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VIDEO: यहां ससुराल वाले करते हैं अपनी बहू के जिस्म का सौदा

क्या आप सोच सकते हैं कि कोई माता पिता बचपन से ही अपने बच्चों को जिस्म बेचने के लिए तैयार करते होंगे. क्या आप सोच सकते हैं कि कोई दाम देकर दुल्हन इसलिये खरीदेगा, ताकि उससे वेश्यावृत्ति कराई जा सके. वो भी ये सब देश की राजधानी दिल्लीमें. महिला अधिकारों की जंग से दूर, यहीं दिल्ली की कुछ महिलाओं को बचपन से ही घर चलाने के लिए जिस्म बेचना सिखाया जाता है. दाम देकर दुल्हनें खरीदी जाती हैं और उन्हें वेश्यावृत्ति के दलदल में झोंका जाता है.

इसी देश की राजधानी में एक बस्ती में रहने वाली लड़किया और महिलाएं आज तक गुलाम हैं. वो न अधिकार जानती हैं, और न ही इन्हें उपलब्धियां, और न ही स्वतंत्रता की परिभाषा पता है. इनके पैदा होते ही इनके भविष्य का फैसला सुना दिया जाता है. और सिखाया जाता है कि घर चलाने के लिए सिर्फ एक चीज ही आनी चाहिए, वो है जिस्म बेचना.

इन महिलाओं की व्यथा इन्हीं की जुबानी आप भी देख सकते हैं.

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अपनी बहू के लिए ‘ग्राहक’ तलाशते ससुराल वाले! कौन हैं ये…

प्राचीन भारत में महिलाओं की स्थिति बेहद दयनीय थी. महिलाओं को परम्पराओं के नाम पर तरह-तरह की प्रथाओं, जैसे बाल विवाह, सती, जौहर, पर्दा, देवदासी आदि प्रथाओं हवाले कर दिया जाता था. आधुनिक भारत में सती, जौहर और देवदासी जैसी परंपराओं पर प्रतिबंध लगने से ये काफ़ी हद तक समाप्त हो चुकी हैं. हालांकि आज भी भारत के कुछ ग्रामीण इलाकों में इन प्रथाओं से जुड़े मामले देखने को मिल जाते हैं.

आधुनिक भारत में महिलाएं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोक सभा अध्यक्ष, प्रतिपक्ष की नेता आदि जैसे शीर्ष पदों पर आसीन हुई हैं. लेकिन वर्तमान स्थिति को देखते हुए आप ये सोच सकते हैं कि कोई माता-पिता बचपन से ही अपनी बेटी का पालन-पोषण ये सोच कर करते होंगे कि भविष्य में उसको बेचना है, या कोई शादी करने की बजाये दुल्हन खरीदता होगा ताकि भविष्य में उससे वेश्यावृत्ति करा सके? है ना ये हैरान करने वाली बात? लेकिन ये बात एकदम सच है और इतना ही नहीं ये सब हो रहा है देश की राजधानी दिल्ली में.

देश की राजधानी दिल्ली के नजफगढ़ की प्रेमनगर बस्ती में रहने वाली महिलाएं आज तक गुलाम हैं. इस बस्ती में रहने वाले ‘परना समुदाय’ के लोगों की रोजी-रोटी सदियों से वेश्यावृत्ति के धंधे से ही चलती आ रही है. यहां पुरुष आराम करते हैं, और महिलाएं काम. इस बस्ती में लड़कियों को बचपन से इस तरह तैयार किया जाता कि आगे चलकर उनको वेश्यावृत्ति के दलदल में झोंका जा सके. यहां दाम देकर दुल्हनें खरीदी और बेची जाती हैं.

कितनी अजीब बात है कि माता-पिता खुद अपने घर की लड़कियों को इस धंधे में झोंक देते हैं. यहां लड़कियों को पढ़ाया नहीं जाता, बल्कि उनके सपनों को बचपन में ही रौंद दिया जाता है. 12-13 साल की उम्र में ही लड़कियों के मां-बाप उनका सौदा कर देते हैं. यहां लड़कियों को पैदा होते ही उनके भविष्य का फैसला सुना दिया जाता है. इस काम की ट्रेनिंग के लिए लड़कियों को दलालों को सौंप दिया जाता है, जो इन्हें वेश्यालयों में बैठा देते हैं. जहां बंधुआ मजदूरों की तरह इनसे काम लिया जाता है. चंद रुपयों के लिए इन लड़कियों का हर रोज कई-कई बार बलात्कार किया जाता है.

न लोगों को बेटियों की शादी की कोई चिंता नहीं होती है, क्योंकि शादी के लिए इनको पैसे खर्च नहीं करने पड़ते बल्कि लड़के वाले अच्छे दाम देकर इनकी लड़की को खरीदते हैं. ये शादी नहीं बल्कि एक सौदा होता है, जितने में भी सौदा पटे यानि लाख, 2 लाख या 5 लाख उतना अच्छा होता है इनके लिए. शादी के नाम पर लड़की को बेच दिया जाता है. लड़की के ससुराल वाले खुद अपनी ही बहु के लिए ग्राहक ढूंढने का काम करते हैं.

घर के सारे काम-धाम निपटाने के बाद रात को करीब 2 बजे ये महिलाएं अपने काम पर निकलती हैं. एक ही रात में करीब 4-5 ग्राहकों को संतुष्ट करने के बाद सुबह तक लौटती हैं. पति और बच्चों के लिए खाना बनाकर अपने हिस्से की नींद पूरी करती हैं. और ऐसा यहां कि हर महिला के साथ होता है. महिलाएं अगर कोई दूसरा काम करना भी चाहें तो ससुराल वाले उन्हें जबरदस्ती इसी पेशे में ढकेलते हैं. कोई महिला नहीं चाहती कि उसकी बेटियां बड़ी होकर इस पेशे को अपनाएं. लेकिन महिला अधिकार के नाम पर ये सिर्फ इतना जानती हैं कि उनके जीवन पर उनके परिवारवालों का ही अधिकार है और उनके साथ क्या होना है या नहीं होना है, इसका फैसला भी वही लोग करेंगे जो उन्हें खरीद कर लाए हैं. उनसे उम्मीद की जाती है कि वो एक रात में कम से कम 10 ग्राहकों को सेवा दें. चंद रुपयों के लिए इन लड़कियों का हर रोज कई कई बार बलात्कार किया जाता है.

ऐसा नहीं है कि ये इस समुदाय का पेशा है तो ये महिलाएं ऐसा जीवन जीने की आदी हो गई हैं. बहुत ही लड़कियों ने इसका विरोध करते हुए अपनी जान तक दे दी है. ये बच्चियां अपनी माओं को जाते देखती हैं, और खुद को डरा महसूस करती हैं कि उन्हें भी एक दिन जाना होगा. ये पढ़ना चाहती हैं, कोई और काम करना चाहती हैं. लेकिन 'बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ' के नारे इन गलियों तक नहीं पहुंच पाते. फिर भी जिस्म बेचकर आती कुछ औरतों की उम्मीदें कायम हैं कि उनकी बेटियों का भविष्य बेहतर होगा.

पर इन उम्मीदों को सच करने वाले लोग, धर्म, देशभक्ति और देशद्रोह की बहस से ही बाहर नहीं निकल पा रहे. लोगों को देश की फ्रिक्र है, देश की इन महिलाओं पर हो रहे द्रोह के बारे में सोच भी लेंगे तो सारे पाप धुल जाएंगे.

(वीडियो साभार: हेडलाइंस टुडे)

टेलिकॉम कंपनियों को जीने नहीं देगी जियो

भारती एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया सेल्युलर अगले कुछ हफ्ते में डेटा और कॉलिंग रेट में भारी कटौती कर सकती हैं. टेलिकॉम इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि तीनों कंपनियों के लिए उस टैरिफ वॉर का जवाब देना मजबूरी है, जो रिलायंस जियो ने शुरू की है.

एक टेलिकॉम कंपनी के सीनियर एग्जिक्युटिव ने नाम जाहिर नहीं किए जाने की शर्त पर बताया, 'कंपनियों का तात्कालिक कदम जियो के असर की स्टडी कर तेजी से इसका जवाब देना होगा.' इस इंडस्ट्री से जुड़े एक और सीनियर एग्जिक्युटिव का कहना था कि अब यह साफ हो चुका है कि इस कॉम्पिटीशन में क्वॉलिटी मायने नहीं रखती और टैरिफ का मामला हावी हो रहा है.

उनके मुताबिक, 'फिर से खेल टैरिफ पर पहुंच गया है.' उनके मुताबिक, मौजूदा टेलिकॉम कंपनियों की प्रतिक्रिया जियो के सब्सक्राइबर बेस पर निर्भर करेगी. अंबानी ने कम से कम समय में 10 करोड़ कंज्यूमर बनाने का टारगेट रखा है. उन्होंने कहा कि जियो लाइफटाइम फ्री कॉलिंग ऑफर पेश करेगी और कोई रोमिंग चार्ज भी नहीं लगेगा.

इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि मौजूदा टेलिकॉम कंपनियों का रिस्पॉन्स इस बात पर निर्भर करेगा कि जियो कितनी तेजी से कस्टमर्स अपने पाले में करती है. हालांकि, इंडस्ट्री से जुड़े एक शख्स ने इन दावों पर सवाल उठाते हुए कहा, 'क्या जियो इस क्वॉर्टर के लिए 60,000 एंप्लॉयीज का कॉस्ट वहन करेगी? और अब तक के ऑपरेशन खर्चों का भुगतान भी अपनी जेब से करेगी?'

अर्न्स्ट ऐंड यंग में ग्लोबल लीडर, टेलिकॉम प्रशांत सिंघल ने कहा, 'कंज्यूमर्स के लिहाज से यह निश्चित तौर पर अच्छा है. हालांकि, हमें यह देखना है कि यह टैरिफ कितना टिकाऊ होता है.' एयरटेल ने गुरुवार को बयान जारी कर टेलिकॉम सेक्टर में जियो की औपचारिक एंट्री का स्वागत करते हुए कहा कि उम्मीद है कि वह सभी रेग्युलेटरी जिम्मेदारियों का पालन करेगी.

जीएसएम इंडस्ट्री से जुड़ी संस्था सेल्युलर ऑपरेटर्स असोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआई) के डायरेक्टर जनरल राजन मैथ्यूज ने कहा, 'टेलिकॉम सेक्टर में मुकाबले के लिए जमीन तैयार हो चुकी है. एक तरफ रिलायंस जियो, रिलायंस कम्युनिकेशंस, एयरटेल और एमटीएस हैं, तो दूसरी तरफ भारती, वोडाफोन और आइडिया हैं.' उनका यह भी कहना था कि मौजूदा टेलिकॉम कंपनियां जियो के ऑफर का मुकाबला कर सकती हैं.

मैथ्यूज ने कहा कि जियो की तरफ ऐलान किए टैरिफ में वास्तव में फ्री वॉइस कॉलिंग नहीं है. कॉलिंग को डेटा के साथ जोड़ा गया है यानी जब वह डेटा के लिए एक जीबी का ऑफर देगी, तो इसमें वॉइस कॉलिंग फ्री होगी. इसका मतलब यह है कि उसी एक जीबी का इस्तेमाल वॉइस और डेटा दोनों के लिए किया जाएगा. आपको यह समझने की जरूरत है कि जियो जिस टेक्नॉलजी का इस्तेमाल कर रही है, उसमें नेटवर्क के जरिये डायल की गई वॉइस कॉल भी में एक जीबी डेटा की खपत होगी और बाकी का इस्तेमाल डेटा में होगा.

एक बार फिर शुरू होगा ICL!

फटाफट क्रिकेट के दौर में साल दर साल कई सारे नए टी-20 लीग की शुरूआत हो रही है. आईपीएल के बाद अब तमिलनाडु प्रीमीयर लीग (TNPL) में क्रिकेटर्स चौके छक्के की बरसात कर धमाल मचा रहे हैं. लेकिन इस बीच खबर यह है कि भारत में एक और नए लीग की शुरूआत होने वाली है.

जी हां, इस लीग का नाम है ‘इंडियन चैंपियंस लीग’ (ICL), सूत्रों की माने तो इस लीग की शुरूआत साल के अंत में या जनवरी 2017 में हो सकती है. कहा ये जा रहा है कि इस लीग की शुरूआत इंडियन बेस्ड कंपनी ‘मैगपाई ग्रुप’ के बिजनसमैन मिलकर कर रहे हैं.

लेकिन इस लीग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि फेडरेशन ऑफ इंटरनेश्नल क्रिकेट एसोसिएशन (FICA) और आईसीसी की तरफ से इस लीग को मान्यता नहीं दी गई है. फेडरेशन ऑफ इंटरनेश्नल क्रिकेट एसोसिएशन ने खिलाड़ियों को चेतावनी देते हुए साफ कहा है कि, ”इंडियन चैंपियंस लीग में खेलने वाले खिलाड़ियों के भविष्य पर नकारात्मक असर भी पड़ सकता है. आईसीसी और FICA ने इसे मान्यता नहीं दी है. लिहाजा इस लीग में आईसीसी के नियमों के आधार पर भी ये लीग गैरकानूनी है.”

आपको बता दे कि आईसीएल में अब तक 8 टीमों के हिस्सा लेने की बात सामने आई है. जिसमें दिल्ली बादशाह, इंदौर रॉकेट्स, मुंबई स्टार्स, चेन्नई वॉरियर्स, हैदराबाद राइडर्स, बैंगलोर टाइगर्स, लखनऊ सुपरस्टार्स और चंडीगढ़ हीरोज शामिल हैं.

साल 2007 में शुरू हुए इंडियन क्रिकेट लीग (ICL) से इसका कोई लेना देना नहीं है. खबरों के मुताबिक इस लीग में कई प्रमुख खिलाड़ियों के खेलने की बात सामने आ रही है जिसमें हर्शेल गिब्स, जस्टिन केंप, सनथ जयसूर्या, कामरान अकमल, शोएब मकसूद, दानिश कनेरिया, इमरान फरहत और सलमान बट जैसे बड़े नाम भी शामिल हैं.

सबसे बड़ी बात यह है कि अब तक इस लीग में किसी भारतीय क्रिकेटर के शामिल होने की बात सामने नहीं आई है, लेकिन कुछ अंडर-19 क्रिकेटर्स का अनुबंध जरूर हुआ है. इंडियन चैंपियंस लीग की ओर से इस लीग में शामिल होने की बात आ रही है. इस लीग में शामिल होने के लिए फॉर्म भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं.

फ्रीकी के कारनामे

सलमान खान और सोहेल खान बतौर निर्माता फिल्म ‘फ्रीकी अली’ ले कर आए हैं. नवाजुद्दीन सिद्दीकी अभिनीत यह फिल्म एक अंडरगारमैंट्स बेचने वाले ऐसे इंसान की कहानी है जो क्रिकेट खेलतेखेलते अपराध की दुनिया से गुजरते हुए गोल्फर बन जाता है. सोहेल खान निर्देशित इस फिल्म के ट्रेलर की बड़ी तारीफें व दावे किए जा रहे हैं लेकिन इस बात को छिपाया जा रहा है कि इस फिल्म का आइडिया हौलीवुड ऐक्टर एडम सैंडलर की मशहूर कौमेडी फिल्म ‘हैप्पी गिलमोर’ से उड़ाया गया है. फर्क इतना है कि ‘हैप्पी गिलमोर’ में एडम बेसबौल से निकल कर गोल्फ में करामात दिखाते हैं, यहां फ्रीकी अली क्रिकेट से गोल्फ में वही तुक्केबाजी से हंसा रहा है.

इंदिरा हत्याकांड और सैंसरबाजी

अकसर राजनीतिक संदर्भों पर बनी फिल्में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सीबीएफसी की कैंची तले आ कर फंस जाती हैं. कई बार कुछ बड़े कदमों के बाद फिल्में रिलीज हो जाती हैं तो कई बार सालों तक बैन रहती हैं. इंदिरा गांधी के जीवन पर आधारित तथाकथित फिल्म ‘आंधी’ को भी सैंसरबाजी का शिकार होना पड़ा था और ‘किस्सा कुरसी का’ के तो पिं्रट तक जला दिए गए थे. फिलहाल देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और उस समय की घटनाओं पर आधारित फिल्म ‘31 अक्तूबर’ भी सैंसर के गलियारों में उलझी हुई थी. लेकिन, अब खबर है कि सोहा अली खान व वीर दास अभिनीत यह फिल्म सैंसर बोर्ड के सुझाए गए 9 बडे़ कट्स के बाद रिलीज होगी. निर्माता के मुताबिक सीबीएफसी की सुधार समिति ने कई बार फिल्म जमा करवाई और फिर कट्स लगवाए. शिवाजी लोटन पाटील ने इसे निर्देशित किया है.

अपने आपको आकर्षक बनाए रखना हुआ आसान

सौन्द्रर्य प्रसाधन कंपनी ओरिफ्लेम इंडिया ने अपनी नई आकर्षक स्किन केयर प्रोडक्ट ‘नोव ऐज रेंज’ का लौंच मुंबई में किया. इस अवसर पर पिछले 5 सालों से ब्रांड एम्बेसेडर , छरहरी काया की धनी, खूबसूरत अभिनेत्री सोनाली बेंद्रे का कहना है कि यह प्रोडक्ट 50 सालों से प्रयोग किया जा रहा है और इसकी गुणवत्ता की परख, मैंने की है. यह मेरी जिम्मेदारी है कि मैं कोई भी ब्रांड को एंडोर्स करने से पहले उसे परख लूं. जब तक मुझे किसी ब्रांड पर भरोसा नहीं होता मैं उसकी इंडोर्समेंट नहीं करती. इनके उत्पाद काफी शोध के बाद बाज़ार में लाये जाते हैं. इसके अलावा ये सारे उत्पाद इंडियन स्किन को ध्यान में रखकर बनाये जाते हैं. जिससे सबको सूट करें. ये सही है कि महिलाएं हर उम्र में सुंदर दिखना चाहती हैं. सुंदर दिखने से कई फायदे भी हैं, मसलन आपका आत्मबल ऊंचा रहता है, वे घर और बाहर अच्छा सामंजस्य बना पाती हैं.

अपने आप को फिट कैसे रखती हैं, पूछे जाने पर वह कहती हैं कि मैं नियमित जिम और वर्कआउट करती हूं. क्योंकि आपके ‘मसल्स’ ही आपके सबसे अच्छे दोस्त है जो आपके अंत तक साथ रहते हैं. इसके अलावा त्वचा की ग्लो को बनाये रखने के लिए भी मैं अपने खान-पान पर ध्यान देती हूं. मैं महिलाओं से कहना चाहती हूं कि वें काम के बीच में अपने लिए समय निकालें, अपना ध्यान रखें और खुश रहें. मैं वर्किंग मदर के साथ-साथ एक खुश मां और पत्नी हूं. फिल्मों में काम न करने के पीछे मेरा बच्चा है, जिस पर मैं ध्यान देती हूं. अंदर से खुश और संतुष्ट रहना बहुत जरुरी है. उसका असर आपकी त्वचा पर पड़ता है.

वैब सीरीज की ‘माया’

निर्देशक विक्रम भट्ट कैंप सस्पैंस, हौरर और बोल्ड सीन की चाशनी में लिपटी फिल्में बनाते रहे हैं. उन की आखिरी हिट फिल्म ‘राज’ थी. अपने नए आइडिए से जब उन्हें फिल्म बनाने में दिक्कत पेश आई तो उन्होंने वैब सीरीज बनाने का फैसला किया है. विक्रम अब एक्ट्रैस शमा सिकंदर को ले कर ‘माया’ नाम की वैब सीरीज बना रहे हैं. हालांकि कुछ इसे इंटरनैट पर फैली तमाम कामुक वैब सीरीज से जोड़ रहे हैं लेकिन विक्रम इसे सौफ्ट पौर्न नहीं मानते. यूट्यूब सरीखे तमाम पोर्टल अनोखे व नए विषयों पर वैब सीरियल बना रहे हैं. यशराज बैनर का डिजिटल चैनल वाईआरएफ भी यही काम कर रहा है जिस ने हाल में ‘सैक्स चैट विद पप्पू ऐंड पापा’ बनाया है.

 

बेटियां होती हैं दिल के करीब

झारखंड की रा?जधानी रांची के हेसाग स्थित ओल्डएज होम, ‘अपना घर’ में रहने वाली सुदामा की अंतिम यात्रा ने लोगों की आंखें नम कर दीं, जब उन्हें मुखाग्नि उन के बेटे ने नहीं, बल्कि मुंहबोली बेटी सुनीता ने श्मशान घाट पहुंच कर दी. आज से करीब 20 साल पहले सुदामा को ‘अपना घर’ की सिस्टर ने गेट के बाहर दर्द से कराहते हुए पाया था. सिस्टर ने उन्हें अपने यहां पनाह दे दी. 58 वर्षीया सुदामा ने तब बताया था कि उन के अपने बेटे ने उन्हें घर से निकाल दिया. कोई  शख्स उन्हें इस ओल्डएज होम की देहरी तक छोड़ गया था. तब से सुदामा इसी ओल्डएज होम में रहने लगीं. पहले से यहां 20 बुजुर्ग महिलाएं रहती थीं. सुदामा पहले तो उदास और गुमसुम रहतीं पर धीरेधीरे दूसरी महिलाओं से बातें करने लगीं और ओल्डएज होम की महिलाओं को ही अपना परिवार मानने लगीं. यहीं पर सुनीता नाम की लड़की अकसर उन से मिलने आती थी. उस ने सुदामा को अपनी मां माना था. दोनों एकदूसरे से इतनी जुड़ गई थीं कि इस पराई बिटिया ने स्वयं आगे बढ़ कर मृत मां को मुखाग्नि दी और एक बेटे द्वारा किए जाने वाले दूसरे सारे कर्तव्य भी निभाए.

जिस वृद्ध, लाचार महिला को सगे बेटे ने घर से निकाल दिया, उसे एक पराई बेटी ने अपनों से बढ़ कर मान दिया और अंतिम समय तक साथ निभाया. वास्तव में यह घटना पुत्र की कृतघ्नता और पराई बेटी की मानवीयता की अनोखी मिसाल है.

बुजुर्गों की दशा

देश में कुल आबादी का 8 से 9 फीसदी हिस्सा बुजुर्गों का है. पिछले एक दशक में भारत में वृद्धों की आबादी 39.3 फीसदी की दर से बढ़ी है. पर अफसोस की बात यह है कि इन बुजुर्गों के जीवन में अकेलेपन और अपनों के अत्याचार की समस्या भी लगातार बढ़ रही है. गैर सरकारी संगठन, ‘हैल्पएज इंडिया’ द्वारा 8 राज्यों के 12 शहरों में किया गया सर्वेक्षण बताता है कि भारत में करीब 50 फीसदी बुजुर्ग अत्याचार के शिकार हो रहे हैं. पुरुष बुजुर्गों की अपेक्षा महिला बुजुर्गों पर अत्याचार ज्यादा होते हैं. जहां 48 फीसदी बुजुर्ग पुरुष अपनों के अत्याचार के शिकार होते हैं वहीं बुजुर्ग महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा 52 फीसदी है.

सर्वेक्षण के मुताबिक, सब से कड़वी सचाई यह है कि इन बुजुर्गों पर अत्याचार करने वाले कोई और नहीं, बल्कि उन के खुद के परिवार के लोग और सगेसंबंधी ही होते हैं, खासतौर पर बेटेबहू ज्यादा जुल्म ढाते हैं. सर्वेक्षण रिपोर्ट में चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि 64 फीसदी पीडि़त बुजुर्गों को पुलिस हैल्पलाइन और इस से निबटने वाली प्रणाली के बारे में जानकारी थी पर लोकलाज के भय से केवल 12 फीसदी बुजुर्गों ने ही इस का सहारा लिया. 53 फीसदी लोगों ने अपने सगेसंबंधियों को जुल्म के बारे में बताया. वृद्धा सास के प्रति एक बहू के निष्ठुर और बर्बरतापूर्ण व्यवहार की झलक लोगों ने देखी जब हाल ही में उत्तर प्रदेश के बिजनौर से एक दिल दहलाने वाला वीडियो वायरल हुआ. 1 मिनट के इस वीडियो में 70 साल की एक वृद्ध बीमार और अशक्त महिला को उस की बहू द्वारा बड़ी बेरहमी के साथ मारने का प्रयास करते देखा जा सकता था.

वीडियो में पहले बहू अपनी सास को हाथों से पीटती दिखती है. फिर पत्थर से वह वृद्धा के सिर पर चोट मारती है. इस के बाद कपड़े से गला घोंट कर मारने का प्रयास भी करती है. एक सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा इस वीडियो को फेसबुक पर अपलोड किया गया और तब पुलिस ने इंडियन पीनल कोड के सैक्शन 307 के अंतर्गत उस बहू के खिलाफ केस दर्ज किया. इसी तरह का एक मामला दक्षिणपूर्व दिल्ली का है. कालकाजी इलाके के एक बेटे ने बुजुर्ग मांबाप के घर की बिजली और पानी के कनैक्शन काट दिए. पिता जब बेटे के पास शिकायत करने पहुंचा तो बेटेबहू ने मिल कर उन्हें पीट दिया. वहीं संगम विहार क्षेत्र में भी इसी तरह की घटना हुई. एक बेटे ने बुजुर्ग बाप को इतना पीटा कि उन के बाएं पैर की हड्डी टूट गई.

जिस बेटे को बांहों में भर कर मांबाप प्यारदुलार से चूमते हैं, जिस के बढ़ते कदमों को देख बलिहारी जाते हैं, जिस की हर ख्वाहिश पूरी करने को जीजान से जुट जाते हैं, उसी बेटे के हाथों बुढ़ापे में जब मांबाप को मार खानी पड़े तो जरा सोचिए, क्या गुजरेगी उन के दिल पर.

समाज की विसंगति

सामाजिक व्यवस्था की विसंगति है कि ज्यादातर घरों में लोग बेटे के लिए अपना सबकुछ न्योछावर करने को तैयार रहते हैं. उन के पैदा होने से ले कर उन के लालनपालन, कैरियर व हर चीज में बेटे को बेटियों की अपेक्षा ज्यादा अटैंशन दी जाती है. मगर जब बाद में वही बेटा अपने दायित्वों से हाथ झाड़ लेता है तो मातापिता आंसू बहाते हैं. हाल ही में जब 12वीं के नतीजे घोषित हुए तो हर साल की तरह इस बार भी लड़कियों ने अपना परचम लहराया. सिर्फ सीबीएसई ही नहीं, विभिन्न राज्यों की बोर्ड परीक्षाओं में भी लड़कियां लड़कों से आगे रहीं. पर अफसोस, हम अकसर अपने घरों में बेटी की पढ़ाई में कोताही कर बेटों को ही पढ़ाते हैं. आंकड़ों के मुताबिक, 52.2 फीसदी लड़कियां बीच में ही अपनी स्कूली पढ़ाई छोड़ देती हैं. जबकि बेटों को आगे बढ़ाने का हरसंभव प्रयास किया जाता है. नतीजा यह होता है कि कई दफा बेटे सिर्फ पढ़ाई और कैरियर में ही नहीं, जिंदगी की दौड़ में भी आगे निकलने के प्रयास में अपने मांबाप को बोझ समझने लगते हैं और इस बोझ को वे किसी ओल्डएज होम या कहीं और उतार कर आगे बढ़ जाते हैं.

पर क्या आप जानते हैं, अकसर उपेक्षित छोड़ दी गई लड़कियां मांबाप के ज्यादा करीब और उन के प्रति ज्यादा जिम्मेदार होती हैं. हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी यह बात स्वीकारी थी कि एक बेटी मांबाप के लिए 5 बेटों से बढ़ कर होती है.

वहीं, अमेरिका के सोशियोलौजिकल एसोसिएशन फाउंडेशन द्वारा जारी एक अध्ययन के मुताबिक, जब बात केयर करने की आती है तो बेटियां मांबाप का खयाल बेटों की अपेक्षा दोगुनी रखती हैं. अध्ययन में 50 साल से अधिक उम्र के 26 हजार से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया. अध्ययन में पाया गया कि बेटियां औसतन प्रतिमाह 12.3 घंटे का वक्त अपने बुजुर्ग अभिभावकों की देखभाल में लगाती हैं जबकि पुत्र महज 5.6 घंटे ही इस काम में व्यतीत करते हैं. बेटियों को इस काम में कई तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है, जैसे जौब, बच्चे वगैरा. मगर बेटों के मामले में केवल यही बात माने रखती है कि कोई और सहयोगी है या नहीं. अध्ययनकर्ता एंजेलिना कैरिर्गोयावा के मुताबिक, बेटे मांबाप की देखभाल की जिम्मेदारी उठाना तब कम कर देते हैं जब उन की बहन मौजूद हो. इस के विपरीत बेटियां अपने अभिभावक की और भी ज्यादा देखभाल करने लगती हैं जब उन का भाई होता है. यानी ज्यादातर बेटे मांबाप के प्रति अपनी जिम्मेदारियां बहनों को स्थानांतरित करने में माहिर होते हैं.

यही नहीं, एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, 18 साल की उम्र के बाद बेटियां अपने मांबाप से बहुत कम रुपयों की मांग करती हैं, जबकि बेटों के साथ ऐसा नहीं. सर्वे में पाया गया है कि 41 फीसदी युवा पुरुष अपने मांबाप से खर्च करने के लिए पैसे लेते हैं, जबकि अभिभावक के साथ रहने वाली सिर्फ 31 फीसदी युवा लड़कियां ही ऐसा करती हैं. करीब 60 फीसदी बेटियां मांबाप को भावनात्मक संबल देती हैं. छोटीछोटी बातों से उन का खयाल रखती हैं, जैसे फोन करना, उन के पास जाना, बैठ कर बातें करना जबकि 50 फीसदी से भी कम लड़के ऐसा करते हैं.

शायद यही वजह है कि लोग भी अब बेटों की अपेक्षा बेटियों को प्राथमिकता देने लगे हैं. हाल ही में कार्लसन स्कूल औफ मैनेजमैंट व रुटजर्स बिजनैस स्कूल में की गई रिसर्च के मुताबिक, अभिभावकों की पहली पसंद बेटे नहीं, बल्कि बेटियां बनती जा रही हैं. इस रिसर्च में 60 फीसदी लोगों ने अपनी भावी संतान के रूप में एक बेटी की ही कल्पना की.

जीवन की मुसकान

मेरी 2 बेटियों में सिर्फ ढाई वर्ष का अंतर है. तबीयत ठीक न रहने के कारण मैं काम करने में दिक्कत महसूस करती हूं. एक दिन ऐसे ही मैं परेशान हो गई कि 2 छोटे बच्चों के साथ कैसे काम करूं. तब मेरी साढ़े 4 वर्षीय बेटी बोली, ‘‘मम्मी, आप परेशान मत हो. मैं अब बड़ी हो गई हूं. मैं आप की मदद करूंगी.’’ उस की यह बात सुन कर मैं हंस दी. तब से वह मेरी हर काम में मदद करती है. उस की इतनी सी उम्र में समझ और मदद करने के जज्बे से मुझ में काम करने की हिम्मत आ जाती है.

नेहा प्रधान, कोटा (राज.)

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बात उस समय की है जब मेरा तबादला ओडिशा के गंजाम जिले के ब्रह्मपुर कसबे में हुआ था. उस समय मेरा प्रोबेशन पीरियड चल रहा था. मेरी सहेली की बैंक शाखा, मेरी बैंक शाखा के पास ही थी. सो, हम दोनों ने किराए का मकान ले कर एकसाथ रहने का फैसला लिया. एक दिन जब दोनों की एक समय पर ही बैंक से छुट्टी हो गई तो हम दोनों ने बाहर डिनर करने की सोची. हम डिनर कर के होटल से बाहर निकले तो बिजली चली गई थी. हम अंधेरे में घर के लिए पैदल निकल पड़ीं. हमें जिस गली में जाना था, उस में न जा कर गलत रास्ते पर चल पड़े. मेरी सहेली मुझे बारबार बोल रही थी कि हम गलत रास्ते जा रहे हैं पर मैं ने उस की बात अनसुनी कर दी. मुझे पूरा यकीन था कि मैं सही थी. लेकिन जब तकरीबन एक किलोमीटर चलने के बाद बिजली आई तब मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ. तब हम अपने किराए के मकान के बिलकुल विपरीत दिशा में करीब 5 किलोमीटर दूर थे. रात के 9:30 बज चुके थे.

वहां हम ने 2 पुलिस वालों को देखा और घर लौटने का रास्ता पूछने लगीं. उन्होंने हमें रास्ता बता दिया. हम उन के बताए हुए रास्ते में 15 मिनट चलने के बाद फिर खो गए. हमें डर भी लग रहा था क्योंकि रात हो गई थी. करीब 15 मिनट के बाद हम ने पुलिस की एक पैट्रोलिंग जीप देखी जिस में वही 2 पुलिस वाले अपने दोस्तों के साथ थे. उन्होंने हमें देखा और बताया कि उन्हें लगा था कि हम लोग उस जगह पर नए हैं, इसलिए खो गए होंगे. वे हम दोनों को ढूंढ़ते हुए आए थे. फिर उन्होंने अपनी जीप में बिठा कर हमारे घर पर हमें पहुंचा दिया. हमें पता चला कि हमारा घर उन के पैट्रोलिंग इलाके के अंदर नहीं आता, फिर भी उन्होंने हमें हमारे घर पर सहीसलामत छोड़ा. मैं आज तक उस घटना को भूल नहीं पाई हूं. मैं यह सोच कर आज भी कांप उठती हूं कि अगर उस रात वे लोग न मिले होते तो हम कैसे घर आते.

मधुस्मिता, भुवनेश्वर (ओडिशा)

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