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राजन चाहते थे दूसरा कार्यकाल

रघुराम राजन भारतीय रिजर्व बैंक के गर्वनर के रूप में दूसरा कार्यकाल चाहते थे लेकिन सरकार के साथ समझौता नहीं हो पाया. खुद राजन ने यह खुलासा किया है. राजन ने कहा, “मैं अपने पद पर कुछ समय और रुकना चाहता था लेकिन अपने सेवाकाल के विस्तार के बारे में सरकार से उचित तरह का समझौता नहीं हो सका.”

राजन का तीन साल का कार्यकाल 4 सितंबर को खत्म हो रहा है. राजन ने कहा, “अधूरे काम को देखते हुए मैं रुकना चाहता था लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बात यहीं खत्म हो गई. कई जगहों पर अनेक तरह के मतभेद हो सकते हैं. मुझे लगता है कि हमारे बीच समझौता नहीं हो सकता. याद रखें कि मेरा कार्यकाल पूरा हो चुका था इसलिए मुझे एक नया कार्यकाल चाहिए था.”

दूसरे कार्यकाल को लेकर सरकार के साथ उनकी चर्चा के बारे में राजन ने कहा, हमने बातचीत शुरू की थी और यह चल ही रही थी कि हमें लगा कि इस मसले पर संवाद को आगे जारी रखने का तुक नहीं है. विभिन्न अवसरों पर लीग से हटकर बोलने को लेकर अपनी आलोचनाओं को खारिज करते हुए राजन ने कहा, किसी भी सार्वजनिक व्यक्तित्व या हस्ती का यह वैध कर्तव्य तथा नैतिक दायित्व बनता है कि वह युवाओं को बताए कि अच्छी नागरिकता क्या होती है.

नीतिगत ब्याज दरें ऊंची रखने संबंधी आलोचनाओं पर राजन ने कहा, उन्होंने दरों में कटौती के लिए हर उपलब्ध विकल्प का इस्तेमाल किया. राजन विभिन्न मसलों पर अपने मुखर विचारों के लिए चर्चित रहे हैं. कई मसलों पर उनके विचारों को सरकार के खिलाफ देखा गया. साक्षात्कार में राजन ने देश में बढ़ती असहिष्णुता पर अपने विवादास्पद भाषण का बचाव किया. इस बयान से सरकार काफी असहज हो गई थी.

चैंपियंस ट्रॉफी में सस्ते टिकट के लिए टिकट बैलट की शुरुआत

आईसीसी यानी इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल ने चै​पियंस ट्रॉफी के लिए टिकट बैलट की घोषणा की है. यह टूर्नामेंट 1 जून 2017 से 18 जून 2017 तक खेला जाना है. यह क्रिकेट फैन्स के लिए चैंपियंस ट्राफी के 15 मुकाबलों के लिए अप्लाई करने का सुनहरा अवसर है. बच्चों के लिए मैच टिकट की कीमत 5 यूरो और वयस्कों के लिए 20 यूरो प्रति मैच होगी.

यहां कर सकते हैं आवेदन

यह बैलट आगामी 30 दिनों तक आईसीसी की आधिकारिक वेबसाइट (www.icc-cricket.com/tickets) पर खुला रहेगा. क्रिकेट प्रशंसक इसमें अपने मनमुताबिक मैचों के लिए अप्लाई कर सकते हैं. इंग्लैण्ड के ​क्रिकेट कप्तान इयॉन मॉर्गन ने इस मौके पर कहा, 'मैं अगले साल होने वाली चैंपियंस ट्रॉफी को लेकर काफी उत्सहित हूं.'

उन्होंने कहा कि वह दर्शकों के जबरदस्त समर्थन को लेकर आश्वस्त हैं. उन्होंने कहा कि चैंपियंस ट्रॉफी में टॉप 8 क्रिकेट टीमों का खेलना वाकई रोचक होता है. हम हर एक मैच को जीतने पर ध्यान केंद्रित करेंगे.

इस मौके पर आईसीसी के चीफ एग्जिक्यूटिव डेविड रिचर्डसन ने कहा, ‘आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी एक ऐसा इवेंट है जहां टॉप रैंकिंग वाली क्रिकेट टीमें हिस्सा लेती हैं. हमने दर्शकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए कम से कम कीमत पर क्रिकेट मैच की टिकटों के दाम रखे हैं और इसके लिए एक बैलेट प्रक्रिया की शुरुआत की गई है.’

उन्होंने कहा कि 2013 चैंपियंस ट्रॉफी टूर्नामेंट सिर्फ बेहतरीन क्रिकेट ही नहीं बल्कि दर्शकों की जबरदस्त प्रतिक्रिया की वजह से भी हिट रहा था. क्रिकेट मैच के टिकट मुहैया कराने के लिए इवेंट से 9 महीने पूर्व ही शुरुआत कर दी गई है. इसके साथा ही बैलेट के जरिए एक महीने एडवांस में ही दर्शक अपने मनमुताबिक टूर्नामेंट के बारे में प्लानिंग कर सकते हैं.

यह होगी पूरी प्रक्रिया

इस एक महीने के एप्लीकेशन पीरियड की समाप्ति पर लोगों को पारदर्शी प्रक्रिया के तहत सीटें देने के लिए टिकट मास्टर एक बैलेट ड्रॉ निकालेगा. इसमें सभी आवेदकों को अक्टूबर की शुरुआत तक नोटिफिकेशन भेज दिया जाएगा.

इसमें जिन आवेदकों का नाम चयनित होगा वे आवेदन प्रक्रिया के तहत टिकट खरीद सकेंगे. इसमें पैसे की कटौती उसी अकाउंट से होगी जिस अकाउंट का​ जिक्र आवेदक अपनी रिक्वेस्ट सबमिट करने के दौरान करेंगे.

बैलट प्रक्रिया में चयन की संभावना को बढ़ाने के लिए पॉवरप्ले फीचर भी जोड़ा जा रहा है. इसके एक्टिवेट होने पर स्वत: ही सस्ते से सस्ता ​मैच टिकट मिल जाएगा.

अधिकतम मिल सकेंगे इतने टिकट

इसके बाद बचने वाले मैच टिकेट्स को जनरल सेल के जरिए बेचा जाएगा. यह सेल अक्टूबर के अंत में शुरू होगी. 1 से 30 सितम्बर 2016 तक क्रिकेट फैन्स के पास सभी 15 मुकाबलों के लिए आवेदन करने की छूट है. एक आवेदक को प्रत्येक मैच के हिसाब से अधिकतम 4 से 10 टिकट ही मिल सकेंगे.

कहां-कहां होंगे मैच

यूनाइटेड किंगडम में होने वाली आगामी 2017 चैंपियंस क्रिकेट ट्रॉफी सीरीज 1 से 18 जून 2017 तक तीन अलग-अलग जगहों पर आयो​जित होगी. ओवल में चैंपियंस ट्रॉफी टूर्नामेंट का पहला मुकाबला 1 जून को खेला जाएगा. इसके साथ ही 18 जून को समापन मैच भी यहीं खेला जाएगा. कार्डिफ वेल्स स्टेडियन 4 मुकाबलों को होस्ट करेगा. इनमें 14 जून को होने वाला सेमीफाइनल मुकाबला भी शामिल है. जबकि एड्गबैस्टन में चार मैच होंगे जिसमें भारत बनाम पाकिस्तान और ऑस्ट्रे​लिया बनाम इंग्लैण्ड के मुकाबले होंगे. इसके साथ ही दूसरा सेमीफाइनल भी यहीं होगा.

गोरक्षा की ओट दलित और वोट

जब तक गोमांस को ले कर वोट का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हो रहा था, भारतीय जनता पार्टी को इस में लाभ नजर आ रहा था. भाजपा के लिए वोट का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण लोकसभा में लाभकारी साबित हो चुका था. ऐसे में पार्टी गोमांस के नाम पर वोट के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में लगी थी. जब गोरक्षा के नाम पर दलित वर्ग पर हमला होना शुरू हुआ तो भाजपा की चिंता बढ़ गई. केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद भजभज मंडली के लोगों ने कई तरह

से अपने काम को आगे बढ़ाने की शुरुआत की थी. गोरक्षा इस में से एक  था. देश में बहुत पहले से दलित वर्ग की कुछ जातियां मरे जानवरों की खाल निकाल कर बेचने का काम करती रही हैं. ऐसे में अब गोरक्षा के नाम पर इन जातियों को निशाना बनाया जाने लगा है. गुजरात और मध्य प्रदेश की घटनाओं ने पूरे देश के सिर को शर्म से झुकाने का काम किया है. देश के प्रधानमंत्री को इस में हस्तक्षेप करना पड़ा. मामला बिगड़ता देख भाजपा ने गुजरात में सत्ता परिवर्तन कर दिया. आनंदी बेन पटेल को हटा कर विजय रूपानी को गुजरात का मुख्यमंत्री बना दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐलान किया कि गोरक्षा के नाम पर चल रही दुकानें बंद हों. जो लोग दलितों को मार रहे हैं वे उन को नहीं, मुझे गोली मार दें पर इस बयान में वे उन गोरक्षकों को बचा गए जो पार्टी या संघ के लिए कार्य कर रहे हैं. उन्होंने ठीकरा उन पर फोड़ा जो दिन में गुंडई कर रहे हैं. जाहिर है ये गुंडे पार्टी या संघ से जुड़े होंगे, यह तो नरेंद्र मोदी मानेंगे नहीं. प्रधानमंत्री का यह बयान इतना ही बताता है कि गोरक्षा के नाम पर तमाम तरह के अत्याचार हो रहे हैं. पंजाब और उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव आ रहे हैं. पंजाब में गोरक्षा के नाम पर तमाम तरह के बवाल मचे हैं.

पंजाब में गाय की सब से अधिक खरीदारी होती है. गोरक्षा करने वाले दुधारू गायों का कारोबार करने वालों से प्रति गाय वसूली करते हैं. ऐसे में केवल दुधारू पशुओं का कारोबार करने वाले ही नहीं, उन को लाने व ले जाने वाले ट्रांसपोर्ट वाले भी परेशानी का शिकार होते हैं. इन हालात के चलते अब बाहरी प्रदेशों के लोग पंजाब व हरियाणा से दुधारू पशुओं की खरीदारी करने से बचने लगे हैं. ऐसे में प्रदेशभर में गोरक्षा के नाम पर वसूली करने वालों के खिलाफ एक नाराजगी फैल गई है. पंजाब में भाजपा व अकाली दल की साझा सरकार है. वहां पर जनता की नाराजगी का असर चुनाव पर पड़ेगा. ऐसे में भाजपा के लिए गोरक्षा के नाम पर धंधा करने वालों की आलोचना जरूरी हो गई थी. पर यह आलोचना असर नहीं डालेगी क्योंकि गोरक्षकों की मनमानी करने की आदत वर्षों से है.

उत्तर प्रदेश का दादरी कांड

उत्तर प्रदेश में 2017 में विधानसभा चुनाव हैं. यहां भाजपा को सब से बड़ी उम्मीद दलित वर्ग से है. भाजपा ने दलितों को पार्टी से जोड़ने के लिए बडे़ पैमाने पर अभियान चला रखा है. राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से ले कर प्रदेश के नेताओं तक ने दलितों को भाजपा के करीब लाने का अभियान चलाया है. भाजपा ने बहुजन समाज पार्टी से बाहर हुए नेताओं को खुद से जोड़ा है. पार्टी के तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए बसपा नेताओं को भाजपा में जगह दी गई है, ताकि दलित भाजपा के साथ जुड़ सकें.

गोमांस को ले कर जिस तरह से गोरक्षकों ने दलित वर्ग को निशाने पर लिया है उस से पंजाब और उत्तर प्रदेश में पार्टी का चुनावी समीकरण बिगड़ सकता है. ऐसे में केवल भाजपा ही नहीं, संघ भी यह मानता है कि दलित के बिना जीत नहीं होगी. इस चुनावी खतरे को भांप कर ही भाजपा ने गोमांस के मुद्दे पर यूटर्न ले लिया है. कुछ समय पहले प्रदेश के दादरी में गोमांस रखने के आरोप में अखलाक का घर जला कर उस की हत्या कर दी गई. तब भाजपा ने वोट के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को ध्यान में रखते हुए गोरक्षा के नाम पर आंतक करने वालों को कोई सीख नहीं दी थी. अब मामला दलित वोटबैंक का आया तो पार्टी ने सरकार और संगठन दोनों ही स्तर से यह संदेश देने का काम शुरू कर दिया. पिछले 2 सालों में गोमांस के नाम पर उत्पीड़न की घटनाओं में लगातार तेजी आ रही है. गुजरात के ऊना में 4 दलित युवकों की पिटाई के साथ ही साथ मध्य प्रदेश के मंदसौर में 2 महिलाओं को पीटा गया. जम्मूकश्मीर में गोमांस की तसकरी को ले कर पिटाई से एक ट्रक सहायक की मौत हो चुकी है. हिमाचल में भी इसी तरह की घटना घट चुकी है. बात केवल गोमांस की ही नहीं है. भाजपा के राज में दलित उत्पीड़न की घटनाएं ज्यादा घट रही हैं.

जड़ों पर हमला

हैदाराबाद में रोहित वेमुला कांड के बाद जो हुआ उस ने भाजपा की सोच को उजागर कर दिया. रोहित को ले कर जिस तरह से कैंपेन चलाया गया उस ने मनुवादी सोच को गहरा करने का काम किया. भाजपा को इस मुद्दे पर जिस संवेदनशील ढंग से काम करना चाहिए था उस का अभाव दिखा. यह बात पूरे देश में फैल गई कि भाजपा केंद्रीय विश्वविद्यालयों के जरिए अपने विचारों को बढ़ावा देने में लगी है. तब की शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी को इस बात के लिए बधाई दी जा रही थी कि वे संघ के एजेंडे पर चल रही हैं.

दिल्ली में कन्हैया कुमार के मामले में भी यही दोहराया गया. कन्हैया कुमार पर जिस तरह से कोर्ट परिसर में हमला हुआ उस पर पूरे देश में सवाल उठे. यह काम भले ही भाजपा के सदस्यों ने न किया हो पर हिंदूवादी लोगों ने किया, जो भाजपा के शुभचिंतक हैं. भाजपा ऐसे लोगों की आलोचना नहीं करती है. राजनीतिक मजबूरियों को ले कर भले ही भाजपा ऐसीताकतों का समर्थन न कर सके पर वह इन का विरोध भी नहीं करती है.

भाजपा की यही मजबूरियां दलित व सवर्ण गठजोड़ को सामने लाती हैं. यह बात सच है कि पिछले कुछ सालों में सरकारी नौकरियों में आए दलित और पिछड़ों के कुछ परिवार खुद को सवर्ण समझने लगे हैं. गांवकसबे छोड़ कर शहर में बस चुके ऐसे लोग भाजपा के विचारों का पालन बड़ी जोरशोर से करते हैं. इस के बाद भी गांवों में दलित व पिछड़ों का बड़ा वर्ग रहता है जो अभी भी सवर्ण जातियों के उत्पीड़न का शिकार हो रहा है. ऐसे लोग पहले की तरह अनपढ़ नहीं रह गए हैं. ये लोग भले ही पढ़नालिखना न सीख पाए हों पर अपने विचारों को समझते हैं. लोकसभा के चुनावों में भाजपा की जीत में कांग्रेस के नकारेपन का प्रमुख हाथ था. सरकार बनाने के बाद भाजपा ने कोई ऐसा काम नहीं किया है जिस से सामाजिक रूप से समाज में एकजुटता आ सके. गाय के मुद्दे को ले कर जो आंदोलन हिंदूवादी ताकतों के द्वारा चला वह समाज को बिखराव की दिशा में ले जा रहा है.

भाजपा जिस हिंदूवादी समाज की बात करती है उस में बड़ी संख्या में दलित और पिछड़े शामिल नहीं हैं. ऐसे में भाजपा की जीत का गणित कमजोर पड़ता दिख रहा है. भाजपा सरकार दोधारी तलवार पर सवार है.  एक तरफ हिंदूवादी ताकतें हैं जो उसे अपनी सोच के हिसाब से काम करने को कहती हैं तो दूसरी ओर बाकी समाज है. ऐसे में दोनों को साधना सरल काम नहीं है. केंद्र सरकार दबाव में है. यह दबाव उस के विकासवादी कामों में बाधा बनता है.

केंद्र सरकार के लिए यह साबित करना कठिन हो रहा है कि वह बाकी देश के साथ है. रोहित वेमुला, कन्हैया कुमार और हार्दिक पटेल ऐसी आवाजें हैं जिन को दबाना संभव नहीं है. दलित वर्ग को अपने साथ लाना है तो पुराने विचारों को त्यागना पडे़गा. दलित नेताओं से एक अलग जमात भी तैयार हो गई है जो अपने मुद्दों को ले कर सजग और जागरूक है. इन आवाजों को दबाना सरल नहीं है. गाय की हत्या का मुद्दा हिंदू समाज को ही बांटने का काम कर रहा है. जिस तरह की घटनाएं पूरे देश में घट रही हैं उन से दलितों को भ्रम होने लगा है कि वे आजाद देश में नहीं, हिंदू राजाओं के राज में रह रहे हैं. 

उत्तर प्रदेश में भाजपा नेता दयाशंकर सिंह का मायावती को ले कर दिया गया बयान भी राजनीति के केंद्रबिंदु में आ गया. बहुजन समाज पार्टी इस प्रकरण को दलित बनाम सवर्ण वोटबैंक से जोड़ कर देख रही है. वह इस मसले पर भाजपा को विलेन साबित करने में जुटी है. यह तो अलग बात है कि बसपा केवल ठाकुर बिरादरी को ही निशाने पर ले रही है. ऐसे में सवर्ण बनाम दलित की राजनीति कोई रंग नहीं ले पाएगी. भाजपा को देशभर में अपना जनाधार बढ़ाना है तो उसे दलित वर्ग को अपने साथ लाना होगा. ऐसे में इस तरह की घटनाओं को रोकना भाजपा की सब से बड़ी प्राथमिकता है.

देश में दलितों की तादाद सब से अधिक है. हिंदी राज्यों में ही नहीं, दक्षिण भारत के राज्यों में भी यही हालात हैं. मिसाल के लिए कर्नाटक में 25 फीसदी और तमिलनाडु में 19 फीसदी दलित हैं. ये आपस में बंटे होने के कारण लाभ नहीं ले पा रहे हैं. यहां भी दलितों को ले कर अत्याचार होते रहते हैं. अब दलित इन मुद्दों को ले कर मुखर हो रहा है. अपनी बात को उठा रहा है. ऐसे में भाजपा के लिए चिंता का विषय है कि वह किस तरह से गोरक्षा के नाम पर दलित उत्पीड़न को संभाले. गोरक्षा करने वाले लोग सवर्ण और मनुवादी विचारों से लैस हैं. वे दलितों को अब भी पांव की जूती समझते हैं. ऐसे में भाजपा के लिए दलितों को जोड़ना कठिन काम है. इस परेशानी को समझते हुए ही भाजपा ने गोरक्षकों पर बड़ा प्रहार किया है. इस का धरातल पर क्या असर होगा, यह देखने वाली बात है.

गोरक्षा पर उठे सवाल

गोरक्षा के नाम पर दूसरों का उत्पीड़न करना एक बात है और गोरक्षा करना दूसरी बात. इसे समझते हुए ही प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि 80 फीसदी रात के अंधेरे में गलत काम करने वाले लोग गोरक्षा का चोला पहन लेते हैं. भाजपा एक तरफ गोरक्षा की बात करती है तो दूसरी तरफ उस की सरकार में गाय की उपेक्षा के मामले सामने आ रहे हैं. राजस्थान में गोशाला की खराब हालत ने देश के सामने इस सच को उजागर कर दिया है. इस के पहले हरियाणा में भी यह सामने आ चुका है. प्रधानमंत्री कहते हैं कि देश में गोरक्षकों की नहीं, गोसेवकों की जरूरत है. जो लोग गाय की रक्षा की बात करते हैं वे खुद भी गाय के साथ बुरा व्यवहार करते हैं. गाय की जान जाने में सब से बड़ा कारण प्लास्टिक और गाय के लिए चारे की कमी का होना है.  संसद में प्रकाश जावडे़कर ने कहा था कि शहरों में मरी हुई गायों के पेट में 30 किलो औसतन प्लास्टिक मिलती है.भूखी गाय बैटरी, बोतल, तांबे के तार खा जाती है. ये चीजें भी उस के पेट में मिलती हैं. गाय को तेल पिला कर

2 किलो तक का प्लास्टिक गाय के पेट से निकाला जा सकता है. इस से ज्यादा के लिए औपरेशन की जरूरत होती है. देश में चारागाह तेजी से कम होते जा रहे हैं. 1947 में 70 करोड़ हैक्टेयर चारागाह थे. अब पूरे देश में 3.8 करोड़ हैक्टेयर चारागाह ही रह गए हैं. देश में सूखे चारे की भी 15 फीसदी तक की कमी हो गई है. गाय को ड्राइंगरूम में बांधने की सलाह कोई क्यों नहीं देता? अगर वह देवता है या माता है तो फिर उस की जगह सड़क, गोशाला या दूधियाओं के यहां तो नहीं होनी चाहिए.

बंद हो गाय पर राजनीति

गाय की हत्या को ले कर देश में आजादी के समय से कानून बना है. अनुच्छेद 48 के मुताबिक, राज्य दुधारू और अन्य पशुओं के वध का निषेध करेगा. 26 अक्तूबर, 2008 से सुप्रीम कोर्ट ने गोहत्या पर रोक लगा रखी है. कई प्रदेशों में यह कानून पूरी तरह से प्रभावी है. बिहार में गाय और बछडे़ की हत्या पर पूरी तरह से प्रतिबंध है. उल्लंघन करने पर 6 माह की जेल या 1 हजार रुपए का जुर्माना हो सकता है. उत्तर प्रदेश में गोवंश की हत्या और उस के मांस पर रोक लगी है. उल्लंघन पर 7 साल की सजा और 10 हजार रुपए के जुर्माने का प्रावधान है.  हम गाय को माता कहते हैं. इस के बाद भी उस का खयाल नहीं रखते. गाय के अधिक दूध की चाह में औक्सिटौक्सीन हार्मोन का इंजैक्शन लगाने का काम करते हैं. जानकारों का कहना है कि गाय के जब बछड़ा होता है तो उसे गाय का दूध पीने को नहीं दिया जाता है. गाय पालने के लिए जो जगहें होती हैं वे काफी गंदगीभरी होती हैं. गायों को खाने के लिए पौष्टिक आहार भी नहीं दिया जाता. जरूरत इस बात की है कि हम गाय पर राजनीति न करें और गाय का ध्यान करना शुरू करें. गाय को मुद्दा बना कर तमाम संगठन सक्रिय नजर आ रहे हैं. इन में से कई राजनीति से जुडे़ हैं. ये गाय को ले कर राजनीतिकरते हैं. गाय एक दुधारू जानवर है, और यह वही रहे, न पूजी जाए न राजनीति का शिकार बने.            

सनी लियोन को राखी सावंत की खरी खरी

इन दिनों सरकार महिला सशक्तिकरण की बड़ी बड़ी बातें कर रही है, तो दूसरी तरफ कनाडियन पार्न स्टार सनी लियोन भारतीय फिल्मों में अभिनय करते हुए अपनी एक अलग ईमेज बनाने की कोशिश के साथ साथ यह प्रचारित करने में लगी हुई हैं कि उन्होने भारत में सेक्स एज्यूकेशन को बढ़ावा देने का काम किया है. इन दिनों सनी लियोन कई स्तर पर काम कर रही हैं. एक तरफ वह अपने उपर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बनवा रही हैं, तो दूसरी तरफ वह चाहती हैं कि उन पर हिंदी में बायोपिक फिल्म बने. तीसरी तरफ वह अमरीकन अखबार में अपने पक्ष में बड़े बडे़ लेख लिखवा रही हैं. एक अमरीकन अखबार में सनी लियोन के बारे में छपा है कि सनी लियोन की वजह से अब भारत में सेक्स शिक्षा को बढ़ावा दिया जा रहा है. तो चौथी तरफ वह दावा कर रही है कि बालीवुड में उनसे बेहतरीन अभिनेत्री कोई नहीं है. उनका दावा है कि वही एकमात्र सही मायनों मे एक प्रोफेशनल कलाकार है.

सनी लियोन के बिंदासपन के चलते उन्हे कोई जवाब नहीं दे रहा है. जिस तरह से बड़े बड़े कलाकारों की फिल्में बाक्स आफिस पर दम तोड़ रही हैं, उसके चलते शाहरुख खान, आमिर खान, सोनाक्षी सिन्हा सहित कई बड़े कलाकार सनी लियोन को अपनी फिल्म के साथ जोड़ रहे हैं, सभी को लग रहा है कि अब उन्हे अपने करियर की नैय्या पार करने के लिए सनी लियोन के ग्लैमर की जरुरत है.

मगर आइटम गर्ल से फिल्म ‘‘एक कहानी जूली की’’ से हीरोईन बन गयी राखी सावंत को सनी लियोन फूटी आंख भी पसंद नहीं हैं. राखी सावंत की नजर में सनी लियोन की मंशा भारत की हर लड़की को नग्नता की ओर प्रेरित करना है.

हाल ही में एक मुलाकात के दौरान सनी लियोन के प्रति अपने गुस्से का इजहार करते हुए राखी सावंत ने कहा- ‘‘देखिए, हम हिंदुस्तान में रहते हैं. हम अपनी फिल्मों में सब कुछ बहुत सलीके से दिखाते हैं. हमारा जरा सा दुपट्टा हिलता है, हिंदुस्तानी भाड़े का दुपट्टा लेकर ओढ़ाने आ जाते हैं. टीवी पर लंबी चौड़ी बहस करते हैं. पर अमेरिका में गंध फैलाने के बाद भारत आयी पार्न स्टार सनी लियोन, जब यहां गोरा जिस्म दिखाती है, तो लोग उसके दीवाने हो जाते हैं. समझ में नहीं आता कि हिंदुस्तान की जनता को अंग्रेजों की गुलामी करने की आदत अभी तक गयी नहीं? मेरी राय में कोई भी हिंदुस्तानी लड़की पार्न फिल्म कभी नहीं करेगी. वह यहां आकर माल लूटना चाहती है, इसलिए खुद को पंजाबन यानी कि भारतीय बता रही है. वह जितनी गंदी न्यूड फिल्में कर चुकी है, वैसी न्यूड फिल्में भारतीय लड़की कभी नहीं करेगी.’’

जब हमने राखी सावंत को याद दिलाया कि बौलीवुड ने उसे स्वीकार कर लिया. आमिर खान उसके साथ काम करने को तैयार हैं. वह शाहरुख खान की फिल्म में आइटम नंबर के अलावा सोनाक्षी सिन्हा व इमरान हाशमी के साथ फिल्में कर रही है. तो गुस्से से तमतमाते हुए राखी सावंत ने कहा- ‘‘यदि सफलता का यही पैमाना है, तब तो मैं भी न्यूड हो जाउंगी. क्या हमारे कलाकार चाहते हैं कि भारत की हर लड़की न्यूड या पार्न फिल्म करे. मैं सोच रही हूं कि मैं भी अमरीका जाकर पार्न फिल्म कर लूं, तो मेरे साथ भी आमिर खान वगैरह सब काम करना पसंद करेंगे.’’

राखी सावंत ने आगे कहा-‘‘सनी लियोनी की वजह से अब फिल्म निर्माता बौलीवुड में बेहतर काम करने की आस लेकर आने वाली हर नई लड़की से कपड़े उतारने के लिए कहने लगे हैं. इससे हो यह रहा है कि कुछ लड़कियां निर्माता की बात मानकर कपड़े उतारकर फिल्में कर रही हैं. तो कुछ आत्महत्या कर रही हैं. सनी लियोन के कारण अब हर फिल्म में नई लड़की आपको टूपीस में मिलेगी. प्रियंका, करीना, दीपिका, सुष्मिता, माधुरी यह सब इस तरह का काम क्यों नही करती?’’

राखी सावंत ने दावा कि उन्हे खुद जिस्म की नुमाइश करना पसंद नहीं है. वह कहती हैं- ‘‘मुझे शरीर दिखाना बिलकुल नहीं पसंद. मगर मजबूरी का नाम महात्मा गांधी. मैं चाहती हूं कि मेरी फिल्म मेरे भाई भी देखे. मगर निर्माता की मांग के आगे हमें झुकना पड़ता है. निर्माता को फिल्म बेचना होता है. मैं साड़ी पहनूंगी तो निर्माता फिल्म कैसे बेचेगा? आप मेरी इच्छा पूछे तो मैं यही कहूंगी कि मैं काजोल, करीना कपूर, दीपिका पादुकोण, सोनाक्षी, श्रीदेवी आदि का अनुसरण करना चाहूंगी.’’

गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स अप्रत्यक्ष करों में सांपसीढ़ी का खेल

टैक्स यानी कर प्रणाली भारत में इतनी पेचीदा है कि इस में एक ही सामान या सुविधा के लिए अलगअलग राज्यों, ठिकानों व मौकों पर अलगअलग करों का भुगतान करना पड़ता है. ऐसे में जीएसटी के संसद में पास होने के बाद पूरे देश में एकसमान अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था लागू होने पर करों के बोझ व अनियमितता से आम जनता क्या बच पाएगी?  जीएसटी संशोधन बिल को ले कर बहुत होहल्ला मचा. संसद में और संसद से बाहर, मीडिया में यहां तक कि गलीचौराहों में इस को ले कर मैराथन चर्चाएं हुईं. सवाल यह है कि जीएसटी आखिर है क्या बला? सरकार और बड़ेबड़े उद्योगपति इस का बेसब्री से इंतजार क्यों कर रहे थे? संसद से ले कर सड़क तक होती चर्चा के बावजूद इस बारे में आम लोगों को जानकारी कम ही है. जीएसटी पर अभिताभ बच्चन ने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा, ‘लंबी चर्चा के बाद जीएसटी आखिरकार पास हुआ. पर यह है क्या, पता नहीं.’

वहीं, शाहरुख खान जो खुद इकोनौमिक्स में ग्रैजुएट हैं और 28 साल के बाद डिगरी ली, ने लिखा, ‘मुझे अर्थशास्त्र के मामलों की बहुत ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन आर्थिक सुधार के लिए यह एक बड़ा कदम है.’ इस के लिए शाहरुख खान ने सब को बधाइयां दीं. जीएसटी यानी गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स (वस्तु व सेवा कर) के लागू हो जाने पर पूरे देश में एकसमान और एक ही तरह की अकेली अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था लागू हो जाएगी. मौजूदा समय में हम बहुत तरह के अप्रत्यक्ष करों यानी सैल्स, एक्साइज, सर्विस आदि टैक्सों के मकड़जाल में फंसे हुए हैं. अलगअलग राज्य में अलगअलग दर से कर वसूले जाते हैं. राज्य द्वारा वसूले जाने वाले स्थानीय प्रवेश कर, विज्ञापन कर, विक्रय कर, चुंगी, वैट व मनोरंजन कर, विलासिता कर, सरचार्ज का अस्तित्व नहीं रहेगा. केंद्र द्वारा वसूला जाने वाला उत्पादन शुल्क, सेवा कर, क्रय कर, आयात शुल्क, सैस और सरचार्ज जैसे बीसियों तरह के टैक्सों का भी सिस्टम खत्म हो जाएगा.

जीएसटी के लिए लंबे समय से राज्य व केंद्र सरकारें जद्दोजेहद कर रही थीं. सभी पार्टियों को रजामंद करना केंद्र के लिए बड़ी चुनौती थी. माकपा और जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके का कहना था कि जीएसटी के कानून बन जाने के बाद राज्यों को केंद्र के आगे भीख का कटोरा ले कर बैठ जाना होगा.  राज्य सरकारें अभी अपनी सहूलियत और जरूरत के अनुरूप राजकोष बढ़ाने के लिए अतिरिक्त मनमाने कर लगाती हैं, जैसाकि ममता बनर्जी ने सारदा चिटफंड कांड के बाद जनता का पैसा लौटाने के लिए सिगरेटशराब पर अतिरिक्त सरचार्ज लगा दिया. जीएसटी लागू हो जाने के बाद ऐसा कुछ करने का इख्तियार राज्य के पास नहीं होगा.

तमिलनाडु के मैन्यूफैक्चरिंग राज्य होने का हवाला दे कर करुणानिधि की डीएमके और जयललिता की एआईएडीएमके पार्टियों ने जीएसटी का विरोध किया. वहीं, उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी ने झक मार कर इस का समर्थन कर ही दिया. मोटेतौर पर सभी राजनीतिक पार्टियां राज्यसभा में बिल के समर्थन को राजी हो गईं और 122वें संशोधन के साथ यह बिल राज्यसभा व लोकसभा से पास हो गया.

नौ दिन चले अढ़ाई कोस

जीएसटी बिल की हकीकत बहुत हद तक नौ दिन चले ढ़ाई कोस जैसी ही रही यानी दूरी कम भी लेकिन समय बहुत अधिक लगा. अपने सफर को तय करने में इस बिल को लगभग 16 साल लग गए. इस पर मंथन की शुरुआत साल 2000 से हुई थी. हालांकि साल 2006 में तत्कालीन संप्रग सरकार के वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने पहली बार बजट भाषण में जीएसटी का जिक्र किया था. कांग्रेस के नेतृत्व में संप्रग-1 और संप्रग-2 – दोनों सरकारें जीएसटी के पक्ष में रही हैं, लेकिन कांग्रेस इसे लागू नहीं करवा सकी. मोदी सरकार आने के बाद इस पर फिर तोड़जोड़ शुरू हुई. तब कांग्रेस ने जीएसटी में करों की अधिकतम सीमा (18 प्रतिशत) संविधान में ही तय कर दिए जाने की मांग रख दी. मामला लटक गया. लेकिन आखिरकार कांग्रेस के इस सुझाव को मोदी सरकार ने नहीं माना. साफ है कि जीएसटी व्यवस्था में कर 18 प्रतिशत से अधिक हो सकता है. यह 20 से 25 प्रतिशत तक जा सकता है.

केंद्र सरकार ने जीएसटी के तहत कर की अधिकतम सीमा तय कर देने की कांग्रेस की मांग को छोड़ कर बाकी सभी मांगें मान लीं. यह बिल ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों के समर्थन से संसद से पास हो गया. हालांकि और भी कई प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद ही यह बिल कानून में तबदील हो पाएगा. इस बीच, इस बिल को कम से कम 15 राज्यों की विधानसभाओं का अनुमोदन हासिल करना होगा. तब जा कर यह बिल कानून बन पाएगा. जाहिर है, यह भी बड़ा जटिल काम है. इस में भी तमाम पार्टियों और 50 प्रतिशत से अधिक राज्यों को विधानसभाओं में इसे पास कराने के लिए रजामंद करना होगा.

बिल के लिए तैयारी

जीएसटी बिल का मसौदा तैयार करने का श्रेय जिन को जाता है, उन के नाम का जिक्र किया जाना जरूरी है. इस का मसौदा तैयार करने में बंगाल के 2 महानुभावों का हाथ रहा है. उन में से एक हैं बंगाल के मौजूदा वित्त मंत्री अमित मित्र, जो फिक्की के महासचिव रह चुके हैं और साथ में एक बड़े उद्योगपति भी हैं. और दूसरे हैं वाममोरचा की सरकार के दौरान वित्त मंत्री रह चुके असीम दासगुप्ता. गौरतलब है कि 2007 में देश में वैट यानी वैल्यू एडेड टैक्स का मसौदा भी असीम दासगुप्ता ने ही तैयार किया था. मजेदार बात यह भी है कि 2011 के विधानसभा चुनाव में ये दोनों एकदूसरे के खिलाफ चुनाव लड़े थे, जिस में हार का मुंह देखना पड़ा वाममोरचा के असीम दासगुप्ता को.

2000 से ले कर 2007 तक बहुत सारे शोध और सर्वेक्षण के नतीजों के आधार पर असीम दासगुप्ता ने बिल का मसौदा लिखना शुरू किया. 2011 में असीम दासगुप्ता ने जीएसटी मौडल  के लिए गठित की गई समिति से इस्तीफा दे दिया. असीम दासगुप्ता के बाद केरल के तत्कालीन वित्त मंत्री के एम मणि को इस समिति का चेयरमैन बनाया गया. लेकिन ये कुछ ही समय के लिए चेयरमैन रहे. इस के बाद पिछले साल फरवरी में बंगाल के वित्त मंत्री अमित मित्र को इस की जिम्मेदारी सौंपी गई. राज्यसभा में पास हुए बिल के मसौदे में आखिरी संशोधन अमित मित्र की ही देखरेख में हुआ. 

कर निर्धारण का अधिकार

एक बार कानून बन गया तो यह केंद्र समेत सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एकसाथ लागू होगा. सवाल यह है कि कर निर्धारण का अधिकार किस के पास होगा? हर मामले में वह कोई वस्तु हो या सेवा – जिस की खरीदारी होगी, ग्राहक को उस का जीएसटी अदा करना होगा. यह जीएसटी 3 तरह का हो सकता है–

1   केंद्र द्वारा लगाया गया कर : सीजीएसटी यानी सैंट्रल गुड्स ऐंड सर्विस टैक्स.

2   राज्य द्वारा लगाया गया कर : एसजीएसटी यानी स्टेट गुड्स ऐंड सर्विस टैक्स.

3    इंट्रीग्रेटेड या सम्मिलित कर : आईजीएसटी यानी इंट्रीग्रेटेड गुड्स ऐंड सर्विस टैक्स.

ये सभी कर केंद्र सरकार वसूलेगी. वस्तु या सामान की खरीदबिक्री अगर एक राज्य के भीतर होती है तो सीजीएसटी और एसजीएसटी लगेगा. आयात की गई वस्तु या सेवा कहां से आ रही है और कहां जाएगी, इस आधार पर उस पर कर लगेगा.

जीएसटी की दर

जीएसटी के तहत किस दर पर कर का निर्धारण होगा, इस का जिम्मा एक अलग परिषद को सौंपा जाना है. इस के लिए एक जीएसटी परिषद का गठन किया जाना है. इस का गठन राष्ट्रपति करेंगे. राज्यसभा में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने साफ तौर पर बयान दिया है कि मौजूदा समय में 65-70 प्रतिशत सामानों पर 27 प्रतिशत की दर पर कर देना पड़ता है. इस के बाद विभिन्न तरह के सैस जोड़ दिए जाएं तो कुल मिला कर लगभग 30 प्रतिशत का कर देना होता है. इसीलिए जीएसटी के तहत कर का निर्धारण हो जाने से तरहतरह के कर नहीं देने होंगे. कर वसूली की पद्धति पहले की तरह जटिल न हो कर सुगम और सरल हो जाएगी. कर चोरी की गुंजाइश पर भी लगाम लगेगी. जहां तक विदेश का सवाल है तो बहुत सारे देशों में जीएसटी की दर 5 प्रतिशत से ले कर 10 प्रतिशत के बीच है. मसलन, कनाडा और जापान में 5 प्रतिशत, सिंगापुर में 7 प्रतिशत, आस्ट्रेलिया में 10 प्रतिशत है. लेकिन फ्रांस, जिस ने सब से पहले अपने यहां जीएसटी लागू किया, में 19.6 प्रतिशत जीएसटी वसूला जाता है. जरमनी में 19 प्रतिशत. माना जा रहा है कि हमारे देश में ज्यादातर सामानों के लिए इस की दर 18 प्रतिशत से अधिक होगी या इस के आसपास होगी.

लेकिन अब तक की स्थिति से संकेत यह है कि हमारे देश में दोहरा जीएसटी – केंद्रीय जीएसटी और राज्य जीएसटी– लागू होने जा रहा है. इस के अलावा राज्यों के बीच होने वाले सौदों पर इंटीग्रेटेड जीएसटी लगेगा. अगर ऐसा होता है तो इसे किस तरह ‘एक देश एक कर’ कहना सही होगा. वहीं, केंद्र और राज्यों के बीच तालमेल बिठाना आसान नहीं होगा. समान कर की दर पर केंद्र और राज्य की सहमति बन चुकी है. लेकिन राज्यों के बीच होने वाले सौदों में दरों, प्रशासनिक दक्षता और बुनियादी ढांचे की तैयारी को ले कर सहमित नहीं बनी है. 

सरकारी नजरिए से जीएसटी

विशेषज्ञ बहुत सारी बातें कह रहे हैं. कुल मिला कर इस पर ‘नाना मुनि नाना मत’ जैसी स्थिति है. हालांकि ज्यादातर विशेषज्ञों का यह जरूर मानना है कि जीएसटी से पूरे देश में कर नीति का निर्धारण और कर अदायगी सरल हो जाएगी. 

बहरहाल, बहुत सारे दावे किए जा रहे हैं, इस के बड़ेबड़े लाभ गिनाए जा रहे हैं. मसलन–

1    जीएसटी व्यवस्था के तहत एक ही छतरी के तले बहुत सारे कर शामिल हैं, क्योंकि जीएसटी में बहुत सारे परोक्ष कर –आबकारी कर, विक्रय कर, सर्विस कर–वगैरा शामिल होंगे. इस आर्थिक सुधार से होगा यह कि जटिल परोक्ष कर व्यवस्था का अंत हो जाएगा और कर व्यवस्था सरल व सुगम हो जाएगी.

2    जटिल कर व्यवस्था से मुक्ति मिल जाने के बाद निर्यात बढ़ेगा. निर्यात के क्षेत्र में भारत अन्य देशों को अच्छी टक्कर दे पाएगा. इस से भारत का निर्यात उद्योग विकसित होगा. इस का लाभ सरकार को भी होगा.

3    जीएसटी के कारण जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद में भी वृद्धि होगी. बताया जा रहा है कि परोक्ष कर व्यवस्था की जटिलता के कारण मौजूदा समय में जीडीपी का 2.7 प्रतिशत नष्ट हो जाता है. पर जीएसटी के लागू हो जाने से जीडीपी में 1.5 प्रतिशत की वृद्धि होगी.

4    जीएसटी के चलते देश का जीपीपी यानी सकल प्राथमिक उत्पादन में वृद्धि होगी और आखिरकार जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद में भी बढ़ोतरी होगी और इस से देश विकास के शिखर पर पहुंचेगा.

5    जीएसटी लागू हो जाने से बाजार का एकीकरण होगा. इस से बगैर किसी तरह की झंझट के और कम खर्च पर किसी भी सामान को देश के एक कोने से दूसरे कोने में पहुंचाया जा सकेगा. इस से कारोबारियों को लाभ होगा, क्योंकि किसी सामान के उत्पादन से ले कर बाजार तक पहुंचाने की प्रक्रिया कम लागत में पूरी हो पाएगी. नतीजतन, खुदरा बाजार में सामान की कीमत कम होगी. यह बात आम जनता के हित में जाएगी.

6    जीएसटी लागू होने पर कारोबारियों को कर अदायगी में सहूलियत हो जाएगी. इस व्यवस्था में तमाम कर पहले ही अदा कर दिए जाने से उत्पादकों को वस्तु कर में सहूलियत मिलेगी. 

7    जीएसटी का सब से बड़ा लाभ यह होगा कि इस से भ्रष्टाचार पर लगाम लग जाएगी. चूंकि इस नई व्यवस्था में डीलर को अलगअलग तरह के बीसियों विभाग में कर अदा नहीं करने पड़ेंगे.

8    कर अदा करने के मामले में कारोबारी वफादारी दिखाएंगे. वे कर देने में आनाकानी नहीं करेंगे, तिकड़म करने की जरूरत नहीं रह जाएगी. 

जीएसटी से जुड़ी आशंकाएं

विशेषज्ञों की राय में जीएसटी के लागू होने से आम जनता पर बोझ भी बढ़ेगा. मसलन–

1    कुछकुछ मामलों में कर का बोझ थोड़ा बढ़ेगा, खासतौर पर उपभोक्ता सामानों में. इस से कुछ चीजों की कीमतों में वृद्धि होगी.  कम से कम यह तो कहा ही जा सकता है कि जो सपना कांग्रेस ने देखा था, उसे मोदी सरकार ने हाईजैक कर लिया,

ठीक उसी तरह जिस तरह कांग्रेस की कुछ परियोजनाओं का नाम बदल कर मोदी सरकार अपना श्रेय ले रही है. अब यह कितना सफल होगा, आने वाला समय ही तय करेगा.                         

कैसे फायदेमंद है जीएसटी

वर्तमान व्यवस्था में सब से बड़ी खामी यह है कि कई स्तर पर हमें कर अदा करना होता है. एक ही सामान पर हमें अलगअलग जगहों पर कईकई बार कर देना पड़ता है. लेकिन जीएसटी लागू हो जाने पर किसी एक समान पर बारबार कर देना नहीं होगा. कैसे? इस के लिए जीएसटी व्यवस्था के लागू होने पर आने वाले बदलाव को समझना होगा. इस पूरी प्रक्रिया को समझने में हमारी मदद की है शांतनु घोषाल नाम के एक दुकानदार ने. इस पूरी प्रक्रिया को उन्होंने कई चरणों में समझाया.

पहला चरण : मान लीजिए एक ब्रैंड की पोशाक तैयार करने वाली कंपनी है. पोशाक तैयार करने के लिए वह कपड़ा यानी मैटेरियल धागा, बटन जैसे कच्चा माल खरीदने के लिए 100 रुपए खर्च करती है. इस 100 रुपए में कच्चे माल को खरीदने के लिए चुकाया गया कर 10 रुपए भी शामिल है. अब तैयार माल में श्रम लागत और पोशाक से मुनाफा के लिए कंपनी उस में 30 रुपए जोड़ लेती है. यानी कंपनी अपना तैयार माल 130 रुपए में बाजार में बेचती है. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि 10 प्रतिशत की दर से 13 रुपए का कर बनता है. लेकिन कच्चा माल खरीदने की बाबत कंपनी ने 10 प्रतिशत कर पहले ही अदा कर दिया है. फिर वह दोबारा कर क्यों दें? जीएसटी लागू हो जाने के बाद केवल तैयार पोशाक पर कंपनी को महज 3 रुपए कर अदा करना होगा.

दूसरा चरण : पोशाक तैयार करने वाली कंपनी से माल खरीदता है थोक विक्रेता. इस थोक विके्रता को कंपनी से माल मिला 130 रुपए की दर पर. अब थोक विके्रता इस में 20 रुपए अपना मुनाफा रख कर इस पोशाक को अपने खुदरा विक्रेता यानी दुकानदार को 150 रुपए में बेचता है. इस हिसाब से

10 प्रतिशत की दर पर 15 रुपए कर बनता है. लेकिन माल खरीदते समय उस माल के लिए 13 रुपए (130 रुपए का 10 प्रतिशत) पहले ही चुकाया जा चुका है. जीएसटी लागू हो जाने पर अब खुदरा विक्रेता दुकानदार को केवल 2 रुपए (15 रुपए -13 रुपए = 2 रुपए) कर देना होगा.

तीसरा चरण :  खुदरा विक्रेता यानी दुकानदार ने थोक विक्रेता से माल यानी पोशाक खरीदा 150 रुपए की दर पर. अब वह इस में 10 रुपए मुनाफा रख कर उस पोशाक को अपने ग्राहक को 160 रुपए में बेचता है. इस हिसाब से 10 प्रतिशत की दर से कर 16 रुपए होता है. लेकिन 15 रुपए कर पहले ही दे दिया गया है. जीएसटी लागू होने के बाद दुकानदार के खाते में अब केवल 1 रुपए का कर बनता है. जीएसटी लागू होने पर एक पोशाक तैयार करने के लिए कच्चा माल खरीदने से ले कर ग्राहक को बेचे जाने तक की पूरी प्रक्रिया में राजकोष में निम्नलिखित दर से रुपए जमा होते हैं :

कच्चे माल के विक्रेता से —     10 रुपए

पोशाक तैयार करने वाली कंपनी से      —     3 रुपए

थोक विक्रेता की तरफ से —     2 रुपए

खुदरा दुकानदार की तरफ से    —     1 रुपए

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कुल मिला कर         16 रुपए

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यहां देखने वाली बात यह है कि पोशाक तैयार करने से ले कर इस के अंतिम लक्ष्य यानी ग्राहक को बेचे जाने तक हरेक चरण में एक ही सामान पर किसी को 2 बार कर देना नहीं पड़ेगा. जीएसटी कर व्यवस्था की यही खासीयत है.

संगीत के गुमनाम लोगों की मदद के लिए धुन प्रोजेक्ट

संगीत के क्षेत्र में इलेक्ट्रानिक उपकरणों व ‘की’ बोर्ड के आने के बाद लाइव संगीत की रिकार्डिंग बंद हो चुकी है. परिणामतः संगीत को संवारने के लिए वाद्य यंत्र बजाने वाले सभी महारथी गुमनामी के अंधेरे में न सिर्फ खो चुक हैं, बल्कि उनकी आर्थिक हालत भी बहुत खराब हो चुकी है. ऐसी ही हस्तियों की मदद के लिए सोनी टीवी के संगीत प्रधान चैनल ‘‘सोनी मिक्स’’ ने अपनी पांचवीं वर्षगांठ के अवसर पर इस वर्ष से ‘‘धुन प्रोजेक्ट’’ की शुरूआत की है. इसके तहत ‘‘सोनी मिक्स’’ हर साल एक गुमनाम व जरुरतमंद वाद्य यंत्र वादक की तलाश कर उन्हे व उनके परिवार की मदद के लिए दस लाख रूपए दिया करेगा. इस वर्ष सोनी मिक्स ने ‘धुन प्रोजेक्ट के तहत अपनी तरफ से अपने समय के मशहूर ढोलक वादक रोशन अली को दस लाख रूपए देने के लिए चुना है. रोशन अली ने तमाम बड़ी बड़ी फिल्मों के गीत संगीत को संवारते समय ढोलक बजायी थी. पिछले पांच वर्ष से वह उनके आधे षशरीर को लकवा मार गया है, जिसके चलते उनकी व उनके पारिवार की आर्थिक हालत काफी खस्ता है.

2011 में शुरू हुआ ‘‘सोनी मिक्स’’ चैनल संगीत व मनोरंजन का एक मात्र ऐसा चैनल है, जो कि दर्शकों को प्रमोशनल गीत संगीत परोसने की बजाय हर तरह का संगीत अपने चैनल पर परोसता है.

धुन प्रोजेक्ट का मकसद संगीत को समृद्ध करना, संगीत के क्षेत्र में लोगों को शिक्षा की सुविधाएं उपलब्ध करना भी है. इसके लिए धुन प्रोजेक्ट को आम लोग या उद्योगपति भी अपनी अनुदान राशि दे सकते हैं. सोनी मिक्स ने ‘धुन प्रोजेक्ट’ के लिए धन इकट्ठा करने के लिए क्राउड फंडिंग करने का भी मन बनाया है. इसके लिए वह कुणाल कपूर की एनजीओ ‘‘किट्टो’’ की भी मदद ले रहा है.

धुन प्रोजेक्ट के संदर्भ में जब सोनी पिक्चर्स नेटवर्क के सीईओ एन पी सिंह से बात हुई, तो उन्होंने कहा- ‘‘इंसान के सशक्तिकरण में फिर चाहे वह पुरूष हो महिला, संगीत का अपना बहमूल्य योगदान होता है. हम अपने चैनल की तरफ से धुन प्रोजेक्ट के माध्यम से प्रतिभाशाली म्यूजीशियन की मदद कर उन्हे आगे लाना चाहते हैं. जिससे वह भारतीय संगीत को समृद्ध करने के साथ साथ मधुर संगीत के साथ हमें एकता के सूत्र में बांध सकें.’’

जबकि सोनी मिक्स के बिजनेस हेड नीरज व्यास ने कहा-‘‘पांच वर्षों में हमारे चैनल सोनी मिक्स ने काफी प्रगति की है. अब समय की मांग है कि हम संगीत जगत को कुछ तो वापस दें.’’ इसी सोच के साथ हमने ‘धुन प्रोजेक्ट’ शुरू किया है.

धुंधली न पड़े सपनों की उड़ान

दिन मंगलवार, 12 जुलाई, स्थान रांची यूनिवर्सिटी प्रांगण, अवसर रांची यूनिवर्सिटी का 56वां स्थापना दिवस समारोह. शिक्षा मंत्री द्वारा खिलाडि़यों को सम्मानित किया जा रहा था. इसी दौरान झारखंड की शिक्षा मंत्री, एक महिला खिलाड़ी, परिणीता की कहानी सुन कर रो पड़ीं. उन्होंने तुरंत उसे मंच पर बुलाया. 50 हजार रुपयों की सहायता की घोषणा के साथ उसे गले से लगा लिया. परिणीता की आंखें छलक पड़ीं. जानना चाहेंगे, परिणीता की जिंदगी की कहानी में ऐसा क्या खास था जो खेलमंत्री भी खुद को भावुक होने से रोक नहीं सकीं.

झारखंड की राजधानी रांची से 13 किलोमीटर दूर कांके के सुंडिल गांव की रहने वाली परिणीता तिर्की फुटबौल और नैटबौल खिलाड़ी हैं. उन्होंने कई बार झारखंड का नाम रोशन किया. मगर जिंदगी ने उन्हें कभी भी आसान रास्ते नहीं दिए. हमेशा उन्हें कंटीलेपथरीले रास्तों से ही गुजरना पड़ा. कदमकदम पर आर्थिक कठिनाइयों व दूसरी बोझिल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा. छोटी सी उम्र में ही उन्होंने अपने पिता को खो दिया. घर में खाने के लाले पड़ गए. मां की तबीयत भी अब ठीक नहीं रहती. इस सब के बावजूद परिणीता ने अपना मनोबल टूटने नहीं दिया. मजदूरी करने के साथ उन्होंने खेल का अभ्यास और पढ़ाई भी जारी रखी. सुबह जल्दी उठ, घर के काम निबटा कर वे साइकिल से 6 किलोमीटर दूर स्कूल में पढ़ाने जाती हैं, फिर कड़ी धूप और धूलमिट्टी में रोज मजदूरी का काम करती हैं, और फिर थकी होने के बावजूद कांके डैम के पास के मैदान में करीब 30 गरीब बच्चों को फुटबौल की ट्रेनिंग देती हैं और अपनी प्रैक्टिस भी करती हैं. फिर घर आ कर कालेज की पढ़ाई पूरी करती हैं. फिलहाल वे एसएस मैमोरियल कालेज में बीए पार्ट 2 की छात्रा हैं. फुटबौल में ईस्टजोन में 3 बार अपना परचम लहरा चुकी हैं. वे वर्ष 2013 में टीम की कप्तान भी थीं.

यह तो बात हुई आर्थिक परेशानियों के बीच भी अपना मनोबल न टूटने देने की. वैसे, जिंदगी में परेशानियां किसी भी रूप में आ सकती हैं. कभी मानसिक पीड़ा, अवसाद, अपनों से विछोह तो कभी शारीरिक तकलीफें और बीमारियां, इन परेशानियों में उलझ कर हम अपना मकसद भूल जाएं, यह नहीं होना चाहिए. इस के विपरीत हम उन परेशानियों से जूझते हुए खुद को मजबूत बना सकते हैं, अपने इरादों में कठोरता ला सकते हैं, नए मकसद तलाश सकते हैं. जरूरत है अंदर से मजबूत बनने और मकसद के प्रति एकनिष्ठ रहने की.

फ्रांस के मशहूर दार्शनिक ज्यां पौल सार्त्र की कहानी भी काफी प्रेरणास्पद है. बचपन में उन्हें विभिन्न विषयों की पुस्तकें पढ़ना बहुत पसंद था. मगर उन की एक आंख खराब थी. उस वजह से ज्यादा पढ़ने से उन की दूसरी आंख पर अतिरिक्त भार पड़ता था. अतिरिक्त भार पड़ने के कारण उन की आंखों में लगातार दर्द की शिकायत रहने लगी. डाक्टर ने उसे पढ़नेलिखने से मना कर दिया मगर उन की जिद पर घर वाले उसे पढ़ कर सुनाने लगे. इस तरह उस ने एम ए पास कर लिया और फिर कई पुस्तकें भी लिखीं. वे अपने विचार दूसरों से लिखवाता और उन्हें किताब के रूप में छपवाता. दरअसल, जीवन का दूसरा नाम समस्या ही है. सफलता उसी व्यक्ति को मिलती है जो हर तरह की परिस्थिति में आगे बढ़ना सीख लेता है, जिस का मन अंदर से मजबूत होता है. हर परिस्थिति में मन को मजबूत बनाना व रखना चाहते हैं, तो इन बातों का खयाल रखें –

वह करें जो करना चाहते हैं : जब आप अपना पसंदीदा काम कर रहे होते हैं और उस काम में पूरी तरह एकाग्रचित हो जाते हैं तो आप का मन किसी भी हाल में दुखी या परेशान नहीं रह सकता. आप हार नहीं मान सकते. अपने पैशन को जी कर आप न सिर्फ मुश्किलों को खुद पर हावी होने से रोकते हैं, बल्कि सफलता के नए रास्ते भी खुलते चले जाते हैं. आर्ट औफ सक्सैस के डायरैक्टर ए के मिश्रा कहते हैं कि पहले यह तय करें कि आप किस चीज में रुचि रखते हैं. अपने शौक को पहचानें. उदाहरण के लिए आप को संगीत पसंद है, यह काफी नहीं. आप यदि संगीत के साथ खाते हैं, सोते हैं और सांस लेते हैं तो जरूर इस सपने को पूरा करने के लिए मेहनत करें. इमोशंस पर रखें कंट्रोल : हर रोज कितने ही इमोशंस से हमारा वास्ता पड़ता है. कभी खुशी कभी गम. कभी फ्रस्ट्रेशन तो कभी क्रोध. आज नहीं समझ पाते पर ये छोटीछोटी बातें हमारे दिमाग और इस की शक्ति पर गहरा असर डालती हैं. याद रखें, दिमाग और शरीर का गहरा नाता होता है. दिमाग में तनाव है, नकारात्मक भाव हैं तो शरीर स्वयं थक कर बोझिल रहने लगता है. जब भी कोई नकारात्मक भावना आप के दिल पर चोट करे तो केवल 90 सैकंड के लिए खुद को उस से प्रभावित होने से रोकें. डेढ़ मिनट का यह समय ही महत्त्वपूर्ण होता है जबकि कैमिकल लोचा आप को अवसाद में डाल सकता है या क्षुब्ध कर सकता है. यदि इस वक्त आप ने स्वयं पर नियंत्रण रख लिया तो फिर संभवतया हमेशा के लिए उस के नकारात्मक प्रभाव से आजाद रहेंगे.

जब दिल टूट जाए : कई लोग जिंदगी में मिलने वाले भावनात्मक धक्कों से जल्द उबर नहीं पाते. प्रेम और उस से जुड़े दर्द, जैसे प्यार न जता पाने का मलाल, प्यार में धोखा, बे्रकअप का दर्द, बेवफाई, तलाक जैसे हालात से व्यक्ति जल्द टूट जाता है और कामयाबी बहुत दूर चली जाती है. इन चक्करों में लोग अच्छाखासा कैरियर भी बरबाद कर लेते हैं. दर्द को पीछे छोड़ कर मजबूती के साथ आगे बढ़ना जिंदगी है. इतने मजबूत बनें कि आप उसे जाने दे सकें जिसे आप प्यार करते हैं. कभी किसी से कोई अपेक्षा न रखें. जो आप की केयर करते हैं वे आप की भावनाएं समझेंगे और जो आप की परवा नहीं करते उन के लिए दुखी हो कर अपने मन को कमजोर क्यों बनाएं.

समस्याओं में उलझे नहीं : मुसीबत के समय अकसर व्यक्ति दुखतकलीफ की बातें बारबार सोचने लगता है. ऐसे नकारात्मक विचारों का दोहराव जितना ज्यादा होता है, क्रिएटिविटी उतनी ही कम होती जाती है. मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक, 24 घंटे में एक सामान्य युवा के मन में 60 हजार से ज्यादा विचार चलते हैं. इस के विपरीत हर वक्त दिमाग परेशान रखने के बजाय एक निश्चित वक्त निकालें जब आप अपनी समस्याओं पर विचार करें और सिर्फ विचार ही न करें, हल निकालने का प्रयास भी करें, ताकि बाकी समय मन लगा कर काम कर सकें.

परिवर्तन ही जीवन है : जिंदगी में ऐसा कुछ भी नहीं जो हमेशा के लिए आप की जिंदगी में रहे. यदि आप आज खुश हैं तो हो सकता है कल परेशानी हावी हो जाए. आज दर्द में हैं तो हो सकता है कल दिल को दिलासा देने वाला कोई मिल जाए. सफलता से बेहद आह्लादित और असफलता से निराश हो कर न बैठें. वह करते रहें जो करना आप को अच्छा लगता है.

स्वयं पर विश्वास रखें : यह विश्वास रखें कि आप परिस्थितियों को बदल सकते हैं. मुसीबतों का सामना कर सकते हैं. आप के अंदर काबिलीयत है कि आप सफल हो सकें. आप की सोच ऐसी रही तो कभी आप परेशानियों से हार नहीं मानेंगे. यह मत सोचें कि आप का बचपन कठिनाइयों में बीता तो भविष्य में भी हालात बुरे ही रहेंगे, मंजिल पर सदैव अपनी नजर रखें, भले ही परिस्थितियां कैसी हों.

जो इंसान आप को खुश रख सकता है, वह आप स्वयं हैं. यदि आप की खुशी किसी दूसरे व्यक्ति पर निर्भर है तो याद रखें, यह हमेशा कायम नहीं रह सकती. किसी और व्यक्ति को इस बात के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता कि आप खुश हैं या दुखी. हर इंसान आजाद है वह करने के लिए जो करना वह चाहता है. बस, आप अपने प्रयास सदैव जारी रखें.

मुसकुराते रहें : जीवन में न चाहते हुए भी कई बार मुसकराना आवश्यक हो जाता है. जब आप परेशान हों, किसी पर नाराज हों या मन में नकारात्मक विचार आ रहे हों तो बस चेहरे पर मुसकराहट ले आएं. आप को एक नई ऊर्जा और ताजगी महसूस होगी और आप कुछ खास कर सकेंगे. तमाम तकलीफों व कमियों को नजरअंदाज कर अपनी आत्मशक्ति के बल पर सफलता के परचम लहराने वाली शख्सीयतों की कमी नहीं.

उदाहरण के लिए तमिलनाडु की बीनो जेफाइन गत वर्ष पहली 100 फीसदी विजुअली चैलेंज्ड आईएफएस औफिसर बनी हैं. जन्म से इस शारीरिक दुर्बलता का शिकार होने के बावजूद उन्होंने अंगरेजी में पोस्ट ग्रैजुएशन किया और फिर स्टेट बैंक में पी ओ के पद पर काम किया. इसी दौरान सिविल सर्विस एग्जाम 2013 में 34वां स्थान पा कर और आईएफएस औफिसर बन कर उन्होंने साबित कर दिया कि मन में जज्बा हो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं. इसी तरह झारखंड की अरुणिमा सिंहा, जो एक वौलीबौल प्लेयर थीं, गुंडों द्वारा ट्रेन से फेंके जाने के बाद एक पैर से हाथ धो बैठीं और दूसरा पैर भी बुरी तरह जख्मी हो गया. पर वे कमजोर नहीं पड़ीं. बैड पर लेट कर आंसू बहाने के बजाय उन्होंने माउंट एवरेस्ट फतह करने की ठानी. वे पहली ऐसी विकलांग महिला पर्वतारोही बन गईं, जिन्होंने माउंट एवरेस्ट तक पहुंचने का हौसला दिखाया.

राजलक्ष्मी नईनई डैंटिस्ट बनी थीं और इस क्षेत्र में कुछ बड़ा कर दिखाने का सपना देखती थीं. इसी बीच, वर्ष 2007 में एक कार ऐक्सिडैंट में उन की रीढ़ की हड्डी और सपने, दोनों ही टूट गए. पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. अब वे मिस व्हीलचेयर 2014 का खिताब हासिल करने के साथ एमडीएस (आर्थोडौंटिक्स) में उच्चतम 73 फीसदी नंबर ला कर अपना डैंटल क्लीनिक चला रही हैं. कोलकाता की 87 साल की शीला घोष की कहानी भी कम प्रेरणास्पद नहीं. वर्ष 2010 में अपने बेटे की मौत के बाद इस उम्र में भी उन्हें घर चलाने के लिए काम करना पड़ता है. वे सड़क के किनारे होममेड चिप्स के पैकेट्स बेचती हैं. उन का पोता बेरोजगार है जबकि बहू को किडनी की बीमारी है. जीवन में हुए हादसों से भी वे टूटी नहीं और किसी से रुपए मांगने के बजाय सम्मान के साथ अपने बल पर जी रही हैं. वे अंतिम सांस तक इस संघर्ष को कायम रखने का जिगर भी रखती हैं. 27 साल की सना इकबाल के पिता का 3 वर्ष पूर्व देहांत हो गया और फिर एक साल पहले काफी टौर्चर व हैरेसमैंट सहने के बाद उन्होंने पति से तलाक ले लिया. परिणामस्वरूप वे गहरे अवसाद में रहने लगीं और अपनी जिंदगी खत्म करने का विचार बारबार उन के जेहन में आने लगा. मगर फिर मन की शक्ति के बल पर उन्होंने खुद को संभाला और अपने दुधमुंहे बच्चे को जीने का सहारा बना कर दूसरे अवसादग्रस्त लोगों में सकारात्मकता का संदेश फैलाने हेतु नवंबर 2015 में अपनी बुलेट पर निकल पड़ीं. बाइक राइडिंग का शौक उन्हें सालों से था. अपनी तकलीफ भूल कर वे भारत भ्रमण कर जगहजगह लोगों के मन में जिंदगी के प्रति उत्साह भरने के मिशन में जुटी हैं. लब्बोलुआब यह है कि जिंदगी के सफर में जितनी भी, जैसी भी दिक्कतें आएं, मन को मजबूत बनाए रखें. उन का डट कर सामना करें, हल ढूंढ़ें, नए रास्ते तलाशें. दिक्कतों से जूझना जिंदगी का हिस्सा ही है और हार का स्वाद चखे बिना जीत की खुशी का भरपूर एहसास नहीं होता.

रिलायंस जियो: कहीं आप भी तो नहीं आ गए झांसे में

रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के चेयरमैन मुकेश अंबानी ने जियो 4जी सर्विस के प्लान के बारे में घोषणा कर दी. वाइस कॉलिंग, एसएमएस, ब्राउंजिग सबकुछ फ्री होने की बात कही, लेकिन हम आपको उन कारणों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसके बाद यह साफ हो जाएगा कि कुछ भी फ्री नहीं है.

यहां हमारा मकसद यह नहीं है कि लोग रिलायंस की इस ऑफर का लाभ ना उठाएं, हम बस ये चाहते हैं कि आप जियो सिम लेने से पहले पूरी सच्चाई से रूबरू हो जाएं.

सिर्फ 10 टैरिफ प्लान्स

रिलायंस जियो के सिर्फ 10 टैरिफ प्लान होंगे जिनमें से आप एक चुन सकते हैं. जिसकी शुरुआत 5 पैसे प्रति एमबी से होगी और 1GB डेटा की कीमत 50 रुपये होगी.

एप सब्स्क्रिप्शन फ्री, लेकिन डेटा के लगेंगे पैसे

डेटा पैक्स में ही रिलायंस जियो के प्रीमियम एप की सुविधा भी मिलेगी. ये एप्स दिसंबर 2017 तक फ्री हैं, लेकिन आपको इसके लिए डेटा पैक के पैसे देने होंगे. जियो सिम लेने पर आपको दिसंबर तक कुल 11 एप भी मिलेंगे.

एप काफी स्लो हैं और सभी सर्विसेज भी चालू नहीं

रिलायंस जियो के 11 एप काफी धीमे काम करते हैं और तो और इन एप्स में से कई की सर्विसेज भी अभी शुरु नहीं की गई है.

केवल 16 कंपनियों के फोन हैं को मिलेगा मुफ्त रिलायंस जियो सिम

रिलायंस जियो 4जी सिम कार्ड आप को 16 कंपनियों के स्मार्टफोन में ही काम कर पाएंगे. ऐसे में लोगों के पास विकल्प कम बचते हैं.

पोर्टेबिलटी की सुविधा नहीं है

रिलायंस जियो 4जी सिम कार्ड में फिलहाल आपको पोर्टेबिलटी की सुविधा नहीं मिल रही है. आगे कंपनी इस पर क्या कदम उठएंगी ये अभी पता नहीं है.

कागजात के साथ हो सकता है हेर-फेर

रिलायंस जियो 4जी सिम पाने के लिए कंपनी पहचान और निवास के प्रमाण पत्रों की फोटोकॉपी खुद से कराता है. ऐसे में कागजात के गलत इस्तेमाल के चाजेंस बढ़ जाते हैं.

बीवी की पिटाई क्यों?

महिलाएं किसी भी मजहब की क्यों न हों, उन्हें पीटना न सिर्फ अमानवीय है बल्कि गैरकानूनी भी है. मुसलिम महिलाओं को आगे बढ़ाने और समाज में उन की भागीदारी को सुनिश्चित करने हेतु हर क्षेत्र में अधिकार देने की मुहिम चल रही है जबकि दूसरी ओर उन की पिटाई करने का हक मर्दों को देने का सुझाव दिया जा रहा है. यह सुझाव पाकिस्तान काउंसिल औफ इसलामिक आइडियोलौजी (सीआईआई) ने दिया है. सीआईआई पाकिस्तान की संवैधानिक संस्था है जो समयसमय पर इसलामी कानूनों के हवाले से वहां की संसद को सुझाव देती है. यह अलग बात है कि पाकिस्तानी संसद उस के सुझावों को मानने के लिए बाध्य नहीं है. ताजा सुझावों ने महिलाओं को आश्चर्यचकित कर दिया है और उन में काफी रोष है. महिलाओं का तर्क है कि उलेमा ने समाज में अपने प्रभाव के चलते पिटाई को धर्म से जोड़ दिया है जबकि इसलाम में महिलाओं की पिटाई का कोई औचित्य नहीं है. सीआईआई के सुझावों को स्वीकार किया जाता है अथवा नहीं, यह अलग सवाल है लेकिन इन सुझावों ने एक पुरानी बहस को फिर से चर्चा में ला दिया है.

सुझावों में कहा गया है कि यदि कोई महिला मासिकधर्म में सफाई का खयाल नहीं रखती है, जिस्म को ढकने वाले कपड़े पहनने से इनकार करती है, शौहर की बातों से मतभेद रखती है और उन्हें नहीं मानती है, तो शौहर को अपनी बीवी की पिटाई करने का हक है. साथ ही, नर्सों द्वारा मर्द मरीजों की देखभाल करने और ‘अश्लील’ विज्ञापनों में महिलाओं के काम करने पर पाबंदी लगाने का भी सुझाव दिया गया है.

जहां तक महिलाओं की पिटाई का मामला है, इसलामी न्यायविधियों ने इस पर बड़ी लंबीचौड़ी बहस की है. भारत सहित मुसलिम देशों में यह व्यवस्था चलन में है क्योंकि उलेमा इस बात पर एकमत हैं कि महिलाओं की पिटाई करने का शौहर को हक है. फुकहा यानी धार्मिक न्यायविद ने पिटाई के लिए जो दिशानिर्देश दिए हैं वे बहुत दिलचस्प हैं. फतवों के अनुसार, बीवी की पिटाई झाड़ू की तीली अथवा किसी हलकी चीज से की जाए जिस से उस के शरीर पर निशान न पड़े, और चेहरे पर न मारा जाए, हथेली अथवा पीठ पर मारा जाए. लेकिन यदि कोई शौहर गुस्से में इन दिशानिर्देशों की अनदेखी कर बीवी को पीटता है, जिस का नमूना समाज में आएदिन देखने को मिलता है, तो क्या उस शौहर पर कोई कानून लागू होगा अथवा वह बेलगाम रहेगा, जैसे सवालों पर आमतौर पर कोई चर्चा नहीं होती है.

वैसे उपरोक्त सुझावों में यह व्यवस्था है कि यदि कोई शौहर अपनी बीवी पर हिंसा करता है तो उस के खिलाफ देश के कानून के मुताबिक कार्यवाही की जाएगी. बुनियादी सवाल यह है कि आदमी गुस्से के समय झाड़ू की तीली तलाश करेगा अथवा जो हाथ में आएगा, उस का इस्तेमाल करेगा. यहां महिलाओं की जिस तरह पिटाई होती है वह पिटाई नहीं, हिंसा की श्रेणी में आती है, जो अपराध है और यदि कोई महिला थाने में इस की शिकायत दर्ज कराती है तो पुलिस, कानून के अनुसार, उस आदमी के खिलाफ कार्यवाही करती है. लेकिन मुसलिम महिलाओं द्वारा शिकायतें कम ही दर्ज कराई जाती हैं.

शारीरिक व मानसिक पीड़ा

सीआईआई ने महिला अधिकारों के संरक्षण हेतु जो विधेयक तैयार किया है वह 164 धाराओं पर आधारित है. इस में बीवी को ‘हलकी मार’ की इजाजत दी गई है तो निसंदेह फुकहा के फतवों के अनुरूप है. इन फतवों की वजह से औरत की पिटाई को एक तरह से धर्म का संरक्षण प्राप्त हो गया है लेकिन इसलाम की मूलभावना में यह धारणा नहीं है बल्कि फुकहा का समयानुसार अपनी सोच पर आधारित फतवा है. इसलिए वह इसलाम द्वारा महिलाओं को दिए गए मानसम्मान से मेल नहीं खाता है. लेकिन यह भी सच है कि आमतौर पर किसी ने उलेमा की इस धारणा को चैलेंज नहीं किया है, बल्कि आंख मूंद कर उस का पालन किया जा रहा है.

इस संदर्भ में बीते दिनों सऊदी अरब के विख्यात बुद्धिजीवी डा. अब्दुल हमीद अबु सुलेमान ने 2002 में एक किताब ‘बीवी की पिटाई : कुरआन व सुन्नत की रोशनी में’ लिखी जिसे नई दिल्ली के इंस्ट्टियूट औफ औब्जैक्टिव स्टडीज ने प्रकाशित किया है. लेखक ने इस किताब में पिटाई को ले कर फुकहा के फतवों से मतभेद व्यक्त किया है. लेखक ने लिखा है कि आमतौर पर फुकहा ने कुरआन की सूरा-अल-निसा में इस्तेमाल शब्द ‘जरब’ से पिटाई का अर्थ लिया है लेकिन क्या इस का अर्थ शारीरिक चोट अथवा मानसिक पीड़ा पहुंचाना है.

समाज में मां का जो स्थान है, क्या उस को चोट पहुंचा कर उस की गरिमा बहाल रह सकती है और क्या एक स्वस्थ्य एवं नैतिक मूल्यों वाले समाज की कल्पना की जा सकती है. इसी तरह मियांबीवी के रिश्ते द्वारा 2 परिवार आपस में मिलते हैं और मियांबीवी से एक नया परिवार वजूद में आता है, क्या बीवी को पीडि़त करने व मानसिक पीड़ा पहुंचाने से एक नया परिवार वजूद में आ सकता है?

पिटाई से जो पीड़ा और मनमुटाव पैदा होता है वह दिलों में नासूर बन जाता है. नाराजगी जाहिर करने के लिए बीवी का बिस्तर अलग कर देना उपयुक्त तरीका है. ‘जरब’ शब्द से पिटाई समझना सही नहीं है बल्कि इस का अर्थ नाराजगी जाहिर करना है. नाराजगी के लिए पिटाई अथवा पीड़ा पहुंचाने का कोई औचित्य नहीं है. द्य

कर्टनी वाल्श बने बांग्लादेश के नये गेंदबाजी कोच

वेस्टइंडीज के पूर्व कप्तान कर्टनी वाल्श को हीथ स्ट्रीक की जगह बांग्लादेश का नया गेंदबाजी कोच नियुक्त किया गया. वह 2019 विश्व कप तक टीम के साथ रहेंगे.स्ट्रीक मई तक पिछले दो साल से बांग्लादेशी टीम के कोच की भूमिका निभा रहे थे.

वर्ष 2001 में टेस्ट में सर्वाधिक विकेट चटकाने वाले गेंदबाज के तौर पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहने वाले वाल्श पहली बार कोई बड़ी कोचिंग भूमिका निभा रहे हैं. वह विभिन्न भूमिकाओं में क्रिकेट प्रशासक के रूप में काम कर चुके हैं.

वह वेस्टइंडीज के चयनकर्ता, कैरेबियाई प्रीमियर लीग में जमैका तलावाह के मेंटर और वेस्टइंडीज अंडर-19 टीम के मैनेजर के रूप में कार्यरत रह चुके हैं. हाल में वह वेस्टइंडीज चयन पैनल का हिस्सा थे.

वाल्श ने कहा, ‘बांग्लोदश क्रिकेट को काफी वर्षों से खेलते हुए देख रहा हूं, उनमें काफी प्रतिभाशाली खिलाड़ी मौजूद हैं. चंदिका हाथुरूसिंघा ने बतौर मुख्य कोच काफी बढ़िया काम किया है इसलिये उम्मीद करता हूं कि मैं उनका पूरक हो सकूं और सकारात्मक प्रगति जारी रखूं.’

वाल्श बांग्लादेश से जुड़ने वाले वेस्टइंडीज के दूसरे क्रिकेटर हैं, उनसे पहले गोर्डन ग्रीनिज बांग्लादेश क्रिकेट में कोचिंग भूमिका निभा चुके हैं जिन्होंने बांग्लादेश को 1997 आईसीसी ट्राफी में जीत के जरिये 1999 विश्व कप में पहुंचाया था.

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