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पुर्तगाल बना यूरो चैंपियन

साल 1984 और साल 2000 में फुटबाल का 'यूरो कप' अपने नाम करने वाले फ्रांस को इस बार मेजबानी रास नहीं आई और पुर्तगाल के साथ हुए रोमांचक फाइनल मुकाबले में वह 0-1 से हार गया.

दूसरी तरफ पुर्तगाल ने इतिहास रच दिया. 41 साल बाद उस ने फ्रांस को किसी मैच में हराया है. इस से पहले पुर्तगाल ने साल 1975 की 26 अप्रैल को फ्रांस के खिलाफ जीत दर्ज की थी. इतना ही नहीं, पिछले 10 मैच भी पुर्तगाल ही फ्रांस से हारा था.

'यूरो कप' के पेरिस में खेले गए फाइनल मुकाबले में तय 90 मिनटों में कोई भी टीम गोल नहीं कर सकी और मुक़ाबला गोल रहित रहा. 15 मिनट के पहले एक्स्ट्रा समय में भी कोई टीम गोल नहीं कर सकी.लेकिन 15 मिनट के दूसरे एक्स्ट्रा समय में पुर्तगाल के खिलाड़ी एडर ने गोल दाग कर टीम को जोश से भर दिया.

पुर्तगाल ने तकरीबन पूरा मैच अपने स्टार खिलाड़ी क्रिस्टियानो रोनाल्डो के बिना खेला, जो फ्रांस के मिडफ़ील्डर खिलाड़ी दिमित्री पेयेट से टकराने के बाद 24वें मिनट में मैदान से बाहर हो गए थे. इस के बाद रोनाल्डो की आंखों से आंसू निकल पड़े और स्टेडियम में मौजूद पुर्तगाली समर्थकों के चेहरे पर निराशा फैल गई. पर मैच में मिली जीत ने उन का यह गम भुला दिया.

पुर्तगाल के कोच सांतोस ने इस जीत का क्रेडिट रोनाल्डो को दिया. उन्होंने कहा, “हमारे कप्तान ने टूर्नामेंट में शानदार खेल दिखाया. कई लोगों की आलोचना झेलने के बाद भी उन्होंने बेहतरीन खेल भावना का प्रदर्शन किया. ड्रेसिंग रूम में उन की मौजूदगी बहुत अहम होती है."  क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने भी इस जीत के बाद  कहा, “यह वैसा फाइनल नहीं था, जिस की मुझे उम्मीद थी, लेकिन मैं इस जीत से बहुत खुश और गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं. यह ट्राफी सभी पुर्तगालियों के साथ ही हर उस प्रशंसक को समर्पित है, जिस ने हमारी टीम पर भरोसा जताया."

'यूरो कप, 2016 ' का खिताब जीत कर लौटी पुर्तगाल टीम का राजधानी लिस्बन में शानदार स्वागत किया गया. हजारों प्रशंसक एयरपोर्ट पर अपने फुटबाल हीरो का स्वागत करने के लिए मौजूद थे. टीम के खिलाड़ी ट्राफी के साथ खुली बस में सवार हुए और एयरपोर्ट से पोम्बल स्क्वायर  तक जुलूस की शक्ल में पहुंचे. रास्तेभर प्रशंसक 'हम चैंपियन हैं’ के नारे लगाते रहे.

दूसरी और, पुर्तगाल के हाथों मिली इस हार के बाद फ्रांस में हुई हिंसा के मद्देनजर वहां की पुलिस ने तकरीबन 40 लोगों को गिरफ्तार किया. फुटबाल के दीवानों ने एफिल टावर के नीचे बोतलें फेंकनी शुरू कर दीं, जिस के बाद पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े.

किसी खेल को ले कर दीवानगी होना ठीक है, पर इस तरह हारने के बाद उत्पात मचाना कहां की अकलमंदी है? वर्ल्ड चैंपियन फ्रांस को यह शोभा नहीं देता है. वैसे भी इस से पुर्तगाल के जीत के जश्न में कोई कमी नहीं आएगी. वेलडन पुर्तगाल.

आमिर खान का दोमुंहापन या इंद्र कुमार प्रेम

आमिर खान और इंद्रकुमार के संबंध जग जाहिर हैं. इसलिए आमिर खान हमेशा इंद्र कुमार को सलाह देते रहते हैं. वह उनके पक्ष में बातें करते रहते हैं. मगर 2013 में जब इंद्रकुमार ने एडल्ट सेक्स कॉमेडी फिल्म ‘ग्रैंड मस्ती’ का निर्माण किया था, तब इस फिल्म को देखने के बाद आमिर खान ने इंद्र कुमार को सलाह दी थी कि वह ग्रैंड मस्ती को सिनेमाघरों में रिलीज न करें.

लेकिन इंद्र कुमार ने आमिर खान की सलाह को दरकिनार करते हुए पर ग्रैंड मस्ती को सिनेमाघरों में रिलीज कर दिया था और ग्रैंड मस्ती ने सौ करोड़ का व्यापार कर लिया था. उसके बाद 2 जनवरी 2014 को ‘सरिता’ पत्रिका से बात करते हुए आमिर खान ने कहा था, ‘मैं किसी फिल्म का नाम नहीं लेना चाहता था. आप मेरे नाम को ‘कोट’ मत कीजिए. मैं ‘ग्रैंड मस्ती’ के खिलाफ हूं. इस तरह की फिल्में नहीं बननी चाहिए. इस फिल्म के निर्देशक इंद्र कुमार मेरे मित्र हैं. मैंने उनसे कहा था कि वह इस फिल्म को रिलीज ना करें.पर उन्होंने मेरी सलाह नहीं मानी और फिल्म रिलीज की. बॉक्स आफिस की कमायी से नफा नुकसान नहीं आंका जाना चाहिए. बॉक्स आफिस की कमायी से हमें आज फायदा नजर आ रहा है, पर हम कितना बड़ा नुकसान कर गए हैं, इसका हमें अहसास नहीं है.’

लेकिन अब दो साल बाद आमिर खान की सोच बदल गयी है या इंद्रकुमार के प्रति उनका प्यार उमड़ पड़ा है. यह तो वही जाने. पर अब जबकि इंद्र कुमार की एडल्ट सेक्स कॉमेडी फिल्म ग्रेट ग्रैंड मस्ती ऑन लाइन लीक हो गयी, तो इंद्र कुमार ने अपनी इस फिल्म को 22 जुलाई की बजाय 15 जुलाई को रिलीज करने की योजना बना ली.

15 जुलाई को ग्रेट ग्रैंड मस्ती को ज्यादा से ज्यादा थिएटर मिल सके, इसके प्रयास खुद आमिर खान ने किया. जितनी दूसरी छोटी फिल्में थी, वह सब 15 जुलाई से 22 जुलाई चली गयी.

सूत्रों के अनुसार आमिर खान ने अपने घर पर कुछ बड़े निर्माताओं की मीटिंग बुलाकर बात की कि ग्रेट ग्रैंड मस्ती की मदद की जानी चाहिए, क्योंकि यह फिल्म इंटरनेट पर लीक हो चुकी है. सूत्रों की माने तो इस मीटिंग में करण जोहर, एकता कपूर सहित कई निर्माता मौजूद थे. लेकिन आदित्य चोपड़ा मीटिंग में नहीं पहुंचे. तो आमिर खान ने स्वयं आदित्य चोपड़ा से फोन पर बात की. उसके बाद आदित्य चोपड़ा ने आमिर खान को आश्वस्त किया कि वह अपनी फिल्म ‘सुल्तान’ को कुछ थिएटरों से निकालकर उन थिएटरों में ग्रेट ग्रैंड मस्ती के रिलीज के लिए जगह दे देंगे. ग्रेट ग्रैंड मस्ती 2013 में प्रदर्शित इंद्र कुमार की फिल्म ‘ग्रैंड मस्ती’ का सिक्वअल है.

अब महज -सजयाई तीन साल के अंतराल में ऐसा क्या घटित हो गया कि एडल्ट सेक्स कॉमेडी फिल्मों को लेकर आमिर खान के विचार बदल गए. सूत्रों के अनुसार कुछ लोग इसे इंद्र कुमार द्वारा ‘दिल’ का रीमेक बनाने के निर्णय से जोड़कर देख रहे हैं. तो कुछ लोग इसे मुसीबत में मित्र की मदद का मसला मान रहे हैं.

साड़ी सब से सैक्सी पहनावा लगती है -अर्चना प्रजापति

मुंबई में पलीबढ़ी अर्चना प्रजापति उत्तर प्रदेश के गोरखपुर इलाके की रहने वाली हैं. मुंबई में अर्चना के पिता का अपना कारोबार है. स्कूल में पढ़ाई के समय से ही अर्चना को ऐक्टिंग अच्छी लगती थी. जब वे ग्रेजुएशन करने के लिए कालेज पहुंचीं, तो उन को एक म्यूजिक अलबम में काम करने का मौका मिला. इस के बाद वे फिल्मों की तरफ चल पड़ीं जल्दी ही अर्चना प्रजापति को कई भोजपुरी फिल्में मिल गईं. इन में ‘जिद्दी’ और ‘इलाहाबाद से इसलामाबाद’ खास हैं, जो बड़े परदे पर आ चुकी हैं.

अर्चना प्रजापति ने जिन म्यूजिक अलबमों में काम किया है, उन में ‘शिकवा’ और ‘नवाजिश’ खास हैं. वे एक हिंदी फिल्म भी करने जा रही हैं.

पेश हैं, अर्चना प्रजापति से हुई बातचीत के खास अंश :

ऐक्टिंग जगत में जगह बनाना कितना मुश्किल काम है?

आज के समय में हर क्षेत्र में एक से एक प्रतिभाएं मौजूद हैं. ऐसे में अपने लिए जगह बनाना बहुत ही मुश्किल काम है. जरूरत इस बात की होती है कि आप मेहनत करें, सही दिशा में कोशिश करें. इस के बाद आप में टेलैंट होगा, तो कामयाबी जरूर मिलेगी. बिना मेहनत के कुछ भी मुमकिन नहीं है.

भोजपुरी फिल्मों से ऐक्टिंग की शुरुआत करने से आप को भोजपुरी फिल्मों की हीरोइन का ठप्पा लगने का डर तो नहीं था?

आज के समय में भोजपुरी सिनेमा काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है. हिंदी और दूसरी इलाकाई बोली के कलाकार भी इस में काम करने आ रहे हैं. अब भोजपुरी फिल्मों का ठप्पा जैसा कुछ नहीं है. भोजपुरी मेरी अपनी बोली है. ऐसे में यहां काम करने में जो खुशी मिलती है, वह सब से खास है.

घर से आप को किस से सब से ज्यादा सहयोग मिलता है?

मेरे मम्मीपापा दोनों ही बहुत सहयोगी हैं. जब मेरी फिल्म ‘इलाहाबाद से इसलामाबाद’ की चर्चा लोगों ने की, तो हमारे घर वालों को लगा कि मैं ने सही काम किया है.

भोजपुरी फिल्में अपनी बोल्डनैस के लिए ज्यादा बदनाम हैं. आप को क्या लगता है?

जिस तरह से भोजपुरी फिल्मों की बुराई होती है, वह कुछ ज्यादा ही लगती है. चाहे किसी भी भाषा की फिल्में हों, उन में खुलापन बराबर होता है. भोजपुरी गांवदेहात की भाषा है, शायद इस वजह से इस की ज्यादा बुराई होती है. फिल्मकार वही फिल्में बनाते हैं, जिन को दर्शक देखते हैं. जब दर्शक इसे गलत नहीं मानते, तो बुराई करने से क्या होता है.

आप को इन फिल्मों में रोल करने से क्या कोई परेशानी होती है?

कहानी की मांग के मुताबिक खुलेपन से कोई एतराज नहीं है. हां, यह बात सच है कि अगर खुलेपन की मांग ऐसी हो, जो देखने वालों को पसंद न हो, तो उसे करने से क्या फायदा. जब इन बातों को ले कर लोग भोजपुरी फिल्मों की बुराई करते हैं, तो बुरा लगता है. हम भोजपुरी फिल्मी परिवार का हिस्सा हैं. हमें खुद इन बातों का खयाल रखना चाहिए कि लोगों को ज्यादा बुराई करने का मौका ही न मिले.

भोजपुरी फिल्मों में डांस आइटम बहुत होते हैं. क्या आप ने भी डांस सीखा है?

मुझे डांस करने का शौक है. मैं ने अभी तक डांस सीखा नहीं है. मैं जल्दी ही डांस सीखने के लिए क्लास लूंगी. वैसे, आजकल के डांस कोरियोग्राफर इतने माहिर होते हैं कि वे डांस कलाकारों से बहुत आसानी से काम करा लेते हैं, पर डांस सीखने के बाद उस का अलग ही अंदाज आता है.

आप को और क्या काम करना पसंद हैं?

मुझे खाली समय में पत्रिकाओं में छपी कहानियां पढ़ने का बहुत शौक है. ‘सरस सलिल’ मैं खूब पढ़ती हूं. इस की कहानियां और लेख मुझे पसंद आते हैं. मैं दूसरी पत्रिकाएं भी पढ़ती हूं. मुझे पहनने में साड़ी बहुत पसंद है. मुझे यह सब से सैक्सी पहनावा लगती है. घूमने और खाने का मुझे खास शौक नहीं है.

शादी से पहले क्यों खुश नहीं थे शाहिद

बॉलीवुड अभिनेता शाहिद कपूर ने पिछले हफ्ते अपनी शादी की पहली सालगिरह मनाई और तब ये कबूल किया कि शादी से पहले उन्हें अकेलापन सताता था. लेकिन शादी के बाद वे खुश हैं, उनकी जिंदगी में कोई है जो उनका ख्याल रखता है.

शाहिद ने एक अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा कि जिन्दगी में में करना अलग बात है. मगर एक समय आता है जब जीवन को संतुलित करना जरूरी हो जाता है. मैं 22 साल की उम्र से अकेला रहता था घर के पारिवारिक माहौल को मिस करता था. मैं अकेलापन महसूस करता था.

शाहिद ने ये भी कहा कि कामयाबी मिलने पर या पुरुस्कार जीतने पर मम्मी (नीलिमा अजीम) और डैड (पंकज कपूर) मेरे आसपास होते थे मगर ऐसा कोई नहीं था जिसके साथ मैं अपनी खुशियां तुरंत बांट सकुं.

अब शाहिद के जीवन में खुशियां भरने वाली और उनके समय का हिसाब-किताब रखने वाली के रूप में उनके पास उनकी पत्नी मीरा हैं. शाहिद बताते हैं कि पहले जब वो कहीं बाहर जाते थे तब कोई पूछने वाला नहीं था कि 'तुम पहुंचे या नहीं, तुम कैसे हो'. मगर अब अब मीरा हैं उनसे यह सब पूछने वाली. इतना ही नहीं, शाहिद के फोन पर आने वाले संदेशों में हर दूसरा संदेश मीरा का होता है.

 

उत्तर प्रदेश : दलबदल में जुटे नेता

उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं. हर दल अपने हिसाब से खुद को मजबूत और दूसरे को कमजोर साबित करने में लग गया है. इस को आज की राजनीति में चुनाव प्रबंधन का नाम दिया जाता है. अपने फायदे के लिए ये दल कार्यकर्ताओं की बलि दे कर दूसरे दल के नेताओं को टिकट देने में जुट गए हैं. कई पुराने नेताओं की ‘घर वापसी’ का दौर भी शुरू हो चुका है. ये नेता कुछ साल पहले पार्टी में ‘दम घुटने’ का आरोप लगा कर बाहर हो गए थे. पार्टी छोड़ कर ‘खुले में सांस लेने वाले’ ये नेता अब पुरानी पार्टी में वापस आ कर सुकून की सांस लेने लगे हैं.

मजेदार बात यह है कि पुरानी पीढ़ी के कई नेता अब अपने साथसाथ अपने परिवार, बेटाबेटी को भी राजनीति में जमाना चाहते हैं.

बागी हुए बसपा के साथी

चुनावी राजनीति के इस खेल में 20 साल से बसपा में रहे स्वामी प्रसाद मौर्य ने पार्टी छोड़ दी है. पार्टी छोड़ते वक्त उन्होंने बसपा प्रमुख मायावती पर टिकट के बदले पैसे लेने का आरोप लगाते हुए उन को ‘दौलत की बेटी’ कहा था. मायावती के लिए यह कोई नई बात नहीं है. इस के एक नहीं कई उदाहरण सामने हैं. बहुत पुराने समय में न जाएं, तो भी हाल के दिनों में ऐसे तमाम नेताओं के नाम लिए जा सकते हैं. आरके चौधरी, मसूद अहमद, दीनानाथ भास्कर, बाबू सिंह कुशवाहा, अखिलेश दास और जुगुल किशोर प्रमुख नाम हैं. बसपा के नेता पार्टी में रहते हुए जब चुनाव जीत जाते हैं, तो वे इसे अपनी ताकत समझ लेते हैं. असल में इन नेताओं को जो वोट मिलते हैं, वे बसपा के नाम पर मिलते हैं. पार्टी छोड़ कर यही नेता जब बाहर होते हैं, तो इन को जनाधार का पता चलता है. ये दूसरे नेताओं की सीट जितवाने का दावा जरूर करते हैं, पर खुद अपनी सीट पर भी चुनाव नहीं जीत पाते हैं.   

बाबू सिंह कुशवाहा बसपा में बहुत कद्दावर नेता माने जाते थे. मायावती के बाद उन की नंबर 2 के नेता की हैसियत थी. हैल्थ घोटाले में बसपा ने जब बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी से निकाला, तो वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने गए, पर वहां उन का विरोध शुरू हो गया. इस के बाद बाबू सिंह कुशवाहा ने जन अधिकार मंच नाम से अपना दल बनाया, पर वे अभी तक अपने जनाधार को साबित नहीं कर सके हैं. बसपा महासचिव रहे जुगुल किशोर बसपा से राज्यसभा सदस्य थे. बसपा से बाहर होने के बाद वे भाजपा में चले गए, पर वहां उन को पुरानी हैसियत नहीं मिल सकी है. वे भाजपा में हाशिए पर हैं. आरके चौधरी भी ऐसे ही नेताओं में शामिल हैं. बसपा से अलग होने के बाद वे स्वाभिमान पार्टी बनाने के बाद अपना जनाधार नहीं बना पाए और वापस बसपा में शामिल हो गए. अब बसपा में वे अपनी पुरानी हैसियत हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

सपा के बागी हुए साथी

समाजवादी पार्टी ने अपने पुराने नेताओं अमर सिंह और बेनी प्रसाद वर्मा को न केवल पार्टी में वापस लिया, बल्कि उन को राज्यसभा का सदस्य भी बनवा दिया. अमर सिंह अपनी पार्टी बना कर चुनाव लड़ चुके थे और बेनी प्रसाद वर्मा कांग्रेस में शामिल हो चुके थे. इन लोगों के लिए अभी भी समाजवादी पार्टी की विचारधारा की कोई अहमियत नहीं है. बेनी प्रसाद वर्मा अपने बेटे राकेश वर्मा की समाजवादी पार्टी में जगह बनाने की कोशिश में लगे हैं. समाजवादी पार्टी में बाहुबली मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के शामिल होने को ले कर सपा नेताओं में विरोध शुरू हो गया. इस को ले कर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, उन के पिता और सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और पार्टी महासचिव शिवपाल यादव के बीच तनाव फैल गया. मुख्तार अंसारी का दबदबा पूर्वी उत्तर प्रदेश के वाराणसी, गाजीपुर और मऊ जिले में है. मुसलिम वोट बैंक को खुश करने के लिए समाजवादी पार्टी ने अपने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की इमेज के खिलाफ फैसला किया. कौमी एकता दल की केवल 2 सीटें विधानसभा में हैं. ऐसे में इस के सपा में शामिल होने से किसी बड़े फायदे की उम्मीद नहीं है.

आनेजाने का दौर

उत्तर प्रदेश में राजनीति बदहवासी के दौर में है. किसी भी दल को यह उम्मीद नहीं है कि वह अपने बल पर सरकार बनाने में कामयाब होगी. ऐसे में पार्टियां तमाम तरह के प्रयोग करने में लगी हैं. नेताओं के आनेजाने का सिलसिला शुरू हो चुका है. यह चुनाव तक जारी रहेगा. कहने के लिए समाजवादी पार्टी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सीधी, सरल और ईमानदार इमेज को ले कर चुनाव मैदान में उतरना चाहती है, पर सचाई यह है कि उसे डर है कि केवल इस से काम नहीं होने वाला. ऐसे में वह पुराने नेताओं की ‘घर वापसी’ व बाहुबलियों के गठजोड़ को साथ रखना चाहती है.

बसपा को लगता है कि वह कानून व्यवस्था के मसले पर मायावती की कड़क इमेज के मुद्दे पर चुनाव जीत जाएगी. बसपा की कमजोरी यह है कि दलित और पिछड़े वर्ग के बहुत सारे लोग धर्म के प्रभाव मे फंस कर भाजपा के बहकावे में आ जाते हैं. बसपा ने पुराने समय में हिंदू समाज में दलितों की हालत को ले कर बड़ा संघर्ष किया था. बाद में बसपा खुद ब्राह्मणवाद का शिकार हो गई. ऐसे में दलित वोटर धर्म के मुद्दे पर भाजपा के पक्ष में खड़ा हो गया.

भाजपा ने बसपा को कमजोर करने के लिए उस के निकाले गए नेताओं पर भी डोरे डालने शुरू कर दिए हैं. जुगुल किशोर और रिटायर हुए चुके आईपीएस ब्रजलाल भाजपा में शामिल हो चुके हैं. उम्मीद की जा रही है कि जरूरत पड़ने पर बाबू सिंह कुशवाहा और स्वामी प्रसाद मौर्य भी चुनाव के बाद भाजपा की मदद कर सकते हैं. उत्तर प्रदेश में भाजपा विकास और हिंदुत्व की दोधारी तलवार पर चल कर चुनाव जीतना चाहती है. इस को ले कर वह कभी कैराना को मुद्दा बनाती है, तो कभी नरेंद्र मोदी की साफ इमेज को सामने रखती है. कांग्रेस अभी भी उत्तर प्रदेश में अपनी साख नहीं बना पाई है. उस की कोशिश यह है कि कुछ दलों के तालमेल से चुनाव लड़े और जीते. उत्तर प्रदेश में नेताओं के दलबदल का खेल आगे और भी तेज होता जाएगा, तब नेताओं के रंग देखने वाले होंगे.

नेताओं की अपनीअपनी राय

समाजवादी पार्टी अपनी सरकार की नीतियों और कामों को ले कर चुनाव मैदान में जाएगी. पार्टी ने 4 साल में प्रदेश मे विकास के जो काम किए हैं, वे पिछली किसी सरकार में नहीं हुए. पार्टी ने चुनाव में जनता से जो वादे किए थे, उन को पूरा किया है. हमारी सफलता है कि विरोधी दलों के पास कोई मुद्दा नहीं रह गया है. ऐसे में वे बेकार के मुद्दों को उठा रहे हैं. हम ने विकास के लैवल पर प्रदेश को पूरे देश में सब से आगे खड़ा कर दिया. आज जो लोग सपा में शामिल हो रहे हैं, वे हमारी नीतियों से प्रभावित हो कर ही आ रहे हैं.       – अखिलेश यादव, मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश.

जो लोग हमारे ऊपर टिकट बेचने का आरोप लगा रहे हैं, वे यह क्यों नहीं बता रहे हैं कि उन्होंने टिकट के लिए कितने पैसे दिए थे? स्वामी प्रसाद मौर्य पार्टी विरोधी गतिविधियों में लंबे समय से लगे थे. उन को कई बार सुधरने के लिए कहा भी था. वे बसपा में रहते हुए अपने परिवार को राजनीति में जमाना चाहते थे. बसपा में यह मुमकिन नहीं है. बसपा में परिवारवाद को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता. उन को वहीं मदद मिल सकती है, जहां परिवारवाद चल रहा हो. बसपा के लोग ऐसे नेताओं को चुनाव में सबक सिखा देंगे. बसपा बाबा साहब और मान्यवर कांशीराम के दिखाए रास्ते पर चलेगी.    – मायावती, बसपा प्रमुख.

बसपा में पहले काम करने वाले उन लोगों को टिकट मिलता था, जो पार्टी के लिए खूनपसीना बहाते थे. साल 2012 के बाद पार्टी में पैसे वालों को टिकट दिए जाने लगे. इस का सब से बड़ा सुबूत यह है कि सैकड़ों लोगों के टिकट काटे गए. मायावती डाक्टर अंबेडकर और कांशीराम के बताए रास्ते से भटक गई हैं. अब वे दलित की बेटी नहीं दौलत की बेटी बन गई हैं. पार्टी के पास फंड की कमी नहीं है. ऐसे में टिकट के बदले पैसे लेने की जरूरत नहीं है. मायावती की नीतियों के चलते दलित समाज को नुकसान हो रहा है. यही वजह है कि लोकसभा चुनाव में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा.          -स्वामी प्रसाद मौर्य, पूर्व बसपा महासचिव.

देवर पर भारी पड़ा भाभी से संबंध

‘‘अरे वाह देवरजी, तुम तो एकदम मुंबइया हीरो लग रहे हो,’’ सुशीला ने अपने चचेरे देवर शिवम को देख कर कहा.

‘‘देवर भी तो तुम्हारा ही हूं भाभी. तुम भी तो हीरोइनों से बढ़ कर लग रही हो,’’ भाभी के मजाक का जवाब देते हुए शिवम ने कहा.

‘‘जाओजाओ, तुम ऐसे ही हमारा मजाक बना रहे हो. हम तो हीरोइन के पैर की धूल के बराबर भी नहीं हैं.’’

‘‘अरे नहीं भाभी, ऐसा नहीं है. हीरोइनें तो  मेकअप कर के सुंदर दिखती हैं, तुम तो ऐसे ही सुंदर हो.’’

‘‘अच्छा तो किसी दिन अकेले में मिलते हैं,’’ कह कर सुशीला चली गई. इस बातचीत के बाद शिवम के तनमन के तार झनझना गए. वह सुशीला से अकेले में मिलने के सपने देखने लगा. नाजायज संबंध अपनी कीमत वसूल करते हैं. यह बात लखनऊ के माल थाना इलाके के नबी पनाह गांव में रहने वाले शिवम को देर से समझ आई. शिवम मुंबई में रह कर फुटकर सामान बेचने का काम करता था. उस के पिता देवेंद्र प्रताप सिंह किसान थे. गांव में साधारण सा घर होने के चलते शिवम कमाई करने मुंबई चला गया था. 4 जून, 2016 को वह घर वापस आया था.

शिवम को गांव का माहौल अपना सा लगता था. मुंबई में रहने के चलते वह गांव के दूसरे लड़कों से अलग दिखता था. पड़ोस में रहने वाली भाभी सुशीला की नजर उस पर पड़ी, तो दोनों में हंसीमजाक होने लगा. सुशीला ने एक रात को मोबाइल फोन पर मिस्ड काल दे कर शिवम को अपने पास बुला लिया. वहीं दोनों के बीच संबंध बन गए और यह सिलसिला चलने लगा. कुछ दिन बाद जब सुशीला समझ गई कि शिवम पूरी तरह से उस की गिरफ्त में आ चुका है, तो उस ने शिवम से कहा, ‘‘देखो, हम दोनों के संबंधों की बात हमारे ससुरजी को पता चल गई है. अब हमें उन को रास्ते से हटाना पड़ेगा.’’ यह बात सुन कर शिवम के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. सुशीला इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी. वह बोली, ‘‘तुम सोचो मत. इस के बदले में हम तुम को पैसा भी देंगे.’’ शिवम दबाव में आ गया और उस ने यह काम करने की रजामंदी दे दी. नबी पनाह गांव में रहने वाले मुन्ना सिंह के 2 बेटे थे. सुशीला बड़े बेटे संजय सिंह की पत्नी थी. 5 साल पहले संजय और सुशीला की शादी हुई थी.

सुशीला उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के महराजगंज थाना इलाके के मांझ गांव की रहने वाली थी. ससुराल आ कर सुशीला को पति संजय से ज्यादा देवर रणविजय अच्छा लगने लगा था. उस ने उस के साथ संबंध बना लिए थे. दरअसल, सुशीला ससुराल की जायदाद पर अकेले ही कब्जा करना चाहती थी. उस ने यही सोच कर रणविजय से संबंध बनाए थे. वह नहीं चाहती थी कि उस के देवर की शादी हो. इधर सुशीला और रणविजय के संबंधों का पता ससुर मुन्ना सिंह और पति संजय सिंह को लग चुका था. वे लोग सोच रहे थे कि अगर रणविजय की शादी हो जाए, तो सुशीला की हरकतों को रोका जा सकता है. सुशीला नहीं चाहती थी कि रणविजय की शादी हो व उस की पत्नी और बच्चे इस जायदाद में हिस्सा लें.

लखनऊ का माल थाना इलाका आम के बागों के लिए मशहूर है. यहां जमीन की कीमत बहुत ज्यादा है. सुशीला के ससुर के पास  करोड़ों की जमीन थी. सुशीला को पता था कि ससुर मुन्ना सिंह को रास्ते से हटाने के काम में देवर रणविजय उस का साथ नहीं देगा, इसलिए उस ने अपने चचेरे देवर शिवम को अपने जाल में फांस लिया. 12 जून, 2016 की रात मुन्ना सिंह आम की फसल बेच कर अपने घर आए. इस के बाद खाना खा कर वे आम के बाग में सोने चले गए. वे पैसे भी हमेशा अपने साथ ही रखते थे. सुशीला ने ससुर मुन्ना सिंह के जाते ही पति संजय और देवर रणविजय को खाना खिला कर सोने भेज दिया. जब सभी सो गए, तो सुशीला ने शिवम को फोन कर के गांव के बाहर बुला लिया.

शिवम ने अपने साथ राघवेंद्र को भी ले लिया था. वे तीनों एक जगह मिले और फिर उन्होंने मुन्ना सिंह को मारने की योजना बना ली. उन तीनों ने दबे पैर पहुंच कर मुन्ना सिंह को दबोचने से पहले चेहरे पर कंबल डाल दिया. सुशीला ने उन के पैर पकड़ लिए और शिवम व राघवेंद्र ने उन को काबू में कर लिया. जान बचाते समय मुन्ना सिंह चारपाई से नीचे गिर गए. वहीं पर उन दोनों ने गमछे से गला दबा कर उन की हत्या कर दी. मुन्ना सिंह की जेब में 9 हजार, 2 सौ रुपए मिले. शिवम ने 45 सौ रुपए राघवेंद्र को दे दिए. इस के बाद वे तीनों अपनेअपने घर चले गए. सुबह पूरे गांव में मुन्ना सिंह की हत्या की खबर फैल गई. उन के बेटे संजय और रणविजय ने माल थाने में हत्या का मुकदमा दर्ज कराया. एसओ माल विनय कुमार सिंह ने मामले की जांच शुरू की. पुलिस ने हत्या में जायदाद को वजह मान कर अपनी खोजबीन शुरू की. मुन्ना सिंह की बहू सुशीला पुलिस को बारबार गुमराह करने की कोशिश कर रही थी. पुलिस ने जब मुन्ना सिंह के दोनों बेटों संजय और रणविजय से पूछताछ की, तो वे दोनों बेकुसूर नजर आए.

इस बीच गांव में यह पता चला कि सुशीला के अपने देवर रणविजय से नाजायज संबंध हैं. इस बात पर पुलिस ने सुशीला से पूछताछ की, तो उस की कुछ हरकतें शक जाहिर करने लगीं. एसओ माल विनय कुमार सिंह ने सीओ, मलिहाबाद मोहम्मद जावेद और एसपी ग्रामीण प्रताप गोपेंद्र यादव से बात कर पुलिस की सर्विलांस सैल और क्राइम ब्रांच की मदद ली. सर्विलांस सैल के एसआई अक्षय कुमार, अनुराग मिश्रा और योगेंद्र कुमार ने सुशीला के मोबाइल को खंगाला, तो  पता चला कि सुशीला ने शिवम से देर रात तक उस दिन बात की थी. पुलिस ने शिवम का फोन देखा, तो उस में राघवेंद्र का नंबर मिला. इस के बाद पुलिस ने राघवेंद्र, शिवम और सुशीला से अलगअलग बात की. सुशीला अपने देवर रणविजय को हत्या के मामले में फंसाना चाहती थी. वह पुलिस को बता रही थी कि शिवम का फोन उस के देवर रणविजय के मोबाइल पर आ रहा था.

सुशीला सोच रही थी कि पुलिस हत्या के मामले में देवर रणविजय को जेल भेज दे, तो वह अकेली पूरी जायदाद की मालकिन बन जाएगी, पर पुलिस को सच का पता चल चुका था. पुलिस ने तीनों को साथ बिठाया, तो सब ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. 14 जून, 2016 को पुलिस ने राघवेंद्र, शिवम और सुशीला को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया. वहां से उन तीनों को जेल भेज दिया गया. सुशीला अपने साथ डेढ़ साला बेटे को जेल ले गई. उस की 4 साल की बेटी को पिता संजय ने अपने पास रख लिया. जेल जाते समय सुशीला के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी. वह शिवम और राघवेंद्र पर इस बात से नाराज थी कि उन लोगों ने यह क्यों बताया कि हत्या करते समय उस ने ससुर मुन्ना सिंह के पैर पकड़ रखे थे.

अंदरूनी बीमारियां और अंधविश्वास

मर्दों के बजाय औरतों के नाजुक अंगों की बनावट इस तरह की होती है, जिन में बीमारियों वाले कीटाणु आसानी से दाखिल हो सकते हैं. इस की वजह से उन में तमाम तरह की बीमारियां देखने को मिलती हैं. ये बीमारियां मर्द औरत के असुरक्षित सैक्स संबंध बनाने, असुरक्षित बच्चा जनने, माहवारी के दौरान गंदे कपड़े का इस्तेमाल करने व अंगों की साफसफाई न रखने की वजह से होती हैं. इस से औरतों के अंगों पर घाव होना, सैक्स संबंध बनाते समय खून का बहना व तेज दर्द, पेशाब में जलन व दर्द, अंग के आसपास खुजली होना, जांघों में गांठें होना व अंग से बदबूदार तरल जैसी चीज निकलने व मर्दों के अंग पर दाने, खुजली, घाव जैसी समस्याओं से दोचार होना पड़ता है. अगर इन का समय से डाक्टरी इलाज न कराया जाए तो औरतों में बांझपन, एचआईवी एड्स, गर्भाशय में गांठ व कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियां जन्म ले सकती हैं. अकसर औरतों में होने वाली अंदरूनी बीमारियों में वे समय से इलाज न करा कर झाड़फूंक जैसे अंधविश्वासों में पड़ कर शारीरिक, माली व दिमागी शोषण का शिकार हो जाती हैं. 12वीं जमात तक पढ़ी शीला को कुछ दिनों से पेड़ू में दर्द की शिकायत थी. इस के बाद उस के अंग के आसपास दाने निकलने शुरू हो गए और फिर बदबूदार पानी बहने लगा. शीला ने अपनी  यह समस्या पड़ोस की एक औरत को बताई, तो उस ने बताया कि उसे किसी बुरी आत्मा के साए ने जकड़ लिया है. एक तांत्रिक बाबा हैं, जो उस की इस समस्या का हल कर सकते हैं.

शीला बाबा के पास पहुंची, तो बाबा ने बताया कि उस के ऊपर किसी चुड़ैल का साया है, जिस की वजह से उसे यह समस्या हो रही है. शीला ने बाबा से अपनी इस समस्या का उपाय पूछा, तो बाबा ने कहा कि इस के लिए अनुष्ठान करना पड़ेगा, जिस पर तकरीबन 20 हजार रुपए का खर्च आएगा. शीला ने अपने पति को बिना बताए उस बाबा को 20 हजार रुपए दे दिए और झाड़फूंक कराना शुरू कर दिया. लेकिन जब 2 महीने बीतने के बाद भी शीला की समस्या घटने के बजाय और बढ़ गई, तो उस ने अपने पति को यह बात बताई. शीला का पति पढ़ालिखा था. उस ने शीला को समझाबुझा कर एक लेडी डाक्टर को दिखाया, तो डाक्टर ने शीला को अंग की बीमारी बताई. उस डाक्टर ने शीला और उस के पति का एकसाथ इलाज किया और शीला कुछ ही हफ्तों में पूरी तरह ठीक हो गई. इस सिलसिले में डाक्टर मलिक मोहम्मद अकमलुद्दीन का कहना है कि अकसर मर्दऔरत द्वारा असुरक्षित सैक्स संबंध बनाने की वजह से अंग में इंफैक्शन की शिकायत हो जाती है. यह समस्या औरत से मर्द में या मर्द से औरत में फैलने की वजह बनती है.

अंग में इंफैक्शन की वजह से औरत में पेशाब करते समय दर्द या जलन की तकलीफ बढ़ जाती है. इस के अलावा संबंध बनाते समय औरत को तेज दर्द होता है, वहीं मर्दों में अंग से स्राव, अंडकोषों में दर्द, अंग पर दाने व पेशाब करते समय दर्द व जलन की समस्या देखने को मिलती है. ये सभी समस्याएं इंफैक्शन की वजह से होती हैं, न कि भूतपे्रत या टोनेटोटके की वजह से. ऐसे में इन बीमारियों का इलाज झाड़फूंक से कराना कभीकभी जानलेवा भी साबित हो जाता है. अगर किसी औरत या मर्द में इस तरह के लक्षण दिखाई दें, तो उन्हें अपने नजदीकी अस्पताल में जा कर जरूर डाक्टरी सलाह लेनी चाहिए.

बांझपन में झाड़फूंक

अकसर औरतों में बच्चा न होने की समस्या देखने को मिलती है, जो कई वजह से होती है. अगर औरत की बच्चेदानी में किसी तरह की गांठ हो या उसे किसी तरह का इंफैक्शन हो, तो बच्चा पैदा होने में यह वजह रुकावट बनती है. ऐसे में बहुत सी औरतें बच्चा पाने की लालसा में झाड़फूंक करने वाले बाबाओं के पास चली जाती हैं, जहां उन्हें बच्चा तो नहीं पैदा होता है, बल्कि बाबाओं द्वारा माली व शारीरिक शोषण जरूर झेलना पड़ जाता है. कभीकभी पाखंडी बाबाओं द्वारा बच्चा पैदा करने के नाम पर झाड़फूंक करने की आड़ में औरतों की इज्जत भी लूट ली जाती है, जिस के चलते कभीकभी उन के बच्चा ठहर जाता है. औरतें ये बातें इसलिए छिपा जाती हैं, क्योंकि उन्हें बांझपन के ताने से छुटकारा मिल जाता है.

ऐसे तमाम मामले सामने आते रहते हैं, जिन में झाड़फूंक करने वाले पाखंडी बाबाओं द्वारा औरतों की इज्जत लूटने की वारदातें सामने आती हैं. बाद में पोल खुलने पर इन बाबाओं को जेल की हवा भी खानी पड़ती है. डाक्टर प्रीति मिश्रा के मुताबिक, अकसर किशोरावस्था से ही नाजुक अंगों की साफसफाई न करने की वजह से औरतों के अंग में इंफैक्शन हो जाता है, जो उन में बच्चा न पैदा होने की समस्या को जन्म देता है. इस हालत में औरतों को चाहिए कि वे अपने परिवार के लोगों के साथ बातचीत कर के किसी अच्छे डाक्टर को अपनी समस्या बताएं. बांझपन आज के दौर में शाप नहीं रहा है, बल्कि इस का समय से इलाज कराने से औरतें आसानी से मां बन सकती हैं. अगर किसी औरत या मर्द की बच्चा पैदा करने की कूवत में किसी तरह की कमी होती है, तो पतिपत्नी आपसी रजामंदी से टैस्ट ट्यूब बेबी या किराए की कोख से भी औलाद का सुख ले सकते हैं.

एचआईवी का खतरा

सामाजिक संस्था ‘गौतम बुद्ध जागृति समिति’ के सचिव श्रीधर पांडेय का कहना है कि अकसर औरत या मर्द में से किसी एक के अंग में होने वाला इंफैक्शन उस के साथ सैक्स करने की वजह से दूसरे साथी में चला जाता है, जिसे एसटीडी यानी यौन संचारी रोग के नाम से जाना जाता है. यह बीमारी मर्द व औरत द्वारा मुख मैथुन या गुदा मैथुन, संक्रमित अंगों को आपस में रगड़ने की वजह से होती है. इस के अलावा मर्द का इंफैक्शन वाला वीर्य जब औरत के अंग में जाता है, तो मर्द की बीमारी औरत को भी लग जाती है. इस हालत में इलाज की जगह बाबाओं से झाड़फूंक कराना न केवल घातक साबित होता है, बल्कि समय से इलाज न होने से औरत और मर्द में एचआईवी होने का खतरा भी बढ़ जाता है.

श्रीधर पांडेय का आगे कहना है कि उन की संस्था नोएडा, उत्तर प्रदेश में एड्स नियंत्रण सोसाइटी के सहयोग से एचआईवी एड्स से बचाव को ले कर जागरूकता का काम कर रही है. इस दौरान वे तमाम ऐसे एचआईवी पीडि़तों से मिले, जो पहले अंग के इंफैक्शन से पीडि़त थे और झाड़फूंक व इलाज में देरी होने की वजह से इन का यह इंफैक्शन एचआईवी में बदल गया.

इस तरह के लोगों में औरतों की तादाद सब से ज्यादा थी, क्योंकि औरतें अकसर अपनी बीमारी का इलाज डाक्टर से कराने के बजाय झाड़फूंक में ज्यादा विश्वास रखती हैं, जिस की वजह से उन को इस तरह की घातक बीमारियों का सामना करना पड़ता है. डाक्टर मलिक मोहम्मद अकमलुद्दीन का कहना है कि अगर औरत या मर्द के अंगों में किसी तरह की खुजली, दाने या घाव दिखाई पड़ते हैं, तो इस का समय रहते इलाज शुरू कर देना चाहिए, जिस से बीमारी के फैलने का खतरा कम हो जाता है. अगर यह समस्या औरत या मर्द में से किसी एक को है, तो उस दौरान दोनों को आपस में संबंध बनाने से बचना चाहिए या सैक्स के दौरान कंडोम का इस्तेमाल करना चाहिए.

अंग के इंफैक्शन में साफसफाई का खास खयाल रखना चाहिए. साथ ही, किसी तरह के अंधविश्वास से दूरी बना कर रखने में ही भलाई होती है. डाक्टर प्रीति मिश्रा कहती हैं कि औरतों में सैक्स संबंधी बीमारियों के नतीजे ज्यादा घातक होते हैं, जिस से वे तनाव का भी शिकार होती हैं. ऐसे में वे झाड़फूंक के अंधविश्वास में आसानी से पड़ जाती हैं. अगर किसी औरत में अंग के इंफैक्शन के लक्षण दिखाई दें, तो उसे अपनी समस्या अपने पति व परिवार वालों को बिना संकोच के बतानी चाहिए, जिस का समय रहते इलाज किया जा सके. डाक्टर प्रीति मिश्रा आगे बताती हैं कि अकसर अंग में इंफैक्शन की वजह से पैदा होने वाला बच्चा या तो समय से पहले पैदा हो जाता है या बेहद कमजोर व अंधा भी हो सकता है. मां में इंफैक्शन की वजह से उस के बच्चे को निमोनिया जैसी बीमारियां भी आसानी से जकड़ लेती हैं. अगर कोई औरत अपने अंदरूनी अंग में इंफैक्शन से पीडि़त है, तो उस के पेट में लंबे समय तक दर्द बना रह सकता है. उस के गर्भाशय में कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी भी जन्म ले सकती है. एचआईवी होने का खतरा भी बढ़ जाता है. ऐसे में आज के जमाने में हर शख्स की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह विज्ञान के तर्कों पर चलते हुए समय पर अपना इलाज कराए, न कि पाखंडी बाबाओं के चक्कर में पड़ कर अपनी जान जोखिम में डाले.

जब ठगे गए बिग बी…

फिल्म तीन को समीक्षकों ने भले ही सराहा हो, लेकिन बॉक्स ऑफिस के लिहाज से ये निराशजनक रही. फिल्म के सात निर्माताओं को 10 करोड़ का घाटा हुआ. इसका निर्माण 15 करोड़ में हुआ, इस राशि में अमिताभ की फीस शामिल नहीं थी. प्रिंट व प्रमोशन के 8 करोड़ सहित कुल निर्माण लागत 23 करोड़ हुई.

भारत में फिल्म ने 20 करोड़ रुपए कमाए, जिसमें वितरकों का शेयर 10 करोड़ रहा. ओवरसीज मार्केट से 2 करोड़ रुपए का कारोबार हुआ. संगीत और अन्य अधिकारों के बदले एक करोड़ की राशि मिली. यानी निर्माताओं के पास महज 13 करोड़ रुपए आए. बच्चन को कम रखनी थी फीस इस घाटे का सीधा असर अमिताभ की फीस पर पड़ा.

फिल्म के रिलीज से पहले तक इन टीवी सैटेलाइट अधिकारों की कीमत 15 करोड़ तक आंकी गई थी, लेकिन फ्लॉप होने के बाद बमुश्किल 8 करोड़ की राशि तय हुई. जानकार कहते हैं ‘प्रयोगधर्मी फिल्म के लिए फीस के तौर पर सैटेलाइट अधिकार अपने पास रखना अमिताभ का गलत फैसला था.

गौरतलब है कि अमिताभ की फीस 6-8 करोड़ के बीच रहती है, इस लिहाज से उन्हें अधिक आय की उम्मीद थी. लेकिन ये आंकड़ा उनकी ही फीस के समकक्ष आ गया. वैसे तो उन्हें फिल्म के बजट के अनुरूप कम फीस ही रखनी थी. सैटेलाइट अधिकार यदि निर्माताओं के पास रहते तो उनका घाटा कुछ कम हो सकता था..’

प्रमोशन में नदारद थे नवाज और विद्या

फिल्म से जुड़े एक अन्य सूत्र का कहना है ‘टाइटल ‘तीन’ था, लेकिन नवाजुद्दीन सिद्दीकी और विद्या बालन के रोल फिल्म में कमतर थे. पूरी फिल्म बच्चन पर केंद्रित होकर रह गई. प्रमोशन में भी विद्या और नवाज की गैरमौजूदगी का असर बॉक्स ऑफिस पर रहा.

तो रिवर राफ्टिंग इंस्ट्रक्टर होते ये अभिनेता

बॉलीवुड अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा पिछले काफी वक्त से नित्या मेहरा के निर्देशन में बनी आगामी फिल्म 'बार बार देखो' की तैयारियों में व्यस्त हैं. सिद्धार्थ ने काफी कम समय में हिन्दी सिनेमाजगत में अपनी एक खास पहचना बना ली है. लेकिन हाल ही में सिद्धार्थ ने बताया है कि अगर वह अभिनेता न होते तो क्या होते.

रोमांच पसंद करने वाले सिद्धार्थ मल्होत्रा का कहना है कि अगर वह अभिनेता नहीं होते तो रिवर राफ्टिंग प्रशिक्षक बनना पसंद करते, क्योंकि इसमें बेहद 'रोमांच और डर' है. सिद्धार्थ ने हाल ही में अपने प्रशंसकों के साथ एक लाइव फेसबुक चैट की थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर वह बॉलीवुड में सफल नहीं होते तो राफ्टिंग प्रशिक्षक बनना पसंद करते.

सिद्धार्थ ने कहा, ‘मैं रिवर राफ्टिंग प्रशिक्षक बनना चाहता हूं. इसमें बेहद रोमांच, उत्साह, साहस और डर है.’ उन्होंने अपने प्रशंसकों को अपने पसंदीदा निर्देशकों के बारे में भी बताया, जिनके साथ वह काम करना पसंद करते हैं. उन्होंने कहा, ‘मैं इम्तियाज अली, राजकुमार हिरानी और जोया अख्तर के साथ काम करना चाहता हूं.’

आगामी फिल्म 'बार-बार देखो' में सिद्धार्थ के साथ कैटरीना कैफ मुख्य किरदार में नजर आएंगी. इस फिल्म में ये दोनों पहली बार साथ में रोमांस करते हुए नजर आएंगे. फिल्म में इन दोनों ने अपने लुक के साथ भी काफी बदलाव किया है. इसके अलावा सिद्धार्थ ने अभिनेत्री जैकलिन फर्नांडीज के साथ अपनी अगली एक्शन फिल्म की शूटिंग शुरू कर दी है.

स्नैपडील ने रिटर्न पॉलिसी में किए बड़े बदलाव

स्नैपडील से स्मार्टफोन, कंप्यूटर समेत अन्य इलेक्ट्रॉनिक प्रॉडक्ट्स की वापसी पहले से ज्यादा मुश्किल होगी क्योंकि अब कोई आइटम वापस करते वक्त आपको डॉक्युमेंट भी देने होगा. यह डॉक्युमेंट आपको स्नैपडील के ऑथराइज्ड सर्विस सेंटर से बनवाने होंगे जिसमें सामान में गड़बड़ी बताई जाएगी और डॉक्युमेंट बनने के सात दिनों के अंदर इसे कंपनी को देना होगा, तभी सामान वापस हो सकेगा.

हालांकि, स्नैपडील का कहना है कि यह पॉलिसी पुरानी है, लेकिन कुछ सेलर्स ने बताया कि उन्हें 11 जुलाई को मिले ईमेल से पहले इसकी जानकारी नहीं थी. कंपनी ने विक्रेताओं को भेजे ईमेल में कहा, 'इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम्स: हमें ब्रैंड/ओईएम के सर्विस सेंटर से एक डॉक्युमेंट चाहिए होता है जिसमें कहा गया हो कि जो सामान डिलिवर हुए उनमें गड़बड़ी है. रिफंड या रिप्लेसमेंट रिक्वेस्ट की प्रोसेसिंग से पहले हम शिकायत की जांच के लिए क्वॉलिटी चेक करेंगे. वही आइटम्स रिटर्न या रिप्लेस होंगे जिसमें गड़बड़ी पाई जाएगी.'

विक्रेताओं ने कंपनी के इस कदम का स्वागत किया है. ऑनलाइन सेलर्स ग्रुप ई-सेलर सुरक्षा फोरम के संजय ठाकुर ने कहा, 'सबसे बड़ा बदलाव 'नो क्वेश्चन आस्क्ड' पॉलिसी को हटाया जाना है जिससे उनकी डिलिवरी कॉस्ट बढ़ जाती है. अब बेवजह की वापसी और ग्राहकों के फ्रॉड्स कम होंगे.'                                                                                                                                                         

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