Download App

कामवालियों पर ललचाई नजरें

आज के समय में ज्यादातर शहरी पतिपत्नी कामकाजी होते हैं. ऐसे में घरों में काम करने वाली बाई का रोल अहम हो जाता है. अगर एक दिन भी वह नहीं आती है, तो पूरा घर अस्तव्यस्त हो जाता है. एक ताजा सर्वे के मुताबिक, मुंबई शहर में कामकाजी लोगों के घर उन की कामवाली बाई के भरोसे ही चलते हैं और अगर एक दिन भी वह छुट्टी ले लेती है, तो घर में मानो तूफान आ जाता है. सवाल यह है कि जो इनसान हमारे घर के लिए इतना अहम है, क्या हमारे समाज में उसे वह इज्जत मिल पाती है, जिस का वह हकदार है?

आमतौर पर घरों में काम करने वाली बाइयों के प्रति समाज का नजरिया अच्छा नहीं रहता, क्योंकि अगर घर में से कुछ इधरउधर हो गया, तो इस का सब से पहला शक बाई पर ही जाता है. इस के अलावा घर के मर्दों की भी कामुक निगाहें उन्हें ताड़ती रहती हैं और अगर बाई कम उम्र की है, तो उस की मुसीबतें और ज्यादा बढ़ जाती हैं. सीमा 34 साल की है. 4 साल पहले उस का पति एक हादसे में मारा गया था. उस की एक 14 साल की बेटी और 10 साल का बेटा है. एक घर का जिक्र करते हुए सीमा बताती है, ‘‘जिस घर में मैं काम करती थी, उन की बेटी मुझ से एक साल बड़ी थी. एक दिन आंटी बाहर गई थीं. घर में सिर्फ अंकलजी, उन की बीमार मां और बेटी थी. मैं रसोइघर में जा कर बरतन धोने लगी. अंकलजी ने अपनी बेटी को किसी काम से बाहर भेज दिया.

‘‘मैं बरतन धो रही थी और वे अंकल कब मेरे पीछे आ कर खड़े हो गए, मुझे पता ही नहीं चला. जैसे ही मैं बरतन धो कर मुड़ी, तो उन का मुंह मेरे सिर से टकरा गया. मैं घबरा गई और चिल्लाते हुए घर से बाहर आ गई.

‘‘इस के बाद 2 दिन तक मैं उन के यहां काम करने नहीं गई. तीसरे दिन वे अंकल खुद मेरे घर आए और हाथ जोड़ कर बोले, ‘मुझे माफ कर दो. मुझ से गलती हो गई. मेरे घर में किसी को मत बताना और काम भी मत छोड़ना. आज के बाद मैं कभी तुम्हारे सामने नहीं आऊंगा.’

‘‘आप बताइए, उन की बेटी मुझ से बड़ी है और वे मेरे ऊपर गंदी नजर डाल रहे थे. क्या हमारी कोई इज्जत नहीं है?’’ कहते हुए वह रो पड़ी. नीता 28 साल की है. पति ने उसे छोड़ दिया है. वह बताती है, ‘‘मैं जिस घर में काम करती थी, वहां मालकिन ज्यादातर अपने कमरे में ही रहती थीं. जब मैं काम करती थी, तो मालिक मेरे पीछेपीछे ही घूमता रहता था. मुझे गंदी निगाहों से घूरता रहता था.

‘‘फिर एक दिन हिम्मत कर के मैं ने उस से कहा, ‘बाबूजी, यह पीछेपीछे घूमने का क्या मतलब है, जो कहना है खुल कर कहो? मैडमजी को भी बुला लो. मैं गांव की रहने वाली हूं. मेरी इज्जत जाएगी तो ठीक है, पर आप की भी बचनी नहीं है.’

‘‘मेरे इतना कहते ही वह सकपका गया और उस दिन से उस ने मेरे सामने आना ही बंद कर दिया.’’ इसी तरह 35 साल की कांता बताती है, ‘‘मैं जिस घर में काम करती थी, उन साहब के घर में पत्नी, 2 बेटे और बहुएं थीं. उन के यहां सीढि़यों पर प्याज के छिलके पड़े रहते थे. हर रोज मैं जब भी झाड़ू लगाती, मालिक रोज सीढि़यों पर बैठ कर प्याज छीलना शुरू कर देता और फिर सीढि़यों से ही मुझे आवाज लगाता, ‘कांता, यहां कचरा रह गया है.’

‘‘जब मैं झाड़ती तो मेरे ऊपर के हिस्से को ऐसे देखता, मानो मुझे खा जाएगा. एक महीने तक देखने के बाद मैं ने उस घर का काम ही छोड़ दिया.’’ 30 साल की शबनम बताती है, ‘‘पिछले साल मैं जिस घर में काम करती थी, वहां दोनों पतिपत्नी काम पर जाते थे. उन का एक छोटा बेटा था. मैं पूरे दिन उन के घर पर रह कर बेटे को संभालती थी. ‘‘एक दिन मैडम दफ्तर गई थीं और साहब घर पर थे. मैं काम कर रही थी, तभी साहब आए और बोले, ‘शबनम, 2 कप चाय बना लो.’

‘‘मैं जब चाय बना कर उन के पास ले गई, तो वे सोफे पर बैठने का इशारा कर के बोले, ‘आ जाओ, 2 मिनट बैठ कर चाय पी लो, फिर काम कर लेना.’

‘‘मैं उन के गंदे इरादे को भांप गई और न जाने कहां से मुझ में इतनी ताकत आ गई कि मैं ने उन के गाल पर एक चांटा जड़ दिया और अपने घर आ गई. उस दिन के बाद से मैं उन के घर काम पर नहीं गई.’’ इन उदाहरणों से कामवाली बाइयों के प्रति समाज का नजरिया दिखता है. ऐसे घरों में इन्हें एक औरत के रूप में तो इज्जत मिलती ही नहीं है, साथ ही जिस घर को संवारने में ये अपना पूरा समय देती हैं, वहीं मर्द इन्हें गंदी नजरों से देखते हैं.

क्या करें ऐसे समय में

ऐसे हालात में आमतौर पर ज्यादातर कामवाली बाई चुप रह जाती हैं या काम छोड़ देती हैं. इस के पीछे उन की सोच यही होती है कि चाहे घर का मर्द कितना ही गलत क्यों न हो, कुसूरवार कामवाली बाई को ही ठहराया जाता है. वे अगर  मुंह खोलेंगी तो और भी लोग उन से काम कराना बंद कर देंगे, इस से उन की रोजीरोटी के लाले पड़ जाएंगे. कई मामलों में तो कामवाली बाई को पैसे दे कर उस का मुंह भी बंद कर दिया जाता है. पर ऐसा करना मर्दों की गंदी सोच को बढ़ावा देना है, इसलिए अगर ऐसा होता है, तो चुप रहने के बजाय अपनी आवाज उठानी चाहिए. आजकल तकनीक का जमाना है. अगर मुमकिन हो सके, तो ऐसी छिछोरी बातों को रेकौर्ड करें या वीडियो क्लिप बना लें, ताकि बात खुलने पर सुबूत के तौर पर उसे पेश किया जा सके.

क्या करें पत्नियां

ऐसे मनचलों की पत्नियां भले ही अपने पति की हरकत को जगजाहिर न करें, पर वे खुद इस से अच्छी तरह परिचित होती हैं. अच्छी बात यह रहेगी कि बाई के साथ अकेलेपन का माहौल न बनने दें. वे खुद बाई से काम कराएं. अगर पति मनचला है, तो ज्यादा उम्र की बाई को घर पर रखें. कई बार कामवालियां भी मनचली होती हैं. उन्हें घर की मालकिन के बजाय घर के मालिक से ज्यादा वास्ता रहता है. ऐसे में उन्हें उन की सीमाएं पार न करने की हिदायत दें.

रेलवे को लगाया करोड़ों का चूना

12वीं जमात में पढ़ने वाले हामिद अशरफ नाम के एक 19 साला लड़के ने 2 सालों में भारतीय रेल को करोड़ों रुपए का चूना लगाया और रेलवे अफसरों को इस की भनक तक नहीं लगी. मामले का खुलासा तब हुआ, जब रेलवे विजिलैंस टीम ने इस की शिकायत बेंगलुरु व लखनऊ की सीबीआई टीम से की. पता चला कि रेल का टिकट बुक करने वाली आईआरसीटीसी वैबसाइट का क्लोन तैयार कर देशभर की कई जगहों से फर्जी तरीके से तत्काल टिकट की बुकिंग की जा रही थी. इस मामले के खुलासे के लिए रेलवे विजिलैंस व सीबीआई टीम द्वारा पिछले 2 सालों से कोशिश की जा रही थी कि अचानक सीबीआई के हाथ एक क्लू लगा कि देशभर में तकरीबन 5 हजार एजेंटों के जरीए आईआरसीटीसी की वैबसाइट को हैक कर तत्काल टिकटों के कोटे में सेंध लगा दी गई थी और इस का संचालन उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से किया जा रहा था.

इस के बाद बेंगलुरु की सीबीआई टीम के इंस्पैक्टर टी. राजशेखर और लखनऊ सीबीआई टीम के इंस्पैक्टर रमेश पांडेय की टीम रेलवे विजिलैंस के साथ बस्ती पहुंची और पुरानी बस्ती के थाना प्रभारी रणधीर मिश्र के साथ मिल कर 3 दिनों तक इस मामले के खुलासे की कोशिश करती रही. आखिरकार पुलिस की मेहनत रंग लाई. 27-28 अप्रैल, 2016 की रात सीबीआई टीम ने पुरानी बस्ती थाने के थाना प्रभारी रणधीर मिश्र व एसआई अरविंद कुमार व रामवृक्ष यादव, एचसीपी रामकरन और महिला सिपाही प्रीति पांडेय के साथ मिल कर दरवाजा नाम की जगह पर बनी एक मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान पर छापा मारा, तो गुफानुमा संकरे गलियारों से होते हुए जब पुलिस के लोग एक कमरे में पहुंचे, तो वहां तकरीबन 19 साला एक किशोर को 10 लैपटौप के बीच काम करता हुआ पाया गया.

उस लड़के ने पुलिस को देखते ही भागने की कोशिश की, लेकिन पुलिस की मुस्तैदी से वह धर दबोचा गया. हामिद अशरफ ने बताया कि वह पिछले 2 साल से आईआरसीटीसी का क्लोन तैयार कर वैबसाइट को हैक कर चुका था, जिस के जरीए उस ने नकली सौफ्टवेयर बना कर पूरे देश में तकरीबन 5 हजार एजेंट तैयार किए थे. इन एजेंटों से उसे अच्छीखासी रकम मिलती थी. जहां रेल महकमा एक टिकट को बुक करने में एक मिनट का समय लगाता था, वहीं हामिद अशरफ द्वारा तैयार किए गए सौफ्टवेयर से 30 सैकंड में ही टिकट की बुकिंग हो जाती थी.

हामिद की चाहत

हामिद अशरफ ने पुलिस को बताया कि वह बस्ती जिले के कप्तानगंज थाने के वायरलैस चौराहे का रहने वाला है. उस के पिता जमीरुलहसन उर्फ लल्ला बिल्डिंग मैटीरियल का कारोबार करते हैं. लेकिन घर का खर्च मुश्किल से ही चल पाता था. ऐसे में उसे इंजीनियर बनने का सपना पूरा होता नहीं दिखा. माली तंगी से परेशान हो कर वह अपने मामा के घर आ कर रहने लगा. बस्ती रेलवे स्टेशन के पास ही एक दुकान पर वह रेलवे टिकट निकालने का हुनर सीखने लगा. चूंकि हामिद अशरफ का झुकाव इंजीनियरिंग की ओर था. ऐसे में रेलवे टिकट की बुकिंग के दौरान उस के दिमाग में एक ऐसी योजना आई, जिस से न केवल उस ने आईआरसीटीसी का सौफ्टवेयर तैयार किया, बल्कि रुपयों की बौछार भी होने लगी.

बेचता था सौफ्टवेयर

हामिद अशरफ ने आईआरसीटीसी की डुप्लीकेट वैबसाइट को बेचने के लिए तमाम सोशल साइटों का सहारा लिया. देखते ही देखते पूरे देश में तकरीबन 5 हजार एजेंटों की फौज तैयार कर ली. इस सौफ्टवेयर को वह 60 हजार से 80  हजार रुपए में एजेंटों को बेचता था. 2 साल में हामिद अशरफ ने नकली सौफ्टवेयर के जरीए इतना पैसा कमा लिया था कि उस के एक ही खाते में तकरीबन 50 लाख रुपए जमा होने की जानकारी पुलिस को हुई. हामिद अशरफ लोगों की नजर में तब आया, जब उस ने औडी जैसी महंगी गाड़ी की बुकिंग कराई. साथ ही, उस ने अपने पिता के लिए नकद रुपए दे कर एक बोलैरो गाड़ी खरीदी थी. इंटरनैट पर सर्च कर के हामिद अशरफ ने जानकारी इकट्ठा की थी कि किस तरह से किसी भी साइट को हैक कर इस की सिक्योरिटी में सेंध लगाई जा सकती है. हामिद अशरफ ने यह कबूला कि उस ने 2 सालों में रेलवे को तकरीबन 16 करोड़ रुपए का चूना लगाया है, लेकिन सीबीआई व पुलिस का मानना है कि यह रकम कई करोड़ रुपए हो सकती है.

टूटेगा गिरोह का नैटवर्क

पुरानी बस्ती थाना क्षेत्र से पकड़े गए हामिद अशरफ की कारगुजारी को ले कर हर कोई हैरान है. यहां के लोगों को इस बात पर यकीन नहीं हो रहा कि हामिद इतना बड़ा शातिर निकलेगा. गिरफ्तारी के बाद उसे सीबीआई की लखनऊ कोर्ट में पेश किया गया, जहां से बेंगलुरु की सीबीआई टीम उसे ट्रांजिट रिमांड पर ले कर बेंगलुरु चली गई. सूत्रों की मानें, तो सीबीआई बस्ती के अलावा गोरखपुर, संत कबीरनगर, फैजाबाद, गोंडा समेत देश के अलगअलग इलाकों से जुड़े लोगों के बारे में जानकरी इकट्ठा करने की कोशिश कर रही है.

रेलवे पर उठे सवाल

भारतीय रेल सेवा के नैटवर्क में 19 साला एक लड़के ने इस तरह से सेंध लगाई कि देखते ही देखते 2 साल में उस ने रेलवे को 16 करोड़ रुपए का चूना लगा दिया. इस के अलावा देशभर में तैयार किए गए तकरीबन 5 हजार एजेंटों ने पता नहीं कितने रुपए का चूना लगाया होगा. इस मामले की जांच सीबीआई के हवाले है. बस्ती पुलिस ने बताया कि उस की भूमिका सीबीआई और रेलवे विजिलैंस टीम के साथ हामिद अशरफ की गिरफ्तारी तक थी. इस के बाद क्या हुआ, पुलिस को नहीं पता. इस मामले के मास्टरमाइंड की गिरफ्तारी हो चुकी है. अब देखना यह है कि सीबीआई और रेलवे विजिलैंस टीम हामिद अशरफ द्वारा तैयार किए गए देशभर के नैटवर्क को किस तरह से खत्म करती है.

बेवफा आशिक को दी मौत की सजा

पीडि़त का नाम – विभाष कुमार कनेरिया.

उम्र – 35 साल.

पिता का नाम – परसराम कनेरिया.

पेशा – जमीन की दलाली.

निवासी – बैतूल. हालमुकाम 307, 2 सी, साकेत नगर, भोपाल.

जुर्म – माशूका से बेवफाई.

सजा – सजा ए मौत.

कातिल – मोंटी उर्फ योगेश्वरी बरार.

 

यह वाकिआ 5 जून, 2016 का है, जब विभाष कुमार को उस की ही माशूका मोंटी ने चाकू से हमला कर मौत के घाट उतार दिया था. विभाष कुमार उन लाखों नौजवानों में से एक था, जो रोजगार की तलाश में भोपाल आ कर रहने लगा था. कुछ और उसे आता नहीं था, इसलिए वह दिखने में सब से आसान लगने वाला जमीनों की दलाली का काम करने लगा और इमारतें बनाने के धंधे में भी उतरने वाला था. भोपाल जैसे बड़े शहर में अपनी आमदनी के दम पर 10 साल गुजार देना यह बताता है कि विभाष कुमार अपने धंधे में माहिर हो गया था और उस की कमाई ठीकठाक हो रही थी. लेकिन 35 साल का हो जाने के बाद भी उस ने शादी नहीं की थी, तो वजह उस की 28 साला माशूका मोंटी थी, जिस के साथ वह बीते 9 सालों से लिव इन रिलेशनशिप में था यानी वे दोनों बगैर शादी किए मियांबीवी की तरह रहते थे, जो हर्ज की बात इस लिहाज से थी कि मोंटी रिश्ते में उस की बहन लगती थी. पहले प्यार और फिर जिस्मानी संबंध बना कर उन दोनों ने कोई समझदारी का काम नहीं किया था. अंदाजा लगाया जा सकता है कि आज की खूबसूरत दिखने वाली मोंटी 9 साल पहले जब जवानी की दहलीज पर दाखिल हुई होगी, तो कितनी खूबसूरत रही होगी. मोंटी भी लाखों लड़कियों की तरह भोपाल पढ़ने आई थी. पढ़ाई तो उस ने की, पर साथसाथ चचेरे भाई के साथ मुहब्बत की भी डिगरी ले डाली थी. मोंटी पढ़ेलिखे घर की लड़की है, जिस के पिता टिमरनी, हरदा के एक स्कूल में टीचर और मां होस्टल वार्डन थीं. बेटी भी अच्छे से पढ़लिख कर कुछ बन जाए, इसलिए उन्होंने मोंटी को पढ़ाई के लिए भोपाल भेज दिया था, पर गलती यह की थी कि सहूलियत और हिफाजत के लिए उसे अपने दूर के रिश्ते के भाई विभाष कुमार के पास रहने छोड़ दिया था, जिस के पास उस की बहन भी रहती थी.

विभाष कुमार और मोंटी जवानी के जोश के चलते रिश्ते की हदें ज्यादा दिनों तक निभा नहीं पाए और सबकुछ भूल कर एकदूसरे में ऐसे खोए कि उन्होंने अपने आने वाले कल के बारे में कुछ नहीं सोचा.

गलती आशिक की

9 साल का अरसा कम नहीं होता. एक कली को फूल बना चुके विभाष कुमार का दिल अपनी माशूका से उचटने लगा था, क्योंकि जैसेजैसे पैसा आता गया, वैसेवैसे उसे नईनई तितलियां भी मिलने लगी थीं. उधर, मोंटी तो विभाष को ही अपना सबकुछ मान बैठी थी. शादी हो न हो, उसे इस बात से कोई मतलब नहीं था, वह तो बस हर हाल में आशिक का साथ चाहती थी. ऐसा भी नहीं था कि वह एकदम नादान या देहाती लड़की थी, बल्कि बेहद समझदार और सधी हुई लड़की थी, जिस ने भोपाल की बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी से साइकोलौजी में एमए की डिगरी ली थी. लिहाजा, कुदरती तौर पर वह जाननेसमझने लगी थी कि कौन कब क्या बरताव करेगा.

लेकिन पढ़ाईलिखाई या डिगरियों का जिंदगी की सचाई से कोई लेनादेना नहीं होता. यह बात मोंटी को समझाने वाला कोई नहीं था.

भड़की माशूका

विभाष कुमार की कम होती दिलचस्पी को मोंटी बखूबी समझ रही थी, पर उसे ज्यादा अफसोस इस बात का रहने लगा था कि उसे छोड़ कर उस का आशिक इधरउधर मुंह मारने लगा था. भले ही वे पतिपत्नी नहीं बने थे, लेकिन मियांबीवी की तरह रह रहे थे, इसलिए मोंटी की बेचैनी या तिलमिलाहट कुदरती बात थी. मोंटी ने कई बार विभाष कुमार को समझाया था कि दूसरी लड़कियों से प्यार की पींगे मत बढ़ाओ. यह मुझ से बरदाश्त नहीं होता है, लेकिन अब तक विभाष कुमार उस की कमजोरी ताड़ चुका था कि वह यों ही कलपती रहेगी, पर कुछ कर नहीं पाएगी. अब से तकरीबन 4 साल पहले विभाष कुमार की बहन आभा, जिस का एक नाम रीना भी है, भी भोपाल में उन्हीं के साथ आ कर रहने लगी थी, तो मोंटी ने साकेत नगर में किराए पर अलग मकान ले लिया था, जो इस नाजायज रिश्ते को बनाए रखने में काफी मददगार साबित हुआ था.

हालांकि रीना इन दोनों के मियांबीवी सरीखे रिश्ते को ताड़ चुकी थी. मोंटी का मकान उस के घर से पैदल की दूरी पर था, इसलिए रीना से कुछ छिपा नहीं था. रीना के जरीए ही इस रिश्ते की बात विभाष कुमार की मां तक पहुंची थी, जो पति की मौत के बाद से ही अपनी औलादों को ले कर परेशान रहने लगी थीं. विभाष कुमार की कमाई से ही उन का बैतूल का खर्च चलता था. विभाष कुमार और मोंटी के रिश्ते के बारे में सुन कर मां का डरना लाजिम था, इसलिए उन्होंने उसे ऊंचनीच समझाई, तो वह मान गया.  वैसे भी विभाष कुमार का जी अब मोंटी से ऊबने लगा था, इसलिए उस ने माशूका से दूरी बनाना शुरू कर दिया. लेकिन मोंटी किसी भी शर्त पर उस का साथ या पीछा छोड़ने को तैयार नहीं थी.

ऐसे लिया बदला

5 जून, 2016 को मोंटी विभाष कुमार के घर पहुंची और रातभर वहीं रही. जब दूसरे कमरे में आभा यानी रीना सो गई, तो उस ने विभाष कुमार को लताड़ना शुरू कर दिया. इसी कहासुनी में विभाष कुमार ने उसे अपनी सगाई के फोटो मोबाइल पर दिखाए, जिन में एक लड़की यानी उस की मंगेतर उसे केक खिला रही थी. फोटो देख कर मोंटी के तनबदन में आग लग गई. हालांकि वह पहले से काफीकुछ जानती थी, पर नौबत यहां तक आ जाएगी, इस का उसे अंदाजा नहीं था. रातभर दोनों तूतूमैंमैं करते रहे. मोंटी की दलीलें अपनी जगह ठीक थीं कि जब उस ने अपना सबकुछ उसे सौंप दिया है, तो वह किसी और का कैसे हो सकता है? विभाष कुमार का यह कहना था कि उस की मरजी जिस से चाहे शादी करे. इस कहासुनी के बाद कोई हल न निकलता देख विभाष कुमार जब गहरी नींद में सो गया, तो नागिन सी तिलमिलाई मोंटी ने चाकू से उस के सीने पर हमला किया और फिर कहीं वह जिंदा न बच जाए, इसलिए ताबड़तोड़ हमले करती रही. शोर सुन कर रीना जागी और बाहर आई तो नजारा देख कर हैरान रह गई. उस ने मोंटी को पकड़ने की कोशिश की, पर वह मोबाइल और चाकू फेंक कर भाग खड़ी हुई.

रीना कुछ पड़ोसियों की मदद से जैसेतैसे उसे अस्पताल ले गई, पर डाक्टरों ने उसे मरा घोषित कर दिया. विभाष कुमार की हत्या करने के बाद मोंटी को होश आया, तो उस ने खुद को भी खत्म करने की ठान ली. शायद उस के लिए विभाष के बाद दुनिया में कुछ रह नहीं गया था. उस ने पहले खुद पर चाकू से हमला किया, पर घबरा गई, क्योंकि इस में मरने की गारंटी नहीं थी. घाव बड़ा नहीं था, इसलिए उस ने उस को ढक लिया और नजदीकी आरआरएल चौराहे पर जा कर पैट्रोल पंप से बोतल में पैट्रोल खरीदा और खुद पर उड़ेल लिया, पर खुद को आग लगाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. जाहिर है, मोंटी अपना आपा खो चुकी थी, इसलिए खुदकुशी की तीसरी कोशिश उस ने कुएं में कूद कर की, पर जिस कुएं में वह कूदी, उस में 4 फुट ही पानी था. लिहाजा, वह फिर बच गई.

इधर, पुलिस को कत्ल की वारदात की खबर लग चुकी थी, इसलिए वह तुरंत मोंटी की तलाश में जुट गई थी. राह चलते लोगों से पूछताछ की बिना पर पुलिस वाले कुएं के पास पहुंचे, तो मोंटी अंदर ही थी. पिपलानी के गांधी मार्केट का यह कुआं 20 फुट गहरा है. मोंटी को बाहर निकालने के लिए डायल 100 के ड्राइवर बलवीर ने हिम्मत दिखाई और कुएं में उतर कर उसे सहीसलामत ऊपर ले आया. थाने जा कर मोंटी फरियाद करती रही कि विभाष को तो उस ने मार दिया है, लेकिन उसे अब कब फांसी दोगे. पुलिस वालों न उसे प्यार से पुचकारा और खाने के लिए सैंडविच मंगा कर दिए, तो मोंटी कुछ सामान्य हुई और उस ने बताया कि विभाष की सगाई के फोटो देख कर मैं आपे से बाहर हो गई थी, इसलिए उसे चाकू से गोद कर मार डाला. यह चाकू उस ने कुछ दिन पहले ही औनलाइन शौपिंग कर के मंगाया था. अगले दिन सुबह के 9 बज चुके थे. सारा शहर जाग उठा था. ‘एक माशूका ने आशिक की बेरहमी से हत्या की’ यह खबर जिस ने भी सुनी, उस ने कलयुग को कोसा, प्यारमुहब्बत और वफा पर उंगलियां उठाईं. अब तक लोगों ने यही सुना था कि बेवफाई के चलते आशिक ने माशूका की हत्या की, पर इस मामले में उलटा हुआ.

कइयों ने रिश्ते की बहन से मुहब्बत करने को ही गलत ठहराया, पर कोई मोंटी का दर्द नहीं समझ पाया, जो बेवफा आशिक को अपने हाथों मौत की सजा देने की बात कहते हुए खुद अपने लिए फांसी का फंदा मांग रही है. 

मायके जाने की धमकी

उस दिन मिर्जा इस तरह से फुफकारते हुए चले आ रहे थे, जैसे जलेबी का खमीर उबाल खा रहा हो. बाल ऐसे बिखरे हुए थे, जैसे तूफान आने के बाद पेड़ गिरे होते हैं. जुमे का दिन और… दिन के 11 बजे मिर्जा मैलेकुचैले कपड़ों में? देखते ही मुझ पर तो जैसे आसमान की बिजली गिर पड़ी. मैं ने अपनेआप को बड़ी मुश्किल से काबू में किया और मन ही मन कहा. ‘जलते जलाल तू, कुदरत कमाल तू, आई बला को टाल तू,’ फिर झपट कर मिर्जा का हाथ थामा और कहा, ‘‘मिर्जा, यह तुम ही हो…’’

ऐसा सुनना था कि मिर्जा गरजते हुए बोले, ‘‘तो क्या तुझे मोनिका लेवेंस्की दिखाई दे रही है?’’ मैं ने मौके की नजाकत को समझा और कहा, ‘‘यार, मैं ने तो यों ही कहा था. पहले अंदर आओ.’’ उन्हें सोफे पर बैठाते हुए मैं बोला, ‘‘देख मिर्जा, मैं तेरा लंगोटिया यार हूं. मुझे बता कि आज तू ने जुमे की तैयारी क्यों नहीं की? जुमे के दिन 11 बजे तक तो तुम दूल्हे की तरह सजसंवर कर जामा मसजिद में इमाम साहब के सामने खड़े हो कर अजान पढ़ा करते थे. लेकिन आज यहां पर, वह भी इस हालत में… कहीं भाभी ने…’’ मैं बात पूरी उगल भी न पाया था कि मिर्जा गरजते हुए बोले, ‘‘अगर तू वाकई मेरा सच्चा यार है, तो बता कि शादी पर औरत ही क्यों ब्याह कर लाई जाती है? मर्द को ब्याह कर ससुराल क्यों नहीं ले जाया जाता?’’

यह सुनते ही मेरा दिमा घूम गया. मैं ने हंस कर कहा, ‘‘यार मिर्जा, तू यह बता कि पान की लत तो खैर तुम्हें विरासत में ही मिली है, अब कहीं भांग वगैरह तो नहीं लेनी शुरू कर दी?’’ मिर्जा तमतमा उठे और बोले, ‘‘एक मुसलमान पर इस तरह की तुहमत लगाते हो. क्या तू ने मुझे काफिर समझा है? मैं पक्का मुसलमान हूं और सात वक्त की नमाज पढ़ता हूं.’’

अब तो मेरा वहम यकीन में बदल चुका था. शायद खुदा ने दो वक्त अलग से मिर्जा को दिए हैं. तभी मिर्जा बोले, ‘‘मैं इशराक व तहज्जुद 12 महीने की पढ़ता हूं.’’ इस के बाद मिर्जा खड़े होते हुए बोले, ‘‘तू भी मेरा दुख बांटने वाला वह सच्चा यार नहीं रहा.’’ मिर्जा की आवाज भर्रा गई थी और गला रुंध गया था. मैं ने सोफे पर बैठाते हुए मिर्जा को समझाया, ‘‘तुम गलत समझ रहे हो. मुझे आज भी तुम से उतनी ही हमदर्दी है, जितनी कभी कुंआरेपन में भी नहीं रही होगी.’’ ‘‘तो क्या औरतों के मायके जाने की धमकी जायज है?’’ मिर्ज बोले.

मेरी समझ में अब सारा माजरा आ रहा था कि आज जरूर इन की बेगम ने मायके जाने की धमकी दी है और यह जोरू का परमानैंट गुलाम मिर्जा उसे बरदाश्त नहीं कर पा रहा है. मैं ने कहा, ‘‘जायज तो नहीं है, पर मर्दों से लड़ने के वास्ते फर्स्ट क्वालिटी का हथियार तो यही है न?’’ इतना सुनते ही मिर्जा एकदम आपे से बाहर हो गए और बोले, ‘‘तो क्या दूसरा हथियार भी होता है?’’ मैं ने कहा, ‘‘हां मिर्जा, तुम तो खुशनसीब हो, जो भाभी ने अपना दूसरा हथियार यानी बेलन तुम्हें नहीं दिखाया.’’ मिर्जा गुस्से में भड़क कर चिल्लाए, ‘‘अरे बेवकूफ, मत पूछ कि आज तो उस ने अमेरिकाइराक युद्ध की तरह अपने बड़े हथियार का भी इस्तेमाल कर लिया. यह तो अच्छा हुआ कि मैं किवाड़ के पास खड़ा था, फुरती से उस की आड़ ले ली, नहीं तो जुमे की नमाज के साथ आज तो अपनी भी नमाजे जनाजा अदा की जाती.’’

मैं ने मिर्जा से कहा, ‘‘चलो, अच्छा हुआ, लेकिन अभी तक तुम्हारी दूल्हा ब्याह कर ले जाने वाली बात समझ में नहीं आई.’’ यह सुन कर मिर्जा कुछ संजीदा हो कर बोले, ‘‘देख, ध्यान से सुन. घर में तकरार होने पर बीवी हमेशा मायके जाने की धमकी देती है और यह धमकी अच्छेअच्छे मर्द को मेमने की तरह मिमियाने को मजबूर कर देती है. ‘‘अगर दूल्हा ब्याह कर ससुराल ले जाया जाता, तो बेलन वगैरह का खतरा होने पर मायके जाने की धमकी को काम में ला सकता था और मर्द सीना तान कर ससुराल में शान से राज करता.’’ मैं ने मिर्जा की बात पर दिखावटी हमदर्दी दिखाते हुए कहा, ‘‘देखो, जैसे एक जीभ बत्तीस दांतों से घिरी हो कर काबू में नहीं रह सकती, उसी तरह औरत ससुराल में अकेली सभी पर भारी पड़ती है.

‘‘अगर तुम्हारे चालू फार्मूले पर समाज चलता, तो बच्चू मिर्जा, खोपड़ी का नटबोल्ट कस कर समझ ले कि अगर दूल्हा ससुराल में रहता, तो पता है क्या होता? होता यह कि पत्नी बेलन से तुम्हारा सिर तोड़ती. ‘‘अगर जीजा साले की बहन को घूर कर भी धमकाता, तो वे उसे लठिया देते. सासससुर के उपदेश अलग से दिमाग चाट कर रख देते. ‘‘सालियां अमरबेल की तरह तुम्हारे जेबरूपी पेड़ को परजीवी बन कर सुखा देतीं. सालों के बच्चों को जिद करने पर न जाने महीने में कितनी बार फिल्म दिखाने ले जाना पड़ता और तब भी वे घर आ कर कहते, ‘पापापापा, फूफाजी ने फिल्म तो दिखाई, पर हमें वहां चाट नहीं खिलाई.’

‘‘इस तरह तुम्हें बेकार में ही कंजूस मक्खीचूस की उपाधि मिल जाती. भले ही तुम ने चाट पर मक्खियों का परमानैंट कब्जा होने के चलते न खिलाई हो, पर इसे कोई नहीं मानता. ‘‘अगर चाट खिलाने से बच्चे बीमार पड़ जाते, तो सास ऐसे लताड़ती जैसे कि पता नहीं क्या खिला लाया. बड़ी मनौतियां मान कर 2 पोते हुए, इन्हें तो मार कर ही इस का कलेजा ठंडा होगा. ‘‘इसलिए मिर्जा, जो कायदेकानून हमारे बड़ों ने बनाए हैं, वे जरूर सोचसमझ कर ही बनाए हैं, इसलिए तू अपना दिल छोटा न कर और भाभी को अपने मन की भड़ास निकाल लेने दिया कर… समझे हजरत मिर्जा?’’

अब मिर्जा धीरेधीरे मुसकराए और बोले, ‘‘यार, वाकई आज तो तू ने कमाल कर दिया. इतने काम की बात मेरे दिमाग में आज तक क्यों नहीं आई? मैं ने इतनी उम्र यों ही गंवाई.’’ मैं ने कहा, ‘‘ठीक है, अब जा कर घर में जुमे की नमाज अदा कर. और हां, दुआ में मुझे मत भूल जाना और भाभी की अच्छी सेहत की दुआ जरूर मांगना.’’ यह सुन कर मिर्जा झेंपते हुए अपने घर की तरफ चल दिए.

कोहली हमेशा ‘मैन ऑफ द मैच’ बनना चाहता है: धोनी

भारत की सीमित ओवरों की टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का मानना है कि उनके उत्तराधिकारी विराट कोहली सभी तीनों प्रारूपों में अच्छा कप्तान साबित होंगे. धोनी ने भारतीय टेस्ट टीम के कप्तान की जमकर तारीफ करते हुए कहा कि कोहली हमेशा बेहतर बनने की कोशिश करता है और इससे वह खास बन जाता है.

धोनी ने कहा, ‘महत्वपूर्ण यह है कि आप अपने खेल में कैसे सुधार कर सकते हैं और इस लिहाज से विराट का पिछले कई वर्षों में कोई जवाब नहीं है. उन्होंने जो पहला मैच भारत की तरफ से खेला तब से लेकर अब तक वह ऐसे खिलाड़ी रहे हैं जो हमेशा सुधार करना चाहते हैं और जो हमेशा टीम की जीत में योगदान देना चाहते हैं और सिर्फ योगदान भी थोड़ा नहीं बल्कि वह हमेशा मैन ऑफ द मैच बनना चाहते है.’

उन्होंने कहा, ‘इसलिए मेरा मानना है कि वह हमेशा खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं चाहे वह फिटनेस हो, खेल की समझ हो या अपनी रणनीति को अंजाम देना हो. मेरा मानना है कि इससे वह विशेष बन जाते हैं.’

धोनी ने कहा, ‘इसके बाद बात आती है कि आप अपनी टीम की अगुवाई कैसे करते हो तो उन्हें आरसीबी (रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु) की अगुवाई करने का अनुभव है और वह पिछले एक साल से अधिक समय से टेस्ट कप्तान हैं तो मुझे लगता है कि उन्होंने खुद को अच्छी तरह से तैयार किया है. उन्होंने बहुत अच्छी भूमिका निभायी है और टीमों की कप्तानी के संदर्भ में उनका भविष्य उज्ज्वल है.’

धोनी वेस्टइंडीज के खिलाफ अमेरिका में 27 और 28 अगस्त को होने वाले दो टी20 अंतरराष्ट्रीय मैचों से फिर से क्रिकेट मैदान पर दिखेंगे. वह इस कम अवधि की श्रृंखला और नये कोच अनिल कुंबले के साथ काम करने को लेकर उत्सुक हैं.

उन्होंने कहा, ‘मैं अनिल भाई के साथ खेला हूं. मैं उनकी कप्तानी में खेला हूं और वह खास व्यक्ति है. वह उन कुछ खिलाड़ियों में से हैं जो कैसी भी परिस्थितियां हों चाहे वह स्पिन गेंदबाजों के अनुकूल हो या नहीं या फिर विदेश में खेल रहे हो या नहीं वह गेंदबाजी के मामले में हमेशा आक्रामक प्रदर्शन करते थे. वह बहुत कड़ी मेहनत करने वाले व्यक्ति हैं.’

धोनी ने कहा, ‘चाहे ईमानदारी हो या कड़ी मेहनत या अपने साथियों के प्रति स्नेह और हां हास्यबोध सभी में उनका सानी नहीं. उनका हास्यबोध पूरी तरह से अलग है. इसलिए उनके साथ फिर से काम करना बहुत अच्छा होगा. हमारी टीम टेस्ट में पहले ही नंबर एक बन चुकी है और जो कि हमारे लिए अच्छा है और मुझे लगता है कि हमारे लिए समय खास होगा.’

टेस्ट से संन्यास लेने के बाद धोनी के पास बहुत अधिक समय है और वह इसका उपयोग अपनी फिटनेस पर काम करके कर रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘जहां तक मेरा सवाल है तो मेरा ध्येय अपना वजन थोड़ा कम करना है. मैंने फिलहाल दो किलो वजन कम किया है.’

बैंक में भी मिलेगा ट्रेन टिकट

जल्दी ही आपको ट्रेन टिकट लेने के लिए लंबी लाइन से छुटकारा मिल सकता है. आने वाले दिनों में बैंक की शाखाओं से भी रेल टिकट जारी किया जाएगा. इसके लिए उत्तर मध्य रेलवे एसबीआई से करार को लेकर बात-चीत कर रही है. यही नहीं रेलवे यात्रियों की सुविधा के लिए टिकट वेंडिंग मशीन भी लगाने की तैयारी कर रही है. दोनों सुविधा शुरू होने के बाद आपको ट्रेन की टिकट के लिए लाइन में नहीं लगना पड़ेगा साथ ही आप बैंक के किसी भी ब्रांच से इस सर्विस का लाभ उठा सकेंगे.

यात्री सुविधाओं के विस्तार पर जोर

भारतीय रेल अपने यात्रियों की सुविधाओं के लिए लगातार काम कर रही है. इस क्रम में सभी जोनल रेलवे काम कर रहे हैं. रेलवे कर्मचारी दूसरे कामों से मुक्त होकर सिर्फ यात्री सुविधाओं को बढ़ाने में जुटें इसलिए पिछले दिनों एसबीआई से रेल शक्ति योजना का करार हुआ. अगला करार एसबीआई शाखाओं में टिकट वेंडिंग मशीन इंस्टॉल कर और एसबीआई शाखाओं में टिकट काउंटर खोलने का हो सकता है. इससे बैंक जाने वाले कस्टमर्स को रेल टिकट के लिए स्टेशन नहीं जाना होगा और रेलवे स्टेशन पर कतार भी कम होगी.

एसबीआई के चुनिंदा ब्रांच में शुरू होगी सर्विस

परिक्षण के तौर पर पहले सर्विस को एसबीआई के कुछ प्रमुख शहरों की शाखाओं से शुरू किया जाएगा. बाद में सफलता मिलने पर इसे दूसरी शाखाओं में भी लागू किया जाएगा. उत्तर मध्य रेलवे के मुख्य वाणिज्य प्रबंणक डॉ. डीके त्रिपाठी ने बताया कि इस योजना पर विचार चल रहा है. एसबीआई से वर्तमान करार की सफलता के बाद इस दिशा में काम किया जाएगा.

टोरेंट से फिल्म डाउनलोड करने पर 3 साल की सजा

कोर्ट के निर्देशों और भारत सरकार इंटरनेट सर्विस प्रोइवाइडर के मुताबिक कई हजार वेबसाइट्स को पिछले 5 सालों में बैन किया जा चुका है. ज्यादातर ब्लॉक साइट्स पॉर्न हैं लेकिन इसके बावजूद लोग ऐसे साइट्स पर जा रहे हैं. लेकिन अब इन साइट्स पर जाने से सख्त सजा हो सकती है. कोर्ट के मुताबिक ब्लॉक साइट्स को खोलने पर व्यक्ति को 3  साल की जेल और 3 लाख रुपए जुर्माना भी भरना पड़ेगा.

ब्लॉक साइट टोरेंट को अगर आप खोलते हैं या उसपर कुछ डाउनलोड करते हैं तो आपको इसके लिए सजा मिलेगी. यह सजा केवल टोरेंट साइट्स से कुछ डाउनलोड करने पर ही नहीं बल्कि किसी भी ब्लॉक साइट से कुछ भी डाउनलोड करने पर मिलेगी. रिपोर्ट के अनुसार अगर आप किसी ब्लॉक यूआरएल पर विजीट करते हैं तो ये चेतावनी दिखाई देगी.

''इस यूआरएल को सरकारी प्राधिकरण के निर्देशों के तहत ब्लॉक कर दिया गया है. ब्लॉक यूआरएल पर किसी भी कंटेट को डाउनलोड करना भारत के कानून के तहत दंडात्मक अपराध है. इसके अलावा कॉपीराइट एक्ट 1957 की धारा 63, 63-A, 65 और 65-A के तहत तीन साल का जुर्माना और तीन लाख तक के जुर्माने का प्रावधान है.''

युवाओं की कमाई का जरिया ‘रंगदारी टैक्स’

‘रंगदारी टैक्स‘ जिसे पहले ‘गुंडा टैक्स‘ भी कहा जाता था, अब युवाओं में कमाई के जरिये के रूप में पनप रहा है. बिजनेसमैन कई बार डर के चलते चुपचाप इस तरह के अपराध का शिकार हो जाते है. कई बार जब मामले की पुलिस में शिकायत होती है और पुलिस पूरी मुस्तैदी से काम करती है, तो रंगदारी टैक्स की वसूली करने वाले बेनकाब होते हैं. वैसे तो अपराध की यह बीमारी पूरे देश में कमोबेश हर जगह फैली हुई है. जहां शासन व्यवस्था लचर है, वहां इसको फलने फूलने की ज्यादा जगह मिलती है.

अब स्कूल मालिक, डाक्टर और छोटे बिजनेस मैन भी इनका शिकार हो रहे हैं. रंगदारी टैक्स वूसल करने वाले लोग ज्यादातर संगठित अपराधियों की तरह काम करते हैं. कई बार युवा पैसे कमाने के लिये इस तरह की धमकी देकर अपने शौक पूरा करने के लिये लोगो को फोन पर धमकाते हैं. ज्यादातर मामलों में लोग धमकी के बाद ‘रंगदारी टैक्स’ देकर छुटकारा पाने की कोशिश करते हैं, जिससे अपराधियों का हौसला बढ़ता है.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के बक्शी का तालाब तहसील में एसआर इंजीनियरिंग कालेज है. एसआर ग्रुप शिक्षा के क्षेत्र में बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है. इसके मालिक पवन सिंह चौहान को मोबाइल पर मैसेज भेजा गया कि ‘अगर अपना स्कूल बचाना चाहते हो तो 2 करोड का इंतजाम कर लो नहीं तो ऐसा धमाका होगा कि स्कूल के टुकड़े टुकड़े हो जायेंगे‘ इसके कुछ समय के बाद एक युवक ने स्कूल परिसर में घुस कर पवन सिह चौहान को धमकाने का काम किया. इसके पहले की उसको पकड़ा जाता, वह भागने में सफल हो गया.

14 अगस्त को मिली धमकी के बाद पवन सिंह चौहान ने मामले की सूचना बक्शी का तालाब थाने के प्रभारी विजय शंकर यादव को दी. जिस नम्बर से फोन आया था उसे सर्विलांस पर लगाया गया तो प्रदीप कुमार वर्मा नामक युवक पकड़ में आया. जो बक्शी का तालाब के रामपुर बेहडा गांव का रहने वाला था.

प्रदीप कुमार ने अपने दोस्त के मोबाइल का प्रयोग करके रंगदारी वसूलने के लिये फोन किया था. प्रदीप बीए का छात्र है. प्रदीप ने बताया कि उसने सावधान इंडिया, और साउथ की थ्रिलर फिल्म देखकर यह योजना बनाई थी. फिल्म में हीरो धमकी देने के बाद कालेज में घुस कर टैक्स की मांग करता है. प्रदीप के पिता किसान है. परिवार में मां के अलावा भाई बहन भी हैं. प्रदीप को जल्द अमीर बनने और अपने शौक पूरा करने के लिये पैसे चाहिये थे. जिसके लिये उसने यह काम किया.

बक्शी का तालाब थाने ने पूरी तत्परता से काम को किया. जिससे अपराधी पकड़ में आया. जिले के बडे अधिकारियों आईजी ए सतीश गणेश और एसएसपी मंजिल सैनी ने पुलिस को पूरी तरह से सक्रिय कर रखा है, जिससे अपराध होते ही घटना से जुडे फोन सर्विलांस पर आ जाते हैं. जिससे अपराध का पता लगाने में कम समय लगता है. रंगदारी टैक्स मांगने वाले प्रदीप को पकड़ने वाली टीम को एसआर कालेज के चेयरमैन पवन सिंह चौहान ने 5100 रूपये का नकद पुरस्कार देने की घोषणा की.

‘नरसिंह ने जानबूझकर किया प्रतिबंधित पदार्थ का सेवन’

कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन फॉर स्पोर्ट (कैस) ने भारतीय पहलवान नरसिंह यादव पर चार साल के प्रतिबंध का फैसला सुनाया था. कैस ने संभावना जताई है कि नरसिंह ने जानबूझकर प्रतिबंधित दवाओं का सेवन किया था. कैस के मुताबिक, नरसिंह इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं दे पाए कि उनके खाने में किसी ने उन्हें फंसाने के लिए दवा मिलाकर खिलाई थी. कैस ने इस बात की भी संभावना जताई कि नरसिंह ने प्रतिबंधित पदार्थ का टैबलट फॉर्म में एक से अधिक बार सेवन किया है.

कैस की ओर से सुनवाई कर रहे पैनल ने कहा कि नरसिंह ने सिर्फ एक बार प्रतिबंधित पदार्थ का सेवन नहीं किया था और उनकी पहली जांच (जो कि 25 जून को हुई थी) में प्रतिबंधित पदार्थ की मात्रा काफी अधिक पाई गई थी. पैनल ने कहा, 'उस मात्रा के आधार पर कहा जा सकता है कि उन्होंने पाउडर को पानी में मिला कर लेने के स्थान पर टैबलेट फॉर्म में लिया था. जोकि 1 या दो की संख्या हो सकती है.'

25 जून को नरसिंह का यूरिन टेस्ट हुआ था जिसमें मेथेनडाइनन (प्रर्तिबंधित पदार्थ) की मात्रा काफी अधिक पाई गई थी. इसके बाद 5 जुलाई को हुए टेस्ट में भी मेथेनडाइनन की मात्रा काफी ज्यादा थी. कैस के पैनल ने कहा कि नरसिंह अपनी बातों से पैनल को संतुष्ट नहीं कर पाए औप रिपोर्ट के आधार पर पैनल को इस बात ने ज्यादा हद तक संतुष्ट किया कि नरसिंह ने जानबूझकर प्रतिबंधित पदार्थ का सेवन टैबलट फॉर्म में एक से अधिक मौकों पर किया था.

गौरतलब है कि इस मामले में एक्सपर्ट ऑपिनियन वाडा की ओर से कनाडा की प्रफेसर क्रिस्टियन अयॉटे ने दिया. प्रफेसर क्रिस्टियन 1995 से IAAF डोपिंग कमिशन की सदस्य हैं.

ऐसे इश्तिहार छपते रहते हैं कि अमीर घरों की लड़कियों को खुश कर के 10 हजार कमाएं. इश्तिहारों की हकीकत क्या है.

सवाल

बहुत से अखबारों में आए दिन ऐसे इश्तिहार छपते रहते हैं कि अमीर घरों की लड़कियों व औरतों को खुश कर के 10 हजार से 20 हजार रुपए तक कमाएं. ये लोग एक हजार रुपए मैंबरशिप के मांगते हैं. आखिर इन इश्तिहारों की हकीकत क्या है?

जवाब

ऐसे इश्तिहारों के चक्कर में बिलकुल नहीं पड़ना चाहिए. इन के चक्रव्यूह में फंसने वाले की छीछालेदर हो जाती है. अपनी कमाई के लिए जो लोग एक हजार रुपए मांग रहे हों, वे 10 हजार या 20 हजार रुपए क्या दिलाएंगे. ये लोग ग्राहक को फंसा कर उस की उलटी सीधी तसवीरें खींच कर उसे ब्लैकमेल भी करते हैं. इन से उचित दूरी बनाए रखें.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें