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मैं अपने संगीत को बेचता नहीं: आदित्य नारायण

महज 4 साल की उम्र में अपनी आवाज के जादू से सब को अपना दीवाना बनाने वाले आदित्य नारायण ने वे सबकुछ पा लिया, जो एक कलाकार वर्षों की मेहनत के बाद हासिल कर पाता है. पिता उदित नारायण और मां दीपा नारायण के सान्निध्य में संगीत सीखने वाले आदित्य ने सिंगिंग के साथसाथ अभिनय में भी अपना जौहर दिखाया. 4 साल की उम्र से आज तक कई गीतों को अपनी आवाज दे चुके आदित्य जीटीवी के रिएलिटी शो ‘सारेगामापा’ के नए सीजन के होस्ट हैं. एक कार्यक्रम के दौरान आदित्य ने अपने संगीत के सफर के अनुभवों और भविष्य के तानेबाने को ले कर बात की, पेश हैं, बातचीत के कुछ चुनिंदा अंश :

एक अभिनेता के तौर पर पहली फिल्म ‘श्रापित’ के बाद अब तक आप की कोई फिल्म नहीं आई, ऐक्टिंग छोड़ दी या फिर फिल्में नहीं मिल रही हैं?

फिल्मों में तो ऐंट्री मैं ने 1995 में फिल्म ‘रंगीला’ से कर ली थी, पर उस समय मैं छोटा बच्चा था. जब ‘श्रापित’ में अभिनय के लिए कहा गया तब भी मैं ज्यादा बड़ा नहीं था, इस फिल्म में काम करने के बाद मैं कन्फ्यूज हो गया कि क्या करूं. ऐक्टिंग में अपना कैरियर बनाऊं या सिंगिंग को अपनाऊं, क्योंकि तब तक मैं सफलता के सारे स्वाद चख चुका था. ‘श्रापित’ फिल्म रिलीज होने के बाद मेरे पास कई फिल्मों के औफर आए जो सारे एक ही कैरेक्टर जैसे थे. तभी घर वालों ने कहा कि तू अगर अभी से इन फिल्मों के चक्कर में पड़ जाएगा तो टाइपकास्ट बन कर रह जाएगा और तेरी पहचान वह नहीं होगी जो तू चाहता है. मैं भी जानता था कि इतनी छोटी उम्र में अगर बिना किसी तैयारी के फिल्मों के चक्कर में पड़ जाऊंगा तो आगे नहीं टिक पाऊंगा, इसलिए फिल्मों से एक मूवी के बाद ब्रेक ले लिया.

अभी क्या डिसाइड किया है, ऐक्टिंग या सिंगिंग?

मुझे दोनों करने हैं. सिंगिंग के साथसाथ ऐक्टिंग मैं बचपन से करता आ रहा हूं. फिल्म ‘रंगीला’, ‘अकेले हम अकेले तुम’ और ‘परदेश’ सभी फिल्मों में मैं ने गाने गाए और ऐक्टिंग भी की है. देखिए, फिल्म ‘रामलीला’ के लिए मैं संजय सर के पास असिस्टैंट डायरैक्टर बनने गया था, पर वहां मुझे 2 गाने मिल गए, इस का मतलब मैं हर तरह का काम करने को तैयार रहता हूं.

फिल्मों में चाइल्ड ऐक्टर के बाद ऐंकरिंग में कैसे आ गए?

इस की भी एक कहानी है. फिल्मों में सिंगिंग मैं ने छोटी उम्र से ही शुरू कर दी थी. किसी ने बताया कि टीवी पर एक म्यूजिक का रिएलिटी शो शुरू होने वाला है. उस में होस्ट के लिए शो के निर्देशक मुझे अप्रोच करने वाले हैं. संगीत आधारित शो होने के कारण मैं ने हां कर दी कि चलो, कैमरे के सामने तो आने को मिलेगा. पर यह शो इतना सक्सैस होगा मैं ने कभी सोचा भी नहीं था. एक प्रस्तोता के रूप में मुझे लोगों का बहुत प्यार मिला. तब से ले कर आज तक इसी तरह का प्यार मिलता गया और आज में ‘सारेगामापा’ को 5वीं बार होस्ट कर रहा हूं.

‘सारेगामापा’ के पहले शो की अपेक्षा यह किस तरह अलग है?

यह सीजन पिछले सीजन से बिलकुल अलग है. इस में कई सारे बदलाव किए गए हैं. जज पैनल में मीका, साजिदवाजिद, प्रीतम के साथ 40 लोगों का स्पैशल जूरी पैनल है, जिस में संगीत, कला, मीडिया, बिजनैस से जुड़े लोग शामिल हैं, जो हर प्रतियोगी को अपने कौशल की कसौटी पर तराशते हैं. इस बार औडिशन पर भी बहुत खर्च किया गया. करीब 17 शहरों में जा कर 500 लोगों में से सुपर 100 को चुनना और 100 में से सुपर 12 का चयन करना बड़ी टेढ़ी खीर है. औडिशन के दौरान तो हम लोगों ने 12 से 14 घंटे लगातार काम किया है. हमारा उद्देश्य दुनिया को सर्वश्रेष्ठ गायक देना है.

इस तरह के शो क्या वाकई एक स्ट्रगलर को प्लेटफौर्म देते हैं?

इंडस्ट्री में जितने भी नए गायकों पर आप नजर डालें, तो आप पाएंगे कि उन की शुरुआत ही रिएलिटी शो के माध्यम से हुई है. उन्हें आम से खास बना कर लोगों से उन की कला को परिचित कराने का माध्यम ये रिएलिटी शो ही हैं. श्रेया घोषाल से ले कर कुणाल गांजेवाला तक सभी को इन शोज की ही बदौलत प्रसिद्धि मिली है. छोटे शहरों के कलाकार भी देश ही नहीं दुनिया में अपनी पहचान बनाने का काम इन शोज के जरिए बखूबी कर रहे हैं.

छोटे परदे पर आ रहे डेली सोप करने का मन हुआ कभी?

सही बताऊं तो मेरी इच्छा कभी नहीं रही कि मैं टीवी पर ऐक्टिंग करूं, क्योंकि टीवी पर किसी शो को होस्ट करना और ऐक्टिंग करने में जमीनआसमान का अंतर है, और डेली सोप में ऐक्टिंग करने का मतलब है आप के पास पर्याप्त समय का होना और वह मेरे पास नहीं है, क्योंकि अगर यहां समय दूंगा तो संगीत के लिए समय नहीं निकाल पाऊंगा. संगीत तो मेरी नसनस में बसा हुआ है. इस से मैं दूर हो ही नहीं सकता.

म्यूजिक इंडस्ट्री में कंपीटिशन कितना बढ़ा है?

देखिए, हर क्षेत्र की तरह इस क्षेत्र में भी कंपीटिशन बढ़ा है, जो अच्छा है, क्योंकि जब प्रतियोगिता होगी तभी तो अच्छा परिणाम सामने आएगा. पहले तो गिनेचुने गायक ही होते थे पर अब कई रिएलिटी शोज के माध्यम से गायकों की संख्या बढ़ी है, जो हर विधा का संगीत जानते हैं. आज के संगीत में बहुत विविधता है. शास्त्रीय संगीत के साथ वैस्टर्न संगीत भी खूब पौपुलर हो रहा है, लेकिन एक ट्रैंड बहुत खराब चल गया है कि यदि आप को काम चाहिए तो किसी कंपनी के साथ करार करना होगा और एक कौन्ट्रैक्ट साइन कर के देना होगा तभी आप को काम मिलेगा. अगर उस कंपनी के अलावा कहीं दूसरी जगह आप गाना गाते हैं तो अपने मेहनताने से निश्चित परसैंटेज देना होगा. अब आप ही बताएं काम मैं करूं और परसैंटेज दूसरे को दूं. यह बात मेरी समझ से बाहर है. आजकल एक ही फिल्म में कईकई गायकों से गाना गंवाना और कई संगीतकार रखने का ट्रैंड चल पड़ा है जो मुझे पसंद नहीं आता. इस में किसी को भी फिल्म के संगीत का श्रेय नहीं मिल पाता सारी शोहरत और पैसा कंपनी के हाथोंमें चला जाता है.

आप ने भी ऐसा कोई कौंट्रैक्ट साइन किया है क्या?

बिलकुल नहीं और न ही कभी करूंगा, क्योंकि मेरे हालात ऐसे नहीं कि खर्च चलाने के लिए काम मिलता रहे. मैं संगीत को बेचता नहीं हूं उस की साधना करता हूं. मैं कभी नहीं चाहूंगा कि किसी भी शो के लिए मिले पैसों से किसी दूसरे के साथ हिस्सा बांटूं, क्योंकि मेहनत मैं करता हूं तो पूरे पैसों पर भी मेरा ही हक बनता है.

तकनीकी गायकों की गायकी अच्छी है या खराब?

आज सारा संगीत तकनीक में बंध चुका है. म्यूजिकल इंस्ट्रूमैंट से ले कर सिंगर की आवाज तक सभी तकनीकसे बंधे हैं. आज सभी अच्छे संगीतकार तकनीक का उपयोग कर के संगीत में नए प्रयोग कर रहे हैं. गायकी में भी यही बात लागू होती है, मैं तो कहूंगा आज की तकनीक ने संगीत और गायन को निखारने में मदद की है.

तो इन्होंने कह दिया राजन को ‘टाइम बम’

बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन पर फिर से हमला बोलते हुए कहा है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) के पूर्व अर्थशास्त्री ने भारतीय वित्तीय प्रणाली में एक 'टाइम बम' लगा दिया है, जो दिसंबर में फटेगा.

स्वामी ने पिछले महीने दो बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर ब्याज दरों को ऊंचा रखने के लिए राजन को हटाने की मांग की थी. इस बार उन्होंने ट्विटर के माध्यम से राजन की आलोचना की है.

स्वामी ने ट्विट किया, 'आर 3 (रघुराम राजन) ने 2013 में हमारी वित्तीय प्रणाली में टाइम बम लगा दिया. इसका टाइमर दिसंबर, 2016 रखा गया है. एफ.ई. में चुकाए जाने वाले 24 अरब डॉलर का भुगतान हमारे बैंकों को करना होगा.' हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि क्या एफ.ई. से उनका आशय किससे है?

इस बारे में रिजर्व बैंक से कोई सफाई नहीं मिली है. इससे पहले स्वामी ने 26 मई को राजन के खिलाफ छह आरोप लगाते हुए प्रधानमंत्री से उनको हटाने की मांग की थी. इनमें से एक आरोप राजन द्वारा गोपनीय और संवेदनशील सूचनाएं दुनिया भर में भेजने का भी था.

वहीं इससे पहले स्वामी ने दावा किया था कि राजन मानसिक तौर पर पूर्ण भारतीय नहीं हैं और उन्होंने जानबूझकर भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया है. स्वामी की पूर्व की टिप्पणियों पर राजन ने कल कहा था कि कुछ ऐसे आरोप हैं, जो बुनियादी तौर पर गलत और आधारहीन है और उनपर कुछ बोलने का मतलब उन्हें भाव देना होगा.

मैं अजहर का फैन: इमरान हाशमी

फिल्म इंडस्ट्री में ‘सीरियल किसर’ के तौर पर मशहूर हीरो इमरान हाशमी ने अपने कैरियर की शुरुआत फिल्म ‘फुटपाथ’ से की थी. यह फिल्म नाकाम रही थी, पर इस के म्यूजिक की तारीफ हुई थी. साल 2004 में इमरान हाशमी की फिल्म ‘मर्डर’ ने उन्हें सितारों की ऊंचाई तक पहुंचा दिया था. इस के बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. हाल ही में इमरान हाशमी की फिल्म ‘अजहर’ बड़े परदे पर आई. इस फिल्म में उन्होंने क्रिकेटर मोहम्मद अजहरुद्दीन का किरदार निभाया. पेश हैं, इमरान हाशमी से हुई बातचीत के खास अंश:

फिल्म ‘अजहर’ को करना आप के लिए कितना मुश्किल था?

इस फिल्म में क्रिकेटर मोहम्मद अजहरुद्दीन की जिंदगी को ड्रामे के तौर पर दिखाया गया है. इस में वे घटनाएं ली गई हैं, जो मोहम्मद अजहरुद्दीन के साथ साल 2000 में हुई थीं. उन पर ‘मैच फिक्सिंग’ का आरोप कैसे लगा, उन्होंने पैसा लिया था या नहीं, कोर्ट का उन को ‘क्लीन चिट’ देना और उस दौरान उन की निजी जिंदगी पर क्या गुजरी थी को दिखाने की कोशिश की गई है. मेरे लिए यह फिल्म आसान नहीं थी, क्योंकि बहुत से लोग मोहम्मद अजहरुद्दीन के ‘फैन’ हैं. ऐसे में मैं अगर कुछ भी गलत करूंगा, तो लोग फिल्म को नकार देंगे. उन का किरदार निभाना मुश्किल था. वे कैसे चलते हैं, कैसे बातें करते हैं, सभी बातों को परदे पर उतारा. मैं मोहम्मद अजहरुद्दीन से भी कई बार मिला था. उन्होंने बहुत सहयोग दिया. मैं ने उन के साथ 3 महीने तक क्रिकेट की ट्रेनिंग भी ली.

आप अजहर के कितने बड़े फैन हैं?

मैं अजहर का जबरदस्त फैन हूं. साल 2004 में जब उन की आलोचनाएं हुईं, तो मुझे भी अजीब लगा था. लेकिन कानून पर भरोसा था. लोगों ने कहा कि उन्होंने पैसा लिया, खेल को नुकसान पहुंचाया, लेकिन मुझे उन पर पूरा भरोसा था. जब मैं ने इस फिल्म को किया, तो मेरे मन में भी बहुत सारे सवाल थे, जिन के जवाब अब मुझे मिल गए हैं.

आप का चेहरा अजहरुद्दीन से एकदम मेल नहीं खाता. ऐसे में क्या मुश्किलें आईं?

पहले मोहम्मद अजहरुद्दीन के चेहरे को बनाने के लिए फेसियल मास्क सोचा गया था, लेकिन हैदराबाद की आबोहवा में वह गल जाता है. ऐसे में ट्रैडिशनल मेकअप का इस्तेमाल किया गया. इस में यंग लुक के लिए हेयर, कपड़े, उन की छोटीछोटी चीजों पर ज्यादा ध्यान दिया गया.

आप को फिल्म इंडस्ट्री में ‘सीरियल किसर’ कहा जाता है. आप इस बारे में क्या कहना चाहेंगे?

अब मैं इस इमेज से बाहर निकल चुका हूं. लेकिन लोग नहीं निकले हैं. मैं इस इमेज से भागता नहीं, लेकिन फिल्म में अगर ऐसे सीन हैं, तो उन्हें करना पड़ता है. मैं किसी भी सीन को कहानी के हिसाब से देखता हूं.

क्या आप को अजहरुद्दीन की पहली पत्नी नौरीन और दूसरी पत्नी संगीता बिजलानी से मिलने का मौका मिला?

इस फिल्म में अजहरुद्दीन की पर्सनल लाइफ को ही ज्यादा दिखाया गया है, क्योंकि खेल को तो लोगों ने काफी देखा है. पर उन के पत्नी के साथ बिताए पल, कैसे शादी हुई, कैसे अलग हुए, फिर संगीता बिजलानी से कैसे मिले, यह सब से ज्यादा रोचक है. हां, मैं नौरीन और संगीता दोनों से मिला हूं. दोनों ने मुझे इस किरदार को समझने में मदद की.

हरदम नया सीखने की चाह रखें: राधिका आप्टे

मराठी फिल्मों से बौलीवुड का रुख करने वाली अभिनेत्री राधिका आप्टे ने हमेशा लीक से हट कर फिल्में कीं और अपनी अलग पहचान बनाई. कम समय में बड़ी पहचान बनाने वाली राधिका की कई फिल्में काफी हिट रहीं, जिन में हिंदी फिल्म ‘मांझी, द माउंटेन मैन’ बंगला फिल्म ‘अहिल्या’, मराठी फिल्म ‘घो मला असला हवा’ काफी चर्चित रहीं. बचपन से ही अभिनय का शौक रखने वाली राधिका महाराष्ट्र, पुणे से हैं. उन के पिता डा. चारुदत्त आप्टे न्यूरोसर्जन हैं. पढ़ाई पूरी करने के दौरान ही राधिका ने अभिनय शुरू कर दिया था. स्कूलकालेज के हर फंक्शन में वे बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थीं. उन्होंने कत्थक नृत्य के साथसाथ कंटैम्परेरी डांस भी सीखा.

अत्यंत स्पष्टभाषी और बोल्ड स्वभाव की राधिका ने 2013 में अपने परिचित दोस्त ब्रिटिश संगीतकार बेनेडिक्ट टेलर से शादी की. राधिका ने मराठी और हिंदी फिल्मों के अलावा तमिल, तेलुगू और मलयालम फिल्मों में भी काफी नाम कमाया. फिल्म ‘वाह, लाइफ हो तो ऐसी’ उन की पहली हिंदी फिल्म थी. बड़ी फिल्मों के अलावा उन्होंने कई छोटी फिल्में भी की हैं, जो उन की अभिनय कला की बारीकियों को दर्शाती हैं. वे हर फिल्म को चैलेंज की तरह ऐक्सैप्ट करती हैं और उसे पूरा समय भी देती हैं. अपनी फिल्म ‘फोबिया’ के प्रमोशन को ले कर भी वे काफी व्यस्त रहीं. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के कुछ खास अंश :

इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा कहां से मिली?

बचपन से ही अभिनय की इच्छा थी. जिस स्कूल में मैं पढ़ती थी वहां रचनात्मक गतिविधियां खूब होती थीं और मैं और मेरी दोस्त कहानियां लिख कर उन पर परफौर्म करते थे. जब बड़ी हुई तो कालेज में अभिनय करने लगी. ऐक्टिंग के अलावा जैसे मैं ने कभी कुछ और सोचा ही नहीं था.

पहली फिल्म कैसे मिली?

मैं नाटकों में अभिनय करती थी. कालेज में पढ़ते हुए मैं ने ‘आसक्ता कला मंच’ के साथ काफी काम किया. जब मेरा एक शो मुंबई में था तो काफी लोग उसे देखने आए. उन्होंने मेरे अभिनय को काफी पसंद किया और मुझे पहली मराठी फिल्म मिल गई.

क्या परिवार का सहयोग मिला, जबकि आप के पिता डाक्टर हैं?

हमारे परिवार में हर कोई एकदूसरे की इच्छा का सम्मान करता है. कोई भी आपत्ति नहीं जताता. मुझे लगता है कि आप तभी सफल हो सकते हैं जब आप को परिवार का सहयोग मिले. मुझे मेरी फैमिली फुल सपोर्ट करती है.

आप की हाल ही में रिलीज फिल्म ‘फोबिया’ कैसी है और उस में आप की क्या भूमिका है?

यह एक साइको थ्रिलर फिल्म है. यह महक नामक एक युवती की कहानी है जो एग्रोफोबिया की शिकार होती है. कुछ ऐसा होता है कि वह घर से बाहर नहीं निकल सकती. दरअसल, हमारे देश में लोग फोबिया के बारे में कम जानकारी रखते हैं. यह एक प्रकार का डिप्रैशन है जो लोगों की नजरों में पागलपन है. इस में हम ने पैनिक अटैक को भी दिखाने की कोशिश की है.

इस भूमिका के लिए कितनी तैयारी करनी पड़ी?

मैं ने अपनी पहचान के एक मनोवैज्ञानिक से बात की और अपने न्यूरोसर्जन पिता से भी राय ली. पूरी जानकारी हासिल की कि ऐसे रोगी कैसे दिखते हैं. उन का व्यवहार कैसा होता है, इस के अलावा मेरे 2 दोस्त ऐसे भी हैं जो पैनिक अटैक के शिकार हैं, जिन के साथ मैं ने काम किया है. मैं ने उन के व्यवहार को समझा व पैनिक अटैक से संबंधित वीडियोज भी देखे यानी काफी रिसर्च वर्क किया, जो काफी मुश्किल था.

आप हमेशा लीक से हट कर फिल्में करती हैं, इस की वजह क्या है?

मैं हर तरह की फिल्में करना चाहती हूं. मैं खासकर ऐसी फिल्में साइन करती हूं जिन में खुद को फिट कर सकूं. फिर चाहे वे किसी भी भाषा की फिल्में हों. अभी मैं ने दक्षिण के सुपरस्टार रजनीकांत के साथ फिल्म साइन की है. एक मराठी फिल्म भी जल्द साइन करने वाली हूं. मेरे हिसाब से हर वह फिल्म कमर्शियल फिल्म होती है जिस के टिकट बेचे जाते हैं.

आप का ड्रीम प्रोजैक्ट क्या है?

मुझे हमेशा अच्छा काम मिले यही मेरा ड्रीम है. एक बायोपिक करने की इच्छा है जिस की बात चल रही है.

कितना संघर्ष किया?

अच्छी फिल्म के लिए संघर्ष तो हमेशा करना पड़ता है और यह आगे भी जारी रहेगा.

आप के साथ परिवार में कौनकौन हैं?

मैं और मेरे पति. मेरे पति लंदन में ज्यादा रहते हैं.

क्या नाटकों में अभी कुछ कर रही हैं?

अभी तक गिरीश कर्नाड के साथ मराठी प्ले ‘उने पूरे शहर एक’ कर रही थी जो अब बंद हो चुका है पर आगे भी नाटक करती रहूंगी.

अब तक आप कितनी ‘ग्रो’ कर चुकी हैं? आप के दिल के करीब कौन सी फिल्म है?

मैं हर प्रोजैक्ट के साथ नई बातें सीखती हूं और जितना भी नया सीखने को मिले सीखती हूं. जितना अभ्यास होगा आप काम में उतने ही परिपक्व होते जाएंगे. पहली मराठी फिल्म ‘घो मला असला हवा’ मेरी सब से प्रिय फिल्म है.

खाली समय में क्या करती हैं?

फिल्में देखती हूं व खाना बनाती हूं.

किस बात पर गुस्सा आता है?

नियम तोड़ कर गाड़ी चलाने वालों पर गुस्सा आता है. इस के अलावा जो लोग समय पर काम नहीं करते उन पर भी बहुत गुस्सा आता है.

महिलाओं को क्या संदेश देना चाहती हैं?

महिलाओं को परिवार के साथसाथ अपना ध्यान भी रखना चाहिए. जिम्मेदारी सिर्फ पुरुषों की ही नहीं महिलाओं की भी होती है, ऐसे में उन्हें अपनी प्रतिभा, अपनी पसंद को आगे बढ़ाना आवश्यक है. इस के अलावा सभी महिलाएं शिक्षित होनी चाहिए ताकि उन पर अत्याचार और जुल्म न हों, वे खुद ही इस का विरोध कर सकें.

आप को फिल्म ‘फोबिया’ में अभिनय करते वक्त क्याक्या कठिनाइयां आईं?

इस में कठिनाई से अधिक मेकिंग में अपनेआप को फिट बैठाना मुश्किल था. यह बौलीवुड की पहली ऐसी फिल्म है, जिस में वर्चुअल रिएलिटी टैक्नोलौजी का प्रयोग हुआ है. वर्चुअल रिएलिटी एक कंप्यूटर टैक्नोलौजी है जिस के जरिए पर्यावरण की उन चीजों को दोहराया जा सकता है जो वास्तविक और काल्पिनक हों. साथ ही इस का प्रयोग करने वाले को इस बात का एहसास होता है कि वे उस जगह पर है और वहां मौजूद लोगों को छू सकता है, महसूस कर सकता है, सुन सकता है. इसे दिखाने का अर्थ यह है कि एग्रोफोबिया के शिकार व्यक्ति खुद इस बीमारी से कैसे बाहर निकलें.

आप की खूबसूरती का राज क्या है? अपनेआप को फिट रखने के लिए क्या करती हैं?

मैं जंक फूड से अपनेआप को कोसों दूर रखती हूं. इस के अलावा अधिक कार्बोहाइड्रेट और मीठा नहीं लेती. अधिक विटामिन और प्रोटीनयुक्त भोजन लेती हूं. ब्रेकफास्ट में टोस्ट आदि लेती हूं. इस के अलावा दूध और फ्रूट जूस भी ले लेती हूं.

लंच टाइम में सीमित खाना खाती हूं, क्योंकि वह समय काम का होता है. डिनर में फिश या चिकन अवश्य खाती हूं. रात को सोने से पहले ग्रीन टी भी मेरे रूटीन में शामिल है. गरमियों में तरल पदार्थ अधिक लेती हूं.

वर्कआउट मेरे डेली रूटीन में अवश्य शामिल होता है. सप्ताह में 4 दिन जिम जाती हूं, जिस में स्विमिंग और कार्डिया भी शामिल हैं. अगर शूटिंग में व्यस्त हूं तो सुबह उठ कर दौड़ती हूं या स्विमिंग करती हूं.

मेरे हिसाब से खूबसूरती अंदर से आती है, जिस के लिए हमेशा फिट रहना, सही डाइट लेना जरूरी है. हर व्यक्ति अपनेआप में सुंदर है, जरूरत है उसे निखारने की. अपनेआप में आत्मविश्वास की.

राधिका आप्टे का फिल्मी सफरनामा

वर्ष          फिल्म

2005        –       वाह, लाइफ हो तो ऐसी

2006        –       दरमियान

2010        –       द वेटिंग रूम

2011        –       आई एम

2011        –       शोर इन द सिटी

2015        –       बदलापुर

2015        –       मांझी, द माउंटेन मैन

2015        –       कौन कितने पानी में

2016        –       फोबिया

2016

विंबलडन से बाहर हुए राफेल नडाल

कलाई की चोट से जूझ रहे स्पेन के राफेल नडाल इस साल विंबलडन में हिस्सा नहीं लेंगे. चोट के कारण ही उन्होंने फ्रेंच ओपन बीच में ही छोड़ दिया था. विंबलडन में हिस्सा नहीं लेने की जानकारी नडाल ने अपने फेसबुक पेज पर दी.

30 वर्षीय दुनिया के पूर्व नंबर एक खिलाड़ी नडाल ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा,"मैं आपको ये जानकारी देना चाहता हूँ कि अपने मेडिकल चेक अप और डॉक्टर से बात करने के बाद इस महीने के अंत में होने वाले विंबलडन में हिस्सा नही ले पाऊंगा."

उन्होंने आगे लिखा, आप इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि यह फैसला लेना मेरे लिए कितना मुश्किल था. लेकिन रौलां गैरोस में मुझे जो चोट लगी, उसे उबरने में समय लगेगा. 14 ग्रैंड स्लैम खिताब जीत चुके नडाल ने 2008 और 2010 में विंबलडन जीता था.

9 बार फ्रेंच ओपन जीत चुके नडाल को यह टूर्नामेंट चोट के कारण दो राउंड के बाद ही छोडऩा पड़ा. गौरतलब है कि चोटों के कारण नडाल का विंबलडन से नाता उतार-चढ़ाव वाला रहा है. चोट के कारण वह 2004 और 2009 में इस टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं ले पाए थे. वहीं, 2012 में वह दूसरे राउंड में ही बाहर हो गए, जबकि 2013 में वह पहले राउंड से आगे नहीं जा पाए थे. पिछले साल भी वह दूसरे राउंड में बाहर हो गए थे.

नडाल को लंबे समय से प्रशीक्षण दे रहे उनके चाचा टोनी नडाल ने बताया कि हम अभी यह बताने की स्थिति में नहीं हैं कि राफेल कब कोर्ट पर वापसी करेंगे. टोनी ने आगे कहा कि रियो ओलंपिक्स में राफेल हिस्सा ले रहे हैं और इसके लिए चोट के चलते हम उन्हें खतरे में नहीं डाल सकते.

छुट्टियों का सदुपयोग करें

इन छुट्टियों में क्या किया है या करने वाले हैं? वही आरामतलबी न? देर से उठना, मोबाइल पर चिपके रहना. बारबार कोक को गले में उड़ेलना. कभी इस पर तो कभी उस पर झल्लाना. हो सके तो दोस्तों के साथ 7-8 दिन के लिए कहीं दूसरे शहर घूमफिर आना. पर यह जीवन नहीं है. यह उम्र बचपन व जवानी के बीच की है जब एक पौधा अपनी जगह बनाता है. अपनी जड़ें गहरी करता है. शाखाएं मोटी करता है पर इस के लिए कमजोर पौधे को मेहनत करनी पड़ती है, उसे धूप का क्लोरोफौर्म कार्बन में बदलना होता है, जड़ों से मिट्टी के मिनरल जमा करने होते हैं ताकि एक मजबूत पेड़ बना जा सके.

अपनी मजबूती दिखाने के लिए आज के किशोरों के पास ज्यादा कुछ नहीं है. 2-3 पीढ़ी पहले 12-14 साल के बेटों को काम पर ले जाया जाता था, तो बेटियों को रसोई के काम सौंप दिए जाते थे. आज लाडप्यार में मातापिता इन को नर्सरी में रखते हैं, सुरक्षित रखते हैं. इन के मनोरंजन का भी पूरा खयाल रखते हैं, लेकिन मजबूती का नहीं. जरूरत है छुट्टियों का सही उपयोग करने की. इन दिनों घर की पूरी सफाई कर डालें. मां के काम में हाथ बटाएं व रसोई का काम सीखें. पिताजी के बाहर के अधिकतर काम कर डालें. बैंक, पोस्टऔफिस में कैसे काम करते हैं, सीख आएं. कार या बाइक कैसे ठीक होती हैं, समझ लें. बिजली का छोटामोटा काम कैसे करें, जान लें. जानकारी जो स्कूली कोर्स में नहीं है, किताबों में नहीं है पता कर लें. आज के किशोर के पास तो मोबाइल भी है, जिस में क्या कैसे होता है या होना चाहिए, यह ज्ञान भरा पड़ा है. मोबाइल सिर्फ कान में इयरफोन लगा कर गाने सुनने या बातें करने के लिए ही नहीं है.

इन छुट्टियों में वे सब बातें जानने की कोशिश करें जो आप ने कभी नहीं सीखीं. घर के लिए मरम्मत का सामान होलसेल मार्केट से ले आएं. प्लास, पेचकश, वायर कटर, आरी, तार, फ्यूज, स्विच, फेवीकोल, रंग, ब्रश, ये सब जीवन भर चाहिए, पर सीखने का यही सब से अच्छा समय है. दस्ताने हाथों पर चढ़ाएं, लड़का हो या लड़की, काम पर लग जाएं. कुछ नया करना सीख लें. यह आत्मविश्वास के लिए भी जरूरी है. इन छुट्टियों में एक जिम्मेदार व्यक्ति बनने का कोर्स करना है

पढ़ाई न छोड़ें. ये सब काम दिन में 3-4 घंटे करने काफी हैं जो बदल भी दें और घर को चमका भी दें. हम बता दें यह चमक आप के चेहरे पर भी नजर आएगी, पक्का है.

दो लफ्जों की कहानीः कोई भविष्य नहीं

अभिनेता से निर्देशक बने दीपक तिजोरी अतीत में ‘‘उप्स’’, ‘‘खामोश’’, ‘‘फरेब’’, ‘‘टाम डिक एंड हैरी’’, ‘‘फाक्स’’ जैसी फिल्में निर्देशित कर चुके हैं. पूरे सात साल बाद बतौर निर्देशक दीपक तिजारी एक कोरियन फिल्म ‘‘आलवेज’’ का हिंदी रूपांतरण ‘‘दो लफ्जों की कहानी’’ के नाम से लेकर आए हैं. फिल्म का इंटरवल तक का हिस्सा परी तरह से एक टीवी सीरियल की तरह चलता है. इंटरवल के बाद कहानी में कई मोड़ आते हैं, पर कुछ मोड़ क्यों है, इसकी वजह साफ नहीं होती. यानी कि पटकथा की कमजोरी साफ तौर पर नजर आती है.

फिल्म की कहानी मलेशिया में रह रहे भारतीय व पूर्व बाक्सर सूरज (रणदीप हुड्डा), जो कि कभी स्ट्राम्स के नाम से मशहूर थे, से शुरू होती है. वह सुबह से रात तक कई काम कर रहा है. वह चैन से नहीं बैठता. एक दिन उसकी मुलाकात नेत्र हीन भारतीय लड़की जेनी (काजल अग्रवाल) से होती है. धीरे धीरे दोनों में प्यार  हो जाता है और दोनो शादी करने का निर्णय लेते हैं. तब पता चलता है कि कभी वह बाक्सर था और हेनरी के साथ जुड़ा हुआ था. सूरज एक मैच हारता है, जिससे हेनरी (अनिल जार्ज) भी सड़क पर आ जाता है और बाक्सिंग की उसकी सदस्यता भी रद्द हो जाती है. वह यह मैच एक साजिश की वजह से जानबूझकर हारा था. पर बाद में उसे इसका पश्चाताप होता है.

फिर वह दूसरों के पैसे की वसूली करके देने का काम करने लगता है. इसी काम को करते समय एक हादसा ऐसा होता है, जिसमें एक कार भी दुर्घटनाग्रस्त होती है. कुछ समय बाद राज खुलता है कि इस कार को जेनी चला रही थी. जेनी की आंखें चली गयी और उसके माता पिता की मौत हो गयी थी. खैर, शादी से पहले खुद को स्थापित करने के लिए सूरज फिर से हेनरी के संग बाक्सिंग क्लब से जुड़कर मेहनत करने लगता है. अब वह फिर से किक बाक्सिंग के मैच लड़ना चाहता है. इसी बीच उसे पता चलता है कि यदि जेनी की आंखों का आपरेशन कराया जाए तो वह फिर से देख सकती है. सूरज को पता चल चुका है कि उसी की वजह से जेनी को अपने माता पिता खोने पड़े और वह अंधी हुई थी. इसलिए अब वह उसकी आंखों का आपरेशन करवाना चाहता है. इस तरह उसने जिस अपराध को किया ही नही है, पर उसके पश्चाताप में अब तक वह जलता आ रहा था, उससे वह छुटकारा पा सकेगा.

जेनी की आंख के ऑपरेशन के लिए उसे पंद्रह दिन में तीन लाख रूपए चाहिए. ऐसे में एक अन्य बाक्सर सिद्धार्थ उससे कहता है कि वह गेविन से मिले. गेविन उसे मुंहमांगी रकम इस शर्त पर देता है कि उसे एक मैच अपनी पहचान छिपाकर लड़ना पड़ेगा. इस मैच में ज्यादातर लोग जिंदा नही बचते. यह मैच गैरकानूनी होता है. इसलिए पकड़े जाने पर वह खुद जिम्मेदार होगा. इस मैच के लिए वह जाता है. तो पता चलता है कि उसका मुकाबला सिद्धार्थ से ही है और सिद्धार्थ उसे हमेशा के लिए खत्म कर देना चाहता है. पर किसी तरह सूरज बच जाता है.

तब गेविन उसे ड्रग्स का पैकेट किसी को देने भेजता है. रास्ते में फिर सिद्धार्थ मिलता है और उसे मरा हुआ छोड़कर चला जाता है. पर पता चलता है कि छह माह बाद अस्पताल में जेनी की उससे एक अलग नाम से मुलाकात होती है. फिर नाटकीय ढंग से जेनी व सूरज मिल जाते हैं. पर सवाल यह है कि सूरज, सरफराज बनकर दूसरे देश गया था. वहां से वह वापस मलेशिया कैसे पहुंचा. सिद्धार्थ ने सूरज को खत्म करने की कोशिश क्यों की?

कोरियन फिल्म ‘‘आलवेज’’ का भारतीयकरण करते समय दीपक तिजोरी ने ऐसे मसाले पिरोए हैं कि फिल्म‘‘दो लफ्जों की कहानी’’ देखते हुए दीपिका पादुकोण व नील नितिन मुकेश की फिल्म ‘‘लफंगे परिंदे’’ की याद आ जाती है. कहने का अर्थ यह कि कहानी में कोई नयापन नहीं.

जहां तक अभिनय का सवाल है, रणदीप हुड्डा ने काफी मेहनत की है. जिन्होंने कोरियन फिल्म ‘आलवेज’ देखी है, उन्हें कोरियन अभिनेता व रणदीप हुड्डा में काफी समानताएं नजर आएंगी. मिक्स्ड मार्शल आर्ट हो या रोमांटिक दृश्य हर जगह वह छा जाते हैं. वह पूरी फिल्म में अपने अभिनय की छाप छोड़ते हैं, मगर अफसोस की बात यह है कि उनके हिस्से कमजोर पटकथा व कमजोर निर्देशक ही आते हैं. जेनी के किरदार में काजल अग्रवाल ने ठीक ठाक काम किया है. वैसे उनके हिस्से में मुस्कुराने के अलावा ज्यादा कुछ करने को था ही नहीं. फिल्म के सारे गाने पृष्ठभूमि में हैं, जो कि ठीक ठाक बन गए हैं.

वक्त के साथ दीपक तिजोरी अपने आपको नहीं बदल पाए. अभी भी वह बीस साल पहले के युग में जी रहे हैं. इसी के चलते उसी तरह के घटनाक्रमों का ताना बाना इस फिल्म में बुना है. जो कि फिल्म को नीरस बना देते हैं. प्रेम कहानी को लेकर कोई दिलचस्पी दर्शक के मन में पैदा नहीं होती. बल्कि दर्शक यह सोचता रहता है कि यह फिल्म कब खत्म होगी.

निर्देशक के तौर पर दीपक तिजोरी ने इस फिल्म को तहस नहस किया है. रणदीप हुड्डा की परफार्मेंस के चलते भले इस फिल्म को कुछ दर्शक मिल जाएं, अन्यथा इस फिल्म का कोई भविष्य नहीं. फिल्म में न तो इमोशन हैं और न ही प्रेम कहानी ही सही ढंग से उभर पाती है. कैमरामैन मोहाना कृष्णा ने जरुर फिल्म में खूबसूरती लाने का काम किया है. पटकथा लेखक गिरीश धमीजा कई जगह चूक गए हैं. फिल्म के कई दृश्य लाजिकली सही नहीं बैठते. मसलन- जेनी किस वजह से अपने घर से कई किलोमीटर दूर एक पार्किंग गैरेज की सिक्यूरिटी केबिन में सिर्फ टीवी पर एक सीरियल देखने हर दिन जाती है?

दो घंटे सात मिनट की फिल्म ‘‘दो लफ्जों की कहानी’’ का निर्माण धीरज शेट्टी, अविनाश वी राय, धवल जयंती लाल गाड़ा ने किया है. निर्देशक दीपक तिजोरी, पटकथा लेखक गिरीश धमीजा, संगीतकार बबलील हक, अमान मलिक, अंकित तिवारी, अर्जुन हरजे, कैमरामैन मोहाना कृष्णा तथा कलाकार हैं- रणदीप हुड्डा, काजल अग्रवाल, अनिल जार्ज, मामिक.

घुटनों के इलाज के लिए वरदान है ये तकनीक

नई अभिनव घुटना नेविगेशन प्रणाली आर्थअलाइन (पंजीकृत) को सफलतापूर्वक दिल्ली में शुरू किया गया है. यह उन्नत उपकरण एक सरल, हथेली के आकार के एकल उपयोग डिवाइस के रूप में सटीक अलाइनमेंट टेक्नोलॉजी प्रदान करता है, जो टोटल नी आर्थोप्लास्टी सर्जरी के परिणामों में सुधार लाती है.

हालिया अध्ययनों से पता चला है कि आर्थअलाइन (पंजीकृत) टेक्नोलॉजी पारंपरिक मैकेनिकल गाइड्स और पारंपरिक कैस सिस्टम की तुलना में अलाइनमेंट में सुधार करती है. इस घुटनों के अलाइनमेंट सिस्टम से टिबिआ और फीमर जैसी गंभीर विकृति के मामलों में सफलतापूर्वक मार्गनिर्देशन किया गया है.

आर्थोप्लास्टी जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार 94.9% आर्थअलाइन मरीजों का “नी रिप्लेसमेंट” (फीमरल कंपोनेंट) न्युट्रल कोरोनल अलाइनमेंट के 2 डिग्री के भीतर अलाइन्ड था, जबकि कंप्यूटर की मदद से सर्जरी के पारंपरिक तरीके की सहायता लेनेवाले मरीजों में यह आंकड़ा 92.5% था. इसके अलावा आर्थअलाइन की मदद लेनेवालों में अंग का समग्र यांत्रिक अलाइनमेंट प्रदर्शन भी बेहतर था.

दिल्ली के डॉ राजेश मल्होत्रा; वरिष्ठ प्रोफेसर,अस्थियों और संयुक्त रिप्लेसमेंट सर्जन (एम्स) ने कहा, ‘‘आर्थअलाइन के साथ कंप्यूटरीकृत सहायता से सर्जन को बहुत मदद मिलती है. यह बेहतर परिणाम देने के लिए ‘नी इम्पलांट’ की स्थिति और सटीक अलाइनमेंट पाने में मदद करता है. कंप्यूटराइज्ड सर्जरी में सर्जन सही कोण में हड्डी को कट कर सकते हैं और घुटनों के आसपास के नरम ऊतकों का संतुलन कर सकते हैं.’’

डॉ. राजेश मल्होत्रा ने आगे कहा, की रिप्लेसमेंट (घुटना प्रत्यारोपण) प्रक्रिया में इम्प्लांट की शेल्फ लाइफ (टिकाऊपन) इस पर निर्भर करता है कि हड्डी के साथ इम्प्लांट कितनी अच्छी तरह अलाइन्ड है. कंप्यूटर की सहायता से की गई सर्जरी न केवल सटीक बल्कि सुरक्षित भी है. इसका अतिरिक्त लाभ यह है कि इसमें अस्पताल में कम समय रहना पड़ता है, कम खून बहता है, सर्जरी के बाद जटिलताओं का जोखिम कम होता है और दोबारा टीकेआर (टोटल नी रिप्लेशमेंट) की जरूरत नहीं पड़ती है. इस तरह की उन्नत व्यवस्था मरीजों के भय को दूर करने और अपने जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए सर्जरी की स्वाभाविक चीर-फाड़ के लिए तैयार होने के लिए प्रोत्साहित करती है.’’

जल्द ही आएगा मोदी का ‘स्टार्ट अप विलेज’

मोदी सरकार, स्मार्ट सिटी के बाद अब देश में स्टार्टअप विलेज बनाएगी. इसके लिए ऐक्शन प्लान तैयार किया जा रहा है. सरकार की योजना स्टार्टअप विलेज की स्थापना अगले साल से आरंभ करने की है. ऐक्शन प्लान के तहत मार्च 2018 तक 100 स्टार्टअप विलेज बनाने की योजना है. सरकार इस योजना के जरिए छोटे-छोटे गांवों में नए कारोबारियों को बिजनस करने के मौके देना चाहती है ताकि गांवों में रोजगार के ज्यादा अवसर पैदा हों.

सूत्रों के अनुसार, सरकार नए कारोबारियों से गांवों को विकसित करने के लिए सुझाव मांगेगी. उन सुझावों के आधार पर गांवों में स्टार्टअप कंपनियां खोलने के लिए वित्तीय सहायता के साथ टैक्स संबंधी छूट दी जाएगी. इन कंपनियों को गांव को विकसित करने तथा बिजनस का माहौल तैयार करने के साथ-साथ स्थानीय लोगों को नौकरियां देने का भी जिम्मा होगा.

क्या है स्टार्टअप

किसी कंपनी को स्टार्टअप कैटिगरी में आने के लिए उसके प्राइवेट लिमिटेड कंपनी, पार्टनरशिप फर्म अथवा लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप फर्म के रूप में रजिस्टर्ड होना जरूरी है. इसके अलावा स्टार्टअप के लिए किसी कंपनी का गठन 5 साल से पुराना नहीं होना चाहिए. इसके साथ ही कंपनी का टर्नओवर 25 करोड़ रुपए तक होना चाहिए. तभी वह कंपनी स्टार्टअप की कैटिगरी में शामिल हो सकती है.

अंजू बॉबी ने खेल मंत्री पर लगाया अपमान का आरोप

अर्जुन अवार्ड जीत चुकी विश्वस्तरीय एथलीट अंजू बॉबी जार्ज ने केरल के खेल मंत्री ई पी जयराजन पर उनका अपमान करने का आरोप लगाया है. अपने समय की स्टार लांग जंपर अंजू ने खेल मंत्री पर आरोप लगाए हैं कि वो उन्हें और केरल स्पोटर्स कांउसिल के बाकी सदस्यों पर भ्रष्टाचार समेत कई तरह के आरोप लगाकर उनका मानसिक उत्पीडऩ कर रहे हैं. हालांकि, मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन ने इस मामले में अपने मंत्री का ही समर्थन किया है.

केरल खेल परिषद की अध्यक्ष अंजू बॉबी जार्ज ने बताया कि इस विषय में अपनी शिकायत उन्होंने मुख्यमंत्री से की है. अंजू को खेल परिषद का अध्यक्ष कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ सरकार ने बनाया था.

2003 में एथलेटिक्स में विश्व चैम्पियनशिप में पदक जीतने वाली अंजू ने कहा कि वह 7 जून को नई सरकार के सत्ता में आने के बाद परिषद के उपाध्यक्ष के साथ खेल मंत्री से मिलने गई थीं. उन्हें लगा था कि वह केरल में खेल के स्तर पर सवाल पूछेंगे. लेकिन पहली ही मुलाकात में खेल मंत्री ने कहा कि आप सभी पिछली सरकार के चुने हुए सदस्य हैं. इसलिए आप अलग पार्टी के सदस्य हैं.

उनका कहना है कि सभी तबादले और नियुक्तियां अवैध हैं. अंजू का आरोप है कि मंत्री ने उनसे कहा कि सब भ्रष्टाचार और नियमों के खिलाफ है और वह यह सब रोक देंगे. अंजू ने कहा कि हम किसी राजनीतिक दल के लिए नहीं काम कर रहे हैं. मैं कांग्रेस, वामदल या भाजपा की सदस्य नहीं हूं.

जब उनसे पूछा गया कि क्या वह अपने पद से इस्तीफा देंगी, तो उन्होंने कहा कि इस बारे में अभी सोचा नहीं है. खेल मंत्री से मुलाकात के समय अंजू के साथ भारतीय हॉकी की कप्तान पीआर श्रीजा, केरल क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष टीसी मैथ्यू व परिषद के अन्य सदस्य भी मौजूद थे.

दूसरी ओर अंजू बॉबी जार्ज के इन आरोपों से खेल मंत्री जयराजन ने इन्कार किया है. वहीं प्रेस वार्ता में मुख्यमंत्री विजयन ने उनका समर्थन करते हुए कहा कि खेल मंत्री ने अंजू से केवल उनके विमान की टिकट के बारे में पूछा था. यह भला अपमान कैसे हुआ.

पिछली सरकार ने अंजू को बहुत सारी सहूलतें दे रखी थीं. इस सरकारी खर्च पर बंगलुरु से तिरुअनंतपुरम तक की विमान यात्रा भी शामिल है. जब अंजू खेल मंत्री से मिलने गईं तो उन्होंने कहा कि वह अंजू को राजनीतिक व्यक्ति के रूप में नहीं देखते.

मुख्यमंत्री से की है अंजू ने शिकायत

केरल स्पोटर्स काउंसिल की अध्यक्ष अंजू ने इस बात की शिकायत केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन से करते हुए कहा है कि खेल मंत्री उन पर यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट यूडीएफ से मिलीभगत का आरोप भी लगाते हैं. यह आरोप उन पर सिर्फ इस कारण लगाए गए हैं, क्योंकि अंजू को काउंसिल के अध्यक्ष पद पर यूडीएफ के कार्यकाल में नियुक्त किया गया था. बता दें कि यूडीएफ पिछले माह विधानसभा चुनाव होने तक केरल में सत्ताधारी पार्टी थी.

भारतीय हॉकी कप्तान भी हैं काउंसिल के सदस्य

2003 विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचने वाली अंजू बॉबी जार्ज के अलावा भारतीय हॉकी टीम के कप्तान पीआर श्रीजेश और केरल क्रिकेट संघ के अध्यक्ष टीसी मैथ्यू केरल स्पोटर्स काउंसिल के अन्य सदस्य हैं, जिन्हें खेलमंत्री के इसी तरह के आरोपों का सामना करना पड़ा है.

अंजू की हवाई उड़ानों पर भी है ऐतराज

खेल मंत्री ने अंजू बॉबी जार्ज के बंगलुरु से तिरुवनंतपुरम तक हवाई जहाज से आने-जाने पर भी ऐतराज जताया है. बता दें कि अंजू बंगलुरु में रहती हैं और केरल की पूर्ववर्ती सरकार ने उन्हें स्पोटर्स काउंसिल का अध्यक्ष बनाते समय यहां आने-जाने के लिए हवाई जहाज के उपयोग की इजाजत दी थी.

एक सप्ताह में दूसरा है खेल मंत्री का यह विवाद

केरल के खेल मंत्री ईपी जयराजन को एक सप्ताह के अंदर दूसरी बार विवादों का सामना करना पड़ रहा है. महान अमेरिकी मुक्केबाज मोहम्मद अली के निधन के बाद उन्होंने बयान दे दिया था कि यह केरल के लिए बहुत बड़ा झटका है, क्योंकि उन्होंने राज्य के लिए बहुत सारे पदक जीते हैं.

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