैं. इस तरह सैल्फी आप के आईने का काम करती है और इस के माध्यम से खुद को ज्यादा करीब व अच्छे से देखने का मौका मिलता है.

सैल्फी के नुकसान भी हैं
भले ही युवा सैल्फी के पीछे पागल हों लेकिन हम इस बात को भी नहीं नकार सकते कि इस के फायदे के साथसाथ नुकसान भी हैं जो इस प्रकार हैं :

–       कहीं भी खड़े हो कर सैल्फी लेने से पर्सनैलिटी प्रभावित होती है.

–       युवा स्टाइल मारने के चक्कर में रेल की पटरी व छतों पर भी सैल्फी लेने से नहीं डरते, जिस से कई बार जान से हाथ तक धोना पड़ता है.

–       सैल्फी पर अच्छे कमैंट्स व ज्यादा लाइक्स न मिलने पर वे निराश हो जाते हैं.

–       खुद को ले कर ज्यादा कौंशियस रहने लगते हैं.

–       सैल्फी के दीवानेपन ने युवाओं को अपनों से दूर कर दिया है.

–       कोई भी आप का फोटो डाउनलोड कर मिसयूज कर सकता है.

–       पढ़ाई से ध्यान भटकता है क्योंकि सारा फोकस सैल्फी लेने पर केंद्रित रहता है.

–       अच्छी सैल्फी लेने के चक्कर में युवा हर 2-3 महीने में बैस्ट कैमरा क्वालिटी वाला फोन तक खरीद लेते हैं चाहे इस के लिए उन्हें पेरैंट्स से झगड़ना ही क्यों न पड़े.

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