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भोजपुरी में पहली 3D व 2D फिल्म ‘गंगा घाट’

हौलीवुड फिल्मों को भारतीय बाजार में मिल रही बढ़त से अब भारतीय फिल्मकार कुछ नया सोचने पर मजबूर हो रहे हैं. इसी के चलते अब चर्चित भोजपुरी फिल्मकार के.सुजीत भी इतिहास रचने जा रहे हैं. जी  हां! के.सुजीत भोजपुरी की पहली 3D व 2D फारमेंट की फिल्म ‘गंगाघाट’ को 2017 में पूरे भारत में प्रदर्शित करने की योजना बनाकर फिल्म की शुरूआत कर चुके हैं. फिल्म गंगाघाट का मुहुर्त हो गया है, पर कलाकारों का चयन बाकी है.

के. सुजीत का दावा है कि वह सितंबर माह में फिल्म की शूटिंग शुरू कर देंगे. ‘सरिता’ पत्रिका से बात करते हुए 3D फिल्म गंगा घाट के निर्देशक के.सुजीत ने कहा, ‘हमें पता है कि भारत की पहली 3D हिंदी फिल्म ‘शिवा का इंसाफ’ को खास सफलता नहीं मिली थी. मगर उसके बाद हौलीवुड की तमाम 3D फिल्में भारत में खासकर भोजपुरी दर्शकों की वजह से सफलता बटोर चुकी हैं. मैंने भोजपुरी फिल्मों और दर्शकों पर काफी शोध किया, उसके बाद हमने भोजपुरी में 3D फिल्म गंगाघाट शुरू करने की योजना बनायी, जिसका निर्माण अशोकन.पी.के करेंगे.’

फिल्म के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया, ‘हमारी फिल्म आम भोजपुरी फिल्मों की तरह कोई मसाला फिल्म नहीं है. हम सिनेमा की तकनीक के साथ-साथ कथानक के स्तर पर भी काफी प्रयोग करने जा रहे हैं. हमारी यह फिल्म पूरी तरह से हॉरर फिल्म होगी, जिसे हम वाराणसी में गंगा किनारे फिल्माने वाले हैं. सभी को पता है कि वाराणसी में गंगा के घाटों पर मृतकों का अंतिम संस्कार किया जाता है और हमारी फिल्म की कहानी यहीं से शुरू होगी. इससे अधिक अभी हम फिल्म के कथानक पर रोशनी डालकर दर्षकों की उत्सुकता पर विराम नहीं लगाना चाहते. हम इसे 3D के साथ 2D में भी बनाएंगे.’

ओबामा का ये हिन्दी वीडियो आपके होश उड़ा देगा

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का कार्यकाल अंतिम दौर में हैं. ओबामा को अब तक आपने तेज़ तर्रार, सुलझे हुए और गंभीर नेता के तौर पर देखा होगा. लेकिन क्या कभी आपने उन्हें ऐसे मज़ाकिया अंदाज़ में देखा है जो आपको हंसा-हंसा कर लोट-पोट कर दे.

दरअसल, ओबामा का राष्ट्रपति कार्यकाल ख़त्म होने के ठीक पहले व्हाइट हाउस ने 'काउच कमांडर' नाम से एक कॉमेडी वीडियो जारी किया है. इस वीडियो में ओबामा सभी को गुदगुदाते दिखाई दे रहे हैं. इस वीडियो में ओबामा के अलावा अमेरिका के उप राष्ट्रपति जो बिडेन और अन्य परिचित चहरे नज़र आ रहे हैं.

इस कॉमेडी वीडियो की पटकथा ओबामा के राष्ट्रपति पद से रिटायरमेंट के बाद उनके खाली समय में बिताए जाने वाले पलों को दिखाने पर केंद्रित है.

हालांकि यह वीडियो अंग्रेजी में बनाया गया है, लेकिन इसे आप हिन्दी में भी देख सकते हैं. तो लिंक पर क्लिक कर देखिए ये मजेदार वीडियो…

http://www.sarita.in/web-exclusive/barack-obama-prepares-to-become-couch-commander-in-hilarious-spoof-retirement-video

रक्षाबंधन पर शौचालय गिफ्ट

इस बार राखी के मौके पर बिहार के नालंदा जिला के राजगीर प्रखंड के भाई एक नई मिसाल कायम करने की जुगत में लगे हुए हैं. वह अपनी बहनों को अनोखा तोहफा देने की तैयारी कर रहे हैं. राखी के धागों के बंधन में बंध कर हर भाई सदियों से अपनी बहन की हिफाजत की कसमें खाते रहे हैं, पर राजगीर के भाई अपनी बहन की इज्जत को बचाने के लिए अपने-अपने घरों में शौचालय बना कर बहनों को गिफ्ट करेंगे.

नालंदा जिला प्रशासन भाईयों की इस सोच को जमीन पर उतारने की कवायद में पूरी गंभीरता से लग गया है. लोहिया स्वच्छता अभियान के तहत राजगीर के गांवों में कम से कम 10 हजार शौचालय बनाने का लक्ष्य तय किया गया है. जिला प्रशासन ने शौचालय योजना से लोगों की भावनाओं को जोड़ दिया है. डीडीसी कुंदन कुमार कहते हैं कि इससे शौचालय मुहिम को खासी कामयाबी मिल सकेगी. राखी के त्योहार के मौके पर पहली बार इस तरह की पहल की जा रही है. इसकी कामयाबी के बाद बाकी प्रखंडों में भी पर्व-त्यौहारों से शौचालय योजना को जोड़ा जाएगा.

फिलहाल नालंदा में 9 फीसदी घरों में ही शौचालय हैं. शौचालय मुहिम में तेजी लाने के लिए इस बार पहली बार राखी के त्योहार से जोड़ा गया है. समूचे प्रखंड में यह प्रचार किया जा रहा है कि इस साल राखी के त्यौहार के अवसर पर हर भाई अपनी बहनों को उपहार में शौचालय दें. बहनें घर की इज्जत होती हैं और उसे शौच करने के लिए बाहर क्यों जाना पड़ता है? क्या कोई भाई चाहेगा कि उनकी बहनों की इज्जत के साथ खिलवाड़ हो? इसलिए हर भाई अपने घरों में शौचालय बनवा कर अपनी बहनों को अनोखा तोहफा दें. प्रशासन की इस मुहिम को भाईयों का पूरा साथ भी मिला है. राजगीर के रहने वाले किसान उमेश प्रसाद कहते हैं कि बहनों के लिए इससे बड़ा तोहफा क्या होगा कि उन्हें अब शौच के लि घर से बाहर नहीं जाना पड़ेगा. जब सारी दुनिया गहरी नींद में डूबी रहती है, उस समय मां-बहनें जाग जाती हैं और शौच के लिए घरों से निकल जाती हैं. इसका फायदा उठा कर लफंगे और बदमाश छेड़खानी और बलात्कार की वारदातों को आसानी से अंजाम देते रहे हैं.

जिला प्रशासन अपनी इस योजना को कामयाब बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है. पहले प्रखंड के सारे लड़कों को जागरूक किया गया कि वह अपनी बहनों को गिफ्ट के तौर पर अपने-अपने घरों में शौचालय बनावाएं, जिससे उनकी बहनों को शौच के लिए खुले में नहीं जाना पड़े. अब वह बहनों की लिस्ट तैयार कर रहा है. 10 अगस्त तक बहनों की सूची तैयार करने की आखिरी तारीख रखी गई है. उसके बाद 11 अगस्त से उनके घरों में शौचालय बनाने में काम आने वाले सारे सामान पहुंचा दिए जाएंगे. उसके बाद 16-17 अगस्त तक सभी घरों में शौचालय बनाने का काम पूरा कर लिया जाएगा. शौचालय बन कर तैयार होने के बाद 18 अगस्त को रक्षाबंधन के मौके पर बहनें अपने भाईयों को रेशम की डोर बांधेंगी और भाई उन्हें उपहार के रूप में शौचालय देंगे.

राजगीर के भाईयों की इस अनोखी और यादगार पहल के बाद दूसरे जिलों में भी इस योजना को जमीन पर उतारने की कवायद शुरू की जाएगी. होली, दशहरा, दीपावली जैसे त्योहारों समेत फ्रेंडशिप डे, मदर्स डे, वैलेंनटाइन डे आदि के मौके पर जिला प्रशासन लोगों को जागरुक करेगा कि वह अपने मां-बहनों को शौचालय का तोहफा देकर मिसाल कायम करें.

व्यक्तिगत घरेलू शौचालय का एक यूनिट बनाने में 6 हजार 600 रुपये की लागत आती है. इसमें से 3200 रुपये केंद्र सरकार और 2500 रुपया राज्य सरकार मुहैया कराती है. शौचालय बनाने के इच्छुक लोग को 900 रुपये अपनी जेब से लगाने पड़ते हैं. साल 2016-17 बिहार में 20 लाख 93 हजार शौचालय बनाने का लक्ष्य रखा गया है. इस लक्ष्य के पूरा होने के बाद राज्य के कुल 1068 पंचायतों के हरेक घर में शौचालय बन जाएगा.

बुधिया सिंहः बॉर्न टू रन – अदभुत और बेहतरीन फिल्म

सत्य कथा या सत्य घटनाक्रम पर फिल्म बनाना हमेशा ही लेखक व निर्देशक के लिए दोधारी तलवार पर चलने जैसा होता है. क्योंकि उसे वास्तविकता को बरकरार रखते हुए फिल्म को मनोरंजक भी बनाना होता है. दूसरी बात खेल पर फिल्में बनाना आसान नहीं रहा है. अब तक खेल पर जितनी भी फिल्में बनी हैं, उनमे से ज्यादातर फिल्में बाक्स आफिस पर असफल ही रही हैं. पर मशहूर धावक मिल्खा सिंह की बायोपिक फिल्म ‘‘भाग मिल्खा भाग’’ ने सफलता के रिकार्ड बनाए थे. अब पहली बार निर्देशन में  उतरे लेखक व निर्देशक सौमेंद्र पाधी ने अपनी फिल्म ‘‘बुधिया सिंहः बॉर्न टू रन’’ में 2006 में उड़ीसा के चर्चित बाल धावक बुधिया सिंह की जिंदगी से जुड़े सत्य घटनाक्रम को पेश किया है. इसके लिए सौमेंद्र पाधी साधुवाद के पात्र हैं. फिल्म ‘‘बुधिया सिंहः बॉर्न टू रन’’ देखते समय अहसास ही नहीं होता कि यह लेखक व निर्देशक की पहली फिल्म है. सौमेंद्र पाधी ने बालक बुधिया की कहानी को जितनी सरलता से परदे पर साकार किया है, वह काबिले तारीफ है.

फिल्म ‘‘बुधिया सिंहः बॉर्न टू रन’’ वास्तव में एक कठिन फिल्म है. क्योंकि यह ऐसे बालक की कथा है जो कि मुश्किल से एक साल तक सुर्खियों में रहा और फिर ऐसी राजनीति गहराई थी कि उसका दौड़ना बंद होने के साथ ही वह एकदम गायब हो गया. आज दस साल बाद तो लोग भूल चुके हैं कि बुधिया सिंह कौन था. ऐसे में उसकी याद लोगों के दिलों में ताजा करने के साथ साथ बहुत कम कथा के आधार पर ऐसी मनोरंजक फिल्म को गढ़ना जिसे देखकर लोग प्रेरित भी हों, आसान तो नहीं था.

फिल्म ‘‘बुधिया सिंह: बॉर्न टू रन’’ की कहानी शुरू होती है उड़ीसा की अपराधियों से युक्त एक झोपड़पट्टी इलाके से. जहां लोग बेवजह धरना प्रदर्शन करने व चोरी वगैरह करते रहते हैं. इसी झोपड़पट्टी की एक टूटी फूटी झोपड़ी में चार साल का बालक बुधिया (मयूर पटोले) रहता है. जिसका पिता शराबी है. उसकी मां सुकांति (तिलोतमा शोम) एक चूड़ी बेचने वाले को उसे महज साढ़े आठ सौ रूपए में बेच देती है. जब यह बात उस इलाके में अनाथ बच्चों केा आश्रय देने के अलावा उन्हे जूड़ो की शिक्षा दे रहे जूड़ो कोच बिरंची दास (मनोज बाजपेयी) को पता चलती है, तो वह चूड़ी बेचने वाले को उसके पैसे लौटाकर बुधिया को अपने पास ले जाता है तथा बुधिया की मां को भी नौकरी दिला देता है. एक दिन बुधिया के दूसरे बच्चे को गाली देने पर उसे घर के अंदर ही दौड़ते रहने की सजा देता है. बिरंची खुद घर से बाहर पत्नी गीता (श्रुति मराठे) के साथ काम से चला जाता है. शाम को वापस आने पर उसे पता चलता है कि सुबह से बुधिया दौड़ ही रहा है. तब बिरंची को अहसास होता है कि बुधिया तो मैराथन दौड़ सकता है.

अब बिरंची हर दिन बुधिया को दौड़ने की ट्रेनिंग देने लगता है. फिर एक दिन वह घोषणा करता है कि बुधिया सिंह 2016 में ओलंपिक में मैराथन दौडे़गा. बिरंची खुद सुबह चार बजे उठकर बुधिया को दौड़ाना शुरू करता है. बिंरची सायकल पर होता है और बुधिया पैदल दौड़ता रहता है. बिरंची, बुधिया से मेहनत करवाता है पर उसे अपने बेटे की ही तरह मानता है. वह बुधिया की बाल सुलभ जरुरतें भी पूरी करता रहता है. बुधिया मैराथन दौड़ में कई रिकार्ड बनाने लगता है. बिरंची दास के साथ विपक्ष के नेता जे डी पटनायक के अलावा एक डाक्टर भी है. जो कि बुधिया की मदद करते हैं.

पांच साल की उम्र में ही बुधिया सिंह 48 मैराथन दौड़कर पूरे उड़ीसा मे चर्चा का विषय बन जाता है. इससे सरकार में बैठे कुछ लोग बिरंची दास के दुश्मन बन जाते हैं. यह लोग बालक बुधिया सिंह की भलाई की बात करते हुए बिरंची के खिलाफ साजिश भी रचते हैं. कहा गया कि बुधिया सिंह का कोच बिरंची दास अपनी स्वार्थ लोलुपता व महत्वाकांक्षाओं के चलते पांच वर्ष के बच्चे के साथ अन्याय कर रहा है. बिरंची दस को नीचा दिखाने के लिए चाइल्ड वेलफेअर कमेटी के सदस्य पांच वर्ष के बुधिया सिंह का ‘डोप’ टेस्ट कराते हैं. राजनीति तेज हो जाती है. अंततः चाइल्ड वेलफेअर विभाग बिरंची दास के खिलाफ टिप्पणी करने के साथ ही बुधिया सिंह के दौड़ने पर प्रतिबंध लगा देता है और फिर बुधिया को उड़ीसा के ‘स्पोर्टस हॉस्टल’ में भेज दिया जाता है. कुछ माह के अंदर ही एक इंसान बिरंची दास के घर पहुंचकर उसकी हत्या कर देता है. अब बिरंची दास का हत्यारा जेल में है और बुधिया सिंह ‘स्पोर्टस हॉस्टल’ में रहकर पढ़ाई  कर रहा है.

पटकथा लेखक के तौर पर सौमेंद्र पाधी ने बेहतरीन काम किया है. उन्होंने पूरी पटकथा बहुत ही सरल भाषा में लिखते हुए इस बात का ख्याल रखा है कि यथार्थ गायब न होने पाए. फिर भी फिल्म की गति धीमी नहीं होती है. निर्देशक के तौर पर सेल्यूलाइड के परदे पर कहानी कहने में सौमेंद्र पाधी महारथी नजर आते हैं, जबकि यह उनकी पहली फिल्म है. तमाम निर्देशक बच्चों के साथ काम करते हुए असफल हो जाते हैं. मगर सौमेंद्र पाधी ने तो पांच साल के बालक मयूर पटोले से भी बेहतरीन परफार्मेंस निकलवा ली. फिल्म के पहले भाग में फिल्म अपनी गति से बढ़ते हुए दर्शक के मन में उत्सुकता पैदा करती है, तो फिल्म का दूसरा भाग दर्शकों को नया अनुभव कराती है. फिल्म में बुधिया के डोप टेस्ट और स्पोर्टस हॉस्टल में बिरंची व बुधिया सिंह के बीच की संक्षिप्त मुलाकात लोगों के जेहन से जल्दी नही मिट सकेगी, यह निर्देशकीय प्रतिभा का ही कमाल है. सौमेंद्र पाधी ने उड़ीसा में फिल्म को फिल्माकर वहां की कुछ लोकेशनों को परदे पर उतारने के साथ ही उड़ीसा की सामाजिक व राजीनीतिक चेतना की तरफ भी इशारा किया है.

बाल कलाकार मयूर पटोले ने जो अभिनय किया है, उसकी जितनी तारीफ की जाए, उतनी कम है. पूरी फिल्म मयूर पटोले व मनोज बाजपेयी के ही कंधों पर है. मयूर पटोले की यह पहली फिल्म है. पर फिल्म में लगता है जैसे कि कोई अति अनुभवी कलाकार अभिनय कर रहा है. बिरंची दास के किरदार में एक बार फिर मनोज बाजपेयी ने साबित कर दिखाया कि उनके अंदर ऐसी अभिनय क्षमता है कि वह किसी भी किरदार को परदे पर जीवंत कर सकते हैं. यह मनोज बाजपेयी की एक और यादगार परफार्मेंस है.

फिल्म का नकारात्मक पक्ष इसका संगीत है, मगर इससे फिल्म की गति या फिल्म की गुणवत्ता पर असर नहीं पड़ता. फिल्म के कैमरामैन मनोज कुमार खटोई ने भी बेहतरीन काम किया है.

‘‘कोड रेड फिल्मस’ के बैनर तले गजराज राव द्वारा निर्मित फिल्म ‘बुधिया सिंह बॉर्न टू रन’’ के लेखक व निर्देशक सौंमेंद्र पाधी तथा कलाकार हैं-मनोज बाजपेयी, मनोज पटोले, तिलोतमा शोम, श्रृति मराठे, छाया कदम, गोपाल सिंह, प्रसाद पंडित, गजराज राव, राजन भिंसे, पुसकर चिरपुतकर व सयाली पाठक.

द लीजेंड ऑफ माइकल मिश्राः भूल जाना ही बेहतर

हास्य प्रधान रोमांटिक फिल्म ‘‘द लीजेंड ऑफ माइकल मिश्रा’’ देखकर कहीं से भी अहसास नहीं होता कि इस फिल्म के निर्देशक वही मनीष झा हैं, जिन्होंने ‘‘मातृभूमि’’ जैसी फिल्म निर्देशित कर शोहरत बटोरी थी. ‘‘द लीजेंड ऑफ माइकल मिश्रा’’ में लेखक व निर्देशक दोनो ही स्तर पर असफल नजर आते हैं. फिल्म की कहानी का केंद्र यह है कि प्यार किस तरह एक अपराधी को भी सुधरने पर मजबूर कर देता है. पर फिल्म देखते समय दर्शक सोचने लगता है कि यह फिल्म कब खत्म होगी. हास्यप्रद प्रेम कहानी वाली फिल्म में लेखक व निर्देशक स्वयं दुविधा में नजर आते हैं. उनकी समझ में नही आया कि वह इंसान के आडंबर को चित्रित करें या इंसानी की विचित्रता को.

फिल्म की कहानी बिहार में हाईवे पर बने एक ढाबे ‘‘माइकल मिश्रा का ढाबा’’ से शुरू होती है. जहां पर एक बस आकर रूकती है, जिसमें से एक प्रोफेसर के अलावा कुछ कालेज विद्यार्थी उतरते हैं. यह सभी इस ढाबे पर जाते हैं, जहां फुलपैंट (बोमन ईरानी) उनका स्वागत करता है. एक विद्यार्थी के सवाल पर फुलपैंट माइकल मिश्रा की कहानी शुरू करता है. माइकल मिश्रा (मोहित मलचंदानी) जब टीनएजर की उम्र में था, तब वह एक बेहतरीन दर्जी होता है. जो कि आंख पर पट्टी बांधकर सही सिलाई कर लेता है. पर एक घटनाक्रम उसे अपराधी बना देता है.

इसी उम्र में उसकी मुलाकात एक दस साल की लड़की वर्षा शुक्ला (ग्रासवीरा कौर) से होती है, पर पुलिस माइकल को पकड़ती है, तो माइकल उसे अपना एक लॉकेट देकर चला जाता है. उसके बाद माइकल पुलिस के चंगुल से भागकर एक दिन बहुत बड़ा अपराधी माइकल मिश्रा भाई (अरशद वारसी) बन जाता है. अब उसका अपना गिरोह है. पटना के लोग उसके नाम से कांपते हैं. वह अपहरण, फिरौती, चोरी सारे संगीन अपराधों से जुड़ा हुआ है. अपराधी के रूप में स्थापित होने के बाद वह अपने प्यार की तलाश शुरू करता है. जब वह एक डाक्टर का अपहरण करने के लिए उस हाल में पहुंचता है, जहां बिहार टैंलेट प्रतियोगिता हो रही होती है, तो वहां उसे गायक के तौर पर वर्षा शुक्ला (अदिति राव हैदरी) नजर आ जाती है.

अब माइकल डाक्टर के अपहरण की बात भूलकर वर्षा के पीछे लग जाता है, पर उस दिन वह वर्षा के घर तक नहीं पहुंच पाता. मगर एक दिन उसे वर्षा के घर का पता चल जाता है. तब वह उसी इलाके में रहना शुरू करता है, जहां वर्षा अपने चाचा व चाची के साथ रहती है. एक दिन वर्षा के हाथ का लिखा पत्र माइकल मिश्रा को मिलता है, जिसमें उसे सुधरने के लिए लिखा होता है. तब माइकल मिश्रा सारे अपराध बंदकर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर देता है. इधर चाचा चाची की ही वजह से वर्षा घर से भागकर मुंबई पहुंचती है, धीरे धीरे वह चर्चित अभिनेत्री बन जाती है.

इस बीच माइकल का दाहिना हाथ रहा हाफ पैंट (कायोज ईरानी) रूप बदल कर वर्षा के पीछे लगा रहता है. इधर कालापानी की सजा काट रहा माइकल जेलर की जान बचाता है, जिसके एवज में जेलर उसकी जेल से भागने में मदद करता है. पटना पहुंचकर माइकल फिर से वर्षा की तलाश करता है. वर्षा एक समारोह का हिस्सा बनने पटना पहुंचती है, मगर वह माइकल को पहचानने से इंकार कर देती है. तब हाफ पैंट, वर्षा को सारी कथा बताता है. वर्षा कहती है कि उसने तो वह पत्र माइकल के उपर वाले मकान में रह रहे संगीतज्ञ मिथिलेष माथुर को लिखा था. बहरहाल, वर्षा, माइकल के प्यार को स्वीकार कर लेती है.

मूलतः बिहार निवासी मनीष झा ने अपनी फिल्म में कलाकारों का मूड़ व भाषा में बिहार का पुट जरुर पिरोया है, मगर पटकथा के स्तर पर वह बुरी तरह से मात खा गए हैं. पूरी पटकथा दिशाहीन है. वैसे पटकथा लेखकों की सूची में मनीष झा के साथ चार अन्य नाम भी हैं. कहानी भी कमजोर हैं. कितनी अजीब बात है कि ‘मातृभूमि’ जैसी फिल्म का निर्देशक भी सोचने लगा है कि दर्शक अपने दिमाग को घर रखकर फिल्म देखने आता है.

अरशद वारसी के अभिनय में नयापन नजर नहीं आता. पूरी फिल्म में वह अपनी पिछली फिल्मों में जो अभिनय कर चुके हैं, उसे ही दोहराते हुए नजर आते हैं. बोमन ईरानी के हिस्से करने को कुछ था ही नहीं. बोमन ईरानी के बेटे व अभिनेता कायोज ईरानी ने ठीकठाक अभिनय किया है. अदिति राव हैदरी भी निराश करती हैं. फिल्म का संगीत भी प्रभावित नहीं करता. परिणामतः 125 मिनट की अवधि वाली फिल्म देखते देखते हुए दर्शक का मनोरंजन नहीं होता, मगर थकावट आ जाती है.

VIDEO: वंदे मातरम या One Day मातरम, क्या है आपके लिए तिरंगे की कीमत

इन दिनों आप स्‍वतंत्रता दिवस की तैयारियां करने में व्‍यस्‍त होंगे. वैसे भी स्‍वतंत्रता दिवस मनाने का सबसे ज्‍यादा जोश बच्‍चों में ही तो होता है. 15 अगस्‍त को आप लोग झंडा तो जरूर खरीदते होंगे, जोर से वंदे मातरम का नारा भी लगाते होंगे और सोशल मीडिया पर अपनी प्रोफाइल पिक्चर भी चेंज करते होंगे.

करते हैं न ये सब आप. आखिर बस एक दिन तिरंगा खरीदकर या प्रोफाइल पिक्चर अपडेट करके हमें अपनी देशभक्ति जो दिखानी है. फिर चाहे शाम होते होते हमारा राष्ट्र ध्वज किसी कचरे के डब्बे से लेकर किसी के पैरों तले रौंदा जा रहा हो.

लेकिन जनाब हकीकत यह है कि हमारा वंदे मातरम असल में One Day मातरम है.

जानना चाहते हैं कैसे, तो इस लिंक पर क्लिक कर देखें हमारी असलियत बताने वाला ये  वीडियो, जिसे देखकर आप शर्म से पानी पानी हो जाएंगे…  

http://www.sarita.in/web-exclusive/reality-of-freedom-because-vande-mataram-is-only-one-day-mataram

Reality of freedom because Vande Mataram is only One Day Mataram

तिरंगा झंडा हमारे देश का राष्‍ट्रीय ध्‍वज है, इसलिए इसे खरीदने के बाद सावधानी से संभालना चाहिए. एक बात याद रखना झंडे को कभी जमीन पर नहीं गिराना. झंडा कोई खेलने की चीज नहीं है, झंडे से अपने दोस्‍तों के साथ खेलना या उसके साथ मस्‍ती करना गलत बात है. आप झंडे को लहराएं, उसे घर में लगाएं, दोस्‍तों को दें पर ऐसा कुछ भी ना करें, जिससे झंडे का अपमान हो.

अगर आप भी आजादी के इस पर्व पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने की तैयारियों में जुटे हैं तो तिरंगा से जुड़ी ये अहम बातें आपके लिए जानना बेहद जरूरी हैं.

राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा

भारत का राष्ट्रध्वज समतल और आयताकार तिरंगा है. इसकी लंबाई-चौड़ाई का अनुपात 2:3 होता है. तीन रंगों की समान आड़ी पट्टिका जिनमें सबसे ऊपर केसरिया, मध्य में सफेद तथा नीचे हरे रंग की पट्टी है. सफेद रंग की पट्टी पर मध्य में सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ का चौबीस शलाकाओं वाला चक्र है, जिसका व्यास सफेद रंग की पट्टी की चौड़ाई के बराबर होगा.

तिरंगे के रंग और उनका अर्थ

राष्ट्रीय ध्वज की ऊपरी पट्टी में केसरिया रंग है जो देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है. बीच की पट्टी का श्वेत रंग धर्म चक्र के साथ शांति और सत्य का प्रतीक है. निचली हरी पट्टी उर्वरता, वृद्धि और भूमि की पवित्रता को दर्शाती है. सफेद पट्टी पर बने चक्र को धर्म चक्र कहते हैं. इस धर्म चक्र को विधि का चक्र कहते हैं जो तृतीय शताब्दी ईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ मंदिर से लिया गया है. इस चक्र को प्रदर्शित करने का आशय यह है कि जीवन गति‍शील है और रुकने का अर्थ मृत्यु है.

जब सबका हुआ तिरंगा

26 जनवरी 2002 को भारतीय ध्‍वज संहिता में संशोधन किया गया और स्‍वतंत्रता के कई वर्ष बाद भारत के नागरिकों को अपने घरों, कार्यालयों और फैक्‍ट‍री में न केवल राष्‍ट्रीय दिवसों पर, बल्कि किसी भी दिन बिना किसी रुकावट के इसे फहराने की अनुमति मिल गई. अब भारतीय नागरिक राष्‍ट्रीय झंडे को शान से कहीं भी और किसी भी समय फहरा सकते हैं. बशर्ते कि वे ध्‍वज की संहिता का कठोरतापूर्वक पालन करें और तिरंगे की शान में कोई कमी न आने दें.

विशेष परिस्थिति

जब किसी राष्ट्र विभूति का निधन होता है तथा राष्ट्रीय शोक घोषित होता है, तब ध्वज को झुका दिया जाना चाहिए, लेकिन जहां जिस भवन में उस राष्ट्र विभूति का पार्थिव शरीर रखा है, वहां उस भवन का ध्वज झुका रहेगा तथा जैसे ही पार्थिव शरीर अंत्येष्टि के लिए बाहर निकालते हैं, वैसे ही ध्वज को पूरी ऊंचाई तक फहरा दिया जाएगा.

शवों पर लपेटना

राष्ट्र पर प्राण न्योछावर करने वाले फौजी रणबांकुरों के शवों पर एवं राष्ट्र की महान विभूतियों के शवों पर भी ध्वज को उनकी शहादत को सम्मान देने के लिए लपेटा जाता है, तब केसरिया पट्टी सिर तरफ एवं हरी पट्टी पैरों की तरफ होना चाहिए, न कि सिर से लेकर पैर तक सफेद पट्टी चक्र सहित आए और केसरिया और हरी पट्टी दाएं-बाएं हों. याद रहे शहीद या विशिष्ट व्यक्ति के शव के साथ ध्वज को जलाया या दफनाया नहीं जाता, बल्कि मुखाग्नि क्रिया से पूर्व या कब्र में शरीर रखने से पूर्व ध्वज को हटा लिया जाता है.

तिरंगे का नष्टीकरण

अमानक, बदरंग कटी-फटी स्थिति वाला ध्वज का स्वरूप फहराने योग्य नहीं होता. ऐसा करना ध्वज का अपमान होकर अपराध है, अतः वक्त की मार से जब कभी ध्वज ऐसी स्थिति हो जाए तो गोपनीय तरीके से सम्मान के साथ उसे अग्नि प्रवेश दिला दिया जाता है. या वजन/रेत बांधकर पवित्र नदी में जल समाधि दे दी जाती है. यही प्रकिया पार्थिव शरीरों पर से उतारे गए ध्वजों के साथ भी किया जाता है.

तिरंगे का दुरुपयोग

राष्ट्रीय ध्‍वज को सांप्रदायिक लाभ, पर्दे या वस्‍त्रों के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है. जहां तक संभव हो इसे मौसम से प्रभावित हुए बिना सूर्योदय से सूर्यास्‍त तक फहराया जाना चाहिए. इस ध्‍वज को आशय पूर्वक भूमि, फर्श या पानी से स्‍पर्श नहीं कराया जाना चाहिए. इसे वाहनों पर, रेलों, नावों या वायुयान पर लपेटा नहीं जा सकता. किसी अन्‍य ध्‍वज या ध्‍वज पट्ट को हमारे ध्‍वज से ऊंचे स्‍थान पर नहीं लगाया जा सकता है. तिरंगे ध्‍वज को वंदनवार, ध्‍वज पट्ट या गुलाब के समान संरचना बनाकर उपयोग नहीं किया जा सकता. तिरंगे को अंडरगार्मेंट्स, रूमाल या कुशन आदि बनाकर भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.

तिरंगे का अपमान

फ्लैग कोड ऑफ इंडिया के तहत झंडे को कभी भी जमीन पर नहीं रखा जाएगा. उसे कभी पानी में नहीं डुबोया जाएगा और किसी भी तरह नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा. यह नियम भारतीय संविधान के लिए भी लागू होता है. प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट टू नेशनल ऑनर ऐक्ट-1971 की धारा-2 के मुताबिक, ध्वज और संविधान के अपमान करने वालों के खिलाफ सख्त क़ानून हैं. अगर कोई शख़्स झंडे को किसी के आगे झुका देता हो, उसे कपड़ा बना देता हो, मूर्ति में लपेट देता हो या फिर किसी मृत व्यक्ति (शहीद हुए जवानों के अलावा) के शव पर डालता हो, तो इसे तिरंगे का अपमान माना जाएगा. तिरंगे की यूनिफॉर्म बनाकर पहन लेना भी ग़लत है. अगर कोई शख़्स कमर के नीचे तिरंगा बनाकर कोई कपड़ा पहनता हो तो यह भी तिरंगे का अपमान है.

कैसे बनता है तिरंगा

1968 में तिरंगा निर्माण के मानक तय किए गए. ये नियम अत्यंत कड़े हैं. केवल खादी या हाथ से काता गया कपड़ा ही झंडा बनाने के लिए उपयोग किया जाता है. कपड़ा बुनने से लेकर झंडा बनने तक की प्रक्रिया में कई बार इसकी टेस्टिंग की जाती है. खादी बनाने में केवल कपास, रेशम और ऊन का प्रयोग किया जाता है. इसकी बुनाई सामान्य बुनाई से भिन्न होती है. ये बुनाई बेहद दुर्लभ होती है. निर्माण के लिए हाथ से बनी खादी का उत्पादन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के एक समूह द्वारा पूरे देश में मात्र ‘गरग’ गांव में किया जाता है जो उत्तरी कर्नाटक के धारवाड़ जिले में बेंगलूर-पूना रोड पर स्थित है. इसकी स्थापना 1954 में हुई, परंतु अब निर्माण ऑर्डिनेंस क्योरिंग फैक्टरी शाहजहांपुर, खादी ग्रामोद्योग आयोग मुंबई एवं खादी ग्रामोद्योग आयोग दिल्ली में होने लगा है. निजी निर्माताओं द्वारा भी राष्ट्रध्वज का निर्माण किए जाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है, लेकिन गौरव व गरिमा को दृष्टिगत रखते हुए यह जरूरी है कि ध्वज पर आईएसआई (भारतीय मानक संस्थान)की मुहर लगी हो. बुनाई से लेकर बाजार में पहुंचने तक कई बार बीआईएस प्रयोगशालाओं में इसका परीक्षण होता है. बुनाई के बाद सामग्री को परीक्षण के लिए भेजा जाता है. कड़े गुणवत्ता परीक्षण के बाद उसे वापस कारखाने भेज दिया जाता है. इसके बाद उसे तीन रंगों में रंगा जाता है. केंद्र में अशोक चक्र को काढ़ा जाता है. उसके बाद इसे फिर परीक्षण के लिए भेजा जाता है. बीआईएस झंडे की जांच करता है इसके बाद ही इसे बाजार में बेचने के लिए भेजा जाता है.

पेस को खेलगांव में नहीं मिली छत

ओलंपिक की ओपनिंग सेरेमनी से पहले रियो में भारतीय टेनिस सुपरस्टार लिएंडर पेस को रहने के लिए कमरे नहीं दिए जाने की खबर आई है. ओलंपिक के लिए बने खेलगांव में उन्हें अभी तक कमरा नहीं मिल सका है.

सूत्रों के मुताबिक पेस ने बताया कि कमरा नहीं मिलने की वजह से उन्हें भारतीय ओलंपिक टीम के मिशन प्रमुख के कमरे में रुकना पड़ा है. टीम के कैप्टन जीशान अली ने भी उनकी बात को सही बताया है. उन्होंने बताया कि पेस ने खेल गांव में न रुकने की बात कभी नहीं कही.

भारत की ओर से सबसे ज्यादा बार ओलंपिक में हिस्सा

ओलिंपिक खेलों में भारत की ओर से सबसे ज्यादा बार हिस्सा लेने वाले पेस ने कहा कि टीम को मिले अपार्टमेंट में तीन बेडरूम हैं. उनमें से एक रोहन बोपन्ना के पास है. दूसरा उनके फिजियो थेरेपिस्ट के पास है. तीसरा बेडरूम जीशान अली के नाम पर दिया गया है. ऐसी हालत में पेस मिशन प्रमुख के कमरे में ही ठहरे हैं.

4 अगस्त की सुबह रियो पहुंच गए थे पेस

दूसरी ओर कैप्टन जीशान अली ने बताया कि लिएंडर पेस के चार अगस्त को रियो पहुंचने के बारे में भी उन्हें जानकारी मिली थी. तब पेस वर्ल्ड टीम टेनिस खेल रहे थे. उन्होंने कहा कि मुझे चिंता थी कि चार अगस्त की शाम को रियो पहुंचने के बाद पेस को 6 अगस्त के मैच के लिए प्रैक्टिस करने का मौका नहीं मिल पाएगा. उन्होंने बताया कि पेस सुबह ही पहुंच गए थे.

कैसे अपडेट करें एंड्रायड स्मार्टफोन

स्मार्टफोन के लिए अपडेट्स काफी जरुरी होते हैं. अक्सर यह देखा जाता है कि यूजर इन अपडेट्स को लेने से कतराते हैं. लेकिन ऐसा सही नहीं है. एंड्रायड अपडेट करने से आपके स्मार्टफोन की कई दिक्कतें दूर हो सकती हैं.

एंड्रायड अपडेट होने फोन में कई नए फीचर्स एड हो सकते हैं. आपके एंड्रायड पर जो भी अपडेट हो उसे अप्लाई करने पर फोन की परफॉरमेंस पर बेहतर होती है. साथ ही स्मार्टफोन में जो भी परेशानियां हो रही हैं या बग्स हैं वो भी ठीक हो जाती हैं.

जैसे मान लीजिए आपके फोन में हीटिंग इशू हो रहे हैं तो हो सकता है कि आपके एंड्रायड पर मौजूद अपडेट से वो समस्या हल हो जाए.

डाटा बैकअप

अपने स्मार्टफोन को अपडेट करने से पहले आप फोन का डाटा बैकअप कर लें. हालांकि इसके काफी कम चांस होते हैं कि इस प्रक्रिया में आपका डिवाइस क्रेश हो जाए.

स्टेप 1

अब अपने एंड्रायड स्मार्टफोन को अपडेट करने के लिए सबसे पहले फोन की सेटिंग में जाएं.

स्टेप 2

सेटिंग में जाकर आप स्क्रीन पर स्क्रोल करें, आपको सबसे अंतिम विकल्प अबाउट फोन का मिलेगा.

स्टेप 3

यहां पर आपको सिस्टम अपडेट का विकल्प मिलेगा. आप सिस्टम अपडेट पर अपने एंड्रायड फोन में अपडेट पाने के लिए क्लिक करें.

अपडेट कर सकते हैं

यदि आपके फोन में अपडेट उपलब्ध होगा तो आपको बता दिया जाएगा, इसके बाद आप फोन को अपडेट कर सकते हैं.

डिवाइस अप टू डेट

यदि आपके एंड्रायड फोन में कोई अपडेट उपलब्ध नहीं होगा तो आपकी स्क्रीन पर मैसेज आ जाएगा कि आपका डिवाइस अप टू डेट है.

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