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किडनैप होने वाले थे रजनीकांत, पर तभी…

राम गोपाल वर्मा निर्देशित उनकी अगली फिल्म 'वीरप्पन' में दिखेगी अब तक की सबसे बड़ी धड़-पकड़ में से एक की कहानी. चंदन तस्कर के लिए सबसे मशहूर स्मगलर पर बेस्ड इस फिल्म की कहानी को वैसे लोगों के नजरिए से पेश किया गया है, जो वीरप्पन के एनकाउंटर में शामिल रहे थे. राम गोपाल वर्मा ने इस फिल्म के लिए जबरदस्त रिसर्च किया.

फिल्म की कहानी गैंग के पुराने साथियों के इंटरव्यू पर बेस्ड है. फिल्म के लिए उन लोगों से भी बातचीत की गई जो वीरप्पन और सरकार के बीच मीडिएटर का काम किया करते थे और उन अधिकारियों से भी बातचीत की गई, जो वीरप्पन को पकड़ने के लिए चलाए गए अभियान का हिस्सा बने थे.

इस फिल्म को प्रड्यूस कर रहे हैं सचिन जोशी, जो फिल्म में ऐक्टिंग करते भी नजर आएंगे. राम गोपाल वर्मा ने इस फिल्म में वीरप्पन को खोजने की कहानी को बेहद प्रभावशाली ढंग से दिखाने की कोशिश में हैं. इस प्रॉजेक्ट से जुड़े एक नजदीकी सूत्र के मुताबिक, फिल्म के एक खास सीन में उस हिस्से को भी फिल्माया जाएगा जब वीरप्पन ने इंडियन सिनेमा के मशहूर स्टार रजनीकांत को किडनैप करने का प्लान बनाया था.

कहा गया है कि वीरप्पन ने रजनीकांत को किडनैप करने की ठीक वैसी ही प्लानिंग की थी जिस तरह उन्होंने कन्नड़ फिल्म स्टार राज कुमार को किडनैप किया था. राम गोपाल वर्मा को वीरप्पन से जुड़े एक नज़दीकी सूत्र के जरिए ही इस किडनैपिंग प्लान के बारे में पता चला. राम गोपाल वर्मा ने कहा, 'रिसर्च के बाद वीरप्पन के बारे में जो जानकारियां मिली हैं वे हैरान कर देने वाली हैं और उससे भी ज्यादा हैरानी भरा वह ड्रामा है, जो उसे मारने के लिए प्लान किया गया था.'

विकिंग मीडिया ऐंड एंटरटेनमेंट प्रा. लिमिटेड द्वारा प्रड्यूस यह फिल्म 27 मई को रिलीज हो रही है.

मौल पर ताला

निर्माता निर्देशक प्रकाश झा ‘गंगाजल’ और ‘अपहरण’ जैसी फिल्मों के जरिए बिहार की पृष्ठभूमि पर कई फिल्में बना चुके हैं. चूंकि वे बिहार से हैं, इसलिए फिल्म बनाने के अलावा वे बिहार में कई तरह के बिजनैस में भी इन्वौल्व हैं, जैसे कि पटना में बना उन का पीऐंडएम मौल.

प्रकाश के लिए चिंता करने वाली बात यह कि एक तरफ उन की फिल्मों का कारोबार कुछ खास नहीं हो रहा है और अब उन के मौल पर भी ताला लगने का संकट खड़ा हो गया है. बिहार सरकार ने उस जमीन की लीज रद्द कर दी है, जहां पर झा का मौल बना हुआ है. मौल के अधिकारी आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में जाने पर विचार कर रहे हैं.

प्रयोगधर्मी इम्तियाज अली

डिजिटल मीडिया ने फिल्म विधा में कई बदलाव पैदा किए हैं. जहां पहले बड़े कैमरों और करोड़ों रुपयों के बजट के साथ फिल्में बनती थी, अब निर्माता निर्देशक औनलाइन प्लेटफौर्म पर शौर्ट फिल्में बना रहे हैं. निर्देशक इम्तियाज अली की बनाई एक शौर्ट फिल्म में उन्होंने समाज में महिला सशक्तीकरण और एक औरत के अपनी लाइफ अपने तरीके से जीने की चौइस को बेहतरीन तरीके से बयां किया है.

इम्तियाज का प्रयोग न सिर्फ सस्ता है बल्कि एक बड़ी दर्शक संख्या तक बिना मोटे खर्चे के पहुंच जाता है. कम से कम पैसे डुबोती सरकारी योजनाओं के विज्ञानपनों से तो सस्ता है ही.

कबीर खान का विरोध

फिल्म निर्देशक कबीर खान की ज्यादातर फिल्में राजनीतिक और भारतपाक संबंधों पर आधारित रही हैं. इस वजह से उन की फिल्मों को ले कर पाकिस्तान में मिलीजुली प्रतिक्रिया रही. फिर चाहे वह ‘एक था टाइगर’ के लिए हो या ‘बजरंगी भाईजान’ और ‘फैंटम’ के लिए. हालांकि ‘फैंटम’ में जरूर उन्हें पाकिस्तान में बैन का सामना करना पड़ा था. लेकिन पिछले दिनों जब वे किसी कार्यक्रम में शिरकत करने पाकिस्तान गए तो उन के साथ कराची एअरपोर्ट पर कुछ लोगों ने बदसलूकी की. विरोधस्वरूप उन्हें जूते भी दिखाए गए.

कबीर ने ट्वीट कर उन्होंने कहा कि दोनों देशों के मीडिया को इस मामले को तूल नहीं देना चाहिए.

दरअसल, दोनों देशों के बीच संबंध खराब करने वाले ऐसे ही मुट्ठीभर लोगों को सुर्खियां मिलने से बातों को तूल मिलता है. इस मामले में कबीर की समझदारी प्रशंसात्मक है.

प्रियंका बनाम डोनाल्ड

अमेरिकी चुनावों में राष्ट्रपति पद की मजबूत दावेदारी कर रहे डोनाल्ड ट्रंप अपने कट्टर और मुसलिम विरोधी बयानों के चलते आलोचनाओं का सामना करते रहे हैं. उन्हें अमेरिका व भारत की कई नामचीन हस्तियों के भी गुस्से का शिकार होना पड़ा है. इस कड़ी में अब प्रियंका चोपड़ा का भी नाम जुड़ गया है.

प्रियंका चोपड़ा ने डोनाल्ड ट्रंप पर उन के मुसलिम विरोधी बयान के लिए निशाना साधा है. प्रियंका ने कहा कि उन का मानना है कि कोई भी हर किसी पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता. एक विशेष वर्ग के लोगों को हेय दृष्टि से देखना रूढि़वादी सोच है. प्रियंका की तरह और भी बड़े नामों को डोनाल्ड की इस कट्टर मानसिकता का विरोध करना ही चाहिए.

रबर स्टैंप न बनें

खिलाडि़यों को संसद के दोनों सदनों में विभिन्न दलों द्वारा भेजा जाता रहा है. केंद्र सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति खेल, कला, विज्ञान और समाजसेवा जैसे क्षेत्रों से चुने गए लोगों को राज्यसभा के सदस्य के तौर पर मनोनीत करते हैं.

मोदी सरकार ने पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू और मुक्केबाज मैरी कौम सहित कुल 6 लोगों को संसद पहुंचा दिया. इस से पहले कांग्रेस महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को संसद पहुंचा चुकी है. कांग्रेस ने सचिन का चयन इसलिए किया था क्योंकि महाराष्ट्र में कांग्रेस का जनाधार बढ़े. ठीक वैसे ही भाजपा ने नवजोत सिंह सिद्धू का चयन किया है ताकि पंजाब विधानसभा चुनाव में भाजपा को फायदा मिले.

इतिहास गवाह है कि जितने भी खिलाड़ी संसद तक पहुंचे हैं चाहे वे राज्यसभा में हों या लोकसभा में, किसी ने ऐसा कोई काम नहीं किया है जिसे उन्हें याद रखा जाए. नवजोत सिंह सिद्धू और मैरी कौम से भी यही उम्मीद है क्योंकि इन खिलाडि़यों के पास संसद में आने का न तो समय होता है और न ही वे किसी मुद्दे पर गंभीरता से सोचते हैं.

सचिन तेंदुलकर संसद के सत्र में कितने मौजूद रहते हैं, यह कहने की जरूरत नहीं. सांसद खिलाडि़यों को तब याद रखा जाता जब ये अपने सांसद निधि या खेलों की दशा सुधारने के लिए काम करते, खेलों से जुड़े मुद्दों को उठाते. पर ये तो अपनेअपने राजनीतिक दलों के रबर स्टैंप हैं. केवल यही नहीं राज्यसभा में जितने भी सांसद हैं वे सभी एक तरह से रबर स्टैंप ही तो हैं.

ऐसे में केवल रबर स्टैंप बनना और बनाना लोकतंत्र के लिए अशोभनीय है. पावर का इस्तेमाल जनता की भलाई के लिए होना चाहिए पर देश में विडंबना है कि संसद में घुसने का सब से सरल रास्ता राज्यसभा ही है. यहां या तो चापलूसी से घुस सकते हैं या फिर पैसों के दम पर. हां, कई ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने अपने क्षेत्र में ख्याति प्राप्त की है और वे संसद पहुंचे हैं. मैरी कौम और नवजोत सिंह सिद्धू अपने पद की गरिमा को समझते हुए खेल के मुद्दों को गंभीरता से उठाएं. खेलों की दुर्दशा और उन्हें व्यवसाय बनाने वाले लोगों पर शिकंजा कसें, बेहतर सांसद का दायित्व निभाएं और सक्रियता दिखाएं न कि औरों की तरह रबर स्टैंप बने रहें.

बौलीवुड टू हौलीवुड

अभिनेत्री दीपिका पादुकोण जहां हौलीवुड की बड़ी फिल्म ‘ट्रिपल एक्स’ कर रही हैं वहीं प्रियंका चोपड़ा ‘बेवाच’ में बिजी हैं. अनिल कपूर ‘24’ कर रहे हैं तो निम्रत कौर ‘होमलैंड’ कर के लौटी हैं. इसी तरह अनुपम खेर से ले कर अली फजल तक कई सितारे बौलीवुड से हौलीवुड का टिकट कटा चुके हैं. अब हुमा भी हौलीवुड में एंट्री करने जा रही हैं. ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ फेम हुमा कुरैशी ने एक अंगरेजी फिल्म के लिए औडिशन दिया है और सबकुछ ठीक रहा तो वे बहुत जल्द ही टौम कू्रज के साथ अभिनय करती नजर आ सकती हैं. कहा तो यह भी जा रहा है कि यह औडिशन उन्होंने मशहूर सीरीज फिल्म ‘द ममी’ के लिए दिया है. इस के अलावा हुमा खाली वक्त में दक्षिण भारतीय फिल्मों में भी हाथ आजमा लेती हैं.

आत्मनिर्भर बनें महिलाएं: दीप्ति नवल

अभिनेत्री दीप्ति नवल के अभिनय की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है. स्वभाव से नम्र, हंसमुख, सादगी को समेटे दीप्ति हर बात को सहजता व आत्मविश्वास के साथ कहती हैं.

37 साल से अभिनय के मैदान में जमी दीप्ति ने न केवल अभिनय के बल पर अपनेआप को हर किरदार में साबित किया बल्कि अपने मन के रचनात्मक विचारों को कविता के माध्यम से खूबसूरत अंदाज में कागज के पन्नों पर उतारा भी. वे हर नई चीज सीखने का शौक रखती हैं. उन्हें हर क्रिएटिव वर्क पसंद है, यही वजह है कि उन्होंने फोटोग्राफी और पेंटिंग भी की है.

पंजाब के अमृतसर में जन्मी दीप्ति की प्रारंभिक शिक्षा हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हुई. फिर वे पिता के साथ अमेरिका चली गईं. वहां से स्नातक की डिगरी हासिल की. कालेज के बाद उन्होंने फिल्म मेकिंग सीखी और कुछ ही दिनों बाद भारत वापस आईं और अभिनय के क्षेत्र में कैरियर की शुरुआत की.

श्याम बेनेगल की ‘जुनून’ फिल्म से अभिनय शुरू करने वाली दीप्ति के लिए फिल्मों में कदम रखना आसान नहीं था. बचपन से ही उन्हें अभिनय का शौक था. अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद जब उन्होंने अपने मातापिता के सामने अभिनय करने की इच्छा जाहिर की तो पिता ने समझाया था कि अभिनय केवल एक उम्र तक ही साथ देगा जबकि पेंटिंग जब तक चाहे कर सकती हैं. लेकिन पिता ने हमेशा उन्हें अपने जीवन से जुड़ा फैसला खुद करने की आजादी भी दी थी.

वे कहती हैं, ‘‘जब हम छोटे थे तो पिताजी कहा करते थे कि पूरी उम्र आप को ‘ग्रो’ करते रहना है. काम कभी खत्म नहीं होता. वे टीचर थे और पूरा जीवन इसी पेशे में बिताया. वे हमेशा प्रोत्साहन देते थे. आज भी मैं उन की बताई सीखों पर चलती हूं.’’

कैरियर के शुरुआती दौर में दीप्ति को अभिनय का कोई अनुभव नहीं था. ‘जुनून’ फिल्म में वे केवल 2-3 दृश्यों में दिखीं. उन के अभिनय की वास्तविक शुरुआत फिल्म ‘एक बार फिर’ से हुई जिस के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार भी मिला.

उन्होंने करीब 60 फिल्मों में अभिनय किया है. फिर चाहे वह ‘चश्मेबद्दूर’, ‘मिर्चमसाला’ तथा ‘अनकही’, ‘मैं जिंदा हूं’, ‘कमला’ जैसी फिल्में हों या ‘लीला’, ‘भिंडी बाजार’ में नकारात्मक भूमिका हो, सभी में उन्होंने अपनी अभिनय प्रतिभा का परिचय दिया है. शबाना आजमी, स्मिता पाटिल, मार्क जुबेर, सईद जाफरी जैसे मंझे हुए कलाकारों के बीच उन्होंने अपनी साख जमाई और बाकी हीरोइनों की तरह ही समानान्तर फिल्मों के निर्देशकों की पहली पसंद बन गईं.

अभिनय के अलावा उन्होंने फिल्मों में लेखन, निर्माण और निर्देशन में भी हाथ जमाए. इसी क्रम में महिलाओं पर आधारित टीवी धारावाहिक ‘थोड़ा सा आसमान’ का लेखन और निर्देशन किया. साथ ही, एक यात्रा शो ‘द पाथलैस ट्रैवल्ड’ का निर्माण किया.

इतने सालों में फिल्मों की कहानी में क्या अंतर पाती हैं? पूछे जाने पर वे बताती हैं, ‘‘पहले फिल्में तो बनती थीं पर उन में कुछ कमी नजर आती थी. तकनीक के क्षेत्र में आज बहुत तरक्की हुई है. हम विश्व में अपनी पहचान बना रहे हैं. आज के सिनेमा में ग्लैमर आ गया है जो

70 और 80 के दशक में नहीं था. मैं ने बहुत सी फिल्मों में काम किया लेकिन तकनीक की कमी हमेशा खलती थी. आज विषयवस्तु में कमी आई है. प्रतिभा अगर देखी जाए तो युवा प्रतिभावान हैं. वे अपने अभिनय पर पूरी मेहनत कर स्क्रीन पर परफैक्ट दिखना चाहते हैं. पहले अभिनेत्रियां मोटी होती थीं पर वैसे ही चल जाती थीं. अभिनय पर जोर दिया जाता था. पर अब परफैक्शन पर फोकस है. लुक परफैक्ट होने के साथसाथ ‘स्किल्ड’ होना भी आज की डिमांड है. आज बैंचमार्क ऊपर तक पहुंच चुका है.

‘‘हालांकि मुझे आज भी गुरुदत्त की ब्लैक ऐंड व्हाइट फिल्में पसंद हैं जिन्हें मैं समय मिलने पर देखती हूं. मैं सासबहू वाले धारावाहिक पसंद नहीं करती जो महिलाओं की सोच को नीचे गिराते हैं.’’

दीप्ति नवल आज भी सोचसमझ कर कहानियां चुनती हैं. उन्हें औफर तो कई फिल्मों के आते हैं, पर कहानी प्रेरित नहीं करतीं, वे कहती हैं कि उन्हें ह्यूमन स्टोरी पसंद हैं जिन में संबंधों को अच्छी तरह दिखाया जाए. अभी दीप्ति नवल टीवी धारावाहिक ‘मेरी आवाज ही पहचान है’ में कल्यानी गायकवाड़ की भूमिका में नजर आ रही हैं. वे बताती हैं कि इस धारावाहिक से जुड़ कर वे बहुत खुश हैं. यह एक अर्थपूर्ण विषय है और इस की सीरीज निश्चित है. इसे फिल्मों की तरह फिल्माया जा रहा है. इस की कहानी उन से जुड़ी हुई है. वे और उन  की दीदी भी एकदम ऐसी ही हैं. यह उस घर की कहानी है जिस का संगीत ही सबकुछ है. उन्हें दुख है कि आज संगीत पर तकनीक की दखलंदाजी ज्यादा है. रियल संगीत अब नहीं रहा. इस के अलावा संगीत से शब्द तो वैसे ही चले गए हैं, धुन भी अब गायब हो रही है. आज के गाने किसी के मन को छूते नहीं, सालोंसाल आप इन्हें याद नहीं रख सकते जैसा पहले के गीतों में होता था.

दीप्ति नवल की निजी जिंदगी कभी आसान नहीं थी. उन्होंने पहले फिल्मकार प्रकाश झा के साथ विवाह किया. दोनों ने एक बेटी दिशा को गोद लिया पर बाद में तलाक हो गया. उस के बाद वे पंडित जसराज के बेटे विनोद पंडित के करीब आईं. विवाह भी तय हो गया था लेकिन अचानक विवाह से पहले विनोद का देहांत हो गया. दीप्ति ‘विनोद पंडित चैरिटेबल ट्रस्ट’ चलाती हैं. वे लड़कियों के लिए शिक्षा और मानसिक रूप से बीमार लोगों के बारे में जागरूकता फैलाने का काम कर रही हैं. बेटी के बारे में पूछे जाने पर दीप्ति कहती हैं कि दिशा अब शादी कर रही है और अपने पिता की प्रोडक्शन कंपनी में काम कर रही है.

दीप्ति ने अपने जीवन में हर विधा का काम किया पर उन्हें अभी भी मलाल है कि वे गाना नहीं सीख पाईं. वे हंसते हुए कहती हैं कि उन्होंने चित्रकारी, अभिनय, लेखन सबकुछ किया लेकिन संगीत सीखने का शौक पूरा नहीं कर पाईं. इस के लिए वे खुद को ही जिम्मेदार ठहराती हैं, क्योंकि उन्होंने उस पर ध्यान नहीं दिया. अभी इस धारावाहिक में उन्हें संगीत सीखने का मौका मिल रहा है.

खाली समय में दीप्ति पेंटिंग और कविताएं लिखने का काम करती हैं. वे मरते दम तक क्रिएटिव काम करती रहना चाहती हैं. वे महिलाओं को बताना चाहती हैं कि जब तक महिलाएं पिता, भाई, पति या किसी रिश्ते पर निर्भर रहेंगी, किसी न किसी रूप में प्रताडि़त और शोषित होती रहेंगी. आत्मनिर्भर होना जरूरी है, इस के लिए शिक्षा आवश्यक है. बातचीत के आखिर में वे अपने संदेश में महिलाओं से कहना चाहती हैं कि वे अपनी बेटियों को किसी भी हालत में शिक्षित जरूर करें ताकि उन का जीवन सुखद रहे.

सलमान पर विवाद क्यों

अगस्त महीने में रियो ओलिंपिक की शुरुआत होने वाली है. लेकिन भारत में रियो ओलिंपिक के लिए गुडविल एंबैसडर बौलीवुड स्टार सलमान खान को बनाया गया तो हंगामा खड़ा हो गया. हंगामे को देखते हुए आईओए ने भारतीय शूटर अभिनव बिंद्रा को भी गुडविल एंबैसडर बनाया है. सलमान को ले कर विरोध की आवाज लंदन में कुश्ती में ब्रौंज मैडल जीतने वाले पहलवान योगेश्वर दत्त की तरफ से आई. उन्होंने विरोध में एक नहीं, कई ट्वीट कर डाले. उस के बाद पूर्व एथलीट मिल्खा सिंह भी ट्वीट कर सलमान का विरोध जताते रहे.

इन लोगों की आपत्ति है कि फिल्मस्टार को ओलिंपिक जैसे खेल का ब्रैंड एंबैसडर बनाया जाना ठीक नहीं है. यदि किसी खिलाड़ी को बनाते तो अच्छा रहता.

दरअसल, योगेश्वर दत्त या मिल्खा सिंह खुल कर यह कह नहीं पा रहे हैं कि उन्हें क्यों नहीं ब्रैंड एंबैसडर बनाया. यदि सलमान खान रियो को प्रमोट करेंगे तो इस में बुराई क्या है? सलमान खान अपनेआप में एक ब्रैंड हैं और यदि इंडियन ओलिंपिक एसोसिएशन यानी आईओए ने उन्हें चुना है तो इस में हर्ज की बात इसलिए नहीं है क्योंकि इस में कहीं से न तो खिलाडि़यों को नुकसान है और न ही खेल को. सलमान के लाखों फैंस हैं, वे सुपरस्टार हैं और वे रियो ओलिंपिक से जुड़ेंगे तो इस आयोजन को अच्छी पब्लिसिटी मिलेगी.

इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल को ही देख लीजिए. बौलीवुड सितारों का इस में अहम रोल है. बहुत से ऐसे दर्शक हैं जो शाहरुख खान और प्रीति जिंटा को देखने आते हैं.

एकाध खिलाड़ी ही ऐसे होंगे जिसे विश्वभर में या देशभर में जाना जाता हो. लेकिन सलमान खान को देश के अलावा विदेशों में भी जाना जाता है. ओलिंपिक खेल कई देशों में खेला जाता है और इन देशों में इक्कादुक्का खिलाडि़यों को छोड़ कर भारतीय खिलाडि़यों को शायद ही कोई पहचाने.

योगेश्वर दत्त ट्वीट के जरीए कहते हैं कि देश को पागल मत बनाओ. क्या सलमान खान को ब्रैंड एंबैसडर बना देने से पदक ज्यादा मिलेंगे? यह योगेश्वर की खीझ हो सकती है. पर पदक ज्यादा आएंगे कि नहीं, यह तो पता नहीं लेकिन सलमान जैसे और भी सैलिब्रिटी स्टार इस खेल को प्रमोट करने में जुट जाएंगे तो फर्क जरूर पड़ेगा. यदि ऐसा होता है तो और क्या चाहिए, बाकी तो खिलाडि़यों को करना है.

लुप्त होते मुहावरे

जहां 2 बरतन होते हैं वहां खनखनाहट, घनघनाहट, अटपटाहट और आवाज का आना व होना स्वाभाविक है. परिवार में जहां प्रेम है, प्यार है, अपनत्व है, वहां तिरस्कार और दुश्मनी भी है पर फिर भी आपस में वार्त्तालाप, बातचीत, उठनाबैठना, रिश्तेनाते भी बने रहते हैं. एकदूसरे से बदला लेना, कटाक्ष करना, व्यंग्य करना, चुहलबाजी करना,चिढ़ाना आदि प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से होते ही रहते हैं.

कभीकभी समस्या आती है कि हम मुंह पर किसी के सामने प्रत्यक्ष रूप से कटाक्ष, बुराई, चुहलबाजी आदि नहीं कर सकते. हम सहारा लेते हैं ऐसे किसी परोक्ष तरीके का जिस से सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. किसी भी बात को सीधे तरीके से न कह कर घुमाफिरा कर करना या कहना, किसी की ओर इशारा किसी और की तरफ बात को कह कर वातावरण के माहौल को बदल कर रख देना ही मुहावरा कहलाता है.

मुहावरों की धार बड़ी तेज होती है. यह तेज धार दोधारी तलवार जैसी होती है. कभीकभी किसी परिस्थिति में प्रयोग किया मुहावरा चुहल के बजाय वैमनस्य भी पैदा कर देता है और फिर पासा उलटा पड़ जाता है. सो, इन का प्रयोग बड़ी समझबूझ और सतर्कता से किया जाता है. मुहावरों के उपयोग और उन के प्रकार को चुनने के लिए जरूरी है कि आप माहौल को पहचानें. वे आप के स्वभाव से, आप के रुतबे से, आप के सम्मान से, आप के पद से कितना जुड़े हैं और आप उन के कितने करीब हैं क्योंकि आप की उन के साथ आत्मीयता आदि बहुतकुछ काम का होता है.

उचित समय, माहौल और उचित तरीके से उपयोग किया गया मुहावरा सटीक, प्रभावी व माहौल को बिना बिगाड़े काम कर जाता है, जैसे ‘कंगाली में आटा गीला’ अर्थात जब साधन न हों तब किसी चीज का कम पड़ जाना.

समय और परिस्थितियां, माहौल, आदमी की व्यस्तता, परिवार का ढांचा आदि बदलने से मुहावरे कहने की प्रथा एवं इन का प्रयोग धीरेधीरे समाप्त होता जा रहा है. परिवार में सासबहू, ननदभौजाई, कार्यालय में बौस तथा कर्मचारी के बीच, चौपाल में मस्तीभरे वातावरण में, लोगों के जमाव आदि अवसरों पर मुहावरों का प्रयोग गमगीन तथा संगीन वातावरण को हंसीठहाके में बदल कर हलकाफुलका बना देता था. आजकल ऐसे अवसर बहुत कम ही आते हैं.

मुहावरे बनते आए हैं. हमारे पूर्वज भी मुहावरों का प्रयोग करते रहे हैं. मनुष्य एवं प्रकृति का अभिन्न संबंध है. पशुपक्षी, जल, वायु, पर्वत, नदियां आदि प्रकृति के मुख्य घटक हैं. इन घटकों का अपना महत्त्व एवं विशेषताएं हैं. मुहावरे बनाने में इन का महत्त्वपूर्ण उपयोग किया जाता है. मुहावरे बनने में प्रकृति के हर अंग का योगदान होना प्रतीत होता है.

मनुष्य के शरीर के विभिन्न अंगों के नाम तथा पशुओं के नाम व उन की कुछ विशिष्ट आदतों को आधार बना कर कई मुहावरे रोजमर्रा के उपयोग में आते रहे हैं, जैसे ‘बाल की खाल’, ‘आंखों की किरकिरी’, ‘आंख का तारा’, ‘नाक ऊंची होना’, ‘टेढ़ी उंगली से घी निकालना’, ‘पांचों उंगलियां घी में’, ‘पूत के पांव पालने में’ आदि. भावभंगिमा और इशारों से भी तीर निशाने पर लग जाता है. चेहरे की भावभंगिमा से घृणा, प्यार, आंख की चमक, चेहरे का लाल होना, नाकभौंह सिकोड़ना, मुंह बिचकाना आदि के द्वारा मन के अंदर उठते भावों को चेहरे पर ला कर व्यक्त करने की कला किसीकिसी को ही आती है.

कुछ निराली छटा वाले मुहावरे काफी प्रचलित थे. ‘आंख का अंधा नाम नैनसुख’, ‘जहां चाह वहां राह’, ‘बंद मुट्ठी लाख की’, ‘देर आए दुरुस्त आए’, ‘सूपा बोले तो बोले छलनी बोले जिस में 72 छेद’, ‘डूबते को तिनके का सहारा’ आदि अकसर उपयोग में आते रहते थे. ये अपनी तीखी प्रकृति के कारण तीखा वार कर अपनी क्षमता का प्रदर्शन करते थे.‘बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे’ काफी प्रचलित एवं अकसर प्रयोग में लाया जाता था जिस का मतलब है किसी साहस के काम को करने के लिए हिम्मत और धैर्य की आवश्यकता है. ऐसे ही ‘शेर के मुंह में हाथ डालना’, ‘सांप को दूध पिलाना’, ‘अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम’, ये मुहावरे सांप और उस की प्रकृति से जुड़े हैं. अजगर किसी की नौकरी नहीं करता और पंछी काम नहीं करता जिस का सीधा सा अर्थ है कामचोरी करने वाला व्यक्ति इसी श्रेणी में आता है. ‘हाथ कंगन को आरसी क्या’, ‘एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है’ आदि मुहावरे आज भी काफी प्रचलित हैं.

मुहावरों के साथसाथ कुछ शिक्षाप्रद, कटाक्ष वाले, उपहास पैदा करने वाले, संजीदा वातावरण को हलकाफुलका करने वाले दोहों, छंदों, क्षणिकाओं आदि का भी प्रयोग होता था. समयसमय पर संतों, कवियों, समाजसुधारकों आदि द्वारा लिखे गए दोहे, कविताएं, चौपाइयां भी दोधारी तलवार की तरह काम करते थे. ‘बड़ा हुआ तो क्या हुआ…’, ‘काज परे कछु और है, काज परे कछु और…’ ‘खीरा को मुंह काट के…’, ‘मांगन मरण समान है…’, ‘आधी छोड़ सारी को धावे…’, ‘एैरन की चोरी करे…’ आदि सभी मुहावरों के महत्त्व, उपयोगिता एवं अनिवार्यता को उजागर करते हैं. कार्यालयों में संजीदगी के वातावरण तथा औपचारिकता के कारण इन मुहावरों का उपयोग नहीं होता पर फिर भी सहकर्मी मौके के अनुसार इन के चटखारे ले ही लेते हैं.

शादी, त्योहार, जन्मदिन आदि अवसरों पर जब घरपरिवार के संबंधी, मित्र आदि मिलते हैं तो माहौल में चुहुलपुहुल, हंसीमजाक, ताने मारना, कटाक्ष करना आदि मुहावरों के प्रयोग का एक स्वाभाविक वातावरण निर्माण करता है. जैसे, ‘बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से खाए’, इस का अर्थ है कि जो अच्छा काम, अच्छे कर्म या भलाई नहीं करता उसे बुरा फल भोगना पड़ता है. ‘बहती गंगा में हाथ धोना’ एक दूसरा बड़ा ही सटीक मुहावरा है जिस का मतलब है जब मौका हो तो उस का फायदा उठाओ, चूको मत. ‘ऊंची दुकान का फीका पकवान’ या ‘अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना’ अर्थात अपनी तारीफ, अपनी महानता, शानोशौकत और धनदौलत का बढ़ाचढ़ा कर स्वयं ही बखान करना या ढिंढोरा पीटना. बड़े समूह में बातेंबातों में इन का उपयोग बिना किसी को चोट पहुंचाए या दिल दुखाए किया जा सकता है. ‘नौ नकद न तेरा उधार’, ‘मुंह में राम बगल में छुरी’, ‘दूध का जला छाछ को भी फूंकफूंक कर पीता है’ आदि कुछ अत्यंत ही प्रभावी, रोचक एवं समयसमय पर उपयोग किए जाने वाले प्रचलित मुहावरे हैं. ‘जो गरजते हैं वो बरसते नहीं हैं’ इस का सीधा सा मतलब है जो ज्यादा बोलते हैं या धमकियां देते हैं वे वास्तव में कुछ भी नहीं कर सकते. डींगे मारने वाले इसी श्रेणी में आते हैं.

एक और काफी प्रचलित मुहावरा हुआ करता था ‘दान की बछिया के दांत नहीं गिने जाते.’ यह काफी व्यंग्यभरा मुहावरा है. कोई चीज आप को मुफ्त, उपहार, दान या लौटरी आदि के द्वारा हासिल होती है और वह चीज जब बाद में बिना किसी काम की, निम्नगुण या टूटीफूटी साबित होती है तो उस अवसर पर यह मुहावरा बिलकुल सटीक बैठता था.‘नेकी कर दरिया में डाल’, ‘जल में रह कर मगर से बैर नहीं करते’, ये दोनों मुहावरे काफी चलन में रहे. ये उचित परिस्थितियों में तीर की तरह लगते हैं. घर में मियांबीवी की तकरार में पति अकसर पत्नी से कह देता है, ‘पानी में रह कर मगर से बैर नहीं कर सकता.’

बीतते समय के साथसाथ आज हम देखते हैं कि इन मुहावरों का उपयोग यदाकदा ही होता है. परिवार के सदस्यों के दिल में समाई संकीर्णता, परिवार की टूटन, मेलजोल का न होना आदि इन मुहावरों के उपयोग के लिए प्रभावी वातावरण का निर्माण नहीं करते. मुहावरों को जीवित रखने के लिए उन्मुक्त हृदय और हंसीठहाकों से भरा माहौल, मलाल रहित दिल अब कहां मिलते हैं.

काश, ये लुप्त होते मुहावरे एक बार फिर आ कर हमारे जीवन में स्वस्थ व्यंग्य एवं कटाक्ष का रंग घोल दें और घर, बाहर, औफिस आदि में होने वाले तनाव से मुक्ति दिलाएं.  

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