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जेल गये बांझपन दूर करने वाले बाबा

बांझपन किसी भी औरत के लिये सबसे वेदना का विषय होता है. इस कारण वह बांझपन दूर करने के लिये हर तरह का समझौता करने को तैयार हो जाती है. कई बार औरतों में बच्चा न होने का कारण पति में कमी का होना होता है पर वह इस बात को मानने के लिये तैयार नहीं होता. ऐसे में औरतें बांझपन दूर करने के लिये ढोंगी बाबाओं का शिकार हो जाती है.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 30 किलोमीटर दूर बाराबंकी जिले में बाबा परमानंद औरतों के बांझपन को दूर करने का काम करते थे. बाबा परमानंद का असल नाम रामशंकर तिवारी था. बाराबंकी जिले के हर्रई गांव में उनका आश्रम है. बाबा के आश्रम में बच्चे पैदा करने की चाहत रखने वाली महिलाओं की लाइन लगी रहती थी. आश्रम में कई राज्यों से महिलाएं आती थीं. दिल्ली, उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बिहार से आने वाली महिलाएं ज्यादा होती थीं.

बाबा के चेले इस बात का प्रचार करते थे कि बाबा के आश्रम में आशीर्वाद पाने और पूजा करवाने वाली सभी महिलाओं को बेटा होता है. बाबा की पूजा देर रात तक चलती रहती थी. इस दौरान कमरे में बाबा और महिला के अलावा कोई नहीं रहता था. पहले बाबा बाराबंकी के स्टेशन रोड पर लोगों की झाड़-फूंक करता था. धीरे धीरे जब उसका प्रचार प्रसार हो गया तो उसने गांव में ही आश्रम बना लिया, कुछ सालों में बाबा के पास अकूत संपत्ति आ गई.

बाबा के दरबार में पुलिस के कई अफसर भी आनेजाने लगे जिससे बाबा का इलाके में रूतबा बढ गया. बाबा के पास कई मोटरसाइकिल, स्कॉर्पियो, मारुति वैन, ऑल्टो, ट्रक, ट्रैक्टर के साथ सीमेंट सरिया की एक दुकान भी बताई जाती है. 1989 से लेकर साल 2008 के बीच बाबा पर तमाम तरह के 9 मुकदमें भी दर्ज हुये. इसके बाद बाबा का कद बढ गया, तो इन मुकदमों से उसका कुछ बिगडा नहीं.

12 मई को बाबा के खिलाफ धोखाधड़ी और आईटी एक्ट (अश्लीलता फैलाने) के तहत केस दर्ज हुआ. बाबा का एक वीडियो भी वायरल हुआ था, जिसमें वह एक महिला का सेक्सुअल हैरेसमेंट करते दिख रहे थे. इसके बाद कई और लोग सामने आए, जिन्होंने बाबा द्वारा ठगे जाने का आरोप लगाया. 16 मई सोमवार को एक महिला ने बाबा के खिलाफ रेप के प्रयास, धोखाधड़ी और मारपीट जैसी धाराओं में केस दर्ज कराया था. इसके बाद बाराबंकी पुलिस ने बाबा को पकडने का प्रयास शुरू किया तो बाबा अपनी गिरफ्तारी के खिलाफ हाईकोर्ट चले गये.

हाईकोर्ट ने बाराबंकी पुलिस को परमानंद की गिरफ्तारी करने से पहले सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन और सीआरपीसी की धारा 41 ए के प्रावधानों का पालन करने के निर्देश दिए थे. कोर्ट में कहा गया था कि इन प्रावधानों के तहत जिन केसों में सजा 7 साल से कम है, उनमें गिरफ्तारी से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि वास्तव में गिरफ्तारी जरूरी है. साथ ही गिरफ्तारी से पहले संबधित ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की परमीशन जरूरी है.

23 मई को बाराबंकी पुलिस ने पाखंडी बाबा राम शंकर तिवारी उर्फ स्वामी परमानंद और उसके ड्राईवर अरविंद पाठक को अरेस्ट कर लिया है. इस दौरान बाबा ने खुद को निर्दोष बताते हुए कहा कि उन्हें साजिश के तहत फंसाया गया है. पुलिस उस वीडियो की जांच कर रही है जिसमें बाबा एक औरत का शोषण करते दिख रहे हैं. बाबा की बात में सच्चाई है या उनके खिलाफ शिकायत करने वालों में यह अदालत तय करेगी. यह जरूर सामने आ गया कि बांझपन दूर करने के लिये आज भी औरतें इस तरह के बाबाओं के झांसे में आ जाती हैं, जिनसे उनके शोषण का रास्ता साफ हो जाता है.

उत्तर प्रदेश में दांव पर केंद्रीय मंत्रियों की साख

वैसे तो भाजपा के लिये उत्तर प्रदेश फतह कोई कठिन काम नहीं होना चाहिये. लोकसभा में उत्तर प्रदेश ने भाजपा को 73 सांसद दिये थे. इस हिसाब से देखे तो भाजपा को उत्तर प्रदेश में 300 से उपर विधानसभा सीटे मिलनी चाहिये. केन्द्र में मोदी सरकार के 2 साल पूरे होने के बाद उत्तर प्रदेश में पार्टी का जनाधार खिसक गया है. अब भाजपा को विधानसभा में बहुमत का आंकडा मुश्किल दिखाई पड़ रहा है.

उत्तर प्रदेश में भाजपा की नैया पार लगाने के लिये मोदी सरकार के केन्द्रीय मंत्रियो को उत्तर प्रदेश में पार्टी के प्रचार का काम सौंपा जा रहा है. पहले चरण में 26 मई से 15 दिन के लिये 45 मंत्री प्रदेश के अलग अलग शहरों में पार्टी प्रचार अभियान चलायेगे. 26 मई को केन्द्र सरकार के 2 साल पूरे हो रहे है. इसको लेकर केन्द्र सरकार और भाजपा संगठन अपने अपने स्तर पर काम कर रहे हैं. मोदी सरकार के प्रचार के बहाने उत्तर प्रदेश में चुनावी अभियान शुरू किया जा रहा है.

असम की जीत के बाद भाजपा खुद को आत्मविश्वास से लबरेज दिखाने की कोशिश कर रही है. असल बात यह है कि भाजपा को खुद पता है कि उत्तर प्रदेश में पार्टी की हालत बेहद खराब है. 73 सांसद देने वाले उत्तर प्रदेश में पार्टी की लोकप्रियता कम हुई है. जिसकी वजह से भाजपा संगठन की नींद उडी हुई है. भाजपा किसी भी हालत में उत्तर प्रदेश फतह करना चाहती है. इसके लिये उसने व्यापक प्रचार अभियान की शुरूआत कर दी है. भाजपा की मुश्किल यह है कि उत्तर प्रदेश के बडे भाजपा नेता खेमेबंदी का शिकार हैं.

पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की यहां के कार्यकर्ताओं से सीधी बात नहीं है. प्रदेश अध्यक्ष चयन को लेकर पार्टी के अंदर का एक धडा निष्क्रिय अवस्था में चला गया है. उत्तर प्रदेश में भाजपा को अगडी जातियों का सबसे अधिक समर्थन हासिल है. इसके बाद भी भाजपा दलित और पिछडों को आगे लाने के लिये जोर लगा रही है. जिससे अगडी जातियों में बेचैनी है.

26 मई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहारनपुर में रैली करेंगे, राजधानी लखनऊ में अरुण जेटली प्रचार की कमान संभाल रहे हैं. सर्राफा कारोबार में टैक्स को लेकर बडी संख्या में सर्राफा कारोबारी अरुण जेटली का विरोध कर रहे हैं. पहले चरण के इस प्रचार अभियान मे भाजपा 29 शहरों में केन्द्र सरकार की 2 साल की उपलब्धियों को बतायेगी. इस काम में केन्द्र के 45 मंत्री लगाये गये हैं. भाजपा 7000 दलित कार्यकर्ताओं के साथ लखनऊ में एक मीटिंग भी करेगी.मं

त्रियों के अलावा उत्तर प्रदेश में प्रभाव रखने वाले दूसरे नेताओं को भी प्रचार अभियान की कमान सौंपी जा रही है. उत्तर प्रदेश में भाजपा के सामने सबसे बडा सवाल राम मंदिर का है. भाजपा इस सवाल से बचना चाहती है. पार्टी संगठन के कुछ नेता इस मुद्दे को फिर से उठाना चाहते हैं. भाजपा को पता है कि जातीय समीकरण में भाजपा के पास न दलित है और न पिछडे, ऐसे में अगर अगडी जातियों ने मुंह मोड लिया, तो चुनाव में लाज बचानी मुश्किल हो जायेगी. लोकसभा चुनाव की तरह भाजपा अगडो का नजरअंदाज कर पिछडों को आगे लाने की योजना बना रही है. अगडी जातियों के खिसकने से भाजपा को उत्तर प्रदेश में बिहार जैसी चुनौतियों से निपटना पडेगा.                 

पंजाब में गेहूं खरीदने के लिए बैंकों से मिलेगा कर्ज

केंद्र सरकार ने पिछले दिनों आंखें तरेरीं कि पंजाब के किसानों को सरकारी गेहूं खरीद के लिए कर्ज नहीं मिलेगा. किसानों की परेशानी को देखते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले और उन्हें अपनी समस्या बताई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समझाने के बाद आखिरकार उन्हें कामयाबी मिल ही गई. भारतीय स्टेट बैंक को कर्ज मुहैया कराने का निर्देश दिया गया है.

पंजाब में गेहूं की सरकारी खरीद के लिए बैंकों के कर्ज देने से हाथ खड़ा कर लेने का मामला अब सुलझा लिया गया है. पिछले दिनों कुछ बैंकों के कर्ज देने से मना क रने के बाद स्थिति खराब होने लगी थी. पंजाब सरकार ने केंद्र सरकार से गेहूं खरीद के लिए 20 हजार करोड़ रुपए की मांग की थी, लेकिन बैंकों के मना कर देने से गंभीर विवाद पैदा हो गया था.

बता दें कि राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. पंजाब के भाजपाअकाली दल के लिए यह समस्या परेशानी का सबब बन सकती थी. मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने नरेंद्र मोदी से मुलाकात की. नतीजतन मामला फौरन सुलझ गया.

भारतीय स्टेट बैंक की अध्यक्षता वाले बैंकों के समूह को रिजर्व बैंक ने पंजाब को खाद्यान्न खरीद के लिए पैसा मुहैया कराने को कहा है. साथ ही राज्य में गेहूं की सरकारी खरीद का रास्ता साफ हो गया है, जबकि बैंक चालू सीजन में विवाद के सुलझने तक कर्ज देने से मना कर चुके थे. उधर सरकार ने इस मामले को सुलझाने के लिए वित्त व खाद्य मंत्रालय, भारतीय स्टेट बैंक समेत दूसरे बैंकों के अधिकारियों व भारतीय खाद्य निगम के अधिकारियों की एक समिति बनाई है. रामविलास पासवान ने कहा कि किसानों के हित में सरकार गेहूं की खरीद करेगी.   

 

 

अब बिना बिजली दूध रहेगा चिल्ड

यह दुनिया की इकलौती ऐसी तकनीक है, जिस में दूध को ठंडा रखने के लिए गोबर के उपले के साथसाथ सूखा गोबर, लकड़ी, बांस, भूसी व घास का इस्तेमाल होता है.

इस तकनीक को नाम दिया गया है ग्रीन चिल. इस में 500 से 1000 लीटर दूध, फलसब्जी, मछली या दूसरी बागबानी की चीजों को महफूज रखा जा सकता है. 

यह एक गैरकंप्रेशर फ्रिज है. ग्रीन चिल को चलाने के लिए न तो बिजली की जरूरत होती है और न ही डीजलपैट्रोल की. यह फ्रिज किसी प्रकार का ध्वनि प्रदूषण या वायु प्रदूषण नहीं करता और इस का रखरखाव  भी बेहद आसान है. इस में किसी प्रकार की गैस नहीं निकलती और यह बहुत कम जगह घेरता है.

इस तकनीक से स्टोर किए हुए दूध को वी2सी बाजार, जेएमडी गलेरिया मार्केट में लगे आजीविका एक्सपीरियंस स्टोर पर मुहैया कराया जाएगा. इस से दूध में चल रही मिलावट से भी लोगों को राहत मिल सकेगी.

यह तकनीक न्यू लीफ  डायनामिक टेक्नोलाजी प्राइवेट लिमिटेड द्वारा तैयार की गई है. इस तकनीक को शुरुआती तौर पर पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया जा रहा है. इस तकनीक की शुरुआत गुड़गांव के मांकड़ौला गांव से की जाएगी. बाद में इसे जिले के सौ दूसरे गांवों में लागू किए जाने की योजना है.

दूध आमतौर पर बहुत जल्दी खराब होने वाली चीज है. जरा ज्यादा गरमी पड़ने पर यह फट जाता हे. जरा सी भी लापरवाही दूध के लिए खतरनाक साबित होती है. ऐसे आलम में बिना बिजली वाली यह तकनीक काफी कारगर रहने की उम्मीद है.                     

 

किरदार की अहमियत देखती हूं, लंबाई नहीं: राधिका आप्टे

पुणे के मशहूर न्यूरोलौजिस्ट मातापिता की बेटी राधिका आप्टे ने पहले थिएटर पर हिंदी व अंगरेजी के नाटकों में अभिनय कर शोहरत बटोरी. फिर मराठी, बंगाली व तेलुगु फिल्मों में अभिनय कर उन्होंने ‘गर्ल नैक्स्ट डोर’ की इमेज बनाई.

इस के बाद एकता कपूर की फिल्म ‘शोर इन द सिटी’ में अभिनय किया. फिर डांस की ट्रेनिंग लेने लंदन चली गईं. वहां उन्होंने संगीतकार बेनेडिक्ट टेलर के साथ शादी कर ली.

2 साल बाद मुंबई लौटीं. फिर से बौलीवुड के साथसाथ क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों में भी अभिनय करने लगीं.

‘बदलापुर’ और ‘हंटर’ व लघु फिल्म ‘अहल्या’ में अति बोल्ड किरदार निभा कर हर किसी को चौंका दिया. फिर केतन मेहता द्वारा निर्देशित फिल्म ‘मांझी: द माउंटेन मैन’ में बिहार के एक अति पिछड़े गांव की लड़की फाल्गुनी का, तो नीला माधव पंडा की फिल्म ‘कौन कितने पानी में’ में ओडिशा के एक गांव की लड़की पारो का किरदार निभा कर लोगों को चौंकाया. पेश हैं, उन से हुई मुलाकात के कुछ खास अंश:

अपने कैरियर को किस तरह से देखती हैं?

मेरा कैरियर बहुत सही आगे बढ़ रहा है. मैं अपने छोटे से कैरियर में काफी अच्छा काम कर चुकी हूं. मैं ने हमेशा किरदार की अहमियत देखी, लंबाई नहीं. मैं ने हर फिल्म में काम करते हुए बहुत कुछ सीखा. गत वर्ष मेरी 5 हिंदी फिल्मों के अलावा 1 बंगला, 1 मलयालम और 1 तमिल फिल्म रिलीज हुई. 2016 में ‘फोबिया’ के अलावा रजनीकांत के साथ मेरी तमिल फिल्म ‘कबाली’ रिलीज होगी.

पिछले साल रिलीज फिल्मों में से ‘कौन कितने पानी में’ तथा ‘मांझी : द माउंटेन मैन’ को बौक्स औफिस पर उतने दर्शक नहीं मिले जितनी उम्मीद थी

‘मांझी : द माउंटेन मैन’ को देशविदेश हर जगह सराहा गया. इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में इसे अवार्ड भी मिले. भारत में थिएटरों में अच्छा रिस्पौंस मिला. फिल्म हिट है. इस की लागत वसूल हो गई है. पर जहां तक फिल्म ‘कौन कितने पानी में’ का सवाल है, तो इसे सफलता नहीं मिली. मैं फिल्म की शूटिंग खत्म होने के बाद उस के बारे में सोचना छोड़ देती हूं. फिल्म की सफलताअसफलता का मुझ पर कोई असर नहीं होता. कई बकवास से बकवास फिल्में भी चल जाती हैं, जबकि कई अच्छी फिल्में नहीं चलतीं.

इसलिए यह कहना बड़ा मुश्किल है कि दर्शक किस फिल्म को क्यों पसंद करेगा  जहां यह तय न हो वहां किसी फिल्म की सफलता या असफलता को ले कर बोलना मुश्किल होता है.

आप सैक्स ऐडिक्ट का किरदार निभाना चाहती हैं, तो ऐसा किरदार मिला या नहीं?

मैं ने ऐसा कभी कुछ नहीं कहा. फिल्म ‘हंटर’ के प्रमोशन हो रहे थे. इस फिल्म का हीरो सैक्ट ऐडिक्ट है तो कुछ पत्रकारों ने मुझ से पूछा कि क्या यदि हीरोइन सैक्स ऐडिक्ट होती तो मैं यह फिल्म करती  तब मैं ने कहा था कि जरूर करती. पर इस का मतलब यह नहीं है कि मुझे सैक्स ऐडिक्ट के किरदार निभाने हैं.

आप अपनेआप को किस तरह की कलाकार मानती हैं?

मैं इस बारे में कुछ नहीं सोचती, क्योंकि मैं अपनेआप को किसी कैटेगरी में नहीं बांधती हूं. मैं खुद को सिर्फ कलाकार मानती हूं. मुझे काम करना पसंद है और काम करने के लिए ही मैं यहां हूं. अब मैं हौट ऐक्ट्रैस हूं या सैक्सी ऐक्ट्रैस या फिर नैक्स्ट डोर गर्ल वाली ऐक्ट्रैस, यह सोचने का काम फिल्म आलोचकों और दर्शकों का है. बहुत जल्दी दर्शक मुझे फिल्म ‘फोबिया’ में एकदम अलग भूमिका में देखेंगे.

मतलब?

पवन कृपलानी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘फोबिया’ में मैं ने अग्रोफोबिया से पीडि़त लड़की का किरदार निभाया है. भारत में अग्रोफोबिया के बारे में लोगों को जानकारी नहीं है. लोगों को क्लोस्ट्रोफोबिया या वर्टिगोफोबिया के बारे में पता है. कुछ लोगों को ऊंचाई पर जाने पर चक्कर आने लगते हैं. ऊंचाई पर जाने के बाद नीचे देखने पर डर लगने लगता है. लेकिन जिसे अग्रोफोबिया होता है, उसे 1 मिनट के लिए भी घर से बाहर नहीं निकाला जा सकता. मेरी एक दोस्त को भी अग्रोफोबिया है. वह पिछले 15 वर्षों से घर से नहीं निकली. उसे देख मुझे बड़ी तकलीफ होती है. यदि दबाव डाल कर उसे घर से निकलने पर मजबूर किया जाए, तो उसे पैनिक अटैक आ जाता है.

आप एकसाथ कई भाषाओं की फिल्में कर रही हैं?

जी, हां. बौलीवुड की मैं एकमात्र ऐसी अदाकारा हूं जो हिंदी, मलयालम, मराठी, बंगला, तमिल, तेलुगु, अंगरेजी सहित 7 भाषाओं में अभिनय कर रही है. मैं ने रितेश देशमुख की मराठी भाषा की सुपरडुपर हिट फिल्म ‘लय भारी’ भी की. मैं अंगरेजी भी बहुत अच्छी बोलती हूं. इसी के चलते मैं अंगरेजी भाषा की इंटरनैशनल फिल्म ‘बांबेरियन’ के अलावा हौलीवुड निर्देशक कल पेन की फिल्म ‘आश्रम’ कर रही हूं, जिस में मेरे अलावा सभी अमेरिकन कलाकार हैं. इसे मनाली में फिल्माया जा रहा है.

क्या वजह है कि आप की तमाम फिल्में कई वर्षों से बनी पड़ी हैं पर रिलीज नहीं हो पा रही हैं?

पिछले वर्ष मेरी कई पुरानी फिल्में रिलीज हुईं. मेरी एक फिल्म ‘बांबेरियन’ भी इस साल के अंत तक रिलीज हो जाएगी.

आप की एक फिल्म पार्च्डभी रिलीज नहीं हो पा रही है?

इस फिल्म की कहानी गुजरात की पृष्ठभूमि पर है. बहुत अच्छी फिल्म बनी है. हाल ही में इस फिल्म को अमेरिकन फिल्म फैस्टिवल में पुरस्कार मिला है. इस के अलावा 20 अप्रैल, 2016 को यह फिल्म फ्रांस में रिलीज हुई. बहुत अच्छा रिस्पौंस है. भारत में यह फिल्म कब रिलीज होगी, कुछ कह नहीं सकती.

रजनीकांत के साथ आप की तमिल फिल्म कबालीकी क्या स्थिति है?

‘कबाली’ रजनी कांत सर के कैरियर की 159वीं फिल्म है, जिस में मैं उन की हीरोइन हूं. यह फिल्म पूरी हो गई है. यह बहुत ही अलग तरह की विषयवस्तु वाली फिल्म है, इस में मैं ने बहुत ही ज्यादा सशक्त और परफौर्मैंस औरिऐंटेड किरदार निभाया है.

भारतीय होते हुए भी आप ने ब्रिटिश संगीतकार बेनेडिक्ट टेलर के साथ शादी की?

मैं मूलतया महाराष्ट्र के पुणे शहर की रहने वाली हूं. पर मेरे मातापिता बहुत ही खुले विचारों के हैं. जब मैं संगीत की उच्च शिक्षा लेने के लिए लंदन गई थी, तब वहां मेरी मुलाकात संगीतकार बेनेडिक्ट टेलर से हुई. मुझे उन से प्यार हो गया. कुछ समय तक हम लिव इन रिलेशनशिप में रहे. फिर शादी कर ली. मेरे मातापिता ने मेरे इस निर्णय पर खुशी ही जाहिर की.

आप की डिस्टैंस मैरिज है. आप भारत में रहती हैं और आप के पति लंदन में. तो आप सब मैनेज कैसे करती हैं. वैवाहिक जीवन को मजबूत बनाए रखने के लिए क्या प्रयास करने पड़ते हैं?

वे भी मुंबई आ कर रहते हैं. मैं भी लंदन जाती रहती हूं. हमें अपने वैवाहिक जीवन को सफल बनाने या मजबूती देने के लिए कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ती. जब 2 लोग समझदार हों और अपने रिश्ते के प्रति ईमानदार तो कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ती. हम दोनों खुशीखुशी अपना रिश्ता चला रहे हैं. मेरी राय में 2 लोगों को अपने रिश्ते में कंफर्टेबल व अच्छा कंपेनियन होना चाहिए.

वूमन ऐंपावरमैंट को ले कर आप की क्या सोच है?

मेरा मानना है कि वूमन ऐंपावरमैंट तब तक सही अर्थों में नहीं हो सकता जब तक लिंग भेद कायम रहेगा. पुरुष व नारी में समानता होनी चाहिए.

क्या फिल्म इंडस्ट्री में वूमन ऐंपावरमैंट को ले कर कुछ काम हो रहा है?

हो रहा है, पर बहुत धीमी गति से.

इस दिशा में आप कोई काम करना चाहती हैं?

मौका मिला, तो जरूर करूंगी.

हमेशा फिल्मों में काम करूं: करीना कपूर खान

हिंदी फिल्म ‘रिफ्यूजी’ से ऐक्टिंग के क्षेत्र में कदम रखने वाली ‘बेबो’ यानी करीना कपूर ने फिल्म इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बनाई है. उन्हें हमेशा अलगअलग किरदार निभाने पसंद हैं और वे पूरी जिंदगी ऐक्टिंग ही करना चाहती हैं.

करीना कपूर की कुछ फिल्में बेहद कामयाब रहीं, तो कुछ नहीं चलीं. पर इस बात को वे ज्यादा तवज्जुह नहीं देतीं. फिल्म ‘चमेली’ और ‘जब वी मैट’ उन की बेहतरीन फिल्में मानी जाती हैं.

फिल्म इंडस्ट्री में 16 साल के सफर में करीना कपूर खान ने हर तरह के डायरैक्टर के साथ काम किया है. उन की नई फिल्म ‘की ऐंड का’ को भी पसंद किया गया. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश:

फिल्म की ऐंड कामें अर्जुन कपूर ने हाउस हसबैंड का किरदार निभाया है. अगर असली जिंदगी में आप के पति सैफ अली खान हाउस हसबैंड बनना चाहें, तो  आप को कोई एतराज तो नहीं होगा?

सैफ पिछले 25 साल से फिल्म इंडस्ट्री में काम कर रहे हैं. ऐसे में अगर उन्हें कुछ दिनों के लिए ब्रेक चाहिए, तो मुझे कोई एतराज नहीं होगा. वे घर संभालेंगे, तो मुझे खुशी ही होगी.

आप अपने अब तक के फिल्मी सफर को कैसे देखती हैं?

मेरे 16 साल के फिल्मी सफर में ऐसा कोई डायरैक्टर नहीं होगा, जिस के साथ मैं ने काम न किया हो. फिल्म चले या न चले, पर हर डायरैक्टर के साथ अच्छा रिश्ता बन जाता है. रोहित शेट्टी हों या कबीर खान या अभिषेक चौबे हों या फिर आर. बाल्की, मैं ने हर किसी के साथ बेहतरीन काम करने की कोशिश की है. मैं तो हमेशा से ही डायरैक्टर की ऐक्टर हूं. उन की सोच को मैं ऐक्टिंग के रूप में पेश करती हूं.

आप का ड्रीम प्रोजैक्ट क्या है?

मैं हर तरह की फिल्में पसंद करती हूं. कौमेडी, थ्रिलर, रोमांटिक कुछ भी नया और अलग. मैं ने किसी ड्रीम प्रोजैक्ट के बारे में नहीं सोचा है. रोल छोटा हो या बड़ा, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं हमेशा अच्छी और अलग फिल्म करना पसंद करती हूं. हां, यह ड्रीम जरूर है कि मैं हमेशा फिल्मों में काम करती रहूं.

अभी आप कम फिल्में कर रही हैं. इस की क्या वजह है?

मैं अब अपने हिसाब से काम करूंगी, पर हमेशा काम करना चाहूंगी. मैं उन फिल्मों में काम करूंगी, जिन में मुझे ऐक्टिंग करने में मजा आए. मैं अब साल में 5 फिल्में नहीं करना चाहती, बल्कि 2 फिल्में ही काफी हैं. मुझे किसी भी कलाकार के साथ काम करने में कोई परहेज नहीं है.

आजकल हिंदी सिनेमा में भी बायोपिक फिल्मों का दौर चल पड़ा है. क्या आप भी किसी की बायोपिक फिल्म करना चाहती हैं?

मुझे बायोपिक फिल्में पसंद हैं, पर कहानी में दम होना चाहिए

क्या आप हौलीवुड की फिल्मों में काम करना चाहेंगी?

मैं हिंदी फिल्मों के एक परिवार से हूं. आजकल हिंदी फिल्में हर जगह ‘डब’ की जाती हैं. सभी उन्हें देखते हैं. ऐसे में मैं हिंदी सिनेमा में ही अच्छी फिल्में करना चाहूंगी.               

सफाई अभियान सिर्फ कागजों में

नरेंद्र मोदी का स्वच्छ भारत अभियान टांयटांय फिस हो गया लगता है. बाकी देश को तो छोडि़ए राजपथ, राष्ट्रपति भवन, शास्त्री भवन, केंद्रीय सचिवालय, नौर्थ ब्लौक, हैदराबाद हाउस जहां विदेशियों को बुला कर खाना खिलाया जाता है, सब के आसपास गंदगी के ढेर हैं. राजपथ के दोनों ओर बने तालाबों में गंदगी भरी है, किनारों पर मिट्टी के ढेर लगे हैं, टेढे़सीधे ट्री गार्ड हैं, बेतरतीब झाडि़यां हैं.

इतनी सफाई तो हर घरवाली कर लेती है. जिस में थोड़ा सा दम होता है वह अपने चार गमलों को भी लीपपोत कर साफ रखती है. अगर बाग हो तो खुद या आधेअधूरे माली से साफसफाई करा लेती है. साधारण मध्यवर्गों के घर आमतौर पर इतने गंदे, बेतरतीब नहीं होते हैं जितना कि राजा की गद्दी का इलाका है.

स्वच्छ भारत अभियान में झाड़ुओं का तो इस्तेमाल हुआ पर यह नहीं सोचा गया कि सारा कूड़ा कहां जाएगा, कैसे जाएगा और क्या होगा उस का. कोई वजह नहीं कि देश इस छोटी चीज का प्रबंध न कर सके. दिक्कत यह है कि हम सब चाहते हैं कि सफाई का काम कोई और करे और जो करे उसे दुत्कारते हैं, उसे अछूत समझते हैं. नौकरी के लिए तो वह व्यक्ति झाड़ू उठा लेगा पर कभी दिल से सफाई नहीं करेगा और सफाई, जैसा हर घरवाली जानती है, हर समय का काम है. ऐसा नहीं कि एक बार किया और भूल गए.

नरेंद्र मोदी सरकार ने तो इस को नारा बना दिया जैसा कभी महात्मा गांधी ने बनाया था. मगर दोनों ने ही सफाई मैनेजमैंट की पूरी स्टडी नहीं की और इसीलिए अगर यह कहा जाए कि हमारा ही सब से गंदा देश है तो शायद गलत न होगा. हम से छोटा श्रीलंका कहीं ज्यादा साफसुथरा नजर आता है, क्योंकि वहां सफाई करने वालों को जन्म से नीचा नहीं माना जाता.

जैसे घरवाली जरूरत पड़ने पर अपने बरतन धोती है, कपड़े धोती है, झाड़ू लगाती है वैसे ही पूरे देश को करना होगा. सिर्फ टोकनबाजी नहीं, गंभीरता व जिम्मेदारी से वरना यह देश सड़ता जाएगा और केवल कुछ अमीरों के कुछ इलाके ही साफ दिखेंगे बाकी सब घूरों में रहेंगे, घरों में नहीं.     

शोध के नाम पर निर्मम हत्या

चूहे ऐसे सामाजिक जीव हैं जिन का सैंस औफ ह्यूमर काफी अच्छा होता है, खासतौर पर तब जब वे अपने साथियों के साथ मस्ती कर रहे होते हैं. इन के अंदर दया की भावना भी होती है. यदि 2 चूहों में से एक को कोई आघात लगा हो और ऐसे में दूसरे को खाना परोसा जाए तो वह अपने साथी की हालत को देखते हुए भूखा रहना पसंद करेगा. व्यवहार में चूहे काफी हद तक इनसानों की तरह होते हैं, फिर भी शारीरिक तौर पर चूहों और इनसानों में कोई समानता नहीं होती. यहां तक कि चूहों पर किए गए शोध भी इनसानों पर व्यावहारिक सिद्ध नहीं होते.

कितनी अजीब बात है कि एक तरफ जहां सारा संसार करुणामयी बनने की बात कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ कोई भी उन 1 करोड़ चूहों के बारे में बात तक नहीं कर रहा, जो बेनतीजा शोधों के चलते वैज्ञानिकों द्वारा निर्ममता से मौत के घाट उतार दिए जाते हैं.

शोधों का सच

वैज्ञानिक अनुसंधानों में 60% से ज्यादा शोध ऐसे वेतनभोगी शोधकर्ताओं के द्वारा किए जाते हैं, जो सिर्फ अपना मासिक वेतन पाने के लिए बेवजह के शोध करते रहते हैं. लगभग 30% शोधों में सिर्फ दोहराव होता है. भारत किसी भी तरह का मैडिकल ऐक्सपैरीमैंट, जानवरों पर किए गए शोध स्वीकार नहीं करता. यहां तक कि इस के लिए और्गनाइजेशन फौर इकोनौमिक कोऔपरेशन ऐंड डैवलपमैंट (ओइसीडी) के साथ एक इंटरनैशनल प्रोटोकाल भी साइन किया गया है. इस के बावजूद हमारे कुछ वैज्ञानिक अंतर्राष्ट्रीय शोधों का बेवजह दोहराव करते रहते हैं.

शोधों का दोहराव करने वाले वैज्ञानिकों को इस तरह व्यस्त रहने के लिए कुछ करने का मौका मिल जाता है, क्योंकि शायद उन की प्रतिभा इतनी ही है. ऐसे 5% शोध मैडिकल की पढ़ाई करने वाले छात्रों के द्वारा परीक्षा में नंबर पाने के लिए भी किए जाते हैं. सिर्फ 5% शोध ही किसी गंभीर कारण से किए जाते हैं और इन में से भी 0.1% शोधों का कोई नतीजा निकलता है.

इतना सब होने पर भी चूहों पर किए गए प्रयोगों को इनसानों पर आजमाया नहीं जाता. वैज्ञानिक सिर्फ अपना हाथ साफ करने के लिए चूहों पर प्रयोग करते हैं ताकि किसी बड़ी रिसर्च जौब में काम करने का मौका मिल सके.

क्रूरता की हद

क्या शोधों में ज्यादातर चूहों का इस्तेमाल मात्र इसलिए किया जाता है कि वे अहिंसक और आसानी से अपनी नस्ल बढ़ाने वाले जीव हैं? इंसानी शरीर की जटिलताओं को समझने की वजह से शोध 1 करोड़ चूहों की जान ले चुके हैं. हम लोग हिटलर को कू्रर कहते हैं तो फिर ऐसा कर के हम खुद को क्या कहलाना पसंद करेंगे?

इन छोटेछोटे जीवों के साथ शोध के दौरान कैसीकैसी क्रूरता की जाती है, जान कर आप सिहर उठेंगे:

– चूहों को बिजली के झटके दिए जाते हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि एक जीव कितना दर्द सह सकता है.

– सर्जरी से जुडे़ शोधों के दौरान चूहों के शरीर को विकृत कर दिया जाता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि कुछ खास अंगों के बगैर जीव की प्रतिक्रिया क्या होगी.

– कुछ खास शोधों में तो इन के शरीर में कोकीन से ले कर मेथमफेटामाइन जैसी ड्रग्स भी पंप की जाती है.

– कैंसर वाले ट्यूमर और मानव शरीर की कोशिकाओं को इन के शरीर में डाला जाता है ताकि आनुवांशिक शोधों को अंजाम दिया जा सके.

– इन की खोपड़ी में छेद कर दिया जाता है और जबरन कुछ खास रसायन पिलाए जाते हैं ताकि दिमाग में तेजी से होने वाली प्रतिक्रियाओं का पता लगाया जा सके.

– बेरहमी यहीं पर खत्म नहीं होती. इन का इस्तेमाल हो जाने के बाद इन को उसी हालत में कूड़े की तरह फेंक दिया जाता है.

निर्मम शोध

व्यावसायिक कंपनियों में चुहियों को पाला जाता है ताकि उन पर शरीर को कमजोर करने वाली बीमारियों जैसे कैंसर वाले ट्यूमर, मोटापा, पैरालाइसिस, तनावयुक्त प्रतिरक्षा तंत्र (इम्यून सिस्टम) और अवसाद से जुड़े शोधों को अंजाम दिया जा सके. इतना ही नहीं, इन चुहियों को शोध के लिए पूरी दुनिया की प्रयोगशालाओं में भेजा जाता है. इन मासूम जीवों पर होने वाले प्रयोग इतने निर्मम और गैरजरूरी हैं कि मैं इन्हें अंजाम देने वालों से बेहद निराश हूं.

मुझे इन शोधकर्ताओं और उन लोगों में कोई फर्क नहीं नजर आता जो बम बनाते हैं या बारूदी सुरंगें बिछाते हैं ताकि निर्दोषों को मौत के घाट उतारा जा सके. ये शोधकर्ता चूहों को मटमैले पानी में तैरने के लिए छोड़ देते हैं जहां इन्हें डूबने से बचने का जरीया खोजना पड़ता है. यह शोध समझदारी के स्तर को जांचने के लिए किया जाता है. मुझे पूरा विश्वास है कि मैं इस तरह के शोध में पूरी तरह असफल हो जाऊंगी. मैं क्या कोई भी हो जाएगा. पर ऐसा होने पर भी यह कैसे सिद्ध होगा कि कोई समझदार है या मूर्ख?

चूहों को 131 डिग्री फारेनहाइट पर गरम प्लेट पर रख दिया जाता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि दर्द का एहसास होने के बाद चीखने में कितना समय लगता है. बिना दर्दनिवारक दवा दिए ही इन की पूंछें काट दी जाती हैं. चूहों पर की जाने वाली सर्जरी ज्यादातर बिना ऐनेस्थीसिया दिए की जाती है और सर्जरी के बाद इन्हें दर्द कम करने की कोई दवा भी नहीं दी जाती. शोध के दौरान चूहे जल जाते हैं, इन को आघात लग जाता है, जहर दिया जा सकता है, इन को भूखा रखा जाता है, नशीली दवाएं दी जाती हैं और कभीकभी तो इन का दिमाग भी क्षतविक्षत हो जाता है. कोई भी प्रयोग, चाहे वह कितना ही दर्दनाक क्यों न हो, प्रतिबंधित नहीं है और दर्दनिवारक दवाओं की भी जरूरत नहीं समझी जाती.

प्रयोगशालाओं के अंदर के वीडियो फुटेज देखने पर पता चलता है कि पिंजरों में बंद चूहे इतने भयभीत रहते हैं कि इन के पास से कोई गुजर भर जाए तो ये दुबक जाते हैं. इन को पता भी नहीं होता कि कब इन में से कोई एक बिजली के झटके देने के लिए, दर्दनाक प्रक्रिया से गुजरने के लिए या मौत के लिए पिंजरे से बाहर खींच लिया जाएगा. ये अपने सामने अपने साथियों को मरते हुए देखते हैं.

3 प्रयोग, कई जानवर

ये 3 प्रयोग हर साल कई जानवरों पर किए जाते हैं:

आंखों का टैस्ट: आई इरिटैंसी या ड्रेज टैस्ट के दौरान जानवरों की आंखों में एक कैमिकल जबरन डाला जाता है. एनेस्थीसिया और दर्दनिरोधी उपचार के अभाव में जानवर जबरदस्त पीड़ा के दौर से गुजरते हैं. कई जानवर असहनीय दर्द से राहत पाने के लिए इतना संघर्ष करते हैं कि उन की रीढ़ की हड्डी तक टूट जाती है और वे मर जाते हैं.

स्किन टैस्ट: त्वचा पर होने वाली प्रतिक्रियाओं को जानने के लिए जानवरों की त्वचा के नाजुक भाग पर जानलेवा रसायन डाले जाते हैं. ऐसे में उन के शरीर पर खुले हुए घाव और उन से खून बहना आम हो जाता है.

ओरल टौक्सिसिटी: इस टैस्ट के दौरान पूरी तरह स्वस्थ जानवर को एलडी 50 रसायन 14 से 28 दिनों तक जबरन दिया जाता है. यह सिलसिला जानवरों की मौत हो जाने के बाद ही थमता है.

आजकल चूहों, चुहियों और चिडि़यों पर होने वाले शोध उस ‘3 आर’ का हिस्सा नहीं, जो दुनिया भर के शोधकर्ताओं को एक बनाते हैं. ‘3 आर’ यानी रिप्लेसमैंट, रिडक्शन और रिफाइनमैंट. रिप्लेसमैंट यानी शोधों के लिए जानवरों के बजाय उन की कंप्यूटर से बनी नकल का प्रयोग हो. रिडक्शन यानी कम से कम जानवरों का शोध में इस्तेमाल हो. रिफाइनमैंट यानी शोध के तरीकों को कम से कम पीड़ा देने वाला बनाया जाए.

कोई भी वैज्ञानिक जानवरों पर शोध करने की तैयारी करने से पहले इंटरनल ओवरसाइट कमेटी (आईएसीयूसी) से ‘3 आर’ मानकों के अनुरूप अप्रूवल लेता होगा. हालांकि, असलियत में ऐसा कोई नियम शोध के दौरान चुहिया या अन्य जानवरों पर लागू नहीं होता फिर चाहे उस की कंप्यूटर नकल कितनी ही कारगर क्यों न हो. ऐसे में किसी भी वैज्ञानिक को छूट है कि वह शोध के दौरान कितने ही जानवरों पर कू्ररता कर सकता है. वह भी तरहतरह की और बेवजह.

यहां कुछ उदाहरण पेश हैं ऐसे नतीजों के जो हजारों छोटी चुहियों को मौत के घाट उतारने के बाद निकले:

आर्थ्राइटिस टैस्ट: दवाओं के चलते चूहों में होने वाली आर्थ्राइटिस की समस्या व्यायाम की प्रक्रिया को कठिन बनाने के संकेत देती है. अब आप ही सोचें कि टैक्स भरने वालों के पैसे का इस तरह के शोधों में इस्तेमाल करना क्या सही है?

चूहे कड़वी चीजें चख सकते हैं: यह शोध करने वाले वैज्ञानिकों ने 10 चूहों की गरदन में चीरा लगा दिया ताकि एक नस को काटा जा सके. इस के अलावा और 10 चूहों के कान के परदे को पंक्चर कर दिया ताकि नस को काट कर अलग किया जा सके. इस के बाद अपनी कू्ररता को छिपाने के लिए इन वैज्ञानिकों ने विज्ञान का सहारा लिया ताकि शोधों में पैसे और जानवरों की बरबादी के खिलाफ आवाज उठाने वालों से बच सकें और अपनी डिग्री या सैलरी पा सकें.

नैतिक रूप से इस कू्ररता का समर्थन नहीं किया जा सकता क्योंकि शोधों के दौरान चूहेचुहियों को दर्द, डर और तनाव की हद से गुजरना पड़ता है.

भारत में सीपीसीएसईए जानवरों पर होने वाले शोधों की निगरानी करता है और ऐसी सूचनाएं यहां दी जा सकती हैं. एक विश्वविद्यालय शोधकर्ता ने एक शोध के लिए 20 साल लगा दिए. इस शोधकर्ता ने पानी से भरे टब के बीच में एक कार्ड पर चूहे को बैठा दिया. काफी वक्त गुजर जाने के बाद जब चूहे की जागने की क्षमता समाप्त हो गई तो वह पानी में गिर कर डूब गया. इस शोध को करने के पीछे की वजह मात्र यह जानना था कि चूहे कब सोते हैं और कब वे सब नहीं कर पाते जो वे जागते हुए करते हैं.

क्या हमें वाकई ऐसे लोगों की जरूरत है या इन को पागलखाने भेज देना चाहिए, खासतौर पर उस शोधकर्ता को जोकि भय और मौत को देखना पसंद करता रहा.

महिला जेबकतरी: आंख बंद, माल गायब

गत 22 मार्च को देश के दूसरे हिस्सों की तरह भोपाल में भी होली के त्योहार की गहमागहमी थी. इस के चलते मिनी बसों और लो फ्लोर बसों में बहुत भीड़ थी. ऐसे ही एक लो फ्लोर बस रूट क्रमांक एस.आर. 5 में मंत्रालय स्टौप से एक महिला बस में चढ़ी, जो बेहद सुंदर थी. महंगी साड़ी पहनने का उस का सलीका भी उस के कुलीन होने का संकेत दे रहा था.

रईसी और ठसक के भाव भी इस महिला के चेहरे पर थे जिन्हें बस में मौजूद यात्रियों ने भी महसूस किया. बस में इस ने इधरउधर ऐसे देखा मानों बता रही हो कि आमतौर पर वह बस में बैठने वाली नहीं है, इसलिए असहज महसूस कर रही है. पूरी बस का मुआयाना करने के बाद उस ने अपने बैठने की जो सीट चुनी उस की बगल में एक और महिला यात्री बैठी थी.

सीट में बैठ कर उस ने लंबी सांस ली और फिर कुछ सोचने की मुद्रा में आ गई पर उस का ध्यान अपनी बगल में बैठी महिला के पर्स पर था. जल्द ही उस की उंगलियों ने पर्स टटोल भी डाला और जब काम का कुछ नहीं मिला तो दूसरे स्टौप पर ही उतरने का उपक्रम करती हुई अगली सीट पर जा बैठी. पर वह यह नहीं समझ पाई कि उस महिला ने उसे पर्स टटोलते हुए देख लिया है पर वह न जाने क्यों कुछ बोली नहीं.

दूसरी सीट पर बैठने के बाद भी उस ने वही दोहराना चाहा लेकिन इस दफा कामयाब नहीं हो पाई. जैसे ही उस ने अपनी सहयात्री का पर्स खोला दूसरी यात्री ने उस का हाथ पकड़ लिया. दरअसल, वह महिला पुलिसकर्मी थी, जिस ने इस कथित संपन्न दिखने वाली महिला को रंगे हाथों पकड़ लिया.

गिरफ्तार करने के बाद जब उस से पूछताछ की गई तो पता चला कि उस का नाम निशा है और वह इटारसी की रहने वाली है. वह केवलजेबकतरी के लिए इटारसीभोपाल अपडाउन करती थी. लेकिन उस दिन भोपाल ट्रैफिक पुलिस ने एडीशनल एस.पी. ट्रैफिक समीर यादव की अगुआई में एक मुहिम छेड़ी हुई थी, क्योंकि पिछले कुछ दिनों से लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि शहर में महिला जेबकतरों का गिरोह सक्रिय है. इसलिए पुलिस वाले सादी ड्रैस में लो फ्लोर बसें और मिनी बसों में चल रहे थे. उन्हें निशा पहचान नहीं पाई और पकड़ी गई.

कैसे पहचानें इन्हें

देश भर में निशा जैसी बहुत सारी महिलाएं ट्रेनों, मिनी बसों और स्थानीय बसों में मौजूद रह कर कैसे अपराध को अंजाम देती हैं यह बात किसी से छिपी नहीं रह गई है. पर इन्हें वक्त पर पहचान पाना हर किसी के बस की बात नहीं. सभ्य समाज में आमतौर पर लोग महिलाओं से इस स्तर के अपराधों की उम्मीद नहीं करते, इसलिए लुटपिट जाते हैं. बाद में पछताते देखे जाते हैं.

क्या इन महिला जेबकतरों को पहचाना जा सकता है? इस सवाल का जवाब कई लोगों और पुलिस वालों ने ‘नहीं’ में दिया. लेकिन यह जरूर माना कि इन के हावभाव देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन की मंशा असल में है क्या.

आमतौर पर सफर में लोग महिलाओं को ले कर शिष्टता दिखाते हैं पर चूंकि ये महिलाएं एक खास मकसद ले कर चढ़ी या बैठी होती हैं, इसलिए कुछ असामान्य भी दिखती हैं. अगर बारीकी से एक नजर में इन की हरकतों को ताड़ लिया जाए तो लुटने से बचा जा सकता है. मसलन:

– जेबकतरी महिलाएं आमतौर पर शिष्ट, सभ्य और संपन्न या मध्यवर्गीय दिखने की कोशिश करती हैं, इसलिए इन के चेहरे पर बनावटीपन, बेचैनी या तनाव भी रहता है.

– ये खुद को व्यस्त दिखाने की कोशिश करती हैं जिस से लोग इन की मंशा के बारे में सोच ही नहीं पाते.

– अधिकांश जेबकतरी महिलाएं बैठते ही इधरउधर की बातचीत करती हैं. मसलन, आज मौसम ऐसा या वैसा है, आप कहां जा रहे हैं, यह कौन सा स्टेशन या स्टौप आ गया वगैरहवगैरह.

– ऐसा करने के पीछे उन की मंशा खुद को सहज दिखाने और लोगों का ध्यान बंटाए रखने की होती है, क्योंकि अपराध करने के लिए इन के पास वक्त कम होता है.

– बस या ट्रेन में ये खाली सीट पर नहीं बैठतीं, बल्कि जहां कोई पहले से बैठा हो उस सीट को चुनती हैं.

– ये खुद को लापरवाह दिखाने की भी कोशिश करती हैं.

– इन की निगाहें बेहद सतर्क होती हैं और आप के सामान या जेब के इर्दगिर्द ज्यादा रहती हैं.

– अगर ये गिरोहबद्ध तरीके से काम करती हैं, तो एक के बाद एक स्टौप से चढ़ती हैं और एकदूसरे की मौजूदगी की तसल्ली करती हैं. इस दौरान अपने चेहरे के हावभाव और उतेजना वे नहीं छिपा पातीं पर यह सब इतनी जल्दी होता है कि आम लोग इस पासवर्ड को तोड़ नहीं पाते.

– अलगअलग स्टौप से चढ़ने की इन की मंशा या योजना यह रहती है कि एक जेब काटे, पर्स या मोबाइल उड़ाए और चुपचाप दूसरी को दे. इसे ये लोग पास करना बोलती हैं.

– कई बार बिलकुल फिल्मी स्टाइल में अपने गिरोह की महिला या पुरुष सदस्य से किसी भी बात पर झगड़ पड़ती हैं, जिस से दूसरों का ध्यान बंटे और ये अपने काम को कामयाबी से अंजाम दे पाएं. बीचबचाव के दौरान ही ये या इन का तीसरा साथी मौका देख माल उड़ा ले जाता है.

– ये अपने साथ ज्यादा सामान नहीं रखतीं.

– कई दफा ये खुद को काफी हैरानपरेशान या तनाव में दिखाने की कोशिश करती हैं ताकि लोग अपने सामान की हिफाजत के बजाय इन के बारे में सोचना शुरू कर दें.

ऐसे बचें इन से

जरूरी नहीं कि हर कोई इन्हें पहचान पाए या इन की मंशा ताड़ पाए, इसलिए ये अपने महिला होने का पूरा फायदा उठाती हैं. कुछ सावधानियां बरती जाएं तो इन से एक हद तक बचा जा सकता है:

– अगर खाली सीट है और उसे छोड़ महिला आप के पास आ बैठी है तो सतर्क हो जाएं. वह जेबकतरी हो सकती है.

– वह उपरोक्त बताए सवाल पूछे तो जवाब बहुत संक्षिप्त यानी हां, न या फिर पता नहीं में बेरुखी से दें और अपनी जेब, पर्स व सामान के प्रति सावधान हो जाएं.

– किसी भी आगुंतक महिला से दूरी बना कर बैठें, क्योंकि ऐसे अपराधों के लिए उन्हें कम दूरी चाहिए होती है.

– जेबकतरी महिलाएं ट्रेन में अकसर एक से दूसरे जंक्शन तक ही चलती हैं, इसलिए उन के चढ़नेउतरने को ले कर सावधान रहें. मसलन ट्रेन में भोपाल से सवार महिला खुद अपनी तरफ से यह बताने की कोशिश करे कि वह दिल्ली तक जा रही है, तो उस पर भरोसा न करें. आजकल ऐसी महिलाएं रिजर्वेशन तो दूर का करवाती हैं पर मौका मिलते ही दूसरे या तीसरे जंक्शन पर सामान ले कर गायब हो जाती हैं. किसी भी स्टेशन पर अपना सामान सहयात्री के भरोसे न छोड़ें.

– आजकल जो जेबकतरी महिलाएं पकड़ी जा रही हैं वे इतनी सफाई से पर्स की चैन खोल कर समान उड़ाती हैं कि लुटने वाले को पता ही नहीं चलता कि कब नगदी पर्स से गायब हो गई. इसलिए कम से कम चैन वाला पर्स रखें और उसे साइड में रखने के बजाय गोद में रखें.

– अगर आप के साथ अपराध घटित हो जाए तो नजदीकी थाने में रिपोर्ट जरूर दर्ज कराएं. यह न सोचें कि जो चला गया उस का क्या अफसोस करना या कि फिर वह नहीं मिलने वाला, बल्कि यह सोचें कि आप की यह उदासीनता जेबकतरों को प्रोत्साहन देने वाली साबित होगी.

पुलिस कुछ नहीं करती या इन लोगों से मिली रहती है जैसी सोच एक हद तक सच

हो सकती है, लेकिन भोपाल में इटारसी की निशा के पकड़े जाने की वजह लगातार हो रही शिकायतें व रिपोर्टों का ही दबाव था. इसलिए रिपोर्ट जरूर दर्ज कराएं और कोशिश करें कि अपराधी महिला का हुलिया ज्यादा से ज्यादा वक्त तक याद रख पाएं.

समारोह में चाहिए अतिरिक्त सावधानी

विवाह समारोह से उड़ाए लाखों के जेवर जैसे शीर्षक वाले समाचार अब बेहद आम हो चले हैं और इन में से अधिकांश महिलाओं या बच्चों द्वारा किए जाते हैं. ऐसे में रेल या बस से सफर के बराबर ही सावधानी समारोहों में रखने की होती है. समारोहों में भी भीड़ इकट्ठा और अनुशासनहीन होती है और लोग अपनेआप में या दूसरों के साथ गप्पें लड़ाने में इतने खोए रहते हैं कि इन्हें पर्स या सामान उड़ाने में ज्यादा मेहनत नहीं करती पड़ती. इसलिए जब भी विवाह या दूसरे किसी समारोह में जाएं तो इन बातों का ध्यान रखें:

– यहां कीमती और नक्दी सुरक्षित रखने के ज्यादा विकल्प नहीं होते, इसलिए उन्हें कम से कम ले जाना चाहिए.

– कुरसी या किसी दूसरी जगह पर्स नहीं रखना चाहिए.

– स्टेज पर चढ़ते वक्त पर्स अपने साथ ही रखें. उसे नीचे किसी के भरोसे छोड़ कर न जाएं.

– अगर कोई महिला लगातार आसपास मंडराती दिख रही है, तो उस से सावधान हो जाएं. वह जेबकतरी हो सकती है. वजह आजकल शादियों में परिचित कम अपरिचित ज्यादा मिलते व दिखते हैं.

– खाने की मेजों पर आइटम लेने में हड़बड़ी न मचाएं न ही धक्कामुक्की के दौरान वहां जाएं. अगर कोई साथ है तो एक को पर्स व सामान की देखभाल के लिए रुकना चाहिए. उस के आने के बाद ही दूसरे को जाना चाहिए.

– पर्स को लटकाए या झुलाए रखने के बजाय कैरी बैग में रखें.

– अनावश्यक बातचीत करने वाले अपरिचितों से दूर रहें.

लिव इन रिलेशन में रहने से पहले

करीब 4 साल तक लिव इन रिलेशनशिप में रहने के बाद स्मृति ने जब देखा कि उस के बौयफ्रैंड सूरज ने किसी और लड़की से शादी कर ली है, तो उस के पैरों तले धरती खिसक गई.

पिछले कुछ दिनों से वह सूरज के हावभाव में बदलाव देख रही थी. पूछने पर वह अलगअलग बहाने बना देता था. कभी कहता कि औफिस में समस्या है, तो कभी कहता कि तबीयत ठीक नहीं है. एक दिन जब उस ने जोर दिया तो उस ने बताया कि जब वह अपने शहर गया, तो मातापिता ने उस की जबरदस्ती शादी करवा दी. वह अपनी और स्मृति की बात उन्हें इसलिए नहीं बता पाया, क्योंकि वे दोनों के अलगअलग जाति के होने की वजह से इस रिश्ते को मंजूरी नहीं देते.

स्मृति उस की सहजता से कह गई इस बात से हैरान हो गई. फिर उसी दिन वहां से अपनी मां के पास चली गई. फिर वह एक सामाजिक संस्था से मिली और कोशिश कर रही है कि सूरज उसे अपना ले. वह कोर्ट नहीं गई, क्योंकि उसे लगा कि इस से उस की बदनामी होगी. उस का कहना है कि सूरज कोशिश कर रहा है. वह अपनी पत्नी को तलाक दे कर उसे अपनाएगा, क्योंकि यह शादी उस ने अपने मातापिता की जिद से की है.

यहां सवाल यह उठता है कि अब तक सूरज अगर अपने रिश्ते को परिवार की नहीं बता पाया है, तो आगे कैसे बता कर स्मृति के साथ रहेगा? और अपनी पत्नी को छोड़ेगा कैसे? उस के लिए वजह क्या बनाएगा?

लिव इन रिलेशनशिप आज के समय में तेजी से बढ़ रहा है. एक समय ऐसा था जब ऐसे संबंध होने पर लोग खुल कर बात करना पसंद नहीं करते थे. लेकिन आजकल लोग खुल कर इस रिलेशनशिप में रहते हैं खासकर युवा इस रिश्ते को अपनाने में सहजता का अनुभव करते हैं, क्योंकि इस में दायित्व कम होता है.

सैक्स की आजादी

इस बारे में मुंबई की सोशल ऐक्टिविस्ट नीलम गोरहे कहती हैं, ‘‘यह रिश्ता तब तक ठीक रहता है जब तक महिलाओं को कोई समस्या नहीं आती. महिलाएं मेरे पास तब आती हैं जब उन का बौयफ्रैंड उन्हें छोड़ कर चला गया हो या चोरीछिपे शादी कर ली हो. ऐसे में हरेक महिला यही चाहती है कि रिश्ते को मैं ठीक कर दूं. उस लड़के से कहूं कि उसे अपना ले.

‘‘असल में इस रिश्ते के लिए अधिकतर लड़के ही आगे आते हैं, क्योंकि प्यार से अधिक इस में सैक्स की आजादी होती है. यह रिश्ता जितनी आजादी देता है, उतना ही खतरनाक भी होता है. मेरे पास एक मातापिता ऐसे आए जिन की लड़की का मर्डर हो चुका था पर कोई पू्रफ नहीं था. उसे मारने वाला उस का बौयफ्रैंड ही था.

3-4 साल से वह लड़की उस लड़के के साथ लिव इन रिलेशनशिप में थी, जिस का पता उस के मातापिता को नहीं था. जब पता चला तो मातापिता ने लड़की से उस से शादी करने के लिए कहा. लेकिन वह लड़का तब आनाकानी करने लगा, जिसे देख लड़की ने उस रिश्ते से बाहर निकलना चाहा. यह बात लड़के को जब पता चली तो उस ने उस का मर्डर कर दिया. उस का शव बाथरूम में मिला.

‘‘दरअसल, लड़के को यह लगा था कि अलग होने के बाद लड़की कोर्ट जा सकती है, क्योंकि वह पढ़ीलिखी थी. प्रूफ के अभाव में लड़का अभी बाहर है.’’

लिव इन रिलेशनशिप के अधिकतर मामले महानगरों में पाए जाते हैं, जहां काम या पढ़ाई के लिए युवा घर से दूर रहते हैं. उन के बीच अकसर इस तरह के रिश्ते हो जाते हैं. दरअसल, फ्लैट कल्चर में घर शेयर करने यानी साथ रहने में इन्हें फायदा भी नजर आता है.

इन रिश्तों को लड़के ही अधिकतर तोड़ते हैं, लेकिन रिश्ता टूटने पर भावनात्मक से सहज हो जाना कई बार लड़कियों के लिए मुश्किल हो जाता है, क्योंकि इस में लड़की के परिवार की भूमिका न के बराबर होती है.

नीलम कहती हैं, ‘‘इस तरह के रिश्ते को बढ़ावा देने में धर्म भी कम नहीं. अधिकतर लोग विपरीत धर्म या जाति में शादी करने के लिए इजाजत नहीं देते, इसलिए रिश्ते को छिपाना पड़ता है. कई बार तो लोग दोहरी जिंदगी भी जीते हैं, जो डिप्रैशन, मर्डर, आत्महत्या जैसी कई घटनाओं को जन्म देती है.

‘‘इस रिश्ते को शादी का नाम देने के लिए मातापिता, परिवार व समाज के सहयोग की आवश्यकता होती है, जो आमतौर पर नहीं मिलता. इस रिश्ते में बड़ी समस्या तब आती है जब दोनों के बीच में बच्चा आ जाता है. बच्चा जब स्कूल जाने लगता है तब उत्तरदायित्व समझ में आता है. हालांकि आजकल डी.एन.ए. टैस्ट का प्रावधान हो चुका है, जिस से महिला को काफी राहत मिल रही है.

‘‘शादी करना आजकल काफी खर्चीला भी होता है. इस के लिए समय और संसाधन की भी जरूरत होती है. वहीं अगर शादी असफल हो जाए तो तलाक के लिए कानूनी झंझट से गुजरना पड़ता है. लिव इन रिलेशन दरअसल शादी का प्रिव्यू है जिस से व्यक्ति यह अंदाजा लगा सकता है कि शादी सफल होगी या नहीं.

ठगी की शिकार महिलाएं

सीनियर ऐडवोकेट आभा सिंह कहती हैं कि लिव इन रिलेशनशिप बड़े शहरों में अधिक है और इसे सामाजिक कलंक अभी भी हमारे समाज में माना जाता है. बहुत कम महिलाएं हिम्मत कर अपना कानूनी अधिकार पाती हैं, क्योंकि कोर्ट, वकील की बातें बहुत कठोर होती हैं. उन्हें सह पाना आसान नहीं होता.

बहुत सारी ऐसी घटनाएं हैं जिस में महिलाएं ठगी गईं पर उन्होंने रिपोर्ट नहीं लिखवाई. बौलीवुड के सुपरस्टार राजेश खन्ना की मौत के बाद उन के बंगले का विवाद सामने आया. उन के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली अनिता आडवाणी को परिवार के लोगों ने धक्के मार कर घर से बाहर निकाल दिया. जबकि वे 8 साल से राजेश खन्ना के साथ रह रही थीं. जब वे मेरे पास आईं, तो मैं ने पहली बात यही पूछी कि आप इतने दिनों तक कहां थीं? पहले क्यों नहीं आईं जब राजेश खन्ना जीवित थे? दरअसल, उन के पास ऐसा कोई प्रूफ यानी सुबूत नहीं था कि वे उन के साथ रह रही थीं, ऐसे केस में प्रूफ के लिए निम्न जगहों पर साथ रहने वाली का नाम होना चाहिए:

– जौइंट अकाउंट में.

– बिजली या मोबाइल बिल में.

– राशन कार्ड में.

ऐसा होने पर ही आप सिद्ध कर सकती हैं कि आप उस व्यक्ति से कुछ पाने की हकदार हैं.

अनिता आडवाणी को 200 करोड़ की प्रौपर्टी में से कुछ भी नहीं मिला. हाई कोर्ट में भी उन की अर्जी खारिज कर दी गई. अब वे सुप्रीम कोर्ट जा रही हैं.

इन शर्तों को जानें

गुजारा भत्ता पाने के लिए भी सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि लिव इन रिलेशन में निम्न 4 शर्तें पूरी होना जरूरी हैं:

– ऐसे युगल समाज के सामने पतिपत्नी के तौर पर आएं.

– वे शादी की कानूनी उम्र पूरी कर चुके हों.

– उन के रिश्ते कानूनी रूप से शादी करने के लिए वर्जित न हों.

– दोनों स्वेच्छा से लंबे वक्त तक यानी कम से कम 6 साल साथ रहे हों.

रिश्ता खराब नहीं

26 नवंबर 2013 को एक अदालती आदेश में रिलेशनशिप को क्राइम नहीं माना गया. इस से इस रिश्ते को अपनाने वाले युवाओं को काफी राहत मिली. मैरिज काउंसलर संजय मुखर्जी कहते हैं कि ऐसे केसेज में दिनोंदिन बढ़ोतरी हो रही है. यह रिश्ता खराब नहीं है. कई बार शादी के बाद पतिपत्नी में अनबन हो जाती है, इसलिए बहुत से यूथ इसे अपनाते हैं. अधिकतर आत्मनिर्भर महिलाएं ही इस रिश्ते को पसंद करती हैं, क्योंकि इस में सासससुर, ननद, देवर आदि का झंझट नहीं रहता.

यह रिश्ता एक तरह से ऐक्सपैरिमैंटल होता है, जिस में 3-4 महीने तो ठीक ही चल जाते हैं. समस्या 1 साल बाद आती है. मेरे हिसाब से 1 साल तक इस रिश्ते में रहने के बाद महिलाओं को शादी करने के बारे में सोचना चाहिए. इस के अलावा कुछ बातों पर उन्हें खास ध्यान देना चाहिए:

– अगर लड़का शादी न करना चाहे, तो वजह पता करें.

– दोनों अपनी कमाई जौइंट अकाउंट में साथसाथ डालें और दोनों उसी से खर्च करें.

– अगर शादी नहीं करनी है, तो पहले ही वकील से परामर्श कर स्टैंप पेपर पर अपने हिस्से को सुनिश्चित करवा लें.

इस के अलावा संजय कहते हैं कि लिव इन रिलेशन में बच्चे की प्लानिंग न करें ताकि आगे चल कर आने वाले बच्चे को अपराधबोध न हो.

वैसे हर रिश्ते की अपनी अलग अहमियत होती है. लेकिन जहां शादी एक महिला को सुरक्षित जीवन देती है, वहीं लिव इन रिलेशनशिप में असुरक्षा अधिक रहती है. सही यही होगा कि आप अपने रिश्ते को समझने की कोशिश करें और अपने भविष्य में आने वाली परेशानियों से अपनेआप को बचाएं.         

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