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ऐसे काम करेगा मध्य प्रदेश में हैप्पीनेस मंत्रालय

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नया ऐलान यह किया है कि जल्द ही प्रदेश मे हैप्पीनेस मंत्रालय खोला जायेगा, जिसका काम लोगों को खुश करने के तौर तरीकों को बढ़ावा देना होगा. भाजपा की एक मीटिंग को सम्बोधित करते करते वे राजनीति की ज़मीन से छलाँग लगाते दर्शन शास्त्र के छज्जे पर चढ़े तो मानव दुखों पर व्याख्यान देने लगे कि हर कोई दुखी है. यहां तक कि मंत्री ओर मुख्य मंत्री भी सुखी और खुश नहीं हैं. फ़िर आम आदमी के दुखों की वजहों का तो अंत ही नहीं. इसलिये मध्य प्रदेश मे खुशी मंत्रालय खोला जायेगा, जो लोगों को खुश करने के तरीकों पर अमल करेगा.

मसलन जो लोग नॄत्य संगीत से खुश होते हैं उनके लिये नाच गाने के समारोह आयोजित किये जायेंगे, जिन्हे खेल से खुशी मिलती है उन्हे खिलाया जयेगा और मुद्दे की बात जिन्हे धर्म से खुशी मिलती है उनके लिये धार्मिक आयोजन किये जायेंगे, यानि किसी भी कीमत पर किसी को दुखी नहीं रहने दिया जयेगा. कभी बुद्ध भी मानव मात्र के दुख दूर करने आधी रात को पत्नी बच्चों को सोता छोड़ राज़ पाट त्याग कर खिसक लिये थे, पर शिवराज कुर्सी पर बैठे बैठे लोगों के दुख दूर करना चाहते हैं, तो कहा जा सकता है आइडिया बुरा नहीं, बशर्ते इसकी आड़ मे धर्म गुरुओं को रोजगार देने की उनकी मंशा न हो, नहीं तो खुश और सुखी रहने का एक मात्र उपाय इन्ही के पास है कि दक्षिणा चढ़ाओ और दुख भूल जाओ.

हैप्पीनेस मिनिस्ट्री शुरू करने का दूसरा पहलू यह स्वीकरोक्ति भी है कि लोग शिवराज के कार्यकाल से खुश नहीं हैं, इसलिये खुशी का उत्पादन वितरण और संचार सरकार खुद करे और सार रुप मे यह कहे कि दरअसल मे तुम जिसे दुख समझ रहे हो, वह दुख नहीं एक मानसिक अवस्था है, जिसका व्यवस्था से कोई लेना देना नहीं. इसलिये तुम इसी मे खुशी ढूँढ़ लो. पटवारी या कोई इंसपेक्टर घूस मांगे तो किल्पौ मत, खुशी खुशी दे दो, खाना नहीं है तो एक थाली की कल्पना करो, जो छप्पन व्यंजनों से सजी है, बच्चों को नौकरी नहीं मिल रही है तो परेशान मत हो, उल्टे खुश हो कि वे हम्माली करने से बचे हैं. मकान का तनाव ती बिल्कुल मत पालो क्योंकि पूरी दुनिया तुम्हारा घर है. लोकतंत्र मे प्रजा की इस हद तक चिंता आज कल कोई नेता नहीं करता सब के सब ज़मीन जायदाद बनाने और भाईयो व सालों को पैसा कमाने की खुली छूट दिये हुये भ्रष्टाचार मे लिप्त हैं. ऐसे मे शिवराज की यह पहल वाकई स्वागत योग्य है.

मोदी पास आए, नीतीश मुस्कुराए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक दूसरे को देख कर क्या मुस्कुराए कि बिहार के राजनीतिक गलियारों में हलचल और कानाफूसी का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है. मोदी और नीतीश का एक दूसरे को देख कर मुस्कुराना, हंस-हंस कर बातें करना और गर्मजोशी से हाथ मिलाने से कुछ लोगों के कलेजे पर सांप लोटने लगा है. इतना ही नहीं एक अप्रैल को जब नीतीश ने नरेंद्र मोदी के जुमले की तर्ज पर कहा- ‘न पीएंगे, न पीने देंगे’ तो कई लोगों के माथे पर बल पड़ गए हैं. मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद भ्रष्टाचार को खत्म करने का ऐलान करते हुए ‘न खाएंगे, न खाने देंगे’ का नारा दिया था. उन्हीं के सुर में सुर मिलाते हुए नीतीश ने बिहार में शराबबंदी का ऐलान करते हुए कहा कि न पीएंगे, न पीने देंगे.

पिछले 12 मार्च को प्रधानमंत्री हाजीपुर में दीघा-सोनपुर और मुंगेर रेल सह सड़क पुल का शिलान्यास करने और पटना हाई कोर्ट के शताब्दी समारोह में शिरकत करने बिहार पहुंचे थे. दोनों समारोहों में मोदी और नीतीश कुमार साथ-साथ मौजूद थे. दोनों समारोहो में मोदी ने नीतीश की जम कर तारीफ की. मोदी ने खुल कर कहा कि गांवों में बिजली पहुंचाने की योजना को तेज रफ्तार देने के लिए नीतीश ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. एक हजार दिनों में 18 हजार गांवों में बिजली पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया था और 6 हजार गांवों मे बिजली पहुंचाई जा चुकी है.

मोदी के सुर में सुर मिलाते हुए नीतीश ने कहा कि प्रधनमंत्री के बिहार आने से लोगों की उम्मीदें बढ़ गई हैं. वह बिहार की तरक्की के लिए बार-बार बिहार आते रहें. केंद्र और राज्य मिल कर काम करेंगे तो बिहार की विकास की गाड़ी तेजी से दौड़ने लगेगी.

मोदी आए और चले गए. नीतीश उनसे मिले और खुल कर मिले और बतियाए. यह सरकारी जलसा था. बात आई -गई हो गई. लेकिन प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के इस मुलाकात की गूंज अभी भी राज्य के सियासत और सत्ता के गलियारे में सुनाई दे रही है. नीतीश और मोदी के तरक्की की जुगलबंदी को लेकर राजद में बौखलाहट बढ़ती जा रही है. वहीं भाजपा के सूत्रों की मानें तो मोदी और नीतीश एक बार फिर साथ आना चाहते हैं. नीतीश भी बिहार की तरक्की में केंद्र की भरपूर मदद के लिए मोदी से नजदीकियां बढ़ाने की जुगत में लगे हुए हैं. वहीं एक भाजपा के एक बड़बोले नेता की मानें तो नीतीश और मोदी इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि क्या नीतीश लालू का साथ छोड़ कर फिर से भाजपा के खेमे में आ सकते हैं या नहीं?

अगर दोनों दलों के सीटों और वोट प्रतिशत पर गौर करें तो राजग को पिछले विधानसभा चुनाव में  कुल 33 फीसदी वोट मिले थे, जिसमें से भाजपा को 24.4 फीसदी मिला था. जदयू को 16.8 फीसदी वोट मिला था. राजग की झोली में 58 और जदयू के खाते में 71 सीट गई थी. दोनों की सीटों को जोड़ने से 129 सीट हो जाता है और विधानसभा मे बहुमत पाने के लिए 122 सीट की दरकार होती है. जदयू के भी कई नेता मानते हैं कि लालू की महत्वाकाक्षांओं और परिवारवाद का बोझ नीतीश ज्यादा समय तक नहीं ढो सकते हैं.

मोदी और नीतीश का करीब आना और एक दूसरे की तारीफ में कसीदे पढ़ने से राजद में बैचेनी बढ़ती जा रही है. राजद के अंदरखाने की खबरों के मुताबिक राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव  को मोदी और नीतीश की ‘रसभरी’ मुलाकात हजम नहीं हो पा रही है. राजद के एक नेता दबी जुबान में कहते हैं- ‘मोगांबो खुश नहीं हुआ’.

 

शब्द जो उछल पड़े

कहे हुए शब्द सहेजे जाते हैं

मन की संदूक में

कभीकभी रत्न जैसे

जड़ जाते हैं हृदय पर

कई बार मील का पत्थर

बन जाते हैं कहे हुए शब्द

शब्द अगर यों ही उगले जाते रहे तो

शब्दों की गरिमा कम हो जाएगी

वे चिंतन का पर्याय कहलाते हैं

जो दिनचर्या को दमका दिया करते हैं.

                        – पूनम पांडे

 

 

औनलाइन विक्रेता कंपनियां

भारीभरकम प्रचार और मोटी छूट का लालच दे कर ईकौमर्स कंपनियों ने बहुत थोड़े समय में ही धाक और धूम मचा दी है. अब गलियों में पीठ पर बड़ा सा बैकपैक लादे डिलीवरीमैन दिखने आम हो गए हैं जो ग्राहकों को उन के द्वारा औनलाइन बुक किए गए सामान को पहुंचा रहे हैं. इस नई विधा पर व्यापारी और निवेशक बहुत खुश हो रहे हैं पर इस ईकौमर्स में पेंच ही पेंच हैं. सब से मोटी बात तो यह जान लें कि 3-4 मुख्य कंपनियों का कुल घाटा इस समय 5 हजार करोड़ रुपए का है. यानी ग्राहकों को सस्ता सामान तो मिला है पर उस की कीमत कोई और देगा. अनुमान यह है कि बैंक देंगे जिन्होंने इन कंपनियों को उस कीमत पर कर्ज दिया कि अगर कंपनी बेची जाए तो वह कीमत मिल सकती थी. यह कीमत, असल में, कोहेनूर हीरे या एम एफ हुसैन की पेंटिंग की तरह की सी होती है कि खरीदने वाले का मन है तो वह 10-20 अरब रुपए में खरीद ले. बहुत सी नुकसान देने वाली कंपनियां सैकड़ों करोड़ रुपए में बिक जाती हैं.

इन ईकौमर्स कंपनियों ने देश को कुछ नया दिया भी नहीं है. पड़ोस की किराना शौप या बड़े बाजार के इलैक्ट्रौनिक शोरूम में जो मिल सकता है उसी को उन्होंने आकर्षक छूट के नाम पर ग्राहकों को बेच दिया. बहुत से ग्राहक तो ‘सस्ता है तो लूट लो’ के चक्कर में सामान खरीद लिया जो उन्हें चाहिए था ही नहीं. इन कंपनियों ने न तो सामान बनाने के कारखाने लगाए हैं न ग्राहकों की पसंद जान कर नए उत्पाद बनवाए हैं. ये तो पुराने उत्पाद ही आकर्षक फोटोग्राफों से, मोबाइलों के माध्यम से बेच रही हैं. इन कंपनियों ने पिछले साल बहुत से नए मेधावी युवाओं को नौकरियां दी थीं पर सालभर में ही, भारीभरकम प्रचार के बावजूद, इन की हालत पतली होती नजर आ रही है और इस साल इन के मच्छीमारों ने एमबीए संस्थानों में होशियार युवाओं को जाल में फंसाने से इनकार कर दिया है.

यह ठीक है कि हमारे देश का खुदरा व्यापारी भरोसे के लायक नहीं है. पहली बात तो यह है कि देशभर में 90 फीसदी दुकानों में ग्राहक को दुकान में घुसने तक नहीं दिया जाता, उसे पटरी पर खड़े हो कर खरीदारी करनी होती है. इस अपमान के बजाय मोबाइल पर सामान और्डर करना सुलभ लगता है. फिर हमारे दुकानदार यह नहीं समझते कि अगर एक बाजार में 10 दुकानें हैं तो सभी को अलगअलग तरह का सामान बेचना चाहिए. यहां सभी एक ही ब्रैंड या चीज बेचते नजर आएंगे जबकि दूसरी हजारों चीजें मिलेंगी ही नहीं. औनलाइन व्यापार ने विविधता का अवसर दिया था पर होड़, प्रचार के खर्च, भरोसे के अभाव में यह नई विधा दम तोड़ने लगी है. ये कंपनियां धोखेबाज बचत कंपनियों की तरह न हो जाएं,  ग्राहकों को घटिया सामान दे कर और सप्लायरों को ठेंगा दिखा कर लुप्त न हो जाएं.

संघर्ष कभी खत्म नहीं होता: सौरभ शुक्ला

15 सालों से सिनेमा, थिएटर और टैलीविजन पर अभिनय, निर्देशन व लेखन करने के तौर पर अपनी खास पहचान बना चुके सौरभ शुक्ला ‘सत्या’ फिल्म के अपने यादगार किरदार कल्लू मामा के बारे में बताते हैं कि फिल्म के निर्देशक रामगोपाल वर्मा ने उन्हें फिल्म की कहानी लिखने को कहा तो पहले उन्होंने इनकार कर दिया. बाद में जब रामगोपाल वर्मा ने उन्हें फिल्म में बढि़या रोल देने की बात कही तो वे कहानी लिखने के लिए तैयार हो गए और आज के कामयाब डायरैक्टर अनुराग कश्यप के साथ मिल कर सत्या की कहानी लिख डाली.

‘बैंडिट क्वीन’, ‘सत्या’, ‘नायक’, ‘स्लमडौग मिलेनियर’, ‘बर्फी’, ‘मोहब्बतें’, ‘बादशाह’, ‘ताल’, ‘लगे रहो मुन्ना भाई’, ‘ये साली जिंदगी’, ‘मैं तेरा हीरो’, ‘फटा पोस्टर निकला हीरो’, ‘जौली एलएलबी’ और ‘पीके’ जैसी कई फिल्मों के जरिए अपनी ऐक्टिंग का जलवा दिखा चुके सौरभ कहते हैं, ‘‘किसी भी प्रोफैशन में संघर्ष कभी भी खत्म नहीं होता है. पहले कामयाबी पाने के लिए स्ट्रगल करना पड़ता है, उस के बाद शिखर पर बने रहने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. ‘सत्या’ फिल्म के किरदार कल्लू मामा से ले कर ‘पीके’ फिल्म के तपस्वी महाराज तक का सफर तय करने के बाद भी उन का स्ट्रगल जारी है. लगातार स्ट्रगल करना ही कामयाबी दिलाता है और उस कामयाबी को लंबे समय तक कायम भी रखता है. अमिताभ बच्चन जैसे कलाकार भी आज तक स्ट्रगल कर रहे हैं, इसलिए वे आज भी कामयाब हैं.’’

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में पैदा हुए 52 साल के सौरभ कहते हैं कि उन के परिवार में पढ़ाईलिखाई का काफी अच्छा माहौल था और हर कोई आसानी से एमए पास कर लेता था. उन पर एमए करने का काफी प्रैशर था, लेकिन उन्होंने पिता से इजाजत ले कर थिएटर का रास्ता चुन लिया. ‘व्यू फ्रौम द ब्रिज’, ‘घासीराम कोतवाल’ और ‘लुक बैक इन एंगर’ नाटकों ने उन की जिंदगी की दिशा और दशा बदल दी. उस के बाद टैलीविजन और सिनेमा में बहुत औफर मिलने लगे. टैलीविजन सीरियल ‘तहकीकात’ की कामयाबी ने सौरभ के लिए हिंदी फिल्मों के दरवाजे खोल दिए और पहली बार शेखर कपूर की फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ में उन्हें अभिनय करने का मौका मिला. सौरभ बताते हैं कि सत्या फिल्म और उस फिल्म में उन के किरदार ‘कल्लू मामा’ को कामयाबी मिलने के बाद भी महीनों तक उन्हें काम नहीं मिला था. हताशा में उन्होंने मुंबई छोड़ने का मन बना लिया था. कुछेक छोटेमोटे रोल मिले पर वे उन्हें पसंद नहीं आए, लेकिन अच्छे रोल की खोज में वे भटकते रहे. फिल्म ‘जौली एलएलबी’ और ‘बर्फी’ ने उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में फिर से जमने का मौका दिया. हिंदी फिल्मों में कौमेडी के गिरते स्तर के बारे में सौरभ शुक्ला कहते हैं कि कौमेडी का मतलब भौंडापन नहीं होता है. हर इंसान के दिल को जो किरदार या डायलौग गुदगुदाए वही असली कौमेडी है. अपनी आने वाली फिल्म ‘फ्रौड सैंया’ के बारे में सौरभ बताते हैं कि उस में उन्होंने एक ठग का बड़ा ही दिलचस्प किरदार निभाया है. इस के अलावा ‘जौली एलएलबी-2’ और अनुराग बसु की ‘जग्गा जासूस’ से उन्हें काफी उम्मीदें हैं. सौरभ शुक्ला बतौर निर्देशक भी कई गुणवत्तापरक फिल्मों का निर्देशन कर चुके हैं. इसीलिए जब भी देश के किसी कोने में खासकर राजधानी में रंगमंचीय गतिविधि में शामिल होने का न्योता मिलता है, सौरभ कभी इनकार नहीं करते. उम्मीद है सौरभ आगे भी अपने अभिनय से दर्शकों को लुभाते रहेंगे.

16 साल बाद अरविंद स्वामी की हिंदी फिल्म में वापसी

मशहूर फिल्मकार मणि रत्नम की खोज माने जाने वाले अभिनेता अरविंद स्वामी तमिल फिल्मों के स्टार कलाकार है. लगभग 25 साल पहले मणि रत्नम निर्देशित तमिल फिल्म ‘‘थलपथी’’ के साथ ही मणि रत्नम निर्देशित हिंदी फिल्म ‘‘रोजा’’ में भी अरविंद स्वामी ने अभिनय किया था. उसके बाद वह दक्षिण भारत में तमिल, तेलगू व मलयालम फिल्मों में अभिनय करते रहे. फिर वह 1998 में हिंदी फिल्म ‘‘सात रंग के सपने’’ तथा 2000 में ‘‘राजा को रानी से प्यार हो गया’’ में भी नजर आए थे. लेकिन उसके बाद वह हिंदी फिल्मों में नजर नहीं आए.

अब पूरे 16 साल बाद वह नवोदित फिल्मकार तनुज भ्रमर की हिंदी फिल्म ‘‘डिअर डैड’’ में नजर आने वाले हैं, जो कि हिंदी के साथ साथ तमिल भाषा में भी बनी है. 16 साल बाद हिंदी फिल्म ‘‘डिअर डैड’’ में अरविंद स्वामी के अभिनय करने की मूल वजह फिल्म की पटकथा है. वैसे 2000 के बाद अरविंद स्वामी अभिनय के साथ साथ व्यापार भी करने लगे थे. 2006 में उनका एक्सीडेंट भी हुआ था. जिसके चलते पिछले 16 साल के दौरान अरविंद स्वामी ने सिर्फ चार तमिल फिल्मों में ही अभिनय किया था.

फिल्म ‘‘डिअर डैड’’ की कथा पिता पुत्र के इर्द गिर्द घूमती है. यह कहानी है 45 वर्षीय नितिन स्वामीनाथन (अरविंद स्वामी) और उनके 14 वर्षीय बेटे शिवम की. पिता पुत्र अपने दिल्ली के घर से मसूरी के लिए सड़क के रास्ते रवाना होते हैं. मसूरी में शिवम का बोर्डिंग स्कूल है. रास्ते में इन्हे किस मोड़ से गुजरना पड़ता है और इस यात्रा के दारान पिता पुत्र के बीच जो बाते होती हैं, वह सब दर्शकों को रोमांचित करने वाला होगा. फिल्म ‘डिअर डैड’ में अभिनय करने की चर्चा चलने पर अरविंद स्वामी कहते हैं-‘‘इस तरह की कहानियां कही जानी चाहिए और इस तरह की फिल्मों को बढ़ावा मिलना चाहिए. इसीलिए मैंने इस फिल्म में अभिनय किया है.’’

कमजोर निकली दमदार किरदार निभाने वाली प्रत्यूषा

रील लाइफ और रियल लाइफ में कितना अंतर होता है प्रत्यूषा बनर्जी की मौत से यह एक बार फर से साबित हो गया.झारखंड के जमशेदपुर जिले की रहने वाली प्रत्यूषा बनर्जी को अभिनय करने का शौक पहले से था.कलर्स चैनल ने जब अपने सामाजिक टीवी शो ‘बालिका वधु’ के लिये बडी उम्र की आंनदी की तलाश शुरू कि तो देश भर से तमाम लडकियों ने दावेदारी पेश की.इस समय तक ‘बालिका वधु’ दर्शको का सबसे पंसदीदा शो बन चुका था. अंविका गौड ने बहुत ही दमदार आंनदी का किरदार निभाया था.चैनल के लिये चुनौती थी कि वैसा ही अभिनय करने वाली दूसरी आनंदी तलाश की जाये. ऐसे में प्रत्यूषा बनर्जी ने आनंदी का किरदार पूरी दमदारी से निभाया.दर्शकों के मन में न केवल अपनी पहचान बनाई बल्कि लोग पुरानी आनंदी का किरदार भूल गये. इस तरह 2010 में प्रत्यूषा बनर्जी ने टीवी की दुनिया से अपने सपफर की शुरूआत की.जिस तरह रातोरात प्रत्यूषा बनर्जी आनंदी बन कर लोगों के दिलों पर छा गई ऐसे मौके कम लोगों को मिलते है.आंनदी के रूप में प्रत्यूषा ने बालिका वधु’ में हर कठिन हालात का पूरे साहस से मुकाबला किया.उस समय हर मां को अपने लिये आनंदी की बेटी और हर सास को अपने लिये आंनदी सी बहू की तलाश होने लगी.

24 साल की प्रत्यूषा बनर्जी को जो शोहरत मिली उसके साथ वह खुद को संभाल नहीं पाई. पर्दे के पीछे प्रत्यूषा के समय पर शूटिंग पर न आने, सहायक कलाकारों से अच्छा व्ययहार न करने जैसे तमाम आरोप भी लगने लगे. ‘बालिका वधु’ छोडने के बाद आंनदी की शोहरत का लाभ लेने के लिये प्रत्यूषा को कई शो में काम करने का मौका मिला. इनमें ‘किचन चैम्पियन’, ‘झलक दिखला जा’, ‘बिग बौस 7 सीजन’ और ‘ससुराल सिमर का’ प्रमुख था. टीवी पर लगातार काम करने के बाद भी मुम्बई जैसे शहर में रहने के लिये प्रत्यूषा आर्थिक दबाव में थी.वह मुम्बई में मलाड के पास  बांगुरनगर में अपनी मां के साथ किराये के मकान में रहती थी.पर्दे की जिदंगी में मजबूत दिखने वाली प्रत्यूषा निजी जिदंगी में आने वाले दबाव को संभाल नहीं पाई. ब्वायपफ्रेंड मकरंद मलहोत्रा के साथ विवादों के चलते प्रत्यूषा की निजी जिदंगी चर्चा में आई.साल 2013 में प्रत्यूषा ने मकरंद मलहोत्रा के खिलाफ शारीरिक शोषण का मामला भी दर्ज कराया था.

मकरंद के बाद प्रत्यूषा का नाम राहुल राज सिंह के साथ जुडा.साल 2016 के जनवरी माह में प्रत्यूषा ने 8 लोगों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई.यहां पर प्रत्यूषा और राहुल राज सिंह का मनमुटाव भी सामने दिखा था. इस समय प्रत्यूषा मानसिक परेशानी के दौर से गुजर रही थी.इस बात की गवाही उसका वाट्सएप स्टेटस ‘मर के मुंह न तुझसे मोडना’ दे रहा था. 15 मार्च को लिखे इस वाट्सएप स्टेटस को उसके दोस्त और करीबी भी समझ नहीं पाये.आनंदी बनी प्रत्यूषा बनर्जी ने ऐसा कदम क्यांे उठाया? फिल्म इंडस्ट्री के लोगों का मानना है कि ‘टीवी इंडस्ट्री बडे उद्योग में बदल गया है. अब यहां गलाकाट प्रतियोगिता का दौर चल रहा है. जिससे छोटी उम्र के लडकेलडकियों में तनाव बढ जाता है.छोटे शहरों से आये युवा अपने पारिवारिक मूल्यों को लेकर भी तनाव में आ जाते है.’ पर्दे पर तमाम मुसीबतों का सामना करने वाली आनंदी बनी प्रत्यूषा भी ऐसे दबाव को झेल नहीं पाई और यह फैसला कर बैठी.                                              

 

फेसबुक पर ग्राफिक उपन्यास द्वारा ‘द ब्लू बेरी हंट’ का प्रचार

बौलीवुड में नित नया सोचने वालों की कमी नहीं है. एक तरफ जहां कई फिल्मकार अपनी फिल्म के प्रचार में दो से बीस करोड़ रूपए खर्च कर रहे हैं. वहीं अनूप कूरियन जैसे फिल्मकारों के पास अपनी फिल्म के प्रचार के लिए धन का घोर अभाव है. इसलिए अपनी पहली ही फिल्म ‘‘मानसरोवर’’ के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार जीत चुके अनूप कूरियन ने इस बार अपनी नई फिल्म ‘‘द ब्लू बेरी हंट’’ के प्रचार के लिए ग्राफिक उपन्यास रचा है और वह इस ग्राफिक उपन्यास के दो से तीन पृष्ठ हर दिन फेसबुक पर डालते हुए अपनी फिल्म ‘‘द ब्लू बेरी हंट’ का प्रचार कर रहे हैं, जिसमें उन्हे काफी सफलता मिल रही है.

खुद अनूप कूरियन कहते हैं-‘‘मेरी हैसियत इतनी नही है कि मैं फिल्म के प्रचार पर करोड़ो रूपए खर्च कर सकूं. इसलिए मैने फिल्म की कहानी पर आधारित एक ग्राफिक नावेल/ उपन्यास लिखा है. फिल्म का मुख्य पोस्टर ही ग्राफिक नावेल का कवर पेज है. फिल्म की कहानी के अनुरूप ही ग्राफिक नावेल के नब्बे पेज हैं. मैं फेसबुक पर हर दिन दो या तीन पेज इस ग्राफिक नावेल के छापकर अपनी फिल्म के प्रति लोगों/दर्शकों के मन में फिल्म देखने की उत्कंठा बढ़ाने का काम कर रहा हूं.

मुझे यकीन है कि इस ग्राफिक नावेल को पढ़ने वाले लोग मेरी फिल्म को जरुर देखना चाहेगा. फिर चाहे वह सिनेमा घर के अंदर जाए या पैसे देकर इंटरनेट से डाउनलोड कर फिल्म देखे. मेरे पास फिल्म के प्रचार के लिए धन की कमी है. पर मैं साफ्टवेअर में माहिर हूं. ग्राफिक बनाने में माहिर हूं. कहानी लिखने में माहिर हूं. तो मैने यह आइडिया सोचा. मेरे पास इतना धन नही है कि मैं हर टीवी चैनल पर अपनी फिल्म का ट्रेलर या प्रोमो वगैरह दिखाकर दर्शकों तक अपनी फिल्म पहुंचा सकूं. इसलिए मैने यह ग्राफिक नावेल की आइडिया सोची. आप फेयबुक पर जाकर देंखेंगे, तो पाएंगे कि दूसरी फिल्मों के मुकाबले हमारी फिल्म ज्यादा लोकपिय हो रही है. कुछ समय पहले ईरोज की फिल्म ‘सनम तेरी कसम’ जिस दिन रिलीज हुई, उस दिन तक उसके फेसबुक पर पचार्स हजार फालोअर्स थे. सभी जानते है कि ‘सनम तेरी कसम’ के प्रमोशन में करोड़ों रूपए खर्च किए गए थे. जबकि मेरी फिल्म ‘द ब्लू बेरी हंट’ आठ अप्रैल को रिलीज होनी है. हम कम पैसे खर्च कर इसका प्रचार कर रहे हैं और अब तक हमारी फिल्म के 42 हजार फालोअर्स हो चुके हैं. ‘यू ट्यूब’ तथा इंस्टाग्राम’ पर हमारी फिल्म का प्रचारात्मक वीडियो मौजूद है.’

बच्चों के मुख से

मेरी सहेली का 5 साल का बेटा बहुत चतुर है. एक बार वह अपनी दादी के साथ एक बुजुर्ग महिला की पगड़ी रस्म पर गया. फोटो पर डाले हुए फूलों के हार देख कर बोला, ‘‘दादीदादी, क्या यह आंटी कहीं चली गई हैं?’’ दादी के ‘हां’ कहते ही तपाक से बोल उठा, ‘‘दादी, यहां लोगों ने सफेद कपड़े तो पहन नहीं रखे हैं. टीवी पर तो सब लोग सफेद कपड़े पहन कर आते हैं.’’ उस की बात सुन कर पास बैठे सब लोग मुसकराए बिना न रह सके.

– कैलाश भदौरिया, गाजियाबाद (उ.प्र.)

*

मेरी बेटी शुभि कक्षा 4 में पढ़ती है. उस का बैंचपार्टनर एलेक्स बहुत मोटा है. शुभि को उस से शिकायत रहती कि उसे बैठने के लिए काफी जगह चाहिए और उस के पैर फैला कर बैठने की आदत से शुभि की कौपीकिताबें नीचे गिर जातीं. दोनों में अकसर झगड़ा होता. जब भी एलेक्स को गुस्सा आता वह अपनी मातृभाषा ‘मलयालम’ में जाने क्याक्या कहता, जिसे शुभि समझ न पाती. एक दिन वह मुझ से शिकायत करने लगी. मैं ने बात पर ध्यान नहीं दिया. उसे समझाया कि तुम भी अपनी मातृभाषा कुमाउंनी में बात करना. एक दिन उन दोनों का फिर से झगड़ा हुआ. एलेक्स मलयालम में कुछ कहता, इस से पहले ही शुभि ने मुंह बना कर कुमाउंनी में बोलना शुरू कर दिया.

एलेक्स ने आव देखा न ताव, टीचर से इस की शिकायत कर दी. टीचर भी मलयाली थी. उन्होंने पहले तो एलेक्स को गुस्सैल व्यवहार के लिए डांट लगाई, फिर शुभि से पूछा, ‘तुम ने क्या कहा?’

वह बोली, ‘बेडू पाकौ बारमासा, हो नरैयण काफल पाकौ चेता मेरी छैला.’

टीचर ने उस का मतलब पूछा. मतलब सुन कर टीचर के साथ कक्षा के बच्चे भी हंस दिए. असल में शुभि को कुमाउंनी बोलना नहीं आता था, उसे मैं ने बचपन में कुमाऊं का सुप्रसिद्ध गीत ‘बैडू पाकौ बारमासा…मेरी छैला’ सिखा रखा था. जिस में कुमाऊं की सुंदरता का वर्णन किया गया है. उस ने मेरे कहे अनुसार कि ‘तुम एलेक्स को कुमाउंनी बोली में जवाब दे देना,’ उसे जो कुछ कुमाउंनी में बोलना आता था, वह बोल दिया. एलेक्स को जब शुभि द्वारा कहे गए वाक्यों का अर्थ समझ में आया तब वह भी खिलखिला कर हंस दिया.

– भावना भट्ट, भोपाल (म.प्र.)

मध्य प्रदेश: जंगल में खातिरदारी

प्रकृति के शांत वातावरण को चीरती टाइगर की दहाड़ और साल व सागौन के घने जंगलों के बीच कौफी की खुशबू कान्हा में आए मेहमानों का स्वागत करती है. सोलासिया रिजौर्ट. कान्हा टाइगर रिजर्व के पास किसली मेन रोड पर खटिया गेट से करीब 600 मीटर की दूरी पर है. 12 एकड़ ईको सैंसटिव जोन में पाम वृक्षों से घिरे रिजौर्ट में पर्यटकों के लिए हर आवश्यक सुविधा मुहैया है. ग्रासरूट कौफी हाउस, नौलेज हब, लक्जरी टैंट के साथ डबल बैडरूम अपार्टमैंट की सुविधा से संपन्न इस रिजौर्ट में पर्यटकों को वाइल्डलाइफ की नौलेज भी दी जाती है. इस तरह के कई और रिजौर्ट भी इस क्षेत्र में हैं.

सोलासिया रिजौर्ट के डायरैक्टर पराग भटनागर बताते हैं, ‘‘यहां पाई जाने वाली 2 मुख्य जनजातियों बैंगा और गौड़ के प्रति हमारी जवाबदेही बनती है. क्योंकि इतने सालों के बाद भी आधुनिकता से वे कोसों दूर हैं. जंगल को पास से देखनेसमझने एवं पक्षी निहारण के लिए पैदल जंगलभ्रमण किया जा सकता हैं. कान्हा के प्राकृतिक परिवेश और शांत वातावरण में साधारण स्वस्थ भोजन के साथ स्वास्थ्य पर्यटन का आनंद भी लिया जा सकता है. वन्यजीवों की फोटो चित्रकारी, जंगली जानवरों के व्यवहार और जीवन की बेहतर समझ में मदद करती है तथा वन्यजीवों के प्रति सद्भाव का वातावरण बनाने में बहुत अहम भूमिका निभाती है, इस के लिए पूरी दुनिया के वन्यजीव फोटो चित्रकार यहां आते हैं.’’

कान्हा टाइगर रिजर्व

मध्य प्रदेश के मंडला और बालाघाट जिलों में मैकल पर्वत शृंखलाओं की गोद में स्थित कान्हा टाइगर रिजर्व देश के सर्वोत्कृष्ट राष्ट्रीय उद्यानों में एक है. यह एक पर्यटन केंद्र ही नहीं, बल्कि भारतीय वन्यजीवन के प्रबंधन और संरक्षण की सफलता का प्रतीक भी है. हृष्टपुष्ट जंगली जानवरों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर कान्हा में प्रतिवर्ष 1 लाख से अधिक सैलानी आते हैं. यह अभयारण्य 15 अक्तूबर से खुल जाता है और 30 जून को मानसून के आगमन के साथ बंद हो जाता हैं. लोग बाघ और जंगल के अन्य जीवजंतुओं को देखने व प्रकृति का आनंद लेने के लिए यहां आते हैं. इस के लिए सब से अच्छा तरीका है जिप्सी सफारी. एक जिप्सी में 6 लोगों को भ्रमण की अनुमति दी जाती है जिस से वे प्रकृति का आनंद ले सकें और उन के प्राकृतिक घर में जंगली जानवरों को देख सकें.

वन्यजंतुओं की सघनता की दृष्टि से यह उद्यान काफी समृद्ध है. 940 वर्ग किलोमीटर के दायरे में सदाबहार साल वनों से आच्छादित कान्हा अद्भुत स्थल है. प्रबंधन की दृष्टि से यह कान्हा, किसली, मुक्की, सुपरवार और मैसानघाट नामक 5 वन परिक्षेत्रों में बंटा हुआ है. पार्क में पर्यटकों के प्रवेश के लिए खटिया (किसली रेंज) और मुक्की में 2 प्रवेशद्वार (बैरियर) हैं. यहां से पार्क के प्रमुख पर्यटन क्षेत्र कान्हा की दूरी क्रमश: 10 और 30 किलोमीटर है. अपने नैसर्गिक सौंदर्य के लिए दुनियाभर में मशहूर इस राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना वर्ष 1955 में हुई और वर्ष 1974 में इसे प्रोजैक्ट टाइगर के अधीन ले लिया गया. बाघ के शौकीनों के लिए कान्हा सर्वोत्तम विकल्प है. कान्हा में बाघ दर्शन ने पर्यटन को काफी बढ़ावा दिया है. बाघ के अतिरिक्त कान्हा में बारहसिंघा की एक दुर्लभ प्रजाति पंकमृग (सेर्वुस बांडेरी) भी पाई जाती है.

बाघ और बारहसिंघा के अतिरिक्त यहां भालू, जंगली कुत्ते, काला हिरण, चीतल, काकड़, नीलगाय, गौर, चौसिंगा, जंगली बिल्ली और सूअर भी पाए जाते हैं. इन वन्यप्राणियों को हाथी की सवारी अथवा सफारी जीप के जरिए देखा जा सकता है.वन्यप्राणियों के दर्शन के अतिरिक्त पर्यटकों को पार्क में स्थित ब्राह्मणी दादर भी जरूर जाना चाहिए. किसली से 36 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस जगह से सूर्यास्त का मनोरम दृश्य दर्शकों को मुग्ध कर देता है. कान्हा के जंगलों का स्थानीय लोकगाथामें  कई जगह, मुख्यतया शिकार एवं शिकारियों की कहानियों में उल्लेख आता है. लपसी कब्र नामक स्थान में लपसी नामक शिकारी का स्मारक है. कहा जाता है कि वह बहुत महान शिकारी था. कान्हा का इलाका आदिवासियों का गढ़ है. पर्यटक पार्क के निकटवर्ती भीलवानी, मुक्की, छपरी, सोनिया, असेली आदि वनग्रामों में जा कर यहां की प्रमुख बैंगा जनजाति के लोगों से मिल सकते हैं. उन की अनूठी जीवनशैली और परिवेश का पर्यवेक्षण निसंदेह आप की यात्रा की एक और स्मरणीय सौगात हगी.

पन्ना नैशनल पार्क

बाघ देखने के शौकीन पर्यटकों के लिए पन्ना नैशनल पार्क सब से अच्छी जगह है. छतरपुर और पन्ना जिलों में फैला यह नैशनल पार्क 5 साल पहले उस समय काफी चर्चा में रहा जब यह बाघविहीन हो गया था. पर लोगों की जागरूकता और प्रशासन के संयोग से आज जंगल फिर बाघ की दहाड़ से गूंजने लगा है. 543 स्क्वायर किलोमीटर में फैले इस पार्क में 32 से भी ज्यादा वनराज शान से चहलकदमी करते दिखाई देंगे.

मेहमाननवाजी

केन नदी के किनारे का सुरम्य वातावरण और पेड़ के ऊपर बने मचाननुमा रैस्टोरैंट में बैठ कर पहाडि़यों के पीछे डूबते सूरज के मनोरम दृश्य को देखने के साथ गरमागरम कौफी के घूंट का एहसास आप को किसी दूसरी ही दुनिया में ले जाता है. नैशनल पार्क के मंडला गेट से थोड़ी ही दूरी पर स्थित केन नदी के मुहाने पर बना केन रिवर लौज (द्गठ्ठह्नह्वद्बह्म्4ञ्चश्चह्वद्दस्रह्वठ्ठस्रद्गद्गह्यड्डद्घड्डह्म्द्बह्य.ष्शद्व)  शाही मेहमान- नवाजी के लिए जाना जाता है.लौज के मालिक श्यामेंद्र सिंह उर्फ बिन्नी राजा बताते हैं, ‘‘हमारा केन रिवर लौज सब से पुराना है. यह ट्री हाउस के नाम से भी जाना जाता है. हम अपने यहां आने वाले पर्यटकों को वाइल्डलाइफ के अलावा यहां के बुंदेलखंडी कल्चर से भी परिचित कराते  हैं और सब से खास इस पार्क में यह है कि दुनिया में पाए जाने वाले कुल 8 प्रजाति के वल्चरों यानी गिद्दों में से 7 यहां पाए जाते हैं. इस के अलावा पर्यटकों को नैशनल पार्क के पास ही झिन्ना नाम की जगह में ले जा कर टैंट में ही नाइट स्टे कराते हैं. इस दौरान हमारी यहां कोशिश रहती है कि लोकल व्यंजनों के स्वाद से उन्हें जरूर परिचित कराएं. लौज में पर्यटकों के लिए एक मल्टीकुजीन रेस्तरां के अलावा 6 ग्रामीणशैली में बनी हुई वातानुकूलित हट्स हैं. इस के साथ कैन बोटिंग, फिशिंग के अलावा हर उस सुविधा का खयाल रखा जाता है जिस से आने वाला पर्यटक इस जगह को हमेशा याद रखे.’’

पन्ना नैशनल पार्क को और भी करीब से जानना है तो इन रिजौर्ट्स से ही टैक्सी बुक करें और अन्य जगहों का करीब से   मजा ले सकते हैं. 1980 के पहले इसे वाइल्डलाइफ सैंचुरी घोषित किया गया था. 1981 में इसे नैशनल पार्क का दरजा दिया गया. पन्ना नैशनल पार्क आने के लिए नवबंर से अप्रैल माह के बीच का समय उपयुक्त होता है. पार्क में टाइगर के अलावा चौसिंगा हिरण, चिंकारा, सांभर, जंगली बिल्ली, घडि़याल, मगरमच्छ, नीलगाय  से भी रूबरू हुआ जा सकता है. सब से नजदीक यहां से खजुराहो है जहां रेलमार्ग और हवाईमार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है. अब तो रेलवे ने भी अपनी लक्जरी ट्रैन महाराजा का रूट खजुराहो से हो कर वाराणसी कर दिया है. खजुराहो से 30 मिनट में पन्ना नैशनल पार्क पहुंचा जा सकता है.

पन्ना नैशनल पार्क के अलावा हीरों के लिए भी प्रसिद्ध है. पार्क से थोड़ी ही दूरी पर एनएमडीसी की मझगंवा डायमंड माइंस है, जहां हीरों की खुदाई से ले कर उन की अन्य सफाई प्रक्रिया देखी जा सकती है. अगर समय मिले तो रिजर्ट से 8 किलोमीटर की दूरी पर पन्ना नगर है जिस के यूरोपीय शैली में बने मंदिर जरूर देखें. पार्क से हो कर गुजरने वाली केन नदी पार्क की खूबसूरती में चारचांद लगाती है. यहां नाव में बैठ कर जंगली जीवों को करीब से देखने का आनंद ही कुछ अलग होता है. केन नदी को घडि़याल अभयारण्य भी घोषित किया हुआ है. पार्क के मुख्य आकर्षणों में एक आकर्षण खूबसूरत पांडव फौल है जो झील में गिरता है. मानसून के दिनों में इस झरने का विहंगम दृश्य बड़ा ही रोमांचकारी लगता हैं.

कला के पारखियों के लिए काम और वास्तुकला के अद्भुत मेल वाली पाषाण प्रतिमाओं के लिए विश्वप्रसिद्ध खजुराहो यहां से 66 किलोमीटर की दूरी पर है. खजुराहो के मंदिर भारतीय कला शिल्प की नायाब धरोहर हैं. खजुराहो मंदिरों को 950-1050 ई. के बीच मध्य भारत पर शासन करने वाले चंदेल वंश के शासकों के द्वारा निर्मित करवाया गया था. खजुराहों में कुल 85 मंदिरों को बनवाया गया था, जिन में से आज केवल 22 ही बचे हैं. पूरी दुनिया का ध्यान यहां के मंदिरों में स्थित मूर्तियों ने आकर्षित किया है जो कामुकता से भरी हुई हैं. मंदिर को 1986 में यूनैस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल घोषित किया गया. खजुराहो के पास ही अंगरेजों के समय में बनाया गया गंगऊ डैम स्थित है. इस डैम की वास्तुकला और इंजीनियरिंग देखने लायक है. पास ही रनेह फौल है जिस का वास्तविक रूप मानसून में ही देखने लायक होता है. अगर सही माने में आप को अपनी यात्रा रोमांचकारी और यादगार बनानी है तो पन्ना नैशनल पार्क की जंगल सफारी का मजा जरूर लें.                                                        

धुबेला

बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल की बेटी मस्तानी का जन्म और बचपन धुबेला के महलों में बीता. निर्देशक संजयलीला भंसाली भी मस्तानी को ले कर ‘बाजीराव मस्तानी’ फिल्म बना चुके हैं. यहां मौजूद महलों के अवशेष और छत्रसाल का मकबरा आज भी यह याद दिलाने के लिए काफी है कि उस वक्त का इतिहास क्या होगा. धुबेला, खजुराहो-झांसी मार्ग पर स्थित है. धुबेला चारों तरफ से खूबसूरत पहाडि़यों से घिरा हुआ है. पहाडि़यों के बीच में बड़ी झील के किनारे बनी लाल रंग की हट्स और हरेभरे  गार्डन वाला धुबेला रिजौर्ट   दूर से ही सब को आकर्षित करते हैं. झांसी-खजुराहो राष्ट्रीय राजमार्ग 75 पर स्थित इस रिजौर्ट में मल्टीकुजीन रेस्तरां के साथ, लक्जरी रूम्स, स्विमिंग पूल की सुविधाएं उपलब्ध हैं.

रिजौर्ट से धुबेला संग्रहालय मात्र 5 मिनट की दूरी पर स्थित है. संग्रहालय एक पुराने किले के अंदर है. इस में प्राचीन और आधुनिक युग की कलाकृतियां और अवशेषों का समृद्ध कलैक्शन है. यहां मुख्य रूप से खजुराहो के प्रसिद्ध बुंदेला वंश के इतिहास, उत्थान और पतन को दर्शाया गया है. संग्रहालय में रखी हुई मूर्तियां शक्ति पंथ से हैं. यहां बुंदेला शासकों के हथियारों, पोशाकों और चित्रों का अनूठा कलैक्शन है. पर्यटन के लिए यह संग्रहालय एक एक दिलचस्प जगह है. राज्य सरकार ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए धुबेला महोत्सव शुरू किया है जिस में लोकनृत्यों के अलावा कई सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. अगर खजुराहो जा रहे हैं तो यहां जरूर आना चाहिए. यहां आने पर बुंदेला वंश के शासकों की अद्भुत सांस्कृतिक विरासत के बारे में जान सकते हैं. शासकों की भव्य जीवनशैली और उन के विभिन्न कार्यों को धुबेला  संग्रहालय में दर्शाया गया है.

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