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ऐश्वर्या और निर्माताओं ने किया ‘सरबजीत’ का उपयोग

कुछ दिन पहले एक खास बातचीत के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोहरत बटोर रही अदाकारा रिचा चड्ढा ने बौलीवुड से जुड़े लोगों की फितरत बताते हुए कहा था-‘‘बॉलीवुड में हर कोई फिल्म को प्रमोट करने, फिल्म को सफल बनाने के लिए एक दूसरे का इस्तेमाल करते हैं. यहां लोग अपने फायदे के लिए ही दुनिया भर के रिश्ते बना लेते हैं. वह अपने रिश्ते को यूज भी करते हैं.’’ उस वक्त उनकी बातें सुनकर हमें लगा था कि बौलीवुड के कुछ बड़े लोगों से रिचा चड्ढा नाराज होंगी. मगर अब जो सच सामन आया है, उससे यह बात साफ हो गयी कि रिचा चड्ढा बौलीवुड को कितनी अच्छी तरह से समझने लगी हैं.

वास्तव में 11 मई से 22 मई के बीच फ्रांस में संपन्न अति सम्मानित ‘‘कॉन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’’ के दौरान वहां पर 15 मई को ऐश्वर्या राय बच्चन की मौजूदगी में फिल्म ‘‘सरबजीत’’ का वर्ल्ड प्रीमियर किया गया था. फिल्म के निर्माता व ऐश्वर्या राय बच्चन की तरफ से प्रचारित किया गया कि कॉन फिल्म फेस्टिवल में ‘सरबजीत’ का वर्ल्ड प्रीमियर संपन्न हुआ. इस अवसर पर फिल्म ‘सरबजीत’ में शीर्ष भूमिका निभाने वाले अभिनेता रणदीप हुड्डा नहीं पहुंचे थे. इस बात को लेकर रणदीप हुड्डा की काफी आलोचना की जा रही थी.

लेकिन अब ‘कॉन फिल्म फेस्टिवल’ से जो सनसनीखेज सच सामने आया है वह साबित करता है कि बौलीवुड के लोग अपने फायदे के लिए क्या नहीं कर सकते. सूत्रों के अनुसार फिल्म ‘‘सरबजीत’’ किसी भी तरह से ‘कॉन फिल्म फेस्टिवल’ का हिस्सा नहीं थी. सूत्रों का दावा है कि इस फिल्म को वहां प्रदर्शित करने के लिए ‘कॉन फिल्म फेस्टिवल’ के आयोजकों ने निमंत्रित ही नहीं किया था और न ही यह फिल्म ‘कॉन फिलम समारोह’ के किसी खंड का हिस्सा थी. जबकि अनुराग कश्यप की फल्म ‘‘रामन राघव 2.0’’ ‘कॉन फिल्म फेस्टिवल’ के ‘डायरेक्टर्स फोर्टनाइट’ सेक्शन का हिस्सा थी और इसका भी वहां पर प्रीमियर हुआ था.

मगर कई वर्षो की भांति इस वर्ष भी ऐश्वर्या राय बच्चन एक अंतरराष्ट्रीय ब्यूटी क्रीम की ब्रांड अम्बेसडर की हैसियत से कॉन फिल्म फेस्टिवल में रेड कारपेट पर चली थी. सूत्रों का दावा है कि ‘कॉन फिल्म फेस्टिवल’ में मौजूदगी का फायदा उठाने और फिल्म को विश्व स्तर पर मार्केट व प्रमोट करने की योजना के तहत निर्माता अपने खर्च पर फ्रांस गए और वहां नजदीक के एक थिएटर में विश्व के कुछ निर्माताओं व वितरकों के लिए ‘सरबजीत’ का खास शो आयोजित किया था. उधर रणदीप के करीबी सूत्रों का दावा है कि और रणदीप हुड्डा महंगे कपड़े पहनकर शो पीस की तरह फोटो खिंचवाने में यकीन नहीं करते.

‘‘सरबजीत’’ के ‘कॉन फिल्म फेस्टिवल’ का हिस्सा न होने का सच सामने आते ही अब रणदीप हुड्डा ने भी अपनी चुप्पी तोड़ दी है. रणदीप हुड्डा ने कहा है -‘‘सभी को पता है कि अप्रैल माह में मेरा अपेंडिक्स का आपरेशन हुआ था. ऐसे में मैं रिस्क नहीं उठाना चाहता. मुझे डाक्टरों ने यात्रा करने के लिए मना किया था. दूसरी बात वहां जाना मेरे लिए कोई फायदे वाली बात नहीं थी. हम या हमारी फिल्म को ‘कॉन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ में निमंत्रित नहीं किया गया था. हमारी फिल्म प्रतियोगिता खंड का हिस्सा भी नहीं थी. ऐसे में बेवजह वहां घूमने जाने का कोई औचित्य मेरी समझ में नहीं आया.’’

दृढ़ इच्छाशक्ति आगे बढ़ने के लिए जरूरी

संसार में 2 तरह के लोगों के बारे में ही ज्यादा कहा और लिखा गया है. पहले वे लोग हैं, जो सोचते जाते हैं और काम करते जाते हैं. वे अपना काम समय से पहले खत्म कर लेते हैं. दूसरे वे लोग हैं जो पहले सोचते हैं और फिर करते हैं. ऐसे व्यक्ति अपना कार्य ठीक प्रकार से कर तो लेते हैं, लेकिन उन्हें अधिक सफल नहीं कहा जा सकता. कुछ लोग हैं जो न तो सोचते हैं और न ही कुछ करते हैं. हमेशा अकर्मण्य ही बने रहते हैं. उन का जीवन दूसरों पर निर्भर रहता है. आखिर में वे अस्तित्व की लड़ाई हार जाते हैं और सारा दोष दूसरों पर मढ़ देते हैं. यह वास्तविकता है जो सोच नहीं सकता, वह कुछ कर भी नहीं पाता, क्योंकि कुछ करने के लिए सब से पहले विचार की आवश्यकता होती है. बौद्धिक क्षमता तो अन्य बातों को आगे बढ़ाती है. वे सपने भी नहीं देख पाते, क्योंकि सपनोें को देखने से ही विचार उत्पन्न होता है और अंत में विचारों की ही परिणति कृति में होती है.

यदि व्यक्ति ने अपनी विचारशक्ति को मजबूत कर उस का भरपूर उपयोग कर लिया तो वह व्यक्ति उस वस्तु को भी पा लेता है जिस का उस ने विचार पाला था. पश्चिमी और भारतीय दोनों विचारकों ने सोच कर ही कर्म करने की सलाह दी है. भावुकता, अंधानुकरण, अंधविश्वास, पाखंड या कुरीतियों में फंस कर खुद के लिए खतरा न बनें. यह तभी संभव होगा जब हमारी सोच में भौतिकता व नैतिकता का संतुलन हो. तुम कुछ कर सकते हो यह बात व्यक्ति के हृदय व मन से उत्पन्न होती है जो एक आश्चर्यचकित कर देने वाली ऊर्जा लिए हुए होती है. यही शक्ति व्यक्ति को दुविधा से निकाल कर उस के द्वारा कुछ किए जाने की क्षमता को और अधिक मुखर बना देती है.

सोच के साथ दृढ़ संकल्प बहुत जरूरी है. जो लोग जीवन में हार जाते हैं. उन के पीछे परिस्थितियां कम होती हैं और उन की सोच व इच्छाशक्ति में कमी अधिक होती है. जो लोग जीवन में कुछ नहीं कर पाते उन के लिए वे खुद ही जिम्मेदार होते हैं. व्यक्ति के मन में जब कोई सोच या इच्छा होगी तभी तो वह किसी कार्य में जुट पाएगा और तभी कोई प्रभावशाली कार्य भी कर सकेगा. बेमन से किए गए कार्य प्रभावशाली नहीं होते. अत: इस प्रक्रिया में 3 बातें हुईं, सोच, इच्छा, कार्य और प्रभाव. जहां इन बातों का समन्वय होगा वहीं कार्य आगे बढ़ेगा. जब तक इच्छा नहीं होगी, आदमी कार्य के लिए प्रेरित नहीं होगा. कार्य करेगा तो उस पर कुछ प्रभाव तो होगा ही. यह प्रभाव ही उस की सोच व इच्छा को संबल देगा. अत: कार्य के लिए इच्छा पैदा करें.

जब व्यक्ति कार्य करने की इच्छा करे तो उस के पास संकल्प भी हो. सोच और संकल्प के आगे पर्वत भी धराशायी हो जाते हैं. अगर हम अब्राहम लिंकन, स्टैनिल व लाल बहादुर शास्त्री जैसे महापुरुषों के जीवन में झांक कर देखें तो पता चलता है कि वे कितनी गरीबी व परेशानियों का सामना कर के आगे बढ़े. उन की सफलता के पीछे उन की सोच, दृढ़ इच्छाशक्ति व संकल्प ही था. व्यक्ति को किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा शुरू किए गए काम में मिली असफलता को देख कर घबराना नहीं चाहिए. कार्य की प्रकृति से परिणाम निर्धारण अपनेआप हो जाता है. कुछ कार्यों का परिणाम तत्काल प्राप्त हो जाता है, लेकिन कुछ का कुछ समय बाद और कुछ का तो जीवनभर नहीं मिल पाता है.

अत: परिणाम के बारे में चिंतित होने की अधिक आवश्यकता नहीं है, क्योंकि करने वाले को कुछ करना ही सुखद लगता है. व्यक्ति अतीत को बदल नहीं सकता और वर्तमान से बच नहीं सकता. अत: परिस्थितियों व असफलताओं से निराश हो कर सोच छोटी कर लेना निर्बलता है. भविष्य गढ़ना हमारे हाथ में होता है. अत: निराशा से बच कर असफलताओं के कारणों की खोज कर सकने की शक्ति का भरपूर लाभ उठा कर पुन: उस दिशा में सक्रिय हो जाना चाहिए. अविकसित सोच वाला व्यक्ति भाग्य को कोसता है. वह सोच को छोटा मानता है और भाग्य को बड़ा. यहां ऐसे कुछ व्यक्तियों की चर्चा की जा रही है, जिन्होंने अपनी सोच के जरिए रचनात्मक कार्य किए और सफल हुए. यदि हम उन की रचनात्मकता को नजरअंदाज करेंगे तो हम अनेक भावी परिणामों से वंचित रह जाएंगे. उन की सोचजन्य विशेषताओं ने ही उन्हें महान बनाया :

–       पिकासो ने अपनी सोच को विस्तृत आयाम दिया. चित्रकला के क्षेत्र में एक महान कृति का निर्माण उन के स्वप्न में था. उन का स्वप्न विचार बना और उन्होंने वह कर दिखाया जो वे करना चाहते थे. उन्होंने यह कार्य इसलिए नहीं किया कि उन के कार्य को वाहवाही मिलेगी बल्कि कुछ कर गुजरने का भाव था, जिस से उन्हें अपने काम में व्यस्त रहने के कारण दोस्तों के साथ लजीज खाना भी छोड़ना पड़ा था. उन्होंने अपने आराम के पलों को भी अपने कार्य को समर्पित कर दिया.

–       एडिसन प्रकाश बल्ब का आविष्कार करने से पहले 10 हजार बार असफल प्रयोग कर चुके थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. एडिसन ने दिखा दिया कि हमारे मस्तिष्क में हजार विचार आते हैं, लेकिन उन में से कोई एक विचार, जिस के लिए अपनी कोशिश का पूरा इस्तेमाल किया जाए, कुछ कर दिखाने की इच्छा के करीब ला देता है.

–       हैनरी फोर्ड का उदाहरण हमारे सामने है जो हमें यह याद दिलाता है कि आप खुद पर भरोसा किस तरह कर सकते हैं. शुरुआत में लगभग हर व्यक्ति फोर्ड की कार बनाने की सोच पर हंसा था. लेकिन फोर्ड का जवाब था कि यदि मैं ने लोगों की बातें सुनी होतीं, तो मैं एक तेज दौड़ने वाली घोड़ागाड़ी ही बना पाता. फोर्ड की सोच व संकल्प ने उसे उस मुकाम पर पहुंचा दिया जहां हंसी उड़ाने वालों के मुंह पर ताले लग गए. फोर्ड कंपनी आज भी कार निर्माता कंपनियों में अपनी विशेष पहचान बनाए हुए है.

–       हेमिंग्वे का व्यक्तित्व हमें बताता है कि अपने विचार पर कायम रहो. उन से यह भी सीखा जा सकता है कि सोच को फलीभूत करवाने में अनुशासित जीवन की भी आवश्यकता होती है. हेमिंग्वे ने अपनी जिंदगी में हर दिन व हर अवस्था में लिखा. उस दौरान यदि उन्हें किसी ने प्रेरणा दी या हतोत्साहित किया तब भी वे अविचलित रहे.

–       मदर टेरेसा जब भारत आई थीं तब उन के पास सिर्फ 5 रुपए थे. मानवता की सेवा करने की सोच के लिए यह राशि ऊंट के मुंह में जीरे के समान थी. उन की इस सोच की वजह से उन्हें पत्थर भी खाने पड़े, लेकिन उन्होंने सोच लिया था कि वे ऐसा कर सकती हैं. इस असीम इच्छा ने उन्हें धन व सम्मान सबकुछ दिया. वे कुंआरी रहते हुए भी आखिर दुनिया के करोड़ों लोगों की हृदयस्पर्शी मां बन गईं.

यदि कोई सोच महान है, लेकिन कुछ कर सकने के पायदान से लुढ़क गई है तो वह उस व्यक्ति के साथ ही खत्म हो जाती है. दुनिया में बहुत से ऐसे व्यक्ति हैं जिन की सोच बड़ी सुंदर थी पर उसे यथार्थ के धरातल पर लाने में वे कामयाब नहीं हुए. हमारे लिए दुख की बात यह रही कि हम उस सोच से वंचित रह गए जो हमारी सोच को संचित शक्ति प्रदान करती है और लगातार हमें आगे बढ़ते जाने का हौसला उपलब्ध करवाती है.

डेंजर जोन में गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन

क्या गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन वाकई पद मुक्त कर दी जाएंगी या यह अफवाह या फिर एक राजनैतिक अंदाजा भर है. इस पर साफ साफ कोई नहीं बोल पा रहा, जिसकी वजनदार वजहें भी हैं जिनमे से पहली यह है कि भाजपा को हांकने वाले आरएसएस के एक आंतरिक सर्वे की यह रिपोर्ट आम हो चुकी है कि आनंदीबेन के 2 साल के नेतृत्व में गुजरात में भाजपा उम्मीद से कहीं ज्यादा कमजोर हुई है.

हार्दिक पटेल का कामयाब आरक्षण आंदोलन और निकाय चुनावों में भाजपा का लचर प्रदर्शन इसकी पुष्टि भी करते हैं. 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद आनंदी को हटाये जाने की चरचाएं फिर ज़ोर पकड़ रही हैं और इस पर भाजपा आलाकमान की चुप्पी मामले को और रहस्यमय बना रही है. उधर आनंदीबेन की बड़ी परेशानी आरएसएस का सर्वे कम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बेरुखी  ज्यादा है. कहा यह भी जा रहा है कि खुद  मोदी भी उनके काम काज से संतुष्ट नहीं हैं और दूसरे कई नेताओं की तरह वे भी इस बात से सहमत हैं कि गुजरात में अगले साल होने जा रहे विधान सभा चुनावों के लिहाज से मौजूदा हालात पार्टी के माफिक नहीं हैं.

आनंदीबेन को जिन उम्मीदों से मुख्यमंत्री बनाया गया था उन पर वे खरी नहीं उतरी हैं. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और आनंदीबेन के रिश्तों की खटास भी जग जाहिर है, लेकिन मोदी के लिहाज के चलते अमित शाह ने कभी आनंदी के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की और चुप रहते गेंद मोदी के पाले में डाल रखी है कि या तो वे गुजरात चुन लें या फिर आनंदी. नरेंद्र मोदी का धर्मसंकट यह है कि आनंदीबेन को हटाया किस बहाने से जाए, क्योंकि वे थीं तो उनकी ही पसंद. तय है मोदी नहीं चाहते कि आनंदी को कमजोर नेतृत्व या पार्टी की घटती साख के आरोप मढ़ते चलता किया जाए.

ऐसे में आनंदी विरोधी खेमा अति उत्साह में उम्र का फार्मूला सुझा रहा है. आनंदीबेन इस साल नवंबर में 75 साल की हो जाएंगी, लिहाजा उम्र का हवाला देते उन्हे पदमुक्त होने कहा जा सकता है और सम्मान बख्शते किसी राज्य का राज्यपाल बनाया जा सकता है. 22 मई को आनंदीबेन 2 साल का कार्यकाल पूरा कर चुकी हैं और अब रोज उन्हे हटाये जाने की चर्चा किसी न किसी रूप में होती रहती है.

विकास का गुजरात मोडल, जिसे लेकर मोदी ने खूब हल्ला मचाते वाहवाही और वोट बटोरे थे, वह भी इतना धुंधला पड़ गया है कि मोदी ने अपनी सार्वजनिक सभाओं में उसका जिक्र करना बंद सा कर दिया है. आनंदीबेन के मामले में संघ के दबाब में मोदी को सख्त फैसला लेने जल्द  मजबूर होना पड़ सकता है, नहीं तो घाटे का सौदा करने का आरोप अपने सर लेने के लिए उन्हें तैयार रहना चाहिए. गुजरात में आनंदीबेन अपनी जमीन तैयार नहीं कर पाईं, तो यह उनकी कमजोरी है जिसका खामियाजा तो उन्हें कभी न कभी भुगतना ही पड़ेगा.

मनुष्य का सब से बड़ा शत्रु क्रोध

अधिकतर किशोर छोटीछोटी बातों पर क्रोध कर बैठते हैं, भले ही इस से उन्हें नुकसान हो. प्राचीन यूनानी दार्शनिक पैथागोरस का कहना है, ‘क्रोध मूर्खता से शुरू होता है और पश्चात्ताप पर खत्म होता है.’ क्रोध एक पागलपन का नाम है, जिस की लपटों से शिक्षित या अशिक्षित कोई भी व्यक्ति झुलसने से नहीं बच सकता. क्रोध जहां बुद्धि को निगल जाता है, वहीं यह मनुष्य के विवेक को भी नष्ट कर के उसे पशु की श्रेणी में ला खड़ा करता है. कई बार किशोर छोटीछोटी बातों पर अपने भाईबहनों, मातापिता, अध्यापक आदि पर क्रोधित हो जाते हैं. भाईबहन आपस में बिना पूछे एकदूसरे की वस्तु की अदलाबदली करने पर क्रोधित हो कर मारपीट तक कर बैठते हैं.

कुछ किशोर मातापिता द्वारा घर में झाड़ू लगाने, पानी भरने आदि काम के लिए कहे जाने पर क्रोधित हो कर बड़बड़ाने लगते हैं. छात्र द्वारा होमवर्क कर के न लाने, विलंब से विद्यालय पहुंचने का कारण अध्यापक द्वारा पूछने पर छात्र क्रोधित हो जाते हैं. किशोरों के क्रोधित होने के कई अन्य कारण भी हैं, मसलन, निरंतर अभ्यास करने से मस्तिष्क का अधिक थक जाना, बुरी संगति, मादक पदार्थों के सेवन की लत लगना, किसी आवश्यकता की पूर्ति होना, आत्मसम्मान को ठेस पहुंचना, हठी स्वभाव, शारीरिक रूप से अस्वस्थ होना, पारिवारिक उपेक्षा का शिकार होना आदि.

यूनानी इतिहासकार प्लुटार्क का कहना है, ‘क्रोध समझदारी को घर से बाहर निकाल कर दरवाजे पर सिटकिनी लगा देता है.’ इतिहास ऐसे कई उदाहरणों से भरा पड़ा है जिन में क्रोध प्रचंड अग्नि सिद्ध हुआ है. स्तालिन व हिटलर जैसे कई योद्धा क्रोध के कारण ही पराजय के शिकार हुए. क्रोध जब किशोरों के चेतन मन पर हावी हो जाता है तो वह उन के स्वभाव को विद्रोही और चिड़चिड़ा बना देता है. मानसिक कुंठा उन के मन में घर कर जाती है. स्मृति नष्ट हो जाती है. जीवन के प्रति रुचि, उत्साह समाप्त हो जाता है. मुखमंडल की चमक फीकी पड़ जाती है. क्रोध मस्तिष्क के दीपक को बुझा देता है. किशोरों को चाहिए कि वे क्रोध आने पर धैर्य से काम लें. जब क्रोध नम्रता का रूप धारण कर लेता है तो अभिमानी भी सिर झुका लेता है. कहा भी गया है कि जो क्रोध करने से बचता है वह महान विवेक से संपन्न है.

क्रोध मनुष्य की कार्यक्षमता पर विपरीत प्रभाव डालता है जिस से मनुष्य मानसिक तनाव का भी शिकार हो जाता है. इसलिए जहां तक संभव हो क्रोध से दूर ही रहें. यदि क्रोध आ भी जाए तो उस की अभिव्यक्ति शांतिपूर्ण ढंग से की जाए. इस संबंध में दिवंगत राष्ट्रपति जाकिर हुसैन के जीवन की एक घटना उल्लेखनीय है. जब डा. जाकिर हुसैन शिक्षक थे तो प्राय: विद्यार्थियों को जूतों पर पौलिश कर के आने को कहते थे. विद्यार्थी उन की बात को बारबार अनसुना कर दिया करते थे. डा. जाकिर हुसैन इस स्थिति को सहन नहीं कर पाए. एक बार वे खुद पौलिश की डब्बी और ब्रश ले कर क्लासरूम के बाहर बैठ गए और जिन विद्यार्थियों के जूते पौलिश नहीं थे उन पर पौलिश करने लगे.

यह देख सब विद्यार्थी शर्मिंदा हुए तथा दूसरे दिन से वे खुद जूतों पर पौलिश कर के आने लगे. इस प्रकार क्रोध की प्रचंडता को रचनात्मक कार्यों की तरफ मोड़ कर उस से होने वाली हानि से बचा जा सकता है. क्रोध से छुटकारा पाने के कुछ अचूक नुसखे भी हैं. चीन के प्रसिद्ध विचारक कनफ्यूशस ने कहा है कि जब क्रोध आए तो परिणाम पर विचार करो. क्रोध आने पर शांत रहना औषधि का काम करता है. क्रोध आने पर ठंडा पानी पीजिए. उस स्थान को छोड़ दीजिए जहां क्रोध आया है. अन्य विषय पर ध्यान केंद्रित कीजिए. यदि किसी अन्य व्यक्ति के क्रोध पर विजय पानी है तो अपना संतुलन खोने के स्थान पर क्रोध करने वाले व्यक्ति के अच्छे पक्ष की प्रशंसा कीजिए. एक बार एक संत सार्वजनिक सभा में भाषण दे रहे थे. भीड़ में से किसी ने उन्हें अपमानित करने की चेष्टा से उन पर एक चप्पल फेंकी. वह चप्पल संत से टकरा कर मंच पर जा गिरी.

संत के अन्य समर्थक यह देख कर क्रोधित हो उठे. लेकिन संत ने स्थिति को बिगड़ते देख चप्पल उठाई और विनम्रता से भाषण जारी रखते हुए कहा, ‘‘मैं उन्हें धन्यवाद देता हूं जिन्होंने यह चप्पल फेंकी है. मेरा उन से अनुरोध है कि वे दूसरी चप्पल भी फेंक दें तो बड़ी मेहरबानी होगी, क्योंकि चप्पल के बिना मेरे दोनों पांवों में छाले पड़ गए हैं. चप्पल पहन कर मैं पैरों की रक्षा कर सकूंगा.’’ इस से जहां श्रोताओं में उन का मान बढ़ा वहीं वह चप्पल फेंक कर क्रोध जताने वाला भी शर्मिंदा हुआ.

इस प्रकार जीवन में क्रोध पर विजय पा कर जीवन की बगिया को सुंदर व प्रशंसनीय बनाया जा सकता है.

निराशा छोडि़ए, आशा का दामन थामिए

कुछ किशोरों के चेहरे पर हमेशा तनाव, उदासी व निराशा के भाव ही दिखते हैं. कई बार तो यह निराशा उन पर इतनी हावी हो जाती है कि देखते ही लगता है कि रो पड़ेंगे. आखिर ऐसा क्यों होता है  अगर उन से इस का कारण पूछा जाए तो वे खीज कर कहते हैं, ‘क्या करूं मेरे हिस्से में जब उदास रहना ही लिखा है, तो मैं प्रसन्न कैसे रहूं  जिस भी काम में हाथ डालता हूं, असफलता ही मिलती है.’ इतना ही नहीं, निराश व्यक्ति जरा सी भी परेशानी या बाधा आने पर घबरा उठता है और उस के निदान हेतु ज्योतिषियों तथा फकीरों के पास चक्कर काटने लगता है. उसे ऐसा लगने लगता है कि मानो निराशा उस के सिर पर बोझ बन गई हो.

निराश व्यक्ति की व्यथा

निराश व्यक्ति हमेशा भाग्य पर विश्वास करने वाला होता है. लेकिन वह यह नहीं समझता कि व्यक्ति अपने भाग्य का निर्माता स्वयं होता है. निराश व्यक्ति सदैव भाग्य का रोना रोता रहता है. निराशा के चलते वह बहुत जल्द ही अपने बहुमूल्य जीवन को निरर्थक बना लेता है. वह सदैव ज्योतिषियों तथा फकीरों द्वारा बताए गए रास्ते पर चल कर अपने भाग्य के चमत्कार को देखना चाहता है. इस प्रकार हम देखते हैं कि निराशा की मांद में घुस कर व्यक्ति कोई काम नहीं कर सकता, क्योंकि वहां आशा की एक भी किरण नहीं घुस सकती. बड़ेबड़े वैज्ञानिकों, जिन के द्वारा आविष्कृत वस्तुओं को देख कर हम चमत्कृत हो उठते हैं, को अपने आविष्कारों में एक बार में सफलता नहीं मिली. उन्हें असफलताओं को ही अधिक झेलना पड़ा. मगर वे निराश नहीं हुए, अनवरत अपनी साधना में लगे रहे और अंतत: उन्हें सफलता मिली.

आशा जीवन है तो निराशा मृत्यु

आशा के कारण ही हम जीवित हैं, इस में कोई अतिशयोक्ति नहीं. आशा प्रकाश की ज्योति फैलाती है और निराशा अंधकार की. वास्कोडिगामा और कोलंबस आशा के बल पर ही खतरनाक समुद्री यात्रा करते रहे. निराश होना तो वे जानते ही नहीं थे. निराश व्यक्ति को कोई नहीं पूछता. कोई उस की सहायता नहीं करता. निराश व्यक्ति का सभी उपहास उड़ाते हैं. उसे कोई मालिक या अधिकारी काम पर भी नहीं रखता, क्योंकि निराशा के भंवर में पड़ा मनुष्य कोई काम करने योग्य होता ही नहीं है. निराशा एक खतरनाक बीमारी है, जिस व्यक्ति को निराशारूपी यह बीमारी पकड़ लेती है, उसे भीतर ही भीतर यह दीमक की तरह धीरेधीरे खोखला और कमजोर बनाती है. निराशा से ग्रसित व्यक्ति अपने जीवन में कभी सफलता प्राप्त नहीं कर पाता. उसे पगपग पर असफलता ही हाथ लगती है. आखिर आप निराश क्यों हैं  अपने भाग्य को दोष क्यों देते हैं  असल में आप की निराशा का कारण यह है कि आप को अपनी योग्यता पर विश्वास नहीं है. आप पर असफलतारूपी बीमारी ने हमला बोल दिया है और आप उस से हार मान बैठे हैं.

कैसे पाएं मुक्ति

यदि आप निराशा से मुक्ति पाना चाहते हैं, तो आप को न केवल अनवरत कर्म करते रहना होगा, बल्कि जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण भी अपनाना होगा. आप किसी कार्य को करने की दृढ़ प्रतिज्ञा कीजिए और उस पर अमल करने की कोशिश कीजिए, अवश्य आप को सफलता मिलेगी. यदि आप को चिंता सताती है तो उस से घबराएं नहीं बल्कि मुक्ति के लिए दृढ़ निश्चय हो कर जुट जाएं. आप अपने मन को निर्बल न बना कर सबल बनाइए. निराशा से मुक्ति के लिए उस का कारण ढूंढ़ निकालिए, यदि स्वयं नहीं ढूंढ़ सकते तो किसी मनोवैज्ञानिक की सहायता लीजिए. अपनी मानसिक उलझनों को सुलझाना निराशा से बचने का सर्वोत्तम उपाय है.

आप अपने मन में आशा व हिम्मत जैसे उत्साहवर्द्धक भावों को जगाइए, तभी आप अपने लक्ष्यों में सफलता प्राप्त कर निराशा से मुक्ति पा सकेंगे. यदि आप इस बात का दृढ़ संकल्प कर लें कि आशा ही हमारा जीवन है, निराशा से हमारे जीवन का कोई सरोकार नहीं है, तो आप निराशा से छुटकारा पाने में अवश्य सफल होंगे  अतएव निराशा की बात छोडि़ए, भाग्य को कोसना बंद कीजिए, ज्योतिषियों तथा फकीरों के चक्करों में मत पडि़ए. असफलता के विचारों की धाराओं को काट कर फेंक दीजिए और आशा का दामन थामिए. यकीन मानिए, जब आप आशावान बनेंगे तो आप के जीवन के सितार से मनमोहक राग निकलने लगेगा. आप को हर काम में सफलता मिलेगी और आप निराशा से मुक्ति पा खुशहाल जीवन व्यतीत करने लगेंगे.

सैल्फी से बढ़ा सर्जरी का क्रेज

आज के युवा सैल्फी के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं. किसी भी तरह का जोखिम उठाने से नहीं घबराते. बस सैल्फी अच्छी आनी चाहिए ताकि उसे सोशल साइट्स पर अपलोड कर के तारीफ बटोर सकें. मीडिया में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2015 में होठों की सर्जरी का एक नया रिकौर्ड कायम हुआ है. अमेरिका में आकर्षक पाउट के साथ तसवीरें खिंचवाने के लिए लोग होठों की सर्जरी करा रहे हैं. यहां हर 19 मिनट में होंठ की सर्जरी होती है. अमेरिकन सोसाइटी औफ प्लास्टिक सर्जन्स (एएसपीएस) के एक सर्वे से पता चला है कि 2015 में पुरुषों और महिलाओं में 27,499 लिप इम्प्लांट्स हुए हैं जो साल 2000 के मुकाबले 48 प्रतिशत अधिक हैं. अमेरिका में प्लास्टिक सर्जरी कराने वाले लोगों की संख्या सब से ज्यादा है. इस के बाद इस क्षेत्र में ब्राजील का दूसरा और चीन का तीसरा जबकि भारत चौथे स्थान पर है.

क्यों बढ़ रहा है चलन

आजकल लोग सोशल मीडिया की वजह से अपनी खूबसूरती को ले कर कुछ ज्यादा ही कौंशियस हो गए हैं इस ने लोगों के बीच एक प्रतियोगिता खड़ी कर दी है. जी हां, जब वे सोशल साइट्स पर दूसरों की फोटो देखते हैं तो खुद को भी वैसा ही दिखाने की कोशिश करने लगते हैं. आजकल आइब्रो ऊपर कर के और पाउट बना कर फोटो खिंचवाने का ट्रैंड छाया हुआ है. इसी वजह से महिलाएं आकर्षक पाउट लिप पाने के लिए सर्जरी करा रही हैं.

दरअसल होंठ यदि बहुत ज्यादा पतले हों तो हंसते समय दिखाई नहीं देते. कई बार होंठों के शेप सही नहीं होते, ऊपर के बहुत ज्यादा पतले और नीचे के मोटे होते हैं. कभीकभी किसी के होंठ में एक छोटा सा उभार होता है, जो पूरी खूबसूरती बिगाड़ देता है. उम्र बढ़ने के साथ होंठ के किनारे भी लटकने लगते हैं, उन्हें भी सर्जरी से सही किया जा सकता है.

कौनकौन से हैं तरीके

इंजैक्शन में आर्टिफिशियल या प्राकृतिक फिलर भर कर होंठों में इजैक्ट किया जाता है जिस से आप के होंठ उभरे हुए नजर आते हैं लेकिन ऐसा सिर्फ कुछ महीने के लिए ही हो पाता है. यह एक अस्थायी तरीका है. स्थायी परिणाम के लिए इंप्लांट और सर्जरी जैसे विकल्प मौजूद हैं, जिस में बारबार इंजैक्शन के प्रोसैस से नहीं गुजरना पड़ता.

लिप इनहांसमैंट, फैट ट्रांसफर इंजैक्शन: इस में आप के शरीर के जिस हिस्से में फैट ज्यादा होता है वहां से फैट ले कर होंठों में इजैक्ट किया जाता है जिस से होंठ भरे हुए और मोटे नजर आते हैं.

डर्मल ग्राफ्ट सर्जरीः त्वचा की गहरी परत में जा कर वसा ली जाती है जिसे होंठों के किनारे यानी मोस्कोसा के अंदर भर दिया जाता है, जिस से होंठ भरे हुए नजर आते हैं.

लिप इंप्लांटः यह मुंह के अंदर की ओर की जाने वाली सर्जरी है. इस के कई नैचुरल और सिंथेटिक इंप्लांट विकल्प मौजूद हैं.

लिप लिफ्टः यह सर्जरी उन लोगों के लिए उपयुक्त है जिन के लिप लटके हुए या उम्र के प्रभाव के कारण झुके हुए होते हैं.

इन बौलीवुड अभिनेत्रियों ने भी करवाई लिप सर्जरी

अनुष्का शर्माः अनुष्का शर्मा ने जब शाहरुख खान के साथ ‘रब ने बना दी जोड़ी’ फिल्म से अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत की, तब उन का चेहरा नैचुरल था. लेकिन जब 2012 में ‘जब तक है जान’ आई तब इस फिल्म में अनुष्का की एक अलग ही पर्सनाल्टी नजर आई. उन के लिप पहले की तरह पतले नहीं थे, उन में एक उभार आ गया है.

राखी सावंत: सुर्खियों में रही राखी सावंत को सर्जरी क्वीन कहा जाए तो गलत नहीं होगा. खुद को ज्यादा ग्लैमरस दिखाने के लिए कई तरह की सर्जरी करवाई है, उन्हीं में से एक सर्जरी लिप की है.

श्रुति हसनः श्रुति ने भी कौस्मैटिक सर्जरी करवाई है. 2009 में ‘लक’ फिल्म से श्रुति ने बौलीवुड में एंट्री ली थी, लेकिन काफी समय बाद जब 2013 में ‘रमईया वस्तावइया’ में आईं तो उन का पूरा लुक ही चैंज हो गया. श्रुति ने सर्जरी के माध्यम से अपने होंठों को उभारा है.

प्रियंका चोपड़ाः प्रियंका इस बात को स्वीकार नहीं करतीं कि उन्होंने सर्जरी करवाई है, लेकिन उन के लिप झूठ नहीं बोलते हैं. उन के लिप से साफ पता चलता है कि उन्होंने सर्जरी करवाई है.

कैटरीना कैफः बौलीवुड की बार्बी डौल कैटरीना कैफ अपनी खूबसूरती और फिगर के लिए फेमस हैं. कैटरीना ने भी सर्जरी के माध्यम से अपने लिप्स को उभारा. लेकिन कैटरीना ने सब के सामने स्वीकार नहीं किया, पर पतले लिप से पाउट लिप का बदलाव ने सब को बता दिया है कि उन्होंने लिप सर्जरी करवाई है.

गौहर खानः फेमस मौडल व अभिनेत्री गौहर खान ने भी लिप सर्जरी करवाई है, गौहर की सर्जरी के बारे में यह भी कहा जाता है कि वे अपनी सर्जरी से खुश नहीं हैं, उन्हें वह शेप नहीं मिला जो वह पाना चाहती थीं.

कंगना राणावतः कंगना ने पूरे होंठ और स्तन प्रत्यारोपण कराए ताकि वह सुंदर व आकर्षक दिख सकें. हालांकि हर अभिनेत्री की तरह कंगना भी इस सर्जरी से साफ इनकार करती है.

महिलाओं को चाहिए सैल्फी स्माइल

सैल्फी मतलब चेहरे की फोटो, जिस में शरीर का बाकी हिस्सा कम दिखाई देता है ज्यादा चेहरे पर फोकस किया जाता है. इसी वजह से महिलाएं अपनी कमियों को छुपाने के लिए सर्जरी का सहारा ले रही हैं. सर्जरी में होंठ व नाक की सर्जरी, चेहरे के दागधब्बों को ठीक करा रही हैं. यहां तक कि अपने टेड़ेमेड़े दातों को भी सही करा रही हैं.

विराट कोहली: क्रिकेट का हरफनमौला

एकाग्रता, कड़ी मेहनत, अनुशासन, खेल के प्रति समर्पण, सीखने की जबरदस्त ललक और बेहतर करने का जज्बा तथा आक्रामक रवैया, इन सब खूबियों से लबरेज दिल्ली के 26 वर्षीय क्रिकेट खिलाड़ी विराट कोहली आज दुनिया के महान खिलाडि़यों के समकक्ष खड़े हैं. टैस्ट मैच के हों, वनडे या टी-20 के पूर्व दिग्गज खिलाड़ी सभी विराट कोहली के खेल के कायल हैं. वे दिल खोल कर विराट की तारीफ करने में लगे हैं. विराट को क्रिकेट विरासत में नहीं मिला. वे ऐसे इलाके में रहते थे जहां खेल के समुचित साधन उपलब्ध नहीं थे और न ही कोई अच्छा मार्गदर्शक था. 8-10 साल के विराट के अंदर क्रिकेट का जनून पैदा हो गया. उन्होंने साधारण बल्ले और पैड से क्रिकेट की शुरुआत की. हर मांबाप की तरह उन के मातापिता भी बेटे को पढ़ाई में अव्वल देखना चाहते थे, लेकिन बाल हठ के आगे वे विवश हो गए. आखिर उन्होंने विराट को पास के ही क्रिकेट मैदान में भेजना शुरू कर दिया. दुबलेपतले विराट के क्रिकेट प्रेम पर सीनियर्स के व्यंग्य ने उन्हें इस के लिए और प्रेरित किया. मजबूत कदकाठी के लिए विराट जिम जाने लगे. यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है.

खेल कैरियर

दिल्ली के लिए अलगअलग आयुवर्ग टूरनामैंटों में खेलने के बाद विराट कोहली के कैरियर की असल शुरुआत 15 वर्ष की उम्र में पूर्व खिलाड़ी पौली उमरेकर ट्रौफी से हुई. दिल्ली राज्य का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने सब से ज्यादा 172 रन बनाए. तब से हर कोई उन की प्रतिभा का कायल हो गया. अगले सीजन में उन्हें दिल्ली की अगुआई करने का मौका मिला और उन की अगुआई में दिल्ली उपविजेता रही. विराट ने 5 मैचों में 2 शतकों के योगदान से 390 रन बनाए. अगला पड़ाव 2004 की विजय मर्चेंड ट्रौफी था, जिस में उन्होंने 470 रन का स्कोर बनाया. विराट के 251 रनों की सर्वोच्च पारी ने चयनकर्ताओं को काफी प्रभावित किया. यह प्रदर्शन विराट को इंगलैंड जाने वाली अंडर-19 भारतीय टीम के सफर पर ले गया. इस दौरे में वनडे और टैस्ट मैचों में विराट ने बेहतरीन प्रदर्शन किया. इस से 19 साल के विराट के लिए प्रथम श्रेणी क्रिकेट का रास्ता खुल गया. इस दौरान विराट के साथ एक अनहोनी हुई, लेकिन उस ने युवा विराट को विचलित नहीं किया. कर्नाटक के खिलाफ मैच के दौरान विराट को पिता की मौत की खबर मिली. तब वे बल्लेबाजी कर रहे थे. साथियों ने उन्हें फौरन घर वापसी की सलाह दी, लेकिन विराट मैदान में उतरे और 90 रन की शानदार पारी खेली और पिता के अंतिम संस्कार में शामिल हुए. विराट का कहना था कि उन के पिता इस तरह की पारी देखना चाहते थे इसलिए मैं उन्हें निराश नहीं करना चाहता था.  

अंडर-19 विश्वविजेता का सफर

विराट कोहली को प्रथम श्रेणी क्रिकेट में शानदार बल्लेबाजी का तोहफा अंडर-19 विश्वकप में भाग लेने वाली भारतीय टीम की कप्तानी के रूप में मिला. मलयेशिया में आयोजित इस विश्वकप में कोहली ने 5 मैचों में 235 रन बनाए. भारत ने सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड और फाइनल में दक्षिण अफ्रीका को 50 रन से हराया.

इंटरनैशनल कैरियर

2008 की चैंपियंस ट्रौफी में 19 साल के विराट कोहली को भारतीय जर्सी पहनने का गौरव हासिल हुआ. पहले मैच में वे मात्र 12 रन पर आउट हुए. अंडर-19 विश्वकप के कुछ महीने बाद कोहली को एकदिवसीय टीम में जगह मिल गई. श्रीलंका के खिलाफ सीरीज में कोहली ने 54, 37, 25 और 31 रन बनाए. कोहली टीम में बतौर मध्यक्रम के बल्लेबाज चुने गए थे, लेकिन श्रीलंका के खिलाफ जब सचिन तेंदुलकर चोटिल हो गए थे तब उन्हें सलामी बल्लेबाज के रूप में उतारा गया. भारत ने यह सीरीज 3-2 से जीती थी.विराट कोहली 2011 का विश्वकप जीतने वाली टीम के सदस्य थे. वनडे में हाथ आजमाने के बाद चयनकर्ताओं ने विराट को टैस्ट मैचों में खेलने का मौका दिया. वेस्टइंडीज दौरे के पहले किंगस्टन टैस्ट में विराट पहला मैच खेले. तब से ले कर विराट कोहली 41 टैस्ट मैच खेल चुके हैं. साल दर साल विराट का कद बढ़ता ही चला गया. 2012 में विराट वनडे टीम के उपकप्तान चुने गए. इस दौरान 2 बार धौनी की गैरमौजूदगी में उन्होंने टीम की कमान संभाली. वनडे में विराट कोहली का शानदार प्रदर्शन जारी है. उन के नाम सब से तेज 10 शतक और 5 हजार रन बनाने का रिकौर्ड दर्ज है. वे कलेंडर वर्ष में 2 बार 1 हजार रन बनाने का कारनामा कर चुके हैं. इस मेहनत ने विराट को 2012 में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का पुरस्कार दिलाने में अहम भूमिका निभाई. 2013 में कोहली को देश के सर्वश्रेष्ठ खेल पुरस्कार ‘अर्जुन अवार्ड’ से नवाजा जा चुका है. पिछले साल धौनी द्वारा टैस्ट क्रिकेट को अलविदा कहने के बाद विराट कोहली कप्तानी कर रहे हैं.        

टी-20 में जलवा बरकरार

क्रिकेट के सब से छोटे प्रारूप टी-20 में विराट का प्रदर्शन विराट रहा है. वे सब से तेज 1 हजार रन और 16 अर्द्धशतक जमाने वाले दुनिया के इकलौते बल्लेबाज हैं. विश्वकप में 2 बार प्लेयर औफ टूरनामैंट, शीर्ष रैंकिंग, स्कोर बोर्ड पर सब से ज्यादा (777) रन, मैदान पर गजब की चपलता और तेज गेंदबाजी के हुनर ने 5 फुट 9 इंच लंबे इस खिलाड़ी के कद को और ऊंचा कर दिया है. विश्वकप से पहले 7 पारियों में 50 से ज्यादा की औसत ने इस बात के संकेत दे दिए थे कि दनादन क्रिकेट में इस बल्लेबाज की धूम रहेगी. 26 जनवरी को एडिलेट में आस्ट्रेलिया के खिलाफ नाबाद 90 रन की पारी विराट का सर्वोच्च स्कोर है. इस विश्वकप में 5 मैचों में 273 रन, 1 विकेट व 89 रन की नाबाद पारी दुनिया की सब से बेहतरीन बल्लेबाजी की रीढ़ है. महान खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर को विराट अपना आदर्श मानते हैं.

विशेषता

अच्छा करने की भूख विराट की सब से बड़ी विशेषता है. वे मैदान में हर चीज को चुनौती के रूप में देखते हैं और हर मैच में अपना योगदान देना चाहते हैं. कोहली मैच से पहले अच्छी तैयारी करते हैं तथा फिटनैस पर हमेशा ध्यान देते हैं. उन के प्रदर्शन में निरंतरता ने नई इबारत लिखी है. क्रिकेट के किसी भी प्रारूप में शानदार प्रदर्शन, क्लासिकल शौट उन के खेल के अनुपम उदाहरण हैं. उन का तेज फुटवर्क, मिड विकेट और कवर क्षेत्र सब से ज्यादा मजबूत है. उन का पसंदीदा शौट कवर ड्राइव है पर स्पीप खेलना पसंद नहीं. 

टी-20 में विराट कोहली का सफरनामा

शीर्ष रैंकिंग. आस्ट्रेलिया के ओरान फिंच को पछाड़ा. 2014 (319 रन) और 2016 (273 रन) में लगातार 2 बार मैन औफ द सीरीज रहे, जो एक रिकौर्ड है. ताजा संस्करण के 5 मैचों में 136 की औसत. 3 अर्द्ध्शतक. 3 नाबाद पारियां. 29 चौके और 5 छक्के जमाए. आस्ट्रेलिया और पाकिस्तान के खिलाफ ऐतिहासिक पारियां खेलीं. आस्ट्रेलिया के खिलाफ 5 कवर ड्राइव लगा कर उसे टूरनामैंट से बाहर किया. सेमीफाइनल में वेस्टइंडीज के खिलाफ नाबाद 89 (47 गेंद) रन बना कर अपना काम किया, लेकिन साथियों की भूल भारी पड़ी. विराट की सारी मेहनत पर पानी फिर गया. कोहली शुरू से ही प्लेयर औफ टूरनामैंट की होड़ में सब से आगे थे, इस बार पिछला रिकौर्ड तोड़ने का मौका मिला, लेकिन सेमीफाइनल में बाहर होने के कारण चूक गए.   

विदेशी प्रशंसक

हाल ही में पाकिस्तानी मौडल कंदील बलोच विराट की दीवानी हो गई और उस ने अपने प्यार का इजहार भी किया. इस से पहले पाकिस्तान के एक युवा प्रशंसक ने कोहली की आस्ट्रेलिया में खेली गई शानदार पारी के बाद अपने देश में तिरंगा फहरा कर अपनी खुशी व्यक्त की थी. इस कारण उसे जेल की सजा भी हुई. विराट फुटबौल और टैनिस के भी दीवाने हैं. वे इन खेलों की फ्रैंचाइजी टीमों  के सहमालिक भी हैं. आस्ट्रेलिया के सलामी विस्फोटक बल्लेबाज डेविड वार्नर भी कोहली के फैन हैं. महान खिलाड़ी विवियन रिचर्ड्स भी कहते हैं कि विराट भले ही कद में छोटे हैं, लेकिन आत्मविश्वास के मामले में उन का कद बहुत ऊंचा है. मुझे उन का आक्रामक अंदाज पसंद है. उन का कैरियर बहुत लंबा है.

ब्रैंड ऐंबैसेडर

विराट कोहली आज 11 ब्रैंडों से जुड़े हैं. गरीब बच्चों की मदद के लिए उन्होंने 2013 में चैरिटी फाउंडेशन बनाया. आमतौर पर मध्यक्रम के बल्लेबाज हैं, लेकिन कई मौकों पर सलामी बल्लेबाज की भूमिका निभा चुके हैं.                      

मील का पत्थर

टैस्ट – 41 मैच, 2,994 रन, 11 शतक, 12 अर्द्धशतक, 169 सर्वोच्च, 36 कैच.

एकदिवसीय-171 मैच, 7,212 रन, 25 शतक, 36 अर्द्धशतक, 183 सर्वोच्च 83 कैच.

टी-20 – 43 मैच, 1,641 रन नाबाद, 90 सर्वोच्च, 16 अर्द्धशतक, 5 विकेट, 20 कैच.

आईपीएल – 123 मैच, 3,137 रन, 99 सर्वोच्च, 19 अर्द्धशतक.

टैस्ट में पदार्पण – 20 जून, 2011 वेस्टइंडीज (19वर्ष).

अंतिम टैस्ट – 3 दिसंबर, 2015 को दक्षिण अफ्रीका में.

एकदिवसीय में पदार्पण – 23 जनवरी, 2008 को दक्षिण अफ्रीका में.

वनडे जर्सी नंबर – 18.

टी-20 में पदार्पण – 12 जून, 2010 को जिंबाब्वे में.

अंतिम टी-20 – 31 मार्च, 2016 को वेस्टइंडीज में.

3 टैस्ट मैचों में लगातार 3 शतक लगाने वाले पहले कप्तान.

मेहनत के बल पर आगे बढ़ सकते हैं: खली

अस्पताल से लौटने के बाद जब खली ने खून का बदला खून से लेने की बात कही, तभी समझ में आ गया था कि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में ‘द ग्रेट खली रिटर्न्स’ सीरीज रोमांचक होने वाली है. लेकिन मुकाबला इतना छोटा रहेगा, यह अंदाजा नहीं था. फरवरी, 2016 में उत्तराखंड में आयोजित इस सीरीज में 3 विदेशी पहलवानों ने खली को धोखे से घायल कर दिया था, जिस के बाद खली को आईसीयू में भरती होना पड़ा था. लेकिन अस्पताल से निकल कर दिलीप सिंह राणा उर्फ खली ने हिसाब चुकता कर दिया. खली ने सिर्फ 2 मिनट में पहलवान स्टील, अपोलो और नोक्स को धूल चटा दी और खिताब अपने नाम कर लिया.

हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर से निकल कर दुनिया में भारत का सिर ऊंचा करने वाले पहलवान खली का असली नाम दिलीप सिंह राणा है. कुश्ती के अलावा बौलीवुड और हौलीवुड फिल्मों व बिगबौस जैसे टीवी कार्यक्रमों में शिरकत करने वाले खली से इस मुकाबले से पहले बात हुई. खली इन दिनों देश में अपने जैसे सैकड़ों खली तैयार करने के काम में लगे हैं. इस के लिए खली ने पंजाब के जालंधर में ट्रेनिंग एकेडमी शुरू की है. पेश हैं, 60 इंच के सीने और 7 फुट से अधिक लंबाई वाले द ग्रेट खली से बातचीत के खास अंश :

सब से पहले अपने बचपन के बारे में बताइए

मेरा बचपन काफी अभावों में बीता. परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि मैं पढ़ाई कर पाता. मुझे वजन उठाने में मुश्किल नहीं होती थी इसलिए पहले अपने गांव में और बाद में शिमला आ कर मैं ने यही काम किया. कई बार मुझ पर लोग हंसते थे. शायद वे मेरा सामान्य से ज्यादा बड़ा आकार देख कर मुझ पर हंसते थे. मैं जहां भी जाता, लोग मुझे अजीबोगरीब नजरों से देखते हुए इकट्ठे हो जाते, लेकिन मैं कभी किसी को कुछ नहीं कहता और वहां से आगे बढ़ जाता. मुझे जितने पैसे मिलते थे, उस में मुश्किल से खाने का इंतजाम हो पाता था. मैं घर के लिए कहां से बचाता, लेकिन मैं ने हिम्मत कभी नहीं हारी. न जाने ऐसा क्या था जो मेरे अंदर की हिम्मत को मरने नहीं देता था.

आप खली बनने की राह में कैसे आगे बढ़े

शिमला में मुझे एक बार पंजाब पुलिस के एक अधिकारी ने देखा तो पुलिस में भरती होने की सलाह दी. पुलिस में भरती होने के बाद मैं ने अपनी फिटनैस पर ध्यान देना शुरू किया. लेकिन मुझे लक्ष्य अभी तक नहीं मिला था. मैं जानता था कि भविष्य में कुछ बड़ा करना है. मैं ने 1998 में एक छोटा सा ब्लैक ऐंड व्हाइट टीवी खरीदा, जिस पर पहली बार पेशेवर कुश्ती देखी. मुझे टीवी पर रेस्लिंग देख कर लगा कि यह काम तो मैं भी कर सकता हूं. बस, मैं भी अमेरिका पहुंच गया. लेकिन डब्लूडब्लूई में मेरा टिकना आसान नहीं था. वहां पैसा तो बेशुमार था, लेकिन खूब पसीना बहाना पड़ता था. अच्छी बात यह थी कि पसीना बहाने के लिए मैं ने खुद को बचपन से ही तैयार कर रखा था. पहले दिन जैसे ही मैं ने रिंग में कदम रखा मुझे देख कर बड़ेबड़े रेस्लर कांपने लगे. जिस दिन मैं ने अंडरटेकर को 10 मिनट में हराया, दुनियाभर में मेरा नाम हो गया. बिग शो, मार्क हेनरी और बतिस्ता जैसे पहलवानों को हरा कर आखिरकार मैं ने डब्लूडब्लूई का खिताब जीता. भारत के लिए यह बिलकुल नया था. 2007 के अंत और 2008 की शुरुआत में देशविदेश में मेरी चर्चा होने लगी. मुझे अपने देश का नाम ऊंचा करते हुए गौरव का एहसास हुआ.

लेकिन दलीप सिंह राणा का नाम खली कैसे पड़ गया

डब्लूडब्लूई में नाम कुश्ती और मनोरंजन के हिसाब से रखना पड़ता है. ऐसा नाम जो ताकत और शौर्य का प्रतीक हो. मुझे नया नाम तलाशने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ी. किसी ने जायंट सिंह रखने को कहा तो किसी ने भीम. तरहतरह के नाम सुझाए गए. मैं ने खुद काली नाम सुझाया. यह नाम सब को बहुत पसंद आया. लेकिन विदेशी लोगों ने ‘क’ को ‘ख’ बोलना शुरू  कर दिया और धीरेधीरे सब काली को खली कहने लगे.

आप हमारे पाठकों से क्या कहना चाहेंगे

जरूरी नहीं कि हर कोई खली बने, लेकिन आप मेहनत कर के किसी भी फील्ड में बहुत आगे जा सकते हैं. लगातार अभ्यास कर के किसी भी काम में सब को पीछे छोड़ा जा सकता है. आजकल बच्चे तंबाकू से बने खाद्य पदार्थों की तरफ तेजी से आकृष्ट हो रहे हैं. यह बहुत गंदी चीज है. चाहे कोई कितना भी अच्छा दोस्त हो, अगर गंदी आदतों का शिकार हो तो ऐसे लोगों से दूरी बना कर रखें.                                   

पाठकों के लिए खली के टिप्स

—      कभी किसी बात को ले कर निराश न हों.

—      किसी भी किस्म के नशे से हमेशा दूर रहें.

—      सही हैं तो किसी से न डरें.

—      आप पर कोई हंसे, आप का मजाक उड़ाए तो उसे अपने काम से जवाब दें.

—      मौके का इंतजार करें और काम शुरू करें तो रुकें न

हमारा उद्देश्य जिंदगी को बेहतर बनाना: दिवाकर

‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है,’ यह कहावत एक भारतीय युवा वैज्ञानिक ने अपाहिजों के लिए दिमाग के इशारे पर चलने वाली कुरसी का आविष्कार कर के चरितार्थ की है. इस वैज्ञानिक ने देखा कि देशविदेश में लाखों लोग मस्तिष्क से तो पूर्णतया स्वस्थ हैं पर शारीरिक अपंगता की वजह से चलनेफिरने में अक्षम हैं. क्यों न इन के लिए एक ऐसी व्हीलचेयर बनाई जाए जो मस्तिष्क के इशारे पर चले और उस जगह पर ले जाए जिस के बारे में उन्होंने सोचा है या जहां उन्हें पहुंचना है. इन दिव्यांगों के लिए एक ऐसे साधन की आवश्यकता थी जिस से ये बिना किसी सहारे के अपनी मरजी से आजा सकें, घूमफिर सकें.

लगभग साल भर की कड़ी मशक्कत के बाद दिवाकर वैश्य को अपने लक्ष्य में सफलता मिल गई. इस से आविष्कार की दुनिया में अब एक ऐसी कुरसी शामिल हो गई है जिसे व्यक्ति दिमाग के इशारे पर चला सकता है और सोचे गए स्थान पर आसानी से पहुंच सकता है. इस से शारीरिक रूप से असमर्थ असंख्य लोगों को सहूलत होगी.

यह व्हीलचेयर उन लोगों के लिए ज्यादा उपयोगी है जो बिलकुल भी हिलडुल नहीं सकते. यहां तक कि वे अपना सिर तक नहीं हिला सकते, पर इस चेयर का इस्तेमाल कर अब वे जहां जाना चाहें, आराम से जा सकते हैं. 2 लाख रुपए कीमत वाली यह चेयर जल्दी ही बाजार में उपलब्ध हो जाएगी. दुनिया में पहली बार ऐसी चेयर बनाने का श्रेय दिल्ली के युवा कंप्यूटर वैज्ञानिक दिवाकर वैश्य को जाता है. ए सेट टे्रनिंग ऐंड रिसर्च इंस्टिट्यूट के रिसर्च हैड दिवाकर इस से पहले भारत का पहला डायमैंशनल थ्रीडी प्रिंटेड ह्यूमनोरायड रोबोट बना कर प्रसिद्घ पा चुके हैं.

कैसे काम करती है व्हीलचेयर

यह व्हीलचेयर सैंसर से संचालित है. सैंसर डिस्टेंस, टैंपरेचर, टाइम और वाइब्रेशन को रीड करने के लिए हैं. इस में वे सभी सैंसर लगाए गए हैं जो इंसानी दिमाग सोच सकता है. सैंसर चिप दिव्यांग व्यक्ति के सिर पर लगानी पड़ती है जो कुरसी में लगे सैंसर से सीधी जुड़ी होगी. अब कुरसी पर बैठा दिव्यांग जो सोचेगा, उस के निर्देश के पालन के लिए व्हीलचेयर का सैंसर एक से डेढ़ मिनट तक सैंस करेगा. उस के बाद व्हीलचेयर सोची गई जगह के लिए चलना शुरू कर देगी.

मशीन में ऐसी कोई भी कमांड नहीं है जिस से इसे उपयोग करने वाले को कोई परेशानी हो. इस माइंड कंट्रोल्ड व्हीलचेयर की बैटरी 4 से 5 घंटे में पूरी तरह चार्ज हो कर 3 से 4 दिन तक चलेगी. यह बैटरी कम से कम 3 साल तक काम करेगी. यह मैंटेनैंस फ्री व्हीलचेयर है. व्हीलचेयर लेने वाले को एक सप्ताह का प्रशिक्षण दिया जाएगा. प्रशिक्षण के दौरान उसे इस के संचालन का तरीका बताया जाएगा. इस व्हीलचेयर को बनाने के लिए 40 से 50 लोगों की टीम एक साल से काम कर रही थी. व्हीलचेयर का कौंसैप्ट, प्रोग्रामिंग, मैन्युफैक्चरिंग सभी चीजें भारत में ही तैयार हुई हैं. मशहूर वैज्ञानिक स्टीफंस हौकिंग अपनी व्हीलचेयर को उंगलियों से मूव कर के चलाते हैं लेकिन यह पहली दिमाग से चलने वाली व्हीलचेयर है.

दिवाकर देश के टौप आईआईटी इंस्टिट्यूट्स में गैस्ट लैक्चरर हैं. मस्तिष्क नियंत्रित व्हीलचेयर बनाने के बाद दिवाकर जल्द ही रोबोटिक हाथ ले कर आने वाले हैें. इस के जरिए दिव्यांग लोग नहाने, खाने से ले कर ब्रश करने तक के काम आसानी से कर सकेंगे. प्रस्तुत हैं इस व्हीलचेयर के बारे में दिवाकर से हुई बातचीत के मुख्य अंश :

आप ने पहले माइंड कंट्रोल्ड रोबोट बनाया. अब माइंड कंट्रोल्ड व्हीलचेयर. इस के लिए प्रेरणा कहां से मिली

मैं देखता था कि कुछ लोग शारीरिक रूप से कमजोर हैं. वे देखसुन तो सकते हैं पर चल नहीं सकते. उन का दिमाग तो काम करता है पर दिमाग में जो चल रहा है वह जाहिर नहीं कर पाते. ऐसे में सोचा और फिर 2011 में माइंड कंट्रोल्ड रोबोट बनाया. इस के बाद हम ने सोचा कि माइंड कंट्रोल के माध्यम से क्यों न असमर्थ लोगों के लिए व्हीलचेयर बनाई जाए जो उन के दिमाग के संकेतों के अनुसार चले. 2015 से हम ने इस पर काम करना शुरू किया और नतीजा आप के सामने है.

व्हीलचेयर की तकनीकी जानकारी के बारे में विस्तार से बताइए

हमारा मन लाखों न्यूरौंस से बना है और ये न्यूरौंस निकटवर्ती न्यूरौंस को विद्युतीय प्रतिक्रिया द्वारा हमारे मन की सोच को उजागर करते हैं. विद्युतीय संकेत जोकि विद्युत रासायनिक प्रतिक्रिया द्वारा उत्पादित होते हैं, एक यंत्र ईईजी सैंसर द्वारा महसूस किए जाते हैं. ये विद्युतीय संकेत पहले काफी मात्रा में बढ़ जाते हैं फिर छन जाते हैं. ये संकेत कंप्यूटर में भेजे जाते हैं और कंप्यूटर इन विद्युतीय संकेतों को सार्थक डेटा में बदल देता है. यह देखने में काफी सरल लगता है पर विद्युतीय आवेग एक बहुत ही कठिन काम है, क्योंकि हर किसी का मस्तिष्क एकसमान नहीं होता इसलिए अगर हम एक सामान्य कार्यक्रम बना लें तो यह सब पर काम नहीं कर सकता. हम ने व्हीलचेयर की गुणवत्ता के लिए तरहतरह के सैंसर प्रयोग किए हैं. इस में टैंपरेचर सैंसर, ध्वनि सैंसर, वेट सैंसर, गड्ढों के लिए ऐक्सल रा मीटर व गायरो स्कोप आदि लगे हैं. कुछ सैंसर आसपास के क्षेत्र जैसे सीढि़यां, दीवार, ऊंचीनीची जगह को स्कैन करते हैं. अगर गलत आदेश प्रेषित हो जाए तो कंप्यूटर इस के प्रति उपयोगकर्ता को आगाह करता है और पूर्व स्थिति को बनाए रखता है. व्हीलचेयर पूरी तरह से सुरक्षित है. इस में पावर स्विच भी है जो फाइटर प्लेन में होता है ताकि गलती से व्हीलचेयर चलनी शुरू न हो जाए.

आप ने इस विषय में पढ़ाई की है

मैं ने इस विषय में बीटैक किया है. देश के 9 प्रमुख आईआईटी में गैस्ट लैक्चरर हूं. कई एनआईटी, बीआईटी और बिट्स समेत कई संस्थानों में लैक्चरर हूं. 21 साल की उम्र में मैं ने थ्रीडी रोबोट, मानव बनाया जो विश्व का सब से सस्ता रोबोट है.

व्हीलचेयर बाजार में आ गई है

विधिवत मई में आ जाएगी. अस्पतालों व अन्य संस्थाओं से हमारी बात हो रही है. हम पूरे विश्व की मार्केट को देख रहे हैं. प्रोडक्ट में हर चीज परफैक्ट है. हमारा उद्देश्य है कि उपयोगकर्ता हमारे उत्पाद का भरपूर फायदा उठाए और हम दुनिया को ऐसी टैक्नोलौजी दें जिस से जिंदगी बेहतर और सुगम बने.

टैगोर के उपन्यास पर फिल्म ‘अर्धांगनी-एक अर्ध सत्य’

रवींद्रनाथ टैगोर ने 1914 में एक उपन्यास ‘‘घारे बायरे’’ लिखा था, जिस पर 1984 में इसी नाम से सत्यजीत रे ने एक बंगाली फिल्म का निर्माण किया था. जो कि एक चर्चित फिल्म थी. अब उसी उपन्यास पर हिंदी और बंगाली दो भाषाओं में संगीत प्रधान फिल्म ‘‘अर्धांगनी-एक अर्ध सत्य’’ नामक फिल्म का निर्माण रिचा मुखर्जी ने किया है, जिसमें सुबोध भावे, श्रीलेखा मित्रा, सुब्रत दत्ता, वर्षा उसगांवकर ने अभिनय किया है.

फिल्म की निर्माता व निर्देशक रिचा मुखर्जी कहती हैं-‘‘यह एक ऐसी फिल्म है,जो धीरे धीरे आगे बढ़ती है और लंबे समय तक दर्शकों के दिलों में बसी रहेगी. यह मेरी अति महत्वाकांक्षी फिल्म है’’

ल्म की कहानी की पृष्ठभूमि में अंग्रेज शासकों की वह नीति है, जब वह ‘फूट डालो और राज करो’ नीति पर चल रहे थे. फिल्म में हिंदू मुस्लिम टकराव भी है. तो वहीं उस वक्त का राजनीतिक आंदोलन भी है.

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