Download App
Home » पृष्ठ 3432

टीवी शो के सैट पर भी अंधविश्वास हावी

टीवी शोज की कहानियों में तो भूतप्रेत, जादूटोना, पूजापाठ की कहानियां भरी रहती हैं, पर अब टीवी शो के सैट पर भी अंधविश्वास का साया छाया हुआ है. एक नए सीरियल ‘बहू हमारी रजनीकांत’ के इस सीरियल को वास्तुशास्त्र के हिसाब से तैयार करवाया गया है, इतना ही नहीं इस के सफल होने के लिए हवन भी कराया गया. जब सैट तैयार हो गया तब एक वास्तुकार महाशय ने उसे सही नहीं बताया. तब निर्माता ने बनेबनाए सैट को तुड़वा कर उसे वास्तुशास्त्र के अनुसार बनाया ताकि वह शो सुपरहिट बन जाए. अब इन धर्मांधों को कौन समझाए कि सीरियल हवन, वास्तुशास्त्र से नहीं सही कहानी और निर्देशन से चलते हैं.

नेहरा ने साबित कर दिया, उम्र केवल संख्या है: गावस्कर

पूर्व भारतीय कप्तान सुनील गावस्कर ने उम्रदराज तेज गेंदबाज आशीष नेहरा की तारीफ करते हुए उन्हें चालाक गेंदबाज करार दिया जिसने साबित कर दिया है कि उम्र केवल संख्या है. विश्व कप 2011 के बाद राष्ट्रीय टीम से बाहर रहे नेहरा ने पिछले महीने लगभग पांच साल बाद वापसी की. उन्होंने बांग्लादेश के खिलाफ एशिया कप के शुरुआती मैच में भारत की 45 रन की जीत में तीन विकेट लिए.

गावस्कर ने कहा कि आशीष नेहरा ने साबित कर दिया कि उम्र केवल एक संख्या है. वह अपनी गेंदों को बहुत अच्छी तरह से मिक्स करते हैं और बड़ी चतुराई से गेंदबाजी करते हैं. उन्होंने अब तक भारत के लिये वास्तव में अच्छा प्रदर्शन किया है. गावस्कर ने सलामी बल्लेबाज रोहित शर्मा की भी तारीफ की जिन्होंने 55 गेंदों पर 83 रन बनाकर भारतीय पारी संवारी. इससे भारत तीन विकेट पर 42 रन से उबरकर छह विकेट पर 166 रन बनाने में सफल रहा. उन्होंने कहा कि रोहित के पास अपनी पारी अच्छी तरह से संवारने की काबिलियत है. शॉट का उनका चयन शानदार है. जब दूसरे संघर्ष कर रहे थे तब उन्होंने बल्लेबाजी को आसान बना दिया था. रोहित जब 21 रन पर खेल रहे थे तब शाकिब अल हसन ने उनका कैच छोड़ा और गावस्कर ने इसे मैच का टर्निंग प्वाइंट करार दिया.

उन्होंने कहा कि मैच का टर्निंग प्वाइंट शाकिब का रोहित का कैच छोड़ना था. आप रोहित जैसे खिलाड़ी का कैच नहीं छोड़ सकते हो और विशेषकर तब जबकि वह इस तरह की फार्म में हो. बांग्लादेश को क्षेत्ररक्षण में अधिक अभ्यास की जरूरत है. गावस्कर ने कहा कि रोहित शर्मा और हार्दिक पांड्या की साझेदारी ने भारत को मजबूत स्थिति में पहुंचाया. टी20 प्रारूप में 150 रन से अधिक का कोई भी लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होता है.

पाक क्रिकेटर सकलैन ने कहा, भज्जी टीम इंडिया के हीरो

वर्ल्ड क्रिकेट में ‘दूसरा’ जैसी बॉल लाने वाले पाकिस्तान के पूर्व स्टार क्रिकेटर सकलैन मुश्ताक सीनियर ऑफ स्पिनर हरभजन सिंह के साथ किए जा रहे बर्ताव से दुखी हैं. उनका मानना है कि पिछले साल टी-20 इंटरनेशनल मैचों में हरभजन को एक में भी खेलने का मौका नहीं देने से इस बॉलर के कॉन्फिडेंस के लिए अच्छा नहीं है.

सकलैन ने कहा कि भज्जी के साथ बीसीसीआई और टीम मैनेजमेंट का बर्ताव अच्छा नहीं है. वह वर्ल्ड लेवल के बॉलर है. अश्विन के अच्छा करने का मतलब यह नहीं है कि भज्जी को बाहर कर दो. उन्हें जब (2001 में) बाहर किया गया तब से उन्होंने 3 बार वापसी की. जिसका मतलब है कि जब आपको उसकी जरूरत पड़ी तो आपने उसे टीम में लिया. जब आपकी जरूरत खत्म हो गई आपने उसे बाहर कर दिया. इसलिए आपने उसके लिए दबाव बना दिया. आपने पहले ही उसकी पिछली अचीवमेंट को नजरअंदाज कर दिया है.

सकलैन ने कहा कि भज्जी पहली पसंद के स्पिनर होने चाहिए थे और अश्विन को उनका साथी. इसके बजाय आपने अब उसे तीसरी या चौथी पसंद का स्पिनर बना दिया है. उन्होंने कहा कि जब कोई खिलाड़ी वापसी करता है तो उसका आत्मविश्वास कम होता है. उसे अपना सर्वश्रेष्ठ परफॉर्मेंस करने के लिए आत्मविश्वास दिलाने की जरूरत होती है.

सकलैन ने टेस्ट क्रिकेट में 208 और वनडे में 288 विकेट लिए हैं.

 

 

41 मैच बाद थमा सानिया-हिंगिस का विजयी अभियान

भारत की स्टार टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा और स्विट्जरलैंड की मार्टिना हिंगिस की जोड़ी के लगातार 41 मैच के जीत के अभियान में कतर ओपन में रोक लग गई, जब दुनिया की इस नंबर एक जोड़ी को महिला युगल के क्वार्टर फाइनल में शिकस्त का सामना करना पड़ा.

सानिया और हिंगिस को गुरुवार रात हुए मुकाबले में एलेना वेस्नीना और दारिया कसात्किना की रूस की जोड़ी के खिलाफ 2-6 6-4 10-5 से शिकस्त झेलनी पड़ी. लगातार तीन युगल ग्रैंडस्लैम जीतने वाली भारत और स्विट्जरलैंड की इस जोड़ी को पिछली बार पिछले साल अगस्त में सिनसिनाटी में हार का सामना करना पड़ा था.

यहां पिछले दौर में चीन की गैरवरीय जोड़ी के खिलाफ तीन सेट में जीत दर्ज करने वाली दुनिया की नंबर एक जोड़ी एक सेट में दबदबा बनाने के बावजूद जीत दर्ज नहीं कर सकी. सानिया और हिंगिस की जोड़ी ने इस साल चार खिताब जीते हैं और उनके नाम कुल 13 खिताब दर्ज हैं.

 

तेरे बिन लादेन: बिना कहानी हंसाने की असफल कोशिश

2010 में प्रदर्शित हास्य फिल्म ‘‘तेरे बिन लादेन’’ का यह सिक्वअल है. इस फिल्म में ओसामा बिन लादेन की मौत हुई या वह जिंदा है, इस बात को लेकर रस्साकसी है. छह साल पहले की फिल्म ‘‘तेरे बिन लादेन’’ में कहानी व हास्य के साथ कलाकारों की परफार्मेंस ऐसी थी कि इस फिल्म ने लोगो के दिलों में जगह बना ली थी. लेकिन छह साल बाद उसी फिल्म का सिक्वअल ‘‘तेरे बिन लादेन डेड आर एलाइव’’ देखकर एक ही सवाल दिमाग में आता है कि जब कहानी नहीं है, तो फिर सिक्वअल बनाने की जिद क्यों?

फिल्म की कहानी शुरू होती है 2009 में दिल्ली के एक हलवाई के बेटे शर्मा (मनीष पॉल)से. वह अपने पिता की हलवाई की दुकान पर बैठने की बजाय फिल्म बनाने के लिए मुंबई पहुंच जाता है. अब उसे इंतजार है कि कोई उसे फिल्म निर्देशित करने का अवसर दे दे. तभी एक दिन बस में यात्रा करते हुए शर्मा की मुलाकात ओसामा बिन लादेन के हमशक्ल पद्दी सिंह (प्रदुम्न सिंह) से हो जाती है. शर्मा के दिमाग में पद्दी सिंह को ओसामा बिन लादेन बनाकर फिल्म निर्माण का ख्याल आता है. शर्मा को एक निर्माता भी मिल जाता है. फिल्म की शूटिंग शुरू होते ही खबर आती है कि अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को मौत के घाट उतार दिया. पर अमेरिका कोई सबूत नहीं दे पाता.

अमेरिका बार बार साबित करना चाहता है कि उनके सैनिकों ने पाकिस्तान के अंदर घुसकर ओसामा बिन लादेन को मौत के घाट उतार दिया. मगर एक आतंकवादी संगठन के प्रमुख खलीली (पीयूष मिश्रा) साबित करना चाहता है कि ओसामा बिन लादेन जिंदा है, जिससे उनके संगठन को लगातार पैसा मिलता रहे. अमेरिकन सरकार और आतंकवादी खलीली के बीच शर्मा फंस जाता है. क्योंकि खलीली और अमेरिकन सरकार को पद्दी सिंह के बारे में खबर लग जाती है. अब अमेरिका के राष्ट्रपति के कहने पर सीआईए एजेंट डेविड (सिकंदर खेर)  कुछ अमेरिकी सैनिक व बिना आवाज वाला एअरक्राफ्ट लेकर भारत पहुंचता है. उसका मकसद ओसामा बिन लादेन के हमशक्ल पद्दी सिंह को अमेरिकन सैनिकों के हाथों मारकर उसका वीडियो दुनिया के सामने रखना है. जबकि खलीली, पद्दी सिंह का अपहरण कर उसका वीडियो बनाकर लोगों के बीच संदेश देना चाहता है कि ओसामा बिन लादेन जिंदा है और वह खलीली के साथ है. डेविड खुद को शर्मा व पद्दी सिंह के सामने हालीवुड फिल्म निर्माता बताता है. दोनों अपने हिसाब से योजना बनाते हैं और शर्मा खुद के साथ साथ पद्दी सिंह को बचाने का प्रयास करता है, जिसकी वजह से कई हास्यप्रद घटनाएं घटित होती हैं.

छोटे परदे पर मनीष पॉल की कॉमिक टाइमिंग के सभी कायल हैं. मगर फिल्म का मामला बहुत अलग होता है. यूं तो मनीष ने स्क्रिप्ट के अनुसार उन्हे जो सामग्री मिली, उसका उपयोग करने के अलावा प्रदुम्न सिंह के साथ कदमताल कर दर्शकों को हंसाने का प्रयास करते है. पर कई जगह वह असफल नजर आते हैं. कई सीन में वह जरुरत से ज्यादा लाउड नजर आते हैं.

कई फनी सीन प्रभाव पैदा करने में असफल हैं. फिल्म में कहानी कहने की बजाय जोक्स दोहराने की कोशिश ज्यादा की गयी है. फिल्म के संवाद भी फिल्म को बेहतर बनाने में मदद नहीं करते हैं. फिल्म में अस्वाभाविक सीन की भरमार है. अमेरिका जैसे देष का राष्ट्रपति और अमेरिका की सीआईए का एजेंट, ओसामा बिन लादेन के मारे जाने का सबूत जुटाने के लिए फिल्म निर्माता पर निर्भर होगा, यह सेाच ही अपने आप में बचकानी है. निर्देशक ने सिनेमाई स्वतंत्रता का बेजा इस्तेमाल भी किया है.

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भी पद्दी सिंह यानी कि नकली ओसामा बिन लादेन को मारने पहुंचते हैं, यह बड़ा अजीब सा है. भले ही फिल्मकार अभिषेक शर्मा इसे व्यंग व हास्य की दृष्टि से सही ठहराएं. फिल्म को एक व्यंग फिल्म के रूप में प्रचारित किया गया, जबकि यह फिल्म ‘दिमाग विहीन हास्य फिल्म’ के रूप में प्रचारित की जानी चाहिए थी. फिल्मकार ने इस फिल्म में अली जफर को कैमियों मे क्या सोचकर पेश किया, यह बात समझ से परे है. अली जफर का चरित्र फिल्म की गति व कथानक में रूकावट डालता है. निर्देशक अभिषेक शर्मा के सामने पहले वाली फिल्म ‘‘तेरे बिन लादेन’’ के मुकाबले इस सिक्वअल फिल्म ‘‘तेरे बिन लादेन डेड आर एलाइव’ को ज्यादा बेहतर बनाने की थी. इसमें वह असफल रहे हैं. लेखक के तौर पर भी अभिषेक शर्मा असफल ही कहे जाएंगे.

नकली ओसामा बने प्रदुम्न सिंह के किरदार को बेहतर तरीके से लिखा जाता, तो शायद बात बन जाती. पीयूष मिश्रा शानदार अभिनेता हैं. इसमें कोई दो राय नहीं.

2010 में हास्य फिल्म ‘‘तेरे बिन लादेन’’ निर्देशित कर अभिषेक शर्मा ने अभिनेता अली जफर को स्टार बना दिया था. मगर उसके बाद अभिषेक शर्मा निर्देशित हास्य फिल्म ‘‘द शौकीन’’ बाक्स आफिस पर बुरी तरह से मात खा गयी थी. अभिषेक शर्मा ने ‘‘द शौकीन’’ की असफलता का दोष फिल्म की मार्केटिंग पर मढ़कर अपना दामन बचा लिया था. मगर अब अपनी तीसरी हास्य फिल्म ‘‘तेरे बिन लादेन डेड आर एलाइव’’ के रिलीज के बाद अभिषेक शर्मा क्या कहेंगे, इस पर नजर रखनी पड़ेगी.

‘‘वॉकवाटर मीडिया’’ के बैनर तले बनी फिल्म ‘‘तेरे बिन लादेन डेड आर एलाइव’’ की निर्माता पूजा शेट्टी देवड़ा और आरती शेट्टी, लेखक व निर्देशक अभिषेक शर्मा, संगीतकार अली जफर व राम संपत, गायक राम संपत, कैमरामैन अमलेंदु चैधरी तथा एक्शन परवेज शेख का है.

ड्रिप इरिगेशन: फायदे का सौदा

आजकल खेतीबारी में हो रही रिसर्च से खाद, बीज, दवा और तकनीक में तरक्की जारी है, जिस से खेती  की क्वालिटी व पैदावार में भी काफी इजाफा हो रहा है. लेकिन देश में अभी भी कुछ किसान ऐसे हैं, जो इन नई सहूलियतों में होने वाले खर्चों से बचने के लिए खेती के पुराने तरीकों को ही अपनाए रखना चाहते हैं.

वहीं कुछ किसान ऐसे भी हैं, जिन्होंने समय के साथ चल कर नए तरीकों को अपनाया. नतीजतन, इन किसानों ने अपने खेतों को कारोबार जैसा बना दिया है और कम खर्च में ही पहले से अच्छी क्वालिटी की ज्यादा पैदावार पा रहे हैं.

इन्हीं नई तकनीकों में से एक है ड्रिप इरिगेशन सिस्टम, जो बूंदबूंद कर के सभी फसलों को बराबर से और उन की जरूरत के मुताबिक पानी देता है. यह पुराने तरीकों के मुकाबले बहुत कम पानी में ही कई गुना ज्यादा उत्पादन देता है. साथ ही, खेती में होने वाले कई तरह के खर्चों को भी कम कर देता है. यानी एक बार होने वाले थोड़े से ज्यादा खर्च के बाद हमेशा के लिए हर तरह से ज्यादा मुनाफा.

पैसों की बचत

इस तकनीक से सिंचाई करने से 60 से 70 फीसदी पानी की बचत होती है. इस सिस्टम को लगवाने के बाद किसानों ने महसूस किया कि ड्रिप इरिगेशन से और भी फायदे हैं. सरकार अगर इस के लिए सब्सिडी नहीं देती, तब भी वे इसे लगवाते, क्योंकि कुछ फसलों के बाद होने वाली बचत और फायदे से इस का पूरा खर्च निकल आता है.

खजोड़ मल कहते हैं कि यहां खेतों में पानी देने के लिए मेंड़ बनवाने में मजदूरों पर काफी पैसा खर्च होता है. इस के अलावा मेंड़ों पर खरपतवार उग आते हैं, जिन की निराईगुड़ाई के लिए अलग से खर्चा करना पड़ता है. वहीं ड्रिप सिस्टम से पैसों की बचत होती है. इस के अलावा फसल 15-20 दिन पहले पक कर तैयार हो जाती है. सभी फसलों को बराबर और जरूरत के मुताबिक पानी मिलने से सभी पौधों में ज्यादा उत्पादन होता है. यानी ड्रिप इरिगेशन से 20 से 30 फीसदी खर्च की बचत होती है.

कैसे काम करता है यह

ड्रिप इरिगेशन सिस्टम में खेत या बगीचे में कतार में बिछे पाइपों से उन में लगे छोटेछोटे ड्रिपर के जरीये पूरी फसल या पेड़ों को बूंदबूंद पानी से सींचा जाता है. इस सिस्टम में कुएं या बोरिंग पाइप से मोटर द्वारा पानी बाहर निकाला जाता है, जो सैंड फिल्टर से छनता हुआ गुजरता है. इस के बाद पानी एक दूसरे स्क्रीन फिल्टर से गुजरता है, जिस से बारीक मिट्टी भी छन जाती है. छनने के बाद यह पानी मोटे पीवीसी पाइप से होता हुआ खेतों में बिछे हुए लेटरल पाइपों तक पहुंचता है. ये लेटरल पाइप थोड़ीथोड़ी दूरी पर फसल के साथसाथ कतार में बिछाए जाते हैं. लेटरल पाइपों में थोड़ीथोड़ी दूरी पर ड्रिपर लगे रहते हैं, जिन से बूंदबूंद पानी बाहर निकलता है.

एक ड्रिपर पौधों के आसपास चारों ओर 30 सेंटीमीटर इलाके को सिंचित कर देता है. इतना ही नहीं, सैंड फिल्टर और स्क्रीन फिल्टर के बीच में एक फर्टिलाइजर टैंक भी लगा रहता है, जिस में खाद या दवा डाल सकते हैं. यह दवा पानी के साथ घुल कर फसल या पेड़ों तक पहुंचती है.

इस तकनीक से पानी केवल पौधों में ही जाता है. इस तरह पानी की 60 से 70 फीसदी तक की बचत होती है. खेतों में लगाए गए ये पाइप 12 से 15 साल तक खराब नहीं होते हैं. इस के ड्रिप को साल में 1 या 2 बार साफ कर लेना चाहिए. किसानों को यह ड्रिप सिस्टम लगवाना थोड़ा महंगा जरूर लगता है, लेकिन कई राज्यों की सरकारें इसे लगवाने में सब्सिडी भी देती हैं.

ड्रिप सिस्टम से होने वाली कई तरह की बचतों के साथ पैदावार में होने वाले फायदे से 2-3 फसलों में ही इस पूरे सिस्टम का खर्च वसूल हो जाता है. कंपनी के कर्मचारी खुद आ कर इसे लगा जाते हैं. किसान इस सिस्टम को हासिल करने या इस के बारे में जानकारी लेने के लिए नीचे दिए गए नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं:

* किसान इरिगेशन लिमिटेड, मुख्य कार्यालय, मुंबई, फोन नंबर : 022 28478505.

* राजस्थान कार्यालय, जयपुर, फोन नंबर : 0141-2372495, 3246336.  फायदे

– ड्रिप इरिगेशन से 60 से 70 फीसदी पानी की बचत होती है. बचे पानी से दूसरी फसल की सिंचाई की जा सकती है.

– सभी पौधों को बराबर और जरूरत के मुताबिक पानी मिलता है और पहले से 25 से 30 फीसदी  ज्यादा पैदावार होती है.

– सभी पौधे एकसमान और जल्दी बढ़ते हैं.

– खाद और दवा पौधों को बराबर मिलती है और उन की बरबादी नहीं होती.

– पहाड़ी व ऊंचीनीची जमीन पर भी ड्रिप से सिंचाई कर के अच्छी फसल तैयार की जा सकती है.

– जहां पानी की कमी हो, वहां के लिए यह सिस्टम बहुत ही फायदेमंद है.

– इस से खरपतवार पूरे खेत में न हो कर केवल पौधों के पास ही उगते हैं, जिन्हें आसानी से दूर किया जा सकता है.

– इस सिस्टम को चलाने में केवल 1 आदमी की जरूरत होती है.

– इस सिस्टम से पौधों में होने वाली बीमारियों की रोकथाम होती है, क्योंकि पुराने तरीके से खुला पानी देने से बीमारी एक पौधे से दूसरे पौधे में फैलती है.

गन्ना किसानों के साथ हुई फिर नाइंसाफी

उत्तर प्रदेश में गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर होती है. गौरतलब है कि पूरे देश के 18 राज्यों में गन्ने की खेती होती है, लेकिन इन सब में गन्ने का जितना रकबा है, उस का करीब आधा हिस्सा अकेले उत्तर प्रदेश में आता है. इस लिहाज से गन्ने की खेती में उत्तर प्रदेश को काफी अहम माना जाता है.

उत्तर प्रदेश में 44 जिलों में बसे 40 लाख किसान 30 हजार करोड़ रुपए कीमत का गन्ना उगाते हैं. साल 2014-15 में 22,600 करोड़ रुपए का गन्ना उत्तर प्रदेश की 124 चीनीमिलों ने व बाकी कोल्हू क्रैशरों ने खरीदा था. लेकिन गन्ना एक नकदी फसल होने के बावजूद गन्ने की खेती करने वाले ज्यादातर किसान बदहाली के दौर से गुजर रहे हैं.

19 जनवरी, 2016 को उत्तर प्रदेश सरकार ने साल 2015-16 के लिए गन्ने के राज्य परामर्शी मूल्य एसएपी का एलान किया. इस साल चीनीमिलें मध्य देर से पकने वाली जनरल वैरायटी का गन्ना 280 रुपए प्रति क्विंटल, जल्द पकने वाली अरली वैरायटी का गन्ना 290 रुपए प्रति क्विंटल व कम चीनी परते वाली किस्मों का गन्ना 275 रुपए प्रति क्विंटल की दर से खरीदेंगी.

कोई इजाफा नहीं

हैरतअंगेज बात यह है कि अब से पहले साल 2013-14 व साल 2014-15 में भी प्रति क्विंटल गन्ना खरीद की यही दरें थीं. अगले साल 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव होने हैं, इसलिए गन्ना किसानों को इस साल गन्ने की कीमतों में खासी बढ़ोतरी की उम्मीद थी. लेकिन अफसोस कि तीसरे साल भी गन्ने की कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई, जबकि गेहूं व धान की कीमतें लगातार 50 से 100 रुपए प्रति क्विंटल तक बढ़ी हैं.

चीनीमिलों को गन्ना खरीद कर व शीरा बिक्री में छूट, चीनी के प्रवेश कर में छूट, सहकारी गन्ना समितियों के विकास कमीशन में छूट व बगैर ब्याज के कर्ज की सौगात समेत 35 रुपए प्रति क्विंटल तक की मदद का वादा किया गया है. साथ ही चीनीमिलों को गन्ने की कीमत भी 2 किस्तों में अदा करने की सहूलियत दी गई है. लिहाजा किसानों को 230 रुपए प्रति क्विंटल की दर से पहले भुगतान मिलेगा व बाकी रकम की दूसरी किस्त सीजन के 3 महीने बाद मिलेगी.

जोर का झटका

जिला हापुड़ में पड़ने वाले गांव बहादुरगढ़ के किसान अमरपाल का कहना है कि खाद, बीज, दवा, मशीनों व जमीन आदि की कीमतें व मजदूरी की दरें लगातार बढ़ने से प्रति हेक्टेयर गन्ने की लागत बढ़ रही है. लिहाजा गन्ने की कीमत 350 रुपए प्रति क्विंटल से कम होना नाकाफी व गलत है, लेकिन सरकार चीनीमिलों के दबाव में लगती है.

चीनीमिलों पर सरकार की मेहरबानी और गन्नाकिसानों से ज्यादती की वजह से गन्नाकिसानों का नाराज होना जायज है. साल दर साल गन्ने के अरबों रुपए चीनीमिलों पर बकाया पड़े रहते हैं. सरकारी अफसर बकाएदार चीनीमिलों पर सख्त कार्यवाही करने की जगह सिर्फ रस्म अदायगी करते हैं. इस तरह नुकसान सिर्फ किसानों का होता है.

गन्ने के रेट तय होने से पहले चीनीमिलों के मालिक पूरा जोर लगाते हैं कि गन्ने की कीमतों में इजाफा न हो, क्योंकि खुले बाजार में चीनी की कीमतें कम हैं. हालांकि बीते 4 महीने में चीनी की थोक कीमतें 2400 रुपए प्रति क्विंटल से बढ़ कर 3300 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच गई हैं. इस के अलावा डबल रिफाइंड चीनी 55 रुपए व ट्रिपल रिफाइंड सुगरक्यूब्स बाजार में 100 रुपए प्रति किलोग्राम तक बिक रहे हैं.

ताकतवरों की जीत

चीनीमिलों के मालिक अपने रसूख, रईसी व ऊंची पहुंच के कारण अपना पक्ष सरकार के सामने रख कर राहत पाने व अपने हक में फैसला कराने में कामयाब हो जाते हैं. फिलहाल देश भर में 488 चीनीमिलें चल रही हैं. इन में 168 महाराष्ट्र में व 124 उत्तर प्रदेश में चल रही हैं. आने वाले वक्त में इन चीनीमिलों को गन्ने की कमी झेलनी पड़ सकती है.

बीते 2 सालों से उत्तर प्रदेश की चीनीमिलें सीजन में खरीदे गए गन्ने की कीमत का भुगतान किसानों को 2 किस्तों में कर रही हैं. साल 2013-14 में पहली किस्त 260 रुपए तय की गई थी. साल 2014-15 में इसे घटा कर 240 रुपए किया गया व इस साल 2015-16 में और घटा कर 230 रुपए कर दिया गया है. इस से किसानों की जेब इस साल और हलकी रहेगी.

किसानों पर मार

बीते साल 2014-15 में केंद्र  सरकार ने किसानों की बेहाली कम करने की गरज से गन्नाकीमत के बकाया भुगतान के लिए 2200 करोड़ रुपए की माली इमदाद दी थी. इस तरह सहूलियतों के बादल चीनीमिलों पर तो खूब खुल कर बरस रहे हैं, लेकिन गन्ना उगाने वाले किसान अपनी उपज की लागत निकालने के लिए भी तरस रहे हैं.

15 जनवरी 2016 तक अकेले मेरठ मंडल की चीनीमिलों पर ही पिछले गन्ना पेराई सीजन के करीब 2 हजार करोड़ रुपए व इस सीजन के 8 हजार करोड़ रुपए बकाया चल रहे थे. कानून के हिसाब से चीनीमिलों को गन्ना खरीदने के 14 दिनों बाद किसानों को कीमत की अदायगी कर देनी चाहिए, लेकिन अपवाद छोड़ कर ज्यादातर चीनीमिलें इस नियम का पालन नहीं करतीं. यह गन्नाकिसानों के साथ सरासर ज्यादती है.

चीनीमिलों को 14 दिनों के बाद होने वाले लेट पेमेंट पर 15 फीसदी की दर से किसानों को ब्याज देना चाहिए, लेकिन चीनीमिलें सूद देना तो दूर किसानों को उन की उपज की कीमत का मूल भी वक्त पर पूरा नहीं देतीं. यह मनमानी सरकारी कायदेकानून व हाईकोट के आदेशों की खुली अनदेखी व किसानों के लिए परेशानी की वजह है

उत्तर प्रदेश गन्नाशोध परिषद, शाहजहांपुर के वैज्ञानिकों ने गन्ने की लागत इस साल 282 रुपए 14 पैसे प्रति क्विंटल आंकी है, जबकि किसान 330 रुपए प्रति क्विंटल लागत आने का दावा कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश सरकार ने तो अपने संगठन का दावा भी खारिज करते हुए गन्ने की कीमत पिछले साल जितनी ही रख दी है. इस से गन्नाकिसानों को बेहद नाराजगी है.

घटा गन्ना

मजबूर किसान गन्ने की फसल से मुंह मोड़ रहे हैं. गन्नामहकमे के मुताबिक अकेले उत्तर प्रदेश में पिछले 4 सालों में गन्ने का रकबा

3 लाख 72 हजार हेक्टेयर घटा है. साल 2013 से 2015 के दौरान गन्ने की पैदावार में 105 लाख टन की कमी आई है. यदि यही हाल रहा तो जल्द ही गन्ना खेतों से गायब हो जाएगा और तब तेलों व दालों की तरह चीनी के लिए भी मजबूरन दूसरे मुल्कों का मुंह ताकना पड़ेगा.

किसानों की मांग है कि खेती की उपज के रेट तय करने के फार्मूले गुपचुप रखने की बजाय सरकार को सब के सामने उजागर करने चाहिए. खेती की असल लागत का खयाल रखा जाना चाहिए व कृषि मूल्य लागत आयोग में आम किसानों की नुमाइंदगी बढ़नी चाहिए. साथ ही उन की मांगों पर गौर किया जाना चाहिए. चीनीमिलों की तरह गन्ना किसानों को भी बगैर ब्याज के कर्ज मिलना चाहिए.

माली मुश्किलों में फंसे चीनी उद्योग को बचाने के लिए रंगराजन कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक काम किया जा रहा है, लेकिन गन्नाकिसानों का खयाल रखना भी जरूरी है.

उपाय

बेशक गन्नाकिसान परेशानी के दौर से गुजर रहे हैं, लेकिन कोई मसला ऐसा नहीं होता जिस का हल न हो. ऐसे में सोचसमझ कर सूझबूझ से कदम उठाने की जरूरत है. लेकिन सवाल यह है कि गन्ना छोड़ कर किसान कौन सी फसल उगाएं, क्योंकि आलू आदि सब्जियों के दाम गिरने से बागबानी में भी घाटा हो रहा है.

माहिरों के मुताबिक किसान जल्दी पकने व ज्यादा पैदावार देने वाली गन्ने की नई किस्में उगाएं और गन्ने की औसत उपज बढ़ाएं. वे ट्रैंच विधि से गन्ना बोएं ताकि 40 फीसदी तक ज्यादा पैदावार हो. कम जमीन में ज्यादा गन्ना उगाना जरूरी है. गन्ने के साथ मटर, सरसों, चारा, मसूर, उड़द, गेहूं, प्याज, लहसुन, मसालों व फूलों आदि दूसरी फसलों की इंटरक्रापिंग कर के भी किसान प्रति हेक्टेयर ज्यादा आमदनी हासिल कर सकते हैं.

इस के अलावा प्रोसेसिंग भी गन्ने से ज्यादा कमाई का जरीया बन सकती है. मसलन किसान गन्ने का रस पका कर परंपरागत तरीके से गुड़ व शक्कर बनाते हैं. सदियों पुराने इस तरीके में सुधार करना जरूरी है. भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के वैज्ञानिकों ने रसायनरहित उम्दा गुड़ के क्यूब्स, शक्कर पाउडर व बोतलबंद गुड़ सीरप बनाने की तकनीक निकाली है. उसे अपना कर किसान पैक्ड व बेहतर गुड़ बनाने की इकाई लगा कर ज्यादा कमा सकते हैं और अपनी मेहनत की कमाई को चीनीमिलों में लुटने से बचा सकते हैं.

रूखी त्वचा के लिए कुछ इस तरह करें फेशियल

फेशियल त्वचा की गहराई में जा कर उसे साफ करता है. साथ ही त्वचा को पोषण भी देता है. फेशियल के दौरान क्लींजिंग, टोनिंग, स्क्रबिंग व मसाज के जरीए चेहरे की सफाई की जाती है जिस से ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है और त्वचा में कसाव आता है.

फेशियल करने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखें:

– क्लींजिंग के बाद चेहरे के संवेदनशील हिस्सों जैसे आंखों और होंठों के आसपास औयल लगा सकती हैं. इस के अलावा आंखों को गुलाबजल से डूबी रुई से ढकें.

– फेशियल के समय चेहरे की कुछ देर तक मालिश करना न भूलें.

– रूखी त्वचा पर क्लीजिंग करने के लिए क्लीजिंग मिल्क का इस्तेमाल करें. इस के बाद कुनकुने पानी से चेहरे की त्वचा को साफ करें.

– टौवेल डिप कर अपने चेहरे की 10 मिनट तक हलके हाथ से मसाज करें. स्ट्रोक्स लय में होने चाहिए. इस से चेहरे की मांसपेशियां शिथिल हो जाती हैं और त्वचा में रक्तसंचार सुचारु हो जाता है.

मिनरल फेशियल: रूखी व खुश्क त्वचा के लिए मिनरल फेशियल बेहतर है. इस फेशियल के जरीए स्किन के अंदर मिनरल्स की कमियों को पूरा किया जाता है, जिस से त्वचा को पर्याप्त पोषण मिलता है.

इस में सब से पहले स्क्रबिंग कर के त्वचा की डीप क्लीनिंग करें. फिर जैट मशीन का प्रयोग कर के मिनरल्स को स्किन के अंदर जाने दें. इस फेशियल से त्वचा निखरी व स्वस्थ नजर आती है.

ऐलोवेरा फेशियल: यह फेशियल भी रूखी त्वचा के लिए काफी अच्छा होता है. इस में एलोवेरा के पल्प को चेहरे पर लगा कर मसाज करें. यह त्वचा को पोषण देने के साथसाथ उसे हाइड्रेट भी करता है. इस फेशियल से स्किन में मौइश्चराइजर लेवल बढ़ता है, जिस से त्वचा ग्लो करने लगती है.              

फेशियल के इन तरीकों को अपना कर न सिर्फ आप की त्वचा का रूखापन दूर होगा, उस में गजब का निखार भी आएगा.

चश्मे के साथ कैसा हो मेकअप, आप भी जानिए

आज करीब 75% से ज्यादा लोगों, जिन में बच्चे भी शामिल हैं की नजर कमजोर है, उन में अगर लड़कियों की बात की जाए तो यह एक मिथ करीब हर जगह दिखाई देगा कि लड़कियां चश्मा लगाती हैं तो उन के नैननक्श चाहे कितने भी सुंदर क्यों न हों, वे आकर्षक दिखाई नहीं देतीं. यही मिथ उन के आत्मविश्वास को गिराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. आखिर क्यों हमेशा नारी को ही सुंदरता के पैमाने पर तोला जाता है, भले वह पुरुष के मुकाबले ज्यादा प्रतिभाशाली हो. महिला के व्यक्तित्व का साथी चश्मा उन के उपहास का और पुरुष की आंखों पर लगा चश्मा उन की गे्रसफुल पर्सनैलिटी का साक्षी कैसे बन जाता है?

दोहरी सोच को करें दरकिनार

इस पुरातन दोहरी सोच को दरकिनार कर के कितनी प्रतिभासंपन्न महिलाएं हैं, जिन्होंने अपने हुनर का परचम हर क्षेत्र में लहराया है. अगर हौसले बुलंद हों तो कोई भी कमजोरी आप की प्रतिभा पर भारी नहीं पड़ सकती है. ऐसी कई प्रतिभासंपन्न हस्तियां हैं, जिन की चश्मे के साथ ही सुंदरता और हुनर को हर कोई पहचानता है. जैसे लिंडसे लोहन, अमेरिकन मौडल, पौप सिंगर व ऐक्ट्रैस, मैडोना, फेमस पौप क्वीन. जेनिफर गार्नर, अमेरिकन ऐक्ट्रैस व फिल्म प्रोड्यूसर. इन के अलावा फेमस इंडियनऐक्ट्रैस भी हैं, जिन की खूबसूरती के हजारों दीवाने हैं. कैटआईज क्वीन बिपाशा बसु, रानी मुखर्जी, काजोल, सोनम कपूर, दीपिका पादुकोण, प्रियंका, श्रुति हसन आदि.

परफैक्ट मेकअप

चश्मे के साथ हौट व गौर्जियस नजर आने के लिए जरूरी है मेकअप की सही जानकारी होना:

करैक्टर कंसीलर: डार्क सर्कल्स और चश्मे की वजह से आंखें और ज्यादा काली नजर आने लगती हैं, इसलिए पीच व यलो टोन कंसीलर को ब्रश की मदद से लोअर लैश की शुरुआत से ले कर ऐंड तक ब्लैंड करते हुए लगाएं. आंखों के इनर कौर्नर तक कंसीलर लगाना बिलकुल न भूलें.

फाउंडेशन व पाउडर: फाउंडेशन को अपने चेहरे पर अप्पर डाइरैक्शन में ईवनली लगाएं. आंखों के किनारों और नाक के आसपास लगाना न भूलें. कानों पर भी फाउंडेशन जरूर लगाएं ताकि चश्मा लगाने पर उन की त्वचा अलग नजर न आए. फिर जिंजर टोन फेस पाउडर का इस्तेमाल करें. आंखों के आसपास पाउडर पफ से डैब करते हुए लगाएं.

आईशैडो: सब से पहले आंखों पर बेस कोट लगाएं. बेस कोट अपनी त्वचा के रंग से एक शेड लाइट लें और वह भी शिमररहित, क्योंकि चश्मे के साथ अप्पर लिड पर ऐक्स्ट्रा शाइन आप की आंखों को छोटा दर्शाएगी, इसलिए शिमर का प्रयोग लोअर लिड पर सिर्फ टचअप के रूप में ही करें. आईशैडो में नैचुरल लुक के लिए न्यूट्रल पेस्टल शेड व ग्लैमरस लुक के लिए चश्मे के फ्रेम व आईबौल के विपरीत शेड्स का इस्तेमाल कर के उन्हें ईवनली स्मज करें. ध्यान रखें कि कोई अननैचुरल क्रीजलाइन न रहे.

आईलाइनर: अगर आप चश्मा पहन रही हैं तो कभी आईलाइनर लगाना न भूलें. इस के लिए जैलबेस लाइनर का चुनाव बेहतर रहता है, क्योंकि यह आंखों को अननैचुरल शाइन नहीं देता. लाइनर को जितना हो सके लैशलाइन के करीब लगाएं ताकि आप की आंखों की खूबसूरती डिफाइन हो सके. इनर कौर्नर से पतला लगाते हुए आउटर कौर्नर पर थोड़ी मोटाई देते हुए लगाएं.

मसकारा व लैशेज: यह एक मिथ है कि चश्मे के साथ मसकारा व आर्टिफिशियल लैशेज का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, बल्कि मसकारा आंखों की सुंदरता को और अधिक निखारता है, इसलिए आर्टिफिशियल लैशेज का भी इस्तेमाल करें और मसकारा के 2 कोट लगा कर आंखों की खूबसूरती बढ़ाएं.

ब्लशर: चश्मा लगाती हैं तो ब्लशर लगाना न भूलें ताकि आप का चेहरा हाईलाइट हो. चीकबोंस से लाइट पिंक या पीच शेड के ब्लशर को ब्लैंड करते हुए कानों के ऊपरी तरफ लेते हुए जाएं व शिमरी विजन हाईलाइटिंग का हलके हाथ से स्मूथ स्ट्रोक दें.

लिप्स: इस मेकअप में आंखों को हाईलाइट किया गया है इसलिए लिप्स के लिए सौफ्ट व न्यूड शेड्स का ही इस्तेमाल करें. चाहें तो सिर्फ हाईग्लौस का ही इस्तेमाल करें.

आईब्रोज: आईब्रोज को आर्च शेप में ही बनवाएं. अगर वे पतली हैं तो जरूरत के अनुरूप ब्रो पाउडर या आईब्रो पैंसिल का इस्तेमाल आईब्रोज की शेप को परफैक्ट लुक देने के लिए करें. आर्च शेप की आईब्रोज से आप को गौर्जियस लुक मिलेगा.

हेयरस्टाइल: चश्मे के साथ हेयरस्टाइल ऐसा बनाएं, जिस से बालों को बाउंसी व पफी लुक मिले. चाहें तो रोल्स या क्रिपिंग मशीन का प्रयोग करें. बालों में वौल्यूम लाने के लिए वौल्यूमाइजिंग स्प्रे का भी प्रयोग कर सकती हैं

यौन उत्पीड़न के शिकार मासूम बच्चे

महंगाई, मुद्रास्फिति और सुख-सुविधा से भरपूर जीवनशैली के लिए आजकल पति-पत्नी दोनों को नौकरी करना पड़ता है. इस फेर में बच्चे माता-पिता की देख-रेख से दूर हो जाते हैं. बच्चों को वे या तो परिवार के किसी सदस्य के जिम्मे छोड़ कर काम पर जाते हैं या फिर आया को सौंप जाते हैं. आया या गवर्नेस द्वारा बच्चों को शारीरिक व मानसिक यातना देने के जाने कितने वीडियो वायरल हो चुके हैं. ऐसे बच्चों का यौन शोषण भी आम ही है. बच्चों के साथ आया, नौकर, वाचमैन से लेकर घर और परिवार का कोई भी सदस्य यह कर सकता है.

शाम या रात को थके-हार कर जब माता-पिता घर लौटते हैं, तब उन्हें पता भी नहीं चलता है कि उनकी अनुपस्थिति में उनके बच्चों पर क्या-कुछ गुजरा है. कोलकाता के नेशनल इंस्टीट्यूट औफ विहेवियर साइंस की श्रीलेखा विश्वास का कहना है कि बच्चों के स्वभाव व उनके आचरण-व्यवहार के बारे में माता-पिता से ज्यादा बेहतर और कोई नहीं जान सकता है. जो माता-पिता नौकरीशुदा हैं और अपने बच्चों को किसी और के भरोसे छोड़ कर काम पर जाते हैं, उन्हें अपने बच्चों के स्वभाव व आचरण में अचानक देखे जाने जानेवाले छोटे-छोटे बदलाव पर ध्यान देना चाहिए.

अगर किसी बच्चे के साथ कुछ बुरा होता है तो अव्वल तो कुछ समझ नहीं पाता है कि क्या कुछ हो रहा है. कभी-कभी बच्चा कंफ्यूज हो जाता है. हर उम्र के बच्चों का उनके पारिवारिक माहौल, उनकी परवरिश के मुताबिक अलग-अलग प्रभाव हो सकता है. कभी-कभी ऐसा भी होता है कि वे स्पर्श को समझ नहीं पाते हैं. लेकिन उनके साथ जो कुछ भी हुआ, उसका उनके जेहन पर बड़ा गहरा असर होता है.

जिन बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न होता है, उनके आचरण-स्वभाव में अचानक से बदलाव आ जाता है. अगर माता-पिता अपने बच्चों के प्रति संवेदनशील हों तो उन्हें बच्चों के स्वभाव-आचरण में आए बदलाव का पता चल जाता है. यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चों में कुछ बदलाव देखे जाने हैं वे इस प्रकार हैं:

  1. बच्चों में खाने के प्रति अरूचि देखने में आती है. उन्हें भूख ही नहीं लगती.
  2. कभी अचानक रो पड़ते हैं. कुछ बच्चे को रह-रह कर रोने लगते हैं.
  3. देखा गया है कि कुछ बच्चे बार-बार नहाना चाहते हैं. या फिर बार-बार जाकर हाथ धो आते हैं.
  4. हर वक्त एक खास तरह का चिड़चिड़ापन उन पर हावी रहता है. बात-बता पर गुस्सा करते हैं. उनके शरीर पर कहीं पर हाथ रखो तो झटक देते हैं.
  5. सीधे किसीसे आंख मिला कर बात नहीं करते. किसी की ओर सीधे देखने से कतराते हैं.
  6. उनका मिजाज शक्क हो जाता है. सबको शक की नजर से देखते हैं. यह शक उनकी नजर में साफ तौर पर दिखाई पड़ता है.
  7. अचानक उनका वजन घटने लगता है. ऐसे बच्चे दुबले होने लगते हैं.
  8. कुछ बच्चों में इसका उल्टा भी देखा जाता है. वे अचानक मोटे होने लगते हैं.
  9. बार-बार वाशरूम जाते हैं. दरअसल, उन्हें बार-बार पेशाब करने की तलब महसूस होती है.
  10. कभी-कभी कुछ बच्चों में अचानक ऐंठन की शिकायत देखी जाती है. पूरे शरीर में ऐंडन होने लगती है.
  11.  रात को सोए में अचानक रोने लगते हैं. या फिर हर कर जग जाते हैं.
  12.  माता-पिता से दूर-दूर भागते हैं. उनके सामने पड़ने से कतराते हैं. यहां तक कि कुछ बच्चों में माता-पिता से‍ छिपने की मानसिकता विकसित होते देखा जाता है.
  13.  इसके विपरीत कुछ बच्चे तो सुरक्षा की चाह में माता-पिता के साथ चिपके रहना चाहते हैं.
  14.  आग के प्रति उनका अचानक आकर्षण बढ़ जाता है.
  15.  ऐसे बच्चों का आत्मनियंत्रण खो जाता है. बात-बात पर विफर जाते हैं. बिस्तर गीला करने लगते हैं.

 हर छोटी-बड़ी बात में दुविधा उन पर हावी हो जाती है. वे कोई भी निर्णय नहीं ले पाते हैं.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें