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छुआछूत के शिकार दलित

मोबाइल फोन, टैक्नोलौजी और इंटरनैट से बहुतकुछ बदला है, लेकिन अगर कुछ नहीं बदला तो वह है पिछड़ी जातियों व दलितों से भेदभाव की सोच. यों तो दलितों से भेदभाव की खबरें देशभर में होती रही हैं, लेकिन एक बड़ी हकीकत चौंकाती है. एक गांव ऐसा भी है, जहां गांव के हज्जाम दलितों के बाल नहीं काटते. यह किस्सा साल 2 साल का नहीं, बल्कि पीढि़यों से चली आ रही एक शर्मनाक परंपरा का है.

यह किस्सा दुनिया के सब से बड़े लोकतंत्र की राजधानी दिल्ली से तकरीबन सवा सौ किलोमीटर दूर नैशनल हाईवे नंबर 58 के नजदीक की वह कड़वी सचाई है, जिस से लोग रूबरू हो रहे हैं. यह उन सरकारी योजनाओं, सोच और बड़ी बयानबाजियों पर भी चोट है, जिन के जरीए समान अधिकारों से ले कर भेदभाव का जड़ समेत उखाड़ने की ताल छोटेबड़े मंचों पर ठोंकी जाती है. उत्तर प्रदेश राज्य के मुजफ्फरनगर जिले की खतौली तहसील के इस गांव का नाम है भूपखेड़ी. गांव की आबादी तकरीबन 4 हजार है, जिन में ज्यादातर अगड़ी जातियां हैं. इन में दलितों की तादाद 3 सौ के आसपास है. गांव के दलितों को हज्जाम के यहां बाल कटाने या हजामत बनवाने की इजाजत नहीं है. अगर कभीकभार वे कोशिश भी करते हैं, तो उन्हे बेइज्जत कर के भगा दिया जाता है.

दरअसल, गांव में अछूत होने के डर से बाल न काटने का सिलसिला सालों पुराना है. इस गांव के दलित दूसरे गांवों में बाल कटवाने के लिए जाते हैं. ठाकुर जाति की नई ग्राम प्रधान अनीता देवी ने इस भेदभाव को खत्म करने की ठानी. उन्होंने अपने पति मान सिंह को भी आगे किया और गांव में हज्जाम की दुकान चलाने वाले से बात की, तो उस ने दलितों के बाल काटने से इनकार कर दिया. उस का कहना था कि दूसरे ठाकुर इस के लिए मना करते हैं. उस के पिता या दादा ने भी कभी दलितों के बाल नहीं काटे, तो फिर वह ऐसा क्यों करे?

कुछ दलित इकट्ठा हो कर बाल काटने पहुंचे, तो उन के साथ गालीगलौज की गई. साथ मिलने से दलितों को हौसला बढ़ा, तो उन्होंने बाकायदा इस की लिखित शिकायत थाना रतनपुरी में की, लेकिन पुलिस का रवैया निराशाजनक रहा. उस ने कोई कार्यवाही करने के बजाय तहरीर ले कर रख ली. नतीजतन, गांव में दोनों बिरादरियों में तनाव हो गया. दलितों ने कलक्टर को भी ज्ञापन दिया. पुलिस प्रशासन ने इस भेदभावपूर्ण परंपरा को तोड़ने की कोशिशों में जुटे दलितों को सहारा देने या ठोस हल निकालने के बजाय कानून व्यवस्था न बिगड़े, इसलिए गांव में पुलिस को तैनात कर दिया. हज्जाम पर दलितों ने दबाव बनाया, तो उस ने दलितों के बाल काटने के बजाय दुकान बंद करना बेहतर समझा. उस ने साफ कर दिया कि कई ठाकुर ऐसा नहीं चाहते. ऐसी परंपरा पर पुलिस वाले भी हैरानी जताते हैं. गांव के दलितों को यह भेदभाव लंबे अरसे से कचोटता रहा है, लेकिन गांव में ठाकुर बिरादरी के लोग ज्यादा हैं, इसलिए कोई विरोध नहीं कर पाता. अछूत होने का डर भले ही हो, लेकिन गांव के दलित ठाकुरों के खेतों में मजदूरी भी करते हैं. दलितों की यह मजदूरी व छोटीमोटी नौकरी ही कमाई का जरीया है.

गांव के एक 90 साला दलित बुजुर्ग भिखारीदास से जब पूछा गया कि उन्हें याद है कि उन्होंने आखिरी बार गांव में बाल कब कटवाए, तो उन्होंने बताया कि जब पहली बार ही यहां बाल नहीं कटे, तो आखिरी बार कैसे कटेंगे. उन की बूढ़ी आंखों में बेबसी के साथ वह उम्मीद भी नजर आती है, जिस से दलितों को भेदभाव से छुटकारा मिल जाए. इसी गांव के दलित ऋषिपाल और उस की पत्नी शारदा कहते हैं कि उन्होंने अपने बच्चों के बाल कटवाने की कोशिश भी की, लेकिन अछूत होने का डर उन में भी था. शारदा जब कभी अपने बच्चों को हज्जाम की दुकान पर ले कर गई, तो खरीखोटी सुना कर चलता कर दिया गया. 45 साल के सलेख की 6 बेटियां और 2 बेटे हैं. न कभी उस के बाल गांव में कटे हैं और न उस के बच्चों के. बुजुर्ग मंगली को ऊंचा सुनाई देता है, लेकिन हर हलचल से वे वाकिफ हैं. इशारों और बातों में वे हमउम्र लोगों से इस पर चर्चा भी करते हैं. उन की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. वे कहते हैं कि पता नहीं, हज्जाम उन के बाल क्यों नहीं काटता? बाल कटाने की कोशिश करने पर मिली झिड़कियां उन्हें भी याद हैं.

दलित सुनील मजदूरी करता है. वह कहता है कि जब वह मजदूरी के लिए किसी दूसरी जगह जाता है, तो वहीं बालों की कटिंग करा लेता है. गांव में बाकी लोगों का हाल देख कर उस ने कभी कोशिश भी नहीं की. 70 साला जहरू और 55 साला सोमबीर भी ऐसे ही किस्से बयां करते हैं. साथ ही, वे सवाल भी करते हैं कि आखिर उन का गुनाह क्या है? उन्हें भी बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए. गांव का संजीव नामक नौजवान बीडीसी मैंबर है. वह गलत परंपरा को तोड़ना चाहता है, लेकिन कामयाब नहीं हो पा रहा है. गांव के नितिन वालिया, अभिषेक, प्रियांशु, प्रकाश, राजीव, प्रवेश, अवनीश, सुशील व रामभूल सभी इस परंपरा के खिलाफ हैं. वे इसे तोड़ना भी चाहते हैं. भेदभाव उन्हें हर वक्त कचोटता है.

ऐसा नहीं है कि आसपास के नेताओं को दलितों के इस भेदभाव की खबर नहीं है, बल्कि दलित उन के लिए महज वोटों का जरीया हैं. लोग बताते हैं कि चुनाव के समय नेता उन के महल्ले में आते हैं, तब वे बहुत अपनापन दिखाते हैं. बस, उसी वक्त लगता है कि गांव में कोई भेदभाव या ऊंचनीच की दीवार नहीं है. प्रधानपति मान सिंह का कहना है कि वे इस भेदभाव को खत्म करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें खुद ही विरोध का सामना करना पड़ रहा है. इस पूरे मामले में प्रशासनिक रवैया ढुलमुल है. सवाल है कि सालों से चली आ रही बुराई से दलितों को नजात कैसे मिले? उस के लिए क्या कोशिश की जाए?

‘खटिया विवाद’ में दब गई किसानों की बदहाली

कांग्रेस नेता राहुल गांधी की किसानों को यात्रा को प्रचार का तडका देने के लिये 5000 खटिया रैली स्थल पर खासतौर पर लाई गई. यह खटिया पूरी तरह से कमीशन बाजी का शिकार हो गई. खटिया इतनी घटिया क्वालिटी की बनी थी कि बैठते ही टूटने लगी. राहुल गांधी की सभा के खत्म होने के पहले ही सभा में आये लोग टूटी-फूटी घटिया क्वालिटी की खटिया तक लेकर भागने लगे. इन खटिया को देख कर लगता है कि यह किस तरह केवल देखने मात्र के लिये तैयार कराई गई थी.

राहुल कि किसान यात्रा पर खटिया विवाद इस कदर छा गया कि विरोधी दलो से लेकर मीडिया तक में किसान यात्रा की जगह पर खटिया विवाद हावी रहा. इसके पीछे कांग्रेसियों की ही साजिश नजर आती है. मीडिया को हवा देने में प्रशांत किशोर विरोधी गुट की भूमिका अहम है. राहुल की किसान यात्रा कांग्रेस की गुटबाजी का शिकार हो कर खटिया यात्रा में बदल गई.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने 6 सितम्बर को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले की रूद्रपुर विधानसभा के पंचलडी गांव से किसान यात्रा की शुरूआत की. यही दूधनाथ मंदिर परिसर में राहुल गांधी की पहली खाट सभा का आयोजन किया गया. दिल्ली, बिहार और लखनऊ से 5 हजार खटिया मंगवाई गई थी. यह बेहद खराब किस्म की थी. गाव में ऐसी खटिया आमतौर मरने के बाद होने वाले मृत्युभोज के समय दी जाती है. अपनी यात्रा की शुरूआत के पहले राहुल गांधी ने दूधनाथ मंदिर में पूजापाठ भी किया. यहां राहुल ने जल और बेलपत्र चढाकर पूजा की.

यात्रा को किसान इमेज से जोडने के लिये खटिया सभा के आयोजन की रूपरेखा तय की गई थी. कांग्रेस की उम्मीद थी कि राहुल की किसान यात्रा भट्ठा परसौल की तरह सफल हो सकेगी पर यहां खटिया विवाद ने किसान यात्रा के पूरे महत्व को खत्म कर दिया. खटिया विवाद में उलझी कांग्रेस ने अब तय किया है कि किसान यात्रा में आगे खटिया का प्रयोग नहीं किया जायेगा.

उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस इस बात पर फोकस कर रही है कि जिन 27 सालों में प्रदेश में कांग्रेस का राज नहीं रहा तभी प्रदेश बदहाल हो गया. उत्तर प्रदेश की 21 करोड आबादी में से करीब 17 करोड लोग गांव में रहते हैं. ऐसे में किसान यात्रा एक बेहतर कदम था. जिस तरह से खाट सभा का प्रचार कर गंभीर मुद्दे को नाटकीयता दी गई, उससे किसान यात्रा पर खटिया की लूट हावी हो गई.

राहुल गांधी प्रदेश के 233 विधानसभा क्षेत्रो से होकर 2500 किलोमीटर लंबी यात्रा कर रहे हैं. अपनी इस यात्रा में वह ग्रामीण युवाओं और किसानों की परेशानियों को दूर करने की बात कर रहे हैं. राहुल पार्टी में जान फूकने की तैयारी में लगे हैं तो कांग्रेसी नेता आपसी विवादों में उलझे हैं. कांग्रेस का मीडिया विभाग पूरी तरह से गुटबाजी में फंसा है. जिसकी वजह से बेमतलब का खटिया विवाद खडा हुआ और किसान यात्रा के मर्म को दबा गया.  

शबाना आजमी फिर बनेंगी लेडी माफिया डान

1999 में प्रदर्शित विनय शुक्ला की फिल्म ‘‘गाड मदर’’ में शबाना आजमी ने लेडी माफिया डान का किरदार निभाया था. इस फिल्म के लिए शबाना आजमी को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था. अब पूरे सत्रह वर्षों के बाद वह एक बार फिर लेडी माफिया डान का किरदार निभाने जा रही हैं. मगर इस बार वह इस किरदार को फिल्म नहीं, बल्कि  टीवी सीरियल में निभा रही हैं.

जी हां! जीटीवी पर प्रसारित हो रहे सीरियल ‘‘एक मां जो लाखों के लिए बनी अम्मा’’ में माफिया क्वीन का किरदार निभाने जा रही हैं. मजेदार बात यह है कि इस सीरियल में पहले लेडी डान का किरदार उर्वशी शर्मा निभा रही थी, मगर अच्छी टीआरपी नहीं मिली. तो निर्माताओं ने इस सीरियल की कहानी को आगे बढ़ाया. तो बड़ी उम्र के किरदार को करने से उर्वशी शर्मा ने इंकार कर दिया, तब इस किरदार के लिए शबाना आजमी को जोड़ा गया.

शबाना आजमी के पति जावेद अख्तर का जीटीवी से काफी पुराना संबंध है. वह इन दिनो जीटीवी के ही दूसरे चैनल ‘जी क्लासिक’ के लिए एक कार्यक्रम कर रहे हैं. इसलिए शायद जीटीवी के लिए शबाना आजमी को इस सीरियल से जुड़ने के लिए मनाना आसान रहा होगा.

शबाना आजमी ने फिल्म ‘‘गाड मदर’’ में गुजरात की लेडी माफिया डान संतोकबेन जडेजा की जिंदगी को परदे पर पेश किया था. जबकि सीरियल ‘‘एक मां जो लाखों के लिए बनी अम्मा’’ में वह सत्तर के दशक की पहली लेडी माफिया डान जेनाबाई दारूवाली के किरदार में नजर आएंगी.

‘बंधुआ’ में शाहरुख के साथ दीपिका नहीं, कटरीना होंगी

‘‘सरिता’’ पत्रिका ने चार माह पहले ही अपने पाठकों को बताया था कि शाहरुख खान और दीपिका पादुकोण के बीच दीवारें खिंच चुकी हैं. शाहरुख खान अब किसी भी फिल्म में दीपिका पादुकोण के साथ अभिनय नहीं करना चाहते. सबसे पहले ‘‘सरिता’’ पत्रिका ने ही लिखा था कि आनंद एल राय की फिल्म में शाहरुख खान के साथ दीपिका पादुकोण के होने की खबरें गलत हैं और यह खबरें सिर्फ दीपिका पादुकोण की तरफ से फैलायी जा रही हैं. ‘‘सरिता’’पत्रिका यह खबर भी सच साबित हो रही है.

शाहरुख और दीपिका के बीच उपजे नए समीकरण के ही चलते फिल्म ‘‘पद्मावती’’ में भी दीपिका की जगह शाहरुख खान व कंगना रानौट नजर आएंगे. तो वहीं  शाहरुख खान और आनंद एल राय के अति नजदीकी सूत्रों की माने तो आनंद एल राय की फिल्म ‘‘बंधुआ’’ में शाहरुख खान के साथ कटरीना कैफ का होना तय है. यह फिल्म 21 दिसंबर 2018 को प्रदर्शित होगी.

शाहरुख खान के साथ कटरीना कैफ पहले भी सफलतम फिल्म ‘‘जब तक है जान’’ कर चुकी हैं. तो वहीं हाल ही में रणबीर कपूर के संग ब्रेकअप के बाद जिस तरह से कटरीना कैफ ने कदम उठाया है. जिस तरह मीडिया के सामने आकर नए जोश के साथ खुलकर कहा कि है कि वह अपने प्रोफेशन के साथ अन्याय नहीं कर सकती, उससे भी काम के प्रति उनकी संजीदगी को लेकर लोगों में विश्वास बढ़ा है.

यूं तो दीपिका पादुकोण का नाम कट होने के बाद इस फिल्म से जुड़ने के लिए परिणीति चोपड़ा ने एड़ी चोटी का जोर लगाया था, मगर उनकी मेहनत बेकार साबित हुई.

‘मुबारकां’ का बनना तय, अर्जुन कपूर और अनिल कपूर खुश

तमाम उतार चढाव, तमाम विवादों के बाद अनीस बज़मी को अपनी फिल्म ‘‘मुबारकां’’ के लिए फिल्म निर्माता मिल ही गए. अब अनीस बज़मी की इस फिल्म का निर्माण ‘‘सोनी पिक्चर्स नेटवर्क प्रोडक्शन” के साथ अश्विन वर्दे और मुराद खेतानी की कंपनी ’’सिने वन स्टूडियो’’ कर रही हैं. फिल्म की शूटिंग नवंबर 2016 में शुरू होगी. यह फिल्म 28 जुलाई 2017 को प्रदर्शित होगी.

अनीस बज़मी ने जब इस फिल्म की घोषणा की थी, उस वक्त इस फिल्म में अभिषेक बच्चन अभिनय करने वाले थे, मगर अभिषेक बच्चन की फिल्मों की असफलता के चलते मामला बिगड़ता चला गया. फिर कई कलाकारों के नाम उड़ते रहे. बहरहाल,अब इस फिल्म में चाचा भतीजा यानी कि अनिल कपूर और अर्जुन कपूर के साथ इलियाना डिक्रूजा, आथिया शेट्टी और अमृता सिंह अभिनय कर रही हैं.

फिल्म ‘‘मुबारकां’’ के साथ अर्जन कपूर के जुड़ने से बौलीवुड से जुड़ कुछ लोगों को अर्जुन कपूर की किस्मत से जलन हो रही है. आम तौर बौलीवुड में कलाकार की एक फिल्म के असफल होते ही फिल्मकार उससे दूरी बना लेते हैं, मगर पिछले तीन वर्ष के दौरान ‘‘फाइंडिंग फैनी’’, ‘‘तेवर’’ और ‘‘की एंड का’’ सहित लगातार तीन असफल फिल्मों के बावजूद अनीस बज़मी ने अर्जुन कपूर में विश्वास जताया है.

बहरहाल, फिल्म ‘‘मुबारकां’’ के निर्देशक अनीस बज़मी अपनी इस फिल्म की पटकथा की तारीफ करते हुए नहीं थकते हैं. वह कहते हैं- ‘‘हमारी इस फिल्म की पटकथा अब तक की अति बेहतरीन पटकथा है. इसी वजह से मैंने इस फिल्म को निर्देशित करने का फैसला किया. हमारी इस फिल्म की सबसे हाईलाइट यह होगी कि पहली बार इस फिल्म में अनिल कपूर और अर्जुन कपूर की जोड़ी हास्य किरदारेां में नजर नजर आएगी.’’जबकि सोनी पिक्चर्स नेटवर्क की स्नेहा रजना कहती हैं-‘‘हम इस हास्य फिल्म का निर्माण करते हुए काफी उत्साहित हैं.’’ 

मेरी 2 बेटियां हैं. मैं चाहती हूं कि एक चांस और ले लूं. शायद बेटा हो जाए. क्या करूं.

सवाल

मैं 32 वर्षीया विवाहिता हूं. मेरी 2 बेटियां हैं, जबकि मेरे जेठ और देवर के 2-2 बेटे हैं. मेरी सास हमेशा मुझे ताना देती रहती हैं इसलिए मैं चाहती हूं कि एक चांस और ले लूं. शायद बेटा हो जाए. जबकि मेरे पति इस के लिए रजामंद नहीं हैं. उन का कहना है कि बेटियों को ही अच्छी तरह से पढ़ालिखा कर योग्य बनाएंगे. मैं क्या करूं?

जवाब

इतने प्रगतिशील युग में जब लड़कियां किसी भी क्षेत्र में लड़कों से कम नहीं हैं, आप ऐसी छोटी और दकियानूसी बातें कर रही हैं. स्वयं औरत हो कर ऐसी सोच रखती हैं, जबकि आप के पति की सोच प्रशंसनीय है. इसलिए आप को उन की सोच का समर्थन करना चाहिए और अपनी बच्चियों की अच्छी तरह परवरिश करनी चाहिए.

 

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जॉन अब्राहम बने अरुणाचल प्रदेश के ब्रांड एम्बेसेडर

पर्यटन रोज़गार का एक बड़ा माध्यम है इससे कई लोगो को काम मिलता है इसी सोच को ध्यान में रखते हुए ‘लैंड ऑफ़ राइजिंग सन’ अर्थात अरुणाचल प्रदेश के टूरिज्म विभाग ने बी ई वायोकॉम 18 के साथ मिलकर इसे पूरे देश-विदेश में फ़ैलाने का संकल्प लिया. उत्तरी पूर्वी प्रान्त का यह भाग अभी भी लोगो की पहुँच से दूर है.

सेवेन सिस्टर्स ऑफ़ इंडिया में अरुणाचल प्रदेश सबसे बड़ा क्षेत्र है. यहाँ की आबादी बहुत कम है हरे-भरे जंगलों से भरा यह राज्य पर्यटन के लिए ख़ास है.अभिनेता जॉन अब्राहम इस अभियान के ब्रांड एम्बेसडर हैं, उनका कहना है कि मुझे प्राकृतिक सुन्दरता बहुत पसंद है, सुदूर प्रान्त की यह खुबसूरती मेरे लिए खास है. इससे जुड़ना मेरे लिए खुशी की बात है.

जॉन अब्राहम नार्थ ईस्ट फुटबाल टीम के ओनर हैं और इससे पहले वे मैराथन ‘रन फॉर नार्थ ईस्ट’ में भी भाग ले चुके हैं. जीवन की आपाधापी से दूर उन्हें ये स्थान बहुत पसंद है. जॉन कहते हैं कि अगर आपने अरुणाचल प्रदेश नहीं देखा है तो आपको हमारे देश की खूबसूरती का पता नहीं चल पायेगा. मुझे बाइकिंग, फोटोग्राफी, राफ्टिंग सब पसंद है. यहां 85 प्रतिशत जंगल है. यहां की आबादी कम है और यही इस क्षेत्र की सबसे अधिक खास बात है. यहां के लोग बहुत साधारण हैं और मेहमान नवाज़ी को तवज्जों देते हैं. जिस तरीके से वे लोगो की आवभगत करते है वह काबिले तारीफ़ है. यहां की ‘जीरो फेस्टिवल’ को मैं एन्जॉय करना चाहता हूँ. जो 22 सितम्बर से 25 सितम्बर तक चलता है. इसके अलावा मेरी कोशिश यह रहेगी कि बॉलीवुड भी इस प्राकृतिक सुन्दरता को फिल्मों में अधिक से अधिक लायें.

अरुणाचल प्रदेश के टूरिज्म सेक्रेटरी जोरम बेडा कहते है कि अरुणाचल एक बहुत ही सुंदर जलवायु वाला प्रदेश है, यहाँ कुछ प्रतिबन्धित क्षेत्र भी हैं. जो विदेशी यहाँ आते हैं, उनकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाता है. पहले यहाँ की यातायात की व्यवस्था अच्छी नहीं थी, जो अब काफी अच्छी हो चुकी है. गौहाटी या इटानगर आने पर लैंड परमिट दी जाती है. इसे आसान बनाया गया है ताकि पर्यटक को कोई असुविधा न हो. यहाँ की संस्कृति और खुबसूरती को लोग जानते नहीं है. यहाँ आने से लोग डरते हैं, क्योंकि यहाँ आदिवासी हैं. लेकिन यह राज्य काफी बदल चुका है, यहाँ की मानसिकता बदल चुकी है. वे अब प्रोग्रेसिव विचार रखते हैं. यहाँ की फेस्टिवल काफी कलरफुल है. यह स्थान एथनिक और एक्सोटिक है.

पैरालम्पिक के लिए सबसे बड़ी भारतीय ब्रिगेड तैयार

ब्राजील के रियो डि जिनेरियो में ओलम्पिक खत्म होने के बाद पैरालम्पिक शुरु हो रहा है. 7 से 18 सितंबर तक चलने वाले पैरालम्पिक खेलों में 19 सदस्यीय भारतीय दल हिस्सा ले रहा है.

अपने अब तक के सबसे बड़े दल के साथ भारत ब्राजीलियाई महानगर रियो डी जनेरियो की मेजबानी में शुरू हो रहे पैरालम्पिक खेलों में हिस्सा लेने के लिए पूरी तरह तैयार है. रियो पैरालम्पिक में कुल 4300 पैरा एथलीट 23 खेलों में प्रतिस्पर्धा करते दिखेंगे.

भारत की तरफ से पदक की सबसे बड़ी उम्मीद भाला फेंक खिलाड़ी देवेंद्र झाझरिया हैं. एथेंस पैरालम्पिक 2004 में भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाने वाले झाझरिया का यह चौथा पैरालम्पिक है.

तींरदाजी के अलावा एथलेटिक्स, बोस्सिया, साइकिलिंग, पैरा कैनो, घुड़सवारी, फुटबाल (पांच खिलाड़ी और सात खिलाड़ी की टीम), गोलबॉल, जूडो, पैर-ट्रायथलॉन, पावरलिफ्टिंग, रोइंग, सेलिंग, निशानेबाजी, तैराकी, टेबल टेनिस, वॉलीबाल, व्हीलचेयर बास्केटबाल, व्हीलचेयर तलवारबाजी, व्हीलचेयर टेनिस, व्हीलचेयर रग्बी जैसे खेल भी इस साल इन पैरालम्पिक खेलों का हिस्सा होंगे.

भारत ने अब तक इन खेलों में कुल आठ पदक अपने नाम किए है जिनमें दो स्वर्ण, तीन रजत और तीन कांस्य पदक शामिल हैं. इन आठ पदकों में से एक स्वर्ण, तीन रजत और दो कांस्य एथलेटिक्स में मिले हैं. वहीं तैराकी और पावरलिफ्टिंग में एक स्वर्ण और एक कांस्य पदक हासिल हुआ है.

भारतीय पैरालम्पिक टीम

पुरुष

मारियप्पन थांगावेलु (ऊंची कूद)

वरुण सिंह भाटी (ऊंची कूद)

शरद कुमार (ऊंची कूद)

रामपाल चाहर (ऊंची कूद)

सुंगर सिंह गुर्जर (भाला फेंक)

देवेंद्र झाझरिया (भाला फेंक)

रिंकू (भाला फेंक)

नरेंद्र रनबीर (भाला फेंक)

संदीप (भाला फेंक)

अमित कुमार सरोहा (क्लब थ्रो)

धर्मबीर (क्लब थ्रो)

अंकुर धामा (1,500 मीटर दौड़)

बाशा फरमान (पावरलिफ्टिंग)

सुयश नारायण जाधव (तैराकी)

नरेश कुमार शर्मा (निशानेबाजी)

महिला

पूजा (तीरंदाजी)

दीपा मलिक (गोला फेंक)

करमज्योति दलाल (चक्काफेंक)

फोन की लॉक स्क्रीन को मनोरंजक बनाएगा ये एप

फनलॉकर सुविधाजनक तरीके से डिजाइन किया गया एंड्रॉयड एप है. सुंदर वॉलपेपर के साथ-साथ यह एप खास तौर पर आपके मनोरंजन के लिए इंटरनेट की दुनिया से छांटी गई ट्रेंडिंग न्यूज, वीडियो, गाने, गेम्स, स्कोर और फोटो आपके फोन की लॉक स्क्रीन पर ही दिखा देता है.

लॉक स्क्रीन पर दिखाएगा सबकुछ

Funlocker app से आप किसी भी नई खबर, नए मूवी ट्रेलर, नए गाने या आपके पसंदीदा कलाकारों के फोटो से अनभिज्ञ नहीं रहेंगे, क्योंकि ये सब आपके पर ही मौजूद रहेंगे. इन सबके के अलावा इस एप में सुंदर वॉलपेपर थीम भी है जिनका उपयोग कर के आप अपने पसंदीदा स्टार्स को अपनी लॉकस्क्रीन पर दिन-रात निहार सकते हैं. क्रिकेट स्कोर के लिए भी आपको कोई एप या ब्राउजर खोलने की जरूरत नहीं है, क्योंकि वह भी आपकी लॉक स्क्रीन पर ही उपलब्ध रहेगा.

दिखाएगा सुन्दर वॉलपेपर थीम्स

Funlocker की विभिन्न विशेषताओं में से सबसे खास विशेषता है इनकी सुन्दर वॉलपेपर थीम्स, जिसके जरिये आप अपने फोन की लॉक स्क्रीन को अलग-अलग तरह की थीम जैसे आपके पसंदीदा व्यक्ति, प्यारे पशु-पक्षी, बेहतरीन कारें, बाइक, प्रकृति या अन्य की वॉलपेपर फोटो के साथ सजा सकते हैं. 200 से अधिक थीम गैलरियों को आपके फोन के रेजोलूसन के हिसाब से अनुकूल किया गया है ताकि यह सब फनलॉकर के मीडिया लॉक स्क्रीन पर के दृष्टिकोण में सुंदर तरीके से समाहित हो सके और आप एक क्लिक में मनोरंजन का लुत्फ ले सकें.

अंग्रेजी के साथ 9 भाषाओं में करता है काम

फनलॉकर के सह-संस्थापक पीयूष पॉल का कहना है, हम दुनिया भर के स्मार्ट फोन उपयोगकर्ताओं के लिए मीडिया उपयोग को आसान बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. दुनिया के सिर्फ छह फीसदी लोग अंग्रेजी भाषा का उपयोग करते हैं लेकिन इंटरनेट पर अंग्रेजी भाषी वेबसाइट्स का शासन है, जिससे अन्य भाषाओं के मोबाइल उपभोक्ताओं को अपने पसंदीदा मनोरंजक साधनों तक पहुंचने के लिए बहुत सारी अंग्रेजी भाषी वेबसाइट्स को खंगालना पड़ता है. उन्होंने कहा, फनलॉकर इसी मनोरंजन केंद्रित मोबाइल सफर को आसान बनाने में लगा है, और जल्द ही आप यह एप हिंदी और इंग्लिश के साथ-साथ, 9 और भाषाओं में इस्तेमाल कर पाएंगे.

हर चीज से अपडेट रखेगा ये एपकई अध्ययन रिर्पोटों में विवरण दिया गया है कि आज का युवा अपना फोन दिन में पचास से अधिक बार उठा कर अनलॉक करता है. फनलॉकर इसी अनलॉक करने की गतिविधि को एंटरटेनमेंट और मजे से भरपूर तो बनाता ही है, पर उसके साथ-साथ उपयोगकर्ता को दुनिया भर की नवीनतम फैशन, म्यूजिक, राजनयिक खबरों इत्यादि से अपडेट भी रखता है.

सोशल मीडिया में वायरल हुआ शाहरुख खान की पहली फिल्म का वीडियो

बॉलीवुड के बादशाह और लाखों करोड़ों दिलों की धड़कन बन चुके शाहरुख खान आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. बच्चे से लेकर बुजुर्गों तक हर उम्र के लोग उनकी फैन लिस्ट में शामिल हैं. खासतौर पर आज के युवा वर्ग पर उनका जादू सर चढ़कर बोलता है. एक सुपरस्टार के रूप में उन्हें मिली यह पहचान महज संयोग की बात नहीं है. इस सफलता के पीछे छिपी है उनकी कड़ी मेहनत और संघर्ष.

70 से ज्यादा फि‍ल्में, 8 से ज्यादा अवॉर्ड अपने नाम करने वाले बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान के साथ हर डायरेक्टर और प्रोड्यूसर काम करना चाहता है. लेकि‍न कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें शाहरुख के साथ काम करने का मौका मि‍ला. बादशाह आमतौर पर अपने दोस्तों के साथ ही काम करना पंसद करते हैं. आपको सुन कर अजीब लगेगा लेकि‍न शाहरुख के पास मुन्भानाई से लेकर भुवन बनने तक का मौका था. जी हां, मुन्नाभाई एमबीबीएस के लि‍ए सबसे पहले शाहरुख से बात की गई थी. सोचने वाली बात यह है कि‍ अगर ये फिल्में भी बादशाह के नाम दर्ज हो जातीं तो बॉलीवुड में उनका मुकाबला शायद कोई भी न कर पाता.

पर सोशल मीडिया में हाल ही में वायरल हो रही उनकी ये फिल्म कुछ खास है. असल में ये फिल्म तब बनी थी जब आज से 25 साल पहले शाहरुख ने बॉलीवुड की शुरुआत की थी. इस फिल्म को करने के लिए शाहरुख को 3000 रुपये मिले थे.

आप भी देखिए ये फिल्म और पहचानिए अपने चहेते स्टार को.

वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें

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