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पहली गेंद पर छक्का मारने की सोचता हूं: हार्दिक पांड्या

टीम इंडिया के ऑलराउंडर और बहुत कम समय में टीम एक खास जगह बना चुके हार्दिक पांड्या को कुछ लोग महज पिंच हिटर मानते हैं. हालांकि इस क्रिकेटर ने जोर देकर कहा है कि वो महज पिंच हिटर नहीं बल्कि प्रॉपर बल्लेबाज हैं.

'ऐसे ही खेलते आया हूं मैं'
बांग्लादेश के खिलाफ एशिया कप के पहले मैच में 18 गेंद में 31 रन बनाने वाले पांड्या की कप्तान महेंद्र सिंह धौनी ने भी तारीफ की. पांड्या ने कहा, 'यह मेरी शैली है और मैं ऐसे ही खेलता आया हूं. मुझे कभी पिंच हिटर के रूप में नहीं भेजा गया. मेरा मानना है कि मैं प्रॉपर बल्लेबाज हूं. यही वजह है कि मुझे किसी ने किसी खास शैली में बल्लेबाजी के लिए नहीं बोला. यह अच्छी बात है कि मैं उस रफ्तार से बल्लेबाजी कर पा रहा हूं जिसकी टीम को जरूरत है.'

'बचपन से पहली गेंद पर छक्का मारने का शौक रहा है'
उन्होंने कहा, 'मुझे नहीं पता कि आक्रामक बल्लेबाजी का मैंने कहां से सीखा. बचपन से मेरी आदत छक्के लगाने की थी. मैं हमेशा गेंद को पीटना चाहता था.' पांड्या ने कहा, 'जब मैं 16 या 17 साल का था तब भी छक्के लगाना मेरा शौक था. मुझे लगता था कि पहली गेंद से ही मुझे छक्का लगाना है. मैंने अभी तक ऐसी ही क्रिकेट खेली है. कई बार यह कामयाब रहता है तो कई बार नहीं.' उन्होंने कहा कि उनका कोई रोल मॉडल नहीं है लेकिन उन्हें दक्षिण अफ्रीका के एबी डिविलियर्स और धौनी की बल्लेबाजी पसंद है.

 

 

 

मैसी ने अफगान में अपने नन्हे फैन के लिए भेजी जर्सी

अर्जेटीना के स्टार फुटबॉलर लियोनल मैसी ने अफगानिस्तान में रहने वाले पांच वर्ष के अपने नन्हे प्रशंसक के लिए हस्ताक्षर की हुई जर्सी काबुल भेजी है.

दुनियाभर में मैसी के करोड़ों प्रशंसक हैं लेकिन दुनिया के इस दिग्गज फुटबॉलर ने अपने मात्र पांच वर्ष के इस प्रशंसक को सबसे अधिक सराहा और यही कारण है कि मैसी ने उपहार स्वरूप मुर्तजा अहमदी के लिए खासतौर पर हस्ताक्षर कर जर्सी भेजी है जो अर्जेंटीना से अफगानिस्तान का सफर तय करने के बाद मुर्तजा के पास पहुंची.

मैसी ने इस नन्हे प्रशंसक के लिए दो जर्सी भेजी हैं जिसे लेने के लिए मुर्तजा अपने परिवार के साथ गजनी प्रांत से लंबा सफर तय करके काबुल पहुंचा. मैसी ने अंतरराष्ट्रीय संस्था यूनीसेफ की मदद से इस बच्चे को यह उपहार भेजा है. मैसी यूनीसेफ में गुडविल एम्बेसेडर हैं.

अशांति और उथल पुथल का शिकार अफगानिस्तान में रहने वाला यह बच्चा इंटरनेट के जरिए मशहूर हुआ.प्लास्टिक के एक बैग पर मैसी लिखकर बनाई गई जर्सी पहनकर खेलते हुए मुर्तजा की तस्वीरें दुनिया में चर्चा का विषय बन गई. यूनीसेफ के अफगानिस्तान में प्रवक्ता डेनिस शेफर्ड जानसन ने बताया कि मुर्तजा मैसी की जर्सी देखकर इतना खुश था कि वह लगातार हंस रहा था और बार-बार यही कह रहा था कि मुझे मैसी से बहुत प्यार है.

मैसी ने अपनी जर्सी पर स्पेनिश में लिखा ‘विद लव’.मैसी के नन्हे प्रशंसक के परिजनों ने बताया कि उनके लिए मैसी की जर्सी को खरीदना संभव नहीं था क्योंकि वे बहुत गरीब हैं. यह परिवार काबुल के निकट बेहद अशांत गजनी प्रांत में रहता है और अल्पसंख्यक हजारा समुदाय से है.

इस बीच दुनियाभर में लोकप्रिय हो चुके मुर्तजा से मिलने के लिए मैसी भी बहुत उत्सुक हैं और अफगान फुटबॉल संघ ने बताया कि मैसी उनके साथ संपर्क में है और मुर्तजा के साथ मुलाकात को लेकर प्रयास कर रहे हैं. काबुल स्थित स्पेनिश एंबेसी ने भी मुर्तजा के परिवार वालों को मैसी से मिलवाने के लिए हर संभव मदद देने की बात कही है. गौरतलब है कि अफगानिस्तान में फुटबॉल और क्रिकेट दोनों ही बेहद लोकप्रिय खेल हैं.

दरिंदगी की शर्मनाक हद

गोवा में नए साल के जश्न के बाद एक नौजवान की रहस्मयी मौत के मद्देनजर पूछताछ के दौरान एक लड़की के अंग में मिर्च का पाउडर डाल देने का मामला सामने आया. लेकिन यह कोई अकेला मामला नहीं था. औरतों के नाजुक अंग पर इस तरह की दरिंदगी की वारदात आम है. औरत तो औरत, छोटी बच्चियों के साथ भी ऐसे वाकिए पेश आते हैं.

छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के परपोड़ी इलाके में दुकलहीन बाई नामक एक औरत पर तांत्रिक होने के शक के चलते पूरे गांव के सामने उस के सारे कपड़े उतारे गए और फिर उस के अंग में मिर्च का पाउडर डाल दिया गया. करनाल, हरियाणा में एक रिकशा चलाने वाले ने अपनी पत्नी पर बदचलनी का आरोप लगा कर उस के अंग में मिर्च का पाउडर डाल दिया था. शर्म के मारे उस औरत ने किसी से कुछ नहीं कहा, लेकिन जब हालत बिगड़ती चली गई, तो मामला सामने आया. तब जा कर पुलिस ने अस्पताल में उस का इलाज कराया.

आरोपी के बेटे के मुताबिक, उस के पिता ने ऐसा घिनौना काम पहले भी कई बार किया था. पश्चिम बंगाल में वीरभूम जिले के नानूर थाने के कीर्णाहार इलाके में तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच बमबारी की घटना हुई.

इस घटना के दौरान तृणमूल कांग्रेस के पंचायत प्रधान के घर पर भी बम से हमला हुआ. इस घटना में पुलिस ने पाडुई के सात्तोर गांव के शेख मिठुन नाम के एक शख्स को नामजद किया था. बताया जाता है कि शेख मिठुन भाजपा का समर्थक है और स्थानीय भाजपा नेताओं के उकसावे में आ कर उस ने पंचायत प्रधान के घर पर बम से हमला किया था. इस हमले में शेख मिठुन खुद भी घायल हुआ था. पुलिस का मानना है कि हमले की घटना के बाद पानागढ़ के एक प्राइवेट नर्सिंगहोम में इलाज के बाद वह अपनी काकी के मायके में जा छिपा था.

उधर मामले की जांच टीम तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय नेताओं के साथ शेख मिठुन की गिरफ्तारी के लिए उस के घर गई. लेकिन घर पर वह नहीं मिला, तो पुलिस ने देवशाला गांव में उस के रिश्तेदारों के घर पर छापा मारा. वहां भी शेख मिठुन को न पा कर तृणमूल कांग्रेस नेताओं के दबाव में आ कर पुलिस मिठुन की काकी सईफुन्नेसा बीबी को उठा लाई. आरोप है कि फरार शेख मिठुन का पता पूछने के लिए पाडुई थाने के प्रभारी अमरजीत विश्वास, बोलपुर थाने के अफसरों और स्थानीय तृणमूल कांग्रेस के 2 नेताओं की मौजूदगी में 18 जनवरी की ठिठुरती ठंड में रातभर जंगल में सईफुन्नेसा बीबी पर बेरहमी से जोरजुल्म किया गया.

सब से पहले तो सईफुन्नेसा बीबी को जंगल में एक पेड़ से बांध कर पीटा गया. उसे इतना पीटा गया कि पुलिस की 2-2 लाठियां टूट गईं. पिटाई से सईफुन्नेसा बीबी के दोनों हाथों की उंगलियां टूट गई थीं. ब्लेड से उस के शरीर पर चोट पहुंचाई गई. दोनों हथेलियों को ब्लेड से काट कर जख्मी कर दिया गया. इतना ही नहीं, सईफुन्नेसा बीबी के अंग में खुजली और जलन पैदा करने वाली जहरीली पत्तियों को रगड़ दिया गया.

इतने जोरजुल्म के बाद सईफुन्नेसा बीबी जब बेहोश हो गई, तब थाने ला कर उसे रातभर के लिए पटक दिया. गंभीर रूप से जख्मी हालत में पुलिस ने सुबह उसे छोड़ दिया. गिरतेपड़ते सुबह जब वह किसी तरह गांव पहुंची, तो घर वाले उसे सिउड़ी के स्वास्थ्य केंद्र ले गए. बाद में स्वास्थ्य केंद्र ने उसे वीरभूम जिला अस्पताल को रैफर कर दिया. जब पीडि़ता का पति सबूर शेख पाडुई थाने में पुलिस के खिलाफ शिकायत का मामला दर्ज कराने पहुंचा, तो पुलिस ने शिकायत दर्ज करने से न केवल मना किया, बल्कि उसे धक्के दे कर बाहर कर दिया. पुलिस की यह दरिंदगी देख गांव वालों के बीच गुस्सा भड़क उठा. तब घटना का राजनीतिक फायदा लेने के लिए वामपंथियों से ले कर कांग्रेसी भी बीच में कूद पड़े. मामला फिलहाल कलकत्ता हाईकोर्ट में लंबित है. ऐसी ही एक घटना पिछले साल टीटागढ़ पुलिस स्टेशन के तहत भी सामने आई थी. टीटागढ़ की एक औरत संध्या सेन ने अपनी 6 साल की बेटी को बिस्तर में पेशाब करने की सजा के तौर पर उस के अंग में मिर्ची का पाउडर डाल दिया था.

टीटागढ़ पुलिस के मुताबिक, श्यामल सेन और संध्या के कोई औलाद नहीं थी. उन्होंने 6 साल की एक बच्ची को गोद लिया था. दरअसल, बच्ची के मातापिता की मौत हो गई थी. वह अपनी एक काकी के यहां पलबढ़ रही थी. लेकिन काकी ने माली तंगी के चलते सेन दंपती को बच्ची दे दी थी. गोद लेने के लिए कानूनी खानापूरी नहीं की गई थी. बहरहाल, यह मामला सामने आने के बाद पुलिस ने सेन दंपती को गिरफ्तार किया और गंभीर हालत में बच्ची को कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में इलाज के लिए भेजा. इलाज के बाद बच्ची की काउंसलिंग चल रही है.

हालांकि गिरफ्तारी के बाद श्यामल सेन को जमानत मिल गई, लेकिन संध्या सेन को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. फिलहाल तो इस मामले की जांच का जिम्मा जिला बाल कल्याण समिति के पास है.

प्यूर्टो रिको: मजा अमेरिका का, आनंद गोवा का

फ्लोरिडा, कैलिफोर्निया जैसे कुछ राज्यों को छोड़ कर अमेरिका के ज्यादातर राज्यों में सर्दी का मौसम भारतीयों के लिए असहनीय हो जाता है. ऐसे में अमेरिका के वंडर्स देख पाने के बजाय भारतीय टूरिस्ट गरम होटलों, कमरों, आर्ट गैलरियों में या फिर म्यूजियमों आदि में अपना समय व्यतीत करते हैं, क्योंकि सर्दी के मौसम में यहां हर घर, दुकान, मौल, गैलरी, म्यूजियम, भवन, औफिस अंदर से गरम रखा जाता है. सर्दी में जबतब बर्फ गिरती है. हिम, पाला, तुषार के इस मौसम के लिए आप को छाता, गरम कपड़े, कोट, दस्ताने, कैप तो चाहिए ही, शायद स्नो शूज भी खरीदने पड़ें.

ऐसे मौसम में आप की अमेरिकी यात्रा के सिलसिले में एक खास सुझाव यह है कि इस यात्रा के बीच समय निकाल 1 हफ्ते के लिए प्यूर्टो रिको हो आएं. अमेरिका के इस सहदेश की राजधानी सैन जुआन है. यहां जा कर आप को अमेरिका की कड़ाके की सर्दी से न केवल राहत मिलेगी, बल्कि सागर के मध्य बसे इस देश में आप को गोवा जैसा आनंद भी मिलेगा. नारियल, केले, पपीते के मनोहारी वृक्ष, गोवा जैसी गरमाहट, सुंदर चौपाटियां, सागर की मादक हवा, स्विमिंग पूल, भरपूर हरियाली आदि आप का मन मोह लेंगे. यहां के लोग भी हमीं जैसे हैं. अंगरेजी भाषा से यहां काम चल जाएगा, यह भी लाभ है.

नया जोश नई ऊर्जा

प्यूर्टो रिको देखने के बाद मन में पहला विचार यही आया कि वहां के आनंदकारी अनुभव गृहशोभा के पाठकों से शेयर करूं. खास बात यह है कि अगर आप ने अमेरिका का वीजा प्राप्त कर लिया है तो प्यूर्टो रिको को देखने से आप को कोई नहीं रोक सकता. जी हां, अमेरिकी वीजा व करेंसी ही चलते हैं वहां. दिलचस्प तथ्य यह भी है कि मेजर महानगरों न्यूयौर्क, अटलांटा, शिकागो, लास एंजिल्स, मियामी आदि से प्यूर्टो रिको की सीधी उड़ानें हैं जोकि आप को जल्दी सैन जुआन पहुंचा देंगी. इन सुविधाओं के अलावा यहां खानापीना, घूमना वगैरह भी अमेरिका के मुकाबले सस्ता है.

वहां जा कर अमेरिका की कड़ाके की सर्दी से 1 सप्ताह राहत पा जश्न मनाएं, फिर अमेरिका देखने पहुंचें, नए जोश, नई ऊर्जा के साथ. मैं परिवार संग अमेरिका गई तो मैं ने भी यही किया. जी हां, 6 दिन का वह सुंदर ट्रिप मुझे भूलता नहीं. तो आइए, आप को भी प्यूर्टो रिको घुमा लाऊं…

प्यूर्टो रिको में कायदाकानून अमेरिका का ही चलता है. अत: इसे अमेरिका का 51वां राज्य भी बोला जाता है, पर आप यहां महसूस करेंगे कि यह आजाद देश जैसा ही है. यहां की प्रमुख भाषा स्पैनिश है, यद्यपि अंगरेजी बोलसमझ लेने वाले पर्यटकों को कोई दिक्कत नहीं. यहां साइनबोर्ड स्पैनिश में हैं, फिर भी हर साल यहां 40-45 लाख टूरिस्ट आते हैं. हमें कुछ लोग ऐसे भी मिले जोकि पूरी सर्दी यहीं बिता कर बाद में अमेरिका जाते हैं.

विशाल और भव्य दृश्य

मैं अपने पति, बेटेबहू, पोतेपोती के संग न्यूयौर्क से निकली तो हम लोग 4 घंटों में ही सैन जुआन पहुंच गए. युनाइटेड की इस फ्लाइट में पानी और जूस तो मुफ्त सर्व हुआ, परंतु खाने का सामान खरीदना पड़ा. सैन जुआन में दुनिया के कई देशों से रोज फ्लाइटें आती हैं. अत: यह काफी बड़ा एअरपोर्ट है. खाने के स्थानीय व अमेरिकन जौइंट्स सभी एअरपोर्ट पर उपलब्ध हैं. यहां एअरपोर्ट पर थोड़ा खापी कर हम ने यहीं से किराए पर एक बड़ी कार ले ली, जिस ने 6 दिन का हम से 500 डौलर किराया लिया. इसे ड्राइव कर फिर अपने होटल विंढम पहुंचे, जहां 5 रातें ठहरने के लिए हम ने 3 कमरों का कोंडो किराए पर लिया. इस का टोटल किराया 1,500 डौलर था. कोंडो में बढि़या फर्नीचर, बरतन, फ्रिज, माइक्रोवेव जैसी सभी सुविधाएं थीं. थोड़ीबहुत खाद्यसामग्री हम बाजार से खरीद लाए. बाकी होटल से मंगाते थे.

2-3 घंटे आराम कर हम 4 बजे शहर देखने निकले. इस पहले दिन हमें पूरा माहौल खूब सुंदर दिखा मानो हम गोवा में हों. अलबत्ता गोवा के मुकाबले भीड़ व ट्रैफिक काफी कम था. खानेपीने और सामान खरीदने के लिए अमेरिकन रेस्तरां व दुकानों के साथसाथ स्थानीय रेस्तरां व दुकानें भी थीं. सड़क के किनारे हम ने केले, सेब, पपीते वगैरह भी खरीदे, न्यूयौर्क से आधे भाव में. फिर हम पहुंच गए पुराने सैन जुआन इलाके में एक सुंदर पुराना किला देखने. 1539 में इस किले का निर्माण स्पेनी लोगों ने शुरू किया था और जब पूरा बन गया तो इसे नाम दिया गया ‘कैस्टिलो सैन फैलिपे डेल मोरो.’ आज इस के अवशेष देखें तो भी मुंह से ये शब्द निकलेंगे कि विशाल, भव्य, रोमांचक. सागर से 140 फुट ऊंचा निर्मित यह किला पुराने सैन जुआन इलाके में है, जहां खूब रौनक है. असंख्य छोटीछोटी दुकानें हैं और हैं पुराने किस्म के सुंदर मकान. स्थानीय भोजन के अनेक रेस्तराओं में चुन कर एक में हम ने भोजन किया. रेस्तरां के बाहर स्ट्रीट डांसर व गायक टूरिस्टों के लिए परफौर्म कर रहे थे. लाइव डांस, म्यूजिक और पेट भर भोजन ने हमें करीबकरीब मदहोश कर दिया.

रोमांचक नजारे

एक और पुराना किला भी है सैन जुआन में जिस का नाम है ‘कैसिलो द सैन क्रिस्टोबल’ परंतु वह बंद हो चुका था. अत: देख नहीं पाए. पुराने सैन जुआन में हम ने एक ऐसी दुकान भी देखी जिस पर लिखा था, ‘आयुर्वेदिक मैडिसिन’ परंतु दुकान बंद थी. बहरहाल, हमारा पहला दिन संतुष्टि भरा गुजरा. रात को बढि़या नींद आई, मगर पंखा चला कर. लगा हम गोवा के किसी होटल में हैं अपनों के बीच. अगले दिन नाश्ता कर स्विमिंग कौस्ट्यूम में स्विमिंग पूल पहुंच गए. होटल के ग्राउंड फ्लोर पर 4 पूल्स हैं. इन में एक छोटे बच्चों के लिए है. बड़े बच्चों के लिए पूल में कूदने के लिए टेढ़ीमेढ़ी मजेदार स्लाइड्स हैं. घंटों जी भर के नहाए. बीचबीच में पास बने रेस्तरां में खातेपीते भी रहे.

बाद में होटल की दीवार से सटे सागर तट पर खूब घूमे. सागर जल एकदम स्वच्छ था. कहीं कोई गंदगी नहीं. सागर जल सूर्य की किरणों को पकड़ कभी सुनहरा, कभी हरा तो कभी नीला रंग इख्तियार कर लेता. 3-4 बजे कमरे में आ कर सो गए, फिर शाम को अनोखे अनुभव के लिए बायो बे गए. कहते हैं कि पूरी दुनिया में केवल 5 बायो बे स्थल हैं, जिन में से 3 प्यूर्टो रिको में हैं. इस नजरिए से प्यूर्टो रिको अनोखा है. हम ने इन में केवल एक ही बायो बे देखा और वह भी 2 किस्तों में, रात के वक्त. दूसरे और तीसरे दिन रात को 2-2 टिकट ही मिल पाए. रात 8 से 10 बजे के बीच देखे ये बायो बे वाकई रोमांचक थे.

अनोखा पर्यटक स्थल

सागर के कुछ ऐसे उथले अनोखे स्थल होते हैं जहां मैंग्रोट्ज के मध्य कुछ अद्भुत जीवाणु पनपते हैं, जो रात के समय जुगनुओं की तरह चमकते हैं. ये लाखोंकरोड़ों जीटाणु नीले, हरे प्रकाश से और ज्यादा चमकते हैं. इन्हीं स्थलों को बायो बे कहा जाता है, परंतु इन के पनपने के लिए खास कुदरती इकोलौजी चाहिए. इन स्थलों पर आप पैट्रोल, डीजल वाली मोटरबोट नहीं ले जा सकते, क्योंकि प्रदूषण इन जीवाणुओं को नष्ट कर देता है. इसीलिए हम लोग चप्पू चला कर साधारण बोटों से एक लीड बोट के पीछेपीछे बायो बे देखने गए. इस प्रकार की बोटिंग को कयाकिंग कहा जाता है. चढ़तेउतरते वक्त आप को कमर तक पानी में घुसना पड़ता है, परंतु प्रकृति की इस अद्भुत लीला का आनंद ही जुदा है. प्यूर्टो रिको की जो बायो बे हम ने देखी वह सैन जुआन में ही है. फ्जार्दो नामक स्थान पर बायो बे की बुकिंग बहुत पहले हो जाती है. अत: हमें वही टिकट मिल पाए थे जो कैंसल हुए थे. इसी कारण हम 2 किस्तों में गए थे.

2 अन्य बायो बे हैं- ला पार्गुयेरा और वियेक्स मैस्किटो बे. यद्यपि हम इन्हें देख नहीं पाए पर इन की भी तारीफ खूब सुनी. सैन जुआन में हमें स्थानीय लोगों ने बताया कि टूरिस्टों की अधिकता के कारण इन बे स्थलों पर प्रदूषण बढ़ रहा है और जीवाणुओं की संख्या कम हो रही है. हो सकता है कि कुछ वर्षों में ही ये बायो बे खत्म हो जाएं. प्यूर्टो रिको में अमेरिकन मैक डोनाल्ड, सबवे, डंकिन डोनट्स वगैरह सभी हैं, पर हम ‘चिलीज’ में ज्यादा जाते रहे. यहां वैजिटेरियन फूड मिलता है. चायकौफी, दूध वगैरह का स्टाक तो कमरे में ही था, बाहर से लेने की जरूरत नहीं पड़ी. इस प्रकार 3 दिन आराम से गुजर गए. तीसरी रात भी जी भर कर सोए. होटल के कमरे में आप को अतिरिक्त सुविधाएं चाहिए हों तो पहले ही सूचित कर देना बेहतर रहता है. वैसे जब भी आप होटल स्टाफ से बात करेंगे, वे सेवा के लिए तत्पर दिखाई देंगे.

अद्भुत प्राकृतिक नजारे

चौथे दिन हम अमेजौन, इंडोनेशिया, कांगो आदि वर्षावनों को देखने गए. छातेवाते लिए और थोड़े सैंडविच वगैरह बांधे निकल पड़े रेन फौरैस्ट देखने. कुछ किलोमीटर ही हमारी कार चली होगी कि घने वृक्ष शुरू हो गए. अचानक एक सुंदर बड़ा झरना दिखा तो कार रोक उस का आनंद लिया. उसे ‘ला कोका’ फौल कहते हैं. आगे 1-2 किलोमीटर के बाद हम पहुंच गए ‘एल यंग’ रेन फौरैस्ट. वाह, क्या नजारा. अद्भुत वृक्षलताएं, स्थानीय तोते और कोकी मेढक (बहुत छोटा मेढक है यह मगर खास आवाज में चिल्लानाटर्राना खूब जानते हैं), अन्यान्य लिजर्ड, रंगबिरंगे वृक्ष. टूरिस्टों के लिए जंगल में कैनोपियां बनी हैं ताकि अचानक बारिश शुरू होने पर उन में शरण ले सकें.

एक कैनोपी में बैठ कर सैंडविचचाय का आनंद लिया, फिर थोड़ा और घूमे. वापस आने का मन नहीं था. बीचबीच में वर्षा होती रही. 3-4 बजे भारी मन से कोंडो लौटे. थोड़ा आराम किया, खायापिया और फिर शाम ‘चिलीज’ रेस्तरां के नाम की. यहां खूब भीड़ थी. पेट भर खाया फिर कोंडो लौट आए.

दुनिया में हरी, नीली, पिंक और सफेद बालू वाले अनेक बीच हैं. 5वें दिन हम जल्दी जगे, बिना नहाए निकल पड़े कुलेब्रा आइलैंड के लिए जहां सफेद बालू वाले कई बीच हैं. इस के लिए पहले हम ने एक फैरी ली, जिस ने हमें कुलेब्रा पहुंचाया. फिर एक जीप किराए पर ले कर हम कुलेब्रा के सर्वाधिक लोकप्रिय बीच फ्लेमेंको पहुंचे. यह बीच विश्व के सर्वाधिक प्रसिद्ध बीचेज में शामिल है. यहां कोई पर्यटक सनबाथ, कोई स्नान, कोई कैंप आउट, कोई बोटिंग, कोई कयाकिंग तो कोई अन्य स्नोर्कलिंग में व्यस्त था. इस बीच को ‘बीच औफ व्हाइट सैंड्स ऐंड क्लियर ब्लू वाटर्स’ यों ही नहीं कहते. जल वाकई नीला व स्वच्छ था. हम ने भारत में इतना सुंदर, स्वच्छ, बढि़या बीच पहले नहीं देखा. यहां तक कि अमेरिका का ऐटलांटिक सिटी बीच भी इतना सुंदर नहीं. बहरहाल, कुल मिला कर लगा हम अपने प्रिय गोवा में हैं. शाम तक होटल वापस आ गए. फिर स्विमिंग पूल में घुस जलक्रीड़ा में मग्न हो गए.

नियमों का पालन जरूरी

स्विमिंग पूल्स के पास एक छोटा बगीचा भी है जहां 10 इगुआना पाली हुई हैं. टूरिस्ट उन्हें पत्ते खिला कर उन से दोस्ती करते हैं. इगुआना यहां की प्रसिद्ध लिजर्ड है जोकि बेबी मगरमच्छ जैसी लगती है. हम ने पहले इगुआना किसी भी म्यूजियम में नहीं देखी थीं. पूल्स से निकल हम इगुआना देखने चले गए पर खेलखेल में जब इगुआना ने हमारे पोते को काट लिया तो हम टैंशन में आ गए. पर गार्ड ने आश्वस्त किया कि कटे स्थान को साबुनपानी से धो निश्चिंत हो जाएं.

अगले दिन होटल से चैकआउट कर एअरपोर्ट के लिए निकल पड़े. फ्लाइट पकड़ न्यूयौर्क आ गए. नई ऊर्जा और नए ज्ञान के साथ लोग जिस रेसिज्म की बातें करते हैं वह हम ने न अमेरिका में महसूस की और न ही प्यूर्टो रिको में. हम तो यही कहेंगे कि वसुधा वाकई एक कुटुंब है. खूब पर्यटन कीजिए और कुटुंबीजनों से मिलते रहिए. हां, कोई ऐसा काम वहां न करें जिस कारण लज्जित होना पड़े खासकर कचरा तो कचरा डब्बे में ही डालें. स्थानीय नियमों का पालन करें और पर्यटन का पूरापूरा लुत्फ उठाएं.

झुग्गी झोंपड़ी तोड़ने से उपजे कुछ सवाल

आज के समय में झुग्गी बस्ती मेहनतकश जनता के लिए वैसी ही है, जैसी मछली के लिए पानी. अगर झुग्गियां नहीं रहीं, तो मजदूरों को रहने के लिए कोई दूसरी सुविधा मुहैया नहीं है. इस के बावजूद सालों पुरानी झुग्गियों को उजाड़ा जाता है.

दिल्ली के शकूरबस्ती इलाके में 12 दिसंबर, 2015 को तकरीबन एक हजार झुग्गियां तोड़ दी गईं. झुग्गियों को तोड़ने की कार्यवाही को सही ठहराने के लिए रेलवे ने कई बातें कहीं, जैसे 3 बार नोटिस दिया जा चुका था, रेलवे को इस जगह की जरूरत है, झुग्गी वाले रेलों पर पत्थर फेंकते हैं, चोरी करते हैं वगैरह.

शकूरबस्ती की झुग्गियां साल 1978 से हैं. इन को रेलवे कालोनी के रूप में बसाने के बजाय उजाड़ रही है. इस झुग्गी बस्ती में बिजली, पानी व शौचालय के नाम पर कोई सुविधा नहीं है. 3 सौ रुपए प्रति महीने पर कुछ लोग प्राइवेट बिजली लिए हुए हैं, जिस से एक सीएफएल बल्ब जलता है. शौचालय के लिए खुले में जाना पड़ता है.

शकूरबस्ती में 90 फीसदी लोग बिहार से आ कर बसे हैं, जो मालगाड़ी से सीमेंट खाली करने का काम करते हैं, जिसे दिल्ली व दूसरे इलाकों में ट्रक द्वारा सप्लाई किया जाता है. साल 1978 में अजमेरी गेट से सीमेंट उतारने का काम शकूरबस्ती में शिफ्ट किया गया था. तब जो मजदूर अजमेरी गेट में थे, वे शकूरबस्ती में आ गए थे.

साल 1978 से यहां रह रहे कैलाश यादव बताते हैं कि उन्हें बंधुआ मजदूर जैसा काम करना पड़ता है. मोहम्मद अजहर आलम मधेपुरा के रहने वाले हैं, जो 1983 से शकूरबस्ती में रह कर सीमेंट उतारने का काम करते हैं. वे बताते हैं कि शुरुआती समय में मालगाड़ी समय से खाली हो, इस के लिए डिस्ट्रिब्यूटर आराम करते मजदूरों से जबरदस्ती काम कराने के लिए जीआरपी पुलिस को पैसा देते थे.

मुख्तीर खातून बिहार की सहरसा जिले की रहने वाली हैं. वे अपने बुजुर्ग व विकलांग पति मुहम्मद इलियास के साथ 18-20 साल से शकूरबस्ती में रहती हैं. उन्होंने अपने बेटे मोहम्मद सबीर को बहुत ही मेहनत से पाला था. उन्होंने उस की शादी आइसा से कुछ साल पहले कर दी थी. मोहम्मद सबीर दिन में मालगाड़ी से सीमेंट उतारता, रात को ट्रक में लोड करता. 24 सितंबर, 2015 की रात को मोहम्मद सबीर सीमेंट से लदी गाड़ी को खाली करने के लिए जा रहा था. गाड़ी 4-5 किलोमीटर ही चली थी कि वह पलट गई. मोहम्मद सबीर गंभीर रूप से घायल हुआ. रात को 1 बजे उसे महावीर अस्पताल पहुंचाया गया, जहां 5 घंटे बाद उस की मौत हो गई.

आसपास के लोगों ने 36 हजार रुपए चंदे में जमा कर के मोहम्मद सबीर के परिवार को मदद पहुंचाई. अब मुख्तीर खातून झुग्गी टूटने से काफी परेशान हैं और नेताओं को कोसते हुए कहती हैं कि झुग्गी टूट गई, लेकिन उन को एक कंबल या टैंट तक नहीं मिला है. 22 साला मुहम्मद असीम विकलांग है. वह अपनी बहन के पास रह कर ही बस्ती में दुकान चलाता है. बहन घरों में साफसफाई करने का काम करती है. मुहम्मद असीम परिवार के लिए 14-15 साल की उम्र में दिल्ली आ गया था और लारैंस रोड की एक फैक्टरी में काम करता था.

साल 2008 में वह मालगाड़ी के नीचे से गुजरा था कि अचानक गाड़ी चल पड़ी और वह विकलांग हो गया. वह एक छोटी सी दुकान खोल कर रोजीरोटी चला रहा था, लेकिन उस की दुकान भी तोड़ दी गई. शकूरबस्ती पंजाबी बाग का वही इलाका है, जहां पर प्रदूषण की मात्रा बहुत ज्यादा है. उस की अहम वजह शकूरबस्ती में सीमेंट का गोदाम है, जहां पर लाखों बोरी सीमेंट रोज उतारे जाते हैं. 

सीमेंट के गरदे से बचने के लिए मजदूर 3-4 पैंट और कमीज पहनते हैं. अंदर वाली पैंट और कमीज को वे रस्सी से बांधते हैं, जिस से कि वे शरीर में पूरी तरह चिपके हों और सीमेंट से शरीर का बचाव हो. वे चेहरे पर तौलिया बांधते हैं, ताकि नाक द्वारा सीमेंट अंदर नहीं जाए. ठंड में तो इतने कपड़े पहनना चल जाता है, लेकिन गरमियों में 40-50 डिगरी के तापमान में जब लोग एयरकंडीशंड घरों, गाडि़यों और दफ्तरों में रहते हैं, उस समय भी वे इन 3-4 कपड़ों में लिपटे होते हैं और सिर पर 50 किलो का वजन ले कर दौड़ लगाते हैं.

जिस तरक्की को दिखा कर सरकार तरक्की का ढोल पीटती है, तो उस तरक्की में एक बड़ा योगदान शकूरबस्ती के लोगों का भी है. इस तरक्की का खमियाजा इन बस्ती वालों को बीमारी के रूप में भुगतना पड़ता है. रेलवे ने चोरी करने और गंदगी फैलाने का आरोप लगा कर झुग्गी तोड़ने को सही ठहराया है. क्या वह यह बता सकता है कि शकूरबस्ती रेलवे से क्या चोरी हुआ है, जो बस्ती वालों ने चुराया है? इस मामले में क्या किसी की कभी गिरफ्तारी हुई है?

साल 2012 के दिल्ली अर्बन डेवलपमैंट अथौरिटी के आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली के 685 झुग्गी बस्तियों की 4,18,282 झुग्गियों में 20,29,755 लोग रहते हैं. साल 2014 में झुग्गी बस्तियों की तादाद 675 हो गई, जिन में 3,32,022 झुग्गियों में 16,17,239 लोग रहते हैं. आखिरी 2 साल में 10 झुग्गी बस्तियों के 4,12,516 लोग कहां गए? उन को कहां दोबारा बसाया गया है? सरकार के पास क्या इस का कोई आंकड़ा है?

दरअसल, सरकार जिन लोगों को उजाड़ती है, उस में से ज्यादातर लोग दूसरी जगह की झुग्गी बस्तियों में जा कर रहना शुरू कर देते हैं, इसलिए झुग्गी बस्तियों की तादाद कम होती है, लेकिन आबादी बढ़ती जाती है. गांव से उजड़े नए लोग भी इन बस्तियों में आ कर ही रहते हैं. दिल्ली सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली की आधा फीसदी जमीन में 16,17,239 लोग रह रहे हैं, जबकि असलियत यह है कि इस से भी कम जमीन पर तकरीबन 40 लाख लोग इन बस्तियों में रहते हैं.

जब ऐसी बस्तियां तोड़ी जाती हैं तो नेता वहां से उजाड़े गए लोगों के हमदर्द बन कर जाते हैं, पर उन के लिए कोई ठोस काम नहीं करते हैं. सामाजिक रूप से इन्हें चोर, गंदगी फैलाने वाले बता कर उजाड़ा जाता है. क्या समाज हमेशा ही बेरहम बना रहेगा

औड-ईवन फार्मूला स्वागत योग्य

दिल्ली सरकार के सड़कों पर प्रदूषण को नियंत्रित करने के प्रयास की सराहना की जानी चाहिए, चाहे यह कामयाब हो या न हो सरकार ने दिल्ली की खराब होती हवा के लिए जनता को खुद जिम्मेदारी दे कर एहसास करा दिया है कि पर्यावरण से ज्यादा खिलवाड़ करना ठीक नहीं होगा और अगर इस की कीमत जान दे कर नहीं चुकानी तो थोड़ी कठिनाई सहिए.

यह ठीक है कि फैलते शहरों में आम लोगों की जरूरत के लायक परिवहन व्यवस्था नहीं बन पाई पर इस का मतलब यह नहीं कि हर नागरिक हर चीज को गारंटीड ले. आज दिल्ली में ही नहीं, पूरे देश में लोग नए मकान, नए दफ्तर, नए शौपिंग सैंटर बिना सोचेसमझे बनाए जा रहे हैं. बिना सोचेसमझे जंगल काट कर कंक्रीट उगाई जा रही है. बिना सोचेसमझे सड़कों पर वाहन ठूंसे जा रहे हैं. सरकारों को दोष देना आसान है पर अपने गरीबान में भी झांकना जरूरी है. आज युवा खासतौर पर एक बढि़या पिज्जा खाने के लिए 20 किलोमीटर दूर जाने को तैयार हैं, क्यों? युवा कालेज चुनते हुए नहीं देखते कि वह घर से कितनी दूर है, क्यों? मातापिता अच्छे स्कूल के नाम पर बच्चों को दूर के स्कूल में दाखिला दिला देते हैं, क्यों?

अगर शहरी लोगों को अपने समय, अपनी जेब, अपनी सेहत का खयाल नहीं है तो सरकार को कोसने से काम नहीं चलेगा और अगर कोई सरकार आप के सुखों पर कड़ा प्रहार कर रही है तो उस पर आपत्ति करने की जगह, उस में खामियां निकालने के, उसे मानना चाहिए. औडईवन फार्मूले से दिल्ली सरकार को कोई लाभ नहीं होगा. यह न सरकार का टैक्स बढ़ाएगा, न सरकारी अफसरों की शक्ति. उलटा अगर यह प्रयास सफल होता है तो सरकार के टैक्स में कमी आएगी, क्योंकि कम पैट्रोलडीजल के खर्च का मतलब है कम सेल टैक्स. सरकार का खर्च तो इस कदम से बढ़ेगा क्योंकि उसे ज्यादा पुलिस, ज्यादा मजिस्ट्रेट, ज्यादा अनुशासित बसें चलवानी होंगी. यह उन थोड़े कामों में से है जिन में सरकारों को जनता का भला करने के लिए गालियां सुननी पड़ती हैं. इस तरह के प्रयोग का स्वागत किया जाना चाहिए.

कंगना-रितिक के बीच अब क्या चल रहा है

गत वर्ष कंगना अपनी फिल्मों के कारण छाई रहीं. मगर नए साल में वे हर किसी से उलझने के चलते चर्चा में हैं. उन्होंने हाल ही में विशाल भारद्वाज के साथ पंगा ले लिया. कंगना विशाल की फिल्म कर रही हैं पर मैडम ने मूड अच्छा न होने के कारण 3 दिनों के लिए शूटिंग स्थगित कर दी और वह भी नया सैट तैयार होने के ऐन पहले.रितिक के साथ भी उन की जबानी लड़ाई जारी है. जब इस सिलसिले में उन से पूछा गया कि रितिक रोशन ने उन्हें ‘आशिकी-3’ से निकलवाया? तो कंगना ने कहा कि पूर्व प्रेमी ऐसी मूर्खता करते रहते हैं. लेकिन वे सब कुछ भूल चुकी हैं और गड़े मुरदे नहीं उखाड़ती हैं. इस के बाद रितिक ने ट्वीट किया था कि वे पोप से अफेयर कर सकते हैं, लेकिन मीडिया में सुझाई जा रही महिलाओं (कंगना) के साथ अफेयर की संभावना नहीं.

किसी खान के होने से ही फिल्म हिट नहीं होती

फिल्म ‘सनम तेरी कसम’ से बौलीवुड में ऐंट्री कर चुकी पाकिस्तानी सुंदरी मावरा हुसैन का मानना है कि बौलीवुड में किसी खान के साथ डैब्यू करना आप की फिल्म की सफलता की निशानी नहीं है. पाकिस्तानी वीजे मौडल और टीवी सीरियलों में काम कर चुकीं मावरा हर्षवर्धन राणे के साथ बौलीवुड में कदम रख रही हैं. वे कहती हैं कि शानदार स्क्रिप्ट की फिल्म सिर्फ इसलिए छोड़ देना कि उस में कोई खान नहीं है, को मैं बेवकूफी समझती हूं.

बौलीवुड में ब्रैकअप का दौर

इन दिनों बौलीवुड में जोडि़यों के टूटने का दौर चल रहा है. गपशप गली के अनुसार, रणबीर-कैटरीना के ब्रैकअप के बाद अनुष्का शर्मा और विराट के बीच भी कुछ सामान्य न होने की खबर आई. फरहान अख्तर और अधुना भी एकदूजे से अलग होने की सोच रहे हैं. अब ताजा खबर यह है कि मलाइका और अरबाज खान का ब्रैकअप होने वाला है. तभी दोनों कई दिनों से साथ नजर नहीं आ रहे हैं. वैसे अरबाज ने ट्वीट किया है कि लोगों को दूसरों के घरों में झांकने से पहले अपना घर देखना चाहिए. मगर जनाब अर्जुन और मलाइका के बीच बढ़ती नजदीकियों से तो कुछ ऐसा ही लग रहा है.

 

सोनी चैनल पर महफिल लगाएंगे कपिल

कपिल के पौपुलर शो के बारे में पहली बार कलर्स चैनल के सीईओ राज नायक ने खुलासा किया है कि इस शो के बंद होने का मुख्य कारण कपिल ही हैं, क्योंकि वे अपनी शोहरत को नहीं संभाल पाए. सब अपनी मरजी से चाहते थे. लेकिन यह भूल गए कि उन्हें यहां तक पहुंचाने में चैनल की कितनी भूमिका रही है. हम लोगों ने इन्हें शो बंद करने के लिए कभी नहीं कहा. वहीं कपिल के सहयोगी गुत्थी सुनील ग्रोवर का कहना है कि हम लोग जल्दी ही अपनी पुरानी टीम के साथ सोनी चैनल पर नया शो नए नाम से लाने वाले हैं.

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