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धर्म के चरणों में राजनीति

धर्म वास्तव में उतना मजबूत होता नहीं है जितना कि दिखता है. दरअसल में उद्योग और राजनीति मिलकर उसे मजबूती देते हैं, जिससे वक्त पड़ने पर अपना उल्लू सीधा किया जा सके. दर्शनशास्त्र से स्नातकोत्तर उपाधि लेने वाले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तय है इस बात को औरों से बेहतर समझते होंगे, लेकिन उनकी अपनी मजबूरियां और कमजोरियां हैं, जिनके चलते वे अक्सर धर्मगुरुओं के सामने नतमस्तक नजर आते हैं.

ज्येातिष व द्वारकापीठ के शंकराचार्य स्वरूपनांद जब बीते दिनों पांच दिवसीय प्रवास पर भोपाल आए, तो शिवराज सिंह चौहान दौड़े दौड़े उनके पास गए और चरण छूकर उनसे आशीर्वाद लिया. कभी विदिशा में दुर्गा और गणेश की झांकियों से अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले शिवराज सिंह को लगता है कि यह धर्म की शक्ति और धर्मगुरुओं के आशीर्वाद का प्रताप है कि वे आज इस मुकाम पर हैं.

स्वरूपानंद ऐसा नहीं कि किसी जंगल में बैठे कोई कठोर तपस्या या त्याग करते हों, पक्षियों ने उनके बालों में घोसला बना लिया हो और पलकें जमीन छूने लगी हों या फिर शरीर में दीमक लग गई हो, उलटे उनका वैभव देख जरूर श्रद्धालु हैरत में पड़ जाते हैं. स्वरूपानंद जिस वेन में चलते हैं उसमें ऊपर चढ़ने के लिए लिफ्ट लगी हुई है वे देश के किसी भी कोने में हों, उनके पीने का पानी गोटेगांव (श्रीधाम) स्थित उनके आश्रम से ले जाया जाता है और उनकी भारी भरकम रसोई उनके साथ चलती है.

बहरहाल राजनेता अगर इस तरह धर्मगुरुओं के पांवों में पड़े दिखाई दें तो इससे लोकतंत्र कमजोर होता है. धर्म के अंधे पाखंडी, अंधविश्वासी लोग यह नहीं समझ पाते कि कैसे कोई शराब कारोबरी कितनी सहूलियत से अरबों रुपए डकार कर देश से भाग जाता है और कोई आध्यात्मिक गुरु 5 करोड़ जो उसके लिए बेहद मामूली रकम होती है का जुर्माना भरकर 1000 एकड़ जमीन पर कला के नाम पर पर्यावरण से खिलवाड़ करके स्वर्ग का सा नजारा धरती पर दिखा देता है.

आम जनता की धर्म नाम की कमजोरी इन सबने पकड़ रखी है, इसलिए लोग ऐसी घटनाओं का वांछित विरोध नहीं कर पाते, बस खिसिया कर रह जाते हैं. स्वरूपनानंद पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के भी गुरु हैं और हिन्दू नहीं बल्कि सनातन धर्म को मानते हैं, जिससे समाज पर ब्राह्मणों का दबदबा बना रहे. शायद इसीलिए शिवराज सिंह उनकी शरण में जाते हैं, जिससे ब्राह्मणों वोटों को लुभाया जा सके और कहीं किसी बात पर यानी स्वागत सत्कार में कमी होने पर शंकराचार्य सिंहस्थ के बहिष्कार का ऐलान न कर दें.

इस औपचारिक मुलाकात को मध्यप्रदेश सरकार द्वारा दिग्विजय सिंह पर अपने कार्यकाल के दौरान विधानसभा  में फर्जी भरती मामले पर दायर मुकदमे से जोड़कर भी देखा जा रहा है जिससे दिग्विजय खासे परेशान हैं.

डेअर यूः सेक्स, ड्रग्स, हत्या और गैंगरैप की पराकाष्ठा

गैंगरैप और महिला उत्पीड़न के मुद्दे पर बनायी गयी ‘वयस्क’ यानी कि ‘ए’ प्रमाणपत्र वाली फिल्म ‘‘डेअर यू’’ एक प्रताड़ित लड़की द्वारा बदला लिए जाने की निडर व साहस भरी कथा है. फिल्म के लेखक व निर्देशकक डेनिस सेलर्का व मेहुल सिमरिया ने अपनी फिल्म के संवाद के माध्यम से देश की सीमा पर दुश्मन को मौत के घाट उतारने वाले वीर सैनिक के समकक्ष उस लड़की रानी दीवान को बताया है, जो कि अपने साथ गैंगरेप करने वाले चार युवकों की हत्या करती है. इतना ही नहीं लेखक व निर्देषक अपनी फिल्म की नायिका रानी दीवान को बदलते समय की जरुरत बताते हैं.

फिल्म ‘‘डेअर यू’’ की कहानी का केंद्र युवा लड़की रानी दीवान (अलीषा खान) है, जो कि कश्र से मुंबई के चर्चिल कालेज में पढ़ाई करने आती है. वह इस कालेज के सात लड़के व लड़कियों के ग्रुप ‘‘डेअर यू’’ की सदस्य बन जाती है. इस ग्रुप में उसके अलावा रविराज, शार्ट, फौजी, ईवा मेंडिस हैं. इनके बीच आपसी रिश्ते भी हैं. ईवा और रविराज के बीच प्रेम संबंध हैं. लेकिन कालेज में रानी दीवान के आते ही रविराज, ईवा का साथ छोड़कर रानी दीवान के प्रेम में पड़ जाता है. यह बात ईवा को पसंद नहीं. वह अपने दूसरे तीन साथियों की मदद से एक शर्त लगाकर रानी दीवान के खिलाफ साजिश रचती है. पर वह जो चाहती है, वैसा नहीं हो पाता है. फिर जब ईवा को पता चलता है कि रानी दीवान अपने दूसरे प्रेमी आर्यन के साथ ब्लूबीच रिसोर्ट पर समय बिताने जा रही है, तो वह अपने तीन साथियों के साथ साथ एक ड्रग्स डीलर की मदद से ब्लूबीच रिसोर्ट में आर्यन की पिटाई करवाने के अलावा रानी दीवान का गैंगरेप बहुत ही अमानवीय प्रताड़ना के साथ करवा देती है. ब्लू बीच रिसोर्ट के मैनेजर, पुलिस इंस्पेक्टर खान को बुला देते हैं. मगर रानी दीवान, पुलिस इंस्पेक्टर को हकीकत बयान करने के बाद इंस्पेक्टर को उनकी बेटी का वास्ता देते हुए शिकायत दर्ज कराने से इंकार कर देती है.

वह नहीं चाहती कि कालेज में पढ़ने वाले उसके साथी और वह बदनाम हो. पर दूसरे ही दिन से रानी दीवान अपने साथ गैंगरेप करने वाले युवकों को वीभत्स व दिल हदला देने वाले अमानवीय तरीके से मौत के घाट उतारना शुरू करती है. इन हत्याओं की जांच में जुटे पुलिस इंस्पेक्टर अशोक पंडित अपराधी तक नही पहुंच पा रहे हैं. पर जब एक दिन पुलिस इंस्पेक्टर खान, इस्पेक्टर पंडित के सामने ब्लू बीच रिसोर्ट की घटना को रखते हैं, तो इंस्पेक्टर पंडित को रानी दीवान पर शक हो जाता है और वह इसे गिरफ्तार करना चाहता है. मगर तभी रानी दीवान और ईवा ग्रोवर की बातचीत सुनकर पुलिस इंस्पेक्टर रीना  दीवान के पक्ष में हो जाता है. इधर रानी के हाथों ईवा भी मारी जाती है. मगर सच जानते हुए भी पुलिस इंस्पेक्टर अशोक पंडित रानी दीवान की बजाय सारा आरोप ड्रग डीलर व ईवा पर लगाकर मामला रफा दफा कर देता है. पुलिस इंस्पेक्टर पंडित को राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है. तब पुलिस इंस्पेक्टर पंडित एक चैनल की रिपोर्टर से कहता है-‘‘जिन दरिंदो ने रानी दीवान के साथ वीभत्स और अमानवीय तरीके से गैंगरेप किया, उन्हे उनके कर्मो की सजा तो मिलनी ही चाहिए थी. रानी ने अपने साथ गलत काम करने वाले युवकों को सजा दी है. उसने गुनाह नहीं किया. सरहद पर अपने दुश्मनों का मौत के घाट उतारने वाले सैनिक को हम वीरता के पुरस्कार से सम्मानित करते हैं. उस सैनिक को हम शहीद का दर्जा देते हैं. उसे अपराधी नहीं कहा जाता. इसलिए रानी दीवान भी अपराधी या हत्यारन नही है. यदि इस तरह हर लड़की निर्भीक व निडरता के साथ पेश आएगी, तभी नारी उत्पीड़न व गैंगरैप की घटनाएं खत्म होंगी.

रहस्य रोमांच प्रधान फिल्म ‘‘डेअर यू’’ में गैंगरैप और नारी उत्पीड़न का एक समसामायिक व ज्वलंत मुद्दा उठाया गया है. लेकिन फिल्म का प्रस्तुतिकरण इतना घटिया है कि लेखक व निर्देशक का मकसद पूरा नहीं हो पाता. फिल्म में कालेज लड़कों को जिस तरह से ड्रग्स व सेक्स मे लिप्त दिखाया गया है, वह फिल्म को यथार्थ से परे ले जाती है. फिल्म में रानी दीवान के साथ गैंगरेप के सीन को भी बहुत वाहियात तरीके से चित्रित किया गया है. उपर से लेखक व निर्देशक दावा है कि उनकी फिल्म का रेप/बलात्कार सीन बालीवुड का पहला सबसे ज्यादा लंबा ‘बलात्कार सीन’ है. फिल्म में नवोदित कलाकारों की भरमार है, तो शायद निर्माता व निर्देशक ने सेक्स सीन के बल पर दर्शकों को सिनेमा घर में खींचने की मंशा से इस तरह के सीन रखे हैं. फिल्म में हत्या के दृश्यों को बहुत ही घिनौने तरीके से फिल्माया गया है. जहां तक अभिनय का सवाल है, तो एक भी कलाकार अभिनय के मामले में खरा नहीं उतरता है. फिल्म का गीत संगीत भी सराहनीय नहीं है. एक गाने का फिल्मांकन स्तरहीन तो है ही, इस गाने के बोल भी अशोभनीय व सेक्सी शब्दों से युक्त है. फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है,जिसकी वजह से फिल्म देखी जाए.

‘‘ब्लूबेरी फिल्मस प्रा. लिमिटेड’’ और ‘‘रेड बेरी इंटरटेनमेंट’’ के बैनर तले बनी फिल्म ‘‘डेअर यू’’ के निर्माता नरसी वसानी, लेखक व निर्देशक डेनिस सेलर्का और मेहुल सिमरियो, संगीतकार चिरंतन भट्ट, जयेष गांधी और करी अरोड़ा, एडीटर पवन श्रीवास्तव तथा कलाकार हैं-अलीषा सीमा खान, अरविंद राठौड़, विकास श्रीवास्तव, क्षितिज सिंह परमार, हर्ष नागर, मडोना टिक्सेरा, सुमित गड्डी, विजय दसानी, हितेन कपूर, काविया विधाटे, बोस्की सेठ, अविनाश अभिचंदानी व नील मोटवानी.

शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा और फिर…

राजधानी की सड़कों पर खूबसूरत, फर्राटेदार अंगरेजी बोलती लड़की राह चलते टकरा जाए, लिफ्ट मांगे और फिर दोस्ती बढ़ाए, तो जरा सावधान हो जाइएगा. आप किसी गहरी मुसीबत में फंस सकते हैं और मुसीबत में घिरने के बाद वहां 2-4 वरदीधारी को देख कर यह मुगालता तो कतई न पालिएगा कि आप बालबाल बच जाएंगे. एक ऐसी ही सनसनीखेज वारदात राजधानी दिल्ली में घटी, जब रोहिणी में हुस्न का जाल बिछा कर एक बिजनैसमेन को ब्लैकमेल करने के आरोप में दिल्ली पुलिस के एक सब इंस्पैक्टर समेत 4 लोगों को हिरासत में लिया.

हनी ट्रैप

दरअसल, यह एक वरदीधारी गुंडों की फौज थी जो हनी ट्रैप में मोटे आसामी को जाल में फंसाती थी. जो शिकार हो जाता उसे फ्लैट पर ले जाते फिर लड़की के साथ उस की चोरीछिपे वीडियो बनाते और बाद में रुपयों की मांग कर ब्लैकमेल करते. जाहिर है, इन के जाल में भी वही लोग फंसे होंगे जिन्हें बाहर मुंह मारने की आदत होती है और जिन्हें 'घर की मुरगी दाल बराबर' कहने समझने की आदत रहती होगी.

खुद ही फंस गए

हनी ट्रैप में फंसाने वाले इन उस्तादों की कारस्तानी शायद ही रुकती अगर रानी बाग इलाके के एक करोबारी सोलंकी ने पुलिस की मदद न मांगी होती. सोलंकी ने अपने साथ हुए घटना की पूरी आपबीती पुलिस को बताई. पुलिस ने जांच के बाद इन चारों को धर दबोचा. पकड़े गए आरोपियों में दिल्ली पुलिस के सब इंस्पैक्टर सुभाष के साथ साथ अमित, ललित व टिंकू शामिल हैं.

सावधानी हटी दुर्घटना घटी

मामला पुलिस से जुड़ा है लिहाजा पुलिस के अधिकारी चुप ही रहेंगे. मगर इस बात का खुलासा जांज रिपोर्ट आने के बाद ही होगा कि इन के जाल में कितने आसामी फंसे होंगे.

आप खुद भी सतर्क रहें और निम्न बातों का ध्यान जरूर रखें-

* घर से बाहर निकलें तो दिल दिमाग काबू में रखें.

* किसी अनजान को अपना फोन नंबर न दें.

* अनजान बुलावे पर गए तो  फंसेंगे ही.

* मुसीबत में भगवान का नाम न लेकर 100 नंबर पर फोन करें.

व्यवस्था में खामी

छात्र नेता व अवर्ण कन्हैया कुमार के मामले में सख्ती और वकील व भारतीय जनता पार्टी के विधायक ओम प्रकाश शर्मा व भाजपा समर्थक विक्रम सिंह चौहान के मामले में नरमी दिखा कर पुलिस ही नहीं अदालतों ने भी साबित कर दिया है कि यह देश अभी भी पौराणिक सोच पर चल रहा है जिस में एक व्यक्ति की स्वतंत्रताओं के मौलिक अधिकार उस के जन्म पर आधारित होते हैं. दिखावे के लिए पुलिस व अदालतें कभीकभार संपन्न ऊंची जातियों के लोगों पर कार्यवाही भले कर लें पर असल में जब मामला सवर्ण बनाम अन्य का आता है तो स्वाभाविक रुख रामायण के श्लोकों से ही निकलता है, संविधान की प्रस्तावना से नहीं.

कन्हैया कुमार ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अपने भाषणों में जो कहा था वह वही था जो रोहित वेमुला की तरह की देश की 80-90 प्रतिशत जनता महसूस कर रही है और इस जनता की मांग चाहे व्यावहारिक हो या न हो, चाहे आज की स्थिति में देश उसे पूरी करने की हैसियत में न हो, उसे दबाने का हक किसी को नहीं है.

पिछले दशकों में वोट की राजनीति के चलते इस वर्ग को अपनी कहने का हक मिल रहा है और यह मुखर हो रहा है. पर कांगे्रस हो या भारतीय जनता पार्टी, सभी कभी फुसलाबहला कर तो कभी धमका कर उस का मुंह बंद कराती रही हैं. भारतीय जनता पार्टी अहंकार से कुछ ज्यादा ही पीडि़त है क्योंकि उस का ज्ञान का स्रोत संविधान नहीं, पुराण, स्मृतियां और उन के पढ़ कर अपने अनुसार सुनाने वाले वे हजारों भगवाधारी हैं जो मुफ्त का माल खाते हैं. भाजपा इस मामले को ढंग से हल करने में बिलकुल फिसड्डी साबित हुई है.

भाजपा की सोच सोशल मीडिया में आरक्षण के खिलाफ चल रहे संदेशों से दिख रही है. भाजपा व उस के समर्थक यथास्थिति बनाए ही नहीं रखना चाहते हैं. लोकसभा चुनाव में मिले वोटों के चलते अहंकार में डूबे भाजपाई व्यवस्था को पौराणिक राजपाट में परिवर्तित किए जाने की मांग करते नजर आ रहे हैं. इस चक्कर में वे कितने ही बंद डब्बे और खोल डालेंगे जिन में सदियों की गंद भरी है, इस बारे में अभी कहा नहीं जा सकता.

भारतीय जनता पार्टी पेशवाई युग को लौटाने की कोशिश कर रही है. वह भूल रही है कि केवल चने और गुड़ खा कर लड़ने वाले मराठे सैनिक अब बहुतकुछ और चाह रहे हैं. जाट, पटेल, कापू, मराठा विद्रोह अभी शुरुआती दौर में है पर हैं ये उसी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के संघर्ष के हिस्से जो अब देशभर में फैल रहा है.

इन्हें भी आजमाइए

– सलवारकमीज के साथ मिलने वाले दुपट्टे अकसर सलावरकमीज के खराब हो जाने के बाद भी अच्छे रहते हैं. इन्हें आप घर में परदे बनाने के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं क्योंकि ये कई रंगों और शेड्स में होते हैं.

– चावल पकाने के बाद उस का माड़ निकाल कर ठंडा होने पर उस से चेहरे की मसाज करें. 10 मिनट बाद चावल के पानी से ही चेहरा धो कर पोंछ लें. इस से त्वचा में कसावट आती है और पोर्स टाइट होते हैं.

– लहसुन को थोड़ा कूट लें और सोने से पहले इसे सिर पर वहां लगाएं जहां बाल झड़ रहे हों. इस के बाद औलिव औयल से मसाज करें और बालों को शावर कैप से ढक लें. अगले दिन अच्छे से धो लें. बालों का झड़ना रुकेगा.

– भोजन करते समय अगर आप को पानी पीने की आदत है तो उस की जगह दूध, मट्ठा व दही का सेवन करें. इस से आप का भोजन सही तरीके से पच सकेगा.

– टोस्ट की महक से किचन की बदबू दूर हो जाती है. बात आप को अजीब लग रही होगी लेकिन यह सही बात है. इस के लिए आप एक टोस्ट बना कर किचन में यों ही खुला छोड़ दें.

– मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द होने पर कपूर को नारियल के तेल में मिला कर मालिश कीजिए, आराम मिलेगा.

जनहित याचिका: महिलाओं पर जोक्स बंद हों

माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय,

सर्वोच्च न्यायालय, भारतीय संघ

विषय : जनहित याचिका – हास्य का निशाना बनती महिलाएं

माननीय महोदय,

राष्ट्र की सजग और समर्पित नागरिक होने के नाते भारतीय संविधान की धारा 51 (ए) के अंतर्गत जनहित याचिका के माध्यम से मैं आप का ध्यान महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव की ओर दिलाना चाहती हूं. महोदय, क्या आप ने कभी गौर किया है कि हास्य की विभिन्न विधाओं, फिर चाहे वह चुटकुला हो, कार्टून हो, हास्य कविता हो या व्यंग्य, में ज्यादातर हम महिलाओं को ही निशाना क्यों बनाया जाता है आप कोई भी टीवी चैनल, समाचारपत्र या पत्रिका उठा कर देखिए, महिलाओं पर ही अधिक व्यंग्य और जोक्स सुननेपढ़ने को मिलते हैं. कभी हमारे फैशन, हमारी शारीरिक बनावट, हमारी चालढाल पर व्यंग्य किए जाते हैं तो कभी हमारे आईक्यू लेवल को व्यंग्य का निशाना बनाया जाता है. ‘कर दी महिलाओं वाली बात’ जैसे जुमले कह कर हमारी भावनाओं को आहत किया जाता है, हमारी छवि को खराब किया जाता है.

जोक्स के जरिए हम महिलाओं के साथ भेदभाव भी किया जाता है. जोक्स में जहां पुरुष को समझदार और बेचारा ठहराया जाता है वहीं महिलाओं को बेवकूफ व पतियों का शोषण करने वाली दर्शाया जाता है. इन जोक्स में हम महिलाओं की गपबाजी, सजनेसंवरने, शौपिंग ऐडिक्शन पर अटैक किया जाता है. बचपन से हम महिलाएं एक सिंगल लाइनर जोक सुनती आती हैं, ‘रेल का महिला डब्बा वह होता है जो इंजन से भी ज्यादा आवाज करता है.’ ‘हमें गर्व होना चाहिए हमारे देश की उन बहादुर महिलाओं पर जो भूखी तो रह सकती हैं पर चुप नहीं.’

दो महिलाओं को 15 साल की सजा मिली…

15 साल जेल में गुजारने के बाद जब दोनों रिहा हुईं तो उन्होंने मुसकराते हुए कहा- ‘चलो, अब बाकी बातें घर पहुंच कर करते हैं.’

महोदय, ये तो महिलाओं का टैलेंट होता है कि वे अपनी मन की बातें मन में नहीं रखतीं और हर किसी से खुल कर बात करती हैं. एक तरफ तो कहा जाता है कि हर सफल पुरुष के पीछे एक महिला का हाथ होता है दूसरी तरफ ऐसे जोक्स बनाए जाते हैं :

कोलंबस अगर मैरिड होता तो अमेरिका डिस्कवर नहीं कर पाता क्योंकि उस से किसी ने नहीं पूछा, ‘कहां जा रहे हो’, ‘क्यों जा रहे हो’, ‘किस के साथ जा रहे हो’, ‘मैं भी चलूंगी, वापस कब आओगे’, ‘घर में रह कर ही डिस्कवर कर लो’, ‘मेरी मां को ही साथ ले जाओ’, ‘मेरे लिए क्या लाओगे’, ‘वापसी में सब्जी लेते आना’, ‘पहुंच कर फोन करना’, ‘तुम ही क्यों हर बार डिस्कवर करते हो’, ‘कोई और क्यों नहीं कर सकता’, ‘खाना आ कर खाओगे या खा कर आओगे ’ वगैरहवगैरह.

महोदय हमारी भी भावनाएं आहत होती हैं. हमारी भी छवि खराब होती है. औरतें रसोई की बागडोर अपने हाथ में संभालती हैं. वहां भी उन के खानेपीने के शौक कुकिंग में उन के माहिर होने को ले कर जोक्स बनाए जाते हैं. नमूने पेश हैं :

पत्नी : खाने में क्या बनाऊं, इटैलियन, इंडियन, चायनीज या कौंटिनैंटल

पति : पहले तुम बना लो, नाम तो शक्ल देख कर रख लेंगे.

महोदय, ऐसे जोक्स पर रोक लगानी चाहिए और गाइडलाइन तय होनी चाहिए. हमारे फैशन, हमारी चालढाल, हमारे आईक्यू लेवल पर जोक नहीं बनने चाहिए. 

महोदय, हमारे साथ यह अन्याय क्यों  क्यों कोई हम महिलाओं के मानसम्मान, हमारी बिगड़ती छवि के लिए आवाज नहीं उठाता. जब दूसरे समुदायों को निशाना बनाया जाता है तो सभी जगहों से आवाजें उठती हैं लेकिन हमारे लिए कोई आवाज नहीं उठाता. उलटा, हम पर बने जोक्स को चटखारे लेले कर सुनाया जाता है. अपनी महिला बिरादरी के सम्मान की रक्षा के लिए मैं यह जनहित याचिका दायर कर रही हूं.

महोदय, जोक्स के माध्यम से यह भी दर्शाया जाता है कि पत्नियां अपने पतियों का शोषण करती हैं, उन्हें दुखी करती हैं. एक नमूना पेश है –

लड़की : शादी के बाद मैं तुम्हारे सारे दुख बांट लूंगी.

लड़का : पर मैं दुखी कहां हूं

लड़की : मैं शादी के बाद की बात कर रही हूं.

माननीय महोदय, आप ही बताएं, हम क्या पहनें, कैसे बोलें, हमारे फैशन पर हमारा मजाक क्यों बनाया जाए. अब आप इन जोक्स पर नजर डालिए :

एक महिला एक दुकान में भारतीय झंडा लेने गई. दुकानदार ने उसे तिरंगा दिया.

महिला ने उस से कहा, ‘और कलर दिखाइए ना.’

अगर लड़की मेकअप कर के, सजधज कर और किसी शादी, पार्टी या फंक्शन में जा रही हो तो समझ लें कि…

अगले दिन या तो फेसबुक पर उन की प्रोफाइल पिक बदलेगी या फिर रिलेशनशिप स्टेटस.

महोदय, दरअसल ये पुरुष हमारी खूबसूरती, हमारी फैशन सैंस से चिढ़ते हैं इसलिए वे जोक्स के माध्यम से हमारा मजाक बनाते हैं. कोई इन से पूछे-क्या इन्हें खूबसूरत स्मार्ट बीवी या गर्लफ्रैंड पसंद नहीं  वे जोक्स के माध्यम से हमारा मजाक क्यों बनाते हैं. इस के अलावा ये पुरुष भी तो फैशन या ब्यूटी के नजरिए से अपना मेकओवर कराते हैं. जब वे खुद ऐसा करते हैं तो उन्हें महिलाओं का मजाक बनाने की जुर्रत हरगिज नहीं करनी चाहिए.

मर्दों को क्या पता कि हमें फैशन के अनुसार खुद को अपडेट रखने के लिए और उस के अनुसार अपनी फिगर मेंटेन रखने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं. हमारी पसंद का फूड हमारे सामने होता है और डाइटिंग पर रहते हुए हमें अपने दिल पर पत्थर रख कर उस फूड के लिए न करना पड़ता है. उस समय हमारे दिल को जो पीड़ा पहुंचती है वह ये पुरुष क्या जानेंगे. जिस पतली कमर पर से पुरुषों की नजरें नहीं हटतीं उस के लिए हमें किना पसीना बहाना पड़ता है. कड़कड़ाती सर्दी में सैक्सी लुक के लिए कैसे हम डीप नैक ब्लाउज विदाउट स्वेटर और शाल कैरी करती हैं, यह हमारा दिल जानता है. हम तैयार होने में ज्यादा समय लेती हैं तभी तो परफैक्ट दिखती हैं. पुरुष भला क्या जानेंगे इस सब के पीछे छिपी हमारी मेहनत.

सो, निवेदन है कि हम महिलाओं के आत्मसम्मान हेतु जोक्स के बहाने हमारा मजाक बनाना बंद करने का फैसला सुनाइए

पूर्ण सम्मान के साथ-

महिलाओं पर बने जोक्स से पीडि़त एक महिला

‘औरतों को पीछे रख कर समाज आगे नहीं बढ़ सकता’

फिल्म इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बना चुकी शबाना आजमी ने हर तरह के किरदार निभाए हैं. आज भी वे फिल्मों में सक्रिय हैं. अभिनय करने के साथसाथ वे सामाजिक कार्यों में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती हैं. एड्स के प्रति जागरूकता फैलाने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई. 1997 में वे राज्यसभा की सदस्या मनोनीत की गईं, सांसद के रूप में उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता के साथ लिया. अत्यंत स्पष्टभाषी, दृढ़प्रतिज्ञ शबाना आजमी का नाम कभी फिल्म निर्देशक शेखर कपूर तो कभी अभिनेता शशि कपूर के साथ जोड़ा गया पर उन्होंने अंत में पटकथा लेखक, गीतकार जावेद अख्तर के साथ शादी की.

हालांकि जावेद अख्तर शादीशुदा थे लेकिन शबाना के प्यार में उन्होंने तलाक ले कर शादी की. आज भी शबाना जावेद को अपना सब से अच्छा दोस्त मानती हैं जिन्होंने शादी के बाद भी उन के हौसले को बढ़ाया और आगे बढ़ने में साथ दिया. जीवन के छठे दशक में प्रवेश करने के बाद आज भी शबाना आजमी ऊर्जा से भरपूर दिखती हैं. अपनेआप को ग्लैमरस अभिनेत्रियों की भीड़ से अलग रख कर उन्होंने प्रयोगात्मक और समानांतर फिल्मों में काम कर अपनी अलग पहचान बनाई. ‘अर्थ’, ‘निशांत’, ‘अंकुर’, ‘स्पर्श’, ‘मंडी’, ‘मासूम’ आदि ऐसी ही फिल्में हैं. इस के अलावा ‘फायर’ जैसी विवादास्पद फिल्म और ‘मकड़ी’ में चुड़ैल की भूमिका को भी शबाना ने बेधड़क हो कर निभाया.

हिंदी फिल्मों में ही नहीं उन्होंने कुछ विदेशी फिल्मों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई. किसी किरदार को चुनते समय किस बात का ध्यान रखती हैं  इस बाबत शबाना आजमी कहती हैं, ‘‘किसी भी भूमिका को चुनते समय मैं उस से जुड़ी रियल लाइफ की किसी किरदार को ढूंढ़ती हूं ताकि मैं उसे फौलो कर सकूं, देख सकूं. जैसे हालिया रिलीज फिल्म ‘चाक ऐंड डस्टर’ में टीचर के किरदार के लिए मैं ने अपनी भाभी सुलभा आर्या की कौपी की है. वे जब थिएटर में पढ़ा कर आती थीं, कैसे कपड़े पहनती थीं, हावभाव कैसे होते थे, कैसे कौपी चैक करती थीं आदि सभी को देखती थी. वैसी हूबहू मैं ने नकल की है.

‘‘इस के अलावा भूमिका कैसी भी हो फिल्म पर उस का कितना प्रभाव है यह अवश्य देखती हूं. कई बार फिल्मों में दिखाया जाता है कि मैं खाना बना रही हूं जबकि रियल लाइफ में मैं इतना खाना नहीं बना सकती. ऐसे में मैं वर्कशौप के हिसाब से उस किचन में जा कर हर चीज को खुद रखती हूं ताकि शौट के वक्त पता चले कि घी, नमक, हलदी वगैरह कहां रखी है. पूरे किरदार के लिए ये तैयारियां करना मैं ने थिएटर से सीखा है जहां अभिनय रियलिस्टिक एप्रोच के साथ किया जाता है.’’

फिल्म ‘चाक ऐंड डस्टर’ बदलती शिक्षा प्रणाली पर कायम थी. ऐसे में वे शिक्षा के बारे में क्या सोचती हैं  इस सवाल पर शबाना बताती हैं, ‘‘आज के बच्चों पर शिक्षा का बोझ अधिक है. ‘फैक्ट्स’ को वे याद कर लेते हैं. मेरे हिसाब से बच्चों को चाहिएकि वे ‘फैक्ट्स’ के प्रयोगात्मक उपयोग को समझें. मैं ने बच्चों के पाठ्यक्रम में देखा है कि ‘मां कहां हैं’, ‘रसोईघर में’, ‘पिता कहां हैं’, ‘दफ्तर में’. पार्लियामैंट में मैं ने यह बात उठाई थी कि ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि ‘मां कहां हैं’, ‘दफ्तर में’, और ‘पिता कहां हैं’, ‘रसोई में’. मां और पिता दोनों ही रसोई में हों, ऐसा क्यों नहीं  आप ने 3 साल के बच्चे के लिए यह क्यों तय कर दिया कि मां हमेशा रसोईघर में ही हो. हम शिक्षा की बात करते हैं लेकिन उस की गुणवत्ता, मूल्य पर ध्यान नहीं देते.’’

फिल्म में शिक्षक की भूमिका सफलतापूर्वक निभाने वाली शबाना असल जिंदगी में किसे अपना गुरु मानती हैं  इस प्रश्न के उत्तर में वे बोलीं, ‘‘मुझे कई अध्यापकों ने शिक्षा दी है. वे सभी मेरे गुरु हैं. पर सही माने में मैं जिन्हें अपना गुरु मानती हूं वे हैं ऐक्ंिटग क्लास के गुरु रोशन तनेजा. वही एक इंसान हैं जिन के पैर मैं आज भी छूती हूं. उस जमाने में उन्होंने जो बातें मुझे सिखाई थीं वे आज भी मेरे जीवन में काम आ रही हैं.’’ बीते साल से सैंसर बोर्ड लगातार विवादों का माध्यम बनता रहा है. ऐसे में श्याम बेनेगल के सैंसर बोर्ड से जुड़ने पर फिल्मों के सैंसर पर क्या बदलाव आएगा, इस विषय पर अपनी राय शबाना कुछ यों रखती हैं : ‘‘श्याम बेनेगल एक सही व्यक्ति हैं, बदलाव अवश्य आएगा. क्योंकि वे किसी राजनीतिक या धार्मिक दल से प्रभावित नहीं हैं. फिल्मों के वे जानकार हैं. मैं ने उन से कहा है कि इस से पहले यूपीए सरकार के दौरान जस्टिस मुद्गल कमेटी ने जो सुझाव दिए थे उन्हें अच्छी तरह पढ़ लें, फिर निर्णय लें. इस से पहले मैं यह भी साफ कर देना चाहती हूं कि सैंसर बोर्ड को सैंसर कहना बंद करना चाहिए. सैंसर करना अर्थात उसे खत्म कर देना या काट देना होता है. यह बोर्ड काटता या खत्म नहीं करता बल्कि यह सर्टिफाई करता है कि फिल्म को किस कैटेगरी में रखा जाए.’’

‘जैंडर बायस्ट’ को कैसे देखती हैं और इसे कैसे सुधारा जा सकता है  इस सवाल पर वे कहती हैं, ‘‘भारत पुरुष प्रधान देश है. यह जन्म से ही दिखाई पड़ता है, जहां लड़कियों को बराबरी का मौका नहीं मिलता. पेट्रियाकल सोसायटी में औरतों को हमेशा पीछे धकेलने का मौका खोजा जाता है. औरतों को पीछे रख कर कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता.’’ देश के विकास मौडल को ले कर उन का मानना है, ‘‘देश में विकास के मौडल पर ही चर्चा होनी चाहिए. यहां केवल 2 मौडल्स हैं, एक कैपिटलिस्ट और एक सोशलिस्ट. कैपिटलिस्ट मौडल में मार्केट सब निर्णय लेती है. किसी भी सभ्य समाज में अगर आप मार्केट पर पूरी तवज्जुह देंगे तो विकास संभव है. यहां अपने देश को उन के हाथ में छोड़ा है जिन के पास पैसा है. जिन के पास पैसा नहीं है उन को जिंदगी जीने का भी अधिकार नहीं है. यह नहीं चल सकता, यहां अमीरगरीब का फासला अधिक है. यहां अब अल्टरनेटिव मौडल की तलाश करनी होगी. अगर आप ने एक बड़ा डैम बनाया तो उस से बिजली की समस्या तो दूर होगी लेकिन उस से कितने गांव, वहां के लोग पशु, पेड़, जमीन आदि सब खराब हो जाएंगे, इस पर चर्चा नहीं होती. ऐसे में विचार करें कि एक बड़े प्रोजैक्ट न बना कर छोटा डैम बनाएं, जिस में नुकसान कम हो या न के बराबर हो.’’

गंभीर मसलों से इतर बात करें तो शबाना हमेशा से अपने ड्रैस सैंस को ले कर सराही जाती हैं. इस बारे में वे बताती हैं, ‘‘मैं अपना ड्रैस खुद ही चुनती हूं. मम्मी से अधिक प्रेरित हूं. मम्मी को कपड़ों का बेहद शौक है. मुझे ऐसा लगता है कि महंगी और सस्ती ड्रैसेज को जोड़ कर कुछ नई बनाई जाए वही क्रिएटिविटी है. महंगे डिजाइनर या ब्रैंड के पीछे मैं नहीं भागती.’’ जावेद अख्तर ने पति के रूप में आप का किस तरह से साथ दिया  इस सवाल पर वे बेबाकी से कहती हैं, ‘‘उन्होंने हर तरह से सहयोग दिया. मैं उन्हें हमेशा प्रेरित करती हूं कि वे अच्छा लिखें और लिख कर वे सुनाते भी हैं. हम दोनों के बीच रोमांस से अधिक दोस्ती है.’’

आज कमर्शियल फिल्मों का जमाना है. ऐसे में समानांतर सिनेमा क्या खत्म हो चुका है  इस बात से इनकार करते हुए वे कहती हैं, ‘‘समानांतर फिल्में आज भी हैं पर उन का रूप बदल गया है. ‘मसान’, ‘किस्सा’, ‘एंग्री इंडियन गौडेस’ आदि समानांतर सिनेमा हैं. गांव के बारे में अगर फिल्म न हो तो यह मतलब नहीं कि समानांतर फिल्में नहीं हैं. यह खत्म नहीं हो सकता, उस के रूप बदल चुके हैं.’’ ‘अंकुर’ की शबाना से अब तक की शबाना में आए बदलाव को ले कर वे कहती हैं, ‘‘आज में और तब में दोनों में मेरा मेच्योरिटी लेवल बढ़ा है. पहले मैं किसी सही बात पर अड़ जाती थी पर आज किसी समस्या को हल करना सीख चुकी हूं. संवाद से ही यह काम संभव हो सकता है और मैं दूसरों की बातें सुनने में विश्वास रखती हूं.’’ फिल्मों में 40 साल की लंबी यात्रा और तमाम पुरस्कृत किरदारों के बावजूद शबाना आज भी डांस को अच्छे से न सीख पाने का मलाल रखती हैं.

बच्चों के मुख से

मेरा धेवता शांतनु 4 साल का, होशियार, चंचल व हाजिरजवाब है. उस की मम्मी जब कभी कहीं मेरे साथ बाजार में खरीदारी कर रही होती, वह कहता, नानी को भी खरीद देना. मैं और मेरी बेटी हंस देते. वह कहता, बस, हंसती हो, नानी को कुछ देती नहीं हो. एक बार हम लोग कल्याण साड़ीज, मेरठ की दुकान में साडि़यां देख रहे थे. वह चुपचाप बैठा था. फिर अचानक खड़ा हो गया और जोर से बोला, दुकानदार अंकल, आप पहले हमारी नानी के लिए रेड कलर की चौड़ी और 10 किलोमीटर लंबी साड़ी दिखाइए. वहां बैठे सभी लोग उस की प्यारी चाहत ‘चौड़ी और 10 किलोमीटर’ सुन हंस पड़े. वह बिना समझे खुश था और हंस रहा था. दुकानदार हंसता हुआ बोला कि अब पहले आप की नानी वाली ही साड़ी दिखाऊंगा.      

मंजु रस्तोगी, मेरठ (उ.प्र.)

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डाक्टर की सलाह पर मैं ने ‘फिश औयल कैप्सूल’ खरीदे. जैसे ही पैकेट से कैप्सूल निकाला वह पलंग पर गिर गया. मुझे वहम हुआ और उसे ठंडे पानी की कटोरी में डाल दिया. मेरी 11 वर्षीया बेटी बहुत जिज्ञासू है. वह बहुत गौर से मुझे यह सब करते हुए देख रही थी. कुछ सोच कर वह हंस पड़ी और बोली, ‘‘मम्मी, यह फिश औयल कैप्सूल है, फिश नहीं, जो पानी में डाल देने से जी उठेगी.’’ उस की यह बात सुन कर मैं भी उस की हंसी में शामिल हो गई.

अर्चना, पटेल नगर (न.दि.)

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बच्चे कभीकभी बड़ों को कैसा मूर्ख बनाते हैं, इस का ज्वलंत उदाहरण दिखाया दीदी के 3 वर्षीय बेटे राजीव ने. राजीव को उस के दादा बहुत प्यार करते थे. जब दादा को 4-5 दिनों के लिए बाहर जाना था तब वे काफी चिंतित हो गए कि उन के जाने के बाद राजीव कैसे रहेगा. पर मजबूरी ऐसी थी कि उन को जाना ही था. 4-5 दिन राजीव ने घर के बाकी सदस्यों के साथ खूब मस्ती में बिताए. एक बार भी उस ने दादा का नाम नहीं लिया. परंतु मजा तो तब आया जब दादा के आते ही राजीव दौड़ कर दादा से लिपट गया और बोला, ‘‘दादा, आप कहां चले गए थे  हम दादादादा कह कर रो रहे थे.’’ यह सुन कर दादा गद्गद हो गए और उसे गोद में उठा कर चूमने व पुचकारने लगे. पर हम लोग उस की बालसुलभ चापलूसी और मौकापरस्ती पर हंसतेहंसते लोटपोट हो गए.

रेणुका श्रीवास्तव, लखनऊ (उ.प्र.)

समझदारी की बातें, जिन्हें न जान कर आप अपना व दूसरों का भला करेंगे

सफल क्रांतिकारी राजनेता होता है और असफल, अपराधी.

हमारे नेताजी सफल इसलिए हैं क्योंकि वे दक्षिणपंथियों की तरह सोचते हैं और वामपंथियों की तरह बातें करते हैं.

हमेशा ऐसे उम्मीदवार को वोट दीजिए जिस ने सब से कम वादे किए हों क्योंकि वह आप को सब से कम निराश करेगा.

राजनीति वह बेहतरीन कला है जिस के जरिए अमीरों और गरीबों को एकदूसरे से बचाने का वादा कर गरीबों से वोट लिए जाते हैं और अमीरों से चंदा.

सारी दुनिया में राजनेता एकजैसे ही होते हैं. वे वहां पुल बनाने का वादा करते हैं जहां नदी नहीं होती.

एक नेता अपनी नेतागीरी बचाने के लिए कुछ भी कर सकता है — यहां तक कि वह देशभक्त भी बन सकता है.

धन्यवाद दीजिए अपने चुनावी उम्मीदवारों को क्योंकि उन में से सिर्फ एक ही जीतेगा.

नेता खुद कभी अपने कहे पर यकीन नहीं करता इसलिए, तब उसे अचरज होता है जब लोग उस पर यकीन करते हैं.

यदि किसी नेता के दिमाग में कोई विचार आता है, तो वह गलत ही होगा.

वह राजनीतिज्ञ कहलाता है जो कभी पकड़ा नहीं गया.

टैक्स की मनमानी से बेहाल सराफा कारोबारी

करीब आधा माह बीत गया है, सराफा कारोबारी पूरे देश में हडताल पर चल रहे है. इनकी दुकाने बंद और कारोबार ठप्प पड गया है. शादी विवाह के इस सीजन में सोने चांदी के जेवरों की दुकाने बंद होने से आम जनता भी परेशान है. केन्द्र की सरकार इनकी बात सुनने और समस्या का समाधान निकालने को तैयार नहीं है. ऐसे में पूरे देश के सराफा कारोबारी देश की राजधनी दिल्ली तक अपना आन्दोलन लेकर पहुंच गये है. सराफा कारोबारियों को शिकायत है कि सभी सोने के जेवरों पर 1 प्रतिशत एक्साइज डयूटी लागू की गई है. सोने पर आयात शुल्क 2 प्रतिशत से बढाकर 4 प्रतिशत कर दिया गया है. हर खरीद पर आपको पैन कार्ड दिखाना होगा. हर खरीद को अपने इनकम टैक्स रिर्टन में दिखाना होगा. इसमें 2 लाख से अधिक कीमत का सोना और सोने के जेवर पर 1 प्रतिशत को अतिरिक्त टैक्स देना होगा. इस तरह से हर 10 ग्राम जेवर की खरीददारी पर 25 सौ रूपये टैक्स देना होगा. इसके अलावा ग्राहक जो पुराना देगा उस पर हर 10 ग्राम पर 12 सौ रूपये का टैक्स सरकार को देना होगा. जेवर की रिपोरिंग की इंट्री सराफा को करनी होगी. उस पर भी टैक्स देना होगा.

सराफा कारोबारियों का कहना है कि इस तरह के अतिरिक्त टैक्स से लाखों कारीगरों के बेरोजगार होने की आशंका है. अपनी बात न सुने जाने से सराफा कारोबारियों ने देश के प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम एक पत्र लिखा है. इसमें लिखा है प्रिय मोदी जी, आपने सराफा कारोबारियों को परेशान और आत्महत्या करने के लिये मजबूर कर दिया है. या तो सराफा कारोबारी जाटों की तरह आंदोलन करे या मर जाये. आप कालाधन देश से निकालने के लिये जोर आजमाइश कर रहे है. हम बताते है कि कालाधन कैसे निकलेगा. 1- सबसे पहले सारे विधायकों और सांसदों के घर छापा डलवाये. इसमें भाजपा के विधायक और सांसद भी हो. वहां कालाधन मिलेगा. 2- मंदिरो में चढे सोने का आधा हिस्सा सरकार के पास जब्त करवाकर उसे बैंको में रखने के बजाय उससे विदेशी कर्ज चुकाये. 3- सभी नेताओ के विदेशी बैंको में खाते सीज कराये. जब भारत सरकार को रिजर्व में सोना रखने का अध्किार है तो आमलोगों को क्यो नहीं  जब जरूरत के समय बैंक में रखा पैसा काम नहीं आता तो यह जेवर ही काम आता है. जेटली जी आप भी अपना घर छानिये और देखिये कि आपने पलिसी ज्यादा ली है या सोना  

सराफा कारोबारी केन्द्र में सरकार चला रही भाजपा का पक्का वोटबैंक रहा है. अपनी ही सरकार के द्वारा छले जाने से वह न केवल नाराज है बल्कि जजबाती भी हो गया है. वह अपनी हर बात सरकार के बडे पदों पर बैठे लोगों तक पहुंचाने की हर जुगत में लगा है. शहरों में यह कारोबारी धरना प्रदर्शन, पुतला दहन जैसे तमाम कार्यक्रम कर चुके है. अब सराफा कारोबारियों को आम जनता का साथ भी मिलने लगा है. ऐसे में सरकार के लिये अपनी साख बचाना मुश्किल हो रहा है. सरकारी नौकरों के पीएफ मामले में यूटर्न मार चुकी सरकार यहां झुकने में शर्म महसूस कर रही है.

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