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हम दोनों की पसंद में समानता है: कुनाल-सोहा

अभिनेत्री सोहा अली खान और अभिनेता कुनाल खेमू बहुत ही सुलझे पति पत्नी हैं. इन दिनों वे हर इवेंट में साथ रहने की कोशिश करते हैं.

पेश हैं, पिछले दिनों उन से हुई मुलाकात के कुछ खास अंश:

आप दोनों का मिलन कैसे हुआ और एकदूसरे की कौनकौन सी खूबियां मन को भा गईं?

सोहा: मुझे कुनाल की स्माइल और आंखें बहुत पसंद आईं. कुनाल को जाननेसमझने में समय लगा. मैं आउट स्पोकेन हूं जबकि कुनाल शांत स्वभाव के हैं. कुछ महीनों बाद ही मैं उन्हें समझ पाई. मैं कुनाल से फिल्म ‘ढूंढ़ते रह जाओगे’ के सैट पर मिली थी. मुझे लगा कि वे औरों से अलग हैं. उस के तुरंत बाद फिल्म ‘99’ की वहां हम ने बातचीत की. मुझे अच्छा लगा कि वे अपनी हर बात पर कायम रहते हैं. उस समय वे 26 वर्ष के थे पर उन की बातें बड़ी मैच्योर थीं. जो कहते थे उसे निभाते भी थे.

कुनाल: मुझे सोहा की आंखें और उस का डाउन टु अर्थ स्वभाव बेहद पसंद आया. उस से बात करने पर पता चला कि मुझे एक अच्छा दोस्त मिल गया है. अब लगता है कि मैं ने अपने करीबी दोस्त से शादी की.

आप दोनों ने आपसी तालमेल बनाए रखने के लिए क्याक्या सीमाएं तय की हैं?

सोहा: किसी भी रिश्ते के स्थायित्व के लिए आपसी तालमेल बहुत जरूरी है. हर व्यक्ति के जीने का अपना अलग स्टाइल होता है. जैसेकि इतने बजे उठना है, काम करना है, घूमने जाना है आदि. ऐसे में अगर आप के जीवन में कोई आए और साथ रहे तो आप को भी थोड़ा बदलना पड़ता है. दोनों की पसंद को ध्यान में रख कर बीच का रास्ता निकालना पड़ता है.

कुनाल: मेरे हिसाब से जब 2 व्यक्ति घर बसाते हैं तो उन्हें एकदूसरे का सम्मान करना आना बहुत जरूरी है. एकदूसरे को सम्मान देना, काम का बंटवारा करना, छोटीछोटी बातों को भी समझना बहुत जरूरी है. जब हमें लगता है कि हमारा रिश्ता हमारे लिए कितना महत्त्वपूर्ण है तब हम सब कुछ करने के लिए राजी हो जाते हैं. मेरे हिसाब से जब व्यक्ति शादी करता है, गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता है, तो वह पहले ही यह सोच चुका होता है कि उसे आपस में तालमेल बैठाना है. यही सोच हम दोनों ने भी अपने अंदर लाए.

शादी के लिए पहल किस ने की?

सोहा: हम दोनों 2 साल तक रिलेशनशिप में रहे. दोनों के परिवार वाले चाहते थे कि हम शादी कर लें. मेरी मां तो सब से पहले तैयार थीं. हम दोनों की इच्छा देख कर दोनों परिवार वालों ने खुद ही पहल कर ली और हमारी शादी हो गई.

कुनाल: मेरे परिवार वाले खुश हुए जब मैं ने सोहा की बात उन्हें बताई. खुश होना ही था, क्योंकि मेरी पसंद उन की पसंद रही है.

एकदूसरे की पसंदनापसंद का खयाल कैसे रखते हैं?

कुनाल: हम दोनों की पसंद में काफी समानता है, क्योंकि हम बहुत सालों से साथ हैं. दोनों को ही एकदूसरे की पसंदनापसंद का पता है. जिस में हमारी राय एक होती है उसे हम साथ कर लेते हैं. जो पसंद नहीं उसे अलगअलग करते हैं. सोहा शांत स्वभाव की है और मैं गुस्सैल हूं. पर रूठने पर मनाने की पहल मैं ही करता हूं. उसे मैं कैसे मनाता हूं, इसे मैं सीक्रेट ही रखना चाहता हूं.

सोहा (हंसती हुई): कुनाल गुस्सैल जरूर हैं पर जितनी जल्दी गुस्सा आता है उतनी ही जल्दी शांत भी हो जाते हैं. इसीलिए मैं चुप रहती हूं.

एकदूसरे को गिफ्ट देने में कितना विश्वास करते हैं?

कुनाल: गिफ्ट देना बहुत मुश्किल काम होता है. अब तक हम दोनों बहुत सारी चीजें एकदूसरे को दे चुके हैं. मैं किसी और का इंतजार नहीं करता. जिस भी चीज की सोहा को जरूरत होती है, ला देता हूं. इसी वजह से जब कोई खास मौका आता है तो दोनों ही के पास एकदूसरे को देने को कुछ नहीं होता.

सोहा: मुझे उपहार देना और लेना अच्छा लगता है. कुनाल को कैमरा बहुत पसंद है. इस बार मैं उन के जन्मदिन पर जूम लैंस वाला कैमरा दूंगी.

सोहा, आप की मां ने कैरियर और वैवाहिक जीवन में तालमेल बनाए रखा. क्या आप ने उन से इस संबंध में कुछ सीख ली?

मेरी मां ने हमेशा सीख दी है कि खुशहाल रिलेशनशिप के लिए आप पति के ईगो का सम्मान करो. इसी तरह पति को भी पत्नी की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए. इस से रिश्ता मजबूत बना रहता है. मैं इस का हमेशा ध्यान रखती हूं.

कुनाल आजकल शादियां बहुत जल्दी टूट रही हैं. ऐसे में आप बेहतर शादीशुदा जीवन बिताने के लिए क्या सुझाव देना चाहेंगे?

विवाह की रस्म दोनों की इच्छा से संपन्न होती है. 2 लोगों के एकसाथ रहने पर थोड़ाबहुत मनमुटाव जरूर होता है. ऐसे में अगर किसी बात को शांति से सोचा जाए तो उस का हल मिल जाता है. आज हर चीज फास्ट हो चुकी है. पहले गाने बड़े बनते थे, अब छोटे बनने लगे हैं. लोग सुनना नहीं चाहते. शांत हो कर एकदूसरे को समय दें तो अच्छाई एकदूसरे में दिखने लगेगी. विवाह को बनाए रखना मुश्किल नहीं. बस इसे बचाए रखने की दोनों की कोशिश होनी चाहिए.                     

हाल ही में सोहा की फिल्म ‘घायल वंस अगेन’ और कुनाल की फिल्म ‘गुड्डू की गन’ प्रदर्शित हुईं, पर दोनों को ही दर्शकों ने औसत दर्जा दिया.

पहरे में सोनोग्राफी मशीन

सुरक्षित प्रसव के लिए सोनोग्राफी मशीन की अहमियत अब किसी सुबूत की मुहताज नहीं रह गई है. जच्चाबच्चा की बेहतरी के लिए वरदान साबित होने वाली इस मशीन के इस्तेमाल पर मध्य प्रदेश में एक और नियम लागू कर दिया गया है, जिस से जाहिर यह होता है कि सरकार को गर्भवती महिलाओं की चिंता कम बेमतलब के कायदेकानून बना कर उन पर अमल करने की सनक ज्यादा है. तमाम सरकारी और प्राइवेट नर्सिंगहोम्स में एक सूचना चिपकाना कानूनन अनिवार्य है कि यहां प्रसवपूर्व गर्भ में लिंग परीक्षण नहीं किया जाता. यह कानूनी अपराध है. गर्भ में पल रहा बच्चा लड़का है या लड़की यह जानने का हक मां को है या नहीं और होना चाहिए या नहीं इस पर बहस की काफी गुंजाइश है, लेकिन लिंग परीक्षण को गैरकानूनी करार देने और ऐसी जांच करने वालों को अपराधी मानने के बाद भी सरकार को तसल्ली नहीं हुई तो उस ने और एक नया फरमान जारी कर दिया.

यह फरमान भी पहले के नियमों जैसा अव्यावहारिक और गर्भवती महिलाओं के लिए झंझट खड़ा करने वाला है, जिस के मुताबिक अब गर्भवती महिलाओं को सोनोग्राफी करवाने से पहले एक फार्म जिस का नाम एफ है औनलाइन भरना पड़ेगा. इस फार्म को भरे बगैर अगर सोनोग्राफी होती है तो संबंधित डाक्टर के खिलाफ पीसी ऐंड पीएनडीटी ऐक्ट के उल्लंघन का मामला दर्ज करने के साथ ही उस की मशीन भी सील कर दी जाएगी.

गत जुलाई को जैसे ही गर्भधारणपूर्व एवं प्रसवपूर्व निदान तकनीक अधिनियम की राज्य सलाहकार समिति की बैठक में यह फैसला लिया गया वैसे ही अधिकतर प्राइवेट नर्सिंगहोम संचालकों ने अपनी सोनोग्राफी मशीनें डब्बों में बंद कर के रख दीं और कुछ ने तो एक नई तख्ती टांग दी कि यहां सोनोग्राफी की ही नहीं जाती. बहुतों ने बाकायदा लिखित में स्वास्थ्य विभाग को इस बाबत सूचना देने में ही अपनी भलाई और बेहतरी समझी तो बात हैरत की नहीं, बल्कि कई मानों में चिंता की है कि आखिर क्यों सरकार कोख पर इतने पहरे लगाने पर उतारू है कि लोग बच्चा पैदा करने के नाम से ही घबराने लगें.

गर्भवती का कुसूर क्या

फार्म एफ औनलाइन भरवाने का तुक क्या है, यह बात वाकई समझ से परे है जिसे समझाते हुए राज्य के स्वास्थ्य संचालक डा. नवनीत कोठारी की दलील यह है कि इस से सोनोग्राफी क्लीनिकों की निगरानी आसान हो जाएगी.सीधेसीधे कहा जाए तो बात हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण भी है कि गर्भवती महिलाओं को चारे की तरह सरकार इस्तेमाल कर रही है. सोनोग्राफी क्लीनिकों की निगरानी करने के लिए और दूसरे हथकंडे सरकार पहले भी अपना चुकी है, लेकिन कामयाब नहीं हुई तो अब यह बचकानी हरकत, जिस से नुकसान गर्भवती महिलाओं का है, कर रही है. पहली ही नजर में स्वास्थ्य संचालक का बयान इस की पुष्टि भी करता है कि सोनोग्राफी जांच की प्रक्रिया कठिन बनाई जा रही है, जिस से नाजायज मशीनों, क्लीनिकों और नर्सिंगहोमों की गरदन पकड़ी जा सके.

जायजनाजायज की बहस और औचित्य से परे देखें तो तमाम प्रतिबंधों के बाद भी भ्रूण लिंग परीक्षण आम बात है और कानूनी रोक के चलते और महंगा हो गया है. सरकार की मंशा कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाने की है या उसे और बढ़ाने की यह खुद फैसले लेने वाले अधिकारी बेहतर जानते हैं.

यह कानून कैसे लड़केलड़कियों का अनुपात बिगड़ रहा है इसे समझना अब कठिन नहीं रह गया है. अगर भ्रूण लड़का है और डाक्टर उसे लड़की बता दे तो कोई क्या कर लेगा. चूंकि सारा सौदा मौखिक होता है, इसलिए इस का कोई प्रमाण भी नहीं होता. जिन्हें लड़की नहीं चाहिए वे गर्भपात करा लेते हैं और इस बाबत भी फीस नर्सिंगहोम वालों को देते हैं. इस तरह पैसा कमाने के चक्कर में कानून की नजर में नाजायज कारोबार करने वाले एक लड़का पैसा कमाने के लिए खत्म कर देते हैं.

अगर व्यक्तिगत संबंधों मानवीयता या ईमानदारी से भी सोनोग्राफी वाला डाक्टर सच बता दे कि भ्रूण लड़की है तो भी कमाई होना तय होता है. ऐसे में यह कानून नुकसानदेह ज्यादा साबित हो रहा है, जिस की सारी तकलीफ और शारीरिक व मानसिक परेशानी गर्भवती को उठानी पड़ती है. वजह भ्रूण से उस का लगाव स्वाभाविक होता है पर पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक दबाव उसे मजबूर करते हैं कि वह लड़की पैदा न करे. वैसे भी एक से ज्यादा लड़की पैदा करना अब परवरिश, महंगी पढ़ाई और खर्चीली शादी के हिसाब से घाटे का सौदा साबित होने लगा है. लिहाजा, लोग क्व20-25 हजार में भू्रण से छुटकारा पा कर लाखों रुपए बचा लेने का व्यावहारिक रास्ता अपनाते हैं.

अब फार्म एफ का झंझट

नाजायज तरीके से सोनोग्राफी करने वाले डाक्टरों और क्लीनिकों पर शिकंजा कसने के लिए सरकार ने सोनोग्राफी मशीनों में एक ऐक्टिव डिवाइस लगाने का फैसला किया है. इस डिवाइस के मशीन में इंस्टौल होने से चोरीछिपे भ्रूण लिंग परीक्षण करने वाले सोनोलौजिस्ट छिपे नहीं रह पाएंगे, ऐसा स्वास्थ्य विभाग का दावा है.

इस डिवाइस का नाम साइलैंट औब्जर्वर है, जिसे विजन इंडिया सौफ्टवेयर ऐक्सपोर्ट नाम की कंपनी ने खासतौर से बनाया है. जिस सोनोग्राफी मशीन में यह डिवाइस इंस्टौल कर दिया जाएगा उस का सारा रिकौर्ड औनलाइन हो कर स्वास्थ्य विभाग के पास होगा. इस से पता चल जाएगा कि कब किस महिला ने यहां सोनोग्राफी कराई यानी निजता कतई नहीं रह जाएगी.

इस प्रक्रिया से होगा यह कि जिन्हें नाजायज कारोबार करना होगा वे सोनोग्राफी मशीन में यह डिवाइस इंस्टौल ही क्यों करवाएंगे और जो लोग मरीजों खासतौर से गर्भवती महिलाओं के हित में करवा भी लेंगे वे जांच कर इशारों में बता भी देंगे कि गर्भ में पल रहा भू्रण लड़का है या लड़की. तब सरकार कौन सी तकनीक से उन का मुंह बंद करेगी? होगा सिर्फ इतना कि किस महिला की किस क्लीनिक या नर्सिंगहोम की सोनोग्राफी मशीन से जांच कब हुई यह जानकारी सरकार के पास होगी. हालांकि अभी भी यह जानकारी संचालकों को सरकार को देनी पड़ती है. लेकिन इस से हेरफेर होता था, इसलिए अब नए तरीके से करने के लिए सरकार उन्हें मजबूर कर रही है.

तय है यह काम भी अब दलाल करेंगे या सोनोग्राफी मशीन उपयोग करने वाले साइबर कैफे भी खोल कर तगड़ा पैसा फार्म भरने के एवज में वसूलेंगे. इस में सरकार शुरू में कुछ नहीं कर पाएगी, लेकिन साल 2 साल बाद उन कंप्यूटरों और इंटरनैट कैफों पर छापे मारेगी जो फार्म एफ भरवा कर गर्भवतियों की मदद कर रहे होंगे. मुमकिन है इन के लिए भी कोई नया नियमकानून बना दिया जाए और फिर इन से सरकार कमीशन लेने लगे जो आखिरकार गर्भवती की जेब सेही जाएगा. भोपाल के एक नामी डाक्टर जिन का खुद का क्लीनिक है कहते हैं कि सजा के डर से अब डाक्टर सोनोग्राफी मशीन से डरने लगे हैं. हम बेवजह का झंझट पाल कर अपना व्यवसाय खोटा नहीं करना चाहते. हालांकि इस से नुकसान मरीजों का हो रहा है. अकेले भोपाल में 1 साल में 60 फीसदी सोनोग्राफी मशीनें बंद हो गई हैं. अब मरीज इधरउधर भटक रहे हैं और जांच में देर हो जाने से उन की बीमारी बढ़ती जा रही है.

भोपाल के पौश इलाके अरेरा कालोनी में सोनोग्राफी क्लीनिक चलाने वाली एक डाक्टर के यहां अब हालत यह है कि सोनोग्राफी के लिए 15 दिन तक की वेटिंग चल रही है. इस की एक संचालिका का कहना है कि मरीज ज्यादा हैं और मशीनें कम. इस पर भी हमें दुनिया भर की खानापूर्ति कर स्वास्थ्य विभाग को भेजनी पड़ रही है और अकसर सरकारी महकमे वाले हम से बेवजह के सवालजवाब करते हैं.

2 पाटों के बीच में

सरकारी डाक्टरों का दुखड़ा यह है कि उन्हें तो सूखी पगार से काम चलाना पड़ता है जबकि प्राइवेट क्लीनिक वाले मनमाना पैसा जांच और इलाज के नाम पर वसूलते हैं. उन्हें कोई कुछ नहीं कहता. वह इसलिए नहीं कि लोगों के पास पैसा है और वे सहूलत व सुरक्षा चाहते हैं. दरअसल, चमचमाते फाइवस्टार अस्पतालों में लोग भरती रह कर इलाज का खर्च उठाते हैं तो सरकारी डाक्टरों और स्वास्थ्य विभाग के अफसरों के पेट में दर्द होने लगता है. उलट इस के प्राइवेट डाक्टरों और नर्सिंगहोम वालों का आरोप यह है कि सरकारी डाक्टर और स्वास्थ्य विभाग अरबों की योजनाओं में से अपना हिस्सा भ्रष्टाचार कर निकाल लेते हैं और बातें साधुसंतों जैसी करते हैं मानो ईमानदारी से सरकारी अस्पतालों में अपनी कुरसी पर बैठे गरीब मरीजों का इलाज कर रहे हों. हकीकत तो यह है कि सरकार अपने ही डाक्टरों को रास्ते पर नहीं ला पा रही है. आए दिन शिकायतें आती रहती हैं कि सरकारी अस्पतालों में दवा नहीं है और इतने का घपला हुआ. डाक्टर तो दूर की बात है सरकारी अस्पताल का स्टोरकीपर भी करोड़पति निकलता है.

इन 2 पाटों के बीच फार्म एफ नई परेशानी है. भोपाल के हमीदिया अस्पताल में जब यह प्रतिनिधि पहुंचा तो पता चला कि ज्यादातर गर्भवती महिलाओं को नहीं मालूम कि यह नया फार्म एफ कहां से लेना है, कैसे भरना है इसलिए जांच नहीं हो पा रही है. कुछ गर्भवतियों की मदद अस्पताल के मुलाजिमों ने फार्म भरवाने में जरूर की, लेकिन बदले में पैसे लिए. इस परेशानी की जड़ सरकारी कानून और नियम हैं, जिन की शिकार गर्भवती महिलाएं हो रही हैं. प्राइवेट नर्सिंगहोम वाले कहते हैं कि स्वास्थ्य विभाग हम से ज्यादा घूस वसूलना चाहता है, इसलिए हर रोज ऐसे तुगलकी फरमान जारी करता है जिस से हमारा कम मरीजों का नुकसान ज्यादा होता है. हमें मरीजों और गर्भवती महिलाओं से सहानुभूति है, लेकिन हमारी अपनी कुछ मजबूरियां हैं, जिन के चलते हम तटस्थ रहना ही उचित समझते हैं.

जाहिर है यह नया नियम गर्भवती महिलाओं के लिए झंझट खड़ा कर रहा है और बजाय नाजायज क्लीनिकों व नर्सिंगहोम्स पर शिकंजा कसने के उन का कारोबार और आमदनी दोनों बढ़ा रहा है. पारिवारिक और सामाजिक बंदिशों में जी रही गर्भवतियां अब नई कानूनी बंदिश में फंस गई हैं जो एक बार सुरक्षित प्रसव और सहूलतों के लिए तो ज्यादा पैसा दे सकती हैं पर जांच में देर होने से होने वाले नुकसानों से कैसे बचेंगी, यह किसी सरकार, स्वास्थ्य विभाग या प्राइवेट डाक्टर को नहीं मालूम. उन के लिए गर्भवती महिला मरीज कम पैसा उगलने वाली मशीन ज्यादा साबित होती है

निजता पर हमला

फार्म एफ में जो जानकारी गर्भवती महिलाओं को सरकार को देनी है, उस में यह भी शामिल है कि आखिरी बार मासिकधर्म कब हुआ था. इस के अलावा सोनोग्राफी कराने वाली गर्भवती को फोटोयुक्त पहचानपत्र भी अनिवार्य रूप से जमा कराना है. बाकी तमाम औपचारिकताएं सरकारी फार्मों जैसी हैं, जिन में तरहतरह की जानकारी खुद के बारे में देनी पड़ती है मानो किसी मकान की रजिस्ट्री कराई जा रही हो या पासपोर्ट बनवाया जा रहा हो. यह एक तरह से हलफनामा ही है, जिस में गर्भवती को यह घोषणा भी करनी है कि उस ने लिंग पहचान की गरज से सोनोग्राफी नहीं कराई है और सोनोग्राफी करने वाले डाक्टर को भी बताना है कि उस ने जच्चाबच्चा की बेहतरी के लिए सोनोग्राफी की है, लिंग परीक्षण नहीं किया है.लेकिन विजन इंडिया सौफ्टवेयर ऐक्सपोर्ट का यह दावा खोखला नजर आता है कि इस डिवाइस की मदद से कन्या भ्रूण हत्या को रोका जा सकता है. यह तय है कि सोनोग्राफी प्रक्रिया औनलाइन होगी तो यह एक तरह की रिकौर्डिंग होगी, लेकिन  डाक्टर अगर इशारे से या किसी दूसरे तरीके से मसलन लड़का हो तो जय हिंद बुदबुदा कर और लड़की हो तो जय मां कह कर लिंग पहचान बताए तो कोई उस का क्या कर लेगा? फिर वह बाद में बाहर भी नतीजा बता सकता है. तय है इस के लिए उसे कोई डिवाइस या कानून नहीं रोक सकता. अलावा इस के कोई भी विशेषज्ञ सौफ्टवेयर इंजीनियर इस की काट आसानी से निकाल सकता है.

युवा पीढ़ी नशे के आगोश में क्यों

युवा पीढ़ी पर नशीले पदार्थों की पकड़ लगातार मजबूत हो रही है. युवतियों में भी ड्रग्स स्टेटस सिंबल बन जाने से इस बुराई की समाप्ति और भी मुश्किल होती जा रही है. स्कूलकालेज भी नशे से अछूते नहीं रहे. नशीले पदार्थों को आमतौर पर 4 भागों में बांटा जाता है- अफीम व अफीम से बने मारफिन, कोडीन, हेरोइन व ब्राउन शुगर, गांजा व गांजे से बने चरस व हशीश, कोकीन, सैन्कोटिक ड्रग्स जैसे एलएसडी, मैंड्रोक्स व पीसीपी. ये सभी बेहद खतरनाक हैं. छोटे नगरों व गांवों में सुल्फे गांजे ने अपने पैर पसार रखे हैं, तो बड़े नगरों में हेरोइन व ब्राउन शुगर ने अपनी जड़ें जमा ली हैं. मुंबई में इन का सेवन करने वालों में 14 से 25 आयुवर्ग के युवकयुवतियों की संख्या सब से अधिक है.

युवकयुवतियों में नशाखोरी की वजह उन का किसी न किसी समस्या से ग्रस्त होना है. आर्थिक दिक्कत, नौकरी की तलाश, असफल प्रेम, मनचाही सफलता न मिलना, परीक्षा में फेल हो जाना, सुखशांति न मिलना, परिवार में इग्नोर फील करना, किसी काम में मन न लगना जैसे कितने ही कारण हैं, जिन से बचने के लिए उन्हें नशे का सेवन ही आसान व एकमात्र उपाय नजर आता है. जबकि नशा किसी समस्या का हल नहीं है.

नशे की गिरफ्त में लड़कियां

पश्चिमी सभ्यता व आधुनिक विचार अपनाने वाले कितने ही परिवारों की लड़कियां स्कूल व कालेज से ही नशीले पदार्थों का सेवन करने लगती हैं. शुरू में वे चोरीछिपे अपना शौक पूरा करती हैं, पर बाद में यह शौक लज्जा व शर्म की सारी हदें लांघ जाता है. नशे को आधुनिकता का पर्याय व नई पीढ़ी की पहचान समझने वाली लड़कियां फैशन, पारिवारिक परिस्थिति, कुंठा, हीनभावना, तनाव आदि से मुक्ति के लिए इसे अपनाती हैं. इंडियन काउंसिल औफ मैडिकल रिसर्च लड़कियों के नशा करने के पीछे 3 कारण मानता है- मित्रों का प्रभाव, अपने से बड़ों की नकल व भूख को दबाना. इन में दोस्तों के प्रभाव में नशा करने वाली लड़कियों की संख्या सर्वाधिक है. युवतियों में सिगरेट व शराब पीने की निरंतर बढ़ रही प्रवृत्ति तो हानिकारक है ही, नशीले पदार्थों का सेवन तो इस से भी ज्यादा घातक है.

इन को अपने भविष्य की चिंता नहीं है. नशे के आगोश में डूबी इन लड़कियों का शरीर इस से वास्तविक सुंदरता तो खोता ही है, नशीले पदार्थ के सेवन से गर्भ में पल रहे शिशु पर भी इस का बुरा प्रभाव पड़ता है. सिगरेट व मादक द्रव्यों के प्रयोग से गर्भाशय की मांसपेशियां कमजोर हो जाने के कारण जहां गर्भधारण में दिक्कत आती है, वहीं उन्हें और कई जटिलताओं का भी सामना करना पड़ता है.

दांपत्य जीवन में दरार

शरीर में मादकता की अधिकता रक्तचाप व विक्षिप्तता को जन्म देती है, जिस से आंखों में मोतियाबिंद की शिकायत अंधत्व में बदल सकती है. महिला की कार्यक्षमता कम हो जाती है. मादक पदार्थों के सेवन से दांपत्य जीवन में दरार पैदा हो जाती है. पति, सासससुर व बच्चों आदि के साथ मनमुटाव घर को नर्क बना देता है. दक्षता प्रभावित होने से कार्य क्षेत्र से जुड़ी महिलाएं दफ्तर व संस्थानों में उपहास व क्रोध का पात्र बनती हैं. सरकार ने जनसामान्य के स्वास्थ्य को महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय कर्तव्यों में शामिल करते हुए संविधान के अनुच्छेद 47 के अनुसार, चिकित्सीय प्रयोग के अतिरिक्त स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पदार्थों व वस्तुओं के उपयोग को निषिद्ध करने केलिए 1985 में नशीली दवाएं व मनोविकारी पदार्थ कानून- एनडीपीएस ऐक्स बनाया. इस कानून को लागू करने के साथ ही मादक पदार्थों का सेवन करने वालों की पहचान, इलाज, शिक्षा, बीमारी के बाद देखरेख, पुनर्वास व समाज में पुनर्स्थापना के लिए जोरदार प्रयास किए जा रहे हैं, किंतु समाज में नशाखोरों की बढ़ती संख्या इन पर पानी फेर रही है.

इसे रोकने के लिए फिल्मों व टीवी धारावाहिकों में सिगरेट, शराब व नशीली वस्तुओं के सेवन वाले अनावश्यक दृश्यों के चित्रण व प्रदर्शन पर पूर्णतया पाबंदी लगनी चाहिए. टीनऐजर्स युवतियां समाज की अमूल्य धरोहर हैं. घरपरिवार व समाज को आदर्श रूप देने में अहम भूमिका निभाने वाली. इन का शिक्षित, प्रशिक्षित व आदर्शवान होना जरूरी है. अत: टैलीविजन पर दिखाए जाने वाले धारावाहिकों व फिल्मों में उन का आदर्श चित्रण व प्रस्तुतिकरण भी आवश्यक है. 

अब एटीएम से पैसे की जगह मिलेगा पानी

अभी तक आपने सिर्फ एटीएम से रुपये निकलते ही देखे होंगे, लेकिन अब आपको एटीएम से पानी की सुविधा मिलेगी. समाजवादी पेयजल योजना के तहत उत्तर प्रदेश में सार्वजानिक स्थानों पर पानी के एटीएम लगेंगे. इनसे 2 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से आम जनता को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया जाएगा.

मुख्य सचिव आलोक रंजन ने सार्वजानिक स्थानों जैसे ब्लाक, तहसील एवं कलेक्ट्रेट कार्यालयों और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों  पर पर एटीएम लगाने के निर्देश दिए हैं. उन्होंने यह भी  निर्देश दिये कि समाजवादी पेयजल योजना के तहत आरओ का शुद्ध पानी न्यूनतम 2 रुपये प्रति लीटर पर उपलब्ध कराये जाने की व्यवस्था की जाए, ताकि निचले स्तर के लोगों को भी शुद्ध पेयजल उपलब्ध हो सके.

अब नींबू से करें अपना स्मार्टफोन चार्ज

आज तक आप ने नींबू को केवल खाने, दाग छुड़ाने और ब्यूटी ट्रीटमैंट के लिए इस्तेमाल किया होगा, लेकिन आप को यह जानकर कर हैरानी होगी कि अब आप नींबू से अपना स्मार्टफोन भी चार्ज कर सकते हैं. जी हां, आजकल सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल हुआ है, जिस में स्मार्टफोन को नींबू से चार्ज करने का दावा किया गया है. यानी अब स्मार्टफोन चार्ज करने के लिए बिजली की जरूरत नहीं है, बल्कि नींबू का इस्तेमाल कर फोन को चार्ज किया जा सकता है.

क्या है वीडियो में

इस वीडियो के अनुसार अब बिजली नहीं रहने पर आप को टेंशन लेने की जरूरत नहीं है कि आप का फोन कैसे चार्ज होगा, बस अपने पास नींबू रखिए और स्मार्टफोन चार्ज कीजिए. वीडियो में नींबू से स्मार्टफोन को चार्ज करने के तरीके के बारे में बताया गया है. जिसमें सबसे पहले नींबू को दो हिस्सों में काटना होता है, फिर चार्जर के पौइंट को नींबू के दोनों हिस्सों के अंदर लगाना होता है. इस के बाद चार्जर के तार को अपने स्मार्टफोन से कनेक्ट करना है. आप देखेंगे कि आप का फोन चार्ज हो रहा है.

इस्तेमाल करने से पहले सोचें जरूर

यह वीडियो देख का आप के दिमाग में एक बार यह विचार जरूर आएगा कि ऐसा कैसे हो सकता है, क्या यह सच में संभव है ? आप भी इसे एक बार  ट्राई करना जरूर चाहेंगे, पर इसे ट्राई करने से पहले जरूर सोचें, कहीं ऐसा न हो कि आप को लेने के देने पड़ जाए, क्योंकि इस से पहले भी केले और आलू से स्मार्टफोन को चार्ज करने की बात कही जा चुकी है.

ये लोग कौमेडी से कर रहे हैं समाज सुधार

कौमेडी का मुकाबला कौमेडी से कर लोगों के बीच हीरो बन गए हैं मैक्सिको के अर्थरो हेरनांदेज और एक निजी कंपनी में सिटी मैनेजर अमेरिकी युवती अर्ने अस डेन रूदेन. जब लोग ऊटपटांग हरकतें करने से बाज नहीं आते, तो ये भी अपनी कौमेडी से न सिर्फ लोगों को गुदगुदाते हैं, बल्कि इस के माध्यम से सही रास्ते पर भी ले आने में कामयाब होते हैं. शहर के जिन स्थानों पर अकसर लोग जाम लगा देते हैं, वहां पर हेरनांदेज उन्हें सबक सिखाने के लिए पहले से ही अपनी गाड़ी लगा कर खड़ी कर देते हैं. उन की इस हरकत को देख कर तो लगता है जैसे वे कह रहे हो कि दम है तो लगा कर दिखाओ जाम. उन की गाड़ी को देख हर किसी की सिट्टीपिटटी गुम हो जाती है.

यही नहीं अगर सडक़ पर हुए गड्ढे की प्रशासन ने समय रहते सुध नहीं ली, तो फिर तो उन का कारनामा देखने लायक होता है. वे खुद ही गड्ढे में पानी भर कर उस में नहाना शुरू कर देते हैं ताकि प्रशासन शर्म से पानी पानी हो जाए. वे भद्दे कपड़े पहनने में भी नहीं हिचकते. जब लोग ऐसे कपड़ों पर कमैंट्स करते हैं तब उन की जबान पर यही डायलौग होता है, ‘जब तुम्हें गंदी हरकतें करने में शर्म नहीं आती तो फिर मुझे काहे की. देखो आंखें फाडफ़ाड़ कर मेरे ऐसे कपड़ों को. जब आए खुद की हरकतों पर शर्र्म तब ठान लेना सुधरने की.’ उन की बात सुन कर लोग खुद को बदलने पर मजबूर हो जाते हैं.

ठीक इसी तरह रूदेन को भी यहांवहां गाड़ी पार्क करने वालों और गंदगी फैलाने वालों से चिढ़ है. अपने मिशन में कामयाब होने के लिए वे पेरिस्कोप ऐप का प्रयोग करती हैं. इस के माध्यम से जैसे ही उन्हें पता चलता है कि सडक़ पर कोई गंदगी फैला रहा है या गलत ढंग से कार पार्क कर रहा है तो वे झट से उस का वीडियों बना कर सोशल साइट पर वायरल कर के उस की वौट लगा देती हैं. इस के लिए उन की कई बार धुनार्ई भी हो चुकी है. लेकिन कहते हैं न कि जिस में कुछ करने का जज्बा हो उस के हौसले को कोई नहीं हिला सकता.

‘मोदी पिचकारी, जो तूने मुझे मारी…’

लंदन, सिंगापुर, हांगकांग और बैंकाक के मैडम तुसाद म्यूजियम में प्रधनमंत्री नरेंद्र मोदी की मोम की मूर्ति लगाई जायेगी. यहां पर पहले से महात्मा गांधी, इंदिरा गांधी, अमिताभ बच्चन, शाहरूख खान, सचिन तेंदुलकर, ऐश्वर्या राय, सलमान खान, रितिक रोशन, करीना कपूर , माधुरी दीक्षित और कैटरीना कैफ की मोम की मूर्तियां लगी है. मैडम तुसाद म्यूजियम में देश और दुनिया के बडे बडे लोगों की मूर्तियां लगी है. मूर्तियां सम्मान और प्रचार का हिस्सा है. अपने देश में होली में बिकने वाली पिचकारी और दीवाली में बिकने वाले पटाको में तमाम लोगों के फोटो लगाकर खरीदने वालों को लुभाया जाता है. जिस पटाखा या फुलझडी का प्रचार कैटरीना और करीना ने नहीं किया होता है उनपर भी उनकी फोटो लगा दी जाती है. इनको तैयार करने वाले यह देखते है कि लोगों के बीच कौन सबसे ज्यादा लोकप्रिय है वह उसी के नाम का प्रयोग करते है. 

होली के त्योहार का रंग बाजार पर चढने लगा है. बाजार में तरह तरह की पिचकारी दुकाने पर आने लगी है, जो रंग खेलने वालों को आकर्षित करने लगी हैं. प्लास्टिक की बनी यह तरह तरह की पिचकारी 150 रूपये से शुरू होकर 2 से 3 हजार तक की कीमत की आ रही हैं. मौल्स से लेकर सडक तक इस तरह की पिचकारी मिलती है. मजेदार बात यह है कि बच्चे रंग खेलने के बाद पिचकारियों को खिलौने के रूप में प्रयोग भी करते है. इन पिचकारियों को बनाने में अलग अलग डिजाइनों का प्रयोग किया जाता है. कोशिश यह होती है कि डिजाइन ऐसे हों, जो बच्चों को आकर्षित कर सकें. कार्टून कैरेक्टर और बन्दूक रायफल आकार वाली पिचकारी बच्चों को सबसे ज्यादा पसंद आते हैं. इस बार बाजार में जो नई किस्म की पिचकारी देखने को मिली, वह मोदी पिचकारी है. इसमें प्रधनमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर चिपकाई गई है. दुकानदारों का कहना है कि आजकल मोदी जी का जिस तरह से प्रचार हो रहा है, अब बच्चें भी उनकी तस्वीर के प्रति आकर्षित हो रहे है.

होली के त्योहार में बुरा न मानने का रिवाज है. ऐसे में नेताओं के नाम की पिचकारी का प्रयोग भी धडल्ले से होने लगा है. फिलहाल बाजार में प्रधनमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम वाली पिचकार बिकने आ गई है. हो सकता है इसके पीछ सोनिया गांधी, ममता बनर्जी या राहुल गांधी के नाम वाली पिचकारी भी तैयार हो रही हो. ऐसे में लोग एक दूसरे के उपर अलग अलग नाम वाली पिचकारी से रंग डालते नजर आये. कहीं मोदी पिचकारी से राहुल पिचकारी का मुकाबला हो रहा हो, तो कहीं सोनिया के नाम वाली पिचकारी से ममता के नाम वाली पिचकारी में रंग चल रहा हो. कुछ भी हो जनता तो बुरा न मानो होली है का नारा लगाते हुये बस एक दूसरे पर रंग डालने का मजा लेगी. रंग खेलते समय इस बात का ख्याल जरूर रहे कि कहीं रंग में भंग न पडे. ऐसे में नेताओं के नाम वाली पिचकारी का प्रयोग सोच समझ कर ही करे.

तो क्या पाकिस्तान के हाथों होगी टीम इंडिया की हार…!

भारत और पाकिस्तान का मुकाबला हमेशा लोगों की दिलों की धड़कन बढ़ा देता है. एक बार फिर दर्शकों को ये रोमांचक मैच देखने को मिलेगा. फिर से टीम इंडिया और पाकिस्तान कोलकाता के ऐतिहासिक मैदान ईडन गार्डन में भिडऩे को तैयार है.

टी 20 वर्ल्ड कप के मुकाबले में जहां टीम इंडिया के धुंरधरों ने अपनी कमर कस ली है, तो वहीं पाकिस्तानी खिलाड़ी भी इस मैच में अपना ऐड़ी-चोटी का जोर लगाने को तैयार हैं.  लेकिन इस बार पलड़ा पाकिस्तान का भारी होगा.

दरअसल, ये हम नहीं बल्कि क्रिकेट के रिकार्ड बता रहे हैं. भारत-पाकिस्तान के इस मुकाबले में पाकिस्तान की टीम भारत से बहुत आगे है. आंकड़ों पर नजर डाले तो अब तक भारत और पाकिस्तान क्रिकेट टी-20 से लेकर वनडे इंटरनेशनल  वर्ल्ड कप में कुल 10 बार आपस में भिड़े हैं. इन 10 मुकाबलों में टीम इंडिया का पलड़ा भारी रहा है. टीम इंडिया ने इनमें से सभी मैच में जीत हासिल की है. लेकिन जब बात वर्ल्ड कप के अलावा भारत और पाकिस्तान के मकाबले की हो, खासकर ईडन गार्डन की, तो यहां रिकार्ड्स  पाकिस्तान के पक्ष में हैं.

अब तक कोलकाता के ईडन गार्डन में भारत और पाकिस्तान आपस में चार बार भिड़े हैं. चारों बार पाकिस्तानी टीम की ही जीत हुई है. ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि इस बार भी  मैदान में पाकिस्तान की टीम भारत पर भारी पड़ सकती है. अब देखना यह होगा कि भारत पाकिस्तान का यह रिकार्ड तोड़ पाता है या नहीं?

ईडन में भारत के खिलाफ पाकिस्तान की जीत का ये रहा आंकड़ा-

18 फरवरी 1987: 2 विकेट से पाकिस्तान की जीत.

28 अक्टूबर 1989: 77 रनों से पाक से भारत को हराया.

13 नवंबर 2004: 6 विकेट से पाक ने टीम इंडिया को हराया.

3 जनवरी 2013: 85 रनों से भारत को हार मिली.

 

तिग्मांशु धुलियाः माफी मांगने का अवसर मिल गया

भारत व पाकिस्तान के बीच राजनैतिक स्तर पर शांति स्थापित करने की कोशिशें रंग नहीं ला रही हैं. आए दिन दोनों देशों के बीच कोई न कोई नया विवाद या नए तरह का तनाव पैदा होता रहता है. ऐसे माहौल के बीच भारत की मीडिया कंपनी ‘‘जी एंटरटेनमेंट इंटरप्रायजेस लिमिटेड’’ ने ‘‘जील फार यूनीटी’’ की घोषणा कर एक नया कदम उठाया है. ‘‘जील फार यूनीटी’’ के तहत भारत व पाकिस्तान की आवाम को एक दूसरे के प्रति सोचने व समझने का मौका देकर एक बदलाव लाने की दिशा में काम किया जा रहा है. इसी के तहत छह भारतीय और छह पाकिस्तानी फिल्मकार इस मंच पर एक साथ इकट्ठा हुए है. इन लोगों ने दोनों देशों में भाई चारा व अमन चैन स्थापित करने के लिए फिल्में बनायी हैं, जो कि बहुत जल्द दोनो देशों में रिलीज की जाएंगी. इसी मकसद से 15 मार्च को वाघा बार्डर, अमृतसर पर दोनो देशों के सभी छह छह यानी कि कुल बारह फिल्मकार मिले और पारस्परिक रूप से शांति एवं सौहार्द को प्रोत्साहित करने पर बल दिया.

वाघा बार्डर से छह पाकिस्तानी फिल्मकारों खालिद अहमद, महरीन जब्बार, मीनू फरजाद, सबीहा समर, शाहबाज समर व सिराज उल हक का ‘जील’ के पुनीत गोयंका, शैलजा केजरीवाल व सुनील बुच के साथ छह भारतीय निर्देशकों केतन मेहता, अपर्णा सेन, तिग्मांशु धुलिया, बेजाय नांबियार, निखिल अडवाणी ने स्वागत किया. उसके बाद  वाघा बार्डर से एक किलोमीटर दूर अमृतसर के ‘सरहद रेस्टोरेंट’ में मीडिया से इन फिल्मकारों ने लंबी चौड़ी बातें की. इस मौके पर तिग्मांशु धुलिया ने कहा कि उन्हे भारत पाक विभाजन की गलती के लिए माफी मांगने का अवसर मिला है.

हमसे बात करते हुए तिग्मांशु धुलिया ने कहा-‘‘पाकिस्तानी फिल्मकार भारत आकर भारतीय कलाकारों व तकनीशियन के साथ फिल्में बनाएं. भारतीय फिल्मकार पाकिस्तान जाकर पाकिस्तानी कलाकारों व तकनीशियन के साथ फिल्में बनाएंगे, तो अमन चैन व शांति स्थापित करने की दिशा में हम कलाकार अहम भूमिका निभा सकेंगे. हम छह भारतीय व छह पाकिस्तानी फिल्मकारो ने ‘जील फार यूनिटी’ के तहत जो काम कर रहे हैं, उससे हमें भारत  पाकिस्तान यानीकि देष के  विभाजन की गलती पर माफी मांगने का अवसर मिल गया है. मुझे लगता है कि राजनैतिक स्तर पर जो भी गलतियां हुई हैं या हो रही हैं, उसे हम सुधार सकते हैं. हम देश के  विभाजन को बहुत बड़ी गलती मानते हैं. इसलिए हम कहते हैं कि अब हमें ‘जील फार यूनीटी’ की वजह से ने माफी मांगने का अवसर मिला है.’’

– शांतिस्वरुप त्रिपाठी, वाघा बार्डर, अमृतसर से लौटकर

धर्म के चरणों में राजनीति

धर्म वास्तव में उतना मजबूत होता नहीं है जितना कि दिखता है. दरअसल में उद्योग और राजनीति मिलकर उसे मजबूती देते हैं, जिससे वक्त पड़ने पर अपना उल्लू सीधा किया जा सके. दर्शनशास्त्र से स्नातकोत्तर उपाधि लेने वाले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तय है इस बात को औरों से बेहतर समझते होंगे, लेकिन उनकी अपनी मजबूरियां और कमजोरियां हैं, जिनके चलते वे अक्सर धर्मगुरुओं के सामने नतमस्तक नजर आते हैं.

ज्येातिष व द्वारकापीठ के शंकराचार्य स्वरूपनांद जब बीते दिनों पांच दिवसीय प्रवास पर भोपाल आए, तो शिवराज सिंह चौहान दौड़े दौड़े उनके पास गए और चरण छूकर उनसे आशीर्वाद लिया. कभी विदिशा में दुर्गा और गणेश की झांकियों से अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले शिवराज सिंह को लगता है कि यह धर्म की शक्ति और धर्मगुरुओं के आशीर्वाद का प्रताप है कि वे आज इस मुकाम पर हैं.

स्वरूपानंद ऐसा नहीं कि किसी जंगल में बैठे कोई कठोर तपस्या या त्याग करते हों, पक्षियों ने उनके बालों में घोसला बना लिया हो और पलकें जमीन छूने लगी हों या फिर शरीर में दीमक लग गई हो, उलटे उनका वैभव देख जरूर श्रद्धालु हैरत में पड़ जाते हैं. स्वरूपानंद जिस वेन में चलते हैं उसमें ऊपर चढ़ने के लिए लिफ्ट लगी हुई है वे देश के किसी भी कोने में हों, उनके पीने का पानी गोटेगांव (श्रीधाम) स्थित उनके आश्रम से ले जाया जाता है और उनकी भारी भरकम रसोई उनके साथ चलती है.

बहरहाल राजनेता अगर इस तरह धर्मगुरुओं के पांवों में पड़े दिखाई दें तो इससे लोकतंत्र कमजोर होता है. धर्म के अंधे पाखंडी, अंधविश्वासी लोग यह नहीं समझ पाते कि कैसे कोई शराब कारोबरी कितनी सहूलियत से अरबों रुपए डकार कर देश से भाग जाता है और कोई आध्यात्मिक गुरु 5 करोड़ जो उसके लिए बेहद मामूली रकम होती है का जुर्माना भरकर 1000 एकड़ जमीन पर कला के नाम पर पर्यावरण से खिलवाड़ करके स्वर्ग का सा नजारा धरती पर दिखा देता है.

आम जनता की धर्म नाम की कमजोरी इन सबने पकड़ रखी है, इसलिए लोग ऐसी घटनाओं का वांछित विरोध नहीं कर पाते, बस खिसिया कर रह जाते हैं. स्वरूपनानंद पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के भी गुरु हैं और हिन्दू नहीं बल्कि सनातन धर्म को मानते हैं, जिससे समाज पर ब्राह्मणों का दबदबा बना रहे. शायद इसीलिए शिवराज सिंह उनकी शरण में जाते हैं, जिससे ब्राह्मणों वोटों को लुभाया जा सके और कहीं किसी बात पर यानी स्वागत सत्कार में कमी होने पर शंकराचार्य सिंहस्थ के बहिष्कार का ऐलान न कर दें.

इस औपचारिक मुलाकात को मध्यप्रदेश सरकार द्वारा दिग्विजय सिंह पर अपने कार्यकाल के दौरान विधानसभा  में फर्जी भरती मामले पर दायर मुकदमे से जोड़कर भी देखा जा रहा है जिससे दिग्विजय खासे परेशान हैं.

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