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ऐसे करें सितंबर में मुख्य खेतीबारी

जमीन और मौजूदा साधनों के मुताबिक अलगअलग इलाकों में अलगअलग खेती हो सकती है, लेकिन यह जरूर तय हो जाता है कि किस महीने में किसान कौन सी फसल की पैदावार करें. इस का तरीका यदि तकनीकी ज्ञान, उचित देखरेख व प्रबंधन वाला भी हो, तो बेहतर उपज पाई जा सकती है. सितंबर का महीना खेतीबाड़ी के लिहाज से खास माना जाता है. इस में कुछ बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए.

धान : धान में नाइट्रोजन की दूसरी व आखिरी टाप ड्रेसिंग बाली बनने की शुरुआती स्थिति (रोपाई के 50-55 दिनों बाद) में ज्यादा उपज वाली प्रजातियों में प्रति हेक्टेयर 30 किलोग्राम (65 किलोग्राम यूरिया) व सुगंधित प्रजातियों में प्रति हेक्टेयर 15 किलोग्राम (33 किलोग्राम यूरिया) की दर से करें. खेत में टाप ड्रेसिंग करते समय 2-3 सेंटीमीटर से अधिक पानी नहीं होना चाहिए. धान में बालियां फूटने व फूल निकलने के समय सही नमी बनाए रखने के लिए जरूरत के अनुसार सिंचाई करें.

तना छेदन की रोकथाम के लिए ट्राइकोग्रामा नाम के परजीवी को 8-10 दिनों के अंतर पर छोड़ना चाहिए या प्रति हेक्टेयर 20 किलोग्राम कार्बोफ्यूरान दवा का इस्तेमाल करें. इस के अलावा क्लोरापायरीफास 20 ईसी 1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 600 लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करें.

धान के भूरे फुदके से बचाव के लिए खेत से पानी निकाल दें. नीम आयल 1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए. जीवाणुधारी रोग व जीवाणु झुलसा रोग की रोकथाम के लिए पानी निकाल दें. नाइट्रोजन की टाप ड्रैसिंग बंद कर दें.

एग्रीमाइसीन 100 का 75 ग्राम या स्ट्रेप्टोसाइक्लीन 15 ग्राम व 500 ग्राम कौपर आक्सीक्लोराइड को 500-600 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से 10 दिनों के अंतर पर 2-3 बार छिड़काव करें. भूरा धब्बा रोग की रोकथाम के लिए जिंक मैगनीज कार्बामेट 75 फीसदी 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

मक्का : मक्का में ज्यादा बरसात होने पर पानी के निकलने का इंतजाम करें. फसल में नर मंजरी निकलने की अवस्था व दाने की दूधियावस्था सिंचाई के लिहाज से खास है. यदि बारिश न हुई हो या खेत में नमी की कमी हो, तो किसानों को सिंचाई कर देनी चाहिए.

ज्वार : किसानों को ज्वार से उपज लेने के लिए बारिश न होने पर नमी की कमी होने पर बाली निकलने के समय और दाने भरते समय सिंचाई कर देनी चाहिए. ज्वार में अर्गट व शर्करीय रोग हो जाते हैं. इन की रोकथाम के लिए रोगग्रस्त पौधों को उखाड़ कर जला देना चाहिए. थीरम का 0.15 फीसदी घोल बना कर फूल आने के समय से 7 से 10 दिनों के अंतर पर 2-3 बार छिड़काव कर देना चाहिए. दूसरे छिड़काव के दौरान उक्त दवा के साथ 0.1 फीसदी कार्बरिल नामक कीटनाशी को मिला देना चाहिए.

बाजरा : बाजरे की उन्नत व संकर प्रजातियों में नाइट्रोजन की बाकी आधी मात्रा यानी 40-50 किलोग्राम (87-107 किलोग्राम यूरिया) की टाप ड्रेसिंग बोआई के 25 से 30 दिनों बाद कर देनी चाहिए.

मूंग/उड़द : इस की उन्नत फसल के लिए खेत का सही रहना बहुत जरूरी है. यदि बारिश कम होती है, तो किसानों को कलियां बनते समय पर्याप्त नमी को बनाए रखने के लिए सिंचाई करनी चाहिए. फलीछेदक कीट की सूडि़यां जो फली के अंदर छेद कर के दानों को खाती हैं, की रोकथाम के लिए निबौली का 5 फीसदी या क्यूनालफास 25 ईसी  की 1.25 लीटर मात्रा का प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

सोयाबीन : इस फसल की बेहतर उपज के लिए बारिश न होने पर किसान फूल व फली बनते समय सिंचाई करें. सोयाबीन में पीला मोजैक नामक बीमारी हो जाती है. इस की रोकथाम के लिए पौधों की सही जांचपड़ताल कर लें. ज्यादा प्रभावित हुए पौधों को निकाल दें, जबकि कम प्रभावित पौधों पर डाईमिथोएट 30 ईसी 1 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव कर देना चाहिए.

गन्ना : किसानों को इस महीने उन गन्नों को बांधने का काम करना चाहिए जिन की अच्छी पैदावार हो. पहले कतार के अंदर ही सवा से डेढ़ मीटर की ऊंचाई पर गन्ने को उस के पत्तों से बांध दें. आगे चल कर एक कतार के गन्ने को दूसरी कतार के गन्ने से बांध देना चाहिए. ऐसे में यह ध्यान रखना चाहिए कि बांधते समय ऊपर की पत्तियां न टूटें. पायरिला रोग की रोकथाम के लिए प्रति हेक्टेयर फास्फेमिडान 300-400 मिलीलीटर या मिथाइला ओ डिमेटान 1.5 लीटर का 1000 लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए. गन्ने में गुरदासपुर बोरर  व शीर्ष बेधक यानी टाप बोरर की रोकथाम के लिए डायमिथोएट की प्रति हेक्टेयर 1.5 लीटर मात्रा का 800-1000 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए.

तोरिया : इस की बोआई के लिए सितंबर का दूसरा पखवाड़ा सब से अच्छा माना जाता है. टा 9, भवानी, पीटी 30 व पीटी 507 तोरिया की अच्छी प्रजातियां मानी जाती हैं. प्रति हेक्टेयर बोआई के लिए 4 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है. बोआई के लिए किसानों को

हमेशा उपचारित बीजों का इस्तेमाल ही करना चाहिए. तोरिया की बोआई 30×10 सेंटीमीटर पर, 3 से 4 सेंटीमीटर गहरे कूड़ों में करनी चाहिए. उर्वरकों का इस्तेमाल जमीन के परीक्षण के आधार पर करना चाहिए. यदि जमीन परीक्षण न हो, तो सिंचित दशा में बोआई के समय प्रति हेक्टेयर 50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फेट व 50 किलोग्राम पोटाश का इस्तेमाल करना चाहिए. असिंचित दशा में 50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 30 किलोग्राम फास्फेट व 30 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए. फास्फोरस तत्त्व के लिए सिंगल सुपर फास्फेट का इस्तेमाल करना चाहिए. यदि सिंगल सुपर फास्फेट मौजूद न हो तो प्रति हेक्टेयर 30 किलोग्राम गंधक का इस्तेमाल करना चाहिए.

सब्जियों की खेती : इस महीने टमाटर व गांठगोभी के बीजों की बोआई नर्सरी में करनी चाहिए. पत्तागोभी की अगेती किस्मों जैसे पूसा हाईब्रिड 2 गोल्डनएकर की बोआई 15 सितंबर तक और मध्यम व पछेती किस्मों जैसे पूसा ड्रमहेड, संकर क्विस्टो की बोआई 15 सितंबर  के बाद शुरू करनी चाहिए. शिमला मिर्च में रोपाई के समय प्रति हेक्टेयर 15 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फेट व 60 किलोग्राम पोटाश का इस्तेमाल करना चाहिए. पत्तागोभी की रोपाई इस महीने के आखिरी हफ्ते से शुरू करनी चाहिए. पत्तागोभी की रोपाई से पहले 200-250 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद या 80 क्विंटल नाडेप कंपोस्ट मिला दें और रोपाई के समय 50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फेट व 60 किलोग्राम पोटाश का इस्तेमाल करें. टमाटर में कम बढ़ने वाली प्रजातियों के लिए रोपाई की दूरी 60×60 सेंटीमीटर और ज्यादा बढ़ने वाली प्रजातियों में दूरी 80×60 सेंटीमीटर रखनी चाहिए. टमाटर की रोपाई के समय प्रति हेक्टेयर 250-300 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद या 70-80 क्विंटल नाडेप कंपोस्ट के साथ 40 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फेट, 60-80 किलोग्राम पोटाश व जिंक व बोरान की कमी होने पर 20-25 किलोग्राम जिंक सल्फेट व 8-10 किलोग्राम बोरैक्स का इस्तेमाल होना चाहिए. मध्यवर्गीय फूलगोभी जैसे इंप्रूव्ड जापानी, पूसा दीपाली, पूसा कार्तिकी की रोपाई के लिए पूरा महीना ही सही है. प्याज की रोपाई के 30 दिनों बाद खरपतवार निकाल कर प्रति हेक्टेयर 35 किलोग्राम नाइट्रोजन यानी 76 किलोग्राम यूरिया की टाप ड्रेसिंग कर दी जाए तो बेहतर होता है.

रोपाई के 45 दिनों बाद प्रति हेक्टेयर बैगन में 40 किलोग्राम नाइट्रोजन, मिर्च में 35-40 किलोग्राम नाइट्रोजन व फूलगोभी में 40 किलोग्राम नाइट्रोजन की दूसरी व आखिरी टाप ड्रेसिंग कर दें तो अच्छा है. बैगन में तना व फल छेदक बीमारी की रोकथाम के लिए बीमार भाग को तोड़ कर अलग कर दें.

नीम गिरी 4 फीसदी का छिड़काव 10 दिनों के अंतर पर करना चाहिए. मूली की एशियाई किस्मों जैसे जापानी हाइट, पूसा चेतकी, हिसार मूली नं. 1, कल्याणपुर 1 की बोआई इस महीने शुरू की जा सकती है. मूली के लिए प्रति हेक्टेयर 6-8 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है.

मेथी की अगेती फसल के लिए 15 सितंबर से बोआई की जा सकती है. इस के लिए प्रति हेक्टेयर 15-30 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है. बारिश खत्म होते ही इस महीने हरी पत्ती के लिए धनिया की प्रजाति पंत हरीतिमा व आजाद धनिया 1 की बोआई शुरू कर सकते हैं. अगेती बोआई के लिए आलू की कुफरी अशोका व कुफरी चंद्रमुखी किस्में भी अच्छी हैं. इन की बोआई 25 सितंबर  से किसानों को शुरू कर देनी चाहिए.

बागबानी : लीची के 1 साल के पौधों के लिए 5 किलोग्राम गोबर/कंपोस्ट खाद, 50 ग्राम नाइट्रोजन, 25 ग्राम फास्फेट व 50 ग्राम पोटाश और 10 साल या उस से ज्यादा उम्र के पेड़ों के लिए 50 किलोग्राम गोबर/कंपोस्ट खाद, 500 ग्राम नाइट्रोजन, 250 ग्राम फास्फेट और 500 ग्राम पोटाश प्रति पौधे की दर से इस्तेमाल की जानी चाहिए. जिंक की कमी के लक्षण दिखाई देने पर 0.4 फीसदी जिंक सल्फेट का इस्तेमाल करें. आम में गमोसिस की रोकथाम के लिए प्रति पेड़ 250 ग्राम जिंक सल्फेट, 250 ग्राम कापर सल्फेट, 125 ग्राम बोरैक्स व 100 ग्राम बुझा चूना (10 साल या अधिक उम्र के पेड़ों के लिए) जमीन में मिलाएं. बारिश नहीं होती, तो हलकी सिंचाई भी करें. आम में एंथै्रक्नोज रोग से बचाव के लिए कापर आक्सीक्लोराइड की 3 ग्राम मात्रा 1 लीटर

पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

इस महीने में आंवले में फल सड़न रोग हो जाता है. इस की रोकथाम के लिए ब्लाइटाक्स 3 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव किया जाना चाहिए. आंवले में शुष्क विगलन (काला गूदा रोग) रोग से 80-90 फीसदी फल अंदर से काले हो कर  अक्तूबरनवंबर में गिर जाते हैं. इस की रोकथाम के लिए 6 ग्राम बोरैक्स प्रति लीटर पानी में घोल कर 15 दिनों के अंतर पर 2 छिड़काव किए जाने चाहिए. आंवले में इंदर बेला कीट की रोकथाम के लिए डाईक्लोरोवास 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के घोल में रुई भिगो कर तार की मदद से छेदों में डाल कर चिकनी मिट्टी से बंद कर दें.

केले में प्रति पौधा 55 ग्राम यूरिया पौधे से 50 सेंटीमीटर दूर घेरे में इस्तेमाल कर के हलकी गुड़ाई कर के मिट्टी में मिला देना चाहिए. केले में बनाना बीटिल रोग हो जाता है. उस की रोकथाम के लिए क्वीनालफास 1.25 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव कर देना चाहिए. कार्बोफ्यूरान 3-4 ग्राम या फोरेट 2 ग्राम प्रति पौधे की दर से तने के चारों ओर मिट्टी में मिलाएं व इतनी ही मात्रा गोफे में डालें. फूल व सुगंध पौधे : इस मौसम में रजीनगंधा के स्पाइक की कटाईछंटाई की जानी चाहिए. ग्लैडियोलस की रोपाई की तैयारी के लिए प्रति वर्गमीटर 10 किलोग्राम गोबर की खाद/कंपोस्ट, 100 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट व 100 ग्राम म्यूरेट आफ पोटाश रोपाई के 15 दिनों पहले अच्छी तरह से मिलाना चाहिए.

पशुपालन व दूध उत्पादन : पशुओं में एचएस व बीक्यू का टीका लगवा देना चाहिए. इस महीने पशु खुरपकामुंहपका के शिकार भी हो जाते हैं. रोकथाम के लिए टीका लगवाएं और रोग से ग्रस्त पशुओं के घावों को पोटैशियम परमैगनेट से धोएं. 2 टीकों के बीच 15-20 दिनों का अंतर जरूर रखना चाहिए. नवजात बच्चों को खीस जरूर दें. सभी पशुओं को पेट के कीड़े मारने की दवा पिलाएं. गंदे पोखरों व तालाबों में पशुओं  को जाने से रोकें. उन्हें साफ पानी ही पीने के लिए दें. साफ दूध उत्पादन के लिए पशु व दूध के बरतन वगैरह की सफाई का ध्यान रखा जाना चाहिए. पशुओं के बांझपन व गर्भ की जांच भी समयसमय पर कराना चाहिए.

मुरगीपालन : मुरगीखाने में कैल्शियम के लिए सीप का चूरा रखें. मुरगियों को पेट के कीड़े मारने की दवा दें. मुरगीखाने में 15-16 घंटे रोशनी का इंतजाम करें. मुरगियों के बिछावन को लगातार उलटतेपलटते रहना चाहिए. यह भी ध्यान रखें कि मुरगीखाने में हर मुरगी के लिए 3 वर्गमीटर जगह जरूरी है.

(सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, मेरठ, उत्तर प्रदेश द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी पर आधारित)

औषधीय फसल सदाबहार की वैज्ञानिक खेती

कैथेरेंथस रोजियस, पेरीविंकल या विंका रोजियस ‘एपोसाइनेसी’ कुल का पौधा है. इसे हिंदी में सदाबहार या सदाफूल, मराठी में नयन, तेलुगू में विलार्गननरू और पंजाबी में रतन जोति कहते हैं. साल 1958 में अचानक इस पौधे की पत्तियों में एल्केलायड ढूंढ़ निकाले गए और इस में सर्पगंधा वाले एल्केलायड भी मिले, जो उच्च रक्तचाप को भी प्रभावित करते हैं. इस पौधे में सारे संसार के पौधों से ज्यादा एल्केलायड पाए गए हैं. करीब 65 एल्केलायड केवल पत्तियों से ही प्राप्त हुए हैं. ये आधुनिक इलाजों में विनब्लास्टिन प्रकार के एल्केलायड के कारण हुआ है, जो पौधों की नई पत्तियों से निकाला जाता है. इस की पत्तियों में विनब्लाटिन और विनक्रिस्टिन होते हैं, जिन का कैंसर रोधी औषधियों में इस्तेमाल किया जाता है, जो एंटीफिब्रिलिक और हाइपोटेंसिव रसायन हैं. यूरोप में इस की जड़ों को दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा?है. जड़ों से अज्मालीसीन एल्केलायड निकाला जाता है, जिस का रक्त कोशिकाओं की कोमलता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. विनक्रिस्टीन सल्फेट का इस्तेमाल पुरानी ल्यूकेमिया (मुख्यतया बच्चों के ल्यूकेमिया) के इलाज में किया जाता है. इस से मिलने वाली दवा बहुत महंगी पड़ती है, क्योंकि 10-15 टन पत्तियों से सिर्फ 1 औंस के करीब दवा हासिल होती है. संयुक्त राज्य अमेरिका के जीए स्वेडा और उन के सहयोगियों ने इस के पौधों से एल्केलायड निकालने की तकनीक का विकास किया.

यह पेशाब बढ़ाने वाला, दस्त रोकने वाला और?घावों को?भरने वाला होता है. यह ब्लडप्रेशर को सही रखता है. भारत और जमैका में इस का इस्तेमाल मधुमेह के इलाज और कीटों के जहर को हटाने

के लिए किया जा रहा है.

पौधा

केथेरेंथस रोजियस बहुवर्षीय शाकीय पौधा है. यह तेजी से बढ़ता है. आमतौर पर पौधों की ऊंचाई 1 मीटर तक होती?है, जिस से कई शाखाएं निकल कर 60-70 सेंटीमीटर के?घेरे में फैल जाती?हैं. इस के फूल सफेद या बैगनी रंग के होते?हैं. इस के फलीदार फलों में करीब 20-30 बीज पाए जाते?हैं.

इस की निम्न 3 प्रजातियां होती हैं, जो फूलों के रंगों पर तय की गई?हैं.

* गुलाबी पंखडि़यों वाली

* सफेद रंग वाली

* सफेद फूलों के बीच में गुलाबी, बैगनी व मखमली रंग वाली

मौजूदगी

यह भारत, फिलीपींस, आस्ट्रेलिया, दक्षिणी वियतनाम, श्रीलंका, इजराइल व वेस्टइंडीज आदि देशों में पाया जाता है. इसे बागों में आमतौर पर सुंदरता के लिए उगाया जाता है. ये जंगलों में भी फैल गया?है व रेतीले स्थानों में साल भर फल देता रहता है. ये भारत के समुद्रीय तटों के किनारे भी फैल गया है.

खेती

सदाबहार भारत भर में बहुत फैला हुआ पाया जाता है. इस से जाहिर होता है कि इस के लिए किसी खास प्रकार की जमीन की जरूरत नहीं होती. यह हर प्रकार की मिट्टी में सरलता से उग सकता है. समुद्र तटीय भागों में यह जंगली तौर पर काफी मात्रा में पाया जाता है. यह हलकी दोमट व रेतीली मिट्टी, सीमांत (मार्जिनल) जमीन और सूखा रोधी जगहों पर सरलता से उगाया जा सकता है.

जलवायु

यह उष्ण कटिबंधीय और उपोष्ण भागों में अच्छी तरह बढ़ता है. भारत में इस की खेती के लिए अच्छी जलवायु पाई जाती है. सदाबहार उत्तरी भारत के उपोष्ण भागों में भी उगता है, लेकिन जाड़ों में कम तापमान होने के कारण पौधों की बढ़वार धीमी होती?है. सदाबहार की खेती के लिए करीब 100 सेंटीमीटर बारिश वाले भाग सही पाए गए हैं.

किस्में

इस की व्यावसायिक फसल बाजारू बीजों से बोई जाती है, जिन में कई रंग वाले फूल मिले होते?हैं. सदाबहार एक ऐसा पौधा है, जो सजावटी भी है और इस की जड़ों व पत्तियों में औषधि के गुण भी होते हैं. केंद्रीय औषधियां एवं संगध पौधा संस्थान लखनऊ ने इस की निर्मल किस्म निकाली है, जो अधिक पैदावार देती है और उस में ईयबैंग कालररोट और जड़ सड़न रोग भी नहीं लगते?हैं. इस के फूल काफी सुंदर होते?हैं, लिहाजा यह आर्थिक लाभ के साथसाथ बागों की शोभा भी बढ़ाता है. भारतीय बागबानी अनुसंधान संस्थान, बेंगलूरू ने इस की 15 नई किस्मों का विकास किया है.

प्रसारण

व्यावसायिक खेती के लिए बीज नए पौधों की फसल से लिए जाते हैं. बीज 1 साल से ज्यादा पुराने नहीं होने चाहिए. पौधशाला में बीजों द्वारा पौध तैयार की जाती है. कभीकभी बीज सीधे खेत में ही बो दिए जाते?हैं. 1 हेक्टेयर के लिए करीब 25 किलोग्राम बीज लगते हैं, जो ड्रिल द्वारा 45 सेंटीमीटर की दूरी की लाइनों में बोते हैं. स्थानांतरित खेती के लिए 500 ग्राम बीजों के पौध पौधशाला की क्यारियों में उगाए जाते हैं, जो 1 हेक्टेयर के लिए सही होते?हैं. इस की जड़ों और तने की कटिंग द्वारा भी पौधे उगाए जा सकते हैं. कटिंग को इंडोल इसिटिक एसिड (आईएए), इंडोल ब्यूटीरिक एसिड (आईबीए) और नेफ्थलीन एसिटिक एसिड (एनएए) से उपचारित करने पर जड़ें ज्यादा और जल्दी निकलती हैं. कटिंग द्वारा पौधों की बोआई स्थानांतरण कर के खेत में की जाती है.

खेत की तैयारी

बोआई से पहले खेत को भली प्रकार से हल से 2-3 बार जोतना चाहिए, ताकि उस की मिट्टी भुरभुरी हो जाए. खेत में इसी समय जोतने के साथसाथ 10-15 टन गोबर की खाद मिला देनी चाहिए. फिर खेत में क्यारियां व सिंचाई की नालियां बना देनी चाहिए. अगर 250 किलोग्राम हड्डी या राक फास्फेट और नीम की पिसी खली खेत में मिला दी जाए तो रासायनिक उर्वरकों की जरूरत नहीं होती.

भारतीय बागबानी अनुसंधान संस्थान बेंगलूरू के परीक्षणों से पता चला है कि उर्वरकों के इस्तेमाल से जड़ों व उन में

मौजूद एल्केलायड की मात्रा और उपज में इजाफा होता है.

बोआई

बड़े पैमाने पर सदाबहार की खेती करने के लिए खेतों को जोत कर व समतल कर के बीजों को सीधे ही मानसून (जूनजुलाई) के महीनों में खेतों में बो दिया जाता है. 1 हेक्टेयर खेत के लिए 2.5 किलोग्राम बीजों की जरूरत होती है. बीजों को नम और महीन बालू में अच्छी तरह मिला कर लाइनों में बो दिया जाता है.

स्थानांतरण विधि

बीजों की मात्रा यदि कम हो तो इस विधि से सदाबहार के पौधे तैयार किए जाते?हैं.

1 हेक्टेयर खेत के लिए 300 ग्राम बीजों की जरूरत होती है. बीजों को नर्सरी की क्यारियों में वर्षाकाल से 2 महीने पहले बोना चाहिए. बीज 8-10 दिनों में अंकुरित हो जाते हैं. जब पौधे

8-10 सेंटीमीटर ऊंचे हो जाते हैं, तब जड़ सहित उखाड़ कर खेत में लाइन से लाइन की दूरी

45 सेंटीमीटर व पौधे से पौधे की दूरी

30 सेंटीमीटर रखते हुए रोपाई की जाती है. इस प्रकार 1 हेक्टेयर खेत में तकरीबन 74000 पौधे लग जाते हैं.

खाद

खेत की तैयारी के समय करीब 15 टन गोबर की सड़ी खाद प्रति हेक्टेयर की दर से डालनी चाहिए. हरी खाद खेत की तैयारी से पहले लगा कर व सड़ा कर लाभकारी साबित होती है. दिल्ली में किए गए परीक्षणों से पता चला है कि 80 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर सिचिंत खेतों के लिए और 40 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर असिंचित खेतों के लिए (जो वर्षा पर निर्भर रहते?हैं) लाभकारी होती है. नाइट्रोजन को 3 भागों में बांट कर देना सही होता है. इस की तिहाई मात्रा खेत की तैयारी के समय और बाकी मात्रा 2 भागों में यानी बोआई के 45 दिनों बाद व 90 दिनों बाद देनी चाहिए. एनपीके की दर 40:30:30 प्रति हेक्टेयर देने से फसल अच्छी हासिल होती है.

निराई

शुरू में 2 बार निराई की जरूरत होती है. पहली निराई बोआई के 2 महीने बाद की जाती है और दूसरी 4 महीने पर की जाती है. फ्ल्यूकोरेलिन 0.75 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या एलाक्लोर 1.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के छिड़काव से बहुत तरह के खरपतवारों पर काबू पाया जा सकता है.

सिंचाई

जिन जगहों पर साल भर नियमित बारिश होती रहती है, वहां इस की फसल को सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन जहां पर कम बारिश होती है और मानसून देर से आता है, वहां पर इस की फसल को 4-5 बार सिंचाई की जरूरत होती है.

फसल की कटाई

जड़ें : बोआई के बाद जैसेजैसे पौधा बढ़ता?है, उस के अंदर एल्केलायड व अन्य रसायन भी बढ़ते हैं. जब पौधे 6 से 8 महीने के हो जाते?हैं, तब विनक्रिस्टिन तत्त्व सब से ज्यादा जड़ों में पाया जाता है. इसलिए इस समय पहली बार पुरानी जड़ों की तोड़ाई की जा सकती है. फिर 3 महीने बाद जड़ें दोबारा तोड़ी जा सकती हैं. दक्षिण भारत में जड़ों की खुदाई बोआई के 6 महीने बाद शुरू करना ठीक रहता है. उत्तरी भारत में 260 दिनों में जड़ों का भार व उन में रसायन सब से ज्यादा पाया जाता है, इसलिए यह ही जड़ों की खुदाई का सही समय होता है. 200 दिनों बाद 2-4 बार पत्तियों की तोड़ाई भी की जा सकती है और 6-8 महीने बाद जड़ों की खुदाई की जाती?है.

पूरी फसल करीब 8-10 महीने में तैयार होती है. इस समय अजमलिन प्रकार के एल्केलायड ज्यादा होते हैं. पौधों को जमीन से 7-8 सेंटीमीटर ऊपर से काटते हैं और तनों, पत्तियों और बीजों को सुखाने के लिए डाल देते हैं. जब खेत खाली हो जाता है, उस समय खेत को अच्छी तरह से सींच कर मिट्टी को ठीक से नम कर देते हैं. इस के बाद खेत में जुताई की जाती?है, जिस से जड़ें ऊपर निकल आती हैं. इन जड़ों को जमा कर के और धो कर छाया में सुखाने के लिए फैला दिया जाता है.

पत्ती, तना और बीज : पत्तियों की फसल 2 बार काटी जाती है, पहली फसल बीज बोने के 6 महीने बाद और फिर 8 महीने के बाद. आखिरी पत्तियों की फसल उस समय काटी जाती है, जब सभी पौधे ही खेतों से अलग कर दिए जाते हैं. पौधों की कटी फसल को छायादार स्थान पर सूखने के लिए फैला दिया जाता?है.

फसल सूखने पर हलकी पिटाई की जाती है. इस से बीज अलग हो जाते हैं. बीजों को अगली फसल बोने के लिए सुरक्षित रख दिया जाता है.

पत्तियों और तनों को अलगअलग रखा जाता है. सिंचित अवस्था में पत्तियों, तनों

और जड़ों की उपज क्रमश: 36, 15 और

15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मिलती है. अच्छे

बीजों के लिए पूरी तरह पके बीजों को ही जमा करना चाहिए.

रोग और कीट

कभीकभी पौधों की पत्तियों पर लिटिल लीफ (मोजेक) रोग लग जाता है. यह रोग विषाणुओं के कारण होता है. इस से पौधों की बढ़वार रुक जाती?है. रोग से छुटकारा पाने के लिए प्रभावित पौधों को जड़ से उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए.

पीथियम बटलेरी का कार डाइबैक रोग उत्तरी भारत में मानसून के समय पाया जाता है. 10-15 दिनों के अंतर से डाइथेन जेड 78 छिड़कने से इस रोग को?ठीक किया जा सकता?है. फ्यूजेरियम मुरझाना रोग व उकठा रोग आदि भी इस पर लगते हैं. इन्हें रोकने के लिए फसल बोने या रोपाई से पहले फफूंदीनाशक दवा से उपचारित करना अच्छा रहता है.

इसे कोई कीट हानि नहीं पहुंचाता है. ओलिअंडर होक कीट कुछ स्थानों पर पाया गया?है. यह पौधा कड़वा होता है, इस कारण इसे कोई जानवर भी नहीं खाता.

उपज

तकरीब 3.6 टन सूखी पत्तियां और 1.5 टन सूखी जड़ें और 4.5 टन तने प्रति हेक्टेयर प्राप्त होते?हैं. अकोला से जड़ों की 660 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उपज हासिल हुई, जिस में 2.6 फीसदी एल्केलायड था. केवल बारिश पर निर्भर रहने वाली फसल से 2 टन पत्तियां, 1?टन तने व 0.75 टन जड़ें प्रति हेक्टेयर हासिल होती हैं.

फसल चक्र

1. सदाबहार-सनाय-सरसों

2. सदाबहार-सनाय-धनिया

इन फसलचक्रों के साथ सदाबहार के खेतों से अधिक आय होती है. सदाबहार के पौधों को यूकेलिप्टस के पेड़ों के साथ छाया में भी भली प्रकार उगा सकते हैं.

औषधीय नजरिए से महत्त्वपूर्ण समस्त एल्केलायड में विनिक्रिस्टिन नामक एल्केलायड सब से ज्यादा मात्रा में पत्तियों में पाया जाता है. व्यापारिक आधार पर विनक्रिस्टिन (एज्मोलिसिन) और विनब्लास्टिन के अलावा रिसर्पीन इंडोल रोबेसिन और सर्पेंटाइन नामक एल्केलायड इस की जड़ों में सब से ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं. अमेरिका में विनप्लाटिन सल्फेट के रूप में बाजारों में बल्बे व्यापारिक नाम से और विनक्रिस्टिन सल्फेट को आनकोवित (एली लिली) के नाम से बेचा जाता है. एली लिली (यूएसए) और भारत की सिपला दोनों दवा कंपनियां इस पौधे को भारत से मंगा कर एल्केलायड हासिल कर के बाजारों में तमाम दवाओं के नाम से बेच रही?हैं.

निर्यात

भारत एक खास देश?है, जहां से सदाबहार के पूरे पौधे, पत्तियां व जड़ें विदेशों को?भेजी जाती हैं. दूसरे देश जैसे मलेशिया, मेडागास्कर और मोजाम्बिक से भी सदाबहार की जड़ें व पत्तियां निर्यात की जाती?हैं.

सदाबहार की जड़ों और पत्तियों की लगातार बढ़ती हुई मांग के कारण इस की कीमत भी बढ़ती जा रही?है. जून 1973 में जड़ों की कीमत केवल 5 रुपए प्रति किलोग्राम थी, जो साल 1999 में 20 रुपए प्रति किलोग्राम तक जा पहुंची. इस की पत्तियों व तनों के मूल्यों में भी इजाफा हुआ है.

निर्यात की उम्मीदें

निर्यात की मात्रा बढ़ाने के लिए सदाबहार की खेती पर बल देना होगा. साथ ही वैज्ञानिक ढंग से पौधों में एल्केलायडों की मात्रा पर शोध कर के इस के गुणों को बढ़ाने के उपाय करने होंगे. फसल की खुदाई के बाद सुखाई व भंडारण वगैरह पर ज्यादा ध्यान देना होगा. वैसे हमारे यहां इस समय 1500 से 2000 हेक्टेयर रकबे में सदाबहार की खेती की जा रही?है, पर आने वाले वक्त में निर्यात बढ़ाने के लिए अधिक रकबे में इस की खेती करनी पड़ेगी.

 डा. अनंत कुमार, डा. हंसराज सिंह, डा. विरेंद्र पाल*
(कृषि विज्ञान केंद्र गाजियाबाद, *हस्तिनापुर)

 

 

नीलगायों पर सियासत, खेती हो रही चौपट

जब बिहार में किसानों और खेती को बचाने के लिए नीलगायों को मारने का जिम्मा पेशेवर शिकारियों को सौंपा गया, तो पटना से ले कर दिल्ली तक की सियासत गरमा गई. केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने अपने ही दल और सरकार के पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडे़कर के खिलाफ आग उगलना शुरू कर दिया. बिहार में मोकामा के दियारा इलाकों में नीलगायों के बढ़ते आतंक को रोकने के लिए जब उन्हें मारने का काम शुरू किया गया, तो मेनका ने केंद्र और राज्य सरकार की बखिया उधेड़ते हुए कहा कि पता नहीं जानवरों को मारने की कौन सी हवस पैदा हो गई है? अपने साथी मंत्री के आरोपों के जवाब में जावड़ेकर सफाई  दर सफाई देते रहे, पर मेनका अपनी रौ में बहती रहीं. प्रकाश ने कहा कि बिहार सरकार ने नीलगायों को मारने की अनुमति मांगी थी और कानून के तहत मंजूरी दी गई है.

नीलगायों को मारना केंद्र की कोई योजना नहीं है. नीलगायों पर मची राजनीति से भौंचक किसानों का कहना है कि मेनका गांधी को नीलगायों की वकालत करने से पहले किसानों की हालत को देखना चाहिए. नीलगायों के खौफ से लाखों एकड़ उपजाऊ खेत खाली पड़े हैं. मोकामा के दियारा इलाकों में 6 जून से नीलगायों को मारने का काम शुरू हो गया और 9 जून तक 300 से ज्यादा नीलगायों को मारा जा चुका है. इस के लिए हैदराबाद के शिकारी नवाब शफाथ अली खान और उन की टीम को लगाया गया है. नीलगायों को मारने से मेनका इस कदर खफा हुईं कि उन्होंने केंद्र सरकार और बिहार सरकार दोनों को ही कठघरे में खड़ा कर दिया. उन्होंने कहा कि आरटीआई से पता चला है कि किसी भी राज्य ने जानवरों को मारने की मंजूरी नहीं मांगी है. वहीं नीतीश सरकार पर हमला बोलते हुए उन्होंने कहा कि आजादी के बाद बिहार में होने वाला यह पहला इतना बड़ा प्राणी संहार है.

मेनका ने कहा कि गुजरात में  1 लाख 86 हजार नीलगायें हैं और वे अकसर मूंगफली, अरंडी, बाजरा, गन्ना, कपास आदि फसलों को नुकसान पहुंचाती हैं. इस के बाद भी वहां एक भी नीलगाय नहीं मारी गई. गौरतलब है कि साल 2007 में ही केंद्र सरकार ने गुजरात सरकार को नीलगायों को मारने की मंजूरी दी थी.

मेनका ने आगे कहा कि क्या अब गोवा में मोरों को मारा जाएगा? क्या बंगाल में हाथियों को मारने की इजाजत दी जाएगी? हिमाचल में बंदरों की संख्या ज्यादा है, तो क्या बंदरों को मारा जाएगा? क्या चंद्रपुर में जंगली सूअरों को निशाना बनाया जाएगा? सरकार को सोचना चाहिए कि जंगलों के कटने और आग लगने की वजह से ही जानवर बाहर निकल आते हैं.

मेनका के आरोपों के जवाब में जदयू के प्रदेश प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा कि केंद्र सरकार ने 1 दिसंबर 2015 को ही नीलगायों और जंगली सूअरों को मारने की इजाजत दी थी. उस समय मेनका गांधी ने उस का विरोध क्यों नहीं किया? अगर मेनका को नीलगायों से प्रेम है, तो उन्हें खेतों से हटा कर कहीं और रखने का इंतजाम करवाएं.

नीरज ने कहा कि मेनका गांधी को पता नहीं है कि नीलगायों की वजह से बिहार समेत कई राज्यों के किसान तबाह हो रहे हैं. नीलगायों से फसलों को बचाने के लिए साल 2007 में किसानों का बड़ा आंदोलन हो चुका है और उसी के बाद पटना हाई कोर्ट ने भारत सरकार को कार्यवाही करने का आदेश दिया था. उस के बाद ही नीलगायों और जंगली सूअरों को अनुसूची 3 से हटा कर अनुसूची 5 में डाला गया और उन के शिकार की इजाजत दी गई. वन्य प्राणी अधिनियम 1972 की धारा 11 बी के तहत कहा गया है कि इन के शिकार के लिए पेशेवर शिकारियों की मदद ली जाए. बिहार के 20 जिलों में पूरी तरह से और 11 जिलों के सीमित इलाकों में नीलगायों के शिकार की इजाजत है. वहीं 10 जिलों में जंगली सूअरों का शिकार करने की मंजूरी है.

गौरतलब है कि पटना जिले के मोकामा के दियारा इलाकों में पिछले कई सालों से नीलगायों का आतंक मचा हुआ है और वहां के किसानों ने खेती करना बंद कर दिया है. नीलगायों के झुंड दलहन,तिलहन, रबी, खरीफ समेत सब्जियों की फसलों को पलक झपकते ही चर जाते हैं या बरबाद कर देते हैं. फतुहा से ले कर बड़हिया तक फैले मोकामा दियारा क्षेत्र में 1 लाख 67 हजार हेक्टेयर में खेती की जाती है, पर पिछले कुछ सालों से हजारों हेक्टेयर खेत खाली पड़े हैं. सरकारी आंकड़ों में बिहार में करीब 25 हजार नीलगायें हैं.

नीलगायों के आतंक से परेशान उत्तर बिहार के कई इलाकों में किसान हजारों एकड़ खेतों में खेती नहीं कर पा रहे हैं. उन की मेहतन और पूंजी को एक झटके में ही नीलगायें चर जाती हैं. किसानों के सामने सिर पीटने के अलावा और कोई चारा नहीं रह जाता है. बिहार में हर साल नीलगायें किसानों को करीब 600 करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचाती हैं. उन के खौफ की वजह से पिछले साल करीब 25 हजार हेक्टेयर खेत खाली रह गए. राज्य के पटना, भोजपुर, बक्सर, रोहतास, औरंगाबाद, सिवान, पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, मुजफ्फरपुर, वैशाली, सारण, बेगूसराय और मधुबनी में नीलगायें और जंगली सूअर करीब 21 हजार टन अनाज गटक जाते हैं, जिस से किसानों को हर साल 600 करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ रहा है.

उत्तर बिहार के गंगा और सोन नदी के तटीय इलाकों में नीलगायों के आतंक से किसान परेशान और खेती तबाह है. मोतीहारी जिले के पिपरा गांव के किसान मलंग लाल ने बताया कि उन्होंने अरहर की खेती के लिए कर्ज ले कर बीज, खाद से ले कर सिंचाई तक का इंतजाम किया था, लेकिन उन की सारी फसल को नीलगायें चट कर गईं. अब महाजन का कर्ज चुकाना बहुत बड़ी समस्या बन गया है.

मोतिहारी के तुरकौलिया, पीपरा, कोटवा, हरसिद्धि सहित कई प्रखंडों में नीलगायों के उत्पात ने खेती और किसानों को तबाह कर दिया है. नीलगायों के आतंक की वजह से गंगा और सोन नदी के तटीय इलाकों की करीब 70 हजार एकड़ जमीन पर किसान खेती नहीं कर पा रहे हैं. लहलहाती फसलों को नीलगायें पलक झपकते ही खा जाती हैं और किसान अपनी मेहनत और पूंजी के लुटने का तमाशा देखते रह जाते हैं.

किसान रामेश्वर यादव ने बताया कि पहले तो पटाखों की आवाज से डर कर नीलगायें भाग जाती थीं, लेकिन अब उन पर पटाखों के धमाकों का कोई असर नहीं होता है. फसलों को बचाने के लिए किसानों को हर महीने करीब 2 हजार रुपए पटाखों पर खर्च करने पड़ते हैं, लेकिन अब वे भी फायदेमंद नहीं साबित हो रहे हैं. नीलगायें अगर किसी किसान की फसलों को बरबाद कर देती हैं, तो सरकार की ओर से उसे मुआवजा मिलता है. फसल के नुकसान होने पर प्रति हेक्टेयर 10,000 रुपए का अनुदान दिया जाता है. कृषि मंत्री विजय चौधरी ने कहा कि जिन इलाकों में नीलगायों का ज्यादा आतंक है, उन इलाकों के किसानों को इस बात के लिए जागरूक किया जा रहा है कि वे जेट्रोफा की खेती करें. उसे नीलगायों से कोई खतरा नहीं होता है. किसानों को जेट्रोफा के पौधे भी मुहैया कराए जा रहे हैं. लेकिन जेट्रोफा की खेती करने में किसानों की कोई दिलचस्पी नहीं है. किसान मनीराम का कहना है कि उन्हें मुआवजा नहीं बल्कि नीलगायों से हमेशा के लिए नजात दिलाई जाए.

नीलगायों की आबादी काफी तेजी से बढ़ती है. 1 मादा नीलगाय 1 साल में 4 बच्चे पैदा करती है और उस के बच्चे भी 1 साल के अंदर ही बच्चे पैदा करने लायक हो जाते हैं. इस वजह से नीलगायों की संख्या में तेजी से इजाफा होता जा रहा है.

वेटनरी डाक्टर कौशल किशोर कहते हैं कि साल 2003 में नीलगायों के बंध्याकरण का काम शुरू किया गया था, लेकिन वह योजना काफी समय पहले ही बंद हो गई. बगैर किसी ठोस प्लानिंग के नौसिखिए और अनाड़ी लोगों को बंध्याकरण के काम में लगा दिया गया था, जिस से नतीजा शून्य रहा. वन प्राणी संरक्षण अधिनियम के तहत नीलगायों को संरक्षित जंगली जानवर का दर्जा मिला हुआ है, जिस की वजह से किसान नीलगायों को मार भी नहीं सकते हैं. नीलगायों को मारने वाले को जेल और जुर्माने की सजा देने का इंतजाम है, जिस की वजह से किसान नीलगायों से परेशान हो कर खेती नहीं कर पाने की सजा भुगतने के लिए मजबूर हैं.  

अब नीलगायों को बिजली का झटका

नीलगायों के आतंक से फसलों को बचाने के लिए सौर ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाएगा. इस के तहत लोहे के तारों से खेतों की घेराबंदी कर के उस में सौर ऊर्जा का करंट प्रवाहित किया जाएगा. प्रयोग के तौर पर पटना के सरकारी कृषि फार्म की घेराबंदी की जा रही है. गौरतलब है कि पटना,  मुजफ्फरपुर, पूर्वी और पश्चिमी चंपारण, भोजपुर, भभुआ, बक्सर आदि जिलों में लहलहाती फसलों को नीलगायों के झुंड चट कर जाते हैं. नीलगाय 10 फुट की ऊंचाई तक छलांग लगा सकती है और वह खासकर दलहनी फसलों को अपना निशाना बनाती है. धान, गेहूं, मक्का को खाने के बाद जब उस का पेट भर जाता है, तो खड़ी फसलों को रौंद कर बरबाद कर देती है. इस से किसानों को काफी नुकसान होता है. घेराबंदी वाले तारों में सौर ऊर्जा के जरीए करंट दौड़ाया जाएगा. करंट डायनमो के जरीए पैदा होगा और उस के झटके से नीलगायों की मौत नहीं होगी. करंट का झटका लगने के बाद नीलगायें खेतों की ओर दोबारा जाने की हिम्मत नहीं करेंगी. इस के लिए किसानों को पैसा भी दिया जाएगा

जिंदगी के लिए जहर बनते कीटनाशक

तमाम फसलों की खेती के दौरान कीटनाशकों का इस्तेमाल करना किसानों की मजबूरी होती है. अपनी कीमती फसलों को घातक कीड़ों से बचाने की खातिर न चाहते हुए भी किसानों को कीटनाशकों का सहारा लेना पड़ता?है. मगर ये कीटनाशक किस कदर खतरनाक होते हैं, इस का अंदाजा हर किसी को नहीं होता. अमेरिका के नामी पत्रकार बेरी एस्टाब्रूक की एक रिपोर्ट ने दुनिया में तहलका मचा दिया था. उस रिपोर्ट के मुताबिक मां के खून से आए कीटनाशक थोड़ी सी मात्रा में भी बच्चे में तमाम कमियां पैदा कर सकते हैं.

रिपोर्ट में अमेरिका के फ्लोरिडा के इम्मोकाली इलाके की घटना का जिक्र किया गया?है. वहां बड़े रकबे में टमाटर की खेती की जाती है. वहां टावर केबिंस नाम की खेतिहर मजदूरों की 30 मकानों की एक छोटी सी बस्ती है. लकड़ी से बने उन मकानों में ज्यादातर मैक्सिको से घुसपैठ कर के आने वाले मजदूरों के परिवार रहते हैं. ये परिवार अवैध तरीके से आने की वजह से गुलामों जैसी जिंदगी गुजारते हैं. करीब ढाई साल पहले का वाकया है यह. क्रिसमस से पहले डेढ़ महीने के दौरान उस बस्ती की 3 मजदूर महिलाओं ने बच्चों को जन्म दिया?था. पहली महिला ने एक लड़के को पैदा किया, मगर उस के दोनों हाथ व दोनों पैर गायब थे. इस हालत को टट्रोमेलिया कहते हैं.

इस के 6 हफ्ते बाद पड़ोस के मकान में रहने वाली दूसरी महिला का बच्चा पैदा हुआ. उस बच्चे को पिअरी रोबिन सिंड्रोम नाम की पैदायशी शिकायत थी. उस का नीचे वाला जबड़ा छोटा और अविकसित था. इस के अलावा उस की जीभ काफी पीछे की ओर थी. जीभ इस कदर पीछे थी कि उसे सांस लेना भी दूभर था. उस का ऊपर वाला तालू बीच से फटा हुआ था. फिर 2 दिनों बाद बस्ती की तीसरी महिला की बच्ची पैदा हुई बच्ची की नाक व एक कान नदारद थे. गुर्दा भी केवल 1 था और गुदा द्वारा भी बंद था. उस का तालू फटा हुआ था और बाहरी जननांग गायब था. वह बच्ची सिर्फ 3 दिनों तक ही जी सकी.

एक ही जगह रहने और साथसाथ काम करने वाली 3 औरतों द्वारा विकलांग बच्चों को जन्म देना वाकई हैरानी वाली बात थी. बच्चों के जन्म के समय में भी खास अंतर नहीं था. माहिर डाक्टरों को भी इस सवाल ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर माजरा क्या है? इतना तो तय था कि गर्भस्थ शिशुओं के अंग बनते वक्त ही कोई खलल पड़ा होगा. डाक्टरों द्वारा तीनों औरतों के आखिरी मासिक के मुताबिक गर्भधारण के महीने परखे गए. ये वही महीने थे, जब?टमाटरों के खेतों में कीटनाशकों का भरपूर छिड़काव किया जाता है. ये महिलाएं उन्हीं खेतों में काम करती थीं.

आमतौर पर कीटनाशकों के छिड़काव के बाद एक तय समय तक खेत में और उस के नजदीक जाने पर भी पाबंदी होती है. अगर ऐसा किया जाता तो वे तीनों मांएं महफूज रहतीं. मगर महिलाओं के मुताबिक उन के मालिकों ने नियम की परवाह न करते हुए उन से उस दौरान भी खेतों में काम करवाया. और उन्हीं कीटनाशकों के जहरीले असर ने महिलाओं के बच्चों का पेट में ही सत्यानाश कर दिया.

इस घटना से जाहिर है कि कीटनाशकों का इस्तेमाल किस कदर जानलेवा हो सकता है. अमेरिका जैसे विकसित देश में जब ऐसी घटनाएं हो सकती?हैं, तो भारत जैसे देश की बिसात ही क्या?है?

आजकल जैविक कीटनाशकों पर जोर दिया जा रहा?है और आने वाले वक्त के लिए इसे अच्छी बात कहा जा सकता?है. इस मामले में वैज्ञानिकों और माहिरों को पूरा जोर लगाना होगा, ताकि रासायनिक कीटनाशकों का नामोनिशान मिट सके और इन के बगैर खेती का काम चल सके.

बेर के पेड़ों की काटछांट और हिफाजत

पश्चिमी राजस्थान की आबोहवा व जमीन बेर की पैदावार के लिए बहुत अच्छी मानी जाती है, इसीलिए इस क्षेत्र में बेर की खेती टिकाऊ साबित हो रही है. गरमी व कम पानी में बेर की पैदावार अच्छी होती है. लेकिन बेर के पेड़ों में सही कटिंग व पौध संरक्षण न करने पर फलों की पैदावार व उस की क्वालिटी पर बुरा असर पड़ता है, जिस से किसानों को बहुत नुकसान सहना पड़ता है. अगर सही समय पर फल वाले पेड़ों में काटछांट व फसल की देखभाल पर ध्यान दिया जाए तो कीट व बीमारियों से होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है.

बेर के पेड़ों में काटछांट : बेर के पेड़ों में हर साल काटछांट करना बहुत जरूरी है. इस काम को हर साल मई के महीने में किया जाना चाहिए. अप्रैल में फलों की तोड़ाई के साथ ही बेर का पौधा गरमी के मौसम में ज्यादा तापमान, नमी की कमी व लू से बचे रहने के लिए सोने वाली स्थिति में चला जाता है. इस दौरान इस में काटछांट करने से पेड़ों को काटछांट का एहसास नहीं हो पाता है. जून में मानसून के साथ ही पेड़ों में नया फुटाव शुरू हो जाता है.

बेर में काटछांट करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि जो शाखाएं पिछले साल निकली थीं, उन के ऊपर का लगभग आधे से तीनचौथाई हिस्सा काट देना चाहिए. 5 से 6 सालों में जब पेड़ ज्यादा घना होने लगे तो गहरी काटछांट करनी चाहिए.

काटछांट करने के 7 से 10 दिनों बाद बेर में गहरी गुड़ाई कर के जरूरत के हिसाब से खाद व उर्वरक मिला देना चाहिए. जून में बारिश नहीं होने की स्थिति में 1 बार सिंचाई कर देनी चाहिए, जिस से नई कोपलें गरमी से झुलसेंगी नहीं व अधिक संख्या में फूल व फल लगेंगे.

जानकारी की कमी की वजह से कुछ किसान बेर में सही समय पर काटछांट नहीं करते हैं, जिस से फलों के उत्पादन व क्वालिटी पर असर पड़ता है.

बेर में काटछांट नहीं करने से नई शाखाएं कम निकलती हैं, जिस से फूल व फल बहुत कम होते हैं. समय से पहले (अप्रैल महीने में) काटछांट करने से पौधों की नींद की

स्थिति जल्दी खत्म हो जाती है व नई शाखाएं जल्दी निकल कर ज्यादा गरमी के कारण

झुलस जाती हैं, जिस से उत्पादन पर गलत असर पड़ता है.

ज्यादा देरी से (जुलाई महीने में) काटछांट करने से पेड़ की नींद खत्म हो जाती है, जिस से काटछांट वाली जगहों से पौधे का कोशारस निकल जाता है और नई शाखाएं बहुत कम  निकलती हैं. नतीजतन फूल और फल बहुत कम होते हैं. इसीलिए ज्यादा उत्पादन प्राप्त करने के लिए 15-30 मई के बीच बेर में काटछांट कर देनी चाहिए. यह भी ध्यान रखना चाहिए कि काटछांट बहुत कम या बहुत ज्यादा नहीं हो.

देखभाल : बेर की फसल को कीटों व बीमारियों से बहुत नुकसान होता है. कभीकभी कीटों व बीमारियों से बेर की पूरी फसल खराब हो जाती है, जिस से किसान को भारी नुकसान झेलना पड़ता है. इस में लगने वाले कीड़े व बीमारियां इस तरह से हैं:

कीट

छाल भक्षक कीट : ये कीट फल वाले पेड़ों की छाल को खाते हैं, जिस से पेड़ों का रस बहाव कम हो जाता है, उन की टहनियां सूखने लगती हैं या कमजोर हो जाती हैं, जो हलकी हवा या फलभार के झुकाव के कारण टूट जाती हैं और पैदावार में कमी हो जाती है. ये कीट छिपने के लिए टहनी के अंदर सुरंग बना लेते हैं. ये कीट दिन के समय सुरंग के अंदर छिपे रहते हैं और  रात के समय फल वाले पेड़ों की छाल खाते हैं.

रोकथाम : इस कीट की रोकथाम के लिए समयसमय पर क्यूनालफास 25 ईसी 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करें. बेर की कटाईछंटाई के बाद नई पत्तियां निकलने तक दवा का छिड़काव करते रहना चाहिए.

* सुरंग साफ कर के पिचकारी की मदद से 5 मिलीलीटर कैरोसिन उस में डालें या छेद में क्लोराफार्म में डूबी रुई डाल कर गीली चिकनी मिट्टी से छेद को बंद कर दें, ताकि कीट सुरंग के अंदर ही मर जाएं.

* कीट लगी टहनियों को काट कर इकट्ठा कर के अलग किसी स्थान पर जला दें, ताकि कीट अंदर ही जल कर मर जाएं.

चैफर बीटल : यह भी बेर के पेड़ों को नुकसान पहुंचाने वाला कीट है, जिस का असर बरसात के समय ज्यादा हो जाता है. यह कीट बेर की कोमल पत्तियों को खाता है, जिस से पेड़ों की बढ़वार और पैदावार पर असर पड़ता है.

रोकथाम : इस कीट से बचाव के लिए पेड़ के तने के आसपास की जमीन की समयसमय पर जुताई करनी चाहिए, जिस से इस कीट की लटें व कोश मर जाएं.

* चैफर बीटल के प्रौढ़ कीट इकट्ठा करने के लिए प्रकाशपाश व फिरोमोनफास पाश का इस्तेमाल करना चाहिए.

* पेड़ों को बचाने के लिए बरसात के शुरू में मोनोक्रोटोफास 36 एसएल 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें. कार्बेरिल 50 डब्ल्यूपी 4 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल के छिड़काव से यह कीड़ा मर जाता है.

फलमक्खी : इस कीट के मैगट ही नुकसान पहुंचाते हैं, जिस का एक सिरा पतला व दूसरा सिरा चौड़ा होता है. जब फल मटर के आकर के हो जाते हैं, तो मादा मक्खी अपने अंडरोपक के द्वारा फलों में छेद कर के अंडे देती है. अंडे फूटने के बाद मैगट निकलते हैं, जो फल के अंदर का गूदा खा कर फल में छेद कर देते हैं. खाया गया भाग पतला हो जाता है व फल गिर भी जाते हैं. मैगट एक फल से दूसरे फल में घुस जाते हैं और पैदावार में कमी आ जाती है.

रोकथाम : गरमी में मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करें ताकि कृमिकोश बाहर आ जाएं, जो धूप या चिडि़यों के द्वारा नष्ट हो जाएंगे, जिस से फल मक्खी नहीं पनप पाएगी.

* कीट लगे फलों को जमा कर के मिट्टी के तेल में डुबो दें जिस से मैगट नष्ट हो जाएंगे.

* बेर के बगीचे के आसपास की जंगली झाडि़यों को हटा दें व कीट से प्रभावित फलों को नष्ट कर दें.

* जब फल मटर के आकार के हों उसी समय डाईमिथोएट 30 ईसी या मिथाइल डेमेटोन 25 ईसी या क्यूनालफास 25 ईसी 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें. 15 दिनों बाद छिड़काव दोहराएं.

बीमारियां

छाछ्या रोग : यह एक भयंकर रोग है, जिस में फलों, पत्तियों व तनों पर सफेद चूर्ण जैसी परत दिखाई देती है. फल पीले पड़ कर सिकुड़ जाते हैं व गिर जाते हैं. इस का असर जाड़े के दिनों में बादल होने पर ज्यादा होता है. इस रोग से बचाने के लिए डाइनोकेप 48 ईसी 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए. पहला छिड़काव फूल आने से पहले और दूसरा व तीसरा छिड़काव फल बनने के बाद 15 दिनों के अंतराल पर करें. घुलनशील सल्फर के छिड़काव से भी छाछ्या रोग से पेड़ों को बचाया जा सकता है.

जड़ गलन : यह रोग पौधे की शुरुआती अवस्था में जब पौधे छोटे होते हैं, उस समय लगता है. इस से पौधे की जड़ें सड़ जाती हैं या जमीन के पास से तने कमजोर हो कर पौधे सूख जाते हैं.

रोकथाम : नर्सरी के लिए जगह का चुनाव ऊंची जगह पर करें, जहां से पानी का निकास आसानी से हो जाए. जड़ में भुरभुरी मिट्टी का इस्तेमाल करना चाहिए.

* बीजों को बोने पहले मिट्टी को केप्टान 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल कर उपचारित करें, ताकि मिट्टी के कवक खत्म हो जाएं.

* बीजों को थायरम या केप्टान 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर के बोआई करनी चाहिए.

* पौधे जब छोटे हों तो उन पर रिडोमिल 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए.

पत्ती धब्बा रोग : यह भी फफूंदी से लगने वाला रोग है, जो नवंबर से दिसंबर के महीने में फैलता है. इस रोग से पत्तियों के ऊपर सफेद रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. बाद में ये धब्बे आकार में बढ़ कर पूरी पत्ती पर फैल जाते हैं. पत्तियां पीली पड़ कर सूख कर गिर जाती हैं.

 बेर के पौधों को इस रोग बचाने के लिए जब सफेद धब्बे दिखाई दें, तो उसी समय मैंकोजेब 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें. दूसरा छिड़काव 15 दिनों बाद करना चाहिए.

फलों व फूलों का झड़ना : बेर में फूल व फल झड़ने की समस्या भी काफी ज्यादा पाई जाती है. इस की खास वजह बागों की ठीक से देखभाल नहीं करना है. अकसर किसान पेड़ों की कटाईछंटाई, जल्दी या देरी से करते हैं. फूल आने के समय सिंचाई करते हैं, जिस से फूल परागण से पहले ही सूख जाते हैं या छोटेछोटे फल गिर जाते हैं, जिस से बेर की पैदावार पर असर पड़ता है.

इस की रोकथाम के लिए बागों की सही देखभाल के साथसाथ सही समय पर मई महीने के आखिर में काटछांट करनी चाहिए. फल लगने के बाद हलकी सिंचाई करनी चाहिए. ज्यादा गरमी बढ़ने पर बगीचों में फव्वारा चलाना चाहिए. खाद व उर्वरक के साथसाथ कीटों व रोगों का भी खास ध्यान रखना चाहिए.

फूल लगने के 15 दिनों पहले, फूल के समय व मटर के आकार के फल के होने के समय प्लेनोफिक्स (1 मिलीलीटर दवा को 3 लीटर पानी में घोल कर) का छिड़काव भी करना चाहिए.

इस प्रकार से किसान सही समय पर पेड़ों की काटछांट व फसल सुरक्षा पर ध्यान दे कर, कीटनाशक व फफूंदीनाशक दवाएं उचित समय पर बगीचे में छिड़क कर बेर में होने वाले नुकसान से बच सकते हैं और ज्यादा फायदा कमा सकते हैं.

बेर की अच्छी पैदावार के लिए निम्नलिखित सालाना कार्यक्रम अपनाएं :

जनवरी : इन दिनों पेड़ों में लगे फल बढ़ रहे होते हैं, इसलिए सिंचाई पर ध्यान देना चाहिए. यदि फल मक्खियों का प्रकोप हो गया हो तो मिथाइल डिमेटोन 25 ईसी 1 मिलीलीटर मात्रा 1 लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करना चाहिए. बेर के जंगली पेड़ों को बढि़या किस्मों की चोटी लगाने के लिए इसी महीने में काट लेना चाहिए.

फरवरी : अगेती किस्मों के फल पकने लग जाते हैं. इसलिए फलों को सही तरह से तोड़ना चाहिए. पछेती किस्मों में फलमक्खी की रोकथाम करनी चाहिए. चूर्णी फफूंदी का प्रकोप दिखाई देने पर सल्फर पाउडर 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करना चाहिए.

मार्च : इन दिनों फल पूरी तरह से पक चुके होते हैं. उन्हें पेड़ों से तोड़ कर बाजार में बेचने के लिए ले जाना चाहिए. मौसम के बाद काम में लाने के लिए फलों को सुखा कर रखा जा सकता है या उन से कैंडी तैयार की जा सकती है. उत्तरी भारत में दिसंबर में काटे गए जंगली बेर के पेड़ों में इस महीने में मनमुताबिक किस्म की कलियां लगा देनी चाहिए.

अप्रैल : यदि बेर नाशक भृंग ने हमला कर दिया हो तो उस की रोकथाम करनी चाहिए. बेर के पौधे उगाने के लिए स्वस्थ जंगली बेरों से जमा किए गए बीजों को जहां पेड़ कली लगा कर उगाने हों वहीं पर बो देना चाहिए.

मई : इस महीने बेर के पेड़ अपनी पत्तियां गिराते हैं और आराम करते हैं. जिन की चोटी को जनवारी में काट दिया गया था, उन पर कलिकायन कर देना चाहिए. इस महीने में पौधों में काटछांट कर देनी चाहिए.

जून : हर पेड़ में 4-5 टोकरी यानी 40 किलोग्राम गोबर की खाद, 2 किलोग्राम नीम की खली और 2 किलोग्राम एनपीके उर्वरक देना चाहिए और जरूरी निराईगुड़ाई कर देनी चाहिए. इस के बाद हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए. पत्तियों व अन्य सूखे भागों को इकट्ठा कर के बाग की सफाई करनी चाहिए. बाग में गहरी जुताई कर के सौर उपचार करना चाहिए. कटाईछंटाई करने के बाद कटे भागों व तने पर बोर्डो पेस्ट का लेप भी करना चाहिए.

जुलाई : थैलियों में उगाए गए पौधों को खेत में सही अंतर पर लगा देना चाहिए. बाद में वहीं पर उन में कलियां लगाई जाती हैं. बीज बो कर उगाए गए पौधों पर कलिकायन भी इसी महीने में कर देना चाहिए. जरूरत के मुताबिक डाईमिथोएट 30 ईसी कीटनाशी का छिड़काव कर देना चाहिए.

अगस्त : थैलियों में उगाए गए बेर के पौधों को खेतों में लगाने का काम चलता रहता है. इस महीने भी कलिकायन कर सकते हैं. बागों में प्लेनोफिक्स का छिड़काव कर देना चाहिए.

सितंबर : पेड़ों के आसपास की जमीन की जुताई कर देनी चाहिए. बाग में साफसफाई करते रहना चाहिए. यदि छाछ्या रोग का प्रकोप हो तो तुरंत इलाज करना चाहिए.

अक्तूबर : फलों का लगना शुरू हो जाता है, इसलिए बागों का पूरा खयाल रखें. पानी की निकासी का पूरा ध्यान रखना चाहिए. इस महीने मोनोक्रोटोफास व प्लेनोफिक्स का घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

नवंबर : इन दिनों में मध्य भारत में बेर पकने लगते हैं. उन्हें पक्षियों से बचाना चाहिए. यदि फलमक्खी ने आक्रमण कर दिया हो, तो उस की रोकथाम के लिए पिछले महीने में किए छिड़काव को दोहराना चाहिए.

दिसंबर : उत्तरी भारत में जिन जंगली बेर के पेड़ों में बढि़या किस्म की कली लगा कर तैयार करनी होती है, उन का तने से ऊपर का भाग इस महीने में काट देना चाहिए. पेड़ों की सिंचाई करनी चाहिए, क्योंकि इन दिनों फल विकास की अवस्था में रहते हैं.

फल झड़ाव हो तो प्लेनोफिक्स का छिड़काव करना चाहिए. फलों की गुणवत्ता में सुधार के लिए एनपीके पालिफिड (50 ग्राम प्रति 15 लीटर पानी) का घोल  बना कर छिड़काव करना चाहिए. इस महीने

कीटनाशी व फफूंदनाशी (रिडोमिल) का घोल तैयार कर के जरूरत के अनुसार छिड़काव करना चाहिए.

किसान औषधीय पौधे लगा कर ज्यादा कमाएं

फसलों के साथ लगाए हुए पेड़ बहुत फायदेमंद होते हैं, क्योंकि पेड़ों के बड़े हो जाने पर उन से मोटी रकम मिलती है. इसलिए बहुत से किसान खेती से ज्यादा कमाई करने के लिए अकसर अपने खेतों की मेंड़ों पर शीशम, साल, सागौन या पापुलर आदि के पेड़ लगाते हैं. बदलते दौर में किसान खेती के साथ औषधीय पौधे लगा कर अच्छी कमाई कर सकते हैं. यह बात अलग है कि ज्यादातर किसान इन के बारे में नहीं जानते. औषधीय पौधों के बीज, पौध, रोपण सामग्री व तकनीकी जानकारी भी हर किसी को आसानी से नहीं मिलती. इसलिए ज्यादातर किसान औषधीय पौधे नहीं लगाते.

माहिरों की खोजबीन के मुताबिक पहचाने गए औषधीय पौधों का कुनबा बहुत बड़ा है. इस पर 3 नई किताबें भारत सरकार की चिकित्सा अनुंसधान परिषद ने पिछले दिनों छापी हैं. इन में शामिल औषधीय पौधों व किस्मों की गिनती 1100 से ऊपर है, लेकिन फिलहाल इन में से सिर्फ 35 औषधीय पौधों की क्वालिटी के लिए ही मानक तयशुदा हैं.

ऐसा करें किसान

अशोक, अश्वगंधा, अर्जुन, अतीस, बायबिड़ंग, बेल, ब्राह्मी, चंदन, चिरायता, गिलोय, गूगल, इसबगोल, जटा मांसी, कालमेघ, कुटकी, शतावर, शंखपुष्पी, सफेदमूसली, दालचीनी, हरड़, बहेड़ा, आंवला, सौंफ व सनाय वगैरह की मांग आमतौर पर ज्यादा रहती है. औषधीय पौधों से मिली कई चीजें हमारे देश से दूसरे मुल्कों को भेजी जाती हैं, लेकिन इस में ज्यादातर  हिस्सा रसायनों के बगैर उगाए गए औषधीय पौधों से मिली आरगैनिक सामग्री का रहता है.

मेरठ के किसान महेंद्र सिंह ने बताया कि ज्यादातर किसान अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए पैसा आने के इंताजर में रहते हैं, जबकि औषधीय पौधों से पैसा काफी देर से मिलता है, लेकिन तुलसी की फसल सब से जल्दी सिर्फ 3 महीने में पक कर तैयार हो जाती है. लिहाजा किसान हिचक छोड़ कर इस काम की शुरुआत कर सकते हैं.

इस के अलावा अश्वगंधा, आंवला, ब्राह्मी, चिरायता, गुडुची, कालमेघ, मकोय, पाषणभेद, सनाय, मेहंदी व बच आदि 1 साल में तैयार हो जाते हैं. लिहाजा किसान अपनी पसंद व कूवत के मुताबिक पेड़ चुन सकते हैं. देसी, यूनानी व होम्योपैथिक वगैरह दवाएं औषधीय पौधों से मिली चीजों से बनती हैं. लिहाजा बहुत सी दवाओं के लिए कच्चे माल की भारी मांग रहती है. नतीजतन औषधीय पौधे बहुत तेजी के साथ घट रहे हैं, जबकि औषधीय पौधों की खेती उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही, जितनी कि जरूरत है. इस के मद्देनजर सरकार औषधीय पौधे उगाने को बढ़ावा दे रही है, ताकि देसी दवाएं बनाने वाली कंपनियों को उम्दा क्वालिटी का कच्चा माल व किसानों, बागबानों को उन की मेहनत का वाजिब मुनाफा मिल सके.

आयूष उत्पादों के मामले में भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 10 फीसदी है, जबकि बढ़त की गुंजाइश हमारे देश में अभी भी बहुत है. औषधीय पौधों को बचाने व बढ़ाने के लिए साल 2000 से केंद्र सरकार का स्वास्थ्य महकमा राष्ट्रीय औषध पौध बोर्ड (एनएमपीबी) के जरीए कई स्कीमें चला रहा है. इस के अलावा 11वीं पांच साला योजना में 630 करोड़ रुपए की लागत से औषधीय पौधों पर 1 राष्ट्रीय मिशन भी नेशनल बोर्ड के तहत चल रहा है.

साथ ही साथ देश भर में 35 राज्य स्तर के बोर्ड भी चल रहे हैं. मिशन की स्कीमों में औषधीय पौधे उगाने पर 75  फीसदी व प्रोसेसिंग पर 50 लाख रुपए तक माली मदद दी जाती है, लेकिन इस का प्रचारप्रसार नहीं के बराबर है. यदि सरकारें ध्यान दें तो औषधीय पौधों से किसानों की माली हालत जल्दी व ज्यादा सुधर सकती है.

अपने देश में औषधीय पौधों पर चल रही सरकारी स्कीमों की कमी नहीं है. मसलन राज्य बागबानी मिशन के जरीए चल रही केंद्र पुरोनिधानित स्कीम में भी औषधीय पौधे उगाने को बढ़ावा दिया जाता है, लेकिन ज्यादातर किसान इतना भी नहीं जानते कि दूसरी फसलों के मुकाबले औषधीय पौधों की खेती ज्यादा फायदेमंद है.

इस के लिए जरूरी है कि किसान औषधीय पौधे उगाने से ले कर उन के तैयार होने तक की पूरी तकनीक ठीक से जानते हों. हालांकि यह काम कोई मुश्किल या नामुमकिन नहीं है. लखनऊ की सरकारी संस्था सीमैप से ट्रेनिंग ले कर किसान औषधीय पौधे उगाना सीख सकते हैं व उन से हासिल सामग्री बेच कर अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं.

चलन पुराना

देसी, यूनानी, सिद्ध व होम्योपैथिक दवाएं बनाने में जड़ीबूटियों का इस्तेमाल सदियों से किया जाता रहा है. औषधीय पौधों से हासिल फल, फूल, बीज, छाल, तना, पत्ती व जड़ के हिस्से जड़ीबूटियां हैं. हमारे देश में 3 हजार से ज्यादा छोटीबड़ी कंपनियां देसी दवाएं बनाती हैं. अगर जानकारी हो तो औषधीय पौधों के उत्पाद बिकने में दिक्कत नहीं होती. फिर भी बेहतर होगा कि पहले ही किसी दवा कंपनी या खरीदार से बात कर ली जाए. हरिद्वार की पतंजलि फार्मेसी रोज सैकड़ों टन ग्वारपाठा व आंवला वगैरह कई चीजें खरीदती है.

दिल्ली जैसे बड़े शहरों में भी औषधीय उत्पादों के बाजार हैं. यह बात अलग है कि आम किसानों को यह जानकारी नहीं है कि औषधीय पौधों के उत्पाद कहां, कब, कैसे व कितनी कीमत में बिकते हैं. लिहाजा किसान पूरी जानकारी के बाद

ही औषधीय पौधे लगाएं, ताकि उन्हें बाद में उपज बेचने के लिए परेशान न होना पड़े. इस के लिए जागरूकता जरूरी है.

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में सहकारिता महकमे के रजिस्ट्रारों ने किसानों की मदद व सहूलियत के लिए जड़ीबूटी संग्रह व बिक्री के सहकारी संगठन भी बना रखे हैं. इस के अलावा औषधीय एवं सगंध पौधा उत्पाद संघ नाम की संस्था बी 83, अशोकपुरा, हजपुरा डेली रोड, पटना, बिहार में भी चल रही है. साथ ही देसी दवा बनाने में काम आने वाले कच्चे माल के अनेक खरीदारों के पते इंटरनेट पर भी मौजूद हैं.

खोजबीन

दिल्ली में भारत सरकार की एक मशहूर संस्था है वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद, जिसे सीएसआईआर भी कहा जाता है. इस संस्था के तहत उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर में केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान काम कर रहा है, जिसे सीमैप भी कहते हैं.

इस संस्थान ने औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने का काफी काम किया है.

सीमैप ने औषधीय पौधों की उम्दा किस्में मुहैया कराने, प्रसंस्करण करने, किफायती उपकरण निकालने, ट्रेनिंग व सलाहमशविरा देने से ले कर बाजार उपलब्ध कराने तक हर पहलू पर काम किया है. लिहाजा किसान इस संस्था से मदद ले सकते हैं. सीमैप औषधीय पौधों की जानकारी देने के लिए किसान मेले एवं प्रदर्शनी लगाती है, ताकि किसान सीधे वैज्ञानिकों से मिल कर सवाल पूछ सकें.

इस के अलावा सीमैप संस्था फार्म बुलेटिन, प्रोसेसिंग पर पुस्तिका व बाजार के लिए मार्केटिंग डायरेक्टरी वगैरह मुहैया कराती है. किसान डायरेक्टरी में खरीदारों के पते देख सकते हैं. इस के अलावा किसानों की सहूलियत के लिए सीमैप की बुकलेट ओस ज्ञान्या में भी 70 खरीदारों के पते छापे गए हैं.

उत्तर प्रदेश के जंगल महकमे की नर्सरी में भी लगभग 85 किस्मों के औषधीय पौधे किसानों को वाजिब कीमत पर मुहैया कराए जाते हैं. किसान अकेले या मिल कर स्वयं सहायता समूह, सहकारी समिति या उत्पादक कंपनी आदि बना कर औषधीय खेती व उस की उपज बेचने का काम कर सकते हैं. जरूरत पहल करने की है.

औषधीय पौधों की किस्म, रोपण तकनीक, औजार, मशीनों व प्रोसेसिंग आदि के बारे में अधिक जानकारी के लिए किसान व उद्यमी सीमैप के नीचे दिए पते पर संपर्क कर सकते हैं:

निदेशक, केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान, सीमैप, कुकरैल, लखनऊ : 226015, फोन 0522-2359623.

सरकारी स्कीमों में छूट, सहूलियत व माली इमदाद आदि के लिए निम्न पते पर संपर्क कर सकते हैं:

मुख्य कार्यकारी, राष्ट्रीय औषध पौधा बोर्ड, आयूष भवन, तीसरा तल, बी ब्लाक, जीपीओ कांप्लैक्स, आईएनए, नई दिल्ली 110023. फोन : 011-24651825

वेबसाइट :  222.ठ्ठद्वश्चड्ढ.ठ्ठद्बष्.द्बठ्ठ

ई मेल : द्बठ्ठद्घश-ठ्ठद्वश्चड्ढञ्चठ्ठद्बष्.द्बठ्ठ      

खास औषधीय पौधे

अश्वगंधा, गिलोय, रुद्राक्ष, काला सिरस, अशोक, भूमि आंवला, चिरायता, पंगारा, हारसिंगार, मुलैहटी, गूलर, वन तुलसी, सफेद तुलसी, रामा तुलसी, सदाबहार, तुन, पीला वासा, पोई, कचनार, पत्थर चूर, पलाश, कट करंज, प्रियंगू, मद, भांग, देवकिली, अजवायन, कसामर्द, सफेद मूसली, काली मूसली, कालमेघ, इसबगोल, घृतकुमारी, सनाय, बच, भृंगराज, आंवला, तगर, जंगली अरंड, सेहुंड, दूधी, कैंथा, बरगद, बबूल, बेच, चंदन, सप्तपर्णी, अंबाहलदी, पीली हलदी, हरी चाय, तेजपात, लघुपाठा, हाड़जोड़, नीबू, भाट, अपराजिता, कुंदरू, लसोड़ा, वरुन, सुदर्शन, जमालघोटा, पीपल, गुड़मार, गुड़हल, रतनजोत, आम, नीम, जामुन, इमली, बकैन, मौलश्री, जल ब्राह्मी, शहतूत, लाल कनेर, सर्पगंधा, सेमल, सागौन, सतावर, कदंब, ईश्वरमूल, दमनक, कटहल, काली मकोय, मोथा, शीशम, काला धतूरा, कनक धतूरा, गेंठी, जापानी पोदीना, वाराहीकंद, अनंतमूल, कुचैला, नागेश्वर, गोखरू व कैंच. कुछ बड़े खरीदारों के पते

* मै. पतंजलि फार्मेसी, हरिद्वार, उत्तराखंड.

*      मै. डाबर इंडिया लि., 8/3 आसफअली रोड, नई दिल्ली-110001. फोन : 011-23253488.

* मै. बैद्यनाथ आर्युवेद भवन, प्रा. लि. लादीनगर, पटना. फोन : 0612-2353143.

*     मै. हिमालय ड्रग कंपनी, मकाली, बेंगलूरू, फोन : 080-23714444.

* मै. झंडू इमामी लि., तीसरा तल, गोल्डन चैंबर, नया लिंक रोड, अंधेरी पश्चिम, मुंबई,

     फोन : 022-26709000.

* मै. मेहता फार्मास्यूटिकल, छीहरता, जीटी रोड, अमृतसर, पंजाब.

टमाटर उत्पादन तकनीक

टमाटर एक खास सब्जी है. सब्जी के अलावा टमाटर से कई उत्पाद जैसे चटनी, सूप, कैचअप व सौस बनाए जाते हैं.

जमीन व जलवायु : टमाटर अधिक कार्बनिक पदार्थ वाली बलुई दोमट मिट्टी में आसानी से उगाया जा सकता?है. हलकी अम्लीय मिट्टी जिस का पीएच मान 6.0 से 7.0 तक हो, टमाटर के लिए अच्छी रहती है. टमाटर गरम मौसम की फसल है, इसलिए उन इलाकों में अच्छी पनपती है, जहां पाला नहीं पड़ता?है. ज्यादा गरमी (42 डिगरी से ज्यादा) में फूल व बिना पके फल झड़ जाते हैं.

उन्नत किस्में : पूसा रूबी, पूसा उपहार, पूसा संकर 1, पूसा संकर 2, पूसा संकर 4, पूसा रोहिणी, पूसा 120, पूसा शीतल, अविनाश 2, अर्का सौरभ, हाईब्रिड लाल, हाईब्रिड ब्रैवो व हाइब्रिड क्रिस आदि. बीज की मात्रा : उन्नत किस्मों के 350 से 400 ग्राम बीज प्रति हेक्टेयर. संकर किस्मों के 200 से 250 ग्राम बीज प्रति हेक्टेयर.

पौधशाला : टमाटर के पौधे तैयार करने के लिए 60 से 90 सेंटीमीटर चौड़ी व 16 सेंटीमीटर ऊंची उठी हुई क्यारियां बनानी चाहिए. भरपूर मात्रा में सड़ी हुई गोबर की खाद या वर्मी कंपोस्ट मिला कर 5 सेंटीमीटर की दूरी पर लाइनें बना कर बीजों की बोआई करनी चाहिए. बीज आधा सेंटीमीटर से ज्यादा गहरे नहीं डालने चाहिए. जब पौधे 15 सेंटीमीटर ऊंचे हो जाएं (28 दिन) तो रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं.

रोपाई?: टमाटर की अच्छी उपज लेने के लिए 80 सेंटीमीटर चौड़ी उठी हुई क्यारी बना कर क्यारी के दोनों छोरों पर 45 से 60 सेंटीमीटर की दूरी पर पौधे लगाने

चाहिए. पानी देने के लिए 2 क्यारियों के बीच 45 से 60 सेंटीमीटर चौड़ी नाली बनानी चाहिए.

खाद व उर्वरक : गोबर की खाद 25 से 30 टन प्रति हेक्टेयर, अमोनियम सल्फेट 300 से 400 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर, सुपर फास्फेट 360 से 400 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर, पोटेशियम सल्फेट 60 से 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर, सूक्ष्म तत्त्व मिश्रण 3 से 5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर.

पूरी मात्रा में गोबर की खाद व आधी मात्रा में अमोनियम सल्फेट, सुपर फास्फेट व पोटेशियम सल्फेट को अच्छी तरह मिला कर के पौधों की रोपाई से पहले बनाई गई नालियों में बराबर मात्रा में डाल कर 10 से 15 सेंटीमीटर गहराई तक अच्छी तरह मिलाना चाहिए. उर्वरकों की बाकी मात्रा फूल निकलने से पहले नाली में डाल कर जड़ों पर मिट्टी चढ़ानी चाहिए.

सिंचाई : टमाटर में हलकी व नियमित सिंचाई की जरूरत होती है, इसलिए बूंददार सिंचाई के तरीके को अपनाने से उपज ज्यादा मिलती है व पानी की भी बचत होती है. खुली सिंचाई हमेशा नाली में ही करनी चाहिए.

निराईगुड़ाई : खरपतवारों को खत्म करने के लिए लगातार निराई व गुड़ाई करना जरूरी होता है. सहारा लगाना : लगातार बढ़ने वाली किस्मों से ज्यादा उत्पादन लेने के लिए पौधे को तार के सहारे ऊपर चढ़ाना जरूरी होता है.

सहारा लगाने से उत्पादन का खर्च बढ़ जाता है, लेकिन पौधे की बढ़वार अच्छी होती है. फल बड़े आकार के व ज्यादा लगते हैं. फलस्वरूप प्रति हेक्टेयर उपज ज्यादा मिलती है.

कीटों व रोगों की रोकथाम

फल छेदक : इस कीट के लार्वे अंदर से फलों को खाते रहते हैं, जिस से फल सड़ जाते हैं. रोकथाम के लिए कीट लगे फलों को

जमीन में गाड़ देना चाहिए व मेलाथियान (0.05 फीसदी) का छिड़काव 10 से 12 दिनों के अंतर पर 3 बार करना चाहिए.

जैसिड व सफेद मक्खी : ये पत्तियों का रस चूस कर नुकसान पहुंचाते हैं. रोकथाम के लिए मेटासिस्टाक्स या रोगोर (0.05 फीसदी) का छिड़काव करना चाहिए.

आर्द्र गलन : पौधों के तने जमीन की सतह से सड़ जाते हैं. रोकथाम के लिए बीजों को थीरम, केप्टान या बाविस्टीन की 2 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें, नालियों में ट्राईगोड्रमा गोबर की खाद के साथ मिला कर दें.

पत्तियों का विषाणु रोग : इस के असर से पत्तियां छोटी हो कर मुड़ जाती हैं, जिस से पौधों की बढ़वार रुक जाती है. रोकथाम के लिए पौधें एंटी वायरस जाली से ढक कर तैयार करने चाहिए.

समयसमय पर कीटनाशी दवा का छिड़काव करना चाहिए. कीट लगे पौधों को नष्ट कर के नीम कीटनाशी दवा का छिड़काव करना चाहिए.

फलों की तोड़ाई व उपज : फलों को बाहर भेजने के लिए पीले होने पर व आसपास के बाजार में भेजने के लिए लाल होने पर तोड़ना चाहिए. उन्नत किस्मों की उपज 300 से 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर व संकर किस्मों की 600 से 700 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो जाती है.   खूबसूरत, सख्त और चटक लाल रंग के टमाटर को आननफानन में खाना तो आसान है, मगर उस का उत्पादन उतना आसान नहीं है. टमाटर की खेती के लिए लगन व मेहनत जरूरी है.             

टमाटर उत्पादक शंकर

भाई को बनाना चाहता है सौफ्टवेयर इंजीनियर

शंकर सिरोही जिले के आदिवासी गांव मुंगथला का रहने वाला एक गरीब किसान है. शुरुआत में पानी की कमी व छोटी जोत के कारण शंकर के परिवार का गुजरबसर भी बहुत मुश्किल से हो रहा?था. उसी दौरान शंकर बड़े किसानों से जमीन भाड़े पर ले कर टमाटर की खेती करने लगा. इस के बाद उस ने कृषि विशेषज्ञों की सलाह व अच्छे टमाटर उत्पादकों की राय ले कर टमाटर की खेती शुरू की और कुछ ही समय में वह टमाटर उत्पादन का अग्रणी किसान बन गया.

आज शंकर टमाटर उत्पादन की उन्नत तकनीक के जरीए भरपूर मात्रा में टमाटरों का उत्पादन कर रहा है और आसपास की बड़ी मंडियों में टमाटर की सप्लाई कर के अच्छा मुनाफा कमा रहा?है. टमाटर की खेती से शंकर के परिवार के सभी सदस्यों को रोजगार मिला है और आसपास के किसानों को?भी?छोटा रोजगार प्राप्त हुआ?है. होने वाली आमदनी से शंकर अपने छोटे भाई को सौफ्टवेयर इंजीनियर की शिक्षा दिलवा रहा है. आज वह अपने परिवार का पूरा खर्च आसानी से उठा रहा है. उस के दोनों बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ रहे हैं. आज शंकर द्वारा अपनाए खेती के नए तरीकों के कारण वह और उस के घर वाले खुशहाल जीवन बिता रहे हैं.

फसल  बोआई का समय पौध रोपाई     फलन

खरीफ जुलाईअगस्त    अगस्तसितंबर   अक्तूबरदिसंबर

रबी    नवंबरदिसंबर    जनवरीफरवरी   मार्च मई

शादी के 2-3 साल तक हम बच्चा नहीं चाहते. इस के लिए क्या मुझे कोई गर्भनिरोधक गोली लेनी चाहिए.

सवाल

मैं 20 वर्षीय युवती हूं और 2 महीने बाद मेरी शादी होने वाली है. शादी के 2-3 साल तक हम बच्चा नहीं चाहते. इस के लिए क्या मुझे कोई गर्भनिरोधक गोली लेनी चाहिए. मैं ने कहीं पढ़ा है कि ‘बी गैप’ गोली लेने के बाद 6 महीने तक गर्भ ठहरने का खतरा नहीं रहता. मैं जानना चाहती हूं कि क्या यह गोली सुरक्षित है और क्या मुझे इस का सेवन करने से पहले किसी लेडी डाक्टर से परामर्श लेना चाहिए?

जवाब

आप की उम्र अभी कम है, इसलिए आप का यह निर्णय कि कुछ सालों तक परिवार नियोजन का पालन किया जाए, बिलकुल सही है. आप किसी स्त्रीरोग विशेषज्ञा से परामर्श लें. वे आप को बता देंगी कि आप को कौन सा गर्भनिरोधक उपाय अपनाना चाहिए.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

ट्रैक्टर की सही देखभाल

खासीयतों से भरपूर ट्रैक्टर खेती के लिए बहुत जरूरी है. कृषि में काम आने वाले तमाम यंत्रों को ट्रैक्टर के साथ जोड़ कर चलाया जाता?है. ट्रैक्टर के अगले व पिछले हिस्से में लगने वाले तमाम कृषि यंत्रों से जुताई, बोआई, मड़ाई, फसल की रोपाई फसल कटाई के साथ ही फसल की ढुलाई व सिंचाई का काम भी लिया जाता?है.

खेती में इस्तेमाल किए जाने वाले यंत्रों की उपयोगिता के अनुसार कई मौडलों के?ट्रैक्टरों का इस्तेमाल किया जाता?है, जिन की ताकत हौर्सपावर से आंकी जाती?है. खेती के लिए कल्टीवेटर, हैरो, रोटावेटर, रोटरी, ट्रिलर, प्लाऊ, सहित अनेक यंत्रों को काम के अनुसार ट्रैक्टर से जोड़ कर इस्तेमाल किया जाता है. इस के अलावा फसल के बोआई, मड़ाई, रोपाई व सिंचाई के लिए भी कई तरह के यंत्र इस्तेमाल में लाए जाते?हैं.

चूंकि ट्रैक्टर का इस्तेमाल हमेशा मिट्टी व पानी में किया जाता?है और इस में ज्यादातर पुर्जे घूमने वाले होते?हैं, इसलिए इन के कलपुर्जो व इस से चलने वाले यंत्रों की साफसफाई पर ध्यान देने से यंत्रों की उम्र बढ़ जाती?है. ट्रैक्टर का इस्तेमाल करने वाले किसानों को चाहिए कि वे अपने?ट्रैक्टर की देखभाल करते रहें, इस के लिए उन्हें निम्नलिखित सावधानियों की जरूरत पड़ेगी :

सर्विस : ट्रैक्टर द्वारा लिए जाने वाले कृषि कार्यों में किसी तरह की समस्या न आए इस के लिए यह जरूरी हो जाता?है कि ट्रैक्टर की समयसमय पर सर्विस कराई जाती रहे. एसपीआटोमोबाइल्स बस्ती के मालिक अखिलेश दूबे का कहना?है कि ट्रैक्टर से लंबे समय तक काम लेने के लिए हमें इंजन आयल की जांच करते रहना चाहिए और इंजन को?ठंडा करने के लिए उपयोग में लाए जाने वाले कूलैंट के स्तर की भी जांच करते रहना चाहिए. अगर किसान को लगता है कि कूलैंट की मात्रा कम तो उस मात्रा को समय से पूरा करते रहें. इस के अलावा आगे की एक्सेल व पिछली बैरिंग पर ग्रीस लगा कर चिकना करते रहना जरूरी?है, जिस से ट्रैक्टर में किसी तरह की समस्या न आए.

अखिलेश दूबे के मुताबिक ट्रैक्टर की सर्विस के लिए जिस कंपनी का ट्रैक्टर इस्तेमाल कर रहे?हैं, उस कंपनी के सर्विस सेंटर पर ही सर्विसिंग करानी चाहिए, क्योंकि वहां एक्सपर्ट मैकेनिकों द्वारा ट्रैक्टर की पूरी तरह से जांचपड़ताल के बाद ही सर्विसिंग की जाती?है. वे ट्रैक्टर के हाइड्रोलिक सिस्टम की जांच, बैटरी की जांच, टायरों में हवा के स्तर की जांच क्लच व ब्रेक पैडल की जांच करने के साथ ही?ढीले नटबोल्ट्स को कस कर ट्रैक्टर की कमियों को दूर कर देते?हैं. किसी भी ट्रैक्टर के लिए यह जरूरी हो जाता?है कि इंजन आयल और फिल्टर को बदला जाए. इस के अलावा एयर क्लीनिक की सर्विस करने के साथ ही इंजन आयल व अन्य जरूरी चीजों को सही किया जाता है.

अगर किसान को ट्रैक्टर से खेती करते समय किसी तरह की संचालन समस्या का सामना करना पड़ता?है, तो उस में लापरवाही न बरत कर तुरंत ही ठीक किए जाने का प्रयास करना चाहिए, ताकि इंजन या ट्रैक्टर के किसी कलपुर्जे को कोई नुकसान न पहुंचे.

ईंधन बचाव के अपनाएं तरीके : खेती के कामों में ट्रैक्टर का इस्तेमाल  करते समय सही रखरखाव व दिशानिर्देशों को अपना कर 25 फीसदी तक डीजल की बचत कर सकते?हैं. इस के लिए सब से पहले हम को यह देख लेना चाहिए कि ट्रैक्टर की फ्यूल टंकी, फ्यूल पंप व फ्यूल इंजेक्टर से किसी तरह का रिसाव न हो रहा हो, क्योंकि प्रति सेंकेंड 1 बूंद रिसाव से साल भर में तकरीबन 2000 लीटर डीजल की बरबादी होती है.

एसपी आटोमोबाइल व जानडियर ट्रैक्टर के सर्विस सेंटर से जुड़े सुनील सिंह का कहना?है कि जब भी आप किसी जगह पर रूकें तो इंजन को बंद कर देना चाहिए,?क्योंकि ट्रैक्टर को चालू हालत में रखने में प्रति घंटे 1 लीटर से अधिक का नुकसान होता है. इस के अलावा डीजल की बचत के लिए ट्रैक्टर को हमेशा सही गियर में ही चलाना चाहिए. अगर ट्रैक्टर से अधिक धुंआ निकल रहा है, तो यह समझ लेना चाहिए कि?ट्रैक्टर ओवरलोडिंग का शिकार?है इसलिए यह ध्यान रखना चाहिए कि ट्रैक्टर की कूवत से ज्यादा बड़े साइज वाले कृषि यंत्रों का इस्तेमाल न किया जाए. इस के बावजूद ट्रैक्टर से लगातार धुंआ निकल रहा है, तो ट्रैक्टर के सर्विस सेंटर से?ट्रैक्टर के नोजल्स व इंजेक्शन पंप की जांच करानी चािहए.

सुनील सिंह के मुताबिक ट्रैक्टर में हमेशा अच्छे एयर फिल्टर का इस्तेमाल करना चाहिए,?क्योंकि ट्रैक्टर में आने वाले धूल व मिट्टी के कण ट्रैक्टर के इंजन को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिस से ट्रैक्टर के पिस्टन, रिंग्स और सिलेंडर बोर्स जल्दी खराब होते?हैं. ट्रैक्टर में हमेशा अच्छी क्वालिटी वाले डीजल का इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि गंदे डीजल से डीजल की खपत ज्यादा होती है.

जानडियर ट्रैक्टर से जुड़े सर्विस मैन बैजनाथ का कहना?है कि हमें ट्रैक्टर के इस्तेमाल के समय ईंधन की बचत पर हमेशा सतर्क रहना चाहिए. इस के लिए यह ध्यान देना चाहिए कि?टायरों में जरूरत से?ज्यादा दबाव न हो या टायर घिसे हुए न हों,?क्योंकि इस से पहिए फिसलने लगते हैं और ईंधन की ज्यादा बरबादी होती?है. साथ ही अगर हम ट्रैक्टर के साथ धुलाई के लिए ट्रौली का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो यह ध्यान देना चाहिए कि वह कभी भी ओवरलोड न हो. इस के अलावा क्लच पैडल, फ्री न होने के कारण भी स्लिप होता है, जिस से यह समय से पहले खराब हो जाता?है और ईंधन की बरबादी होती है. इन बातों पर ध्यान दे कर हम अपने?ट्रैक्टर पर होने वाले ईंधन खर्च में कमी ला सकते?हैं.

अच्छी ड्राइविंग की डालें आदत : ट्रैक्टर को लंबे समय तक किसी खराबी से बचाने के लिए अच्छे ड्राइवर की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि अच्छी ड्राइविंग भी ट्रैक्टर के कलपूर्जे व इंजन को खराब होने से बचाती?है. इसलिए जब भी ट्रैक्टर की ड्राइविंग कर रहे हों तो यह ध्यान दें कि ट्रैक्टर हमेशा न्यूट्रल गियर में हो तभी चालू करें. इस के पहले यह तय कर लें कि ट्रैक्टर के साथ जुड़े उपकरणों के आसपास कोई भी व्यक्ति मौजूद नहीं?है. ट्रैक्टर को चालू हालत में?छोड़ कर कभी भी ड्राइविंग सीट नहीं छोड़नी चाहिए.?ट्रैक्टर को कभी लहराते हुए नहीं चलाना चाहिए क्योंकि इस से दुर्घटना हो सकती है.

मैकेनिक विजय मिश्र का कहना?है कि हमें ट्रैक्टर के साथ जोड़ कर खेती के काम में लाए जाने वाले उपकरणों का रखरखाव भी सही तरीके से करना चाहिए,?क्योंकि ट्रैक्टर के साथ जुड़ कर चलने वाले कृषि यंत्र में खराबी भी ट्रैक्टर के ऊपर बुरा प्रभाव डालती है. हम ट्रैक्टर से जुड़ी छोटीछोटी सावधानियों को अपना कर न केवल ट्रैक्टर की सुरक्षा कर सकते?हैं, बल्कि उस पर आने वाले खर्च से भी बच सकते हैं. ट्रैक्टर के रखरखाव के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए जानडियर ट्रैक्टर व एसपी आटोमोबाइल्स बस्ती से जुड़े सुनील सिंह, बैजनाथ, विजय मिश्र के मोबाइल नंबरों 9413628656, 9415858818, 9839520955 पर संपर्क कर सकते हैं.

टमाटर की फसल का कीड़ों से बचाव

भारत में टमाटर  की फसल को साल भर उगाया जा सकता है. यह सब्जी की महत्त्वपूर्ण फसल है. इस के बिनरा सब्जी अधूरी मानी जाती है. इस में विटामिन बी व सी की मात्रा ज्यादा होती है. टमाटर का इस्तेमाल सब्जियों के साथ पका कर किया जाता है. इस के अलावा सूप, सौस, चटनी, अचार बनाने व सलाद में किया जाता है. टमाटर की फसल से किसानों को अच्छी आमदनी हो जाती है. टमाटर में फलभेदक, तंबाकू की सूंड़ी, सफेद मक्खी, पर्ण सुरंगक कीड़ा, चेंपा माहू वगैरह कीड़े लग जाते हैं.

फलभेदक कीड़ा : यह पीलेभूरे रंग का होता है. अगले पंखों पर भूरे रंग की कई धारियां होती हैं व इन पर सेम के आकार के काले धब्बे पाए जाते हैं, जबकि निचले पंखों का रंग सफेद होता है, जिन की शिराएं काली दिखाई देती हैं और बाहरी किनारों पर चौड़ा धब्बा होता है. इस कीट की मादा पत्तियों की निचली सतह पर हलकेपीले रंग के खरबूजे की तरह धारियों वाले अंडे देती है. 1 मादा अपने जीवनकाल में लगभग 500 से 1000 तक अंडे देती है. ये अंडे 3 से 10 दिनों के अंदर फूट जाते हैं.

नुकसान की पहचान : सूंडि़यां पत्तियों, मुलायम तनों व फूलों को खाती हैं. ये बाद में कच्चे व पके टमाटर के फलों में छेद कर के उन के अंदर का गूदा खा जाती हैं. ऐसे टमाटर खाने लायक नहीं रहते हैं. कीड़े के मलमूत्र के कारण उस में सड़न शुरू हो जाती है, जिस से फलों की कीड़ों से लड़ने की ताकत कम हो जाती है. ऐसे फलों का भाव कम हो जाता है. इस कीड़े के लगने से करीब 50 फीसदी फसल खराब हो जाती है.

रोकथाम : जाल फसल के लिए टमाटर रोपाई से 10 दिन पहले गेंदा की एक लाइन टमाटर की हर 14 लाइन के बाद लगानी चाहिए. खेत में 20 फेरोमोन जाल प्रति हेक्टेयर की दर से लगाएं.

खेत में पक्षियों के बैठने के लिए 10 स्टैंड प्रति हेक्टेयर के अनुसार लगाएं. कीड़े के लगते ही अंड परजीवी ट्राइकोग्रामा ब्रेसीलिएंसिस (ट्राइकोकार्ड) के 10,0000 अंडे प्रति हेक्टेयर हर हफ्ते की दर से 5-6 बार छोड़ने चाहिए.

सूंड़ी की पहली अवस्था दिखाई देते ही 250 एलई का एचएएनपीवी को एक किलोग्राम गुड़ व 0.1 फीसदी टीपोल के घोल का प्रति हेक्टेयर की दर से 10-12 दिनों के अंतर पर छिड़काव करें. इस के अलावा 1 किलोग्राम बीटी प्रति हेक्टेयर इस्तेमाल करें व उस के बाद 5 फीसदी एनएसकेई का छिड़काव करें. प्रकोप बढ़ने पर क्विनालफास 25 ईसी या क्लोरोपाइरीफास 20 ईसी का 2 मिलीमीटर प्रति लीटर या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल का 1 मिलीमीटर प्रति लीटर की दर से छिड़काव करें.

स्पाइनोसैड 45 एससी, इंडोक्साकार्ब व थायोमेंक्जाम 70 डब्ल्यूएससी की 1 मिलीमीटर प्रति लीटर की दर से इस्तेमाल करें.

तंबाकू की सूंड़ी : इस के पतंगे भूरे रंग के होते हैं व ऊपरी पंख कत्थई रंग का होता है, जिस पर सफेद लहरदार धारियां पाई जाती हैं. इस के पिछले पंख सफेद रंग के होते हैं. मादा पत्तियों की निचली सतह पर लगभग 250 से 300 अंडे झुंड में देती है, जो भूरे रंग के रोएं से ढके रहते हैं. ये रोएं मादा के पेट से गिर जाते हैं. इन अंडों से 3 से 5 दिनों में पीलापन लिए हुए गहरे हरे रंग की सूंडि़यां निकलती हैं.

नुकसान की पहचान : ये सूंडि़यां नुकसानदायक होती हैं. शुरू में सूंडि़यां झुंड बना कर पत्तियों को खाती हैं, जो अपने काटने व चबाने वाले मुखांगों से पौधों की पत्तियों को काट कर नुकसान पहुंचाती हैं. इस के अलावा इस कीड़े की सूंडि़यां पौधे की शिराओं, बीच की शिरा और डंठल व पौधे की कोमल टहनियों को भी खा जाती हैं. कभीकभी ये रात के समय बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाती हैं. इस की सूंडि़यां पत्तियों को खा जाती हैं, जिस से पौधे ठूंठ रह जाते हैं. टमाटर के अलावा इस का प्रकोप फूलगोभी, तंबाकू, टमाटर व चना वगैरह पर पाया जाता है.

रोकथाम : सूंड़ी के गुच्छों को हाथ से पत्ती समेत तोड़ कर खत्म कर देना चाहिए.

खेत में 20 फेरोमोन ट्रैप प्रति हेक्टेयर की दर से लगाएं.

खेत में चारों ओर अरंडी की फसल की बोआई करें.

ट्राइकोग्रामा कीलोनिस 1.5 लाख प्रति हेक्टेयर या किलोनिस ब्लैकबर्नी या टेलिनोमस रिमस के 1,00,000 अंडे प्रति हेक्टेयर 1 हफ्ते के अंतर पर छोड़ें.

पूर्ण विकसित सूंडि़यों पर टेकेनिड मक्खी, स्टरनिया एक्वालिस व चिवंथेमियो, परजीवी का इस्तेमाल करें.

एजेंटेलिस प्रोडीनी इस की सूंडि़यों का परजीवी है.

5 किलोग्राम धान का भूसा, 1 किलोग्राम शीरा, 0.5 किलोग्राम कार्बरिल को मिला कर पतंगों को आकर्षित करें.

एसएलएनपीवी 250 एलई का प्रति हेक्टेयर की दर से 8-10 दिनों के अंतर पर छिड़काव करें.

1 किलोग्राम बीटी का प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

फसल में जहर चारा 12.5 किलोग्राम राईसबीन, 1.25 किलोग्राम जगेरी, कार्बेरिल 50 फीसदी डब्ल्यूपी 1.25 किलोग्राम 7.5 लीटर पानी के घोल का शाम के समय छिड़काव करें जिस से जमीन से सूंड़ी निकल कर जहर चारा खा कर मर जाएंगी.

सूंडि़यों के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल एसिटामिप्रिड क्लोरोपायरीड या थायोमेक्जाम की 1.0 मिलीमीटर मात्रा प्रति लीटर की दर से प्रयोग करें.

पत्ती का फुदका : इस कीड़े का रंग हरा भूरा स्लेटी हरा होता है. यह हलकी सी आहट से उड़ जाता है. इस कीड़े की मादा सुबह या रात को पत्तियों की नसों में 15-25 अंडे देती है. ये अंडे 4 से 11 दिनों में फूट जाते हैं और इन से छोटेछोटे फुदके निकलते हैं.

नुकसान की पहचान : फुदके के जवान व निम्फ दोनों ही पत्तियों का रस चूसते हैं और पौधों को काफी नुकसान पहुंचाते हैं, जिस से पौधों की पत्तियां पीली पड़ जाती हैं. बाद में भूरी हो कर सूख जाती हैं. कुछ समय बाद पौधे भी सूख जाते हैं. यह नुकसान कीट की जहरीली लार के कारण होता है.

रोकथाम : जरूरी मात्रा में खादों का इस्तेमाल करना चाहिए.

कीड़ों का प्रकोप होने पर यूरिया का इस्तेमाल रोक देना चाहिए.

फसल के ऊपर मिथाइल डिमेटोन 25 ईसी या डाईमेथोएट 30 ईसी का 600 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएलसी की 1.0 मिलीलीटर मात्रा का प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

सफेद मक्खी : इस कीड़े के निम्फ जूं की तरह मूलायम, पीले, धुंधले व सफेद होते हैं. निम्फ व जवान दोनों ही पत्ती की निचली सतह पर बैठना पसंद करते हैं. ये कीड़े पूरे साल फसल को नुकसान पहुंचाते हैं. लेकिन सर्दियों में इन का प्रकोप ज्यादा रहता है. इन के शरीर पर सफेद मोम जैसी परत पाई जाती है. मादा मक्खी पत्तियों की निचली सतह पर 100 से 150 तक अंडे देती है. निम्फ अवस्था 81 दिनों में पूरी हो जाती है.

नुकसान की पहचान : इस का प्रकोप पूरे साल फसल के समय में बना रहता है, साथ ही दूसरी फसलों पर पूरे साल इस का प्रकोप पाया जाता है. निम्फ व जवान पत्तियों की निचली सतह पर झुंड में पाए जाते हैं, जो पत्तियों की कोशिकाओं से रस चूसते हैं, जिस से पौधे की बढ़वार रुक जाती है. इस के अलावा ये वायरस से पैदा होने वाला रोग फैलाते हैं, जिस से पत्तियां कमजोर हो जाती हैं और हरियाली खत्म होने के कारण गिर जाती हैं.

रोकथाम : फसल देर से न बोएं व सही फसलचक्र अपनाएं. 1 साल में 1 ही बार कपास की फसल बोएं.

परपोषी फसलें जैसे टमाटर व अरंडी बीच में लगाएं.

पीले चिपचिपे 12 ट्रैप प्रति हेक्टेयर के हिसाब से इस्तेमाल करें.

काइसोपरला कार्निया के 50, 000 से 10,0000 अंडे प्रति हेक्टेयर की दर से छोड़ें.

कीड़े लगे पौधों पर नीम का तेल 5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें या मछली रोसिन सोप का 25 मिलीग्राम प्रति लीटर की दर से पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

कीट की संख्या ऊपर जाते ही मेटासिस्टाक्स 25 ईसी या डाइमिथोएट 30 ईसी 1 मिलीमीटर प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें.

इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल या थायोमेक्जाम 25 ईसी 1 मिलीमीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें.

माहू या चेपा : इस कीट को आलू का माहू भी कहते हैं. यह गहरे हरे काले रंग का होता है. माहू के निम्फ छोटे व काले होते हैं व झुंड में पाए जाते हैं. वयस्क अवस्था 2 प्रकार की होती है, पंखदार व पंखहीन. इन का आकार लगभग 2 मिलीमीटर होता है. इन के पेट पर 2 मधुनलिकाएं होती हैं, जिन्हें कूणिकाएं कहते हैं. निम्फ की अवस्था 7 से 9 दिनों तक रहती?है. हरापन लिए वयस्क 2-3 हफ्ते तक जिंदा रहते हैं व प्रतिदिन 8 से 22 बच्चे पैदा करते हैं. इस का प्रकोप दिसंबर से मार्च तक ज्यादा होता है.

नुकसान की पहचान : इस के निम्फ व वयस्क पत्ती, पुष्प डंठल व

पुष्प वृंत से रस चूसते हैं, जिस से पत्तियां किनारों से मुड़ जाती हैं व कीड़े की पंखदार जाति टमाटर में वायरस से पैदा होने वाला रोग भी फैलाती है. ये चिपचिपा मधुरस अपने शरीर के बाहर निकालते हैं, जिस से पत्तियों के ऊपर काली फफूंद देखी जा सकती है, जिस से

पौधों की प्रकाश संश्लेषण क्रिया पर बुरा असर पड़ता है.

रोकथाम : माहू का प्रकोप होने पर पीले चिपचिपे जाल को इस्तेमाल करें जिस से माहू ट्रैप पर चिपक कर मर जाएं.

परभक्षी काक्सीनेलिड्स या सिरफिड या क्राइसोपरला कार्निया का प्रयोग कर 50,000 से 10,0000 अंडे या सूंड़ी प्रति हेक्टेयर की दर से छोड़ें.

नीम का अर्क 5 फीसदी या 1.25 लीटर नीम का तेल 100 लीटर पानी में मिला कर छिड़कें.

बीटी का 1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

आवश्यकता होने पर इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल या डाइमिथोएट 30 ईसी या मिथाइल डेमीटान 25 ईसी 1 लीटर का प्रति हेक्टेयर छिड़काव करना चाहिए.

पत्ती का सुरंग कीड़ा : इस कीड़े के मैगट ही मुख्य रूप से नुकसान पहुंचाते हैं. वयस्क मादा पत्तियों में छेद कर के अंडे देती है, जिन से 2-3 दिनों बाद मैगट निकल कर पत्तियों में सफेद टेढ़ीमेढ़ी सुरंगें बना कर पत्तियों के हरे भागों को खा कर नष्ट कर देते हैं.

पुराने पत्तों में सफेद लंबी गोलाकार सुरंगें देखी जा सकती हैं, जबकि नए पत्तों में ये सुरंगें छोटी व पतली होती हैं. इस के प्यूपा भूरेपीले रंग के होते हैं. इस के प्रकोप से पत्तियां मुरझा कर सूख जाती हैं.

रोकथाम : इस से बचाव के लिए

4 फीसदी नीम गिरी चूर्ण का पानी में घोल बना कर छिड़काव करें. इस के अलावा निंबीसिडीन 1 से 2 लीटर प्रति हेक्टेयर या लहसुन

7 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या कानफिडेर

0.3 मिलीमीटर या इंडोसल्फान 2 मिलीमीटर का प्रति लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करने से भी इस से बचाव हो जाता है.

इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल स्पाइनोसेड 45 एससी या थायोमेथ्योम्जाम 70 डब्ल्यूएस की 1 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर की दर से प्रयोग करें.

जड़गांठ नेमाटोड : वयस्क मादा नाशपाती के आकार की गोल होती है. इस का अगला भाग पतला और अलग सा मालूम होता है. एक मादा लगभग 250 से 300 अंडे देती है. अंडों के अंदर ही डिंभक पहली अवस्था पार करते हैं. इन से जो द्वितीय अवस्था के डिंभक बनते हैं, वे मिट्टी के कणों बीच रेंगते रहते हैं और जड़ों  से चिपक जाते हैं.

परपोषी के अंदर डिंभक में 3 निर्मोचन और होते हैं. नेमाटोड की शोषण क्रिया से पौधे के नए उत्तकों में तेजी से विभाजन होता है, उन की कोशिकाओं का आकार बढ़ जाता है और इस प्रकार ग्रंथियों का जन्म होता है. इन्हीं ग्रंथियों के अंदर नेमाटोड एक फसल से दूसरी फसल तक जीवित रह कर हमला करता है.

नुकसान की पहचान : इस नेमाटोड के असर से जड़गांठ रोग पैदा होता है. इस के लगने से पौधे मरते नहीं बल्कि गांठों पर कई रोग पैदा करने वाले और मृतजीवी कवकों व जीवाणुओं के आक्रमण से संपूर्ण जड़ सड़ जाती है. पौधों में गलने के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं, जिस से पौधे की बढ़वार रुक जाती है, पत्तियां छोटी व पीली पड़ जाती हैं. फल बहुत कम लगते हैं और कभीकभी पौधे सूख भी जाते हैं.

रोकथाम : परपोषी फसलों को लगातार एक ही खेत में उगाने से नेमाटोड की संख्या बढ़ती है, इसलिए सही फसलचक्र अपना कर इस का प्रकोप कम किया जा सकता है.

गरमियों में खेत की 2-3 बार गहरी जुताई कर के मिट्टी को अच्छी तरह सूखने से डिंभक मर जाते हैं.

नेमाटोड का अधिक प्रकोप होने पर नेमाटोडनाशी का प्रयोग करना चाहिए. इस के लिए डीडी 300 लीटर, निमेगान 18 लीटर या फ्यूराडान 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से फसल रोपने के 3 हफ्ते पहले जमीन पर डालना चाहिए.

प्रतिरोधी प्रजातियों का इस्तेमाल करना चाहिए.

मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों के मिलने से भी इस नेमाटोड की रोकथाम में काफी मदद मिलती है. लकड़ी का बुरादा, नीम या अरंडी की खली 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से फसल लगाने से 3 हफ्ते पहले खेत में मिलाने पर जड़गांठ की संख्या में काफी कमी देखी जा सकती है.

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