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कंप्यूटर विजन सिंड्रोम: छिन जाएगी आंखों की रोशनी

न्नई के एक इंजीनियरिंग कालेज में कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई कर रहे पीयूष सिन्हा की आंखों में अचानक जलन, दर्द और काफी तेज खुजली शुरू हो गई. पहले तो वह इस की अनदेखी कर पढ़ाई में जुटा रहा, लेकिन जब उसे कंप्यूटर पर काम करने और रोशनी को देखने पर आंखों में तेज दर्द महसूस होने लगा और आंखें भी लाल हो गईं तो उस ने डाक्टर से आंखों की जांच कराई. डाक्टर ने बताया कि उसे कंप्यूटर विजन सिंड्रोम नामक बीमारी हो गई है.

कंप्यूटर, लैपटौप, टैबलेट या स्मार्टफोन पर ज्यादा समय तक आंखें गढ़ा कर काम करने वालों को सतर्क रहना चाहिए. लंबे समय तक कंप्यूटर पर काम करने और आंखों को ले कर सावधानी न बरतने वालों की आंखें खराब हो सकती हैं. उन की आंखों का लुब्रिकैंट हमेशा के लिए सूख सकता है. ऐसे लोग कंप्यूटर विजन सिंड्रोम का शिकार हो सकते हैं और अपनी आंखों की रोशनी गवां सकते हैं.

पटना के नेत्र निदान आई हौस्पिटल के डायरैक्टर डाक्टर राकेश कुमार का कहना है कि यह बीमारी होने पर मरीज द्वारा पलकों को झपकाना काफी कम हो जाता है, जो आंखों के लिए काफी खतरनाक है. सामान्यतया पलकें हर मिनट में 15 बार झपकती हैं लेकिन कंप्यूटर विजन सिंड्रोम से पीडि़त व्यक्ति की पलकें एक मिनट में 5-7 बार ही झपक पाती हैं. इस से आंखों में जलन और भारीपन हो जाता है. इस के साथ ही आंखों का पानी (लुब्रिकैंट) कम होने से आंखें सूखीसूखी महसूस होती हैं और थकान से दर्द करने लगती हैं. इस के अलावा सिर, गरदन और कंधों में भी दर्द होने लगता है.

डाक्टर राकेश कहते हैं कि इस बीमारी की अनदेखी नहीं करनी चाहिए वरना हमेशा के लिए आंखें सूख सकती हैं. इस से देखने में दिक्कत होने लगती है और धूप या रोशनी में आंखें खोलने में तकलीफ होती है. कंप्यूटर पर रोजाना 3 घंटे से ज्यादा समय तक लगातार काम करने वाले 90% लोगों को कंप्यूटर विजन सिंड्रोम होने का खतरा रहता है.

आंखों के डाक्टर शंकर नाथ का कहना है कि कंप्यूटर पर ऐंटी ग्लेयर स्क्रीन का इस्तेमाल कर इस बीमारी के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है. साथ ही कंप्यूटर की स्क्रीन को आंख के लैवल से 4-5 इंच नीचे रखना चाहिए.  स्क्रीन का कंट्रास्ट भी कम रखना चाहिए.

कंप्यूटर विजन सिंड्रोम से बचने के लिए कंप्यूटर पर काम करते समय खास तरह का चश्मा पहनना चाहिए. अगर आंखों में किसी भी तरह की तकलीफ हो तो डाक्टर से सलाह लेने में देर न करें.

थोड़ी सी सावधानी रख कर कंप्यूटर विजन सिंड्रोम की चपेट में आने से बचा जा सकता है. कंप्यूटर या लैपटौप पर काम करते समय हर 20-25 मिनट में कंप्यूटर से नजरें हटा कर 6-7 मीटर दूर की चीजों को देखें.

30 मिनट काम करने के बाद 30 सैकंड के लिए आंखों को बंद कर आराम दें. आंखों को ज्यादा थकान महसूस हो तो पानी से आंखें धोएं.             

बचाव के उपाय

–       अपने कंप्यूटर की स्क्रीन को 20 से 26 इंच की दूरी पर रखें.

–       कंप्यूटर के मौनीटर को अपनी आंखों के लैवल से 4-5 इंच नीचे रखें.

–       कंप्यूटर की स्क्रीन को 10 से 20 डिग्री के कोण पर रखें.

–       स्क्रीन पर दिखने वाले अक्षरों को सामान्य तौर पर पढ़े जाने वाले अक्षरों के साइज से 3 गुना ज्यादा रखें.

–       मौनीटर के कंट्रास्ट को कम रखें, ताकि आंखों पर ज्यादा जोर न पड़े. हर 20 मिनट बाद 20 फुट की दूरी पर स्थित किसी चीज को 20 सैकंड तक देखें.

–       हर 30 मिनट बाद 30 सैकंड के लिए आंखों को आराम दें.

जब मैच हारने के बाद ब्रावो ने पकड़ी धोनी की कॉलर

टी20 वर्ल्ड कप का रोमांचक आगाज हो चुका है. टी20 विश्व कप के अभ्यास सत्र मैच में भारत ने वेस्टइंडीज को 45 रनों से हरा दिया और शायद इसी कारण वेस्टइंडीज के खिलाड़ी ड्वेन ब्रावो को गुस्सा आ गया और वो कप्तान धोनी का कॉलर पकड़ बैठे, वो भी सरेआम सबके सामने फील्ड में.

इससे पहले की आप अपने अक्ल के घोड़े दौड़ाये, हम बता देते हैं कि ये सब कुछ मैदान पर सिर्फ मस्ती-मजाक में हुआ, हालांकि धोनी के अजीज दोस्तों में से एक ब्रावो की इस हरकत से धोनी पहले से जागरूक नहीं थे, इसलिए जब ब्रावो ने उनका कॉलर पकड़ा, तो वो काफी सीरयस दिखे और दोनों की मस्ती की फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो गई.

मालूम हो कि ब्रावो और धोनी के बीच काफी अच्छा तारतम्य है, दोनों ने आईपीएल टीम में साथ-साथ खेले हैं और दोनों एक-दूसरे की खूबियों और खामियों को बहुत अच्छे से जानते हैं.

तेरा सुरुरः कहानी और पटकथा के स्तर पर कमजोर फिल्म

हिमेश रेशमिया एक भाव शून्य चेहरे वाले कलाकार का नाम है. मगर खुद हिमेश रेशमिया इस बात को मानने को तैयार ही नहीं है. सीरियल निर्माता के रूप में करियर शुरू करने वाले हिमेश रेशमिया बाद में अपने पिता संगीतकार विपिन रेशमिया के पदचिन्हों पर चलते हुए संगीतकार, फिर गायक बन गए. उसके बाद गायक से अभिनेता बने कई कलाकारों की तरह हिमेश रेशमिया ने भी अभिनय के क्षेत्र में कदम रख दिया.

‘‘तेरा सुरुर’’ से पहले वह ‘आपका सुरुर’, ‘कर्ज’, ‘कजरारे’, ‘रेडियो’, ‘दमादम’, ‘एक्सपोज’ जैसी अफसल फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं. हर फिल्म में उनके भावहीन चेहरे की चर्चा होती रही है. मगर जिद्दी हिमेश रेशमिया खुद को हीरो लेकर फिल्म पर फिल्म बनाते जा रहे हैं. फिल्म ‘तेरा सुरुर’ को भी दर्शक मिलने की कोई उम्मीद नही है. मगर एक सफल व्यवसायी की तरह हिमेश रेशमिया ने फिल्म के रिलीज से एक सप्ताह पहले ही दावा करना शुरू कर दिया था कि उन्होने अपनी फिल्म बेचकर रिलीज से पहले ही लाभ कमा लिया.

106 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘तेरा सुरुर’’ की कहानी एक हत्यारे रघु (हिमेश रेशमिया) की है. उनकी प्रेमिका तारा (फरहा करीमी) ड्रग की तस्करी के आरोप में डबलिन की जेल में बंद है. जबकि असली अपराधी अनिरुद्ध रहस्य बना हुआ है. अपनी प्रेमिका तारा को बेकसूर साबित करने के लिए रघु कड़ी मेहनत कर रहा है. तारा को जेल से बाहर निकालने के लिए रघु अंततः (नसिरूद्दीन शाह) संतिनो की मदद लेता है. वह अनिरुद्ध तक पहुंचना चाहता है, पर हर बार मात खा जाता है. क्लायमेक्स में अनिरुद्ध की असलियत सामने आती है. फिल्म के दूसरे हिस्से में रघु के बचपन की कहानी भी बयां की गयी है कि वह आज जो कुछ है, उसकी वजहें क्या रही. अनिरूद्ध की असली पहचान के बारे में अनुमान लगाने के लिए कई अर्थहीन किरदार व छोटी छोटी कहानियां गढ़ी गयी हैं, जो कि फिल्म की रोचकता को विराम ही देती हैं.

हिमेश रेशमिया या निर्देश श्वान अरन्हा के इशारे पर कैमरामैन का कैमरा सिर्फ हिमेश रेशमिया के ही इर्द गिर्द ज्यादा घूमता है. पर कैमरे को प्रतिभाशाली कलाकार रूपी हिमेश रेशमिया नहीं मिलता है. फिल्म का गीत संगीत अच्छा है. लोकेशन बहुत अच्छी चुनी गयी है. कुछ एक्शन सीन अच्छे बने हैं. कैमरामैन बधाई के पात्र हैं. फिल्म की पटकथा में तमाम कमियां नजर आती हैं. यदि हिमेश रेशमिया ने इसे फिल्म की बजाय एक लंबा म्यूजिक वीडियो बनाया होता, तो शायद लोगों को वह पसंद आ जाता.

इस मसाला फिल्म में कबीर बेदी, नसिरुद्दीन शाह, शेखर कपूर जैसे दिग्गज कलाकारों की उपस्थिति भी फिल्म को बेहतर रूप नहीं दे पाती है. फिल्म का निर्माण हिमेश रेशमिया की प्रोडक्शन कंपनी ‘एच आर म्यूजिक लिमिटेड’ और ‘टीसीरीज’ ने मिलकर किया है.

मैं करीना को कभी फोन नहीं करता: अर्जुन कपूर

मशहूर फिल्म निर्माता बोनी कपूर के बेटे अर्जुन कपूर की पहचान बौलीवुड में अभिनेता की बजाय एक फिल्मी संतान के ही रूप में ज्यादा होती है, जो अपने अभिनय को सुधारने की बजाय अन्य गतिविधियों से जुड़े ज्यादा नजर आते हैं. पिछले कुछ समय से बौलीवुड में चर्चाएं गर्म है कि अर्जुन कपूर ने रात बारह बजे करीना कपूर को फोन किया, जिसे करीना कपूर के पति और अभिनेता सैफ अली खान ने उठाया और अर्जुन कपूर को डांटते हुए समझाया कि भले घर के लोग व अच्छे कलाकार किसी महिला कलाकार को रात बारह बजे फोन नहीं करते हैं.

इस घटनाक्रम को लेकर कई तरह की बातें कही व अखबारों में छापी जा चुकी हैं. मगर इस घटनाक्रम को लेकर अब तक अर्जुन कपूर चुप्पी ही साधे हुए हैं. जब हमने इस बारे में उनसे सवाल किया, तो अर्जुन कपूर ने बौलीवुड की परंपरा के अनुरूप ही इस घटनाक्रम का सारा ढीकरा मीडिया पर मढ़ते हुए कहा-‘‘यह बहुत ही बचकानी खबर है. मेरी समझ में नहीं आता कि ऐसी बेहूदगी वाली बात किसने फैलायी. जिस सीन को लेकर खबर छपी है, वह सीन हमने अक्टूबर माह में फिल्माया था. जबकि खबर फिल्म का ट्रेलर आने के बाद छपी है. आप भी जानते हैं कि सैफ अली खान ने ट्रेलर की बड़ी तारीफ की है. ट्रेलर देखकर सैफ ने मुझे खुद मैसेज किया था. इसलिए मैं खबर को पढ़कर हंसकर टाल गया था. मैं कुछ कर नहीं सकता. मैं मानकर चलता हूं कि कुछ तो लोग कहेंगे. मीडिया के पास जब कुछ भी लिखने को नही होता है, तो वह ऐसी खबरे बनाता है.’’

अर्जुन कपूर पूरे दावे के साथ कहते हैं कि उन्होंने करीना कपूर को अब तक कभी भी फोन नहीं किया. वह कहते हैं-‘‘इस मामले में मैंने सफाई देना ही ठीक नहीं समझा. अब जब आपने पूछा है, तो बता दूं कि मैंने आज तक कभी भी करीना कपूर को फोन नहीं किया. मैं हमेशा उन्हें सिर्फ मैसेज भेजता हूं. मैं सैफ अली खान की इज्जत करता हूं. आप खुद सोचिये कि मैं खुद क्यों छपवाना चाहूंगा कि सैफ अली खान मुझसे नाराज हैं.’’

अब अर्जुन कपूर के दावों में कितनी सच्चाई है यह तो करीना कपूर या सैफ अली खान ही बेहतर बता सकते हैं…!!

ग्लोबल बाबाः धर्म गुरूओं पर व्यंग्य प्रधान फिल्म

भारत में धर्म गुरूओं का सदैव बोल बाला रहा है. तमाम राजनेता इन धर्म गुरूओं के आगे नतमस्तक होते रहे हैं. ऐसे ही धर्मगुरूओं यानी कि धार्मिक बाबाओं पर  फिल्म निर्देशक मनोज तिवारी एक व्यंग फिल्म ‘‘ग्लोबल बाबा’’ लेकर आए हैं. जिसमें एक अपराधी किस तरह धर्म गुरू बनकर देश के पूरे सिस्टम व हर राजनेता को अपने इशारे पर नचाता है, उसकी दास्तान है.

फिल्म ‘‘ग्लोबल बाबा’’ की कहानी शुरू होती है एक ढाबे पर ईमानदार पुलिस अफसर जैकब (रवि किशन) और अपराधी चिलम पहलवान (अभिमन्यू सिंह) के बीच आपसी बातचीत से. जैकब ने चिलम पहलवान को रस्सी के द्वारा बंदी सा बना रखा है. कुछ देर बाद पहलवान को अहसास हो जाता है कि उसके चारों तरफ बिना वर्दी के पुलिस वाले ही हैं. चिलम पहलवान, जैकब से कहता है कि, ‘सत्ता क्या बदली उनके तेवर बदल गए.’ पहलान धमकाता है कि जैसे ही दुबारा भानुमती सत्ता में आएगी, वैसे उसके उपर से सभी आरोप रफा दफा हो जाएंगे, मगर जैकब का अस्तित्व नहीं रह जाएगा. पहलवान की बातें सुनने के बाद जैकब उसका एनकाउंटर करने के लिए जंगल में ले जाता है. जहां जैकब, पहलवान को बता देता है कि भानुमती ही चाहती है कि चिलम पहलवान को खत्म कर दिया जाए. सच जानकर चिलम के चेहरे के भाव बदलते हैं.

फिर वह पुलिस को चकमा देकर भागता है,पर पुलिस उसे पीछे से गोली मारती है. वह भागकर नदी में गिर जाता है और नदी के एक किनारे पर जा पहुंचता है, जहां कुछ साधू चरस गांजा पीने में मशगूल हैं. उनमें से एक साधू बाबा उसे बचाकर उसकी पीठ में लगी गोलियां निकाल देता है. वहीं पर नदी किनारे उसकी मुलाकात मौनी बाबा उर्फ डमरू बाबा (पंकज त्रिपाठी) से होती है.

डमरू बाबा तुतलाते हैं, इसलिए मौनी बाबा बने रहते हैं. डमरू बाबा, चिलम पहलवान को सलाह देते हैं कि वह धार्मिक बाबा बनकर हर तरह का ऐशो आराम पा सकते हैं. फिर डमरू बाबा के साथ चिलम कबीर नगर पहुंचता है. इस बीच वह नदी पार कराने वाले नाविक को अपने शरीर की सभी वस्तुएं पहनाकर उसकी हत्या कर देता है. कुछ समय बाद इसी नाविक की लाश पाकर पुलिस उसे चिलम की लाश मानकर अंतिम संस्कार कर देती है. इधर चिलम ने रूप बदलकर खुद का नाम ग्लोबल बाबा कर लिया है.

वाराणसी के पास कबीर नगर में भोला पंडित ने अपना आश्रम बना रखा है, वह कभी विधायक भी थे. डमरू बाबा, भोला पंडित (संजय मिश्रा) के साधकों को ग्लोबल बाबा के पास ले आता है. देखते ही देखते ग्लोबल बाबा का बहुत बड़ी जगह पर आलीशान महलनुमा आश्रम खड़ा हो जाता है. राज्य के गृहमंत्री डल्लू यादव (अखिलेंद्र मिश्रा) भी ग्लोबल बाबा के चंगुल में फंस जाते हैं. देश के रक्षा मंत्री भी ग्लोबल बाबा के आश्रम में कुछ दिन रहकर सेवाएं लेते हैं. ग्लोबल बाबा के आश्रम में जिस्मफरोशी, औरतों की खरीद फरोख्त सहित हर तरह के गैर कानूनी काम होते रहते हैं. राज्य में चुनाव घोषित हो जाते हैं. फिर शुरू होता है ग्लोबल बाबा और राज नेताओं के बीच का शतरंजी खेल. उधर जैकब को शक हो जाता है कि ग्लोबल बाबा ही अपराधी चिलम पहलवान है. इस खेल में टीवी पत्रकार भावना शर्मा भी बुरी तरह से फंस जाती है. अंततः ग्लोबल बाबा ऐसी चालें चलते हैं, जिसमें भावना शर्मा  को अपनी जान गंवानी पड़ती है. पर यहीं पर ग्लोबल बाबा और डमरू के बीच अनबन हो जाती है. डमरू बाबा गुस्से में ग्लोबल बाबा के अपराधों का सबूत एक पेन ड्राइव में करके पुलिस अफसर जैकब को सौंप देते है.

फिल्म में इस बात को बेहतर ढंग से रेखांकित किया गया है कि किस तरह आम लोगों के अधविश्वास व धर्म के नाम पर डरने की प्रवृत्ति के चलते नित नए धर्म गुरू उभरते रहते हैं. यह धर्म गुरू राजनेताओं के साथ मिलकर बडे़ बड़े अपराधों में लिप्त रहते हैं. फिल्म में इस बात को भी बहुत सही अंदाज में चित्रित किया गया है कि यह धार्मिक बाबा अपने समर्थकों यानी कि भीड़तंत्र के बल पर किस तरह सामांनातर सरकार चलाने लगते हैं. निर्देशक ने नेताओं द्वारा इन धार्मिक बाबाओ का चुनाव के वक्त अपने पक्ष मे उपयोग को भी सही अंदाज में पेश किया है. निर्देशक मनोज तिवारी के अनुसार यह काल्पनिक कथा है. पर फिल्म देखते समय लोगों को आसाराम बापू से लेकर स्वामी नित्यानंद तक कई धर्म गुरूओं या उनके कारनामों की याद आ जाए, तो आश्चर्य नहीं होगा.

फिल्म की विषवस्तु में कोई नवीनता नहीं है. फिल्म में ग्लोबल बाबा के नाम पर जो कुछ दिखा गया है, वैसा टीवी चैनलो व अखबारों में अक्सर पढ़ा व देखा या सुना जा चुका है. मगर फिल्म के निर्देशक मनोज तिवारी ने इस विषय को जिस तरह से परदे पर उतारा है, उससे यह रोचक व मनोरंजक फिल्म बनकर उभरती है. फिल्म के एडीटर चंदन अरोड़ा की एडीटिंग ने फिल्म को चार चांद लगा दिए हैं. अपराधी से कुटिल, चालाक, तेज तर्रार ग्लोबल बाबा के किरदार में अभिमन्यू सिंह निराश करते हैं. संजय मिश्रा के हिस्से करने के लिए कुछ खास था ही नहीं. फिल्म की नायिका व टीवी रिपोर्टर भावना शर्मा का किरदार ठीक से नहीं उभरता. भावना शर्मा के किरदार में संदीपा धर से काफी उम्मीदें थी, मगर वह पत्रकार के किरदार के साथ न्याय नहीं कर पायी. निर्देशक ने बेवजह उनके पिता की बीमारी को ज्यादा फुटेज दे दी. राज्य के गृहमंत्री व एक मंजे हुए पोलीटीशियन के किरदार में अखिलेंद्र मिश्रा उम्मीदो पर खरे नहीं उतरते हैं. यदि सभी कलाकारों ने बेहतर अभिनय प्रतिभा का परिचय दिया होता, तो शायद फिल्म बाक्स आफिस पर कुछ कमाल कर जाती. वैसे भी फिल्म में ऐसा एक भी कलाकार नहीं है, जो दर्शक को सिनेमाघर के अंदर ला सके. देखना है कि कहानी व उसकी प्रस्तुतिकरण फिल्म को कितना लाभ पहुंचाती है.

फिल्म के निर्माता विजय बंसल व प्रिया बंसल, कहानीकार सूर्य कुमार उपाध्याय, पटकथा लेखक विशाल विजय कुमार, कैमरामैन देवेंद्र तिवारी व डी कानन, संगीतकार रिपुल शर्मा, अग्नेल रोमान व फैजान हुसेन हैं.

जब अपनी मां का कहना नहीं टाल पाए आमिर खान

बॉलीवुड स्टार आमिर खान कहां हैं और क्या कर रहे हैं? हर कोई यह बात जानना चाहता है, क्योंकि 'मिस्टर परफेक्टनिस्ट' ने अपनी इमेज ही कुछ ऐसी बनाई है. उनके 51वें जन्मदिन पर उनकी मां अपने बेटे को पास देखना चाहती हैं, वह उनका कहना नहीं टाल सके. फिलहाल वह 'दंगल' की शूटिंग पंजाब के जालंधर में खत्म करके अपने बेटे से मिलने लॉस ऐंजेलिस निकल गए हैं. इससे पहले आमिर ने जालंधर में खूब पसीना बहाया. कुश्ती पहलवान वाले किरदार के लिए उन्होंने कुश्ती चैंम्पियन सुशील कुमार से ट्रेनिंग भी ली.

आमिर से जुड़े एक खास सूत्र ने बताया कि आमिर को अभी करीब 30 से 40 किलोग्राम वजन घटाना होगा, ताकि वह किरदार के जवानी वाले फ्रेम में फिट बैठ सकें. आने वाले 14 मार्च को उनका 51वां हैपी बर्थडे है यानी गोल्डन के बाद डायमंड इयर में आने का पहला साल. या फिर ये कहें कि गोल्डन जुबली मनाने का समय. सूत्रों ने पुष्टि की है वह इस समय यूएस में हैं. आमिर 21 साल के बेटे जुनैद से मिलने का कोई मौका नहीं छोड़ते. जुनैद वहां फिल्म एंड एक्टिंग का कोर्स कर रहा है.

खबर है कि आमिर पेरेंट्स मीटिंग में अपने बेटे से मिलने गए हैं. कयास यह भी लगाया जा रहा है कि वह अपना जन्मदिन अपने परिवार के साथ मनाएंगे. लेकिन उनकी 80 साल की मां जीनत हुसैन का क्या! वह अपने आमिर को 14 मार्च को अपने पास देखना चाहती हैं. आमिर खान फिर पड़े ना पशोपेश में! लेकिन वह अपने जीवन में भी परफेक्शनिस्ट हैं, ये बात शायद ही कम लोगों को पता है. सूत्रों की मानें तो आमिर अपनी मां के साथ अपना जन्मदिन मनाएंगे. लेकिन कब, कैसे और किस तरह.. इस पर अभी सस्पेंस बना हुआ है.

राम भरोसे

आरएसएस से घोषित और अधिकृत तौर पर भाजपा में आए राम माधव की स्थिति 12वें खिलाड़ी जैसी है जो मैदान पर पानी की बोतल ले जाते वक्त ही नजर आता है लेकिन अब जरूरत पड़ी तो भाजपा ने उन्हें एक अहम काम सौंप दिया है. यह काम बड़ा ही चुनौतीपूर्ण और शायद ही हो सकने वाला है कि जम्मूकश्मीर में महबूबा मुफ्ती भाजपा के साथ गठबंधन धर्म निभाने को न्यूनतम शर्तों पर तैयार हो जाएं. पीडीपी की इस नई मुखिया को समझ आ रहा है कि अब भाजपा की उंगली थामे रखने का सीधा मतलब है बनाबनाया वोटबैंक हाथ से जाने देना. लिहाजा, वे यहांवहां की शर्तें थोप कर गठबंधन से किनारा करने की कोशिश कर रही हैं. भाजपा के लिए भागीदारी वाली इस सत्ता को छोड़ना जमीन को बंजर करने जैसी बात होगी. मुफ्ती मोहम्मद सईद की मौत के बाद घाटी की सियासत अब तक अधर में लटकी है तो उस की एक बड़ी वजह महबूबा की समझदारी भी है जो जल्दबाजी न दिखाते सोनिया गांधी और उमर अब्दुल्ला को भी घाटी में भाजपा के होने के खतरे का एहसास करा रही हैं वरना सारे पत्ते तो उन के हाथ में हैं ही. 

इसलिए बढ़ता है मोटापा

उन दिनों मैं 2 सप्ताह से डाइटिंग कर रही थी और इतना समय किसी को भी तुनकमिजाज बनाने के लिए काफी होता है. मुझे लगता है कि चाहे मैं कितना भी कम क्यों न खाऊं, फैट कम नहीं होगा. सप्ताहांत में मैं पका खाना नहीं खाती. लेकिन फैट है कि बिलकुल कम नहीं होता. यह 3 साल पहले की बात है, मंत्री बनने से पहले की. यह कितने खेद की बात है कि इनसानी पेट या आंतें जो खाना अपने अंदर रखती हैं, उस पर इनसान का कोई बस नहीं चलता. बैरिएट्रिक सर्जरी कराना तो आजकल फैशन हो गया है. इस सर्जरी में पेट से जुड़े कुछ हिस्सों और छोटी आंतों को काट कर संकुचित कर दिया जाता है. इस के पीछे सिद्धांत यह है कि आंतों में जितनी कम जगह होगी वे उतनी ही कम कैलोरी पचा सकेंगी.

जानवरों में अलग ही बात

इस मामले में जानवर इनसानों से कहीं ज्यादा विकसित हैं. जानवरों में बैरिएट्रिक सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि उन की मांसपेशियां उन की आंतों पर नियंत्रण रखने के लिए काफी हैं. इन को संकेत मिलता है बदलते मौसम से, आंतों में होने वाली क्रियाप्रतिक्रिया से और कभीकभी कुछ खाने की चीजों से भी. इस का मतलब यह है कि जानवरों की आंतें इनसानी आंतों की तरह आलसी नहीं, बल्कि सचेत व सक्रिय होती हैं. कुछ जानवरों की आंतों में तो आश्चर्यचकित करने वाली क्रियाएं होती हैं. उन की आंतें उन की इच्छा के अनुसार फैलतीसिकुड़ती हैं. इस का मतलब यह है कि जानवरों की इच्छानुसार उन की आंतें एक ही प्रकार के खाने से अलगअलग मात्रा में कैलोरी ले सकती हैं. जब इन की आंतें फैली हुई स्थिति में होती हैं तो अपने भीतर से गुजरने वाले खाने से ज्यादा पोषण सोख लेती हैं और जब संकुचित रहती हैं तो खाने का कोई भी तत्त्व नहीं सोखतीं.

उदाहरण के लिए, माइग्रेट बर्ड्स को जब एक से दूसरे देश जाना होता है तो उन की आंतें अपने आकार से 25 गुना ज्यादा फैल जाती हैं ताकि लंबा सफर आसानी से तय करने में मदद मिल सके. जब शरीर को जरूरत के अनुसार भार मिल जाता है तो आंतें खुद ही संकुचित हो जाती हैं. ऐसी प्रक्रिया मछली, मेढक, गिलहरी और चुहिया में भी होती है. अजगर कभीकभी अपनी आंतों को इतना ज्यादा संकुचित कर लेता है कि बिना कुछ खाए कई महीनों तक जिंदा रह सकता है. जैसे ही उसे शिकार मिल जाता है वह अपनी आंतों को इतना ज्यादा फैला लेता है जैसेकि खाने की उसे तुरंत जरूरत है.

मौत के बाद इनसानी शरीर में मांसपेशियां शिथिल पड़ जाती हैं और आंतें अपने आकार से 50 गुना ज्यादा बढ़ जाती हैं. शायद जब हम निष्क्रिय जीवनशैली अपना लेते हैं तो हमारी आंतों की मांसपेशियां अपने भीतर से गुजरने वाले खाने को अधिक मात्रा में सोखती हैं और आकार में बड़ी हो जाती हैं. कुछ चीजें निश्चित रूप से मोटापा बढ़ने का कारण बनती हैं जैसे नशा करना, हारमोन असंतुलन, तनाव और जरूरत से ज्यादा खाना. इन कारणों से भी आंतों के आकार में बदलाव संभव है. मुझे लगता है कि मेरी आंतें 100 फुट तक लंबी हो चुकी होंगी, क्योंकि जब मैं कुछ भी नहीं खाती और व्यायाम भी करती हूं, तब भी मेरा वजन कम नहीं होता.

शरीर के अंदर भी एक दुनिया

हमारे शरीर के अंदर भी एक दुनिया है, अजनबी और आश्चर्यजनक जीवों की, जिन के बारे में वैज्ञानिकों ने पता लगाना शुरू कर दिया है. हर इनसानी शरीर में ऐसे जीवों के प्लानेट होते हैं. 3 पैरों वाले वायरस और रंगीन फंगी, वर्म और बैक्टीरिया जैसे लाखों जीव हमारी आंतों में समूह बना कर रहते हैं. यहीं खाते हैं और वंश भी बढ़ाते हैं. वैज्ञानिकों का तो यह भी कहना है कि हमारी त्वचा, मुंह, दांत और अन्य अंग छोटेछोटे जीवों से इस कदर भरे हुए हैं कि हमारी 10 कोशिकाओं में से सिर्फ 1 कोशिका ही इनसानी शरीर का हिस्सा है. हम सिर्फ एक सामान्य इनसान नहीं, बल्कि कई तरह की प्रजातियों से बनी संघटित संरचना हैं. माइक्रोबायोलौजिस्ट शरीर में रहने वाले इन जीवों पर शोध कर रहे हैं कि आखिर ये हमारे शरीर में काम क्या करते हैं  इन में से कई खाने को पचाने में सहायक हैं ताकि खाने से मिलने वाला पोषण शरीर के विभिन्न हिस्सों तक पहुंच सके.

मोटापे के जिम्मेदार बैक्टीरिया

यह भी सामने आया है कि बैक्टीरिया के 2 समूह शरीर में प्रभावशाली होते हैं- फर्मीक्यूट्स और बैक्टीरौइडट्स. वैज्ञानिकों ने यह भी पता लगाया है कि मोटापे के शिकार लोगों की आंतों में फर्मीक्यूट्स की संख्या ज्यादा होती है. इस के उलट पलते लोगों की आंतों में बैक्टीरौइडट्स ज्यादा होते हैं. वजन कम करने के तौरतरीकों को अपनाने वाले लोगों में फर्मीक्यूट्स की संख्या बढ़ती है और बैक्टीरौइडट्स की संख्या घटती है. चुहिया पर किए गए शोध में भी वैज्ञानिकों को यही जानकारी मिली. वैज्ञानिकों ने पाया कि मोटी चुहिया के मल में ज्यादा कैलोरीज थीं जबकि पतली चुहिया के मल में कम. शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे कि फर्मीक्यूट्स बैक्टीरौइडट्स की तुलना में खाने से कैलोरी ज्यादा मात्रा में निकालते हैं. इस का मतलब यह हुआ कि यदि

मैं 1 सेब खाती हूं तो फर्मीक्यूट्स इस की 100% कैलोरी निकाल लेंगे. लेकिन यदि मेरी बहन जोकि थोड़ी पतली है, सेब खाती है तो उस के शरीर में मौजूद बैक्टीरौइडट्स केवल 50% कैलोरी ही निकाल पाएंगे. ऐसे में ज्यादा खाना और कम व्यायाम करना ही मोटापे का कारण नहीं, बल्कि हमारे शरीर में मौजूद ये बैक्टीरिया मोटापे को घटानेबढ़ाने के असली कारण हैं. इस लेख को पढ़ने के बाद कोई पाठक यदि पैसा कमाना चाहता है तो उसे फर्मीक्यूट्स या बैक्टीरौइडट्स में से किसी एक बैक्टीरिया का व्यवसायीकरण करना सीखना होगा ताकि लोग इन्हें खरीद कर खा सकें और अपनी आंतों में इन का संतुलन बना सकें. यदि ऐसा संभव हुआ तो मोटा या पतला होना बहुत आसान हो जाएगा.

सीख लेनी होगी

अब हम ने जानवरों के बारे में जानना शुरू किया है. उन के बारे में नहीं तो कम से कम उन के शरीर के बारे में जानना तो शुरू किया ही है, जोकि हम से कहीं ज्यादा विकसित हैं. घोड़ों, कछुओं और वानरों में पोषण या पाचनक्रिया तब तक शुरू नहीं होती, जब तक कि उन की आंतों में पाए जाने वाले बैक्टीरिया का संतुलन नियंत्रित नहीं हो जाता. इस के लिए वे हरी घास व कुछ मात्रा में फर्मैंटेड फूड भी खाते हैं ताकि अपनी आंतों में मौजूद बैक्टीरिया को आहार पहुंचा सकें. अपनी शारीरिक संरचना के अनुसार इनसान चूंकि शाकाहारी प्रवृत्ति के होते हैं, इसलिए जो सब्जियां वे खाते हैं, वे संभवतया इनसानी शरीर में मौजूद बैक्टीरिया के संतुलन को बनाए रखने में सहायता करती हैं. इस के अलावा किसी भी तरह का खाना शरीर में फर्मीक्यूट्स और बैक्टीरौइडट्स के संतुलन को बिगाड़ने का काम करता है.

मोटा बनातीं ऐंटीबायोटिक्स

ये दवाएं सिर्फ बीमारी फैलाने वाले कीटाणुओं का ही सफाया नहीं करतीं, बल्कि ये शरीर के लिए जरूरी बैक्टीरिया को भी नुकसान पहुंचाती हैं. सभी ऐनिमल फैक्टरीज, पोल्ट्री फार्म, सूअर पालन केंद्र या खरगोश पालने वाले फार्महाउसेज में जानवरों को खाने के साथ ऐंटीबायोटिक्स दिए जाते हैं ताकि कम खा कर भी वे मोटे दिख सकें. इस से आप समझ सकते हैं कि ऐंटीबायोटिक्स जानवरों के शरीर में बैक्टीरिया संतुलन को बिगाड़ देते हैं, जिस की वजह से वे तेजी से मोटे होने लगते हैं. जब हम इन के मांस को खाते हैं तो ऐंटीबायोटिक्स की वजह से असंतुलित हुए बैक्टीरिया हमारे शरीर में पहुंच जाते हैं.

मोटापा संक्रामक है

क्या मोटापा संक्रामक भी है  पोषण का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि मोटापा संक्रामक है. कुछ जंतु जैसे घोड़े, शेर, चूहे, मुरगे यदि 7 में से 1 से भी संक्रमित हो जाएं तो इन का मोटापा बढ़ने लगता है. इस का मतलब यह हुआ कि शरीर के सूक्ष्म जीव मोटापा फैला सकते हैं. हम इन में से किसी एक जंतु का मांस खाते हैं और संक्रमित हो जाते हैं, क्योंकि उस जंतु के अंदर के अच्छे बैक्टीरिया को तो उसे बेचने वाला पहले ही ऐंटीबायोटिक्स के जरीए मार चुका होता है.

अपनी डाइट पर वापस आने के साथसाथ मैं सपना देख रही हूं कि बैक्टीरौइडट्स की सेना योद्धाओं के साथ सशस्त्र हो कर खलनायक फर्मीक्यूट्स को समाप्त कर रही है. मैं ‘जूबीक्विटी’ किताब को धन्यवाद देती हूं, इतनी अच्छी जानकारी देने के लिए. 

इस बार वर्ल्ड कप में बनेंगे 7 अनोखे रिकॉर्ड, आप भी जानिए

टी20 वर्ल्ड कप में विराट कोहली, क्रिस गेल, युवराज सिंह, महेंद्र सिंह धोनी, शाहिद अफरीदी जैसे क्रिकेटरों की बल्लेबाजी देखने के लिए प्रशंसक आतुर हैं. इस साल वर्ल्ड कप के 6ठें संस्करण में हर बार की तरह कई कारनामें होंगे. इस बार वर्ल्ड कप में 7 अनोखे रिकॉर्ड बन सकते हैं, कुछ हालांकि अभी क्वालीफाइंग मैचों में बन भी चुके हैं.

आप भी जानिए क्या हैं ये रिकॉर्ड…

1. पाकिस्तान के कप्तान शाहिद अफरीदी एशिया कप में बल्ले और गेंद से ज्यादा सुर्खियां नहीं बटोर सके, लेकिन वह इस वर्ल्ड कप में एक रिकॉर्ड तोड़ सकते हैं. अफरीदी के नाम टी-20 में 93 विकेट हैं. अगर वह 7 और विकेट लेने में कामयाब हो जाते हैं तो टी-20 फॉर्मेट में 100 विकेट लेने वाले इकलौते गेंदबाज बन जाएंगे.

2. वेस्टइंडीज के धाकड़ ओपनर क्रिस गेल छक्कों का शतक लगाने वाले इकलौते टी-20 बल्लेबाज बन सकते हैं. उनके नाम इस समय टी-20 में 87 छक्के हैं. उनसे ज्यादा छक्के इस फॉर्मेट में इस समय न्यूजीलैंड के पूर्व कप्तान ब्रैंडन मैकुलम के नाम हैं. वह हालांकि रिटायर हो चुके हैं. इसलिए गेल के पास यह अनोखा रिकॉर्ड बनाने का मौका है.

3. इस समय टी-20 वर्ल्ड कप में टीम इंडिया टूर्नामेंट जीतने की सबसे प्रबल दावेदार है. अगर फटाफट क्रिकेट का वर्ल्ड कप भारत जीतने में सफल हो जाता है तो अपने घर में दो वर्ल्ड कप जीतने का अनोखा रिकॉर्ड अपने नाम कर लेगा. इससे पहले भारत महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में ही 2011 वनडे वर्ल्ड कप भी जीत चुका है.

4. दक्षिण अफ्रीका टीम से खेल चुके टेस्ट क्रिकेटर रिओल्फ वान डर मर्व अब 31 साल से ज्यादा के हो चुके हैं. लेकिन इस बार भी उन्होंने टी-20 वर्ल्ड कप में हिस्सा लिया है. लेकिन दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ नहीं. वह इस बार वर्ल्ड कप की एसोसिएटेड टीम नीदरलैंड के खिलाफ वर्ल्ड कप में उतरे हैं. अफ्रीका टीम के खिलाफ उन्होंने 2009 में डेब्यू किया था.

5. अगला रिकॉर्ड हांगकांग टीम में मध्यक्रम के बल्लेबाज रियान कैंपबेल ने बनाया है. मंगलवार को उन्होंने जिम्बाब्वे के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय टी-20 करियर की शुरुआत की. उनकी उम्र 44 साल है. इस मैच के साथ ही वह टी-20 क्रिकेट में वह सबसे उम्रदराज क्रिकेटर भी बन गए. इससे पहले यूएई के तौकीर 43 साल 179 दिन के साथ सबसे उम्र वाले टी-20 क्रिकेटर थे.

6. भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी टी-20 वर्ल्ड कप में सबसे ज्यादा मैच में मैचों में कप्तानी करने वाले दुनिया के इकलौते कप्तान बने हुए हैं. धोनी इस फॉर्मेट में लगातार 6वें संस्करण में भी भारतीय टीम की कप्तानी करने उतरेंगे. धोनी कुल 63 अंतरराष्ट्रीय टी-20 मैच खेल चुके हैं.

7. टी-20 वर्ल्ड कप में सबसे ज्यादा बार बिना खाता खोले आउट होने का रिकॉर्ड पाक कप्तान शाहिद अफरीदी और श्रीलंका के तिलकरत्ने दिलशान के नाम संयुक्त रुप से हैं. दोनों 5-5 बार शून्य पर आउट हुए हैं. इस रिकॉर्ड में आगे निकलने के लिए दोनों में कड़ी टक्कर है, देखते हैं कौन बाजी मारेगा?

एसिड अटैक पीड़िताओं को मिलेगी राहत

तेजाब से जले चेहरे के साथ जिंदगी जी रही पीड़िताओं को अब बहुत जल्दी ही राहत मिलेगी. अब महिला एवं बाल कल्याण विभाग के सम्मान कोष से एसिड अटैक सरवाइवर्स की प्लास्टिक सर्जरी करवाई जाएगी. उत्तर प्रदेश महिला एवं बाल कल्याण विभाग की प्रमुख सचिव रेणुका कुमार ने बताया कि प्रदेश से अब तक 200 एसिड अटैक सरवाइवर्स की लिस्ट बन चुकी है. अब इन की सर्जरी का प्रोसेस शुरू किया जा रहा है.

एसजीपीआई को इस का नोडल सैंटर बनाया गया है. सैंटर की जिम्मेदारी पीजीआई की पीआर ओ मोनालिसा चौधरी की होगी. कम पढ़ीलिखी या निरक्षर एसिड अटैक पीडि़ताओं के लिए एक वालेंटियर की व्यवस्था की गई है जो पीडि़ताओं की मदद के लिए 24 घंटे मौजूद रहेगा. एसिड अटैक सरवाइवर्स की सर्जरी इसी महीने के अंत तक शुरू कर दी जाएगी. सर्जरी के लिए सरवाइवर्स को अलगअलग कैटिगरी में बांटा गया है. जिन का चेहरा सब से ज्यादा जला है, विकृत है और एक बार भी सर्जरी नहीं हुई है, उन की सर्जरी पहले होगी. प्रदेश के किसी भी कोने से सर्जरी के लिए यहां आने वाली विक्टिम्स को घर से लाने और सर्जरी के बाद घर तक छोड़ने की जिम्मेदारी भी विभाग की होगी.

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