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कॉलेज गर्ल्स के बीच फंसे ओमकार कपूर

निर्देशक  लव रंजन की फिल्म प्यार का पंचनामा  2 से बतौर अभिनेता बॉलीवुड डेब्यू कर चुके ओमकार कपूर की लोकप्रियता दिन प्रतिदिन बढ़ती ही  जा रही  है. हाल ही में ओमकार को पिल्लै कॉलेज द्वारा उनके कॉलेज फेस्टिवल अलेग्री के लिए  मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया.

ओमकार जो फिल्म प्यार का पंचनामा 2 से घर घर में प्रसिद्ध हो चुके हैं वे जब इस फेस्टिवल में पहुंचे तो उन्होंने वहां पर मौजूद सारी महिलाओं का ध्यान अपनी  और आकर्षित कर लिया.

ओमकार जैसे ही कॉलेज के ऑडिटोरियम में पहुंचे वैसे ही लड़कियों ने तो उन्हें चारो तरफ से घेर लिया और  वहां पर मौजूद सारे विद्यार्थी उन्हें  देखते ही बहुत उत्साहित हो गए और वे उनके गाने पर डांस करने लगे और उनके साथ डांस करने का निवेदन भी किया.

ओमकार के प्रसंशक उनकी एक झलक पाने के लिए बेताब थे जिसकी वजह से वहां पर आयोजित समारोह में भी देरी हो गयी, इतना ही नहीं वहां पर मौजूद एक प्रोफेसर ने उनसे अपनी बेटी के लिए जन्मदिन की बधाई देते हुए एक विडियो भी बनवाया क्यूंकि वो उनकी बहुत बड़ी प्रसंशक है. समारोह की समाप्ति के बाद ओमकार ने  अपने प्रसंशकों के साथ सेल्फ़ी भी क्लिक किये. 

 

मासूमियत पर डाका

रेयान इंटरनेशनल स्कूल के क्लास वन के दिव्यांश काकरोरा का शव स्कूल के टैंक में तैरता हुआ पाया गया था. दिव्यांश के माता-पिता का कहना है कि उनके बच्चे के साथ कुछ गलत हुआ है. इनका इशारा यौन शोषण की तरफ है. क्योंकि जब टैंक से निकाला गया तब उसकी बौडी नंगी थी उसके पौटी के रास्ते पर रूई लगी थी. लेकिन दिल्ली पुलिस ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि दिव्यांश के साथ दुष्कर्म नहीं हुआ है. हालांकि माता-पिता द्वारा उठाए सवालों का जवाब फिलहाल दिल्ली पुलिस ने नहीं दिया है. अंतिम रिपोर्ट आनी अभी बाकी है.

कुछ दिन पहले गाजियाबाद के एक क्रेच में भी बाल यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया था. क्रेच की संचालिका का 65 वर्षीय ससुर चार साल की बच्ची के साथ अकेले में दुष्कर्म किया करता था. घर में, मौल में, स्कूल में, स्कूल बस में बच्चों के साथ दुष्कर्म की घटनाएं हर रोज घट रही है.

राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि 2012 में बच्चों के साथ दुष्कर्म के 38,172 मामले दर्ज हुए, लेकिन 2014 में आंकड़ा बढ़कर 39,172 हो गया. दो साल में दुष्कर्म के 1251 मामलों में वृद्धि हुई. इनमें से नब्बे फीसदी मामलों में दुष्कर्म परिचित ही पाए गए. ह्यूमन राइट्स वौच के मुताबिक देश में हर साल करीब 7200 बच्चे यौन उत्पीड़न के शिकार होते हैं. इंग्लैंड में हुए एक अध्‍ययन में पाया गया कि 2012 से लेकर 2014 तक पचास हजार बाल यौन उत्पीड़न के दर्ज  किए गए. वहीं चाइल्ड कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार सही आंकड़ा चार लाख के आसपास है, जिसमें से 85 फीसदी मामले दर्ज ही नहीं होते हैं. उस पर भी दो-तिहाई मामलों में परिवार का कोई सदस्य या परिवार का कोई भरोसेमंद ही दोषी होता है.

कुछ समय पहले कैथोलिक पादरी ने अपने बयान में कहा था कि दो फीसदी पादरी बच्चों का यौन शोषण करते हैं. हाल ही में मदरसे में यौन शोषण की घटना सामने आयी थी. मलयालम फिल्‍ममेकर और राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित अली अकबर ने 70 के दशक में मदरसे में तालीम हासिल करने के दौरान यौन शोषण की बात को स्वीकार किया था. इससे पहले मलयाली अखबार की पत्रकार राजीना में अपने साथ हुए मदरसे में यौन उत्पीड़न की चर्चा फेसबुक में की थी. वहीं आसाराम बापू द्वारा आश्रम में नाबालिग के साथ यौन उत्पीड़न का मामला सुर्खियां बन चुका है. 

मद्रास हाईकोर्ट ने एक ब्रिटिश नागरिक द्वारा एक बच्ची का यौन शोषण मामले की सुनवाई के दौरान न्यायाधीश एन किरूबकरण ने कहा कि पोकसो जैसे सख्त कानून के बावजूद बच्चों के साथ दुष्कर्म हो रहा है. इसीलिए सरकार को बच्चों के साथ दुष्कर्म करने वालों को नपुंसक बनाने के प्रस्ताव पर विचार करना चाहिए. इसके जादुई नतीजे सामने आएंगे. हालांकि 2012 में सरकार ने प्रोटेक्शन औफ चिल्ड्रेन फ्रौम सेक्सुअल औफेंसेज एक्ट (संक्षेप में पोकसो एक्ट) पारित करने का मकसद यौन उत्पीड़न से बच्चों को सुरक्षा देने के लिए किया गया था. लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस कानून में स्कूलों में यौन उत्पीड़न के मामले में स्कूल प्रबंधन की जवाबदेही को शामिल नहीं किया गया. जबकि 2007 में महिला व बाल विकास मंत्रालय की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया था कि 65 फसदी बच्चों का यौन उत्पीड़न स्कूलों में होता है.

बहरहाल, 2012 में पारित पोकसो एक्ट के तहत पहला मामला दर्ज होने में दो साल लग गए. 2014 में इसके तहत 8904 मामले दर्ज किए गए. राष्ट्रीय अपराध रिकौड्स ब्यूरो के अनुसार बच्चों के बलात्कार के 13,766 मामले सामने आए. नाबालिग लड़कियों का शीलभंग करने के इरादे से हमले 11,335 मामले और यौन शोषण के 4,593 मामलों के अलावा नाबालिग लड़कियों निर्वस्त्र करने के इरादे से हमला या शक्ति प्रयोग के 711 मामले; घूरने के 88 और पीछा करने के 1,091 मामले दर्ज किए गए. इन सभी घटनाओं में पोकसो के तहत मामले दर्ज नहीं हुए.

नीतीश को मोदी के बराबर खड़ा करने की तैयारी

बिहार में नरेंद्र मोदी को पटखनी देने के बाद अब नीतीश कुमार दिल्ली पहुंच कर मोदी को चुनौती देंगे. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को नरेंद्र मोदी के कद के बराबर खड़ा करने की तैयारी उनकी पार्टी जदयू ने कर दी है. पिछले लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के सामने बौने नजर आए नीतीश कुमार ने ताजा बिहार विधानसभा चुनाव में अपने कद को बड़ा साबित कर डाला. विधानसभा चुनाव में नीतीश को मात देने के लिए मोदी को खुद ही मैदान में उतरना पड़ा था, लेकिन 243 सीटों वाली विधानभा में भाजपा को 53 सीटों पर समेट कर नीतीश-लालू गठबंधन ने मोदी को धूल चटा कर आम चुनाव की हार का बदला लिया.

जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह साफ लहजे में कहते हैं कि नीतीश कुमार की अगुवाई में नेशनल लेवल पर राजनीतिक मंच बनाने की मुहिम शुरू की गई है. बिहार विधानसभा चुनाव में जदयू, राजद और कांग्रेस के महागठबंधन को मिली कामयाबी के बाद दूसरे राज्यों में भी महागठबंधन बनाने की कोशिशें की जा रही हैं. उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम और केरल में होने वाले विधानभा के चुनाव में जदयू बड़ी भूमिका निभाएगा. सभी राज्यों में नीतीश प्रचार के लिए जाएंगे और जिन दलों के साथ गठबंधन बनेगा उसके लिए प्रचार करेंगे.

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के हाथों जदयू को मिली करारी हार के बाद नीतीश ने मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी और जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया था. 2009 के आम चुनाव में जदयू को 20 सीटें मिली थी पर 2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी की लहर में उसे केवल  2 सीटों पर ही जीत मिली ओर भाजपा 12 से 32 सीटों पर पहुंच गई थी. उसके बाद पिछले साल 243 सदस्यों वाले बिहार विधानसभा में महागठबंधन ने 178 सीटों पर कब्जा कर लिया है. इसमें जदयू की झोली में 71, राजद के खाते में 80 और कांग्रेस के हाथ में 27 सीटें गई हैं. विधानसभा चुनाव के हीरे नीतीश और लालू ही रहे. पिछले विधानसभा में 22 सीट पर सिमटने वाले राजद ने इस बार 80 सीटें जीत ली. वहीं दूसरी सबसे बड़ी फतेह कांग्रेस को मिली है, जो 4 से 27 सीटों तक पहुंच गई है. महागठबंधन ने राजग को महाझटका देते हुए उसे 58 सीट पर समेट डाला. 

क्षेत्रीय दलों के गठबंधन को बिहार में मिली बड़ी कामयाबी के बाद अब दूसरे राज्यों में भी महागठबंधन बनाने की कवायद शुरू हुई है. बिहार की तरह दूसरे राज्यों में भी महागठबंधन को कामयाब बनाने की उम्मीद से नीतीश कुमार इलाकाई दलों के नेताओं से लगातार मिल रहे हैं. नीतीश को पता है कि दिल्ली तक पहुंचने के लिए उत्तर प्रदेश समेत कुछेक राज्यों में महागठबंधन को कामयाब बनाना जरूरी है.

नीतीश और नरेंद्र मोदी की सियासी खुन्नस काफी पुरानी है और मोदी प्रधनमंत्री बन गए हैं लेकिन नीतीश ने कभी भी खुद को मोदी से कमतर नहीं माना है. नीतीश कुमार भले ही बार-बार सफाई देते रहें कि उन्हें प्रधनमंत्री की कुर्सी की चाहत नहीं हैं, पर पिछले लोकसभा चुनाव से पहले 6 मार्च 2014 को उनके मन में दबी चाहत निकल कर बाहर आ गई थी. बिहार के बगहा जिला में संकल्प यात्रा के जलसे में उन्होंने कहा था कि जो लोग प्रधनमंत्री की दावेदारी लेकर टहल रहे हैं, वह उनसे ज्यादा काबिल और अनुभवी हैं. नीतीश ने नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी का नाम लिए बगैर कहा था कि एक उम्मीदवार को संसद और दूसरे को राज्य का तर्जुबा नहीं है. अपने को दोनों से बेहतर सबित करने के लिए उन्होंने कहा कि उन्हें केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को चलाने का अनुभव है. 

साल 2012 में नरेंद मोदी के लगातार तीसरी बार गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही नीतीश उनसे कन्नी कटाने लगे थे. मोदी को उनकी जीत पर बधाई न देकर नीतीश ने अपनी खुन्नस को सबके सामने जाहिर भी कर दिया था. मोदी की जीत के बाद भाजपा में उनकी मजबूत होती हैसियत से नीतीश को उस समय ही अहसास हो गया था कि 2014 के लोकसभा चुनाव में राजग के प्रधनमंत्री के तौर पर नीतीश की दावेदारी को मोदी से तगड़ी चुनौती मिल सकती है. हालांकि 2002 में गुजरात में हुए गोधरा कांड के बाद से नीतीश को लगने लगा कि नरेंद्र मोदी के साथ मंच शेयर करने या उनके साथ फोटो खिंचवाने से उनका मुस्लिम वोट छिटक सकता है.

इसी वजह से साल 2009 में लुधियाना में हुए एनडीए की रैली में मोदी-नीतीश के हाथ मिलाए फोटो की वजह से पिछले बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान काफी बवाल मचा था. नीतीश ने भी उस फोटो के अखबारों में छपने पर खुल कर नाराजगी जाहिर की थी. 12 जून 2010 को नीतीश ने पटना में राजग की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद भोज का आयोजन किया था, पर उसमें नरेंद्र मोदी के आने की वजह से भोज को रद्द कर अपनी किरकिरी भी करा चुके हैं.

मोदी को मात देने की मुहिम में लगे नीतीश पिछले साल विधानसभा चुनाव में जीत के बाद से ही लगातार आप के अरविंद केजरीवाल, असम के तरूण गोगई, शिवसेना के रामदास कदम, रांकपा के शरद पवार, तृणमूल की ममता बनर्जी, वामपंथी सीताराम येचुरी, जनता दल के एचडी देवेगौड़ा, इनेलो के अभय चैटाला, झारखंड विकास मोर्चा के बाबूलाल मरांडी, झामुमो के हेमंत सोरेन, अगप के प्रफुल्ल कुमार महंत, अकाली दल के सुखबीर सिंह बादल जैसे नेताओं से लगातार संपर्क में हैं. अपने शपथ ग्रहण समारोह में वह एक मंच पर 9 राज्यों के मुख्यमंत्रियों सहित 15 दलों के नेताओं को खड़ा कर चुके हैं. इन 15 दलों के पास राज्य सभा की केल 244 सीटों में से 132 पर कब्जा है. इस हिसाब से मोदी विरोधी दलों को राज्य सभा में पूरा बहुमत है. इससे साफ हो जाता है कि नीतीश अपने धुर प्रतिद्वंद्वी नरेंद्र मोदी को मजबूत चुनौती देने के साथ उन्हें बेचैन करने की बिसात बिछाने में लगे हुए हैं.

जदयू के विधन पार्षद रणवीर नंदन कहते हैं कि बिहार में महागठबंधन को कामयाबी मिलने के बाद पश्चिम बंगाल, असम, तामिलनाडु, पंजाब ओर उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में इस तरह के प्रयोग का रास्ता साफ हुआ है. बिहार में महागठबंधन ने नरेंद्र मोदी की लोकसभा चुनाव वाली चमक को काफी पफीका कर दिया है. इसलिए जदयू अब साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव तक नीतीश कुमार के कद को नरेंद्र मोदी की तरह राष्ट्रीय स्तर का बनाने कसरत में लग गया है.

घर घर फैलता जाति का जहर

अगर हम इस गलतफहमी में रहने लगें कि देश और समाज आधुनिक हो गया है और आज की पीढ़ी पुरातनवादी सोच से ऊपर उठ चुकी है तो अपने को सुधार लें.

अगर हैदराबाद का ओस्मानिया विश्वविद्यालय युवाओं का गढ़ है, तो जातिवादी गुटों का भी. वहां कम से कम 60 जातियों से जुड़ी युवा संस्थाएं हैं, जो एकदूसरे की कट्टर दुश्मन हैं और जातिवाद के जहरीले दलदल में पैट्रोल, तेल, गंद डाल कर खुद को धन्य समझ रही हैं.

कभीकभार पिछड़ी यानी अदर बैकवर्ड कास्ट्स एक मंच पर एकसाथ बैठ कर कुछ करने की योजना बनाती हैं, जैसे हार्दिक पटेल के गुजरात के आंदोलन को समर्थन देने के लिए हुआ पर उन में हर जाति की अलग पहचान का मुद्दा उभर आया.

युवाओं को इन जाति समूहों से बहुत परेशानी होती है. पहली और सब से बड़ी परेशानी तो यह होती है कि ये समूह प्यार में आड़े आते हैं. आमतौर पर इन समूहों को एक जाति के जने का दूसरी जाति में प्यार नहीं सुहाता, क्योंकि अगर प्यार और विवाह हो गया तो जातिवाद की चूलें हिल जाएंगी और जाति के नाम पर चल रही दुकानें ठप्प हो जाएंगी. गांवों और शहरों में भी इस का असर पड़ता है. अब हमारे यहां ऐसे महल्ले बनने लगे हैं, जिन में एक ही जाति के लोग रहते हैं और जातिवाद को पनाह देने वाले पंडेपुजारी यहां जम कर कमाते हैं.

अब पिछड़ी और दलित जातियों में भी पंडेपुजारियों की बरात बन गई है, जो भक्तों से मोटा दान पाती है और वे केवल कट्टरों को चाहते हैं, क्योंकि इसी बहाने उन को हड़काया जा सकता है.

ओस्मानिया विश्वविद्यालय में हाल ही में गौमांस खाने पर हल्ला मचा. जो गाएं सड़कों पर कचरा खाती हैं, उन को काटने पर लोग आदमी का सिर काटने को तैयार थे और जो कहते थे कि इसे खाने का हमें पुश्तैनी हक है, आपस में सिर फोड़ने को तैयार थे. यह तो सरकार की दखल थी जो मामले को दबा दिया गया वरना धर्म और जाति पर बंटा ओस्मानिया विश्वविद्यालय मारपीट की क्लासें लगाने लगता.

ऐसा सारे देश में हो रहा है. हर स्कूल, कालेज, दफ्तर, महल्ला, कालोनी जातियों पर बंटी है. किट्टी पार्टियों में भी एक ही जाति की औरतें नजर आती हैं मानो हर जाति पर कोई मुहर लगी रहती हो और किसी जाति वालों के 4 हाथ हैं और किसी की 3 आंखें.

घरघर में जाति का जहर जोर पकड़ रहा है. यह भगवाधारियों की सफलता है पर आधुनिक सोच वाला घर भी एक समरस समाज नहीं बन रहा. देश एक मैल्टिंग पौट नहीं बना, इसे अफसोस ही कहेंगे

एसआईपी: छोटी बचत को बनाए बड़ा

हर महीने आप खुद से एक वादा करती हैं अपने जरूरी खर्चों से कुछ पैसे बचा कर बचत करने का. लेकिन महीने गुजरते जाते हैं और आप का वादा अधूरा ही रह जाता है. इस के अतिरिक्त कामकाजी महिलाएं जो अपने वेतन में से कुछ पैसे बचा कर बचत करती भी हैं, तो उन का तरीका बहुत प्रभावशाली नहीं होता यानी बचत के लिए वे आवर्ती जमा खाता (आरडी) चुनती हैं, जो उन्हें उन के लक्ष्य को पूरा करने हेतु जरूरी धनराशि जुटा पाने की सुविधा नहीं देता.

मसलन, बच्चे की उच्च शिक्षा हेतु या फिर बेटी के विवाह के लिए जितने धन की आवश्यकता भविष्य में पड़ सकती है, उसे आवर्ती जमा खाते के लाभ से पूरा नहीं किया जा सकता.

एसआईपी क्यों जरूरी

मान लीजिए आप का लक्ष्य अपनी बेटी की उच्च शिक्षा के लिए पैसे की बचत करना है. पहले से ही महंगी उच्च शिक्षा हर वर्ष 10-12% की दर से और भी महंगी होती जा रही है. ऐसे में यदि आप अपनी 2 वर्ष की बेटी को 18 वर्ष बाद एमबीए कराना चाहती हैं तो आप को फीस के लिए उस वक्त 80 लाख की आवश्यकता पड़ सकती है जबकि वर्तमान में इस कोर्स की फीस लगभग 15 लाख ही है.

व्यावहारिक रूप से इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सिर्फ बैंक खाते में पैसे की बचत या आवर्ती जमा खाते के माध्यम से 8-9% का लाभ पाने के लिए निवेश काफी नहीं है, बल्कि इस के लिए आप को 12% या इस से भी अधिक ब्याज दर से रिटर्न प्रदान करने वाले निवेश की आवश्यकता है. यहां म्यूचुअल फंड लक्ष्य को प्राप्त करने में एक बड़ी भूमिका निभाते हैं.

हो सकता है कि गृहिणियों और कामकाजी महिलाओं को म्यूचुअल फंड में निवेश करना थोड़ा जोखिम भरा लगेगा, लेकिन सिप (सिस्टमैटिक इनवैस्टमैंट प्लानिंग) के माध्यम से म्यूचुअल फंड में निवेश करने में जोखिम की संभावना कम होती है. एसआईपी निवेश का एक ऐसा विकल्प है, जो एक समय अवधि में केवल प्रति माह क्व1000 की राशि निवेश कर के धन बढ़ाने में मदद करता है.

कैसे तय करें वित्तीय लक्ष्य

आप इन 5 सिद्धांतों पर अमल कर के अपने वित्तीय लक्ष्य तय कर सकती हैं:

– जिस दिन से आप अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास शुरू करने जा रही हैं, वह दिन तय कर लें.

– अपने वित्तीय लक्ष्यों की वर्तमान लागत का मूल्यांकन करें.

– मुद्रास्फीति सहित अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए तय की गई धनराशि का मूल्यांकन करें.

– निवेश के विकल्प का चुनाव और उस से मिलने वाले रिटर्न का मूल्यांकन करें.

– निवेश की अपनी मासिक किस्त तय करें.

एसआईपी की शुरुआत

– निवेश हमारे लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करता है. हर किसी के अपनेअपने लक्ष्य मसलन रिटायरमैंट, बच्चों की शादी, शिक्षा, नई कार खरीदना, छुट्टियां बिताने विदेश जाना आदि होते हैं. सही रिटर्न पाने के लिए निवेश के सही उद्देश्य का पता लगाना जरूरी है. आप म्यूचुअल फंड की विभिन्न योजनाओं में से किसी का भी चयन कर सकती हैं. लार्ज कैप, स्मौल कैप, मिड कैप, फ्लैक्सी कैप आदि ऐसी ही कुछ योजनाएं हैं.

– म्यूचुअल फंड खरीदने के लिए आप औनलाइन आवेदन करने के साथसाथ यह सुविधा देने वाले बैंक इत्यादि से भी संपर्क कर सकती हैं.

– एसआईपी की मासिक किस्त जमा करने के लिए कोई भी विभिन्न तारीखों का चयन कर सकती हैं. हर म्यूचुअल फंड कंपनी की अपनी तारीखें होती हैं. ज्यादातर कंपनियों में हर माह 1 से 5 तारीख किस्त जमा करने के लिए तय होती हैं. दूसरे निवेशों की तुलना में एसआईपी की सब से अच्छी बात यह होती है कि आप म्यूचुअल फंड की किस्त के भुगतान को अपने बचत खाते से ईसीएस द्वारा कटवा सकती हैं.

एसआईपी में निवेश के समय क्या करें

– अपने लक्ष्यों की योजना पहले से बनाएं और उसी के आधार पर एसआईपी लें.

– आप को अपने पेशे में जैसेजैसे प्रोमोशन मिलती जाए वैसेवैसे आप एसआईपी की राशि को अपने वित्तीय लक्ष्यों को पूरा करने के लिए बढ़ा सकती हैं.

– जैसेजैसे आप अपने वित्तीय लक्ष्यों के करीब आती जाएं, वैसेवैसे अपने पैसे को सुरक्षित निवेश विकल्पों में हस्तांतरित करती जाएं.

क्या न करें

– सारे पैसे एक ही म्युचूअल फंड में निवेश न करें, बल्कि 3-4 स्कीमों में मसलन लार्ज कैप, मिड कैप, स्मौल कैप, फ्लैक्सी कैप में लगाएं.

– अपनी एसआईपी स्कीम की रोज निगरानी न करें, बल्कि निवेश के बाद जब तक आप अपने वित्तीय लक्ष्य के नजदीक न पहुंचें तब तक के लिए अपने निवेश को भूल जाएं.

– बाजार के उतारचढ़ावों से परेशान न हों. अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श लेने के बाद ही कोई फैसला लें. 

होम लोन से जुड़ी 5 जरूरी बातें

मिडिल क्लास के घर खरीदने के सपने को सच करने में होम लोन ने बड़ी भूमिका अदा की है. लेकिन आज भी ज्यादातर लोग यह मानते हैं कि होम लोन की सुविधा लेने में बहुत पेचीदगियां हैं. जबकि ऐसा है नहीं. यदि होम लोन के लिए आवेदन करने से पहले इस की कुछ बारीकियों को जांच लें, तो यह आप के लिए फायदे का सौदा साबित होगा.

कब बनाएं योजना

बजाज कैपिटल में फाइनैंस प्लानिंग और क्लाइंट सर्विसेज के ग्रुप हैड सुशील जैन का कहना है कि पिछले 10 सालों में लोगों के घर खरीदने के फैसले में बदलाव देखने को मिले हैं. इनकम टैक्स ऐक्ट में सैक्शन 24 के जुड़ने के बाद अब घर के खरीदार घर की खरीद के लिए उम्र से ज्यादा अपनी आय को प्राथमिकता देते हैं.

सैक्शन 24 घर खरीदार को होम लोन पर आयकर में छूट पाने के योग्य बनाता है. ऐसे में युवा जितनी जल्दी प्रौपर्टी में निवेश करते हैं, उतनी ही जल्दी वे इस छूट के हकदार बन जाते हैं.

सुशील जैन के अनुसार, युवाओं को नौकरी मिलने के 3-4 सालों के भीतर घर खरीदने की योजना बना लेनी चाहिए, क्योंकि आजकल बिल्डर्स ऐसी योजनाएं ले कर आ रहे हैं जिन में घर की बुकिंग राशि मिडिल क्लास के वहन करने योग्य होती है. इस के साथसाथ युवाओं को आयकर में छूट के अलावा लोन की किस्तें चुकाने का अच्छा समय भी मिल जाता है.

होम लोन की योग्यता

इस बारे में सुशील बताते हैं, ‘‘कोई भी वेतनभोगी, प्राइवेट कर्मचारी या अपना व्यवसाय करने वाला होम लोन के लिए योग्य है. होम लोन का आवेदन करने के लिए इन तीनों श्रेणियों के लोगों के जरूरी डौक्यूमैंट्स में थोड़ा सा अंतर है. अपनी आय का ब्योरा दिखाने वाले डौक्यूमैंट्स में वेतनभोगियों और प्राइवेट कर्मचारियों को अपनी 3 महीने की सैलरी स्लिप, 6 माह की बैंक स्टेटमैंट और फार्म 16 भर कर देना होता है, तो व्यवसाय करने वालों को 2 साल के आयकर भुगतान का चार्टर्ड अकाउंटैंट का प्रमाणपत्र भी देना होता है.’’

क्या ध्यान रखें

होम लोन का सही फायदा भी आप को मिले और इस की किस्तों का भुगतान आप पर बोझ न बने, इस के लिए निम्न बातों का ध्यान रखें:

द्य होम लोन के लिए आवेदन करने से पहले यह जरूर पता कर लें कि वित्तीय तौर पर आप इस के योग्य हैं भी या नहीं. क्रैडिट इनफौर्मेशन ब्यूरो इंडिया लिमिटेड (सिबिल) की वैबसाइट के द्वारा आप अपना क्रैडिट स्कोर जान सकते हैं. 300 से 900 पौइंट्स के स्केल पर आप का क्रैडिट स्कोर आंका जाता है. यदि आप का क्रैडिट स्कोर मानकों के अनुरूप न हो तो उसे सही करने का तरीका भी आप को सिबिल की वैबसाइट पर मिल जाएगा.

– होम लोन में 2 प्रकार की ब्याज दरों का विकल्प है- फिक्स्ड और फ्लोटिंग. किस्तों का भुगतान करते समय फिक्स्ड ब्याज दर पर लिए गए लोन की ईएमआई में बदलाव नहीं आता. बाद में ब्याज दर में बदलाव आए तो इस में थोड़ा बदलाव संभव है. ऐसे में सुशील जैन का सुझाव है कि फ्लोटिंग ब्याज दर का विकल्प चुनें. यदि आप के फाइनैंस सलाहकार के अनुसार ब्याज दरों में कटौती की संभावना हो तो.

– लोन की रकम के अतिरिक्त प्रोसैसिंग चार्ज, सर्विस चार्ज, भुगतान की तय समयसीमा से पहले लोन चुकाने का चार्ज इत्यादि की जानकारी पहले से ले लें. ये सभी अतिरिक्त चार्ज आप को दिए जा रहे लोन का ही हिस्सा होते हैं न कि उस रकम का जो आप ने घर खरीदने के लिए बैंक से ली है.

– यदि आप ने निर्माणाधीन घर खरीदने के लिए लोन लिया है, तो आयकर में छूट पाने के लिए आप तभी योग्य होंगे जब घर का निर्माण कार्य पूरा हो जाए.

होम लोन के फायदे

होम लोन लेने वाले को निम्न फायदे होते हैं:

– यदि लोन के डौक्यूमैंट्स में आप घर मालिक या सहमालिक हैं तो ईएमआई पर लगने वाले ब्याज पर आप को आयकर छूट मिलेगी.

– ब्याज के अलावा आप की किस्त का जो हिस्सा लोन की मूल रकम में जाता है, उस पर आप इनकम टैक्स ऐक्ट 80सी के अंतर्गत आयकर छूट पा सकते हैं. इस के अंतर्गत 1 वित्तीय साल में आप लगभग क्व1.5 लाख की आयकर छूट पा सकते हैं.

– लोन की रकम और किस्तों पर आयकर छूट पाने के अलावा स्टांप ड्यूटी और रजिस्टे्रशन फीस पर भी आप आयकर छूट पा सकते हैं. इनकम टैक्स ऐक्ट 80सी के अंतर्गत मिलने वाली इस छूट का फायदा आप को उसी साल मिलेगा जिस साल में आप ने इन का भुगतान किया हो.

महिलाओं के लिए फायदे

भारत के कई राज्यों में मकान की रजिस्ट्रेशन फीस पर महिलाओं के लिए छूट का प्रावधान है. इस का फायदा उठाने के लिए महिला के नाम पर मकान की रजिस्ट्री होनी जरूरी है.

सुशील जैन ने महिलाओं के लिए होम लोन के अन्य फायदे भी बताए, जो निम्न प्रकार हैं:

– पतिपत्नी यदि जौइंट होम लोन लें, तो वे ज्यादा लोन पाने के योग्य होने के साथसाथ आयकर में ज्यादा छूट पाने के भी योग्य होंगे.

– जौइंट लोन में दोनों आवेदन करने वालों को मिलने वाली आयकर छूट में अंतर संभव है.

– प्रौपर्टी पतिपत्नी दोनों के नाम होने से उत्तराधिकारी की समस्या से छुटकारा मिल जाता है.

होम लोन का पूरा लाभ उठाने के लिए अपनी किस्तों का समय पर भुगतान करें. यों तो 1 भी किस्त छूटनी नहीं चाहिए, लेकिन लगातार 2 किस्तें छूटने पर आप बैंक की कार्यवाही के दायरे में तो आ ही जाएंगे, आप का क्रैडिट स्कोर भी खराब हो जाएगा.

कुछ जरूरी बातें

रोजमर्रा के खर्चों और उन के भुगतानों में ज्यादातर लोग लापरवाही बरतते हैं, जिस का असर उन के क्रैडिट स्कोर पर पड़ता है. ऐसे में कुछ बातों पर ध्यान देना जरूरी है:

– कम से कम रकम के लोन के लिए भी आवेदन करने से पहले अपनी लोन योग्यता को जांचपरख लें, क्योंकि यदि आप का आवेदन अस्वीकार कर दिया गया तो इस का असर आप के क्रैडिट स्कोर पर पड़ेगा.

– अपने पोस्टपेड मोबाइल/टैलीफोन बिल, किस्तों पर लिए गए घरेलू सामानों की ईएमआई, क्रैडिट कार्ड इत्यादि के बिल का भुगतान इन की तय समयसीमा के अंदर ही कर दें. यदि इन छोटेछोटे भुगतानों में लापरवाही बरतेंगे, तो बड़ा लोन लेने में आप को परेशानी हो सकती है.

– नौकरीशुदा लोगों को होम लोन का आवेदन करने से लगभग 6 महीने पहले से ही अपने बचत खाते को मैंटेन करना जरूरी है.

ईमोजी: तकनीक की नई भाषा

शब्दों और भाषा की दुनिया में ब्रिटेन की औक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित औक्सफोर्ड डिक्शनरी को काफी मान्यता और प्रतिष्ठा हासिल है. दुनिया में सब से ज्यादा प्रचलित और इस्तेमाल होने वाले कुछ नए शब्द इस डिक्शनरी में हर साल जोड़े जाते हैं, फिर चाहे वे विश्व की किसी भी भाषा के क्यों न हों. डिक्शनरी में जोड़े जाने वाले शब्द की चर्चा भी बहुत होती है, पर वर्ष 2015 में इस में शामिल किए गए एक चित्र ने तो तहलका ही मचा दिया.

दरअसल, 2015 में औक्सफोर्ड डिक्शनरी ने शब्द के स्थान पर एक चित्र (चित्र समूह) को जगह दी और उसे ‘वर्ड औफ द ईयर’ भी घोषित किया. यह चित्र ईमोजी का है. ईमोजी वास्तव में जापान में प्रचलित हंसते हुए स्माइली हैं और इन में भी खासतौर से औक्सफोर्ड डिक्शनरी ने ऐसे ईमोजी का उल्लेख किया है, जिस में हंसते हुए स्माइली की आंखों से आंसू निकल रहे हैं. इस ईमोजी को ‘वर्ड औफ द ईयर’ घोषित करते हुए डिक्शनरी के प्रकाशकों ने कहा कि यह ईमोजी वर्ष 2015 में दुनिया के लोगों के मूड को बेहतर ढंग से अभिव्यक्त करता है, इसीलिए इसे डिक्शनरी में शामिल किया गया है. औक्सफोर्ड द्वारा शब्द के रूप में इस का चयन करने के अपने तर्क हैं, पर इसे ले कर काफी आलोचना हुई. कहा गया कि अब डिक्शनरी के प्रकाशक चित्रों को भाषा बनाने पर तुल गए हैं. स्माइली को शब्द मानने के फैसले को कई प्रतिष्ठित ब्रिटिश और अमेरिकी अखबारों ने गलत ठहराया. ब्रिटिश अखबार गार्डियन के एक लेख में कहा गया, ‘ईमोजी कोई शब्द नहीं है. यह वर्ड औफ द ईयर के रूप में डिजर्व नहीं करता.’

इस चयन के विरोधियों का कहना है कि ईमोजी का बढ़ता चलन अंगरेजी के लिए खतरनाक है. अगर ऐसे चित्रों को डिक्शनरी में शामिल किया जाने लगा, तो इस से व्याकरण और भाषा का तो कोई अर्थ ही नहीं बचेगा. पर औक्सफोर्ड डिक्शनरी ने ऐसी दलीलों को खारिज कर दिया. डिक्शनरी के प्रकाशकों ने कहा कि उन के इस चयन का आधार शब्द के रूप में चित्र का बढ़ता इस्तेमाल है, जिस तरह से आज पूरी दुनिया में ईमोजी का इस्तेमाल शब्दों के रूप में हो रहा है, इसलिए उसे नजरअंदाज करना मुश्किल है. यह बात सही है कि ईमोजी का व्हाट्सऐप आदि में बढ़चढ़ कर इस्तेमाल हो रहा है.

शब्दचित्र की नई कड़ी

कहने को तो ईमोजी एक जापानी शब्दचित्र है. मनुष्य की भावनाओं को व्यक्त करने वाले इमोटिकौन्स की तरह का ही एक चित्र है. जिस तरह स्माइली का ज्यादातर इस्तेमाल मोबाइल फोन और इंटरनैट आदि पर किया जाता है. उसी तरह ईमोजी जापानी फोनों से निकल कर अब पूरी दुनिया में छा गए हैं. ईमोजी का एक शाब्दिक अर्थ भी है. इस में प्रयुक्त ‘ई’ का मतलब है इमेज यानी चित्र और ‘मोजी’ का मतलब है लिपि या करैक्टर. इस प्रकार ईमोजी वास्तव में एक चित्रलिपि है.

जिस दौर में दुनिया में स्माइली का प्रचलन शुरू हो रहा था, लगभग उसी दौर में एक जापानी इंजीनियर शिगेताका कुरीता ने कई लोगों की भावनाओं को उजागर करते हुए करीब 180 अलगअलग ईमोजी बनाए थे. यह वर्ष 1998-99 की बात है जब कुरीता और उन की टीम ने एक टैलीकौम कंपनी एनटीटी डोकोमो की मोबाइल व इंटरनैट सेवाओं के लिए खास तरह के संकेतों के आविष्कार का काम अपने हाथ में लिया था. ईमोजी को ईजाद करते समय उन की टीम ने मौसम की भविष्यवाणी करने वाले संकेतों और शेयर बाजार के भावों को प्रकट करने वाले संकेतों के बारे में विचार किया. जैसे मौसम की भविष्यवाणी करते समय बादलों, बारिश, बर्फबारी या सूर्य का चित्र बनाया जाता है, उसी तरह उन्होंने इंसान के मूड को व्यक्त करने वाले यानी हंसी, खुशी, क्रोध आदि भाव दर्शाने वाले ईमोजी बनाए.

नए किस्म के इमोटिकौन्स

जिस प्रकार ईमोजी दो शब्दों ‘ई’ और ‘मोजी’ से मिल कर बना है, उसी प्रकार इमोटिकौन्स भी इमोशन (भाव) और आइकन (संकेत) से मिल कर बने हैं. इमोटिकौन्स की तरह ईमोजी भी भाव संकेत हैं. हालांकि ईमोजी के मुकाबले इमोटिकौन्स दुनिया में डेढ़ सदी से प्रयोग में आ रहे हैं. बताते हैं कि पहली बार न्यूयार्क टाइम्स ने वर्ष 1862 में अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का भाषण छापते समय स्माइली का प्रयोग किया था. इस के बाद अखबारों व पत्रिकाओं में स्माइली का इस्तेमाल होने लगा. स्माइली तब ज्यादा प्रचलन में आए, जब इन का प्रयोग कंप्यूटर पर होने लगा.

कंप्यूटरों पर स्माइली लाने का श्रेय पिट्सबर्ग (अमेरिका) स्थित कार्नेगी मिलान यूनिवर्सिटी के प्रोफैसर स्कौट ई फालमैन को जाता है. 1982 में प्रोफैसर फालमैन ने इलैक्ट्रौनिक संकेतों के रूप में कुछ स्माइली बनाए थे, जिस के बाद सैकड़ों स्माइली बनाए गए. तरहतरह के चिढ़ाते, मुसकराते, गुदगुदाते, रोते, चेहरों वाले स्माइली का आज पूरी दुनिया स्मार्टफोनों और कंप्यूटरों पर इंटरनैट के जरिए इस्तेमाल कर रही है.

यों बढ़ा जापानी ईमोजी

ईमोजी को 1997 में जापानी शब्दकोषों में पहली बार जगह दी गई थी. पर यह तब ज्यादा मशहूर हुए जब जापान की डोकोमो आईमोड मोबाइल सर्विस प्रोवाइडर कंपनी ने सब से पहले ईमोजी को टैक्स्ट मैसेज में इस्तेमाल करने की सहूलत दी थी.

इस के बाद इस की चर्चा तब भी हुई थी, जब इसे एप्पल कंपनी के आईफोन में जगह दी गई. विदेशों में तो एसएमएस, चैटिंग या व्हाट्सऐप मैसेज भेजने के दौरान खुशी, दुख, क्रोध आदि भावों को लिख कर संप्रेषित करने के स्थान पर उन भावों से जुड़ा ईमोजी भेजा जाने लगा. पहले ईमोजी किसी एक वाक्य में 1-2 जगह पर इस्तेमाल होता था पर धीरेधीरे अलगअलग ईमोजी जोड़ कर पूरेपूरे वाक्य बनाए जाने लगे. जापान में तो ईमोजी का प्रयोग कई रूपों में हो रहा है. जापानी नूडल्स, डैंगो, ओनिगिरि, जापानी करी या सुशी को अभिव्यक्त करने वाले ईमोजी भी वहां प्रचलित हैं.

ईमोजी उपन्यास और फिल्में

ईमोजी कितनी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, इस की एक मिसाल इस से मिलती है कि एक उपन्यास ‘मोबी डिक’ का तो ईमोजी में ही अनुवाद किया है. असल में एकएक ईमोजी जोड़ कर पूरा वाक्य बनाया जाता है और जो लोग ईमोजी में अपनी बात कहनेसुनने के आदी हैं, वे बड़ी आसानी से ईमोजी जोड़ कर बनाए गए वाक्य का अर्थ समझ जाते हैं. सिर्फ उपन्यास ही नहीं, अब तो इस पर पूरी फिल्म बनाने की बात भी हो रही है. हौलीवुड की ऐंटरटेनमैंट कंपनी सोनी पिक्चर्स एनिमेशन ने यह घोषणा की है कि वह ईमोजी पर आधारित एक एनिमेशन फिल्म बनाने की योजना पर काम कर रही है.

नया जमाना, नई भाषा

वैसे तो शब्दों के समर्थक कह रहे हैं कि चित्रों को भाषा का माध्यम बनाना गलत है, पर यह एक सचाई है कि जिस तरह से स्मार्टफोन पर शब्दों के बजाय कोई बात चित्रों के जरिए कह दी जाती है, उस में भाषा का खो जाना स्वाभाविक है. कोई बात कहने के लिए अब जरूरी नहीं रह गया है कि एक लंबा वाक्य ही कहा जाए. जैसे धन्यवाद कहने या आभार प्रकट करने के लिए उठा हुआ अंगूठा बना दिया जाता है या शाबाशी देने के लिए ताली बजाते हाथों का संकेत बना दिया जाता है. उसी तरह अन्य भाव भी चित्रों से आसानी से व्यक्त हो जाते हैं. इसलिए इस की पूरी संभावना है कि निकट भविष्य में स्माइली की तरह ईमोजी भी पूरी दुनिया पर छा जाए. फिर अब तो ईमोजी के बढ़ते आंकड़े भी हैं. जैसे औक्सफोर्ड और एक अन्य कंपनी स्विफ्टकी ने अपने सर्वेक्षणों के आधार पर आकलन किया है कि ईमोजी का ब्रिटेन में 20% और अमेरिका में 17% मैसेजिंग में इस्तेमाल हो रहा है. यही नहीं, 2014 के मुकाबले 2015 में ईमोजी का तीनगुना ज्यादा इस्तेमाल हुआ, जिस से प्रभावित हो कर ही औक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने इसे डिक्शनरी में जगह देने का फैसला किया. हो सकता है कि जल्द ही ईमोजी मनोरंजन की भाषा न रह कर कामकाज की भाषा भी बन जाए.

आप भी बन सकते हैं हैकर

सूचना और तकनीक के इस दौर में कंप्यूटर और इंटरनैट मानव जीवन के अभिन्न अंग बन गए हैं. आज जहां सभी क्षेत्रों में कंप्यूटर का इस्तेमाल हो रहा है वहीं नई नई तकनीक के आगमन ने उपभोक्ता को अपनी ओर आकर्षित किया है. हमारे देश में स्मार्टफोन का बाजार तेजी से विकसित हो रहा है और इसी वजह से हालिया वर्षों में इंटरनैट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है. फेसबुक, व्हाट्सऐप, वीचैट, लाइन और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया के जरिए लोग आपस में आसानी से जुड़ रहे हैं.

इन सब के चलते इन दिनों साइबर क्राइम की घटनाओं में भी काफी इजाफा हो रहा है. आएदिन समाचारपत्रों में हैकिंग से संबंधित खबरें जहां चिंता का विषय हैं वहीं इन की वजह से युवाओं और टीनएजर्स में हैकिंग के प्रति उत्सुकता भी बढ़ी है.

क्या है हैकिंग

वास्तव में किसी कंप्यूटर अथवा नैटवर्क की सुरक्षा को भेद कर अनधिकृत रूप से घुसपैठ करना ही हैकिंग है. हैकिंग की दुनिया काफी रोमांचकारी है और अन्य क्षेत्रों की तरह इस के भी कई सफेदसियाह पहलू हैं. जहां एक ओर एथिकल हैकर्स बड़ीबड़ी इंटरनैट कंपनियों और सरकारी संस्थानों के लिए काम करते हैं, वहीं दूसरी ओर ब्लैक हैट हैकर्स लोगों को नुकसान पहुंचाने के लिए नएनए तरीके ईजाद करते रहते हैं.

गौरतलब है कि इंटरनैट के इस युग में कोई सामान्य कंप्यूटर यूजर भी हैकर बन सकता है. और तो और गूगल तथा फेसबुक जैसी नामी कंपनियां हैकर्स को काफी उम्दा पैकेज औफर करती हैं. एथिकल हैकिंग के क्षेत्र में अब रोजगार की अपार संभावनाएं हैं. एक अच्छा हैकर बनने और इस क्षेत्र में कैरियर बनाने के लिए निम्न बिंदुओं पर ध्यान देना आवश्यक है :

रुचि

किसी भी क्षेत्र में ऊंचा मुकाम हासिल करने के लिए उस क्षेत्र में रुचि होना नितांत आवश्यक है. हैकिंग के क्षेत्र में अपनी गहरी पैठ बनाने के लिए हैकर्स को नितनई तकनीक तथा उस की कार्यप्रणाली से अवगत होना पड़ता है. हैकर्स लगातार इस जुगाड़ में रहते हैं कि अति सुरक्षित कंप्यूटर प्रणाली में घुसपैठ कैसे की जाए. प्रोफैशनल हैकर्स दिनरात इंटरनैट पर हैकिंग सौफ्टवेयर और ट्रिक्स की खोज करते रहते हैं. साथ ही वे अपने सहकर्मी हैकर्स के साथ भी गुपचुप तरीके से सूचनाओं का आदानप्रदान करते हैं.

ब्रेन

यदि आप दुनिया के नामीगिरामी हैकर्स पर नजर दौड़ाएं तो आप एक चीज कौमन पाएंगे कि सभी हैकर्स प्रतिभाशाली और रचनात्मक होते हैं. कंप्यूटर के क्षेत्र में नितनई तकनीक अस्तित्व में आती हैं. हैकर अपने ज्ञान और बुद्धि के बल पर इन में छिपी खामियों का पता लगाता है. हजारोंलाखों डौलर खर्च कर बनाए गए सौफ्टवेयर और प्रोग्राम में तकनीकी खामी होना कतई सामान्य बात नहीं है. इस के बावजूद हैकर्स इन में मौजूद खामी ढूंढ़ ही लेते हैं.

प्रोग्रामिंग लैंग्वेज

वास्तव में प्रत्येक डिजिटल कंप्यूटर बाइनरी अंकपद्धति पर आधारित होता है अर्थात कंप्यूटर सिर्फ ‘0’ और ‘1’ की भाषा को समझता है, लेकिन हम मनुष्यों की बोलचाल की भाषा कंप्यूटर की भाषा से एकदम भिन्न है. इस समस्या से नजात पाने के लिए ही प्रोग्रामिंग लैंग्वेज का विकास किया गया. प्रमुख प्रोग्रामिंग लैंग्वेज जावा, सी, सी++, कोबोल, पाइथन हैं. आमतौर पर कंप्यूटर हैकर्स इन सभी प्रोग्रामिंग लैंग्वेजेज के अच्छे जानकार होते हैं. इस के पीछे वजह यह है कि हैकर्स जिन वैबसाइट्स और सौफ्टवेयर्स को हैक करते हैं, उन का निर्माण इन्हीं प्रोग्रामिंग लैंग्वेजेज की मदद से होता है. आप को यह जान कर आश्चर्य होगा कि फेसबुक के निर्माण में सी नामक प्रोग्रामिंग लैंग्वेज का उपयोग हुआ है.

हैकिंग बुक्स

यह तो सर्वविदित है कि पुस्तकें ज्ञान का अथाह भंडार होती हैं. सभ्यता के विकास में पुस्तकों के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. आज जहां बाजार में विभिन्न विषयों पर अनेकानेक पुस्तकें उपलब्ध हैं वहीं इंटरनैट के आगमन के पश्चात डिजिटल रूप में भी पुस्तकें सर्वसुलभ हो गई हैं. अब इंटरनैट से किसी भी विषय से संबंधित पुस्तक को सीधे कंप्यूटर अथवा स्मार्टफोन में डाउनलोड किया जा सकता है.

इंटरनैट पर हैकिंग से संबंधित कई पुस्तकें उपलब्ध हैं जिन्हें पीडीएफ फाइल की सहायता से पढ़ा जा सकता है. इन पुस्तकों की मदद से हैकिंग से संबंधित आधारभूत बातें आसानी से सीखी जा सकती हैं. अंडरग्राउंड हैंडबुक, हैकिंग फौर डमीज, सोशल इंजीनियरिंग : द आर्ट औफ ह्यूमन ऐक्सप्लौइटेशन, जीमेल हैकिंग, हैकर्स हाईस्कूल आदि कुछ प्रमुख हैकिंग ईबुक्स हैं जिन की आप मदद ले सकते हैं.

गूगल सर्च इंजन

विश्वप्रसिद्ध सर्च इंजन गूगल का इस्तेमाल इंटरनैट पर मौजूद किसी भी विषयवस्तु की खोज के लिए किया जाता है. गूगल कई तरह से हैकिंग सीखने में मददगार साबित हो सकता है. आप गूगल के जरिए उन समस्याओं के हल प्राप्त कर सकते हैं जिन्हें सुलझाना आप के लिए मुमकिन न हो. हैकिंग सीखने के दौरान कई बार आप को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. कई बार आप की उलझनों को सुलझाने के लिए कोई मददगार नहीं मिलता, ऐसे में गूगल आप की मदद कर सकता है. विदित हो कि हैकिंग सीखने के दौरान आप जिन समस्याओं का सामना करेंगे, वे पहले भी मौजूद थीं और उन का समाधान भी ढूंढ़ा जा चुका है. इसलिए आप को सिर्फ उन समाधानों की खोज करनी है और इस के लिए आप बेहिचक गूगल का इस्तेमाल कर सकते हैं.

हैकिंग वैबसाइट्स

वैब क्रांति के वर्तमान दौर में वैबसाइट्स अहम भूमिका निभा रही हैं. आज विभिन्न विषयों पर अलगअलग वैबसाइट्स मौजूद हैं, जिन का एक बड़ा पाठक वर्ग है. ब्लौगर और वर्डप्रैस के आगमन के बाद तो किसी भी सामान्य इंटरनैट यूजर के लिए ब्लौग और वैबसाइट का निर्माण करना काफी आसान हो गया है. दुनिया के विभिन्न हिस्सों में कई ऐसे हैकर्स मौजूद हैं जो इन वैबसाइट्स के जरिए अपने अनुभवों और जानकारियों को शेयर करते हैं. उन को दी ये जानकारियां भी हैकिंग सीखने का प्रभावी माध्यम हैं. कुछ प्रमुख हैकिंग वैबसाइट्स हैं, कूल हैकिंग ट्रिक डौट कौम, अमेजिंग हैकिंग ट्रिक्स डौट कौम, गो हैकिंग डौट कौम, हैकर्स औनलाइन क्लब डौट कौम.

औपरेटिंग सिस्टम

औपरेटिंग सिस्टम एक कंप्यूटर और कंप्यूटर यूजर के बीच की कड़ी का काम करता है. आमतौर पर हम माइक्रोसौफ्ट द्वारा निर्मित विंडोज औपरेटिंग सिस्टम इस्तेमाल करते हैं. विंडोज औपरेटिंग सिस्टम होम, औफिस, मनोरंजन और व्यवसाय जैसे क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है, लेकिन अगर आप हैकिंग के क्षेत्र में कैरियर बनाना चाहते हैं तो विंडोज औपरेटिंग सिस्टम आप की जरूरतों पर खरा नहीं उतरता. यही वजह है कि अधिकतर पेशेवर हैकर्स काली लिनक्स औपरेटिंग सिस्टम इस्तेमाल करते हैं.

काली लिनक्स एक मुफ्त और ओपन सोर्स औपरेटिंग सिस्टम है, जिसे इंटरनैट से आसानी से डाउनलोड किया जा सकता है. काली लिनक्स औपरेटिंग सिस्टम पूरी तरह से हैकर्स को ध्यान में रख कर विकसित किया गया है. इस औपरेटिंग सिस्टम में मौजूद सौफ्टवेयर और टूल्स की मदद से मोबाइल हैकिंग, फेसबुक हैकिंग, वाईफाई हैकिंग, नैटवर्क हैकिंग, वैबसाइट हैकिंग और हार्डवेयर हैकिंग से संबंधित औपरेशंस को अंजाम दिया जा सकता है. दुनिया के किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल करने का कोई शौर्टकट नहीं है. परिश्रम, धैर्य, बुद्धि और ज्ञान जैसे कारक ही व्यक्ति को सफल और श्रेष्ठ बनाते हैं. हैकिंग का क्षेत्र भी इस का अपवाद नहीं है. एक हैकर के लिए देर रात तक कंप्यूटर पर काम करना काफी सामान्य बात है. ऐसे में एक हैकर के पास धैर्य और इंतजार करने की क्षमता का होना नितांत आवश्यक है, क्योंकि कई बार पासवर्ड ब्रेक करने में कई घंटे, कई दिन तक लग जाते हैं. हकीकत में आज एक सामान्य इंटरनैट यूजर भी आसानी से मास्टरमाइंड हैकर बन सकता है. कई प्रोफैशनल संस्थान तो बाकायदा एथिकल हैकिंग का प्रशिक्षण और सर्टिफिकेट भी प्रदान करते हैं. इन संस्थानों की मदद से एथिकल हैकिंग में दक्षता हासिल की जा सकती है.

एथिकल हैकर्स के लिए रोजगार की अपार संभावनाएं हैं. टैक्नोलौजी के क्षेत्र में कार्यरत सभी कंपनियां अपने संवेदनशील डाटा की सुरक्षा के लिए एथिकल हैकर्स को जौब प्रदान करती हैं. एथिकल हैकर्स कंपनी की अनुमति से डाटाबेस में घुसपैठ करते हैं और सिस्टम में मौजूद बग को फिक्स करते हैं, जिस से कोई ब्लैक हैट हैकर डाटा को चुरा नहीं सकता. साथ ही, बैंक, सरकारी एजेंसियां, पुलिस और प्राइवेट फर्में भी एथिकल हैकर्स को आकर्षक पैकेज पर जौब प्रदान करती हैं.    

अभिषेक बच्चन को एक बार फिर पिता का सहारा

अभिषेक बच्चन स्टार सन हैं. उनके पिता अमिताभ बच्चन को अभिनय जगत में महानायक कहा जाता है. लेकिन अभिषेक बच्चन का अपना अभिनय करयिर संवरने का नाम ही नहीं ले रहा है. वह कुछ मल्टीस्टारर फिल्मों में शाहरुख खान या अजय देवगन की दया माया पर ही निर्भर हैं. लंबे समय बाद अभिषेक बच्चन को सोलो हीरो वाली फिल्म ‘‘आल इज वेल’’ मिली थी, मगर यह फिल्म बाक्स आफिस पर चारो खाने चित हो गयी. जिसकी वजह से संजय गुप्ता ने अभिषेक बच्चन को लेकर सोलो हीरो वाली फिल्म ‘‘एक था गैंगस्टर’’ बनाने की जो घोषणा की थी, उसे उन्होंने हमेशा के लिए बंद कर दिया. कुल मिलाकर आज की तारीख में अभिषेक बच्चन के पास एक भी फिल्म नहीं है.

कहने को तो अभिषेक बच्चन दावा कर सकते हैं कि उनके पास दो मल्टी स्टारर फिल्में ‘हाउसफुल 3’ और ‘हेराफेरी 3’ हैं. मगर यह दोनों फिल्में भी लंबे समय से रूकी हुई हैं. मजेदार बात यह हुई कि इधर अभिषेक बच्चन अपने पूरे परिवार के साथ मालदीव में जन्मदिन मनाने पहुचे, उधर संजय गुप्ता की फिल्म ‘‘एक था गैंगस्टर’’ के न बनने की खबर आ गयी.

सूत्रों की माने तो ‘‘एक था गैंगस्टर’’ के न बनने की खबर के आते ही अभिषेक बच्चन और उनके पिता अमिताभ बच्चन भी परेशान हो गए. अभिषेक बच्चन के सामने अब उनके पिता ही एकमात्र सहारा नजर आए. सूत्रो के अनुसार उसके बाद शुरू हुआ फिल्मी जुगाड़. सूत्रों के अनुसार उसी दिन अमिताभ बचन कैंप की तरफ से साजिद नाडि़याडवाला से बात की गयी और साजिद नाडि़याडवाला ने आनन फानन में अभिषेक बच्चन की एक तस्वीर मीडिया को जारी करते हुए दावा किया कि यह तस्वीर फिल्म ‘‘हाउसफुल-3’’ में अभिषेक बच्चन के लुक की है. सवाल यह है कि अब तक ‘हाउसफुल 3’ को लेकर सभी चुप क्यों थे. और अचानक अभिषेक बच्चन की ही तस्वीर जारी करने का मकसद?

बहरहाल, मामला यहीं तक नहीं रूका. अब अमिताभ बच्चन के नजदीकी सूत्र दावा कर रहे हैं कि अमिताभ बच्चन ने एक बार फिर अभिषेक बच्चन को सोलो हीरो के रूप में मैदान में उतारने के लिए कमर कस ली है और अब अमिताभ बच्चन अपनी होम प्रोडक्शन कंपनी ‘‘ए बी सी एल’’ की फिल्म में अभिषेक बच्चन को सोलो हीरो पेश करना चाहते हैं. सूत्रों के अनुसार इसके लिए अच्छी पटकथा की तलाश शुरू हो गयी है. सूत्रों के अनुसार इस बार अभिषेक बच्चन के लिए हार्ड हीटिंग तथा सम सामायिक मुद्दों वाले विषय की तलाश की जा रही है. क्योंकि संजीदा व रोमांटिक फिल्मों में दर्शक अभिषेक बच्चन को अस्वीकार कर चुके हैं, इसलिए इस तरह की फिल्म में अब रिस्क न लेने का मन बना लिया गया है.

सूत्र बताते है कि अमिताभ बच्चन लंबे समय से 2013 की सफल मलयालम फिल्म ‘मुंबई पुलिस’ का हिंदी रूपांतरण बनाना चाह रहे थे. मगर इस फिल्म में समलैंगिकता का मुद्दा भी है, इसलिए वह रूके हुए हैं. सूत्र यहां तक दावा कर रहे हैं कि इस बार ‘एबीसीएल’ के तहत अभिषेक बच्चन को सोलो हीरो लेकर कम बजट वाली यानी कि 15 करोड़ रूपए से कम बजट की ही फिल्म बनाने की बात तय की गयी है. फिल्म के सेटेलाइट राइट बेचने की जिम्मेदारी खुद अमिताभ बच्चन ने ली है. यह सभी को पता है कि सभी सेटेलाइट चैनलों से अमिताभ बच्चन के काफी अच्छे संबंध हैं. बहरहाल, देखना यह होगा कि अमिताभ बच्चन का यह प्रयास अभिषेक बच्चन के करिय में क्या गुल खिलाता है.

सोनम कपूर की अग्निपरीक्षा

फैशन फिएस्टा के रूप में मशहूर अदाकारा सोनम कपूर बतौर अभिनेत्री अभी तक अपनी कोई खास पहचान नहीं बना पायी हैं. अब तक के अभिनय करियर में यदि ‘‘रांझणा’’ को छोड़ दें, तो वह किसी भी फिल्म में अपनी अभिनय क्षमता को साबित नहीं कर पायी है. ‘रांझणा’ के बाद जब उनकी फिल्म ‘‘बेवकूफियां’’ बाक्स आफिस पर बुरी तरह से असफल हुई, तो सोनम कपूर ने इस फिल्म की असफलता का सारा ढीकरा पी आर कंपनी ‘‘स्पाइस’’ के सिर फोड़ा था. लेकिन उसके बाद ‘खूबसूरत’ भी असफल रही. यह एक अगल बात है कि सोनम कपूर ने कभी भी ‘खूबसूरत’ को असफल नहीं माना. इसके बाद उनकी फिल्म ‘‘डॉली की डोली’’ने भी निर्माता को  नुकसान पहुंचाया. सूत्रों की माने तो कम बजट वाली फिल्म ‘‘डॉली की डोली’’ से इसके निर्माता को साढ़े सात करोड़ रूपए का नुकसान हुआ था. फिर ‘प्रेम रतन धन पायो’ आयी, जिसमें उनके साथ सलमान खान थे, पर यह फिल्म भी अपनी लागत के अनुरूप बाक्स आफिस पर धन नहीं जुटा पायी.

अब सभी की निगाहें 19 फरवरी को रिलीज होने वाली सोनम कपूर की फिल्म ‘‘नीरजा’’ पर है. बालीवुड में फिल्म ‘‘नीरजा’’ को सोनम कपूर की अग्निपरीक्षा के तौर पर देख जा रहा है. सोनम कपूर के पास ‘नीरजा’ के अलावा कोई दूसरी फिल्म नहीं है. और न ही उन्हे किसी नई फिल्म का आफर ही मिला है. यहां तक उनकी बहन रिया कपूर और पिता अनिल कपूर होम प्रोडक्शन के तहत बनने वाली फिल्म ‘‘बैटल फार बिठोरा’’ की शूटिंग पिछले दो वर्ष से टालते आ रहे हैं. सूत्रों की माने तो ‘‘बैटल फार बिठोरा’’ की शूटिंग शुरू करने का फैसला बाक्स आफिस पर फिल्म ‘‘नीरजा’’ को मिलने वाले रिस्पांस को देखने के बाद ही लिया जाएगा.

महज 23 साल की उम्र में मौत की नींद सुला दी गयी ‘पैन एशिया’’ उड़ान की एअर होस्टेस नीरजा भानोट की जिंदगी पर बनी बायोपिक फिल्म ‘‘नीरजा’’ में सोनम कपूर ने नीरजा भानोट का किरदार निभाया है. सोनम कपूर दावा कर रही हैं कि नीरजा भानोट की मां स्व.रमा भानोट ने उन्हे देखकर कहा था कि वही उनकी बेटी नीरजा के किरदार में फिट हैं. मगर बौलीवुड में चर्चाएं गर्म हैं कि नीरजा भानोट के बारे में जो जानकारी है, नीरजा जिस तरह की लड़की थी, वह सब फिल्म ‘नीरजा’ के ट्रेलर या प्रोमो को देखकर सोनम कपूर के अभिनय में नजर नहीं आ रहा है. जब प्लेन के अंदर अपहरणकर्ता घुस गए थे, उस वक्त नीरजा के चेहरे पर डर के साथ उसकी प्रवृत्ति के अनुरूप अपने कर्तव्य को निडरता के साथ निभाने का जो भाव होना चाहिए, उसका अभाव ट्रेलर में नजर आता है.

सूत्रों की माने तो फिल्म ‘‘नीरजा’’ के बाक्स आफिस परिणाम को लेकर भी बौलीवुड के ट्रेड पंडित बंटे हुए नजर आ रहे हैं. मजेदार बात तो यह है कि यदि खुदा न खास्ता यदि फिल्म ‘‘नीरजा’’ बाक्स आफिस पर असफल हो जाए, तो उससे सोनम कपूर को अछूता रखने के लिए अभी से सोनम कूपर के नजदीकियों ने वजहें फैलाना शुरू कर दिया है.

सूत्रों के अनुसार अब बौलीवुड का एक हिस्सा यह कह रहा है कि ‘‘नीरजा’’ को ऑस्कर अवार्ड की वजह से बाक्स आफिस पर परेशानी झेलनी पड़ सकती है. वास्तव में ‘‘नीरजा’’19 फरवरी को रिलीज हो रही है और फरवरी माह का तीसरा सप्ताह ऑस्कर अर्वाड का सप्ताह रहेगा. इस सप्ताह में ऑस्कर के लिए नामित फिल्में प्रदर्शित की जाएंगी. 28 फरवरी को ऑस्कर अवार्ड के विजेताओं के नाम घोषित होंगे. नीरजा के नजदीकी लोगो की माने तो फरवरी के तीसरे व चौथे सप्ताह में मुंबई के अलावा दिल्ली, गुड़गांव, कोलकत्ता व मद्रास के कई मल्टी प्लैक्स ऑस्कर नामित फिल्में प्रदर्शित करेंगें, जिसका खामियाजा ‘‘नीरजा’’ को भुगतना पड़ेगा. तर्क देने वाले तो यह तर्क भी दे रहे हैं कि इस समय तमाम लोग सिनेमाघरों में जाने की बजाय घर पर टॉरेंट से डाउनलोड करके अपने लैपटॉप या कम्प्यूटर पर ऑस्कर नामित फिल्में देखना चाहेंगे.

इतना ही नहीं सोनम के अति नजदीकी सूत्रों के अनुसार 19 फरवरी को ‘नीरजा’ के साथ ही पांच अन्य फिल्में रिलीज होंगी, इसलिए भी दर्शक बंटेंगे. यानी कि यदि फिल्म ‘‘नीरजा’ बाक्स आफिस पर न चले, तो उसके श्रेय से सोनम कपूर को बचाने के सारे हथकंडे अभी से अपनाए जा रहे हैं. मगर इस तरह कब तक सोनम कपूर अपनी पहचान एक बेहतरीन अदाकारा की बजाय फैशनिष्ट के रूप में बनाते हुए बौलीवुड में टिकी रह सकती हैं. इसके अलावा अब जिस तरह से दर्शक बदल रहा है, जिस तरह से सोनम कपूर की फिल्में लगातार असफल हो रही हैं और आज की तारीख में उनके हाथ में एक भी फिल्म न होने से जो हालात पैदा हुए हैं, उन हालातों में यह कहना गलत नहीं होगा कि फिल्म ‘‘नीरजा’’ सोनम कपूर के लिए सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है.

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