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युवाओं की पसंद खादी

कभी नेताओं की यूनीफौर्म मानी जाने वाली खादी अब युवाओं के स्टाइल में प्रमुख स्थान हासिल कर चुकी है. डिजाइनरों के अनुसार गरमी और मानसून के मौसम के लिए खादी बैस्ट आउटफिट है. हालांकि कई लोग खादी को आउटडेटेड फैब्रिक मानते हैं, लेकिन समय के तकाजे ने इसे आज के लेटैस्ट फैशन में बदल दिया है. इस की वजह है इस का ईकोफ्रैंडली होना. खादी को हमेशा से ही बैस्ट फैब्रिक माना जाता है, जिसे किसी भी मौसम में आराम से कैरी किया जा सकता है, साथ ही खादी को उम्रदराज लोगों के साथसाथ युवा भी कैरी कर रहे हैं, आज डिजाइनर्स ने इस फैब्रिक में काफी सारे परिवर्तन कर के इसे इंटरनैशनल मार्केट में ला खड़ा किया है.

इसी का नतीजा है कि पहले जहां खादी के आउटफिट क्रीम, सफेद व मैरून कलर में ही होते थे वहीं आज खादी हर कलर और कई फैब्रिक में मौजूद है जैसे रैगुलर कलर्स इंडिगो, रैड व येलो के अलावा ब्राइट ब्लू, ग्रीन और पिंक का प्रयोग कर इसे मौडर्न व कंटैंपरेरी लुक दिया है. आज खादी को पसंद करने वालों की संख्या में भी वृद्धि हुई है, जो इस की लोकप्रियता को दर्शाती है. स्टफ की बात करें तो इस में लिनन जूट, मटका, करेबी, मसलीन, कटिया, मधुबनी, खादी सिल्क, खादी कौटन आदि प्रमुख हैं. वैराइटी की बात करें तो इस में युवकयुवतियों की पसंद को खास तवज्जो दी गई है. यही वजह है कि इस में तकरीबन सारे आउटफिट हैं जैसे कुरतापाजामा, पटियाला सलवार, धोती, कफ्तान, स्कर्ट, हौल्टर टौप, कोस्टर टौप, लो वैस्ट ट्राउजर, ट्यूनिक, स्टोल्स, सलवार सूट, शर्ट, टी शर्ट, साड़ी आदि मौजूद हैं. इस में अपनी पसंद के हिसाब से कुछ भी कैरी किया जा सकता है.

खादी पर ब्लौक प्रिंट्स और ऐंब्रौयडरी हमेशा से ही चलन में रहे हैं. इस फैब्रिक पर किसी तरह का भी कट व स्टाइल ट्राई कर सकते हैं.

मानसून व गरमी के मौसम के लिए परफैक्ट है खादी

मानसून व गरमी के मौसम में युवाओं पर खादी का फैशन सिर चढ़ कर बोलता है. खादी के कूल व कंफर्ट होने की वजह से तमाम फैशन डिजाइनर भी गरमी व मानसून के मौसम को कंफर्टेबल बनाने के लिए इस फैब्रिक के आउटफिट को युवाओं की पसंद के हिसाब से तैयार करना नहीं भूलते. युवाओं में तो हमेशा से ही खादी के लंबे कुरते व जींस पौपुलर रहे हैं. इस के लिए युवाओं का यह कहना है कि मानसून व गरमी में खादी कंफर्टेबल रहती है. पसीना जल्द सोखने के साथ इस में हवा भी आसानी से पास हो जाती है. खादी वजन में तो हलकी होती ही है, साथ ही इसे कैरी करना भी आसान है.

बौडी टाइप और खादी

पीयर शेप बौडी : इस बौडी टाइप पर मुलायम खादी बौडी को पतला दिखाती है. इस के लिए खादी फैब्रिक से बनी ए लाइन वनपीस ड्रैस या कुरते से भी लोअर फैट कम दिखेगा. अपर पोर्शन को हैवी दिखाने के लिए टौप या कुरती में लेस लगा कर वी नैक पहनें. शर्ट को अंदर की तरफ न दबाएं. इस तरह की बौडी पर ट्राउजर ज्यादा अच्छे लगते हैं, लेकिन ट्राउजर का फैब्रिक लिनन रखें. इस तरह की बौडी पर फैट लेयर्स बौटम एरिया पर अधिक होता है. एप्पल शेप : इस तरह की बौडी पर खादी फैब्रिक से बनी ट्यूनिक बौडी के फैट को बैलेंस्ड दिखाती हैं. साथ ही खादी से ही तैयार लो वैस्ट ट्राउजर व पैंट पहनें. यह मौसम के अनुकूल तो रहेगी, साथ ही लोअर पोर्शन को बैलेंस्ड दिखाएगी. इस मौसम में जींस व उस से बने स्टफ को पहनने से बचें, क्योंकि यह मौसम के लिहाज से सही नहीं होगा. दूसरा इस से आप का लोअर पोर्शन और भी हैवी दिखेगा. इस तरह के बौडी शेप में फैट पेट के आसपास दिखाई देता है. अपर ग्लास बौडी : इस तरह की बौडी शेप में अपर व लोअर पोर्शन बराबर होता है. स्टाइलिश दिखने के लिए फिटिंग वाली लौंग खादी की ट्यूनिक पहनें या फिर वन पीस ड्रैस पहनें. टौप, ब्लाउज या कुरती में नैक गले का चुनाव करें. चुस्त व ओवर साइज टौप न पहनें. इस से अपर बौडी शेप हैवी नजर आएगी.

– फैशन डिजाइनर पूनम बजाज से बातचीत पर आधारित          

बचें सरकारी नौकरियों के फर्जी इश्तिहारों से

गांव देहात की रहने वाली अनीता ने रोजगार संबंधी एक अखबार में 8वीं जमात पास लोगों के लिए आंगनबाड़ी सहायिकाओं की भरती का इश्तिहार देखा, जिस के लिए 3 सौ रुपए के आवेदन शुल्क की मांग की गई थी, जो शिक्षा विकास संस्थान, मेरठ में बैंक ड्राफ्ट के जरीए भेजनी थी. उस इश्तिहार में हर ग्राम पंचायत में आंगनबाड़ी सुपरवाइजर, आंगनबाड़ी वर्कर व आंगनबाड़ी सहायिकाओं के पदों के लिए अर्जी मांगी गई थी.

अनीता ने फार्म खरीद कर तय शुल्क के साथ शिक्षा विकास संस्थान, मेरठ को नौकरी के लिए अर्जी भेजी, लेकिन अर्जी भेजने के एक साल बाद भी जब उक्त पद के लिए कोई बुलावा नहीं आया, तो उन्होंने इश्तिहार में दिए गए फोन नंबर पर बात करने की कोशिश की. लेकिन सभी फोन नंबर स्विच औफ थे. जब अनीता ने अपने आसपास के गांवों में पता किया, तो पता चला कि कई औरतों ने इस पद के लिए अर्जी दी थी, लेकिन आज तक उन सब से कोई संपर्क नहीं किया गया था. इसी तरह चांद ऐजूकेशनल ऐंड कल्चरल सोसाइटी, लेखू नगर, नई दिल्ली द्वारा सर्वशिक्षा अभियान के तहत 20 हजार से ज्यादा अध्यापकों के पदों पर भरती निकाली गई, जिस की न्यूनतम योग्यता 12वीं जमात पास होना तय थी. इस के लिए इस संस्था द्वारा आवेदन शुल्क के रूप में 250 रुपए के पोस्टल और्डर की डिमांड की गई थी.

लाखों बेरोजगारों द्वारा उक्त पद के लिए अर्जी दाखिल की गई, लेकिन उक्त संस्था द्वारा मांगा गया आवेदन फर्जी निकला. कैरियर काउंसलिंग से जुड़े ‘दिशा सेवा संस्थान’ के डायरैक्टर अमित मोहन का कहना है कि सरकारी महकमों में नियुक्तियों का अधिकार सिर्फ सरकार के पास होता है और इस के लिए सरकार इश्तिहार निकाल कर नियुक्तियां करती है. महकमों में होने वाली नियुक्तियों में पदों के मुताबिक अलगअलग शैक्षिक योग्यता तय की जाती है. किसी भी गैरसरकारी संस्था द्वारा अगर सर्वशिक्षा अभियान, आंगनबाड़ी, अग्निरक्षा विभागों सहित सरकारी महकमों में किसी तरह की नियुक्ति के लिए आवेदन मांगा जाता है, तो उस का मकसद महज ठगी करना होता है. अनीता के मामले में कुछ इसी तरह की ठगी की गई, क्योंकि आंगनबाड़ी विभाग में भी सरकार से जुड़ा महिला एवं बाल विकास मंत्रालय करता है. उत्तर प्रदेश में गांवों में आंगनबाड़ी व उस से जुड़े दूसरे पदों की नियुक्तियां की जा चुकी हैं. ऐसे में इस तरह के इश्तिहार भोलेभाले लोगों को नौकरी के नाम पर लूटना होता है. फर्जी संस्थाओं द्वारा निकाली गई वैकैंसी के आधार पर कुछ ही समय में करोड़ों रुपए इकट्ठा हो जाते हैं.

इस के बाद ये संस्थाएं अपना बोरियाबिस्तर समेट कर चंपत हो जाती हैं और 200-300 रुपए की मामूली रकम के लिए ठगी का शिकार हुआ शख्स इन के खिलाफ कोई शिकायत नहीं करता. इस के बाद इन संस्थाओं के लोग फिर से दूसरे शहरों में इस तरह की ठगी का जाल फैलाना शुरू कर देते हैं.

कम पढ़े ही बने शिकार

सरकारी नौकरियों के नाम पर फर्जी संस्थाओं द्वारा ठगी का मकसद सिर्फ कम पढ़ेलिखे लोगों को ठगने का होता है. कुछ इसी तरह का एक मामला बस्ती जिले के बनकटी ब्लौक के मरवटिया उर्फ जोगिया गांव के रहने वाले सुदामा प्रसाद के साथ हुआ. सुदामा प्रसाद ने अखिल भारतीय मानव हित संस्थान नाम की एक संस्था में नौकरी के लिए आवेदन किया और उस संस्था ने सुदामा को यह यकीन दिलाया कि वह भारत सरकार द्वारा नामित की गई एक संस्था है. जिस के द्वारा सभी गांवों में सायंकालीन स्कूल चलाए जाने हैं. गोरखपुर की इस संस्था ने सुदामा से शिक्षक पद पर नियुक्ति के लिए 50 हजार रुपए घूस के रूप में लिए और सुदामा की ही तरह जिले के तमाम गांवों के बेरोजगारों नौजवानों को नौकरी देने के नाम पर इस संस्था द्वारा पैसे की वसूली की गई. सुदामा 10 हजार रुपए महीने की तनख्वाह पर नियुक्त हुआ, लेकिन उस को पढ़ाते हुए जब 2 महीने से ऊपर हो गए, तो उस ने उस संस्था से अपनी तनख्वाह की मांग की, पर इस के पहले कि सुदामा उस संस्था से तनख्वाह ले पाता, संस्था गोरखपुर से अपना बोरियाबिस्तर समेट चुकी थी.

इस संस्था से जुड़े लोगों से जब ठगे गए और भी लोगों ने उन के मोबाइल नंबरों पर बात करनी चाही, तो सभी नंबर बंद मिले.

वैबसाइटों पर न करें यकीन

सरकारी नौकरियों के लिए सिर्फ वैबसाइटों पर निकलने वाली वैकैंसी को आधार मान कर विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि आएदिन रेलवे भरती बोर्ड सहित तमाम महकमों की फर्जी वैबसाइट बना कर बेरोजगारों से नौकरी के नाम पर ठगी के मामले सामने आते रहते हैं, जिस में ठगी करने वाला अपनेआप को संबंधित महकमे का अधिकारी बता कर न केवल वैबसाइटों के जरीए फार्म भरवाता है, बल्कि नौकरी की पक्की गारंटी के नाम पर भारीभरकम रकम वसूल कर फर्जी नियुक्तिपत्र भी थमा देता है. ऐसे में जब भी आप सरकार नौकरी के लिए आवेदन कर रहे हों, तो संबंधित विभाग व उस के द्वारा जारी किए गए इश्तिहारों की ठीक तरह से जांच करें, इस के बाद ही नौकरी के लिए आवेदन करें.

इन पर भी रखें नजर

अगर कोई संस्था आप को सरकारी महकमे में नियुक्ति कराने का दावा करती है, तो इस की शिकायत तुरंत अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन पर जरूर करें, क्योंकि किसी भी तरह की नियुक्तियों का अधिकार फर्जी संस्थाओं को नहीं दिया जाता है. कुछ महकमों द्वारा सेवा प्रदाता संस्थाओं के जरीए नियुक्यिं की जाती हैं, जिस में किसी तरह के आवेदन शुल्क की मांग नहीं की जाती और न ही नौकरी देने लिए किसी तरह की रकम की मांग की जाती है. नौकरियों के आवेदनों के फार्म बेचने की दुकान चलाने वाले एक आदमी का कहना है कि फर्जी संस्थाओं द्वारा नियुक्तियों के लिए निकाले गए आवेदन फार्म अकसर उन की दुकान पर मुफ्त में भेज दिए जाते हैं, लेकिन वे ऐसे फार्मों को फाड़ देते हैं, क्योंकि उन्हें अच्छी तरह पता है कि सरकारी नौकरियों के लिए निकाले गए कौन से इश्तिहार सही हैं और कौन से फर्जी. अगर आप कम पढ़ेलिखे हैं और सरकारी नौकरी पाने का ख्वाब देखते हैं, तो अपनी पढ़ाईलिखाई के मुताबिक पदों को चुनें. उस के लिए पूरी तैयारी के साथ इम्तिहान में शामिल हों, जिस से किसी भी तरह की ठगी से बच सकें. नहीं तो कोई छोटामोटा कारोबार कर के अपने कैरियर को आगे बढ़ाएं. आजकल प्राइवेट नौकरियों में भी बहुत गुंजाइश है.

हर हाल में बचाना ही होगा पानी

लगातार गिरते जमीन के पानी  के स्तर से हुई पानी की कमी की वजह से जनता परेशान है. जमीन के पानी का सतर यों ही गिरता रहा तो धरती पर जीवन बचाना ही मुश्किल हो जाएगा. पानी का जिस प्रकार से अंधाधुंध इस्तेमाल किया जा रहा है, उस का खमियाजा आने वाली पीढि़यों को भी भुगतना पड़ेगा. मौसम में बदलाव, पानी के स्रोतों में कमी, प्रदूषण और जरूरत से ज्यादा पानी के इस्तेमाल के चलते पूरा देश जल संकट की चपेट में है. जमीन के पानी को बहुत ज्यादा निकालने से कई इलाके डार्क जोन में आ गए हैं. इसलिए पानी के लिए बरसात पर ही निर्भर रहना पड़ रहा है. फिर भी सरकारी महकमे, जिम्मेदार लोग और आम आदमी कुदरत के दिए पानी को सहेजना नहीं चाहते. सरकार की ओर से भी सही कार्ययोजना न होने की वजह से पानी को बचाने की कोशिशें नहीं हो पा रही हैं.

आज भारत ही नहीं पूरा संसार पानी को ले कर  परेशान है. मौसम में बदलाव, पानी के जरीयों में कमी, प्रदूषण और जरूरत से ज्यादा जमीन से पानी को निकालने के चलते सभी देश पानी के संकट की चपेट में हैं.

डराते हैं ये आंकड़े

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के मुताबिक, साल 2025 से पहले ही पूरे भारत में पानी का जबरदस्त दबाव पैदा हो जाएगा. अंतर्राष्ट्रीय जनसंख्या संगठन के मुताबिक साल 2054 तक 64 देशों के 4 अरब लोग यानी उस समय की 40 फीसदी जनता पानी की किल्लत से जूझ रही होगी. केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुमान के मुताबिक अगर जमीनी पानी के अंधाधुंध इस्तेमाल का सिलसिला यों ही जारी रहा, तो देश के 15 राज्यों में जमीन के अंदर का पानी 2025 तक पूरी तरह खत्म हो जाएगा. एक अनुमान के मुताबिक हमारे देश में 2 करोड़, 10 लाख किसान फसलों की सिंचाई के लिए जमीन के पानी का इस्तेमाल करते हैं और कुल सिंचित इलाके में से 2 तिहाई में जमीनी पानी का इस्तेमाल होता है. देश में तकरीबन 40 करोड़ हेक्टेयर मीटर बारिश और बरफ गिरने से जमीनी पानी की मौजूदगी करीब 17 करोड़ 5 लाख हेक्टेयर मीटर है. जमीन की बनावट और दूसरी समस्याओं की वजह से इस में से केवल 50 फीसदी पानी का ही इस्तेमाल किया जा सकता है. बारिश के पानी को इकट्ठा न करने व बारिश की कमी के चलते देश में हर साल कहीं न कहीं सूखे की हालत बनी रहती है. जमीन  के पानी के अंधाधुंध इस्तेमाल से भी पानी की किल्लत बढ़ रही है. दुनियाभर में हर साल जितनी मात्रा में जमीनी पानी निकाला जाता है, उस की भरपाई नहीं हो पाती है. नतीजतन, आज कई राज्यों में जमीनी पानी का लेवल तकरीबन 1 मीटर की दर से हर साल गिर रहा है.

राजस्थान की ही बात करें तो 70 फीसदी सिंचाई कुओं व नलकूपों द्वारा ही पूरी की जाती है. साल 2014 तक 40 फीसदी कुएं सूख गए हैं. साल 2014 में स्वीडन में हुए विश्व जल सम्मेलन में वैज्ञानिकों ने पानी से पैदा होने वाली अकाल जैसी हालत के लिए आगाह किया है. 50 सालों में प्रति व्यक्ति पानी की मौजूदगी तेजी से घटी है, जो साल 1951 में 52 सौ घन मीटर की तुलना से साल 2011 में केवल 1825 घन मीटर ही रह गई और अगर समय रहते कोई हल नहीं निकाला गया तो साल 2050 तक पानी की मौजूदगी घट कर 1140 घन मीटर ही रह जाएगी. देश में बनाए गए ‘पानी दृष्टि 2025’ दस्तावेज के मुताबिक, साल 2025 में 1027 अरब घन मीटर पानी की जरूरत होगी, ताकि खाद्यान सुरक्षा व लोगों की पानी की जरूरत को पूरा किया जा सके.

साल 2025 में हमें 730 अरब घन मीटर पानी सिंचाई के लिए, 70 अरब घन मीटर पानी आबोहवा के लिए, 12 अरब घन मीटर पानी औद्योगिक इलाकों के लिए और बाकी दूसरे इलाकों के लिए चाहिए होगा. देश में बड़े पैमाने पर बारिश के पानी को इकट्ठा करना ही जल संचयन यानी पानी जमा करना कहलाता है. पानी को जमा करने से सूखे से निबटने में मदद मिलेगी व पानी के इस्तेमाल के अच्छे तरीकों से हमारे पानी के साधनों पर पड़ने वाले बोझ में भी कमी आएगी.

बचाना ही होगा पानी के जरीयों को

एक जमाने में जब कुएं, बावड़ी व तालाबों को बनवाया गया था, तब शायद बनाने वालों की यह मंशा थी कि वहां रहने वालों के साथसाथ राहगीरों व पशुओं को भी पीने के पानी के लिए भटकना नहीं पड़े व उन्हें पीने का पानी आसानी से मिल जाए. उस जमाने में भी शायद पानी का संकट लोगों के सामने रहा होगा. गौरतलब है कि इसी संकट से निबटने व लोगों को पानी देने के मकसद से उस जमाने के राजाओं द्वारा कुएं, बावड़ी व तालाब खुदवाए गए थे. गांवों के हजारों जलस्रोत ध्यान न दिए जाने के चलते खत्म होते जा रहे हैं. कभी साफ व मीठे पानी से भरे रहने वाले ये जलस्रोत आज कचराघरों में बदल गए हैं. यह हाल तो तब है, जबकि गरमियों में लोग पानी के लिए बुरी तरह से तरसते हैं. बावजूद इस के जिम्मेदार नगरपालिकाओं, नगर परिषदों व ग्राम पंचायतों द्वारा पानी के स्रोतों की साफसफाई, देखरेख व मरम्मत पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है.

आम नागरिक भी जलस्रोतों को खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. कई जगह तो इन जलस्रोतों को बेकार समझ कर लोग इन्हें मिट्टी या कचरे से भरते जा रहे हैं और इन पर कब्जा करने की जुगत में हैं.

बदहाल पड़े हैं पुराने तालाब व बांध

जल संरक्षण कर के पीने का पानी मुहैया कराने के सरकारी दावे भी झूठे साबित हो रहे हैं. इस के लिए पुराने समय के तालाबों व बांधों को भी यदि सहेज लिया गया होता, तो कम बारिश में भी बांधों, तालाबों व छोटेछोटे तालाबों में पानी जमा किया जा सकता था. गौरतलब है कि जयपुर में पुराने समय के तकरीबन 2600 तालाब हैं. लेकिन प्रशासनिक उदासीनता के चलते ये आज बुरी हालत में हैं. इन तालाबों में पानी आने के तमाम रास्ते बंद पड़े हैं. भले ही जल स्वावलंबन व मनरेगा जैसी योजनाओं के तहत इन तालाबों से मिट्टी उठा कर सफाई का काम तो किया जा रहा है, लेकिन पानी आने के रास्तों को ठीक किए जाने की कोई योजना नहीं होने से अच्छी बारिश में भी ये तालाब सूखे ही रहते हैं. जयपुर जिले के सब से बड़े व जिला मुख्यालय के सब से नजदीकी रामगढ़ बांध की बदहाली भी आज किसी से छिपी नहीं हैं. ऐसी ही बदहाल स्थिति दूसरे बांधों व तालाबों की भी है.

दम तोड़ती वाटर हार्वेस्टिंग प्रणाली

हर साल लाखों गैलन बरसाती पानी नदीनालों में बह जाता है. इस पानी को इकट्ठा करने के लिए कुछ साल पहले राजस्थान सरकार ने रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को जरूरी करार दिया था. बरसात के पानी को इकट्ठा करने के नाम पर लाखों रुपए खर्च कर के प्रदेशभर की तमाम सरकारी इमारतों व सरकारी स्कूलों में बनाए गए वाटर टैंक जर्जर हो कर बेकार पड़े हैं. कई इमारतों में तो इन टैंकों के खुले व अधूरे होने से दुर्घटनाएं होने का खतरा है. इस वजह से बारिश का पानी जमा नहीं होने से जहां योजना का फायदा नहीं मिल पा रहा है, वहीं सरकार के लाखों रुपए बेकार ही पानी में बह गए हैं. बरसात के पानी को इकट्ठा करने के लिए छतों के पानी को टैंक में इकट्ठा करने की सरकार की यह खास योजना थी. इस योजना के दायरे में तमाम सरकारी व गैरसरकारी इमारतों समेत 200 वर्गगज रकबे से बड़े मकान व फार्म हाउस आते हैं.

इस के तहत करीब 15-20 फुट की गहराई में टैंक बनाए जाते हैं. फिर छतों पर बरसात के दिनों में गिरने वाले पानी को नलों के जरीए फिल्टर कर के टैंकों में लाया जाता था. खासतौर से सरकारी स्कूलों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने के पीछे सरकार की मंशा यह थी कि इस के जरीए विद्यार्थियों व शिक्षकों को बारिश के पानी को इकट्ठा करने का महत्त्व समझाया जा सके. बरसात का पानी जमीनी पानी से ज्यादा उपयोगी होता है. स्कूलों में इस पानी का इस्तेमाल पीने के साथसाथ पेड़पौधों को सींचने व मिड डे मील पकाने वगैरह में किया जा सकता है. लेकिन सरकारी व प्रशासनिक स्तर की यह योजना हर जगह दम तोड़ती दिख रही है.

ऐसे बचाना होगा पानी

यह पानी की बेतहाशा बरबादी का ही नतीजा है कि अब पानी बचाने के नएनए उपाय ढूंढ़े जा रहे हैं. इस के बाद भी पानी की कमी लगातार बनी हुई है. पानी बचाना और पानी इकट्ठा करना, एक ही बात है. जरूरत के मुताबिक दोनों काम किए जा सकते हैं. अलगअलग इलाकों में ये काम अलगअलग तरीके से किए जा सकते हैं. पानी बचाने के कुछ तरीके ऐसे हैं, जिन्हें आजमा कर हर कोई फायदा उठा सकता है. मेंड़ व तलाई बांधने का तरीका देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर का पुरान तरीका है, जिस में कम लागत में ज्यादा पानी इकट्ठा किया जा सकता?है. मेंड़ हर जगह बांधी जा सकती है. यह किसी भी आकार के खेत की सुविधा के मुताबिक हो सकती है. इस में खेत के चारों ओर मेंड़ें उठा दी जाती हैं, जिस से बरसात का पानी खेत में इकट्ठा हो जाता है. काली भारी मिट्टी वाले इलाकों में यह विधि ज्यादा कारगर होती है. खेत तलाई, नाड़ी, एनिकट व छोटेछोटे पानी हौज व तालाब भी इसी तकनीक का हिस्सा हैं.

सरकार को जनजागरूकता के साथ जल इकट्ठा करने के कारगर व बुनियादी कदम उठाने ही होंगे. तालाबों व पुराने कुएंबावडि़यों को फिर से इस्तेमाल लायक बना कर बारिश के पानी को बरबाद होने से रोकना होगा. वाटर ट्रीटमेंट प्लांटों से रसोईघरों  व स्नानघरों के गंदे पानी को साफ कर के उसे दोबारा शौचालय या पार्कों  के उपयोग में लाने की व्यवस्था की जानी होगी. नदियों को गंदा करने वाले उद्योगों के मालिकों के खिलाफ भी कार्यवाही करनी होगी. पानी जमा करने के पुराने तरीकों को बढ़ावा देना होगा.

ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिस से बारिश के पानी के भंडार फिर से पानी से भर जाएं. इस के लिए आम जन को भी जागरूक करना होगा. इस के लिए वार्ड व मोहल्ला स्तर पर जल संरक्षण कमेटियां बनाना भी जरूरी है. इस में आमजन के साथसाथ जल संसाधन विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों को भी शामिल किया जाए. पानी का इस्तेमाल सब से ज्यादा खेती में होता है. इसलिए कुदरती तौर पर बरबादी भी इसी में ज्यादा होती है. माना कि पानी कुदरत की देन है, पर किसानों को भी इस की कद्र कर के पानी की अहमियत को समझना ही होगा. देशभर के किसान पानी की कमी के संकट से जूझ रहे हैं. सिंचाई के लिए पानी अब पहले की तरह नहीं मिलता. बांध, नहरों और नदीनालों के अलावा अब कुओं में भी पानी कम रह गया है. ऐसे में किसानों को खेती के तौरतरीकों में बदलाव के साथसाथ बूंदबूंद सिंचाई, फव्वारा सिंचाई. पाली हाउस, ग्रीन हाउस जैसी तकनीकी खेती करने की ओर ध्यान देना होगा. कम जमीन व कम पानी में ज्यादा पैदावार देने वाली फसलों की खेती करनी होगी.

बारिश के पानी को इकट्ठा करने के कई फायदे हैं. पानी इकट्ठा करने के लिए भंडारण, निर्माण और उस के रखरखाव में सामुदायिक भागीदारी की अच्छी उम्मीदें भी हैं. बारिश का पानी साफ और कार्बनिक पदार्थों से भरा होता है. बारिश के पानी को खासतौर से बनाए गए तालाबों, जलाशयों, गड्ढों और छोटे बांधों में इकट्ठा किया जा सकता है. मकानों की छतों पर बारिश के पानी को इकट्ठा करने का इंतजाम करना चाहिए. घरों और खेतों में पानी के इस्तेमाल में किफायत करनी होगी. घरों से निकलने वाले बेकार पानी का इस्तेमाल घरों में सब्जी पैदा करने के लिए करना चाहिए. फसलों को पानी देने में सिंचाई की मौर्डन तकनीकें अपनानी चाहिए, जिन में बूंदबूंद और छिड़काव सिस्टम खास हैं. फसलों और पेड़ों को पानी जरूरत के मुताबिक दें और एक बार ज्यादा सिंचाई करने के बजाय थोड़ीथोड़ी मात्रा में पानी बारबार दें. पानी की मौजूदगी बढ़ाने के लिए हमें अपने रहनसहन का तरीका बदलना होगा. घरों व कारखानों में पानी का इस्तेमाल सही ढंग से व जरूरत पर ही करना चाहिए. जमीनी पानी का इस्तेमाल करने के लिए बनाए जाने वाले खुले कुएं या बंद कुओं की तादाद व जगह वगैरह के बारे में राज्य सरकारों व नगरपालिकाओं ने नियम बनाए हैं, लेकिन उन का सही तरह से पालन नहीं हो रहा है. किसानों को दी जाने वाली मुफ्त या कम शुल्क की बिजली की सहूलियत से भी जमीनी पानी का अंधाधुंध इस्तेमाल हो रहा है. इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों को जमीनी पानी के इस्तेमाल के लिए भी कानून व नीति बनानी चाहिए, ताकि कुओं व नलकूपों की खुदाई पर काबू पाया जा सके. इस के अलावा जमीनी पानी के गिरते लेवल को ध्यान में रखते हुए खास इलाकों में खेती के लिए फसलों और पौधों का चुनाव भी होशियारी से करना चाहिए. खेती में सिंचाई के लिए आधुनिक सिंचाई तकनीकों जैसे ड्रिप इरिगेशन, फव्वारा सिंचाई, मिस्ट इरिगेशन और ड्रम किट इरिगेशन वगैरह का इस्तेमाल करना चाहिए. इन आधुनिक तकनीकों से तकरीबन 40 से 50 फीसदी पानी की बचत होती है, साथ ही पैदावार में भी 20 से 40 फीसदी की बढ़ोतरी होती है.

उपेक्षा से बेहाल गन्ना किसान

उत्तर प्रदेश का शामली जिला गन्ने की खेती के लिए पूरे देश में जाना जाता है. अपनी जमापूंजी लगा कर गन्ना पैदा करने वाले किसान जब मिलों में गन्ने को बेचने जाते हैं तो उन्हें समय पर भुगतान नहीं मिलता. आज किसान करोड़ों के भुगतान के लिए तरस रहे हैं. चीनी मिलें उन के करीब 300 करोड़ रुपए दबाए बैठी हैं. इसी जिले के कैराना में पलायन के मामले में एक तरफ जहां राजनीति गरमाई हुई है, वहीं किसानों की समस्या को सुनने वाला कोई नहीं है. किसान हताशा और परेशानी के शिकार हो रहे हैं. गन्ना बैल्ट के लिए मशहूर शामली की कमाई गन्ने पर टिकी है. जनपद का कुल कृषि रकबा 1,60,997 हेक्टेयर है. 58000 हेक्टेयर रकबे में गन्ना उपजाया जाता है. इस के अलावा 19075 हेक्टेयर में धान, जबकि 49606 हेक्टेयर रकबे में गेहूं की खेती होती है.

गन्ना उत्पादन के मामले में पश्चिमी यूपी में शामली भले ही सब से आगे हो, लेकिन इस के बावजूद पिछले 3 साल में गन्ना किसानों की हालत बद से बदतर होती जा रही है. किसान पूरे साल मेहनत करता है. खास बात यह भी है कि प्रदेश में शामली जिला 2 साल से गन्ने के उत्पादन के मामले में पहले नंबर पर है. पूरे प्रदेश का औसत उत्पादन 665 क्विंटल प्रति हेक्टेयर का है, वहीं अकेले शामली जिले का औसत उत्पादन 807.76 क्विंटल प्रति हेक्टयेर रहा है. जिले में छोटीबड़ी जोत वाले करीब 76 हजार 500 किसान हैं. आगे होने के बावजूद गन्ना भुगतान के मामले में पिछड़े हैं. शामली की 3 चीनी मिलों पर किसानों का 297 करोड़ 13 लाख रुपए बकाया है.

सभी को इंतजार है कि कब गन्ना मिलें उन के गन्ने की कीमत चुकाएंगी. मिलों द्वारा भुगतान न किए जाने से इस का असर जिले की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है. आर्थिक तंगी ने किसानों की कमर तोड़ कर रख दी है.  किसान कर्जदार और ब्लडप्रेशर व शुगर जैसी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं. इस का असर बाजारों पर भी है. पहले जहां दुकानों पर 15 से 20 हजार रुपए की बिक्री होती थी, अब 3 से 4 हजार रह गई  है. वेदपाल दुकानदार बताते हैं कि किसान आ कर भी क्या करें जब उन के पास पैसा ही नहीं है. तकाजे से भी वे बच रहे हैं. व्यापारी नेता घनश्यामदास गर्ग कहते हैं कि दुकानदारी  मंदी पड़ी है, लेकिन दुकानदार किसानों के दर्द को समझते हैं. सब से अच्छी बात तो यह है कि किसान ईमानदार हैं. जब उन के पास पैसा होगा, तो वे दुकानदारों का पैसा लौटा देंगे. इसी नाते उन को उधार सामान दे दिया जाता है. जिले के सैकड़ों किसान हैं, जिन्होंने जीतोड़ मेहनत  से अपने खेतों में गन्ना उगाया. उन का गन्ना खेत से चीनी मिलों तक तो गया, लेकिन भुगतान आज तक नहीं मिला. इस के चक्कर में न वे कर्ज चुका पा रहे हैं, न ही परिवार चला पा रहे हैं. यही तकलीफ ज्यादातर किसानों के तनाव की वजह बनती जा रही है. बैंकों का कर्ज भी बढ़ता जा रहा है. 31 मार्च 2016 तक कुल 24 बैंकों का 2 हजार 2 सौ 24 करोड़ का कर्ज लोगों पर है, जिस में करीब 17 करोड़ रुपए का कर्ज केवल किसानों पर ही है. बैंक कर्ज वसूल नहीं पा रहे हैं और परेशान हैं, तो किसान चीनी मिलों के भुगतान को ले कर परेशान हैं.  इस के अलावा बैंकों से किसानों ने क्रेडिट कार्ड बनवाए हुए हैं, उन का ब्याज भी उन्हें देना पड़ेगा. यह बात अलग है कि गन्ना मिलों से उन के पैसे का कोई ब्याज नहीं मिलेगा.

किसान जगमेर सिंह के पास 300 बीघे जमीन है. जमीन पर उन्होंने 1 हजार 789 क्विंटल गन्ने का उत्पादन कर के पूरे प्रदेश में रिकार्ड बनाया, उस के लिए उन्हें 50 हजार रुपए का इनाम तो मिला, लेकिन गन्ने का भुगतान अभी तक नहीं मिल सकता है. उन्होंने करीब 22 लाख रुपए का गन्ना बेचा, लेकिन मिले केवल 5 लाख रुपए. किसान का बेटा किसान ही बने इस पर वे सोचने के लिए मजबूर हो रहे हैं. हालात को देख कर वे अपने बच्चों को खेती करने के बजाय पढ़लिख कर कामयाब होने की सलाह देते हैं.

जगमेर सिंह ऐसा सोच सकते हैं, लेकिन ऐसे किसान परिवार भी हैं जो इस बारे में नहीं सोच सकते. पैसे की तंगी का असर सीधे उन के बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है. जिले में करीब 20 पब्लिक स्कूल हैं, जिन में पढ़ने वाले 15 फीसदी बच्चे किसान परिवारों से हैं. कर्ज के बोझ तले दबे किसानों के लिए बच्चों को पढ़ाना मुश्किल हो गया है. कई किसानों ने कर्ज ले कर बच्चों का दाखिला स्कूलों में कराया है. कई किसान ऐसे भी हैं, जिन्होंने अपने बच्चों को पब्लिक स्कूलों से निकाल कर गांव के ही प्राइमरी स्कूलों में पढ़ाना शुरू कर दिया है. सूर्यवीर सिंह बीएसएम स्कूल के चेयरमैन हैं. वे कहते हैं कि गन्ना किसानों के 10 से 15 फीसदी बच्चे पिछले कुछ सालों में स्कूल छोड़ चुके हैं. सूरजमल पब्लिक स्कूल के मैनेजर योगेंद्र मलिक बताते हैं कि वे किसानों की समस्या समझते हैं और जहां तक होता है उन की मदद भी करते हैं. उन का अभिभावकों पर करीब 26 लाख रुपए बकाया हैं. किसान यही कहते हैं कि गन्ने का भुगतान होने पर फीस चुका देंगे. ज्यादातर पब्लिक स्कूलों में यही हाल है.

हैरान करने की बात यह भी है कि 3 सालों से गन्ने का भाव नहीं बढ़ा है. चीनी मिलों का अपना तर्क है. मिलों के अधिकारी कहते हैं कि मिलें चीनी की बिक्री के बाद ही किसानों को भुगतान कर पाएंगी, लेकिन यह भुगतान कब और कितने समय में होगा इस की कोई गारंटी नहीं लेता. हालांकि पिछले कुछ समय समय में किसानों को 2 किश्तों में भुगतान किया भी गया, लेकिन वह बहुत कम था. यों तो किसानों के नाम पर दर्जनों संगठन हैं, लेकिन ठोस हल किसी के पास नहीं दिखता. भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत कहते हैं कि मिलों को गन्ना भुगतान तो करना ही होगा, वे रणनीति बना कर ठोस कदम उठाएंगे. किसान नेता सतपाल सिंह कहते हैं कि मिल प्रबंधकों से बात होती है, लेकिन वे वादों से मुकर जाते हैं.                       

उम्मीद से कायम है हौसला

किसानों के गन्ना मिलों पर भले ही करोड़ों रुपए बकाया हैं, लेकिन उन की उम्मीद और हौसला दोनों कायम हैं. मेहनतकश किसान गन्ने की रिकार्ड फसल पैदा करना चाहते हैं. नतीजन उन के खेतों में गन्ने की फसलें लहलहा रही हैं. पिछले साल के मुकाबले गन्ने का रकबा भी बढ़ गया है. पिछले साल जहां 48 हजार हेक्टेयर में गन्ना बोया गया था, वहीं इस बार 52 हजार हेक्टेयर से अधिक रकबे में गन्ना उगाया गया है. यानी गन्ने का रकबा 5.87 फीसदी बढ़ा है.

गन्ना विभाग के आंकड़ों पर गौर करें, तो पता चलता है कि शामली जिले के 292 गांवों में से 198 गांवों में सर्वेक्षण का काम अभी तक पूरा किया गया है. इन गांवों में हुए सर्वे की रिपोर्ट में पिछले साल के मुकाबले 5.87 फीसदी गन्ना रकबे में बढ़ोतरी हुई है. खास बात यह है कि गन्ने की फसल के लिए जिले की जमीन उपजाऊ होने के साथसाथ जलवायु भी माफिक है. इस के अलावा कम व अधिक बारिश झेलने की क्षमता है, तो रोग लगने की संभावना भी कम होती है. कई किसान ऐसे भी हैं, जिन्होंने कर्ज ले कर इस उम्मीद में गन्ने की फसल उगाई है कि उन्हें अच्छा भुगतान हो जाएगा. किसान कहते हैं कि चीनी मिलें समय से उन को गन्ने का भुगतान करती रहें, तो गन्ने का रकबा और बढ़ जाएगा.

शिक्षा मंत्रालय को छुटकारा स्मृति ईरानी से

कन्हैया कुमार से बेबात का झगड़ा मोल ले कर स्मृति ईरानी ने अपना कद घटा लिया है. शिक्षा मंत्री की हैसियत के लायक वे थीं या नहीं यह अगर छोड़ भी दिया जाए, जिस तरह उन्होंने कन्हैया कुमार के मामले में टैलीविजनी तेवर दिखाए थे वे आसानी से पच नहीं सकते थे. नरेंद्र मोदी ने समझ लिया पर फिर जता दिया कि केवल इमोशंस पर सरकार नहीं चलती. स्मृति ईरानी का कन्हैया कुमार से विवाद निरर्थक था. उन का इस मामले से कुछ लेनादेना नहीं था. यही बात हैदराबाद के रोहित वेमुला की आत्महत्या से थी, स्मृति ईरानी बेबात की ऐजुकेशन क्वीन बनने की कोशिश में संसद व बाहर कट्टरपंथी लाइन ले कर खड़ी हो गईं और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की नेता बन गईं जबकि उन का मंत्रिपद परिषद की पोस्ट से कहीं ऊंचा था.

यह मानने की बात है कि बिना फौर्मल ऐजुकेशन के भी वे शिक्षा मंत्रालय संभाल रही थीं. वैसे यह कोई अनूठी बात नहीं है. दिल्ली विश्वविद्यालय के सभी कालेजों को चलाने वाले अधिकांश लोग साधारण पढ़ेलिखे व्यवसायी या नेताओं के संगीसाथी हैं, जिन्हें शिक्षा के बारे में कुछ पता है. वैसे भी जो प्रिंसिपल या वाइस चांसलर बनते हैं वे भी इन लालाओं तथाकथित समाजसेवियों और नेताओं की सुनते हैं. स्मृति ईरानी शिक्षा मंत्री की पोस्ट पर कोई अजूबा न थीं. वे तेजतर्रार और कुछ करना चाहती थीं पर थोड़ी जल्दबाजी में और थोड़ी फारसाइटिडनैस की कमी ने उन को इस ऊंचाई से ला पटका है.

हालांकि उन के कुछ करीबियों का कहना है कि उन्हें शिक्षा मंत्री से हटाया इसलिए गया है, क्योंकि उन्हें 2017 के उत्तर प्रदेश के चुनावों का भार सौंपा जाना है जहां अगर पार्टी जीती तो वे मुख्यमंत्री भी बन सकती हैं. पावर कौरिडोरों में क्या छिपा है, यह किसी को नहीं मालूम होता. फिर भी शिक्षा मंत्रालय को स्मृति ईरानी से छुटकारा मिला, यह थोड़ा रिलीफ है.

अंधेरा आश्रम

गिरधारी लाल कसबे के बड़े कारोबारी थे. उन की पत्नी सुशीला देवी घर में पंडितों को भोज, पूजापाठ करवा कर आएदिन उन्हें दक्षिणा देती रहती थीं. वे आंख मींच कर पंडितों और बाबाओं पर भरोसा करती थीं. वे आएदिन व्रतउद्यापन कराती थीं, सो उन के घर में दूसरी सहेलियों का आनाजाना भी लगा रहता था. हर उद्यापन के पहले शहर के बड़े साड़ी स्टोर से आदमी नए फैशन की साडि़यां ले कर घर आता और सुशीला देवी खटाखट 15 एकजैसी साडि़यां बांटने के लिए निकाल लेतीं. फिर एक भारी साड़ी वे खुद के लिए पसंद करतीं और बहू इंद्रा को भी पुकारतीं और कहतीं कि तुम भी एक अच्छी साड़ी पसंद कर लो.

सुशीला देवी के घर में एक नामी बाबाजी का भी आनाजाना था. उन के आशीर्वाद के बिना तो घर का पत्ता भी नहीं हिलता था. कुछ भी नया काम हो, बाबाजी उस का मुहूर्त निकालते और हवन करते, फिर उस काम की शुरुआत होती. सुशीला देवी बाबाजी के आश्रम में जातीं और सेवा कर के आतीं. उन का विश्वास था कि घर में हर तरक्की बाबाजी के आशीर्वाद से होती है. हकीकत यह थी कि सुशीला देवी व उन के जैसे ही दूसरे भक्तों की मदद से बाबाजी का आश्रम हराभरा हो रहा था. जब सुशीला देवी सेवा के लिए जातीं, तो अपनी बेटी साक्षी को भी साथ ले जातीं. आश्रम में वे कहतीं, ‘‘बाबाजी के पैर छू कर आशीर्वाद लो बेटी.’’

बाबाजी भी साक्षी को आशीर्वाद देते और कहते, ‘‘देखना, हमारी साक्षी बेटी किसी राजा भोज को ब्याही जाएगी.’’ शकुंतला देवी बाबाजी के मुंह से शुभ वचन सुन कर धन्य हो जातीं. साक्षी निकली भी बहुत खूबसूरत. 4-5 साल बाद वह कालेज जाने लगी थी. जब इम्तिहान का समय आता, बाबाजी घर आते, साक्षी को आशीर्वाद देते. साक्षी भी उन की शख्सीयत से बहुत प्रभावित थी. कभीकभी अगर शकुंतला देवी सेवा के लिए न जा पातीं, तो वे साक्षी को भेज देतीं. सुशीला देवी की बहू इंद्रा पेट से हुई. सुशीला देवी तो बाबाजी के चरण पकड़ कर बैठ गईं और कहने लगीं, ‘‘कुछ ऐसा कीजिए बाबाजी, पहली बार में ही पोते का मुंह देखूं. पोता होते ही आप के पूरे आश्रम में एसी लगवाऊंगी.’’

बाबाजी ने बहू को पुकारा, ‘‘बेटी इंद्रा, जरा इधर आओ तो…’’

इंद्रा वहां आई. बाबाजी ने कुछ मंत्र बुदबुदाया और बहू को आशीर्वाद दिया. पोते की आस लिए सुशीला देवी जीजान से अपनी एकलौती बहू की सेवा में जुटी रहीं. सुबह उठते ही मक्खनमिश्री मिला कर बहू को दे देतीं और आंखें मटका कर कहतीं, ‘‘रोज खाया करो, मक्खन सा गोरा बेटा पैदा होगा.’’

एक दिन शकुंतला देवी ने साक्षी से कहा, ‘‘बेटी, आज बाबाजी के आश्रम में तुम चली जाओ, मुझे कुछ काम है. और देखो, रसोई में सूखे मेवे रखे हैं, उन्हें ले जाना नहीं भूलना. बाबाजी के आशीर्वाद से पोता ही होगा… देख लेना तुम लोग.’’ साक्षी भी मां के कहे मुताबिक बाबाजी की सेवा में जुटी रहती थी. बहू इंद्रा के दिन चढ़ रहे थे और सुशीला देवी की चिंता बढ़ती जा रही थी. उधर साक्षी पर बाबाजी की सेवा का काम बढ़ता जा रहा था. वह आश्रम में जा कर बाबाजी का बिस्तर लगाती, उन की खड़ाऊं जगह पर रखती, उन की किताबें जमाती, यह सब कर के वह अपनेआप को धन्य समझती.

साक्षी सारीसारी रात बाबाजी के आश्रम में बिताती. सुशीला देवी कुछ पूछतीं, तो वह कहती, ‘‘मां, आज आश्रम में अखंड मंत्र जाप था. सो, उठ कर बीच में नहीं आ सकती थी. मुंहअंधेरे बाबाजी को हवन करना था, इसलिए उस की तैयारी कर रही थी और देर हुई तो वहीं सो गई.’’ सशीला देवी भी चेहरे पर शांत भाव लाते हुए कहतीं, ‘‘हां बेटी, अच्छा ही है. हमारे घर में जो अच्छी आमदनी हो रही है न, सब बाबाजी की कृपा से ही है. अब बस इसे संभालने वाला एक वारिस और आ जाए, तो मैं बद्री नारायण के दर्शन कर आऊं.’’ साक्षी घर से सलवारकुरता पहन चुन्नी ओढ़ कर जाती और सांझ ढलते ही छोटेछोटे कपड़े पहन किसी अप्सरा का रूप धारण कर लेती. वह अपनी जवानी का बाबाजी के साथ भरपूर मजा ले रही थी. अंधा क्या चाहे दो आंखें. सो, बाबाजी दिन में घर से लाए मेवों का भोग लगाते और रात में साक्षी का.

कभीकभी सुशीला देवी कहतीं, ‘‘बेटी साक्षी, तुम बहुत आश्रम में बहुत रहने लगी हो. अपनी पढ़ाई पर भी जरा ध्यान दो.’’

साक्षी कहती, ‘‘मां, आप चिंता न कीजिए. मैं खुद ध्यान दे रही हूं अपनी पढ़ाई पर.’’

इधर बाबाजी जब कभी घर आते, तो सुशीला देवी से कहते, ‘‘साक्षी बेटी पर यह साल भारी है, थोड़ा आश्रम में मंत्र जपेगी और हवन करेगी, तो दोष मुक्त होगी.’’ साक्षी तो बाबाजी से इतनी सम्मोहित हो चुकी थी कि घर में कुछ न बताती. जो चल रहा था, उस में वह बहुत खुश थी. कभीकभी साक्षी की सहेलियां उसे पार्टी के लिए बुलातीं, तो साक्षी बाबाजी से कहती, ‘‘बाबाजी, आज रात को मैं न आ सकूंगी.’’ बाबाजी कहते, ‘‘अब तुम बिन हमारा जीवन असंभव है. तुम भी नहीं चाहोगी कि यह राज खुल जाए. एक रात की भी छुट्टी नहीं तुम्हें.’’

साक्षी बाबाजी के डर के मारे जिद न करती और अपनी सहेलियों से कह देती कि घर में काम ज्यादा है, वह पार्टी में न आ सकेगी. जल्दी ही सुशीला देवी के घर में खुशखबरी आ गई कि उन की बहू इंद्रा ने बेटे को जन्म दिया है. सुशीला देवी तो खुशी के मारे आसमान में उड़ने लगी थीं. घर में बड़े ही जोरशोर से जश्न मनाया गया और बाबाजी का आश्रम सुशीला देवी की कृपा से चमचमा उठा. अब पोते के साथ सुशीला देवी और ज्यादा बिजी हो गईं और उधर साक्षी बाबाजी के आश्रम में. वह बाबाजी के खिलाफ एक शब्द भी सुनना पसंद नहीं करती थी. अब कभीकभी सुशीला देवी कहतीं, ‘‘बेटी साक्षी, अब तुम आश्रम जाना छोड़ दो. पोता हो गया, मैं तो गंगा नहा ली. अब मैं फिर से बाबाजी की सेवा में जुट जाती हूं.’’

साक्षी कहती, ‘‘मां, कहां तुम इस उम्र में आश्रम में दौड़भाग करोगी? अब तुम पोता संभालो, बाबाजी की सेवा में मैं कोई कमी न आने दूंगी.’’

यह सुन कर सुशीला देवी के चेहरे पर बड़ी सी मुसकराहट बिखर जाती. वे मन ही मन सोचतीं, ‘आजकल लड़कियां इतना डिस्को में जाती हैं, अच्छा है साक्षी को यह हवा नहीं लगी. क्या फायदा 4 बौयफ्रैंड्स बना लेगी और वहां नशा करेगी. इस से अच्छा है कि आश्रम में ही सेवा करे, कुछ पुण्य ही कमाएगी.’ सुशीला देवी निश्चिंत हो कर एक तीर्थ कर आईं. उन्हें आए अभी 3-4 दिन ही बीते थे कि अस्पताल से फोन आया, ‘आप की बेटी अस्पताल में भरती है. आप जल्दी यहां आइए.’

सुशीला देवी ने जैसे ही फोन सुना, उन के तो हाथपैर फूल गए. एक बार को तो उन्हें कुछ समझ ही नहीं आया कि वे क्या करें, लेकिन अपनेआप को सहज किया, फिर झट से ड्राइवर को गाड़ी निकालने को कहा. वहां जा कर जब उन्हें सारी बात मालूम हुई, तो उन्हें कानों सुने पर विश्वास ही न हुआ. मालूम हुआ कि साक्षी अस्पताल में बच्चा गिरवाने आई थी और उस दौरान उस की अंदर की कोई नस फट गई, जिस के चलते उस के शरीर से बहुत खून बह गया और उस की जान को खतरा हो गया. सुशीला देवी तो समझ ही नहीं पाईं कि यह कब और कैसे हो गया. साक्षी अभी बेहोशी की हालत में थी.

जब साक्षी को होश आया, तो सुशीला देवी ने उस के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, ‘‘यह कैसे हो गया बेटी?’’

साक्षी सिर्फ इतना ही कह पाई, ‘‘बाबाजी…’’

यह सुन कर सुशीला देवी के तो जैसे तनबदन में आग लग गई. वे कहने लगीं, ‘‘क्या बाबाजी ने जबरदस्ती की तुझ से?’’

साक्षी बोली, ‘‘नहीं मां, सब मेरी मरजी से. मुझे नहीं मालूम कि क्या हो गया है, लेकिन बाबाजी का साथ मुझे अच्छा लगता है.’’ उस की बात सुन कर सुशीला देवी का गुस्सा बेकाबू हो गया. फिर भी अपनी व साक्षी की इज्जत  की खातिर अपनेआप को शांत कर वे बोलीं, ‘‘बेटी, क्या सोचा और क्या पाया?’’ खैर, अस्पताल में तो उन्हें मुंह बंद रखने में ही समझदारी नजर आई. साक्षी को अस्पताल से डिस्चार्ज करवा कर वे घर लाईं. सेठ गिरधारी लाल ने जब सचाई सुनी, तो उन के पैरों तले जैसे जमीन खिसक गई. पर अब किया भी क्या जा सकता था. आखिर इस सब में साक्षी भी तो शामिल थी. हां, सुशीला देवी का बेटा रमेश कहने लगा, ‘‘देखा मां, बाबाजी की अंधभक्ति का नतीजा. मैं ने तुम्हें कितनी बार समझाया था कि घर में जो कुछ है, वह पिताजी व मेरी मेहनत का फल है. बाबाजी के आशीर्वाद से कुछ नहीं होता है, लेकिन मां, तुम्हें तो उन पर इतना विश्वास था कि तुम मेरी एक भी बात ध्यान से सुनती तक नहीं.’’

भाईभाभी, सुशीला देवी व गिरधारी लाल ने मिल कर साक्षी को बड़े प्यार से समझाया, ताकि वह बाबाजी के सम्मोहन से बाहर निकल सके. फिर सुशीला देवी का बेटा रमेश व बहू इंद्रा साक्षी को एक काउंसलर के पास ले गए, ताकि वह उसे समझाबुझा कर उस के बीते कल से छुटकारा दिला सके. कुछ महीने के लिए सुशीला देवी उसे अपनी बहन के घर ले गईं. कुछ समय में साक्षी फिर से सामान्य हो गई थी. अब सुशीला देवी समझ गई थीं कि बाबाजी ने उस की अंधभक्ति का इस्तेमाल किया और उस के विश्वास का फायदा उठा कर उसी की बेटी का सम्मोहन कर लिया था. लेकिन अब सुशीला देवी ने बाबाजी के लिए अपने घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर दिए थे. बाबाजी ने भी सोचा कि शांत रहने में ही भलाई है, वरना कहीं गिरधारी लाल आगबबूला हो गए, तो पुलिस में रिपोर्ट कर देंगे और उन की पोलपट्टी खुल जाएगी. उन्होंने जो आश्रम में हवनकीर्तन के नाम पर कारोबार किया हुआ है और बाबाजी का मुखौटा पहना है, वह जनता के सामने न उतर जाए. कहीं उन्हें जेल की हवा न खानी पड़ जाए.

क्या आप भी च्विंगम खाते हैं, अगर हां तो एक बार देख लें ये VIRAL VIDEO

च्विंगम खाने का शौक किसे नहीं होता, लेकिन क्या आपको पता है कि उसे कैसे तैयार किया जाता है. बहुत लोगों से आपने सुना भी होगा कि इस तरह की कैंडीज या गम बनाने के लिए जानवरों की चर्बी का इस्तेमाल किया जाता है. ये बिलकुल सच है कि इसे बनाने के लिए Gelatin का इस्तेमाल किया जाता है जो कि जानवरों की स्किन और हड्डियों से ही मिलता है.

बता दें कि बेल्जियम के एक फिल्ममेकर Alina Kneepkens ने लोगों को इस बात के प्रति सजग बनाने के लिए 2 मिनट की एक शार्ट फिल्म बनाई है जो कि सोशल मीडिया पर खूब शेयर की जा रही है. इस वीडियो में बड़ी बारीकी से दिखाया गया है कि कैसे जानवरों खासकर सूअर की चर्बी और स्किन का इस्तेमाल च्विंगम बनाने के लिए किया जाता है. आप भी देखें ये वीडियो…

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पूनम पांडे की अडल्ट फिल्म ‘द वीकेंड’ के ट्रेलर ने मचाई धूम

पूनम पांडे भारत की पहली मोबाइल अडल्ट फिल्म 'द वीकेंड' लेकर आई हैं. द वर्ल्ड नेटवर्क्स कंपनी के बैनर तले सुरेश नाकुम द्वारा निर्मित 'द वीकेंड' का ट्रेलर रिलीज किया गया. हालांकि फिल्म का ट्रेलर रिलीज से पहले ही लीक हो गया और रातों-रात इसे खासी लोकप्रियता भी हासिल हुई.

फिल्म 24 सितंबर को रिलीज होगी. 22 मिनट की फिल्म को www.poonampandey.in पर सब्सक्राइब कर और 50 रुपये का भुगतान करने पर देखा जा सकता है. पूनम ने कहा कि यह पॉर्न फिल्म नहीं, एक फीचर फिल्म है.

फिल्म को मोबाइल प्लैटफॉर्म पर लॉन्च करने की वजह के बारे में जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस तरह से उनके प्रशंसक फिल्म को बिना किसी कांट-छांट के पूरी देख पाएंगे. पूनम का तर्क यह है कि इस तरह फिल्म सेंसर बोर्ड की कैंची से बच जाएगी.

उन्होंने सेंसर बोर्ड के बारे में कहा, 'सेंसर बोर्ड से तो सभी डरते हैं. सेंसर से तो पूरी इंडस्ट्री भाग रही है.' उन्होंने चुटीले अंदाज में इशारों ही इशारों में यह भी जाहिर कर दिया कि इस इरोटिक फिल्म में उनका ग्लैम और बोल्डनेस कोशंट बेहद हाई है.

उन्होंने कहा, 'मेरी इस फिल्म में सेंसर बोर्ड दूर-दूर तक नहीं है. यह पहली व्यस्क फिल्म है, जिसे सेंसर नहीं किया है और पहली बार मोबाइल प्रेमियों के लिए इस तरह का प्रयास हुआ है. मेरे प्रशंसकों को फिल्म से निराशा नहीं होगी. मैं बहुत खुश हूं, इसमें मुझे भी कुछ ज्यादा करने को मिला है.'

पूनम ने कहा, 'द वीकेंड' एक हॉरर स्टोरी है, जो दिल्ली के एक बिंदास जोड़े के ईद-गिर्द बुनी गई है. इस जोड़े की भूमिका मैंने और अमित ने निभाई है, जो अपने बिंदास अंदाज के चलते सीरियस टाइप की परिस्थितियों में आ जाते हैं.

सेक्सी का टैग बदलने के सवाल पर उन्होंने कहा, 'हे भगवान, यह सुनने से पहले मैं मर क्यों नहीं गई. नहीं, कभी नहीं, मैं ऐसी ही हूं और मैं पचास साल की भी हो जाऊं, तो भी मैं सेक्सी ही कहलाना पसंद करूंगी.'

पूनम ने कहा कि उनकी फिल्म सही मायने में डरावनी है और उन्हें इसकी शूटिंग के दौरान भी काफी डर महसूस हुआ. उन्होंने कहा, 'फिल्म से काफी उम्मीदें हैं. इसकी कहानी, मंच, तकनीक सभी कुछ नया है. यह किसी और फिल्म जैसी नहीं है. इसमें दर्शकों को अभिनय, सेक्स, सस्पेंस, थ्रिल, ड्रामा सभी मसाले मिलेंगे.'

सनी लियोनी से खुद की तुलना किए जाने पर और इस सवाल पर कि उन्हें बॉलीवुड में काम क्यों नहीं मिल रहा बॉलीवुड में काम क्यों नहीं मिल रहा, पूनम ने कहा, 'अगर चार-पांच बोल्ड फिल्में करने के बाद मुझे घर पर बैठना पड़े तो मैं यह क्यों करूं?'

हिंदी फिल्म 'नशा' और तेलुगू फिल्म 'मालिनी ऐंड कंपनी' जैसी फिल्मों में काम कर चुकीं पूनम ने इसी के साथ दावा किया कि उन्हें बॉलीवुड से कई प्रस्ताव मिले हैं, लेकिन उन्होंने वे प्रस्ताव इसलिए स्वीकार नहीं किए, क्योंकि उन्हें कोई मनपसंद किरदार नहीं मिला. इस दौरान पूनम ने कहा, 'मुझे राधिका आप्टे का काम पसंद है. उनका काम रियल लगता है.

आप भी च्विंगम खाते हैं, अगर हां तो एक बार देख लें ये VIRAL VIDEO

च्विंगम खाने के फायदे और नुकसान दोनों होने का दावा कई तरह के शोध कर चुके हैं.

च्विंगम चबाने से होते हैं ये सभी नुकसान

बहुत से लोगों को च्विंगम चबाने की आदत होती है. यह कहा जा सकता है कि लोगों को च्विंगम चबाने की लत लग जाती है और फिर यह जल्दी से छूटती नहीं है. बहुत बार आपके टीचर ने आपको क्लास रूम में च्विंगम चबाने के कारण डांटा होगा. केवल इसके साइड इफैक्ट के लिए नहीं बल्कि कक्षा में असभ्य व्यवहार करने के कारण.

फिर भी हम आपको कुछ कारण बता रहे हैं कि च्विंगम क्यों नहीं खाना चाहिए. आइए देखते हैं च्विंगम के कुछ नुकसान. च्विंगम चबाने के ये बुरे प्रभाव हैं.

जंक फूड खाने पर ज़ोर

एक रिसर्च से पता चला है कि खास तौर पर मिंट वाली च्विंगम चबाने से आप फल और सब्जियों जैसी स्वास्थ्यप्रद चीजों से दूर रहते हैं. सिर्फ ये ही नहीं, यह आपको जंक फूड खाने के लिए मजबूर भी करती है.

जोड़ों के दर्द का कारण बनती है

मुह की मांसपेशियों का ज्यादा इस्तेमाल भी नुकसानकारी है. लगातार च्विंगम चबाने से एक डिसऑर्डर होता है जिसे मेडिकल की भाषा में टेम्पोरोमंडीबुलर डिस ऑर्डर कहते हैं. इसमें जबड़े और खोपड़ी को जोड़ने वाली मांसपेशियों में तेज दर्द होता है.

गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल की समस्या '

च्विंगम चबाने से बहुत सी हवा पैदा होती है जिससे पेट में सूजन और दर्द हो सकता है. यह अपच और सीने में जलन का कारण भी बन सकता है. यह च्विंगम चबाने का एक दुष्परिणाम है.

सिरदर्द और एलर्जी

सिरदर्द और एलर्जी भी च्विंगम के हानिकारक प्रभाव हैं. ज्यादा च्विंगम चबाने से सिरदर्द और एलर्जी होती है. इसका यह कारण है कि च्विंगम में बहुत से प्रिजर्वेटिव्स, आर्टिफ़िशियल फ्लेवर्स और आर्टिफ़िशियल शुगर मौजूद होती है जो कि विषाक्तता, एलर्जी और सिर दर्द पैदा करती हैं.

इससे दांत भी खराब होते हैं

यह सच है कि कभी-कभार च्विंगम चबाना मसूड़ों और दातों के लिए ठीक है. फिर भी इसका ज्यादा इस्तेमाल आपके दांतों को नुकसान पहुंचा सकता है और इससे आपके दाँत गिर भी सकते हैं. इसका कारण है कि च्विंगम में माजूद शुगर कोट से दांतों में बैक्टीरिया के प्रवेश के लिए जिम्मेदार है.

डायरिया

च्विंगम चबाने से डायरिया भी होता है. मैन्थोल और सोर्बिटोल जैसे आर्टिफ़िशियल स्वीटनर्स आंतों में जलन पैदा करते हैं. इससे डायरिया होता है और शरीर का तरल निकलने के कारण डिहाईड्रेशन भी होता है.

इससे जहरीला पारा स्त्रावित होता है

 कुछ लोगों के दांतों के बीच कुछ भरावट होती है जो कि पारे, सिल्वर और टिन की होती है. ज्यादा च्विंगम चबाने से यह पारा दांतों के बीच से निकलकर शरीर में चला जाता है. यह पारा मनुष्य के लिए जहर समान है.

यह विकास में बाधित होता है '

एक अध्ययन से पता चला है कि जो बच्चे और टीन एजर्स ज्यादा च्विंगम चबाते हैं युवावस्था में उनके चेहरे का सही विकास नहीं होता है. उनका चेहरा सामान्य से बड़ा होता है क्यों कि ज्यादा च्विंगम से जबड़े और चेहरे की मांसपेशियाँ उत्तेजित होती हैं. यह भी च्विंगम चबाने का एक बड़ा साइड इफैक्ट है.

च्विंगम खाने से फायदा

च्विंगम केवल एक माउथ फ्रेशनर नहीं है बल्कि इसको चबाने से कई तरह के स्वास्थ्य लाभ भी होते हैं. यह केवल खाना खाने के बाद या फिर जब बोर हो रहे हों, तभी खाने की चीज़ नहीं है. रिसर्च के मुताबिक, च्विंगम खाने से हमारे स्वास्थ्य पर कई तरह के अच्छे असर प़डते हैं. इसको खाने से मोटापा कम होता है और दांतों की समस्प्तया भी हल होती है. चलिए जानते हैं च्विंगम चबाने के और भी लाभ क्या-क्या हैं.

मोटापा कम

इसको चबाने से वजन कम करने में मदद मिलती है. कम कैलोरी वाली फैट फ्री च्विंगम होती है जिसेस कैलोरिज बर्न होती है. इसको चबाने से आपके जब़डे की मासपेशियों पर असर प़डता है. यही नहीं इससे भूख पर भी कंट्रोल रहती है और मीठा खाने की तीव्र इच्प्त;छा भी कम होती है. साथ ही च्विंगम दिन भर में 11 कैलोरी प्रति घंटे कम करने की क्षमता रखती है

पाचन शक्ति में सुधार

च्विंगम आंत गतिशीलता में सुधार करती है. जब आप च्विंगम चबाते हैं तो उस दौरान मुंह से ज्यादा थूक आता है जो डायजेस्टिव एसिड को पेट से मुंह में आने से रोकता है. इसलिए भोजन आराम से पच जाता है और पाचन शक्ति में सुधार होता है.

मौखिक स्वास्थ्य

जब की आप च्विंगम खाते हैं तब मुंह में ज्प्यादा थूक आना प्रारम्प्तभ हो जाता है. थूक, मुंह की बीमारियों जैसे, दांत की स़डन, कैविटी आदि को होने से बचाती है. हां अगर आप सोंच रहे हैं कि आप जो मन करे वह च्विंगम खा सकते हैं तो ऎसा नहीं है. आपके दांत न स़डे इसलिए आपको शुगर फ्री ही च्विंगम खानी चाहिये. कृत्रिम मिठास वाली च्विंगम मोटापेको बढावा देने के अलावा दांत को भी खराब करती है.

सफेद दांत

च्विंगम खाने से आपके दांत सफेद होगें और जब़डे मजबूत होगें. डबल चिन, यानी की अगर आपके गले के पास मोटापा दिखाई देना शुरू हो गया है तो च्विंगम चबाने से अच्प्तछी एक्प्तसर्साइज तो और कोई हो ही नहीं सकती है. इसको चबाने से दांत पर लगे पीले दाग भी साफ हो जाते हैं और चमकने लगते हैं. अगर सांस में बदबू आती है तो च्प्त;विंग गम चबाने से ठीक हो जाएगी.

यूपी में डीजीपी पर चली ‘टेजर गन’

उत्तर प्रदेश के पुलिस मुख्यालय यानि डीजीपी कार्यालय में उत्तर प्रदेश के डीजीपी जावीद अहमद खडे हुये थे.उनके बगल डीजीपी के सहायक भी थे. ऐसे में पीछे से ‘टेजर गन’ चलती है.डीजीपी सामने की ओर गिरते इसके पहले पास खड़े लोगों ने संभाल लिया.अचेत हो गये डीजीपी कुछ देर में होश में आ गये. अपने इस कदम से अपने मातहतों को एक शिक्षा दे गये कि दूसरो को वहीं कहो जो खुद कर सके. 

उत्तर प्रदेश सरकार ‘टेजर गन’ को पुलिस विभाग को देना चाहती है. जिससे उपद्रव के समय आसानी से उन पर काबू पाया जा सके. सुरक्षा उपकरणों का सप्लाई करने वाली कपंनी ने ‘टेजर गन’ का डेमो पुलिस विभाग को दिखाने का काम किया. डीजीपी आफिस में जब इस गन का ट्रायल होना था तो बहुत सारे अफसर और पुलिस के जवान वहां मौजूद थे. ट्रायल के लिये किसी जवान को आगे आने कहा गया तो लोग हिचकने लगे. ऐसे में उत्तर प्रदेश के डीजीपी जावीद अहमद खुद ‘टेजर गन’ के ट्रायल के लिये सामने आये. डीजीपी के सहायक संजय सिंघल और एक अन्य ने डीजीपी को पकड़ लिया तब पीछे से ‘टेजर गन’ से गोली चलाई गई. तेज झटके गोली लगने से डीजीपी अचेत होने लगे तो उनको जमीन पर लिटा दिया गया. कुछ समय में वह फिर नार्मल हो गये.

नासा के रिसर्चर जैक कोवर ने 1969 में टेजर गन बनाने की योजना शुरू की थी. तब से अब तक इसमें तमाम तरह के सुधार किये गये. इसको बनाने का मकसद यह था कि बिना जान जाये दूसरे को अपने कब्जे में किया जा सके. टेजर को कनडक्टेड इलेक्ट्रिकल वेपन के रूप में जाना जाता है. यह इलेक्ट्रि शौक वेपन होता है.इसमें 2 इलेक्ट्रोड होते है.एक कंडक्टर के जरीये मेन यूनिट से जुडे रहते है.जब यह किसी के शरीर से टकराते है तो तेज कंरट पैदा होता है.इससे गोली लगने वाले का मांसपेशियों से नियंत्रण छूट जाता है.शरीर न्यूरों मसक्यूलर की दशा में पहुंच जाता है.गोली लगने वाले को कोई चोट नहीं लगती पर वह अचेत सा हो जाता है.ऐसे में उसको काबू में करना सरल हो जाता है.

डीजीपी जावीद अहमद ने बताया कि जब ‘टेजर गन’ शरीर से टकराती है तो तेज झटका लगता है.वह बेहोश हो गये.दिन में तारे से दिखने लगे.मुझे लगा कि किसी और से ट्रायल के लिये कहने से अच्छा है कि खुद पर ट्रायल हो. अभी इस पर रिसर्च चल रही है.रिसर्च में सफल होने के बाद ही पुलिस फोर्स में इसके शामिल किये जाने का कोई फैसला लिया जायेगा. 

                               

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